Friday, September 16, 2011

उदासीनता उचित नहीं

पत्रिका तत्काल
शहर की लोगों की गणेश महोत्सव की खुमारी ठीक से उतरी भी नहीं थी कि सोमवार को दो बड़ी वारदातों से शहर सहम गया। पहली वारदात में लालखदान रेलवे फाटक के पास एक अधेड़ की सरेराह गोली मारकर हत्या कर दी गर्इ जबकि दूसरी वारदात में शहर के व्यस्तम इलाके तेलीपारा में अपने घर के बाहर गणेश विसर्जन की झांकी देख रही एक महिला की तलवार मारकर नृशंस हत्या कर दी गर्इ। दोनों ही वारदातों के पीछे जो कारण सामने आ रहे हैं, उनमें एक प्रमुख कारण पुलिस की उदासीनता भी माना जा रहा है। लालखदान में लम्बे समय से थाने की मांग की जा रही है, क्योंकि यहां बाहरी लोगों की बसावट होने के कारण आपराधिक गतिविधियों की आशंका ज्यादा रहती है। तेलीपारा में महिला की हत्या के बाद पुलिस पर  इस बात को लेकर अंगुली उठार्इ जा रही है कि उसने इस मामले में लगातार मिल रही शिकायतों को नजरअंदाज किया।
बहरहाल, दोनों की मामलों में पुलिस आरोपियों की सरगर्मी से तलाश कर रही है, लेकिन एक ही दिन हुर्इ इन दोनों वारदातों से इतना तो तय है कि पुलिस अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन भली भांति से करती तो शायद दो जिंदगियों को यूं सरेराह शांत नहीं किया जाता। देखा गया है कि रिकॉर्ड दुरुस्त रखने के चक्कर में पुलिस अक्सर छोटी-मोटी घटनाओं को गंभीरता से नहीं लेती और थाने में आने वाले परिवादियों को ऐसे ही टरका दिया जाता है जबकि इन घटनाओं में से ही कुछ कालांतर में बड़े हादसे में तब्दील हो जाती हैं। पुलिस को इस प्रकार की वारदातों को हल्के में कतर्इ नहीं लेना चाहिए। उसे प्रकार की वारदातों से न केवल सबक लेना चाहिए बल्कि चुनौती मानकर काम करना चाहिए। तभी तो वह थानों में आने वाले परिवादियों की भावनाओं को समझ कर उनके साथ न्याय कर पाएगी। पीडि़तों की शिकायतों का  निराकरण समय पर पाएगी। शिकायतों पर शुरुआती दौर में अगर गंभीरता नहीं बरती गई तो अपराधी पुलिस की उदासीनता का फायदा उठाकर आपराधिक वारदातों को इसी प्रकार अंजाम देते रहेंगे।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 13  सितम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Saturday, September 10, 2011

मनमर्जी की आपूर्ति

टिप्पणी
इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि जिस दिन राजधानी  रायपुर में मुख्यमंत्री 'सांची'  दूध के नए ट्रेड मार्क 'देवभोग' का लोकार्पण कर रहे थे, उस दिन न्यायधानी बिलासपुर में दूध का वितरण ही नहीं हुआ। यह कोई एक दिन की कहानी नहीं है। बिलासपुर के साथ ऐसा अक्सर होता है। जब जी में आए रायपुर से दूध की आपूर्ति बिना किसी पूर्व सूचना के रोक दी जाती है। मजबूरी में उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत पर ऐसा दूध खरीदना पड़ रहा है, जिसकी शुद्धता की भी कोई गारंटी नहीं है। रायपुर सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ लिमिटेड के अधिकारियों की इस 'मनमर्जी' के कारण उपभोक्ताओं का दोहरा नुकसान उठाना पड़ रहा है। सोचनीय विषय तो यह है कि समस्या लम्बे समय से निरंतर बनी हुई है लेकिन रायपुर एवं बिलासपुर के अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। एक अनुमान के मुताबिक सामान्य दिनों में बिलासपुर में साठ हजार लीटर दूध की मांग प्रतिदिन है लेकिन रायपुर दुग्ध उत्पादक संघ से मात्र 15 हजार लीटर दूध ही आता है, इसमें से भी चार हजार लीटर दूधर कोरबा चला जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है संघ मांग का 25 फीसदी दूध ही वितरण बड़ी मुश्किल से कर पा रहा है। संघ की स्थानीय शाखा को एक हजार लीटर जिले से एकत्रित करने का लक्ष्य है लेकिन आंकड़ा तीन सौ-चार सौ लीटर से आगे नहीं बढ़ पाता है। त्योहारों में दूध की मांग और भी बढ़ जाती है। ऐसे में निजी क्षेत्र के लोग न केवल जमकर चांदी कूटते हैं बल्कि उपभोक्ताओं को गुणवत्ता से परिपूर्ण दूध भी मुहैया नहीं करवाते।
देखा जाए तो राज्य में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए कभी गंभीरता से प्रयास हुए ही नहीं हैं। दूध की किल्लत खत्म करने तथा दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए अब भले ही नए सिरे से कवायद की जा रही हो लेकिन पूर्व में भी दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए चलाई गई योजनाएं भी उपभोक्ताओं को लाभान्वित किए बिना ही दम तोड़ गईं। पूर्व में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के नाम पर ऐसे 'किसानों' को ऋण बांट दिया जो राजनेताओं या नौकरशाहों के करीबी थे। मतलब साफ है, ऋण पाने वालों में कई किसान ही नहीं थे। ऐसे में दुग्ध उत्पादन कैसे बढ़ता तथा योजना का हश्र क्या होता, सहज की कल्पना की जा सकती है। लापरवाही एवं  अंधेरगर्दी की इससे बड़ी हद और क्या होगी कि बिलासपुर जिले में चालू की गई समितियों में से वर्तमान में इक्का-दुक्का ही संचालित हैं। इससे भी गंभीर बात तो यह है कि बिलासपुर दुग्ध केन्द्र में लाखों रुपए के उपकरण महज इसलिए धूल फांक रहे हैं कि उनकी क्षमता के मुताबिक दूध एकत्रित नहीं हो पा रहा है।
बहरहाल, दूध का ट्रेड मार्क बदलने से उसकी किल्लत मिटने वाली नहीं है। आम आदमी से जुड़े इस मसले में जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होगी तब तक यह खेल यूं ही चलता रहेगा। सबसे जरूरी बात है कि पुरानी भूलों एवं गलतियों में सुधार हो। लम्बे समय से संघ में जमे बैठे अकर्मण्य अधिकारियों-कर्मचारियों को न केवल इधर-उधर किया जाए बल्कि उन पर पूर्ण नियंत्रण भी हो। योजनाएं बनाने से पूर्व उनकी क्रियान्विति कैसी होगी, इस पर विचार करना भी निहायत जरूरी है, क्योंकि पूर्व की योजनाओं में   इस बात की कतई पालना नहीं हुई। अगर सरकार एवं संघ गंभीर हैं तो उपभोक्ताओं को मांग के हिसाब से दूध की आपूर्ति करने का हल तत्काल खोजें अन्यथा  बिलासपुर को मिल्क हब बनाने का सपना, सपना ही रह जाएगा।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 10 सितम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Friday, September 9, 2011

'अ' से अरपा और आमजन

टिप्पणी
एक अरसे बाद अरपा को अनूप (जल से परिपूर्ण) देख लोग उत्साहित हैं। मामला आस्था व अकीदत से जुड़ा है, लिहाजा लोगों को अरपा से खासा अनुराग भी है। तभी तो इस अनूठे व अनोखे अवसर को देख लोग बेहद रोमांचित हैं। वैसे भी पूर्ण आवेग से बहती अरपा का आकर्षक नजारा किसी अजूबे से कम नहीं है। उसकी उफनती अतुलनीय व अद्वितीय अदाओं व आश्चर्यजनक अंदाजों को कैमरे में कैद करने की होड़ सी लगी है, गोया अक्कासी (फोटोग्राफी) की कोई प्रतियोगिता हो। मोबाइल लिए सैकड़ों अक्कास (फोटोग्राफर) अकस्मात ही पैदा हो गए हैं। शनिचरी रपटे का नजारा तो किसी उत्सव से कम नहीं। अपार हर्ष से लबरेज लोग बड़ी शिद्‌दत के साथ अरपा के साथ आनंद मना रहे हैं, झूम रहे हैं। कुछ अति उत्साही तो खुशियों के अतिरेक में अमान (सुरक्षा) को भी दरकिनार कर रहे हैं। अरपा की इस अंगड़ाई को आमजन अचरज से निहार रहा है लेकिन उसके आवेश एवं आक्रोश से अनजान बना है। लम्बे अंतराल के बाद उदासी का लबादा उतार कर उफनी अरपा आम लोगों के लिए नया अनुभव हो सकती है लेकिन जान की कीमत पर कतई नहीं।
क्योंकि जीवन अनमोल है। उत्साह में अक्लमंदी जरूरी है। प्रशासन की मुनादी की अवहेलना नहीं उस पर अमल आवश्यक है। अफवाहों से सावधान एवं सावचेत रहना भी जरूरी है। पता नहीं अति उत्साह में  कब कोई आपका अजीज इस अवाम से अलविदा हो जाए और आपकी आंखों में अश्क व लबों पर अफसोस के अलावा कुछ नहीं रहे।
इन सब के अलावा अरपा का दूसरा रूप भी है। अतिवृष्टि के चलते अंतः सलीला की अतुराई (चंचलता) से लोग भले ही उत्साहित हों लेकिन इससे अब अपकार (अहित) ज्यादा हो रहा है। इसका रौद्र रूप देखकर लोग अनहोनी और अमंगल की आशंका में अधीर हो चले हैं। अरपा किनारे आबाद कई आशियानों का तो अस्तित्व ही गायब हो गया है। गाढ़ी कमाई से तैयार किए गए आशियानों को छोड़कर अन्यत्र जाने में लोग असहज महसूस कर रहे हैं, उनको असुविधा हो रही है, लेकिन सवाल जिंदगी का है। अरपा से आहत अधिकतर लोगों पर प्रशासनिक अमले की अनुकम्पा तो बनी हुई है लेकिन लोग इससे असंतुष्ट दिखाई देते हैं। राहत के नाम पर किए गए प्रबंध नाकाफी हैं। उनमें अव्यवस्था होने से लोगों में असंतोष है। बहरहाल, आसमान के नीचे आए लोगों को नीड़ के फिर से निर्माण के लिए अनकूल मौसम का इंतजार है। ...और आर्थिक मदद का भी।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 9 सितम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Thursday, September 8, 2011

दूरदर्शिता का अभाव

टिप्पणी

तीन साल पहले जिस उद्‌देश्य के साथ शहर में ऑडिटोरियम का निर्माण शुरू हुआ था, वह अभी तक अधूरा ही है। इस ऑडिटोरियम को दो साल में बनकर तैयार तैयार होना था लेकिन यह शुरुआती दौर में ही विवादों में घिर गया। अभी तक इसका बेसमेंट पार्किंग का काम ही हो सका है जबकि इस ऑडिटोरियम में बेसमेंट में कार और भूतल पर दो पहिया वाहनों के पार्किंग का निर्माण किया जाना है। इसके अलावा ऊपरी तल पर ऑडिटोरियम तथा ओपन थियेटर का निर्माण भी प्रस्तावित है। वर्तमान में ऑडिटोरियम का निर्माण कार्य बंद है, क्योंकि इसकी ड्राइंग डिजाइन पर आपत्ति उठने के बाद उसे  निरस्त कर दिया गया। नगर निगम प्रशासन फिलहाल नई डिजाइन का इंतजार कर रहा है। जैसे ही नई डिजाइन आएगी कार्य फिर से शुरू होगा।
ऑडिटोरियम निर्माण पर महापौर भी सवाल उठा चुकी हैं। उन्होंने बाकायदा सदन में आरोप लगाया था कि ऑडिटोरियम का निर्माण गलत तरीके से हो रहा है तथा इससे कभी भी जनहानि हो सकती है। इधर, निगम के अधिकारी महापौर के आरोपों में दम नहीं बता रहे हैं। भले ही निगम के अधिकारी कुछ भी कहें लेकिन ऑडिटोरियम को लेकर जो हालात उपजे हैं, उससे अनियमितता की आशंका बलवती को उठी है। इन बातों से इतना तो तय है कि ऑडिटोरियम के निर्माण कार्य को निगम अधिकारियों ने गंभीरता से नहीं लिया। साथ ही कई ऐसे सवाल भी उठ खड़े हुए हैं, जिनसे निगम की भूमिका संदिग्ध दिखाई दे रही है। मसलन, आम लोगों को भवन निर्माण के दौरान नियम-कायदों की औपचारिकता में अटका देने वाले निगम अधिकारियों ने इस काम की कार्ययोजना पहले से तैयार क्यों नहीं की? जिस डिजाइन पर हंगामा बरपा है, उसको तैयार करने में गंभीरता क्यों नहीं बरती गई? ऑडिटोरियम बनने की निर्धारित समयावधि की पालना क्यों नहीं की गई? सहित ऐसे कई सवाल हैं, जो निगम अधिकारियों  को कठघरे में खड़ा करते हैं। जाहिर सी बात है कि निर्धारित समयावधि गुजर जाने के कारण ऑडिटोरियम के लिए प्रस्तावित लागत सात करोड़ 80 लाख 58 हजार में भी वृद्धि होगी।
बहरहाल, इस समूचे मामले से इतना तो तय है कि अनुभवहीन एवं अदूरदर्शी अधिकारियों के  हाथों में अगर इसी प्रकार बड़ी जिम्मेदारी दी जाती रही तो योजनाओं का हश्र ऐसा ही होगा। निगम के उच्च अधिकारी अगर बड़े प्रोजेक्ट की कार्ययोजना तैयार करवाने में किसी अनुभवी एवं दूददर्शी अधिकारी को तरजीह दें तो निसंदेह उसके परिणाम भी आशातीत आएंगे। इतना ही नहीं योजनाओं में गंभीरता न बरतने वाले तथा अदूरदर्शितापूर्ण निर्णय लेने वाले अधिकारियों से अतिरिक्त खर्च होने वाली राशि वसूलने का प्रावधान भी हो ताकि कोई ऐसी हिमाकत ही नहीं करे।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 8 सितम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Friday, September 2, 2011

बेतुका निर्णय

टिप्पणी
स्कूल शिक्षा विभाग ने एमएड एवं बीएड छात्रों की  फीस के संबंध में  संशोधित आदेश जारी किया है। संशोधित आदेश के अनुसार अब छात्रों को फीस की धनराशि में कम से कम एक हजार रुपए की राहत प्रदान की गई है साथ ही फीस जमा करने में देरी होने पर 25 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से वसूले जाने वाले विलम्ब शुल्क को भी वापस ले लिया है।  21 जुलाई को फीस तय करने के बाद अब 27 अगस्त को उसमें संशोधित करना यह दर्शाता है कि विभाग के नीति नियंता आंखें मूंदकर ही नियम बना रहे हैं।  संशोधित नियम में पुरानी भूलों एवं गलतियों को कुछ हद तक दुरुस्त करने का प्रयास तो किया गया है लेकिन उनसे सबक नहीं लिया गया है। जो काम सत्र के शुरुआत में हो जाना चाहिए था, वह देरी से हो रहा है। एक माह से अधिक समय बीतने के बाद विभाग का संशोधित  निर्णय जारी करना सांप गुजरने के बाद लाठी पीटने के समान ही है। फीस के मामले में किया गया संशोधन न केवल अव्यवहारिक है बल्कि बेतुका भी है।
संशोधन जारी करने के पीछे विभाग की क्या मंशा रही यह तो विभाग जाने लेकिन इससे छात्रों को किसी प्रकार की राहत नहीं मिलने वाली। बीएड के छात्रों की प्रथम सूची 12 अगस्त को जारी हुई थी तथा 18 अगस्त तक प्रवेश हुए। दूसरी सूची भी 25 अगस्त को जारी हुई तथा इसमें प्रवेश शुक्रवार तक होने हैं। जाहिर है  इस अवधि में प्रथम सूची के सभी छात्रों ने  फीस जमा करवा दी है जबकि दूसरी सूची के भी अधिकतर छात्र फीस जमा करवा चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि जो छात्र 12 से 27 अगस्त के बीच अतिरिक्त फीस जमा करवा चुके हैं, उनको राहत कैसे मिलेगी। उनसे वसूली गई फीस वापस कैसे होगी। इसी प्रकार का गड़बड़झाला पिछले सत्र में भी हुआ हो चुका था। वह मामला भी अभी तक सुलझ नहीं पाया है। विभाग ने अधिक वसूली गई राशि के लिए संबंधित कॉलेजों को दिशा-निर्देश जारी कर अपनी औपचारिकता पूरी कर ली, लेकिन छात्रों को राशि नहीं मिली। राशि के लिए छात्र, कॉलेज एवं विभाग के बीच फुटबाल बने हुए हैं। उनको ज्ञापन, धरना व प्रदर्शन जैसे उपक्रम भी करने पड़ रहे हैं।
बहरहाल, लगातार दूसरे सत्र में इसी प्रकार की गफलत से यह तो तय है कि विभाग ने पुरानी गलतियों से कोई सबक नहीं लिया है। साथ ही विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान उठने लगे हैं। संशोधित निर्णय जारी करते समय अधिक वसूली गई फीस को वापस करने का रास्ता दिखाया जाता तो बेहतर होता, क्योंकि इस निर्णय से छात्रों को राहत कम उनकी मुश्किलें ज्यादा बढ़ने वाली हैं। उम्मीद की जानी चाहिए लगातार दो सत्रों से दोहराई जा रही गलती फिर नहीं होगी। साथ ही फीस वापस लौटाने का रास्ता भी विभाग को निकालना होगा, क्योंकि इसमें छात्रों की तो कोई गलती है नहीं।  अगर कॉलेज, विभाग के दिशा-निर्देश नहीं मानते हैं तो उन पर भी कड़ी कार्रवाई की जाए।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 2 सितम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Wednesday, August 31, 2011

कब टूटेगी कुंभकर्णी नींद

टिप्पणी
सरकारी विभाग दिशा निर्देश जारी करने में जितनी तत्परता दिखाते हैं, उतनी उनके पालन करवाने में नहीं। बिलासपुर के एक स्कूल पर आकाशीय बिजली गिरने के बाद विभाग ने सभी शासकीय एवं अशासकीय स्कूलों में तडि़त चालक लगाने के निर्देश जारी किए थे। उदासीनता की इससे ज्यादा इंतहा और क्या होगी कि इन निर्देशों को जारी किए दस साल से भी ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन स्कूलों में तड़ित चालक नहीं लग पाए हैं। इससे विभाग की कार्यकुशलता का भी सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। लगातार दस साल तक बारिश के मौसम में नौनिहाल मौत के साये में भयभीत होकर अध्ययन करते रहे लेकिन विभाग की कुंभकर्णी नींद नहीं टूटी। वैसे भी छत्तीसगढ़ राज्य में दूसरे राज्यों के मुकाबले आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं ज्यादा होती हैं। बारिश के मौसम में तो अमूनन रोजाना ही कहीं न कहीं से बिजली गिरने तथा उससे जनहानि होने की खबरें आती रहती हैं। मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो यहां पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण बादल गरजने तथा बिजली गिरने की घटनाएं ज्यादा होती हैं।
मामला गंभीर इसलिए भी है क्योंकि बिलासपुर जिले में 22 सौ प्राथमिक शिक्षा केन्द्र, छह सौ मिडिल स्कूल, सौ से ऊपर  हायर सैकण्डरी स्कूल तथा दो सौ के करीब हाई स्कूल हैं। इस प्रकार जिले में तीन हजार से ऊपर स्कूल हैं।  इनमें अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या तो हजारों में है। सन 2001 में बर्जेश स्कूल भवन पर आकाशीय बिजली गिरने तथा उसमें एक छात्रा के हताहत होने के बाद जिला शिक्षा विभाग ने सभी स्कूलों में तड़िल चालक लगाने के निर्देश जारी किए थे। साथ में निर्देशों के पालन न करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की बात भी कही गई थी। निर्देशों के बाद कई अशासकीय स्कूल संचालकों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अपने यहां तड़ित चालक लगवा लिए लेकिन शासकीय स्कूलों का मामला अटक गया। दस साल से अधिक समय गुजरने के बाद तड़ित चालक तो दूर एक भी व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है, हालांकि विभाग के आला अधिकारी इस बात को स्वीकर करते हैं कि इस मामले में लापरवाही बरती गई है।
बहरहाल, शिक्षा विभाग के अधिकारी इस मामले में नए सिरे से जानकारी जुटा कर कडे़ निर्देश जारी करने तथा व्यवस्था में जल्द सुधार करने की बात कह रहे हैं। विभाग अगर इस मामले में वाकई गंभीर है तो उसे निर्देश का पालन तत्काल करवाना चाहिए। निर्देश के पालन में आई रुकावटों को दूर करने की दिशा में भी काम होना चाहिए। साथ ही इतना लम्बा समय गुजरने के बाद भी निर्देश लागू क्यों नहीं हो पाए, इसके कारणों की पड़ताल करना भी जरूरी है। उम्मीद की जानी चाहिए शिक्षा विभाग नोटिस देने जैसी औपचारिकता से आगे बढ़कर मामले की गंभीरता को देखते एवं समझते हुए कार्रवाई करेगा।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 31 अगस्त 11 के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, August 30, 2011

सद्‌भाव की सरिता

टिप्पणी
न्याय की नगरी बिलासपुर अपने आप में कई विशेषताओं को समेटे हुए है। शहर में विभिन्न संस्कृतियों का समागम तो है ही यहां का साम्प्रदायिक सद्‌भाव भी गजब का है। गंगा-जमुनी संस्कृति के संवाहक यहां के लोग इतने संजीदा एवं जिंदादिल हैं कि सम्प्रदाय विशेष की मानसिकता से ऊपर उठकर सामूहिक रूप से त्योहार मनाते हैं। तभी तो यहां के सद्‌भाव की अक्सर मिसाल दी जाती है। यह यहां के सद्‌भाव एवं कौमी एकता का ही कमाल है कि जो यहां एक बार आया तो फिर यहीं का होकर रह गया। वैसे तो बिलासपुर में साल भर विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों के दर्शन वहां के स्थानीय पर्वों के रूप में होते रहते हैं, लेकिन इस बार एक सुखद संयोग भी जुड़ा है। संयोग यह है कि ईद व गणेश चतुर्थी  एक दूसरे केआगे-पीछे ही आ रहे हैं। वैसे माना जा रहा है कि 30 अगस्त को चांद दिखा तो ईद  31 अगस्त को और नहीं दिखा तो फिर एक सितम्बर को मनेगी। अगर ईद एक को हुई तो दोनों त्योहार एक ही दिन भी मनाए जा सकते हैं। ऐसे में शहर के साम्प्रदायिक सद्‌भाव में एक अध्याय और जुड़ जाएगा।
दोनों त्योहारों की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि इनमें न केवल दोनों संस्कृतियों के रंग मिलते हैं बल्कि 'राम' और 'रहमान' की सहभागिता भी बराबर रहती है। पुलिस लाइन में मनाया जान वाला गणेश उत्सव तो अपने आप में ही अनूठा है। सुनकर खुशी मिश्रित आश्चर्य होता है कि यहां कि गणेशोत्सव समिति में जमुनी तहजीब के डेढ़ दर्जन लोग सरंक्षक से लेकर कार्यकर्ता की भूमिका में है। शहर के अन्य कई गणेशोत्सव में इसी प्रकार की सहभागिता दिखाई देती है। खास बात यह है शहर में यह परम्परा लम्बे समय से चली आ रही है। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि कई सियासी उलटफेर एवं साम्प्रदायिक झंझावत भी शहर की इस साझी विरासत का बाल तक बांका नहीं कर पाए। विषम परिस्थितियों में भी यहां के लोग एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आए। समय के साथ कदमताल करती शहर की यह साझा विरासत दिन दूनी रात चौगुनी और भी मजबूत व प्रगाढ़ हो रही है। सद्‌भाव व एकता का जज्बा यहां के जर्रे-जर्रे में है। शायद यहां के पानी की तासीर ही ऐसी है। तभी तो यहां इस प्रकार के सद्‌भाव की सरिता बहती है।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 30 अगस्त11 के अंक में प्रकाशित।

Monday, August 29, 2011

अन्नागिरी और बिलासपुर

टिप्पणी
बारह दिन तक चली 'जनतंत्र की जंग' के बाद मिली 'जीत' का जश्न मनाने के लिए शायद इससे बेहतर कोई दूसरा तरीका हो भी नहीं सकता था। यह एक तरह की 'खुशियों की बारात' थी, जिसमें शामिल हर आम और खास के चेहरे पर विजयी मुस्कान साफ-साफ जाहिर हो रही थी। खुशी के मारे हर 'बाराती' झूम रहा था, गा रहा था। उत्साह एवं उमंग से लबरेज उसके जोश में शर्म-संकोच की तो जैसे कोई गुंजाइश ही नहीं थी। 'आजादी की दूसरी लड़ाई' में संकल्प एवं साहस की 'फतह' के उपलक्ष्य में निकली यह 'बारात' न केवल अनूठी रही बल्कि कई अर्थों में अलग भी नजर आर्इ। इसमें हर वर्ग की भागीदारी रही। लोग इस 'बारात' में शामिल होते गए और समय के साथ बधाई दर बधाई की फेहरस्ति लम्बी होती गई। मिठाई बंटी। हवन हुए। इतना ही नहीं खुशी के गुलाल व उल्लास के अबीर के बीच हुई आतिशबाजी और गले मिलकर दी गई मुबारकबाद ने होली-दीवाली व ईद के माहौल को साकार कर दिया। तभी तो 'जनतंत्र की जीत' का यह उल्लास किसी उत्सव से कम नजर नहीं आया। तीनों त्योहारों की झलक के इस ऐतिहासिक संगम के साक्षी शहर के सैकड़ों लोग बने। इस आकर्षक नजारे के बीच हुई रिमझिम बारिश ने तो सोने पर सुहागे जैसा काम किया। ऐसा लगा मानो बारिश भी 'जनतंत्र की जंग' में शामिल 'दीवानों' का खैरमकदम करने को आतुर थी। तभी तो जश्न का यह दौर जैसे ही थमा आसमान से बादल भी छंट गए।
दरअसल, मामला 'आजादी की दूसरी लड़ाई' से बावस्ता था, लिहाजा, इसमें देशभक्ति के सभी रंग होना लाजिमी थे। 'आजादी के दीवाने' खुशी में झूमते-गाते इस कदर शंखनाद कर रहे थे गोया उनको मुंह मांगी मुराद मिल गई हो। कई आंदोलनों का गवाह रहा बिलासपुर का नेहरू चौक तो देशभक्ति की इस अद्‌भुत सरिता को देख धन्य हो गया।
बहरहाल, जनतंत्र के इस अनूठे अनुष्ठान की 'पूर्णाहुति' सुखद रही। यह बात दीगर है कि 'आजादी के दीवाने' लगातार बारह दिन तक अनुशासन की अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण होते रहे लेकिन आखिरी एवं निर्णायक दिन उनके जोश के आगे अनुशासन कुछ बौना नजर आया और अन्ना के आह्वान की अवहेलना होती दिखाई दी। खैर, भ्रष्टाचार के विरोध में प्रज्वलित हुई उम्मीद की यह लौ कालांतर में प्रचंड अग्नि में तब्दील होकर 'अन्ना की अधूरी जीत' को पूरी जीत में परिवर्तित करने का मार्ग प्रशस्त करेगी। बिलासपुर जैसे शहर में तो इस लौ का निरंतर जलते रहना निहायत ही जरूरी है। यह काम चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन न्यायधानी में 'आजादी के दीवानों' का हौसला एवं जोश देखते हुए मुश्किल तो बिलकुल भी नहीं।
साभार  : पत्रिका बिलासपुर के 29 अगस्त 11 के अंक में प्रकाशित

अन्नागिरी के अनूठे व अनोखे अंदाज

बिलासपुर. जन लोकपाल के मुद्‌दे पर अनशन कर रहे हैं सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन का समर्थन करने वालों का कारवां दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। वैसे तो गांधी टोपी तथा तिरंगा झण्डा इस आंदोलन की पहचान बन चुके हैं, लेकिन इनके अलावा और भी कई तरीके हैं, जो लोगों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच रहे हैं। बीते दस दिनों में आंदोलन के एक से बढक़र एक कई ऐसे अहिंसक तरीके सामने आए हैं, जो आज तक शायद ही किसी आंदोलन के हिस्से बने हैं। इन सभी तरीकों में एक खास बात यह भी है कि इनमें गंभीरता के साथ मनोरंजन का तड़का भी है। आंदोलन के संबंध में गढे गए नारों तथा वंदेमातरम व भारत माता के जयकारों ने न केवल लोगों में देशभक्ति की भावना भर दी है बल्कि उनको एकजुट करने में भी प्रमुख भूमिका निभाई है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत जो देखने में आ रही है, वह है अनुशासन। धरनास्थल पर सुरक्षा के लिहाज से शायद ही कोई पुलिस वाला दिखाई देगा। कई तरह की गतिविधियों के बावजूद अनुशासन भी गजब का है। सभी लोग अनुशासित सिपाही की तरह अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन बखूबी कर रहे हैं। धरने से संबंधित तमाम व्यवस्थाओं की कमान युवाओं ने संभाल रखी है। धरनास्थल पर मौजूद लोगों को पानी पिलाने से लेकर यातायात बाधित न हो इसका भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है। हर वर्ग का समर्थन तथा उनका विरोध करने का तरीका अलहदा होने के कारण भी यह आंदोलन अनूठा बन पड़ा है।  आंदोलन में किन्नरों से लेकर कुलियों तक की सहभागिता भी  अनोखी है।
ये हैं तरीके
धरना, अनशन, मोटरसाइकिल रैली, शांति मार्च, मशाल जुलूस, केडिंल मार्च, ऑटो रैली, पोस्टकार्ड अभियान, हस्ताक्षर अभियान, घण्टा रैली, काली पट्‌टी बांधकर काम, दीप प्रज्वलित करना, सद्‌बुद्धि यज्ञ, हवन, हनुमान चालीसा के पाठ, स्टीकर अभियान, पम्पलेट का वितरण, नाचते गाते जुलूस, भ्रष्टाचार की मटकी फोड़ना, भजन-कीर्तन, देशभक्ति गीत, चुटकुले, शेरो शायरी एवं कविता पाठ, मंदिरों में अन्ना की सलामती की दुआ, सांसदों के निवास पर प्रदर्शन, मानव श्रृंखला, शैक्षणिक बंद, नारेबाजी आदि।
साभार  : पत्रिका बिलासपुर के 26 अगस्त 11के अंक में प्रकाशित

Sunday, August 28, 2011

न्यायिक जांच हो

टिप्पणी
बिलासपुर बीएसएनएल महाप्रबंधक कार्यालय में लगे अग्निशमन यंत्र लम्बे समय से शोपीस बने हुए हैं। इन यंत्रों को रिफिल करने की निर्धारित अवधि को गुजरे पांच साल से ज्यादा समय हो चुका है। कार्यालय भवन में लगे फायर अलार्म की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। सुरक्षा के लिहाज से कार्यालय भवन में लगाए गए अन्य उपकरण भी देखरेख के अभाव में धूल फांक रहे हैं। ऐसे में कार्यालय में अगर आगजनी जैसी कोई अनहोनी हो जाए तो सुरक्षा फिर रामभरोसे ही है। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीएसएनएल अधिकारी-कर्मचारी जब खुद के कार्यालय या यूं कहें कि खुद की सुरक्षा के प्रति ही गंभीर नहीं है तो उस कंपनी की सेवा फिर कैसी होगी। उसके उपभोक्ता किस हाल में होंगे। इतना समय गुजरने के बाद  उपकरणों के संबंध में ध्यान दिलाने पर बीएसएसएल के आला अधिकारियों के बयान बेहद ही हास्यास्पद हैं। बड़े अधिकारी यंत्रों के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की कह रहे हैं तो उनके अधीनस्थ अधिकारी को अभी तक पूरी जानकारी ही नहीं है। वे जानकारी जुटाकर यंत्रों का नवीनीकरण करवाने की बोल रही हैं।
खैर, यंत्रों की उपेक्षा तथा अधिकारियों के बयान से इतना तो तय है कि कार्यालय की सुरक्षा को लेकर कोई भी गंभीर नहीं हैं। गनीमत तो यह है कि अब तक कोई अनहोनी नहीं हुई। दबे स्वर में तो यह भी सुनने को मिल रहा है कि बीएसएनल के आला अधिकारियों एवं कर्मचारियों में समन्वय तक नहीं है। जाहिर है जब समन्वय ही नहीं होगा तो फिर कामकाज की गति क्या होगी, सोचा जा सकता है। तीन मंजिला बीएसएनएल भवन में कर्मचारी बिना मुंह खोले, जान हथेली पर रखकर अगर काम रहे हैं तो, इसके पीछे के अंकगणित को भी आसानी से समझा जा सकता है। जरूर कहीं न कहीं कोई दबाव या डर है, जो कर्मचारियों को मुंह खोलने से रोक रहा है।
बहरहाल, पांच साल से अधिक समय से सुरक्षा संबंधी उपकरणों की उपेक्षा या अनदेखी सरासर लापरवाही की श्रेणी में आती है। ऐसा हो नहीं सकता कि अधिकारियों एवं कर्मचारियों को इस मामले की जानकारी नहीं हो। जिनके जिम्मे  इन सुरक्षा उपकरणों की सारसंभाल की जिम्मेदारी है, वे पांच साल से क्या  कर रहे थे। उम्मीद की जानी चाहिए बीएसएनएल प्रबंधन इस लापरवाही को दूर करने के लिए आवश्यक एवं कारगर कदम उठाएगा। बस शर्त इतनी है कि मामला गंभीर है, लिहाजा इसकी जांच में लेटलतीफी नहीं होनी चाहिए। जांच भी ऐसी-वैसी नहीं बल्कि न्यायिक हो, तभी दूध का दूध और पानी का पानी होगा।

साभार-पत्रिका बिलासपुर के 28 अगस्त 11 के अंक में प्रकाशित

Saturday, August 20, 2011

कायम रहे यह जज्बा

टिप्पणी
सियासत के भंवर में उलझे, विकास कार्यों में उपेक्षित तथा कदम-कदम पर भ्रष्टाचार का दंश झेलने वाले बिलासपुर में लम्बे समय से चुप्पी साधकर बैठे लोगों का सामाजिक कार्यकर्ता  अन्ना हजारे के समर्थन में सड़कों पर उतरना न केवल काबिलेगौर है बल्कि एक सुखद एहसास की तरह भी है। हजारे के बहाने से ही सही शहर के लोगों को एकजुट होने का मंच तो मिला है। शासन-प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों से नाउम्मीद हो चुके शहरवासियों की एकजुटता से अब कुछ तो उम्मीद बंधी है। यह कहना अभी जल्दबाजी है लेकिन उनकी इस एकजुटता में उज्ज्वल भविष्य का अक्स भी दिखाई देने लगा है। वैसे तो देशभर में अन्ना का समर्थन करने वालों की फेहरिस्त बेहद लम्बी है लेकिन बिलासपुर में इसके अर्थ दूसरे हैं। यहां के लोगों में आक्रोश है, लोग गुस्से में हैं, उनमें कुछ कर गुजरने का जज्बा है, तो मान लेना चाहिए कि इन सब के पीछे अन्ना के अलावा और भी कई ठोस कारण हैं। विकास की मुख्यधारा से कटकर बदहाली के कगार पर पहुंच चुके शहर का दर्द भी लोगों को लम्बे समय से अंदर ही अंदर कचोट रहा है। व्यवस्था के प्रति गुस्सा सभी के मन में है लेकिन वह बाहर आने का बहाना ढूंढ रहा था। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। अब हालत यह है कि शहर का हर आम से लेकर खास तक, जाति, धर्म एवं पार्टी से ऊपर उठकर सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहा है। इसमें लेशमात्र भी राजनीति दिखाई नहीं दे रही है।
शहरवासियों के मौजूदा जोश, जुनून एवं जज्बे को देखकर कहीं से भी नहीं लगता है कि यह वही लोग हैं, जो कल तक खामोश थे। शहर के प्रति उनका क्या सरोकार है? जिम्मेदार नागरिक होने की वजह से वे शहर के लिए क्या कर सकते हैं? जैसी सामान्य बातों का अर्थ भी वे लगभग बिसरा चुके थे। तभी तो जिसके जैसे मन में आया, उसने शहर को बदहाली के कगार तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब ऐसा लगता है कि रेल जोनल कार्यालय के आंदोलन के बाद शांत, सुस्त एवं उदासीन बैठे लोग अन्ना के बहाने यकायक पुनर्जीवित हो उठे हैं। उनको जीने का मकसद मिल गया है। जाहिर है जनता जनार्दन की एकजुटता एवं जागरुकता से उन सब नेताओं एवं नौकरशाहों को अब अपना सिंहासन हिलता हुआ नजर आ रहा है, जो अब तक जनता की उदासीनता की फायदा उठाते आए हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि सिंहासन को खतरे में जान कर जनता व विकास से दूरी बनाए रखने वाले अब उनको गले भी लगा लें।
बहरहाल, बिलासपुर में भ्रष्टाचार की लड़ाई के मायने कई हैं। उम्मीद की जानी चाहिए अन्ना के एक आह्वान पर एकजुट होने वाले न्यायधानी के लोग शहर के विकास में सियायत करने तथा शहर की उपेक्षा करने वालों के खिलाफ भी प्रभावी तरीके से आवाज बुलंद करेंगे। जरूरत है तो बस मौजूदा जज्बे को कायम रखने की।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 20 अगस्त 11 के अंक में प्रकाशित।

Sunday, August 14, 2011

काश! वक्त रुक जाता...

बिलासपुर. दोनों तरफ भावनाओं का समन्दर उमड़ने को आतुर था। आंखें एक दूसरे को देखने के लिए बेचैन एवं उतावली थीं। इंतजार की घड़ियां बस खत्म होने को थीं। कुछ पल की देरी भी बहुत अखर रही थी। एक-एक पल एक युग जैसा बीत रहा था। मन में कई तरह के सवाल, शंकाएं और जिज्ञासाएं थीं।
लेकिन यह क्या...? जब मिलन हुआ तो दोनों को कुछ नहीं सूझा। गला रुंध गया और होंठ कुछ कह ना पाए। एक दूसरे को अपलक निहारती आंखों में बस आंसुओं की अविरल धारा थी। दोनों तरफ टप-टप गिरते मोतियों से आंसुओं ने रिश्तों की मजबूती और प्रगाढ़ता पर मुहर लगा दी थी। आंसुओं की इस मुलाकात में जुबान एकदम खामोश थी। बस आंखें ही आंखों की भाषा समझ रही थी। दोनों को दिलासा देने वाला कोई तीसरा भी नहीं था। दोनों एक-दूजे के आंसू पौंछ रहे थे। आखिरकार जब आंसुओं का सिलसिला कुछ थमा तो होठ कुछ कहने को हिलने लगे। बातें पहाड़ सी लम्बी थी, बिलकुल अंतहीन। उनका कोई छोर दिखाई नहीं दे रहा था। बातों से बातें निकलने लगी। फिर क्या था, बस रफ्ता-रफ्ता भावनाओं ने रफ्तार पकड़ी तो फिर दोनों खुलकर बतियाए। मन के एक कोने में वापस बिछुड़ने की टीस भी थी, जो न चाहते हुएभी दोनों के चेहरों से जाहिर हो रही थी। दोनों के जिगर में एक दर्द भी छिपा था। गुनाह का पछतावा भी कहीं न कहीं मन को कचोट रहा था।
कहने को अभी काफी कुछ था लेकिन वक्त की पाबंदी थी। समय कब पंख लगाकर उड़ गया पता ही नहीं चला। लम्बे समय से जिस दिन का बेसब्री से इंतजार था, वह इतनी जल्दी गुजर जाएगा, इसका अफसोस भी था। मन-मस्तिष्क में सवाल फिर कौंधने लगे। वक्त इतनी जल्दी कैसे बीत गया? अभी तो बहुत कुछ था कहने-सुनने को? काश! यह वक्त रुक जाता। वक्त को अपने हिसाब से मोड़ना एवं रोकना दोनों चाहते थे कि लेकिन ऐसा हकीकत में संभव नहीं था। मिलन से ज्यादा गमगीन माहौल तो बिछोह का था। आंखों में आंसुओं का सैलाब फिर दिखाई देने लगा, लेकिन आंसुओं की कीमत समझने वाला कोई नहीं था। क्योंकि यह मुलाकात अनूठी जरूर थी लेकिन शर्तों में बंधी थी। वह गुनाहों की कीमत वसूल रही थी। भाई बहन के अटूट रिश्ते एवं पवित्र प्रेम का यह नजारा शनिवार को सेंट्रल जेल में फलीभूत हुआ। दूरदराज के इलाकों से चलकर जेल में सजा काट रहे भाइयों की कलाई पर स्नेह का धागा बांधने आई बहनों का उत्साह देखते ही बनता था। अपनों से मिलने की खुशी में बहनें सफर की थकान को भूल चुकी थी।
अक्सर खामोश रहने वाला जेल का माहौल भाई-बहन के मिलन के चलते किसी मेले से कम नहीं था। अंतर महज इतना था कि इस मेले में प्यार, स्नेह, पछतावा, प्रायश्चित, संवेदनाओं, भावनाओं और आंसुओं के अलावा और कुछ नहीं था। इतना होने के बावजूद दोनों यह सोचने को मजबूर थे कि अगर गुनाह ना किया होता तो क्यों आज मुलाकात के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ती? क्यों वक्त की पाबंदी होती? क्यों जेल की दीवारों के बीच मिलन होता? आखिर यह बंधन ही तो है, जो सब पर भारी पड़ता है। रिश्तों का बंधन...प्यार का बंधन... जन्मों का बंधन...।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 14 अगस्त 11 के अंक में प्रकाशित।

Wednesday, August 10, 2011

पर्यावरण प्रेमियो कुछ तो सोचो.....एक पेड़ की व्यथा

मैं एक पेड़ हूं, इमली का। लम्बे समय के रखरखाव एवं देखभाल के बाद मैं बड़ा हुआ। छत्तीसगढ़ भवन में होने के कारण मैं कई घटनाओं का साक्षी रहा हूं। कई नेताओं ने मेरी ठण्डी छांव में बैठ कर सियासत के दावपेंच सुलझाए हैं तो कई कई नौकरशाहों ने मेरी शीतल छांव में सुकून भी पाया है। इतना ही नहीं भरी गर्मी में अचानक बिजली गुल होने पर कइयों ने मेरी छांव में आकर कुछ देर के लिए चैन भी पाया है। खास जगह पर स्थित होने के कारण मैं सभी का चहेता रहा हूं। देखने में मैं आज भी भला चंगा लगता हूं लेकिन अंदर से खोखला हो चुका हूं। यह बात प्रशासन की सर्वे रिपोर्ट में साबित हो चुकी है। अभी पिछले दिनों की ही तो बात है नेहरू चौक पर एक पुराने पेड़ की शाखा अचानक टूट कर गिर गई। इससे एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। पेड़ की शाखा टूटने के कारण तलाशे गए तो पाया गया कि पेड़ बेहद पुराना हो गया था। हादसे के बाद प्रशासन को याद आया कि शहर में तो बहुत सारे पेड़ पुराने हैं। फिर कोई बड़ा हादसा न हो इसके लिए तत्काल सर्वे की कार्रवाई की गई। सर्वे रिपोर्ट में बहुत सारे पेड़ जर्जर पाए गए। ऐसे में इन जर्जर पेड़ों को जनहित में काटने का निर्णय लिया गया। विशेष रूप से लिंक रोड पर मेरे दर्जनों साथी कई झंझावतों को झेलने के बाद अब जीवन के अंतिम पड़ाव में हैं। मेरे कई साथी पेड़ तो दम भी तोड़ चुके हैं लेकिन उनके सूखे तने आज भी खड़े हुए हैं।
प्रशासन इन जर्जर पेड़ों को काटने का निर्णय लेता, उससे पहले ही रातोरात कई तथाकथित पर्यावरण प्रेमी अचानक उठ खडे़ हुए। सभी एक स्वर में मांग करने लगे  कि लिंक रोड के पेड़ न काटे जाएं। मामले को राजनीतिक रंग देने का प्रयास भी किया गया। दबाव की रणनीति काम कर गई और प्रशासन ने मामले को आगे बढ़ाना उचित नहीं समझा। तथाकथित पर्यावरण प्रेमी तो चाहते ही यही थे कि किसी न किसी तरह पेड़ काटने का मामला अटक जाए। खैर, मेरे पर्यावरण प्रेमियों के इस निर्णय से मुझे खुशी कम आश्चर्य ज्यादा हुआ। मैं सोचने लगा कि आखिरकार लिंक रोड में ऐसा क्या है, जो हर बार मामला उठने के बाद शांत हो जाता है। मेरे जेहन में बार-बार यही सवाल कौंधता रहा, क्या शहर में और कहीं पेड़ कटते ही नहीं हैं? बिलकुल कटते हैं और बार-बार कटते हैं लेकिन कोई पर्यावरण प्रेमी चिल्ल पौं तक नहीं करता। मुझे लगता है कि लिंक रोड पर मेरे जर्जर साथियों की ससम्मान अंतिम विदाई का विरोध करने वाले केवल दिखावे के ही पर्यावरण प्रेमी हैं। उनके इस पर्यावरण प्रेम के पीछे उनका खुद का स्वार्थ छिपा हुआ है। अगर लिंक रोड से जर्जर पेड़ कट जाएंगे तो यह मार्ग न केवल चौड़ा जाएगा बल्कि इन पेड़ों की ओट में अतिक्रमण करने वाले भी बेनकाब हो जाएंगे। पेड़ों की दुहाई देकर वे अपना अतिक्रमण कायम रखना चाहते हैं। वे लोग पेड़ों को बचाने के लिए बंगलौर, नागपुर की तर्ज पर काम करने की दलील देते हैं। उनको पता है यह सब हकीकत में संभव नहीं होगा और बेजा कब्जा यथावत रह जाएगा।
मेरे तथाकथित पर्यावरण प्रेमियों मैं आपके दोहरे चरित्र से हैरान भी हूं। अगर आपको वास्तव में पर्यावरण की चिंता है तो बताइए आपने अपने जीवन में कितने पौधे लगाए। कितने पौधों की रक्षा की? अरे इन सब को तो जाने दीजिए, आप तो यह बताइए कि कलेक्टोरेट में मेरे एक साथी को कल-परसों ससम्मान अंतिम विदाई दे दी गई क्योंकि प्रशासन के सर्वे में वह जर्जर पाया गया था, लेकिन अफसोस किसी ने चूं तक नहीं की। अब मेरी बारी है, क्योंकि सर्वे में मैं भी जर्जर पाया गया हूं, लिहाजा पहले मेरी शाखाओं को काटा जा रहा है। इसके बाद मुझे भी ससम्मान अंतिम विदाई दे जाएगी। अगर पर्यावरण प्रेमियों के दिल में वाकई पेड़ों के प्रति प्रेम होता तो वे यूं चुप नहीं रहते? लिंक रोड के पेड़ों की प्रति हमदर्दी दिखाने वाले इस मामले में खामोश क्यों रहे? कारण भी मुझे पता हैं, क्योंकि कलेक्टोरेट एवं छत्तीसगढ़ भवन के पेड़ों से किसी का हित नहीं जुड़ा है।
खैर, प्रकृति का नियम है कि जो आया है, उसे एक दिन जाना है। मैंने भी अपने दिन पूरे कर लिए, इसलिए मैं भी हंसते-हंसते हुए आपसे विदा हो रहा हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे नाम पर राजनीति हो या मेरे विदा होने का विरोध हो। मैं जाते-जाते आप पर्यावरण प्रेमियों से यह करबद्ध निवेदन करता हूं कि हम जर्जर पेड़ों की आड़ में राजनीति न कीजिए। हम बहुत जी लिए अब ससम्मान अंतिम विदाई चाहते हैं। हमारी विदाई में अब रोड़े मत अटकाइए। हम नहीं चाहते हैं कि हमारे सिर पर किसी और हत्या का संगीन आरोप लगे, इसलिए सोचना और जनहित में निर्णय लेना। अगर आपने आज सोचने में देरी की तो आने वाली पीढ़ियां शायद ही आपको माफ करेंगी।

साभार-पत्रिका बिलासपुर के  10 अगस्त 11 के अंक में प्रकाशित


Friday, July 29, 2011

विकास पर बोलती बंद

छत्तीसगढ़ राज्य के बड़े शहरों में शुमार बिलासपुर सियासी दंगल एवं वर्चस्व की लड़ाई में इस कदर फंस चुका है कि विकास के मुद्‌दे गौण हो चुके हैं। विडम्बना देखिए, जिनके जिम्मे विकास है वे जिम्मेदारी से मुंह मोड़ कर आरोप-प्रत्यारोपों के खेल में उलझे हैं। कोई जवाबदेही लेने को तैयार नहीं है। विकास फुटबाल बना हुआ है। मूकदर्शक बनी जनता के पास इस सियासी फुटबाल के खेल को देखने के अलावा कोई चारा भी नहीं है।  लम्बे चौड़े विकास की बातें तो छोड़िए, मूलभूत सुविधाओं का हाल भी बुरा है। बिजली, पानी, सड़क, चिकित्सा, शिक्षा जैसी सुविधाओं मे एक भी तो ऐसी नहीं है, जिस पर दावा किया जा सके। यह बात दीगर है कि कागजों में विकास के दावों की फेहरिस्त बेहद लम्बी है लेकिन हकीकत के धरातल पर आते ही दावों की हवा निकल जाती है। विकास के नाम पर जो काम शहर में चल रहे हैं, उनमें अनियमितता की बू आती है। निर्धारित समय गुजरने के बाद भी आधे-अधूरे काम सरकारी उदासीनता की चुगली करते दिखाई देते हैं। बहरहाल, कई संस्कृतियों के संगम वाली न्याय की इस नगरी के लोगों के साथ  पग-पग पर नाइंसाफी हो रही है। शहर ठप है और बयानों के शोर में जनता जनार्दन की आवाज दब गई है या यूं कहे कि दबा दी गई है। शहरवासियों के मन में अव्यवस्था के प्रति आक्रोश है। अगर बयानों का यह खेल यूं ही बदस्तूर चलता रहा है तो जिनको उम्मीद के साथ  सिर, आंखों पर बिठाया गया है, कल उनको दरकिनार भी किया जा सकता है। सब्र की इंतहा होने को है, धैर्य भी रफ्ता-रफ्ता जवाब देने को है। बहुत हो चुका यह सियासी खेल। जनता अब काम चाहती है। जनता जनार्दन का आक्रोश भड़के,  इससे पहले सभी को राजनीति से ऊपर उठकर सिर्फ और सिर्फ शहर के विकास को जेहन में रखना चाहिए। तभी बेपटरी हुआ शहर विकास की मुख्यधारा से कदमताल कर पाएगा।

साभार- पत्रिका बिलासपुर के  09 जुलाई 11 के अंक में प्रकाशित

खासियत का खामियाजा

राज्य का दूसरा बड़ा शहर होने का गौरव हासिल करने वाला बिलासपुर इसी खासियत का खामियाजा भी भुगत रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद बिलासपुर की राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर उपेक्षा इस कदर हुई कि यह शहर विकास से कदमताल करने में विफल हो गया। शहर के लोग खुद को छला हुआ सा महसूस कर रहे हैं। बिलासपुर एवं रायपुर की प्रगति के मौजूदा सफर को साथ रखकर देखें तो पाएंगे कि न्यायधानी के हिस्से में केवल हाईकोर्ट ही आया। शिक्षा के मामले राज्य का अग्रणी शहर होने तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में सर्वाधिक सफल विद्यार्थी देने के बावजूद बिलासपुर में गुरुघासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय को छोड़कर आईआईटी, एम्स, आईआईएम तथा विधि विश्वविद्यालय जैसे बड़े सरकारी शिक्षण संस्थानों का अभाव है। तमाम संभावनाएं होने के बावजूद बिलासपुर अभी हवाई सेवा से भी अछूता है। शहर को हवाई सेवा से जोड़ने के वादे भी हवाई ही साबित होकर रह गए। और तो और शहर के विकास के लिए बनने वाला मास्टर प्लान भी प्रशासनिक उदासीनता का शिकार है।
लब्बोलुआब यह है कि विकास की भरपूर संभावनाएं मौजूद होने के बावजूद न्यायधानी को नजरअंदाज किया जा रहा है। एक तरह से यह न्याय की नगरी के लोगों के साथ नाइंसाफी ही है। राज्य के गठन के बाद बिलासपुर के लोगों ने जो सपना देखा और जो उम्मीदें थीं, वे एक-एक कर टूटती गई। सुविधाओं से वंचित बिलासपुर विकास की बड़ी योजनाओं से दूर मूलभूत सुविधाओं में सुधार के लिए ही जूझ रहा है। पत्रिका ने बिलासपुर के लोगों को विकास के संबंध में दिखाए गए सब्जबाग की पड़ताल की तो वे मुद्‌दे और बातें सामने आए, जिनको पूरा करने से बिलासपुर का विकास न केवल रफ्तार पकड़ेगा बल्कि शहर की छवि में भी अप्रत्याशित सुधार होगा। 

साभार- पत्रिका बिलासपुर के 26 जुलाई 11 के अंक में प्रकाशित

Sunday, July 24, 2011

ब और बिलासपुर

टिप्पणी
लगता है ब शब्द  बिलासपुर की नियति बन चुका है। या यूं कहें कि बिलासपुर का ब शब्द से चोली दामन का साथ है। शायद तभी बिलासपुर का नामकरण बिलासा नामक महिला पर हुआ। पुलिस कान्फ्रेंस हाल का नाम भी बिलासा गुणी रखा गया। और तो और बिलासपुर के पुराने बाजारों में से एक बुधवारी बाजार की शुरुआत भी ब से ही होती है। खैर, यह सब अतीत की बातें हैं। ब शब्द को वर्तमान के साथ रखकर देखें तो बिलासपुर की मौजूदा तस्वीर यह है कि यहां के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। विकास के लिए बयानवीर जनप्रतिनिधि बयानों पर बयान जारी कर खुद को बड़ा साबित करने की बाजीगरी दिखा रहे हैं। बयानों की ऐसी बानगी विकास से संबंधित बैठकों में भी बखूबी देखने को मिल रही है। समूचा बिलासपुर जानता है और मानता है कि इन बैठकों में नीतिगत निर्णय कम बकबक और बकवास ही ज्यादा हो रही है। समस्याओं की फेहरिस्त बदस्तूर बढ़ रही है। शहर बदरंग, बदसूरत एवं बेनूर हो चुका है। मानसून की बरसात भी बिलासपुर के लोगों के लिए बैरन बनी हुई है। बरसात से बिलासपुर की बदइंतजामी की पोल तो खुली ही, शहर बदहाल भी हो चला है। बिलासपुर की बदकिस्मती यह भी है कि स्थानीय एवं राज्य की बागडोर दो धुर विरोधी दलों के हाथों में है।
बहरहाल, बिलासपुर में बहरतौर (हर प्रकार से) बदहाली का आलम है। कभी बेमिसाल एवं बेनजीर इतिहास के गवाह रहे बिलासपुर की यह बदनसीबी ही कही जाएगी कि वह फिलवक्त बदतरीन दौर से गुजर रहा है। इस नाइंसाफी को बिलासपुर के लोग बहुत देर से बराबर बर्दाश्त कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए बिलासपुर के बाशिंदे बहमदीगर (एक दूसरे के साथ) होकर  बरवक्त (सही समय पर) कोई निर्णय लेंगे। शायद तभी बिलासपुर की बिगड़ी एवं बेपटरी हुई व्यवस्था लाइन पर आएगी। आखिर एकजुटता के बहुमत के बलबूते से ही तो बुलंदी हासिल होती है, इसलिए बयानों की बिसात बिछाकर सियासत की बागडोर हासिल करने करने वालों की बोलती बंद करने के लिए एकजुटता बेहद जरूरी है। बिना एकजुटता के तो सब बातें बेमानी हैं।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 24 जुलाई के अंक में प्रकाशित।

जिम्मेदारी समझें अधिकारी

टिप्पणी
शहर में संचालित अवैध विवाहघरों के मामले में स्टाफ की कमी बताकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने वाले निगम आयुक्त का बयान न केवल हास्यास्पद बल्कि बचकाना भी है। इससे भी बड़ी और गंभीर बात तो यह है कि विवाहघरों के नक्शे पास करने वाले, आयुक्त की नजरों में दोषी ही नहीं है। आयुक्त तो सारा दोष भवन निर्माण करवाने वाले मालिक के सिर ही मंढ़ रहे हैं। वे यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि स्टाफ कम है, लिहाजा मानिटरिंग करना मुमकिन नहीं है। अगर आयुक्त के  बयानों को नियमों के साथ रखकर देखें तो अंतर साफ नजर आता है। निगम क्षेत्र में रिहायशी या व्यावसायिक काम्प्लेक्स का निर्माण तय नियमों के अंतर्गत हो, इसके लिए निगम में भवन शाखा संचालित है। इस शाखा में किसी भी निर्माण के लिए निर्माणकर्ता भूखण्ड मालिक को शहर तथा ग्रामीण निवेश से भू उपयोग प्रमाण-पत्र, फायर सेफ्ट पार्किंग, डायवर्सन आदि से संबंधित दस्तावेज इस शाखा में जमा करना होता है। इतना सब कुछ साफ और स्पष्ट होने के बावजूद निगम आयुक्त का बयान जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने वाला ही है। विचारणीय बिन्दु यह भी है कि शहर में इतने विवाहघर एक साथ या रातोरात तो बने नहीं है। जाहिर है यह सारा खेल मिलीभगत और सांठगांठ की बुनियाद पर ही चल रहा है। दूसरों शब्दों में कहें तो निगम की शह पर ही इन विवाहघरों का संचालन हो रहा है।
वैसे देखा जाए तो निगम आयुक्त का बयान एक तरह से अवैध निर्माण करवाने वालों का समर्थन ही करता है। इस बयान से आमजन तथा शहर के विकास से सरोकार रखने वालों के हाथ निराशा ही लगी है। लकीर पीटने के लिए भले ही निगम प्रशासन शहर में ऐसे विवाह घरों तथा व्यावसायिक काम्प्लेक्स का नापजोख करवा रहा हो लेकिन इसके बाद क्या होगा कहना मुश्किल है। निगम के निर्देशन में शहर में अन्य कामों की जो मानिटरिंग चल रही है, उनकी प्रगति देखकर यह सवाल मौजूं है कि विवाहघरों के नापजोख का हश्र भी कहीं वैसा ही नहीं हो?
बहरहाल, छोटे-छोटे कब्जे हटाने के लिए आम जन तथा मुफलिस लोगों पर कार्रवाई का डंडा चलाने वाले निगम अधिकारियों को यह सोच लेना चाहिए कि विकास के मामले में पिछड़ चुके इस शहर में अब कागजी घोड़े दौड़ाने से काम नहीं चलेगा।  उम्मीद की जानी चाहिए कि नापजोख का काम ईमानदारी से होगा तथा इसके बाद सभी दोषियों पर कार्रवाई बिना किसी भेदभाव के समान रूप से होगी। राजनीतिक हस्तक्षेप को भी नजरअंदाज करना होगा। सियासी दांवपेचों में उलझे इस शहर में यह काम निगम अधिकारियों के लिए चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन मुश्किल नहीं है। इस काम के लिए पहली जरूरत तो यह है कि अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी न केवल समझनी होगी बल्कि उनका निवर्हन भी बखूबी से करना होगा। शायद तभी लोगों का खोया हुआ विश्वास बहाल हो पाएगा।
साभार : पत्रिका बिलासपुर के 14 जुलाई के अंक में प्रकाशित।

Sunday, June 19, 2011

मेरे पापा...मेरी मां...

रविवार को समाचार पत्रों का अवलोकन किया तो पता चला कि आज फादर्स डे है। कुछ इसी भावना के साथ हम मदर्स डे भी मनाने लगे हैं। लगभग हर अखबारों में फादर्स डे के ही चर्चे थे। इस विषय पर कई अखबारों ने तो बाकायदा अतिरिक्त अंक भी निकाले थे। वैसे माता-पिता के लिए साल में एक-एक दिन निर्धारित करने का मैं कतई पक्षधर नहीं हूं। इस प्रकार के आयोजन भारतीय संस्कृति के बिलकुल भी अनुकूल नहीं है। हमारे देश में माता-पिता का दर्जा देवताओं के समतुल्य है। जैसे हम देवताओं का रोज स्मरण करते हैं, उसी प्रकार माता-पिता भी प्रातः स्मरणीय हैं। भौतिकवाद के वशीभूत एवं पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण कर हम प्रकार के दिन विशेष मनाने तो लग गए हैं लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि समूची दुनिया को संस्कृति और ज्ञान का पाठ पढ़ाने वाले देश में इस प्रकार के आयोजनों का औचित्य क्या है। देखा जाए तो माता-पिता को किसी परिधि में बांधा ही नहीं जा सकता है।
खैर, फादर्स डे को लेकर मैं अपना मंतव्य स्पष्ट कर चुका हूं। अब कुछ ऐसे बातें आपसे शेयर कर लूं जो मेरे लिए रोजमर्रा का हिस्सा है। पिछले 11 साल से पेशेगत मजबूरियों के चलते मैं पैतृक घर से बाहर हूं लेकिन रोज उठते ही मैं पहला फोन घर पर करना नहीं भूलता। यह एक तरह का नियम सा बन चुका है। हां, कभी-कभार कार्य अधिकता की वजह से कुछ विलम्ब हो जाता है  तो पापा का फोन आ जाता है। मतलब संवादहीनता वाली स्थिति पिछले 11  सालों में एक भी दिन नहीं आई है। गांव में संचार सुविधाएं कैसी हैं, कहने की आवश्यकता नहीं है, लिहाजा,  कई बार फोन खराब भी हो जाता है। ऐसे में पापा किसी एसटीडी बूथ पर जाकर फोन करके मेरे हालचाल पूछ लेते हैं।
मेरे इस नियम से कुछ सवाल भी उठ रहे हैं, मसलन, माता-पिता के प्रति इतनी श्रद्धा और प्रेम है तो उम्र के उस पड़ाव में उनको अकेला क्यों छोड़ रखा है? क्यों नहीं उनको अपने साथ रख लेते?  क्या फोन के माध्यम से ही आप हालचाल पूछने से काम चल जाता है? आप अपनी पत्नी को उनके पास क्यों नहीं छोड़ देते,  आदि। बिलकुल यही सवाल मेरे मन भी उठते हैं और मुझे विचलित भी करते हैं। माता-पिता को साथ न रख पाने के पीछे सबसे बड़ी दिक्कत मेरी दादी जी हैं,  वे एकदम परम्परावादी हैं। वे जीते-जी किसी भी हालत में घर के ताला लगाने की पक्षधर नहीं हैं। ऐसे में मां और पापा भला उनको अकेला कैसे छोड़ दें। मां और पापा मेरे साथ रहने को तैयार हैं लेकिन दादी जी किसी भी कीमत पर तैयार नहीं होती। अब बात धर्मपत्नी की ले लीजिए। वो मेरे साथ है तो उसके पीछे भी मेरे पापा और मां का प्यार ही है। वो खुद दुख उठा रहे हैं लेकिन मुझे दुखी देखना नहीं चाहते।  मुझे खाना बनाना नहीं आता है। बाहर का खाना मजबूरी में खा तो लेता हूं लेकिन स्वास्थ्य बहुत जल्द खराब हो जाता है। शादी से पहले लगातार यह क्रम चार साल तक चला। स्वास्थ्य इतना खराब हुआ कि करीब आठ किलो वजन कम हो गया। गाल पिचक गए और आंखें अंदर धंस गई। हालात यह हो गई कि मैं समय से पहले ही उम्रदराज दिखने लगा। मेरी हालत दुबारा वैसी ना हो जाए  इसलिए पापा-मां स्वयं दुख उठाने के लिए तैयार हैं, हालांकि मैंने अपनी धर्मपत्नी को सास-ससुर की सेवा के लिए गांव में रहने को कहा, तो  वह तैयार भी हो गई लेकिन पापा-मां तैयार नहीं हुए। बोले बेटा तो अकेला इतनी दूर दुख पाएगा, इसलिए बिनणी को साथ ले जा। मेरे बार-बार आग्रह के बावजूद वो तैयार नहीं हुए।
इधर, दादी मां जिनको मैं बूढी मां भी कहता हूं, वे उम्र के मामले में शतक मारने की नजदीक हैं जबकि मां और पापा 74-75 के करीब पहुंच चुके हैं। कहने का मतलब है गांव में रहने वाले यह तीनों प्राणी बस बड़ी मुश्किल के साथ अपना काम कर पाते हैं। घर का काम तो  कैसे होता है ये ही जानें.... मैं तीनों की हालत देखकर बड़ा दुखी हूं और चिंतित भी। सर्वाधिक पीड़ा तो उस वक्त होती है जब गांव का अदना सा आदमी भी इस बात के लिए उलाहना दे देता है। सचमुच उलाहने की शर्मिन्दगी से जमीन में गड़ा तो नहीं जाता लेकिन बाकी कुछ बचता भी नहीं है। मेरा कुछ होना उस वक्त बेकार साबित हो जाता है। कहने वाले कहते हैं,  उनका मुंह तो पकड़ा नहीं जा सकता,  लेकिन हकीकत में जो दिक्कत है,  उनको उससे कोई मतलब भी नहीं है।
बहरहाल, विषयवस्तु पर लौटते हुए मैं अब कुछ अतीत से जुड़ी यादों को जिंदा कर लूं। यादें इसलिए क्योंकि वे वर्तमान में फिर अपने आप को दोहरा रही हैं। बस भूमिका बदल गई है लेकिन भाव वो ही हैं। कहा भी गया है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। हाल ही में करीब पांच साल तक घर के सबसे निकटतम स्थान पर कार्यरत रहा। ऐसे में कभी महसूस ही नहीं हुआ कि घर से दूर हूं। हाल में तबादला हुआ और मां-पापा से जब मिलकर लौटने लगा तो पापा की आंखों में आंसू देखकर मैं भी अपनी रुलाई नहीं रोक पाया। पापा देर तक अपनी बांहों में कस कर मुझे गले लगाकर सुबकते रहे। रास्ते में भी मां-पापा को याद कर करके आंखों से आंसू अपने आप निकलते रहे। आंसुओं को पोंछ-पोंछ कर रुमाल कब गीला हो गया पता नहीं चला।  मां-पापा को याद कर आंखें अब भी नम हो जाती हैं।  आज भी हो चली हैं। भले ही कुछ लिख रहा हूं लेकिन आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी है। आंसूओं की बूंदें टप-टप कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर गिर रही हैं।  मैं बेहद गमगीन हो चला हूं... कुछ देर सामान्य होने का प्रयास करता हूं लेकिन आज विषय ही ऐसा चुन लिया और वैसे भी मैं बेहद संवेदनशील हूं।  .... हां तो इतिहास वाली बात यह है कि मैं जब छोटा था और पापा जब अपनी छुट्‌टी पूरी करके वापस नौकरी पर लौटने लगते तब मैं उनके पैरों में लिपट जाता और उनके साथ जाने की जिद करता। रो रोकर अपनी आंखें सुजा लेता था। यह पापा का प्यार ही था कि कि वो मुझे रोता हुआ नहीं देख सकते थे, इस कारण रात को मुझे सोता हुआ छोड़कर जाते थे। शायद मेरी बाल हठ पर पापा भी भावुक हो जाते थे। वर्तमान में हालात बदले और जिस दिन घर से मैं रवाना हुआ और पापा की आंखों में आसूं देखकर अतीत याद आ गया। बस, आज मैं इतना ही लिख पाऊंगा। आसूं बह रहे हैं, रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। काश! आज  पापा और मां मेरे साथ होते लेकिन हाय री किस्मत! सचमुच मुझे मेरे पापा और मां से बहुत प्यार है, लेकिन मैं चाहकर भी उनके लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं। उम्मीद जरूर है कि बूढी मां घर छोड़ने को तैयार हो जाएंगी तो मुझे पापा-मां की सेवा का मौका मिल जाएगा। मुझे उस दिन का बेसब्री से इंतजार है।

Saturday, June 18, 2011

पति-पत्नी और वो...

पंजाब के जालंधर एवं उत्तरप्रदेश के कानपुर शहर में शादीशुदा व्यक्तियों को दूसरी महिलाओं से प्रेम की पींगें बढ़ाने की कीमत गधे की तरह मार खाकर चुकानी पड़ी। शनिवार को दिन भर यह दोनों खबरें टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज के नाम चलती रही। जालंधर में पति और उसकी माशूका को पत्नी पीटती दिखाई दी तो कानपुर में पति अपनी पत्नी के प्रेमी पर हाथ उठा रहा था। दोनों घटनाओं में एक अंतर जरूर था। जालंधर की घटना घर के अंदर हुई तो कानपुर की बीच बाजार में। इन खबरों में पिटने और पीटने वालों के बयान भी दिखाए गए गोया उन्होंने कोई लड़ाई फतह की हो।
जैसी कि मेरी आदत है मैं हमेशा खेल या न्यूज से संबंधित चैनल ही ज्यादा देखता हूं। सुबह से लेकर दोपहर तक जब एक चैनल पर लगातार यही खबर देखते-देखते मैं उकता गया तो दूसरा चैनल लगाया लेकिन यहां भी जालंधर एवं कानपुर के ही चर्चे थे। समझ नहीं आया कौनसा चैनल देखूं। आखिकर आवाज म्‌यूट करके मैं दूसरे काम में व्यस्त हो गया, लेकिन चैनल पर यह न्यूज बदस्तूर चलती रही। थोड़ी देर काम से फुर्सत मिली तो इन दोनों खबरों को लेकर सोचने लगा।
मन में ख्याल आया कि  पति-पत्नी और वो... जैसे मामले अगर हम थोड़ी सी गंभीरता से ढूंढेंगे तो अपने आसपास भी मिल जाएंगे। वैसे भी इस प्रकार की घटनाओं से अब कोई हैरत नहीं होती है क्योंकि देश और समाज में इस प्रकार के मामलों में बड़ी तेजी के साथ इजाफा हो रहा है। बावजूद इसके हमारे चैनल वालों को पता नहीं क्या हो गया है। जैसा कि मेरे एक परिचित कल ही मुझे कह रहे थे कि टीवी चैनल का मतलब है देखो और भूल जाओ। दिल पर मत लो। इनका काम ही सनसनी फैलाना है। मुझे उनकी बात में दम नजर आया। यह सनसनी नहीं तो और क्या है। निहायत ही घरेलू मामलों को राष्ट्रीय स्तर का समाचार बनाकर पेश कर दिया जाता है। ऐसा लगता है कि घर-घर की कहानी का कथानक जरूरत से ज्यादा ही मजबूत और लोकप्रिय हो गया है।  तभी तो भूख, भय, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे ज्वलंत मुद्‌दों को दरकिनार किया जा रहा है और इन सब पर घर-घर की कहानी भारी पड़ रही है।
खैर, चप्पलों एवं जूतों से मार खाए महाशय, अनैतिक रूप से प्यार करने का मतलब भली-भांति समझ गए होंगे। अगर नहीं समझें तो उनको नीचे दिया गया यह शेर गुनगुना लेना चाहिए लेकिन शेर में अंतर्निहित फलसफे को समझने को बाद।
ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए..
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

Thursday, June 16, 2011

मेरा गांव....

मातृभूमि से मोह भला किसे नहीं होता। मुझे भी है। मेरे ही गांव के एक शिक्षाविद्‌ हैं श्रीभगवानसिंह झाझड़िया। सीकर कॉलेज में पढ़ाते थे। आजकल सेवानिवृत्त होने के बाद साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। समाचार पत्रों में तो लिखते ही रहते हैं फेसबुक पर भी लगभग मौजूद रहते हैं। गांव के होने के नाते मेरा उनसे परिचय पहले से ही है, लेकिन हाल ही में फेसबुक के माध्यम से उनसे मिलन हो गया। एक दिन मैंने अपने ब्लॉग में बगड़ के बारे में कुछ लिखा था। मेरे आग्रह पर उन्होंने मेरा आलेख पढऩे के बाद कहा कि आपको ऐसा ही कोई लेख गांव के बारे में भी लिखना चाहिए। मैंने मन ही मन उनके आग्रह  को स्वीकार तो कर लिया लेकिन गांव के बारे में लिखना जितना आसान है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। समझ नहीं आया कि गांव की खासियतों एवं खूबियों को रेखांकित करूं या फिर उन मूलभूत समस्याओं को उजागर करूं जो आजादी के बाद से ही मुंह बाए खड़ी हैं। खैर, प्रयास यही रहेगा कि दोनों बातों का समावेश समान रूप से हो जाए।
दो कस्बों के बीच बसा है केहरपुरा कलां गांव। गांव के पूर्व में सुलताना है तो पश्चिम दिशा में इस्लामपुर। ऐसा समझ लीजिए कि इन दोनों कस्बों को जोड़ने वाली सड़क के बीच में स्थित है मेरा गांव। रोजमर्रा की चीजों की खरीददारी करने के लिए गांव के लोग सुलताना ही ज्यादा जाते हैं, क्योंकि सुलताना का  देहाती बाजार  बड़ी तेजी के साथ उभरा है जबकि इस्लामपुर समय के साथ कदमताल नहीं कर पाया है, जैसा बीस साल पहले था तथा कमोबेश वैसा ही आज है। मेरे गांव का विधानसभा क्षेत्र झुंझुनूं है लेकिन तहसील एवं उपखण्ड मुख्यालय चिड़ावा लगता है।
सैनिकों के मामले में प्रसिद्ध मेरे गांव में कभी यह स्थिति थी कि प्रत्येक घर से एक व्यक्ति सेना में था। मेरा परिवार भी इसका बहुत बड़ा उदाहरण रहा है। मेरे पिताजी और उनक चार बड़े भाई भी सेना में रहे हैं। इतना ही नहीं इन पांचों भाइयों ने 1962, 1965 व 1971 की लड़ाइयां भी लड़ी हैं। मेरे परिवार जैसे गांव में बहुत से परिवार हैं। गांव में आज भी कई पूर्व सैनिक मौजूद हैं। आजादी के बाद शुरुआती दौर में रोजगार का एकमात्र साधन सेना ही था, हालांकि इससे पहले अंग्रेजों की सेना में भी गांव के लोगों ने सेवाएं दी हैं। फिर भी रोजगार का सबसे सशक्त एवं महत्वपूर्ण साधन सेना ही रहा। गांव से बड़ी संख्या में लोग सेना में गए तथा जब-जब देश पर खतरा आया तब सीमा पर मोर्चा संभालने में कोताही नहीं बरती। सेना में जाने का सिललिसा आज भी बदस्तूर जारी है। हां, वर्तमान में गांव में शिक्षा का उजियारा इतना फैल गया है कि अब गांव के युवाओं को कैरियर बनाने के कई विकल्प दिखाई देने लगे हैं। यही कारण है कि अब गांव के युवा बड़ी संख्या में थलसेना के साथ-साथ वायुसेना व जल सेना की ओर भी रुख करने लगे हैं।
गांव के कई लोग सेना में उच्च पदों पर पहुंचे जबकि कई फिलहाल कार्यरत हैं। शिक्षा के मामले में गांव में तीन सरकारी एवं निजी स्कूल हैं लेकिन उच्च शिक्षा के लिए गांव से बाहर निकलना पड़ता है। लड़कों के लिए सरकारी मिडिल स्कूल है जबकि लड़कियों के लिए दसवीं तक है। इतना होने के बावजूद मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरे गांव का शिक्षा का स्तर बेहद अच्छा है। बेटियों को लिखाने पढ़ाने का जज्बा गांव में गजब का है। लिंगभेद की देशव्यापी काली छाया से मेरा गांव अछूता है। यहां बेटा-बेटी को समान समझा जाता है। लैंगिक संवेदनशीलता तथा कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लिखने की प्रेरणा के पीछे काफी हद तक मेरे गांव का माहौल ही रहा है।सेना के बाद मेरे गांव के काफी लोग शिक्षा से जुड़े हुए हैं। बड़ी संख्या में गांव के लोग शिक्षा के माध्यय से राष्ट्र निर्माण की बुनियाद को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। सिविल सर्विसेज में भी गांव के लोग सेवा दे रहे हैं। मेरे गांव के एक शख्स तो कलक्टर जैस शीर्षस्थ पद तक पहुंचने में भी सफल रहे हैं।
मेहनत कर बढ़िया मुकाम हासिल करने वाले गांव के सफल व्यक्तियों के पीछे किसी गॉडफादर का हाथ नहीं बल्कि आपसी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का ही परिणाम है। गांव के युवा एक दूसरे से प्रेरणा लेते हैं और मंजिल की तलाश में जुट जाते हैं।
सेना, शिक्षा तथा सर्विस के बाद बड़ी संख्या में लोग कृषि से भी जुड़े हुए हैं लेकिन गांव का रकबा कम है, इस कारण गांव में खेती फायदे का सौदा नहीं है। बावजूद इसके मजबूरी कहें या जिनको रोजगार नहीं मिला वे कृषि के काम में लगे हुए हैं। कुओं का जलस्तर हर साल नीचे जा रहा है इस कारण हर साल कुओं को गहरा करवाना पड़ता है। इस वजह खेती में जो थोड़ा बहुत मुनाफा होता है वह इस काम में खर्च हो जाता है।
गांव में बिजली मेरे पैदा होने से पहले ही आ गई थी लेकिन उसका ढर्रा आज भी पटरी पर नहीं है। गांव में बिजली कब आए और कब चली जाए कहना मुश्किल है। सबसे बड़ी बात तो है कि मेरे गांव के लोग इस समस्या से रोजाना दो चार होते हैं, आपस में चर्चा करते हैं, लेकिन इस समस्या के निदान के लिए कोई प्रयास नहीं करते। हालत घरेलू एवं कृषि बिजली दोनों की समान है। एक बार छात्र जीवन में कुछ युवा साथियों के साथ हम बिजली की मांगों के लेकर सुलताना के पावरहाउस पहुंचे थे। बदकिस्मती से वहां का माहौल गर्मा गया। मामला पुलिस थाने तक पहुंच गया। बस फिर क्या था। उसके बाद बिजली को लेकर कोई कुछ कहता ही नहीं है।  ग्रामीणों की इसी मजबूरी का फायदा विद्युत निगम के  अधिकारी-कर्मचारी गाहे-बगाहे उठाते रहते हैं। गांव के अधिकतर नौकरीपेशा लोग जब गांव आते हैं तो उनको सर्वाधिक पीड़ा बिजली को लेकर ही होती है। वे अपनी पीड़ा गांव के लोगों को कहते हैं लेकिन उस पर गंभीरता से कोई नहीं सोचता।
मेरे गांव में सबसे बड़ा संकट यह है लोग यहां से पलायन कर रहे हैं। वर्तमान में आधे से ज्यादा गांव खाली हो गया है। रोजगार की तलाश में जो गांव से बाहर निकला, उसने फिर वापस गांव की ओर रुख नहीं किया। उसने गांव की चिंता भी नहीं की। राजनीतिक मोहरे ऐसे लोगों को चुनाव के मौसम में अपने खर्चे पर गांव के दर्शन करवाने का अवसर जरूर उपलब्ध करवा देते हैं, लिहाजा, वे भी उसी का समर्थन कर चले जाते हैं।  मैंने गांव के मौजीज लोगों  को एक जगह बैठ कर गांव के समग्र विकास लिए चर्चा करते हुए नहीं देखा। ग्रामसभाओं में ग्रामीण तो दूर जनप्रतिनिधि ही नहीं आते हैं। उनकी उपस्थिति किस प्रकार दर्शाई जाती है मेरे से बेहतर शायद ही कोई जानता होगा। हां, तो मैं कह रहा है था मेरा गांव खाली हो गया है।
मेरे देखते-देखते ही गांव काफी कुछ बदल गया है। अक्सर आबाद रहने वाले गांव के रास्तों में अब अघोषित कर्फ्यू सा लगा रहता है। गांवों के नुक्कड़ों पर अक्सर दिखाई देने वाले ताशपत्ती एवं चौपड़ के नजारे अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुके हैं। हां, ताशपत्ती का खेल जरूर होता है लेकिन उसमें मनोरंजन व हास-परिहास की भावना गौण हो चुकी है। ताशपत्ती का खेल रफ्ता-रफ्ता जुए में तब्दील हो रहा है। गांव के अधिकतर बेरोजगारों की सुबह और शाम इसी काम में बीत रही है।
व्यक्ति के खुद तक सिमटने की वैश्विक समस्या से मेरा गांव भी अछूता नहीं है।  गांव का गुवाड़  अब अतीत की गवाही देता है। कभी यहां चौपाल लगती थी तथा बड़े बुजुर्ग मिलकर आपस में हालचाल पूछा करते थे। एक दूसरे के दुख-दर्द साझा किए करते थे। लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है। राजनीति का खेल मेरे गांव में भी खूब चला। यह राजनीति का ही कमाल था कि कभी सामूहिक रूप से मनाई जाने वाली होली आज तीन-चार जगह मनने लगी है। धूलण्डी के दिन प्यार मोहब्बत से एक दूसरे को राम-रमी करने तथा रंग-गुलाल लगाने वाले आज एक-दूसरे के प्रति बांहे चढ़ाए हुए नजर आते हैं। दो धड़ों में बंटे लोगों के बीच जो एक अदृश्य तनाव है, जो कभी भी किसी बड़े हादसे की शक्ल इख्तियार कर सकता है। मैं सोचता हूं गांव की एकमात्र इस साझा विरासत को पुनः बहाल करने के लिए कोई प्रयास क्यों नहीं करता। फिर ख्याल आता है कि किसको मतलब है, सब को अपनी पड़ी है। राजनीतिक मोहरे तो ऐसे ही अवसरों की तलाश में रहते हैं। मुझे मेरे गांव में बहुत सारी खूबियां नजर आती हैं लेकिन एकमात्र यही खामी सब पर भारी पड़ती है। मुझे आज भी होली का वह मनहूस वाकया याद है, जब गांव की साझा संस्कृति को बहुत बड़ा आघात लगा था। होली-दीवाली पर राम रमी के बहाने  एक दूजे के घर जाने तथा हालचाल जानने का प्रचलन भी अब कम हो चला है।
आखिर में एक बात और मेरा गांव आम गांव जैसा नहीं है। यहां प्रत्येक घर आपको पक्का दिखाई देगा। हां, रास्ते जरूर ऊबड़खाबड़ एवं बेतरतीब है। इनमें कीचड़ भरा रहता है। रास्तों की इस प्रकार की दशा के लिए मैं काफी हद तक राजनीति को ही जिम्मेदार ठहराऊंगा। कच्चे मकान तो गांव में ढूंढे भी ना मिलेगा। एक दूसरी बड़ी बात यह है कि मेरे गांव में खेतीबाड़ी या भवन निर्माण के लिए आपको मजदूर नहीं मिलेंगे। इस काम के लिए पड़ोसी कस्बे सुलताना जाना पड़ेगा।
यातायात के पर्याप्त साधन हैं। गांव तक पहुंचने के लिए पक्की डामर की सड़क भी बनी हुई है। नौकरीपेशा लोग होने के कारण गांव के लोगों का आर्थिक स्तर औसत से काफी ऊंचा है। इसी कारण अधिकतर घरों में दुपहिया वाहन मिल जाएंगे। चौपहिया वाहनों की संख्या में भी दिनोदिन इजाफा हो रहा है। गांव का ऐतिहासिक राधा कृष्ण मंदिर कई घटनाओं का साक्षी रहा है। मंदिर में बाबा का धूणा अपने चमत्कारिक महत्त्व के कारण ग्रामीणों की आस्था का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है।
बहरहाल, समय के साथ कदमताल करता मेरा गांव आगे बढ़ा जा रहा है लेकिन संस्कार एवं संस्कृति की कीमत पर है। सोचता हूं संस्कार एवं संस्कृति को साथ लेकर गांव के लोग उन्नति करें, आगे बढ़े तो कितना अच्छा होगा। मुझे उम्मीद है वह दिन जरूर आएगा। मेरे जैसे कुछ साथी और हैं जिनके मन में यह पीड़ा है। देर है तो बस साथ बैठने की। एक दिन बैठ गए तो जरूर कुछ ना कुछ सकारात्मक पहल करके उठेंगे। वैसे भी कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती है।