Tuesday, May 22, 2018

हार के बहाने

बस यूं ही
जैसा कि मैंने कहा था कि शाम होते-होते सन्नाटा टूटेगा। पस्त पार्टी की आईटी विंग हार को सम्मानजनक व खूबसूरत मोड़ देने के लिए कोई न कोई जुमले जरूर लाएगी। शाम होते-होते एेसा हो भी गया। पोस्ट आई कि 'यह कनार्टक का दुर्भाग्य है। फस्र्ट डिवीजन विपक्ष में बैठेगा जबकि थर्ड डिवीजन सरकार चलाएगा। इसके नीचे लिखा है , कांग्रेस को अब लोकतंत्र खतरे में नजर नहीं आएगा।' खैर यह तो बानगी भर है। अभी तो हार के गम को कम करने को कई जुमले ईजाद होंगे। कई उदाहरण दिए जाएंगे तो कई तुलनाएं भी होने लगेंगी। कुछ अति उत्साही भक्तों ने तो येदियुरप्पा की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से करने में भी गुरेज नहीं किया। फ्लोर टेस्ट में संभावित हार देखते हुए येदि को वाजपेयी की तरह प्रचारित करना भी संभवत: पहले से तय हो चुका था। तभी तो वैसा ही भावुकता भरा भाषण और सहानुभूति की लहर पर सवार.होकर त्यागपत्र। प्रयास पूरा था कि दो दिन की नौटंकी की इतिश्री पर भरपूर सहानुभूति बटोरी जाए। हालांकि येद्दि व वाजपेयी में तुलना या समानता केवल इस की बात की जरूर हो सकती है कि दोनों भाजपा के हैं, बाकी किसी भी स्तर पर येदि, वाजपेयी के समकक्ष नहीं हैं। कद, पद, योग्यता, व्यक्तित्व, खासियत के मामले में येद्दि ही क्या वर्तमान दौर के किसी भी नेता में अटल जी का अक्स नजर नहीं आता। अटल जी के साथ तुलना करना एक तरह से हार के गम को कम करने का नायाब तरीका ही है।
खैर, कर्नाटक के सियासी ड्रामे पर समूचे देश की नजर लगी थी। उत्सुकता इस बात की थी कि इस राजनीतिक नौटंकी का समापन कैसे होगा। भक्तों को इस बात का अंदेशा कतई नहीं था कि येद्दि की विदाई इस अंदाज में होगी। वैसे राज्यपाल के भाजपा को मौका देने के फैसले को लेकर कांग्रेस ने आपत्ति भी जताई। इतना ही नहीं कांग्रेस ने कर्नाटक फार्मूले की तर्ज पर बिहार, गोवा, मणिपुर व मेघालय में सरकार बनाने का मौका भी मांगा। कांग्रेस का एेसा करना गलत भी नहीं था, क्योंकि बिहार को छोड़कर तीन राज्यों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन भाजपा ने दूसरे दलों से गठबंधन कर कांग्रेस को सत्ता से पदच्युत कर दिया। तीन चार बार भाजपा की रणनीति से पिटी कांग्रेस ने भी इस बार भाजपा को भाजपा के ही अंदाज में जवाब दिया। उसने जेडीएस को आगे कर दिया। लेकिन इस बार राज्यपाल ने पूर्व के फैसलों से इतर सबसे बड़े दल को न्यौतने की परंपरा निभाते हुए भाजपा को मौका दे दिया। यही विरोधाभास कांग्रेस को अखरा और वह कोर्ट चली गई। देर रात कोर्ट बैठा। साढ़े तीन घंटे तक सुनवाई हुई लेकिन फैसला मिला जुला आया। कांग्रेस दरअसल शपथ ग्रहण को ही रुकवाना चाह रही थी लेकिन कोर्ट ने शपथ ग्रहण समारेाह पर रोक नहीं लगाई। इतना ही नहीं बहुमत का फैसला जब कोर्ट ने विधानसभा में करने को कहा तो इसे प्रचारित किया गया कि कोर्ट में मुंह की खाने वाले विधानसभा में भी मात खाएंगे, लेकिन एेसा हुआ नहीं। वैसे सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया मौटे तौर.पर वही भाजपा सरकार की विदाई का कारण बना। यह सही है कि कोर्ट के फैसले ने पहले भाजपा को खुशी दी जब उसने राज्यपाल के शपथ ग्रहण के निर्णय को यथावत रखा। दूसरा निर्णय जरूर खिलाफ जाता दिखाई दिया। कोर्ट ने दो दिन में फ्लोर टेस्ट करने तथा इसका प्रसारण लाइव करने को कहा जबकि राज्यपाल ने बहुमत सिद्ध करने के लिए पन्द्रह दिन का समय दिया था। प्रसारण लाइव तथा बहुमत का समय कम होने के कारण भाजपा खेमे में हलचल जरूर दिखाई दी। फिर भी जोड़तोड़ व खरीद फरोख्त की चर्चाओं के चलते इस बात की उत्सुकता जरूर थी कि आखिर कर्नाटक में होगा क्या?
कांग्रेस के दो विधायक शुरूआती सत्र में अनुपस्थित रहे तो लगा भी कि शायद जोड़तोड़ का गणित कारगर बैठ जाए लेकिन जब खबरें आने लगी कि वाजपेयी की तर्ज पर कुछ होगा तो यह लगने लगा था कि भाजपा अब बैकफुट पर है। हुआ भी वही येदि ने अपना भाषण पढऩे के बाद फ्लोर टेस्ट होने से पहले ही इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। उनको संभावित हार का एहसास हो चुका था। जैसे ही समीकरण बदले कांग्रेसी खेमी में खुशी की लहर दौड़ गई। गोवा, मणिपुर, मेघालय में ज्यादा सीटें हासिल करने के बाद सरकार न बना पाने के कारण कांग्रेस में जो निराशा का माहौल था, उसको भी इस फैसले ने निसंदेह कम किया है। गठजोड़ की सरकार कैसे चलेगी, यह अभी देखना बाकी है। चर्चा इस बात की है कि जिस तरह से जेडीएस व कांग्रेस ने दो दिन के लिए विधायकों की मजबूत किलेबंदी की वैसी कब तक रखेंगे। मतलब साफ जाहिर है कि बाजार खुला है। भाव लगने व बिकने के विकल्प बरकरार है। गठबंधन अगर मजबूती के साथ डटा रहा तो बात अलग है वरना खरीद फरोख्त की आशंकाएं व चर्चाएं थोड़ी बहुत भी सही साबित हुई तो गठबंधन सरकार का कार्यकाल पूरा करना मुश्किल होगा। मतलब तय है कर्नाटक में सियासी कमशकश खत्म नहीं होने वाली...। चुनौती दोनों तरफ है। देखना है शह व मात के इस खेल में बाजी किसके हाथ लगेगी। हार से तमतमाई भाजपा चुप नहीं बैठने वाली...वह पलटवार जरूर करेगी इतना तय है।

इक बंजारा गाए-31

मेरे साप्ताहिक कॉलम  की अगली कड़ी....।
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जनसंपर्क का मौका
नेता हो या नेता बनने की हसरत देखने वाला हो। दोनों में एक बात की समानता विशेष रूप से देखने को मिल जाती है। भीड़ देखते ही यह लोग हाल चाल पूछने और मेल मिलाप करने जरूर लग जाते हैं। मौका चाहे खुशी का हो या गम का इससे इनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई कैसा भी सोचे, यह लोग तो अपना जनसंपर्क अभियान जारी रखते हैं। अब नगर परिषद सभापति की माताजी के निधन की ही बात करें। अंतिम संस्कार पर मुक्ति धाम ठसाठस भरा था। इतनी भीड़ अमूनन अंतिम संस्कारों में जुटती नहीं है। इतने भीड़ देखकर छुटभैयों को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। इधर, लोग सभापति व उनके परिजनों को सांत्वना दे रहे थे, वहीं यह छुटभैये नेता मुक्तिधाम में घूम-घूमकर लोगों से मिल रहे थे। हंस-हंस के बतिया रहे थे। यहां तक कि गर्मजोशी से हाथ भी मिला रहे थे। इतने सारे लोग एक जगह कभी मिल नहीं सकते, इसलिए मौके का फायदा उठाने से छुटभैये चूके नहीं। खैर, फायदा कितना मिला या मिलेगा यह तो समय बताएगा।
चुनावी मौसम
चुनावी मौसम का अपना ही आनंद है। यह मौसम आते ही न जाने कितने ही नेता चुनाव लडऩे का सपना पाल बैठते हैं। हार-जीत अलग विषय है। टिकट मिलना न मिलना भी कोई मायने नहीं रखता। हां यह बात दीगर है कि चुनाव आते-आते सपना देखने वालों की संख्या कम हो जाती है। श्रीगंगानगर में एक पार्टी के नेताजी ने तो बकायदा चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। परिणाम चाहे कुछ भी कैसा भी हो, टिकट मिले न मिले लेकिन उन्होंने कह दिया है चुनाव लड़ेंगे। खैर, इसी तरह पार्षद का चुनाव न जीतने वाले शख्स भी विधानसभा चुनाव के नाम पर जीभ लपलपा रहे हैं। हैरत की बात तो है कि यह शख्स हर किसी से पूछते फिर रहे हैं कि उनको लेकर मतदाताओं की क्या राय है? यह बात सुनकर सलाह देने वाले अपना माथा पीटने के अलावा करें भी तो क्या। लोग इस छुटभैये को कैसे बताएं कि मतदाताओं की राय क्या है। वैसे कोई राय हो तब तो बने भी। जानने वाले जानते हैं यह छुटभैया समय-समय पर शहर में अपने होर्डिंग्स टांग कर खुद को विधानसभा का दावेदार बताता रहता है।
घेराव की कहानी
श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज खुलने का सपना फिलहाल तो सपना ही बना हुआ है। हां इस सपने को साकार करने के लिए प्रयास कई बार हुए हैं। अब भी हो रहे हैं लेकिन सपना अभी सच हुआ नहीं है। इधर, इस सपने को सच करने के लिए कई तरह के आंदोलन भी हुए हैं। पिछले दिनों इसी विषय को लेकर विधायक का घेराव करने तक घोषणा की कर दी गई। सोशल मीडिया पर पोस्टें वायरल की गई। समाचार पत्रों तक में भी प्रेस नोट भिजवाए गए। इतना होने के बावजूद घेराव स्थगित हो गया। दानदाता ने घेराव करने वालों से चर्चा की और उनको वस्तुस्थिति से अवगत कराया। अब जो बातें सामने आई उनमें ऐसी कोई नई नहीं थी। अब लोगों के समझ में यह नहीं आ रहा कि यह घेराव की रणनीति बनी ही क्यों थी। और बनी भी थी तो ऐसा क्या मिल गया तो टाल दी गई। वैसे यह सवाल कइयों के जेहन में घूम रहा है और जवाब न मिलने के कारण परेशान कर रहा है सो अलग। वैसे घेराव की घोषणा व स्थगित होने की कहानी शायद ही सामने आए।
दावे हैं दावों का क्या
कसमें, वादे, प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या.. यह चर्चित फिल्मी गाना तो कमोबेश हर किसी ने सुना ही होगा। श्रीगंगानगर पुलिस के संदर्भ हो याद रखते हुए अगर गीत के बोल में बातों की जगह दावा जोड़ दिया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। विशेषकर सरकारी विभागों की तरफ से किसी बात को लेकर दावे तो खूब होते हैं लेकिन कुछ समय बाद दावों की हवा निकल जाती है। लोक परिवहन बसों से जुड़े दावे का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक हादसे के बाद पुलिस ने आनन-फानन में लोक परिवहन बसों के खिलाफ खूब कार्रवाई की। और साथ में यह दावा भी किया कि इन बसों की लगातार चैकिंग की जाएगी। खैर, जैसे-जैसे हादसे की खबर शांत हुई पुलिस का चैकिंग का अभियान भी सुस्ती पकड़ गया। कई बसें फिर से परंपरागत तरीके से संचालित होने लगी है। शायद फिर कोई हादसा ही खाकी की इस सुस्ती को तोड़ेगा। वैसे भी सुस्ती हादसे के बाद ही टूटती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 17 मई 18 के अंक में प्रकाशित 

कलक्टर साहब! यह सड़क ठीक करवाओ

श्रीमान, जिला कलक्टर
श्रीगंगानगर।
इन दिनों आप शिव चौक होते हुए जिला अस्पताल गए हैं तो यकीनन आपको हालात की जानकारी होगी। अगर नहीं गए हैं तो आप एक बार इस सड़क से जरूर गुजरें। पखवाड़े भर से ज्यादा समय से इस सड़क पर इंटरलॉकिंग का काम बंद पड़ा है। एक तरफ तो सड़क के किनारे कहीं पर खोद कर तो कहीं पर कंकरीट डाल कर छोड़ दिया गया है, जबकि दूसरी तरफ इंटरलॉकिंग का काम भी आधा अधूरा ही हुआ है। यूआईटी ने पता नहीं क्या सोच कर इस बीच के टुकड़े की इंटरलॉकिंग करवाने का तय किया? जबकि इस जगह पर जबरदस्त अतिक्रमण हैं। वैसे तो अतिक्रमण की मार से समूचा श्रीगंगानगर शहर ही प्रभावित है, लेकिन इस मार्ग पर तो रेत व बजरी का कारोबार खुलेआम सड़क पर होता है। रेत व बजरी से भरे ट्रकों के कारण इस मार्ग पर रोज जाम लगता है। वैसे भी यह अति व्यस्त मार्ग है जो श्रीगंगानगर को सूरतगढ़ और बीकानेर से जोड़ता है। हिसाब से तो यूआईटी को इस मार्ग से अतिक्रमण हटाने तथा तमाम औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही यह काम शुरू करवाना था, लेकिन पता नहीं न्यास का क्या मकसद रहा कि आनन-फानन में यह काम शुरू करवा दिया गया। इस जल्दबाजी का अंजाम यह हुआ कि वन विभाग की आपत्ति के बाद यह काम रुक गया। अब यूआईटी के अधिकारी बीकानेर व जयपुर के बीच एनओसी लेने के लिए चक्कर लगा रहे हैं। नियमानुसार इंटरलॉकिंग करवाने का काम यूआईटी का है ही नहीं। फिर भी उसने करवाना तय किया तो पूरी तैयारी करनी चाहिए थी। खैर, यूआईटी की इस नासमझी का खमियाजा आमजन व वाहन चालकों को भुगतना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं इंटरलॉकिंग और सड़क के बीच जो डिवाइडर बनाया जा रहा है, जानकारों के अनुसार वह किसी का काम नहीं है। इससे सड़क और संकरी हो गई है तथा इंटरलॉकिंग की जगह अतिक्रमण फिर पसरने लगा है। यह डिवाइडर अतिक्रमण करने वालों के लिए एक तरह से सुरक्षा दीवार बन गया है। इसने सड़क व अतिक्रमण प्रभावित क्षेत्र को दो भागों में बांटने का काम किया है। इस डिवाइडर के कारण सड़क सिकुड़ गई है, जिससे राहत की बजाय यह काम और ज्यादा बिगड़ गया है। यदि डिवाइडर नहीं बनाया जाता तो सड़क और इंटरलोकिंग टाइल्स का मिलान हो जाता, जिससे सड़क की चौड़ाई बढ़ जाती और वाहन चालकों को सुविधा होती। अभी पिछले दिनों आई मामूली बरसात से डिवाइडर की वजह से सड़क पर पानी भी भरा। वैसे देखा जाए तो इस मार्ग पर इंटरलॉकिंग के काम व डिवाइडर की जरूरत ही नहंी थी। इस मार्ग पर अतिक्रमण हटाना सबसे जरूरी काम था, लेकिन यूआईटी ने इस मामले में आंखें क्यों मूंद रखी हैं, यह सवाल भी खड़ा हो रहा है। यह बिना जरूरत का काम करवाकर यूआईटी ने आमजन को तकलीफ में डाला है। एक तरह से यह राजकीय राशि का दुरुपयोग भी है।
आप इस मार्ग का न केवल निरीक्षण करें, बल्कि विशेषज्ञों से रिपोर्ट भी बनवाएं ताकि पता चले कि यह अनुपयोगी डिवाइडर भविष्य में कितना परेशानी भरा होगा? यह हादसों का वाहक बनेगा। बरसाती पानी की निकासी कैसे व कहां से होगी? लगता नहीं कि यूआईटी ने इन परेशानियों के बारे में सोचा भी होगा। जो विभाग निर्माण कार्य संबंधी औपचारिकता पूरी नहीं कर रहा है, लगता नहीं है कि उसने आगे की बात सोची होगी। आपसे आग्रह है कि इस सड़क को अतिक्रमण मुक्त कर बंद पड़े काम को शुरू करवाएं। रोजाना इस मार्ग से गुजरने वाले तथा व्यवस्था को कोसने वाले लोग यकीनन आपको दुआ देंगे। आप संजीदा शख्स हैं तथा समस्या का समाधान करवाने शिद्दत से करवाने की सोच रखते हैं। उम्मीद है इस मामले में भी आपका संजीदापन दिखाई देगा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 14 मई 18 के अंक में प्रकाशित 

Sunday, May 13, 2018

मनमर्जी की बधाई

टिप्पणी
पुलिस की बीकानेर रेंज की तीन दिवसीय प्रतियोगिता शुक्रवार को श्रीगंगानगर पुलिस लाइन संपन्न हुई। बीकानेर रेंज में चार जिले हनुमानगढ़, चूरू, बीकानेर व श्रीगंगानगर आते हैं। चारों जिलों के खिलाडिय़ों ने तीन दिन तक खूब दम दिखाया। तेज धूप में पसीना बहाया, लेकिन ऑवरआल चैम्पियन का खिताब मेजबान श्रीगंगानगर के नाम रहा। जीत तो जीत होती है और उसकी खुशी भी बड़ी होती है। इतनी बड़ी कि उसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है, लेकिन इस खुशी का ढिंढोरा चौक चौराहों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर पीटा जा रहा है। वैसे तो गाहे-बगाहे शहर को बदरंग में करने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता, लेकिन संभवत: यह पहला मामला है जब नेताओं व छुटभैयों की तर्ज पर पुलिस की जीत पर बधाई के होर्डिंग्स लगे हैं। सुखाडिय़ा सर्किल पर लगा बधाई का होर्डिंग तो नियमों को सरेआम ठेंगा दिखा रहा है। भारतीय सैनिकों की वीरता व बहादुरी की बदौलत जीता गया पाक टैंक इस होर्डिंग की आड़ में छिप गया है। खास बात देखिए इस होर्डिंग के संबंध में नगर परिषद से किसी प्रकार की अनुमति नहीं ली गई है। इधर पुलिस भी इस तरह के होर्डिंग्स लगाने से इनकार कर रही है। बधाई देने वालों में किसी का नाम नहीं है, होर्डिंग के नीचे केवल बधाई लिखकर नीचे 'श्रीगंगानगर पुलिस का सदस्य होने पर गौरवान्वित है' , लिखा हुआ है। अगर यह होर्डिंग पुलिस की जानकारी में लाए बिना ही लगा है तो पुलिस को पड़ताल कर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। इधर नगर परिषद को भी इस तरह बिना अनुमति के लगने वाले होर्डिंग्स पर कार्रवाई करनी चाहिए। होर्डिग्स लगने के पीछे कहीं न कहीं परिषद की भूमिका भी संदिग्ध है। इतने समय से बिना अनुमति के होर्डिंग्स लगते आ रहे हैं तो कार्रवाई क्यों न हो रही है?
बहरहाल, पुलिस को बधाई देने वाला यह होर्डिंग विशेष रूप से पुलिस के लिए जांच का विषय है। पुलिस दिवस जैसे बड़े कार्यक्रमों पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने संबंधी कोई होर्डिंग्स नहीं लगे तो खेल प्रतियोगिता में चैम्पियनशिप हासिल करने की बधाई चौराहों पर देने की जरूरत कहां रह जाती है? भले ही पुलिस होर्डिंग के लगाने से इनकार कर रही है, लेकिन कोई सरेआम चाटूकारिता का प्रदर्शन कर होर्डिंग्स लगा रहा है तो वह लोभ संवरण भी कैसे कर पाएगी? फिर भी पुलिस को इस मामले में कड़ा कदम उठाना चििाहए और न केवल यह होर्डिंग हटवाए बल्कि लगवाने वाले के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए। नगर परिषद को भी अब सुस्ती का आलम छोड़कर शहर को बदरंग करने वालों के खिलाफ सख्ती से पेश आना चाहिए। अगर इस काम में परिषद के लोग ही बाधक हैं या उनकी भूमिका संदिग्ध है तो उन पर भी अब लगाम कसने की जरूरत है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 13 मई 18 के अंक में प्रकाशित

केवल दस सेकंड में मां से दूर हो गई माही

श्रीगंगानगर. मात्र दस सेकंड से भी कम का समय रहा होगा जब मासूम माही अपनी मां की गोद से छिटकी और फिर सदा के लिए दूर हो गई। शुक्रवार को सोशल मीडिया पर वायरल हुए मात्र एक मिनट चौबीस सेकंड की फुटेज में यह समूचा दर्दनाक घटनाक्रम कैद है। विदित रहे कि श्रीगंगानगर के चहल चौक स्थित सीजीआर मॉल में गुरुवार को स्वचालित सीढियों से एक मासूम बालिका अपनी मां की गोद से छिटक कर गंभीर रूप से घायल हो गई। बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। श्रीगंगानगर में स्वचालित सीढियों से गिरकर मौत होने का यह अपने आप में पहला मामला है। सोशल मीडिया पर वायरल सीसी टीवी फुटेज देखने से जाहिर होता है कि महिला ने संभवत: पहली बार ही स्वाचालित सीढियों का प्रयोग किया। वह सीढियों की अभ्यस्त नहीं दिखाई दे रही। इस कारण यह हादसा हुआ। फुटेज में साफ तौर पर दिखाया दे रहा है कि रायसिंहनगर का यह दपंती मॉल में आता है। आते ही युवक राहुल अपने मोबाइल से सेल्फी लेता है। इसके बाद पति-पत्नी एक चक्कर लगाकर सीढियों की तरफ आते हैं। इस दौरान भी राहुल अपने बालों में हाथ फेरता दिखाई देता है। सीढियों पर आकर महिला कुछ ठिठकती है। वह डरती-डरती सीढियों की तरफ बढ़ती है। वह बच्ची को गोद में ठीक से लेती भी है। इसके बाद संभलते हुए वह सीढि़यों की तरफ कदम बढ़ाती है। जिस हाथ से उसने बच्ची को थाम रखा है, उसी हाथ की कुहनी वह स्वचालित सीढियों की रेलिंग पर रख देती है। चूंकि, रेलिंग सीढि़यों के साथ-साथ नहीं चलती। सीढियां आगे बढऩे और डर के मारे कोहनी जोर से टिकाए रहने के कारण उसका हाथ शरीर से दूर होता जाता है और बालिका उसके हाथ से छिटकर रेलिंग के नीचे गिर जाती है। यह हादसा दूसरे फ्लोर से तीसरे फ्लोर पर जाते वक्त होता है। मात्र दस सेकंड के इस घटनाक्रम के बाद समूचे मॉल में हड़कंप मच जाता है। दंपती बदहवाश होकर इधर-उधर दौड़ते दिखाई देता है। वहां मौजूद लोगों में भी अफरा-तफरा मच जाती है।
गमगीन माहौल में अत्येष्टि
सीढियों से गिरकर घायल हुई तथा बाद में इलाज के दौरान दम तोडऩे वाली मासूम माही का शुक्रवार को रायसिंहनगर में अंतिम संस्कार कर दिया गया। गुरुवार को उसकी मां बेसुध हो गई थी। विदित रहे रायसिंहनगर का राहुल अपनी पत्नी मीरा को दवा दिलाने शुक्रवार को श्रीगंगानगर आया था। साथ में मासूम माही भी थी। पत्नी को दवा दिलाने के बाद यह दंपती सीजीआर मॉल आ गया और यह हादसा हो गया। मासूम माही की उम्र को लेकर जरूर असमंजस रहा। श्रीगंगानगर पुलिस कंट्रोल रूम के अनुसार उसकी आयु दस माह है जबकि परिजनों ने उसकी आयु दो साल से तीन साल के बीच बताई।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 12 मई 18 के अंक में प्रकाशित

इक बंजारा गाए-30


विदाई पार्टी
तबादला होने पर विदाई देने की परम्परा पुरानी है। वैसे तो विदाई सहकर्मी ही देते आए हैं लेकिन समय के साथ अब वाहर वाले भी विदाई देने लगे हैं। विशेषकर खाकी वाले महकमे के प्रति बाहरी लोग ज्यादा सहानुभूति दिखाते हैं। इस सहानुभूति की वजह भी लोग अच्छी तरह से जानते हैं। अब यातायात वाले साहब की विदाई की चर्चे इन दिनों दबे स्वर में सुनाई दे रहे हैं। विदाई भी कोई सामान्य नहीं थी। शहर के एक सबसे बड़े मॉल में इस विदाई पार्टी का आयोजन किया गया। विदाई देने वाले भी वही लोग थे, जिनके पीछे पिछले दिनों खाकी हाथ धोकर पड़ी थी। बकायदा अभियान भी चलाया। अभियान की मार झेलने के बाद भी विदाई देने का राज हर किसी के समझ नहीं आ रहा। विशेषकर अब नए साहब क्या करेंगे। वो पुराने साहब के संबंधों को कायम रखेंगे या संबंधों से ऊपर जाकर कोई नजीर पेश करेंगे, यह तो खैर आने वाला वक्त ही बताएगा।
गजब की एकता
श्रीगंगानगर शहर के हालात से कोई अनजान नहीं हैं। कहीं सीवरेज लाइन की खुदाई के कारण लोग परेशान हैं तो कहीं अधूरे निर्माण ने दुविधा में डाल रखा है। कहीं सफाई व्यवस्था चौपट है तो कहीं यातायात व्यवस्था चरमराई हुई है। गंगनहर में दूषित पानी आने का मामला भी लगातार चर्चा में है लेकिन शहर के नेताओं और छुटभैयों को यह सब दिखाई नहीं देता। उनकी नजर थोक के वोट बैंक पर लगी रहती है। विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही इन नेताओं व छुटभैयों में सही-गलत में अंतर करना भी छोड़ दिया लगता है। हालात यह है कि कोई नाजायज मांग करता है तो शहर के नेता व छुटभैये उसके समर्थन में तत्काल खड़े हो जाते हैं। न्यायसंगत बात के लिए एकजुट होने की बात तो समझ आती है लेकिन गैरवाजिब बातों के लिए ताल इसलिए भी ठोकी जा रही है कि ताकि इस बहाने थोक में वोट बैंक बढ़ जाए। हालांकि इन नेताओं में टिकट किसको मिलेगी और किसकी कटेगी यह तय नहीं है। फिलहाल इनका काम हां में हां मिलाना ही है।
नाका प्रेम
देखा गया है कि खाकी को कोई जगह पसंद आ जाती है तो उस पर भले ही लाख सवाल उठे, पर वह उस जगह को नहीं छोड़ती, उस पर कायम रहती है। अब साधुवाली छावनी के रास्ते पर सैनिक अस्पताल के पास जांच अभियान तथा उससे थोड़ा आगे साधुवाली गांव में नाका लगाने के मामले चर्चा में आने के बावजूद यथावत हैं। सैनिक अस्पताल के पास वैसे भी यातायात व्यवस्था इतनी चरमराई हुई नहीं है फिर भी खाकी का इस जगह से खास लगाव संशय तो पैदा करता है। आखिर शहर से दूर इस मार्ग पर खाकी को इस तरह एकांत तलाशने की जरूरत ही क्या थी। वैसे दो चार रोज पूर्व साधुवाली नाके का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। लेकिन खाकी के अधिकारियों ने मामले में दम न बताकर इसको खारिज कर दिया। खैर, यह तो सब जानते ही हैं कि बिना आग के कभी धुआं नहीं उठता। वैसे भी जब मामला गरम है तो अधिकारियों को इस बात की पड़ताल तो करवा ही लेनी चाहिए कि इस जगह से इतने लगाव की वजह आखिर है क्या?
जिन्न का जलवा
श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज का जिन्न विशेषकर चुनावी सीजन के आसपास ज्यादा प्रकट होता है। इस जिन्न का जलवा ऐसा है इसके आभा मंडल के इर्द गिर्द सब घूमने लगते हैं। चाहे कोई समर्थन में हो या फिर खिलाफ। अब विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही मेडिकल कॉलेज का मामला फिर चर्चा में हैं। वैसे मेडिकल कॉलेज के साथ-साथ चर्चा इस बात की भी हो रही है कि श्रीगंगानगर में रात को तो मेडिकल स्टोर नहीं खुलता। वैसे भी मेडिकल कॉलेज कब खुलेगा कब नहीं, इसका कोई अता पता नहीं है। हां, मेडिकल कॉलेज खुलवाने की मांग करवाने वाले पहले अगर एक मेडिकल स्टोर खुलवाने की व्यवस्था भी करवा दें तो यह भी जनता पर एक तरह का उपकार ही होगा। पता नहीं क्यों आंदोलन करने वालों को यह बात समझ नहीं आती। हो सकता है समझ आती भी हो लेकिन गरम लोहे पर चोट करने का अवसर भला कौन चूकना चाहेगा, इसलिए सब मेडिकल कॉलेज का राग ही अलाप रहे हैं।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 10 मई 18 के अंक में प्रकाशित

मीडिया और तूफान राग

बस यूं ही 
करीब दो साल पहले मानसून और मीडिया राग पर कुछ लिखा था। इन दिनों तूफान राग चर्चा में हैं। हालांकि तूफान दो दिन से कुछ ठंडा पड़ा है लेकिन इसका राग इस बार इतना खतरनाक तरीके से गाया गया गोया तूफान ही पहली बार आया हो। बचपन में इस तरह की न जाने कितनी ही आंधियों से वास्ता से पड़ा है लेकिन इस बार आंधी का नाम तूफान हो गया। हालांकि गांवों में आंधी का स्वरूप थोड़ा बड़ा होता है तो उसे सूंटा कहते हैं। खैर, तूफान नाम बड़ा है और इसमें डर समाहित हो जाता है। और ये जो डर है ना यह आजकल बहुत बिकता है। डाक्टर बीमारी का डर, मरीज की तबीयत बिगडऩे का डर, प्रसूता की मौत का डर दिखाकर जेब ढीली करते हैं तो मीडिया डरा डरा कर टीआरपी बटोरता है। यह डर बिकता भी इसीलिए है क्योंकि डर को परिभाषित भी इसी तरह से किया जाता है कि अगला शर्तिया डरे ही। मौसम विभाग और उसकी भविष्यवाणियों का सटीक उदाहरण पिछली पोस्ट में दे चुका हूं। मौसम विभाग अपने सिर पर कोई इल्जाम नहीं लेना चाहता। मौसम दगा या न दे यह उसका सिरदर्द है। मौसम विभाग तो भविष्यवाणी करके गंगा नहाया हो जाता है। हां एक तूफान से जनहानि होने के बाद तो मौसम विभाग को हल्का सा बादल या हल्की सी हवा भी तूफान नजर आने लगे हैं। मौसम विभाग के इस डर को मीडिया ने जबरदस्त ने भुनाया। खतरनाक तरीके से। मौसम विभाग की भविष्यवाणी पर मीडिया की मुहर लगने के बाद प्रशासन की क्या मजाल, लिहाजा उसने भी व्यापक प्रबंध करने तथा कई जगह स्कूलों में अवकाश तक की घोषणा करने में गुरेज नहीं किया। अब आसमान में बादल थोड़े से ही गहराएं या हवा थोड़ी सी तेज हो, मौसम विभाग व मीडिया भविष्यवाणी सच साबित हुई यह मानकर अपनी पीठ थपथपाने में भी संकोच नहीं करते।
बहरहाल, आशंका व अनजाने भय से सहमे लोग रफ्ता-रफ्ता भविष्यवाणियों से उबर रहे हैं। दिलोदिमाग से डर कुछ निकला है तो अब जुमले और चुटकले भी याद आ रहे हैं। इस निगोडे़ तूफान पर न जाने कितने ही जुमले बन गए। वैसे भी देश में जुमले बनते आजकल जरा सी भी देर नहीं लगती। कुछ तूफानी जुमलों पर गौर फरमाएं।
1.अभी अभी तूफान पंजाब से हरियाणा की और बढ रहा है और हरियाणा पंजाब बार्डर पर हरियाणा वालों ने टोल टैक्स पर रोक रखा है। कह रहे हैं पर्ची कटेगी। नहीं तो लट्ठ बाजेंगे।
2. तूफान का इंतजार ना करें.. बीवी के साथ बाहर डिनर का प्रोग्राम बनाएं... बीवी के तैयार होने के बाद केंसिल कर दें... तूफान अपने आप आ जाएगा।
3. सासू फोन कर के दामाद नं पूछ्यो:- तूफान का के हाल चाल है?
दामाद- बस बढिय़ा है। कूलर चला की सूती है आराम ऊं , बात करवाऊं के!!!
4. यूपी व बिहार में लोग मन्दिरों में बैठे हैं कि तूफान न आवे लेकिन हरियाणा आले छात पे खड़े है कि क़द आवैगा।
5. इतनी बाट तो ब्याह मैं भातियाँ की कोनया होती, जितनी आज हरियाणा वालों नै 2 दिन की छुट्टी कराण आले तूफान की होरी सै।
इस तरह चुटकुलों की फेहरिस्त बेहद लंबी हैं। कहीं एक अंडरवियर पर बहुत सारी चिटकनी लगाकर तूफान से बचाव प्रचारित किया जा रहा है। खैर, तूफान भी मौसम का ही अंग है। तो इस कथित तूफानी मौसम में पोस्ट पढऩे के साथ धर्मेन्द्र के मौसम को बेईमान बताने वाले गाने का आनंद लीजिए। साथ में अमिताभ अभिनीत फिल्म तूफान का भी थोड़ा स्मरण कर लेवें।

Tuesday, May 8, 2018

तो क्या बगड़वासियों को जियो फ्री में मिलेगा?

बस यूं ही
मेरे स्कूली जीवन का शहर। मेरी किशोरावस्था से जवानी की दहलीज पर कदम रखने का शहर। गांव के बाद मेरी दूसरी पसंदीदा जगह। जीवन के आठ सुनहरे साल जहां बीते वो शहर। जी हां यह शहर है। बगड़। शिक्षा नगरी बगड़। झुंझुनूं जिला मुख्यालय से मात्र चौदह किमी की दूर पर आबाद बगड़ दो दिन से जबरदस्त चर्चा में हैं। यह चर्चा बगड़ में शिक्षा की अलख जगाने वाले सेठ पीरामल के पड़पौत्र आनंद पीरामल की है। आनंद की देश के सर्वाधिक धनवान मुकेश अंबानी की पुत्री ईशा अंबानी से शादी होने की खबरें आ रही हैं। यह शादी दिसंबर में प्रस्तावित हैं। बस इस खबर को लेकर बगड़वासी बेहद खुश हैं। पीरामल ट्रस्ट की ओर से संचालित संस्थाओं में तो बाकायदा मिठाई का वितरण भी हो गया है। बगड़ में आजादी से पहले सेठ पीरामल की आेर से प्राइमरी स्कूल के रूप में रोपा गया पौधा आज विशाल वट वृक्ष बना हुआ है। बड़े भाईसाहब केशरसिंह जी ने गोपीकृष्ण पीरामल शिक्षण प्रशिक्षण महाविद्यालय से बीएड की थी। बीच वाले भाईसाहब सत्यवीरसिंह जी ने भी पीरामल सीनियर सैकंडरी स्कूल से ही कक्षा नौ से बारहवीं तक की तालीम ली। मैंने भी 11वीं और बारहवीं की शिक्षा इसी स्कूल से प्राप्त की है। इतना ही नहीं बगड़ में जब कॉलेज में अध्ययनरत था तब कई कई बार पीरामल हवेली में भी ठहर चुका हूं। मौसाजी इस हवेली में बतौर केयर टेकर रह चुके हैं। इसके बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में आया तो पीरामल बालिका स्कूल में बतौर अतिथि भी शिरकत कर चुका। यह सब बताने का मकसद यह है सेठ पीरामल की दूरदर्शी सोच ने झुंझुनूं जिले को शिक्षा के मामले में अग्रणी करने में प्रमुख भूमिका निभाई। वह भी बिना किसी लाभ के। बीएल माहेश्वरी व रूंगटा भी कुछ एेसे ही नाम हैं। इन सेठों की बदौलत हम सब ने कम खर्च में संस्कार युक्त पढ़ाई की। आज के दौर में यह सब संभव नहीं लगता।
खैर, अब मूल विषय पर लौटता हूं। कल आनंद व ईशा की खबरें जैसे ही आई, सोशल मीडिया पर जुमले बनने लगे। लोग खुशियां मनाने लगे। एक दूसरे को बधाई देने लगे। सोशल मीडिया पर भी मेरे सर्वाधिक मित्र बगड़ से ही हैं, लिहाजा वहां की अपडेट खबर मिल ही जाती है। अब इस जुमले पर गौर फरमाएं ' अब यह अफवाह कौन फैला रहा है कि अंबानी बगड़वासियों को दहेज में जियो आजीवन फ्री देंगे।' बगड़ नगर पालिका के पूर्व चैयरमैन आदरणीय बड़े भाईसाहब राजेन्द्र जी शर्मा के फेसबुक वॉल पर लगी इस पोस्ट के नीचे रोचक कमेंट आने का दौर जारी है। एक खुशखबर ने वाकई बगड़वासियों को खुशी की वजह दे दी है। 33 वर्षीय आनंद की 27 वर्षीया ईशा से शादी के बाद बगड़ को क्या मिलेगा, क्या नहीं यह सब भविष्य की बातें हैं लेकिन खुशी तो खुशी है जनाब। आप भी हंस सकते हैं क्योंकि हंसी का कोई मोल नहीं होता। 

प्रताडऩा की पराकाष्ठा


टिप्पणी
यह हकीकत वाकई हैरान करने वाली है। मौके के हैरतअंगेज हालात तो रोंगटे तक खड़े कर देते हैं। यह बेरहमी की भयावह तस्वीर है। मासूमों की मजदूरी की यह तस्वीर डराती है, चौंकाती है, विचलित करती है और शर्मसार भी। यह अपनों की उपेक्षा तो है ही, अभावों की वजह भी लगती है। पापी पेट के लिए परिजनों ने कलेजे पर पत्थर रख मासूमों पर जिम्मेदारियों का बोझ तो लादा ही, कारखाने के कारिंदों ने इन कोमल कलियों से कठोर काम करवा कर इनके सपनों का कत्ल करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।
यह यातनाओं के दुर्लभ उदाहरणों में से एक है। यह हैवानियत की हद है तो प्रताडऩा की पराकाष्ठा भी है। इसे अमानवीयता की अति भी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं। श्रीगंगानगर की एक चूड़ा फैक्ट्री से गुरुवार दोपहर को मुक्त करवाए गए 23 बाल श्रमिकों की दर्दनाक दशा देखकर हर कोई स्तब्ध है। सात से चौदह साल की उम्र तो पढऩे तथा खेलने खाने की उम्र होती है। दुनियादारी से दूर मौजमस्ती करने की उम्र। कमाई या पेट की चिंता से बेफिक्र रहने की उम्र। सपने देखने की उम्र। पंख फैलाने की उम्र।
अफसोसजनक बात यह है कि बच्चों के बचपन को बिसरा कर इनके अरमानों का गला घोंट दिया गया। उनके सपनों को तोड़ दिया गया। हमदर्दी, इंसानियत, संवेदनशीलता जैसे मानवीय गुण यहां गौण हो गए। दया की जगह एक तरह की 'दरिदंगी' ने ले ली। पत्थरदिल कारिंदों की यह करतूत अक्षम्य है। मासूमों पर मुसीबतों का पहाड़ लगातार टूटता रहा, लेकिन कारिंदों ने कभी भी रहमदिली नहीं दिखाई। इन कारिंदों ने कभी प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने या समझने की जहमत तक नहीं उठाई।
बहरहाल, मासूमों को कारखाने रूपी काल कोठरी में कैद करके रखना भी अपने में आप बड़ा सवाल है। बाल श्रमिकों को बंधक बनाना यह साबित करता है कि उनसे यह काम जबरन करवाया जा रहा था। खैर, मासूमों से की गई कठोर यातनाओं की भरपाई तभी संभव है जब इस समूचे प्रकरण की ईमानदार जांच हो और दोषियों को सजा मिले, ताकि इस तरह की विचलित करने वाली व हृदय विदारक घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 4 मई 18 के अंक में प्रकाशित 

इक बंजारा गाए-29


खूबसूरत बहाना
नेता और अभिनेता दोनों में एक बात समान होती है। दोनों अभिनय बड़ी खूबसूरती से करते हैं। ऐसा अभिनय कि लोग हकीकत समझ बैठते हैं, तभी तो इनकी बातों में जल्दी आ जाते हैं, प्रभावित हो जाते हैं। अब देखिए न अपने परिषद वाले नेताजी वैसे तो चर्चा में बन रहते हैं। एक संभवत: प्रदेश के इकलौते नेता हैं, जो सर्वदलीय हैं। सभी दलों के समर्थन इनकी कुर्सी टिकी हुई है। नगर परिषद का विपक्ष भी कहा जाए तो कोइ अतिश्योक्ति नहीं होगी। अब गोल बाजार के एक होटल को सीज करने की कार्रवाई को भी बड़ा ही खूबसूरत बहाना बनाकर टाल दिया गया है। दलील दी गई कि शादी समारोहों का मौसम है। होटल पर कार्रवाई हुई तो जनता को परेशानी होगी। एक होटल से जनता को कैसी व कितनी परेशानी होगी यह बात लोगों के हजम नहीं हो रही। नेताजी की हमदर्दी होटल मालिक के प्रति है या जनता के यह राज भी शहरवासी जानने लगे हैं। बीच रास्ते में बस खराब हो जाए या कोई ट्रेन रद्द हो जाए तो क्या यात्री रुक जाएंगे? जिनको जाना है वो किसी दूसरे साधन से निकल लेंगे। पर नेताजी को अब कौन समझाए। सारे ही एक जैसे हैं।
खामोशी तो टूटी
दारू वाला महकमा लंबे समय से लंबी तान के सोया था। शराब ठेकेदार व उनके कारिंदे दोनों हाथों से सुराप्रेमियों को लुटने में लगे रहे। न दिन देख रहे थे न रात। ऊपर से धमकी-चमकी अलग। अब जो तलबगार है, उसको तो सब सहन करना ही पड़ता है। यहां तक कि खाकी के हाथ भी मंथली लेते रंगे गए। विभाग की सुस्ती व खाकी की शह के कारण शराब ठेकेदारों की मनमर्जी चरम पर पहुंच गई। मुंहमांगे दाम और ठेके खुलने व बंद होने का कोई समय ही नहीं। शिकायत करने वालों कहीं पर भी कर ले, कोई इन शराब ठेकेदारों का बाल बांका करने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाता। नफरी और स्टाफ की कमी का बहाना बनाकर अब तक कार्रवाई करने से बचते रहे आबकारी विभाग का अचानक हरकत में आना किसी आश्चर्य से कम नहीं हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि विभाग को आनन-फानन में बोगस ग्राहक बनाने पड़े। विभाग ठेकेदारों की मनमर्जी से क्या वाकिफ नहीं हैं। जरूर कहीं न कहीं कोई शेर को सवा शेर मिला है। जिसके निर्देशों पर आबकारी विभाग ने यह हलचल दिखाई बाकी हकीकत तो जगजाहिर है ही।
न खाते बने न निगलते
गले की हड्डी बने जाने संबंधी मुहावरे से कौन परिचित नहीं हैं। गले में हड्डी अटक जाए तो न तो ठीक से खाते बने और न ही निगलते। शिव चौक से जिला अस्पताल बन रहा इंटरलॉकिंग का काम यूआईटी के लिए गले की हड्डी बन चुका है। पता नहीं ऐसी क्या जल्दबाजी थी या मजबूरी थी जिसके चलते यूआईटी ने इस टुकड़े का चयन किया। काम शुरू होने से पहले ही विरोध होना था। नजीता यह निकला कि इस काम की हवा तभी निकल गई। आवाश्सन की रेवडिय़ां बांटने के बाद काम फिर शुरू हुआ। काम की रफ्तार भले ही धीमी रहे हो लेकिन डिवाइडर बनाने तथा मिट्टी खुदाई का काम युद्धस्तर पर हुआ। पर अचानक वन विभाग ने ऐसा पेच फंसाया कि यूआईटी के पास अब बगलें झांकने और विकल्प खोजने के लिए अलावा कोई चारा नहीं हैं। वैसे भी लोगों को फायदा तो इस इंटरलॉकिंग बनने के बाद भी नहीं होने वाला। बहरहाल, उड़ती धूल व खोदी गई सड़कें परेशानी का सबब बन रहे हैं। इंटरलॉकिंग के बहाने नाम चमकाने वाले नेताजी भी मौजूदा हालात के आगे पस्त नजर आते हैं।
गिफ्ट का चक्कर
शादी समारोहों व मांगलिक कार्यों का सिलसिला वैसे तो साल भर चलता ही रहा है। इनके साथ ही उपहार आदि देने का काम भी होता है। लेकिन मौसम चुनावी हो तो उपहारों की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे उपहार बिन बुलाए मेहमान देकर जाते हैं। सब जगह खुद नहीं पहुंच पाते लिहाजा समर्थकों के माध्यम से भी यह काम करवाया जाता है। हां उपहार पर संबंधित मेहमान की नाम की स्लिप जरूर चस्पा होती है। चुनावी फसल तैयार करने का वैसे तो यह तरीका काफी पुराना है लेकिन समय के साथ अब यह हाइटेक हो गया है। पहले तो शादी समाराहों आदि में लिफाफे से काम चल जाया करता था लेकिन अब लिफाफे की जगह महंगा गिफ्ट आ गया है। यह गिफ्ट मतदाताओं का मानस बदलने में कितने मददगार होंगे यह तो समय ही बताएगा लेकिन शादी वाले परिवारों में बिन बुलाए मेहमानों के गिफ्ट ने उनको सोचने पर मजबूर कर दिया है। धर्मसंकट तो वहां पर है जहां दावेदार कई हैं और सभी के गिफ्ट के पहुंच जाते हैं। धर्मसंकट यह है कि कल वह मतदाता की भूमिका में होगा तो कौनसे गिफ्ट का बदला ईमानदारी से चुका पाएगा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 3 मई 18 के अंक में प्रकाशित 

कमर दर्द

लघु कथा
सुंदर नयननक्श की मां - बेटी बस में एक ही सीट पर बैठी थी। तभी बेटी उठी और आराम का कहकर सिंगल स्लीपर में सोने चली गई। अब मां के बगल वाली सीट खाली थी। खाली सीट देख काफी समय से खड़े एक बुजुर्ग के चेहरे पर चमक आ गई। वो फौरन सीट की तरफ लपके लेकिन निराशा ही हाथ लगी। वह महिला बोली, जी यह हमारी सीट है। हमने इसको बुक करवा रखा है। स्लीपर भी हमने ही बुक करवाया है। मेरी कमर में दर्द रहता है, इसीलिए बीच-बीच में जाकर आराम करती हूं। हालांकि यह सब कहा तब तक महिला स्लीपर में एक बार भी नहीं गई थी। अगले स्टॉप पर एक परिवार और चढ़ा। सीट पर बैठी महिला खिसकी और एक बालिका को अपनी बगल में बैठा लिया। बस अपनी रफ्तार से दौड़े जा रही थी। रात का एक बजने को था। लगभग सभी यात्री नींद में आगोश में समा चुके थे। अचानक परिचालक आया और बालिका को एक तरफ कर महिला के बगल में बैठ गया और फिर महिला व.परिचालक के बीच खुसर-पुसर होती रही। तीन घंटे बाद महिला सीट से उठी और बेटी स्लीपर से नीचे उतरीं। दोनों का मुकाम जो आ गया था। बस से नीचे उतरने के बाद महिला के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान थी और हाथ अभिवादन में हिल रहा था। बस चल पड़ी पर सवाल खड़ा रह गया, वो कमर दर्द? वो आराम?

सोच

लघुकथा
तेज रफ्तार दौड़ती रोडवेज बस के आगे दो युवकों ने अचानक हाथ किया तो बस के टायर चरमरा उठे। दोनों युवक बैठे और बस चल पड़ी। इसी के साथ दोनों का आपसी संवाद शुरू हुआ।
पहला युवक 'यार मैं उस माहौल से परेशान हो गया था। मकान चेंज न करता तो क्या करता।'
दूसरा युवक 'अरे एेसा क्या हो गया। कुछ दिन पहले तो आपने सब ठीक बताया था, अब अचानक कैसे?'
सवाल सुनकर पहला युवक थोड़ा सकपकाया, होठों पर जीभ फेरते हुए बोला ' आपको बताया था कि हम वहां सभी लड़के-लड़के ही रहते थे। फिर हमारे बीच एक महिला भी आकर रहने लगी।'
महिला का जिक्र आते ही दूसरा युवक थोड़ा संभलकर सीट पर बैठते हुए बोला ' फिर?'
'अरे फिर क्या, महिला मेरे कमरे में आती है। वैसे ही वह दूसरे लड़कों के कमरों में भी जाती। हमेशा बात करने का प्रयास करती है। खुद चलाकर बात करती हमेशा।'
दूसरे युवक की जिज्ञासा और बढ़ गई कंधे उचका कर उसने पूछा ' फिर? तूने कभी बात की क्या?'
'नहीं, वह शादीशुदा महिला है। उसके पन्द्रह साल का एक बच्चा भी है। तू तो समझता है कि महिला से कौन बात करें। हां, कोई लड़की हो तो फिर भी सोचा जा सकता है। '
दूसरे युवक ने भी हां में हां मिलाई ' हां लड़की हो तो सोचा जा सकता है। महिला से कौन बात करे।'
बस करीब चालीस किलोमीटर का सफर तय कर चुकी थी लेकिन दोनों युवकों की बात का विषय अभी बदला नहीं था। एक उत्सुकतावश सवाल पूछे जा रहा था तो दूसरा जवाब देकर ही आनंदित हो रहा था। दोनों युवकों की आगे की सीट पर बैठा मैं यह समूचा वार्तालाप सुनकर तथा महिला व लड़की को लेकर उनकी अलग अलग सोच पर हैरान था।

नमूनों की नौटंकी कब तक?

टिप्पणी
सात सुखों में से पहला सुख निरोगी काया को माना गया है, लेकिन श्रीगंगानगर में आकर यह बात बेमानी हो जाती है। इसकी बड़ी वजह है शासन- प्रशासन का लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध न करा पाना। गंगनहर में पखवाड़े भर से ज्यादा समय से काले रंग का पानी का आ रहा है। विभिन्न संगठन व राजनीति दल लगातार प्रशासन को ज्ञापन देकर इस मामले में कारगर कार्रवाई की गुहार लगा रहे हैं। कुछ किसान संगठन तो मौका भी देख आए लेकिन जिला प्रशासन अभी जांच करवाने के आश्वासन से आगे नहीं बढ़ पाया है। ऐसा कोई पहली बार नहीं है, बल्कि ऐसा हर बार ही होता है। लोग शिकायत करतें हैं और प्रशासन आश्वासन का कहकर टरका देता है। ज्यादा से ज्यादा पानी के नमूने लेने की बात भी कह दी जाती है। बड़ी हैरत की बात है कि नमूनों में पानी दूषित साबित होने के बावजूद इसकी रोकथाम के लिए कोई ठोस या प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते। विडम्बना यह है भी है कि पानी की कमी या दूषित पानी को लेकर श्रीगंगानगर जिले में हर साल आंदोलन होते हैं। बस फर्क इतना है कि सरकारें बदलने के साथ आंदोलन करने वालों के चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। दूषित पानी बेचना खुलेआम स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। लोग जेब ढीली करके खुद के लिए बीमारियां व मौत खरीदें तो इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या होगी? तीन दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद स्वच्छ पेयजल मुहैया न कर पाना शासन व प्रशासन दोनों को कटघरे में खड़ा करता है। बड़ा सवाल तो यह है कि कि बात आश्वासनों व नमूनों की जांच से आगे बढ़ी क्यों नहीं? नहरी पानी में दूषित या केमिकल पानी छोडऩा एक तरह का धीमा जहर है। कैंसर, पेट संबंधी व चर्म रोगियों की बढ़ती संख्या के पीछे के कारणों में दूषित पानी भी एक बड़ा कारण है।
बहरहाल, आश्वासन की रेवडिय़ों व नमूनों की नौटंकी से लोगों को शुद्ध पेयजल नहीं मिलने वाला। इन पर विराम लगाकर तुरंत प्रभाव से ठोस, कारगर व प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। जो पानी को दूषित करता है, उस पर मुकदमे दर्ज हों, क्योंकि स्वास्थ्य से खिलवाड़ का सिलसिला अब थमना चाहिए। अगर शासन-प्रशासन की आंख अब भी नहीं खुली तो बीमारियों से पीडि़त मरीजों का आंकड़ा मौतों में तब्दील होते ज्यादा वक्त नहीं लगने वाला।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 27 अप्रेल 18 के अंक में प्रकाशित 

Thursday, April 26, 2018

इक बंजारा गाए-28


सुनहरे सपने
सपने बेचना आसान होता नहीं होता और यह हर किसी के बस की बात भी नहीं है। यह बात दीगर है कि सपने सभी देखते हैं किसी के पूरे हो जाते हैं तो किसी के अधूरे रह जाते हैं। लेकिन श्रीगंगानगर में एक महाशय तो सपने दिखाने में जबरदस्त उस्ताद निकले। इनको सपनों का सौदागर कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। सपनों के इस सौदागर ने सपनों के सहारे एक बार तो काठ की हांडी में किसी तरह दाल पका ली। पता नहीं तब क्या-क्या सपने दिखाए थे। किसी को कॉलेज के सपने तो दिखाए तो किसी को एग्रो फूड पार्क का सब्जबाग दिखाया। पर सपने सारे ही टूट गए। दुबार दाल पकाने का मौसम आया तो किसी तरह कॅालेज के सपने को फिर जिंदा किया गया। अब प्रशासन ने सपनों के सौदागर की हर शर्त मान ली। फिलहाल बैकफुट पर आए यह महाशय अब इस मामले में क्या रास्ता निकलते हैं ? हाल-फिलहाल के आसार से तो दाल पकती नजर नहीं आ रही।
याद की वजह
खाकी के भी ठाठ निराले हैं। कई उदाहरण तो ऐसे भी मिल जाएंगे जब कार्रवाई होनी चाहिए थी तब खाकी लंबी तान सोई थी। कुछ ही ऐसा मामला लोक परिवहन की बसों का है। बेकाबू रफ्तार पर कहीं कोई अंकुश नहीं था। तब भी जब पिछले दिनों एक ही नंबर की दो बसें दिखाई दी। न तो परिवहन विभाग जागा और न ही खाकी। विभागों की यह उदासीनता स्वयं स्फूर्त थी या जानबूझकर पैदा की गई ये दोनों पक्ष ही बेहतर जानते हैं, लेकिन इन बसों से हादसे बढऩे लगे तो खाकी के हाथ-पांव फूले। जन आंदोलनों को देखते हुए आखिरकार खाकी को कार्रवाई की याद आई। यह याद समय रहते आ जाती है तो यह बस वाले इतने निरकुंश नहीं होते। खाकी व परिवहन विभाग की कार्यशैली सही होती तो आज इस तरह की दौड़-धूप की जरूरत ही नहीं थी। इतना होने के बाद भी शहर की अंदरूनी यातायात व्यवस्था में अभी भी सुधार की काफी गुंजाइश है।
मनमर्जी का सौदा
मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक में वो फैसला देगा। प्रसिद्ध गायक जगजीत सिंह की गाई यह गजल इन दिनों शराब वाले विभाग पर सटीक बैठ रही है। वैसे भी विभाग को केवल टारगेट की चिंता है। शराब किस कीमत पर बिक रही है, कब बिक रही है, कैसे बिक रही है, इससे कोई मतलब नहीं है। एक तरह से विभाग ने ठेकेदारों व उनके कारिंदों को खुली छूट दे रखी है कि आप सुरा शौकीनों को जमकर लूटो। उनकी मनमर्जी से जेब काटो। आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इधर खाकी भी पिछले साल तक शराब ठेके पर कार्रवाई करती रही है लेकिन इस बार खाकी के दामन पर पर दाग लगे हैं। शराब ठेकेदारों से बंधी लेने के आरोप में पुलिस के कर्मचारियों भी धरे गए हैं। कार्रवाई करने वाले दोनों की विभाग आंख मूंद कर बैठे हैं। अब शराब ठेकेदार अपनी मर्जी से शराब की कीमत वसूल रहे हैं। पीडि़त व परेशान उपभोक्ता अपनी पीड़ा का रोना आखिर किसके आगे रोए।
मिट्टी में मिल रहे पैसे
कहते हैं जिम्मेदार जब कोई काम सोच लेते हैं तो उसे पूरा करके ही रहते हैं। यह अलग बात है उस काम का किसी को फायदा मिले या ना मिले। पर जिद है तो काम करना ही है। शिव चौक से जिला अस्पताल के बीच इंटरलॉकिंग के काम का प्रस्ताव जिसने भी तैयार किया है वह भी कुछ ऐसा ही है। यह काम क्यों व किसके लिए किया जा रहा है यह तो संबंधित विभाग, उसके कर्मचारी/ अधिकारी व नुमाइंदे ही बेहतर जानते हैं। फिलहाल इस काम को देखते हुए यह सरकारी पैसे को मिट्टी मिलाने से ज्यादा कुछ नजर आ रहा है। इस निर्माण कार्य की वजह से लोगों को जो परेशानी हो रही है उसका तो समाधान नजर ही नहीं आता। बिना मतलब काम और वह भी बेतरतीब तरीके से। बड़ी बात है कि जागरूक लोग इस काम को देखकर भी चुप हैं। गाहे-बगाहे धरना प्रदर्शन कर शहर हितैषी होने का दंभ भरने वालों को भी यह बिना मतलब का काम नजर नहीं आ रहा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 26 अप्रेल 18 के अंक में प्रकाशित 

बिना राज के भी सजा है यहां 'पोपाबाई' का दरबार

श्रीगंगानगर. पोपा बाई का नाम सुनते ही चेहरे पर डेढ़ इंच मुस्कान तो जरूर दौड़ती है, लेकिन पोपाबाई कौन थी? के सवाल पर चेहरे की हवाईयां भी उड़ जाती हैं। 
विशेषकर सियायत में 'पोपाबाई का राज' नामक जुमला खूब चलता है। राजस्थान में तो गाहे-बगाहे इस जुमले का प्रयोग होता ही रहता है। खास तौर पर जहां अव्यवस्था हो, अराजकता हो या लगे कि कानून का राज नहीं है। मतलब जहां किसी तरह की कोई व्यवस्था नजर नहीं आए, उसको 'पोपाबाई का राज' कहा जाता है। इस जुमले को कमोबेश हर कोई चटखारे के साथ बोलता है। पोपा बाई कौन थी? कहां पैदा हुई? इसका राज कैसा था? इसका शासन कौन-से कालखंड में था? जैसे सवालों का संतोषजनक जवाब भले ही कहीं न मिले, लेकिन राजस्थान में एक जगह ऐसी भी है जहां पोपाबाई का छोटा सा मंदिर यानि की दरबार सजा है। यह जगह है श्रीगंगानगर जिले के सादुलशहर उपखंड का मुक्तिधाम। वैसे तो इस मुक्तिधाम में कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लगी हैं, लेकिन पोपाबाई का दरबार चौंकाता है।
विधानसभा में भी छाया था 'पोपाबाई का राज'
27 जुलाई 2004 में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सुमित्रासिंह ने विधानसभा में कहा था कि पोपाबाई का राज मुद्दा इस सदन में एक बार नहीं, अनेक बार उठाया गया है। मैं आपसे एक निवेदन करना चाहती हूं कि क्या दो सौ माननीय सदस्यों में से कोई सदस्य ऐसा है कि जो जानता है कि पोपाबाई कौन थी? इस बार पर खूब चर्चा चली। करीब एक दर्जन सदस्यों ने पोपाबाई के राज पर टिप्पणियां कर सदन को खूब हंसाया। सबसे आखिर में तत्कालीन शिक्षा मंत्री घनश्याम तिवाड़ी पर सदन लगातार हंसता रहा जब उन्होंने विधानससभा अध्यक्ष से मुखातिब होते हुए कहा कि आप पुरस्कार दें तो वो बताएंगे कि पोपाबाई कौन थीं? लेकिन सवाल फिर भी कायम रहा कि आखिर पोपाबाई कौन थीं?
कथाओं व कहानियोंं में पोपाबाई का जिक्र
बुजुर्गों के अनुसार कार्तिक माह में महिलाएं पोपाबाई की कथा सुनती हैं। संभवत: सादुलशहर में यह प्रतिमा उस कथा से प्रेरित होकर लगाई गई है। कथा में बताया गया है कि किस तरह पोपाबाई की मृत्य हो जाती है और फिर उसको किस तरह स्वर्ग का राज मिलता है। मृत्यु के बाद एक दंपती जब स्वर्ग पहुंचता है तो वहां का दरवाजा बंद मिलता है। तब धर्मराज प्रकट होते हैं और कहते हैं कि यहां 'पोपाबाई का राज' है। इसके बाद दंपती को मृत्युलोक जाकर सात दिन तक आठ खोपरा में राई भरकर ,पांच कपड़ा ऊपर रखकर कहानी सुनने और उद्यापन करने को कहते हैं। कथा के आखिर में, राज है पोपा बाई का, लेखा लेगी राई राई का। बोलो पोपा बाई की जय। कहा जाता है। वैसे पोपाबाई को पात्र मानकर कहानियां भी लिखी गई हैं।
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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 25 अप्रेल 18 के अंक में प्रकाशित    https://goo.gl/8yHVFs

राजनीति के रंग

बस यूं ही
राजनीति के रंग कई तरह के होते हैं। यह रंग हर किसी के जल्दी से समझ भी नहीं आते हैं। यहां कौन सगा है और कौन दगा देगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती। यहां संबंध भी स्थायी नहीं होते। तभी तो अवसरवादिता को राजनीति का प्रमुख अंग माना जाता है। राजस्थान की राजनीति इन दिनों जबरदस्त तरीके से गरमाई हुई है। वैसे तो किरोड़ीलाल मीणा की वापसी तथा उनको राज्यसभा की टिकट दिए जाने के साथ ही राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगने शुरू हो गए थे कि केन्द्र ने अब राज्य की राजनीति में दखल देना शुरू कर दिया है। उसी वक्त से राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं भी जोर पकडऩे लगी। नेतृत्व परिवर्तन तो नहीं हुआ लेकिन संगठन के मुखिया के अचानक त्यागपत्र ने सबको चौंका दिया। इससे बड़ी चौंकाने वाली बात थी जोधपुर सांसद व केन्द्रीय राज्यमंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत के प्रदेशाध्यक्ष बनने की चर्चा। सोशल मीडिया पर शेखावत का नाम बड़ी तेजी से वायरल हुआ। एक दो टीवी चैनल वालों ने भी उत्साह में उनका नाम बढा दिया। फिर क्या था, इसी के साथ शेखावत को बधाईदेने के संदेश भी वायरल होने लगे। बिना किसी अधिकारिक घोषणा या नियुक्ति के बधाई देने का यह अपने आप में अनूठा मामला था। मीडिया ने इस मामले को और अधिक चर्चा में ला दिया। मीडिया में नाम उछलना किसी रणनीति का हिस्सा था यह सिर्फ यह मीडिया की देन थी यह अलग विषय है लेकिन इसके बाद सोशल मीडिया पर दूसरी तरह की खबरें भी आने लगी। वैसे भी राजनीति में बड़े नेता कोई बात सीधे कहने से बचते रहते हैं। वे अपनी बात किसी समर्थक से कहलवाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। राजनीति में फिलहाल हाशिये पर चल रहे तथा कभी भाजपा के कद्दावर नेता रहे देवीसिंह भाटी के बयान को भी उसी नजरिये से देखा जा रहा है। भाटी ने अर्जुनराम मेघवाल व गजेन्द्रसिंह शेखावत दोनों के नाम पर सवाल उठाए हैं। मीडिया में भाटी के हवाले से बताया गया है कि शेखावत को प्रदेशाध्यक्ष बनाने से जाट मतदाता नाराज हो जाएंगे तथा मेघवाल को बनाने से सौ वोट भी नहीं मिलेंगे। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भाटी ने यह बयान खुद ने दिया है या दिलवाया गया है यह कहने की जरूरत नहीं है। पिछले दिनों बीकानेर में हवाई सेवा के उद्घाटन के बाद जिंदाबाद व मुर्दाबाद के नारे लगे, तब साबित हो गया था कि राजनीति में अब तक राज्य नेतृत्व के खिलाफ गाहे-बगाहे मोर्चा खोलने वाले भाटी पलट कैसे गए। जाहिर सी बात है हार के बाद राजनीतिक वनवास भोग रहे भाटी को इस बहाने संबंध सुधारने का बेहतर मौका मिलता भी कैसे। खैर, भाटी के बयान से इतना तय है कि गजेन्द्र सिंह शेखावत या अर्जुनराम मेघवाल की राह भी उतनी आसान नहीं है।
प्रदेशाध्यक्ष बदले जाने के शोर के बीच बहस इस बात पर भी जरूरी है कि सता व संगठन में संबंध कैसे हो। राज्य में सता व संगठन के संबंधों को यह कहकर प्रचारित किया गया है कि संगठन ठीक से काम नहीं कर रहा था, वह सत्ता के प्रभाव में था। अगर यही बात केन्द्र के संदर्भ में करें तो क्या वहां संगठन सत्ता से अछूता है? या सत्ता के प्रभाव में नहीं है? यह राजनीति है। इसके रंग निराले हैं। इसमें जिसका सिक्का चल निकलता है उसके सौ खून भी माफ हो जाते हैं और जिसके दिन उल्टे शुरू हो जाते हैं वो चाहे कैसा भी कर ले कोई यकीन नहीं करता। मौजूदा हालात देखते हुए इतना तय है कि विधानसभा चुनाव तक राज्य की राजनीति और अधिक गरमाएगी। इंतजार करते रहें।

इक बंजारा गाए-27


राज की बात
श्रीगंगानगर में दो-तीन अधिकारी ऐसे हैं, जो घूम फिर किसी न किसी तरीके से वापस श्रीगंगानगर आ जाते हैं। उनका श्रीगंगानगर के प्रति प्रेम किसी रहस्य से कम नहीं है। यह अधिकारी श्रीगंगानगर से बाहर जाना नहीं चाहते या कोई बाहर का श्रीगंगानगर आना नहीं चाहता। कहानी तो जरूर है वरना कोई इतने लंबे समय तक और भी एक ही जिले में तथा विभिन्न पदों पर कौन टिकता है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इन अधिकारियों का कभी श्रीगंगानगर से बाहर तबादला भी हुआ तो ये दो-तीन माह बाद किसी न किसी दूसरे विभाग में बदली करवाकर आ धमकते हैं। कुछ न कुछ तो है जरूर वरना घूम-फिर कर उसी जिले में नहंीं आते। यह अधिकारी लोकप्रिय कितने व कैसे हैं यह तो सब जानते हैं। हां, इससे यह साबित जरूर होता है कि इनकी ऊपर तक पहुंच जरूर है जिसके दम पर यह एक ही जगह पर टिके रहना चाहते हैं।
घर में नहीं दाने
घर में नहीं दाने अम्मी चली भुनाने, यह चर्चित कहावत इन दिनों यूआईटी पर सटीक बैठ रही है। पिछले सप्ताह पेश किए गए बजट को देखकर तो यही लगता है। बजट में कई तरह के हसीन सपने दिखाए गए हैं। इतने कि यूआईटी के पास इतना पैसा ही नहीं है। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि पिछले बजट में जिस मद के लिए जितना बजट तय किया गया था वह खर्च ही नहीं हुआ। है ना कमाल की बात। शहर में विकास कार्य करने, नई कॉलोनियों विकसित करने तथा सौन्दर्यीकरण को बढ़ावा देने वाले विभाग की दूरदर्शिता का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है। हां, यूआईटी अधिकारियों को खुद के भवन की चिंता कुछ जरूरत से ज्यादा ही है तभी तो एक साल में उसी दीवार के दूसरी बार प्लास्टर हो गया और लगे हाथ कलर भी। जबकि यूआईटी की ठीक नाक के नीचे एक पार्क की हालत इतनी खराब है कि उसको पार्क कहते हुए भी हंसी आती है।
स्वागत का दौर
कहते हैं कि सम्मान हमेशा पात्र का करना चाहिए और निस्वार्थ भाव से करना चाहिए। इन दिनों जिला मुख्यालय पर इन दिनों किया गया सम्मान भी अच्छी खासी चर्चा में है। चर्चा का विषय है सम्मान के बहाने लोगों में देश प्रेम की भावना जगाना और फिर इस भावना को भुनाना। इतना ही नहीं जिसका सम्मान किया गया उसके सरनेम के आगे कोष्ठक में उसकी जाति का उल्लेख करने के पीछे भी कहीं न कहीं सियासी पेच नजर आता है। लंबे समय से सक्रिय राजनीति में वापसी के लिए वैसे तो एक नेताजी लंबे समय से इस तरह के उपक्रम कर रहे हैं लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे इस तरह की गतिविधियां बढ़ गई हैं। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि जिसका सम्मान हुआ उसकी जिस अंदाज में अगुवानी की गई विदाई उससे ठीक उलटी थी। देखने की बात है कि यह सम्मान इन नेताजी के लिए कितना लाभदायक साबित होता है।
नई जगह तलाशी
श्रींगानगर की यातायात पुलिस के भी क्या कहने। जहां कार्रवाई की जरूरत है वहां तो इसके दर्शन कम ही होते हैं। अब जब से आजाद फाटक बंद हुआ है तब से पुलिस की कार्रवाई की एक स्थायी जगह ही बंद हो गई। विशेषकर टी प्वाइंट पर यातायात पुलिस के जवान नाका लगाते थे। फाटक की जगह दीवार बनने से अब टी प्वाइंट पर वाहनों का आवागमन कम हो गया है। आखिकर लंबी जददोजहद के बाद टी प्वाइंट जैसी जगह की तलाश ली गई है। यह जगह है शहर से बाहर साधुवाली स्थित सेना अस्पताल के पास है। ठीक वहीं जहां ओवरब्रिज का रास्ता जाकर मिलता है। यहां पेड़ों की ठंडी छांव के नीचे बाकायदा कार्रवाई को अंजाम दिया जाता है। अब खाकी को यह कौन समझाए उसका काम सिर्फ वसूली ही नहीं व्यवस्था बनाना भी है। शहर से बाहर कैसी व्यवस्था बन रही है, सब जान रहे हैं।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 19 अप्रेल 18 के अंक में प्रकाशित

Monday, April 16, 2018

इंसानी फितरत

बस यूं ही
किसी ने सच ही कहा है कि दुनिया में भले इंसानों के लिए जगह नहीं है। देखिए ना सांप अगर काटना छोड़ दे तो उसका क्या हश्र हो। लोग उसकी रस्सी न बना लें। इसी तरह सांड अगर मारना या मारने के लिए किसी को डराए नहीं तो लोग उसकी सवार न करने न लग जाएं। यह इंसानी फितरत है कि कमजोर को हमेशा दबाया जाता रहा है। सीधे पेड़ पर भी आरा सबसे पहले चलता है। कबीर जी भी कह कर गए कि दुनिया में जय जयकार हमेशा दुर्जन लोगों की होती है। यकीन नहीं है तो बताइए कि जो ग्रह नक्षत्र सही चल रहे होते हैं उनकी कभी आप पूजा करते हैं। नहीं करते ना। हां, जो ग्रह नक्षत्र उलटे चल रहे होते हैं, उनको सही करवाने के लिए कई तरह के जतन करने पड़ते हैं। पूजा हवन तक होते हैं। दान दक्षिणा तक दी जाती है। इसी तरह सीधा आदमी बगल से निकल जाए दुआ सलाम करने वाले बहुत कम होंगे लेकिन यही कोई प्रभावशाली आदमी हो तो फिर देखिए नजारा। किस तरह लोग उसके आगे पीछे दुम हिलाकर घूमते हैं। आजकल तो अपराधियों की मौत के बाद उनके समर्थन में हुजूम उमड़ता है। और कोई गरीब मर जाए तो जनाजे को कंधा देने वाले चार लोग तक नहीं आते। वाकई यह दुनिया गजब की है। इस दुनिया को समझना आसान नहीं है।
वैसे आदमी के बारे में काफी कुछ कहा भी गया है। यही कि आदमी आश्रय देने पर सिर पर चढ़ता है। उपदेश देने पर मुड़कर बैठता है। आदर करने पर खुशामद समझता है। उपकार करने पर अस्वीकार करता है। विश्वास करने पर हानि पहुंचता है। क्षमा करने पर दुर्बल समझता है और प्यार करने पर आघात करता है। इस तरह के चरित्र को उत्तम नहीं कहा जा सकता है। अगर इंसानियत व भाईचारे का दर्शन समझ में आ जाए तो सारे लफड़े ही खत्म मानो। होना यह चाहिए कि आश्रय देने पर उसका हमेशा एहसानमन्द होना चाहिए। कोई अच्छे कार्य के लिए कुछ उपदेश दे तो उसका पालन करना चाहिए। कोई सच्चे मन से आदर सत्कार करे तो उसकी प्रतिष्ठा बनाए रखनी चाहिए। कोई हृदय से उपकार करे तो उसे सच्चे मन से ग्रहण करना चाहिए। विश्वास करने पर उसे कभी ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए। अपनी गलती पर कोई हमें क्षमा करता है उसे दुर्बल नहीं समझना चाहिए बल्कि उसका एहसानमंद होना चाहिए। यदि कोई हमसे प्यार करे तो उसके प्यार एवं विश्वास को हमेशा बनाए रखना चाहिए।
मेरे को भी आज शुक्रवार को कुछ इसी तरह का अनुभव हुआ। रुका नहीं गया तो जज्बातों को शब्द देने बैठ गया। क्या लिखा, कैसा लिखा यह सब आपके सामने हैं। यह सबक जिंदगी भर याद रहेगा। वाकई सीधा होना व किसी का निस्वार्थ भाव से सहयोग करना मौजूदा परिदृश्य में जोखिम भरा काम है। धन्यवाद तो दूर की बात है लोग पागल का तमगा जरूर चस्पा कर जाते हैं। बहरहाल देखने की बात यह है कि सीधे लोगों के दिन फिरते हैं या फिर यह दुर्लभ प्रजाति लुप्त हो जाएगी।

इस तरह जलते हैं हाथ

बस यूं ही
होम करते हाथ जले, यह कहावत लगभग हम सभी ने सुनी होगी। और जब सुनी होगी तो इस कहावत का अर्थ भी मालूम होगा। चलो किसी को मालूम नहीं है तो बता देता हूं। इसका अर्थ होता है भला करते हुए नुकसान हो जाना। कल मेरे साथ कुछ एेसा ही हुआ। दोपहर बाद की बात है। फेसबुक पर स्नेहीजन रतनसिंह जी चांपावत का एक मैसेज आया। मैसेज का मजमून कुछ इस तरह से था कि आजकल एफबी पर हैकर्स सक्रिय हैं। वो आपकी आईडी को हैक करके आपके नाम से आपके एफबी दोस्तों को कुछ आपत्तिजनक व अश्लील वीडियो भेज सकते हैं। अगर किसी के पास मेरे नाम से इस तरह का वीडियो आता है, तो यह वीडियो मेरे द्वारा भेजा हुआ नहीं होगा। इसके आगे लिखा था कि कृपया इस मैसेज को आप अपने तमाम एफबी दोस्तों को भेजिए। चूंकि रतनसिंहजी चांपावत एक सम्मानित नाम हैं और व्याख्याता हैं, लिहाजा उनकी बात का अनुसरण करते हुए मैंने मैसेंजर से अधिकतर एफबी फ्रेंड्स को भेज दिया। हालांकि मैसेंजर में फोन बुक वालों के नाम भी शो होते हैं, लिहाजा बहुत से एेसे लोगों के पास भी यह मैसेज सेंड हो गया जो एफबी फ्रेंड नहीं हैं।
इस मैसेज के बाद कई जनों ने मैसेंजर के माध्यम से ही इस मैसेज को लेकर कई तरह की पूछ परख की। कइयों ने अपनी शंकाएं व जिज्ञासाएं शांत की है। दोपहर से लेकर शाम तक तो मैं जिज्ञासाएं शांत करने में ही जुटा रहा। खैर, शाम होते होते- मैंने कुछ मित्रों को मैसेंजर से मैसेज भेजे लेकिन बार-बार अस्थायी रूप से ब्लॉक का मैसेज आ रहा था। मैंने यही सोचा कि मित्र लोग शायद बुरा मान गए ,क्षइसीलिए ब्लॉक कर दिया गया। हालांकि इस तरह की समस्या सभी के साथ नहीं थी, इसलिए शक और भी गहरा रहा था ऐसा हो क्यों रहा है। आज सुबह भी एक एफबी मित्र को मैसेज किया लेकिन जल्द ही नोट सेंट का मैसेज आ गया। दो तीन बार किया लेकिन बात बनी नहीं। आखिर उनके कमेंट के नीचे वो बात पूछनी जो मैं मैसेंजर में पूछना चाह रहा था। खैर, समस्या यथावत थी। शाम को आफिस के साथियों से चर्चा की तो सलाह दी गई कि लोगआउट कर लो। यह भी किया। पासवर्ड भी बदला लेकिन समस्या बनी रही। इसी बीच एफबी फ्रेंड लिस्ट में पहले से शामिल एक जने की और रिक्वेस्ट आई। मैं सोच रहा था कि यह तो पहले से मित्रता सूची में हैं, लिहाजा उनको मैसेंजर पर मैसेज किया कि दूसरी आईडी कैसे बनाई, लेकिन यहां भी मैसेज नोट सेंट आ रहा था। आखिर यह मर्ज समझ नहीं आ रहा था कि कुछ कुछ मित्रों के साथ ही एेसा क्यों हो रहा है। काफी पड़ताल के बाद सार यह निकला कि कल एक साथ हजारों मैसेज भेजे यह उसी का नतीजा है। मतलब सलाह देना भारी पड़ गया। यानि कि होम करते हाथ जला लिए। खैर, एक दो दिन में यह हालात सामान्य होंगे पर एक नया अनुभव जरूर हो गया। कहा भी कहा गया है कि अक्ल बादाम खाने से नहीं भचीड़ खाने से आती है। और यह मामला भी तो किसी भचीड़ से कम नहीं है।

इक बंजारा गाए 26

 मेरा साप्ताहिक कॉलम......
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संत की पीड़ा
माना जाता है कि संत तो सबके भले की ही सोचते हैं। वे तो लोक कल्याण की बातें करते हैं। पिछले कुछ समय से उल्टा परिदृश्य सामने आ रहा है। संत के आगमन से लेकर ठहरने तक तमाम इंतजामात इतने लग्जरियस किए जाते हैं कि सुनकर व देखकर हैरानी होती है। संतों के स्वागत व उनके आयोजन पर हजारों-लाखों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। पिछले दिनों श्रीगंगानगर आए एक संत के स्वागत में भी खूब पलक पावड़े बिछाए गए लेकिन संत का मूड उखड़ा-उखड़ा सा नजर आया। यहां तक कि उनके कार्यक्रम का संचालन कर रहे हैं। शख्स को उन्होंने चुप करवा दिया। बताया गया है कि संत यहां तक बोल गए कि आज यहां दलाई लामा आते तो उनके स्वागत में कलक्टर, एसपी और मंत्री तक सब आते। संभवत: संत की पीड़ा कार्यक्रम में कम आई भीड़ और किसी प्रशासनिक अधिकारी के न पहुंचने को लेकर थी। इसके लिए दोषी किसको ठहराया जाए, लिहाजा गुस्सा बेचारे मंच संचालक पर उतरा। कार्यक्रम में मौजूद श्रोता संत का यह आचरण व अखड़ा मूड देखकर एक बार सोचने को मजबूर जरूर हुए कि आखिर यह माजरा क्या है। 
उलटफेर का किस्सा
उलटफेर कहां नहीं होता। फिल्मों से लेकर खेल मैदान तक। सियासत से लेकर आम आदमी के जीवन तक उलटफेर हो जाता है। कुछ ऐसा ही उलटफेर एक शख्स व उसकी संस्था के साथ हुआ बताते हैं। कला प्रेमी इस शख्स ने मुख्यमंत्री के जनसंवाद कार्यक्रम में प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह की याद में स्मारक बनाने की बात कही। बताते हैं कि यह मामला सीएम ने जिला प्रशासन को रेफर कर दिया। सीएम के निर्देशों की अनुपालना में प्रशासन ने बैठक भी बुलाई। उलटफेर का किस्सा यहीं से शुरू होता है। जनसंवाद में स्मारक की बात कहने वाले शख्स या उसकी संस्था के किसी सदस्य को इस बैठक में बुलाया तक नहीं गया। बैठक में भी कुछ खास लोगों को ही बुलाया गया। अब यह बात तो उस शख्स के भी समझ नहीं आ रही है कि प्रशासन ने यह उलटफेर क्यों व किसलिए किया। दबे स्वर में चर्चा इस बात की जरूर है कि प्रशासन की स्मारक बनाने में दिलचस्पी कम है। बताया जा रहा है कि प्रशासन की इच्छा तो यह है कि किसी तरह से इस मामले का पटाक्षेप हो जाए। स्मारक की जगह कोई स्टेच्यू ही लग जाए। देखते हैं आगे क्या होता है। 
स्वागत के बहाने
श्रीगंगानगर व बीकानेर दोनों पड़ोसी जिले हैं, लिहाजा दोनों में काफी समानताएं हैं। स्वागत करने की परम्परा भी इसी का ही हिस्सा है। सम्मान के मामले में श्रीगंगानगर दो कदम इसीलिए आगे हैं, क्योंकि यहां सम्मान की बाकायदा मार्केटि ंग भी होती है। खूब प्रचार-प्रसार होता है। इस बात का गली-गली डंका पीटा जाता है। वैसे स्वागत की इस परम्परा के पीछे मुख्य कारण खुद का प्रचार भी होता है। स्वागत के बहाने के कई लोग अपना नाम चमका लेते हैं। अखबारों की सुर्खियां बन जाते हैं। मतलब यह है जितना पसीना स्वागत वाले दिन नहीं बहाया जाता है, उससे कहीं ज्यादा दौड़ धूप तो पहले की जाती है ताकि नाम चर्चा में बना रहे। इस स्वागत में आर्थिक सहयोग करने वाले भी कम नहीं होते हैं। स्वागत के बहाने मोटा खर्चा करने तथा उससे पहले चंदा एकत्रित करने के भी कई उदाहरण सामने आते हैं। सहयोग करने वालों के नाम भी खूब प्रचारित किए जाते हैं। 
नेताजी का दर्द
नेताओं का मीडिया वालों से रिश्ता कुछ अलग व गहरा होता है। लेकिन रिश्ते में खटास उस वक्त पैदा होने लगती है कि जब मीडिया खरी-खरी पर उतर जाए। नेताओं की मनमाफिक कवरेज न हो। कुछ ऐसा ही हाल शहर के एक नेताजी का है। उनका दर्द है कि मीडिया हमेशा उनको लेकर नकारात्मक ही रहता है। कभी सकारात्मक खबर नहीं दिखाता। यह बात अलग है कि वह नकारात्मक खबरें नेताजी की न होकर उनसे संबंधित संस्था से होती है। पर नेताजी को कौन समझाए कि यह खबरें व्यवस्थागत खामियों पर केन्द्रित हैं जबकि वे उनको व्यक्तिगत ले रहे हैं। नेताजी के मन के किसी कोने में यह डर जरूर बैठा कि विभाग की नकारात्मक खबरें उनके सपने को पूरा करने में बाधक बन सकती हैं। बस यह सोच-सोच कर वे परेशान हैं। यह बात अलग है कि इन नेताजी ने जो-जो कथित काम करवाए हैं, उनका लाभ कम परेशानी ज्यादा हुई है। बात चाहे सीवरेज व पाइप लाइन बिछाने की हो, सड़कें टूटने की हो। नाले जाम होने की हो या फिर इंटरलॉकिंग के काम की हो। कुछ भी हो लेकिन नेताजी का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 12 अप्रेल 18 के अंक में प्रकाशित