Friday, August 31, 2012

...ताकि कष्टप्रद ना हो अंतिम सफर

जो आया है, वह एक दिन जाएगा। यही जिंदगी की कड़वी हकीकत है। बावजूद इसके लोग इस हकीकत को दरकिनार करने से बाज नहीं आते। स्वतंत्रता सेनानी बालाराम जोशी के अंतिम संस्कार से पहले जब उनकी अंतिम यात्रा दुर्ग की शिवनाथ मुक्तिधाम की इस टूटी-फूटी सड़क से होकर गुजरी तो विकास के नारे बेमानी से लगे। अंतिम यात्रा में शामिल लोगों को यह तो यकीन हो गया कि मुक्तिधाम की यह सड़क भी ऐसे ही लोगों ने बनाई है, जिन्होंने अपना जमीर बेचकर जिंदगी के इस सच को नजरअंदाज किया। सड़क पर बने बड़े-बड़े गड्‌ढ़े और उनमें भरा कीचड़ यह बताने के लिए काफी है कि इसके निर्माण में किस तरह की गफलत की गई है। कितनी दिक्कत होती है यहां से गुजरने वालों को। अकेले आदमी को भी एहतियातन यहां से गुजरते हुए सावधानी बरतनी पड़ती है। अर्थी लेकर चलने वाले कैसे गुजरते होंगे यहां से, समझा जा सकता है। इसके लिए जिम्मेदार सिर्फ शासन-प्रशासन एवं जनप्रतिनिधि ही नहीं है। हम सब भी हैं। ऐसे हालात क्यों बने, हम कभी सोचते नहीं हैं। हम केवल उसी वक्त व्यवस्था को कोसते हैं, जब इस मार्ग से गुजरते हैं। हमको तकलीफ भी उसी वक्त होती है। उसके बाद हम भूल जाते हैं। हम बात-बात पर रास्ता रोकते हैं, हंगामा खड़ा करते हैं। तोड़फोड़ पर उतारू हो जाते हैं। फिर इस बात के लिए अपनी आवाज बुलंद क्यों नहीं करते। इस जगह देर सबेर हम सभी को आना है। पहल करने बाहर से कोई नहीं आएगा। शुरुआत खुद से ही करनी होगी। इस विषय में सोचना और कोई उचित निर्णय जरूर लेना ताकि जैसा आज स्वतंत्रता सेनानी बालाराम जोशी की अंतिम यात्रा के दौरान हुआ कल किसी और के साथ न हो। इस बहाने सड़क सुधारने के लिए अगर शासन-प्रशासन या जनप्रतितिनिधियों की तरफ से कोई सार्थक प्रयास होते हैं तो निसंदेह स्वतंत्रता सेनानी बालाराम जोशी को एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी, ताकि किसी का अंतिम सफर इस प्रकार कष्टदायी ना बने।

साभार : भिलाई पत्रिका के 31 अगस्त 12 के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, August 28, 2012

...क्योंकि मैं एक सड़क हूं

(सड़क की कहानी, उसी की जुबानी)

टिप्पणी 

बनना और टूटना मेरी फितरत है। मैं बनती हूं, टूटती हूं। फिर बनती हूं और फिर टूट जाती हूं।... क्योंकि मैं एक सड़क हूं। यह सिलसिला चलता रहता है। लगातार, निरतंर और बदस्तूर। तभी तो टूटने का क्रम कभी रुकता नहीं है, थमता नहीं है। अनवरत चलता ही रहता है बिना थके। मेरे साथ विडम्बना यह जुड़ी
है कि मैं बनती देर से हूं लेकिन उखड़ बहुत जल्दी जाती हूं। मेरे उखड़ने से भले ही कोई दुर्घटनाग्रस्त हो। कोई चलते-चलते ठोकर खाए। हाथ-पैर तुड़वाए, मेरे बाप का क्या जाता है। मुझे घुट्‌टी भी इसी बात की पिलाई जाती है। क्या सांप काटना छोड़ सकता है। क्या कुत्ता भौंकना छोड़ सकता है। तो मैं अपना स्वभाव कैसे छोड़ दूं। मौसम बदल जाते हैं। हालात बदल जाते हैं। और तो और सरकारें भी बदल जाती हैं लेकिन मेरा टूटना या उखड़ना कभी बंद नहीं होता। हो भी कैसे ..क्योंकि मैं एक सड़क हूं। जगह कोई भी हो, मेरी जैसी कहानी मेरी सभी बहनों की है। तभी तो हमारे बनने-बिगड़ने का गणित सभी जगह कमोबेश एक जैसा ही है। सरकार किसी की भी हो। सत्ता में कोई भी बैठा हो। क्या फर्क पड़ता है उससे। टूटने का सिलसिला तो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। आजादी के बाद से ही। उस परम्परा को भला कैसे छोड़ दूं। समाज के नियमों को कैसे तोड़ दूं। मैं जब टूटती हूं तो ठाले-बैठे विपक्षी दलों को एक जोरदार मुद्‌दा जरूर मिल जाता है। विरोध करने का। मेरा नाम लेकर कइयों के भाग्य बन गए और अभी तो कइयों के बनेंगे। मैंने अपना स्वभाव बदल लिया तो यकीन मानिए नेता बनने की एक राह तो सदा के लिए ही बंद हो जाएगी। किसी की राह रोकना भी तो मेरा काम नहीं है।...क्योंकि मैं एक सड़क हूं।
मैं अक्सर टूटती हूं। कई बार तोड़ दी भी जाती हूं। कभी किसी बहाने से तो कभी कोई कारण बताकर। इंद्रदेव को तो हमारी जमात पर जरा सा भी तरस नहीं आता। घोटालों और घपलों की तमाम खामियां बारिश में बहा ले जाते हैं। कितने दयालु हैं दूसरों का गुनाह खुद अपने ऊपर ले लेते हैं। मेरे टूटने की सबसे बड़ी वजह (बहाना) तो बारिश ही बनती है। खैर मेरे टूटने के बहाने वहां भी हैं, जहां बारिश नहीं है। और फिर मुझे तोड़ा भी तो आपके भले के लिए जाता है। मेरी बहनें जो बार-बार टूटती है। नजर अक्सर उन्हीं पर रहती है। उन्हीं की पूछ परख होती है। जो समय पर टू टती नहीं है, उसे कोई पूछता ही नहीं है। उपेक्षित रहती है बेचारी। लाचारी एवं मजबूरी की मारी। देखा जाए तो मेरे बनने-बिगड़ने की कहानी से कई जिंदगियां जुड़ी हैं। कई परिवार पल रहे हैं। मैं अपनी आदत छोड़ दूंगी तो यह सब कहां जाएंगे। घरों में रोटियों के लाले पड़ जाएंगे। नेताओं की कुर्सियां हिल जाएंगी। ठेकेदार बेरोजगार हो जाएंगे। मैं चाहकर भी अपनी आदत नहीं छोड़ सकती। अपने उसूलों से कभी मुंह नहीं मोड़ सकती। घर दूसरों का भरने के कारण ही मेरा दामन गरीब है। बार-बार बनना और बिगड़ना ही मेरा नसीब है। ...क्योंकि मैं एक सड़क हूं।
मेरी हालत पर आम आदमी तरस खाता है। रोता है, चिल्लाता है। गुस्से में बड़बड़ाता है। गालियां भी निकालता है लेकिन मैं क्या कर सकती हूं। दोष बनाने व बनवाने वालों के साथ आप सब का भी है। वैसे भी किसी पर फिजूल में दोषारोपण करना ठीक नहीं है। मुझे यह भी पता है कि बिना तालमेल के घालमेल संभव नहीं है। लेकिन जब आप लोग ही चुप हैं तो फिर मैं किसके लिए बोलूं और क्यों बोलूं.... क्योंकि मैं तो एक सड़क ही हूं। दिल से भी पैदल और दिमाग से भी पैदल।... आखिर एक सड़क जो ठहरी।
साभार- पत्रिका भिलाई के 28 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।

Saturday, August 25, 2012

जरूरी है शहीदों का सम्मान


प्रसंगवश

छत्तीसगढ़ प्रदेश के युवाओं की सेना में भागीदारी इसीलिए कम है, क्योंकि इस मामले में न तो यहां की सरकार रुचि लेती है और ना ही जनप्रतिनिधि। प्रदेश के युवाओं को ऐसा माहौल भी उपलब्ध नहीं कराया जाता जिसकी बदौलत उनमें देश सेवा करने के प्रति जोश, जुनून और जज्बा पैदा हो। सरकारी उदासीनता के बीच अगर कोई युवा देश सेवा की हसरत लिए सेना में भर्ती हो भी जाता है तो उसके मान-सम्मान को बनाए रखने के भी प्रयास नहीं किए जाते। सोचनीय एवं दुखद विषय तो यह भी है कि देश के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले शहीदों एवं उनके परिवारों को भी राज्य सरकार की ओर से यथायोग्य सम्मान भी नहीं मिल पाता। वैसे भी छत्तीसगढ़ में शहीदों के अंतिम संस्कार में राज्य सरकार की ओर से अक्सर निभाई जाने वाली औपचारिकता के उदाहरणों के फेहरिस्त भी बेहद लम्बी है। बात चाहे माओवादी हमले में शहीद होने वाले जवानों की हो या फिर सरहद पर दुश्मन से लोहा लेते हुए बलिदान होने वालों की। दोनों ही मामलों में सरकार का रवैया कमोबेश एक जैसा ही है। ताजा मामला जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए भिलाई के लाडले प्रवीणसिंह के अंतिम संस्कार से जुड़ा है। शहीद को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के मामले में जिले के अधिकतर जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने दूरी बनाए रखी। जो पहुंचे वे भी मौका देखकर अत्येष्टि से पूर्व ही वहां से खिसक लिए। कुछ तो अंतिम यात्रा में शामिल हुए बिना ही शहीद के घर से ही लौट गए। मतलब सभी को पहुंचने से पहले जल्दी लौटने की चिंता ज्यादा थी। शहीद के प्रति जिले के जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारी का इस प्रकार का रवैया निहायत ही गैर जिम्मेदाराना है। विडम्बना देखिए कि जिले के कई जनप्रतिनिधियों के पास सैलून व जूतों की दुकान का उद्‌घाटन करने,  नाली निर्माण के लोकार्पण समारोह में रिबन या फीते काटने और सस्ती लोकप्रियता के लिए छोटे-मोटे कार्यक्रमों में उपस्थित होकर ठुमके लगाने के लिए तो पर्याप्त समय है लेकिन शहीद की पार्थिव देह पर श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए वक्त नहीं है। इतना ही नहीं बात-बात पर बयान जारी करने वाले जनप्रतिनिधियों के पास शहीद के मामले में सांत्वनास्वरूप कहने के लिए दो शब्द भी नहीं है। पता नहीं क्यों जुबान तालु से चिपकी हुई है।
बहरहाल, शासन-प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह शहीद परिजनों तथा देशसेवा से जुड़े परिवारों की न केवल खैर-खबर ले बल्कि उनका मान-सम्मान भी बनाए रखे। अगर शासन-प्रशासन ऐसा नहीं कर पाए तो फिर कौन मां होगी जो अपने लख्तेजिगर को सरहद पर गोलियां खाने के लिए भेजेगी। क्यों कोई पिता अपने बुढ़ापे की लाठी को देश के खातिर मर-मिटने की शिक्षा देगा। क्यों कोई वीरांगना अपना सुहाग मिटाकर वैधत्व भोगने पर मजबूर होगी। मामला संवदेनशील एवं बेहद गंभीर है, इसमें देरी किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। यह शासन-प्रशासन को सोचनी चाहिए।

साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 25 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।

Friday, August 24, 2012

जल्दबाज ड्राइवर कभी बूढ़ा नहीं होता....

बस यूं ही

आफिस से घर पहुंचते-पहुंचते डेढ़ बज चुका था। अचानक ख्याल आया कि एकलव्य (मेरा छोटा बेटा, जो केजी टू में पढ़ता है) की स्कूल बस आने का समय हो गया है। बस रोजाना डेढ़ और पौने दो बजे के बीच ही आती है लेकिन वह घर तक नहीं आती है। इसलिए एकलव्य को लेने के लिए सड़क तक जाना पड़ता है। रायपुर-नागपुर मार्ग होने के कारण इस पर वाहनों की आवाजाही भी खूब रहती है। एकलव्य को लेकर घर पहुंचा तब तक श्रीमती ने खाने की तैयारी लगभग पूरी कर ली थी। चाहे गर्मी हो या सर्दी अपनी आदत के अनुसार मैं गर्मागर्म एक-एक चपाती ही खाता हूं। खाने की स्पीड भी इतनी तेज है कि जब तक दूसरी आए तब तक पहली वाली साफ हो चुकी होती है। खाने की स्पीड उस वक्त तो और भी बढ़ जाती है जब कहीं जाना होता है।
दरअसल मैं जल्दबाजी इसलिए दिखा रहा था कि मुझे कांग्रेस पार्टी के दुर्ग में आयोजित घेराव कार्यक्रम को देखने जाना था। करीब आधा घंटे कार्यक्रम देखने के बाद मैंने ऑटो पकड़ा और भिलाई के लिए रवाना हो गया। रास्ते में मेरे ऑटो के आगे एक लोडिंग ऑटो चल रहा था। उसके पीछे की साइड में लिखा था, जल्दबाज ड्राइवर कभी बूढा नहीं होता है। यह स्लोगन मैंने पढ़ लिया और इसका मर्म समझ कर मन ही मन मुस्कुरा भी लिया। ऑटो चालक की बगल में ही उसका साथी बैठा था। चेहरे के हावभाव देखकर मुझे उनके बालिग होने में संदेह लगा। दोनों बच्चे ही थे। उन दोनों ने भी वह स्लोगन पढ़ा और इसके बाद तो बार-बार पढ़ने लगे। दोनों की हालत देखकर मुझे लगा कि शायद दोनों को स्लोगन के पीछे छिपा मर्म समझ में नहीं आ रहा है। मैंने जिज्ञासावश दोनों को टोकते हुए पूछ लिया कि इस स्लोगन से आप क्या समझते हैं। जवाब भी वैसा ही आया जैसा मैं सोच कर चल रहा था। दोनों ने असहमति में सिर हिलाया। मैंने उनको कहा कि जो ड्राइवर गाड़ी तेज चलाता है वह कभी बूढा नहीं होता है। चूंकि मैं पीछे बैठा था लिहाजा दोनों ने मेरी बात को गंभीरता से सुना, लेकिन किसी तरह की प्रतिक्रिया ना होती देख मैंने फिर पूछा समझे कि नहीं, इस पर उन्होंने असहमति स्वरूप अपना सिर हिला दिया। मैंने उनको बताया कि जो वाहन तेज चलाता है वह इसलिए बूढा नहीं होता है क्योंकि वह असमय ही ऊपर मतलब भगवान के घर चला जाता है। वे फिर भी नहीं समझे और पूछने लगे कि कैसे। मैंने बताया कि जब तेज चलेगा तो हादसा होगा और हादसा होगा तो जान जाने की आशंका रहती है। मेरी बात एक युवक को समझ में आ गई। उसने तत्काल अपने साथी को अपने हिसाब से समझाया तो दोनों ठहाका लगाना लगे। फिर तो एक युवक ने बिलकुल विशेषज्ञ की तरह मुझसे कहा, भाईसाहब सिगरेट पीने वालों के लिए भी ऐसा ही कहा जाता है ना। इसी दौरान दूसरा बोल उठा सिर्फ सिगरेट ही नहीं कोई नशा करने वाला कभी बूढ़ा नहीं होता। ऑटो अपनी गति से दौड़ा जा रहा था। नशे की बात पर इतनी गंभीर बातें करने वाले युवकों को गुटखा चबाते व पीक थूकते देख मैं सोच में इस कदर डूबा कि मेरा स्टैण्ड कब आया पता ही नहीं चला। उतरते वक्त मैंने गुटखे के लिए दोनों को टोका तो उलटे मेरे को ही नसीहत देने लगे, बोले भाईसाहब कैन्सर तो उनके भी होता है जो नशा नहीं करते। मैं उन नासमझों की बातों पर बिना कोई टिप्पणी किए किराये के दस रुपए थमा कर चुपचाप कार्यालय लौट आया।

पालक हित में काम करें

टिप्पणी 

 स्कूलों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा और बेतहाशा स्कूल फीस वृद्धि से उकताए शिक्षानगरी भिलाई के पालकों को उस वक्त बड़ी उम्मीद बंधी थी कि कम से कम उनकी पीड़ा को सुनने वाला कोई संगठन तो तैयार हुआ। उनको लगने लगा कि उनकी आवाज को अनसुना कर देने वाले संबंधित स्कूल संचालकों में अब कुछ तो भय होगा। इसी भरोसे के साथ पालकों ने एक नए नवेले संगठन को भरपूर समर्थन भी दिया। शुरुआती दौर में छत्तीसगढ़ पालक संघ अपने उद्‌देश्यों पर खरा उतरता नजर भी आया जब उसने पालकों की कई समस्याओं को हल करवाया। पालक संघ की पहल पर निजी स्कूलों पर लगाया गया जुर्माना तो समूचे प्रदेश में एक नजीर के रूप में याद किया जाएगा। इन सब कामों के चलते अल्प समय में ही पालक संघ ने अच्छी खासी लोकप्रियता भी हासिल कर ली। तभी तो पालकों को यह लगने लगा कि जिले में एक संगठन पहले से मौजूद होने के बावजूद नया संगठन अस्तित्व में क्यों आया। इतना कुछ करने के बाद गुरुवार को एक निजी स्कूल के बस चालकों के प्रदर्शन को समर्थन देकर संघ ने अपने उद्‌देश्यों की मर्यादा को लांघने का ही काम किया है। आखिर संघ यह करके क्या साबित करना चाहता है। बस चालकों के प्रदर्शन की वजह से विद्यार्थी ढाई घंटे तक स्कूल में बैठे रहे। समय पर बच्चों के घर न पहुंचने के कारण पालकों को हुई परेशानी को तो शब्दों में बयां करना भी मुश्किल है। पालकों के हितैषी कहलाने वाले संघ पदाधिकारियों को इस बात का जरा सा भी ख्याल नहीं आया कि उनके इस निर्णय की गाज सबसे पहले कहां पर गिरने वाली है। स्कूल प्रबंधन और बस चालकों की लड़ाई में पालक संघ के बीच में कूदने से सर्वाधिक नुकसान तो विद्यार्थियों का ही हुआ। बस चालक एवं स्कूल प्रबंधन में तो कल को समझौता भी हो जाएगा लेकिन मासूमों की भावना से खिलवाड़ करने की क्षतिपूर्ति किसी भी रूप में संभव नहीं है। 
बहरहाल, गड़बड़ियों एवं अव्यवस्थाओं को दुरुस्त करवाने के लिए इस प्रकार के संगठन होना जरूरी हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह भी तो नहीं कि इस बहाने उसे कुछ भी करने की आजादी मिल जाए। लोकतंत्र में अपनी मांगे मनवाने के तरीके से बहुत से हैं और अव्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना भी बुरी बात नहीं है लेकिन ध्यान यह रखा जाना चाहिए कि इस कवायद में कहीं जन को कोई नुकसान या पीड़ा तो नहीं हो रहा है। जनता की उम्मीदों की बुनियाद पर खड़ा होने वाला संगठन कभी जनहित को नजरअंदाज करके आगे नहीं बढ़ सकता। पालक संघ का गठन पालकों की समस्याओं का निराकरण करवाने के लिए किया गया था ना कि समस्याएं बढ़ाने के लिए। ऐसे में उसके आंदोलनों या प्रदर्शनों का मकसद सस्ती लोकप्रियता पाने या केवल वाहवाही बटोरने तक तो सीमित कतई नहीं होना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना तो बेहद जरूरी है कि पालकों का हमदर्द कहलाने के चक्कर में किसी से दादागिरी या मनमानी तो बिलकुल ना हो। जरूरत है कि पालकों का हितैषी कहलवाने वाले अपने गिरेबान में झांकें, गलतियों से सबक लें और बिना किसी राजनीति व लाग लपेट के ईमानदारी के साथ पालक हित में काम करें।

साभार - भिलाई पत्रिका के 24 अगस्त 12 के अंक में प्रकाशित।

Saturday, August 18, 2012

सरासर जान से खिलवाड़

प्रसंगवश

 एक चर्चित जुमला है, रोम जब जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। कुछ ऐसा ही हाल राज्य सरकार एवं उनके नुमाइंदों का है। इन दिनों दुर्ग-भिलाई में सरकारी भवनों से प्लास्टर उखड़ने की खबरें लगातार आ रही हैं। वैसे भी बारिश के मौसम में सीलन आने से इस प्रकार के मामलों में यकायक इजाफा हो ही जाता है। प्लास्टर उखड़ने से प्रभावित लोग अपने बचाव के लिए जहां बन रहा है गुहार लगा रहे हैं लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। सरकार एवं उसके नुमाइंदे तो कुंभकर्णी नींद में ऐसे गाफिल हैं कि उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही हैं। यह तो गनीमत है कि प्लास्टर उखड़ने से जानमाल की कोई बड़ी हानि नहीं हुई। देखा जाए तो दुर्ग के जिला अस्पताल परिसर स्थित टीबी अस्पताल की छत्त का प्लास्टर उखड़ना ही अपने आप में बेहद गंभीर बात है। अस्पताल एक ऐसी जगह होती हैं, जहां लोग स्वस्थ होने की उम्मीद के साथ आते हैं, लेकिन यहीं पर भी हादसों से वास्ता पड़े तो फिर यह सरासर जान से खिलवाड़ ही है। बात अकेले अस्पताल की ही नहीं है, बल्कि दुर्ग में अधिकतर सरकारी कार्यालय एवं आवास बेहद पुराने एवं जर्जर हैं और इनसे अक्सर प्लास्टर उखड़ता रहता है। ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद अधिकारी-कर्मचारी एवं उनके परिजन जान जोखिम में डालकर इन आवासों में रहने को मजबूर हैं। 
पिछले दिनों पुलिस लाइन में भी इसी तरह प्लास्टर उखड़कर गिरने से एक महिला घायल हो गई थी। समस्या से प्रभावित महिलाएं जब अपना दुखड़ा सुनाने स्थानीय सांसद के पास गई तो उन्होंने अनर्गल बयान देकर जले पर नमक छिड़कने जैसा काम किया। जन से इस तरह रुखा व्यवहार करने के बाद भी खुद को जनप्रतिनिधि कहलवाना निसंदेह शर्मनाक एवं गंभीर बात है। जनप्रतिनिधि से उम्मीद की जाती है कि भले ही वह समस्या का निराकरण ना कर/करा पाए, कम से कम दिलासा तो दे। ज्यादा नहीं तो वह उम्मीद भरा आश्वासन तो दे ही सकता है, लेकिन सत्तारूढ़ दल एवं उसके नुमाइंदों से ऐसी उम्मीद करना भी बेमानी है।  
बहरहाल, पुलिस ऐसा विभाग है जिसके कंधों पर प्रदेश की कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी हैं। परिजनों पर मंडरा रही मौत की आशंका में पुलिसकर्मी अपने काम को कितनी ईमानदारी से कर पाएंगे, सोचा जा सकता है। कहा गया है कि जान है तो जहान है, लेकिन जब खतरा जान पर ही हो तो फिर सारे काम गौण हो जाते हैं। राज्य सरकार को भावी हादसे की दस्तक को तत्काल प्रभाव से समझते हुए आवश्यक कदम उठाना चाहिए। देखना यह है कि राज्य सरकार इस मामले में पहल अपने विवेक से करती है या किसी हादसे के बाद। और अगर जानमाल की हानि के बाद ही यह सब होना है तो सरकार एवं उसके नुमाइंदों को सद्‌बुद्धि देने के लिए भगवान से प्रार्थना के अलावा और कुछ किया भी नहीं जा सकता है।

साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ के  18 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, August 14, 2012

यह पानी निकलवा दीजिए


 टिप्पणी

माननीय, अनिल टुटेजा जी
आयुक्त नगर निगम, भिलाई।
आपको भिलाई नगर निगम की जिम्मेदारी संभाले हुए सप्ताह भर से अधिक समय हो गया है। इस अवधि में आपके काम करने का अंदाज देखकर लगा कि वाकई आपमें कुछ करने का जज्बा है। वैसे भिलाई निगम के लिए आप नए हो सकते हैं लेकिन आप छत्तीसगढ़ के ही जन्मे जाए हैं, लिहाजा यहां की जानकारी तो आ
पको पहले से है। विशेष रूप से भिलाई को तो आप भली-भांति जानते ही हैं। जानने की वजहें भी हैं। कौन होगा जो भिलाई को नहीं जानता। इस्पातनगरी एवं शिक्षा नगरी, यही तो दो नाम हैं, जो भिलाई का प्रतिनिधित्व करते हैं। बड़े गर्व की अनुभूति होती है भिलाई के लिए यह दोनों विश्लेषण सुनकर, लेकिन अफसोस की बात यह है कि इन विशेषताओं के साथ कई कड़वी हकीकतें भी जुडी हैं भिलाई के साथ। बुनियादी सुविधाओं के अभाव से लेकर प्रदूषण तक की कड़वी हकीकतें। खैर, रफ्ता-रफ्ता आप इन हकीकतों से वाबस्ता हो जाएंगे। आप संवदेनशील हैं तथा जनता के दर्द को भी समझते हैं। तभी तो पदभार ग्रहण करने के साथ ही आपने अधिकारियों-कर्मचारियों को निर्धारित समय पर कार्यालय आने की कड़ी नसीहत दे डाली। इतना ही नहीं लगे हाथ आपने शहर की टूटी सड़कों का जायजा भी ले लिया। चाहते तो आप मातहत को मौके पर भेजकर सड़कों की रिपोर्ट मंगवा सकते थे लेकिन आपने खुद मौका देखना उचित समझा। एक अधिकारी में ऐसा गुण होना भी चाहिए। वातानुकूलित कक्षों में बैठकर रिपोर्ट पर भरोसा करने वाले अधिकारियों का हश्र बाद में कैसा होता है, यह आप बखूबी जानते हैं। ऐसे अधिकारी कमोबेश हर जगह मिल जाएंगे। भिलाई में भी कमी नहीं है। आपके निगम में भी मिल जाएंगे।
कुछ ऐसे ही अधिकारियों की बदौलत तो भिलाई में मौर्या टाकीज के पास एक अंडरब्रिज बनकर तैयार हो गया। बनाने वालों ने यहां नियमों को अनदेखा किया ही, बनने के बाद भी उसकी किसी ने शायद ही सुध ली होगी। फिलवक्त महीने भर से चल रही बारिश के कारण यह अंडरब्रिज पानी से लबालब है। यहां भरे पानी को निकालने के किए जा रहे प्रयास नाकाफी हैं। अंडरब्रिज बंद होने के कारण पावर हाउस एवं सुपेला के रेलवे क्रासिंग पर यातायात का दवाब यकायक बढ़ गया है। जल्दी निकलने के चक्कर में वाहन चालक जान को दाव पर लगाने से भी नहीं हिचक रहे हैं। आप समझ सकते हैं, ऐसा वे जानबूझकर तो नहीं करते। परेशान लोगों के हालात व मजबूरी पर आपके मातहतों को कतई तरस नहीं आता है। आप ही सोचिए, आपके मातहत संवेदनशील होते तो क्या एक माह तक रास्ता इस तरह बाधित रहता?।
यकीन मानिए यह शहर अपनी विशेषताओं के कारण जितना प्रसिद्ध है, उनसे उतना ही परेशान एवं हलकान भी है। करने को भिलाई में बहुत काम है। समस्याओं की लम्बी फेहरिस्त है। बस एक बार नब्ज देखने और मर्ज जानने की जरूरत है। फिलहाल तो आप एक बार मौका देखकर किसी तरह पानी निकासी का प्रबंध करवा दीजिए। अगर इस पानी भराव का कोई स्थायी हल भी हो जाए तो सोने में सुहागा होगा। प्रभावितों के लिए यह बड़ा काम है लेकिन आप जैसे सक्षम अधिकारी के लिए कुछ भी असंभव नहीं। आप ऐसा करवा देंगे तो यकीनन प्रभावित लोग इस काम के लिए आपके ऋणी तो रहेंगे ही दिल से दुआ भी देंगे।
 
साभार -पत्रिका भिलाई के 14 अगस्त 12  में  प्रकाशित।

चुपचाप कट गया मैं...


पेड़ का दर्द

मेरी दशा देखकर आप समझ गए होंगे कि मेरा दर्द क्या है। सोमवार दोपहर को मैं मरते-मरते बचा हूं। वो तो भला हो एक दो जागरूक लोगों का, जिनकी बदौलत मेरा अस्तित्व रह गया। वरना मेरी हत्या तो लगभ तय थी। बेरहमों ने समय भी बड़ा मुफीद चुना। मैं बहुत चीखा, चिल्लाया भी, लेकिन कोई नहीं था, उस वक्त। वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि एक-दो पर्यावरण प्रेमी संयोग से वहां पहुंच गए और मैं बच गया। पता नहीं क्यों कोई यकायक मेरे खून का प्यासा हो गया। क्या बिगाड़ा था मैंने किसी का। मैं तो आसपास के लोगों को सुकून भरी छाया ही उपलब्ध कराता रहा हूं। सैकड़ों परिंदे मेरी शाखाओं पर बेखौफ होकर शिद्दत के साथ रात गुजारते रहे हैं।
अफसोस उन परिन्दों का आशियाना उजड़ गया। कहां रात गुजारेंगे वो। एकदम ठूंठ बन गया हूं मैं। हालात यह हो गई मैं अभी किसी को छाया तक भी नहीं दे सकता। काफी वक्त लगेगा मेरे जख्म भरने में। हुड़को में श्रीराम चौक के मैदान के पास मुझे बड़े आदरभाव व विधि विधान के साथ लगाया था। बरगद का पेड़ होने तथा सबका चहेता होने के बाद भी पता नहीं क्यों मैं किसी को अखर गया। खैर, यह आप लोगों के स्नेह एवं दुआओं का ही कमाल था कि मैं बच गया। फिर भी आपको आगाह करता हूं कि मेरे से दुश्मनी निकालने वाले को आप सजा जरूर दिलवाएं ताकि वह भविष्य में इस प्रकार की हिमाकत ही ना करे। अगर आज आप लोगों ने हिम्मत करके यह पुनीत कार्य कर दिया तो यकीन मानिए आप पर्यावरण प्रेम की नई इबारत लिख देंगे।

साभार -पत्रिका भिलाई के 14 अगस्त 12 में  प्रकाशित।

Saturday, August 11, 2012

इसकी टोपी, उसके सिर

प्रसंगवश

भिलाई में फोरलेन (राष्ट्रीय राजमार्ग-6) पर बने क्रासिंग पर सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं। आलम यह है कि भिलाई एरिया में 11 में से पांच क्रासिंग नियमों को नजरअंदाज करके बनाए गए हैं। यह तो अकेले भिलाई एरिया की कहानी है। फोरलेन में बहुत सी जगह ऐसी हैं, जहां नियमों एवं मापदण्डों को दरकिनार कर इस प्रकार के क्रासिंग छोड़े गए हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जनप्रतिनिधियों ने सस्ती लोकप्रियता पाने एवं वाहवाही बटोरने के चक्कर में फोरलेन बनाने वाली कम्पनी पर दबाव डालकर नियम विरुद्ध क्रासिंग बनवा लिए। निर्माता कंपनी ने भी बिना किसी ना नुकर के हाइवे में क्रासिंग इसलिए छोड़ दिए क्योंकि वह खुद भी कठघरे में है। शहर के बीचोबीच फोरलेन का निर्माण ही सवालों के घेरे में है। देखा जाए तो फोरलेन हाइवे में कट पाइंट बनाने का प्रावधान ही नहीं है। बावजूद इसके जनहित का हवाला देकर व दबाव बनाकर जनप्रतिनिधियों ने तात्कालिक लाभ उठाते हुए मनमाफिक रास्ते (क्रासिंग) खुलवा लिए। बढ़ते यातायात दबाव के कारण अब यही क्रासिंग जानलेवा साबित हो रहे हैं, लेकिन यहां सुरक्षा के प्रबंध करने के नाम पर कोई भी तैयार नहीं है। फोरलेन निर्माता कंपनी के नुमाइंदे, जनप्रतिनिधि व यातायात पुलिस के अधिकारी इसकी टोपी, उसके सिर पर की तर्ज पर बयान देकर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं। फोरलेन निर्माता कंपनी का कहना है कि बढ़ते हादसों के पीछे सबसे बड़ा कारण लोगों में जागरुकता का अभाव होना है। किसी हद तक यह बात सही भी है लेकिन बिना भय के कानून की पालना संभव नहीं है। अकेली जागरुकता के भरोसे के यातायात नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। गौर करने वाली बात तो यह है कि फोरलेन पर दो क्रासिंग तो पुलिस थानों के ठीक सामने बने हैं। यानि कानून की पालना करवाने वालों की आंखों के सामने ही कानून की धज्जियां उड़ रही हैं। सोचनीय विषय है कि किसी वीआईपी के आगमन के दौरान इन क्रासिंग पर यातायात पुलिस के जवान बड़ी मुस्तैदी के साथ ड्‌यूटी बजाते नजर आते हैं लेकिन आमजन की सुरक्षा के नाम पर उनके पास बगले झांकने के अलावा कोई जवाब नहीं है।
बहरहाल, सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। समय की नजाकत को देखते हुए फोरलेन कंपनी को जहां जरूरत है, वहां सूचना पट्‌ट, ब्लींकर या सिग्नल लगाने चाहिए। क्रासिंग पर बढ़ते यातायात दबाव को देखते हुए यातायात पुलिसकर्मियों की तैनाती भी बेहद जरूरी है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो उन जनप्रतिनिधियों की है, जो खुद को बचाने के चक्कर में जिम्मेदारी यातायात पुलिस एवं फोरलेन निर्माता कंपनी की बता रहे हैं। आखिर नियम विरुद्ध काम करवाने की बुनियाद तो जनप्रतिनिधियों ने ही रखी है। ऐसे में जान माल की सुरक्षा कैसे हो, यह भी तो उनको ही तय करना चाहिए।

साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ के 11 अगस्त 12 के अंक में प्रकाशित।


Thursday, August 9, 2012

स्थायी हल खोजना जरूरी

टिप्पणी 

नागपुर-रायपुर फोरलेन हाइवे में नियमों को दरकिनार कर सुपेला थाने के पास डिवाइडर को काटकर बनाया गया रास्ता अब लोगों को राहत कम परेशानी ज्यादा दे रहा है। चौराहे पर यातायात का दबाव सुबह से लेकर देर रात तक लगातार बना रहता है। हाइवे के दाएं-बाएं स्थित राधिका नगर व प्रियदर्शनी के अलावा सेक्टर एरिया के दुपहिया वाहन चालक भी शॉर्टकट के चक्कर में इसी चौराहे का उपयोग करते हैं। बहुत से स्कूली बच्चे भी जान जोखिम में डालकर रोज इधर से उधर एवं उधर से इधर आते हैं। यहां से गुजरने वाले वाहनों की रफ्तार पर न तो कोई अंकुश है और ना ही कोई डर। वे बेखौफ व बेलगाम होकर यहां से गुजरते हैं और अक्सर बेकाबू होकर हादसों का सबब बन जाते हैं। इतना कुछ होने के बाद भी इस चौराहे पर न तो कोई सिग्नल लगा है और ना ही यातायात पुलिस के किसी जवान की ड्‌यूटी लगती है। लब्बोलुआब यह है कि यहां सब कुछ स्वयं स्फूर्त एवं भगवान भरोसे ही है। तभी तो यहां एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब कोई हादसा नहीं होता हो। बुधवार दोप हर बाद हुआ हादसा भी तेज रफ्तार का नतीजा था। पहले निकलने की होड़ में दोनों वाहन टकरा गए। गनीमत यह रही कि हादसे में कोई जन हानि नहीं हुई। देखा जाए तो इस प्रकार के नियम विरुद्ध कामों का तात्कालिक लाभ जरूर हो सकता है लेकिन दूरगामी परिणाम हमेशा प्रतिकूल ही रहे हैं। जब यहां रास्ता छोड़ना इतना ही जरूरी था तो यहां से गुजरने वालों की जानमाल की सुरक्षा का ख्याल तो जेहन में सबसे पहले आना चाहिए था। आखिर जिनके लिए रास्ता छोड़ा जा रहा है, उनकी ही जान हथेली पर रहे तो फिर इस प्रकार के काम से फायदा भी क्या।
बहरहाल, हाइवे के आजू-बाजू दुर्घटना से देरी भली। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। रफ्तार का मजा, अस्पताल की सजा। गाड़ी धीरे चलाएं, घर पर कोई आपका इंतजार कर रहा है। जिन्हे जल्दी थी वे चले गए। आदि स्लोगन लिख भर देने से जागरुकता नहीं आएगी। जरूरी है कि नियमों की पालना कड़ाई से करवाई जाए। दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे यातायात के दवाब से इतना तो तय है कि इस समस्या का स्थायी हल खोजना अब बेहद जरूरी हो गया है। हल भी तभी संभव है, जब पीछे की भूलों में सुधार हो। भले ही वह यहां सिग्नल लगाकर या किसी यातायात पुलिसकर्मी की तैनाती के रूप में भी हो सकता है, लेकिन यह सब करना अब जरूरी है। पीछे की इस भूल में अब सुधार नहीं किया तो कालांतर में यह किसी बड़े हादसे की वजह भी बन सकती है। समस्या का हल जनभावना के अनुकूल हो तो फिर कहना ही क्या।
 
साभार : पत्रिका भिलाई के 9 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।




Saturday, August 4, 2012

किस काम के अंडरब्रिज


प्रसंगवश

मुम्बई-हावड़ा रेल मार्ग पर भिलाई के नेहरूनगर क्रॉसिंग के पास रेलवे मंत्रालय की ओर से अंडरब्रिज निर्माण की स्वीकृति की खबर से एक बार फिर बोतल में कैद जिन्न बाहर आ गया है। तय मानकों पर न बनने के कारण भिलाई में दो अंडरब्रिज पहले से ही लोगों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। ऐसे में नया अंडरब्रिज कितना कारगर साबित होगा, इस पर सवाल उठने लगे हैं। भिलाई के मौर्या टाकीज व प्रियदर्शनी नगर के अंडरब्रिज बारिश में किसी काम के नहीं रहते हैं। जमीन की स्तह से काफी नीचे होने के कारण दोनों अंडरब्रिज में थोड़ी सी बारिश में ही इतना पानी भर जाता है कि आवागमन अवरुद्ध हो जाता है। बारिश के मौसम में यह समस्या हर साल पैदा होती है। मौर्या टाकीज के पास तो बरसाती पानी की निकासी के लिए एक कुआं भी खोदा गया था लेकिन वह भी किसी काम नहीं आया। इसके बाद पम्प लगाकर अंडरब्रिज का पानी निकाला जाता है, लेकिन यह भी समस्या का स्थायी हल नहीं है। हर साल पम्प से पानी निकालने के खेल के चलते अंडरब्रिज के निर्माण के औचित्य पर ही सवाल उठ रहे हैं। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि जनहित को दरकिनार कर अंडरब्रिज का निर्माण कर दिया गया। हैरत वाली बात तो यह है कि अंडरब्रिज का निर्माण करने वाली रेलवे की अधिकृत ऐजेंसी राइट्‌स  की रिपोर्ट को अनदेखी करके इन अंडरब्रिज को बनवाया गया। अंडरब्रिज के निर्माण में बरती गई अनियमितता एवं अदूरदर्शिता का खमियाजा जनता को भुगतान पड़ रहा है। पानी से लबालब भरे व ऊपर से टपकते तथा करीब चार करोड़ की लागत से बने ये दोनों अंडरब्रिज कितने कारगर व उपयोगी हैं, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
बहरहाल, इनके निर्माण में कितनी पारदर्शिता बरती गई है। इनका निर्माण तय मानकों पर क्यों नहीं हुआ? आदि  बिन्दु़ओं की जांच जरूरी है। आखिर चार करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद जनता को बारिश के मौसम में परेशान होना पड़े तो फिर ऐसे अंडरब्रिज किस काम के। सुनने में आ रहा है कि व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए, इसके निर्माण में तय मानकों व जनहित को नजरअंदाज कर दिया गया। देखा जाए तो राहत पहुंचाने के नाम पर आमजन के साथ यह एक तरह का धोखा ही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नेहरू नगर के अंडरब्रिज के निर्माण में किसी तरह की अनियमिता व गड़बड़ी ना हो। अंडरब्रिज का निर्माण एकदम पारदर्शी तरीके, तय मानकों एवं भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो जैसी समस्या का सामना मौर्या टाकीज व प्रियदर्शनी नगर के अंडरब्रिज को लेकर आ रही है, वैसी ही नेहरूनगर के अंडरब्रिज में देखने को मिल जाए तो हैरत की बात नहीं होनी चाहिए।


साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ के 4 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।

Thursday, July 26, 2012

शहादत को मिले सम्मान

टिप्पणी

यकीन मानिए अगर यह किसी फिल्मी कलाकार का कार्यक्रम होता तो लोग इतनी बड़ी संख्या में जुटते कि भिलाई का हुडको मैदान छोटा दिखाई देने लगता। अगर यह किसी पार्टी विशेष के बड़े नेता की सभा होती तो अकेली गाड़ियों का लवाजमा ही इतना हो जाता कि शहर की यातायात व्यवस्था लड़खड़ा जाती। अगर यह किसी हीरोइन या नृत्यांगना का कार्यक्रम होता तो भूख-प्यास की चिंता छोड़कर लोग सुबह से अपनी जगह सुनिश्चित करने का प्रयास करते दिखाई देते। अफसोस की बात यह है कि कार्यक्रम किसी फिल्मी कलाकार, किसी नेता या किसी नृत्यांगना का ना होकर एक शहीद की पुण्यतिथि का था। तभी तो छत्तीसगढ़ के एकमात्र करगिल शहीद कौशल यादव के स्मारक स्थल पर श्रद्धासुमन अर्पित करने जुटे लोगों की उपस्थिति वाकई सोचनीय थी। श्रद्धांजलि देने आए गिने-चुने लोगों को देखकर समझा जा सकता है कि आखिर छत्तीसगढ़ के युवाओं की सशस्त्र सेनाओं में भागीदारी कम क्यों है। श्रद्धांजलि सभा के लिए लगाए गए टैंट की अधिकतर कुर्सियां खाली पड़ी थी। समय निकाल कर पहुंचे चुनिंदा लोग भी इतनी जल्दी में थे कि वे सिर्फ मुंह दिखाई करके लौट गए।गनीमत रही कि दो चार स्कूलों के विद्यार्थियों ने राष्ट्रधर्म निभाते हुए स्मारक स्थल पर न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि शहीद को भावभीनी श्रद्धांजलि भी अर्पित की। कहने को महापौर एवं भिलार्इ नगर  विधायक ने भी स्मारक स्थल पर श्रद्धासुमन अर्पित किए लेकिन दोनों ने मंच पर साथ-साथ बैठने से परहेज किया। विधायक अपनी रस्म अदायगी कर पहले की निकल लिए जबकि महापौर तय समय पर पहुंची। वैशाली नगर विधायक तो दोपहर बाद श्रद्धाजलि अर्पित करके आए। इधर, देश की सुरक्षा एवं अस्मिता की दुहाई देने तथा देश के लिए मर-मिटने के दावे करने वाले दल भाजपा के छुटभैये नेताओं के अलावा नामचीन नामों की उपस्थिति न के बराबर थी। शर्मनाक बात तो यह भी थी कि कार्यक्रम में प्रशासनिक स्तर पर कोई अधिकारी या कर्मचारी नहीं पहुंचा। मरणोपंरात वीर चक्र से नवाजे गए शहीद कौशल यादव के प्रति ऐसा व्यवहार निहायत ही गैर जिम्मेदाराना एवं देशभक्ति के जज्बे को ठेस पहुंचाने वाला है।
बहरहाल, छत्तीसगढ़ प्रदेश के युवाओं की भागीदारी सशस्त्र सेनाओं में बेहद कम है। इसका यह तो कतई मतलब नहीं है कि यहां के युवाओं में देशभक्ति का जज्बा नहीं है। दरअसल यहां के युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने तथा उनको राष्ट्र सेवा की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास ही बहुत कम हुए हैं। यहां के युवाओं को शायद ही ऐसा माहौल मिला हो, जिसके दम पर उन्होंने देश सेवा करने का सपना पाला हो। लोगों में देश के प्रति जोश, जज्बा एवं जुनून बरकरार है, बस शर्त इतनी सी है कि उनकी इस भावना को समय-समय पर जगाया जाए। हाल ही में प्रदेश में हुई वायुसेना भर्ती इसका जीता जागता उदाहरण है। भर्ती के प्रति माहौल बनाया गया तो युवाओं को जुटने में भी देर नहीं लगी। फिर भी तेरह साल पहले शहीद के अंतिम संस्कार के दौरान हजारों की संख्या में जुटने वालों की संख्या बुधवार को दहाई तक सिमटना बेहद सोचनीय विषय है। इसके पीछे कहीं न कहीं सरकारी एवं प्रशासनिक उदासीनता ही  जिम्मेदार है। शहीद की पुण्यतिथि किसी उत्सव से कम नहीं होती है। उसकी शहादत को पूरा-पूरा सम्मान मिलना चाहिए ताकि युवा पीढ़ी के दिल में देशप्रेम का जज्बा पैदा हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में अकेले कौशल यादव ही नहीं बल्कि प्रदेश के अन्य शहीदों के प्रति ऐसा रुखा व्यवहार न हो तथा उनकी पुण्यतिथि महज रस्मी कार्यक्रम ना बने, तभी शहीदों की चिताओं पर हर वर्ष मेले लगने का स्लोगन चरितार्थ हो पाएगा।

साभार - पत्रिका भिलाई के 26  जुलाई 12  के अंक में प्रकाशित।

Saturday, July 14, 2012

तबादले पर उठते सवाल

प्रसंगवश
 
आखिकार वही हुआ, जिसका अंदेशा था। जिला शिक्षा अधिकारी बीएल कुर्रे का तबादला हो गया। नई जिम्मेदारी के तहत उनको धमतरी डाइट का प्राचार्य बनाया गया है। वैसे कुर्रे के तबादले के कयास उसी दिन से लगने शुरू हो गए थे, जिस दिन उन्होंने भिलाई के दो बड़े स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई की थी। यह ऐसी कार्रवाई थी,जो न केवल अनूठी थी बल्कि ऐतिहासिक भी रही। निजी स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई कर बड़े पैमाने पर जुर्माना लगाने का छत्तीसगढ़ प्रदेश का संभवतः यह इकलौता एवं पहला मामला था। आमजन ने इस कार्रवाई का तहेदिल से स्वागत भी किया था। इस कार्रवाई के बाद अभिभावकों में यह उम्मीद जगी थी कि आखिकार उनकी पीड़ा को समझने वाला कोई अधिकारी तो है। तभी तो प्रदेश के बाकी जिलों में भी इसी तर्ज पर कार्रवाई की मांग उठने लगी थी। खैर, कुर्रे की इस कार्रवाई का भले ही अभिभावकों एवं आम लोगों ने स्वागत किया हो लेकिन नियमों का पालन न करने वाले तथा राजनीतिक पहुंच रखने वाले कतिपय शिक्षण संस्थानों की आंखों की किरकिरी भी वे उसी दिन से बन गए थे। उनको भय सताने लगा था कि अगर कुर्रे कुछ समय और रह गए तो अगला नम्बर कहीं उन्हीं का न जाए। कहा भी जा रहा है कि दो बड़े स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई से उत्साहित कुर्रे करीब दर्जन भर स्कूलों के खिलाफ तैयारी में थे, लेकिन इससे पहले उनका तबादला हो गया। कुर्रे के तबादले के पीछे तरह-तरह की चर्चाएं सुनने को मिल रही हैं लेकिन सबसे अहम कारण यही माना जा रहा है कि निजी स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करना उनको भारी पड़ गया।
बहरहाल, अगर कुर्रे के तबादले के पीछे राजनीतिक कारण हैं तो यह किसी योग्य एवं ईमानदारी अधिकारी के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे माहौल एवं दबाव में भला कोई कैसे तटस्थ रहकर निष्पक्षता के साथ काम कर पाएगा। ईमानदारी के साथ काम करने की सजा अगर तबादला ही है तो फिर योग्य अधिकारियों एवं पारदर्शी काम की उम्मीद करना भी बेमानी है। कुर्रे के तबादले से तो इस बात को बल मिलता है कि राज्य सरकार भी गड़बड़ी करने वाले निजी स्कूलों के न केवल दबाव में है अपितु उनकी हां में हां भी मिला रही है। और अगर तबादला सामान्य प्रक्रिया है तो नए शिक्षा अधिकारी से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे कुर्रे के अधूरे कार्यों को अंजाम तक पहुंचाएंगे। 

साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 14 जुलाई 12  के अंक में प्रकाशित।


Friday, July 13, 2012

अपनै आप नं दारासिंह समझै है के....

 रुस्तम-ए-हिन्द दारासिंह के निधन का समाचार गुरुवार सुबह ही मिल गया था। टीवी एवं सोशल साइट्‌स पर दिन भर दारासिंह के निधन तथा उनसे जड़े किस्सों एवं संस्मरणों पर आधारित खबरों का बोलबाला रहा। शुक्रवार सुबह प्रिट मीडिया में भी दारासिंह ही छाए हुए थे। अधिकतर समाचार पत्रों में उनके निधन के समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। कई समाचार-पत्रों में तो अतिरिक्त पेज भी दिए गए। वे इसके हकदार भी थे, क्योंकि दारासिंह का जुड़ाव देश के लगभग हर छोटे- बड़े शहरों से रहा। कुश्ती के कारण देश में वे कई जगह घूमे थे। लिहाजा, अलग-अलग जगह पर समाचार-पत्रों में उनके अलग-अलग संस्मरण प्रकाशित हुए हैं। किसी ने दारासिंह के पहलवानी के पक्ष को रेखांकित किया तो किसी ने उनके राजनीतिक जीवन को। सर्वाधिक फोकस उनके रामायण धारावाहिक में निभाए गए हनुमान के किरदार को किया गया। कई समाचार-पत्रों ने इनके इस किरदार को अपने शीर्षकों में भी शामिल किया है। मसलन, राम के हुए हनुमान, राम के पास पहुंचे  हमारे हनुमान, राम के पास गए हनुमान आदि। लब्बोलुआब यह है कि निधन के कवरेज में दारासिंह के मूल काम के बजाय उनके हनुमान के किरदार को ज्यादा प्राथमिकता दी गई। दारासिंह मूल रूप से पहलवान थे और अपनी इसी खूबी और मजबूत कद काठी की बदौलत ही वे फिल्मों में आए। संभवत उनकी शारीरिक बनावट को देखकर ही रामायण में हनुमान का किरदार मिला। हनुमान के किरदार निभाने के कारण ही उनका राज्यसभा जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकार दारासिंह ने पहलवानी के अलावा अभिनेता एवं राजनेता दोनों  ही किरदार बखूबी निभाए।
फिलहाल बहस का विषय यह है कि दारासिंह को पहलवान के रूप में ज्यादा प्रसिद्धि मिली या फिर हनुमान का किरदार निभाने से। प्रसिद्धि का पैमाना क्या रहा है, यह सब लोगों ने टीवी, सोशल साइट एवं समाचार पत्रों के अवलोकन से लगा लिया होगा। अधिकतर जगह यही लिखा गया है कि उनको प्रसिद्धि हनुमान के किरदार से ज्यादा मिली। कुछ हद तक तक यह बात सही भी होगी लेकिन मैं इससे पूर्णतया सहमत नहीं है। मेरा मानना है कि दारासिंह को लोग हनुमान से पहले पहलवान के रूप में ही जानते थे। पहलवान रहते हुए दारासिंह ने वह काम कर दिखाया था जो किसी परिचय का मोहताज नहीं था। वह भी ऐसे दौर में जब न तो सोशल साइट्‌स थी और ना ही अखबारों का  जोर। टीवी भी उस वक्त गिने-चुने घरों की शान हुआ करते थे। विशेषकर शेखावाटी में दारासिंह की पहलवानी से जुड़ी एक लोकोक्ति प्रचलन में है। बचपन से इसको सुनते आए हैं और अब भी सुन रहे हैं। रामायण धारावाहिक तो 1987 में आया लेकिन लोकोक्ति इससे काफी पहले से बोली एवं सुनी जा रही है। दारासिंह से संबंधित से यह लोकोक्ति उर्फ जुमला बचपन में न केवल सुना है बल्कि कई बार बोला है। आज भी गाहे-बगाहे इस प्रयोग कर ही लिया जाता है। यह जुमला है अपनै आप नं दारासिंह समझै है के....। शेखावाटी में यह जुमला उस वक्त प्रयोग किया जाता है तब दो पक्षों के बीच नोकझोंक होती है और बात कुछ ज्यादा बढ़ जाती है। इसके अलावा यह जुमला उस वक्त भी बोला जाता है जब कोई बच्चा शरारत करता है। कहने का अर्थ यह है दादागिरी दिखाने वाले को भी इस जुमले से पुकारा जाता है। शेखावाटी में इस जुमले का प्रयोग सिर्फ बच्चे ही नहीं बल्कि बड़े भी करते हैं। हमारे गांव में तो एक युवक का नाम इसलिए दारासिंह रख दिया गया, क्योंकि उसने एक तेज धमाके वाले पटाखे को हाथ में ले लिया था। संयोग से वह पटाखा हाथ में लेने के बाद फट गया और वह युवक गांव के युवाओं की नजर में बहादुर मतलब दारासिंह हो गया। गांव में आज भी उस युवक को मूल नाम से कम और दारासिंह के नाम से ज्यादा जाना जाता है। 
कहने का मतलब यह है कि दारासिंह मूल रूप से पहलवान थे। उनकी पहचान उनकी ताकत थी। यह बात और है कि हनुमान के किरदार ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। आज दारासिंह हमारे बीच में नहीं है। भले ही हम उनकी अलग-अलग कामों के लिए चर्चा करें लेकिन उनका सबसे मजबूत पक्ष अभिनेता या नेता न होकर  पहलवानी ही था। उनकी ताकत ही उनकी प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण थी। 1947 से 1983 तक दारासिंह ने विभिन्न कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने पांच सौ पहलवानों को धूल चटाई। दारासिंह आज हमारे बीच से चले गए हैं लेकिन उनसे संबंधित जुमला लोगों की जुबान पर है और रहेगा। रुस्तम-ए-हिन्द को मेरा शत-शत नमन।

दोहरा चरित्र !


टिप्पणी

विडम्बना देखिए कि भिलाई के शांतिनगर एवं मॉडल टाउन के लोग वैधता के लिए जनप्रतिनिधियों एवं निगम अधिकारियों के यहां लगातार चक्कर लगा रहे हैं लेकिन उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। दोनों ही कॉलोनियों को वैधता तीन माह पहले दी जा चुकी है, लेकिन अभी तक विकास शुल्क निर्धारित नहीं किया गया है। नगर निगम की सामान्य सभा भले ही दो दिन चली हो लेकिन इस मसले पर कोई फैसला तो दूर चर्चा तक नहीं हुई। किसी ने बात कहने की कोशिश भी की तो हो हल्ला कर मामले को बहुमत के जोर पर दबा दिया गया। खैर, यह सामान्य सभा का एक पक्ष था। अब इसी सामान्य सभा का दूसरा पक्ष देखिए। वार्ड 24 में साप्ताहिक बाजार लगे या नहीं इस बात को लेकर मामला अदालत में विचाराधीन है। इसके बावजूद इसका प्रस्ताव सामान्य सभा में रखा गया। सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे की तर्ज पर इस प्रस्ताव पर मतदान करवाने की रस्म अदायगी भी गई ताकि भविष्य में किसी प्रकार के शिकवा-शिकायत की कोई गुंजाइश ही नहीं रहे। सदन में बहुमत कांग्रेस का है, चाहते तो प्रस्ताव वैसे ही पास हो जाता है लेकिन मतदान को आधार बनाकर यह संदेश दिया गया कि साप्ताहिक बाजार वार्ड 24 में ही लगना चाहिए। वैसे साप्ताहिक बाजार को लेकर प्रस्ताव पारित करने में जल्दबाजी दिखाना कई सवालों को जन्म देता है। आखिर ऐसी क्या वजह है कि अदालत के निर्णय का इंतजार किए बिना ही प्रस्ताव पारित कर दिया गया।
उक्त दोनों मामले यह साबित करते हैं कि जनहित से जुड़े मसलों  को लेकर हमारे जनप्रतिनिधि बिलकुल भी संजीदा नहीं है। ऐन-केन-प्रकारेण उनका ध्यान सिर्फ इस बात पर है कि उनको अधिकाधिक निजी लाभ कैसे हासिल किया जाए। स्वाभाविक सी बात है, मामला जब निजी लाभ या व्यक्तिगत स्वार्थों से जुड़ा होगा तो हो-हल्ला होना भी लाजिमी है। जब इस प्रकार के विवादों से नाता रखने वाले प्रस्ताव पारित हुए तो जमीर की आवाज पर काम करने वाले कुछ जनप्रनिधियों के लिए यह सब सहन करना बर्दाश्त से बाहर हो गया। वे झगड़े पर उतारू हो गए। तोडफ़ोड़ करने लगे, लेकिन उनका ऐसा करना भी तो उचित नहीं है। लोकतंत्र में अपनी बात रखने के कई माध्यम हैं। लोकतांत्रिक एवं गांधीवादी तरीके से भी अपनी बात रखी जा सकती है। इस प्रकार के हथकंडे अपनाकर चर्चा में बना जा सकता है लेकिन लोकप्रिय नहीं। यह सब महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने से ज्यादा कुछ भी नहीं है। कानून हाथ में लेकर हाथापाई करना, तोड़फोड़ करना, सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचाना, सदन का कीमती समय जाया करना किसी भी कीमत पर उचित नहीं हैं। सदन की अपनी मर्यादा है, अपनी गरिमा हैं। उसकी मर्यादा एवं गरिमा का ख्याल रखना जनप्रतिनिधियों का फर्ज है, लेकिन भिलाई नगर निगम में मर्यादा एवं गरिमा को तार-तार करना जनप्रतिनिधियों का एक सूत्री कार्यक्रम हो गया। वाहवाही लूटने के लिए हंगामा करने का रिवाज सा बन गया है। जनप्रतिनिधियों द्वारा नैतिक दायित्य का निर्वहन करना तो बिलकुल बेमानी हो गया है। शांतिपूर्वक चर्चा करना तो वे अपनी शान के खिलाफ समझने लगे हैं।
बहरहाल, जनप्रतिनिधियों को यह तय करना लेना चाहिए कि उनके लिए शहर का विकास सर्वोपरि है। इसमें किसी तरह का राजनीति करना या हंगामा खड़ा करना उचित नहीं है। तात्कालिक या निजी लाभ के लिए जनहित से जुड़े मुद्‌दों को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं है। शहरहित एवं जनहित में राजनीति का हस्तक्षेप ना तो ही बेहतर है। सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना भी सही नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए हमारे जनप्रतिनिधि पिछले सारे दुराग्रह व पूर्वाग्रह भुला कर विकास के मामलों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएंगे। अगर ऐसा नहीं कर पाए तो सिर-आंखों पर बैठाने वाली जनता दूसरा रास्ता भी दिखा सकती है, इतिहास गवाह है। जनप्रतिनिधियों को उससे कुछ सबक या सीख जरूरी लेना चाहिए।

साभार : पत्रिका भिलाई के 13 जुलाई 12  के अंक में प्रकाशित।

Friday, July 6, 2012

शुक्रिया... साथियो...

.बिलासपुर से आने के बाद...

मेहंदी रंग लाती है सूख जाने के बाद, और महोब्बत रंग लाती है दूर जाने के बाद। हो सकता है यह शेर आपने भी कहीं पढ़ा या लिखा हुआ देखा हो। मैंने तो यह शेर कई बार पढ़ा है। बचपन से लेकर कॉलेज लाइफ तक। यहां तक कि बसों के अंदर भी यह शेर कई जगह लिखा हुआ दिखाई दे जाता है। नब्बे के दशक में स्टीकर का दौर भी खूब चला। शेरो-शायरी के शौकीन उस वक्त इन स्टीकरों को खूब खरीदते थे। कोई किताब पर चिपकाता तो कोई साइकिल पर। मतलब यह था कि इन स्टीकर का क्रेज खूब था। दूर जाने की बात से ही शेर याद आ गया। बिलासपुर से तबादले की बात सुनकर सिर्फ अकेला रणधीर ही नहीं बल्कि कई साथी थे जो, उदास हो गए। कोई मेरे तबादले से खुश हुआ होगा मुझे नहीं लगता।
जिस दिन से मेरे तबादले की सूचना आई तो किसी ने फोन करके तो किसी ने एसएमस के माध्यम से हैरानी जताई। वैसे बिलासपुर में मेरे सहयोगियों के अपनेपन पर मुझे कभी कोई शक नहीं हुआ। लेकिन उनके दिल में मेरे प्रति कितनी जगह है, यह उनसे बिछड़ने के बाद ही पता चला। तबादले की सूचना के बाद मैसेज मिलने का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। फेसबुक पर भी जब मैंने बिलासपुर से विदाई कार्यक्रम का फोटो लगाया तो कई साथियों ने नई जगह जाने की शुभकामनाएं प्रेषित की। बिलासपुर के साथियों के अलावा शहर के एक-दो शुभचिंतकों ने भी मैसेज के माध्यम से अपनी बात कही। मेरे तबादले के आदेश 22 जून को ही आ गए थे। इस दिन मेरी शादी की आठवीं वर्षगांठ भी थी। आदेश की सूचना धीरे-धीरे सब जगह फैल गई।
सबसे पहले 23 जून को सीवी रमन विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री शैलेष पाण्डेय जी ने मैसेज किया कि ... सर, हम सब से प्यार और मोहमाया लगाव बढ़ाके आप दूर क्यों जा रहे हैं। अभी तो यह अच्छी शुरूआत हो रही थी। आपने जरा भी नहीं सोचा कि आपके अच्छे दोस्तों का क्या होगा। या हमसे नाराज होकर जा रहे हैं आप, आपके जाने की बात सुनकर अच्छा नहीं लगा सच में।
इसके बाद 26 जून को सिटी डेस्क पर कार्यरत छिंदवाड़ा के श्री प्रभाशंकर गिरी ने मैसेज किया....मिस यू सर। आपने बहुत कुछ सिखाया है जो पूरी लाइफ काम आएगा। थैंक्यू सर। मैसेज का सिलसिला थमा नहीं था। इसी दिन शाम को शहर के उत्साही एवं जागरूक युवा श्री पिनाल उपवेजा ने मैसेज किया....सर आपको, आपकी फेयरवेल की बधाई और बहुत शुभकामनाएं, नई यूनिट के लिए। आपका बिलासपुर के लिए किया गया कार्य हमेशा प्रशंसनीय और प्रेरणास्त्रोत रहेगा। इसी दिन कार्यालय में एक सादे समारोह में विदाई कार्यक्रम का आयोजन भी किया था। तबादले की बात सुनकर झुंझुनूं कार्यालय से पत्रिका के साथी श्री भगवान सहाय यादव ने भी बेस्ट ऑफ लक का मैसेज किया।
28 जून को बिलासपुर से भिलाई रवाना होने के दौरान मैंने एक मैसेज कम्पोज किया, उसमें लिखा कि.... एक साल के दौरान बिलासपुर में आप लोगों का जो सहयोग मिला, मैं उसका आभारी रहूंगा। यह मैसेज लिखकर मैंने कई लोगों को सेंड किया।इसके बाद रेलवे के पीआरओ श्री संतोष कुमार ने रिप्लाई देते हुए लिखा... आपका हर समय तहे दिल से स्वागत है और हमारा सहयोग हर समय रहेगा। इसके बाद पत्रकार साथी यशवंत गोहिल ने जवाबी मेसेज दिया कि...आपका स्नेहिल भावना के लिए आभार। आप सतत प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे अशेष शुभकामनाएं। एक अन्य साथी योगेश्वर शर्मा जो कुछ समय के लिए पत्रिका बिलासपुर में मेरे साथ रहे, ने भी मैसेज का जवाब मैसेज से दिया। उन्होंने लिखा....दूरियां बढ़ने से रिश्ते नहीं मिटा करते। अपनो से बिछड़ के प्यार और भी गहरा हो जाता है। आपके सानिध्य में जो सीखने को मिला वह मेरे जीवन की बड़ी उपलब्धि है। मेरा विश्वास है कि आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा। इसके अलावा कई लोगों ने फोन के माध्यम से नई जगह की शुभकामना दी लेकिन इतनी जल्दी बिलासपुर छोड़ने के लिए अफसोस भी जाहिर किया।
इसके बाद तीन जुलाई को मैं भिलाई आ गया लेकिन बीच-बीच में मैसेज मिलते रहे। सीवी रमन के कुलसचिव पाण्डेय जी ने फिर मैसेज किया कि... खुदा की इबादत में वो एक दुआ हमारी होगी, जिसमें मांगी हर खुशी आपकी होगी। जब भी कोई दस्तक सुनाई दे दिल से, समझो वो प्यारी सी आहट हमारी होगी।
मेरा भतीजा सिद्धार्थ दिल्ली रहता है। वह हाल ही में गांव जाकर आया था। वहां पापा एवं मां ने मेरे तबादले पर चिंता जताई लेकिन भतीजे ने गांव से दिल्ली लौटने के बाद पांच जुलाई को मैसेज भेजा... आई विश के आप भिलाई में और नाम रोशन करेंगे। दादोसा (मेरे पापा) कह रहे थे कि हीरे को कहीं भी भेज दो वो तो चमकेगा ही.....। प्राउड ऑफ यू....।
छह जुलाई को बिलासपुर के साथी श्री नरेश भगोरिया जो मूलतः इटारसी के रहने वाले हैं और पत्रकारिता में मेरे से भी ज्यादा समय से सक्रिय हैं, ने ब्लॉग पर जब रणधीर से संबंधित लेख पढ़ा तो वे भी भावुक हो और उन्होंने भी अपनी भावनाएं मैसेज के माध्यम से मुझे प्रेषित की। उन्होंने लिखा...सर, निश्चित रूप से आपका साथ हम सब के लिए ताउम्र याद रहेगा। ऐसा माहौल तो कभी नहीं मिलेगा। और बहुत सी बातें हैं जो लिखी नहीं जाएंगी पर दिल में हमेशा रहेगी। बस इतना ही कहूंगा.... सेल्यूट टू यू बॉस....।
सच में एक साल में कितना जुड़ गया था मैं। इस बात का एहसास मुझे आज हो रहा है। अपने लोगों एवं अपने प्रदेश से बाहर मुझे बिलासपुर में सहयोगियों एवं शहरवासियों का जो सहयोग मिला मैं उसका आभारी हूं और रहूंगा। साथियों एवं शुभचिंतकों ने मुझमें जो विश्वास दिखाया, मुझे जो सहयोग एवं स्नेह दिया वह मेरी लिए किसी पूंजी से कम नहीं। मैं उसे ताउम्र सहेज कर रखूंगा। यह रिश्ता अब टूटेगा नहीं। सचमुच महोब्बत दूर जाने के बाद ही रंग लाती है। बचपन से सुनते आए इस शेर का मर्म अब समझ में आया। शुक्रिया.... साथियों...।

जिंदगी के सफर में...


बिलासपुर से आने के बाद...

जिंदगी के सफर में वैसे तो ताउम्र कई लोग मिलते हैं, बिछडुते हैं और यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहता है, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, जो याद रह जाते हैं। याद रहने की वजह है कुछ लोगों से आत्मिक लगाव या जुड़ाव। सर्विस के दौरान भी ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं, जब साथ-साथ काम करने से आपस में एक स्नेह की भावना जुड़ जाती है। एक रिश्ता बन जाता है। यहां एक ऐसा ही उदाहरण है, जिसे मैं शायद ही भुला पाऊंगा। ......
पिछले साल की ही तो बात है, मेरे पास भोपाल से किसी परिचित ने फोन किया था। और कहा कि भाईसाहब एक रिज्यूम भिजवा रहा हूं। मेरा परिचित है। आपके यहां कोई वैकेन्सी हो तो प्लीज रख लेना। दूसरे दिन मुझे मेल के माध्यम से बायोडाटा मिल गया। युवक बिहार के आरां जिले से था। भोपाल में ही एक न्यूज पेपर में कार्यरत था। बायोडाटा में उसके फोन नम्बर देखकर मैंने तत्काल उसको अपने पास बुलवा लिया। जब इस संबंध में मैंने अपने सीनियर को अवगत कराया तो उन्होंने पूछा  कौन है, कैसा है, काम जानता है या नहीं  आपने बिना जाने ही कैसे बुलवा लिया। मैंने कहा कि परिचित ने बताया है, इस आधार पर बुलवाया है। काम का जानकार तो होगा ही। थोड़ा कम जानता होगा, तो मैं सीखा दूंगा। मेरी बात पर सीनियर आश्वस्त हो गए। खैर वह युवक मेरे कहे अनुसार निर्धारित दिन मेरे पास पहुंच गया और बोला सर मैं रणधीर। भोपाल से आया हूं। एकदम दुबला-पतला, गौरा सा युवक। एक बार देखा तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि यह युवक पत्रकारिता में है भी या नहीं। साक्षात्कार की औपचारिकता कर मैंने उसे ज्वाइन करने के लिए कह दिया। काम की शुरुआत में वह कुछ धीमा जरूर था लेकिन उसमें छिपी प्रतिभा रफ्ता-रफ्ता निखरने लगी। एक साल बाद तो हालत यह हो गई कि काम में रणधीर सबका चहेता बन गया। मुझे इस बात की खुशी थी कि मेरा चयन गलत साबित नहीं हुआ। करीब साल भर मेरे साथ काम करने से रणधीर मेरे से इतना घुलमुल गया कि मुझे बॉस कम अपना अभिभावक ज्यादा समझने लगा। अपने दुख-दर्द मुझसे साझा करने लगा। रणधीर भावुक प्रवृत्ति का है। एकदम उदास हो जाना। काम में गलती होने पर एकदम से उदास एवं निराश होकर बैठ जाना। मैं हमेशा उसको प्रोत्साहित करता, कहता यह सब पार्ट ऑफ जॉब है। काम करोगे तो गलती भी होगी। गलती काम करने वाले से ही होती है। शायद मेरी बात के मर्म को रणधीर ने अच्छी तरह से जान लिया था। तभी तो वह मेरा विश्वासपात्र बन गया। एकदम सपर्पित होकर काम करना, काम करते-करते उसमें ही डूब जाना, उसके जीवन का हिस्सा बन गया। अपनी इस खूबी का शायद खुद रणधीर को भी पता नहीं चला।
वक्त अपनी रफ्तार से दौड़ा चला जा रहा था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक दिन रणधीर बदहवाश
सा मेरे कक्ष में आया और बोला सर, पिताजी को कैंसर हो गया है, मुझे गांव जाना पड़ेगा। मैंने भी संकट की घड़ी में अभिभावक की तरह रणधीर को ढांढस बंधाया और तत्काल घर जाने की अनुमति दे दी। होनी को शायद कुछ और ही मंजूर था। घर जाने के करीब 15 दिन बाद रणधीर ने मुझे फोन पर दुखद समाचार सुनाया। वह बोला सर, पिताजी नहीं रहे। सुनकर मैं अवाक रह गया। फोन पर उसको क्या कहता। ज्यादा कुछ न कहकर बस इतना ही कह पाया कि सारे जरूरी काम निपटा लो।
करीब एक माह बाद रणधीर गांव से लौटा। चेहरे पर परेशानी देखकर मैंने हौसला बढ़ाया और कहा कि यह सब एक दिन होना ही था। यह जिंदगी की कड़वी हकीकत है। खैर, रणधीर ने पिताजी की मौत के गम को कभी अपने काम पर हावी नहीं होने दिया और उसी उत्साह एवं अंदाज में उसने काम शुरू कर दिया। कम उम्र में पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद होने वाली पीड़ा को बखूबी समझा जा सकता है लेकिन इस मामले में रणधीर ने बड़ी हिम्मत दिखाई दिया। उसने अपनी पीड़ा को जैसे अंदर ही अंदर समेट लिया हो। कार्यालय में मैंने उसको कभी उदास नहीं देखा। उसी जिंदादिली के साथ वह काम करने लगा।
अचानक एक और खबर से रणधीर टूट गया। मेरा तबादला हो गया, यह सुनकर वह उदास हो गया। बोला सर, हम अब काम नहीं करेंगे। आप जा रहे हैं तो हम भी बिहार चले जाएंगे। मैंने उसको बताया कि नौकरी में यह सब चलता रहता है। काम तो करना ही है कहीं भी कर लो। दिलासा देने के बाद रणधीर कुछ शांत हुआ। पांच जुलाई शाम को कम्प्यूटर पर बैठा था। नेट चालू किया तो देखा कि रणधीर ऑनलाइन है। दोनों के बीच नेट पर चेटिंग का सिलसिला एक बार शुरू क्या हुआ फिर खत्म होने का नाम ही नहीं लिया। दोनों के बीच हुई बातचीत को मैंने हुबहू मेल आईडी में सेव कर लिया। हमारे बीच का वार्तालाप तो देखिए....
मैं- क्या चल रहा है?
रणधीर-सर अब तो काम करने की इच्छा ही नहीं हो रही है। बाकी बस बढ़िया हैं सर। बिलासपुर कब आ रहे हैं।
मैं-क्यों ऐसा क्या हो गया है।
रणधीर-कुछ नहीं सर, आप चले गए तो अब क्या है।
मैं-काम करने की इच्छा क्यों नहीं हो रही? मैं क्या करता था। जो आप करते थे, वही अब कर रहे हो।
रणधीर-नहीं सर।
मैं-क्यों अब काम नहीं हो रहा क्या?
रणधीर- नहीं सर, कर रहा हूं, बट सर पहले जैसी बात नहीं है। अब तो सर ऑफिस आने की इच्छा भी नहीं होती है।
मैं-काम तो वही है, मैं ही बदला हूं।
रणधीर- जब आप बदल गए तो काम करने की इच्छा भी बदल ही जाएगी सर।
मैं-सोचो, कोई जन्मभर का साथ थोड़े ही निभाता है। अपना साथ इतना ही था, अब काम में मन लगाओ।
रणधीर- बट सर, कुछ लोग होते हैं, जिनकी याद कभी नहीं जाती।
मैं-याद करने से कौन रोक रहा है।
रणधीर- नहीं सर, बट सर अच्छा नहीं लग रहा है। ऐसा लगता है कि जॉब कर रहे हैं। आप थे तो घर जैसा लगता था सर।
मैं- कुछ दिन की बात है, फिर सब ठीक हो जाएगा।
रणधीर- नहीं होता है, सर। जो बात आपके साथ थी, वो अब कहां मिलने वाली है सर।
मैं-वक्त सब ठीक कर देगा। उम्मीद रखो। जो हुआ अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा।
रणधीर- वो तो आपका आशीर्वाद जब तक रहेगा तब तक अच्छा ही रहेगा सर।
मैं-मैं कहीं भी रहूं। मेरा आशीर्वाद रहेगा आपके साथ। काम तो करना ही पड़ेगा, जिंदगी पड़ी है सामने।
रणधीर- जी सर, बट सर, आपकी याद बहुत आती है सर।
मैं-जी लगाकर काम करो। कोई दिक्कत हो तो मुझे याद कर लेना। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
रणधीर- जी सर।
मेरे पास काम आ गया और चेटिंग का सिलसिला थम गया। बिलासपुर से भिलाई आए हुए आज तीसरा दिन ही था। मैं सोच रहा था कि पिताजी के देहांत से जरा सा भी विचलित न दिखाई देने वाला रणधीर मेरे तबादले से यकायक कितना भावुक हो गया। शायद मेरी उपस्थिति उसको संबल प्रदान करती थी। मेरे आने के बाद वह खुद को अकेला समझने लगा। खैर, रणधीर को मैंने कर्मचारी ना समझ कर हमेशा छोटे भाई की तरह समझा। 23 की उम्र में ही घर से बाहर आ गया वह। बिलासपुर में कौन था उसका। बस स्नेह व अपनेपन से उससे बतिया लेता तो उसको लगता कि कोई अपना तो है। रणधीर को मैं भुला नहीं पाऊंगा कभी। सच में। जवानी में ही पहाड़ सी जिम्मेदारियों का बोझ ढोने वाले रणधीर के लिए मेरे पास असीम शुभकामनाएं हैं। वह आगे बढ़े और प्रगति करे।

Wednesday, June 27, 2012

शहरहित में जरूरी है एकजुटता


टिप्पणी

तीन साल से बिलासपुर के लोग सीवरेज से परेशान हैं, लेकिन कोई बोल तक नहीं रहा था। न कोई आंदोलन न कोई जनजागरण। पक्ष- विपक्ष की तरफ से भी कोई बयान नहीं आया। जो कुछ था वह अंदर ही अंदर सुलग रहा था। टिकरापारा में हुए हादसे ने आग में घी का काम किया और लोगों को एक जोरदार मुद्‌दा हाथ लग गया। रातोरात कई संगठन बन गए। आंदोलन का शंखनाद हो गया। मंत्री-मेयर के खिलाफ मोर्चे खुल गए। जनजागरण अभियान तक शुरू हो गए। वैसे देखा जाए तो बिलासपुर में यह काम बखूबी होता है। कोई भी हादसा या दुर्घटना होने के बाद उसके विरोध में आंदोलन करने के लिए कोई न कोई संगठन या कमेटी का जन्म जरूर हो जाता है। एसपी राहुल शर्मा के मामले में भी एक ऐसा ही संगठन पैदा हुआ था। सोशल साइट पर दिवंगत एसपी के समर्थन में एक मुहिम चली, लेकिन उसका हश्र क्या हुआ सब जानते हैं। ऐसा पहले भी कई मामलों में हुआ है, जब इन मौसमी संगठनों की बुनियाद रखने वालों ने तात्कालिक लाभ उठाते हुए बहती गंगा में हाथ धो लिए।
जनता का क्या, वह तो वैसे ही परेशानी के भंवर में फंसी है। वह भले-बुरे का अंतर न समझते हुए आंदोलन की मुहिम में शामिल हो जाती है। और जब तक उसको आंदोलन की वजह समझ में आती है तब तक सारा खेल हो चुका होता है। देखा जाए तो आंदोलनों को लेकर बिलासपुरवासियों के  अनुभव खराब ही रहे हैं, लिहाजा लोग आंदोलन में जुड़ने से डर रहे हैं। विश्वास उठा हुआ है उनका, क्योंकि अक्सर आंदोलनों के सूत्रधार दवाब बनाकर अपना हित साध लेते हैं, समझौता तक कर लेते हैं। और आंदोलन में समर्थन करने वालों के हाथ कुछ नहीं आता। दूध का जला छाछ को फूंक कर पीता है। यही बात बिलासपुर के लोगों पर लागू होती है। सीवरेज पर जनजागरण शुरू हुआ है, लेकिन जैसी परेशानी लोग झेल रहे हैं, उसके अनुरूप इस मुहिम से जुड़ नहीं पा रहे हैं।
वैसे जनता का आक्रोश को देखते हुए पक्ष-विपक्ष के लोगों को बैठे बिठाए मुद्‌दा मिल गया है। रोज एक से एक नायाब बयान जारी हो रहे हैं। समाचार पत्रों के माध्यम से संवेदनाएं व्यक्त हो रही हैं। जनता के बीच जाने तक ही हिम्मत नहीं हो रही है। जनप्रतिनिधि कहलाते हैं, लेकिन जन से ही डर रहे हैं। लोग गुस्से में हैं। पता नहीं क्या कर बैठें।  ऐसे में सवाल उठता है कि बयानों और आश्वासनों के माध्यम से जनता को आखिर कब तक बहलाया जाता रहेगा।
बहरहाल, सीवरेज के खिलाफ आंदोलन अच्छी शुरुआत है, बशर्ते इसका हश्र पिछले आंदोलनों जैसा न हो और इसमें किसी प्रकार की राजनीति न हो। बार-बार आंदोलनों की राजनीति से मार खाए लोग फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे हैं। अगर वाकई आंदोलन के पीछे मतलब के बजाय सिर्फ और सिर्फ जनहित व शहरहित है तो लोगों को इस आंदोलन में साथ देना चाहिए।  भले ही समर्थन देने से पहले वे आंदोलन करने वालों की पृष्ठभूमि का पता लगा लें, ताकि बाद में ठगे जाने का अंदेशा ना रहे। मामला विकास से जुड़ा है, इसमें राजनीति न होकर केवल शहर हित की बात हो। सीवरेज के खिलाफ भले ही अलग-अलग विचारधारा के लोग हों लेकिन बिना किसी लागलपेट के शहरहित में एकमंच पर आने में संकोच नहीं करना चाहिए। शहरहित में एकजुटता जरूरी भी है तभी यहां के जनप्रतिनिधियों के बात अच्छी तरह से समझ में आएगी। आंदोलन के साथ-साथ सीवरेज की खामियों, अनियमितताओं और सीवरेज जनित हादसों के दोषियों के खिलाफ अगर सिलसिलेवार एफआईआर भी दर्ज हो तो इसमें किसी प्रकार कोताही नहीं बरती जानी चाहिए।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 27 जून 12 के अंक में प्रकाशित।

Monday, June 18, 2012

सीवरेज पर सियासत कब तक


टिप्पणी

शहर में बारिश से निपटने की तैयारी कैसी है, इस बात का अहसास उन लोगों को बखूबी हो गया होगा, जो रविवार को मामूली बूंदाबांदी से ही हलकान हो उठे। यकीनन इस बार की बारिश बिलासपुर पर बहुत भारी पड़ने वाली है। यह भविष्यवाणी नहीं बल्कि हकीकत है और इसकी झलक दिखाई देने भी लगी है। जरा सी बूंदाबांदी ने शहरवासियों को भावी खतरे से आगाह  कर दिया है। चिंतनीय विषय यह है कि मामूली बारिश ने ही लोगों का घरों से निकलना मुश्किल कर दिया है। भारी बरसात के दौरान क्या होगा, सोच कर आमजन भयभीत है। सीवरेज की खुदाई से उखड़ी सड़कों पर बिछाई गई मुरुम व मिट्‌टी बारिश की बूंदों से फिसल पट्‌टी में तब्दील हो गई हैं। जिधर देखो उधर कीचड़ ही कीचड़ है या सड़कों पर बने गड्‌ढ़ों में पानी भरा है। हालात इस कदर खराब हैं कि लोगों को निकलने के लिए ठीक से रास्ता तक नहीं मिल  पा रहा है। निगम भले ही दावों की दुहाई दे, इंतजामों की बात करें लेकिन दावे और इंतजाम कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। समूचा शहर बदइंतजामी का शिकार है। हर जगह सीवरेज के गड्‌ढ़े व उखड़ी सड़कें शहर की बदहाली को बयां कर रहे हैं। लोग कीचड़ से होकर गुजर रहे हैं। फिसल रहे हैं और व्यवस्था को कोस रहे हैं। खैर, हल्की बारिश ने खतरे की घंटी बजा दी है और यह भी बता दिया है कि निगम के दावों में दम कतई नहीं है। अगर आप निगम के दावों पर भरोसा कर भी रहे हैं तो यह आपके लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
 देखा जाए तो बुनियादी सुविधाओं तक को तरसने वाले बिलासपुर में विकास कम सियायत ही ज्यादा हो रही है। शहर के नेताओं ने पता नहीं क्यों आंखों पर पट्‌टी बांध रखी है जो उनको शहर की दुर्दशा दिखाई नहीं देती है। कानों में भी पता नहीं क्या डाल रखा है जो लोगों की पीड़ा सुनाई नहीं देती है। शहर की समस्याओं के लिए आंदोलन की घोषणा करने वाले भी लगता है  अज्ञातवास पर चले गए हैं। शहरवासी संकट में हैं लेकिन अब उनका कोई बयान तक नहीं आ रहा है। कल परसों चक्काजाम की चेतावनी देने वाले, कलक्टर को ज्ञापन देने वाले यकायक खामोश हो गए तो वार्डों-वार्डों में धरना देने वाले भी पता नहीं अचानक कहां भूमिगत हो गए हैं। इन घटनाक्रमों से इतना तो तय है कि शहर के नेता सिर्फ श्रेय लेने या सस्ती लोकप्रियता हासिल करने तक ही सीमित हैं, शहर की जनता से उनको कोई मतलब नहीं है। वैसे भी नेताओं के भरोसे रहकर आश्वासनों की रेवड़िया एवं वादों के लॉलीपाप के सिवाय कुछ हासिल नहीं होने वाला, क्योंकि शहर में विकास के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेकने का काम ही ज्यादा हो रहा है। आमजन की चुप्पी का फायदा नेता लोग बखूबी उठा रहे हैं। यह लोग महज दिखावे के नाम पर एक दूसरे से खिलाफ लड़ रहे हैं, बयान जारी कर रहे  हैं लेकिन पर्दे के पीछे तालमेल भी उतना ही है। जनता को विकास के नाम पर बेवकूफ बनाना किसी नौटंकी से कम नहीं है।
बहरहाल, शहरवासियों ने सब्र भी खूब रखा और जनप्रतिनिधियों पर विश्वास भी उतना ही किया लेकिन अब सब्र जवाब देने लगा है और विश्वास उठ रहा है। एकजुटता के साथ जब तक आवाज नहीं उठेगी तब तक परेशानी का भंवर कम नहीं होगा। ज्यादा नहीं तो इस बात का संकल्प जरूर कर लिया जाए कि सीवरेज पर सियासत करने वालों को उचित समय आने पर मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। आखिरकार आश्वासन देने वालों और विकास के नाम पर सियायत करने वालों को आइना दिखाना भी तो जरूरी है।


साभार - पत्रिका बिलासपुर के 18  जून 12  के अंक में प्रकाशित।



Thursday, June 14, 2012

तेरी महफिल में मगर हम ना होंगे

स्मृति शेष
विडम्बना देखिए कभी 'मोहब्बत करने वाले कम ना होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम ना होंगे' जैसी गजल को अपनी आवाज देने वाले मेहदी हसन पर इस गजल के बोल ही मौजूं हो गए। वैसे उनकी रुमानी आवाज एवं गजलों के मुरीद लाखों हैं, लेकिन उनके इस दुनिया से रुखसत होने के बाद उनके प्रशंसकों की संख्या में और भी इजाफा हो गया है। बीमारी से लम्बे संघर्ष के बाद उन्होंने बुधवार दोपहर को अंतिम सांस ली। उनके इलाज के लिए राजस्थान सरकार ने भी पेशकश की थी लेकिन यह काम बहुत देरी से हुआ। चिकित्सकों ने नासाज तबीयत देखते हुए उनको बाहर जाने की इजाजत नहीं  दी। हकीकत में उस वक्त हसन ऐसी स्थिति में थे भी नहीं कि वे भारत आकर इलाज करवाते। वे 12  साल से फेफड़ों में संक्रमण से जूझते रहे, लेकिन उनके इलाज को लेकर शायद ही कोई पेशकश हुई हो। अब उनके जाने के बाद उनकी यादों को चिरस्थायी बनाने के जतन किए जा रहे हैं। उनके पैतृक गांव लूणा में उनकी प्रतिमा लगाने की बात भी कही जा रही है। यह भी एक संयोग ही है कि लूणा गांव की याद भी हसन के जाने के बाद ही आ रही है।
राजस्थान के झुंझुनूं जिला मुख्यालय से करीब 15  किलोमीटर की दूरी पर स्थित है लूणा गांव है। 18  जुलाई 1927  को इस गांव में पैदा होने के बाद हसन भारत-पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे। हसन जैसे बड़े फनकार को पैदा करने का गौरव हासिल करने वाला लूणा गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है। जिस गांव का नाम हसन ने समूची दुनिया में रोशन किया, उस गांव की कद्र सरकार ने कभी नहीं ली। लूणा गांव में पक्की सड़क भी इस वक्त बनी जब मेहदी हसन लूणा आए थे।  इतना ही नहीं उसी वक्त हसन ने अपने अपने दादा इमाम खान व मां अकमजान की मजारों की मरम्मत करवाई थी। गांव में उनके आगमन पर लड्‌डू भी बंटे थे। फिलहाल रखरखाव के अभाव में दोनों मजारें जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं। गांव के स्कूल की बगल में बनी यह मजारें अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। इनकी खैर-खबर लेने वाला गांव में कोई नहीं है। दुखद विषय है कि हसन की वजह से प्रसिद्धि पाने वाले लूणा गांव में सरकार से और कोई बड़ा काम नहीं हुआ। उनको यादों को सहेजने या चिरस्थायी बनाने की पहल भी कभी नहीं हुई। अगर सरकार हसन के जीते जी लूणा के लिए कुछ कर पाती तो इस महान फनकार को कितनी खुशी मिलती कल्पना नहीं की जा सकती। एक तरफ सरकार की बेरुखी देखिए और दूसरी तरफ हसन का मातृभूमि के प्रति प्रेम। सन 1978  में वे एक कार्यक्रम के सिलसिले में जयपुर आए तो उन्होंने लूणा जाने की इच्छा जाहिर की। लूणा में प्रवेश करते हुए हसन इतने भावुक हो गए कि गाड़ी से उतर कर टीले की बलुई रेत में लौटने लगे। मातृभूमि से बिछुड़ने के गम में भाव विह्वल हसन को देख वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गई थी।
बहरहाल, राज्य सरकार वाकई गंभीर है और इस फनकार के लिए कुछ करना चाहती है तो उसकी याद में कुछ ऐसा हो जिस पर आने वाली पीढ़ियां भी फख्र करें। लूणा की मिट्‌टी में पैदा होकर उसकी खुशबू दुनिया में फैलाने वाले हसन के लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी। हसन की बीमारी में उनकी सलामती  के लिए दुआ एवं प्रार्थना करने वालों की तो दिली ख्वाहिश है कि लूणा में हसन की याद में संगीत अकादमी की स्थापना हो। वैसे मांग जायज भी है क्योंकि गंगा-जुमनी संस्कृति के संवाहक तथा साम्प्रदायिक सद्‌भाव की मिसाल झुंझुनूं से मुफीद जगह शायद ही हो। हसन के इलाज की पेशकश करने वाली राज्य सरकार अगर हसन की याद में लूणा में संगीत अकादमी की घोषणा करती है तो संगीत प्रेमियों से लिए इससे बड़ी सौगात और हो भी नहीं सकती।

नोट : फोटो कैप्शन- लूणा स्थित मेहदी हसन के परिजनों की मजार, जो रखरखाव के अभाव में जर्जर हो गई है। गांव में इनकी सारसंभाल करने वाला कोई नहीं है।