Friday, July 29, 2011

विकास पर बोलती बंद

छत्तीसगढ़ राज्य के बड़े शहरों में शुमार बिलासपुर सियासी दंगल एवं वर्चस्व की लड़ाई में इस कदर फंस चुका है कि विकास के मुद्‌दे गौण हो चुके हैं। विडम्बना देखिए, जिनके जिम्मे विकास है वे जिम्मेदारी से मुंह मोड़ कर आरोप-प्रत्यारोपों के खेल में उलझे हैं। कोई जवाबदेही लेने को तैयार नहीं है। विकास फुटबाल बना हुआ है। मूकदर्शक बनी जनता के पास इस सियासी फुटबाल के खेल को देखने के अलावा कोई चारा भी नहीं है।  लम्बे चौड़े विकास की बातें तो छोड़िए, मूलभूत सुविधाओं का हाल भी बुरा है। बिजली, पानी, सड़क, चिकित्सा, शिक्षा जैसी सुविधाओं मे एक भी तो ऐसी नहीं है, जिस पर दावा किया जा सके। यह बात दीगर है कि कागजों में विकास के दावों की फेहरिस्त बेहद लम्बी है लेकिन हकीकत के धरातल पर आते ही दावों की हवा निकल जाती है। विकास के नाम पर जो काम शहर में चल रहे हैं, उनमें अनियमितता की बू आती है। निर्धारित समय गुजरने के बाद भी आधे-अधूरे काम सरकारी उदासीनता की चुगली करते दिखाई देते हैं। बहरहाल, कई संस्कृतियों के संगम वाली न्याय की इस नगरी के लोगों के साथ  पग-पग पर नाइंसाफी हो रही है। शहर ठप है और बयानों के शोर में जनता जनार्दन की आवाज दब गई है या यूं कहे कि दबा दी गई है। शहरवासियों के मन में अव्यवस्था के प्रति आक्रोश है। अगर बयानों का यह खेल यूं ही बदस्तूर चलता रहा है तो जिनको उम्मीद के साथ  सिर, आंखों पर बिठाया गया है, कल उनको दरकिनार भी किया जा सकता है। सब्र की इंतहा होने को है, धैर्य भी रफ्ता-रफ्ता जवाब देने को है। बहुत हो चुका यह सियासी खेल। जनता अब काम चाहती है। जनता जनार्दन का आक्रोश भड़के,  इससे पहले सभी को राजनीति से ऊपर उठकर सिर्फ और सिर्फ शहर के विकास को जेहन में रखना चाहिए। तभी बेपटरी हुआ शहर विकास की मुख्यधारा से कदमताल कर पाएगा।

साभार- पत्रिका बिलासपुर के  09 जुलाई 11 के अंक में प्रकाशित

खासियत का खामियाजा

राज्य का दूसरा बड़ा शहर होने का गौरव हासिल करने वाला बिलासपुर इसी खासियत का खामियाजा भी भुगत रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद बिलासपुर की राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर उपेक्षा इस कदर हुई कि यह शहर विकास से कदमताल करने में विफल हो गया। शहर के लोग खुद को छला हुआ सा महसूस कर रहे हैं। बिलासपुर एवं रायपुर की प्रगति के मौजूदा सफर को साथ रखकर देखें तो पाएंगे कि न्यायधानी के हिस्से में केवल हाईकोर्ट ही आया। शिक्षा के मामले राज्य का अग्रणी शहर होने तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में सर्वाधिक सफल विद्यार्थी देने के बावजूद बिलासपुर में गुरुघासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय को छोड़कर आईआईटी, एम्स, आईआईएम तथा विधि विश्वविद्यालय जैसे बड़े सरकारी शिक्षण संस्थानों का अभाव है। तमाम संभावनाएं होने के बावजूद बिलासपुर अभी हवाई सेवा से भी अछूता है। शहर को हवाई सेवा से जोड़ने के वादे भी हवाई ही साबित होकर रह गए। और तो और शहर के विकास के लिए बनने वाला मास्टर प्लान भी प्रशासनिक उदासीनता का शिकार है।
लब्बोलुआब यह है कि विकास की भरपूर संभावनाएं मौजूद होने के बावजूद न्यायधानी को नजरअंदाज किया जा रहा है। एक तरह से यह न्याय की नगरी के लोगों के साथ नाइंसाफी ही है। राज्य के गठन के बाद बिलासपुर के लोगों ने जो सपना देखा और जो उम्मीदें थीं, वे एक-एक कर टूटती गई। सुविधाओं से वंचित बिलासपुर विकास की बड़ी योजनाओं से दूर मूलभूत सुविधाओं में सुधार के लिए ही जूझ रहा है। पत्रिका ने बिलासपुर के लोगों को विकास के संबंध में दिखाए गए सब्जबाग की पड़ताल की तो वे मुद्‌दे और बातें सामने आए, जिनको पूरा करने से बिलासपुर का विकास न केवल रफ्तार पकड़ेगा बल्कि शहर की छवि में भी अप्रत्याशित सुधार होगा। 

साभार- पत्रिका बिलासपुर के 26 जुलाई 11 के अंक में प्रकाशित

Sunday, July 24, 2011

ब और बिलासपुर

टिप्पणी
लगता है ब शब्द  बिलासपुर की नियति बन चुका है। या यूं कहें कि बिलासपुर का ब शब्द से चोली दामन का साथ है। शायद तभी बिलासपुर का नामकरण बिलासा नामक महिला पर हुआ। पुलिस कान्फ्रेंस हाल का नाम भी बिलासा गुणी रखा गया। और तो और बिलासपुर के पुराने बाजारों में से एक बुधवारी बाजार की शुरुआत भी ब से ही होती है। खैर, यह सब अतीत की बातें हैं। ब शब्द को वर्तमान के साथ रखकर देखें तो बिलासपुर की मौजूदा तस्वीर यह है कि यहां के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। विकास के लिए बयानवीर जनप्रतिनिधि बयानों पर बयान जारी कर खुद को बड़ा साबित करने की बाजीगरी दिखा रहे हैं। बयानों की ऐसी बानगी विकास से संबंधित बैठकों में भी बखूबी देखने को मिल रही है। समूचा बिलासपुर जानता है और मानता है कि इन बैठकों में नीतिगत निर्णय कम बकबक और बकवास ही ज्यादा हो रही है। समस्याओं की फेहरिस्त बदस्तूर बढ़ रही है। शहर बदरंग, बदसूरत एवं बेनूर हो चुका है। मानसून की बरसात भी बिलासपुर के लोगों के लिए बैरन बनी हुई है। बरसात से बिलासपुर की बदइंतजामी की पोल तो खुली ही, शहर बदहाल भी हो चला है। बिलासपुर की बदकिस्मती यह भी है कि स्थानीय एवं राज्य की बागडोर दो धुर विरोधी दलों के हाथों में है।
बहरहाल, बिलासपुर में बहरतौर (हर प्रकार से) बदहाली का आलम है। कभी बेमिसाल एवं बेनजीर इतिहास के गवाह रहे बिलासपुर की यह बदनसीबी ही कही जाएगी कि वह फिलवक्त बदतरीन दौर से गुजर रहा है। इस नाइंसाफी को बिलासपुर के लोग बहुत देर से बराबर बर्दाश्त कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए बिलासपुर के बाशिंदे बहमदीगर (एक दूसरे के साथ) होकर  बरवक्त (सही समय पर) कोई निर्णय लेंगे। शायद तभी बिलासपुर की बिगड़ी एवं बेपटरी हुई व्यवस्था लाइन पर आएगी। आखिर एकजुटता के बहुमत के बलबूते से ही तो बुलंदी हासिल होती है, इसलिए बयानों की बिसात बिछाकर सियासत की बागडोर हासिल करने करने वालों की बोलती बंद करने के लिए एकजुटता बेहद जरूरी है। बिना एकजुटता के तो सब बातें बेमानी हैं।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 24 जुलाई के अंक में प्रकाशित।

जिम्मेदारी समझें अधिकारी

टिप्पणी
शहर में संचालित अवैध विवाहघरों के मामले में स्टाफ की कमी बताकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने वाले निगम आयुक्त का बयान न केवल हास्यास्पद बल्कि बचकाना भी है। इससे भी बड़ी और गंभीर बात तो यह है कि विवाहघरों के नक्शे पास करने वाले, आयुक्त की नजरों में दोषी ही नहीं है। आयुक्त तो सारा दोष भवन निर्माण करवाने वाले मालिक के सिर ही मंढ़ रहे हैं। वे यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि स्टाफ कम है, लिहाजा मानिटरिंग करना मुमकिन नहीं है। अगर आयुक्त के  बयानों को नियमों के साथ रखकर देखें तो अंतर साफ नजर आता है। निगम क्षेत्र में रिहायशी या व्यावसायिक काम्प्लेक्स का निर्माण तय नियमों के अंतर्गत हो, इसके लिए निगम में भवन शाखा संचालित है। इस शाखा में किसी भी निर्माण के लिए निर्माणकर्ता भूखण्ड मालिक को शहर तथा ग्रामीण निवेश से भू उपयोग प्रमाण-पत्र, फायर सेफ्ट पार्किंग, डायवर्सन आदि से संबंधित दस्तावेज इस शाखा में जमा करना होता है। इतना सब कुछ साफ और स्पष्ट होने के बावजूद निगम आयुक्त का बयान जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने वाला ही है। विचारणीय बिन्दु यह भी है कि शहर में इतने विवाहघर एक साथ या रातोरात तो बने नहीं है। जाहिर है यह सारा खेल मिलीभगत और सांठगांठ की बुनियाद पर ही चल रहा है। दूसरों शब्दों में कहें तो निगम की शह पर ही इन विवाहघरों का संचालन हो रहा है।
वैसे देखा जाए तो निगम आयुक्त का बयान एक तरह से अवैध निर्माण करवाने वालों का समर्थन ही करता है। इस बयान से आमजन तथा शहर के विकास से सरोकार रखने वालों के हाथ निराशा ही लगी है। लकीर पीटने के लिए भले ही निगम प्रशासन शहर में ऐसे विवाह घरों तथा व्यावसायिक काम्प्लेक्स का नापजोख करवा रहा हो लेकिन इसके बाद क्या होगा कहना मुश्किल है। निगम के निर्देशन में शहर में अन्य कामों की जो मानिटरिंग चल रही है, उनकी प्रगति देखकर यह सवाल मौजूं है कि विवाहघरों के नापजोख का हश्र भी कहीं वैसा ही नहीं हो?
बहरहाल, छोटे-छोटे कब्जे हटाने के लिए आम जन तथा मुफलिस लोगों पर कार्रवाई का डंडा चलाने वाले निगम अधिकारियों को यह सोच लेना चाहिए कि विकास के मामले में पिछड़ चुके इस शहर में अब कागजी घोड़े दौड़ाने से काम नहीं चलेगा।  उम्मीद की जानी चाहिए कि नापजोख का काम ईमानदारी से होगा तथा इसके बाद सभी दोषियों पर कार्रवाई बिना किसी भेदभाव के समान रूप से होगी। राजनीतिक हस्तक्षेप को भी नजरअंदाज करना होगा। सियासी दांवपेचों में उलझे इस शहर में यह काम निगम अधिकारियों के लिए चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन मुश्किल नहीं है। इस काम के लिए पहली जरूरत तो यह है कि अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी न केवल समझनी होगी बल्कि उनका निवर्हन भी बखूबी से करना होगा। शायद तभी लोगों का खोया हुआ विश्वास बहाल हो पाएगा।
साभार : पत्रिका बिलासपुर के 14 जुलाई के अंक में प्रकाशित।

Sunday, June 19, 2011

मेरे पापा...मेरी मां...

रविवार को समाचार पत्रों का अवलोकन किया तो पता चला कि आज फादर्स डे है। कुछ इसी भावना के साथ हम मदर्स डे भी मनाने लगे हैं। लगभग हर अखबारों में फादर्स डे के ही चर्चे थे। इस विषय पर कई अखबारों ने तो बाकायदा अतिरिक्त अंक भी निकाले थे। वैसे माता-पिता के लिए साल में एक-एक दिन निर्धारित करने का मैं कतई पक्षधर नहीं हूं। इस प्रकार के आयोजन भारतीय संस्कृति के बिलकुल भी अनुकूल नहीं है। हमारे देश में माता-पिता का दर्जा देवताओं के समतुल्य है। जैसे हम देवताओं का रोज स्मरण करते हैं, उसी प्रकार माता-पिता भी प्रातः स्मरणीय हैं। भौतिकवाद के वशीभूत एवं पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण कर हम प्रकार के दिन विशेष मनाने तो लग गए हैं लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि समूची दुनिया को संस्कृति और ज्ञान का पाठ पढ़ाने वाले देश में इस प्रकार के आयोजनों का औचित्य क्या है। देखा जाए तो माता-पिता को किसी परिधि में बांधा ही नहीं जा सकता है।
खैर, फादर्स डे को लेकर मैं अपना मंतव्य स्पष्ट कर चुका हूं। अब कुछ ऐसे बातें आपसे शेयर कर लूं जो मेरे लिए रोजमर्रा का हिस्सा है। पिछले 11 साल से पेशेगत मजबूरियों के चलते मैं पैतृक घर से बाहर हूं लेकिन रोज उठते ही मैं पहला फोन घर पर करना नहीं भूलता। यह एक तरह का नियम सा बन चुका है। हां, कभी-कभार कार्य अधिकता की वजह से कुछ विलम्ब हो जाता है  तो पापा का फोन आ जाता है। मतलब संवादहीनता वाली स्थिति पिछले 11  सालों में एक भी दिन नहीं आई है। गांव में संचार सुविधाएं कैसी हैं, कहने की आवश्यकता नहीं है, लिहाजा,  कई बार फोन खराब भी हो जाता है। ऐसे में पापा किसी एसटीडी बूथ पर जाकर फोन करके मेरे हालचाल पूछ लेते हैं।
मेरे इस नियम से कुछ सवाल भी उठ रहे हैं, मसलन, माता-पिता के प्रति इतनी श्रद्धा और प्रेम है तो उम्र के उस पड़ाव में उनको अकेला क्यों छोड़ रखा है? क्यों नहीं उनको अपने साथ रख लेते?  क्या फोन के माध्यम से ही आप हालचाल पूछने से काम चल जाता है? आप अपनी पत्नी को उनके पास क्यों नहीं छोड़ देते,  आदि। बिलकुल यही सवाल मेरे मन भी उठते हैं और मुझे विचलित भी करते हैं। माता-पिता को साथ न रख पाने के पीछे सबसे बड़ी दिक्कत मेरी दादी जी हैं,  वे एकदम परम्परावादी हैं। वे जीते-जी किसी भी हालत में घर के ताला लगाने की पक्षधर नहीं हैं। ऐसे में मां और पापा भला उनको अकेला कैसे छोड़ दें। मां और पापा मेरे साथ रहने को तैयार हैं लेकिन दादी जी किसी भी कीमत पर तैयार नहीं होती। अब बात धर्मपत्नी की ले लीजिए। वो मेरे साथ है तो उसके पीछे भी मेरे पापा और मां का प्यार ही है। वो खुद दुख उठा रहे हैं लेकिन मुझे दुखी देखना नहीं चाहते।  मुझे खाना बनाना नहीं आता है। बाहर का खाना मजबूरी में खा तो लेता हूं लेकिन स्वास्थ्य बहुत जल्द खराब हो जाता है। शादी से पहले लगातार यह क्रम चार साल तक चला। स्वास्थ्य इतना खराब हुआ कि करीब आठ किलो वजन कम हो गया। गाल पिचक गए और आंखें अंदर धंस गई। हालात यह हो गई कि मैं समय से पहले ही उम्रदराज दिखने लगा। मेरी हालत दुबारा वैसी ना हो जाए  इसलिए पापा-मां स्वयं दुख उठाने के लिए तैयार हैं, हालांकि मैंने अपनी धर्मपत्नी को सास-ससुर की सेवा के लिए गांव में रहने को कहा, तो  वह तैयार भी हो गई लेकिन पापा-मां तैयार नहीं हुए। बोले बेटा तो अकेला इतनी दूर दुख पाएगा, इसलिए बिनणी को साथ ले जा। मेरे बार-बार आग्रह के बावजूद वो तैयार नहीं हुए।
इधर, दादी मां जिनको मैं बूढी मां भी कहता हूं, वे उम्र के मामले में शतक मारने की नजदीक हैं जबकि मां और पापा 74-75 के करीब पहुंच चुके हैं। कहने का मतलब है गांव में रहने वाले यह तीनों प्राणी बस बड़ी मुश्किल के साथ अपना काम कर पाते हैं। घर का काम तो  कैसे होता है ये ही जानें.... मैं तीनों की हालत देखकर बड़ा दुखी हूं और चिंतित भी। सर्वाधिक पीड़ा तो उस वक्त होती है जब गांव का अदना सा आदमी भी इस बात के लिए उलाहना दे देता है। सचमुच उलाहने की शर्मिन्दगी से जमीन में गड़ा तो नहीं जाता लेकिन बाकी कुछ बचता भी नहीं है। मेरा कुछ होना उस वक्त बेकार साबित हो जाता है। कहने वाले कहते हैं,  उनका मुंह तो पकड़ा नहीं जा सकता,  लेकिन हकीकत में जो दिक्कत है,  उनको उससे कोई मतलब भी नहीं है।
बहरहाल, विषयवस्तु पर लौटते हुए मैं अब कुछ अतीत से जुड़ी यादों को जिंदा कर लूं। यादें इसलिए क्योंकि वे वर्तमान में फिर अपने आप को दोहरा रही हैं। बस भूमिका बदल गई है लेकिन भाव वो ही हैं। कहा भी गया है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। हाल ही में करीब पांच साल तक घर के सबसे निकटतम स्थान पर कार्यरत रहा। ऐसे में कभी महसूस ही नहीं हुआ कि घर से दूर हूं। हाल में तबादला हुआ और मां-पापा से जब मिलकर लौटने लगा तो पापा की आंखों में आंसू देखकर मैं भी अपनी रुलाई नहीं रोक पाया। पापा देर तक अपनी बांहों में कस कर मुझे गले लगाकर सुबकते रहे। रास्ते में भी मां-पापा को याद कर करके आंखों से आंसू अपने आप निकलते रहे। आंसुओं को पोंछ-पोंछ कर रुमाल कब गीला हो गया पता नहीं चला।  मां-पापा को याद कर आंखें अब भी नम हो जाती हैं।  आज भी हो चली हैं। भले ही कुछ लिख रहा हूं लेकिन आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी है। आंसूओं की बूंदें टप-टप कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर गिर रही हैं।  मैं बेहद गमगीन हो चला हूं... कुछ देर सामान्य होने का प्रयास करता हूं लेकिन आज विषय ही ऐसा चुन लिया और वैसे भी मैं बेहद संवेदनशील हूं।  .... हां तो इतिहास वाली बात यह है कि मैं जब छोटा था और पापा जब अपनी छुट्‌टी पूरी करके वापस नौकरी पर लौटने लगते तब मैं उनके पैरों में लिपट जाता और उनके साथ जाने की जिद करता। रो रोकर अपनी आंखें सुजा लेता था। यह पापा का प्यार ही था कि कि वो मुझे रोता हुआ नहीं देख सकते थे, इस कारण रात को मुझे सोता हुआ छोड़कर जाते थे। शायद मेरी बाल हठ पर पापा भी भावुक हो जाते थे। वर्तमान में हालात बदले और जिस दिन घर से मैं रवाना हुआ और पापा की आंखों में आसूं देखकर अतीत याद आ गया। बस, आज मैं इतना ही लिख पाऊंगा। आसूं बह रहे हैं, रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। काश! आज  पापा और मां मेरे साथ होते लेकिन हाय री किस्मत! सचमुच मुझे मेरे पापा और मां से बहुत प्यार है, लेकिन मैं चाहकर भी उनके लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं। उम्मीद जरूर है कि बूढी मां घर छोड़ने को तैयार हो जाएंगी तो मुझे पापा-मां की सेवा का मौका मिल जाएगा। मुझे उस दिन का बेसब्री से इंतजार है।

Saturday, June 18, 2011

पति-पत्नी और वो...

पंजाब के जालंधर एवं उत्तरप्रदेश के कानपुर शहर में शादीशुदा व्यक्तियों को दूसरी महिलाओं से प्रेम की पींगें बढ़ाने की कीमत गधे की तरह मार खाकर चुकानी पड़ी। शनिवार को दिन भर यह दोनों खबरें टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज के नाम चलती रही। जालंधर में पति और उसकी माशूका को पत्नी पीटती दिखाई दी तो कानपुर में पति अपनी पत्नी के प्रेमी पर हाथ उठा रहा था। दोनों घटनाओं में एक अंतर जरूर था। जालंधर की घटना घर के अंदर हुई तो कानपुर की बीच बाजार में। इन खबरों में पिटने और पीटने वालों के बयान भी दिखाए गए गोया उन्होंने कोई लड़ाई फतह की हो।
जैसी कि मेरी आदत है मैं हमेशा खेल या न्यूज से संबंधित चैनल ही ज्यादा देखता हूं। सुबह से लेकर दोपहर तक जब एक चैनल पर लगातार यही खबर देखते-देखते मैं उकता गया तो दूसरा चैनल लगाया लेकिन यहां भी जालंधर एवं कानपुर के ही चर्चे थे। समझ नहीं आया कौनसा चैनल देखूं। आखिकर आवाज म्‌यूट करके मैं दूसरे काम में व्यस्त हो गया, लेकिन चैनल पर यह न्यूज बदस्तूर चलती रही। थोड़ी देर काम से फुर्सत मिली तो इन दोनों खबरों को लेकर सोचने लगा।
मन में ख्याल आया कि  पति-पत्नी और वो... जैसे मामले अगर हम थोड़ी सी गंभीरता से ढूंढेंगे तो अपने आसपास भी मिल जाएंगे। वैसे भी इस प्रकार की घटनाओं से अब कोई हैरत नहीं होती है क्योंकि देश और समाज में इस प्रकार के मामलों में बड़ी तेजी के साथ इजाफा हो रहा है। बावजूद इसके हमारे चैनल वालों को पता नहीं क्या हो गया है। जैसा कि मेरे एक परिचित कल ही मुझे कह रहे थे कि टीवी चैनल का मतलब है देखो और भूल जाओ। दिल पर मत लो। इनका काम ही सनसनी फैलाना है। मुझे उनकी बात में दम नजर आया। यह सनसनी नहीं तो और क्या है। निहायत ही घरेलू मामलों को राष्ट्रीय स्तर का समाचार बनाकर पेश कर दिया जाता है। ऐसा लगता है कि घर-घर की कहानी का कथानक जरूरत से ज्यादा ही मजबूत और लोकप्रिय हो गया है।  तभी तो भूख, भय, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे ज्वलंत मुद्‌दों को दरकिनार किया जा रहा है और इन सब पर घर-घर की कहानी भारी पड़ रही है।
खैर, चप्पलों एवं जूतों से मार खाए महाशय, अनैतिक रूप से प्यार करने का मतलब भली-भांति समझ गए होंगे। अगर नहीं समझें तो उनको नीचे दिया गया यह शेर गुनगुना लेना चाहिए लेकिन शेर में अंतर्निहित फलसफे को समझने को बाद।
ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए..
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

Thursday, June 16, 2011

मेरा गांव....

मातृभूमि से मोह भला किसे नहीं होता। मुझे भी है। मेरे ही गांव के एक शिक्षाविद्‌ हैं श्रीभगवानसिंह झाझड़िया। सीकर कॉलेज में पढ़ाते थे। आजकल सेवानिवृत्त होने के बाद साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। समाचार पत्रों में तो लिखते ही रहते हैं फेसबुक पर भी लगभग मौजूद रहते हैं। गांव के होने के नाते मेरा उनसे परिचय पहले से ही है, लेकिन हाल ही में फेसबुक के माध्यम से उनसे मिलन हो गया। एक दिन मैंने अपने ब्लॉग में बगड़ के बारे में कुछ लिखा था। मेरे आग्रह पर उन्होंने मेरा आलेख पढऩे के बाद कहा कि आपको ऐसा ही कोई लेख गांव के बारे में भी लिखना चाहिए। मैंने मन ही मन उनके आग्रह  को स्वीकार तो कर लिया लेकिन गांव के बारे में लिखना जितना आसान है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। समझ नहीं आया कि गांव की खासियतों एवं खूबियों को रेखांकित करूं या फिर उन मूलभूत समस्याओं को उजागर करूं जो आजादी के बाद से ही मुंह बाए खड़ी हैं। खैर, प्रयास यही रहेगा कि दोनों बातों का समावेश समान रूप से हो जाए।
दो कस्बों के बीच बसा है केहरपुरा कलां गांव। गांव के पूर्व में सुलताना है तो पश्चिम दिशा में इस्लामपुर। ऐसा समझ लीजिए कि इन दोनों कस्बों को जोड़ने वाली सड़क के बीच में स्थित है मेरा गांव। रोजमर्रा की चीजों की खरीददारी करने के लिए गांव के लोग सुलताना ही ज्यादा जाते हैं, क्योंकि सुलताना का  देहाती बाजार  बड़ी तेजी के साथ उभरा है जबकि इस्लामपुर समय के साथ कदमताल नहीं कर पाया है, जैसा बीस साल पहले था तथा कमोबेश वैसा ही आज है। मेरे गांव का विधानसभा क्षेत्र झुंझुनूं है लेकिन तहसील एवं उपखण्ड मुख्यालय चिड़ावा लगता है।
सैनिकों के मामले में प्रसिद्ध मेरे गांव में कभी यह स्थिति थी कि प्रत्येक घर से एक व्यक्ति सेना में था। मेरा परिवार भी इसका बहुत बड़ा उदाहरण रहा है। मेरे पिताजी और उनक चार बड़े भाई भी सेना में रहे हैं। इतना ही नहीं इन पांचों भाइयों ने 1962, 1965 व 1971 की लड़ाइयां भी लड़ी हैं। मेरे परिवार जैसे गांव में बहुत से परिवार हैं। गांव में आज भी कई पूर्व सैनिक मौजूद हैं। आजादी के बाद शुरुआती दौर में रोजगार का एकमात्र साधन सेना ही था, हालांकि इससे पहले अंग्रेजों की सेना में भी गांव के लोगों ने सेवाएं दी हैं। फिर भी रोजगार का सबसे सशक्त एवं महत्वपूर्ण साधन सेना ही रहा। गांव से बड़ी संख्या में लोग सेना में गए तथा जब-जब देश पर खतरा आया तब सीमा पर मोर्चा संभालने में कोताही नहीं बरती। सेना में जाने का सिललिसा आज भी बदस्तूर जारी है। हां, वर्तमान में गांव में शिक्षा का उजियारा इतना फैल गया है कि अब गांव के युवाओं को कैरियर बनाने के कई विकल्प दिखाई देने लगे हैं। यही कारण है कि अब गांव के युवा बड़ी संख्या में थलसेना के साथ-साथ वायुसेना व जल सेना की ओर भी रुख करने लगे हैं।
गांव के कई लोग सेना में उच्च पदों पर पहुंचे जबकि कई फिलहाल कार्यरत हैं। शिक्षा के मामले में गांव में तीन सरकारी एवं निजी स्कूल हैं लेकिन उच्च शिक्षा के लिए गांव से बाहर निकलना पड़ता है। लड़कों के लिए सरकारी मिडिल स्कूल है जबकि लड़कियों के लिए दसवीं तक है। इतना होने के बावजूद मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरे गांव का शिक्षा का स्तर बेहद अच्छा है। बेटियों को लिखाने पढ़ाने का जज्बा गांव में गजब का है। लिंगभेद की देशव्यापी काली छाया से मेरा गांव अछूता है। यहां बेटा-बेटी को समान समझा जाता है। लैंगिक संवेदनशीलता तथा कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लिखने की प्रेरणा के पीछे काफी हद तक मेरे गांव का माहौल ही रहा है।सेना के बाद मेरे गांव के काफी लोग शिक्षा से जुड़े हुए हैं। बड़ी संख्या में गांव के लोग शिक्षा के माध्यय से राष्ट्र निर्माण की बुनियाद को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। सिविल सर्विसेज में भी गांव के लोग सेवा दे रहे हैं। मेरे गांव के एक शख्स तो कलक्टर जैस शीर्षस्थ पद तक पहुंचने में भी सफल रहे हैं।
मेहनत कर बढ़िया मुकाम हासिल करने वाले गांव के सफल व्यक्तियों के पीछे किसी गॉडफादर का हाथ नहीं बल्कि आपसी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का ही परिणाम है। गांव के युवा एक दूसरे से प्रेरणा लेते हैं और मंजिल की तलाश में जुट जाते हैं।
सेना, शिक्षा तथा सर्विस के बाद बड़ी संख्या में लोग कृषि से भी जुड़े हुए हैं लेकिन गांव का रकबा कम है, इस कारण गांव में खेती फायदे का सौदा नहीं है। बावजूद इसके मजबूरी कहें या जिनको रोजगार नहीं मिला वे कृषि के काम में लगे हुए हैं। कुओं का जलस्तर हर साल नीचे जा रहा है इस कारण हर साल कुओं को गहरा करवाना पड़ता है। इस वजह खेती में जो थोड़ा बहुत मुनाफा होता है वह इस काम में खर्च हो जाता है।
गांव में बिजली मेरे पैदा होने से पहले ही आ गई थी लेकिन उसका ढर्रा आज भी पटरी पर नहीं है। गांव में बिजली कब आए और कब चली जाए कहना मुश्किल है। सबसे बड़ी बात तो है कि मेरे गांव के लोग इस समस्या से रोजाना दो चार होते हैं, आपस में चर्चा करते हैं, लेकिन इस समस्या के निदान के लिए कोई प्रयास नहीं करते। हालत घरेलू एवं कृषि बिजली दोनों की समान है। एक बार छात्र जीवन में कुछ युवा साथियों के साथ हम बिजली की मांगों के लेकर सुलताना के पावरहाउस पहुंचे थे। बदकिस्मती से वहां का माहौल गर्मा गया। मामला पुलिस थाने तक पहुंच गया। बस फिर क्या था। उसके बाद बिजली को लेकर कोई कुछ कहता ही नहीं है।  ग्रामीणों की इसी मजबूरी का फायदा विद्युत निगम के  अधिकारी-कर्मचारी गाहे-बगाहे उठाते रहते हैं। गांव के अधिकतर नौकरीपेशा लोग जब गांव आते हैं तो उनको सर्वाधिक पीड़ा बिजली को लेकर ही होती है। वे अपनी पीड़ा गांव के लोगों को कहते हैं लेकिन उस पर गंभीरता से कोई नहीं सोचता।
मेरे गांव में सबसे बड़ा संकट यह है लोग यहां से पलायन कर रहे हैं। वर्तमान में आधे से ज्यादा गांव खाली हो गया है। रोजगार की तलाश में जो गांव से बाहर निकला, उसने फिर वापस गांव की ओर रुख नहीं किया। उसने गांव की चिंता भी नहीं की। राजनीतिक मोहरे ऐसे लोगों को चुनाव के मौसम में अपने खर्चे पर गांव के दर्शन करवाने का अवसर जरूर उपलब्ध करवा देते हैं, लिहाजा, वे भी उसी का समर्थन कर चले जाते हैं।  मैंने गांव के मौजीज लोगों  को एक जगह बैठ कर गांव के समग्र विकास लिए चर्चा करते हुए नहीं देखा। ग्रामसभाओं में ग्रामीण तो दूर जनप्रतिनिधि ही नहीं आते हैं। उनकी उपस्थिति किस प्रकार दर्शाई जाती है मेरे से बेहतर शायद ही कोई जानता होगा। हां, तो मैं कह रहा है था मेरा गांव खाली हो गया है।
मेरे देखते-देखते ही गांव काफी कुछ बदल गया है। अक्सर आबाद रहने वाले गांव के रास्तों में अब अघोषित कर्फ्यू सा लगा रहता है। गांवों के नुक्कड़ों पर अक्सर दिखाई देने वाले ताशपत्ती एवं चौपड़ के नजारे अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुके हैं। हां, ताशपत्ती का खेल जरूर होता है लेकिन उसमें मनोरंजन व हास-परिहास की भावना गौण हो चुकी है। ताशपत्ती का खेल रफ्ता-रफ्ता जुए में तब्दील हो रहा है। गांव के अधिकतर बेरोजगारों की सुबह और शाम इसी काम में बीत रही है।
व्यक्ति के खुद तक सिमटने की वैश्विक समस्या से मेरा गांव भी अछूता नहीं है।  गांव का गुवाड़  अब अतीत की गवाही देता है। कभी यहां चौपाल लगती थी तथा बड़े बुजुर्ग मिलकर आपस में हालचाल पूछा करते थे। एक दूसरे के दुख-दर्द साझा किए करते थे। लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है। राजनीति का खेल मेरे गांव में भी खूब चला। यह राजनीति का ही कमाल था कि कभी सामूहिक रूप से मनाई जाने वाली होली आज तीन-चार जगह मनने लगी है। धूलण्डी के दिन प्यार मोहब्बत से एक दूसरे को राम-रमी करने तथा रंग-गुलाल लगाने वाले आज एक-दूसरे के प्रति बांहे चढ़ाए हुए नजर आते हैं। दो धड़ों में बंटे लोगों के बीच जो एक अदृश्य तनाव है, जो कभी भी किसी बड़े हादसे की शक्ल इख्तियार कर सकता है। मैं सोचता हूं गांव की एकमात्र इस साझा विरासत को पुनः बहाल करने के लिए कोई प्रयास क्यों नहीं करता। फिर ख्याल आता है कि किसको मतलब है, सब को अपनी पड़ी है। राजनीतिक मोहरे तो ऐसे ही अवसरों की तलाश में रहते हैं। मुझे मेरे गांव में बहुत सारी खूबियां नजर आती हैं लेकिन एकमात्र यही खामी सब पर भारी पड़ती है। मुझे आज भी होली का वह मनहूस वाकया याद है, जब गांव की साझा संस्कृति को बहुत बड़ा आघात लगा था। होली-दीवाली पर राम रमी के बहाने  एक दूजे के घर जाने तथा हालचाल जानने का प्रचलन भी अब कम हो चला है।
आखिर में एक बात और मेरा गांव आम गांव जैसा नहीं है। यहां प्रत्येक घर आपको पक्का दिखाई देगा। हां, रास्ते जरूर ऊबड़खाबड़ एवं बेतरतीब है। इनमें कीचड़ भरा रहता है। रास्तों की इस प्रकार की दशा के लिए मैं काफी हद तक राजनीति को ही जिम्मेदार ठहराऊंगा। कच्चे मकान तो गांव में ढूंढे भी ना मिलेगा। एक दूसरी बड़ी बात यह है कि मेरे गांव में खेतीबाड़ी या भवन निर्माण के लिए आपको मजदूर नहीं मिलेंगे। इस काम के लिए पड़ोसी कस्बे सुलताना जाना पड़ेगा।
यातायात के पर्याप्त साधन हैं। गांव तक पहुंचने के लिए पक्की डामर की सड़क भी बनी हुई है। नौकरीपेशा लोग होने के कारण गांव के लोगों का आर्थिक स्तर औसत से काफी ऊंचा है। इसी कारण अधिकतर घरों में दुपहिया वाहन मिल जाएंगे। चौपहिया वाहनों की संख्या में भी दिनोदिन इजाफा हो रहा है। गांव का ऐतिहासिक राधा कृष्ण मंदिर कई घटनाओं का साक्षी रहा है। मंदिर में बाबा का धूणा अपने चमत्कारिक महत्त्व के कारण ग्रामीणों की आस्था का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है।
बहरहाल, समय के साथ कदमताल करता मेरा गांव आगे बढ़ा जा रहा है लेकिन संस्कार एवं संस्कृति की कीमत पर है। सोचता हूं संस्कार एवं संस्कृति को साथ लेकर गांव के लोग उन्नति करें, आगे बढ़े तो कितना अच्छा होगा। मुझे उम्मीद है वह दिन जरूर आएगा। मेरे जैसे कुछ साथी और हैं जिनके मन में यह पीड़ा है। देर है तो बस साथ बैठने की। एक दिन बैठ गए तो जरूर कुछ ना कुछ सकारात्मक पहल करके उठेंगे। वैसे भी कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती है।

Wednesday, June 15, 2011

खुदकुशी का सीधा प्रसारण...

यह मात्र संयोग ही है कि दो दिन से लिखने का विषय टीवी चैनल ही बन रहे हैं। वैसे देखा जाए तो इसमें किसी तरह का कोई पूर्वाग्रह भी नहीं है। बस जो देखा और सोचने पर मजबूर कर गया उसी पर कुछ लिखा है। कल शाम यानी मंगलवार 14  जून की ही तो बात है। रिमोट हाथ में लिए टीवी के चैनल आगे-पीछे कर रहा था अचानक एक ब्रेकिंग न्यूज पर नजर पड़ी तो चौंक गया। चैनल किसी खुदकुशी का सीधा प्रसारण दिखा रहा था। यकायक विश्वास नहीं हुआ, भला खुदकुशी का सीधा प्रसारण? अब तक संसदीय कार्यवाही या किसी खेल का ही सीधा प्रसारण देखता आया हूं लिहाजा, खुदकुशी का सीधा प्रसारण देखने के लिए टीवी पर नजरें तल्लीनता एवं उत्सुकता के साथ गड़ा दी। 
खबर छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले से थी, जहां एक प्रेमी युगल ने पानी में कूद कर आत्महत्या करनी चाही। बदकिस्मती कहिए या खुशकिस्मती युवक की डूबने से मौत हो गई लेकिन युवती किसी तरह से बच गई। जैसा कि प्रेम कहानियों में होता आया है। मरने से बची युवती खुद को बचाने का उपक्रम करते हुए पानी में बिछड़े साथी को तलाशने लगी। बस, इसी दौरान सूचना पाकर कुछ चैनल वाले भी वहां पहुंच गए। कवरेज के लिए इससे बढ़िया नजारा और खबर भला और क्या हो सकते थे। देखते- देखते खुदकुशी का सीधा प्रसारण शुरू हो गया। साथ में सीन पर एक्सक्लूसिव... और ओनली ऑन... आदि भी बार-बार लिखा आ रहा था। हैरत तो तब हुई जब किसी कॉमिक्स की तरह युवती के मुंह के आगे घेरा बनाकर बचाओ... बचाओ... लिख दिया गया। भले ही मुंह से वह कुछ और बोल रही हो।
पांच मिनट तक मैं अपलक इस खबर को हैरानी एवं विस्मय के साथ देखता रहा। एक पल सोचा कहीं यह स्वप्न तो नहीं, आंखें जो देख रही थी, उस पर यकायक यकीन नहीं हो रहा था। सिर को थोड़ा झटका देकर मैं यथार्थ की दुनिया में तो लौट आया लेकिन बार-बार यही सवाल मेरे मन मस्तिष्क में कौंध रहा था कि आखिरकार चैनलों की इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा का अंतहीन सिलसिला कब थमेगा। प्रतिस्पर्धा के इस युग में क्या मानवीय संवेदनाएं इसी तरह दम तोड़ती रहेंगी। क्या उस डूबती युवती के दृश्य को फिल्माने वाला कोई इंसान नहीं था। क्या उसके सीने में कोई दिल नहीं था। अगर हकीकत में वह बचाओ... बचाओ... चिल्ला रही थी तो मानवीयता के नाते क्यों उसको दया नहीं आई।
खैर, बाद में इस मामले का क्या हुआ मैं फालोअप नहीं कर पाया। अति व्यस्तता के चलते मैं दूसरे कामों में लग गया।  लेकिन खबर को याद कर सोचने पर विवश हो जाता हूं। खुदकुशी के सीधे प्रसारणों से चैनलों की टीआरपी तो भले ही बढ़ जाए लेकिन दिलों में जगह नहीं बन सकती। बेहतर होता खुदकुशी का दृश्य फिल्माने वाला कैमरामैन अपना कैमरा अपने किसी दूसरे साथी के हाथ में सौंप कर जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रही युवती की मदद को आगे आता। अगर चैनल पर युवती की मदद करने का दृश्य  दिखाया जाता तो शायद दर्शकों की दाद ज्यादा मिलती। अपने मुंह बड़ाई वाली बात नहीं है अगर उस जगह मैं होता तो मेरी पहली प्राथमिकता  युवती को बचाना ही होती।

Tuesday, June 14, 2011

इंतहा हो गई....

 मंगलवार दोपहर मतलब 14 जून को टीवी पर एक  चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी। बार-बार टीवी स्क्रीन पर डिस्पले हो रहा था। समाचार था, फिल्म भिंडी बाजार में दर्जी शब्द पर सेंसर ने कैंची चला दी है। किसी जाति विशेष को इंगित करने वाले शब्दों को सेंसर करने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले शाहरुख खान की फिल्म बिल्लू बारबर से भी बारबर शब्द हटाया गया था। वैसे फिल्मों से जाति विशेष को दर्शाने वाले शब्द हटाने का इतिहास बेहद पुराना है। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे बिना किसी आपत्ति के ही सेंसर ने अपने स्वविवेक से उस पर कैंची चला दी। वैसे भी फिल्मों में कौन सा नाम जाए और कौनसा नहीं इस पर सेंसर का कोई तय पैमाना नहीं है। फिल्मी इतिहास पर नजर डालें तो निर्माता निर्देशकों की सर्वाधिक पसंद एक दो जाति विशेष ही रही हैं। बार-बार इन्हीं जातियों के पात्रों को खलनायक की भूमिका में पेश किया जाता रहा है। आजादी से लेकर वर्तमान तक हजारों फिल्मों का निर्माण हो चुका है लेकिन अमूमन हर तीसरी या चौथी फिल्म में निर्माताओं को खलनायक की भूमिका के लिए  कुछ जाति विशेष के नाम ही सबसे मुफीद लगते है। जातियों के इस तरह के  प्रस्तुतिकरण को लेकर कई सामाजिक संगठनों ने विरोध भी जताया लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है। आजादी के बाद से ही फिल्म निर्माता जाति विशेष का खलनायक के रूप में जो चेहरा दिखाते हैं, उनके अत्याचार दिखाते हैं, इससे उनका जाति विशेष के खिलाफ पूर्वाग्रह ही ज्यादा झलकता है।
सोचनीय विषय तो यह है कि फिल्मों में ऐसी जातियों का गलत प्रस्तुतिकरण किया  जाता है, जिनके गौरव की गाथा इतिहास का प्रत्येक पन्ना बयां करता हैं। मैं स्वयं भी गलत का समर्थन नहीं करता है। जो गलत है उसका प्रस्तुतिकरण उसी अंदाज में होना चाहिए लेकिन आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था का युग है। इसमें वैसा कुछ होता भी नहीं जो आजादी से पूर्व होता था। मतलब सभी को बराबरी का अधिकार है। बावजूद इसके बार-बार जाति विशेष को खलनायक की भूमिका में ही दर्शाया जाता है। ऐसे मामलों में सेंसर बोर्ड भी चुप है।
बहरहाल, आजादी के छह दशक से ज्यादा समय से गुजरने के बाद भी हमारे फिल्म निर्माताओं को फिल्म कथानक के लिए कोई नया या मौलिक शब्द नहीं सूझे तो  उनको नई बोतल में पुरानी शराब परोसने का खेल बंद कर देना चाहिए। जनता आखिरकार कब वही एक-दो जातियों को बार-बार खलनायकों की भूमिका में सहन करेगी। बर्दाश्त करने की भी कोई सीमा होती है।

Saturday, June 11, 2011

जूता दिखाने का चलन

इन दिनों जूता फेंकने, उछालने व दिखाने का चलन इतना आसान हो चला है कि हींग लगे न फिटकरी रंग चोखो आ जाए... वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। जूतों से संबंधित हालिया घटनाओं पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे  कि इस कृत्य को अंजाम देने वाले पलक झपकते ही समूची दुनिया में चर्चित हो गए। वैसे भी सारा खेल नाम का ही है। किसी ने कहा भी है कि बदनाम नहीं होंगे तो क्या नाम नहीं होगा। अभिताभ ने तो गाया भी है ... जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है... खैर, नाम कमाने के लिए लोगों की जिंदगी गुजर जाती है बावजूद इसके वे अपनी पहचान नहीं बना पाते, लेकिन जूता फेंकने, उछालने या दिखाने वालों ने महज एक-दो मिनट में ही अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया। यह अलग बात है कि इतिहास का अवलोकन करने वाले इन जूता प्रेमियों को किस संदर्भ में लेते हैं। जिसकी जैसी मानसिकता होगी, वह उसको उसी नजरिए से देखेगा।
हाल ही में सीकर जिले के धोद विधानसभा क्षेत्र के युवक ने एक राजनीतिज्ञ को जूता दिखाया। जूता दिखाने के बाद पक्ष-विपक्ष दोनों दलों के बयान आए। कोई इसे आम आदमी की आवाज बता रहा था तो कोई विपक्ष की चाल। लेकिन जूता दिखाने वाले ने जो सवाल पूछा था, उसमें उसका झुकाव किसी दल की तरफ नहीं था। होता भी कैसे उसके विधानसभा क्षेत्र में लम्बे समय से वामदल का प्रत्याशी जीतता आया है। आरोप-प्रत्यारोप के खेल में फंसे दोनों ही दलों की वहां दाल नहीं गलती है। इतना ही नहीं जूता दिखाने वाला वहां पत्रकार की भूमिका में पहुंचा था। पत्रकारों को भी वाम विचारधारा के नजदीक माना जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम से मैंने तो यह सोचा है कि किसी को  अगर जूता मारना होता है तो वह फेंक कर ही मार देता है उसे सीकर के युवक की तरह हाथ में लेकर खड़े होने की जरूरत क्या है। इससे साफ जाहिर होता है कि सीकर जिले के युवक  का मकसद जूता मारना या उछालना नहीं बल्कि दिखाना था। शेखावाटी में  इसी तरह जूता दिखाने का प्रचलन खूब है। शायद उसी से प्रेरित होकर उसने इस काम को अंजाम दिया। वैसे भी शेखावाटी के लोग मारने में कम डराकर काम निकलवाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। मसलन बच्चा शैतानी कर रहा होता है तो अभिभावक उसे थप्पड़ दिखाते हुए कहेंगे, देखा है ना, यह थप्पड़ एक पड़ेगा तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। बस थप्पड़ का डर असर कर जाता है और बच्चा शैतानी करना बंद कर देता है। इसी प्रकार मोहल्ले में या रास्ते में किसी को कुछ गड़बड़ करते देखकर बड़े बुजुर्ग इसे सजा के नाम पर डांटते हैं। वो कुछ ऐसे ही कहते हैं, बेटा, चुपचाप लाइन पर आ जा वरना यह जूता देखा है ना.. या यह लट्‌ठ देखा है ना....। मतलब आप समझ गए हैं कि शेखावाटी का आदमी किसी को मारेगा नहीं, बल्कि डराएगा।

Friday, June 10, 2011

समझदारी, पड़ गई भारी

कई बार जरूरत से ज्यादा बरती जाने वाले समझदारी भी भारी पड़ जाती है। सप्ताह भर पहले ही मैं एक घटना से दो चार हो चुका हूं। दो जून को दोपहर बाद मैं दिल्ली जाने के लिए बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर गाड़ी के इंतजार में खड़ा था। इतने में एक युवक दौड़ता हुआ आया और बोला भाईसाहब, दिल्ली जाने वाली ट्रेन कब आएगी। मैंने कहा कि मैं स्वयं भी उसी ट्रेन में जाऊंगा। इतना कहते ही वह वहीं  खड़ा हो गया और बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। हेमराज नामक इस शख्स ने  बताया कि वह कम्पनी के स्पेशल आपॅरेशन के चलते यहां आया था, वरना उसका काम काज तो जयपुर में ही चलता है। दादाजी का निधन होने के कारण वह वापस जयपुर लौट रहा है। हेमराज का गांव जयपुर जिले में शाहपुरा कस्बे के पास देवन है।
मेरे पास शयनयान श्रेणी का टिकट था जो कि कन्फर्म हो चुका था जबकि हेमराज के पास सामान्य डिब्बे का टिकट। बातों का सिलसिला शुरू होने के कारण हेमराज मुझसे खुल चुका था। जब तक गाड़ी स्टेशन पर आई हमने एक दूसरे से काफी बातें शेयर कर ली। मैं जब डिब्बे में चढ़ने लगा तो हेमराज बोला, भाईसाहब थोड़ी देर आपके पास बैठ जाऊं तो? मैंने कहा मुझे कोई आपत्ति नहीं है, आप शौक से बैठ जाओ लेकिन रात को अपना ठिकाना ढूंढ लेना। गाड़ी चलते ही हेमराज मेरी बगल में बैठ कर लम्बी-लम्बी डींगे हांकने लगा। बताने लगा कि वह रेलों में ऐसे ही यात्रा करता है और बाद में जुगाड़ से  सीट प्राप्त कर लेता हैं। वह बोला कि उसको कभी कोई दिक्कत नहीं आई, बस इस काम के लिए टीटी को कुछ सुविधा शुल्क जरूर दिया। मैं मन ही मन सोच रहा था कि यह अजीब शख्स है। मेरे से तो ऐसा काम कतई नहीं हो।
बिना टिकट यात्रा करने से मुझे कितना डर लगता है, इससे जुड़ी कुछ स्मृतियां मेरे जेहन में हैं। १९९९ में नवलगढ़ के पोदार कॉलेज में ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट का कोर्स करने के लिए मैं गांव के दो साथियों के साथ  नियमित रूप से अपडाउन करता था। हमारी कक्षाएं दोपहर से शुरू होती थीं, इस कारण रतनशहर से जयपुर जाने वाली रेल हमारी लिए उपयुक्त थी। मेरे दोनों साथी हमेशा बिना टिकट ही यात्रा करते थे, लेकिन मैं टिकट लेता था।  वे मुझे कहते कि डरो मत, कुछ नहीं होगा लेकिन मैं उनकी बातों को हमेशा अनसुना कर देता। बिना टिकट यात्रा करने के लिए मेरा दिल कभी गवाही नहीं देता था। इतना ही नहीं, मैं मेरे दोनों साथियों को भी टिकट लेने के लिए कहता लेकिन उन्होंने शायद ही मेरी बात को माना हो।
खैर, विषय हेमराज का चल रहा था। अतीत में जाने का मकसद इतना था कि जुगाड़ू प्रवृत्ति जो होती है वह बचपन से ही विकसित हो जाती है। शायद हेमराज भी मेरे गांव के उन दो युवकों की तरह ही रहा होगा। रफ्ता-रफ्ता वह बड़े जुगाड़ करना सीख गया होगा। मेरे जेहन में यह सवाल चल ही रहे थे कि अचानक डिब्बे में टीटी आ गया। मैंने हेमराज से कहा कि बात कर लो और अपनी सीट पक्की करो। हेमराज टीटी के पीछे हो लिया। थोड़ी देर में वापस आकर बोला कि टीटी ने इंतजार करने के लिए कहा है। गाड़ी अपनी रफ्तार पर दौड़ी जा रही थी और हेमराज अपनी काबिलियत के किस्से बड़े जोश के साथ सुना रहा था। संयोग से हमारे डिब्बे में जयपुर जिले का एक अन्य युवक मिल गया है। एक ही जिले के होने के कारण वे दोनों कुछ ज्यादा ही खुल गए।
थोड़ी देर बाद टीटी फिर आया तो मैंने हेमराज से कहा कि जाओ, शायद इस बार तुम्हारा काम हो जाएगा। मेरे कहते ही हेमराज जिस उत्साह के साथ उठकर गया था वापस लौटते समय वह उत्साह गायब था। चेहरे पर शिकन देख मैंने पूछ लिया, क्या बात हुई। बोला यार क्या बताऊं, टीटी ने मेरी टिकट देख ली। बस, सारा गुड़ गोबर हो गया। मैंने उत्सुकतावश पूछा क्यों? तो हेमराज बोला कि टीटी ने डिब्बा बदलने के लिए कहा है। मैंने कहा कि टीटी से थोड़ा गंभीरता के साथ बात करो शायद वह तुम्हारी मजबूरी समझ जाए। तीसरी बार हेमराज हिम्मत करके फिर टीटी के पास गया। करीब दस मिनट बाद वह माथे पर हाथ लगाए हुए लौटा। बिलकुल हताश, उदास एवं निराश। मैं उसके हावभाव देखकर समझ गया था कि कुछ न कुछ गड़बड़ तो जरूर हो गई है। थोड़ा टटोलने पर गरीबदास बनते हुए हेमराज बोला कि टीटी ने दो सौ रुपए तो सामान्य से शयनयान का टिकट बनाने के तथा ढाई सौ रुपए जुर्माना लगा दिया। कुल साढ़े चार सौ रुपए दे दिए लेकिन सीट फिर भी नहीं मिली। अपनत्व का भाव लाते हुए वह बोला यार, साढ़े चार सौ रुपए लग गए अब कम से आप बैठा तो लो। वह रात भर मेरी सीट पर बैठा रहा और टीटी को कोसता रहा। उसको जयपुर जल्दी पहुंचना था लिहाजा, वह आगरा में उतर गया। उतरते समय भी बड़बड़ाता हुआ ही निकला। मैं मन ही हेमराज पर मुस्कुरा रहा था तो खुद पर भी हंस रहा था। क्योंकि हम दोनों ने जो समझदारी बरती वह हम पर भारी पड़ चुकी थी। हेमराज की समझदारी तो आप पढ़ ही चुके हैं और मेरी इस संदर्भ में कि मैं बिलासपुर स्टेशन पर उससे इतनी आत्मीयता से मिला। हेमराज ने समझदारी की कीमत साढ़े चार सौ रुपए ज्यादा चुकाकर अदा की तो, मैंने टिकट होते हुए भी रात भर जागकर।

Wednesday, June 1, 2011

यादें... भूली-बिसरी...

मानव जीवन में किशोरावस्था से वयस्क होने तक का सफर सबसे महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यही वह काल होता है, जब जीवन की बुनियाद रखी जाती है। इस मोड़ पर जरा सी चूक जिंदगी भर की टीस दे जाती है। इस मामले में मैं खुशकिस्मत रहा हूं कि किशोरावस्था से जवान होने तथा फिर जॉब पाने तक का समय एक ऐसे कस्बे में बीता जो लम्बे समय से छोटी काशी के रूप में विख्यात रहा है। मेरा मतलब बगड़ कस्बे से है। झुंझुनूं-चिड़ावा मार्ग पर स्थित यह कस्बा लम्बे समय तक शिक्षानुरागी सेठों की बदौलत आस पड़ोस के राज्यों में चर्चित रहा है। यहां के शिक्षण संस्थानों से निकले होनहार विद्यार्थी समूचे देश में कस्बे की कीर्ति पताका फहरा रहे हैं। बदलते दौर में कड़ी प्रतिस्पर्धा तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद इस कस्बे ने अपनी साख कायम रखी है। यही कारण है कि शैक्षणिक सत्र के दौरान कस्बे की चहल-पहल देखते ही बनती है। तिराहे से लेकर बीएल चौक तथा तथा चौराहे से पीरामल गेट तक मेले जैसा माहौल नजर आता है। जाहिर है जब माहौल ही मेले जैसा होगा तो लोगों के चेहरों पर मुस्कान आना भी स्वाभाविक है। लेकिन गहमागहमी का दौर उस वक्त गायब सा हो जाता है, जब शैक्षणिक अवकाश का दौर शुरू होता है। उस वक्त कस्बे में सन्नाटा इस कदर फैल जाता है गोया कोई कर्फ्यू लगा हो। लब्बोलुआब यह है कि कस्बे की रौनक उसके शिक्षण संस्थानों से ही है।
लम्बे समय से शिक्षा में सिरमौर इस छोटी काशी में मैंने भी अध्ययन किया है। स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद भी तीन साल तक मैं नियमित रूप से बगड़ आता रहा। इस प्रकार सन १९९३ से २००० तक कुल सात साल तक मेरा बगड़ से नियमित जुड़ाव रहा है।  आज भी मेरे लिए बगड़ सर्वोपरि है। गांव के बाद अगर सर्वाधिक समय कहीं बीता है तो वह बगड़ ही है। वैसे बगड़ से मैं अकेला ही नहीं लगभग पूरा परिवार ही जुड़ा हुआ है। सर्वप्रथम पापाजी बगड़ आए। वे एफसीआई में थे। इसके बाद सबसे बडे़ भाईसाहब ने बगड़ से ही बीएड किया। फिर उनसे छोटे भाईसाहब ने ९ से लेकर १२वीं की शिक्षा यहीं पर ग्रहण की। सबसे बाद में मेरा नम्बर आया। मैंने यहां ११वीं में प्रवेश लिया तथा स्नातक की डिग्री भी कस्बे के ही एक कॉलेज से हासिल की। बगड़ मेरे लिए इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि मेरे गांव से जिला मुख्यालय जाने का रास्ता यहीं से गुजरता है। मेरे समय में आज की तरह स्कूल बसों का प्रचलन नहीं था, लिहाजा, सुबह की पारी में गांव से बगड़ तक का करीब १५ किलोमीटर तक का सफर पैदल ही करना पड़ना था। दो साल तक मैं अपने गांव से बगड़ पैदल आया हूं।
अब भी मैं बगड़ से दूर नहीं हूं। बगड़ से जुड़ी यादें, यहां के लोग तथा छात्र जीवन की तमाम बातें मेरे जेहन में आज भी जवां हैं। भला बगड़ में ऐसा कौन है, जिसे मैं नहीं जानता। अब भी समय मिलता है तो बगड़ चला जाता हूं लेकिन अब वहां जाने की भूमिका कुछ बदल सी गई है। छात्र जीवन के साथियों से बातें और मुलाकातें अब भी होती हैं लेकिन पेशेगत मजबूरियों के कारण उन्होंने मर्यादाओं का लबादा ओढ़ लिया है। इसी पेशेगत मजबूरी ने मेरे एवं परिचितों के बीच एक दायरा भी बना दिया है। जिसे चाहकर भी कम नहीं किया जा सकता है। बहरहाल, बगड़ की यादें मेरी लिए किसी धरोहर से कम नहीं। विशेष रूप से उस वक्त तिराहे बस स्टैण्ड पर स्थित  सैनी जी तथा बीएल चौक पर मुरारी जी की दुकानों की चाय का स्वाद आज भी याद है। सैनी जी की दुकान तो शायद बंद हो चुकी है लेकिन मुरारी जी की दुकान अभी चल रही है। कभी मौका मिला तो वहां की चाय की चुस्कियों के साथ एक बार अतीत की यादों को जीभर के जी लूंगा।

Tuesday, May 31, 2011

... तम्बाकू छोड़ दी मैंने


आज विश्व तम्बाकू निषेध दिवस है। समूचे विश्व में आज के दिन धूम्रपान से होने वाले खतरों की भयावहता से अवगत कराया जाएगा। रैलियां निकाली जाएंगी और कई तरह के जाग्रति विषयक कार्यक्रम होंगे। सच में धूम्रपान और उससे बढ़ते खतरे वर्तमान में न केवल वैश्विक समस्या है बल्कि चिकित्सकों एवं विज्ञान जगत के लिए चुनौती भी। रोज नए-नए मर्ज पैदा हो रहे हैं। लाइलाज रोगों की फेहरिस्त बढ़ रही है। बावजूद इसके तम्बाकू का कारोबार भी खूब फल-फूल रहा है। इतनी भूमिका बांधने के पीछे मेरा मकसद यह है लम्बे समय तक मैं स्वयं भी धूम्रपान का आदी रहा हूं। मैं तम्बाकू और गुटखे दोनों का सेवन करता था। सेवन भी इस कदर कि हर पल मुंह में कुछ ना कुछ होता ही था। रोजाना दो पाउच खैनी के तथा औसतन दस-बारह पाउच गुटखे के मैं खा जाता था। अब एक और सच जिसे मैं आज पहली बार सार्वजनिक कर रहा हूं, वह यह है कि यह दोनों ही लत मुझे परिवार के माध्यम से लगी। पापाजी खैनी खाते हैं। बचपन में मोहल्ले के सारे बच्चे एकत्रित होकर उनके पास पहुंच जाते और उत्सुकता एवं जिज्ञासवश उनसे खैनी मांगने लग जाते। उन बच्चों में मैं भी शामिल था। शौक कब लत में तब्दील हुआ पता ही नहीं चला और मैं खैनी का सेवन करने लग गया। यह बात १९८२-८३ की है। इसके बाद गुटखे की लत मुझे १९८९ में लगी। यह लत भी बडे़ भाईसाहब को देखकर लगी। बीच में १९९९ में मैंने खैनी का सेवन सात माह तक बंद किया लेकिन इस दौरान पान खाने की आदत लग गई। दिन भर पान मुंह में दबा ही रहता था। पांच या छह पान रोजाना। पान खाना महंगा सौदा था, इस कारण  वापस खैनी और गुटखे पर लौट आया। एक दिन मन में ख्याल आया कि क्यों न गुटखा छोड़ दिया जाए। बस तत्काल  दृढ़ निश्चय किया और ७ मार्च २००४ को गुटखे का सेवन बंद कर दिया। मतलब १५ साल पुरानी लत एक झटके साथ छोड़ दी। उस दिन के बाद मैंने आज तक किसी तरह के पान मसाले का प्रयोग नहीं किया है। हां, अवसर विशेष पर ेकभी-कभार सादा पान जरूर खा लिया लेकिन गुटखे से सदा के लिए तौबा कर ली। अब बात खैनी की। सन्‌ २००४ में शादी के बाद मेरी धर्मपत्नी खैनी के संबंध में अक्सर मुझे टोकती रहती लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। २२ जून २००७ को शादी के वर्षगांठ के दिन धर्मपत्नी ने कहा कि अगर मैं खैनी छोड़ दूं तो वह उसके लिए सबसे बड़ा तोहफा होगा। इस पर मैंने उससे वादा किया कि शादी की अगली वर्षगांठ पर खैनी छोड़ दूंगा। आखिरकार २२ जून २००८ को मैंने खैनी छोड़ दी। करीब २७-२८ साल की लत से पलक झपकते ही छुटकारा पा लिया। यह और बात है कि इसके बाद सुबह उठते ही, चाय पीते ही  या फिर खाना खाने के बाद खैनी की जोरदार तलब जगती। मैंने इसका वैकल्पिक उपाय निकाला और बाजार से सौंफ खरीद लाया। करीब एक माह तक मैंने सौंफ का प्रयोग किया, इसके बाद सौंफ खाना भी बंद कर दिया। इस सारी कहानी का लब्बोलुआब यह रहा है कि मेरी धर्मपत्नी जो कि मुझसे उखड़ी-उखड़ी रहती थी, प्यार से पेश आने लगी। मैं दोनों वक्त सिर्फ चार-चार चपाती ही खा पाता था, क्योंकि भूख महसूस नहीं होती थी। खैनी छोड़ने के बाद भूख महसूस होने लगी और चपातियों की संख्या में इजाफा होने लगा। सबसे बड़ा फायदा तो यह हुआ कि मेरा वजन करीब दस-बारह किलो बढ़ गया। वजन का जिक्र इसलिए क्योंकि वह लम्बे समय तक ५४ से ५८ के बीच ही रहा। सर्दी में ५८ और गर्मियों में वापस ५४। यह सिलसिला अब टूट गया है। यह कॉलम लिखने का मकसद महज इतना है कि दृढ़ निश्चय के साथ हम कोई निर्णय लें तो उसके परिणाम सकारात्मक ही आते हैं। हां, व्यसन छोड़ने के निश्चय या प्रतिज्ञा के पीछे कोई कहानी है तो यह मजा दुगुना हो जाएगा। आखिर में एक बात और बीड़ी और सिगरेट का सेवन तो मेरे पूरे परिवार में ही कोई नहीं करता है।

Monday, May 30, 2011

मेरा बचपन...७

मैं समझ रहा हूं और भली भांति जान भी रहा हूं कि यह कॉलम लम्बा होता जा रहा है लेकिन यादों को जब याद करने लगा तो सिलसिला थम ही नहीं रहा है। मुझे यह भी पता है कि एक अनजान व्यक्ति को इस कालम को पढ़ने में कतई दिलचस्पी नहीं होगी। होगी भी क्यों। इसे केवल वही व्यक्ति पढ़ेगा जो मेरा रिश्तेदार है या मेरा परिचित। आखिरकार पढ़ने में मजा भी उन्हीं लोगों को आएगा जो मुझे व्यक्तिशः जानते हैं। अभी तक मैं आप लोगों को अपने जन्म से लेकर १९९० तक की प्रमुख यादों से अवगत करा चुका हूं। बावजूद इसके मुझे लगता है कि एक बात और है जो आप सभी लोगों से शेयर करनी चाहिए हालांकि उसका हल्का सा जिक्र  मैं अपनी प्रोफाइल में कर चुका हूं। बचपन से मुझे दो चीजों का शोक लग गया था। टीवी देखने का और क्रिकेट खेलने का। वैसे मेरे गांव में टीवी १९८४ के आसपास आया।  वो भी केवल ऐसे लोगों के घर में लगा था जो बाहर नौकरी करते थे और छुटि्‌टयों में गांव आया करते थे। गांव के सारे बच्चे फिल्म देखने उस घर में जबरदस्ती घुस जाया करते थे। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि हमको घर से धक्के देकर निकाल दिया लेकिन हम ढीठ बने रहते। वैसे टीवी १९८१-८२ में पालम में मामाजी के यहां देख लिया था लेकिन वहां से आने के बाद गांव में कहां देखता। स्कूल के पास एक घर में शारजाह क्रिकेट कप को देखने के लिए टीवी लगाया गया। मैं स्कूल की आधी छुट्‌टी के दौरान टीवी देखने जाता। मन में डर भी रहता कि कहीं झिड़की मारकर बाहर नहीं निकाल दें लेकिन संयोग से क्रिकेट मैच के दौरान ऐसा नहीं हुआ। १९८७-८८ के आते-आते गांव में करीब दस-पन्द्रह घरों में टीवी हो गया था। लिहाजा, मेरे साथियों को अब कोई दिक्कत नहीं थी। हमारे पास विकल्प होता था कि वह मना करेगा तो दूसरे के घर चल देंगे। बचपन में देखे सीरियल, बुनियाद, इंतजार, निर्मला, जीवन रेखा, कहकशा, कमशमश आदि मुझे आज भी याद है। इसके बाद रामायण का दौर आया। उसको देखने के लिए तो एक तरह का जुनून सा सवार हो जाता था। टीवी देखते-देखते  मुझे फिल्मों का भी चस्का लग चुका था। ग्रामीण पृष्ठभूमि में किसी प्रकार के आयोजन में वीडियो दिखाने का प्रचलन उस वक्त कुछ ज्यादा ही था। वीसीआर को टीवी के साथ संलग्न कर फिल्म देखी जाती थी। गांव के आस-पड़ोस के करीब ५-६ किलोमीटर के इलाके में जब भी कोई वीडियो आता मैं चला जाता। यह अलग बात है कि मैं वहां जाते ही पहली फिल्म भी नहीं देख पाता और नींद के आगोश में समा जाता। सुबह होने के बाद मिट्‌टी से सने अपने शरीर को झाड़ कर चुपचाप घर आ जाता। इस काम के लिए मुझे घरवालों की कई बार डांट भी खानी पड़ी। क्रिकेट की कहानी तो किशोरावस्था में ज्यादा परवान चढ़ी हालांकि इसका बीजारोपण भी स्कूली जीवन में ही हो गया था। दसवीं पास करने से पहले तक पापाजी से अजमेर से दो-तीन बैट मंगवाकर तोड़ चुका था या यूं कहूं कि दोस्तों से तुड़वा चुका था। फिल्मों का जुनून ऐसा था कि मैं उनके नाम बाकायदा एक डायरी में लिखता था। वह डायरी घर पर आज भी सुरक्षित रखी हुर्इ है। आज न तो फिल्म देखने के लिए समय है और ना ही इच्छा होती है। बस बचपन की फिल्मों से जुड़ी यादों को जरूर याद कर लेता हूं। वैसे फिल्म देखने का सिलसिला १९९४ तक चला। इसके बाद शौक फिल्म की बजाय क्रिकेट की तरफ परिवर्तित हो गया, जो वर्तमान तक बरकरार है।

मेरा बचपन...६

मेरी बचपन की यादों में दो ऐसे झूठ भी शामिल हैं, जिनमें एक पर मैं आज भी शर्मिन्दा हूं जबकि दूसरे पर हंसी आती है। जिस पर शर्मिन्दा हूं वह कक्षा पांच का है जबकि हंसी वाला नवमीं का है। कक्षा पांच में मुझे एक बार खुद के हस्ताक्षर करने का शौक सवार हो गया। शौक क्या बस आप इसे जुनून की संज्ञा दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। जहां भी जगह मिले मैं अपना ऑटोग्राफ दे दूं। मसलन, दीवार, किताब, किवाड़, फर्श आदि एक भी जगह नहीं छोड़ी। इसी आदत से मजबूर होकर मैंने अपनी नोटबुक के कोरे पन्नों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कर दी। उपस्थिति भी किसी ऐसी वैसी नोटबुक में नहीं बल्कि हिन्दी की में। हिन्दी का जिक्र इसलिए, क्योंकि वह मेरा पंसदीदा विषय रही और है। एक दिन होमवर्क की जांच करते समय मास्टरजी की नजर आगे के पन्नों पर पड़ गई। बस फिर क्या था उन्होंने कड़क आवाज में मेरा नाम पुकारा। मेरी सिटी-पिटी गुम। मैं चुपचाप खड़ा हो गया। मास्टरजी ने हस्ताक्षरों की कहानी पूछी तो मैंने कहा कि यह सब छोटे भाई ने किया है जबकि मेरा कोई छोटा भाई नहीं है। घर में सबसे छोटा मैं ही हूं। मेरा जवाब सुनकर पास ही बैठी एक छात्रा ने कहा कि मास्टरजी यह झूठ बोल रहा है, इसके छोटा भाई कोई नहीं है। बस फिर क्या था। मास्टरजी एक डंडा लेकर बरस पड़े मुझ पर। और तब तक मारते रहे जब तक डंडा टूट नहीं गया। उस घटना के बाद मेरे समझ में आ गया था कि झूठ बोलने का नतीजा क्या होता है। यह बात मुझे आज भी याद आती है तो मैं शर्मिन्दा हो जाता हूं। दूसरा झूठ कक्षा नौ है। उस वक्त मैं थोड़ा समझदार हो गया था। आठवीं उत्तीर्ण करने के बाद पास के कस्बे में आया था इसलिए कस्बाई संस्कृति में इतना रच-बस गया कि कक्षा से बंक मारने की लत कब लग गई पता ही नहीं चला। जब भी मौका मिलता कक्षा से भाग छूटता। एक दिन जैसे ही बंक मारकर कक्षा से निकला तो सामने से स्कूल के सबसे खतरनाक अध्यापक आ रहे थे। उन अध्यापक से स्कूल का प्रत्येक बच्चा थर-थर कांपता था। मैं भी घबरा गया और सोचने लगा कि अब तो मारा गया। कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। मेरे साथ मेरा एक सहपाठी और था। हालांकि अध्यापक थोड़ी दूरी पर थे इस कारण हम उनकी नजरों में नहीं आए लेकिन रास्ता एक ही था। वो स्कूल की तरफ आ रहे थे और हम जा रहे थे। दूरी कम होती जा रही थी और धड़कन बढ़ रही थी। अचानक एक दरवाजा खुला दिखाई दिया और हम दोनों उसमें घुस गए। वह दरवाजा दरअसल किसी मोहल्ले का था इसलिए हम आगे बढ़ते गए। रास्ते में एक मुस्लिम महिला ने हमको टोक दिया। उसने एक मुस्लिम सज्जन का नाम लेते हुए पूछा कि आप उनके बच्चे हैं क्या? मरते क्या ना करते हमने स्वीकृति में सिर हिलाया और आगे बढ़ गए। अगर उस वक्त मना कर देते तो शायद अध्यापक से भी बुरी गत उस मोहल्ले के लोग बना देते। मोहल्ले में घूमकर जब हम वापस दरवाजे तक आए तब तक अध्यापक स्कूल में प्रवेश कर चुके थे। आज वह घटना याद आती है तो मेरी हंसी रोके हुए भी नहीं रुकती है। यह घटनाक्रम मैं मेरे साथियों को भी अक्सर सुनाता रहता हूं।

मेरा बचपन...५

बचपन की यादों की जो श्रृंखला चल रही है उसमें अब मेरे स्कूली जीवन से जुड़ी कुछ यादें हैं। स्कूली जीवन में काफी कुछ हुआ जो मुझे याद है। मुझे यह भी याद है कि स्कूल में २६ जनवरी के समारोह में मैंने पहली बार एक कविता सुनाई थी। उस समय मैं पहली कक्षा में था। कविता के बोल थे, एक-एक कर ईंटें जोड़ो तो तुम महल बना दोगे...। इसके बाद हर साल २६ जनवरी एवं १५ अगस्त पर प्रस्तुति देने का एक सिलसिला चल पड़ा जो  कॉलेज लाइफ तक जारी रहा। शायद यही एकमात्र कारण रहा कि मुझे स्टेज पर जाने तथा वहां जाकर कुछ बोलने में कभी हिचकिचाहट नहीं हुई। वैसे कक्षा प्रथम से लेकर आठवीं तक मैंने प्रार्थना भी की है। स्कूल में मेरे एक और साथी एक थे मैं और वो दोनों आगे-आगे बोलते और सारे विद्यार्थी हमारा अनुसरण करते। १९८२ से लेकर १९८९ तक गांव के स्कूल में ही आठवीं तक अध्ययन किया। हां इस दौरान स्कूल में अंताक्षरी का बड़ा क्रेज था। बात चाहे अंग्रेजी की हो या फिर हिन्दी की। मैं अकेला ही पूरी स्कूल को हरा देता था। मेरी काबिलियत को देखते हुए अध्यापक मुझे एक-एक कक्षा में बारी-बारी से भेजते थे तथा मैं पूरी कक्षा को पराजित करके ही दम लेता था। एक बार पड़ोसी गांव के स्कूल के चार विद्यार्थियों की टोली हमारे विद्यालय में अंताक्षरी के मकसद से आई। उन विद्यार्थियों ने बड़ी अच्छी तैयारी की थी और सभी ने रामायण के दोहे कंठस्थ कर रखे थे। उस दौरान जो हुआ वह आज भी याद है अंताक्षरी के प्रत्युत्तर में मैं ऐसा खड़ा हुआ कि फिर बैठा ही नहीं। लगातार मैं ही दोहे सुनाता रहा। आखिरकार विजय हमारी ही हुई। स्कूल का एक और महत्त्वपूर्ण वाकया है उस वक्त मैं कक्षा चार का विद्यार्थी था। इतिहास के अध्यापक उस वक्त पाठ स्वयं ने पढाकर विद्यार्थियों से पढ़वाया करते थे। कक्षा चार में सामाजिक ज्ञान की पुस्तक में अलाउद्‌दीन खिलजी से संबंधित पाठ पढ़ रहा था। अचानक मेरे चारों तरफ अंधेरा छा गया और मैं चक्कर गिर गया। किताब हाथ से छूटकर दूर जा गिरी। यकायक हुए इस घटनाक्रम से क्लास में हड़कम्प मच गया। बाद में सहयोगी साथी मुझे पीठ पर बैठाकर प्रधानाध्यापक कक्ष तक ले गया। वहां एक लम्बी बैंच पर मुझे लिटा दिया गया। सामान्य होने के बाद मुझे ठण्डा पानी पिलाया गया। वैसा चक्कर मुझे बाद में कभी नहीं आया लेकिन उसे याद करने के बाद आज भी हल्की सी सिहरन दौड़ जाती है।  कहने को स्कूल की यादों में बहुत सी बातें हैं। हां एक बात और अध्यापक क्लास में सवाल पूछते थे। सही जवाब न देने वालों को वे स्वयं दण्डित नहीं करते बल्कि जो छात्र सही जवाब देता वह बारी-बारी सबके एक-एक थप्पड़ मारता था। मैंने शायद ही कभी थप्पड़ खाए हों लेकिन थप्पड़ मारे खूब। मैं क्लास में सबसे छोटा था। उम्र में भी और कद में भी। घर में आठवीं कक्षा का एक ग्रुप फोटो आज भी टंगा है, जिसमें सहपाठियों ने प्रधानाध्यापक को सेवानिवृत्ति पर विदाई दी थी। वह फोटो देखकर बरबस मेरी हंसी छूट जाती है। जैसा मैंने बताया मैं फोटो में सबसे अलग एवं सबसे छोटा दिखाई देता हूं। सच में वे भी क्या दिन थे।

मेरा बचपन...४

अभी यह कॉलम लिख ही रहा था कि मेल पर एक शुभचिंतक का मैसेज आया, कहा आप समसामयिक विषय पर अच्छा लिखते हो, उस पर भी लिखा करो। मुझे यह जानकार खुशी हुई कि किसे ने मुझे क्या लिखना है इसके लिए अपना सुझाव दिया। निकट भविष्य में मैं इस सुझाव पर अमल भी करुंगा। फिलहाल परिस्थितियोंवश ही ऐसा लिख रहा हूं। मुझे मालूम है कि अच्छे लेख के कद्रदान भी खूब होते हैं।  कद्रदानों के माध्यम से ही निरंतर कुछ न कुछ लिखने का सम्बल मिलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रशंसकों के सुझाव और शिकायत एक तरह की खाद है, जो एक लेखक को निरंतर चाहिए। क्योंकि इस खाद के कारण ही आगे से आगे कुछ नया लिखने की प्रेरणा मिलती रहती है। मेरा साथ भी कुछ ऐसा ही है। अखबारी जगत में लिखने पर प्रतिक्रिया ब्लॉग की बजाय जल्दी होती है और बड़े स्तर पर होती है। हालांकि अखबार एवं ब्लॉग की प्रतिक्रिया में खासा अंतर  होता है। सीधे एवं सपाट शब्दों में समझें तो दोनों विधाओं में प्रतिक्रिया व्यक्त करने का माध्यम ही अलग होता है। ब्लॉग की विधा में मैं नया हूं और आज दूसरा दिन ही है।
खैर, यह विषय काफी लम्बा है। मैं मूल विषय पर लौटता हूं। मेरे बचपन की यादों की फेहरिस्त वैसे तो बेहद लम्बी है, इसलिए मैंने उसमें कुछ चुनिंदा यादों को शब्दों के माध्यम से सहेजने का एक अदना सा प्रयास किया है। मेरी यह याद भी आज से करीब ३० साल पहले की है जब मैं मात्र पांच साल का था। माताजी के साथ मैं अपने मामाजी की बेटी जो कि जयपुर में रहती हैं, के पास गया था। वे उस समय खातीपुरा में रहती थी। मुझे याद है कि उस वक्त खातीपुरा फाटक से आगे कोई भी मकान या बसावट दिखाई नहीं देती थी। बस इक्का-दुक्का घर ही दिखाई देते थे। मामाजी की बेटी यानि दीदी का घर खातीपुरा फाटक से भी दिखाई दे जाता था उस वक्त। एक दिन दीदी के तीनों बच्चों के साथ हम सब ने जयपुर भ्रमण का कार्यक्रम तय किया। सिटी पैलेस देखने के बाद हम आमेर चले गए। वहां किले को देखते समय मैं परिवार वालों से बिछड़ गया। बिछड़ा भी ऐसा कि मुझे परिवार के सभी लोग नीचे की मंजिल पर जाते हुए दिखाई दे रहे थे लेकिन उनके पास पहुंचने का मुझे कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया। इतने में अलवर से आए एक परिवार के सदस्यों ने मुझे ढांढस बंधाया। उन्होंने जोर से आवाज लगाकर दीदी को ऊपर बुलाया। दीदी गुस्से में तमतमाती हुई आई और एक थप्पड़ मेरे गाल पर जड़ दिया और बोली किधर मुंह फाड़ रहा है। उसके बाद मैं चुपचाप घर वालों के साथ हो लिया। आमेर भ्रमण के बाद जब वापस लौट रहे थे तब अलवर वाले लोग फिर मिल गए और कहा बेटा अब तो घरवाले मिल गए ना। मैं मन ही मन सोच रहा था मिले हुए तो थे बस थोड़े दूर हो गए थे। उसी दूरी की कीमत मैंने चुकाई एक थप्पड़ खाकर। बहरहाल, आज भी जयपुर दीदी के यहां कभी जाना होता है तो उस थप्पड़ की चर्चा जरूर होती है।

मेरा बचपन...३

बचपन की यादों को शब्दों में पिरोने का सिलसिला  एक बार शुरू क्या किया यादें यकायक फ्लेशबैक की मानिंद मानस पटल में फिर से जिंदा हो गई हैं। यह याद भी उसी समय की है जब मामाजी की बेटी की शादी हुई थी। शादी पूर्ण होने के बाद हम सभी लोग वापस गांव लौट रहे थे। साथ में ताऊजी, मौसीजी, माताजी एवं बड़ी बहन थे। हरियाणा के रेवाड़ी जंक्शन पर जल्दबाजी में ताऊजी, मौसीजी एवं बड़ी बहन तो टे्रन में सवार हो गए लेकिन मैं और माताजी नहीं चढ़ पाए। हम दोनों के साथ और कोर्इ नहीं था।  हमें यह भी पता नहीं कि लोहारू कौनसी ट्रेन जाएगी। इतने में एक दम्पती मिला, जिनको सतनाली कस्बे तक आना था। एक ही रूट के यात्री मिलने से कुछ राहत मिली। अब हम चार लोग हो गए। इतने में ही प्लेटफार्म पर ट्रेन आई और हम सब उसमें सवार हो गए। थोड़ी देर बाद ट्रेन रवाना हो गई। देखते-देखते उसने रफ्तार पकड़ ली। इतने में ही वे सज्जन जिनको सतनाली आना था जोर से चिल्लाए, अरे, यह ट्रेन तो बांदीकुई जाएगी। हम तो गलत ट्रेन में चढ़ गए।
अब क्या हो। तत्काल आइडिया आया और उन्होंने जंजीर खींच ली। ट्रेन की रफ्तार कम होती उससे पहले ही मैं प्लेटफार्म की दूसरी साइड में कूद गया। मैंने सोचा कि मैं ट्रेन रुकने से वापस प्लेटफार्म पर पहुंच जाऊंगा। ट्रेन की गति तेज थी, लिहाजा कूदते ही मैं गिर गया। कुछ देर तो वहीं रुका, तब तक माताजी और वो दम्पती चिल्लाते रहे। धीरे-धीरे गाड़ी आगे जाकर रुकी लेकिन तब तक वह मेरी नजरों से ओझल हो चुकी थी। अनिष्ट की आशंका में मैं रुंआसा होकर वापस गाड़ी की दिशा में दौड़ पड़ा। थोड़ा दौड़ने के बाद ट्रेन और इसके बाद माताजी दिखाई दी। वे हाथ हिलाकर जोर- जोर से चिल्ला रही थी। मैं दौड़ते-दौड़ते रोने लगा। आखिरकार ट्रेन के पास पहुंच गया। जंजीर खींचने के कारण ट्रेन रुक चुकी थी। सतनाली जाने वाले अंकल ने मेरा पकड़ कर मुझे वापस डिब्बे में खींचा और जोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर रसीद कर दिया। मैं गलती में था, इसलिए प्रत्युत्तर में मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। बाद में दूसरी साइड में उतर कर हम प्लेटफार्म तक पहुंचे। बाद में शाम को दूसरी ट्रेन से लोहारू पहुंचे। चलती ट्रेन से कूदने का वह मंजर आज भी मेरे आंखों के सामने आता है तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। पता नहीं किस अदृश्य शक्ति के चलते मैं सकुशल घर पहुंच पाया। हां, इतना जरूर है जिसके भी सामने इस घटना का जिक्र किया तो बदले में मुझे डांट ही सुनने को मिली। शायद मेरा वो फैसला ही कुछ ऐसा था।

मेरा बचपन..२

यह याद भी कमोबेश उसी समय की है जब मेरी उम्र पांच-साढ़े पांच रही होगी। मामाजी की बड़ी बेटी की शादी में मैं माताजी के साथ पालम, दिल्ली गया था। वैसे मेरा ननिहाल हरियाणा में भिवानी के पास है लेकिन मामाजी  अपनी नौकरी के चलते पालम में ही शिफ्ट हो गए थे। इस कारण उन्होंने शादी भी वहीं पर करने का निर्णय किया था। बचपन में अपनी चंचलता, चपलता एवं हाजिरजवाबी के कारण मैं हर किसी का ध्यान अपनी तरफ खींच लेता था। एक सबसे बड़ा शौक जो बचपन से था वह आज भी है। अंतर केवल इतना आया है कि तब में जोर-जोर से गाता था और अब केवल गुनगुना लेता हूं, लेकिन संगीत का शौक रग-रग में समाया है। बचपन में गाता था इसलिए भी लोग मुझसे प्रभावित होते थे। वे प्यार से मुझसे एक गाने की गुजारिश करते और जैसा मुझे याद था मैं गा देता था। बिना किसी संकोच के एकदम बिंदास होकर। तो ऐसी ही दो-चार खासियतों के चलते मैं जल्द ही बड़ों को अपना बना लेता था। एक और खासियत जो आज भी कायम है, बिना किसी झिझक के अजनबी के साथ भी परिचय कर लेना। खैर, बात शादी की चल रही थी। भूमिका बांधना इसलिए जरूरी था कि क्योंकि सारा घटनाक्रम मेरी इन्हीं खासियतों की चलते ही हुआ था। मेरे एक दूसरे मामाजी भी पालम ही शिफ्ट हो गए थे।  उनका सबसे छोटा बेटा जो कि उम्र में मेरे से कुछ बड़ा है, मैं दिन भर उसके साथ खेलता। ननिहाल पक्ष का कोई भी व्यक्ति मुझको गोद में लेकर गाने को कहता तो मैं निसंकोच गा देता। अल्पसमय में ही मैं सबका प्रिय बन गया था। शायद यही कारण था कि सब मुझ पर विश्वास करने लगे थे। मेरी इसी खूबी का फायदा मेरे मामाजी के बेटे ने उठाया। उसने एक दिन शाम को गेंदे का फूल मुझे दिया और कहा कि इस फूल में सुगंध बहुत अच्छी आ रही है। आप इसको सभी को सुंघा दो। मैं स्वभावतः भोला होने के कारण उसकी बातों में सहज ही आ गया। मुझे नहीं मालूम था कि फूल सुंघाने के पीछे क्या राज है और ना ही मैंने फूल सूंघ कर देखा। अब मैं बारी-बारी से सबके पास गया और सबको फूल सुंघा आया।  इसी दौरान सभी जोर-जोर से छींकने लगे। छींकने का राज समझ आया तो मेरे पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई लेकिन आज उस घटनाक्रम को याद करता हूं तो मुस्कुराए बिना नहीं रहता। दरअसल, मामाजी के बेटे ने उस फूल में लाल पिसी हुई मिर्ची डाल दी थी। इस कारण जिसने भी फूल  सूंघा वह छींकने लगा। लगभग वैसी ही खूबियां मेरे छोटे बेटे एकलव्य में है। वह भी बिंदास एवं मस्तमौला है  बिलकुल मेरी तरह। उसे देखकर मेरा बचपन फिर जवान हो उठता है।

मेरा बचपन...१

हो सकता है इस ब्लॉग का शीर्षक पढ़कर आप चौंक जाएं और सोचें भला यह भी कोई विषय है। आप सोचते रहें लेकिन अपने को इस विषय पर लिखना है। लिखना इसलिए भी है कि बचपन की यादें सभी के लिए खास होती हैं। मेरे लिए भी हैं। मैं यहां जिन यादों का जिक्र कर रहा हूं वे सभी स्कूल में प्रवेश लेने से पहले की हैं। मतलब उस समय मैं यही कोई चार-पांच साल का था उस दौरान के यह सभी वाकये हैं। मेरी प्रारंभिक शिक्षा मेरे गांव के ही सरकारी स्कूल में ही हुई है। बचपन की यादों की रूप में वैसे तो मुझे कई घटनाएं याद हैं लेकिन विशेष रूप से मैं उन खास घटनाओं का जिक्र करना उचित समझूंगा जो कि अलग-अलग स्थानों से संबंधित हैं और कुछ अनूठी भी हैं।
शुरुआत ख्वाजा साहब की नगरी अजमेर से करता हूं। पापाजी यहीं पर नौकरी करते थे। परिवार सारा गांव ही रहता था, बस पापाजी माह में एक बार गांव आते थे। एक बार मैं जिद करके पापाजी के साथ अजमेर आ गया। अधिकतर बार तो पापाजी के साथ उनके कार्यालय चला जाता। आखिरकार एक दिन उन्होंने कहा कि तू पड़ोस में स्कूल है उसमें चला जा। पापाजी के कहने पर मैं पड़ोस के स्कूल में चला गया। यह इलाका सुभाष नगर कहलाता है। यहां पास से ही रेलवे लाइन गुजरती है और उसी के पास स्थित था वह सरकारी स्कूल। मैं बिना प्रवेश लिए ही उस स्कूल में जाने लग गया। माहौल अपने अनुकूल देखा तो यह क्रम लगातार हो गया,  हालांकि इस स्कूल में मैं ज्यादा नहीं गया लेकिन जब भी गया उछलकूद और मौजमस्ती ही ज्यादा की। आखिरकार बचपन में अच्छे-बुरे का कहां ख्याल होता है, वह तो निर्दोष होता है। एक दिन पता नहीं मुझे एवं मेरे हमउम्र साथियों को क्या सूझी और हम सब रेलवे लाइन के पास एकत्रित हो गए। वैसे यह काम हम रोज ही करते थे। वहां से गुजरने वाली मालगाड़ियों के गार्ड को हम हाथ हिलाकर टाटा करते थे और प्रत्युत्तर में गार्ड भी हाथ हिला देते थे।  हां, तो मैं कह रहा था कि एक दिन में हम रेलवे लाइन के पास एकत्रित हो गए और सभी ने लाइन के पास पड़े पत्थरों को उठा लिया। इतने में एक मालगाड़ी वहां से गुजरी और हम सब ने उस पर पत्थरों से बौछार कर दी। बच्चों की यह कारस्तानी देखकर आखिरकार मालगाड़ी को आपात परिस्थितियों में रोक दिया गया।  गार्ड अंकल नीचे आए। हम सब लोग वहीं खड़े थे लेकिन काफी सहमे हुए थे। गार्ड ने आते ही हम सब को प्यार से समझाया और भविष्य में कभी ऐसा न करने के लिए कहा। यह बचपन की उसी सीख का कमाल था कि मैंने आज तक कभी कोई गलत काम नहीं किया। मेरा कोई साथी अगर करता भी है तो मैं उसे डांट देता। मैंने यह बार डांटा भी है। यह क्रम आज भी बरकरार है। वास्तव में उस घटना का मेरे जीवन में काफी गहरा असर पड़ा। कहा भी गया है कि बचपन कच्ची मिट्‌टी के समान होता है। उसमें बच्चे को हम जैसी शिक्षा एवं मार्गदर्शन देंगे वह उसी के हिसाब से ढल जाएगा। शायद यह उन अजनबी गार्ड अंकल की सीख का ही कमाल है कि आज तक इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति नहीं हुई है और ना ही ताउम्र होगी।