Tuesday, June 11, 2019

बीकानेर संभाग की सबसे बड़ी जीत के मायने भी हैं बड़े!



टिप्पणी
गंगानगर लोकसभा से भाजपा उम्मीदवार निहालचंद मेघवाल ने चार लाख से ज्यादा मत प्राप्त कर न केवल अपना पिछला रिकॉर्ड दुरुस्त किया बल्कि संभाग के तीनों लोकसभा क्षेत्रों में उन्होंने सबसे बड़ी जीत भी दर्ज की है। यह निहालचंद का अब तक का सातवां चुनाव था, जिनमें उनको पांच में उन्हें सफलता मिली है। इस तरह उन्होंने गंगानगर से पांच बार सांसद बनने के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है। इससे पहले इस सीट से कांग्रेस के पन्नालाल बारूपाल 1952 से लेकर 1971 तक लगातार पांच बार सांसद रहे थे। खास बात यह है निहालचंद ने पिछले दो चुनाव लगातार जीते हैं। संभाग के तीनों सांसदों में निहालचंद के साथ यह उपलब्धि भी जुड़ी है कि वो सबसे ज्यादा बार सांसद बने हैं। वैसे तो गंगानगर लोकसभा क्षेत्र श्रीगंगानगर जिले के पांच विधानसभा तथा हनुमानगढ़ जिले के तीन विधानसभाओं से मिलकर बना है लेकिन संभाग के दो अन्य लोकसभा क्षेत्रों में भी इन दोनों जिलों की सहभागिता है। इस तरह से हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर जिले के 11 विधानसभाओं के मतदाताओं की पहली पसंद भाजपा रही है। यह बात दीगर है कि नवम्बर में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में गंगानगर लोकसभा की आठ सीटों पर कांग्रेस व भाजपा में मुकाबला बराबरी का था, लेकिन लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने भाजपा को बढ़त दी। इसी प्रकार चूरू लोकसभा में शामिल हनुमानगढ़ की दो विधानसभाओं में एक पर माकपा व एक पर कांग्रेस काबिज हुई थी लेकिन लोकसभा चुनावों में इन दोनों विधानसभाओं में भी भाजपा जीतने में सफल रही है। बीकानेर लोकसभा में शामिल अनूपगढ़ विधानसभा क्षेत्र से भी दोनों ही चुनाव में भाजपा जीती है। गंगानगर लोकसभा से निहालचंद की जीत से साफ जाहिर है कि आठों विधानसभाओं में न तो कांग्रेस का जादू चला और न ही उनके विधायकों का। और तो और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से बागी होकर चुनाव लडऩे वाले को फिर से पार्टी में शामिल करने का निर्णय भी कोई करिश्मा नहीं दिखा सका। बड़ी जीत के साथ ही निहालचंद मेघवाल के समर्थकों में उनको मंत्री बनाने की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, हालांकि बातचीत में निहालचंद कहा कि वो पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता बनकर ही काम करना पसंद करेंगे। लेकिन केन्द्र से मंत्री बनने का प्रस्ताव आने के सवाल पर वो हामी भी भरते हैं। जीत के बाद अपनी प्राथमिकताओं में निहालचंद ने श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज व हनुमानगढ़ में रेलवे की वाशिंग लगाया बताया। मतदाता यह तो मानते हैं कि निहालचंद के कार्यकाल में रेल सुविधाओं में विस्तार हुआ लेकिन मंत्री पद रहते जो होना चाहिए था, वैसा हुआ नहीं। खैर, इस बार जीत बड़ी है। मतदाताओं ने इस विश्वास के साथ निहालचंद में विश्वास जताया है उससे उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उम्मीद की जानी वो लोकसभा के सभी क्षेत्रों को बिना किसी राजनीतिक चश्मे के समान रूप से देखेंगे क्योंकि इस बार सभी विधानसभाओं के मतदाताओं ने उनकी झोली भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 24 मई 19 के अंक में प्रकाशित ।

शाबाश श्रीगंगानगर!

टिप्पणी 
‘सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं होता।’ ‘सरकार स्कूलों में तो सिर्फ औसत अंक वाले बच्चे पढ़ते हैं।’ ‘सरकारी स्कूलों में अध्यापकों के पद रिक्त रहते हैं।’ लंबे समय से सुने जा रहे इन परम्परागत जुमलों का अर्थ व मायने अब बदलने लगे हैं। बारहवीं विज्ञान, वाणिज्य तथा बुधवार को आए कला वर्ग के परीक्षा परिणामों ने साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी की बपौती नहीं होती। इन परिणामों में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों ने भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। विशेषकर श्रीगंगानगर जिले के संदर्भ में तीनों संकायों के परिणामों को देखें तो वाकई यह खुशी की बड़ी वजह बन रहे हैं। सरकारी स्कूल की बालिका गीता ने तो कला वर्ग में समूचे प्रदेश में अव्वल आकर उस मिथक को भी तोड़ दिया है कि सिर्फ निजी स्कूलों के बच्चे ही अच्छे अंक प्राप्त करते हैं। दरअसल, श्रीगंगानगर जैसे कृषि आधारित जिले के लिए गौरव की बात इसलिए भी है कि इस बार वाणिज्य वर्ग में वह पूरे प्रदेश में दूसरे स्थान पर रहा है। इसके अलावा यह परिणाम खास इसीलिए भी हैं कि क्योंकि इस बार सरकारी स्कूलों के परिणाम में उत्साहजनक सुधार हुआ है। आंकड़ों की बात करें तो वार्णिज्य वर्ग में 16 में 13 सरकारी विद्यालयों का परिणाम शत-प्रतिशत रहा है। इसी तरह विज्ञान वर्ग में 49 में से 31 सरकारी विद्यालयों का परिणाम सौ फीसदी रहा है। थोड़ा विस्तार में बात करें तो वाणिज्य वर्ग में 681 विद्यार्थियों में से 661 विद्यार्थी सफल रहे हैं। इनमें 461 प्रथम श्रेणी से उत्तीण हुए हैं। इसी तरह, विज्ञान वर्ग में कुल 4651 विद्यार्थियों में 4194 उत्तीर्ण हुए हैं। इनमें 3349 प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए हैं। कला वर्ग का परिणाम भी उत्साहजनक रहा है। कुल 17724 विद्यार्थियों में से 8522 प्रथम श्रेणी तथा 6606 द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हुए हैं। यह परिणाम इसीलिए भी अलग हैं कि क्योंकि सभी संकायों में बेटियों ने बेटों से ज्यादा अंक प्राप्त किए हैं।
देखा जाए तो सरकारी स्कूलों के परिणााम सुधरने के पीछे कई कारण रहे हैं। विद्यार्थियों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करने के लिए कई तरह की योजनाएं तथा इनाम व छात्रवृत्तियों की बड़ी भूमिका है। इसके लिए सरकारी स्कूलों में रिक्त पदों के भरने से भी काफी असर पड़ा है। इन सबके अलावा अभिभावकों का सरकारी स्कूलों में विश्वास जताना भी बड़ा कारण माना जा रहा है। सरकारी स्कूलों में बढ़ता नामांकन यह बताता है कि अभिभावक फिर से सरकारी स्कूलों की ओर रुख करने लगे हैं।
प्रदेश स्तर पर श्रीगंगानगर की पहचान खेती व खेलों के लिए है, लेकिन इस बार शिक्षा के क्षेत्र में भी उसने दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई है। यह उपलब्धि बड़ी है। इस बड़ी सफलता के लिए विद्यार्थी, उनके अध्यापक व अभिभावक सभी बधाई के पात्र हैं। अभिभावकों की सोच व अध्यापकों की मेहनत के चलते नि:संदेह प्रदर्शन में साल दर सुधार आएगा तथा सरकारी स्कूलों के बारे में बनी धारणा भी टूटेगी, ऐसी उम्मीद करनी चाहिए।

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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 23 मई 19 के अंक में प्रकाशित। 

मेरी आंध्रा यात्रा- 11

यकीन मानिए किसी अनहोनी की आशंका में मेरी आंखों से नींद गायब हो चुकी थी। एक मित्र को फोन लगाकर सारे घटनाक्रम से अवगत कराया। उससे मदद का आग्रह भी किया लेकिन वहां से भी जवाब आया नहीं। सच में बहुत डरा हुआ था। किसी तरह रात बीती। सुबह जल्दी तैयार होकर चेक आउट करने आया। और पांच रुपए का नोट थमाया तो उसने सारे रख लिए। मैंने कहा बात तो एक हजार की हुई थी, बोला नहीं 11 सौ ही लगेंगे। मैं ज्यादा उलझा नहीं। अपना बैग उठाया और सड़क पर आ गया। सामने एक टैम्पों को हाथ दिया। स्टेशन छोडऩे के उसने पचास रुपए मांगे। मैंने कहा आधा किलोमीटर तो है भी नहीं है और पचास रुपए किस बात के। वह कहने लगा रास्ता इधर से नहीं है घूमकर जाना पड़ेगा। मैं उसकी चालाकी समझ रहा था। दो गलियां घूमाने के बाद वह वापस उसी सड़क पर आया जहां से कुछ दूरी पर मैंने ऑटो पकड़ा था। मैं उसकी चालाकी पर मुस्करा रहा था। खैर, उसको पचास का नोट थमाकर मैं टिकट काउंटर की तरफ बढा। विजयवाड़ा की टिकट मांगी तो उसने कहा उसने कहा अभी कोई ट्रेन नहीं है। मैंने जब भी है टिकट तो दे। उसके टिकट लेकर प्लेटफार्म नंबर पूछकर मैं सीढियां चढ़ गया। सुबह के आठ बज चुके थे। प्लेटफार्म नंबर दस। महिला कर्मचारी स्टेशन की सफाई करने में जुटी थी। पूरा स्टेशन एकदम साफ सुथरा। तभी आंध्रा एक्सप्रेस आकर रुकी। यह ट्रेन दिल्ली के लिए थी। पूरी की पूरी वातानुकूलित। मैं आराम से एक कुर्सी पर बैठा ट्रेन रवानगी का इंतजार करने लगा। चूंकि मेरे पास सामान्य टिकट था, इस कारण नजर टीटीई को भी खोज रही थी कि उससे पहले पूछ लूं कि टिकट अंदर बन जाए तो मैं बैठूं, क्योंकि मैं उस ट्रेन में बैठने का पात्र नहीं था। नौ बजकर बीस मिनट के करीब सफेद ड्रेस में एक जना दिखाई दिया। मेरी आंखों में थोड़ी चमक आई। मैं उसकी तरफ बढ़ा और एक्सक्यूज मी, मुझे विजयवाड़ा जाना है। क्या मैं इस ट्रेन में यात्रा कर सकता हूं। मेरे पास सामान्य टिकट है। मेरी बात सुनकर टीटीई ने कहा साढ़े पांच सौ रुपए लगेंगे, आप किसी भी डिब्बे में बैठ जाएं। एक लंबी सांस छोड़ते हुए खुद को रीलेक्स महसूस करते हुए मैं एक डिब्बे में सवार हो गया। लगभग सीट खाली पड़ी थी। बैठ सीट के नीचे के लगाया और लैबटॉप ऊपर की बर्थ पर रखकर दिया। मैं अब टीटीई का इंतजार कर रहा था। साढ़े पांच सौ रुपए व सामान्य टिकट मैंने हाथ में रखे हुए थे। करीब आधा घंटे बाद वह आया मैंने टिकट मांगा तो हाथ से इशारा करके मुझे रुकने की कहकर वह आगे बढ़ गया। बीच में टीटीई कई बार आया मैने पांच सौ पचास रुपए और टिकट उसकी तरफ िकया लेकिन लेकिन उसने न तो टिकट बनाई न ही सीट दी। बस इतना कहा वेट कीजिए। इस दौरान काफी स्टेशन आए और सभी सीट भर चुकी थी। अब मेरी पास खड़ा रहकर यात्रा करने के अलावा कोई चारा नहीं था। कोच के अंदर खड़ा होना भी कोई आसान काम नहीं है। आने जाने वालों के कारण मुझे बार बार एक तरफ होना पड़ रहा था। इन सबसे बचने के लिए मैं कोच से निकलकर दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया....तभी वहां एक युवक आया। मेरी आदत है सो पूछ लिया कहां जाओगे , उसने बताया राजस्थान। इतना सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई... तेलुगू बाहुल्य इलाके में कोई हिन्दी भाषी तो मिला....खैर, मैंने पूछा राजस्थान.में कहां से, जवाब आया झुंझुनूं से....मैंने फिर पूछा झुंझुनूं में कहां से, तो जवाब मिला.पिलानी। पिलानी या कोई गांव? तो बताया गया जसवंतपुरा। सुनकर खुशी हुई। मैंने भी कहा मैं भी झुंझुनूं से ही हूं...यह.जानकर उस बीएसएफ जवान.के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई..वह जल्दी में था..नाम नहीं पूछ पाया न बता पाया। युवक चला गया। इस बीच टीटीई फिर टकराया मैंने फिर सीट के लिए पूछा तो उसने कहा कहा बी 4 में सीट नंबर 71 खाली हो रही है। वहां चले जाओ। जब सीट 71के लिए मैं उस कोच को क्रोस कर दूसरे कोच में जाने लगा तो पीछे से आवाज आई...मुडकर देखा तो वही जवान अडेंटेड की सीट पर सोते हुए पूछ रहा था सीट मिल.गई क्या..मैंने स्वीकृति में.सिर.हिलाया तो उसके चेहरे पर फिर.मुस्कान थी। मैं निर्धारित सीट पर आकर बैठ गया। करीब दस मिनट बाद ही टीटीई आया और इशारा किया मैंने फिर पांच सौ पचास और टिकट निकाले और उसको दे दिए....उसने पचास का नोट और टिकट मुझे फुर्ती से वापस थमाए और बडी तेजी से आगे बढ गया....मैं आवाज लगाता ही रह गया लेकिन वह नहीं रुका। मेरे सामने बैठे शख्स पोल्लाराव हंसने लगे। टिकट नहीं दी मतलब पांच सौ का नोट गया जेब में.....विजयवाड़ा आने को था, एेसे में टीटीई को तलाशना मेरे लिए संभव नहीं था। और तलाश भी लेता तो शायद वह मुझे टिकट नहंी देता। खैर, करीब चार बज चुके थे। मैं विजयवाड़ा स्टेशन उतरा। स्टेशन से बाहर की तरफ आया। एक ऑटो से बोला मुझे एेसी जगह छोड़ दे जहां होटल भी हो और मारवाड़ी भोजनालय की व्यवस्था हो। उसने हामी में सिर हिलाया और एक होटल ले आया।
क्रमश:

मेरी आंध्रा यात्रा-10

चुनाव के चलते रास्ते में सुरक्षा बलों ने हमारी कार रुकवाई। मेरा सारा सामान चैक किया और हम फिर आगे बढ़े। अब विजयनगम आ गया था। बताता चलूं कि विजयनगरम, पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री अशोक गजपति राजू का शहर है। राजू राजसी परिवार से आते हैं और तेलुगूदेशम पार्टी के नेता है। शहर में उनका प्राचीन महल भी है। इसके आधे हिस्से में अब कॉलेज संचालित होता है, एक तरफ उनका आवास है। वहीं एक नीबू पानी की रेहड़ी पर हम रुके हैं और कार चालक वेंकट के आग्रह पर नमकीन शिंकजी पी। यहां रेहड़ी वाले ने डस्टबीन लगा रखा था। शिकंजी पीने वाले डिस्पोजल गिलास उसी में डाल रहे थे। सफाई व्यवस्था यहां भी अच्छी नजर आई। दोपहर हो चुकी थी। तय कार्यक्रम के हिसाब से मुझे विजयनगरम ही रुकना था लेकिन बाद में पता चला कि मैं तो उत्तर की बजाय दक्षिण में आ गया हूं, इसलिए वापस विशाखापट्टनम जाना ही बेहतर समझा। इसलिए वेंकट को कहा कि मुझे फिर से विशाखापट्नम ही छोड़ दे। विजयनगरम शहर का एक चक्कर लगाने के बाद हम वापस विशखापट्नम की ओर चल पड़े। रास्ते में एक जगह वेंकट ने डेढ़ सौ साल से से ज्यादा पुराना चर्च दिखाया। दरअसल इस इलाके में अंग्रेज काफी पहले आ गए थे। इस कारण अंग्रेजों से जुड़ी कई चीजें आज भी यहां हैं । इस क्षेत्र के विकसित होने का बड़ा कारण अंग्रेजों का यहां आना भी है। आगे बढ़े तो ऋषिकोण्डा बीच आया। वेंकट ने कहा सर भूख लगी है क्यों न भोजन कर लिया जाए। मैंने कहा चपाती वाले रेस्टारेंट पर चलें लेकिन वहां चपाती नजर नहीं आई। आखिर वेंकट की तरह मुझे भी चावल, दाल व दही से काम चलाना पड़ा। कुछ सब्जियां और भी लेकिन वह में नहीं खा पाया। हां चावल के लिए मेरा चम्मच मांगना और फिर चम्मच से खाते देख कई लोग चौंके जरूर क्योंकि वे सब बिना चम्मच के हाथों से खा रहे थे। वह भी अंगुलियों के बजाय पूरे हाथ से मुट्ठी भर के। भोजन के उपरांत वेंकट ने कहा सर, आप थोड़ा बीच देख आएं तब मैं भी धूम्रपान कर लेता हूं। दोपहर हो चुकी थी। धूप व तेज गर्मी के कारण मैं पसीना पसीना हो गया। एसी गाड़ी में लंबा सफर करने के बाद यकायक बाहर आने से वैसे भी गर्मी ज्यादा लगती है। ऋषिकोंडा बीच के किनारे पहाड़ पर आंध्र्रप्रदेश पर्यटन विभाग की ओर से पर्यटकों के लिए बंगले बनाए गए हैं, जो कि 12 घंटे के हिसाब से रेंट पर मिलते हैं। बीच एकदम साफ सुथरा। गंदगी तनिक भी नहीं। बीच किनारे डस्टबीन रखे हुए थे। दस मिनट यह सब देखने के बाद मैं कार की तरफ पलटा। मुझे आता देख वेंकट ने हाथ हिला दिया था। हम चल पड़े विशाखापट्टनम की ओर। बातों ही बातों में मैंने शिपिंग यार्ड की चर्चा की तो वेंकट सीधा मुझे वहीं ले गया। चारों तरफ मछलियों की गंध। बहुत बड़ी मंडी सजी थी। यहां से जिंदा मछलियां बड़ी मात्रा में निर्यात होती हैं। जिधर देखो नाव ही नाव। जहां तक नजर जाए नाव ही नाव। यहां से ड्राई मछलियां भी खूब निर्यात होती हैं। महिलाएं ड्राई मछलियों की दुकानों पर बैठी नजर आई। सड़कों पर मछलियों को सुखाया जाता है। मैं थोड़ी देर कार से उतर कर वहां घूमा लेकिन मछलियों की तेज गंध ने सांस लेना मुश्किल कर दिया। फोन की बैटरी खत्म हो चुकी थी और पावर बैंक भी लगभग जवाब दे गया था, लिहाजा मैं जल्दी से कार में आया और चल पड़े। इसके बाद वेंकट मुझे पुराने विशाखापट्नम लेकर गया। यहां अंगे्रजों के जमाने की बनी करीब दो सौ साल पुरानी स्कूल का भवन दिखाया। नए विशाखापट्टनम की बजाय पुराना शहर थोड़ा संकरा है। मैंेने वेंकट से आग्रह किया वह मुझे रेलवे स्टेशन के आसपास किसी होटल में छोड़ दे ताकि मैं दूसरे दिन अलसुबह किसी और शहर के लिए निकल सकूं। वह मुझे होटल ले गया। होटल वाले ने एक हजार में एसी रूम बताया और एक युवक को कमरा दिखाने को कहा। वह युवक दूसरे होटल लेकर गया और कमरा दिखा दिया। मैं आश्वस्त था कि एक हजार का बोला है तो एक हजार का होगा। खैर, यह दिमाग लगाने से पहले मैं पहले मैंने वेेकट का भुगतान करना बेहतर समझा। । मैंने दो हजार रुपए निकाले और इस उम्मीद से कि वेंकट मुझे चार सौ रुपए लौटाएगा। उसने कहा सर जी दो सौ रुपए और दीजिए। मैं चौंका यह सब कैसे। बोला 120 के बाद हर दस किलोमीटर का सौ रुपया होगा। गाड़ी 188 चल गई। मैं उसकी चालकी पर हैरान था। मैं सोच रहा था कि इसको खाना खिलाया है तो यह एहसानमंद होकर यह सब दिखा रहा था। खैर, ना चाहते हुए दो सौ रुपए और दिए। अब कहने लगा सर, टीप तो दीजिए। मैंने हाथ जोड़ लिए और कहा जो खाना खिलाया उसको टीप समझो मुझे अब माफ करो। वेंकट का हिसाब कर मैं होटल आया और कमरे में घुसा तो वह गर्मी से भभक रहा था। अपना सामान जमाने के बाद मैंने एसी ऑन किया तो तो वह नहीं चला। । मैं काउंटर पर गया और युवक से कहा कि एसी चलाओ, तो वह पलट कर बोला एक हजार में नॉन एसी कमरा मिलेगा। मैंने कहा कि मुझे एक हजार ही बताया तो पास खड़े दूसरा युवक जो संभवत: नशे में था, बिलकुल घूरने वाले अंदाज में बोला। आप को रहना है तो रहिए वरना अपना सामान उठाइए और दूसरे होटल चले जाइए। अजनबी जगह और मुंबइया फिल्मों के के टपोरी टाइम गुंडों जैसे युवक देखकर सच में मैं डर गया । मन ही मन में सोचा आज तो फंस गए हैं, खैर भगवान ही मालिक है। तभी एक युवक बोला है ठीक है एसी ऑन करते हैं आप अपने कमरे में जाइए। मैं कमरे में आ तो गया लेकिन घबराहट के कारण नींद गायब थी। मैंने रूम के अंदर की चिटखनी लगाई और लेट गया।
क्रमश:

लाइलाज मर्ज !

टिप्पणी..
अगर आप वाहन चालक हैं और कभी गोलबाजार में गाड़ी पार्क की है तो यकीनन यातायात पुलिस से आपका वास्ता जरूर पड़ा होगा। गोलबाजार में किसी चौक पर पार्क करने वाली गाड़ी को यातायात पुलिस के जवान क्रेन से उठाकर यातायात थाने में ले जाकर खड़ा कर देते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि गोलबाजार में पार्किंग के लिए कोई स्थान ही नहीं है। बिना पार्किंग एरिया में गाड़ी खड़ा करना कानूनन अपराध है। इसके लिए आपको जुर्माना भी देना पड़ता है। ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि जब तक कार्रवाई का भय नहीं होगा, कानून की पालना करवाना संभव नहीं होगा। तभी तो गोलबाजार में वाहनों की पार्किंग उतनी नहीं होती, जितने शहर के अन्य स्थानों पर होती है। शहर का कोई भी प्रमुख मार्ग या गली ऐसी नहीं है जहां वाहन न खड़े हों। यह तो गनीमत है कि यहां की सडक़ें अपेक्षाकृत चौड़ी हैं, इस कारण यातायात बाधित नहीं होता। बावजूद इसके गोलबाजार जैसी सख्ती व तत्परता शहर के अन्य हिस्सों में दिखाई नहीं देती।
निजों बसों के रूट में परिवर्तन करने का काम जरूर राहत भरा है, लेकिन अकेले इससे बात नहीं बनने वाली। शिव चौक से जिला अस्पताल तक सडक़ के दोनों तरफ वाहनों का जबरदस्त जमावड़ा है। यूआइटी की मेहरबानी से यहां अच्छी भली चौड़ी सडक़ को सौन्दर्य के नाम पर संकरी कर दिया गया है। यहां खड़े होने वाले वाहनों पर न तो यातायात पुलिस की नजर जाती है और न ही सडक़ पर बजरी-रेता बेचने वालों के खिलाफ यूआइटी कोई कदम उठाती है। ऐसा लगता है यातायात पुलिस और यूआइटी दोनों ने यहां कुछ भी करने की खुली छूट दे रखी है। इसी तरह चहल चौक चले जाएं। शॉपिंग मॉल में आने वालों की वजह से यहां दिनभर जाम की स्थिति रहती है। शाम को हालात और भी खराब हो जाते हैं। रोडवेज बस स्टैंड के आगे, कोडा चौक, बीरबल चौक, रेलवे स्टेशन आदि जगह भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। इतना ही नहीं शहर के छोटी-छोटी गलियों में भी आधा रास्ता यह वाहन रोकते हैं। आवासीय कॉलोनी में व्यावसायिक गतिविधियां होने के कारण वाहनों की आवाजाही लगी रहती है।
शहर के अंदरुनी यातायात की सर्वाधिक बैंड मैरिज होम वाले बजाते हैं। अधिकतर के पास पार्किंग की व्यवस्था ही नहीं है। इतना ही नहीं है कुछ मैरिज होम के जनरेटर सडक़ पर चलते हैं। शादी समारोह में आने वाले वाहनों के चलते सडक़ संकरी हो जाती है। इससे वाहन रेंग-रेंग कर चलते हैं। आखिर कौन है इस अव्यवस्था का जिम्मेदार। कमाई कोई करे और संकट कोई झेले, ऐसा क्यों? यातायात पुलिस ने शायद ही किसी मैरिज होम के बाहर अवैध रूप से खड़े वाहनों पर कार्रवाई का डंडा चलाया होगा। इस अव्यवस्था के लिए वो तमाम विभाग जिम्मेदार हैं, जो इन मैरिज होम को एनओसी जारी करते हैं। आमजन को तकलीफ में डालकर या रास्ता बाधित करके कारोबार करने वालों पर कारगर कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर कब तक आमजन इस अव्यवस्था के बीच पिसता रहेगा।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 19 मई 19 के अंक में प्रकाशित 

मेरी आंध्रा यात्रा-9

सबसे बड़ी बात यह है कि यह पच्चीस किलोमीटर की दूरी टॉलीवुड (तेलुगू सिनेमा) के लिए प्रकृति प्रदत फ्री गिफ्ट है। इस मार्ग पर कई आकर्षक लोकेशंस हैं, जहां साल भर फिल्मों की शूटिंग चलती रहती है। नारियल व काजू के पेड़ यहां बहुतायत में है। सड़क से बंगाल की खाड़ी की तरफ छोटी-छोटी पहाडि़यां है, जो पानी के थपेड़े खाकर चिकनी व छोटी हो गई हैं लेकिन दूसरी तरफ ऊंचे पहाड़ हैं। हालांकि पहाड़ पूरे २५ किमी तक नहीं हैं। विशाखापट्टनम से भिमली बीच तक पहाड़ हैं। सड़क पहाडों व बंगाल की खाड़ी के बीच विभाजक का काम करती है। पहाड़ों पर भी ऊंची-ऊंची इमारतें बनी हुई हैं। रास्ते में एक पहाड़ की तरफ इशारा करके कार चालक वेंकट ने बताया है यह रामोजी का फिल्म स्टुडियो है। मैंने उस तरफ देखा पहाड़ की चोटी तक सड़क बनी है। सड़क पर शूटिंग वाले वाहनों की कतार लगी थी। ऊपर महलनुमा इमारत दिखाई दी। मैंने चलते-चलते ही यह सब देखा। स्टुडियो के मालिक डा. रामनायडु दागुबाती फिल्म निर्माता हैं तथा पूर्व सांसद रहे हैं। रामोजी का इतना ही परिचय शायद आपके लिए काफी न हो, इसलिए थोड़ा डिटेल में बताता हूं। फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुस्कान है.. गीत वाली फिल्म तो आपको याद होगी ही। जी हां १९९३ में आई फिल्म अनाड़ी के रामोजी प्रोड्यूसर थे। इतना ही नहीं अनाड़ी फिल्म की नायिका करिश्मा कपूर के बाद नायक वेंकटेश रामोजी के पुत्र हैं। यह अलग बात है कि वेंकटेश तेलुगू फिल्म में तो खूब चले लेकिन हिन्दी फिल्मों में ज्यादा सफल नहीं हुए। कार चालक वेंकट ने बताया कि यहां फिल्मों की शूटिंग चलती रहती है और काफी दर्शक देखने के लिए आते रहते हैं।
चलते-चतते सड़क पर अचानक एक मोड़ आया और वेंकट बोला, सर इधर, एक दूजे के लिए फिल्म में कमल हासन के मरने के सीन फिल्माया गया था। एक दूजे के लिए फिल्म तेलुगू फिल्म मारो चरित्र की रीमेक थी। मैं वेंकट से यह नहीं पूछ पाया कि यहां कौनसी फिल्म का सीन फिल्माया था। बाद में अपनी इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने नेट पर बहुत तलाश किया लेकिन कहीं पर इस लोकेशंस का जिक्र नहीं मिला। कुछ जगह गोवा के अलावा विशाखापट्टनम के दूसरे समुद्री किनारों का जिक्र जरूर पढ़ा। वैसे बता दूं कि एक दूजे के लिए फिल्म का अंत दर्दनाक था। इसके आखिर में नायक-नायिका दोनों सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं। इस फिल्म के बाद कई प्रेमी युगलों ने मौत को गले लगाया था। एेसे में फिल्म का अंत बदलने पर भी चर्चा हुई थी लेकिन बदला नहीं गया। मारो चरित्र व एक दूजे के लिए दोनों ही फिल्मों का अंत एक जैसा है। वेंकट ने मुझे वह इमारत भी दिखाई, जहां रति अग्निहोत्री के साथ रेप सीन फिल्माया गया था। थोड़ा सा विषयांतर होते हुए बता दूं कि मारो चरित्र १९७८ में आई थी जबकि एक दूजे के लिए १९८१ में प्रदर्शित हुई थी। एक श्वेत श्याम थी तो एक रंगीन। दोनों ही फिल्मों के निर्माता के बालाचंद्र थे। के बालाचंद्र को २०१० में दादा साहब फाल्के अवार्ड भी दिया गया था। २०१४ में इनकी मौत हो गई थी। करीब चार दशक पहले रिलीज हुई फिल्म एक दूजे के लिए तब ब्लॉकबस्टर थी। उस साल का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के अलावा यह फिल्म फेयर अवाड्र्स की 13 अलग-अलग कैटेगरी में नॉमिनेट हुई थी और बेस्ट एडिटिंग, लिरिक्स और स्क्रीनप्ले के लिए अवॉर्ड जीता भी। यह कमल हासन, रति अग्निहोत्री के साथ गायक एसपी बाला सुब्रमण्यम की भी पहली फिल्म थी। चूंकि एक दूजे के लिए फिल्म मेरी भी पसंदीदा रही है। घर पर न जाने कितनी ही बार इसको देखा है, लिहाजा उस अंतिम सीन वाले स्थानों को मैं मोबाइल में कैद करने की इच्छा हुई। मैंने वेंकट से कार रुकवाई और उस जीर्ण-शीर्ण इमारत को सड़क से क्लिक कर लिया। यहां से आगे चले तो सागर में खूब नाव नजर आई। वेंकट ने बताया कि कुछ शूटिंग यहां भी हुई है तो मैंने वहां भी कार रुकवा कर एक दो क्लिक कर लिए। अब हम विजयनगरम के पास पहुंच गए थे। वेंकट ने बताया कि विजयनगरम काफी प्राचीन शहर है।
क्रमश:

पुलिसवाला

34वीं लोककथा
हादसे में घायल महेश ने मोटरसाइकिल वाले के खिलाफ मामला दर्ज करवा दिया था। मोटरसाइकिल वाले की गलती यह थी कि उसने महेश को गलत साइड से आकर टक्कर मारी थी और भाग गया था। महेश को चालक का नाम नहीं पता था लेकिन मोटरसाइकिल के नंबर याद थे। इसी आधार पर मामला दर्ज करवाया गया। सारी औपचारिकताएं पूरी करवाने के बाद महेश पुलिस थाने से घर लौटा ही था कि मोबाइल बज उठा। रिसीव किया तो फोन थाने से ही था। बताया गया कि हादसा कारित करने वाले युवक की पहचान कर ली गई है, आप एक बार पुलिस थाने आ जाइए। महेश फिर से थाने पहुंचा। वहां युवक व उसके परिजन बैठे थे। सभी ने याचक की भूमिका में महेश की तरफ देखा और माफ करने के लिए हाथ जोड़ दिए। तभी युवक उठा और उसने महेश के पैर पकड़ लिए और सॉरी बोल दिया। यह सब देख महेश ने उसको माफ कर दिया। तभी सामने बैठा पुलिस का हवलदार उठा और महेश को एक तरफ ले जाकर में कान में फुसफुसाया, आपको चोट लगी है, कुछ खर्चा पानी चाहिए क्या? महेश ने असहमति में सिर हिलाया लेकिन पुलिस वाले के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी। उसने अपना मुंह महेश के कान के नजदीक करते हुए सवालिया लहजे में पूछा, वो तो ठीक है आप कुछ मत लो, हम तो हमारा हिसाब कर लें? महेश पुलिस वाले की हिसाब की बात मंद-मंद मुस्काया और घर चला आया लेकिन उसके जेहन में पुलिसवाले के हिसाब की बात ही घूम रही थी।

श्रीगंगानगर का दुर्भाग्य!

टिप्पणी
आज़ादी के सात दशक बीतने के बाद भी यह श्रीगंगानगर शहर का दुर्भाग्य ही है कि यहां समस्याएं जस की तस हैं। प्रदेश में कितनी ही सरकारें आई-गई लेकिन इस शहर की तस्वीर नहीं बदल पाई। लोक लुभावन नारों व वादों के सहारे बहुत से नेताओं अपना भाग्य चमकाया लेकिन शहर की सूरत नहीं चमका सके। श्रीगंगानगर को ‘चंडीगढ़ का बच्चा’ या ‘चंडीगढ़ का बाप’ बनाने वालों ने भी राजनीतिक रोटियां सेककर खुद का भला जरूर किया लेकिन शहर का भला नहीं कर सके। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य इस बात का है कि शहर में ऐसे जनप्रतिनिधि भी चुनकर आने लगे हैं, जिनके पास न तो खुद की कोई दूरदृष्टि है और न ही शहर को समस्या रहित बनाने की कोई कारगर कार्ययोजना। यहां आने वाले प्रशासनिक अधिकारी भी यहां के जनप्रतिनिधियों के नक्शेकदम पर ही चलते नजर आते हैं। 
शहर की सबसे बड़ी समस्या तो बरसाती पानी की निकासी है। यह हर साल पेश आती है। अभी मानसून पूर्व की जरा सी बारिश ने ही शहर की हालत खराब कर रखी है या यूं कहिए कि बरसाती पानी निकासी पानी के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करने वालों की पोल खोल कर रख दी। बड़ी बात है कि पानी की निकासी के नाम पर यह पैसा हर साल खर्च होता है। हर साल बजट बढ़ता जाता है लेकिन समस्या का ठोस या स्थायी समाधान नहीं होता। हो भी कैसे? ‘ बारिश ज्यादा आई तो सेना को बुला लेंगे।’ जैसे बयान देने वाले नेताओं के हाथ में शहर की बागडोर है। ऐसे नेता शहर का किस तरह से भला करेंगे, सहज ही सोचा जा सकता है। तभी तो यहां आने वाले अधिकारी भी शहर के प्रति गंभीरता नहीं दिखाते। नए नवेले अधिकारियों में एक-आध एक दो बार शहर भ्रमण करने की औपचारिकता निभा देते हैं, इसके बाद शहर भगवान भरोसे ही रहता है। अधिकारी भी बंद कमरे में ही शहर की चिंता करते नजर 
आते हैं। 
नगर परिषद व नगर विकास न्यास सौन्दर्य के नाम पर करोड़ों रुपए का मोटा बजट खर्च करते हैं। इन निकायों में बैठने वाले अधिकारियों का ध्यान बजट बनाने और उसे खर्च करने पर ही ज्यादा रहता है, भले ही वह लोगों के काम आए या नहीं। शिव चौक से जिला अस्पताल तक लगाई गई इंटरलोकिंग फुटपाथ तथा एक तरफ बनाया गया डिवाडर किसी काम का नहीं है। यह प्रस्ताव क्यों बना? किसके लिए बना? तथा इसका फायदा किसको हुआ? यह जानने समझने की बात न तो यहां के जनप्रतिनिधि करते हैं और न ही प्रशासनिक अधिकारी। इंटरलोकिंग के नाम पर लाखों रुपए मिट्टी में मिला दिए गए। इस तरह के उदाहरण यहां कई हैं। 
शहर की बदहाली और इसको लेकर जनाक्रोश न होने पर अक्सर श्रीगंगानगर को ‘मुर्दों का शहर’भी कह दिया जाता है। दरअसल, यहां विरोध तो होता है लेकिन उसमें शहर हित कम नजर आता है। विडम्बना यह भी है कि विरोध प्रदर्शन करने वालों में परम्परागत चेहरे ही ज्यादा नजर आते हैं। उनका जनता से जुड़ाव कम है या जनता उन्हें पसंद नहीं करती। कोई तो वजह है। और इसी वजह के कारण ही इसे ‘मुर्दों का शहर ’ कहा जाने लगा। अधिकारी व जनप्रतिनिधि शहर के प्रति उतनी दिचपस्पी नहीं दिखाते। जिस दिन विरोध में जनता उठ खड़ी हुई उस दिन तय मानिए, न तो सेना बुलाने जैसे हास्यास्पद बयान देने वाले नेता जीतकर आएंगे। और न ही बंद कमरों में बैठकर शहर का हित करने वाले अधिकारी यहां टिकेंगे। विकास कार्यों के नाम, उनसे आमजन को होने वाला फायदा तथा उन पर खर्च होने वाली राशि का विवरण जनता मांगना शुरू कर दे तो नि:सदेह बजट राशि का दुरुपयोग कम होगा। लेकिन यह बात भी तभी बनेगी जब जनता जागेगी।
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श् राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 16 मई 19 के अंक में प्रकाशित। 

मेरी आंध्रा यात्रा-8

सुबह आंख जल्दी खुल गई थी। कहीं जाने का कार्यक्रम तय होता है तो यकीनन आपकी आंख अलार्म से पहले खुल जाती है। मेरा साथ तो अक्सर एेसा होता है। दिमाग की घड़ी पहले ही अलर्ट कर देती है। घड़ी का अलार्म बजता है तब तक सुस्ती दूर हो चुकी होती है। खैर, सारी तैयारी करने के बाद मैंने सुरेश को बुलाया और उसको बताया कि मुझे ग्रामीण क्षेत्र के टूर पर जाना है, इसलिए यहां से एक कार की व्यवस्था करनी है। सुरेश थोड़ी ही देर में एक शख्स को लेकर हाजिर हुआ। वह ट्रेवल एजेंसी से जुडा हुआ था। मैंने उससे गाड़ी की रेट पूछी तो उसने बताया कि यहां सौ किलोमीटर के 14 सौ रुपए हैं। यह यात्रा आप अधिकतम दस घंटे में तय कर सकते हो। आगे प्रत्येक दस किलोमीटर पर सौ रुपए बढ़ते जाएंगे और एक घंटा भी बढ़ता जाएगा। एेसा इसलिए होता है कि यहां जो लोग घूमने आते हैं तो कहीं रुककर या बंगाल की खाड़ी के किसी बीच पर नहाने या खाने का प्रोग्राम करते हैं। इस कारण यहां समय भी किराये के साथ जोड़ा गया है। मुझे विजयनगरम जाना था। उसकी विशाखट्टनम से दूरी 60 किलोमीटर के करीब है। इस तरह आना-जाना 120 किमी हो गया। एेसे में हमारा सौदा सोलह सौ रुपए और बारह घंटे में तय हुआ।
मैंने ट्रेवल्स एजेंसी वाले को साफ साफ कह दिया था कि मुझे एेसा चालक चाहिए जो मेरी बातों को समझ सकें। मतलब हिन्दी समझने व बोलने वाला हो तथा इलाके का जानकार हो। उसने कहा सर जी हो जाएगा। इसके बाद मैं बगल के रेस्टोरेंट गया। नाश्ते में एक परांठा लिया और कार का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर में कार वाला आ गया था। मैंने सामान जमाया और होटल के काउंटर पर आया। रिशेप्सन पर बैठी युवती ने टूटी फूटी हिन्दी में कहा सर बिल कच्चा चाहिए या पक्का। मैं समझा नहीं तो उसने बताया कि कच्चा मतलब बिना जीएसटी का और पक्का मतलब जीसएटी का। खैर, उसने बिना जीएसटी का बिल बनाया। मुझे दो सौ रुपए कम देने पड़े। मेरा बैग कार की डिग्गी में रख दिया था। अब मैं चालक की बगल की सीट पर बैठ गया और कार चल पड़ी। चालक 56 साल का अधेड़ था। नाम पूछा तो वेंकट बताया। हिन्दी ज्यादा तो बोल पा रहा था लेकिन वह मुझे समझाने का भरपूर प्रयास कर रहा था। होटल से चलकर हम शहर में आए तो वेंकट अब चालक के साथ-साथ गाइड की भूमिका में भी था।
वैसे गैर हिन्दी भाषी क्षेत्र में अपनी बात ठीक से कह पाना और सामने वाले की बात भली भांति समझ पाना एक हिन्दी भाषी के लिए आसान काम नहीं है। बिना संवाद के आदमी गूंगे के समान ही हो जाता है। दो दिन शहर व देहात की यात्रा करते हुए मोटा अंतर यही समझ आया कि चुनाव का असली रंग देहात यानि ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा चढ़ा हुआ है। सबसे पहले वेंकट मुझे भाजपा कार्यालय लेकर गया। यह शहर से थोड़ा बाहर था। कार्यालय के बाहर किसी तरह का कोई बोर्ड या झंडा नहीं लगा था। अंदर प्रवेश किया तो देखा वहां एक छोटा सा टैंट लगा हुआ है। पास के एक भवन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के साथ एक स्थानीय प्रत्याशी का बड़ा सा होडिँग रखा था। उस वक्त वहां चार पांच लोग जमा थे। मैं सामने कार के पास बैठे बुजुर्ग से मुखातिब हुआ तो उन्होंने बताया कि नेताजी का इंतजार हो रहा है। उस वक्त वहां एक दो झंडे जरूर टंगे हुए थी बाकी सारे समेटे हुए एक कुर्सी पर पड़े थे। मौके की नजाकत भांपते हुए मैं बाहर आया तो पुराने होर्डिंग्स के दो ढेर देखकर चौंका। अधिकतर होर्डिंग्स में उपराष्ट्रपति वेंकया नायडू नजर आए। यहां से हमने सीधे भीमली बीच की ओर रुख किया। तभी रास्ते में सड़क किनारे तेलुगुदेशम पार्टी का कार्यालय नजर आया। उस वक्त कार्यालय के आगे महज एक चौपहिया वाहन खड़ा था। कार्यालय के बाहर बहुत से पोस्टर लगे थे, लेकिन अंदर ज्यादा चहल पहल नहीं थी। इसी कार्यालय से थोड़ा आगे कस्बे की तरफ बढे तो युवाजन श्रमिक रायतु कांग्रेस पार्टी (वाईएसआर कांग्रेस पाटीज़् ) का कार्यालय दिखाई दिया। यह कार्यालय भी पोस्टरों के रंग भी रंगा हुआ था। अंदर तीन चार युवा कुसिज़्यों पर बैठे चुनावी मंत्रणा में मशगूल थे। यहां से थोड़ा आगे बढ़े तो अभिनेता से नेता बने पवन कल्याण की पार्टी जन सेना का कार्यालय का नजर आया। पवन कल्याण फिल्म अभिनेता चिंरजीव के भाई हैं। चिरंजीव ने भी राजनीति में भाग्य आजमाया था, अलग पार्टी भी बनाई लेकिन वो ज्यादा सफल नहीं हुए थे। पवन कल्याण के कार्यालय में युवाओं की टीम चुनावी सामग्री आदि को व्यवस्थित कर वितरित करने में जुटी थी। यहां से हम आगे बढे तो तगरपोवलसा नामक कस्बे में भाजपा की चुनावी रैली नजर आई। भीड़ तो नहीं थी लेकिन भाजपा के झंडे के रंग की साडी पहने महिलाएं पार्टी का झंडा उठाए बढ़ी जा रही थी। रैली में भीड़ ज्यादा नहीं थी लेकिन फिर भी लोग उसे देखने को रुक रहे थे। थोड़ी देर यहां रुकने के बाद हम आगे बढ़ गए। कार चालक वेंकट कहने लगा, आंध्रा में मुकाबला हमेशा एकतरफा ही होता रहा है लेकिन इस बार मामला रोचक है और कुछ भी हो सकता है वाले हालात बन गए हैं। विशाखापट्टनम से विजयनगरम के लिए अलग से हाइवे है लेकिन वेंकट मुझे दूसरे रास्ते से लेकर आया। यह रास्ता बंगाल की खाड़ी के किनारे-किनारे विजयनगरम तक गया है। करीब 25 किलोमीटर तक सड़क बंगाल की खाड़ी के साथ-साथ चलती है। सागर की उठती-उफनती लहरों को चलते-चलते भी देखा जा सकता है।
क्रमश:

निशब्द

33वीं लोक कथा
'एक तो तू बिना पूछे बैठे ही क्यों? ऊपर से पैसे भी नहीं दे रही है।' एक अधेड़ महिला को यह घुड़की पिलाते हुए परिचालक ने सिटी बजा दी और बस चल पड़ी। वह बस रुकवाने का आग्रह करते रही, उसका स्टैंड भी निकल गया लेकिन बस नहीं रुकी। करीब चार किलोमीटर चलने के बाद एक बुजुर्ग ने परिचालक से थोड़े तल्ख लहजे में कहा कि इस तरह आपको क्या हासिल होगा। इसका स्टैंड चला गया है, इसको उतार दो। परिचालक बोला, इसको आधा किलोमीटर ही जाना था तो यह बस में बैठी ही क्यों? अब चार किलोमीर पैदल चलेगी तब एहसास होगा और यह दुबारा एेसा कतई नहीं करेगी। चूंकि महिला गलती में थी, इसलिए उससे कुछ बोलते नहीं बना। वह निशब्द थी, लेकिन उसके रुंआसे चेहरे और आंखों में तैरते गुस्से को साफ पढ़ा जा सकता था। बस रुकी और वह चुपचाप उतर गई लेकिन सवारियों में महिला के पक्ष व विपक्ष में चर्चा चल पड़ी।

बाहर के तनाव घर आने लगे हैं

बाहर के तनाव घर आने लगे हैं
रात-बेरात रोज डराने लगे हैं
शिकायत सुकून की छांव सी हो गई
तन हरे दरख्वत भी तो जलाने लगे हैं
किसी की बातों पर आता नहीं यकीं
हकीकत के तराने भी फसाने लगे हैं
वादा करते थे जो हर राज छुपाने का
गाहे बगाहे वो सबको बताने लगे हैं
मेरी आह पर बहाते थे जो आंसू
बात बात पर मुझको सताने लगे हैं
वो आजकल रूठते हैं बेवजह ही यारो
मनाने में 'माही' जिनको जमाने लगे 

मेरी आंध्रा यात्रा- 7

यहां से ऑटो वाला मुझे सीधे होटल की तरफ ले आया। मैं उसको हिन्दी में कहता रहा कि बाकी पार्टियों के कार्यालय तो अभी दिखाए ही नहीं है लेकिन वह मेरी बात समझ नहीं पाया। मैंने उसको पैसे दिए और सीधे सुरेश के पास गया और उसका उलाहना देते हुए कहा कि ऑटो वाले ने तो चिटिंग कर ली। सारे कार्यालय दिखाने के नाम पर सिर्फ दो जगह ले गया और पूरे पैसे ले लिए। सुरेश के पास भी मेरे सवाल का कोई जवाब नहीं था। दोपहर हो चुकी थी। मैंने रुम पर कपड़े बदले और सीधा रेस्टारेंट पहुंच गया और स्पेशल थाली का ऑर्डर कर दिया। अचानक काउंटर पर बैठी महिला के मोबाइल से ' तावड़ा मंदो पड़ ज्या रे..' गीत सुना तो चौंका। मुझे यकीन हो गया था कि यह भी कोई राजस्थानी ही है। भोजन के करने के बाद मैं काउंटर पर आया और पैसे देने के बाद महिला से पूछा आप राजस्थान के हैं क्या? मेरा सवाल सुनकर उन्होंने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया है और अब मेरा अगला सवाल था, राजस्थान में कहां के तो, उसने कहा चूरू के हैं। चूरू में कहां के तो उन्होंने रतननगर के नाम लिया। मैंने उनको जब खुद के बारे में बताया तो बतौर राजस्थानी दोनों के चेहरे पर मुस्कान दौडऩी लाजिमी थी। भोजन के बाद मैं रुम पर आया और लैपटॉप बैड पर जमा कर खबर लिखी। खबर पूर्ण करने के बाद थोड़ा लेट गया। शाम होने को थी। नहाकर बाहर निकला क्योंकि आरके बीच पर मात्र आधा घंटे में ही पसीने-पसीने हो गया था। बड़ी तेज उमस थी वहां। खैर, बाजार में एक थड़ी पर चाय पी। देखा उस चाय वाले ने डस्टबीन रखा हुआ था। चाय पीने वाले डिस्पोजल गिलास उसी डस्टबीन में डाल रहे थे। शाम गहरा चुकी थी। अब खाने की इच्छा कम थी, लिहाजा एक परांठा रूम में ही मंगवा लिया। रेट चालीस रुपए लिख रखी थी लेकिन बिल आया पचास रुपए का। कारण जाना तो बताया कि दस रुपए सर्विस चार्ज है। मैंने कहा कि आपने रूम में रेट कार्ड रखा है। इसका मतलब तो यही है कि आपके होटल का ही है, तो फिर काहे का सर्विस चार्ज? वह मेरी बात का संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। मैंने परांठा खाया। और टीवी पर आईपीएल देखने लगा। मैच समाप्ति के बाद नींद आने को थी। सोने से पहले तय कर लिया था कि अगले दिन ग्रामीण क्षेत्र में चलना है और वहां क्या चल रहा है, इस पर काम करना है। साथ ही यह भी तय किया है सुबह होटल से चैक आउट हो जाऊंगा और घूमते-घूमते जहां रात होगी वहीं पर रूक जाऊंगा। अगले दिन का प्लान फाइनल करके मैं सो गया। होटल में मुझे दो दिन हो गए थे। सुबह उठा और सबसे पहले उसी थड़ी वाले के पास गया। चाय पी और फिर पैदल ही एक लंबा चक्कर लगाकर होटल आ गया। सामान पैक करने के बाद मैं अगले पड़ाव की तैयारी में जुट गया।
क्रमश:

जिम्मेदार नागरिक

31वीं लघुकथा
गेट पर याचक की भूमिका में खड़ा वह शख्स गिड़गिड़ाए जा रहा था लेकिन सुरक्षाकर्मी के चेहरे पर तनिक भी शिकन की बजाय मंद-मंद कुटिल मुस्कान दौड़ रही थी। कल तक वह अंदर बेखटके जाता रहा लेकिन अब सुरक्षागत कारणों के चलते उसका प्रवेश रोक दिया गया। उसने परिचय दिया। परिवार के बारे में बताया। पुराना हवाला भी दिया। यहां तक कि खुद के जिम्म्मेदार नागरिक होने का दावा भी लेकिन सुरक्षाकर्मी पर किसी भी बात का कोई असर नहीं है। आंखें तरेरता हुआ वह बोले जा रहा था, यह सिस्टम है, और इसी के हिसाब से उसको काम करना है। रही बात जिम्मेदार नागरिक होने की तो जिम्मेदार तो जम्मू कश्मीर के लोग भी हैं। जम्मू कश्मीर के जिम्मेदार नागरिक! सुरक्षाकर्मी की यह उपमा सुनकर वह शख्स एकदम से चौंका। उसे लगा मानों किसी ने गर्म शीशा उसके कानों में डाल दिया है। कश्मीर के नागरिक से तुलना के बाद उसको 'जिम्मेदार नागरिक' शब्द किसी गाली के तरह लगने लगा था।

मेरी आंध्रा यात्रा- 6

विशाखापट्नम रेलवे स्टेशन पर उतरा तो मुझे यह स्टेशन अन्य स्टेशन के मुकाबले अलहदा नजर आया। एकदम चकाचक। गंदगी का कहीं नामोनिशान तक नहीं। स्टेशन से बाहर आकर मैंने मोतीलाल जी अग्रवाल को फोन लगाया।
मोतीलालजी से मेरा सीधा परिचय नहीं था। किसी जानकार ने उनके नंबर दिए थे और उन्हीं का हवाला देकर मैंने उनको फोन लगाया। करीब दस-पन्द्रह मिनट के बाद उनका बेटा मोटरसाइकिल पर आया। मैं मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ गया। मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि वे लोग मूलत: राजस्थान के डूंगरपुर के रहने वाले हैं। तेरह साल से यहीं टाइल्स का कारोबार करते हैं। मैंने किसी राजस्थानी खाने वाले होटल के आसपास ठहरने का कहा तो वह मुझे जयपुर पैलेस नामक होटल ले गया। रिसेप्शन पर बैठे शख्स शंकर शर्मा खाटूश्यामजी के पास के गांव के ही निकले। रजिस्टर में नाम-पत्ता दर्ज करवाते वक्त मैंने उनसे चुनाव की हल्की सी चर्चा की तो उनका कहना था कि यहां तो इस बार जगन के चर्चे ज्यादा हैं। तभी वहां खड़े मुकेश जो कि खुद खाटूश्याम के हैं, मुझे रुम तक छोड़ गए। मैंने वही सवाल मुकेश से दागा तो उसने भी जगन का ही नाम लिया। इसके बाद सुरेश बावलिया मुझे रुम तक छोड़ गए। सुरेश बावलिया भी खाटूश्याम जी के पास ही रहने वाले निकले। मैंने वही सवाल सुरेश से दागा तो उसने भी जगन का ही नाम लिया। हजरत निजामुद्दीन दिल्ली से करीब 38-39 घंटे बाद होटल पहुंचकर बेड पर लेटा तो थकान से शरीर दोहरा हो गया था। अपरान्ह के तीन बज चुके थे। थोड़ी देर लेटने के बाद नहाने की तैयारी की तो देखता हूं अंडर वियर व बनियान तो गायब हैं। याद आया वह तो नजफगढ़ में सुबह नहाया था तब छत्त पर सुखाए थे, वहीं पर भूल आया। अब क्या किया जाए। रिशेप्सन की घंटी बजाई। सुरेश हाजिर हुआ। मैंने उससे एक कपड़े धोने की साबुन तथा अंडरवियर व बनियान लाने को कहा। करीब आधा घंटे बाद सुरेश वह सब ले आया। इसके बाद फिर नहाना हुआ। थोड़ी देर टीवी देखा। अखबार के लिए आधी खबर तैयार की। फिर लेट गया। शाम हो चुकी थी। होटल से बाहर आया। पैदल ही बाजार घूमा। शाम को आकर होटल के बगल में बने रेस्टोरेंट में स्पेशल थाली मंगवाई। वैसे रेस्टोटेंट का रेट कार्ड मैंने रुम में ही देख लिया था। सब्जी, रोटी, चावल व पापड़ आदि देखकर लगा नहीं कि आंध्रा में हूं। क्योंकि रवाना होते समय काफी लोगों ने कहा था कि वहां के खाने से आप रंज नहीं पाओगे। भोजन कर रुम पर आया और थोड़ी देरी आईपीएल देखा। स्कोर कार्ड व खिलाडि़यों केनाम तेलुगू में आ रहे थे। वह तो खिलाडि़यों की टी शर्ट पर लिखे नाम के आधार पर ही पहचान की। थकान की वजह से नींद आ रही थी लेकिन मैच का मोह बाधक बन रहा था। खैर मैच देखने के बाद सो गया। अगले दिन गुरुवार सुबह नहाकर मैं शहर में निकला। घूमने के लिए ऑटो लिया। ऑटोचालक हिन्दी नहीं जानता तो वापस होटल लेकर आया और सुरेश ने दुभाषिए की भूमिका निभाई। ठेठ मारवाड़ी होने के बावजूद सुरेश फर्राटेदार तेलुगू बोल रहा था। ऑटो वाले से सभी राजनीतिक दलों के कार्यालय या चुनावी कार्यालय दिखाने की बात हुई। उसने छह सौ रुपए मांगे लेकिन मामला साढ़े पांच सौ में फाइनल हुआ। ऑटो से सबसे पहले मैं रामकृष्ण बीच, जो कि आरके बीच के नाम से प्रसिद्ध है वहां गया। वहां अपने मोबाइल से दो चार फोटो व सेल्फी लेने के बाद वापस मुड़ा तो एक किशोर कैमरा लेकर पास आया और कहने लगा सर, फोटो करवा लीजिए। बीस रुपए में पांच। मुझे मामला जमा और मैंने हां कर दी। अब तो वह मुझे एंगल बताने लगा। कभी हाथ ऊपर करवाए तो कभी मोबाइल लेकर सेल्फी लेने का पोज बनवाए। आरके बीच पर छोटी-छोटी पहाडि़यां हैं, जो पानी के थपेड़ों से घिस-घिस कर छोटी हो गई है। वह मुझको चार पांच जगह ले गया और बहुत सारे क्लिक कर दिए। फिर कैमरे से उसने सारे फोटो भी दिखाए। फोटो अच्छे आए थे, लिहाजा मन ललचा गया। मैंने फोटो की संख्या पूछी तो उसने 42 बताई। बीस रुपए की पांच फोटो के हिसाब से मैंने कहा करीब दो सौ रुपए के करीब हो गए तो वह कहने लगा, नहीं सर। सौ रुपए की पांच है। डवलप करके भी देगा। मैंने कहा डवलप करने की बात तो पहले भी की थी। पर वह नहीं माना। इधर फोटो अच्छे होने के कारण मेरा मन ललचा रहा था। आखिरकार उसने ही दूसरा प्रस्ताव रखा कि, सर डवलप रहने दो, आपको सारे फोटो मोबाइल में कॉपी कर देता हूं। इसके बाद उसने दो चार फोटो और खींचे कुल 46 हो गए थे। कहने लगा सर, आप पांच सौ रुपए दे दीजिए। मैंने ज्यादा मोलभाव नहीं किया। फोटो पहले उसने कॉपी करने चाहे लेकिन उसके कैमरे की पिन मोबाइल में सेट नहीं हुई। बाद में शेयरइट से फोटो उसने मेरे मोबाइल में भेज दी। वहां से मैं सीधा ऑटो में आया और चल पड़ा। विशाखापट्नम घूमते मैंने पाया कि वहां की साफ सफाई बहुत अच्छी है। कई जगह सीवरेज व नाली बनने का काम जारी है। विशाखापट्नम वैसे खूबसूरत शहर है। पहाड़ की गोद में बसा है। इस कारण बसावट एक सतह पर नहीं है। यहां से सबसे पहले मैं एनटीआर भवन (तेलुगुदेशम पार्टी के कार्यालय भवन) गया। उस वक्त वहां सन्नाटा पसरा था। वहां कोई नहीं था। एक महिला व पुरुष दिखाए दिए तो आगे बढ़ा। मैंने उनको अपना परिचय दिया। इसके बाद भवन के सामने लगी तेलुगूदेशम पार्टी संस्थापक एनटी रामाराव की आदमकद प्रतिमा की फोटो ली। तभी वहां खड़ी महिला बोली हमारी फोटो भी साथ में लो। मैंने दोनों से वहां पसरे सन्नाटे की वजह पूछी तो बताया कि चुनाव है, सब फील्ड में हैं। प्रेस, मीडिया सब शाम को आते हैं। वहां से मैं आगे बढ़ा तो कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डा. टी. सुब्बारामी रेड्डी के आवास पहुंचा। यहां भी सन्नाटा ही था। आवास के बाहर शिवरात्रि पूजा का होर्डिंग्स टंगा था। अंदर गया तो एक युवक दिखाई दिया। मैंने पूछा तो उसने बताया नेताजी शहर से बाहर गए हैं।
क्रमश:

मेरी आंध्रा यात्रा- 5

थोड़ी देर चुप रहने के बाद मैंने शुरूआत की और सामने बैठे युवक से संवाद किया तो वह कोलकाता का था। वह इंजीनियर था। मैंने इससे आंध्रप्रदेश के बारे में फीडबैक लेने का प्रयास किया तो साइड बर्थ पर बैठे शख्स भी सामने आकर बैठ गए। औपचारिक बातों के बाद जिक्र राजनीति का आया था बगल वाले शख्स भी बोल पडे। अब मैं कोलकाता वाले युवक की बजाय उन दोनों से मुखातिब था। तब तक कोलकाता वाला युवक ऊपर की बर्थ पर जाकर सो चुका था। दोनों की राजनीति में गहरी रूचि थी। प्रदेश से लेकर देश तक के तमाम मसले अंगुलियों पर गिनाने लगे। जी सुपैप्या व अशोक वर्मा दोनों ही विशाखापट्टनम में काम करते हैं। देश की राजनीति पर चर्चा की तो सुप्पैया बोले, देश को अच्छे नौकरशाह की जरूरत है, नेताओं को भी नौकरशाह ही चलाते हैं, इसलिए नौकरशाहों को राजनीति में आना चाहिए। किसानों का कर्जा माफ करने की बात पर उन्होंने बेहद तल्ख शब्दों में कहा, इससे देश का किसान बर्बाद हो जाएगा। किसानों को रोजगार से जोडऩा होगा। पशुपालन को बढ़ावा देना होगा, तभी देश का भला होगा। देश में अगली सरकार किसकी और आंध्रप्रदेश की भूमिका पर दोनों ही कहने लगे, सरकार किसी की भी बने और आंध्रा में कोई भी दल जीते लेकिन आंध्र की हिस्सेदारी जरूर रहेगी। आंध्रप्रदेश में मुख्य मुद्दे पूछे तो कहने लगे विकास ही प्रमुख मुद्दा है। केन्द्रीय राजनीति की चर्चा में जहां सुपैप्या सरकार की आलोचना रहे थे, वहीं अशोक वर्मा केन्द्र की सराहना करने से नहीं चूके। हां आंध्रप्रदेश के मामले में दोनों के विचार समान थे। दोनों ही मौजूदा मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के कार्यकाल की सराहना कर रहे थे। जगन मोहन रेड्डी की पदयात्रा और पदयात्राओं से सियासी नैया पार लगने के बारे में मैंने सवाल किया तो दोनों हंसने लगे। कहने लगे नायडू दूरदर्शी है। उसने काम करवाया है, जगन ने क्या करवाया। वह तो अपने पिता के कामों को ही याद करके वोट मांग रहे हैं। तभी तपाक से अशोक वर्मा अपना मोबाइल निकालते हैं। तेलुगू में लिखा मैसेज दिखाते हैं, मैं मतलब पूछता हूं तो हिन्दी में अर्थ बताते हैं, सचिन का बेटा अगर सलेक्टर के पास जाकर कहे, मेरे पिताजी बहुत अच्छे क्रिकेटर रहे हैं, लिहाजा मेेरा सलेक्शन भी टीम में कर लो। यही काम काम जगन कर रहे हैं। भला पिता के अनुभव या काम बेटे के काम कैसे आएंगे। सुपैप्या कहते हैं आंध्रप्रदेश में नायडू के बाद अगर कोई नेता होगा तो वो हैं, जन सेना का पवन कल्याण। पवन कल्याण तेलुगू फिल्म अभिनेता हैं तथा फिल्मी अभिनेता चिरंजीव के भाई हैं। मैंने सवाल पूछा चिरंजीव ही राजनीति में नहीं चले तो फिर पवन कल्याण का क्या भविष्य है? तो कहने लगे चिरंजीव भी भला आदमी है लेकिन जो बात पवन में है वह चिरंजीव में नहीं। देखना फिल्मों की तरह पवन राजनीति में भी आगे तक जाएगा, बंदे में दम है। थोड़ा सा पास आकर अशोक वर्मा कान में फुसाफुसाते हैं, इस बार चुनाव मे हिन्दुत्व भी मुद्दा रहेगा। यह कहने के पीछ़े उनका इशारा जगन मोहन रेड्डी की तरफ था, जो इसाई हैं। करीब छह घंटे तक रुक-रुक कर मेरा अशोक वर्मा व जी सुप्पैया के साथ संवाद होता रहा। बीच-बीच में वो दोनों आपस में तेलुगू में भी बतियाते। बातचीत के दौरान ही अशोक वर्मा ने अपने बैग से बड़ा सा लड्डू निकाला और मेरी तरफ बढ़ाया और आग्रह किया। मैंने लड्डू लेकर रखकर लिया। फिर दोनों कहने लगे कि आंध्रप्रदेश की संस्कृति में हम स्थानीय भले ही आपस में बात न करें लेकिन दूसरे प्रदेश के लोगों का आदर करते हैं और उनकी मदद करते हैं। बातचीत के दौरान मैं बाहर के नेसैर्गिक सौंदर्य का आनंद भी ले रहा था। पहाड़, हरियाली चावल के खेत आदि देखकर मन रोमांचित हो रहा था। विशाखापट्टनम आने को था। छह घंटे का सफर बातों में ही कट गया। विशाखापट्ïटनम स्टेशन पर दोनों ने अपने मोबाइल नंबर दिए, हाथ मिलाया और एक मीठी मुस्कान के साथ विदा ली।
क्रमश:

मेरी आंध्रा यात्रा-4

सुबह मैंने साथी गोपाल जी शर्मा को फोन लगाया। गोपाल जी इन दिनों पत्रिका भोपाल में हैं। उनसे करीब छह साल पुरानी जान-पहचान है। मैं भिलाई था तब वो वहां शाखा प्रभारी बनकर आए थे। करीब डेढ़ साल हमने भिलाई में साथ बिताया। हर संडे को हम सपरिवार घूमने जाते थे। इसके बाद मैं बीकानेर आ गया और गोपाल जी पहले जबलपुर और फिर भोपाल आ गए। उन्होंने मेरे को हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर मिलने की बात कही। दस बजे के करीब गाड़ी पहुंची और मैं अपने कोच से बाहर निकलकर गोपाल जी को तलाशने लगा। अचानक दूर मेरी नजर उन पड़ी। हम दोनों एक दूसरे की तरफ बढ़े। पहले गले मिले और फिर गोपाल जी ने खाने का पैकेट थमा दिया, हंसकर बोले दो सप्ताह तक बाहर का खाना है आज तो घर का खाओ। हम करीब पांच साल बाद मिले थे। बातें बहुत थी करने को लेकिन वक्त ने इजाजत नहीं दी। गाड़ी का स्टॉपेज यहां मात्र दो मिनट का ही था। गाड़ी चली हमने हाथ- हिलाकर एक दूसरे से विदा ली। थोड़ी देर में होशंगाबाद आ गया और जैन दपंती भी उतर गया। अब केबिन में मैं अकेला ही था। दोपहर होने को आई। मैंने गोपाल जी दिया वह पैकेट खोला। परांठे, आलू की सूखी सब्जी, तली हुई हरी मिर्च के साथ एक गुंजिया व एक आगरा का पेठा भी था। करीब पच्चीस साल के बाद यह पहला मौका था जब बिना नहाए मैंने खाना खाया। मजबूरी थी, क्योंकि पूरे चौबीस घंटे बाद गंतव्य पहुंचना था, इसलिए भूखा रहना उचित नहीं समझा। गाड़ी बैतूल के जंगल से होते हुए महाराष्ट की सीमा मे प्रवेश कर चुकी थी। शाम पांच बजे नागपुर रेलवे स्टेशन आया। अब मेरे सामने की बर्थ पर एक शख्स तशरीफ ला चुके थे। नाम था मोहम्मद सिकंदर। मध्यप्रदेश के बालाघाट के रहने वाले थे। मिर्च के बड़े व्यापारी थे। मिर्च मंडी खम्मम से मिर्चोँ की खरीद फरोख्त के सिलसिले में ही जा रहे थे। बातों का सिलसिला आगे बढ़ा और थोड़ी देर में हम परिचित की तरह बतियाने लगे। तभी वो ही अटेडेंट फिर आया। सिकंदर भाई को चद्दर, तकिया व कंबल देकर चला गया। यहां भी चद्दर मैली थी, तो सिकंदर भाई ने लपका दिया। रात गहराते जा रही थी। सोने की तैयारी थी। तभी एक स्टेशन और आया। दो युवक और चढ़े। उनके वार्तालाप से आभास हो गया था कि मैं तेलंगाना की सीमा में प्रवेश कर चुका हेूं। रात करीब चार बजे सिकंदर भाई खम्मम उतरे। उनसे दुआ सलाम करके मैं फिर लेट गया। सुबह सात बजे आंध्रप्रदेश का विजयवाड़ा शहर आया। ऊपर की दोनों बर्थ पर बैठे युवक यहां उतर गए थे। मेरे सामने एक युवक आकर बैठा तो बगल भी एक सज्जन आ गए। साइड बर्थ पर भी एक व्यक्ति आ गए। करीब आधा घंटे रुकने के बाद ट्रेन चल पड़ी । विजयवाड़ा आंध्रप्रदेश के बीच में है। विजयवाड़ा से आधा प्रदेश उत्तर में तो आधा दक्षिण में रह जाता है। मुझे उत्तर की ओर जाना था।
क्रमश:

मेरी आंध्रा यात्रा-3

मौसम में नमी थी और रात की नींद और थकान की वजह से मुझे सर्दी का एहसास होने लगा था। घर आते ही मैंने कंबल ली और सोने का प्रयास करने लगा लेकिन नींद नहीं आई। अखबार पढऩे तथा मोबाइल पर अपेडट देखने के बाद जानकारी में आया कि हमारी श्रीमती की स्कूल- कॉलेज के जमाने की दोस्त अर्चना पांडे भाईसाहब के घर आने वाली हैं। वो फेसबुक से मेरे से जुड़ी हुई हैं, लिहाजा, मेरा भी उनसे परिचय है। वो मूलत: कानपुर की रहने वाली हैं लेकिन उनके भाई यहां बैंक में कार्यरत हैं और नजफगढ़ ही रहते हैं। उनकी माताजी का ऑपरेशन हुआ था, इस कारण वो नजफगढ़ आई थीं। उन्होंने करीब नौ बजे आने का समय दिया था। नजफगढ़ में सीवरेज, नाली व सड़कों का काम बड़े स्तर पर चल रहा है। इस कारण पूरा नजफगढ़ खुदा पड़ा है।रिक्शे वाले ज्रल्दी से तैयार नहीं होते हैं। यही अर्चना पांडे के साथ हुआ। उनको घर आते-आते ग्यारह बज गए। तब तक मैं बिस्तर में ही था। वो अपनी भाभाजी के साथ आई थीं। चाय के बाद खाना हुआ। करीब साढ़े ग्यारह बजे उनके जाने के बाद मैं बाथरूम की तरफ बढ़ा तो पता चला कि टॉवल तो श्रीगंगानगर ही रह गया है। भाभीजी ने एक टॉवल निकालकर दिया। नहाने के बाद कपड़े पहने तो पता चला कि बेल्ट भी श्रीगंगानगर ही भूल आया। भाईसाहब ने अपना बेल्ट दिया। करीब सवा बारह हो गए थे। मुझे अपने परिचित से मिलने जाना था। वहां ज्यादा समय लग गया। लौटा तो साढ़े पांच का समय हो चुका था। शाम को नहाने और भोजन के करने के बाद मैं करीब साढे आठ बजे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के लिए कैब पकड़ी और रवाना हो गया। सवा सवा दस बजे के करीब मैं स्टेशन पहुंच गया। रात्रि 11 बजे की ट्रेन थी। रेलवे स्टेशन हो बस स्टैंड में अक्सर में समय से पहले ही पहुंचता हूं। भले ही बाद में इंतजार करना पड़े लेकिन समय से पहले पहुंचने पर अनावश्यक भागदौड़ नहीं करनी पड़ती। यह आदत शुरू से ही रही है। ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी थी लेकिन आरक्षित कोच अंदर से बंद थे। सामान्य कोच में सवारियों को बैठने का सिलसिला शुरू हो चुका था। आरक्षित कोच में चद्दर और तकिये आदि जमाने का काम चल रहा था, जो शीशे के अंदर से दिखाई दे रहा था। आखिरकार कोच खुला और मैं अपनी निर्धारित सीट पर पहुंचा। मेरे सामने की बर्थ पर मध्यप्रदेश के हौशंगाबाद का एक जैन दपंती था। दोनों पति-पत्नी कॉलेज व्याख्याता थे, फुर्सत में देहरादून आदि जगह घूम कर आए थे। कोच अटेंडेंट चद्दर, कंबल व तकिया ले आया था। मैंने पॉकेट खोला तो एक चद्दर मैली थी। अटेंडेट शक्ल से साउथ इंडियन लग रहा था। मैं जोर से चिल्लाया, यह क्या मजाक है। यूज की हुई चद्दर फिर से दे रहे हो? वह मुझे चुप करने वाले अंदाज में कुछ बड़बड़ाया और दूसरा पैकेट लाकर दे दिया लेकिन उसमें भी हालत वैसी ही थी। मैंने इस बात की जानकारी अपने ट्विटर हैंडल से वायरल की। रेल मंत्रालय व रेल मंत्री आदि को टैग भी किया लेकिन कुछ नहीं हुआ। अक्सर खबरें पढी है टवीट किया तो कार्रवाई हुई। राहत मिली लेकिन यहां सब बेमानी सा नजर आया। भूलने की आदत यहां भी रही। पैनकीलर लेकर नहीं आया था। तो ठीक से सोते नहीं बन रहा था। पूरा शरीर दर्द कर रहा था। सारी रात बैचेनी में ही निकली। क्रमश:

मेरी आंध्रा यात्रा-2

अगले दिन 24 मार्च को सुबह उठते ही पुलिस थाने पहुंचा। रात के घटनाक्रम की एफआईआर दर्ज करवाई। अपनी ही गाड़ी से पुलिस को दुर्घटनास्थल का मौका मुयाअना करवाया। यह सब करते-करते दोपहर हो चुकी थी। घर लौटा ही था कि पुलिस थाने से फिर फोन आया। मुझे वापस थाने जाना पड़ा। रात को मोटरसाइकिल से टक्कर मारने वाला युवक और उसका मामा बैठे थे। मेरे वहां जाते ही आग्रह करने लगे कि गलती हो गई, माफ कर दो। इतने में युवक के अन्य परिजन भी आए गए। उनमें युवक के पिताजी भी थे। युवक ने पैर पकड़ लिए और माफी मांग ली, लिहाजा मैंने उसको माफ कर दिया। इसी बीच एक पुलिस वाला मुझे एक तरफ ले जाकर बोला, आपको चोट लगी है, आपको कुछ खर्चा पानी चाहिए क्या? मैं चौंका और साफ तौर पर मना किया कि जो होना था, वह हो चुका है, खर्च से मेरा दर्द कम नहीं होगा। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे इतना कहते ही पुलिस वाले की आंखों में चमक आई और कहने लगा आप तो नहीं ले रहे हो लेकिन हम अपना हिसाब तो कर लें क्या? मैंने कहा आपकी आप जानो, यह कहकर मैं चला आया। कोई बड़ी बात नहीं मेरी पीठ पीछे पुलिस वालों ने मेरे नाम से उनसे रुपए लिए हों? खैर, इसके बाद घर आ गया। नहाने के बाद आफिस आया जरूरी साजोसामान जमाया। रात साढ़े आठ बजे के करीब घर गया। सामान पैक किया और खाना खाया। दर्द निवारक टेबलेट खाई हुई थी, लिहाजा दर्द कम था। हालांकि कुछ परिचितों व परिजनों ने यात्रा स्थगित करने का सुझाव दिया लेकिन मैंने उनके सुझाव को सिरे से नकार दिया। मेरे मन में यह आशंका घर कर गई थी कि मैंने यात्रा स्थगित कर दी तो यही सोचा जाएगा कि मैं आंध्रा के नाम से डर गया। वहां जाना जाना नहीं चाहता आदि आदि। इन सब के बीच ट्रेन का समय हो चुका था। श्रीमती खुद छोडऩे स्टेशन तक आई। मैंने अपने सीट पकड़ी और लेट गया। लेटते ही नींद आ गई। रात चार बजे दर्द निवारक का असर कम हुआ तो दर्द फिर परेशान करने लगा। जिस भी करवट सोऊं उधर ही दर्द। एक तरफ टांग में दर्द तो दूसरी तरफ कोहनी में। दोनों कुल्हों पर इंजेक्शनों का दर्द भी जोर से था। ना सीधे लेटते बन रहा था ना औंधे। समझ नहीं आ रहा था क्या किया जाए। ट्रेन में सन्नाटा पसरा था लेकिन मैं परेशानी के भंवर में फंसा अपने गंतव्य का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। कब दिल्ली आए और कब आराम करूं।आखिरकार किसी तरह सुबह के आठ बजाए। मुझे सरायरोहिल्ला उतरना था लेकिन मैं शकूर बस्ती उतरा। वहां से पहले ऑटो फिर रिक्शे के मदद से भाईसाहब के घर पहुंचा। नींद, दर्द व थकान के कारण मेरी हालत खराब हो चली थी। क्रमश:

मेरी आंध्रा यात्रा-1

लोकसभा चुनाव में ग्राउंड रिपोर्ट के लिए मेरा आंध्रप्रदेश जाना 16 मार्च को ही तय हो गया था। तभी से जेहन में कई तरह के सवालों को द्वंद्व शुरू हो गया था। मसलन, अनजाना प्रदेश। अजनबी लोग। समन्वय स्थापित करने की दिक्कत। अलग तरह का भोजन आदि आदि। जिससे भी पूछो नया व अलग ही तरह का फीडबैक। किसी से संबल मिलता तो कोई संशय पैदा करता। इन सब के बीच रोमांच व उत्साह चरम पर था लेकिन मन के किसी के कौन में अनजाना भय भी घर किए था। खैर, जाने व आने का कार्यक्रम तय किया। 24 मार्च को रात श्रीगंगानगर से रवानगी तथा 25 मार्च को दिल्ली से विशाखापट्टनम की रेल पकडऩा तथा चार अप्रेल को चैन्नई से हवाई जहाज से दिल्ली लौटने का कार्यक्रम तय हो गया। टिकट वगैरह भी करवा ली गई थी। वैसे 16 मार्च से ही आंध्र प्रदेश के बारे में अध्ययन शुरू कर दिया था। वहां के राजनीतिक परिदृश्य को समझने में हालांकि दिक्कत हुई क्योंकि वहां के अधिकतर समाचार पत्र तेलुगू में हैं। एक मात्र हिन्दी पोर्टल मिला लेकिन बताया गया कि यह तो वहां के एक स्थानीय दल विशेष का है, लिहाजा उस पोर्टल की खबरों व तथ्यों पर विश्वास करना भी संभव नहीं था। खैर, इंटरनेट के माध्यम से मैं वहां की ज्यादा से ज्यादा जानकारी एकत्रित करने में जुटा था। आंध्रा जाने की निर्धारित तिथि नजदीक आ रही थी। आखिरकार 23 मार्च को छोटे बच्चे का जन्मदिन आया। रात दस बजे में कार्यालय से घर पहुंचा। केक काटा फिर भोजन बाहर खने के लिए हम रवाना हुए। होटल के पास कार के पार्क कर हम जैसे ही रोड क्रॉस कर रहे थे। अचानक गलत दिशा से पीछे से आए बुलेट मोटरसाइकिल वाले ने पीछे से जोरदार टक्कर मारी। टक्कर लगते ही मैं नीचे गिरा। गनीमत रही की दाहिने हाथ की कोहनी टिकी। मुंह या सिर के बल गिरता तो चोट ज्यादा लग सकती थी। फिर कोहनी पर चोट आई थी, जिससे खून रिसने लगा था। चोट के दर्द से मैं पसीने से नहा गया था। जन्मदिन की पार्टी का सारा मचा किरकिरा हो चुका था। कार्यालय फोन करके साथियों को बुलाया। पहले बच्चों को घर छोड़ा और फिर अस्पताल पहुंचा। दो इंजेक्शन लगाए और कोहनी पर पट्टी बांध दी गई थी। टक्कर मारने वालों ने चूंकि किसी तरह की माफी नहीं मांगी लिहाजा, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का मन रात को ही बना लिया था लेकिन सक्षम अधिकारी के थाने नहीं होने पर यह बात सुबह पर छोड़ दी गई। मैं दर्द से कराहता हुआ घर लौट आया। कोहनी पर पट्टी बंधी होने के कारण हाथ मोडऩे में बड़ी तकलीफ हो रही थी। दर्द निवारक टेबलेट के सहारे जैसे-जैसे रात बीती। क्रमश:....