Monday, September 23, 2013

बच्चों की बात


बस यूं ही

 
अभी दो दिन पहले की ही बात है। सुबह घर से कार्यालय पहुंचा ही था कि श्रीमती का फोन आ गया। मोबाइल पर श्रीमती के नम्बर देखकर चौंक गया। रिसीव करने से पहले ख्याल आया कि आखिरकार ऐसा क्या हो गया, अभी तो घर से आया था और पीछे-पीछे फोन आ गया। खैर,फोन अटेण्ड किया तो श्रीमती की आवाज सुनकर लगा कि वह बड़ी उत्साहित है। मैंने पूछा बोलो, क्या काम आ गया, तो बोली मैंने वो अखबार की रद्दी बेच दी है। मैंने कहा ठीक है लेकिन इसमें बताने की बात क्या है। इस वह बोली बात तो बताने वाली ही है, इसलिए तो फोन किया है। मैंने कहा कि अब बता दो कि आखिर ऐसा क्या है। उसने कहा कि आपने रद्दी आठ रुपए किलो के हिसाब से बेची थी जबकि उसने दस रुपए किलो के हिसाब से बेची है। मैंने उसको धन्यवाद दिया और अच्छा किया कहकर फोन काट दिया।
इसके बाद कार्यालय से दैनिक काम निबटाकर बच्चों को लेकर घर पहुंचा। बस्ता सोफे पर फेंकने के बाद योगराज कमरे की ओर दौड़ा। अंदर जाते ही वह जोर से बोला, 'अरे, मम्मा, अपने कमरे के अखबार कौन ले गया।' श्रीमती रसोई में व्यस्त थी, लिहाजा योगराज ने यही सवाल मेरे से पूछा। चूंकि मैं तो समूचे घटनाक्रम से वाकिफ था, इसलिए जानबूझाकर अनजान बना रहा है। जवाब ना पाकर योगराज की बेचैनी स्वाभाविक थी। वह मेरे पास आया और फिर बोला, 'अरे पापा कब से पूछ रहा हूं, बताओ ना, अखबार कहां गए? ' मैंने कहा बेटे अखबार तो आज चोरी हो गए। जवाब सुनकर वह छोटे भाई एकलव्य (चीकू) के पास गया और बोला 'चीकू, देख अपने अखबार चोरी हो गए।'
चीकू ने यह सुना तो वह भी दौड़कर कमरे में गया। इसके बाद दोनों भाई सोचने वाले अंदाज में बाहर आए। दोनों सोच में डूबे थे कि आखिर यह सब कैसे हो गया। अचानक योगराज बोला 'अरे, पापा अखबार चोरी हो गए,यह तो ठीक है लेकिन चोरों ने अपने को बताया क्यों नहीं?' मैं योगराज के भोलेपन पर मंद मंद मुस्कुरा ही रहा था कि हाजिरजवाब चीकू जल्दी से बोला.. 'अरे भाई, चोर कोई बताकर चोरी थोड़े ही करेगा।' चीकू का जवाब सुनते ही मैं हंस पड़ा। श्रीमती भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी। सचमुच बच्चों का अपना संसार है। वे बड़े ही जिज्ञासु होते हैं। उनके सवाल जितने अजीब व रोचक होते हैं तो जवाब उतने ही दिलचस्प। और एक बात और पोस्ट के साथ लगाई यह गई इस फोटो की कहानी भी बड़ी रोचक है। एक दिन स्कूल से आने के बाद दोनों भाई बाथरुम में जाकर खेलने लगे। इसी दौरान श्रीमती ने चुपके से आकर मेरे कान में कहा कि देखो बच्चे क्या कर रहे हैं। मैंने जाकर देखा तो हंसे बिना नहीं रह सका। दोनों अपने स्कूल के सफेद जूतों को धोने में जूटे थे। दोनों की यह गतिविधि मैंने मोबाइल मैं कैद कर ली। आज बच्चों के बारे में लिखने का ख्याल आया तो इस फोटो की भी याद आ गई।

कमाल का धमाल


बस यूं ही

लालों का कमाल,
मचा रहे धमाल,
पार्टी है बदहाल,
विपक्ष तो खुशहाल।

जी का जंजाल,
सब कुछ निढाल,
बुरा हुआ हाल,
चुनावी है साल।

हो गए हलाल,
रह गया मलाल,
समय का काल,
छोड़ गया सवाल।

थमता नहीं बवाल,
सियासत में उबाल,
तोड़ कोई निकाल,
काली लगती दाल।

Tuesday, September 17, 2013

सपनों की सियासत...4


बस यूं ही

 
सपनों की सियायत कम होने का नाम नहीं ले रही है। गाहे-बगाहे सपनों से जुड़ा कोई न कोई बयान आ ही जाता है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जाएंगे, वैसे-वैसे सपनों की फेहरिस्त और भी लम्बी होती जाएगी। ऐसे-ऐसे सपने जो आजादी के बाद से लगभग हर छोटे-बड़े चुनाव में दिखाए जाते रहे हैं। सपनों की इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए मंगलवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी राजस्थान के बारां में सपने दिखाए। कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि वे चाहते हैं कि देश का सबसे बड़ा सपना देश के गरीब को देखना चाहिए। वे चाहते हैं कि मजूदर का बेटा हवाई जहाज में चढऩे का सपना देखे। वैसे, सपना तो हर कोई देखता है, उस पर न तो कोई टैक्स लगता है और ना ही किसी तरह की पाबंदी है, लेकिन सपने गरीब ही देखे और वह भी सबसे बड़ा सपना.. यह तो सोचने वाली बात है। उनका यह बड़ा सपना पूरा होगा या नहीं यह तो बाद की बात है, लेकिन मेरा अनुभव तो यही कहता है कि मजदूर या गरीब व्यक्ति के हवाई जहाज में चढऩे से उन पर कर्जा जरूर चढ़ जाता है। यकीन नहीं है तो शेखावाटी के उन लोगों से पूछिए जिनके परिजन रोजगार की तलाश में अरब देशों में गए हुए हैं। अगर हवाई जहाज में चढऩे व उतरने मात्र से ही सपना साकार हो जाता तो फिर क्यों वे अपने वतन से दूर जाने को मजबूर होते। क्या यहीं पर कमा खा नहीं लेते? हां इतना जरूर है कि केवल हवाई जहाज में चढ़कर, उतरने का ही सपना है तो, मेरे हिसाब से उसे पूरा करना कोई मुश्किल काम नहीं है। वैसे भी देश में कई जगह संग्रहालयों में पुराने हवाई जहाज खड़े हैं। राहुल के निर्देश पर पार्टी गरीबों को यह सुअवसर उपलब्ध करवा सकती है। दरअसल, यहां हवाई जहाज में चढऩे से तात्पर्य प्रत्येक आदमी को रोजगार मिलने से है। रोजगार से आदमी इतना सक्षम और समर्थ हो जाएगा कि हवाई जहाज में बैठना उसके लिए मुश्किल काम नहीं होगा। तभी तो राहुल ने कहा भी कि उनकी पार्टी हर आदमी को रोजगार मुहैया करानी चाहती है। अरे भई, करवाओ ना.. किसने रोका है। स्वागत है। लेकिन सिर्फ कह भर देने से ही रोजगार नहीं मिलने वाला। यह देश आजादी से लेकर आज तक कई तरह के संकटों से जूझता रहा है। उनमें बेरोजगारी भी बड़ी समस्या है। हर साल शिक्षित व प्रशिक्षित बेरोजगारी की फौज बढ़ती ही जा रही है। यह सब सपने दिखाने का कमाल नहीं तो क्या है? आजादी के समय से ही रोजगार देने और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सोच लिया जाता तो आज ऐसे हालात शायद पैदा ही नहीं होते। बहरहाल, किसी गरीब और मजबूर का सपना पूरा होता है तो हम सब के लिए इससे बड़ी गर्व और गौरव की बात कोई और हो ही नहीं सकती। लेकिन सपने पूरे होने में संशय इसलिए है, क्योंकि देश में अगर गरीब और मजूदर रहेंगे ही नहीं तो फिर सपने देखेगा कौन? देश में वो ही तो एकमात्र ऐसा वर्ग है, जिसको सर्वाधिक सपने आज तक दिखाए गए हैं। भले ही इस वर्ग को दो जून की रोटी ठीक से मय्यसर ना हो लेकिन सपने तो देखे ही जा सकते हैं ना।                                                                                           जारी है..।

Monday, September 16, 2013

सपनों की सियासत...3


बस यूं ही

 
'मैं सपने नहीं देखता, क्योंकि सपने देखने वाला बर्बाद हो जाता है।' 'हमें सशक्त सरकार और सशक्त नेता के सपने को पूरा करना है।' पढऩे में यह दो साधारण वाक्य ही हैं लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। याद कीजिए यह दोनों बयान एक ही व्यक्ति के हैं। अंतर महज इतना सा है कि पहला बयान पखवाड़े भर पहले का है जबकि दूसरा एकदम ताजातरीन है और रविवार को ही आया है। दोनों बयानों में विरोधाभास है या समानता, यह आम आदमी भी आसानी से समझ सकता है। एक तरफ जनता को सपना दिखाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सपना देखने से होने वाले संभावित खतरे से आगाह भी किया जा रहा है। हां, इतना जरूर है कि दोनों बयान जारी हुए तब हालात जुदा-जुदा थे। एक बयान उस वक्त का है जब तस्वीर साफ होने में कुछ संशय था। उस पर विरोध के बादल मंडरा रहे थे। दूसरा बयान तस्वीर साफ होने के बाद का है। भले ही विरोध को दरकिनार कर दिया गया हो। इससे इतना तो तय हो गया कि परिस्थितियों के हिसाब से सपने की परिभाषा भी बदल जाती है। सपना अब व्यक्तिगत नहीं सामूहिक हो गया है, मतलब सब मिलकर सपना देखेंगे और फिर...सपने देखने वाला...हो गया.. तो, राम-राम, भगवान सलामत रखे। खैर, मेरे को तो दोनों बयान विरोधाभासी लगे। बयानों का इस तरह यू टर्न देखकर अब पक्का यकीन हो गया कि राजनीति में सब कुछ स्थायी क्यों नहीं होता है। महोब्बत और जंग की तरह राजनीति में भी सब कुछ जायज क्यों है। यह इसलिए क्योंकि यहां न तो कोई स्थायी मित्र होता है और ना ही स्थायी दुश्मन। परिस्थितियों के हिसाब से सब कुछ बदलता रहता है। तभी तो राजनीति करने वाले या इसमें रुचि रखने वाले अवसरवादिता से परहेज नहीं करते। बहरहाल, बयानों के इस तरह बाल की खाल निकालने की तर्ज पर भावार्थ तलाशने के कारण मेरे पर किसी विचारधारा विशेष का समर्थन करने जैसे गंभीर आरोप लगने लाजिमी हैं। वैसे भी मेरे विचारों से सभी संतुष्ट हों यह भी तो जरूरी नहीं है और हो भी नहीं सकते। हाथ की पांचों अंगुलियां ही बराबर नहीं होती तो फिर विचारधारा में समानता की कल्पना करना ही बेमानी है। खैर, यहां पर आलोचना किसी व्यक्ति विशेष की नहीं होकर उन दो बयानों की है, जो देश में खासे चर्चित हो गए हैं। वैसे मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूं कि हमारे देश में सपनों का कारोबार है, यहां सपने बिकते हैं। इसलिए सियासत में सपने देखे या दिखाए नहीं जाएंगे तो फिर सत्ता रूपी सफलता की सीढ़ी चढऩा असंभव ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा। बस देखने की बात यह है कि सपने पूरे किस तरह से होते हैं। क्योंकि सपनों को साकार करने के लिए मेहनत जरूरी है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि, जिसने कल्पना के महल नहीं बनाए उसे वास्तविक महल भी उपलब्ध नहीं हो सकता है। स्वामी जी के कहने का आशय यही था कि सपने देखने चाहिए लेकिन उनको पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत भी जरूरी है। लेकिन गौर करने लायक बात यह भी है कि सपने टूटने का ग्राफ सियासत में ही ज्यादा है। सपने जब टूटते हैं तो फिर गोपालदास नीरज याद आते हैं। और याद आता है उनका वह कालजयी गीत, जिसमें उन्होंने कहा है...
स्वपन झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे।
वाकई सियासत में जब सपने टूट जाते हैं तो गुबार ही हिस्से में आता है.। जारी है...

सपनों की सियासत...2


बस यूं ही

 
सियासत में इसी तरह के सपने दिखाए जाते हैं। आजादी से लेकर आज तक न जाने कितने ही सपने दिखाए गए। कोई हिसाब नहीं है। बिलकुल बेहिसाब। सपने दिखाते-दिखाते हालत यह हो गई है कि अब बात सपने देखें जाए या नहीं, इस विषय पर होने लगी है। तभी तो आजकल सपने पर बहस चल रही है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाल ही में दिए गए सपनों से संबंधित बयानों की जोरदार समीक्षा हो रही है। मोदी कहते हैं, वे सपने नहीं देखते। सपना देखने वाला बर्बाद हो जाता है। राहुल कहते हैं, आपके (जनता के) सपनों को मैं अपना सपना बनाना चाहता हूं.। मैं जनता के हर सपने को पूरा करना चाहता हूं। दोनों बयान कितने विरोधाभासी हैं। दोनों में कहीं कोई समानता नजर नहीं आती है। बिलकुल एक दूसरे के उलट हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, दोनों परस्पर विरोधी दलों के नेता जो ठहरे। इसके बावजूद मेरे को दोनों नेताओं के बयान में एक समानता दिखाई देती है। समानता इस बात की कि दोनों नेताओं के बयान पार्टी लाइन की बजाय व्यक्तिगत ज्यादा नजर आते हैं। यह बात अलग है कि दोनों ही दलों ने बयानों पर न तो कोई प्रतिक्रिया जाहिर है की और ना ही इनको व्यक्तिगत मामला बताकर अपना पल्ला झाड़ा है। ऐसा इसलिए है कि क्योंकि इन दोनों दिग्गज नेताओं के बयानों को चुनौती देने का काम कौन करे। यही बयान कोई छुटभैया दे देता तो यकीन मानिए, उससे स्पष्टीकरण मांग लिया जाता। भविष्य में इस तरह के बयान देने पर पाबंदी तक भी लग सकती थी। खैर, मोदी का ना हो लेकिन उनकी पार्टी का सपना है कि मोदी प्रधानमंत्री बने। इधर राहुल हर आदमी का सपना सच करने की कह रहे हैं कि जबकि उनकी पार्टी ने न जाने आज तक कितनों के सपनों को तोड़ा है। इसलिए मेरी नजर में तो दोनों बयान व्यक्तिगत ही हैं और इधर दोनों दल मजबूर हैं। बयानों के समर्थन हां में हां मिलाने या मौन रहने पर। चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते। कोई चारा भी नहीं है।
बहरहाल, देश में सपना आज भी प्रासंगिक है। सपना हमारे देश का एक तरह से यथार्थ बन गया है। देश में सपने का कारोबार है। यहां सपने बिकते हैं। यहां सपनों के सौदागर हैं। साहित्य से लेकर फिल्म तक हर जगह सपना मौजूं हैं। कॅरियर बनाने तक में सपना देखा जाता है। हर आम से लेकर खास तक सपना जुड़ा है लेकिन इसके हर वर्ग के हिसाब से मायने अलग हैं। दरअसल, सपना हमारे देश में एक बहुत बड़ा मुद्दा है। भ्रष्टाचार, महंगाई, साम्प्रदायिकता, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, जनसंख्या वृद्धि इन सबसे दीगर लेकिन सबसे कारगर। जिस प्रकार धर्म का राजनीति से घालमेल करके फायदा उठाया जाता है, उससे कहीं ज्यादा मुफीद तो सपना है। इसलिए सपना सियासत का सबसे कारगर हथियार है। सफलता पाने की पहली कड़ी ही सपना है। बिना सपने के सफलता मिलना संभव भी नहीं है। जारी है..

सपनों की सियासत...1


बस यूं ही

 
आजकल बेहद उधेड़बुन में हूं और असमंजस में भी। सोते-उठते जेहन में एक ही सवाल कौंधता है... सपने देखने चाहिए या नहीं...। बहुत दिमाग खपा लिया लेकिन फिलहाल किसी फैसले पर नहीं पहुंचा हूं..। कई बार तो मन ही मन प्रण ले लेता हूं कि कल से सपने के बारे में नहीं सोचूंगा, लेकिन कोई न कोई बात ऐसी निकल ही जाती है कि सपने का सवाल फिर उठ खड़ा होता है। अंदर ही अंदर विचारों का प्रवाह दौड़ता है। कभी कभी तो यह प्रवाह इतना उग्र हो जाता है कि विचारों में द्वंद्व होने लगता है। वैसे भी मौजूदा दौर में सपने पर कुछ बोलना या कहना खतरे से खाली नहीं है। सपनों के साथ आजकल सियासत जो जुड़ गई है। सपने का समर्थन करने या विरोध करने का सीधा सा मतलब खुद पर किसी दल की विचारधारा का ठप्पा लगवाने से कम नहीं है। राजनीतिक गलियारों में बयानों के भावार्थ न चाहते हुए भी निकाल ही लिए जाते हैं। बस यही सोचकर कई दिनों से चुप था लेकिन जब सपनों की बात बढ़ ही गई है तो फिर जोखिम उठाने की हिम्मत जुटा ही ली। वैसे भी हमारी जमात के प्रति नेक विचार होते ही कितनों के हैं। ऐसे संक्रमण के काल में जब जमात के कुछ साथी बिना कुछ किए व कहे नाहक ही बदनाम हो रहे हैं, उससे तो बेहतर है कि चुप्पी तोड़ ही दी जाए। खैर, मुद्दे की बात यह है कि मेरा सपने देखने और दिखाने के दर्शन में विश्वास मिलाजुला सा ही है। यह मेरी बेहद निहायत और निजी राय है। सपने देख भी लेता हूं और नहीं भी। यह बात दीगर है कि रात को सपने अपने आप जरूर आ जाते हैं। न चाहते हुए भी। कभी सुहावने तो भी डरावने। उन पर किसी की कोई बंदिश नहीं है.. कोई रोक नहीं है। मेरा मानना है कि इस प्रकार से सपने तो सभी को ही आते होंगे। फितरन कुछ लोग अपने सपनों को साझा भी करते हैं। कुछ तो सपने का फल जानने के लिए बड़े बेताब नजर आते हैं। यह तो हुई ना चाहते हुए भी सपने देखने की बात। अब मेरा तजुर्बा तो यह कहता है कि सपने देखने के साथ दिखाने भी पड़ते हैं। बात को आजमाना हो तो इसके लिए खुद के परिवार से बड़ा उदाहरण कोई नहीं है। किसी चीज को लेकर बच्चे जब जिद करते हैं.. रोते हैं.. रुठते हैं... तो हम या तो उनकी जिद पूरी कर देते हैं या फिर उनको भरोसा दिलाते हैं, उनसे वादा करते हैं... आश्वासन देते हैं। यह सब करना एक तरह का लॉलीपाप या सपना ही तो है। यही कहानी बच्चों की मां से जुड़ी होती है। उसकी कई मांगें तो तत्काल पूर्ण करने वाली ही होती हैं। कुछ हाथोहाथ पूरी नहीं भी हो पाती हैं, जिनको दूरगामी मांगें भी कह सकते हैं, उनके लिए सब्जबाग दिखाने की कलाकारी करनी पड़ती है। यह एक सपना ही तो है। भले ही आपने नहीं देखा लेकिन आपके आश्वासन से किसी ने तो देख लिया..। जारी है..

सूर्यनगरी जोधपुर-3


बस यूं ही

 
कार्य संबंधी तमाम औपचारिकताएं पूर्ण कर उसी दिन शाम को हम दोनों भाई-बहन गांव के लिए रवाना हो गए। ऐसे में जोधपुर देखने की हसरत पूरी नहीं हो सकी। मजे की बात तो यह है कि उस काम का परिणाम केवल एक हां पर ही टिका था। आखिरकार हां हो ही गई और इसके बाद रिश्तों की डोर कुछ कदर बंधी, कि मैं जिंदगी भर के लिए जोधपुर का होकर रह गया। इसके बाद तो जोधपुर पहले के बरक्स और भी अच्छा लगने लगा था। यह बात दीगर है कि व्यस्तता और पेशगत मजबूरियों के चलते जोधपुर जाना कम ही हो पाता है। कभी कारण विशेष के लिए जाना भी पड़ा तो कार्यक्रम इतना व्यस्त रहा कि बस वो कार्य ही बड़ी मुश्किल से हो पाया। घूमने-फिरने की हसरत फिलहाल भी अधूरी है। खैर, हालिया दो घटनाक्रमों के चलते जोधपुर की जो छवि देश-दुनिया में बनी है, उसको लेकर मैं बेहद व्यथित हूं। इसलिए नहीं कि मैं जोधपुर से जुड़ा हूं, मेरा उससे संबंध है, बल्कि इसलिए कि समृद्ध इतिहास और संस्कृति के धनी इस शहर की वर्तमान में जो तस्वीर बना दी गई है वह डराती है। झकझोरती है। कचोटती है। और शर्मसार भी करती है। आलम यह है कि चंद लोगों की कारगुजारियों की सजा न केवल जोधपुर के लोग बल्कि यहां का इतिहास, संस्कृति और सद्भाव भी भोग रहे हैं। यकीन मानिए आजकल जोधपुर का नाम लेने के बाद लोगों के चेहरे पर जो कुटिल मुस्कान दिखाई देती है, वो अपने आप में काफी कुछ कह देती है। बहुत दुख देती है यह मुस्कान। सच कहता हूं., अंदर ही अंदर बहुत दर्द होता है। एक चोट सी लगती है। पहले तो भंवरीदेवी और अब आसाराम प्रकरणों का प्रस्तुतिकरण नई पीढ़ी में एक अजीब सी जिज्ञासा पैदा कर रहा है। मैं टीवी पर अक्सर खेल या समाचार चैनल ही देखता हूं..। लेकिन आजकल वह देखने की भी इच्छा नहीं होती। इसलिए नहीं कि जोधपुर का नाम, बदनाम हो रहा है, उसकी छवि को बट्टा लग रहा है, बल्कि बच्चों के कारण मैंने यह सब बंद कर रखा है। कोई भी समाचार चैनल लगा लो.. सब पर जोधपुर ही जोधपुर है। बच्चे जब बार-बार जोधपुर दिखाने और बोलने का सबब पूछते हैं तो मैं निशब्द हो जाता हूं..।       
क्रमश: ...

सूर्यनगरी जोधपुर-2

बस यूं ही
 
उस वक्त जोधपुर की खूबियों और खासियतों की बारे में इतनी जानकारी भी नहीं थी। वैसे भी बचपन में इन सब का ध्यान रहता भी कहां है। खैर, समय के साथ जोधपुर के बारे में और जानकारी मिलती गई। गांव के काफी लोग भी काम के सिलसिले में जोधपुर रहते हैं। उनके मुंह से भी सूर्यनगरी की काफी तारीफ सुन चुका था। सेना में रहते हुए पापा भी जोधपुर जा चुके हैं। इतना कुछ सुनने और जानने के बाद जोधपुर के प्रति जेहन में अलग छवि बनना लाजिमी था। जोधपुर का इतिहास, वहां के ऐतिहासिक स्थल, मेहरानगढ़, मंडोर, वायुसेना स्टेशन, पत्थरों की नक्काशी व उम्मेद पैलेस आदि के बारे में जानने के बाद मेरी जोधपुर देखने की जिज्ञासा और भी बढ़ गई। बीच-बीच में जोधपुर से जुड़े समाचार लगातार मिलते रहे। कभी क्रिकेट मैच के आयोजन को लेकर तो कभी फिल्मों की शूटिंग के बारे में। 1998 में जोधपुर उस वक्त अचानक सुर्खियों में आया था जब फिल्म स्टार सलमान खान, सैफ अली खान, तब्बू और नीलम हिरण शिकार के मामले में फंस गए। यह सब चलता रहा लेकिन कभी जोधपुर जाना नहीं हो पाया। आखिरकार 2003 में पहली बार जोधपुर जाने का मौका मिला। आज भी याद है बड़ी बहन के साथ जयपुर से रात को जोधपुर के लिए बस पकड़ी थी। तारीख तो याद नहीं है लेकिन शायद अगस्त या सितम्बर में से कोई महीना रहा होगा। रात भर का सफर करने के बाद अलसभोर हम दोनों बुआजी के घर पहुंचे थे। दोनों को देखकर बुआजी भी विस्मित थी कि आखिर बिना सूचना के सुबह-सुबह ही अचानक यह लोग किस प्रयोजन से आ गए। मैं नित्यक्रम से निवृत्त होता तब तक बुआ-भतीजी दोनों बातों में ही मशगूल हो चुकी थी। इसी बीच हमारे जोधपुर आने का मकसद भी बुआजी जान चुकी थी। उस वक्त मैं श्रीगंगानगर में कार्यरत था, लिहाजा अवकाश मुश्किल से तीन या चार दिन का ही मिला था। अखबार का काम ही ऐसा है, लम्बे अवकाश की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए जोधपुर घूमने-फिरने की बात गौण हो चुकी थी, पहली प्राथमिकता तो वह काम ही था, जिसके लिए जोधपुर गए थे। क्रमश: ...

सूर्यनगरी जोधपुर-1


बस यूं ही

 
फेसबुक पर इन दिनों फिल्म अभिनेता सलमान खान और आसाराम बापू की फोटो खूब शेयर की जा रही है। इसी फोटो के नीचे लिखा है, 'पचास बार मना किया था, जोधपुर मत जाना।' इस फोटो को खूब लाइक मिल रहे हैं और टिप्पणियां भी की जा रही हैं। भले ही यह बात सलमान ने ना कही हो लेकिन जाहिर सी बात है, सलमान का भी जोधपुर को लेकर अनुभव अच्छा नहीं रहा है। आज से करीब पन्द्रह साल पहले 1998 में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'हम साथ-साथ हैं' की शूटिंग के दौरान सलमान, हिरण शिकार के मामले में ऐसे फंसे थे कि अभी तक पीछा नहीं छूट पाया है। संभवत: सलमान का आसाराम के साथ फेसबुक पर यह लिंक तभी जोड़ा जा रहा है। खैर, करीब पखवाड़े भर से जोधपुर फिर चर्चा में है। गूगल पर भी जोधपुर के नाम से सर्च करने पर आसाराम प्रकरण ही ज्यादा दिखाई दे रहा है। जोधपुर चर्चित शहर है, इसमें दो कोई दो राय है ही नहीं। न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी। सूर्यनगरी के नाम से विख्यात इस शहर की पहचान केवल विशेष प्रकार के पत्थरों से ही नहीं बल्कि यहां की अपणायत से है, जिसका कायल हर वो शख्स है जो जोधपुर से परिचित है या यहां आ चुका है। यहां की संस्कृति को समझ चुका है। यहां के लोगों स्वभाव में न तो शहर के नाम (सूर्यनगरी) से हिसाब से गर्मी है और ना ही यहां लोग पत्थरों का शहर होने के बावजूद पत्थर जैसे कठोर हैं। हां, मान-सम्मान एवं स्वाभिमान तो यहां रहने वालों की नस-नस में है। गौर करने की बात यह है कि जोधपुर की यह विशेषताएं या खूबियां मैंने नहीं गढ़ी हैं, बल्कि इस शहर के साथ सदियों से जुड़ी हुई हैं। बचपन में एक जुमला सुना था कि जोधपुर के लोग जब गुस्से में कुछ कहते हैं तो भी उनका गुस्सा, आम गुस्से जैसे नजर नहीं आता। कहने का मतलब यह है कि जोधपुर की बोली इतनी मीठी है कि वो किसी पराये को भी अपना बनाने पर मजबूर कर देती है। खैर, मैं तो इस शहर से वाबस्ता बचपन से ही हूं..। हल्की सी याद है कि बचपन में एक बारात में जोधपुर आया था। चौपासनी स्कूल में बारात ठहराई गई थी। करीब 28-29 साल पहले की बात है...। क्रमश:

13/13 का राज


बस यूं ही

 
आज 13 सितम्बर है और साल भी 2013 का। मतलब आज का दिन लिखा जाए तो दो बार 13 का उल्लेख होगा। आज के दिन ने किसी के अरमानों के पंख लगा दिए तो किसी की उम्मीदों का दिया बुझा दिया। वैसे भी तेरह के अंक के साथ कई तरह के किस्से एवं कहानियां जुड़े हुए हैं और अंधविश्वास भी। विशेषकर क्रिकेट की दुनिया में 13 का अंक बेहद ही अशुभ माना जाता है। शायद ही कोई खिलाड़ी होगा जो 13 नम्बर की टीशर्ट पहनता है। इसके अलावा 13 पर आउट होने वालों की फेहरिस्त भी खासी लम्बी है। 13 पर आउट होने के पीछे एक बहुत बड़ा मनोविज्ञान है। खिलाड़ी इस स्कोर पर पहुंचते खुद को असुरक्षित महसूस करता है और जल्दी से इसे पार पाने के प्रयास में आउट हो जाता है। खैर, क्रिकेट की दुनिया से इतर काफी जगह 13 को अशुभ और मनहूस माना जाता है। पश्चिमी देशों में 13 तारीख के अंक को इतना अशुभ व दुर्भाग्यशाली माना जाता है कि इर साल 13 सितम्बर को अंधविश्वास को नकारने के लिए डिफाय सुपरस्टिशन डे मनाते हैं। तेरह के अंक को विज्ञान में भी एक फोबिया का नाम दिया गया है। इतना ही नहीं पश्चिम देशों में होटलों में तेरहवीं मंजिल नहीं होती है। होटलों में तेरह नम्बर का कमरा भी नहीं होता। इतना ही नहीं हवाई जहाज में तेरह नम्बर की पंक्ति भी नहीं होती।
बहरहाल, आज 13 सितम्बर के दिन देश में दो ऐसे फैसले हुए, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए हैं। दोपहर बाद जहां दिल्ली के दामिनी सामूहिक अनाचार प्रकरण के दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई, वहीं शाम होते-होते भाजपा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना दावेदार घोषित कर दिया। हो सकता है, जिनको फांसी की सजा मिली है वे और उनके परिजन आज के दिन को कोस रहे हों, लेकिन पूरा देश इस इस फैसले पर झूम रहा है। इधर मोदी की ताजपोशी से आडवाणी और उनके समर्थकों को छोड़कर शेष भाजपा में दीवाली का सा माहौल है। पटाखे फूट रहे हैं। मिठाई बंट रही है। ढोल-ढमकों और गाजे-बाजे के साथ खुशियां मनाई जा रही हैं। ऐसा लग रहा है कि मोदी कोई उम्मीदवार न हुए गोया प्रधानमंत्री ही बन गए हैं। खैर, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन मोदी समर्थकों की खुशी और जोश आज देखते ही बन रहा है।
अपने व्यस्त समय के बीच से जब 13 के अंक के बारे में कुछ जानकारी जुटाई तो इस दिन वैसे तो कोई खास उपलब्धि नजर नहीं आई, हालांकि रचनाकार रांगेय राघव, साहित्यकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी और संगीतकार जयकिशन की पुण्यतिथि 13 सितम्बर को ही आती है। वीर दुर्गादास का जन्म 13 तारीख को ही हुआ था। प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार का निधन भी तेरह तारीख को ही हुआ था। वैसे 13 को अपशकुनी मानने का प्रचलन भारत में भी है। 13 का डर यहां भी कम नहीं है। किसी वर्ष 13 मास अर्थात अधिमास हो जाए तो उसे भी शुभ नहीं माना जाता है। तिथि क्षरण के कारण चंद्रपक्ष में तेरह दिन रह जाएं उसे भी अशुभ माना जाता है। मुम्बई में दो प्रमुख आतंकी हमलों के लिए भी 13 तारीख का ही चयन किया गया था।
वैसे तेरह से जुड़ी कुछ कहावतें भी हमारे देश में प्रचलन में है। मसलन, नौ नकद तेरह उधार, तीन बुलाए तेरह आए दे दाल में पानी, तीन में न तेरह में। इसके अलावा एक और राजस्थानी कहावत है कि तीन का तेरह कर देना, अर्थात बिगाड़ देना। संयोग की बात यह भी यह है कि ताश के पत्तों में एक रंग के तेरह ही पत्ते होते हैं। अगर इक्के से गिना जाए तो तेरहवां पत्ता बादशाह और दुग्गी से गिना तो तेरहवां पत्ता इक्का होता है। 13 के अंक के सभी के लिए अपने-अपने मायने हैं। भाजपा के लिए तो 13 खास महत्त्व रखता है। तभी तो मोदी का नाम तय करने में इतनी जल्दबाजी दिखाई गई है, वरना लोकसभा चुनाव में तो अभी छह-सात माह बाकी हैं। भाजपा के लिए 13 का अंक वैसे मिलाजुला ही रहा है। फिर भी पार्टी इसका मोह नहीं त्याग नहीं पा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी 1996 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उनका कार्यकाल मात्र 13 दिन का ही रहा था। इसके बाद 1998 में जब वे दोबारा प्रधानमंत्री बने तो 13 तारीख को ही शपथ ली। दूसरा कार्यकाल भी तेरह माह का रहा। यह भी संयोग है कि सहयोगी दलों की संख्या भी तेरह ही थी। और उनके सहयोग से उन्होंने तेरहवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इतना ही नहीं उनको पराजय भी तेरह तारीख को झेलनी पड़ी। इस तरह उनका चौथी बार प्रधानमंत्री बनने का सपना भी तेरह तारीख को ही टूटा था। इतना ही नहीं वाजपेयी के कार्यकाल में तथा भाजपा के समर्थन में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी।
बहरहाल, मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की घोषणा जिस अंदाज में हुई है। उसके मायने तो हैं। कहीं मोदी भी वाजपेयी के नक्शे कदम पर तो नहीं हैं? उनका तेरह के प्रति प्रेम देखते हुए लगता तो यही है, वह भी एक नहीं बल्कि डबल तेरह। अब यह 13/13 का अंक उनके लिए कैसा साबित होता है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि वे वाजपेयी की तरह कोई करिश्मा दिखाएंगे या आडवाणी की तरह पीएम इन वेटिंग के नाम से ही जाने जाएंगे।

सच कहां है...


बस यूं ही

सच कहने का साहस... सच सुनने का साहस...
सच लिखने का साहस...सच स्वीकारने का साहस...
सच के साथ रहने का साहस...सच के साथ काम करने का साहस..
सच के साथ जीने का साहस...सच के साथ मरने का साहस...
यह सब अब कहां है,

क्योंकि आजकल,
सच आपस में लड़ाता है..बेवजह गुस्सा दिलाता है...
सच से रिश्ते टूटते है...सच से दोस्त रुठते हैं...
सच से बात बिगड़ती है...सच से दुनिया अकड़ती है...
सच बोरिंग कहानी है...पागलपन की निशानी है...
यह हालत इसलिए है,

क्योंकि आजकल,
सांच को आंच है... झूठ की नहीं जांच है..
झूठ का बोलबाला है... सच का मुंह काला है..
झूठ से बात बनती है... झूठ से राह निकलती है..
झूठ बोलना शान है.. झूठ ही पहचान है...
तभी तो यह हो रहा है,

क्योंकि आजकल
सच बेचारा बीमार है... आदत से लाचार है...
सच प्रताडि़त है... सच पराजित है...
झूठ को अपना लिया.. सच को बिसरा दिया...
सच बुरी तरह घायल है... झूठ के सब कायल हैं..
यह हालत तब तक रहेगी..

जब तक हम,
अहसानों से दबते रहेंगे... जुल्म के प्रति चुप रहेंगे..
मुफ्त उपहार पाते रहेंगे... बदले में गुण गाते रहेंगे..
झूठ को अपनाते रहेंगे. सच को ठेंगा दिखाते रहेंगे..
आत्ममंथन करेंगे नहीं... भगवान से कभी डरेंगे नहीं..

इसलिए अब,
मजबूर हम होंगे नहीं... तो सच से दूर होंगे नहीं..
सोए जमीर को जगाना होगा.. झूठ को दूर भगाना होगा..
माध्यम हम बनें नहीं... बुरा किसी से सुनें नहीं...
सब कुछ सच के साथ करेंगे... प्रलोभन से नहीं डिगेंगे..

आज मैं ऊपर...

बस यूं ही
 
हो सकता है शीर्षक पढ़कर आप चौंक जाएं लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। दरअसल आज मेरी एक बहुप्रतीक्षित मुराद पूरी हो गई। बस उसी खुशी में यह गीत गुनगुना रहा था, अच्छा लगा तो शीर्षक दे दिया। खुशी इस बात की, कि कॉलेज लाइफ से दूर होने के करीब १६ साल बाद एक और डिग्री हासिल करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। परिणाम भी मंगलवार को ही जारी हुआ है। परिणाम जानने की बेताबी का आलम ऐसा था कि पिछले दो माह से राजस्थान विश्वविद्यालय की वेबसाइट को कोई सौ बार से ज्यादा देख चुका हूं। कई बार ऐसा भी हुआ कि साइट खुल ही नहीं पाई। कई बार खुली तो रिजल्ट का विवरण नहीं देख पाया। आज भी शाम चार बजे के करीब बड़ी उम्मीद के साथ वेबसाइट खोली थी। रिजल्ट पर जैसे ही क्लिक किया तो खुशी से उछल पड़ा। उस पर एमजेएमसी फाइनल का परिणाम शो हो रहा था। धड़कन तेज हो गई थी। परिणाम की साइट खुली तो रोल नम्बर मांगे गए। नम्बर भूल चुका था। प्रवेश पत्र भी घर पर रखा हुआ था। परीक्षा भी तो अप्रेल में हो चुकी थी, इतना लम्बे समय तक रोल नम्बर भला याद कैसे रख पाता। घर पर श्रीमती को फोन करने ही वाला था कि अचानक दूसरे विकल्प पर पड़ी। उसमें नाम लिखने को कहा गया था। जैसे ही नाम लिखकर की बोर्ड पर इंटर मारा। मार्कशीट खुल गई थी। परिणाम उम्मीद से बेहतर आया। परीक्षा देते समय जितने अंक का अनुमान लगाया था उससे कहीं ज्यादा अंक देखकर खुशी दोगुनी हो गई। मेरा प्रयास था कि किसी तरह 55 प्रतिशत अंक बन जाए ताकि आगे कोई और डिग्री लेने में दिक्कत ना हो। पूर्वाद्ध और उतराद्र्ध दोनों के अंक जोडऩे के लिए श्रीमती की मदद लेनी पड़ी। उसने फोन पर मार्कशीट देखकर नम्बर बताए तो प्रतिशत 59.44 के करीब आए। डिग्री हासिल करने की खुशी इसलिए ज्यादा है क्योंकि इसको मैंने चार साल की मेहनत के बाद हासिल किया है। वैसे तो यह दो साल में ही मिल जाती है। मैं यहां बात मास्टर इन जर्नलिज्म एंड मास कम्प्युनिकेशन (एमजेएमसी) की कर रहा हूं। इस डिग्री को हासिल करने की कहानी बड़ी ही दिलचस्प व रोचक है, इसलिए तो सभी के साथ साझाा कर रहा हूं। एमजेएमसी पूर्वाद्ध तो मैंने 2010में ही उत्तीर्ण कर ली थी। इसके बाद 2011 में जैसे ही एमजेएमसी उतराद्र्ध का परीक्षा टाइम टेबल घोषित हुआ मेरा तबादला झुंझुनू से छत्तीसगढ़ हो गया। छत्तीसगढ़ में ज्वाइनिंग 13 अप्रेल तक देनी थी। इसी चक्कर में मैं पहला एवं दूसरा पेपर नहीं दे पाया। बाद में बॉस से आग्रह किया तो शेष दो पेपरों की अनुमति मिल गई। जल्दबाजी में किसी तरह मैंने दो पेपरों की परीक्षा दे दी। स्थानांतरण के वक्त मैं केवल उतराद्र्ध का प्रेक्टिकल का पेपर ही दे पाया था, और दो पेपर लिखित के दिए। परिणाम तो जैसा पता था वैसा ही आया। खुशी इस बात की थी कि पे्रक्टिकल सहित बाकी दोनों विषयों में 60 प्रतिशत से ज्यादा अंक आए थे। लेकिन प्रथम एवं द्वितीय विषय के आगे डबल ए यानी अनुपस्थित (अबसेंट) लिखा गया था।
इसके बाद मैंने दोनों विषयों की परीक्षा अगले साल देने का निर्णय किया। परीक्षा फार्म व फीस आदि की औपचारिकता बीच में अवकाश लेकर पूरी कर गया था। परीक्षा तिथि घोषित हुई तो उसी के हिसाब से मैंने रेल टिकट का आरक्षित करवा लिए थे। दोनों पेपरों में सात दिन का गेप था लेकिन इतना लम्बा अवकाश एक साथ स्वीकृत नहीं हुआ, लिहाजा दो बार बिलासपुर से जयपुर आने एवं जाने का आरक्षण करवाया गया।
मैं परीक्षा देने के लिए जिस दिन रवाना होने वाला था कि ठीक उसी रात्रि को अचानक श्रीमती का फोन आया कि उसके पेट में तेज दर्द है। उस वक्त में कार्यालय में ही था। जैसा कि अक्सर करता आया हूं मैं खुद घर नहीं गया और एक स्टाफर के हाथों दवा घर भिजवा दी। दवा देने के बाद भी श्रीमती को आराम नहीं मिला और उसने फिर फोन लगाया और घर जल्दी आने का आग्रह किया। उसके आग्रह को अनसुना करते हुए काम पूर्ण होने के बाद रात करीब डेढ़ बजे मैं घर पहुंचा तो उसकी हालत देखकर दंग रह गया। मेरे होश फाख्ता हो गए। मुझो खुद पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों मैं फोन पर उसके दर्द को इतने हल्के में लेता रहा। वह दर्द के मारे बुरी तरह से छटपटा रही थी। पेट पकड़े हुए वह बार-बार करवट बदल रही थी लेकिन ऐसा करने से भी उसे राहत नहीं मिल रही थी। अंतत: रात ढाई बजे हिम्मत करके मैंने पड़ोसी डाक्टर को उठाया। उन्होंने दर्द निवारक इंजेक्शन लगा दिया, बोले इससे आराम मिल जाएगा और नींद भी आ जाएगी। इंजेक्शन लगाने के बाद बामुश्किल आधा घंटा ही बीता होगा श्रीमती फिर उसी तरह से करने लगी। रात के तीन बज चुके थे। समझा में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। आखिरकार एक स्टाफ सदस्य को फोन लगाया और अलसुबह करीब चार बजे के करीब श्रीमती को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया।
मैं घर पर बच्चों के साथ था। बच्चों की भी उस वक्त परीक्षा चल रही थी। मैंने सुबह उठकर उनको नहलाया। नाश्ते के लिए फल रखे थे वो ही टिफिन में डाल दिए। तब तक नीचे बच्चों का रिक्शा आ चुका था। उनको स्कूल के लिए रवाना करने के बाद में मैं अस्पताल पहुंचा। वहां देखा तो श्रीमती के ग्लूकोज चढ़ रहा था। चिकित्सकों ने अपेन्डिस की आशंका जताते हुए सोनाग्राफी करवाने की सलाह दे दी थी। आशंका सही निकली। स्टाफ सदस्यों की सलाह पर श्रीमती को उस अस्पताल से अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया। वह वहां पर तीन दिन तक भर्ती रही है। मैं तो दो पाटों के बीच फंसा था। एक तरफ घर पर बच्चे तो दूसरी तरफ श्रीमती। इस आपाधापी के बीच मैं परीक्षा कहां व कैसे दे पाता। रेल टिकट भी जैसे-तैसे रद़्द करवाए। इस तरह यह एक और साल भी यूं ही चला गया।
आखिरकार इस शैक्षणिक सत्र में तीसरी बार फिर फार्म भरकर परीक्षा के लिए आवेदन किया। अवकाश न मिलने के कारण फार्म भरने का काम परिचित के माध्यम से ऑनलाइन ही करवाया। फीस के पैसे भी उन्होंने ही दिए। फिर किसी प्रकार का व्यवधान ना हो, भगवान से इसी स्मरण के साथ मैं परीक्षा का इंतजार करने लगा। आखिरकार अप्रेल में परीक्षा की तिथि घोषित हुई। किसी तरह अवकाश मंजूर करवाकर नियत तिथि को परीक्षा देने पहुंचा। उसी वक्त परिचित के द्वारा दिए गए वो फीस के पैसे भी चुकाए। इसके बाद भिलाई लौट आया। परीक्षा की तैयारी कैसी थी, अब यह मत पूछना लेना। केवल टे्रन में जो वक्त मिला उसी दौरान कुछ नोट्स को पढ़ पाया। बाकी सब भगवान भरोसे था। पहला पेपर देने के बाद फिर बीमार पड़ गया, लेकिन गनीमत यह थी कि दोनों पेपरों के बीच सात दिन का गेप था और इस बार अवकाश भी आठ दिन का लिया था। इस प्रकार परीक्षा पूर्ण हुई। अब परिणाम के इंतजार में चार माह से अधिक का समय कैसे बीता मैं ही जानता हूं। बहरहाल, आज परिणाम आ गया है और खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। फिलहाल ऑफिस में हूं लेकिन अपनी भावनाएं व्यक्त करने से खुद को रोक नहीं पाया। आखिर चार साल बाद एमजेएमसी उत्तीर्ण जो की है। तभी तो गा रहा हूं आज मैं ऊपर...

Tuesday, August 27, 2013

क्या आज हम शर्मिन्दा नहीं !

टिप्पणी

याद है दिल्ली में दरिंदगी की शिकार हुई 'दामिनी' के प्रति संवेदना जताने के लिए किस कदर होड़ मची थी हम सब में। कोई मोमबत्ती जला रहा था तो कोई जज्बाती स्लोगन लिख रहा था। हम सब अपने-अपने हिसाब से आरोपियों के खिलाफ आग उगल रहे थे। कोई उनके लिए उम्रकैद तो कोई फांसी तक मांग रहा था। और भी पता नहीं कितनी ही तरह की सजा देने की मांग भी उठी थी। इन सब के बीच पुलिस कार्रवाई पर भी कई तरह के सवाल उठाए गए थे। याद कीजिए, यह सब करने वाले भी तो आप और हम ही लोग थे। और आज न तो हम शर्मिन्दा हैं और ना ही शोकाकुल। संवेदनाओं का सैलाब भी लगता है सूख गया है। पीडि़ता की मदद के लिए कोई पहल तो दूर प्रार्थना तक नहीं हैं। बात-बात पर प्रतिक्रिया जाहिर करने और केंडल मार्च निकालने वाले तो पता नहीं कहां भूमिगत हो गए। कथित नारीवादी एवं स्वयंसेवी संगठनों की चुप्पी भी चौंकाने वाली है। मात्र नौ माह के बाद जागरूक एवं शिक्षित लोगों का व्यवहार इतना बदला हुआ सा क्यों है? पता नहीं, आज हम गुस्से से क्यों नहीं उबल रहे? क्या अब यह किसी की अस्मिता का सवाल नहीं रहा? क्या भिलाई की युवती किसी की बेटी या बहन नहीं? क्या भिलाई की 'दामिनी' का दर्द दिल्ली की 'दामिनी' जैसा नहीं? जब हम दिल्ली की 'दामिनी' का 'दर्द' महसूस कर सकते हैं तो अपनी 'दामिनी' के लिए क्यों नहीं? सवाल तो बहुत सारे हैं लेकिन अफसोस की बात यह है कि भिलाई के पावर हाउस रेलवे स्टेशन के पास दरिंदगी की शिकार हुई युवती के समर्थन में इक्का-दुक्का संगठनों को छोड़कर कोई कारगर व सार्थक आवाज उठती दिखाई नहीं दे रही। सब के सब चुप हैं। यह दोहरा चरित्र नहीं तो क्या है। और सरासर भेदभाव भी।
वैसे भी इस मामले में भेदभाव तो कदम-कदम पर दिखाई दे रहा है। पुलिस की जांच तो वैसे ही संदेह के घेरे में है। भिलाई-दुर्ग पुलिस के प्रति शक की सुई तो उसी वक्त घूम गई थी जब उसने सामूहिक अनाचार के आरोपियों को मात्र कुछ ही घंटों के भीतर पकडऩे का दावा तक कर दिया। और उसके बाद जो हुआ वह गले उतरने वाला तो कतई नहीं है। बिल्कुल अविश्वसनीय सा काम। बिना शिनाख्त परेड करवाए आरोपी पकड़ कर न्यायालय में पेश भी कर दिए लेकिन पुलिस उनके नाम बताने से पता नहीं क्यों एवं क्या सोच कर परहेज करती रही। इससे भी दुखद तो यह है कि दिल्ली के 'दामिनी' प्रकरण में पुलिस भूमिका पर सवाल उठानेवाले तथा उसको कोसने वाले लोग अब खामोश हैं। उनकी यह चुप्पी हर लिहाज से खतरनाक है। चाहे वह सामूहिक अनाचार को लेकर हो या पुलिस कार्रवाई पर।
जाहिर सी बात है हम सब की यह चुप्पी अनाचार के दरिंदों के साथ उन सभी का मनोबल भी बढ़ा रही है जो इस मामले को हल्के में ले रहे हैं या रफा-दफा करने के उपक्रम में जुटे हुए हैं। कवि अवतारसिंह पाश ने कहा भी है 'सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना, तड़प का न होना, सब कुछ सहन कर जाना।' वाकई मुर्दा शांति सबसे खतरनाक है। अगर आज हम चुप बैठे तो यकीन मानिए अगला नम्बर आप या हम में किसी का भी हो सकता है।
साभार - पत्रिका भिलाई के 27 अगस्त 13 के अंक में प्रकाशित। 

Monday, August 5, 2013

फिर भी अधूरी सौगात

(दुर्ग की कहानी, उसी की जुबानी)
 
टिप्पणी
 
मैं दुर्ग हूं, आपका दुर्ग। जरा पहचानिए मुझे आपका जिला दुर्ग। करीब सौ साल से भी अधिक पुराना समृद्ध इतिहास है मेरा। भले ही मेरी स्थापना गुलाम भारत में हुई लेकिन मैंने वो जमाना भी देखा जब यहां के लोगों की नस-नस में राष्ट्र प्रेम का रक्त प्रवाहित होता था। देश के नाम पर जान देने वाले लोग बातों के इतने धनी थे, कि प्राणों की बाजी तक लगा देते लेकिन अपने वचन (बात) पर अडिग रहते थे। उनकी कथनी और करनी में भेद तो कतई नहीं था। वे लोग अपनी नहीं बल्कि समूचे देश की चिंता करते थे। उस दौरान अपने नौनिहालों का जज्बा देखकर गर्व से मेरी छाती चौड़ी हो जाती थी। देश जब आजाद हुआ तो मैंने भी सपने देखे। पहला सपना तो यही कि मेरे नौनिहाल प्रगति करें और साथ में मेरा भी विकास करें। आजादी के करीब 26 साल तक मैं इंतजार करता रहा। इसके बाद राजनांदगांव को यह कहते हुए अलग कर दिया कि मेरा स्वरूप बड़ा है। राजनांदगांव को अलग से जिला बना दिया जाएगा तो विकास बेहतर होगा। इस तरह की दलील देकर और विकास का नाम लेकर मेरा विभाजन कर दिया गया...। मैं यही सोच कर चुप रहा कि मेरे नौनिहाल अपनी जुबान के पक्के हैं, आखिरकार कुछ तो करेंगे। लेकिन क्या हुआ.. मैं क्या बताऊं। आप सब जानते हैं, सब आपके सामने है। मेरे पहले विभाजन के करीब 25 साल बाद फिर राजनांदगांव को तोड़ दिया और एक और नया जिला कवर्धा, जो आजकल कबीरधाम बन गया है, बना दिया गया। समय के साथ जनप्रतिनिधि और नौनिहाल सपने दिखाते रहे कि लेकिन मैं उनकी नासमझी पर हमेशा खामोश ही रहा। हालात एवं वक्त के थपेड़े खाने के बाद मुझे इतना तो यकीन हो गया तो कि मेरे नौनिहाल जरूरत से ज्यादा समझादार हो गए हैं और मेरे टुकड़े करके मेरा विकास नहीं बल्कि खुद का ही उल्लू सीधा कर रहे हैं। अगर भिलाई के टाउनशिप को छोड़कर बाकी दुर्ग जिले की बात करें तो आज भी यहां के आम लोग बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे हैं। बिजली, पानी एवं सड़क तक ठीक से मुहैया नहीं हो पाए हैं लोगों को। लेकिन फिर विकास के नाम पर पिछले साल मेरे टुकड़े कर दिए गए। मेरे हिस्से से अलग कर बालोद एवं बेमेतरा नए जिले बना दिए गए। इस तरह कभी सबसे बड़े जिले का गौरव हासिल करने के बाद मेरा क्षेत्रफल अब बेहद छोटा हो गया। बालोद एवं बेमेतरा लोग भी विकास के सब्जबाग को देखकर राजी हो गए लेकिन हकीकत क्या है वे खुद बेहतर जानते हैं। बिना कोई संसाधन जुटाए जनप्रतिनिधियों ने महज अपने फायदे के लिए मेरे टुकड़े कर दिए। मैं पूछता हूं जब टुकड़े करने के बाद भी विकास नहीं हो रहा है तो फिर कब होगा।
अब मुझे संभाग बनाने की बात कही जा रहा है। मेरे नौनिहाल इसके लिए भी लम्बे समय से प्रयास कर रहे थे। लेकिन जनप्रतिनिधियों की यह समझदारी अब मुझे बोलने पर मजबूर कर रही है। आखिर क्या वजह है कि संभाग बनाने का यह ख्याल ऐन चुनाव के वक्त ही जेहन में आया। मांग तो लम्बे समय से उठ रही थी। जाहिर सी बात है चुनाव नजदीक हैं और फायदा लेना है तो नियम कायदों को दरकिनार किया जा रहा है। मैं संभाग का दर्जा देने की घोषणा करने वालों से पूछता हूं कि पिछले दस साल से तो सत्ता की चाबी उनके ही हाथों में थी। जिम्मेदारी के पदों पर आप ही काबिज थे तो यह नेक ख्याल अब क्यों?। विकास, विकास, विकास.. मेरे कान पक चुके हैं यह शब्द सुनते-सुनते लेकिन विकास कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। बहुत हो चुकी सियासत। बहुल लाभ ले लिया गया मेरे नाम से। मेरे टुकड़े कर के। अब संभाग बनाने का फैसला तो लिया जा रहा है लेकिन वह भी बिना संसाधन के ही। आयुक्त दफ्तर के लिए भी जुगाड़ किया जा रहा है। सुना है हिन्दी भवन में संभाग कार्यालय होगा। जनप्रतिनिधियों, तुमको विकास के नाम पर टुकड़े करने तथा संभाग बनाने से होने वाले नफा-नुकसान का आकलन करना बखूबी आता है लेकिन आपसे करबद्ध अनुरोध है कि मेरे नाम पर अब राजनीति ना करें। बहुत हो चुका यह सब..। अब आप विकास कीजिए.. ताकि मेरा और निरीह जनता का कुछ तो भला हो सके।

साभार - पत्रिका भिलाई के 5 अगस्त 13 के अंक में प्रकाशित। 

Monday, July 29, 2013

दो पीढिय़ों का संगम... भाग मिल्खा भाग


बस यूं ही








 
प्रदर्शित होने के 17 दिन बाद रविवार को जब परिवार सहित भाग मिल्खा भाग फिल्म देखने गया तो वहां हाउस फुल देखकर विश्वास यकीन में बदल गया कि फिल्म के चर्चे यूं ही नहीं है। वैसे फिल्म देखने की उत्सुकता तो रिलीज होने से पहले ही थी लेकिन समय आज ही मिला। इस बीच फिल्म की सफलता की कहानी कई जगह समीक्षा के रूप में पढ़ चुका था। यकीन मानिए जैसे-जैसे फिल्म के बारे में पढ़ता गया, तो इसके प्रति मेरी जिज्ञासा और बढ़ती गई। आज जब फिल्म देखकर लौटा तो पछतावा, इस बात का जरूर था कि क्यों इतनी शानदार फिल्म को देखने में इतना विलम्ब किया गया। सबसे अलग एवं चौंकाने वाली बात जो आजकल अमूमन नई फिल्म में दिखाई नहीं देती है, वह यह कि बुजुर्गों की दिलचस्पी नई फिल्मों में कम ही रहती हैं। लेकिन भाग मिल्खा भाग में मैंने कई बुजुर्ग दम्पती ऐसे भी देखे जो अपने बेटों-बहुओं का हाथ पकड़कर सिनेमाघर पहुंचे थे। फिल्म के प्रति बुजुर्गों के लगाव का सबसे प्रमुख कारण भी शायद अपने अतीत को याद करना ही रहा होगा। नई एवं पुरानी पीढ़ी को एक जगह करने का श्रेय बहुत ही कम फिल्मों को मिल पाता है। एक धावक की जीवनी को जिस अंदाज में फिल्माया गया है और बीच-बीच में जिस प्रकार कॉमेडी का समावेश किया गया है वह जरूरी भी था, क्योंकि सिर्फ दौड़ ही दिखाने के लिए दर्शकों को तीन घंटे तक बांधे रखना भी तो मुश्किल काम है।
वैसे पखवाड़े भर बाद फिल्म के बारे में लिखना बेमानी सा ही है, क्योंकि अब तक तो सब कुछ सबके सामने आ ही चुका है लेकिन फिल्म से मैं प्रभावित यूं ही नहीं हुआ। मेरे लिए आज भी भारतीय सेना एवं खेल दोनों का स्थान सबसे अहम है। और संयोग से फिल्म भी इन दोनों ही विषयों पर केन्द्रित है। पापाजी सेना में रहे हैं और इसके बाद बड़े भाई साहब भी। मैंने भी सेना में जाने के प्रयास किए लेकिन बदकिस्मती से वे सिरे नहीं चढ़ पाए। मुझे सेना में न जाने का मलाल आज भी है। यह बात अलग है कि देश सेवा एवं देश प्रेम के अपने जोश, जज्बे एवं जुनून को मैं पत्रकारिता के माध्यम से पूरा करने में बड़ी शिद्दत के साथ जुटा हुआ हूं। दूसरा स्थान खेल का इसलिए मानता हूं क्योंकि बचपन में दौड़ मेरा भी पसंदीदा खेल रहा है। कहा भी कहा गया है कि संस्कार घर से ही मिलते हैं। पापाजी सेना में रहे हैं और अपने समय के श्रेष्ठ धावक भी। सौ मीटर की दौड़ पापाजी 11.2 सेकण्ड में पूरी करते थे। पापाजी के जीते कप एवं मैडल घर रखे हैं जो आगे बढऩे की प्रेरणा देते हैं। संयोग देखिए पापाजी भी मिल्खासिंह के समय ही दौड़ा करते थे। वे 1952 में भर्ती हुए और जल्द ही दौड़ में अपना काम कमाया। जिस तरह मिल्खासिंह की राह में उनके प्रतिद्वंद्वियों (साथियों) ने मुश्किलें पैदा की लेकिन मिल्खा ने इनको चुनौती के रूप में लिया लेकिन पापाजी ने इनको चुनौती के रूप में लेने की बजाय स्वाभिमान से जोड़ दिया। फिल्म देखने की बाद घर आने पर सबसे पहले फोन पर पापाजी से ही बात की। उनको बताया कि आपसे बचपन में सुनी मिल्खासिंह की कहानी को आज फिल्म के रूप में देखकर आ रहा हूं। वे बेहद खुश हुए यह सुनकर। इसके बाद बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो देर तक चलता रहा। मैने जिज्ञासावश पूछ लिया तो पापाजी ने बताया कि जब मैं प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद जालधंर में रेजीमेंट में गया तो वहां के पुराने धावकों ने अपने आप को स्पर्धाओं से अलग कर लिया था। लेकिन अफसरों ने पापाजी से यह कहते हुए कि तुम सौ मीटर बाधा दौड़ भी पूरी कर लोगे. इसलिए सौ मीटर किसी दूसरे के लिए छोड़ दो। बस सीनियरों के इस फैसले को पापाजी ने चुनौती के रूप में नहीं लिया। हो सकता है उनका फैसला सही हो। उन्होंने बताया कि अभ्यास तो सौ मीटर का ही था। बाधा दौड़ में तो कभी हिस्सा ही नहीं लिया। उसकी शुरुआत तो जीरो से करनी थी जबकि सौ मीटर में काफी महारत हासिल हो चुकी थी। दौड़ की श्रेणी बदलने के बाद पापाजी ने खुद को दौड़ की प्रतिस्पर्धाओं से अलग कर लिया। यह अलग बात है कि वे 1969 तक सौ मीटर का अभ्यास लगातार करते रहे।
खैर, यह सब बताने का उद्देश्य यही था कि सेना और खेल में मेरी रुचि होने के कारण फिल्म के प्रति दिलचस्पी और भी बढ़ गई। वैसे भी मैं संवेदनशील शख्स हूं, लिहाजा फिल्म के दौरान चार बार आंखें नम हुई। एक बार तो आलम यह हो गया कि रुमाल निकालना ही पड़ा। वो चार दृश्य फिल्म को और भी ऊंचाइयों तक पहुंचा देते हैं। सबसे पहले आंख नम भाई-बहन के मिलन को देखकर हुई। शरणार्थियों के शिविर में जैसे ही घोषणा होती है तो मिल्खा, बहन से मिलने के लिए दौड़ पड़ते हैं..। बड़ा ही भावपूर्ण दृश्य है। भाई-बहन का प्रेम देख भावुक हो गया। दूसरा उस वक्त भावुक हुआ जब मिल्खा मैडल जीतकर लौटते हैं और वह अपने पहले कोच के चरण-स्पर्श कर मैडल उनके गले में पहना देते हैं। यकीनन यह खुशी के आंसू थे लेकिन गुरु के प्रति निष्ठा रखने की साक्षात अनुभूृति रखने का यह कितना बड़ा उदाहरण था। शायद यह आंसू इसलिए भी आए कि क्योंकि गुरुओं के प्रति मेरी निष्ठा भी तो कमोबेश ऐसी ही है। तीसरे दृश्य में तो मैं रो ही पड़ा था। यकीन मानिए आंसू ही बहने लग गए थे। प्रतियोगिता में भाग लेने मिल्खा जब पाकिस्तान जाते हैं तो अपने गांव जाना भी नहीं भूलते। वैसे मिल्खा पर उनका अतीत उनके वर्तमान पर ताउम्र हावी रहता है और यह अतीत का ही कमाल है कि मिल्खा ने नाम कमाया तो उसी की वजह से और वे पदक जीतने से वंचित भी रहे तो उसके पीछे भी उनका अतीत ही था। अपने पैतृक घर जाने के बाद जब उनको अतीत याद आता है और लाशों के ढेर में जब वे मां को पुकारते हैं तब सचमुच बेहद ही मर्मान्तक दृश्य पैदा हो जाता है। फिल्मांकन भी ऐसा है कि पत्थर भी पिघल जाए। चौथी बार आंसू तब आए जब मिल्खा अपने बचपन के साथी के घर जाते हैं और उससे गले मिलते हैं। सचमुच यह दृश्य भी तो कालजयी बन पड़ा है।
अगर देखा जाए और कुछ सीख ली जाए तो फिल्म मैनेजमेंट के लिहाज से भी बेहतर है। यह प्रोत्साहित करती है और आगे बढऩे का हौसला प्रदान करती है। निरुत्साहित मिल्खा को जब उनके कोच प्रोत्साहित करते हैं और कहते हैं कि एक स्पोट्र्समैन में जज्बात, अनुशासन एवं तपस्या होना जरूरी है। सही में यह बात एक धावक पर ही नहीं, असली जिंदगी में भी लागू होती है। किसी भी क्षेत्र में मुकाम पाने के लिए इन तीनों चीजों का समावेश होना बेहद जरूरी है। वैसे फिल्म समापन से पूर्व मिल्खा सिंह का संदेश भी दिखाया जाता है, जिसमें उन्होंने कहा है कि सफलता पाने के लिए विल पावर (दृढ़ इच्छा शक्ति), हार्ड वर्क (कठोर मेहनत ) एवं डेडीकेशन (समर्पण) जरूरी है। सच में अगर इन तीनों को ध्यान में रखते हुए कोई काम किया जाए तो तय मानिए कि सफलता निश्चित है। तभी तो फिल्म खत्म होने के बाद पीछे आ रहे दो जनों की बातचीत का उल्लेख कर रहा हूं। एक व्यक्ति दूसरे से कहता है.. सर... कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, फिल्म देखी तो चार्ज हो गया। काफी मोटीवेट हो गया हूं। सही बात है। भाग मिल्खा भाग यही तो संदेश देती है कि मुश्किल कुछ भी नहीं है अगर डटकर मुकाबला किया जाए।
गीत संगीत के मामले में तो कहना ही क्या.. हवन करेंगे.. गीत तो जन-जन की जुबान पर चढ़ चुका है। विशेषकर बच्चे तो इस गीत के मुरीद हैं। थियेटर में जब गाना शुरू हुआ तब गोद में बैठे एकलव्य का अंग प्रत्यंग इसके बोलो पर मचल रहा था। वैसे यह गीत जब भी टीवी पर आता है बच्चे इसके साथ संगत करना नहीं भूलते। बीयर पीने के बाद आस्टे्रलिया में विदेशी महिला के साथ गाया मिल्खा का गीत भी यादगार बन पड़ा है। संगीत का पक्ष भी फिल्म को मजबूती प्रदान करता है। फिल्म कलाकारों, संगीतकारों, निर्माता, निर्देशक आदि के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। और वैसे भी लिखने पढऩे वाले यह सब जानते ही हैं कि किसने किस जिम्मेदारी का निर्वहन बखूबी के साथ किया है।
आखिर में यही बात कि पूरे परिवार के साथ बिना किसी शर्म संकोच के देखने वाली फिल्में आजकल बनती ही कितनी हैं। यह बात दीगर है कि भाग मिल्खा भाग में भी मध्यान्तर के बाद विदेशी महिला के साथ मिल्खासिंह के जो अंतरंग संबंध में दिखाए गए हैं, वे कुछ अखरते जरूर हैं। इसके अलावा विभाजन के बाद भारत आए शरणार्थियों को तम्बुओं मेंं ठहराए जाने का फिल्मांकन बेहद विहंगम हैं। रात को तम्बू में मिल्खा का अपने बहन की गोद में सो जाना और इसके बाद पर्दे के पीछे बहन एवं जीजाजी के बीच अंतरंग संबंधों की आवाज दर्शकों को सुनाई देती है.. यह दृश्य भी पता नहीं क्या सोच कर जोड़ दिया गया। दोनों दृश्य अगर जरूरी ही थे, तो इनको दूसरे अंदाज में भी दिखाया जा सकता था। अगर यह दृश्य फिल्म में ना भी होते तो इससे मूल कथानक पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। खैर, यह फिल्म बनाने वालों का अपना नजरिया है,लेकिन मेरे हिसाब से वह जरूरी नहीं था। विदेशी महिला के साथ अंतरंग दृश्य पीछे बैठे एक उम्रदराज दर्शक को इतना अखरा कि वे सिनेमाघर में ही जोर से चिल्ला उठे....अरे इसको हटाओ...।
बहरहाल, फिल्म देखने के बाद जेहन में टिकट काउंटर पर बैठे उस व्यक्ति के बोल ही गूंज रहे थे... कि तीन घंटे की फिल्म है। बड़ी है। समय पर आना है। पूरी फिल्म में मिल्खा भागता ही रहता है। सचमुच मिल्खा भागता ही तो रहता है। कभी देश छोडऩे के लिए तो कभी देश की खातिर। आखिर का दृश्य भी यादगार है जब जवान (भारत ) का मिल्खा बचपन के (पाकिस्तान के ) मिल्खा के साथ दौड़ता है। यह दृश्य काफी कुछ कहता है। बहुत ही बड़ा संदेश छिपा है इस दृश्य के पीछे।

Monday, July 22, 2013

दिमाग का दही हो गया


बस यूं ही

 
पिछले पन्द्रह दिन से बच्चे दो ही गीत ज्यादा गुनगुना रहे हैं। कभी वो भाग मिल्खा भाग का 'हवन करेंगे...' के बोल पर नाच रहे हैं तो कभी ये जवानी है दिवानी का 'बदतमीज दिल माने न...' को बड़े ही जोश व शिद्दत के साथ गा रहे हैं। अचानक गीत के बोल सुनकर मैं चौंक गया.., पहला ही सवाल जेहन में आया, भला दिल बदतमीज कैसे हो सकता है। बस तभी से दिल में हलचल मच गई। विषय कुछ रोचक व अलग हटकर लगा लिहाजा तभी तय कर लिया कि क्यों ना दिल को बदतमीज करार देने वाले इस गीत पर दिल से लिखा जाए। वैसे जितना प्रयोग दिल के साथ पर्दे की दुनिया पर हुआ है उतना तो शायद हकीकत में भी नहीं हुआ। शायद की कोई फिल्म हो जिसमे दिल का जिक्र ना हो। या तो फिल्म के शीर्षक में ही दिल मिल जाएगा और वहां नहीं मिला तो फिर किसी न किसी गाने के मुखड़े या अंतरे में दिल का उल्लेख मिलना तय मानिए। तभी तो दिल से लगायत गीत हो या फिल्म, रुपहले पर्दे के सबसे पसंदीदा विषय रहे हैं। सात-आठ दशकों से दिल पर लगातार लिखना कोई आसान नहीं है। ऐसे में गुण-दोष की बात करना तो वैसे भी बेमानी है। फिर भी कभी सिर आंखों पर बैठाया जाना वाला दिल जब बदतमीज हो गया तो इस दिशा में सोचा जाना भी तो जरूरी है। यह बात दीगर है कि बदतमीज दिल से दिल लगाने वालों की संख्या भी कम नहीं हैं। खैर, सबसे पहले मैंने इस गीत को बोलो को गौर से सुना, आप भी देखिए...

'पान में पुदीना देखा,
नाक का नगीना देखा,
चिकनी चमेली देखी,
चिकना कमीना देखा,
चांद ने चीटर हो चीट किया तो,
सारे तारे बोले गिल्ली गिल्ली अख्खा.....'

'मेरी बात, तेरी बात,
ज्यादा बातें, बुरी बात,
आलू-भात, पूरी भात,
मेरे पीछे किसी ने
रिपीट किया तो साला,
मैंने तेरे मुंह पे मारा मुक्का....'

'इस पे भूत कोई चढ़ा है,
ठहरना जाने ना,
अब क्या बुरा क्या भला है,
फर्क पहचाने ना...
जिद पकड़ के खड़ा है,
कमबख्त छोडऩा जाने ना....'

'बदतमीज दिल, बदतमीज दिल, बदतमीज दिल, माने ना...'
'ये जहान है सवाल है कमाल है जाने ना, जाने ना...'
'बदतमीज दिल, बदतमीज दिल, बदतमीज दिल माने ना...'

'हवा में हवाना देखा,
ढीमका फलाना देखा,
सींग का सिंघाड़ा खाके,
शेर का गुर्राना देखा,
पूरी दुनिया का गोल-गोल चक्कर ले के
मैंने दुनिया को मारा धक्का...'

'बॉलीवुड, हॉलीवुड,
वैरी-वैरी, जॉली गुड...
राई के पहाड़ पर तीन फूटा लिलीपुट
मेरे पीछे किसने रिपीट किया तो साला
मैंने तेरे मुंह पर मारा मुक्का...'

'अय्याशी के वन वे से खुद को
मोडऩा जाने ना..
कंबल बेवजह यह शरम का
ओढऩा जाने ना....
जिद पकड़ के खड़ा 
कमबख्त का
छोडऩा जाने ना...'

'बदतमीज दिल बदतमीज दिल बदतमीज दिल माने ना...'

यकीन मानिए गीत के बोलों में क्या संदेश छिपा है अपने तो समझ से बाहर है। सोच-सोच के दिमाग का दही जरूर हो गया लेकिन गीत समझ में नहीं आया। हां एक बात समझ में जरूर आ गई कि दिल जब बदतमीज ही है तो फिर उससे तमीज की बातें करने की उम्मीद भी तो नहीं की जा सकती है। बदतमीज तो बदतमीजी से ही बात करेगा ना...। जरूरी थोड़े ही बदतमीजी की बातें सभी के समझ में आए। अपने भी नहीं आई....।

एक जैसी समानता...


बस यूं ही

 
राजस्थान के उदयपुर शहर में फिल्मी अभिनेत्री पूजा भट्ट और पुलिस अधीक्षक हरिप्रसाद शर्मा के बीच हुए घटनाक्रम को न केवल स्थानीय समाचार पत्रों में काफी तरजीह मिली बल्कि राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मामले को खूब हवा दी गई। सभी जगह एक जैसी समानता दिखाई दी...। मतलब सभी का झुकाव पुलिस की बजाय फिल्म यूनिट की तरफ ज्यादा दिखाई दिया। वैसे भी कोई भी घटनाक्रम हो, अक्सर यह मान लिया जाता है कि पुलिस की भूमिका सही नहीं थी। इसकी एक प्रमुख वजह यह भी है कि आम आदमी की नजरों में पुलिस की छवि अच्छी नहीं है। लेकिन पुलिस अधीक्षक हरिप्रसाद शर्मा को लेकर जो आरोप सामने आए हैं, उसको लेकर मैं आश्चर्यचकित हूं। हरिप्रसाद शर्मा को मैंने करीब से देखा है। पांच साल पहले वे झुंझुनूं के पुलिस अधीक्षक हुआ करते थे। उस वक्त मैं भी झुंझुनूं में ही था। किसी बड़ी सभा, आंदोलन या धरना आदि में कवरेज के दौरान उनसे मुलाकात हो ही जाया करती थी। वैसे मेरा उनसे जो संबंध एक पत्रकार का एक पुलिस अधिकारी के साथ होता वैसा ही रहा है। मैंने उनमें बाकी पुलिस अधिकारियों से अलग जो चीज देखी वह यह थी कि वे कभी वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर अपने मातहतों को दिशा-निर्देश देने के बजाय मौके पर जाने पर विश्वास रखते थे। यही कारण था कि अल्प समय में ही उन्होंने जिले की जनता में जो छाप छोड़ी वैसी बहुत कम पुलिस अधिकारी छोड़ पाए थे। कितना भी बड़ा घटनाक्रम हो मैंने उनको कभी गुस्से में या तनाव में नहीं देखा। इससे ठीक उलट कई बार तनावपूर्ण हालात वाले स्थान पर जाकर उन्होंने माहौल को न केवल सामान्य कर दिया बल्कि गुस्से में नथुने फुलाने वालों को बाद में हंसी के ठहाके लगाते भी देखा। अपने मातहतों की बैठकों में भी उनका रोल अधिकारी की बजाय लीडर वाला ही रहा। उस दौरान के बड़े एवं चुनिंदा कार्यक्रमों में उनका बतौर अतिथि दिखाई देना भी यह दर्शाता था कि लोग उनको किस कदर पंसद करने लगे थे।
आज जब इस अधिकारी पर लगाए गए आरोप के बारे में पढ़ा तो यकीन नहीं हुआ। पांच साल पहले मिलनसार, हंसमुख और जीवट अधिकारी की छवि बनाने वाला शख्स पांच साल में इतना तो नहीं बदल सकता।

फेसबुक से कई नुकसान


बस यूं ही

 
आफिस से लौटकर बस कम्प्यूटर पर फेसबुक ऑन करने वाला ही था कि धर्मपत्नी एक समाचार पत्र का परिशिष्ठ उठा लाई और जोर-जोर से पढ़कर मेरे को सुनाने लगी, हालांकि धर्मपत्नी भी फेसबुक से जुड़ी हुई हैं फिर भी उसने बिना लाग लपेट के पढना शुरू किया। मैंने उसकी सारी बातों को गंभीरता से सुना और इसके बाद उस अखबार को ले लिया। सोचा आपसे भी साझा कर लूं। शीर्षक जैसा कि मैंने दे ही दिया है.. लिखा था फेसबुक से कई नुकसान। अब अंदर के लिखे पर जरा गौर फरमाएगा....।

आजकल फेसबुक का जमाना है.. सभी उम्र के लोग इसमें अपना कीमती वक्त बेकार करते नजर आते हैं। अगर आप भी फेसबुक पर अपना अकाउंट बनाए हुए हैं तो आप निश्चित रूप से नुकसान झेल रहे हैं। फेसबुक के नुकसान इस प्रकार हैं-
1. समय की बर्बादी- फेसबुक पर लॉगिंग करने के बाद आप यह भूल जाते हैं कि आपने फेसबुक पर लॉगिंग क्यों किया है और आप एक प्रोफाइल से दूसरे प्रोफाइल को देखने में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि आपको पता ही नहीं चलता कि आपने कितना समय बर्बाद कर दिया।
2. नम्बर ऑफ लाइक्स की चिंता- अगर आपने फेसबुक पर अपना कोई फोटो अपलोड किया है तो आपके दिमाग में हमेशा यह घूमता रहता है कि कितने लोगों ने इसे लाइक किया या कमेंट किया। अगर आपके किसी फ्रेंड ने आपके द्वारा अपलोड किए गए फोटो को लाइक नहीं किया तो आप व्यर्थ में दुखी हो जाते हैं।
3. प्राइवेसी का खतरा- फेसबुक पर आपके द्वारा अपलोड किए गए फोटो को कोई भी डाउनलोड कर सकता है और उसका गलत इस्तेमाल कर सकता है।
4. जेल जाने की संभावना- फेसबुक पर यदि आपने कुछ ऐसे कमेंट किए जिससे सरकार की या अन्य किसी लोगों की भावना को ठेस पहुंचे तो वह आप पर केस कर सकता है ओर आपको जेल जाना पड़ सकता है।
5. बहुत सारे फे्रंड-फे्रंड रिक्वेस्ट के जरिए बहुत से अवांछित लोग आपके सम्पर्क में आ जाते हैं और अगर उनको फे्रंड नहीं बनाया तो वे लोग दुश्मन बन जाते हैं।
6. गंदे फोटो या लिंक- कभी भी वायरस के कारण गंदे फोटो या लिंक बिना आपके जानकारी के आपके सारे फे्रंड के पास पहुंच जाती है, जिससे आपको शर्मसार होना पड़ सकता है।
अगर आप इन सभी मुसीबतों से छुटकारा पाना चाहते हैं तो आज ही अपना फेसबुक अकाउंट बद करें और मन में शांति प्राप्त करें।
बहरहाल, धर्मपत्नी ने यह सब कम्पोज करते हुए भी देखा। जिज्ञासावश पूछ लिया कि ऐसा क्यों कर रहो? मैंने कहा कि तुमने मेरे को सुनाया मैं सब को सुना रहा हूं और क्या? वो निरूतर हो गई कुछ नहीं बोली। पास से उठकर चुपचाप टीवी के सामने जा बैठी।

तार नहीं रहा...


बस यूं ही

कल शाम को एक सांध्य दैनिक के अंतिम पेज पर प्रकाशित एक व्यंग्य छाया चित्र देखकर खुद को मुस्कुराने से नहीं रोक पाया। उसका मजमून कुछ इस तरह से था..। मां, बापूजी का टेलीग्राम आया है........। तार नहीं रहा। सचमुच तार अब अतीत का हिस्सा बन गया है। करोड़ों रुपए के नुकसान को देखते हुए इस सेवा को बंद करना पड़ा। वैसे इस नुकसान की तरफ हम सब का ध्यान तभी गया,जब इस सेवा को बंद करना पड़ा। समाचार पत्रों की सुर्खियों में भी टेलीग्राम ही छाया था। यह भी संयोग ही था कि सभी ने टेलीग्राफ के उजले पक्ष पर ही फोकस कर आमजन की सहानुभूति बटारेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। खैर, नफा-नुकसान आदि बहस का विषय हो सकता है लेकिन एक जमाना वो भी था जब ग्रामीण क्षेत्रों में तार की छवि अच्छी नहीं मानी जाती थी। और इस कालखण्ड का साक्षी मैं भी रहा हूं। बचपन की स्मृतियां आज भी ताजा हैं। देहात में महिलाएं जब आपस झगड़ती थी और लड़ाई उग्र रूप धारण कर लेती तब महिलाएं एक दूसरे को गाली के रूप यह कहती थी 'भगवान करे, तेरे तार आए।' यहां तार आने का मतलब किसी अशुभ समाचार से ही होता था। सेना में जाने का शगल जिले के लोगों में आजादी के पहले से ही रहा है और अब भी है। ऐसे में कोई अनहोनी या बुरी खबर होती तब तार ही आता था। क्योंकि लगभग हर घर से कोई न कोई सेना में अवश्य होता था। बहरहाल, यह सब बताने का मकसद यही था कि तार की छवि कैसी थी। इतना ही नहीं किसी सैनिक को अगर घर बुलाना होता, कोई मांगलिक कार्य या शादी की बात होती तो उसको सेना से छुट्टी आसानी से नहीं मिलती थी। ऐसे में किसी परिजन के बीमार होने का बहाना बनाकर तार करवाया जाता था ताकि नियत समय पर छुट्टी मिल जाए। ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि छात्र जीवन में दो बार तार करवाने का अवसर मुझे भी मिला है और दोनों ही बार मूल कारण न लिखकर कभी मां तो कभी पिताजी की बीमारी का उल्लेख करना पड़ा ताकि छुट्टी जल्दी मिल जाए।
अब बात एक ऐसे तार की जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी। 1997 में बीए करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त हो गया। इसी चक्कर में लगातार दो साल एमए पूर्वाद्ध में फीस जमा करवाने के बाद भी परीक्षा नहीं दे पाया। एक बार आरपीएससी की पुलिस इंस्पेक्टर की भर्ती आ गई तो दूसरी बार सेना में एजुकेशन हवलदार की लिखित परीक्षा। किस्मत में शायद यह नौकरियां नहीं थी। परीक्षा में उत्तीर्ण तो हुआ लेकिन वरीयता सूची में न आने के कारण मेरा चयन नहीं हो पाया। सन 2000 में पंचायत चुनाव के दौरान गांव के एक साथी ने चुनाव लडऩे की इच्छा जताई। उस वक्त हम सब गांव के युवा एक नवयुवक मंडल के माध्यम से गांव में रचनात्मक कार्यों में जुटे हुए। थे। चुनाव मैदान में कूदने की बात पर मंडल के सभी सदस्य सहमत नहीं थी लेकिन बाद में किसी तरह से सभी मान गए। चूंकि मंडल में मेरे पास महासचिव की जिम्मेदारी थी, लिहाजा लिखने पढऩे के तमाम काम मैं ही सम्पादित करता था। ऐसे में मतदाताओं के नाम एक मार्मिक अपील करने का जिम्मा भी मेरे को ही दिया गया। मैंने अपील लिखी और उसके पम्पलेट मतदाताओं के बीच वितरित कर दिए गए। संयोग से उसी वक्त बड़े भाई साहब दिल्ली से गांव आए हुए थे। उन्होंने मेरा लिखा वह पम्पलेट देखा तो प्रभावित हुए और कहा कि तुम तो अच्छा लिखते हो। संयोग से उसी दिन के पेपर में एक पत्रकारिता संस्थान के बारे में लिखा था कि अगर आपकी आयु 25 साल से कम है। आप अविवाहित हैं और हिन्दी पर अच्छी पकड़ है तो आवेदन करें। भाईसाहब के कहने पर ही मैंने आधे अधूरे मन से इस संस्थान में अपना आवेदन भेज दिया।
आवेदन चयनित हो गया और जयपुर में लिखित परीक्षा के बाद साक्षात्कार हुआ। यहां भी सफलता हाथ लगी। इसके बाद पत्र आया कि आपको फाइनल साक्षात्कार के लिए भोपाल जाना है। 25 जुलाई 2000 को यह साक्षात्कार भोपाल में था। कुल 97 युवक-युवतियां साक्षात्कार के लिए पहुंचे थे। बारी-बारी से सबका नम्बर आया। कोई मुस्कुराते हुए बाहर आ रहा था तो कोई मुंह लटकाए हुए। आखिरकार मेरा भी नम्बर आया।
साक्षात्कार की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद 14 जनों को बताया गया कि आपका चयन हो गया है और एक अगस्त से आपकी कक्षाएं शुरू हो जाएंगी। चूंकि मेरे को किस तरह का कोई जवाब नहीं मिला था। वैसे जवाब न मिलना यह दर्शा रहा था कि मेरा चयन नहीं हुआ है। यकीन मानिए मैं रोया तो नहीं लेकिन बाकी कुछ नहीं बचा। बड़े ही उदास एवं निराश मन से मैं गांव लौटा। यकायक हुए घटनाक्रम से मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिरकार यह सब कैसे हो गया। गांव के साथियों ने दिलासा दी, फिर भी मैं सामान्य नहीं हो पाया। भोपाल से साक्षात्कार देकर लौटने के बाद 7 अगस्त को एक तार आया हुआ था। उसमें लिखा था कि आप का चयन पत्रकारिता संस्थान के लिए हो गया है आप प्रशिक्षण के लिए तत्काल भोपाल पहुंचें। मुझो यकीन नहीं हो रहा था कि किस्मत इस तरह से यू टर्न लेगी। इसके बाद 14 अगस्त को मैं भोपाल पहुंच गया और पत्रकारिता का प्रशिक्षण लिया। यकीन मानिए उस तार ने मुझे कितनी खुशी दी मैं ही जानता हूं। और आज पत्रकारिता में हूं तो काफी कुछ योगदान उस तार का भी है। इसलिए कह सकता हूं कि तार से जुड़े दोनों ही तरह के अनुभव मैंने देखे हैं लेकिन गांव में तार की जो छवि है उससे इतर छवि मेरे जेहन में है। भले ही तार व उससे जुड़ी जानकारी इतिहास बन गई हों लेकिन मैं इसे कभी भूल नहीं सकता, जिंदगी भर भी नहीं। यह मेरी मधुर स्मृतियों में ताउम्र जिंदा रहेगा।

Monday, July 8, 2013

एक घंटे में फिल्म खत्म!


बस यूं ही
रविवार की वजह से आज सुबह देरी से ही उठा था। दस बजे के करीब साथी गोपाल जी शर्मा का फोन आया, बोले बन्ना जी, आज तो फुर्सत में हैं..। क्यों ना बच्चों को मैत्रीबाग घूमा दिया जाए। मैंने पलट कर जवाब दिया, बार-बार मैत्री बाग ही क्यों? अपन कई बार होकर आ गए वहां। क्यों ना कुछ नया किया जाए..। वे बोले, तो आप ही तय कीजिए क्या करना है। मैंने कहा कि शाम को फिल्म देखने चलते हैं। वैसे तो शहर में हालिया प्रदर्शित कई फिल्में लगी हैं लेकिन रांझणा की समीक्षा पढ़ी थी, कुछ जमी इसलिए तय किया गया कि वो फिल्म देखी जाए। शाम को छह से नौ वाले शॉ का समय तय कर दिया गया। टिकट के लिए मैंने ही हां कर दी। बोल दिया कि अपना परिचित है, उसको बोल देता हूं। वह एडवांस में टिकट ले लेगा ताकि कोई दिक्कत ना हो..। गोपाल जी से मोबाइल पर जैसे ही वार्तालाप खत्म हुआ मैंने तत्काल टिकटों के जुगाड़ की कवायद शुरू कर दी। स्टाफ के एक साथी से बोला तो उसका कहना था कि एडवांस की जरूरत नहीं है। सीटें खाली ही रहती हैं, आप जिस भी श्रेणी की टिकट लेंगे हाथोहाथ मिल जाएगा। मैंने फिर भी जोर देकर कहा कि यह तो ठीक है, लेकिन रविवार है, हो सकता है टिकट के लिए मारामारी हो, इसलिए आप एक बार सिनेमाघर होकर आ ही जाना...।
भोजन करने के बाद जैसे ही लेटा तो आंख लग गई थी। दोपहर में उसका फोन आया। धर्मपत्नी ने मेरे को उठाना उचित नहीं समझा और फोन उसने ही स्वीकार किया। फोन टिकटों की जिम्मेदारी वाले साथी का ही था। जागने के बाद धर्मपत्नी ने बताया कि आपके स्टाफ वाले का फोन आया था। वो कह रहे थे कि टिकटों की एडवांस में बुकिंग नहीं होती है। वहीं मौके पर ही टिकट का जुगाड़ हो जाएगा। कोई दिक्कत नहीं होगी। शॉ का समय शाम साढे पांच बजे का रहेगा। मैं और अधिक आश्वस्त हो गया कि चलो टिकट की टेंशन तो खत्म हुई। घड़ी देखी तो पांच बज चुके थे। तत्काल गोपाल जी को फोन लगाया तो बोले... बन्ना जी आ जाओ, हम तो आपका ही इंतजार कर रहे हैं। मैं तत्काल तैयार हुआ और स्टाफ सदस्य से आग्रह किया कि आप बच्चों को अपनी कार से सिनेमाघर तक छोड़ दो। मैं और गोपाल जी मोटरसाइकिल पर चल पड़ेंगे। ऐसा ही हुआ। करीब सवा पांच बजे हम घर से रवाना हुए... इसके बाद गोपाल जी के घर पहुंचे। बच्चे कार में बैठकर निकल लिए जबकि मैं गोपाल जी की मोटरसाइकिल पर उनके पीछे बैठ गया। 
घर से मुश्किल से एक किलोमीटर की चले होंगे कि बूंदाबांदी का दौर शुरू हो गया। बादल भी इतने घने थे, जिनको देखकर लग रहा था कि बारिश हुई तो फिर जोरदार ही होगी। बूंदाबांदी के बीच हम चले जा रहे थे, क्योंकि साढ़े पांच हो चुके थे। सिनेमाघर अभी हमारी पहुंच से करीब दो किलोमीटर दूर था। बारिश तेज हुई तो हमने रुकना ही मुनासिब समझा और दुकान के बरामदे में खड़े हो गए। वहां और भी लोग खड़े थे। 
दस मिनट खड़े रहने के बाद जब बारिश खत्म नहीं हुई तब हमने बारिश में ही चलने का फैसला किया। लेकिन अब गोपाल जी की मोटरसाइकिल नखरे दिखाने लगी। स्पार्क प्लग में पानी जाने की वजह से वह बार-बार बंद हो रही थी। गोपाल जी बार-बार किक मार रहे थे लेकिन मोटरसाइकिल बंद होने से बाज नहीं आ रही थी। रास्ते में बारिश मूसलाधार में तब्दील हो गई। हम दोनों बारिश के पानी से सरोबार हो गए, फिर भी चले जा रहे थे। सिनेमाघर से हम अभी आधा किलोमीटर की दूरी पर थे कि मोटरसाइकिल ने इस बार बिलकुल जवाब दे दिया। गोपाल जी के लाख प्रयास के बाद भी वह स्टार्ट होने का नाम नहीं ले रही थी। थक हारकर हम दोनों फिर एक दुकान के बरामदे में खड़े हो गए। घड़ी छह बजाने को आतुर हो रही थी। हम दोनों अजीब धर्मसंकट में घिरे हुए थे। 
बच्चे व दोनों की धर्मपत्नियां सिनेमाघर पहुंच चुके थे, लेकिन हमारे बिना वो कैसे टिकट लेते और कैसे अंदर जाते, लिहाजा वे सभी लोग मूकदर्शक बने अंदर जाने वाले लोगों को देख रहे थे। समय की नजाकत देखते हुए गोपाल जी ने कहा, बन्ना जी फिर से कोशिश करते हैं। उन्होंने एक कपड़े से प्लग को साफ किया और किक मारी तो मोटरसाइकिल स्टार्ट हो गई। जैसे ही बैठने लगा तो मोबाइल की घंटी बजी। अजनबी नम्बर से कोई फोन था। जैसा कि आदत है फोन किसी का भी अटेंड कर लेता हूं। फोन उठाया तो सामने से धर्मपत्नी बदहवाश वाले अंदाज में पूछ रही थी... कहां हो। मैंने सारी वस्तुस्थिति से अवगत कराया तो वह कुछ सामान्य हुई। संयोग यह भी रहा कि फिल्म देखने की खुशी में दोनों ही अपने मोबाइल घर पर भूल गई थीं। खैर, जैसे-तैसे हम सिनेमाघर पहुंचे। मैं पार्किंग वाले स्थान से पहले ही उतर गया जबकि गोपाल जी मोटरसाइकिल को पार्किंग में खड़े करने चले गए। हमको देखकर सिनेमाघर के बाहर खड़े बच्चों के चेहरों पर मुस्कान दौड़ गई। वे बूंदाबांदी के बीच भागते हुए मेरे पास आ गए। मैं गोपाल जी को साथ लेने के चक्कर में रुक गया। दोनों जब हम अपनी धर्मपत्नियों के पास पहुंचे तो उनके चेहरों पर शिकायत भरी हंसी तैर रही थी। दोनों बोली.. हाउसफुल है, आप तो टिकट आसानी से मिलने की बात कह रहे थे। 
इस सवाल के बाद सभी की निगाह मेरे चेहरे पर थी, कि मैं क्या जवाब देता हूं। मेरे को भी कुछ नहीं सूझ रहा था। तत्काल स्टाफ सदस्य को फोन लगाया। मैंने कहा, यार आप तो एडवांस में बुकिंग से मना कर रहे थे जबकि यहां तो सब कुछ फुल हो चुका है। आगे की सीट जरूर खाली हैं लेकिन वहां से फिल्म देखना तो न देखने के बराबर ही है। लेकिन वह मानने को तैयार ही नहीं था। बोला मैं जाकर आया लेकिर सिनेमाघर वालों ने एडवांस में टिकट नहीं दी, बोले कि हाथोहाथ टिकट मिल जाएगी। 
लेकिन मेरे तर्क से या मोबाइल से इस वार्तालाप से कोई संतुष्ट हुआ होगा, मेरे को नहीं लगता। इसी बीच सवा छह बज चुके थे। तय हुआ कि अब फिल्म तो देखने का सवाल ही नहीं उठता। कोई रास्ता या विकल्प ही नहीं है, इसीलिए अब घर चलने में ही भलाई है। एक बार फिर से स्टाफ सदस्य से आग्रह किया कि वो आएं ताकि बच्चों को गाड़ी से घर तक छोड़ दें। आखिरकार कार आ गई। बच्चे उसमें रवाना हो गए। मैं और गोपाल जी पार्किंग की तरफ बढ़े। मोटरसाइकिल लेकर हम बाहर निकल रहे थे तो पार्किंगवाले ने पूछ लिया क्या हुआ। हमने सारा घटनाक्रम बताया तो उसने कहा कि यहां एडवांस बुकिंग करवा लेनी चाहिए। हमने कहा कि आप एडवांस बुकिंग करते कहां हो... तो वह बोला, किसने कहां, यहां सब कुछ होता है, और आज तो संडे है। देख रहे हो ना कितनी गाडिय़ा खड़ी है। पार्किंग वाले से मुझे जवाब मिल चुका था। हम सभी लोग घर आए। धर्मपत्नी का आग्रह था कि सभी चाय पीकर जाएं। आखिर एक घंटे का घटनाक्रम इस प्रकार से बीता कि अपने पीछे कई यादें छोड़ गया। रांझणा भले ही ना देखी हो लेकिन उससे जुड़ा यह वाकया जरूर लम्बे समय तक याद रहेगा। और यह वाकया मेरे को रांझणा से कम नहीं लगा, भले ही एक घंटे में इसका द एंड हो गया हो।