Friday, July 6, 2012

जिंदगी के सफर में...


बिलासपुर से आने के बाद...

जिंदगी के सफर में वैसे तो ताउम्र कई लोग मिलते हैं, बिछडुते हैं और यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहता है, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, जो याद रह जाते हैं। याद रहने की वजह है कुछ लोगों से आत्मिक लगाव या जुड़ाव। सर्विस के दौरान भी ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं, जब साथ-साथ काम करने से आपस में एक स्नेह की भावना जुड़ जाती है। एक रिश्ता बन जाता है। यहां एक ऐसा ही उदाहरण है, जिसे मैं शायद ही भुला पाऊंगा। ......
पिछले साल की ही तो बात है, मेरे पास भोपाल से किसी परिचित ने फोन किया था। और कहा कि भाईसाहब एक रिज्यूम भिजवा रहा हूं। मेरा परिचित है। आपके यहां कोई वैकेन्सी हो तो प्लीज रख लेना। दूसरे दिन मुझे मेल के माध्यम से बायोडाटा मिल गया। युवक बिहार के आरां जिले से था। भोपाल में ही एक न्यूज पेपर में कार्यरत था। बायोडाटा में उसके फोन नम्बर देखकर मैंने तत्काल उसको अपने पास बुलवा लिया। जब इस संबंध में मैंने अपने सीनियर को अवगत कराया तो उन्होंने पूछा  कौन है, कैसा है, काम जानता है या नहीं  आपने बिना जाने ही कैसे बुलवा लिया। मैंने कहा कि परिचित ने बताया है, इस आधार पर बुलवाया है। काम का जानकार तो होगा ही। थोड़ा कम जानता होगा, तो मैं सीखा दूंगा। मेरी बात पर सीनियर आश्वस्त हो गए। खैर वह युवक मेरे कहे अनुसार निर्धारित दिन मेरे पास पहुंच गया और बोला सर मैं रणधीर। भोपाल से आया हूं। एकदम दुबला-पतला, गौरा सा युवक। एक बार देखा तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि यह युवक पत्रकारिता में है भी या नहीं। साक्षात्कार की औपचारिकता कर मैंने उसे ज्वाइन करने के लिए कह दिया। काम की शुरुआत में वह कुछ धीमा जरूर था लेकिन उसमें छिपी प्रतिभा रफ्ता-रफ्ता निखरने लगी। एक साल बाद तो हालत यह हो गई कि काम में रणधीर सबका चहेता बन गया। मुझे इस बात की खुशी थी कि मेरा चयन गलत साबित नहीं हुआ। करीब साल भर मेरे साथ काम करने से रणधीर मेरे से इतना घुलमुल गया कि मुझे बॉस कम अपना अभिभावक ज्यादा समझने लगा। अपने दुख-दर्द मुझसे साझा करने लगा। रणधीर भावुक प्रवृत्ति का है। एकदम उदास हो जाना। काम में गलती होने पर एकदम से उदास एवं निराश होकर बैठ जाना। मैं हमेशा उसको प्रोत्साहित करता, कहता यह सब पार्ट ऑफ जॉब है। काम करोगे तो गलती भी होगी। गलती काम करने वाले से ही होती है। शायद मेरी बात के मर्म को रणधीर ने अच्छी तरह से जान लिया था। तभी तो वह मेरा विश्वासपात्र बन गया। एकदम सपर्पित होकर काम करना, काम करते-करते उसमें ही डूब जाना, उसके जीवन का हिस्सा बन गया। अपनी इस खूबी का शायद खुद रणधीर को भी पता नहीं चला।
वक्त अपनी रफ्तार से दौड़ा चला जा रहा था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक दिन रणधीर बदहवाश
सा मेरे कक्ष में आया और बोला सर, पिताजी को कैंसर हो गया है, मुझे गांव जाना पड़ेगा। मैंने भी संकट की घड़ी में अभिभावक की तरह रणधीर को ढांढस बंधाया और तत्काल घर जाने की अनुमति दे दी। होनी को शायद कुछ और ही मंजूर था। घर जाने के करीब 15 दिन बाद रणधीर ने मुझे फोन पर दुखद समाचार सुनाया। वह बोला सर, पिताजी नहीं रहे। सुनकर मैं अवाक रह गया। फोन पर उसको क्या कहता। ज्यादा कुछ न कहकर बस इतना ही कह पाया कि सारे जरूरी काम निपटा लो।
करीब एक माह बाद रणधीर गांव से लौटा। चेहरे पर परेशानी देखकर मैंने हौसला बढ़ाया और कहा कि यह सब एक दिन होना ही था। यह जिंदगी की कड़वी हकीकत है। खैर, रणधीर ने पिताजी की मौत के गम को कभी अपने काम पर हावी नहीं होने दिया और उसी उत्साह एवं अंदाज में उसने काम शुरू कर दिया। कम उम्र में पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद होने वाली पीड़ा को बखूबी समझा जा सकता है लेकिन इस मामले में रणधीर ने बड़ी हिम्मत दिखाई दिया। उसने अपनी पीड़ा को जैसे अंदर ही अंदर समेट लिया हो। कार्यालय में मैंने उसको कभी उदास नहीं देखा। उसी जिंदादिली के साथ वह काम करने लगा।
अचानक एक और खबर से रणधीर टूट गया। मेरा तबादला हो गया, यह सुनकर वह उदास हो गया। बोला सर, हम अब काम नहीं करेंगे। आप जा रहे हैं तो हम भी बिहार चले जाएंगे। मैंने उसको बताया कि नौकरी में यह सब चलता रहता है। काम तो करना ही है कहीं भी कर लो। दिलासा देने के बाद रणधीर कुछ शांत हुआ। पांच जुलाई शाम को कम्प्यूटर पर बैठा था। नेट चालू किया तो देखा कि रणधीर ऑनलाइन है। दोनों के बीच नेट पर चेटिंग का सिलसिला एक बार शुरू क्या हुआ फिर खत्म होने का नाम ही नहीं लिया। दोनों के बीच हुई बातचीत को मैंने हुबहू मेल आईडी में सेव कर लिया। हमारे बीच का वार्तालाप तो देखिए....
मैं- क्या चल रहा है?
रणधीर-सर अब तो काम करने की इच्छा ही नहीं हो रही है। बाकी बस बढ़िया हैं सर। बिलासपुर कब आ रहे हैं।
मैं-क्यों ऐसा क्या हो गया है।
रणधीर-कुछ नहीं सर, आप चले गए तो अब क्या है।
मैं-काम करने की इच्छा क्यों नहीं हो रही? मैं क्या करता था। जो आप करते थे, वही अब कर रहे हो।
रणधीर-नहीं सर।
मैं-क्यों अब काम नहीं हो रहा क्या?
रणधीर- नहीं सर, कर रहा हूं, बट सर पहले जैसी बात नहीं है। अब तो सर ऑफिस आने की इच्छा भी नहीं होती है।
मैं-काम तो वही है, मैं ही बदला हूं।
रणधीर- जब आप बदल गए तो काम करने की इच्छा भी बदल ही जाएगी सर।
मैं-सोचो, कोई जन्मभर का साथ थोड़े ही निभाता है। अपना साथ इतना ही था, अब काम में मन लगाओ।
रणधीर- बट सर, कुछ लोग होते हैं, जिनकी याद कभी नहीं जाती।
मैं-याद करने से कौन रोक रहा है।
रणधीर- नहीं सर, बट सर अच्छा नहीं लग रहा है। ऐसा लगता है कि जॉब कर रहे हैं। आप थे तो घर जैसा लगता था सर।
मैं- कुछ दिन की बात है, फिर सब ठीक हो जाएगा।
रणधीर- नहीं होता है, सर। जो बात आपके साथ थी, वो अब कहां मिलने वाली है सर।
मैं-वक्त सब ठीक कर देगा। उम्मीद रखो। जो हुआ अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा।
रणधीर- वो तो आपका आशीर्वाद जब तक रहेगा तब तक अच्छा ही रहेगा सर।
मैं-मैं कहीं भी रहूं। मेरा आशीर्वाद रहेगा आपके साथ। काम तो करना ही पड़ेगा, जिंदगी पड़ी है सामने।
रणधीर- जी सर, बट सर, आपकी याद बहुत आती है सर।
मैं-जी लगाकर काम करो। कोई दिक्कत हो तो मुझे याद कर लेना। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
रणधीर- जी सर।
मेरे पास काम आ गया और चेटिंग का सिलसिला थम गया। बिलासपुर से भिलाई आए हुए आज तीसरा दिन ही था। मैं सोच रहा था कि पिताजी के देहांत से जरा सा भी विचलित न दिखाई देने वाला रणधीर मेरे तबादले से यकायक कितना भावुक हो गया। शायद मेरी उपस्थिति उसको संबल प्रदान करती थी। मेरे आने के बाद वह खुद को अकेला समझने लगा। खैर, रणधीर को मैंने कर्मचारी ना समझ कर हमेशा छोटे भाई की तरह समझा। 23 की उम्र में ही घर से बाहर आ गया वह। बिलासपुर में कौन था उसका। बस स्नेह व अपनेपन से उससे बतिया लेता तो उसको लगता कि कोई अपना तो है। रणधीर को मैं भुला नहीं पाऊंगा कभी। सच में। जवानी में ही पहाड़ सी जिम्मेदारियों का बोझ ढोने वाले रणधीर के लिए मेरे पास असीम शुभकामनाएं हैं। वह आगे बढ़े और प्रगति करे।

Wednesday, June 27, 2012

शहरहित में जरूरी है एकजुटता


टिप्पणी

तीन साल से बिलासपुर के लोग सीवरेज से परेशान हैं, लेकिन कोई बोल तक नहीं रहा था। न कोई आंदोलन न कोई जनजागरण। पक्ष- विपक्ष की तरफ से भी कोई बयान नहीं आया। जो कुछ था वह अंदर ही अंदर सुलग रहा था। टिकरापारा में हुए हादसे ने आग में घी का काम किया और लोगों को एक जोरदार मुद्‌दा हाथ लग गया। रातोरात कई संगठन बन गए। आंदोलन का शंखनाद हो गया। मंत्री-मेयर के खिलाफ मोर्चे खुल गए। जनजागरण अभियान तक शुरू हो गए। वैसे देखा जाए तो बिलासपुर में यह काम बखूबी होता है। कोई भी हादसा या दुर्घटना होने के बाद उसके विरोध में आंदोलन करने के लिए कोई न कोई संगठन या कमेटी का जन्म जरूर हो जाता है। एसपी राहुल शर्मा के मामले में भी एक ऐसा ही संगठन पैदा हुआ था। सोशल साइट पर दिवंगत एसपी के समर्थन में एक मुहिम चली, लेकिन उसका हश्र क्या हुआ सब जानते हैं। ऐसा पहले भी कई मामलों में हुआ है, जब इन मौसमी संगठनों की बुनियाद रखने वालों ने तात्कालिक लाभ उठाते हुए बहती गंगा में हाथ धो लिए।
जनता का क्या, वह तो वैसे ही परेशानी के भंवर में फंसी है। वह भले-बुरे का अंतर न समझते हुए आंदोलन की मुहिम में शामिल हो जाती है। और जब तक उसको आंदोलन की वजह समझ में आती है तब तक सारा खेल हो चुका होता है। देखा जाए तो आंदोलनों को लेकर बिलासपुरवासियों के  अनुभव खराब ही रहे हैं, लिहाजा लोग आंदोलन में जुड़ने से डर रहे हैं। विश्वास उठा हुआ है उनका, क्योंकि अक्सर आंदोलनों के सूत्रधार दवाब बनाकर अपना हित साध लेते हैं, समझौता तक कर लेते हैं। और आंदोलन में समर्थन करने वालों के हाथ कुछ नहीं आता। दूध का जला छाछ को फूंक कर पीता है। यही बात बिलासपुर के लोगों पर लागू होती है। सीवरेज पर जनजागरण शुरू हुआ है, लेकिन जैसी परेशानी लोग झेल रहे हैं, उसके अनुरूप इस मुहिम से जुड़ नहीं पा रहे हैं।
वैसे जनता का आक्रोश को देखते हुए पक्ष-विपक्ष के लोगों को बैठे बिठाए मुद्‌दा मिल गया है। रोज एक से एक नायाब बयान जारी हो रहे हैं। समाचार पत्रों के माध्यम से संवेदनाएं व्यक्त हो रही हैं। जनता के बीच जाने तक ही हिम्मत नहीं हो रही है। जनप्रतिनिधि कहलाते हैं, लेकिन जन से ही डर रहे हैं। लोग गुस्से में हैं। पता नहीं क्या कर बैठें।  ऐसे में सवाल उठता है कि बयानों और आश्वासनों के माध्यम से जनता को आखिर कब तक बहलाया जाता रहेगा।
बहरहाल, सीवरेज के खिलाफ आंदोलन अच्छी शुरुआत है, बशर्ते इसका हश्र पिछले आंदोलनों जैसा न हो और इसमें किसी प्रकार की राजनीति न हो। बार-बार आंदोलनों की राजनीति से मार खाए लोग फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे हैं। अगर वाकई आंदोलन के पीछे मतलब के बजाय सिर्फ और सिर्फ जनहित व शहरहित है तो लोगों को इस आंदोलन में साथ देना चाहिए।  भले ही समर्थन देने से पहले वे आंदोलन करने वालों की पृष्ठभूमि का पता लगा लें, ताकि बाद में ठगे जाने का अंदेशा ना रहे। मामला विकास से जुड़ा है, इसमें राजनीति न होकर केवल शहर हित की बात हो। सीवरेज के खिलाफ भले ही अलग-अलग विचारधारा के लोग हों लेकिन बिना किसी लागलपेट के शहरहित में एकमंच पर आने में संकोच नहीं करना चाहिए। शहरहित में एकजुटता जरूरी भी है तभी यहां के जनप्रतिनिधियों के बात अच्छी तरह से समझ में आएगी। आंदोलन के साथ-साथ सीवरेज की खामियों, अनियमितताओं और सीवरेज जनित हादसों के दोषियों के खिलाफ अगर सिलसिलेवार एफआईआर भी दर्ज हो तो इसमें किसी प्रकार कोताही नहीं बरती जानी चाहिए।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 27 जून 12 के अंक में प्रकाशित।

Monday, June 18, 2012

सीवरेज पर सियासत कब तक


टिप्पणी

शहर में बारिश से निपटने की तैयारी कैसी है, इस बात का अहसास उन लोगों को बखूबी हो गया होगा, जो रविवार को मामूली बूंदाबांदी से ही हलकान हो उठे। यकीनन इस बार की बारिश बिलासपुर पर बहुत भारी पड़ने वाली है। यह भविष्यवाणी नहीं बल्कि हकीकत है और इसकी झलक दिखाई देने भी लगी है। जरा सी बूंदाबांदी ने शहरवासियों को भावी खतरे से आगाह  कर दिया है। चिंतनीय विषय यह है कि मामूली बारिश ने ही लोगों का घरों से निकलना मुश्किल कर दिया है। भारी बरसात के दौरान क्या होगा, सोच कर आमजन भयभीत है। सीवरेज की खुदाई से उखड़ी सड़कों पर बिछाई गई मुरुम व मिट्‌टी बारिश की बूंदों से फिसल पट्‌टी में तब्दील हो गई हैं। जिधर देखो उधर कीचड़ ही कीचड़ है या सड़कों पर बने गड्‌ढ़ों में पानी भरा है। हालात इस कदर खराब हैं कि लोगों को निकलने के लिए ठीक से रास्ता तक नहीं मिल  पा रहा है। निगम भले ही दावों की दुहाई दे, इंतजामों की बात करें लेकिन दावे और इंतजाम कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। समूचा शहर बदइंतजामी का शिकार है। हर जगह सीवरेज के गड्‌ढ़े व उखड़ी सड़कें शहर की बदहाली को बयां कर रहे हैं। लोग कीचड़ से होकर गुजर रहे हैं। फिसल रहे हैं और व्यवस्था को कोस रहे हैं। खैर, हल्की बारिश ने खतरे की घंटी बजा दी है और यह भी बता दिया है कि निगम के दावों में दम कतई नहीं है। अगर आप निगम के दावों पर भरोसा कर भी रहे हैं तो यह आपके लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
 देखा जाए तो बुनियादी सुविधाओं तक को तरसने वाले बिलासपुर में विकास कम सियायत ही ज्यादा हो रही है। शहर के नेताओं ने पता नहीं क्यों आंखों पर पट्‌टी बांध रखी है जो उनको शहर की दुर्दशा दिखाई नहीं देती है। कानों में भी पता नहीं क्या डाल रखा है जो लोगों की पीड़ा सुनाई नहीं देती है। शहर की समस्याओं के लिए आंदोलन की घोषणा करने वाले भी लगता है  अज्ञातवास पर चले गए हैं। शहरवासी संकट में हैं लेकिन अब उनका कोई बयान तक नहीं आ रहा है। कल परसों चक्काजाम की चेतावनी देने वाले, कलक्टर को ज्ञापन देने वाले यकायक खामोश हो गए तो वार्डों-वार्डों में धरना देने वाले भी पता नहीं अचानक कहां भूमिगत हो गए हैं। इन घटनाक्रमों से इतना तो तय है कि शहर के नेता सिर्फ श्रेय लेने या सस्ती लोकप्रियता हासिल करने तक ही सीमित हैं, शहर की जनता से उनको कोई मतलब नहीं है। वैसे भी नेताओं के भरोसे रहकर आश्वासनों की रेवड़िया एवं वादों के लॉलीपाप के सिवाय कुछ हासिल नहीं होने वाला, क्योंकि शहर में विकास के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेकने का काम ही ज्यादा हो रहा है। आमजन की चुप्पी का फायदा नेता लोग बखूबी उठा रहे हैं। यह लोग महज दिखावे के नाम पर एक दूसरे से खिलाफ लड़ रहे हैं, बयान जारी कर रहे  हैं लेकिन पर्दे के पीछे तालमेल भी उतना ही है। जनता को विकास के नाम पर बेवकूफ बनाना किसी नौटंकी से कम नहीं है।
बहरहाल, शहरवासियों ने सब्र भी खूब रखा और जनप्रतिनिधियों पर विश्वास भी उतना ही किया लेकिन अब सब्र जवाब देने लगा है और विश्वास उठ रहा है। एकजुटता के साथ जब तक आवाज नहीं उठेगी तब तक परेशानी का भंवर कम नहीं होगा। ज्यादा नहीं तो इस बात का संकल्प जरूर कर लिया जाए कि सीवरेज पर सियासत करने वालों को उचित समय आने पर मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। आखिरकार आश्वासन देने वालों और विकास के नाम पर सियायत करने वालों को आइना दिखाना भी तो जरूरी है।


साभार - पत्रिका बिलासपुर के 18  जून 12  के अंक में प्रकाशित।



Thursday, June 14, 2012

तेरी महफिल में मगर हम ना होंगे

स्मृति शेष
विडम्बना देखिए कभी 'मोहब्बत करने वाले कम ना होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम ना होंगे' जैसी गजल को अपनी आवाज देने वाले मेहदी हसन पर इस गजल के बोल ही मौजूं हो गए। वैसे उनकी रुमानी आवाज एवं गजलों के मुरीद लाखों हैं, लेकिन उनके इस दुनिया से रुखसत होने के बाद उनके प्रशंसकों की संख्या में और भी इजाफा हो गया है। बीमारी से लम्बे संघर्ष के बाद उन्होंने बुधवार दोपहर को अंतिम सांस ली। उनके इलाज के लिए राजस्थान सरकार ने भी पेशकश की थी लेकिन यह काम बहुत देरी से हुआ। चिकित्सकों ने नासाज तबीयत देखते हुए उनको बाहर जाने की इजाजत नहीं  दी। हकीकत में उस वक्त हसन ऐसी स्थिति में थे भी नहीं कि वे भारत आकर इलाज करवाते। वे 12  साल से फेफड़ों में संक्रमण से जूझते रहे, लेकिन उनके इलाज को लेकर शायद ही कोई पेशकश हुई हो। अब उनके जाने के बाद उनकी यादों को चिरस्थायी बनाने के जतन किए जा रहे हैं। उनके पैतृक गांव लूणा में उनकी प्रतिमा लगाने की बात भी कही जा रही है। यह भी एक संयोग ही है कि लूणा गांव की याद भी हसन के जाने के बाद ही आ रही है।
राजस्थान के झुंझुनूं जिला मुख्यालय से करीब 15  किलोमीटर की दूरी पर स्थित है लूणा गांव है। 18  जुलाई 1927  को इस गांव में पैदा होने के बाद हसन भारत-पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे। हसन जैसे बड़े फनकार को पैदा करने का गौरव हासिल करने वाला लूणा गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है। जिस गांव का नाम हसन ने समूची दुनिया में रोशन किया, उस गांव की कद्र सरकार ने कभी नहीं ली। लूणा गांव में पक्की सड़क भी इस वक्त बनी जब मेहदी हसन लूणा आए थे।  इतना ही नहीं उसी वक्त हसन ने अपने अपने दादा इमाम खान व मां अकमजान की मजारों की मरम्मत करवाई थी। गांव में उनके आगमन पर लड्‌डू भी बंटे थे। फिलहाल रखरखाव के अभाव में दोनों मजारें जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं। गांव के स्कूल की बगल में बनी यह मजारें अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। इनकी खैर-खबर लेने वाला गांव में कोई नहीं है। दुखद विषय है कि हसन की वजह से प्रसिद्धि पाने वाले लूणा गांव में सरकार से और कोई बड़ा काम नहीं हुआ। उनको यादों को सहेजने या चिरस्थायी बनाने की पहल भी कभी नहीं हुई। अगर सरकार हसन के जीते जी लूणा के लिए कुछ कर पाती तो इस महान फनकार को कितनी खुशी मिलती कल्पना नहीं की जा सकती। एक तरफ सरकार की बेरुखी देखिए और दूसरी तरफ हसन का मातृभूमि के प्रति प्रेम। सन 1978  में वे एक कार्यक्रम के सिलसिले में जयपुर आए तो उन्होंने लूणा जाने की इच्छा जाहिर की। लूणा में प्रवेश करते हुए हसन इतने भावुक हो गए कि गाड़ी से उतर कर टीले की बलुई रेत में लौटने लगे। मातृभूमि से बिछुड़ने के गम में भाव विह्वल हसन को देख वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गई थी।
बहरहाल, राज्य सरकार वाकई गंभीर है और इस फनकार के लिए कुछ करना चाहती है तो उसकी याद में कुछ ऐसा हो जिस पर आने वाली पीढ़ियां भी फख्र करें। लूणा की मिट्‌टी में पैदा होकर उसकी खुशबू दुनिया में फैलाने वाले हसन के लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी। हसन की बीमारी में उनकी सलामती  के लिए दुआ एवं प्रार्थना करने वालों की तो दिली ख्वाहिश है कि लूणा में हसन की याद में संगीत अकादमी की स्थापना हो। वैसे मांग जायज भी है क्योंकि गंगा-जुमनी संस्कृति के संवाहक तथा साम्प्रदायिक सद्‌भाव की मिसाल झुंझुनूं से मुफीद जगह शायद ही हो। हसन के इलाज की पेशकश करने वाली राज्य सरकार अगर हसन की याद में लूणा में संगीत अकादमी की घोषणा करती है तो संगीत प्रेमियों से लिए इससे बड़ी सौगात और हो भी नहीं सकती।

नोट : फोटो कैप्शन- लूणा स्थित मेहदी हसन के परिजनों की मजार, जो रखरखाव के अभाव में जर्जर हो गई है। गांव में इनकी सारसंभाल करने वाला कोई नहीं है।



Thursday, June 7, 2012

मशीन खराब है...

बातचीत के दौरान अक्सर यह जुमला सुनने को मिल जाता है कि भगवान ने तो सिर्फ मनुष्य ही बनाया लेकिन मनुष्य ने न जाने कितने ही प्रयोग करके नई-नई तकनीकें ईजाद कर दी।  वैसे भी यह कहा गया है और माना भी गया है  कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जब-जब मनुष्य को किसी वस्तु की जरूरत महसूस हुई तो उसने उस दिशा में सोचा और फिर आवश्यकताओं की पूर्ति भी की। खैर, जिस संदर्भ में यह भूमिका बांधी गई है वह ज्यादा बड़ी तो नहीं है लेकिन इसके पीछे जो दिमाग लगा उसने वाकई सोचने पर मजबूर कर दिया। जी हां, बात रात को एटीएम पर तैनात रहने वाले चौकीदार की है। बिलासपुर की चिपचिपाहट भरी गर्मी के मौसम में रात भर खड़े होकर ड्‌यूटी देना बड़ा मुश्किल काम है, हालांकि कुछ एटीएम में चौकीदार के अंदर बैठने की व्यवस्था भी होती है। एसी के अंदर बैठने पर चौकीदार को न तो गर्मी लगती है और वह बैठे-बैठे झपकी भी ले लेता है। लेकिन यहां जिस चौकीदार एवं एटीएम का जिक्र है, उसकी कहानी कुछ अलहदा है। बिलासपुर के लिंक रोड पर स्थित एक एटीएम के अंदर चौकीदार के बैठने की व्यवस्था नहीं है, हालांकि अंदर काफी जगह है, उसमें चौकीदार बैठ ही नहीं बल्कि आराम से लेट भी सकता है। संबंधित बैंक प्रबंधन ने शायद सोचा होगा कि चौकीदार कहीं अंदर बैठ कर सो ना जाए लिहाजा, उसके लिए अंदर बैठने की कोई व्यवस्था रखी ही नहीं गई। लेकिन चौकीदार, बैंक प्रबंधन से दो कदम आगे निकला। चौकीदार ने जो तरीका खोजा उसके आगे बैंक प्रबंधन की सोच पानी भरते नजर आ रही है। चौकीदार ने आराम से सोने का एक अजीब सा तरीका खोज निकाला। उसने एक गत्ते पर सफेद कागज चिपका कर उस पर 'मशीन खराब है'  लिखा और एटीएम के दरवाजे पर टांग दिया। यह काम वह रोज रात को करने लगा। बाहर वह यह सूचना टांग देता और अंदर से आराम से खर्राटे भरता। शुरुआत में मैंने सोचा कि वाकई मशीन खराब हो गई होगी लेकिन सुबह जब एटीएम पर लोगों को पैसा निकालते देखा तो मेरे सारा माजरा समझ में आ गया। रातोरात मशीन ठीक होना संभव भी नहीं है। अब यह काम उस चौकीदार के लिए रोजमर्रा का हिस्सा बन चुका है, हालांकि दिन में बैंक खुलता है, ऐसे में यह काम संभव नहंी हैं। रात को कोई देखता नहीं है, लिहाजा तख्ती लटका दी जाती है। रात को कोई उपभोक्ता आता है तो दूर से ही तख्ती देखकर वापस चला जाता है। मैं रोज रात को इस एटीएम के आगे से गुजरता हूं और उसके अंदर सोए चौकीदार को देखता हूं तो मुस्कुराए बिना नहीं रहता। वैसे कुछ बैंक की तरफ से एटीएम के अंदर सीसी कैमरे भी लगवाए जाते हैं। अगर इस मामले में बैंक प्रबंधन सोच ले तो शायद चौकीदार भी कोई नया तरीका खोज  ले। बहरहाल, चौकीदार के इस तरीके से बैंक अनजान हैं और चौकीदार मजे से एटीएम के अंदर लगे एसी कीहवा में आराम से चैन की नींद सोकर अपनी ड्‌यूटी निभा रहा है।

Wednesday, May 30, 2012

...प्रशासन की छूट है!


टिप्पणी

पिछले सप्ताह गुरुवार की ही तो बात है, जब राज्य में सतारूढ़ पार्टी भाजपा के पदाधिकारी टीपी नगर चौक पर पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ धरने पर बैठे थे। धरनास्थल पर हुई सभा में वक्ताओं ने पेट्रोल मूल्य में वृद्धि के लिए केन्द्र पर न जाने कितने ही शब्दों के तीर चलाए। विरोध का सिलसिला दूसरे दिन, शुक्रवार को भी चला, जब भाजपा के अनुषांगिक संगठन भाजयुमो के पदाधिकारियों ने पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ अपनी गाड़ियों की चाबी कांग्रेस पदाधिकारियों को सौंप दी। इसी दिन ऑटो चालकों ने भी रैली निकालकर न केवल पेट्रोल मूल्यवृद्धि का विरोध किया, बल्कि चुपके से नई किराया सूची की घोषणा भी कर दी। इसके बाद शहरवासियों से बढ़ा हुआ किराया वसूला जा रहा है लेकिन कहीं कोई विरोध नहीं है। पेट्रोल के भाव बढ़ने पर आक्रोशित दिखाई देने वाले भाजपा पदाधिकारियों का ऑटो किराये में वृद्धि को लेकर एक बयान तक नहीं आया है। ऐसा लगता है कि भाजपा का विरोध केवल दिखावे का ही था। भाजपा की नजरों में पेट्रोल के भावों में बढ़ोतरी आम आदमी से जुड़ा मसला है लेकिन, बढ़े हुए ऑटो किराये से उसे कोई मतलब नहीं है। कोई बोलना ही नहीं चाहता। इससे साफ जाहिर है कि पेट्रोल मूल्यवृद्धि का विरोध सस्ती लोकप्रियता ही थी लेकिन, नए ऑटो किराये का विरोध करने से वोट बैंक खिसकने का खतरा है, लिहाजा मौन धारण करना ही उचित समझा जा रहा है। विपक्षी दल कांग्रेस के  नेताओं के भी इस मामले में हाल कमोबेश भाजपा जैसे ही हैं। उन्होंने भी इस मामले में चुप्पी साध रखी है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में पक्ष-विपक्ष में आपसी सूझबूझ बेहद गजब की है। आपस में एक दूसरे का विरोध करना तो दोनों दलों के नेताओं की फितरत में है ही नहीं।
खैर, किराया वृद्धि के इस मसले में राजनीतिक पार्टियों की खामोशी तो आश्चर्यजनक है ही, प्रशासन का रवैया भी कम हास्यास्पद नहीं है। ऑटो किराये को लेकर जिला परिवहन अधिकारी के बयान को देखें तो ऐसा लगता है कि जैसे कि वे हर काम शिकायत मिलने के बाद ही करते हैं। चार दिन से शहरवासियों की ऑटो चालकों के साथ किराये को लेकर नोकझोंक हो रही है लेकिन, परिवहन विभाग को शिकायत का इंतजार है। ऐसे में यह सवाल मौजूं है कि विभाग किसके लिए काम कर रहा है।
बहरहाल, प्रशासन को इस मामले में पहल करनी चाहिए। भले ही ऑटो चालक पेट्रोल के भावों में बढ़ोत्तरी के साथ ऑटो पाट्‌र्स की कीमतों में उछाल को किराया वृद्धि का कारण बताएं लेकिन, प्रशासन को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। इस बात की तहकीकात भी जरूरी है कि किराये में की गई बढ़ोत्तरी जायज है या नाजायज। गंभीर बात तो यह है प्रशासन को विश्वास में लिए बिना किराया बढ़ाना कहां तक उचित है। पेट्रोल के भाव समूचे राज्य में बढ़े हैं लेकिन, मूल्य वृद्धि सिर्फ कोरबा में ही क्यों? यह सरासर नाइंसाफी नहीं है तो क्या है? प्रशासन को चाहिए कि वह ऑटो चालकों के साथ बैठकर ऐसी किराया सूची तय करे, जिसमें दोनों पक्षों का ही अहित ना हो। जिस अनुपात में पेट्रोल के भाव बढ़े हैं, उस अनुपात में किराया बढ़ाना तो समझ में आता है लेकिन, उससे ज्यादा किराया लेना तो सरासर लूट की श्रेणी में आता है।

साभार : पत्रिका कोरबा के 30 मई 12 के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, April 10, 2012

आओ जांच-जांच खेलें


टिप्पणी

क्योंकि इसमें कुछ जमा-खर्च नहीं लगता है। क्योंकि यह तात्कालिक संकट पर पार पाने की सबसे अचूक एवं रामबाण औषधि है। क्योंकि यह विवाद को शांत करने का सबसे आसान तरीका भी है। क्योंकि इसमें सारा खेल हाजिरजवाबी और वाकपटुता का है। क्योंकि इसकी आड़ का कोई तोड़ भी नहीं है। जी हां, इस कारगर हथियार का नाम जांच है। तभी तो सांच को आंच नहीं जैसे जुमले के मायने भी अब बदलने लगे हैं। विशेषकर छत्तीसगढ़ में तो यह गुमनामी के भंवर में खोकर बेमानी सा हो गया है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि अगर उक्त जुमले को 'जांच को आंच नहीं' कर दिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। छत्तीसगढ़ में जांच का खेल जमकर खेला जा रहा है। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां जांच की धमक या दखल ना हो। हर जगह जांच के ही चर्चे हैं। मामला चाहे जनप्रतिनिधियों से वाबस्ता हो या फिर किसी विभाग या अधिकारी से, जांच से कोई अछूता नहीं है। आलम यह है कि नीचे से लेकर ऊपर तक जांच ही जांच है। क्योंकि जब तक जांच है, तब तक आंच नहीं। नेताओं और नौकरशाहों के लिए तो जांच किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। जांच के आगे सब फेल हैं। जांच की इस वैतरणी में ऐसा जादू है कि इसके सहारे कई आरोपी गंगोत्री तर गए।
बिलासपुर जिले में मरवाही का हरित क्रांति घोटाला सबके सामने आ चुका है, लेकिन इसमें दोषी पर कार्रवाई के बजाय जांच दर जांच ही चल रही है। कार्रवाई के नाम पर सब के पास एक ही रटारटाया जवाब है कि जांच जारी है। दो-तीन माह से जांच का खेल चल रहा है। भले ही जांच की आड़ में आरोपित व्यक्ति अपने बचाव के रास्ते खोज ले। कमोबेश कुछ इसी तरह का मामला सिम्स के डीन का है। डीन के फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों का मामला साफ हो चुका है। सूचना के अधिकार में मिली जानकारी में भी यह बात साबित हो चुकी है लेकिन न सिर्फ सरकार, बल्कि स्वास्थ्य मंत्री जिंदा मक्खी निगलने जैसा उपक्रम कर रहे हैं। सच को झुठलाने व दबाने के प्रयास हो रहे हैं। जांच जारी है, जांच जारी है, कहकर न केवल वे सच्चाई पर पर्दा डाल रहे हैं, अपितु मामले को बेवजह लम्बा भी खींचा जा रहा है। इस प्रकार का हीला-हवाला आरोपियों को अभयदान देने से कम नहीं है। क्या भरोसा, इस समयावधि में आरोपित लोग खुद पर लगे आरोपों का किसी जुगाड़ से कोई हल खोज लें। ऐसे हालात में सवाल मौजूं है कि जब सब कुछ साफ दिखता है कि तो फिर क्यों जांच का पेंच फंसा दिया जाता है। जांच-जांच की रट सुनते-सुनते लोगों के कान पक चुके हैं, लेकिन सरकार और नुमाइंदों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। वैसे भी, देखा जाए तो सिम्स डीन और हरित क्रांति घोटाला तो बानगी भर है। ऐसे उदाहरणों की फेहरिस्त लम्बी है, जो जांच के दायरे में सिमटे-सिमटे ही अतीत का हिस्सा बनने की कगार पर है।
बहरहाल, घोटालों-घपलों और भ्रष्टाचार से पीड़ित लोगों के हिस्से सिर्फ जांच ही आती है। शातिर और चालक लोग जांच की आड़ में बच निकलते हैं। सोचिए, एसपी राहुल शर्मा की मौत के मामले में ही जब २८ दिन बाद जांच के नाम पर हलचल शुरू होती है, तब आम आदमी की बिसात ही क्या है। शायद ही ऐसे अवसर आए हों, जब जांच से जुड़े कागजात सार्वजनिक किए गए हों। जाहिर  है कि जब जांच करने या करवाने वालों की नीयत में ही खोट हो, तो भला वे जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किस मुंह से करेंगे। जांच की घोषणा करने वाले ही जांच करवाएं तो जांच का परिणाम क्या होगा? इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। समय रहते अगर जांच रिपोर्ट न आए तो फिर ऐसी जांच का फायदा ही क्या? जांच की प्रासंगिकता व उपयोगिता तभी है, जब समय रहते, दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

साभार - पत्रिका बिलासपुर के 10 अप्रैल 12 के अंक में  प्रकाशित।

Wednesday, April 4, 2012

जांबाज मरावी को नमन


स्मृति शेष

आखिरकार जिसका अंदेशा था, वही हुआ। उम्मीद की किरण बुझ गई। दिल का दौरा पड़ने के बाद दो दिन से जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहे आईजी बीएस मरावी के निधन की घोषणा मंगलवार को कर दी गई। वे हर बार मौत को छकाते आए, लेकिन सेहत को दरकिनार कर काम को तरजीह देने का शगल, इस बार भारी पड़ गया। यह काम के प्रति जुनून का ही नतीजा था कि शुगर के मरीज होने के बाद भी उन्होंने शासन के आदेश को सिर-आंखों पर लिया और तत्काल बिलासपुर रेंज के आईजी का चुनौतीपूर्णपद संकट और संक्रमण के दौर में ग्रहण किया। चाहते तो वे बीमारी का हवाला देकर इसे नकार भी सकते थे लेकिन काम के प्रति उनके जोश, जज्बे और जुनून ने ऐसा करने नहीं दिया। एसपी राहुल शर्मा की मौत के बाद बिगड़े हालात सुधरते, आमजन में पुलिस का विश्वास बहाल हो पाता, सदमे से सहमे आमजन व पुलिसकर्मी सामान्य होते, खाकी पर लगे धब्बे धुलते, उससे पहले ही काल ने एक योग्य, मेहनती, जांबाज, कर्मठ और जुझारू अफसर छीन लिया। यह भी एक संयोग है कि अनियमित दिनचर्या तथा काम के प्रति दीवानगी के चलते मरावी को शुगर जैसे रोग ने चपेट में ले लिया और आखिरी समय में भी काम की अधिकता ही उनके दिल के दौरे की वजह बनी।
दरअसल, आरामतलबी न तो उनके व्यवहार में थी और न ही खून में। वे वातानुकूलित कक्षों में बैठकर दिशा-निर्देश जारी करने के बजाय मौके पर पहुंचने में ज्यादा विश्वास करते थे। काम के प्रति समर्पण ऐसा था कि न दिन देखते थे न रात। तभी तो छत्तीसगढ़ जैसे विषम परिस्थितियों वाले राज्य में अपनी दबंग छवि एवं व्यवहार कुशलता के बलबूते उन्होंने आमजन में गहरी पैठ बनाई। पुलिस विभाग में रहते हुए भी लोगों का विश्वास जीता। जमीन से जुड़े होने के कारण वे व्यवहार कुशल थे और जनता के दर्द को बखूबी समझते थे। तभी तो उनका असमय इस तरह चले जाना सबको अखर रहा है। पुलिस लाइन में इस बहादुर असफर को श्रद्धा सुमन अर्पित करने वालों की भीगी पलकें इस बात की गवाही दे रही थी कि वाकई आज छत्तीसगढ़ ने एक दिलेर, दबंग, मदृभाषी एवं मिलनसार अफसर खो दिया है। फर्श से अर्श तक पहुंचने में उनकी मेहनत एवं काबिलियत का ही प्रमुख योगदान रहा। स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर काम करने के उनके तौर-तरीकों से भले ही कोर्इ उचित न ठहराए लेकिन पुलिस जैसे अनुशासन एवं चुनौतीपूर्ण काम वाले विभाग में मरावी एकदम फिट बैठते थे। ऐसा लगता था वे पुलिस के लिए ही बन थे। पुलिस की परिभाषा में एकदम खरे उतरने के मरावी जैसे उदाहरण कम ही हैं। उनके निधन से आमजन अवाक जरूर है, लेकिन जाते-जाते वे एक ऐसी सीख जरूर दे गए जो कालान्तर में किसी प्रेरणा से कम नहीं होगी। एक ऐसी प्रेरणा, जिसकी मौजूदा पुलिस महकमे को महत्ती आवश्यकता है। पुलिस के इस अनुशासित एवं जांबाज अफसर को नमन।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 04 अप्रैल 12 के अंक में प्रकाशित

Tuesday, March 20, 2012

सबको सन्मति दे भगवान

बोले बापू

 मैं हैरान हूं, परेशान हूं। उदास, निराश और व्यथित भी। जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और आमजन के दोहरे चरित्र पर। इनकी कथनी-करनी में कितना अंतर है, यह तो मुझे भली-भांति पता है। आज इसे प्रत्यक्ष देख भी लिया। मेरी जयंती और पुण्यतिथि पर सत्य, अहिंसा व नैतिकता का पाठ पढ़ाने वालों की आज मेरे सामने आने तक की हिम्मत नहीं हुई। मन के किसी कोने में हल्का सा डर या संकोच रहा होगा, तभी तो मेरी प्रतिमा के चारों ओर पर्दा  खींच दिया गया। मैं बात कर रहा हूं कलेक्टोरेट परिसर की, जहां सोमवार को आबकारी ठेकों की लॉटरी निकाली गई। बरगद के नीचे लगी मेरी शांत चित मुद्रा की प्रतिमा को पर्दे में ढंक दिया गया। प्रतिमा के पिछवाडे़ यानि मेरी पीठ के पीछे 'मंथन सभा कक्ष' में शराब ठेकेदारों के भाग्य का फैसला होता रहा। आमतौर पर कलेक्टोरेट परिसर में आने वाले फरियादियों को मेरी प्रतिमा देखकर सुकून मिलता है, संबल मिलता है। न्याय की उम्मीद बंधती है लेकिन आज मेरी जरूरत नहीं थी। सरकार और उसके नुमाइंदे भी नोटों में मेरी फोटो देखने लगे हैं, तभी तो उन्हें मेरे विचारों से ज्यादा कागजों (नोटों) पर भरोसा है। यह नोटों का ही तो कमाल है कि बीते दस साल में छत्तीसगढ़ शराब बिक्री के मामले में दसवें से तीसरे पायदान पर आ गया है। आलम यह है कि शराब, दवा से भी सस्ती हो गई है। यही रफ्तार रही, तो नंबर वन का खिताब हासिल करने में देर नहीं लगेगी। लोग नशे के आदी हो गए हैं। शराब से नोट किस तरह बरस रहे हैं, इसके लिए बिलासपुर का उदाहरण ले लीजिए। गत वर्ष के मुकाबले इस बार 50  करोड़ से भी ज्यादा के शराब ठेके छूटे हैं। आवेदन पत्रों में भी पिछले साल की तुलना में सात करोड़ ज्यादा कमा लिए। यह तस्वीर कमोबेश पूरे प्रदेश की है। विडंबना देखिए, इन सबके बाद भी प्रदेश सरकार शराबबंदी का राग अलापती है। कारण क्या है पता नहीं, फिर भी जोर-शोर से प्रचारित करवाया जा रहा है कि ढाई हजार तक आबादी वाले गांवों में शराबबंदी कर दी गई है। सोचनीय विषय है कि एक तरफ शराब ठेकों की नीलामी के दौरान मेरी प्रतिमा को पर्दे से ढंक दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ शराबबंदी के पोस्टरों में मुख्यमंत्री के साथ मेरी तस्वीर लगाई जा रही है। यह दोहरा चरित्र नहीं तो क्या है। अगर मेरे विचारों को मानते हैं तो फिर खुलकर स्वीकार करने या छिपाने में हर्ज क्या है।
शराब ठेकों की लॉटरी से ही जुड़ा एक हास्यास्पद पहलू भी मैंने आज देखा। बहुत से आवेदन महिलाओं के नाम से आए, लेकिन लॉटरी के दौरान कोई आवेदिका मौजूद नहीं थी। मैंने देखा है कि शराब से पीड़ित अगर कोई है, तो उनमें सर्वाधिक संख्या महिलाओं की है। इसके बावजूद उनके नाम से आवेदन करना कहां तक न्यायसंगत है। सरकार और उनके नुमाइंदों को सिर्फ कमाने से मतलब है। अगर वह लॉटरी के दौरान यह शर्त रख देते कि आवेदक का लॉटरी के दौरान हाजिर रहना जरूरी है तो शायद महिलाओं के नाम का इस तरह दुरुपयोग नहीं होता।यह महिलाओं के लिए सोचने का विषय है कि जब वे शराब से पीड़ित हैं, तो फिर क्यों अपने नाम का इस्तेमाल ठेकों की लॉटरी के लिए होने दिया?
बहरहाल, मैं चकित हूं। सरकार व उनके नुमाइंदों से। यही तो वे लोग हैं, जो योजनाओं के नाम,  मेरे विचारों एवं सिद्धांतों को मानने का दंभ भरते हैं। गाहे-बगाहे यह साबित करते हैं उनकी विचाराधारा गांधीजी के ज्यादा निकट हैं। यह सब ख्याली पुलाव हैं, जो चुनाव के वक्त ही पकाया जाता है। बाद में पांच साल के लिए मुझे कोई पूछता भी नहीं। अवसर विशेष पर श्रद्धा के सुमन चढ़ा दिए तो गनीमत है, वरना साल भर मेरी प्रतिमाओं को धूल फांकने के अलावा कोई चारा नहीं है। मेरे नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ही मेरी वैचारिक हत्या कर रहे हैं। जिस प्रकार की व्यवस्था की गई और सुरक्षा के लिए जवानों को  तैनात किया गया, उतना अमला किसी मैदान में भी जुटाया जा सकता है। व्यस्त सड़क पर बार-बार जाम लगता रहा वह अलग। खैर, बड़ों का काम हमेशा माफ करना रहा है। यह सब नासमझ हैं। पैसे की चाह में मुझे नजरअंदाज कर दिया। भगवान इनको सद्‌बुद्धि दे, सन्मति दे, ताकि अगले साल कम से कम मेरा लिहाज तो रखें और लॉटरी के लिए किसी दूसरी मुफीद जगह की तलाश करें।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 20  मार्च 12  के अंक में प्रकाशित



Friday, February 24, 2012

चेतावनी से नहीं बनेगी बात

टिप्पणी

बिलासपुर की बदहाल यातायात व्यवस्था पर माननीय हाईकोर्टकी ओर से लगाई गई फटकार के बाद यातायात पुलिस एवं जिला परिवाहन अधिकारी इन दिनों हरकत में आए हुए हैं। यातायात पुलिस का जोर जहां वाहनों की जब्ती पर है, वहीं जिला परिवहन अधिकारी अभी भी कागजी घोड़े ही दौड़ा रहे हैं। कार्रवाई के नाम पर रोजाना प्रेस विज्ञप्ति जारी कर वाहन चालकों को चेतावनी पर चेतावनी दी जा रही है। चेतावनी का असर वाहन चालकों पर कितना हो रहा है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। अगर चेतावनी के माध्यम से ही बदहाल यातायात व्यवस्था पटरी पर आ जाती तो बार-बार माननीय हाईकोर्ट से फटकार नहीं लगती। हालत यह हैकि  करीब तीन माह से ज्यादा समय से लगातार फटकार लग रही हैलेकिन यातायात व्यवस्था में सुधार दिखाईनहीं दे रहा है। तभी तो माननीय हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और आरटीओ एवं यातायात डीएसपी को अवमानना नोटिस जारी करते हुए कहा हैकि दो हफ्ते में व्यवस्था सुधरनी चाहिए नहीं तो दोनों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाईहोगी।
आलम देखिए कल तक हाथ पर हाथ धरे बैठे अधिकारियों को अब वह सब याद आ रहा है, जो रोजमर्रा की कार्रवाई की हिस्सा है। एक ही नम्बर की कईगाड़ियां शहर में दौड़ रही हैं। अधिकतर ऑटो रिक्शा का बिना परमिट के संचालन हो रहा है। कृषि कार्य में उपयोग किए जाने वाली ट्रैक्टर-ट्रालियां भी बेखौफ चल रही हैं। टाटा मैजिक वाहन शहर के अंदर न केवल आसानी से आ जा रहे हैं बल्कि सवारियां भी ढो रहे हैं। एक ही नम्बर के वाहन मिलने के मामले में कार्रवाई के नाम पर आरटीओ ने वाहन डीलरों को चेतावनी जारी कर औपचारिकता निभा दी। इतना ही नहीं बसों में किराया सूची लगाने की बात भी जागरूक लोग समय-समय पर उठाते रहे हैं लेकिन कार्रवाईनहीं हुई। अब परमिट क्रमांक, वैधता, मार्ग का नाम, समय सारिणी, फिटनेस प्रमाण पत्र की वैधता के लिए दिशा-निर्देश जारी हो रहे हैं। बसों में  किराया सूची चस्पा करने, शिकायत पुस्तिका रखने, बस स्टैण्ड पर अनावश्यक रूप से बसें खड़े ना करने, परमिट में दर्जसमय से आधे घंटे से पूर्व ही स्टैण्ड पर खड़ी करने तथा नो पार्किंग में बसें न खडी करने जैसी बातें भी अब याद आ रही हैं।
बहरहाल, यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाने में जोर इसलिए भी आ रहा हैक्योंकि इस प्रकार के हालात पैदा होने के पीछे वाहन चालकों के साथ-साथ दोनों विभाग भी जिम्मेदार हैं। जितनी तत्परता अब दिखाईजा रही है, उतनी शुरू से दिखाई जाती तो यह हालात ही नहीं बनते। कानून तोड़ने वालों पर चेतावनी का असर इसलिए भी नहीं हो रहा है, क्योंकि बचाव के रास्ते भी इन विभागों के द्वारा ही तैयार किए गए हैं। इसीलिए तो विभागों की सरपरस्ती पाए लोग चेतावनी को महज गीदड़ भभकी ही मान रहे हैं। ऐसे लोग तभी लाइन पर आएंगे जब कार्रवाई का डंडा समान रूप से सख्ती के साथ चलेगा। चेतावनी देने तथा दिशा-निर्देश जारी करने का खेल बहुत हो चुका है। इनका हश्र भी सबने देखा है। अब चेतावनी से बात नहीं बनने वाली। मानननीय हाईकोर्टका आशय भी शायद यही है कि दोनों विभाग कार्रवाई के परम्परागत ढर्रे को तोड़ते हुए कुछ ऐतिहासिक काम करें, तभी कुछ हो सकता है। देखा यह गया हैकि शहर में समस्या के समाधान के लिए बैठकें तो खूब होती हैं। सुझाव लिए जाते हैं। कार्रवाई के नाम पर दिशा-निर्देश भी जारी हो जाते हैं लेकिन बात इससे आगे नहीं बढती। ऐसे कईउदाहरण हैं। मौजूदा हालात में यह जरूरी हो गया हैकि बात चेतावनी से आगे बढ़े। दोनों विभाग ऐसा कुछ कर पाए तो ही व्यवस्था में सुधार होगा।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 24 फरवरी 12  के अंक में प्रकाशित




Monday, February 20, 2012

आमजन की भी सुनिए...

हमारी पीड़ा

हम बिलासपुर के लोग इन दिनों संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। एक ऐसा अजीब सा दौर जहां हमारी पीड़ा सुनने वाला, हमारे आंसू पोंछने वाला दूर तलक कोई नजर नहीं आता। आम लोगों के लिए किसी के पास फुर्सत ही नहीं है। सांप छछूंदर जैसी हालत हो गई हमारी। ना खाते बन रहा है, ना निगलते। ना कहीं रो सकते हैं और ना ही खुलकर हंस सकते हैं। दोष किसको दें। हम अपने कर्मों की सजा ही तो भोग रहे हैं। हमने जो बोया उसका फल पा रहे हैं। यह हमारा और इस शहर का दुर्भाग्य हैकि यहां जनप्रतिनिधि और अधिकारी दोनों एक जैसे हैं। कोई काम करना ही नहीं चाहता। जनप्रतिनिधियों को तो हमसे कोई वास्ता ही नहीं रह गया। जरूरत के समय तो पता नहीं कैसे-कैसे वादे कर रहे थे। सपने दिखा रहे थे। विकास की गंगा बहा रहे थे। और भी न जाने क्या-क्या सब्ज बाग दिखाए। हम सीधे एवं सहज लोग उनकी चिकनी चुपड़ी बातों में आ गए।  ऐसा हम हर बार करते हैं। लगातार परेशान होते रहते हैं। मन ही मन में व्यवस्था बदलने की सोचते हैं, लेकिन फैसले की घड़ी में हम गलती कर बैठते हैं। ऐसा हम लम्बे समय से करते आ रहे हैं। तभी तो हमारे जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली का असर हमारे अधिकारियों पर भी पड़ रहा है। या यूं कहे कि जनप्रतिनिधियों की आदतें अधिकारियों में भी घर कर गई हैं।
बिलासपुर आने वाले अधिकारियों को पता नहीं क्या हो जाता है। आमजन के काम, उनकी दिक्कतें उनको नजर ही नहीं आती हैं। पद का इतना गरुर है कि आंख खुलती ही नहीं है। एक अजीब सी नींद में गाफिल नजर आते हैं। खुद से कोई काम कभी सूझता ही नहीं है। हां, एक काम करना इनको बखूबी आता है, जिसमें इनको महारत हासिल हो गई है। जनप्रतिनिधियों के इशारे पर इधर-उधर करना या जोड़-तोड़ का समीकरण बैठाने का काम हंसते-हंसते करना यह लोग परम कर्तव्य समझते हैं। जनप्रतिनिधियों की जी हजूरी करना वे अपना परम सौभाग्य मानते हैं। ऐसा लगता है सेवक जनता के न होकर जनप्रतिनिधियों के हैं। जनप्रतिनिधि जो कहते हैं, अधिकारी वैसा ही करते  हैं। कठपुतली की तरह उनके इशारों पर नाचते हैं। अधिकारियों के भाग्य विधाता आजकल जनप्रतिनिधि ही बने हुए हैं लिहाजा, आम आदमी से उनको कोई सरोकार नहीं है। जनप्रतिनिधियों को खुश कैसे रखा जाए, अधिकारियों का दिन इसी उधेड़बुन में ही बीतता है।
बहरहाल, बिलासपुर के अधिकारी कैसे हैं तथा उनके काम करने का तरीका कैसा है, यह बात वे लोग बेहतर जानते हैं जिनका अधिकारियों से वास्ता पड़ चुका है। नर्मदानगर एवं गुरुनानक चौक का उदाहरण ही देख लें। नर्मदानगर में हमारे साथी कई दिनों से सामुदायिक भवन में देर रात बजने वाले डीजे, लाउडस्पीकरों एवं पटाखों से परेशान हैं। अपनी पीड़ा को लेकर यह लोग कहां-कहां तक नहीं गए, लेकिन अधिकारियों के कानों पर जूं तक नही रेंग रही। कमोबेश ऐसा ही मामला गुरुनानक चौक का है। यातायात को व्यवस्थित करने के लिए सिख समाज ने गुरुनानक देव के प्रतीक चिन्ह को चौराहे से हटाकर सडक़ किनारे स्थापित करने करने के लिए सहमति प्रदान की। चार साल पूर्व चौक को तोडक़र प्रतीक चिन्ह को सडक़ किनारे समारोहपूर्वक स्थापित किया गया। सहर्ष एवं शहर के हित में निर्णय लेने वाले सिख समाज के लोग इन दिनों अधिकारियों की उदासीनता से काफी आक्रोशित हैं। चौक बदहाल हो गया है। ऑटो स्टैण्ड में तब्दील हो चुका है। नर्मदानगर एवं गुरुनानक चौक जैसे मामले शहर में दर्जनों हैं। समस्याओं से त्रस्त लोग पुकार रहे हैं लेकिन जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उनको अनसुना कर रहे हैं। आलम यह हो गया है कि छोटी-छोटी बातों तक के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। बदहाल यातायात व्यवस्था हो, चाहे शहर की टूटी फूटी सडक़ें। अधिकारी तभी हरकत में आते हैं जब न्यायालय का डंडा चलता है। अंततः घूम फिर कर सवाल वही उठता है कि आम आदमी को बुनियादी सुविधाओं में सुधार के लिए न्यायालय की शरण में जाना पड़े तो फिर अधिकारियों को जनसेवक कहना कहां तक उचित है। हां इतना जरूर हैकि हमारे जनप्रतिनिधियों की तरह अधिकारी एक काम तो आसानी कर लेते हैं, वह है बयान देने का। जनप्रतिनिधि भाषणों के माध्यम  विकास की गंगा बहाते हैं तो अधिकारी बैठकों में दिशा-निर्देश जारी कर ऐसा समझते हैं मानो काम हो ही गया।
बहरहाल, बयानों के इस शोर में जनता की पुकार दब रही है। एक बार हाथ आया मौका गंवा देने की सजा उसे पांच साल भोगनी पड़ती है, क्योंकि बाद में उसके हाथ में कुछ बचता नहीं है। फिर भी इस प्रकार की उदासीनता लम्बे समय तक उचित नहीं है। जनता जनार्दन सिर-आंखों पर बैठाना जानती है तो नीचे उतारने में भी देर नहीं लगाती। देर है तो बस एकजुट होने की। अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों को समय रहते चेत जाना चाहिए। समय की नजाकत को भांप लेना चाहिए। 

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 20 फरवरी 12 के अंक में प्रकाशित।


Tuesday, February 14, 2012

इन धमाकों को सुनिए!

टिप्पणी 

श्रीमान, राहुल शर्मा
पुलिस अधीक्षक, बिलासपुर।

आपको बिलासपुर जिले का कार्यभार संभाले हुए एक माह से ज्यादा समय हो गया है। इस अवधि में आपको शहर की सूरत एवं सीरत का अंदाजा तो भली भांति हो गया होगा। वैसे भी किसी अधिकारी के लिए शहर को समझने के लिए एक माह का समय कम नहीं होता है। चूंकि आप नए हैं, सभी की नजरें भी आप पर ही हैं, इसलिए शहर को आपसे अपेक्षाएं भी ज्यादा हैं। अपेक्षा ज्यादा होने का मतलब यह तो कतई नहीं है कि आपसे पहले वाले अधिकारी काम के नहीं थे या उन्होंने काम नहीं किया। दरअसल यह आम धारणा बन गई है कि जब भी कोई नया अधिकारी आता है तो उससे उम्मीदें एवं अपेक्षाएं बढ़ जाती है। इसकी एक प्रमुख वजह नए व पुराने के बीच तुलना होना भी है। जब व्यवस्था एक  ही ढर्रे पर चलती है और उसमें रत्तीभर भी बदलाव दिखाई देता है तो उम्मीदें बढ़ना लाजिमी है। आपने पदभार संभालने के बाद जिस तरह कबाड़ियों के खिलाफ कार्रवाई की उससे लगा कि वाकई आप पटरी से उतरी व्यवस्था को सही करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। लेकिन जिस अंदाज में कार्रवाई का आगाज हुआ, वह अंजाम तक पहुंचने से पहले ही विवादों में घिर गई। खैर, इस प्रकार की कार्रवाई अक्सर नवागत अधिकारी करते आए हैं ताकि गलत काम करने वालों में कानून के प्रति खौफ हो। यह बात दीगर है कि आपने कार्रवाई का केन्द्र कबाड़ियों को बनाया।
आपको अवगत कराने की जरूरत नहीं है, फिर भी बता दें कि बिलासपुर शहर में मुख्य रूप से दो विचारधाराओं के लोग ही ज्यादा हैं। या यूं कहें कि दो विचारधाराओं के लोग दो वर्गों में बंटे हुए हैं। इनकी जीवनशैली में जमीन आसमान का अंतर है। तभी तो दोनों वर्गों के बीच लम्बी-चौड़ी खाई है। एक वर्ग सामान्य व आम लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जबकि दूसरा रसूखदारों एवं धनाढ्‌य लोगों से बावस्ता है। सारी कहानी इन दोनों वर्गों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। रसूखदार जहां पैसे एवं पहुंच के दम पर कुछ भी करा सकने का दावा करते हैं जबकि आम आदमी के पास सिवाय व्यवस्था को कोसने के दूसरा कोई चारा नहीं है। रसूखदारों से नजदीकियां बढ़ाने, उनके दुख-दर्द में शामिल होने तथा उनको कुछ भी करने की छूट देने जैसे आरोपों से आपका विभाग भी अछूता नहीं है। कई मौके तो ऐसे आए हैं जब आपके मातहतों ने मुंह देखकर कार्रवाई की है।
पुलिस में भर्ती होने के बाद प्रशिक्षण के दौरान संविधान के प्रति पूरी ईमानदारी एवं मेहनत से सेवा देने, कर्तव्य का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी के साथ करने, सभी धर्मा के प्रति समान भावना रखने, अपराध के लिए कोई भी रिश्तेदारी या जाति भावना दिल में न आने देने तथा मेहनत एवं लगन के दम पर देश एवं राष्ट्र धवज का नाम ऊंचा करने की शपथ लेने वाले आपके मातहत पता नहीं क्यों समय के साथ बदल जाते हैं। आम आदमी का दर्द उनको दर्द ही नजर नहीं आता है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। बीते एक माह में आप भी इससे वाकिफ हो गए होंगे। शहर में देर रात तक डीजे बजाना, तेज धमाकों के साथ आतिशबाजी करना और पटाखे फोड़ना आम हो गया है।  मौजूदा समय में रसूखदारों का यह शगल आम आदमी को इसलिए अखर रहा है, क्योंकि यह परीक्षा का समय है। प्राइमरी से लेकर माध्यमिक, उच्च माध्यमिक एवं कॉलेज स्तर की परीक्षा सिर पर हैं। परीक्षाओं को देखते हुए जिला प्रशासन ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनुपालना में तेज ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक लगाने के आदेश जारी कर रखे हैं। ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक के आदेशों के बावजूद रात बारह-एक बजे तक शहर में तकरीबन रोजाना तेज आवाज में डीजे बजता है। पटाखे फूटते हैं, लेकिन आपके मातहतों को यह सुनाई नहीं देता है।
ऐसा लगता है, उन्होंने कानों में रुई डाल रखी है। डीजे एवं पटाखों के धमाके आपको सुनाई न देना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। ऐसा लगता है आपके बंगले एवं कार्यालय की दीवारें आवाज रोधी हैं। आप ही बताइए, अपनी खुशी के लिए दूसरों को परेशानी में डालना कहां तक उचित है। परीक्षा की तैयारी में व्यस्त कोई नौनिहाल हिम्मत जुटाकर आपको सूचना देता भी है तो उसकी बात को अनसुना नहीं करना चाहिए। वह एक उम्मीद के साथ  सूचना देता है लेकिन जब उसे निराशा  हाथ लगती है तो वह दुबारा क्यों फोन करेगा। इससे तो यह जाहिर होता है कि रसूखदारों को खुलेआम अपने रुतबे का प्रदर्शन करने की अघोषित छूट भी आपके विभाग ने ही दे रखी है।  वे कभी भी, कहीं भी कुछ भी करें। उनको रोकने या टोकने कोई नहीं जाता है।  तभी तो आम आदमी पुलिस के पास जाने में भी डरता है। व्यवस्था से त्रस्त बिलासपुर के आम आदमी को जब इन ध्वनि विस्तारक यंत्रों व देर रात होने वाले तेज धमाकों से ही मुक्ति नहीं मिल रही है तो फिर अपराधों पर नियंत्रण की बात करना बेमानी है। आप कुछ नया कर पाए तो बिलासपुर के लोग आपको लम्बे समय तक याद रखेंगे। भले ही वह आम जन में विश्वास कायम करना ही क्यों न हो।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 14 फरवरी 12 के अंक में प्रकाशित

Sunday, February 12, 2012

भाषण

सर्वप्रथम एक अच्छे एवं प्रासंगिक विषय का चयन करने के लिए डा. सीवी रमन विश्वविद्यालय को धन्यवाद। इस सेमीनार की परिकल्पना करने वालों को धन्यवाद और इस आयोजन में मुझे आमंत्रित करने के लिए भी धन्यवाद। 
अपनी बात शुरू करने से पहले एक रोचक जानकारी से आपको अवगत कराना चाहता हूं, हालांकि यह जानकारी भी सेमीनार की विषय वस्तु से ही संबंधित है, लेकिन बात शुरू वहीं से करता हूं। आपने बिट्‌स पिलानी का नाम तो सुना ही होगा। बताइए कितने लोग इसके बारे में जानते हैं.........? अब यह बताइए कि झुंझुनूं कहां पर है...? आप में से कम लोग ही यह जानते होंगे कि पिलानी एक छोटा सा कस्बा है और झुंझुनूं जिले के अधीन आता है। पिलानी इसलिए प्रसिद्ध हो गया क्योंकि उसने तकनीकी आधारित शिक्षा देने काम किया है। हालात यह है कि इस संस्थान में प्रवेश पाना कई युवाओं के लिए तो सपना ही रह जाता है। खैर, पिलानी और झुंझुनूं का जिक्र इसलिए किया है क्योंकि मैं स्वयं झुंझुनूं का रहने वाला हूं।  झुंझुनूं राजस्थान बेहद जागरुक जिला है। इसी जिले में मेरा गांव है। मेरा जिला साक्षरता के मामले में राजस्थान में अव्वल है। कमोबेश यही तस्वीर महिला शिक्षा की भी है।
जाहिर सी बात है कि लोग शिक्षित होंगे तो जागरुक होना भी लाजिमी है, लेकिन मेरा मानना है कि सिर्फ शिक्षित होने से ही जागरुकता नहीं आ सकती है। इसके लिए मानसिकता को भी बदलना होगा। इसके लिए भी मैं मेरे जिले का ही उदाहरण दूंगा क्योंकि यह सब मैंने न केवल प्रत्यक्ष देखा है बल्कि महसूस भी किया है। बात लम्बी एवं बड़ी जरूर है लेकिन मौका मिला है तो मैं कहने से नहीं चूकूंगा। स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद हमारे यहां बीएड करना एक परम्परा सी बन गई है। इसके अलावा युवाओं को दूसरा कोई रास्ता न दिखता है और न सूझता है। आलम देखिए, बड़े भाई ने अगर बीएड की तो छोटा भी बीएड ही कर रहा है। तभी तो अकेले झुंझुनूं जिले से जितने शिक्षक हैं, उतने राजस्थान के किसी भी जिले में नहीं हैं। आपको घर-घर में शिक्षक तथा बीएडधारी मिल जाएंगे। पति-पत्नी दोनों के शिक्षक होने या बीएडधारी होने के उदाहरण तो हजारों में हैं। आपको बता दूं कि मेरी धर्मपत्नी भी एमए बीएड है। मैंने भी बीए करने के बाद बीएड के लिए एक बार कोशिश की लेकिन भाग्य में कुछ और ही लिखा था। मेरे बड़े भाई भी शिक्षक हैं। एक भाभीजी ने भी बीएड की डिग्री हासिल कर रखी है। मतलब बीएड का जितना क्रेज युवाओं में है, उतना ही युवतियों में भी है। साथ में यह भी बता दूं कि बेरोजगार शिक्षकों के मामले में भी झुंझुनूं का पहला स्थान है। दरअसल बीएड करने के पीछे यह धारणा है कि सभी ऐसा कर रहे हैं मैं भी ऐसा कर लूं। इस भेड़चाल में शामिल मेरे जिले के युवाओं को कॅरियर के प्रति जागरुक एवं मार्गदर्शन देने वाला पथप्रदर्शक कोई नहीं है। यह एक छोटी सी तस्वीर है, जो बताती है कि मार्गदर्शन के अभाव में युवाओं के पास कॅरियर बनाने के विकल्प किस प्रकार से सीमित हो जाते हैं।
मेरे जिले से ही एक दूसरा उदाहरण है सेना में जाने का। दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद युवा सेना में भर्ती होने के लिए लालायित रहते हैं और दौड़ धूप शुरू कर देते हैं। इसका प्रमुख कारण मेरे जिले में खेती फायदा का सौदा न होना है। आजीविका का मुख्य आधार नौकरी पेशा ही है। यही कारण की दसवीं के बाद सेना में जाने की परम्परा आजादी से पहले से ही चल रही है। तभी तो अकेले झुंझुनूं जिले से करीब 60 हजार युवा भारतीय सेना में कार्यरत हैं जबकि इतने ही सेनानिवृत्त्त हैं। मेरे पिताजी एवं उनके चारों भाइयों ने न केवल सेना में नौकरी की बल्कि 1962, 1965 व 1971 के युद्धों में भी भाग लिया है। मेरे बड़े भाई भी भारतीय वायुसेना में कार्यरत हैं। मैं स्वयं भी दो बार सेना में भर्ती होने के लिए कोशिश कर चुका हूं लेकिन वहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया।
माफ कीजिएगा, मैं अपनी बात को लम्बी खींच रहा हूं लेकिन सेना और शिक्षक का उदाहरण देने की पीछे ही आज के सेमीनार की विषय वस्तु छिपी हुई है। लब्बोलुआब यह है कि  शिक्षित होने के बाद भी मानसिकता सरकारी नौकरी हासिल करने की रहती है। यही कारण है कि अधिकतर शैक्षणिक संस्थान अकादमिक शिक्षा देने तक ही सीमित हैं।  इसी वजह से अधिकतर गांवों में शिक्षित बेरोजगारों की लम्बी फौज मिल जाएगी। बेरोजगारी के पीछे प्रमुख कारण यही है कि उन्होंने रोजगार विषयक शिक्षा ग्रहण नहीं की।
मैंने आपको जो तस्वीर दिखाई है वह आज से पांच साल पहले तक ही है, हालांकि इसमे आमूलचूल परिवर्तन तो अभी भी नहीं हुआ लेकिन बदलाव की बयार बहनी शुरू हो गई है। आरक्षण की मार तथा कड़ी प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सरकारी नौकरियां अब सीमित हो गई हैं। ऐसे में रोजगारपरक शिक्षा की महत्ता काफी बढ़ गई है।
तभी तो अकेले मेरे जिले में ही तीन निजी विश्वविद्यालय पिछले पांच साल में खुले हैं जबकि दो निकट भविष्य में खुलने वाले हैं। इन सभी विवि का ध्यान अकादमिक शिक्षा के बजाय रोजगारपरक पढ़ाई एवं कोर्सेज पर ही केन्द्रित है।  पिछले पांच साल से मैंने देखा है कि आईआईटी में अकेले झुंझुनूं से 15 से 20  छात्रों का चयन प्रति वर्ष हो रहा है। ऐसे परम्परागत जिले में इस प्रकार लीक से हटकर काम कर उसमें सफलता पाना अपने आप में बड़ी बात है।
खैर, मौजूदा समय में व्यवसायिक शिक्षा निहायत जरूरी है लेकिन इसके लिए कुछ चुनौतियां भी हैं, मसलन, जागरुकता का अभाव, परम्परागत ढर्रे का असर, सरकारी नौकरी के प्रति मोह, सरकारी प्राइवेट में भेद, प्रचार-प्रसार का अभाव, विवाह में सरकारी नौकरी वालों को प्राथमिकता, अकादमिक शिक्षा का अंधानुकरण, सस्ती शिक्षा का लालच, मार्गदर्शन का अभाव आदि प्रमुख है।
सरकारी नौकरी तथा उसके रुआब से इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन प्राइवेट क्षेत्र में आज ने केवल काफी संभावनाएं हैं,बल्कि पैसा एवं प्रतिष्ठा दोनों हैं। सरकारी नौकरी का मोह छोड़कर व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण करने वालों के लिए मैं राजस्थान में बेहद प्रचलित दोहे का उल्लेख जरूर करना चाहूंगा,  जिसमें कहा गया है कि, लीक लीक घोड़ा चले, लीक ही चले कपूत, लीक छोड़ तीन चले, शायर, सिंह, सपूत। कहने का तात्पर्य है जो लीक से हटकर चलते हैं, वे इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाते हैं।
व्यावसायिक एवं रोजगारपरक शिक्षा आज जरूरी है और समय की मांग भी है लेकिन भारत में इस दिशा में देरी से सोचा गया वरना आज तस्वीर ही दूसरी होती है। जितना गंभीरता अब दिखाई जा रही है उतनी पहले बरती जाती तो शायद हमारे देश की प्रतिभाएं दूसरे देशों में पलायन करने की बजाय यहीं रुकती। इससे देश को फायदा भी मिलता। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 15 से 25 आयु समूह के युवाओं में आज भी भारतीय सामान्य विवि के कार्यक्रमों में दाखिल लेते हैं जबकि यूरोप में 80 फीसदी तथा मलेशिया, कोरिया व ताइवान जैसी पूर्वी एशियाई देशों में 60 प्रतिशत युवा व्यवसायिक शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं। तभी तो बाजार में दिखाई देने वाले लगभग हर उत्पाद में चीन के सामान की धमक दिखाई देती है।
चीन का भारतीय बाजार पर कब्जे करने के अंकगणित को भी हमें समझना होगा।  भारत में जहां 51 सौ औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान तथा 1745 पोलिटेक्नीक कॉलेज हैं, वहीं चीन में इनकी संख्या लाखों में है। भले ही व्यावसायिक प्रशिक्षण में फिल्म, टेलीविजन, सूचना प्रौद्योगिकी के मामले भारत आगे है लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 18 से 25 आयु वर्ग के तीन सौ लाख युवा बेरोजगार हैं जबकि46 लाख रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत हैं।
सरकारी सेवाओं में घटते अवसरों तथा निजी क्षेत्र में व्यापक संभावनाओं को देखते हुए भारत सरकार की ओर से  2008-09 में एनएसडीएल.... नेशनल  स्कील डवलपमेंट कोरपोरेशन की स्थापना की गई। इसका उद्‌देश्य 2022 तक करीब 50  करोड़ लोगों को विभिन्न प्रकार के कौशलों से अवगत श्रमिकों की श्रेणी में लाने तथा जो कुशल वर्ग में आते हैं, उनकी कुशलता में और इजाफा करने के लक्ष्य में करीब 30 प्रतिशत तक का महत्वपूर्ण योगदान करने का है जो कि मुख्यतया निजी क्षेत्र से आएगा। एनएसडीएल वित्त मंत्रालय के अधीन है तथा  यह बगैर लाभ के काम करती है। इसकी मूल पूंजी 10 करोड़ हैं। इसमें 49 प्रतिशत शेयर सरकार के पास जबकि 51  फीसदी निजी क्षेत्र के हाथों में है। इस संस्था से देश में कौशलता को सुधारने में काफी मदद मिलेगी। प्राइवेट सेक्टर में भरपूर संभावनाओं के वाले बीस क्षेत्र हैं। इनमें दस औद्योगिक तथा दस सेवा क्षेत्र हैं। औद्योगिक क्षेत्र में वाहन तथा उनके पुर्जों से जुड़े उद्योग, इलेक्ट्रोनिक्स, कपड़ा तथा वस्त्र उद्योग, चमड़ा तथा चमड़े की सामग्र से जुड़े उद्योग, रसायन तथा औषधि उद्योग, जवाहरात तथा कीमती पत्थर उद्योग, गृह तथा ढांचागत निर्माण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, हस्तकरघा तथा हस्तशिल्प उद्योग और गृह निर्माण व गृह सज्जा की वस्तुओं का उद्योग शामिल है। इसी प्रकार सेवा क्षेत्र में सूचना तकनीक व साफ्टवेयर सेवा, सूचना तकनीक पर आधारित सेवा जैसी बीपीओ, पर्यटन तथा होटल उद्योग, यातायात, सामान का वहन व पैकेजिंग, सुनियोजित खुदा व्यापार, रियल इस्टेट सेवा, मीडिया, मनोरंजन, ब्रोडकास्टिंग, एनिमेशन तथा लेखन से जुड़ी सेवा, स्वास्थ सेवा, बैंकिंग बीमा तथा वित्तीय सेवा और शिक्षण-कौशल विकास के क्षेत्र शामिल हैं।
बहरहाल, आपको पता दूं कि मैं खुद भी उस क्षेत्र में हूं जो सेवा क्षेत्र में आता है। मीडिया में भी वर्तमान में रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। यहां सिर्फ लेखन ही नहीं बल्कि कई सेक्टर हैं जहां कॅरियर बनाया जा सकता है। आखिर में फिर पुरानी बात पर लौटता हूं कि आज से १२ साल पहले मैं जब इस क्षेत्र में आया  था तो मेरे गांव के लोगों को पता ही नहीं था कि मीडिया क्या है। मैं जब भी गांव जाता वे जिज्ञासावश पूछ लेते, अखबार में आप क्या करते हो? कहीं आप अखबार बांटने का काम तो नहीं करते? आदि-आदि।  यह सब बातें मैँ इसलिए शेयर कर रहा हूं क्योंकि लोगों का इस क्षेत्र की जानकारी ही नहीं थी। आज भी हालात बदलते नहीं है, लेकिन मैंने सरकारी का मोह को त्यागा तथा शिक्षक या सैनिक बनने की किवदंती को न केवल तोड़ा बल्कि यह भी साबित कर दिखाया है देश सेवा सिर्फ सेना में जाने से ही नहीं बल्कि पत्रकारिता के माध्यय से भी की जा सकती है। मैंने लीक को छोड़ा,  परम्परा को तोड़ा तो उसका फायदा भी मिला। मैं मेरे युवाओं साथियों की तरह बीएड कर भी लेता तो उनकी तरह आज बेरोजगारों की भीड़ में ही शामिल होता या फिर किसी निजी शिक्षण संस्थान में डेढ़-दो हजार की मासिक पगार पर नौकरी कर रहा होता। मैंने परम्परा तोड़ने का साहस दिखाया। मैंने कुछ नया करने का खतरा मोल लिया तो उसका प्रतिफल भी मुझे मिला। आज आलम यह है कि गांव जाता हूं तो कई युवा पत्रकारिता के क्षेत्र में आने को उत्सुक दिखाई देते हैं तथा मुझसे इस फील्ड में आने के तरीकों के बारे में चर्चा करते हैं।
्रसेमीनार में भाग लेने वाले युवा साथियों से इतना ही कहना चाहूंगा कि वे जिस भी क्षेत्र में जाएं पूर्ण लगन एवं निष्ठा के साथ कार्यकर महारत हासिल करें। खुद को किसी भी मामले में कमत्तर नहीं आंके। आत्मविश्वास को किसी भी सूरत में कम नहीं होने दें। मन में यह हीन भावना भी कभी न आने दें कि मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि का हूं और यह शहरी है। ऐसा कुछ नहीं है, यह केवल वहम है। सोच का फर्क है। दूसरी बात यह है कि प्राइवेट क्षेत्र में कौशल विकास करने के मौके लगातार मिलते रहते हैं, इसके लिए खुद को कभी विशेषज्ञ न मानें और निरंतर सीखते रहे। सीखने में छोटे-बड़े का भेद न हो बल्कि प्रयास यही रहे कि हम उसके अनुभवों का लाभ उठाएं। मैं स्वयं हमेशा सीखने को लालायित रहता हूं। जहां भी मौका मिलता हूं सीखता हूं, क्योंकि मैं जब से चला मेरी मंजिल पर नजर है, मेरी आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा, जैसे फलसफे में विश्वास रखता हूं।  मतलब साफ है कि अपने लक्ष्य को अपने जेहन में रखता हूं तथा उसे पाने के लिए के लिए प्रयास व मेहनत भी करता रहता हूं। आखिर में आयोजकों को अच्छे विषय पर सेमीनार करवाने तथा मुझे इसमें आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद देते हुए अपनी वाणी को विराम देना चाहूंगा।
जय हिन्द, जय भारत।

दिनांक 10 फरवरी 12  को डा. सीवीरमन विश्वविद्यालय में कौशल विकास एवं व्यावसायिक शिक्षा में विश्वविद्यालयों की भूमिका विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में बतौर विशिष्ट अतिथि दिया गया भाषण।







Saturday, January 28, 2012

बात दिशा-निर्देशों से आगे तो बढ़े


पत्रिका व्यू
सड़क सुरक्षा सुरक्षा समिति की शुक्रवार को हुई बैठक जो निर्णय लिए गए , वे सब करीब ढाई माह पूर्व हुए खुला मंच कार्यक्रम में भी लिए जा चुके हैं। मंथन में जुटे अधिकारियों, कर्मचारियों तथा  निजी ट्रक, बस, आटो, चालक संघों के पदाधिकारियों को शायद याद न हो, लेकिन जिन मुद्‌दों पर इन लोगों की चर्चा की उन पर पहले भी काफी विचार-विमर्श हो चुका है। मसलन, शहर के विभिन्न स्थानों से अनुचित पार्किंग एवं अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। टाटा मैजिक वाहनों का शहर के अंदर प्रवेश प्रतिबंधित किया गया है। रास्तों पर अतिक्रमण कर ठेला लगाने वालों को हटाने, ऑटो संचालन के लिए परमिट अनिवार्य करने तथा ट्रांसपोर्ट नगर में सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात कही गई।
ऑटो के परमिट न होने तथा मैजिक के अवैध संचालन की बात तो खुला मंच कार्यक्रम में यातायात विभाग के डीएसपी ने ही कही थी। इसी कार्यक्रम में  ट्रांसपोर्ट नगर का मामला तो बहुत जोर-शोर से उठा था। शहर में भारी वाहनों के रात में प्रवेश का मामला भी इसी बात से जुड़ा है। सवाल उठता है कि जिन सुविधाओं की उपलब्धता की बात अब की जा रही है, वह पहले क्यों नहीं जुटाई गई। सुविधाएं थी ही नहीं तो वाहनों का प्रवेश बंद करने में जल्दबाजी क्यों दिखाई गई। सुविधाएं जुटाई गए तो उनमें कमी की गुंजाइश क्यों छोड़ दी गई। बात फिर वहीं आकर रुकती है कि केवल हर बार दिशा-निर्देश ही जारी होकर रह जाते हैं।
बहरहाल, ऐसी बैठकों की सार्थकता तभी है, जब उनमें लिए गए निर्णयों पर काम हो। बैठकें बुलाने तथा उनमें दिशा-निर्देश जारी करना एक तरह से वक्त बर्बाद करना ही तो है, क्योंकि इनसे हासिल तो कुछ होता नहीं है। सिर्फ कागजी कार्रवाई करने, शासन-प्रशासन के दवाब या माननीय न्यायालय के आदेशों की अनुपालना में सिर्फ बैठकें बुलाने से ही बात नहीं बनेगी। जरूरत दिशा-निर्देशों को हकीकत में बदलने की है। उम्मीद की जानी चाहिए शुक्रवार को हुई बैठक में जारी किए गए दिशा-निर्देशों पर न केवल अमल होगा बल्कि कार्रवाई भी होगी।

साभार- पत्रिका बिलासपुर के  28 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित


Friday, January 27, 2012

चुप्पी तोड़िए...कुछ तो बोलिए...


खरी-खरी
हम बिलासपुर के लोग बेहद अजीब हैं। हमारा स्वभाव, हमारी प्रकृति और व्यवहार, सब कुछ अजूबा है। अनूठा है। हर कोई हमें सीधा समझता है। वैसे हम हैं भी सीधे। इतने सीधे कि चाहे इधर का उधर हो जाए। कुछ बोलते ही नहीं है। सहनशीलता देखिए... सड़कों पर बने गड्‌ढ़ों में गिरेंगे। पैदल चलते भी हिचकोले खाएंगे। धूल फांकेंगे। बीमार हो जाएंगे। अस्पताल चले जाएंगे, लेकिन बोलेंगे नहीं। हमारी खासियतों एवं खूबियों की बानगी के तो कहने ही क्या...हम सरल हैं। सहज हैं। सहनशील हैं। धैर्यवान हैं। आशावान हैं। सपने देखते हैं। उम्मीदें पालते हैं। बाद में भूल जाते हैं। मगर बोलेंगे नहीं।
धार्मिकता ऐसी कि...चंदा उगाहेंगे। न देने वालों को चमकाएंगे। पंडाल लगाएंगे। सड़कें घेरेंगे। रास्ते रोकेंगे। अतिक्रमण करेंगे। रोज झांकी सजाएंगे। फिल्मी गीत बजाएंगे। शोरगुल करेंगे। देर रात तक सड़कों पर नाचेंगे। जाम लगाएंगे। गुस्सा भी ऐसा कि....हादसों से हिलेंगे नहीं। सबक इनसे लेंगे नहीं। कुछ देर चिल्लाएंगे। कानून तोड़ेंगे। वाहनों को फोडे़ंगे। पत्थर फेंकेंगे। आगजनी करेंगे। खुद पर मुकदमे दर्ज करवाएंगे। फिर चुप बैठ जाएंगे। एकदम खामोश। बाद में कुछ बोलेंगे ही नहीं। हाथ इतना खुला है कि...जन्मदिन मनाएंगे, झूमेंगे। नाचेंगे। पानी की तरह पैसा बहाएंगे। फिजूलखर्च करेंगे। पटाखे फोड़ेंगे। पोस्टर लगाएंगे। बैनर टांगेंगे। दीवारें रंगेंगे। शहर बदरंग करेंगे।
जागरुकता की तो मिसाल ही क्या दें, क्योंकि...नियमों को तोड़ेंगे, वाहनों पर  फर्राटे से दौडेंगे।  हेलमेट लगाएंगे नहीं। तेज हार्न बजाएंगे। मनमर्जी की नम्बर प्लेट लगवाएंगे। पार्किंग व्यवस्था को मानेंगे नहीं। नियमों की बात जानेंगे नहीं। बेवजह बिजली जलाएंगे। पानी सड़कों पर बहाएंगे।
हमारे प्रतिनिधि तो.... दावे करते हैं। आश्वासन देते हैं। वादों में भरमाते हैं। हमें बहलाते हैं। मना कभी करते नहीं। काम कुछ करते नहीं। शहर से ज्यादा खुद की चिंता है। दिन इसी उधेड़बुन में बीतता है। देखेंगे सब पर बताएंगे नहीं।  सच जानकार भी जुबां हिलाएंगे नहीं। जनता से दूर हैं। मुद्‌दों से बेखबर है।
और हमारे सेवक... दिशा-निर्देश जारी करेंगे। कागजी आंकड़ों में खेलेंगे। घोटालों का घालमेल है। भ्रष्टों से तालमेल है। बंधी आंखों पर पट्‌टी है। पी इसी बात की घुट्‌टी है। नियम रोज बनाएंगे। काम नहीं कराएंगे। ईमानदारी से काम बनता नहीं। सुविधा शुल्क से काम रुकता नहीं। लगती रोज फटकार है। फिर भी आदत से लाचार हैं। वसूली थमती नहीं है। राहत मिलती नहीं है। शहर परेशान है। हर आमोखास हलकान है। रास्ते तंगहाल है। सफाई बदहाल है।
तभी तो यहां...सियासत का खेल है। पक्ष-विपक्ष में मेल है। फर्जीवाड़े की भरमार है। सर्जरी की दरकार है। कदम-कदम पर भ्रष्टाचार है। नींद में सरकार है। अपराधियों से प्यार है। कुछ भी करो आजादी है। ना नियम है ना पाबंदी है। पैसे की बर्बादी है। बात-बात पर चंदा है। मोटी कमाई का जो धंधा है। बदरंग शहर है। हादसों की डगर है। बातें और बयान हैं। समस्याओं का नहीं समाधान हैं। बयानों का शोर है। बदहाली का दौर है। आदमी परेशान चहुंओर है। उम्मीद का दिखता नहीं छोर है। बदइंतजामियों का जोर है। फिर भी हम कुछ बोलते नहीं...।  क्योंकि सहन कर लेंगे, उम्मीद रखेंगे। भरोसा कर लेंगे। दूसरों के भरोसे रहेंगे। खुद कुछ नहीं करेंगे। बात हमारी कोई मानता नहीं। गांधीगिरी की भाषा यहां कोई जानता नहीं। दूरगामी असर को हम नहीं आंकते। जनप्रतिनिधियों को भी नहीं जांचते। उनके बहकावे में आ जाएंगे। वादों से बहल जाएंगे। सब सह लेंगे।  सोए रहेंगे। मगर बोलेंगे कुछ नहीं...। 
बहुत हो चुका।  अब तो इस चुप्पी को तोड़िए। कुछ तो बोलिए... कुछ तो बोलिए...। भाग्य का साथ छोड़िए। कर्म से नाता जोडि़ए।  शुरुआत आज से कीजिए। मजा आएगा कितना फिर देखिए। कुछ तो बोलिए... कुछ तो बोलिए...।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 26 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।


Sunday, January 15, 2012

सिम्स की सर्जरी जरूरी


खुला पत्र

माननीय अमर अग्रवाल जी,
स्वास्थ्य मंत्री,
छत्तीसगढ़, सरकार।

आपने पीड़ित लोगों की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए हाल में बिलासपुर में जन शिकायत केन्द्र शुरू किया था। यह इतना हाईटेक सिस्टम है कि न केवल बिलासपुर बल्कि समूचे छत्तीसगढ़ में एक अभिनव प्रयोग  माना जा सकता है। इस शिकायत केन्द्र के माध्यम से समूचे प्रदेश के लोग फोन पर अपनी समस्याओं से आपको अवगत कराते हैं और  यथासंभव उनका हल भी हो रहा है। इस शिकायत केन्द्र का दूसरा पहलू यह भी है कि यह चिराग तले अंधेरा वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है। आपके साथ भी इन दिनों लगभग वैसा ही हो रहा है। आप समूचे प्रदेश की समस्याएं तो सुन रहे हैं, लेकिन बिलासपुर का हाल-बेहाल हैं। यहां समस्याओं की फेहरिस्त बेहद लम्बी हो गई है। या यूं कहें कि समूचा शहर ही बीमार है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं।
बाकी बातों को तो छोड़िए केवल आपके मंत्रालय के अधीन स्वास्थ्य विभाग की ही बात करें तो हालात बड़े विकट हैं। विशेषकर शहर की चिकित्सा व्यवस्था तो पटरी से लगभग उतर चुकी है। सिम्स पर तो ऐसा लगता है कि किसी का नियंत्रण ही नहीं है। विवादों का सिम्स से चोली-दामन का साथ हो गया। एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब सिम्स से जुड़ी खबरें न आती हों। कभी रैंगिंग तो कभी हॉस्टल में शराबबाजी। कभी मरीजों की उपेक्षा तो कभी इलाज के लिए पैसे मांगने जैसी बातें तो यहां आम हो चली हैं। हॉस्टल में एक छात्रा द्वारा फांसी लगाने के मामले में भी सिम्स प्रबंधन की भूमिका संदेह के घेरे में है। यह सब आपके गृह नगर में हो रहा है। समूचे प्रदेश की हालात क्या होगी, सहज ही समझा जा सकता है। वैसे भी सिम्स की स्थापना जिस मकसद को लेकर की गई थी, मौजूदा हाल में उन पर काम कतई नहीं हो रहा है। करोड़ों-लाखों रुपए की मशीनें धूल फांक रही हैं जबकि मरीज बाहर महंगे दामों पर जांच करवाने को मजबूर हैं। सिम्स परिसर से सटकर खुले करीब तीन दर्जन निजी जांच केन्द्रों के मामले में सिम्स की मिलीभगत से इनकार नहीं किया सकता। इन जांच केन्द्रों के मामले में आपने भी पता नहीं क्यों आंखें मूंद रखी हैं। सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, एक्सरे व पैथालॉजी जैसी जांच के लिए मरीजों को भटकना पड़ रहा है। कमीशन के खेल तथा 'ऊपर की कमाई' के चक्कर में चिकित्सक एवं नर्सिंग स्टाफ द्वारा मरीजों से दुर्व्यवहार करने की शिकायतें तो यहां आम हैं। सिम्स के अधिकतर चिकित्सक नॉन प्रेक्टिस एलाउंस इसलिए नहीं लेते क्योंकि वे ऐसा करेंगे तो फिर सिम्स के समानांतर न तो अपने घर में क्लीनिक खोल पाएंगे और न ही वहां मरीजों को पाएंगे। मामला ज्यादा कमाने का है, लिहाजा, एलाउंस की छोटी राशि ठुकरा कर क्लीनिक को ज्यादा तरजीह दी जा रहा है। यह बात मरीजों के इलाज में भी झलकती है। डाक्टरों को 'भगवान' के समकक्ष माना जाता है, लेकिन सिम्स के 'भगवान' की नजर मरीज के मर्ज की बजाय उसकी जेब पर ज्यादा है। प्रयास यही रहता है कि मरीज उनके घर वाले क्लीनिक पर आए।
 सिम्स के ऐसे हालात बनने के पीछे दो ही मुख्य कारण माने जा सकते हैं। या तो सिम्स प्रबंधन आपको नजरअंदाज करता है। आपकी बात मानता नहीं है। आपके आदेशों की अवहेलना करता है।  दूसरा यह है कि आप इसमें दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं। दिलचस्पी न लेने की बात समझ में इसीलिए नहीं आती, क्योंकि अगर ऐसा होता तो फिर आप शिकायत केन्द्र खोलते ही क्यों? जाहिर है सिम्स प्रबंधन आपको गंभीरता से कतई नहीं ले रहा है। शनिवार को एक मरीज की मौत के कारण हुए हंगामे के बाद सिम्स में तैनात एक नर्स द्वारा की गई टिप्पणी 'आपने मंत्री को फोन किया तो उनसे ही ठीक करवाएं' से समझा जा सकता है।
बहरहाल, सिम्स प्रबंधन द्वारा मनमर्जी से काम करना मामले का एक पक्ष हो सकता है लेकिन विभाग आपके ही अधीन है। अगर सिम्स के मौजूदा ढर्रे में बदलाव नहीं आता है तो यह आपका उत्तरदायित्व बनता है कि आप उनको जिम्मेदारी का एहसास कराएं। जन शिकायत केन्द्र खोलने का मकसद लोगों को 'राहत'   देना हो सकता है लेकिन स्वास्थ्य मंत्री होने के साथ-साथ स्थानीय विधायक होने के नाते बीमार शहर के इलाज की जिम्मेदारी भी तो आपकी ही बनती है। सिम्स में रोजाना हंगामे और विवाद की वजह बनने वाले कारणों को ढूंढने और दोषियों को बाहर का रास्ता दिखाने में अब देरी नहीं होनी चाहिए। मामले में थोड़ी सी भी देरी अब किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। आखिर सब्र की भी एक सीमा होती है। ऐसा न हो उसकी इंतहा हो जाए।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 15 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।



Thursday, January 12, 2012

दुआओं और प्रार्थनाओं का दौर

शहंशाहे गजल के नाम से विख्यात मेहदी हसन की हालत नाजुक है और वे आईसीयू में भर्ती है। हसन पिछले 12 साल से फेफड़ों में संक्रमण से जूझ रहे हैं लेकिन उनके समाचार कभी-कभार ही आते हैं। करीब साढ़े तीन साल पहले जुलाई 2008 में भी उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर समाचार-पत्रों की सुर्खियां बनी थी। हसन इलाज के लिए भारत आना चाहते हैं, लेकिन सफर में उनका स्वास्थ्य बिगड़ने का खतरा है, लिहाजा, चिकित्सकों ने उनको कहीं आने-जाने पर रोक लगा रखी है। पिछले ढाई साल से तो हसन ट्‌यूब की जरिये ही खा पी रहे हैं। एक माह से तो वे बोल भी नहीं पा रहे हैं।
दरअसल, हसन के भारत आने  का मकसद अकेला इलाज ही नहीं है बल्कि मातृभूमि का प्रेम भी है। जैसा कि अक्सर होता है व्यक्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव में मातृभूमि की याद जरूर आती है। यह मातृभूमि से लगाव का ही परिणाम है कि हसन  विभाजन के बाद भारत के बाद पाकिस्तान चले गए लेकिन वे अपनी जड़ों से दूर नहीं हुए। वे करीब तीन-चार बार अपने पुश्तैनी गांव आए। राजस्थान के झुंझुनूं जिले के लूणा गांव में 18 जुलाई 1927 को जन्मे मेहदी हसन के परिवार को गाने-बजाने का शौक विरासत में मिला। झुंझुनूं जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हसन का गांव आजादी से पहले मंडावा ठिकाने के अधीन था। विभाजन के दौरान हसन के परिजन एवं रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए। उनके साथ हसन ने भी भारत छोड़ दिया। दूसरे देश जाने के बाद भी हसन अपनों से दूर नहीं हुए।
लूणा में हसन के परिवार का अब कोई नहीं रहता है। पुश्तैनी मकान का भी कोई अता-पता नहीं है। गांव के स्कूल के बगल में बनी हसन के परिजनों की दो मजार उनकी यादगार के रूप में जरूर मौजूद है। इन मजारों के साथ हसन की याद, इसलिए जुड़ी है क्योंकि इनका  निर्माण स्वयं हसन ने  ही करवाया था।  गांव में मजारों की सार-संभाल करने वाला अब कोई नहीं है। रखरखाव के अभाव में इनके चारों तरफ घास उग आया है। गांव तक पक्की सड़क बनने का श्रेय भी हसन को ही जाता है। वे जब लूणा आए तो उनके सम्मान में गांव तक पक्की सड़क बनी थी। यह भी विडम्बना है कि लूणा के लोग इस शख्सियत पर फक्र तो करते हैं, लेकिन हसन के बारे में उनको ज्यादा जानकारी नहीं है। एक-दो बुजुर्गों की बात छोड़ दें तो वर्तमान में हसन के बारे में विस्तार से बताने वाला भी लूणा में कोई नहीं है।
बहरहाल, मेहदी हसन की बीमारी के साथ एक संयोग भी जुड़ा है। हसन के जब-जब भी बीमार हुए तब-तब उनके कद्रदानों ने उनकी सलामती के लिए दुआ की। उनके हजारों-लाखों दीवाने आज भी उनके स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं। हसन की गजलों का मुरीद हर कोई है। तभी तो उनके स्वस्थ जीवन की कामना के लिए एक तरफ प्रार्थनाओं का दौर है तो दुआ मांगने वालों की संख्या भी लाखों में है। छोटे से गांव से निकलकर इस फनकार ने प्रसिद्धि के उस फलक को छुआ जिस पर मादरे वतन के साथ जन्मभूमि के लोगों को गर्व की अनुभूति होती है।

Monday, January 9, 2012

परहित सरिस धर्म नहीं भाई...


टिप्पणी

सीमित संसाधनों में बेहतर व्यवस्था बनाने और आशातीत परिणाम हासिल करने के उदाहरण कम ही मिलते हैं। अमूनन देखा गया है कि पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद न तो परिणाम आशानुकूल आते हैं और न ही व्यवस्था ठीक प्रकार से हो पाती है। रविवार को हुई शिक्षक पात्रता परीक्षा को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। बिलासपुर जिला मुख्यालय पर सभी तरह की सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन परीक्षार्थियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। प्रशासनिक स्तर पर की गई तमाम व्यवस्थाएं ऊंट के मुंह में जीरे के समान साबित हुई। दूरदराज इलाकों से आए परीक्षार्थी शनिवार शाम को ही बिलासपुर पहुंच गए थे, लेकिन ठहरने के लिए माकूल बंदोबस्त न होने के कारण वे इधर-उधर भटकते रहे। कइयों की रात तो आंखों में गुजरी। सर्दी में ठिठुरते परीक्षार्थियों पर न तो प्रशासनिक अधिकारियों का दिल पसीजा और न ही समाज सेवा का दंभ भरने वाले तथाकथित संगठन दिखाई दिए। वैसे भी बिलासपुर में परीक्षा को प्रशासनिक अधिकारियों ने गंभीरता से लिया ही नहीं वरना ऐसे हालात पैदा ही नहीं होते। राज्य के दूसरे जिलों में बिलासपुर के मुकाबले बेहतर व्यवस्था कैसे हो गई। जाहिर है वहां सुनियोजित तरीके से कार्ययोजना बनाकर काम किया गया, जिसके परिणाम भी सकारात्मक आए। बिलासपुर की प्रशासनिक व्यवस्था एवं तथाकथित स्वयंसेवी संगठनों से लाख गुना बेहतर तो पेण्ड्रा-बिल्हा जैसे छोटे-छोटे कस्बों का प्रशासन, वहां की स्वयंसेवी संस्थाएं हैं तथा वहां पुरुषार्थी लोग हैं, जिन्होंने पराये दर्द को अपना समझा।
हाल में बने नए जिले मुंगेली के लोगों ने भी परीक्षार्थियों की पीड़ा कम करने का प्रयास किया। सेवाभावी लोगों ने परीक्षार्थियों की अपने सामर्थ्य के अनुसार खुले दिल से मदद की। किसी ने भटकते परीक्षार्थी को सेंटर बताने का काम किया तो किसी ने सर्दी में ठिठुरतों के लिए रात को अलाव के लिए लकड़ियों की व्यवस्था की। इतना ही नहीं कइयों ने परीक्षार्थियों को अपने घर में भोजन कराया तो कुछ ऐसे भी जिन्होंने सामूहिक भोजन की व्यवस्था की।
भौतिकवादी युग की भागदौड़ एवं तनावभरी जिंदगी में जब रिश्ते नाते तार-तार हो रहे हैं। अपने ही अपनों के दुश्मन हो रहे हैं। दिलों से अपनापन गायब हो रहा है। लोग खुद तक सीमित हो गए हैं। ऐसे हालात में पेण्ड्रा, बिल्हा एवं मुंगेली के लोगों ने वाकई सराहनीय एवं अनुकरणीय काम कर दिखाया है। ऐसे समाजसेवी-सेवाभावी संगठन एवं लोग वाकई बधाई के पात्र हैं। इन सेवाभावी लोगों ने साबित कर दिखाया हैकि आदमी ठान ले तो मुश्किल कुछ भी नहीं, बस सोच बड़ी होनी चाहिए। निसंदेह इन लोगों ने समाजसेवा एवं इंसानियत की नई इबारत लिखी है, जो लम्बे समय तक आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा देने का काम करेगी। बहरहाल, पिछली बार भी हुई शिक्षाकर्मी भर्ती परीक्षा में बिलासपुर पहुंचे परीक्षार्थियों को कुछ इसी की तरह परेशानी का सामना करना पड़ा लेकिन प्रशासन ने उससे सबक नहीं लिया। छोटे कस्बों के लोगों ने जिस तरह जिंदादिली दिखाते हुए पुरुषार्थ एवं परोपकार का काम किया उससे न केवल बिलासपुर के प्रशासनिक अधिकारियों बल्कि तथाकथित संगठनों को भी सीख लेनी चाहिए।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 09जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।


Friday, January 6, 2012

शहर हित में निर्णय लेना जरूरी


खुला पत्र


यशवंत कुमार,
आयुक्त,नगर निगम,
बिलासपुर।

सड़क निर्माण के मामले में आखिरकार माननीय हाईकोर्ट की फटकार के बाद आपको भी इस बात का अहसास तो हो ही गया कि शहरवासी लम्बे समय से यूं ही शिकायत नहीं कर रहे थे।  बावजूद इसके सिम्पलेक्स कंपनी के नुमाइंदों तथा आपके मातहतों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। पता नहीं किस नींद में गाफिल थे। अब गड़बड़ी करने पर एफआईआर दर्ज होने लगी है तथा माननीय हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए निर्देश दिए हैं तो होश ठिकाने आ रहे हैं। सीवरेज मामले में आप भले ही नए सिरे से फटकार लगाएं, जुर्माना करें या नोटिस दें, लेकिन सिम्पलेक्स कंपनी ने पता नहीं क्यों, आपको कभी गंभीरता से नहीं लिया। नोटिस एवं जुर्माना तो आप पहले भी लगा चुके हैं, लेकिन उनका परिणाम क्या हुआ, आप भी जानते हैं। मौजूदा हालत से तो यही लगता है कि सिम्पलेक्स कंपनी के नुमाइंदों के साथ-साथ आपके मातहतों ने भी अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीके से नहीं किया। जिस निरीक्षण की बात आप अब कर रहे हैं, क्या वह पहले नहीं हुआ? अगर हुआ तो फिर गड़बड़ क्यों हुई? और निरीक्षण नहीं हुआ तो आपके मातहत किस काम में मशगूल थे। उनको अभयदान क्यों दे दिया गया। यह आपके मातहतों की उदासीनता का ही परिणाम है कि सीवरेज परियोजना का काम किसी भी स्तर पर व्यवस्थित दिखाई नहीं देता है। सारा काम बिखरा पड़ा है। निर्धारित के बाद अतिरिक्त समय भी गुजर गया लेकिन कंपनी के पास ठोस कार्ययोजना दिखाई नहीं देती। आलम यह है कि कहीं जरूरत से ज्यादा तत्परता दिखाई जा रही है तो कहीं पर सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
इस मामले में यह अच्छी बात है कि आपने माननीय हाईकोर्ट की फटकार के बाद संबंधित कंपनी एवं अपने मातहतों को सड़कों की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान देने को कहा है। वैसे यह काम भी शुरू से ही हो जाना चाहिए था, लेकिन आपके मातहत शहरवासियों की पीड़ा सुनने की जगह सिम्पलेक्स की हां में हां मिलाते ज्यादा दिखाई दिए। कई बार तो आपके मातहतों की भूमिका से ऐसा लगा जैसे वे जनसेवक न होकर सिम्पलेक्स के लिए काम कर रहे हैं। सड़कों में घटिया निर्माण सामग्री की जांच करवाई गई लेकिन जांच रिपोर्ट आने तक सड़कें बनने का काम बदस्तूर जारी रहा। जांच रिपोर्ट में गड़बड़ी की आशंका थी (जो बाद में उजागर भी हुई) लेकिन आपके मातहतों ने काम बंद होने नहीं दिया।  सिम्पलेक्स कंपनी के प्रति आपके मातहतों का यही विशेष लगाव तो मामले को संदिग्ध बनाता है। दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए जरूरी है आप इसकी अपने स्तर पर जांच करवाएं।
सड़कों की गुणवत्ता के बाद सबसे गंभीर एवं बड़ी समस्या काम धीमी गति से होना भी है। शहर में कई जगह ऐसी हैं, जहां गड्‌ढे खोदने के बाद उनकी खैर-खबर नहीं ली गई। ज्यादा नहीं तो आप लम्बे समय से खुदे गड्‌ढों को बिना किसी राजनीति व हस्तक्षेप के प्राथमिकता के साथ तत्काल भरवाने का काम करवा दीजिए। यकीन मानिए शहरवासी आपके  आभारी रहेंगे।  काम की निगरानी भी आप स्वयं करें ताकि संबंधित कंपनी के साथ-साथ आपके मातहतों में भी भय रहे। आप अगर वातानुकूलित कक्ष में बैठकर मातहतों के भरोसे रहे तो फिर अनुकूल परिणामों की आशा भी  न करें। क्योंकि  भविष्य में कुछ गड़बड़ होती है तो अधिकारी होने के नाते जिम्मेदारी भी आप पर आएगी। उम्मीद की जानी चाहिए आप सीवरेज मामले के 'घालमेल'  और 'तालमेल' को समझते हुए अपने विवेक से शहर हित में निर्णय लेंगे।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 06  जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।








Wednesday, January 4, 2012

सब गोलमाल


टिप्पणी

सीवरेज परियोजना भले ही पूर्ण होने के बाद (जैसा कि दावा किया जा रहा है) राहत दे, लेकिन वर्तमान में बिलासपुर के लिए इससे बड़ी समस्या और कोई नहीं है। दावों पर भी यकीन इसलिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि योजना की सफलता एवं परिणामों पर अभी से सवाल उठाए जा रहे हैं। स्वयं महापौर तक यह कह चुकी हैं कि परियोजना के बेहतर परिणाम नहीं आएंगे। खैर, परिणाम एवं सफलता तो भविष्य के गर्भ में हैं लेकिन मौजूदा समय में शहर का हाल गांव से भी बदतर है। जिधर देखो उधर रास्ते खुदे हुए हैं। सड़कों का तो नामोनिशान तक मिट चुका है। प्रमुख मागोर्ं पर पसरे कीचड़ एवं दलदल ने तो शहर की तस्वीर बिगाड़ रखी है। वाहनों की छोड़िए पैदल निकलना भी टेढी खीर है। कई जगह तो आवाजाही तक बंद हो गई है। घटिया निर्माण सामग्री से बनी सड़कें बारिश के बाद 'सच' बयान कर रही हैं। आलम देखिए हफ्तेभर पहले बनी हुई सड़कें भी धंस रही हैं। घटिया निर्माण सामग्री को लेकर बीच-बीच में हो हल्ला भी मचा लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। हल्ला मचाने वाले पता नहीं किस दवाब या प्रलोभन के चलते लम्बे समय तक 'रहस्यमयी चुप्पी' साध लेते हैं या फिर यकायक'अज्ञातवास' पर चले जाते हैं। तभी तो घटिया निर्माण सामग्री लगाकर सड़कें बनाने वाले, जगह-जगह गड्‌ढ़े खोदकर लोगों की जान से खेलने वालों के हौसले बुलंद हैं। उनको किसी का डर या भय तक नहीं है। यही कारण है कि उनका काम बदस्तूर जारी है।
शहरवासियों के लिए तोहफे के रूप में प्रचारित यह परियोजना देखा जाए तो किसी धोखे से कम नहीं है। जन के साथ माल की हानि हो रही है लेकिन जिम्मेदार अफसर एवं जनप्रतिनिधि गलत को गलत कहने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे हैं। खुले में जिनको डांटा जा रहा है, पर्दे के पीछे उनको गले लगाया जा रहा है। सियासी दांवपेच एवं वोट बैंक बनाने-बिगाड़ने के चक्कर में विकास की रफ्तार थम गई है। हिन्दी साहित्य के श्लेष अलंकार 'नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है...' की तर्ज पर पक्ष-विपक्ष और निगम-सिम्पलेक्स (सीवरेज परियोजना पर काम रही कंपनी) के बीच इतना घालमेल और तालमेल है कि आम आदमी के समझ से बाहर है।
हालात यह हैं कि आम आदमी के दुख-दर्द के बजाय कहां, कब, कैसे  व क्यों  विरोध करना है, इसका खाका पहले से तैयार हो जाता है। विरोध प्रदर्शन से होने वाले नफा-नुकसान का आकलन भी कर लिया जाता है। तभी तो कई बार विरोध प्रदर्शन भी प्रायोजित नजर आता है।  इसी खेल के चलते शहरवासियों की पीड़ा पर्वत सी बनी हुई है।  खैर, सीवरेज परियोजना का काम पूर्ण होने की न केवल निर्धारित अवधि पूर्ण हो चुकी है बल्कि अतिरिक्त समय भी गुजर गया है। परियोजना की लागत भी 250 करोड़ से बढ़कर तीन सौ करोड़ रुपए तक पहुंच गई है जबकि इस परियोजना का अभी तक 40 फीसदी ही काम हुआ है।
बहरहाल, लागत मूल्य बढ़ने तथा अतिरिक्त समय निकलने के बाद इतना तो तय है कि सीवरेज परियोजना के काम में तेजी आएगी। ऐसे में शहरवासियों की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण होगी। वे दूसरों के भरोसे न बैठें तथा सीवरेज के काम पर कड़ी नजर रखें। अगर आज शहरवासियों ने चुप्पी साध ली तो कालांतर में उनको इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। जागो तभी सवेरा की तर्ज पर सीवरेज परियोजना के कामों पर कड़ी नजर रखी जा सकती है, ताकि कोई आपकी आंखों में धूल ना झोंक सके। देखा गया है कि जल्दबाजी के चलते अक्सर गुणवत्ता से समझौता कर लिया जाता है।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 04 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।