Monday, August 17, 2020

मुआ कोरोना- 43

बस यूं.ही

भला कभी रेलों को रास्ते भटकते हुए देखा या सुना है? बात जरूर चौंकाने वाली है लेकिन कोरानाकाल में यह भी संभव हो गया है। लोग रेलों के रास्ते भटकने पर तरह-तरह के चटखारे ले रहे हैं। चर्चाओं का बाजार गर्म है। सियासी बाजार तो चुटीले व्यंग्य बाणों से आबाद है। वाकई यह कैसे संभव है कि रेल रास्ता भूल जाए? देश में पिछले तीन-चार दिन से रेलों के रास्ते भटकने की खबरें यकायक बढ़ी हैं। जैसा कि सुना है और बताया जा रहा है कि तीन दर्जन से अधिक रेलें अब तक रास्ता भटक चुकी हैं। इसीलिए सोचा आज क्यों न रेल पर ही लिखा जाए। कोरोना के चलते लंबे समय तक रेलों का संचालन बंद रहा है। एेसे में कोई एक दो रेल रास्ता भटकती तो शायद फिर भी बात गले उतर जाती है कि रेल चालक कोरोना काल से आया था, इस कारण उनकी मनोस्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन यहां तो लाइन लग गई है। सियासी फुटबाल बने प्रवासी श्रमिक अब रेल के माध्यम से भारत भ्रमण कर रहे हैं। उनको शुक्र मनाना चाहिए कि कोरोना के बहाने भारत भ्रमण का मौका मिल गया। वैसे रेल के सफर को आरामदायक व सुरक्षित माना गया है। रेल के संबंध में एक मारवाड़ी कहावत भी है, जिसको तुकबंदी करके मैंने और बढ़ा दिया है। गौर फरमाइएगा, 'चलना रास्ते का चाहे फेर ही हो। छांव मौके की भली, चाहे केर ही हो। बैठना भाइयों का चाहे बैर ही हो। सफर ट्रेन का चाहे देर ही हो और धीणा भैंस का चाहे सेर ही हो।' बाकी बातें तो आपके आसानी से समझ आ गई होंगी लेकिन धीणा भैंस वाली बात राजस्थानी साथियों के अलावा शायद ही कोई समझे। बता दूं कि गांवों में लोग पशुपालन करते हैं। वह चाहे गाय हो, भैंस हो बकरी हो। जब भैंस या गाय का प्रसव होता है तो वह दूध देती है। उसी दूध से दही-छाछ-घी आदि बना लिया जाता हैं। गांवों में एक दूसरे से हाल-चाल जानने के बाद धीणा किसका वाली बात अक्सर पूछी जाती थी। अब भी बड़े बुजुर्ग जरूर पूछ लेते हैं। जिसके भैंस ब्याही हुई होती है वह भैंस का धीणा है और अगर गाय है तो वह गाय का बता देता है। खैर, बात रेल की थी। सफर रेल का चाहे देर से हो। वाकई रेलवे ने यह कहावत चरितार्थ कर दी। वैसे भारतीय फिल्मकारों के लिए भी रेल शूटिंग के लिए अच्छी खासी लोकेशन रही है। न जाने कितनी ही फिल्मों में रेल या रेलवे स्टेशनों के दीदार हो जाते हैं। कई गीत तक रेल के अंदर या रेलों की छत पर फिल्माए गए हैं। 1985 के आसपास गांव में किसी मांगलिक अवसर पर वीसीआर, रंगीन टीवी व तीन चार फिल्में लाने का प्रचलन शुरू हुआ था। उस वक्त टीवी तो इक्का-दुक्का घरों में ही हुआ करते थे और वो श्वेत-श्याम थे। इस कारण रंगीन टीवी पर फिल्म देखने का तब बड़ा क्रेज था। मेरी उम्र तब कोई नौ-दस साल रही होगी लेकिन फिल्म देखने का चस्का ऐसा लगा कि 1994 तक एक हजार से ऊपर फिल्में देख चुका था। बाकायदा सबके नाम डायरी में दर्ज करता। आस पड़ोस या पांच किलोमीटर के दायरे में कहीं कोई मांगलिक अवसर होता और वीसीआर व टीवी आता तो मेरा वहां जाना तय था। कई बार तो फिल्म देखने के लिए याचक की भूमिका भी निभाई। खैर, उसी दौर में एक फिल्म आई थी। गंगा-जुमना सरस्वती। इसमें कलाकार थे अमिताभ बच्चन, मिथुन चक्रवती, मिनाक्षी शेषाद्रि और जया प्रदा। इस फिल्म का वो गीत आज भी याद है,जो रेल के डिब्बे में फिल्माया गया था। गीत के बोल थे ' साजन में मेरा उस पार है, मिलने को दिल बेकरार है।' इस तरह के न जाने कितने ही गीत और दृ़श्य हैं, जिसने फिल्मों के साथ रेलों की कीर्ति का बखान किया। रेल की मुलाकात, रेल में प्यार, रेल में गाना, रेल में लड़ाई, रेल में बिछडऩा आदि क्या-क्या नहीं फिल्माया गया। शोले फिल्म का चर्चित गीत भी रेल के सहारे फिल्माया गया था। बोल थे ' कोई हसीना जब रुठ जाती है तो और हसीन हो जाती है, स्टेशन से गाड़ी जब छूट जाती है तो एक दो तीन हो जाती है।' इस तरह लंबी फेहरस्ति है। हां तो बात कोरोना की थी। इतनी बड़ी गलती के बाद रेलों पर जुमले बनने तो स्वाभाविक थे। बानगी देखिए 'आत्मनिर्भर भारतीय रेलवे..स्वतंत्र भारत मे पहली बार 40 श्रमिक ट्रेन रास्ता भूली..गोरखपुर की ट्रेन झारसुगुड़ा पहुंची...चालीस घंटे का सफर 80 घंटे में पहुंचे लोग..बुलेट ट्रेन होती तो शायद जापान पहुंच जाती।' एक जने ने तो अपने एफबी वाल पर लिखा कि 'जब देश मे नियमित तौर पर हजारों की संख्या में ट्रेन चल रही थी तब ट्रेन कभी भी रास्ता न भूली न रास्ता भटकी जबकि पटरियों पर ट्रेनों की भीड़ होती थी। लेकिन लॉकडाउन में श्रमिक ट्रेन कह लें या गरीबों की ट्रेन कह लें, जब चली तब खूब रास्ता भटक रही है। दूरी तय करने में समय का तो पूछो मत। 70 से 80 घंटे तक लगा रही है। खाना तो पूछो मत, वाह क्या बात है। गरीबों को भारत भ्रमण कराया जा रहा है। उसी लॉकडाउन में अमीरों के लिए राजधानी ट्रेन चलाई गई। राजधानी कभी रास्ता भूली न भटकी। गरीबो के साथ ऐसा क्यों होता है।' यकीनन यह लिखने वाला जरूर कोई भुक्तभोगी होगा लेकिन उसका सवाल बड़ा मारक है। एक और भुक्त भोगी ने तो बड़े व्यंग्यात्मक लहजे में एफबी पर जोरदार कटाक्ष किया है, देखिए, 'श्रमिक ट्रेन रास्ता नहीं भूली बल्कि रेलवे ने हां जी मतलब ड्राइवर ने मजदूरों की भलाई सोची है। कहां इन बेचारे लोगों को भारत दर्शन का मौका मिलता होगा। रोटी की तलाश में बेचारे बस काम से घर तक, घर से काम तक यही करते होंगे तो उन्होंने सोचा लगे हाथ क्यों ना भारत दर्शन करा दिए जाएं। अब अगर 8-10 लोग भूख प्यास से मर भी जाएं तो भाई इसमें उनकी क्या गलती। वो तो खाना-पानी सब दे ही रहे हैं ना। और मर जाएं तो मर जाएं, इतने लोगो का मनोरंजन भी तो करवाया है ना घुमा -घुमा कर। तो कोई नहीं बोलेगा, बस कुछ मर गए तो सब आ जाएंगे बदनाम करने।' बहरहाल आप दुष्यंत कुमार की चर्चित गजल के इस अंतरे का आंनद लीजिए या पढ़ कर सोचिए, संयोग से इसमें भी रेल का जिक्र है।
'मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूं,
वो गज़़ल आपको सुनाता हूं,
तू किसी रेल-सी गुजऱती है,
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं।'
क्रमश

मुआ कोरोना- 42

बस यूं.ही

पोस्ट लिखने के तत्काल बाद प्रतिक्रिया आने का क्रम अनवरत जारी है। पुलिस एवं चिकित्सकों पर लिखा तो प्रतिक्रिया आई कि यह भी लिखना चाहिए था। जैसे एक ने बताया कि चिकित्सकों में अधिकतर सरकारी ही थे, निजी तो लगभग फ्री ही थे। किसी ने कहा कि अस्पतालों में भीड़ कम होने की वजह कोरोना का डर था, इसलिए लोगों ने अपनी छोटी-मोटी बीमारी को डर के मारे दबा लिया। एक परिचित ने तो कोट को लेकर ही टोक दिया। कहने लगे, कोट तीन नहीं चार होते हैं। आपने शायद मर्यादा का ख्याल रखते हुए इस चौथे कोट का उल्लेख नहीं किया। मैं उनकी प्रतिक्रिया पर बस हंस भर दिया। इसी तरह पुलिस के लिए कहा कि वो खुद दोपहिया पर बिना हेलमेट के घूमते दिखाई दिए लेकिन उनका चालान कौन काटे। मारवाड़ी में एक कहावत भी है ' बाबो सै नै मारै, बाबै न कुण मारै।' इसका तात्पर्य यही है कि जो समर्थ होता है वो सभी पर कार्रवाई का डंडा चला सकता है लेकिन उस पर कौन चलाए। खैर, दुनिया विविधता से भरी पड़ी है। यहां भिन्न-भिन्न मानसिकता वाले लोग हैं। तुलसीदास जी ने तो बहुत पहले कह दिया था कि,
'तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग,
सबसे हंस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग।'
अब हंस मिलकर बोलने वाली बात पर कितने विचार करते हैं, यह अलग बात है लेकिन किसी वर्ग विशेष के प्रति सोच सबकी समान नहीं होती है। पुलिस व चिकित्सक उन सबकी नजरों में निसंदेह हीरो व बहुत नेक आदमी हैं, जिनका इनसे परोक्ष या प्रत्यक्ष अनुभव नहीं रहा। इनको गलत या बुरा भी वो ही ठहराएगा, जिसका कोई एेसा अनुभव रहा होगा। दरअसल, मूल विवाद की जड़ यह धारणा ही बनती है। कोई एक आदमी गलत है तो उससे सारा विभाग गलत नहीं हो जाता और कोई एक आदमी सही है तो उससे सारा विभाग ईमानदार नहीं हो जाता। विडम्बना यही है कि व्यक्ति विशेष के प्रति रखा जाने वाला पूर्वाग्रह, उसके समूचे विभाग के लिए एक तरह का अभिशाप बन जाता है और पूरे विभाग को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। मैं खुद मानता हूं कि हाथ की पांच अंगुलियों की तरह सभी आदमी बराबर नहीं हो सकते। भगवान ने सबको शक्ल, रंग व सोच अलग तरह की दी है। सोशल मीडिया पर तो एक की गलती पर पूरे विभाग को गलत ठहराने की परंपरा सी बन गई है। यही गलती कोई राजनीति दल का नुमाइंदा करता है तो पार्टी की तरफ से बयान आता है, यह इनका व्यक्तिगत मामला है। पार्टी का इससे कोई लेना देना नहीं। अफसोस की बात यह है कि विभागों की तरफ से एेसे कोई स्पष्टीकरण नहीं आते। खैर, आज मैं भी दार्शनिक अंदाज में लिखने लगा। बात कोरोना की थी विषयांतर होकर कहां तक आ गया। पुलिस व चिकित्सक की बात के बाद अर्द्ध सैनिक बल में तैनात एक परिचित से हुए दो तीन संवादों का जिक्र करना उचित समझूंगा। वो परिचित अक्सर कोरोना को लेकर चर्चा करते हैं। यह रोग क्या है? इसकी प्रकृति कैसी है? यह क्यों फैल रहा है? फैल गया है या फैलाया गया है? इतनी मौत ही नहीं तो महामारी के रूप में क्यों प्रचारित किया गया है? कब तक एेसा रहेगा? एक साथ दनादन कई सवाल। मैं यह गलत या परेशान करने वाली बात नहीं मानता। बचपन से जानता हूं, उनका स्वभाव जिज्ञासु प्रवृति का है। जब तक किसी सवाल का समाधान न खोज लें, तब तक पीछा नहीं छोडऩा। मूल सवाल का जवाब मिल जाए तो फिर पूरक सवाल की झड़ी शुरू हो जाती है। जहां तक संभव हुआ है मैंने उनके हर सवाल का तसल्लीबख्श जवाब देने का प्रयास किया है फिर भी उनके कई सवाल कायम ही रह जाते हैं। मैं उनके सवालों से प्रभावित इसीलिए भी हूं क्योंकि उनके पास सवाल के साथ तर्क भी हैं। यह उनके नियमित अध्ययन का परिणाम है। कल परसों फोन आया, पूछने लगे भाईसाहब आपके पास अकेले कोरोना से मरने वाले तथा कोरोना के साथ अन्य बीमारी से मरने वालों का आंकड़ा है क्या? कोरोना संक्रमितों की रफ्तार विदेशों के मुकाबले भारत में बहुत धीमी है तो मीडिया में इतना कवरेज क्यों? वाकई इन सवालों ने तो मुझे भी चक्करघिनी किया। सोचने भी लगा बाकी बीमारियों व हादसों के मुकाबले हताहतों की संख्या एवं तुलनात्मक रूप से रफ्तार कम है तो फिर हर तरफ इतना हो- हल्ला क्यों? वाकई इस हो- हल्ले ने लोगों को डरा दिया है। भयभीत कर दिया है। सोते-जागते, उठते-बैठते, नहाते-खाते बस कोरोना ही कोरोना है। इस कोरोना के अलावा और कोई चर्चा ही नहीं है। आश्चर्य तो जब होता है जब सुनने को मिलता है कोरोना बम फूटा, कोरोना विस्फोट। देश में कोरोना ने दो- ढाई माह पहले दस्तक दे दी थी लेकिन यह विस्फोट, यह धमाके अब तक जारी हैं। पता नहीं यह बम और विस्फोट जैसे शब्द कैसे ईजाद हो गए। यह कोरोना बम व कोरोना विस्फोट भी बारिश के झमाझम शब्द जैसे ही हैं। बारिश को लेकर मूसलाधार, रिमझिम, बूंदाबांदी व फुहारें गिरने जैसे शब्द प्रयोग किए जाते रहे हैं लेकिन जब से यह झमाझम आया, इसको लिखने की होड़ सी लग गई। बारिश कैसी भी हो झमाझम शब्द की ही संज्ञा दी जाने लगी। ठीक वैसे ही कोरोना विस्फोट का उपयोग होने लगा है। कोरोना संक्रमित पांच हो तो भी विस्फोट और बीस हो तो भी विस्फोट। इसी तरह तर्ज पर कोरोना बम हो गया। पता नहीं कब फूट जाए। इसकी न कोई संख्या निर्धारित है न कोई समय सीमा। जाहिर सी बात है कि कोरोना के नाम से पहले से भयभीत लोग बम और विस्फोट जैसे युद्धक शब्द सुनकर और ज्यादा डर रहे हैं।
क्रमश :

हमें मिले पूरा पानी

टिप्पणी

भला यह कहां का न्याय है कि हम हमारे हिस्से का पानी सहेजने के बजाय उसे व्यर्थ बहा दें या उसको पड़ोसी मुल्क ही सरहद में चुपचाप ही चले जाने दें। खास बात तो यह है कि हर बार चुनाव में यह पानी मुद्दा बनता है। इस पानी को रोकने के बड़े-बड़े दावे होते हैं लेकिन चुनाव होने के बाद दावों को दम निकल जाता है और पानी अनवरत बहता रहता है। या यूं कहें कि बहाया जाता है। दरअसल, हमारे बांधों की पानी संग्रह करने की निर्धारित क्षमता है। इससे ज्यादा पानी उनमें संग्रह नहीं हो सकता। इस बार भाखड़ा बांध के जल ग्रहण क्षेत्रों में अच्छी बर्फबारी हुई है। जून के अंत में बर्फ पिघलने के साथ ही मानसून सक्रिय होने पर बांध में चारों तरफ से पानी आने पर इसका भंडारण काफी मुश्किल हो जाएगा। क्षमता से ज्यादा पानी कहीं बांधों की सेहत न बिगाड़ दे, इस डर से पानी का स्तर जितना निर्धारित है, उतना ही रखा जा रहा है। यही हाल नहरों का है। विशेषकर राजस्थान आने वाली नहरों में क्षमता के अनुसार पानी शायद ही कभी चलाया जाता हो, क्योंकि नहरें इतनी मजबूत और सक्षम नहीं है कि वो क्षमता जितने पानी के प्रवाह को झेल सकें। वैसे पानी में राजस्थान के शेयर की बात करें तो मई में प्रतिदिन करीब 14 हजार क्यूसेक पानी मिल रहा है। इस तरह मई का प्रदेश का कुल शेयर पांच लाख क्यूसेक बनता है। इस तरह अभी तक दो लाख से अधिक क्यूसेक पानी पाकिस्तान में छोडा जा चुका है। यानी राजस्थान के कुल शेयर के अनुपात में करीब चालीस प्रतिशत पानी बेवजह पाकिस्तान भेजा गया है। भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (बीबीएमबी) की सोमवार को हुई बैठक में पाक जा रहे पानी को कम करने तथा पानी की आवक अधिक होने पर इसका प्रबंधन करने पर चर्चा की गई। देखा जाए तो यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। सहेजे गए पानी का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा जब बांधों की क्षमता बढ़ेगी तथा राजस्थान व हरियाणा में नहरों की मरम्मत होगी, तभी छीजत रुकेगी तथा नहरों में क्षमता के अनुसार पानी प्रवाहित होना संभव होगा। वैसे राजस्थान व केन्द्र सरकार के साथ केन्द्रीय जल आयोग की ओर से इस बार नहरों की मरम्मत के लिए 32 सौ करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत किया गया था। काम के लिए राजस्थान में 70 दिन की बंदी ली जानी थी लेकिन कोरोना के चलते यह सारा काम रुक गया।

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 राजस्थान पत्रिका के राजस्थान में प्रकाशित लगभग सभी अंकों में 26 मई 20 को प्रकाशित।

मुआ कोरोना- 41

बस यूं.ही

'आप पुलिस और डाक्टरों पर क्यों नहीं लिखते। कोरोनाकाल में यह दोनों वर्ग रातोरात हीरो बन गए। लोग पहले इनको गालियां देते हैं अब इनके लिए दुआ कर रहे हैं।' यह किसी परिचित का सुझाव था। उनका कहना सही भी था कि अब तक शिक्षक, फोटोग्राफर, मास्क, शराब, मजदूर, मध्यम वर्ग आदि पर ही आपने कलम चलाई है, इसलिए कुछ इन पर भी लिखा जाना चाहिए। बात तो सही है, जनता कब नजरों में चढ़ा दे और कब उतार दे, यह कलाकारी सब जनता ही जानती है। सन 1974 में राजेश खन्ना की फिल्म आई थी, नाम था रोटी। इसी फिल्म का एक गीत है 'ये जो पब्लिक है सब जानती है।' इसी गीत का एक अंतरा है, 'ये चाहे तो सर पे बिठा ले चाहे फ़ेंक दे नीचे, ये चाहे तो सर पे बिठा ले चाहे फ़ेंक दे नीचे, , पहले ये पीछे भागे फिर भागो इसके पीछे। अरे दिल टूटे तो अरे ये रूठे तो दिल टूटे तो अरे ये रूठे तो तौबा कहां फिर मानती है... ये जो पब्लिक है।' इसी गीत का अगला अंतरा भी देखें, 'क्या नेता क्या अभिनेता दे जनता को जो धोखा,क्या नेता क्या अभिनेता दे जनता को जो धोखा, पल में शोहरत उड़ जाए ज्यों एक पवन का झोंका, अरे ज़ोर न करना अरे शोर न करने, ज़ोर न करना अरे शोर न करना, ज़ोर न करना शोर न करने, अपने शहर में शान्ति है, ये जो पब्लिक है सब जानती है।, वाकई जनता की अदालत जो होती है ना, उसका कोई जवाब नहीं। जनता की अदालत तो सरकारें तक बनवा और बिगड़वा देती हैं यह तो चिकित्सकों एवं डाक्टरों की छवि की बात है। थोड़ा गहराई में सोचा जाए तो सवाल भी खड़े होते हैं कि छवि बिगड़ती क्यों हैं ? और बिगाड़ता कौन है? स्वाभाविक सी बात है काम करने का तरीका और व्यवहार ही छवि बनाते हैं और बिगाड़ते हैं। पुलिस और चिकित्सकों की छवि सुधरी है तो इसका श्रेय कोरोना को भी दिया जाना चाहिये। यह मुआ नहीं आता तो सब कुछ पुराने ढर्रे पर ही चलता ना। देखिए ना छवि सुधारने का कितना बेहतर मौका उपलब्ध कराया है इस कमबख्त कोरोना ने। कई चिकित्सकों के तो पीपीई किट पहने हुए कोरोना संक्रमितों के साथ थिरकते हुए के वीडियो तक वायरल हुए हैं, तो मदद करते पुलिसमर्मियों के भी। यह बात दीगर है कि कई जगह व्यवस्था बनाने या कानून की पालना करवाने के लिए उसको डंडे भी चलाने पड़े। हां एक नियम को लेकर जरूर असमंजस रहा। सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर नियम बनाया गया कि दुपहिया पर एक तथा चौपाहिया वाहन में दो आदमी ही यात्रा कर सकते हैं। माना एहतियातन यह जरूरी था, लेकिन आपने अपने आसपास पुलिस की गश्ती जीप जरूर देखी होगी। कभी देखा कि उसके अंदर कितने लोग बैठे थे। इससे तो यह जाहिर हुआ कि कानून के डंडे से कोरोना भी डरता है। वह आम आदमी को तो प्रभावित करेगा लेकिन पुलिस वालों के पास नहीं आएगा। खैर, एेसी परिस्थिति में क्या कहा जाए। एेसे हालात पर तो वो गाना ही याद आता है, 'हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है ।' वैसे भी पुलिस से पंगा कौन ले भला। बचपन में एक ट्रक के पीछे लिखा स्लोगन पढ़ा था, आज भी याद है। लिखा था जिंदगी में हमेशा तीन कोट से बचना चाहिए। खाकी कोट, काला कोट एवं सफेद कोट। खाकी मतलब पुलिस। काला मतलब वकील तथा सफेद मतलब डाक्टर। यहां काला कोट तो चर्चा में नहीं है। कोरोना के चलते उनका काम वैसे ही मंदा है। ज्यादा काम तो पुलिस व चिकित्सकों का ही बढ़ा। जिस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग के नियम और पुलिस द्वारा उसकी पालना पर असमंजस में था, उसी तरह कोरोनाकाल में अन्य बीमारियों का हश्र देखकर भी हतप्रभ हूं। शायद कोरोना के डर से सारी बीमारियां दुम दबा कर बैठ गई। यहां तक कि दिन भर मरीजों से गुलजार रहने वाली ओपीडी तक भी कहीं बदं कर दी गई तो कहीं सूने हो गई। मौसमी बीमारियों के मरीज यकायक कम हो गए। ठीक वैसे ही जैसे जंगल में कोई हिंसक जानवर आता है तो बाकी सभी जीव-जंतु डर से सहम कर दुबक जाते हैं या गायब हो जाते हैं। यह कोरोना भी तो एक तरह का हिसंक जानवर ही हुआ न। सारी बीमारियों को पलक झपकते ही गायब कर दिया। सोचिए यह बीमारियां गायब नहीं होती तो चिकित्सक को कोरोना पर ध्यान केन्द्रित करने में कितना जोर आता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि कोरोना काल में सिजेरियन बच्चे पैदा होने कम हो गए। सामान्य प्रसव के मामले यकायक बढे हैं। यह राज समझ नहीं आ रहा है कि कोरोना ने एेसा क्या जादू किया। वाकई उसने गर्भवती महिलाओं एवं उनके होने वाले बच्चों को सभी प्रकार से खतरों से एक तरह से मुक्त कर दिया। तभी तो उनका सामान्य प्रसव की तरफ रुझान बढ़ा। सिजेरियन बच्चे पैदा क्यों होते हैं? इसके पीछे क्या मनोविज्ञान है, यह तो मैं भी नहीं जानता हूं, क्योंकि दोनों सुपुत्र सिजेरियन ही हैं। अब इस पोस्ट के माध्यम से मुझे पुलिस या चिकित्सक विरोधी समझने की भूल कभी मत करना। बस दो चार सवाल जेहन में थे, वो जरूर साझा किए हैं, बाकी इनके प्रति जो सम्मान पहले था, वैसा ही अब है। फिर भी किसी को गुस्ताखी नजर आए तो दोनों कान पकडता हूं। इस पोस्ट में इतना ही। मिलते हैं जल्द ही नई पोस्ट एवं नए विषय के साथ।
क्रमश:

मुआ कोरोना-40

बस यूं.ही

कोरोना पर बारहवीं कड़ी में मैंने बीकानेर के शिक्षक मित्र के आग्रह पर उनकी बात का समर्थन करते हुए लिखा था कि कोरोना काल में एक शिक्षक की भूमिका भी महत्वपूर्ण है लेकिन वो नींव का पत्थर बना हुआ है। उसके काम का, उसकी मजबूरी का, उसकी परेशानी का कहीं जिक्र नहीं है। पोस्ट लिखने के बाद मित्र का खुश होना स्वाभाविक था। हो सकता है, उनकी जमात से जुड़े शिक्षकों को भी खुशी हुई हो, क्योंकि वह दर्द इकलौता उनका न होकर कोरोना ड्यूटी में लगे तमाम शिक्षकों का था। वैसे आपको बता दूं कि जीवन में मैंने हमेशा दो वर्गों को सर्वाधिक सम्मान दिया है। इसके पीछे कई तरह के कारण व अनुभव शामिल हैं। पहला वर्ग शिक्षक तो दूसरा सैनिक। हालांकि इन दोनों वर्गों को लेकर कई तरह के खट्टे मीठे अनुभव भी रहे हैं, फिर भी मान-सम्मान व श्रद्धा में कभी कोई कमी नहीं आई। अभी ताजा मामला भी एक मित्र अध्यापक का ही है। लंबे समय से उनको अवकाश नहीं मिल रहा था। न अध्यापन करवा पा रहे थे न कोई ड्यूटी। बस घर से दूर सरकारी फरमान के इंतजार में फंसे बैठे थे। न सरकार का कोई फरमान आया न लॉकडाउन में घर जाने का कोई साधन मिला। हालांकि बात सप्ताह भर पुरानी हो चुकी है, इसी बीच वो घर चले गए। अवकाश मिला या नहीं यह जानकारी मुझे नहीं दी। दरअसल बात यह थी कि उन्होंने किसी अध्यापक की लिखी एक कविता मुझे भेजी। उसमें भी अध्यापकों की पीड़ा थी और यह पीड़ा थी सरकार से। चूंकि पीड़ा को कविता रूप में देखने के बाद मैं उसको साझा करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। हो सकता है आपको भी पसंद आए। इसका शीर्षक है ड्यूटी पर लगे शिक्षक की सरकार से पुकार। पेश है: -
'मुख्यालय पर रुके शिक्षक गुनहगार हो गए,
जो छोड़ गए वो सरकार के पनाहगार हो गए।
बिना अनुमति के गए वो कर रहे हैं मजा,
नियम पालना में रहे वो पा रहे हैं सजा।
प्रवासी मजदूर लाने का तो कर दिया इंतजाम,
शिक्षकों में ले जाने में रेड जोन का कैसे आया नाम।
संख्या बल देखकर वोट बैंक याद आ गया,
कार्रवाई न करने का आदेश तुरंत ही आ गया।
दो चार हजार होते तो नोटिस आ जाते,
कई निलंबित होते, कइयों के वेतन रुक जाते।
रोटेशन आदेश की नहीं हो रही है पालना,
मनमर्जी चल रही है लगा रहे हैं छालना।
ऑफिस के बाबू से जिनकी है सांठगांठ
मुख्यालय पर उपस्थिति, पर घर पे कर रहे ठाठ
हम कर्तव्य विमुख नहीं पर दोहरा बर्ताव क्यों,
जो रसूखदार हैं, उनके प्रति ये वफादारी क्यों।
ड्यूटी आने पर भी उनके तुरंत नाम कट जाते हैं,
कर चुके दिनों तक ड्यूटी वही नाम आ जाते हैं।
कर्तव्यपरायणता व आदर्शों का पढाते थे पाठ,
वो आने की पहल क्यों नहीं करते, जो रहे हैं बाट।
कोसों दूर गया मजदूर जब घर वापस आ सकता है,
तो फिर शिक्षक के आने में किस बात की विवशता है।
रोटेशन आदेश की अधिकारी करें सख्ती से पालना,
रसूखदार हो या शिक्षक नेता, पर उसे भी न टालना।
आपात आपदा व महामारी में भी भाई-भतीजावाद क्यों,
ईमानदारी से लगाओ ड्यूटी, व्यर्थ का विवाद क्यों।
कर ली बहुत दिनों तक ड्यूटी, हमें भी छुट्टी चाहिए,
मात-पिता, बीवी-बच्चों से मिलने का हक हमें भी चाहिए।'
अब जरा सा उस अध्यापक मित्र से हुआ वार्तालाप भी जान लीजिए, जिस दिन यह कविता भेजी थी, उसी दिन उन्होंने यह भी कहा था कि, जो टीचर्स मुख्यालय छोड़कर चले गए थे, उनका सरकार ने साथ दिया और जो ईमानदारी से मुख्यालय पर थे, उनके साथ अन्याय हुआ। जो अभी यहां हैं वो तो पहले ड्यूटी करो, अगर नंबर आता है तो, और नहीं आता है तो भी यहीं रहो। बाकी जो घर आराम कर रहे हैं, उनकी ड्यूटी बाद में लगाओ। यह सब उन्होंने मुझे बिना पूछे ही बताया था। हां अपने घर जाने के बाद तो उन्होंने कुछ भी नहीं बताया। वैसे भी घर जाने के बाद पीड़ा किसे याद रहती है। कहा जाता है एकांकी आदमी नकारात्मक हो जाता है, जहान भर की पीड़ाएं उसके इर्द-गिर्द रहती हैं, उसको घेर लेती हैं लेकिन जब वह अपनों के बीच जाता है तो सारी पीड़ाएं दूर हो जाती हैं। तमाम समस्याओं, शंकाओं को समाधान स्वत: हो जाता है। अध्यापक मित्र के साथ भी शायद एेसा ही हुआ। मुसीबत दूर न होती तो शायद फिर याद करते। खैर, इस संकट के मौसम में वो अपनों के बीच हैं मुझे तो खुशी इसी बात की है। हां इस वाकये पर एक गाना जरूर याद आ रहा है, 'किससे शिकायत करूं शरारत मेरे साथ हुई...'
क्रमश:

मुआ कोरोना-39

बस यूं.ही

वैसे सियासत काजल की कोठरी की तरह होती है। कोई लाख जतन करे कालिख लग ही जाती है। मां की एक कहावत याद आ रही है। बचपन में घर से बाहर चौक पर लड़कों के बीच बैठ जाता था तो मां पीछे-पीछे जाती है और खड़ा करके घर ले आती। मैं कहता कि मैं तो चुपचाप बैठा था। न किसी से लड़ाई कर रहा थ न किसी को गलत बोल रहा था। तब मां कहती बेटा भले ही तुम कुछ ना कहो या करो लेकिन काली हांडी के पास बैठने से कालस लगती है। तो राजनीति वो काली हांडी है, जिसके पास बैठने वाले को कालिख लगना तय है। सियासी दलों में लड़ाई विचारधारा की मानी जाती है लेकिन अब यह विचारधारा की मर्यादा को लांघ कर तू-तड़ाक एवं व्यक्तिगत गाली-गलौज तक आ पहुंची है। बात कोरोनाकाल में हो रही सियासत की हो रही थी। आप गंभीरता से कोरोनाकाल में लिए प्रत्येक सरकारी फैसलों का अध्ययन करेंगे तो आपको कहीं न कहीं सियासी तड़का लगा दिखाई दे ही जाएगा। तबलीगी जमात को लेकर भी खूब सियासत हुई। संक्रमण के आंकड़ों में तबलीगी जमात के कॉलम को हटाने के पीछे भी लोग सियासी दिमाग ही मान रहे हैं। इतना ही नहीं अब तबलीगी जमात जैसा ही प्रयोग प्रवासी श्रमिकों के लिए किए जाने की वकालत होने लगी है। खैर, और कहीं न जाएं,  आपको कोरोना संक्रमितों की संख्या के आधार पर बनाए गए लाल, पीले एवं हरे जोन तो याद ही होंगे। सियासत करने वालों ने तो इन रंगों को भी नहीं बख्शा। इन रंगों को भी धर्म से जोड़ दिया गया। जिस तरह से गाय व बकरे को संप्रदाय से जोड़ा गया, ठीक उसी तर्ज पर जोन के रंगों को जोड़ा गया।

सियासत का चेहरा बड़ा अजीब, रहस्यमयी एवं तिलिस्मी होता है। मां की एक बात फिर याद आ रही है। वो कहती थी ' त्रिया चरित्र कोई नहीं जाणै, खसम मार सती हो जाणै।' इस हरियाणवी कहावत का अर्थ है कि स्त्री को समझना आसान नहीं होता। वह पति की हत्या करके सती भी हो सकती है। यकीनन लोकोक्तियां एवं कहावतें किसी न किसी अनुभव या घटना के आधार पर बनती रही हैं। अतीत में एेसा कोई घटनाक्रम या अनुभव रहा होगा, जिस पर यह कहावत बनी।  यह कहावत भले ही मौजूदा समय में महिलाओं पर सटीक न बैठे लेकिन सियासत पर फिट जरूर बैठती है। वह शेर भी है ना, अर्ज किया है,

'सियासत इस कदर अवाम पे अहसान करती है,

आंखें छीन लेती है फिर चश्मे दान करती है।'

सच में सियासत के दोहरे चरित्र को समझना देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकाता को देखना या पढने जैसा ही है। बचपन में इस धारावाहिक को रोज देखता पर आगे से आगे कड़ी में कड़ी इस कदर उलझती हुई मिलती है कि आगे का देखता तो पिछला भूल जाता। यह सियासत भी तो वैसे ही है। जब कोई मसला आता है, जनता मुखर होती है तो उसके समकक्ष कोई दूसरा मसला और खड़ा कर दिया जाता है। जनता फिर नए मुद्दे में इस कदर उलझती है कि पुराने वाला मुददा पता नहीं कहां गायब हो जाता है। यह तो मुआ कोरोना है। अभी देश-दुनिया में हिट है, इस पर तो राजनीति होनी ही थी, वरना सियासत तो किसी को नहीं बख्शती। कभी फिल्मों के नाम पर राजनीति तो कभी पानी के नाम पर। कभी देशभक्ति के नाम पर तो कभी विकास के नाम पर। और तो और शवों पर भी सियासत करके सत्ता के सौपान तय कर लिए जाते हैं। भावना में बही जनता सियासत का यह चरित्र समझ कहां पाती है। सियासी मोहरे एेसे मौकों की अक्सर तलाश में रहते हैं। नईम जज्बी फरमाते हैं,

'कच्चे मकान जिनके जले थे फसाद में

अफसोस उनका नाम ही बलवाइयों में था।'   

एेसा ही तो हो रहा है आजकल। इसी शेर से मिलता-जुलता एक शेर और है, सुदर्शन फाकिर फरमाते हैं, गौर फरमाइए:-

'मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ  है,

क्या मेरे हक में फैसला देगा।'

खैर, धर्म और अपराध तो सियासत के खास हथियार हैं। यह एेसे ब्रह्मशस्त्र हैं, जो मुफीद मौका देखकर इस्तेमाल किए जाते हैं। वैसे भी सियासत जो दिखाई देती है, वैसी है नहीं। पर्दे के पीछे इसका दूसरा चेहरा है। पिछली एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया स्वरूप भाईसाहब ने कहा, आजकल विपक्ष भी विपक्ष न होकर एेसे पेश आता है जैसे दुश्मन हो। वाकई  यह बात सच है। हालात कई बार तो इतने गंभीर हो उठते हैं कि अगर पक्ष-विपक्ष का आमना-सामना हो जाए तो जूतमपैजार जैसे हालात बनते देर नहीं लगती।  प्रवासी मजदूरों के पलायन पर तो सियासत की भूमिका और दखल तो सभी ने देखा। यह अलग बात है कि समर्थक भी अपने सियासी दलों की खेमाबंदी में शामिल होकर, सच- झूठ का आकलन किए बिना बस उनकी हां में हां मिलाते रहते हैं। वाकई राजनीति के रंग समझना बड़ी टेढ़ी खीर है। फिर भी इसका आभामंडल एेसा है कि हर दूसरा-तीसरा आदमी सियासत का मुरीद निकलेगा। किसी चौपाल या नुक्कड़ पर आप किसी समस्या की बजाय किसी दल की चर्चा छेड़ कर देखिए। एक से बढ़कर एक विशेषज्ञों की जमात जमा हो जाएगा। कोई बड़ी बात नहीं अपने तर्कों, कुतर्कों एवं दलीलों से वो आपको निरुत्तर भी कर दे। सोशल मीडिया भी आधुनिक जमाने की एक तरह की चौपाल या नुक्कड़ ही तो है। खुद को चैक करना है तो किसी भी दल के समर्थन या विरोध में कोई पोस्ट लिखकर आप परिणाम जान सकते हैं। कोई बड़ी बात नहीं, आपका एेसे सियासी विशेषज्ञों से वास्ता पड़ भी चुका होगा। खैर, 'ईश्वर-अल्लाह तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान, सारा जग तेरी संतान। भजन  का स्मरण करते हुए सियासत के प्रति इतना तल्ख लिखने के लिए खेद जताते हुए  इस पोस्ट को यहीं विराम देता हूं। अगली पोस्ट सियासत से अलग किसी दूसरे विषय पर।

क्रमश:

मुआ कोरोना- 37

बस यूं.ही

यह भी संयोग है कि कोरोना पर निरंतर लेखन के चलते अभी कई शुभचिंतक भी लिखने के विषय बताने लगे हैं। अभी मास्क व फोटोग्राफर पर लिख कर हटा ही था कि बतौर प्रतिक्रिया मैसेज आया कि मास्क के चलते मेकअप के सामान की बिक्री घट गई है, विशेषकर लिपिस्टिक की। बात में दम तो है। इसी तरह फोटोग्राफर की बात से याद आया कि हर फोटो स्टूडियो के बाहर एक स्लोगन आप सब ने जरूर पढ़ा होगा, 'फोटो ही जीवन की मधुर यादगार है।' बात सही भी है।आखिर फोटो ही तो है, जिसको देखकर अतीत जिंदा हो उठता है। मुझे आज से 31 साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है। मैंआठवीं कक्षा में था, तब हमारे प्रधानाध्यापक जी सेवानिवृत्त हुए थे। सभी स्टाफ सदस्यों एवं बड़ी कक्षा होने के नाते आठवीं के सभी विद्यार्थियों ने उनको विदाई दी और एक ग्रुप फोटो भी करवाया। फोटो ग्रुप था, लिहाजा सुलताना से आए फोटोग्राफर हम सभी को व्यवस्थित करने में जुटे थे। सभी तैयार हुए तो फोटोग्राफर ने एक आंख बंद करके दूसरी आंख कैमरे पर लगाई और कहा रेडी, इतने में कोई हिला तो फोटोग्राफर एक आंख बंद किए ही उसको टोकने लगे। तब फोटोग्राफर की एक आंख बंद देखकर हम खूब हंसे। फोटोग्राफर भी झेंप गया। वैसे फोटो से जुड़े दर्जनों वाकये हैं। तस्वीर पर कलम भी खूब चली है। तस्वीर पर लिखी शेरो-शायरी और फिल्मी गानों का तो कहना ही क्या। वो क्या है घूम फिर कर कहीं न कहीं बात गानों पर आ ही जाती है। गानों को देखकर मैं लोभ संवरण नहीं कर पाता। माया फिल्म का गाना 'तस्वीर तेरी दिल में, जिस दिन से उतारी है।' अचानक ही याद आ गया। तस्वीर पर गानों की फेहरिस्त लंबी है, इसलिए तस्वीर से जुड़े चर्चित शेर ' तेरी सूरत से नहीं मिलती किसी की सूरत, हम जमाने में तेरी तस्वीर लिए फिरते हैं।' के साथ फोटो की चर्चा को विराम देते हैं, हालांकि फोटोग्राफरों के प्रति मेरी पूरी सहानुभूति है।
लेखन के लिए अगले विषय का चयन कर ही रहा था कि अचानक श्रीगंगानगर से एक परिचित के मैसेज ने सोचने पर मजबूर कर दिया, मैसेज का शीर्षक था, कड़वा सत्य। वैसे भी सच कड़वा ही होता है। आजकल जमाना सच बोलने का है भी नहीं । हां सच को चासनी में लपेट कर पेश करने की परम्परा जरूर बन चुकी है, सुनने वाला भी खुश और सुनाने वाला भी खुश। तो मैसेज था कि 'कोरोना ने भारत में सब कुछ बंद करवा दिया पर, राजनीति बंद नहीं करवा सका। यहां तो कोरोना हार गया।' वाकई संकट के समय में देश में सियासत तो जमकर हुई। एक के बाद एक लॉकडाउन के फेर में उलझी जनता तो बेचारी समझ ही नहीं पाई कि यह क्या हो रहा है? कौन राजनीति कर रहा है? क्यों कर रहा है? क्या कोरोना को राजनीति से मुक्त नहीं किया जा सकता ? जैसे सहज और सीधे सवाल आपके जेहन में आएं होंगे। दरअसल, सियासत मेरा पंसदीदा विषय है। संयोग से अध्ययन के दौरान राजनीतिक विज्ञान मेरा विषय भी रहा है। सियासत के सामने कोरोना की एक नहीं चली। सियासत ने जनता कर्फ्यू लगवाया। लॉकडाउन लगावाया। ताली-थाली-टाली बजवाई। दीपक-मोमबत्ती भी जलवाई। हवाई जहाज, रेलें एवं बसें तक भी चलावाई। शराब की दुकानें खोलने सहित कई छूटें भी धीरे-धीरे दी। लेकिन इन सब कामों में सियासी गंध राजनीतिक विश्लेषकों ने जरूर महसूस की होगी। सियासत और भी चरम पर होती अगर कोरोना चुनाव के समय आता या कोरोनाकाल में कोई चुनाव आते। हां जब देश में सब बंद होने लगा था तब एक जगह सरकार का तख्ता पलटा भी तथा नई सरकार का गठन भी हुआ। मतलब कोरोना यहां किसी भी तरह से बाधक नहीं बना। वैसे भी निर्देश, नियम, गाइडलाइन, कानून आदि हैं तो उनके लिए है ना जो इनकी पालना करते हैं। आम आदमी तोड़ता है तो सजा पाता है लेकिन समर्थ तोड़ता है कोई चर्चा तक नहीं होती। वो अकबर इलाहबादी का एक चर्चित शेर है ना कि 'हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।' सच में समर्थ लोगों को कोई दोष नहीं दे सकता। तुलसीदासजी ने भी लिखा है, 'समर्थ को नहीं दोष गुसाई, रवि पावक सुरसरि की नाहि। जमाना समर्थों का ही है। आम आदमी की सुनता भी कौन है। सियासी मोहरे वक्त के साथ जरूर बदल जाते हैं लेकिन उनकी फितरत कमोबेश एक जैसी ही रहती है, बेचारा आम आदमी वैसा का वैसा ही रहता है। हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा की यह कविता मुझे बेहद प्रिय है। वैसे शर्मा हैं तो हास्य के कवि लेकिन इस कविता में इनके गांभीर्य की दाद देनी पड़ेगी। आप भी पढि़ए और सोचते रहें। मैं चलता हूं अगली पोस्ट की खोज में.....।
'कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा रावण हो या राम
जनता तो बेचारी सीता है
रावण राजा हुआ, तो वनवास से
चोरी चली जाएगी
और राम राजा हुआ तो,
अग्नि परीक्षा के बाद फिर वनवास में भेज
दी जाएगी।
कोई फर्क नहीं पड़ता इस देश में राजा कौरव
हो या पांडव,
जनता तो बेचारी द्रौपदी है
कौरव राजा हुए तो, चीर हरण के काम
आएगी
और पांडव राजा हुए तो जुए में हार
दी जाएगी।
कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा हिन्दू हो या मुसलमान,
जनता तो बेचारी लाश है,
हिन्दू राजा हुआ तो, जला दी जाएगी
और मुसलमान राजा हुआ
तो दफना दी जाएगी।'
क्रमश:

मुआ कोरोना-36

बस यूं.ही

मास्क पर पोस्ट लिखी तो बीकानेर के एक परिचित ने बताया कि अब तो बाजार में चांदी और सोने के मास्क भी आ गए है। खास तौर पर यह दुल्हन व दूल्हे के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में बीकानेर में तो दूल्हे-दुल्हन के परिजन सोने के हीरो में जड़ित जड़ाऊ कुंदन के मास्क शादी के लिए ढूंढ़ते रहे। वो कई स्वर्णकारों के यहां गए उनका कहना था कि मास्क खरीदने हैं या फिर किराये पर लेने हैं। चूंकि बीकानेर वाले परिचित खुद स्वर्णकार हैं, लिहाजा उनकी बात में दम लगा। वैसे भी संकट में आनंद खोजना तो हमारे संस्कार में है। और बात बीकानेर की हो तो कहना ही क्या। यहां के लोग तो वैसे ही उत्सवधर्मी ठहरे। मास्क की प्रासंगिकता और उसको लगाने की पैरवी के बीच एक मैसेज एेसा भी आया, जिसमें मास्क लगाते समय बरते जाने वाली सावधानी या नुकसान के बारे में बताया गया है। 'साइड इफेक्टस आफ फेस मास्क : मास्क का उपयोग सीमित समय के लिए किया जाना चाहिए। यदि आप इसे लंबे समय तक पहनते हैं तो, इससे खून में ऑक्सीजन कम हो जाती है। मस्तिष्क में ऑक्सीजन कम हो जाती है। आप कमजोरी महसूस करने लगते हैं। और यह मृत्यु तक ले जा सकता है। इसलिए सलाह दी जाती है कि जब आप अकेले हों तो इसे ना पहने। काफी चालक फेस मास्क पहनकर एसी वाली कार चलाते देखे गए हैं जबकि कार में उनके अलावा कोई नहीं होता। यह अज्ञान है या अशिक्षा? मास्क का घर पर इस्तेमाल न करें, इसका उपयोग केवल भीड़ वाली जगह पर करें और या जब एक या अधिक व्यक्तियों के साथ निकट संपर्क में हो।, ज्यादातर अपने आप को भीड़ से अलग करते हुए इसका उपयोग कम करें।हमेशा दो मास्क रखें, हर चार या पांच घंटे में बदलाव करें। अधिक समय तक मास्क का प्रयोग न करें।' वैसे अति तो हर चीज की अनुचित बताई गई है। इसलिए मास्क जहां जरूरी हो वहां ही पहनें। खैर, मास्क पहनने से चेहरे पर किसी तरह का भाव नजर नहीं आएगा। न गुस्सा दिखाई देगा, न लाचारी या मजबूरी दिखाई देगी। भाव पूरे चेहरे से ही बनते हैं, अकेली आंखों से चेहरे के भावों का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। इस तरह के हालात पर यह शायरी मौजूं हैं,
'जिंदगी जीने को यहां ख्वाब मिलता है,
यहां हर सवाल का झूठा जवाब मिलता है,
किसे समझें अपना और किसे पराया ,
यहां हर चेहरे पर एक नकाब मिलता है।'
हालांकि रुबाई (शायरी) के नकाब से तात्पर्य दोहरे चरित्र से हैं। फिर भी नकाब पहचान तो छिपा ही लेगा। इससे अपने-पराये को भेद करना मुश्किल होगा। मास्क के लिए इतना ही।
मास्क की आवश्यकता के बीच एक किरदार एेसा भी है जिसका आप से कभी न कभी वास्ता जरूर पड़ा होगा। वह किरदार इन दिनों नेपथ्य में है। मुश्किल में है। बचपन में इस किरदार को लेकर बस में एक दो लाइन पढ़ी थी जो आज भी याद है, 'लड़कपन जवानी और बुढ़ापा बदलता जाएगा, यादगार के लिए सिर्फ फोटो ही रह जाएगा।' जी हां वो किरदार फोटोग्राफर है, जो कोरोना के चलते परेशानी में है। वैसे तो मेरा तो कई फोटोग्राफरों से वास्ता है। पेशेगत भी और मित्रतावश भी। एक फोटोग्राफर परिचित ने अपनी पीड़ा भेजी। कहने लगा 'इस कोरोना में फोटोग्राफर को पिछाड़ा क्यों जा रहा है,क्या फोटोग्राफर से ही फैलता है संक्रमण? जहां शादियों में 50 लोगों की अनुमति मिली है। वहां पर 48 के साथ दो फोटोग्राफर क्यों नहीं। एक फोटोग्राफर को काम मिलने से पांच लोगों का घर चलता है, जैसे कि ऑपरेटर, एक्सपोजर, डिजाइनर, वीडियो एडिटर, एल्बम प्रिटिंग तथा अन्य सहायक भी। फोटोग्राफर को काम मिलने पर वह अपने परिवार के कम से कम पांच से सात लोगों का भरण-पोषण कर सकता है। इसके अलावा 80 प्रतिशत फोटोग्राफरो ने बैंक से लोन, फाइनेंस से खरीदे गए कैमरे, वीडियो कैमरे, कम्प्यूटर आदि ले रखे हैं। उनकी समय -समय पर कि़स्त भुगतान भी जरूरी है। समय के साथ काम न मिलने पर वह कि़स्त की भरपाई भी नहीं कर पाएगा। साथ ही डिफॉल्टर घोषित होने की आशंका होगी। फोटोग्राफर तो वैसे भी सोशल डिस्टेन्स को ध्यान में रखते हुए काम करते आया है। अन्य इंडस्ट्री जिस प्रकार से खुल रही है तो फोटोग्राफर्स का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। वैसे भी फोटोग्राफर समय -समय पर सरकार के दिशा-निर्देशें की पालना करता है। वैश्विक कोराना महामारी को देखते हुए वह अब भी दिशा-निर्देश मानने को तैयार है। फोटोग्राफर एक नेक दिल इंसान होता है, जो कि खुद मायूस रहकर भी दूसरो के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश करता है।' इस आखिरी लाइन ने वाकई जज्बाती बना दिया। यकीनन फोटो खिंचवाते समय फोटोग्राफर के मुंह से आपने भी सुना होगा 'स्माइल प्लीज।' उसके इतना कहते ही हम सब मुस्कुराए भी हैं।
क्रमश:

मुआ कोरोना- 35

बस यूं.ही

मास्क हटाकर छींकने से याद आ गया, मास्क भी तो एक तरह का नकाब ही है। अंतर इतना ही है कि नकाब में पूरे चेहरे को ढंका जाता है और सिर्फ आंखें ही दिखती हैं जबकि मास्क से नाक व मुंह को ढंका जाता है। विडम्बना देखिए कुछ समय पहले तक पुलिस नकाब हटवाने की कार्रवाई करती थी और अब बिना मास्क के दिखाई देने पर जुर्माना लगाती है। तभी तो कहा गया है कि वक्त-वक्त की बात है। यह भी संयोग है कि नकाब से भी चेहरा पहचान में नहीं आता और मास्क से भी, इसलिए नकाब या मास्क में ज्यादा कोई अंतर नहीं है। वैसे मास्क भी सोशल मीडिया के जुमलों से अछूता नहीं बचा है। इस पर काफी मजाकिया चुटकुले बन चुके हैं। एक दो पर गौर फरमाइए, 'बीवी की, शॉपिंग बन्द, मॉल जाना बंद, फिल्म की फरमाइश बन्द, आउटिंग की फरमाइश बन्द, बाहर खाना बंद और सबसे बड़ी बात कि मुंह पर मास्क का ताला लगाए फिरने से दिन भर की चिक चिक बन्द। वाह रे कोरोना तुम भी क्या कमाल की चीज हो, तुमने वो कर दिखाया जो अच्छे अच्छे ना कर सके।' दूसरा देखिए ' आज बाजार में एक अनजान स्त्री ने मेरा हाथ पकड़कर पूछा, अजी सुनते हो, सब्जी कौनसी लूं? जब मैंने चेहरे से मास्क को हटाया तो बोली, अई दय्या, हमारे किधर गए? इसीलिए कहता हूं घर पर रहें सुरक्षित रहें वरना आपकी पसंद की सब्जी किसी और घर में बन रही होगी।' एक और जुमला है, हो सकता है कि आपके मोबाइल तक भी आया हो, देखिए, 'महंगे-महंगे ब्रांडेड कपड़े खूंटी पर टंगे रह गए। बिना कंपनी वाला मास्क बाजी मार ले गया।' मास्क पर तो कार्टून तक बन गए हैं। ये दिन दूर नहीं वाला कार्टून याद कीजिए। मॉल में अपनी बेटी के साथ बैठी महिला दुकानदार से कहती है, दुल्हन के लिए अच्छा सा मास्क दिखाइए, पिंक बेस पर पहनेगी। पलटकर दुकानदार कहता है, बिलकुल। अभी लेटेस्ट आया है। गोल्ड वर्क में ढाई हजार तक का चलेगा ना।
वैसे बाजार में डिजाइनर मास्क भी आ गए हैं। साड़ी या सूट पर मैच करने वाले मास्क की रेंज भी बाजार में आने लगे हैं। साधारण से लेकर फैशनेबल मास्क तक उपलब्ध हैं। अब नकाब और मास्क के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा भी हो सकती है। नकाब तो लगभग फैशन का पर्याय ही बन चुका है, विशेषकर हर शहर, हर बाजार में नकाबपोश महिला व युवतियों का मिलना आसान था, लेकिन अब मास्क ने भी दखलदे दिया है, इसलिए स्वाभाविक सी बात है कि नकाब की बिक्री में कुछ कमी भी आ जाए। हां नकाब के साथ-साथ पर्दा, घूंघट या चिलमन आदि को भी मास्क की प्रजाति का माना जा सकता है। हालांकि इनके अर्थ अलग हैं और लगाने, करने या बांधने के तरीके भी दीगर हैं। जैसे पर्दा व घूंघट किया जाता है। नकाब व मास्क बांधे जाएंगे या पहने जाएंगे। इसी तरह चिलमन बांस की तिल्लियों से बना एक रेशमी पर्दा होता है, जिसमें सामने वाला व्यक्ति दिखाई देता भी है और नहीं भी। इस्लाम में भी एक शब्द है हिजाब। हिजाब में बाल, कान, गला और छाती को कवर किया जाता है। इसमें कंधों का कुछ हिस्सा भी ढंका होता है, लेकिन चेहरा दिखता है। हिजाब अलग अलग रंग का हो सकता है। पर्दा, घूंघट, चिलमन, हिजाब, नकाब आदि पर शायरों एवं कवियों ने भी खूब कलम चलाई। कई कालजयी गीत भी बने। 'रुख से जरा नकाब हटा दो मेरे हुजूर' वाला कालजयी गीत तो जन-जन की जुबान पर छाया था। खैर, अब दौर मास्क का है। मास्क के साथ ही जीना होगा।वैसे मास्क की कालाबाजारी के समाचार भी खूब आए तो महिलाओं ने घरों में मास्क बनाकर निशुल्क बांटने का काम भी युद्धस्तर पर किया। यह भी संयोग है कि अभी मास्क पर लिख रहा हूं तो धड़ाधड़ तीन मैसेज भी मास्क के संबंध में ही आ गए। आप मास्क के इन मैसेज का आंनद उठाइए। 'मास्क का सबसे अच्छा उपयोग आज देखने को मिला जब बेटा और पिताजी शराब की एक ही लाइन में लगे थे और एक-दूसरे को पहचान नहीं पाए।' एक मैसेज करने वाले ने तो मास्क का हिन्दी नाम भी बता दिया। पढ़कर मेरे तो पेट में बल पड़ गए। कहता है 'अथक प्रयासों के बाद आखिरकार मास्क की हिंदी मिल ही गई......'मुखलंगोट।' वैसे मास्क का एक हिन्दी नाम कल भी आया था। मेरा दावा है आप एक सांस में इस नाम को पढ़ नहीं पाएंगे। और यदि पढ़ भी लिया तो ठीक से याद नहीं कर पाओगे। अगर आपको हिन्दी से प्रेम है तो इसको बार-बार पढ़ लीजिए ताकि यह याद रह जाए। मास्क का हिन्दी नाम है, ' नाक मुख संरक्षक जीव जंतु रोधक हवा छानक कपड़ा डोरी पट्टी।'
क्रमश:

मुआ कोरोना- 34

बस यूं.ही

कल दो खबरों की चर्चा अधूरी रही। हालांकि दोनों खबरें कोई खुशी वाली नहीं है। वैसे भी कोरोनाकाल में खुशी रही कहां है। हर तरफ नैराश्य ज्यादा दिखाई दे रहा है। मेरी तरह सकारात्मक सोचने वाले कम ही है। कुछ दार्शनिकों की तरह भी बातें करने लगे हैं, जीवन का सार बताने लगे हैं। स्वर्ग-नरक की परिभाषा बताने लगे हैं। खैर, पहली खबर उत्तरप्रदेश की है, जहां लॉकडाउन में बीवी मायके में फंसी तो शौहर ने दूसरा निकाह कर लिया। बात पुलिस तक पहुंची पंचायत भी बैठी तो शौहर दोनों पत्नियों को साथ रखने पर राजी हो गया लेकिन पहली बीवी तैयार नहीं हुई। अब बताइए दूसरा निकाह करने वाले ये शख्स कोरोना से दुखी थे? नहीं कतई नहीं। होते तो कोरोना जैसे विपदा काल के समय जहां सभी को जान बचाने की पड़ी है, वहीं ये जनाब शादी रचा रहे थे। सच में यह हैरत भरी बात भी है और हंसी वाली भी। समझ नहीं आ रहा इसको कौनसी श्रेणी में शामिल किया जाए। बहरहाल, बरेली के यह शख्स अब दोहरे संकट से घिरे हैं। कोरोना से मुकाबला वो भी पहली बीवी से नाराजगी मोल लेकर। दूसरी खबर भी शादी से ही संबंधित हैं। यहां भी शादी खुशी लेकर नहीं बल्कि आफत लेकर आई। मामला मध्यप्रदेश का है। भोपाल के नजदीक मंडीदीप में शादी के तीसरे दिन दुल्हन के कोरोना पॉजिटव निकलने पर हड़कंप मच गया। एेसे में दूल्हे एवं पंडितजी सहित 32 जनों को क्वारेंटाइन होना पड़ा। दरअसल, शादी से छह दिन पहले युवती को बुखार आया था। परिजनों ने बुखार की दवा दिलवाने के साथ सेंपल भी जांच के लिए भिजवाया जो शादी के तीन दिन बाद मिला। दोनों खबरें शादी से जुड़ी हैं। दोनों कोरोना से संबंधित हैं और दोनों का परिणाम भी एक जैसा रहा। बेशक उत्तरप्रदेश व मध्यमप्रदेश की यह दोनों शादियां अच्छी खासी चर्चा में रही लेकिन थोड़ी नजर दौड़ाई तो कोरोना काल के दौरान हुई शादियों में कुछ अनूठा भी हुआ। उत्तरप्रदेश के हमीरपुर में एक युवक को कोरोना काल में शादी की अनुमति नहीं मिली तो वह अकेला ही साइकिल पर चला गया अपनी दुल्हनिया को लेने। युवक के पास मोटरसाइकिल भी थी लेकिन ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, इस कारण वह साइकिल पर गया और दुल्हन को साइकिल पर बैठा कर ही ले आया। इसी तरह बिहार के रोहतास जिले में भी इसी तर्ज पर विवाह हुआ। युवक बुलेट मोटरसाइकिल पर आया और फेरे लेने के बाद दुल्हन को बुलेट पर ही ले गया। राजस्थान के जयपुर के आमेर में हुई शादी में एक पिता ने बेटी को विदा करते समय मास्क एवं सेनिटाइजर भेंट किए। इसी तरह बिहार में तो ऑनलाइन शादी तक हो गई। पटना के फुलवारी शरीफ़ में दुल्हन ने उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद के दूल्हे के साथ ऑनलाइन शादी की। दोनों की शादी की तारीख़ 24 मार्च तय थी। कोरोना वायरस के कारण सब जगह लॉकडाउन चल रहा है, ऐसे में बारात आ नहीं सकती थी एेसे में ऑनलाइन शादी का ख्याल जेहन में आया। इसके लिए बाहर से मौलवी को घर लेकर आना पड़ा। बस सामने एक स्क्रीन रख दिया गया, उसमें दूल्हा दिख रहा था और इधर दुल्हन बैठी थी। मौलाना ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके निकाह करा दिया, जब लॉकडाउन ख़त्म होगा तब दुल्हन, दूल्हे के पास जाएगी। बिहार में ही इसी तरह की एक और शादी की ख़बर है, जो कैमूर जिले में 25 मार्च को हुई। इसमें भी बारात को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) से आना था, लेकिन लॉकडाउन के कारण निकाह की सारी रस्में ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ही संपन्न हुई। इसी तरह की शादी सिंगापुर में भी हुई, जहां दंपती ने वीडियो कॉल के ज़रिए शादी की, क्योंकि दोनों कुछ दिन समय पहले चीन के वुहान से लौटे थे। पुणे में एक दपंती ने जनता कर्फ्यू की घोषणा होने के कारण शादी निर्धारित दिन से एक दिन पहले कर ली। इधर राजस्थान के उदयपुर शहर में एक चिकित्सक जोड़े ने तो शादी से पहले डयू्टी करना बेहतर समझा जबकि एक कश्मीरी युवक ने शादी बेहद सादगी से की। उसने फिजूलखर्ची से बचे पैसों से जरूरतमंदों को राशन बांट दिया। शादियों की चर्चा के बीच सबसे चौंकाने वाली खबर तो राजस्थान से रही। आखातीज के अबूझ सावे पर इस बार खामोशी छाई रही। माना जा रहा है कि कोरोना के कारण करीब 25 हजार शादियां टल गई। यह सही है कोरोना ने शादियों पर ब्रेक लगाए लेकिन जहां चाह होती है, वहां राह मिल ही जाती है। शादी होते ही काम पर जाने के तो सैकड़ों उदाहरण हैं। आपने भी कहीं न कहीं खबर पढी होगी कि उसके हाथों की मेहंदी तक नहीं सूखी थी लेकिन वह फर्ज की राह पर चल पड़ी। वैसे चुटकुलों से कोरोना काल में हो रही शादियां भी अछूती नहीं है। जैसा कि नियम है कि शादी में पचास से ज्यादा आदमी एकत्रित नहीं हो सकते तो जुमला बना कि शादी में ज्यादा से ज्यादा पचास लोग ही खुश होते हैं। पोस्ट के आखिर में कोरोना काल में प्रेमी से नाराज प्रेमिका की अदावत पर बना यह चुटकुला पढि़ए ताकि आप मुस्कुरा सकें। 'हमारा कत्ल करने की उनकी साजिश तो देखिए......पास से गुजरी तो मास्क हटाकर छींक दिया।'
क्रमशः

मुआ कोरोना-33

बस यूं.ही

मध्यम वर्ग की चर्चा के बीच दो खबरें अचानक ही आंखों के सामने से गुजरी तो चौंका, हालांकि गुणग्राहकों का आग्रह है कि मध्यम वर्ग पर और लिखा जाए, इसलिए मध्यम वर्ग को नजरअंदाज करके उनके दो खबरों पर आना एक तरह की नाइंसाफी ही होगी। दरअसल, कोरोना का दर्द और दुख सबका साझा है, फिर भी मानव स्वभाव है, सभी को अपना दुख ज्यादा लगता है, यह सही है दुनिया गमों से भरी है। यहां दुखियारों की कोई कमी नहीं है। खुद को सबसे ज्यादा दुखी मानने वालों को यह गीत सुनना चाहिए, 'दुनिया में कितना गम है। मेरा गम कितना कम है, लोगों का गम देखा तो मैं अपना गम भूल गया।' बात गुणग्राहकों की हो रही थी। श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ इलाके से एक परिचित वकील ने बताया कि 'जिन वकीलों के खेती आदि अन्य कोई काम नहीं है, उनका हाल बहुत बुरा है। हमारे पड़ोसी गांव में एक प्राइवेट स्कूल का संचालक खुद नरेगा में मजदूरी करने लगा है।' देखा जाए तो यह एक छोटा सा उदाहरण है, लेकिन इस तरह के हालात से कोई गांव, कस्बा या शहर अछूता नहीं है। कोरोना ने एक झटके में अर्श से फर्श पर ला पटका। सरकारें भले ही अमीर-गरीब का भेद करे। निम्न-मध्यम वर्ग बनाए। उनकी औकात, हैसियत एवं वोट बैंक देखकर योजनाएं बनाए। पैकेजों का निर्धारण करे लेकिन कोरोना ने सभी के प्रति समान व्यवहार रखा। अमीर-गरीब से ऊपर उठकर समभाव रखा। उसने इंसान को इंसान ही समझा। काश, एेसा यह समभाव सियासत भी समझ जाए। वो इंसान को जाति, धर्म व वोट बैंक के नजरिये से ऊपर उठकर देखे और केवल इंसान समझे। जाति, धर्म, वर्ग तो बाद की बात है पहले तो सभी इंसान ही हैं। सभी का खून लाल हैं। सियासत से कोई सवाल नहीं करता। मुझे क्रांतिवीर फिल्म का वो डॉयलाग याद आ रहा है। डॉयलाग काफी बड़ा है लेकिन यह दर्शकों को झकझोरता है, उसी डॉयलोग की जरा सी झलक देखिए। 'तुम्हारी ये ना-मर्दानगी, बुजदिली, एक दिन इस देश की मौत का तमाशा इसी ख़ामोशी से देखेगी। कुछ नहीं कहना मुझे तुम्हे। कुछ नहीं। तुम्हारी जिंदगी में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। अंधेरे में रहने की आदत पड़ी है तुमको। गुलामी करने की आदत पड़ी है। पहले राजा महाराजाओं की गुलामी की। फिर अंग्रेज़ों की फिर अब चंद गद्दार नेताओं और गुंडों की। धर्म के नाम पर ये तुम्हे बहकाते हैं। तुम एक दूसरे का गला काट रहे हो। काटो। काटो। ऊपर वाला भी ऊपर से देखता होगा तो उसे शर्म आती होगी। सोचता होगा मैंने सबसे खूबसूरत चीज बनाई थी इंसान। नीचे देखा तो सब कीड़े बन गए। कीड़े। कीड़े रेंगते रहो। रेंगते रहो। सड़ते रहो। मरो। आए और गए। खेल खत्म क्यों जिए मालूम नहीं क्यों मरे मालूम नहीं।' भले ही जज्बात भरा यह डॉयलोग अभी प्रासंगिक नहीं लेकिन चुनाव के वक्त इसको एक बार याद कर लिया जाए तो शायद मतदाताओं का सोया जमीर जाग जाए। खैर, मैं भी इस विषय पर जज्बाती हो गया। कहां से कहां आ गया। हां तो इसी तरह झुंझुनूं से एक परिचित ने लिखा, 'मध्यम वर्ग की रसाई से पौषकता गायब होने लगी है और चेहरे पर चिंता की लकीरों ने अड्डा जमाया है। समस्या यह है कि कोई उसे गरीब मानने को तैयार नहीं। उसके भवन, उसके कपड़े तक शक की नजर में आ रहे हैं। साबुन तेल की गुणवत्ता बदल रही है, पर इतना धीरे कि कहीं कोई गरीब न मान ले। अब एक सब्जी दो समय चलने लगी है।' यह कहानी भी कमोबेश हर मध्यम वर्ग की रसोई की होगी। दअरसल' मध्यम वर्ग के साथ एक दुविधा है। वह गरीब बनना तो चाहता है पर उसे कोई गरीब बनते देखे यह गवारा नहीं है। बस सियासत उसकी हालत पर चुपचाप तरस खा जाए। वह यह भूल जाता है कि बच्चे को मां भी स्तनपान तभी करवाती है जब वो रोता है। बच्चा ना रोए तो मां की नजर में सब ठीक ही होता है। मध्यम वर्ग व सियासत को मां व बेटे वाली भूमिका में समझना चाहिए। बेटा (मध्यम वर्ग) रो नहीं रहा है तो मां (सियासत) समझ रही है कि उसका पेट भरा हुआ है। उसे दूध (पैकेज या मदद ) की जरूरत नहीं है। और यह मध्यम वर्ग इतना आज्ञाकारी पुत्र है कि कभी रोता ही नहीं है, और न कभी शिकायत करता है, उल्टे श्रवण कुमार बनकर वह सियासत की सेवा करता है, उसका पालन पोषण करता है। बहरहाल, लॉकडाउन में 4.0 को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं और उन सवालों के बीच हमेशा की तरह से आज भी गुदुगुदाने वाले मैसेज आए, लिहाजा आप से साझा कर रहा हूं। ' बाजार खोलने से पहले, संसद खोलो, मुख्यमंत्रियों के दफ्तर खोलो। सभी अफसरों को काम पर लगाओ ताकि आपको पता लग सके कि यह कोरोना कितनी खतरनाक बीमारी है। लॉक डाउन खोल रहे हो हम पब्लिक हैं, साहब कोई टेस्टिंग किट नहीं हैं।' खैर, इतनी गंभीर बात के बाद एक हल्का पुछल्ला ताकि इस प्रतिकूल मौसम में आपकी मुस्कान कायम रहे। ' पति नहाने गया था... पत्नी ने उसका फोन चेक किया तो कॉन्टेक्ट्स में एक नाम कोरोना लिखा था, उसने डायल किया तो किचन में पड़ा उसका खुद का फोन बजने लगा...अब लाख समझाने पर भी पति बाथरूम से बाहर नहीं आ रहा है... बोल रहा है मैं कोरंटाइन हूं।' अब हंसिते रहिए, कल फिर मिलते हैं।
क्रमश:

मुआ कोरोना-32

बस यूं ही

यह महज संयोग है कि वर्क फ्रॉम होम को आज पूरे दो माह हो गए। 21 मार्च को पहला दिन था, जब कार्यालय का काम घर से करना शुरू किया था। दूसरा संयोग यह है कि कोरोना पर लगातार लिखते हुए भी आज एक माह पूरा हो गया। पहली कड़ी 21 अप्रेल को लिखी थी। एक ही विषय पर लगातार लिखना तथा साथ में रोचकता एवं पठनीयता को बरकरार रखने की चुनौती हो तो मामला थोड़ा दुरुह हो जाता है। कल अचानक यह ख्याल भी आया कि कहीं मेरा लेखन पाठकीय कसौटी पर खरा उतर रहा है या नहीं? एक हल्का सा अपराध बोध भी घर कर गया कि कहीं मैं यह सब जबरन लिख-पढ़वा तो नहीं रहा? खैर, यह सवाल मित्रों, परिचितों व शुभचिंतकों से साझे किए और जो जवाब आए उससे लगा मेरा ऐसा सोचना एकपक्षीय था और सही भी नहीं था।मुझे यह भी बताया गया कि लेखन सदैव स्वांत सुखाय होता है। वैसे तुलसीदास जी ने भी लिखा कि 'स्वांत: सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा।' इसका सीधा-सा अर्थ है मैं अपने सुख के लिए कथा कर रहा हूं। भले ही उन्होंने अपने सुख के लिए रामचरित मानस की रचना की हो लेकिन दूसरों को भी सुख मिले इसके लिए भी तुलसी दास जी ने कोई कमी नहीं छोड़ी। खैर, सभी सुझावों-सलाहों को दृष्टिगत रखते हुए कोरोना पर निरंतर लिखना तय किया है।
हां तो बात मध्यम वर्ग की चल रही थी। इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने मध्यम वर्ग के हालात पर एक बड़ा सा लेख लिखा है। उनके लेख की एक खास बात यह लगी कि उन्होंने मध्यम वर्ग की खुशहाली, उधार को बताया है और इसको उन्होंने उधार के सिंदूर की संज्ञा दी है। आप भी पढिए उनके लेख के कुछ चुनिंदा अंश:- 'कोरोना महामारी में सरकारों को निम्न वर्ग तंग बस्ती के रहवासियों की चिंता है। अमीर वर्ग अपने बंगलों में कैद रहते उकता जरूर गया है लेकिन आटे-दाल की चिंता से मुक्त है। कुल आबादी में 45 प्रतिशत मध्यम वर्ग है। कोरोना काल ने मध्यम वर्ग की हालत उधार के सिंदूर जैसी ही कर दी है। इस मध्यम वर्ग में वह नौकरीपेशा भी शामिल है,जिसकी पगार न्यूनतम 20 से 50 हजार मासिक है और वह व्यापारी भी शामिल है, जो हर माह इतने का व्यापार करता है। इस वर्ग की चुनौती यह है कि मकान बनाना या फ्लैट-गाड़ी-व्हीकल खरीदना हो, हर सपना पूरा करने के लिए बैंक लोन पर निर्भर रहना है। बच्चों के बेहतर एजुकेशन के लिए, पब्लिक स्कूल का खर्चा ,बाद की ऊंची पढ़ाई के लिए एजुकेशन लोन, अचानक बीमारी-दुर्घटना में महंगे इलाज में राहत के लिए इंश्योरेंस की किश्त, टीवी-फ्रिज आदि के लिए लोन यानी घर की खुशहाली का अखंड दीपक उधार के सिंदूर से ही रोशन रहता है।'
राणा आगे लिखते हैं, 'सरकार चाहे कांग्रेस की, जनता दल की रही हो या अभी भाजपा की, सर्वाधिक अमीर वर्ग इन सभी दलों के लिए दूध देती गाय रहा है, लिहाजा बजट में एक हाथ से सरकारें इनकी नाक दबाने का काम करती हैं तो दूसरा हाथ अदृश्य तरीके से इनके गाल सहलाता रहता है। यही कारण है कि बड़े लोग बैंकों से करोड़ों-अरबों का लोन लेकर या तो बड़ी आसानी से फरार होते रहे या 'विलफुल डिफाल्टर' के कोडवर्ड से सम्मानित होते रहते हैं। रही बात निम्न वर्ग की तो राज्य और केंद्र सरकार की शायद ही कोई ऐसी योजना हो जिसे लागू करते वक्त इनके हितों का ध्यान ना रखा जाता हो।जो सबसे अमीर है उसमें एक बड़ा वर्ग सफेदपोश चोट्टा होकर भी सम्मान पाता है और रहा निम्न वर्ग तो न उसे टैक्स चुकाना है, न पानी का बिल और न ही बिजली बिल। अब बचा मध्यम वर्ग जो हर सरकार के करों व अन्य वसूली के निशाने पर रहता है।' कीर्ति राणा की तरह ही जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार डा.उरुक्रम शर्मा ने भी मध्यम वर्ग को लेकर बेबाक कलम चलाई। वो लिखते हैं, ' मिडिल क्लास के हालात को देखकर मन द्रवित होता है, रोता है। उसकी स्थिति दो पाटों के बीच पिसने जैसी है। वो जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं। उसकी मुस्कुराहट नकली होती है, वो दिल से कभी नहीं हंस पाता है। उसकी आंखों से आंसू निकलना बंद हो गए। कहो तो सूख गए। इतनी सारी विपदाओं से घिरे होने के बाद भी वो जीने की कोशिश करता है, वो सब कुछ अपने परिवार को देने का पूरा प्रयास करता है, जो धनिक वर्ग को मिलती है। वो भी सपने देखता है, उसके सपनों में भी अच्छे दिन होते हैं, मगर हालात के बोझ तले दबा मिडिल क्लास मजबूर था और मजबूर है। सबसे ज्यादा कोरोना काल में किसी पर अटैक हुआ है तो मिडिल क्लास पर। वह इधर गिरे तो कुआं और उधर गिरे तो खाई।'
इससे बड़ी भी बात यह है कि मध्यम वर्ग समाचारों की दुनिया व चर्चाओं से गायब है। टीवी, समाचार पत्र व.सोशल मीडिया में मध्यम वर्ग की दशा व दिशा पर कोई बात नहीं है। देश की सियासत व मीडिया को सड़क पर चलते मजदूर तथा उनके पैरों में पड़े छाले ही ज्यादा दिखाए दे रहे हैं। मैं यह नहीं कहता कि इस मजदूरों को नजरअंदाज करना चाहिए लेकिन उनके चक्कर में मध्यम वर्ग के लिए आंखें मूंद लेना भी तो नाइंसाफी ही है।
क्रमश:

मुआ कोरोना-31

बस यूं ही

हां तो कल मध्यम वर्ग की बात महिलाओं की पोस्ट की वजह से बीच में छूट गई थी। तो आज बात मध्यम वर्ग की। जब से केन्द्र सरकार ने कोरोना के लिए देश में आर्थिक पैकेज की घोषणा की है। इसके बाद समूचे देश में बहस छिड़ गई है। एक तरह की प्रतिस्पर्धा भी हो चली है कि कोरोना की मार से प्रभावित ज्यादा कौन है। यह तो तय है कि कोरोना की मार से अछूता कोई नहीं बचा। कहीं नौकरियां चल गईं तो कहीं वेतन के लाले पड़ गए। काम धंधे सारे चौपट हो गए। हाथ के काम वाले भी बेकार हो गए। मध्यम वर्ग जो है वो सरकार का कमाऊ पूत भी है। सर्वाधिक करदाता भी इसी श्रेणी से आते हैं। सरकार बनाने, बिगाडऩे में भी मध्यम वर्ग का अहम योगदान होता है। कोरोना की मार से आहत तो सभी हैं लेकिन आर्थिक पैकेज के बाद मध्यम वर्ग का दर्द अब धीरे-धीरे बाहर आ रहा है। आर्थिक पैकेज से पहले दबे स्वर में यही आ रहा था कि मध्यम वर्ग गैरतमंद है, वह चलाकर न तो किसी के आगे हाथ फैलाता है और ना ही सरकार उसकी सुनती है। मध्यम वर्ग इसीलिए भी व्यथित है कि वह कहीं चर्चा में नहीं है, हालांकि कई पत्रकार साथियों ने भी मध्यम वर्ग के लिए कलम चलाई है। सोशल मीडिया पर भी कई ज्ञात-अज्ञात लेखक इस मुहिम को आगे से आगे बढ़ा रहे हैं। कल मुझे भी बीकानेर के एक परिचित ने मैसेज भेजा। उसमें मध्यम वर्ग का दर्द था, चूंकि मैं भी इसी श्रेणी का हूं, यह दर्द कुछ अपना सा लगा, लिहाजा साझा कर रहा हूं, गौर फरमाइए 'ऐसा लग रहा है कि देश में सिर्फ मजदूर ही रहते हैं, बाकी क्या भटे बघार रहे हैं। अब मजदूरों का रोना- धोना बंद कर दीजिए। मजदूर घर पहुंच गया तो उसके परिवार के पास मनरेगा का जाब कार्ड , राशन कार्ड होगा। सरकार मुफ्त में चावल व आटा दे रही है। जनधन खाते होंगे तो मुफ्त में ढाई हजार रुपए भी मिल गए होंगे और आगे भी मिलते रहेंगे। बहुत हो गया मजदूर- मजदूर अब जरा उसके बारे में सोचिए, जिसने लाखों रुपए का कर्ज लेकर प्राइवेट कालेज से इंजीनियरिंग किया था और अभी कम्पनी में पांच से आठ हजार की नौकरी लगा था ( मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी से भी कम ), लेकिन मजबूरीवश अमीरों की तरह रहता था। (बचत शून्य है) जिसने अभी अभी नई-नई वकालत शुरू की थी। दो -चार साल तक वैसे भी कोई केस नहीं मिलता। दो -चार साल के बाद चार पाच हजार रुपए महीना मिलना शुरू होता है, लेकिन मजबूरी में वो भी अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं कर पाता और चार छह साल के बाद जब थोड़ी कमाई बढ़ती है, दस पंद्रह हजार होती है तो भी..लोन-वोन लेकर कार- वार खरीदने की मजबूरी आ जाती है। (बड़ा आदमी दिखने की मजबूरी जो होती है।) अब कार की किस्त भी तो भरनी है। उसके बारे में भी सोचिए, जो सेल्समैन, एरिया मैनेजर का तमगा लिए घूमता था। बंदे को भले ही आठ हज़ार रुपए महीना मिले, लेकिन कभी अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं किया। उनके बारे में भी सोचिए, जो बीमा एजेंट, सेल्स एजेंट बने मुस्कुराते हुए घूमते थे। आप कार की एजेंसी पहुंचे नहीं कि कार के लोन दिलाने से लेकर कार की डिलीवरी दिलाने तक के लिए मुस्कुराते हुए साफ -सुथरे कपड़ो में आपके सामने हाजिर। बदले में कुछ हजार रुपए लेकिन अपनी गरीबी का रोना नहीं रोता है। आत्म सम्मान के साथ रहता है।
मैंने संघर्ष करते वकील, इंजीनियर, पत्रकार, एजेंट, सेल्समेन, छोटे-मंझोले दुकान वाले, क्लर्क, बाबू, स्कूली माटसाब, धोबी, सलून वाले आदि देखे हैं अंदर भले ही चड्डी- बनियान फटी हो, मगर अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं करते हैं।
और इनके पास न तो मुफ्त में चावल पाने वाला राशन कार्ड है न ही जनधन का खाता। यहां तक कि गैस की सब्सिडी भी छोड़ चुके है। ऊपर से मोटर साइकिल की किस्त या कार की किस्त ब्याज सहित देनी है। बच्चों की एक माह की फीस बिना स्कूल भेजे ही इतनी देनी है, जितने में दो लोगों का परिवार आराम से एक महीने खा सकता है। परंतु गरीबी का प्रदर्शन न करने की उसकी आदत ने उसे सरकारी स्कूल से लेकर सरकारी अस्पताल तक से दूर कर दिया है। ऐसे ही टाइपिस्ट, स्टेनो, रिसेप्सनिस्ट व ऑफिस बॉय जैसे लोगो का वर्ग है। अब ऐसा वर्ग क्या करे, वो तो फेसबुक पर बैठ कर अपना दर्द भी नहीं लिख सकता है (बड़ा आदमी दिखने की मजबूरी जो है। ) तो मजदूर की त्रासदी का विषय मुकाम पा गया है, मजदूरों की पीड़ा का नाम देकर ही अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहा हूं। क्या हकीकत पता है आपको, आईएएस, पीएससी का सपना लेकर रात-रात भर जाग कर पढऩे वाला छात्र तो बहुत पहले ही दिल्ली व इंदौर से पैदल निकल लिया था। अपनी पहचान छिपाते हुए, मजदूरों के वेश में। क्यों वो अपनी गरीबी व मजबूरी की दुकान नहीं सजाता। काश! कि देश का मध्यम वर्ग ऐसा कर पाता' वाकई इस अज्ञात लेखक ने गागर में सागर भर दी है। मध्यम वर्ग का जो सजीव चित्रण किया है देखा जाए हकीकत यह भी है। पर पता नहीं यह जिम्मेदारों को, सियासतदानों को दिखाई क्यों नहीं देती है।
क्रमश

मुआ कोरोना- 30

बस यूं ही

मध्यम वर्ग से पहले बात आधी दुनिया की आ गई। आधी दुनिया मतलब महिला। इस पोस्ट में महिलाओं की बात कर लें, मध्यम वर्ग फिर अगली पोस्टों में। दरअसल, एक दो मैसेज महिलाओं से संबंधित आ गए तो सोचा पहले इसी विषय को लिया जाए। दरअसल कोरोना से महिलाएं भी अछूती नहीं है। अभी दो चार दिन पहले क्लास 2025 की परिकल्पना करते हुए एक वीडियो बनाया गया है। एक खूबसूरत सी महिला अध्यापक बच्चों की उपस्थिति लेने के लिए उनके नाम पुकारती है। वह कोरोंटिना जोशी, लोकडाउनसिंह राठौड़, कोविड अवस्थी, कोरोनापालसिंह सोशल डिस्टेंसिंह, मास्क मेहतो, गल्ब्स गायकवाड़, वुहान भदोरिया, आत्मनिर्भर केलावाला नाम बोलती है। कोविड अवस्थी व वुहान भदौरिया के नाम पर मैडम गुस्सा होती है जबकि आत्मनिर्भर केलावाला के नाम पर मुस्कान बिखेरती हुई हल्की सी झेंप भी जाती है। यह वीडियो लोगों को इतना भाया कि न जाने कितने ही व्हाट्सएप-टेलीग्राम का स्टेटस बना तो न जाने कितनों की एफबी वॉल पर जाकर चस्पा हुआ। भविष्य के नाम पर श्रीगंगानगर से आया मैसेज याद आ गया। इसमें भी तो पति-पत्नी के बीच के वार्तालाप में कोरोना शब्दावली का प्रभाव साफ-साफ परिलक्षित हो रहा है। आप इस कोरोना शब्दावली पर गौर फरमाइए, 'कोरोना शब्दावली से निकले नए शब्दों से पत्नी ने पतिदेव को डांट लगाई यह क्या ! आप यहां बालकनी में अकेले - अकेले 'क्वारंटाइन' हुए खड़े हैं और एक मै हूं जो आपको ढूंढने के लिए हर कमरे में 'टेस्ट' लगवा रही हूं। पहले ड्राइंग रूम में ढूंढा, लेकिन टेस्ट में आप 'नेगेटिव' निकले। डायनिंग रूम में भी रिज़ल्ट नेगेटिव ही था, फिर बेडरूम और किचन तक की 'स्क्रीनिंग' करवाई तब जाकर आप इस बालकनी में 'पॉजिटिव' निकले हैं। घर में इतना काम पड़ा है और आप यहां बालकनी की शुद्ध हवा से अपनी 'इम्यूनिटी' बढ़ाने में लगे है! कहीं आप फिर से आस -पड़ोस वाली सुंदरियों के सौंदर्य से 'संक्रमित' होकर तो यहां नहीं खड़े हैं ? याद है ना कि मैं आपको पहले भी उनसे 'सोशल डिस्टेंसिंग' पर रहने की चेतावनी जारी कर चुकी हूं और आप हैं कि उन सौंदर्य युक्त 'वायरसों' से मुक्त नहीं हो पा रहे है ? यदि वे सब ब्यूटी क्वीन है तो मैं भी किसी 'हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन' से कम नहीं हूं। सच-सच बताओ कि इस 'इम्यूनिटी' के बहाने से कहीं महिलाओं की 'कम्युनिटी' में आप दिलों का 'ट्रांसमिशन' तो नहीं बढ़ा रहे हो ना? याद रखना कि यदि मेरा शक एक 'कन्फर्म केस' निकला तो इसी बालकनी में लॉक लगाकर आपको जिंदगी भर के लिए घर के अंदर 'लॉकडाउन' कर दूंगी। अच्छा चलो, अब कुछ काम की बात। बर्तनों को मैंने 'सेनेटाइज' कर दिया है, किन्तु कपड़ों के ढेर का 'सेनेटाइजेशन' अभी बाकी है। जल्द ही आटा गूंथने से लेकर सब्जी काटने तक के कई 'प्रकरण' भी सामने आने वाले है। इससे पहले कि सारे काम एक साथ पेंडिंग होकर किसी 'महामारी' का रूप ले लें, आप एहतियात बरतते हुए अपनी इच्छाओं को 'मास्क' से ढक कर यह बालकनी छोड़ो और सारे काम निबटाना शुरू कर दो। घर की सफाई की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। धूलकणों के आधार पर सिर्फ ड्राइंग रूम ही 'ग्रीन जोन' में दिखाई देता है, बाकी बेडरूम 'ऑरेंज जोन' तो डायनिंग रूम 'रेड जोन' में बने हुए है। बाथरूम तो गंदगी का 'हॉटस्पॉट' बन चुका है। इसकी दीवार की जिस दरार में से कॉकरोच निकल रहे हैं , उसे मैंने पूरी तरह से 'सील' कर दिया है। दवाई तो डाली किन्तु कॉकरोचों की 'मृत्यु दर' बढऩे का नाम ही नहीं ले रही है। आपको ही कुछ करना पड़ेगा। अरे हां ! सुना है आप संदिग्ध होकर भी अपनी 'हिस्ट्री' छुपा रहे है ! मैं सब जानती हूं कि कल पूरी दोपहर किचन में बैठकर आलू के पंराठे आपने ही उड़ाए थे, इसलिए आज से मैंने किचन को दोपहर के समय में 'कंटेंटमेंट एरिया' घोषित कर दिया है। शाम होने से पहले किचन में जाना पूर्णतया 'प्रतिबंधित' है । रसोई बनाने से पहले घर के सभी सदस्यों का 'मास टेस्टिंग' करके यह जरूर पूछ लेना कि शाम के खाने में उन्हें कौन-सा टेस्ट चाहिए, ताकि एक जैसी रसोई बन पाए। यदि मेरी बातें कुछ असर कर रही हो तो जल्दी से काम शुरू करो, वरना गुस्से में रूठकर यदि मैं 'सेल्फ आइसोलेशन' में चली गई तो तुम्हारे मनाने का कोई भी 'वैक्सीन' काम नहीं करेगा।
' इसीलिए तो मैं तुम्हारी डांट चुपचाप सुन रहा हूं प्रिये ! मै जानता हूं कि यह तुम्हारे गुस्से का 'इनक्यूबेशन पीरियड' है, बाद में तो हालात और बेकाबू हो जाएंगे। कहते हुए पतिदेव घर के काम निबटाने चले गए।' वाकई जिसने भी इस शब्दावली को पति-पत्नी के संवाद के रूप में पेश किया वह काबिलेतारीफ है। मेरे उस अज्ञात लेखक को दिल से सलाम। खैर इसी तरह नागौर से एक परिचित का मैसज कल आया था, लगे हाथ वह भी साझा कर लेता हूं। देखिए तो 'लॉक डाउन के दौरान गर्मी की छुट्टी के मद्देनजऱ सरकार ने महिलाओं की विशेष मांग को मानते हुए अतिशीघ्र मायका स्पेशल ट्रेन चलाने की मंज़ूरी दे दी है। इसमें यात्रा करने के लिए मैरिज सर्टिफिकेट अनिवार्य होगा। टिकिट सिर्फ ससुराल से मायके तक का ही मिलेगा। जानकारी मिली है कि इस ख़बर के आने से विवाहित पुरुषों में ख़ुशी की लहर उमड़ पड़ी है।' अब आप पोस्ट का आनंद लीजिए, पढकर थोड़ा मुस्कुराइए और मुझे दीजिए इजाजत, ताकि अगली पोस्ट के लिए फिर कोई नया और मुफीद विषय तलाश सकूं।
क्रमश:

मुआ कोरोना- 29

बस यूं.ही

अभी एक कार्टून देख रहा था। इसको देख कर दिमाग में कई तरह के ख्यालात आए। फिलहाल केवल कार्टून की ही बात करें, फ्रेम में एक मजदूर परिवार सिर पर गृहस्थी का सामान लिए खड़ा है। पीछे एक समाचार का शीर्षक लगा है ' प्रधानमंत्री के नाम राष्ट्र का संदेश।' सामने माइक एवं कैमरा दिखाई दे रहे हैं। शायद मजदूर बाइट दे रहा है। वह कह रहा है, 'आत्मनिर्भरता... आत्मबल... आत्मविश्वास... इन शब्दों ने हमारे अंदर जोश भर दिया है। हम चार दिन से भूखे प्यासे पैदल यात्रा कर लेंगे...।' दरअसल सप्ताह भर पहले प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कोरोना संकट से उबरने के लिए आत्मनिर्भरता की पुरजोर वकालत करते हुए कहा था कि '21वीं सदी भारत की हो, यह हम सबका सपना ही नहीं जिम्मेदारी भी है, लेकिन इसका मार्ग एक ही है. आत्मनिर्भर भारत।' आत्मनिर्भरता पर प्रधानीमंत्री काफी कुछ बोले। साथ में कई दृष्टान्त व उदाहरण भी दिए। इससे पहले अप्रेल माह में सरपंचों के साथ संवाद में भी उन्होंने आत्मनिर्भरता की बात कही थी। प्रधानमंत्री के इस आत्मनिर्भरता के आह्वान को कितने लोगों ने गंभीरता से लिया तो कितने लोगों ने आलोचना की यह अलग विषय है। लेकिन इस आह्वान पर चुटकी लेने वालों की संख्या भी कम नहीं है। यह चुटकीबाज पता नहीं आत्मनिर्भरता के समर्थक हैं या विरोधी लेकिन उनको एेसा करने में ही इस चुनौतीपूर्ण माहौल में भी सुखद अनुभूति हो रही है। वैसे थोड़ा मजाकिया स्वाभाव होने की वजह से मैं चुटकियों, चुटुकलों एवं चुटीली बातों का मुरीद हूं। माना चुटीली बातें किसी की भावना को चोट पहुंचा सकती हैं। शीशे रूपी नाजुक मन को आसानी से चटका भी सकती है लेकिन आदत से मजबूर हूं। अक्सर चुटकी की चिकोटी काट ही लेता हूं। भले ही वो बातों में हो या लेखन में। यह आदत मेरी स्वभाव में पता नहीं कब घर कर गई। राम ही जाने। अब आत्मनिर्भरता पर आते हैं। आत्मनिर्भरता का मतलब जो मेरी समझ आया है, उसका मतलब है, अपने पैरों पर खड़ा होना। आत्मनिर्भरता की अनुभूति भी तभी होगी। दूसरों पर निर्भर रहने से तो होने से रही। दूसरें शब्दों में कहें तो स्वर्ग खुद के मरे से ही मिलेगा। खुद के स्वर्ग मिलने की बात से बचपन की याद आ गई। तब आज की तरह रोजाना जेबखर्ची नहीं मिलती थी। कभी-कभार कोई अवसर विशेष आता था तब काफी रोने-धोन व मिन्नत करने के बाद एक -दो रुपए मिलते तो एेसा लगता जैसे मुंंह मांगी मुराद मिल गई। यह एक दो रुपए देते वक्त पापाजी एक कहानी सुनाते थे। ' यही कि एक सेठजी का बेटा बड़ा फिजूलखर्च था। वह रोज पैसे मांगता। एक दिन सेठजी परेशान हो गए और बेटे से कहा, तुझे पता है ना पैसे कैसे कमाई जाते हैं। कभी कमाकर बताना तभी पता चलेगा। बस फिर क्या था, पुत्र को पिता की बात दिल पर लग गई और उसने कमाने की चुनौती स्वीकार कर ली। वह एक कुल्हाड़ी लेकर जंगल गया, वहां उसे लकड़ी काटने का काम मिला। दिन भर लकड़ी काटने के बाद उसे एक अठन्नी मिली। वह कभी अठन्नी को देखकर खुश होता तो कभी अपने हाथों में पड़े छालों को देखकर दुखी होता। फिर भी अठन्नी कमाने की खुशी में वह अपने पिताजी के पास गया और कहने लगा देखो मैं आज अठन्नी कमाकर लाया। सेठ जी ने बिना कोई प्रतिक्रिया दिए कहा, जाओ इस अठन्नी को कुएं में डाल आओ। पिता की आज्ञा की पालना कर पुत्र कुएं की तरफ चल पड़ा। वहां पहुंचकर उसने अपने हाथों को देखा, उनमें पड़े छालों का देखा। बार-बार देखा और अठन्नी बिना डाले ही घर लौट आया। घर आते ही वह पिता के कदमों में लेट गया और बोला पिताजी मुझे आज पता लगा पैसे कमाना आसान काम नहीं है।' खैर, इस कहानी का असर यह हुआ कि बचपन से मितव्ययी हो गए और बचत की आदत डाल ली। पिताजी भी शायद कहानी के चक्कर में यही सीख देना चाहते थे। कहानी के चक्कर में विषयवस्तु से थोड़ा अलग चला गया लेकिन बात वो ही है ,'खुद के मरे बिना स्वर्ग' वाली थी, लिहाजा यह सब लिखना पड़ा। हां तो बात आत्मनिर्भरता की हो रही थी। जयपुर के एक पत्रकार साथी ने आत्मनिर्भरता के संबंध में अपने एफबी वॉल पर लगाया ' सारे नेताओं की सिक्योरिटी खत्म कर देनी चाहिए। आत्मनिर्भर बनें, खुद की सुरक्षा खुद करें, और देश में हर दिन करोड़ों बचाएं।'' वाकई बात में दम तो है। बात आत्मनिर्भर बनने और आत्मनिर्भरता को अपनाने की है तो यह सब पर समान रूप से लागू होनी भी चाहिए। इसी तरह एफबी पर एक और पोस्ट पढ़ी, ' ईएमआई भरने के लिए बैंक का फोन आया तो मैंने भी बोल दिया, कब तक मांगते रहोगे? आत्मनिर्भर बनो, आत्मनिर्भर।' खैर, बैंक से तो उधार लिया हुआ है तो वह तो चुकाना पड़ेगा ही, हां इस तरह के जुमलों से हंस कर कोरोना का तनाव थोड़ा कम जरूर किया जा सकता है। कहीं एक जगह और पढ़ा, ' मध्यमवर्गीय तो शुरू से ही आत्मनिर्भर है, सरकार के भरोसे तो अमीर और गरीब है।' सोचने वाली बात तो यह है कि मध्यमवर्ग कितना आत्मनिर्भर है। यह किसी से छिपा हुआ भी नहीं है। यकीन नहीं है तो अगली कड़ी में मध्यमवर्ग पर ही चर्चा करेंगे। मजदूरों के बाद सर्वाधिक कमर मध्यम वर्ग की टूटी है। इससे पहले पत्रकार प्रभुनाथ शुक्ल की सुन लेते हैं 'आत्मनिर्भरता यानी स्वावलंबन जीवन में बेहद आवश्यक है। लेकिन आजकल बगैर अवलंबन ( सहारा लेना ) के काम ही नहीं चलता। पति- पत्नी पर, प्रेमी- प्रेमिका पर, बुजुर्ग-छड़ी पर, सरकार- गठजोड़ पर और विपक्ष- ट्विटर पर आत्मनिर्भर है।
क्रमश:

मुआ कोरोना- 28

बस यूं.ही..

मजदूरों की चर्चा के बाद अब बात सूचना एवं प्रोद्यौगिकी की कर ली जाए। देश में जिस दिन से कोरोना ने दस्तक दी उसके कुछ दिन बाद यानी के दो अप्रेल को एक एप आया। आरोग्य सेतु नामक इस एप को मोबाइल में डाउनलोड करने के लिए बहुत अपीलें हुई। प्रचार-प्रसार भी खूब हुआ। सरकारी एप है, लिहाजा लोगों ने इसको धड़ाधड़ डाउनलोड किया। आलम यह है कि गूगल प्ले स्टोर पर जाकर देखते हैं तो इस एप को अभी तक सौ मिलियन से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं। खुद एप पर सबसे ऊपर जानकारी आती है कि 10.74 करोड़ भारतीय इस एप का इस्तेमाल कर रहे हैं। वैसे यह सभी के लिए उपयोगी हैं लेकिन केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के लिए इसे अनिवार्य भी किया गया है। बताया जा रहा है आरोग्य सेेतु से कोरोना से संक्रमित मरीजों व इलाके चिन्हित करने में बड़ी मदद मिली है। दावा तो यह भी है कि इस एप की मदद से अपने आसपास के कोविड 19 मरीज़ के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है। मैंने भी जब यह एप लांच हुआ था, उसके दो चार दिन बाद डाउनलोड कर लिया था। इस पर लिखा आता है 'आप सुरक्षित हैं।' तो यकीन मानिए बड़ा सुखद एहसास होता है। एप में कई तरह की जानकारी है, यह बताता है कि मेरे पांच सौ मीटर के दायरे में करीब सोलह सौ लोग इस एप के उपयोगकर्ता हैं। इसी तरह एक किलोमीटर की परिधि में पांच हजार से ज्यादा लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। दो किलोमीटर में यह संख्या सोलह हजार के करीब है तो पांच किमी में 81 हजार से ज्यादा। दस किलोमीटर में इलाके में एक लाख 63 हजार उपयोगकर्ता हैं। पांच सौ मीटर एवं एक किमी में यह एप कोरोना संक्रमित नहीं बता रहा है लेकिन दो किमी की दूरी पर दो संक्रमित बता रहा है। इसी तरह पांच किमी की दूरी पर 80 तो दस किमी की परिधि में 132 कोरोना संक्रमित दर्शा रहा है। यह बात मैं जोधपुर की बीएजेएस कॉलोनी में बैठकर कर रहा हूं। स्वाभाविक सी बात है अलग- अलग जगह पर यह संख्या कम ज्यादा होगी। बहरहाल, अब बात एप पर पूछे जाने वाले सवालों की करते हैं। सबसे पहले पूछा जाता है कि आप किन लक्षणों का अनुभव कर रहे हैं, मसलन, खांसी, बुखार, सांस लेने में दिक्कत या इनमें से कोई नहीं। इस सवाल से आगे बढते हैं तो अगला सवाल आपको कभी निम्न रोग में कुछ हुआ है। मधुमेह, उच्च रक्तदाब या हाइपरटेंशन, फेफड़ों की बीमारी, दिल की बीमारी या इनमें से कोई नहीं। इससे आगे बढते हैं तो अगला सवाल आता है आपने 28-45 दिनों में कोई विदेश यात्रा की है। नीचे हां या नहीं के दो विकल्प हैं। इसके बाद अगला सवाल है कौनसा विकल्प आप पर लागू होता है। मसलन, आप कोरोना संक्रमित के साथ रहे हैं, आप स्वास्थ्य कर्मचारी हैं या इनमें से कोई नहीं। अगर आपने मेरी तरह कोई नहीं जवाब दिया है तो आखिर में मैसेज आएगा आपका संक्रमण का जोखिम है। खैर, अपने स्वास्थ्य का टेस्ट करके मुझे संतुष्टि मिल गई लेकिन मैं अनजाने में किसी कोरोना संक्रमित से मिल आया, जिसका पता न उसको न मुझे तो फिर मैं कैसे आश्वस्त हो जाऊं कि मैं संक्रमित नहीं हूं। दरअसल, यह वहम है लेकिन इसको दूर करने का यह संतोषप्रद जवाब भी तो नहीं है। दो चार दिन पहले की बात है झुंझुनूं के साथी ने एफबी पर पोस्ट किया कि एप में उनके दो किलोमीटर की परिधि में कोरोना संक्रमित होने का संकेत मिल रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या इसको सही माना जाए? और अगर सही नहीं है तो इस शंका का समाधान कैसे हो?
झुंझुनूं जैसी समस्या एक दो जगह और भी सुनने को मिली। अखबार में भी खबरें आईं, लेकिन विशेषज्ञों की दलील है कि एप इस्तेमाल करने वालों ने कोई डाटा या अपनी कोई जानकारी या लोकेशन सही नहीं भरी होगी, इसलिए एेसा आ रहा है। खैर, सही गलत की बहस में अपन नहीं फंसते हैं। हां हर विषय की तरह आरोग्य सेतु भी जुमलों से अछूता नहीं बचा। कल ही मोबाइल पर किसी ने व्हाटसएप किया। मैं एेसे लोगों के दिमाग को मन ही मन दाद दे रहा था, आखिर यह लोग किसी को भी नहीं बख्शते। मैसेज था 'अब ये आरोग्य सेतु भी ना जले पर नमक छिड़क रहा है। लॉक डाउन हुए दो माह के करीब हो गए, लेकिन पूछता है पिछले 14 दिन में कोई विदेश यात्रा की? अबे ढक्कन 54 दिन से पड़ोस यात्रा नहीं हुई है और तू विदेश यात्रा की पूछ रहा है।' हालांकि एप में अब यह सवाल 28-45 दिन की अवधि में है। हो सकता है कि जब यह जुमला बना तब सवाल में 14 दिन का उल्लेख हो। खैर, इन सब से यह तो तय है कि संकट कैसा भी हो देश में जुमले बनते रहेंगे और लोग जुमलों पर झूमते रहेंगे। कोरोना की तो औकात ही क्या है।
क्रमश:

मुआ कोरोना- 27

बस यूं.ही

देश का मजदूर आज मजबूर है। वह मुसीबत में फंसा हैं। हर साल की तरह इस बार भी मजदूर दिवस आया, लेकिन लॉकडाउन के चलते चुपचाप बीत गया। शौर भी होता तो मजदूरों की मुसीबत कौनसी कम होती। हर साल एक दिन मजदूरों को याद किया जाता है, उनकी महिमा गाई जाती है। फिर सब अपने-अपने काम लग जाते हैं । मौजूदा हालात में अदम गोंडवी की मजदूर पर लिखी एक रचना याद आती है।
'वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बंधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है ।'
बदले हालात में मजदूर बेकाम हो गया है। उसका रोजगार छिन गया है। लेकिन पैरों में बिवाई उसकी नियति है। अब हजारों किलोमीटर कदमों से नापने के बाद उसके पैरों में छाले हैं। देश में मजदूरों पर कितनी ही फिल्में बनी, कितनी ही कलमें चलीं लेकिन उनकी किस्मत कभी नहीं फिरी। उनका संघर्ष कभी खत्म नहीं हुआ। यह तो दिए और तूफान की लड़ाई है। यह समानता और असमानता का द्वंद्व है। यह अमीरी-गरीबी के भेद का झगड़ा है। यह सक्षम-समर्थ की मजबूर-लाचार से लड़ाई है। यह शोषित का पोषित से संघर्ष है। यह संघर्ष जन्म जन्मांतर का है। समय बदला, वैज्ञानिक युग आया। आदमी चांद पर जा पहुंचा लेकिन यह संघर्ष कभी खत्म नहीं हुआ। यह भूख और पेट का संघर्ष है। कोरोना काल में यह संघर्ष बड़ा हो गया है। मजदूर कहां रोए, किसके सामने रोए। कोई सुनने वाला भी नहीं है। सियासत को भी पैसों से प्यार है। वह अपना फायदा पहले देखती है। कंपनियों को राहत दी जा रही है लॉकडाउन में पूरा वेतन देने का सरकारी निर्देश भी वापस हो गया है। सियासी घटनाक्रम में मजदूर बेचारा फुटबाल बना हुआ है। मजूदरों के हितैषी बनने की नौटंकी हर स्तर पर जारी है। कल एक जगह पढ़ा था, ' किसी को लेने बस आई, किसी को लेने जहाज आया। मैं गरीब मजदूर था, मुझे लेने यमराज आया।' इसी तरह का एक गीत भी है ' जिसका कोई नहीं उसका खुदा है यारो, मैं नहीं कहता किताबों में लिखा है यारो।' वाकई मजदूर का तो भगवान ही मालिक है। जैसे पहले भी बताया था कि मजदूरों पर काफी लिखा गया है, लेकिन कोरोनाकाल में भी यह लेखन जारी है। हर मौके पर लिखा जा रहा है, बानगियां देखिए 'था गुरुर तुझे लम्बा होने पर एे सड़क, गरीब के हौसले ने तुझे पैदल ही नाप दिया।' नापे भी कैसे नहीं, मजदूर का हौसला तो पहाड़ जैसा होता है। किसी कवि ने लिखा भी है, ' मजदूर तुम्ही जादूगर हो, पत्थर के महल बना देते हो।' इतना संघर्षशील व्यक्तित्व होने के बावजूद मजदूर किसी का बुरा नहीं सोचता। देखिए किसी ने क्या खूब लिखा है, 'आज फिर वो मुझ पर एक कर्ज चढ़ा गया, वो गरीब कुछ न मिलने पर भी दुआ दे गया।' इसी तरह के मिजाज वाला एक फूल दो माली फिल्म का यह गीत भी है। 'भूखे गरीब की तो ये ही दुआ है, औलाद वालो फूलो फलो।' गांव में साइकिल पर करतब दिखाने वाले आते थे, तब लाउडस्पीकर पर यही गीत बजता था। रोज करतब देखने जाते। वह साइकिल पर सवार होकर नंगे बदन से टयूबलाइट तोड़ता और सारे दर्शक तालियां बजाते। बस तभी से यह गाना जेहन में कैद हो गया। इसी गाने की यह चार लाइन तो हम बच्चे तब अक्सर गुनगुनाते थे, हालांकि इन बोलों का मर्म बडे़ हुए तब जाना। बोल थे, 'कर दे मदद गरीब की, तेरा सुखी रहे संसार, बच्चों की किलकारी से गूंजे तेरा घर बार।' खैर, मुफलिसी में जीने वाले मजूदर को लेकर कवि रामधारीसिंह दिनकर ने अपनी एक कविता में लिखा है कि...'मैं मजदूर हूं मुझे देवों की बस्ती से क्या, अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाए, अम्बर पर जितने तारे उतने वर्षों से, मेरे पुरखों ने धरती का रूप संवारा।' मैं खुद को भी मजदूर मानते हुए किसी कवि की ही इन चंद पंक्तियों के साथ आज की पोस्ट को विराम देता हूं। यह पंक्तियां सच के करीब हैं, और एेसा लगता है, जैसे मौजूदा समय के लिए ही लिखी गई हों।
'हालात से मजबूर हैं सब
इस जिंदगी के मजदूर हैं सब
पास यहां सब जिस्मों से
जज्बातों से अब दूर हैं सब।'
क्रमश:

मुआ कोरोना- 26

बस यूं ही

सन 1971 में राजेश खन्ना की फिल्म आई थी, हाथी मेरे साथी। इस फिल्म के लगभग सारे गाने हिट थे। इसी फिल्म का 'नफरत की दुनिया को छोड़ के प्यार के दुनिया में खुश रहना मेरे यार ...' गीत इतना मर्मस्पर्शी है कि सुनने वाले की आंखें नम हो जाए। इसी गाने की तर्ज और टेर पर आजकल एक गीत सोशल मीडिया पर वायरल है। देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से जा रहे है मजूदरों की बेबसी और लाचारी को दर्शाते दृश्यों के साथ इस गीत को मिक्स कर आगे से आगे बढ़ाया जा रहा है। निसंदेह यह पसंद भी काफी किया जा रहा है। गीत के बोल हैं, ' हम मजदूरों को गांव हमारे भेज दो सरकार, सूना पड़ा घर द्वार...। मजबूरी में हम सब मजदूरी करते हैं, घर बार छोड़कर शहरों में भटकते हैं, जो लेकर हमको आए वो ही छोड़ गए मझधार... सूना पड़ा है घर द्वार...। हमको ना पता था कि ये दिन भी आएंगे, कोरोना के कारण घरों में सब छिप जाएंगे, हम तो बस पापी पेट के कारण झेल रहे हैं मार... सूना पड़ा है घर द्वार... गांव हमारे भेज दो सरकार।' वाकई यह गीत भी डूब कर गाया गया है। गीत के बोलों में और गायक के सुर में छिपे दर्द को बखूबी महसूस किया जा सकता है। मौजूदा हालात को देखकर कहा जा सकता है कि मजूदरों की पीड़ा पर्वत सी है। उनकी फरियाद कहीं सुनी जा रही है तो कहीं अनसुनी है तो कहीं आधी अधूरी। समझ नहीं आ रहा उनकी पीड़ा को सभी जगह पूरा क्यों नहीं सुना गया? मानवता पर सियासत भारी पड़ रही है। माना जाता है कि मजबूर और लाचार आदमी को ज्यादा दबाया जाता है तो फिर वह बागी बन जाता है। देश में मजदूरों के बगावती सुर दिखाई भी देने लगे हैं। लूट खसोट की घटनाएं भी सामने आई हैं। आज से माह भर पहले ही मैंने एक टिप्पणी में आगाह किया था कि देश में भुखमरी के हालात पैदा होने की आशंका बन रही है। और यह हालात पैदा हुए तो स्थिति कोरोना से विकट होगी। चर्चित कवि गोपालदास नीरज जी ने भूख को लेकर बहुत पहले कहा था,
'तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है,
बाग के बाग़ को बीमार बना देती है,
भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालो,
भूख इन्सान को गद्दार बना देती है।'
यकीनन भूख इंसान को गद्दार बना देती है। फिलहाल वक्त के सताए मजदूरों के सामने खुद को सुरक्षित रखते हुए जान बचाना बड़ी चुनौती है। दो चार रोज पूर्व साइकिल चोरी करने की मजबूरी और चोरी की वजह बताते हुए छोड़ी गई चिट्ठी बताती है कि संकट के इस काल में मजबूर भले ही कितना दुखी हो जाए लेकिन उसका जमीर मरा नहीं है। उस मजदूर ने अपने किए के लिए बाकयदा माफी भी मांगी। मजदूर की चिट्ठी भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई। टूटी-फूटी हिन्दी में चिट्ठी में लिखा था, ' मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। मुझे माफ कर देना। मेरे पास बरेली जाने का और कोई साधन नहीं था। मेरा एक बच्चा है,जो विकलांग है। उसके लिए मुझे एेसा करना पड़ा रहा है। आपका कसूरवार, एक मजदूर, एक मजबूर।' इस तरह अपनी भावना लिखने वाला निसंदेह चोर तो कतई नहीं हो सकता। हालात से हारा व्यक्ति ही एेसा कदम उठाता है। वैसे सच यह भी है लॉकडाउन में भले ही दुकानें बंद रही हों लेकिन साइकिलें खूब बिकी हैं। घर जो जाना था। तभी तो जेब में बचे-खुचे पैसों से मजूदरों ने साइकिल खरीदना बेहतर समझा। किसी ने तो अपना मोबाइल तक बेचकर साइकिल का जुगाड़ किया। और जिनके पास साइकिल जितने पैसे भी नहीं थे, उन्होंने अपने जरूरी साजो सामान की गठरी सिर पर रखकर पैदल चलना ही मुनासिब समझा। कहीं नंगे पैर तो कहीं पैरों में छाले, कहीं टूटी हवाई चप्पल तो कहीं गोद में मासूम। बड़े ही हृदय विदारक एवं विचलित करने वाले नजारे सड़कों पर दिखाई दिए। कल कई साथी चुटकी ले रहे थे कि अभी चुनाव नहीं है वरना मजदूरों के लिए हर तरह की व्यवस्था हो जाती। मजदूरों की इसी दशा पर किसी ने शेर भी लिखा ,
'मौत तो पहले से तय थी मेरी
पैदल तो वजह तलाशने निकला था।'
कल कहीं पढ़ा था, जिसमें एक कहावत के हवाले से बताया गया था कि गांव गया मजदूर तथा पानी में गई भैंस देर से ही वापस आते हैं। बात भी सही है, जो गांव गया है वह जल्दी से अब शहर का रुख नहीं करेगा।
क्रमश: