Tuesday, September 11, 2012

उचित नहीं अनदेखी

  टिप्पणी

 राज्य के मुखिया मंगलवार को भिलाई आ रहे हैं। मूलभूत सुविधाओं से संबंधित कार्यों का भूमिपूजन करने। काम कब शुरू होंगे, इसका कोई अता-पता नहीं है। न काम शुरू होने की तिथि ना खत्म होने की समय सीमा। लेकिन बड़ी ही होशियारी के साथ सभी कामों की गिनती एवं उनके संभावित खर्चे का आकलन जरूर कर लिया गया है। कुल 70 करोड़ रुपए के 182 कार्यों का भूमिपूजन करेंगे। कार्यों का भूमिपूजन भी अपने आप में अनूठा है। यह बिना वर्क ऑर्डर जारी हुए ही हो रहा है। निगम अधिकारियों की दलील है कि ऐसा सकता है, लेकिन जानकारों को यह खटक रहा है। निगम का इतिहास बता रहा है कि पिछले साल उसने स्वीकृत राशि का केवल 26 प्रतिशत की खर्च किया। सोचा जा सकता है 70 करोड़ कब तक खर्च होंगे। बात इसलिए भी जम रही है क्योंकि 2010 में भी कुछ इसी अंदाज में भूमिपूजन किया गया था। यह काम भी मुख्यमंत्री के कर कमलों से ही सम्पादित हुआ था। कुल 85 करोड़ रुपए के 84 कार्य होने थे। क्या हश्र हुआ उनका, सब जानते हैं। कुछ काम तो अभी तक चल रहे हैं। जो हुए वे गुणवत्ता का रोना रो रहे हैं। आंसू बहा रहे हैं, अपनी बदहाली पर। तभी तो मुख्यमंत्री की यात्रा को लेकर आम आदमी में कोई जोश नहीं है। हो भी कैसे। विकास कार्यों का बानगी और उसका हश्र वह देख चुका है। हर बार वादे एवं आश्वासन ही तो मिले हैं उसको। हुडको तो ज्वलंत उदाहरण है इसका। बुनियादी सुविधाओं के लिए फुटबाल बने हुए हैं, वहां के लोग। देने के लिए भिलाई के लिए बहुत कुछ हो सकता है। संभव है भूमिपूजन कार्यकम में कुछेक की घोषणाएं भी हो जाएं लेकिन घोषणाओं का इतिहास भी उजला नहीं है। भिलाई के लोग तो यही चाहते हैं कि घोषणाओं पर अतीत हावी न हो। वो अपने अंजाम तक पहुंचे। देखा जाए तो राज्य सरकार ने आखिर ऐसा दिया भी क्या है भिलाई को। वैश्विक फलक पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाला तथा खेलों में एक से बढ़कर एक नायाब हीरे देने वाला भिलाई शहर विकास के मामले में राज्य सरकार की मदद का मोहताज ही रहा है। जो पहचान है वह खुद के दम पर ही तो है भिलाई की। आजादी के 65 साल बाद भी शहर में मूलभूत सुविधाओं में विस्तार के कार्य ही हो रहे हैं, कितना हास्यास्पद लगता है यह सब सुनकर। शिक्षानगरी के साथ हमेशा सियासत ही हुई है, वरना करने को बहुत कुछ किया जा सकता है यहां पर।
बहरहाल, प्रदेश के मुखिया अगर भिलाई को लेकर वाकई गंभीर हैं तो वे ऐसा कुछ करें कि उदास एवं नाउम्मीद लोगों में उत्साह का संचार हो। सियासत के मारो के साथ अब और सियासत ना हो। उनको काम चाहिए, घोषणाएं, वादे या भूमिपूजन नहीं। समय के साथ आकार लेते भिलाई में भविष्य की जरूरतों पर अभी से विचार किए जाने की जरूरत है। लगातार अनदेखी उचित नहीं है। जरूरत है भिलाई के दर्द को समझने। मुखिया होने के नाते घोषणाएं करना कोई बड़ी बात नहीं है जरूरत है उनको समय पर अमलीजामा पहनाने की। ऐसा ना हो कि वादे सिर्फ वादे ही रह जाएं और लोग फिर अपने आप को ठगा सा महसूस करें।

साभार- पत्रिका भिलाई के 11 सितम्बर 12 के अंक में प्रकाशित।

Monday, September 10, 2012

हिन्दी इतनी हीन क्यों?



बस यूं ही

 

सोमवार दोपहर को दोनों बच्चे स्कूल से लौट आए थे। धर्मपत्नी जरूरी सामान की खरीदारी के चलते बाजार गई थी, लिहाजा दोनों बच्चों को बस से लेकर मैं ही आया। वैसे ईमानदारी से कहूं तो बच्चों से संबंधित सारे काम धर्मपत्नी ही देखती है। कभी-कभार जरूर कुछ काम कर लेता हूं लेकिन वह भी बच्चों को बस से घर तक लाने का ही होता है। बच्चों को सुबह जगाने, नहलाने एवं तैयार कर स्कूल बस तक
छोड़ने का काम वही करती है। इसके बाद बच्चों को खाना खिलाने तथा उनको गृह कार्य कराने का काम भी वो ही सम्भालती है। दोपहर को बाजार से आने के बाद उसने बड़े बेटे योगराज से रोजाना की तरह स्कूल तथा गृह कार्य के बारे में पूछा। योगराज ने बताया कि मैडम ने हिन्दी का कुछ काम करवाया था लेकिन उसको बैग में अभ्यास पुस्तिका नहीं मिली। धर्मपत्नी ने झुंझलाहट में उसे हल्का सा डांटा तो वह बोला मम्मा अभ्यास पुस्तिका तो बैग के अंदर ही थी लेकिन दूसरी अभ्यास पुस्तिका ऊपर आ जाने के कारण जल्दबाजी में उसे देख नहीं पाया। इस पर मैडम ने दूसरे विषय की अभ्यास पुस्तिका में कुछ नोट लिख दिया। धर्मपत्नी ने उत्सुकतावश योगराज से वह अभ्याय पुस्तिका दिखाने को कहा, तो उसने तत्काल बैग से पुस्तिका को बाहर निकाला और मम्मा को दिखा दी। पुस्तिका पर मैडम का नोट देखकर धर्मपत्नी एकदम अवाक रह गई। वह गुस्से में बड़बडा़ई, यह कैसी त्रासदी है? हिन्दी इतनी हीन क्यों है? धर्मपत्नी के बोल सुनकर मैं एकदम चौंक गया। संयोग से मैं उस वक्त उसी कमरे में छोटे बेटे एकलव्य के साथ कुछ मस्ती कर रहा था।
धर्मपत्नी की गंभीर बातें सुनकर मेरा ध्यान भंग हो गया। ऐसा होना स्वाभाविक था, क्योंकि हिन्दी मेरा सबसे पसंदीदा विषय रहा है और अब भी है। हिन्दी के प्रति लगाव बचपन से ही था। इतना लगाव था कि श्रुतिलेख में भी मास्टरजी शायद की कोई गलती ढूंढ पाते थे। पारिवारिक माहौल बचपन से ही ऐसा था कि पढ़ने के लिए घर में पर्याप्त सामग्री मिली। तभी तो हिन्दी में दसवीं, बारहवीं और बाद में स्नात्तक परीक्षा में अनिवार्य तथा हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक अंक हासिल किए। सच मानिए मुझे हिन्दी से बहुत प्रेम है। दीवारों पर कभी कुछ गलत या अशुद्ध लिखा हुआ देखता हूं तो बड़ी पीड़ा होती है। गुस्सा भी बहुत आता है कि सिर्फ हस्तलेखन सुंदर होने से ही कोई पेंटर थोड़े बन जाता है। शुद्ध लेखन के लिए हिन्दी का ज्ञान तो उसके लिए भी जरूरी है। खैर पुनः विषय वस्तु पर लौटता हूं। मैंने धर्मपत्नी से पूछा आखिर ऐसा क्या हो गया जो हिन्दी के सम्मान में इस तरह का सम्बोधन किया जा रहा है। मेरी बात सुनकर उसने अभ्यास पुस्तिका दिखाते हुए कहा कि ... देखो हिन्दी की मैडम को तो कम से हिन्दी में लिखना चाहिए लेकिन इसने भी अंग्रेजी में ही नोट लगाया है। मैंने कहा, क्या लिखा है ऐसा.. बोली हिन्दी की मैडम ने अंग्रेजी में लिखा है... प्लीज सेंड हिन्दी कॉपी। यह सब जानकार मैं थोड़ा गंभीर हो गया। हिन्दी की मैडम का अंग्रेजी प्रेम देखकर मन में कई तरह के ख्याल आने लगे। और फिर मैं सोच में ही डूब गया। पता नहीं क्या-क्या सोचने लगा...।
सोच रहा था हिन्दी दिवस भी तो इसी सप्ताह आने वाला है 14 सितम्बर को। बचपन से मनाते आए हैं, इसलिए 14 सितम्बर को कैसे भूल सकते हैं। वैसे हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी दिवस के आसपास ही हिन्दी का ज्यादा ख्याल आता है। खैर, बात हिन्दी दिवस की करें तो क्या-क्या नहीं होगा इस दिन। कामकाज हिन्दी में करने के संकल्प लिए जाएंगे। खूब शपथ ली जाएगी। हिन्दी के लिए जनजागरण विषयक रैलियां निकलेंगी। वाद-विवाद, निबंध और भी न जाने कितने ही आयोजन-प्रयोजन होंगे हिन्दी के नाम पर। लब्बोलुआब यह है कि इस दिन हिन्दी का खूब गुणगान होगा। महिमा बतार्इ जाएगी, चौक चौराहों पर बैनर टगेंगे। होर्डिंग्स लगेंगे। बाद में साल भर यही होर्डिंग्स हिन्दी की अहिन्दी करते हैं। अपनी बदहाली पर आंसू बहाते हैं। कोई हटाता भी नहीं तो कोई ठीक भी नहीं करता इनको। रह-रहकर मेरे कानों में धर्मपत्नी के बोल गूंज रहे थे...। यह कैसी त्रासदी है? हिन्दी इतनी हीन क्यों है? यह कैसी त्रासदी है? हिन्दी इतनी हीन क्यों है? सचमुच एक दिन विशेष में कैद करके हमने हिन्दी को हीन नहीं तो और क्या बनाया है। दिन विशेष में कैद करके से उसकी महत्ता व विशेषताओं को एक दायरे में कैद ही तो कर दिया है हमने। हिन्दी के लिए एक दिन तय करने के पीछे सभी के पास अपने-अपने तर्क होंगे लेकिन मैं इससे न तो सहमत हूं और ना ही इसका पक्षधर हूं। मेरे हिसाब से तो हिन्दी की महिमा साल भर गाई जाए तो भी कम है। और अगर हम हिन्दी दिवस की दिन करने वाला गुणगान रोजाना करना शुरू कर दें तो यकीन मानिए हमारी हिन्दी सिरमौर होगी।

Saturday, September 8, 2012

नींव के असली पत्थर

प्रसंगवश

हाल ही में बेमेतरा जिले के कुमारी देवी चौबे शासकीय स्कूल, देवरबीजा में पदस्थ अध्यापक टीकाराम साहू का स्थानांतरण विद्यार्थियों को इतना नागवार गुजरा कि वे बेहद आक्रोशित हो गए। विद्यार्थी इतने गुस्से में थे कि अपने प्रिय अध्यापक का तबादला रुकवाने के लिए २१ किलोमीटर पैदल चलकर जिला मुख्यालय तक पहुंच गए और प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर ही दम लिया। शिक्षक के प्रति विद्यार्थियों का इतना लगाव यूं ही या यकायक पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसमें शिक्षक की लम्बी साधना, सकारात्मक सोच, मेहनत एवं दूरदृष्टि का प्रमुख योगदान रहा है। पुत्री के आकस्मिक निधन के बाद साहू की जिंदगी की दिशा ही बदल गई। पुत्री की स्मृति में उन्होंने नौ लाख रुपए खर्च करके स्कूल भवन बनवाया। यह राशि जुटाने के लिए उन्होंने अपना घर तक बेच दिया। गरीब बच्चों के लिए तो वे भगवान से कम नहीं। उनकी पढ़ाई का समस्त खर्चा भी वे अपनी जेब से वहन कर रहे थे। इस प्रकार विद्यार्थियों को अपने बच्चों तथा विद्यालय को परिवार की तरह मानने वाले शिक्षक का तबादला अखरना स्वाभाविक भी था। इसी जिले का एक और उदाहरण है, जो गुरु-शिष्य के संबंध को प्रगाढ़ करने की मिसाल पेश करता है। ग्राम बिलाई के शासकीय स्कूल में मध्यान्ह भोजन के बाद बच्चे एक-एक कर बेहोश होने लगे। उनको तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया। गया। यह सिलसिला दूसरे दिन भी चला। मासूमों की हालत देखकर स्कूल में कार्यरत शिक्षाकर्मी निराकार पाण्डे इतने व्यथित हुए कि वे दो दिन तक बिना कुछ खाए सिर्फ चाय-पानी के सहारे बच्चों की सेवा सुश्रुषा में जुटे रहे। विद्यार्थियों के ठीक होने तथा सकुशल होकर घर लौटने के बाद ही पाण्डे अपने घर गए। उक्त दोनों घटनाक्रम यह साबित करने के लिए काफी हैं कि प्रतिस्पर्धा भरी जिंदगी के बावजूद आज भी ऐसे शिक्षक हैं, जो अपने गुरुतर धर्म का निर्वहन ईमानदारी के साथ कर रहे हैं। ऐसे ही लोग हैं, जो शिक्षा जगत में आ रही गिरावट को रोकने के लिए चट्‌टान की तरह अडिग खड़े हैं तथा प्रतिकूल हालात के बावजूद शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। दोनों शिक्षक न केवल अपने पेशे को गौरवान्वित कर रहे हैं बल्कि मानवता एवं इंसानियत के सच्चे सेवक की भूमिका भी बखूबी निभा रहे हैं। वाकई साहू और पाण्डे का विद्यार्थियों के प्रति स्नेह एवं समर्पण अपने आप में जीती जागती नजीर है। अपने मूल्यों एवं आदर्शों से समझौता किए बगैर सरस्वती के मंदिरों में शिक्षा की लौ प्रज्वलित करने वाले ऐसे गुरुओं से बाकी शिक्षकों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।
बहरहाल, अर्थ प्रधान एवं भागदौड़ भरी जिंदगी में सब कुछ बदल गया है। गुरु-शिष्य के संबंध भी इससे अछूते नहीं है। मौजूदा दौर में तो गुरु-शिष्य संबंधों की मिसाल देने के लिए उदाहरण तक का अकाल पड़ जाता है। इस काम के लिए अब भी प्राचीन काल के गुरुओं एवं शिष्यों के नाम गिनाए जाते हैं। शिक्षक दिवस पर राज्य स्तर पर सम्मानित होने वाले शिक्षकों की सूची में साहू एवं पाण्डे जैसे अध्यापकों के नाम न होना वाकई किसी अचम्भे से कम नहीं है। देखा जाए तो शिक्षक सम्मान के वास्तविक हकदार तो ऐसे ही लोग हैं, एकदम नींव के असली पत्थर हैं। शासन-प्रशासन ऐसे शिक्षकों को नजरअंदाज करते रहे तो फिर शिक्षा के मूल्यों एवं आदर्शों को पुनर्स्थापित करने का सपना पूरा कैसे हो पाएगा।
 
साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 08  सितम्बर 12  के अंक में प्रकाशित।

Thursday, September 6, 2012

इधर भी तो देख लीजिए...


 टिप्पणी


माननीय, एस. चंद्रशेकरन जी
सीईओ, भिलाई स्टील प्लांट।

आपने ऐसे समय में सीईओ का दायित्व संभाला है, जब भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) को रिकॉर्ड दसवीं बार प्रधानमंत्री ट्रॉफी से नवाजा गया है। यह ट्रॉफी क्यों व कैसे मिलती है, यह बात  भले ही आमजन के लिए जिज्ञासा भरी हो, लेकिन आप इससे अनजान नहीं हैं। बतौर मुखिया
होने के नाते आपको तथा आपके मातहतों के लिए प्रधानमंत्री ट्रॉफी मिलना गर्व एवं खुशी की बात है, लेकिन यह खुशी उस मोर के जैसी है, जो अपने पंखों को देखकर इतराता है, खुश होता है और नाचता है लेकिन जब वह अपने पैरों को देखता है तो रोने लगता है। बीएसपी के हालात भी कमोबेश उस मोर के जैसे ही हैं। यहां आने वालों को सिर्फ वही दिखता है, जो उनको दिखाया जाता है। चाहे वह प्रधानमंत्री ट्रॉफी के सिलसिले में यहां आने वाली टीम हो या फिर आप जैसे मुखिया। इन सब के लिए एक दायरा बना दिया गया है। यहां आने वाले बस उसी दायरे में सिमट कर जाते हैं। अफसर एवं आम बीएसपीकर्मी के बीच एक अजीब सी लक्ष्मण रेखा खींच दी जाती है। एक पक्ष मजबूरी के चलते तो दूसरा पक्ष दायरे में सिमटने के कारण एक दूसरे के नजदीक नहीं आ पाता और सच हमेशा छिपा हुआ ही रह जाता है। इसमें दोष आपका नहीं, इस कुर्सी का एवं इसके आभामंडल का है।
अब देखिए ना, आपसे आसानी से मिलना आम बीएसपीकर्मी के लिए तो सपने जैसा ही है। आप तक पहुंचने के लिए कितने चरणों से होकर गुजरना पड़ता है उसको। इतनी चाक चौबंद सुरक्षा है कि माशाअल्लाह परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इतने बड़े पद के लिए ऐसी सुरक्षा लाजिमी भी है लेकिन जेहन में टाउनशिप की सुरक्षा व्यवस्था का ख्याल भी तो जरूरी है। कौन यहां कब और क्यों आ-जा रहा है, इसकी खबर कोई नहीं रख रहा है। आपके मातहत बेफिक्र हैं। कायदे कानून ताक पर रखकर बीएसपी के आवास आम आदमी को किराये पर आसानी से सुलभ हो रहे हैं। किरायेदार कौन है, कहां से आया है, क्या पृष्ठभूमि है, इस बात की जरा सी भी पूछ परख नहीं होती। कई जगह तो प्रकाश व्यवस्था भी बदहाल है। बिलकुल घुप अंधेरा पसरा रहता है। ऐसे में किसी अनहोनी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
खैर, बात अकेली सुरक्षा व्यवस्था की नहीं है। बीएसपी के टाउनशिप इलाके में कई समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। बुनियादी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हो पा रही हैं यहां रहने वालों को। कई जगह तो सड़कें ही नहीं बन पाई हैं। बीएसपी की चिकित्सा व्यवस्था स्टाफ एवं संसाधनों के अभाव में खुद बीमार होने के कगार पर है। आपने ही बताया कि सेलम में एक हजार कर्मचारियों पर मेडिकल सुविधाओं के लिए करीब आठ करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन बीएसपी के कर्मचारियों व उनके परिजनों पर खर्च होने वाली राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। सबसे बड़ी समस्या तो आवासों की है। टाउनशिप के आवास इतने जर्जर हो चुके हैं कि उनमें घास तक उग गई है। आवासों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं। उनसे टपकता बारिश का पानी एवं रोज-रोज उखड़ता प्लास्टर यकीनन इनमें रहने वालों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। रोज भगवान से अपनी सलामती की दुआ मांगते हैं यहां के लोग। जितना डर प्लांट में जाते नहीं लगता उससे कहीं ज्यादा इन आवासों में रात बिताते लगता है। इतना ही नहीं बीएसपी की जमीन एवं आवासों पर रसूखदारों का कब्जा है। आपके मातहतों में इतनी इच्छाशक्ति नहीं कि उनको यहां से बेदखल कर दें। ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि आपके कई मातहत बलात कब्जे एवं अतिक्रमण करने के खेल में शामिल होने के आरोपों से घिरे हुए हैं। उनको बीएसपी के हित से बड़ा खुद का हित नजर आता है। श्रमिकों की भलाई की दुहाई देने वाले संगठन एवं यूनियनें भी इस मामले में खामोश हैं। उनका बीच-बीच में बोलकर अचानक चुप हो जाना भी संदेह को जन्म देता है।
बहरहाल, बीएसपी का उत्पादन बढ़ाना अपने आप में बड़ी बात व उपलब्धि है लेकिन किसकी कीमत पर? उत्पादन बढ़ाने में योगदान देने वालों को लम्बे समय तक उपेक्षित नहीं किया जा सकता है। आखिर असली मेहनत भी तो उन्हीं की है। प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उल्लेखनीय प्रदर्शन व बेहतर परिणाम देने वालों  की खैर-खबर लेना निहायत जरूरी भी है। मुखिया होने के नाते प्लांट की तरह टाउनशिप इलाके के स्कूल, अस्पताल, बिजली, पानी, सफाई, आवास, पार्क, मैदान आदि का हाल देखेंगे तो आप माजरा समझ जाएंगे। निरीक्षण भी आप बिना बताए अपने स्तर पर आकस्मिक करेंगे तो ही आप अपने मातहतों की कारगुजारियों तथा असलियत को भली प्रकार से जान पाएंगे। इसके अलावा आप बीएसपी कर्मचारियों के साथ माह में बार सीधा संवाद रखने जैसा कोई कार्यक्रम भी रख सकते हैं, ताकि सही एवं निष्पक्ष फीडबैक आप तक पहुंच सके। समय-समय पर औचक निरीक्षण एवं सीधा संवाद रखने का काम ईमानदारी से कर लिया तो यकीन मानिए न केवल बीएसपीकर्मियों बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आप बहुत ही बड़ा काम कर जाएंगे। वरना अन्य मुखियाओं की तरह सूची में आपका नाम जुड़ना तो वैसे भी तय है।
 
साभार - पत्रिका भिलाई के 06 सितम्बर 12  के अंक में प्रकाशित।

Saturday, September 1, 2012

दूध की दर में अंतर क्यों

प्रसंगवश

भिलाई में दूध उत्पादक पशुपालक संघ ने दूध के दामों में पांच रुपए की वृद्धि करने की घोषणा की है। नई वृद्धि के बाद गाय का दूध 30 के बदले 35 तथा भैंस का दूध 32 की जगह 37 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से मिलेगा। वृद्धि की दर एक सितम्बर से लागू हो रही है। दरों में बढ़ोतरी के पीछे तर्क दि

या जा रहा है कि दिनोदिन आसमान छूती महंगाई के कारण पशुओं का चारा व पशु आहार महंगा हो गया है। दूध की वर्तमान कीमत से पशुपालकों की लागत वसूल नहीं हो पा रही है। ऐसे में उनके समक्ष परिवार के भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है। दूध के दामों में हुई इस बढ़ोतरी ने निसंदेह उपभोक्ता की चिंता भी बढ़ा दी है। उपभोक्ताओं में चिंता केवल भावों में वृद्धि के लिए ही नहीं बल्कि दूध की अलग-अलग कीमतों को लेकर भी है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि महंगाई का असर क्या उन पर नहीं होता, जो दूध को 30 रुपए प्रति लीटर से भी कम के हिसाब से बेच रहे हैं। और अगर कोई फर्क पड़ता है तो फिर यह लोग इतना सस्ता दूध कैसे व क्यों दे रहे हैं। आखिर ऐसा क्या है कि एक तरफ ३० रुपए प्रति लीटर से भी कम के हिसाब से देने वाला भी कमा रहा है जबकि दूसरी ओर 30 रुपए से ज्यादा लेने वाले के भी पूरे नहीं पड़ रहे हैं। यकीन मानिए दरों में असमानता से इस बात को बल मिलता है कि कहीं न कहीं गड़बड़ तो जरूर है। और स्वास्थ्य से सरासर खिलवाड़ भी। इतना कुछ होने के बाद भी प्रशासन अपनी भूमिका भूलकर खामोश है। और एकदम उदासीन भी। एक ही शहर में दूध अलग-अलग कीमतों पर बिक रहा हैं। खुले दूध की बिक्री के इस तरह भिन्न-भिन्न भाव शायद ही किसी ने देखे या सुने हो लेकिन भिलाई में यह सब हो रहा है।
हां इतना जरूर है कि पैंकिंग के दूध के भाव अलग होते हैं, वह भी इसलिए क्योंकि उस दूध की गुणवत्ता में अंतर होता है और यह बात पैकेट के ऊपर लिखी भी होती है लेकिन खुले दूध की क्या गारंटी कि वह गुणवत्ता पर कितना खरा है? पिछले साल बिलासपुर शहर में भी दूध के दामों में इसी तरह से वृद्धि कर दी गई थी। दूध विक्रेताओं के एक धड़े ने भाव बढ़ाए जबकि बाकी उसके समर्थन में नहीं थे। काफी विरोध के बाद प्रशासन को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा और बिलासपुर के इतिहास में पहली बार दूध के भाव प्रशासन की मौजूदगी में लिखित में तय हुए। दूध के भावों को लेकर कमोबेश वैसे ही हालात भिलाई के हैं। ऐसे में प्रशासन को सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है। बाजार में बिक रहा खुला दूध कितना शुद्ध है, कितना गुणवत्तायुक्त है, इस बात को जांचे हुए तो मुद्‌दत हो गई है।
बहरहाल, प्रशासन को सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस मामले का कोई सर्वमान्य हल निकालना्र चाहिए। एक ऐसा हल जिससे किसी भी पक्ष को किसी तरह का नुकसान न हो। अगर प्रशासन ऐसा नहीं कर पाया तो फिर अकेला दूध ही नहीं कल को कोई भी अपनी मर्जी के हिसाब से भाव तय करके कुछ भी बेचने लगेगा। मामला जनहित ही नहीं स्वास्थ्य से भी जुड़ा है। इसलिए प्रशासन को मामले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रशासनिक स्तर पर दूध की शुद्धता व गुणवत्ता मापने के लिए बड़े पैमाने पर कोई अभियान चलाया जाता है तो फिर कहना ही क्या।
 
साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 01 सितम्बर 12 के अंक में प्रकाशित।

Friday, August 31, 2012

...ताकि कष्टप्रद ना हो अंतिम सफर

जो आया है, वह एक दिन जाएगा। यही जिंदगी की कड़वी हकीकत है। बावजूद इसके लोग इस हकीकत को दरकिनार करने से बाज नहीं आते। स्वतंत्रता सेनानी बालाराम जोशी के अंतिम संस्कार से पहले जब उनकी अंतिम यात्रा दुर्ग की शिवनाथ मुक्तिधाम की इस टूटी-फूटी सड़क से होकर गुजरी तो विकास के नारे बेमानी से लगे। अंतिम यात्रा में शामिल लोगों को यह तो यकीन हो गया कि मुक्तिधाम की यह सड़क भी ऐसे ही लोगों ने बनाई है, जिन्होंने अपना जमीर बेचकर जिंदगी के इस सच को नजरअंदाज किया। सड़क पर बने बड़े-बड़े गड्‌ढ़े और उनमें भरा कीचड़ यह बताने के लिए काफी है कि इसके निर्माण में किस तरह की गफलत की गई है। कितनी दिक्कत होती है यहां से गुजरने वालों को। अकेले आदमी को भी एहतियातन यहां से गुजरते हुए सावधानी बरतनी पड़ती है। अर्थी लेकर चलने वाले कैसे गुजरते होंगे यहां से, समझा जा सकता है। इसके लिए जिम्मेदार सिर्फ शासन-प्रशासन एवं जनप्रतिनिधि ही नहीं है। हम सब भी हैं। ऐसे हालात क्यों बने, हम कभी सोचते नहीं हैं। हम केवल उसी वक्त व्यवस्था को कोसते हैं, जब इस मार्ग से गुजरते हैं। हमको तकलीफ भी उसी वक्त होती है। उसके बाद हम भूल जाते हैं। हम बात-बात पर रास्ता रोकते हैं, हंगामा खड़ा करते हैं। तोड़फोड़ पर उतारू हो जाते हैं। फिर इस बात के लिए अपनी आवाज बुलंद क्यों नहीं करते। इस जगह देर सबेर हम सभी को आना है। पहल करने बाहर से कोई नहीं आएगा। शुरुआत खुद से ही करनी होगी। इस विषय में सोचना और कोई उचित निर्णय जरूर लेना ताकि जैसा आज स्वतंत्रता सेनानी बालाराम जोशी की अंतिम यात्रा के दौरान हुआ कल किसी और के साथ न हो। इस बहाने सड़क सुधारने के लिए अगर शासन-प्रशासन या जनप्रतितिनिधियों की तरफ से कोई सार्थक प्रयास होते हैं तो निसंदेह स्वतंत्रता सेनानी बालाराम जोशी को एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी, ताकि किसी का अंतिम सफर इस प्रकार कष्टदायी ना बने।

साभार : भिलाई पत्रिका के 31 अगस्त 12 के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, August 28, 2012

...क्योंकि मैं एक सड़क हूं

(सड़क की कहानी, उसी की जुबानी)

टिप्पणी 

बनना और टूटना मेरी फितरत है। मैं बनती हूं, टूटती हूं। फिर बनती हूं और फिर टूट जाती हूं।... क्योंकि मैं एक सड़क हूं। यह सिलसिला चलता रहता है। लगातार, निरतंर और बदस्तूर। तभी तो टूटने का क्रम कभी रुकता नहीं है, थमता नहीं है। अनवरत चलता ही रहता है बिना थके। मेरे साथ विडम्बना यह जुड़ी
है कि मैं बनती देर से हूं लेकिन उखड़ बहुत जल्दी जाती हूं। मेरे उखड़ने से भले ही कोई दुर्घटनाग्रस्त हो। कोई चलते-चलते ठोकर खाए। हाथ-पैर तुड़वाए, मेरे बाप का क्या जाता है। मुझे घुट्‌टी भी इसी बात की पिलाई जाती है। क्या सांप काटना छोड़ सकता है। क्या कुत्ता भौंकना छोड़ सकता है। तो मैं अपना स्वभाव कैसे छोड़ दूं। मौसम बदल जाते हैं। हालात बदल जाते हैं। और तो और सरकारें भी बदल जाती हैं लेकिन मेरा टूटना या उखड़ना कभी बंद नहीं होता। हो भी कैसे ..क्योंकि मैं एक सड़क हूं। जगह कोई भी हो, मेरी जैसी कहानी मेरी सभी बहनों की है। तभी तो हमारे बनने-बिगड़ने का गणित सभी जगह कमोबेश एक जैसा ही है। सरकार किसी की भी हो। सत्ता में कोई भी बैठा हो। क्या फर्क पड़ता है उससे। टूटने का सिलसिला तो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। आजादी के बाद से ही। उस परम्परा को भला कैसे छोड़ दूं। समाज के नियमों को कैसे तोड़ दूं। मैं जब टूटती हूं तो ठाले-बैठे विपक्षी दलों को एक जोरदार मुद्‌दा जरूर मिल जाता है। विरोध करने का। मेरा नाम लेकर कइयों के भाग्य बन गए और अभी तो कइयों के बनेंगे। मैंने अपना स्वभाव बदल लिया तो यकीन मानिए नेता बनने की एक राह तो सदा के लिए ही बंद हो जाएगी। किसी की राह रोकना भी तो मेरा काम नहीं है।...क्योंकि मैं एक सड़क हूं।
मैं अक्सर टूटती हूं। कई बार तोड़ दी भी जाती हूं। कभी किसी बहाने से तो कभी कोई कारण बताकर। इंद्रदेव को तो हमारी जमात पर जरा सा भी तरस नहीं आता। घोटालों और घपलों की तमाम खामियां बारिश में बहा ले जाते हैं। कितने दयालु हैं दूसरों का गुनाह खुद अपने ऊपर ले लेते हैं। मेरे टूटने की सबसे बड़ी वजह (बहाना) तो बारिश ही बनती है। खैर मेरे टूटने के बहाने वहां भी हैं, जहां बारिश नहीं है। और फिर मुझे तोड़ा भी तो आपके भले के लिए जाता है। मेरी बहनें जो बार-बार टूटती है। नजर अक्सर उन्हीं पर रहती है। उन्हीं की पूछ परख होती है। जो समय पर टू टती नहीं है, उसे कोई पूछता ही नहीं है। उपेक्षित रहती है बेचारी। लाचारी एवं मजबूरी की मारी। देखा जाए तो मेरे बनने-बिगड़ने की कहानी से कई जिंदगियां जुड़ी हैं। कई परिवार पल रहे हैं। मैं अपनी आदत छोड़ दूंगी तो यह सब कहां जाएंगे। घरों में रोटियों के लाले पड़ जाएंगे। नेताओं की कुर्सियां हिल जाएंगी। ठेकेदार बेरोजगार हो जाएंगे। मैं चाहकर भी अपनी आदत नहीं छोड़ सकती। अपने उसूलों से कभी मुंह नहीं मोड़ सकती। घर दूसरों का भरने के कारण ही मेरा दामन गरीब है। बार-बार बनना और बिगड़ना ही मेरा नसीब है। ...क्योंकि मैं एक सड़क हूं।
मेरी हालत पर आम आदमी तरस खाता है। रोता है, चिल्लाता है। गुस्से में बड़बड़ाता है। गालियां भी निकालता है लेकिन मैं क्या कर सकती हूं। दोष बनाने व बनवाने वालों के साथ आप सब का भी है। वैसे भी किसी पर फिजूल में दोषारोपण करना ठीक नहीं है। मुझे यह भी पता है कि बिना तालमेल के घालमेल संभव नहीं है। लेकिन जब आप लोग ही चुप हैं तो फिर मैं किसके लिए बोलूं और क्यों बोलूं.... क्योंकि मैं तो एक सड़क ही हूं। दिल से भी पैदल और दिमाग से भी पैदल।... आखिर एक सड़क जो ठहरी।
साभार- पत्रिका भिलाई के 28 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।

Saturday, August 25, 2012

जरूरी है शहीदों का सम्मान


प्रसंगवश

छत्तीसगढ़ प्रदेश के युवाओं की सेना में भागीदारी इसीलिए कम है, क्योंकि इस मामले में न तो यहां की सरकार रुचि लेती है और ना ही जनप्रतिनिधि। प्रदेश के युवाओं को ऐसा माहौल भी उपलब्ध नहीं कराया जाता जिसकी बदौलत उनमें देश सेवा करने के प्रति जोश, जुनून और जज्बा पैदा हो। सरकारी उदासीनता के बीच अगर कोई युवा देश सेवा की हसरत लिए सेना में भर्ती हो भी जाता है तो उसके मान-सम्मान को बनाए रखने के भी प्रयास नहीं किए जाते। सोचनीय एवं दुखद विषय तो यह भी है कि देश के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले शहीदों एवं उनके परिवारों को भी राज्य सरकार की ओर से यथायोग्य सम्मान भी नहीं मिल पाता। वैसे भी छत्तीसगढ़ में शहीदों के अंतिम संस्कार में राज्य सरकार की ओर से अक्सर निभाई जाने वाली औपचारिकता के उदाहरणों के फेहरिस्त भी बेहद लम्बी है। बात चाहे माओवादी हमले में शहीद होने वाले जवानों की हो या फिर सरहद पर दुश्मन से लोहा लेते हुए बलिदान होने वालों की। दोनों ही मामलों में सरकार का रवैया कमोबेश एक जैसा ही है। ताजा मामला जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए भिलाई के लाडले प्रवीणसिंह के अंतिम संस्कार से जुड़ा है। शहीद को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के मामले में जिले के अधिकतर जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने दूरी बनाए रखी। जो पहुंचे वे भी मौका देखकर अत्येष्टि से पूर्व ही वहां से खिसक लिए। कुछ तो अंतिम यात्रा में शामिल हुए बिना ही शहीद के घर से ही लौट गए। मतलब सभी को पहुंचने से पहले जल्दी लौटने की चिंता ज्यादा थी। शहीद के प्रति जिले के जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारी का इस प्रकार का रवैया निहायत ही गैर जिम्मेदाराना है। विडम्बना देखिए कि जिले के कई जनप्रतिनिधियों के पास सैलून व जूतों की दुकान का उद्‌घाटन करने,  नाली निर्माण के लोकार्पण समारोह में रिबन या फीते काटने और सस्ती लोकप्रियता के लिए छोटे-मोटे कार्यक्रमों में उपस्थित होकर ठुमके लगाने के लिए तो पर्याप्त समय है लेकिन शहीद की पार्थिव देह पर श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए वक्त नहीं है। इतना ही नहीं बात-बात पर बयान जारी करने वाले जनप्रतिनिधियों के पास शहीद के मामले में सांत्वनास्वरूप कहने के लिए दो शब्द भी नहीं है। पता नहीं क्यों जुबान तालु से चिपकी हुई है।
बहरहाल, शासन-प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह शहीद परिजनों तथा देशसेवा से जुड़े परिवारों की न केवल खैर-खबर ले बल्कि उनका मान-सम्मान भी बनाए रखे। अगर शासन-प्रशासन ऐसा नहीं कर पाए तो फिर कौन मां होगी जो अपने लख्तेजिगर को सरहद पर गोलियां खाने के लिए भेजेगी। क्यों कोई पिता अपने बुढ़ापे की लाठी को देश के खातिर मर-मिटने की शिक्षा देगा। क्यों कोई वीरांगना अपना सुहाग मिटाकर वैधत्व भोगने पर मजबूर होगी। मामला संवदेनशील एवं बेहद गंभीर है, इसमें देरी किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। यह शासन-प्रशासन को सोचनी चाहिए।

साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 25 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।

Friday, August 24, 2012

जल्दबाज ड्राइवर कभी बूढ़ा नहीं होता....

बस यूं ही

आफिस से घर पहुंचते-पहुंचते डेढ़ बज चुका था। अचानक ख्याल आया कि एकलव्य (मेरा छोटा बेटा, जो केजी टू में पढ़ता है) की स्कूल बस आने का समय हो गया है। बस रोजाना डेढ़ और पौने दो बजे के बीच ही आती है लेकिन वह घर तक नहीं आती है। इसलिए एकलव्य को लेने के लिए सड़क तक जाना पड़ता है। रायपुर-नागपुर मार्ग होने के कारण इस पर वाहनों की आवाजाही भी खूब रहती है। एकलव्य को लेकर घर पहुंचा तब तक श्रीमती ने खाने की तैयारी लगभग पूरी कर ली थी। चाहे गर्मी हो या सर्दी अपनी आदत के अनुसार मैं गर्मागर्म एक-एक चपाती ही खाता हूं। खाने की स्पीड भी इतनी तेज है कि जब तक दूसरी आए तब तक पहली वाली साफ हो चुकी होती है। खाने की स्पीड उस वक्त तो और भी बढ़ जाती है जब कहीं जाना होता है।
दरअसल मैं जल्दबाजी इसलिए दिखा रहा था कि मुझे कांग्रेस पार्टी के दुर्ग में आयोजित घेराव कार्यक्रम को देखने जाना था। करीब आधा घंटे कार्यक्रम देखने के बाद मैंने ऑटो पकड़ा और भिलाई के लिए रवाना हो गया। रास्ते में मेरे ऑटो के आगे एक लोडिंग ऑटो चल रहा था। उसके पीछे की साइड में लिखा था, जल्दबाज ड्राइवर कभी बूढा नहीं होता है। यह स्लोगन मैंने पढ़ लिया और इसका मर्म समझ कर मन ही मन मुस्कुरा भी लिया। ऑटो चालक की बगल में ही उसका साथी बैठा था। चेहरे के हावभाव देखकर मुझे उनके बालिग होने में संदेह लगा। दोनों बच्चे ही थे। उन दोनों ने भी वह स्लोगन पढ़ा और इसके बाद तो बार-बार पढ़ने लगे। दोनों की हालत देखकर मुझे लगा कि शायद दोनों को स्लोगन के पीछे छिपा मर्म समझ में नहीं आ रहा है। मैंने जिज्ञासावश दोनों को टोकते हुए पूछ लिया कि इस स्लोगन से आप क्या समझते हैं। जवाब भी वैसा ही आया जैसा मैं सोच कर चल रहा था। दोनों ने असहमति में सिर हिलाया। मैंने उनको कहा कि जो ड्राइवर गाड़ी तेज चलाता है वह कभी बूढा नहीं होता है। चूंकि मैं पीछे बैठा था लिहाजा दोनों ने मेरी बात को गंभीरता से सुना, लेकिन किसी तरह की प्रतिक्रिया ना होती देख मैंने फिर पूछा समझे कि नहीं, इस पर उन्होंने असहमति स्वरूप अपना सिर हिला दिया। मैंने उनको बताया कि जो वाहन तेज चलाता है वह इसलिए बूढा नहीं होता है क्योंकि वह असमय ही ऊपर मतलब भगवान के घर चला जाता है। वे फिर भी नहीं समझे और पूछने लगे कि कैसे। मैंने बताया कि जब तेज चलेगा तो हादसा होगा और हादसा होगा तो जान जाने की आशंका रहती है। मेरी बात एक युवक को समझ में आ गई। उसने तत्काल अपने साथी को अपने हिसाब से समझाया तो दोनों ठहाका लगाना लगे। फिर तो एक युवक ने बिलकुल विशेषज्ञ की तरह मुझसे कहा, भाईसाहब सिगरेट पीने वालों के लिए भी ऐसा ही कहा जाता है ना। इसी दौरान दूसरा बोल उठा सिर्फ सिगरेट ही नहीं कोई नशा करने वाला कभी बूढ़ा नहीं होता। ऑटो अपनी गति से दौड़ा जा रहा था। नशे की बात पर इतनी गंभीर बातें करने वाले युवकों को गुटखा चबाते व पीक थूकते देख मैं सोच में इस कदर डूबा कि मेरा स्टैण्ड कब आया पता ही नहीं चला। उतरते वक्त मैंने गुटखे के लिए दोनों को टोका तो उलटे मेरे को ही नसीहत देने लगे, बोले भाईसाहब कैन्सर तो उनके भी होता है जो नशा नहीं करते। मैं उन नासमझों की बातों पर बिना कोई टिप्पणी किए किराये के दस रुपए थमा कर चुपचाप कार्यालय लौट आया।

पालक हित में काम करें

टिप्पणी 

 स्कूलों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा और बेतहाशा स्कूल फीस वृद्धि से उकताए शिक्षानगरी भिलाई के पालकों को उस वक्त बड़ी उम्मीद बंधी थी कि कम से कम उनकी पीड़ा को सुनने वाला कोई संगठन तो तैयार हुआ। उनको लगने लगा कि उनकी आवाज को अनसुना कर देने वाले संबंधित स्कूल संचालकों में अब कुछ तो भय होगा। इसी भरोसे के साथ पालकों ने एक नए नवेले संगठन को भरपूर समर्थन भी दिया। शुरुआती दौर में छत्तीसगढ़ पालक संघ अपने उद्‌देश्यों पर खरा उतरता नजर भी आया जब उसने पालकों की कई समस्याओं को हल करवाया। पालक संघ की पहल पर निजी स्कूलों पर लगाया गया जुर्माना तो समूचे प्रदेश में एक नजीर के रूप में याद किया जाएगा। इन सब कामों के चलते अल्प समय में ही पालक संघ ने अच्छी खासी लोकप्रियता भी हासिल कर ली। तभी तो पालकों को यह लगने लगा कि जिले में एक संगठन पहले से मौजूद होने के बावजूद नया संगठन अस्तित्व में क्यों आया। इतना कुछ करने के बाद गुरुवार को एक निजी स्कूल के बस चालकों के प्रदर्शन को समर्थन देकर संघ ने अपने उद्‌देश्यों की मर्यादा को लांघने का ही काम किया है। आखिर संघ यह करके क्या साबित करना चाहता है। बस चालकों के प्रदर्शन की वजह से विद्यार्थी ढाई घंटे तक स्कूल में बैठे रहे। समय पर बच्चों के घर न पहुंचने के कारण पालकों को हुई परेशानी को तो शब्दों में बयां करना भी मुश्किल है। पालकों के हितैषी कहलाने वाले संघ पदाधिकारियों को इस बात का जरा सा भी ख्याल नहीं आया कि उनके इस निर्णय की गाज सबसे पहले कहां पर गिरने वाली है। स्कूल प्रबंधन और बस चालकों की लड़ाई में पालक संघ के बीच में कूदने से सर्वाधिक नुकसान तो विद्यार्थियों का ही हुआ। बस चालक एवं स्कूल प्रबंधन में तो कल को समझौता भी हो जाएगा लेकिन मासूमों की भावना से खिलवाड़ करने की क्षतिपूर्ति किसी भी रूप में संभव नहीं है। 
बहरहाल, गड़बड़ियों एवं अव्यवस्थाओं को दुरुस्त करवाने के लिए इस प्रकार के संगठन होना जरूरी हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह भी तो नहीं कि इस बहाने उसे कुछ भी करने की आजादी मिल जाए। लोकतंत्र में अपनी मांगे मनवाने के तरीके से बहुत से हैं और अव्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना भी बुरी बात नहीं है लेकिन ध्यान यह रखा जाना चाहिए कि इस कवायद में कहीं जन को कोई नुकसान या पीड़ा तो नहीं हो रहा है। जनता की उम्मीदों की बुनियाद पर खड़ा होने वाला संगठन कभी जनहित को नजरअंदाज करके आगे नहीं बढ़ सकता। पालक संघ का गठन पालकों की समस्याओं का निराकरण करवाने के लिए किया गया था ना कि समस्याएं बढ़ाने के लिए। ऐसे में उसके आंदोलनों या प्रदर्शनों का मकसद सस्ती लोकप्रियता पाने या केवल वाहवाही बटोरने तक तो सीमित कतई नहीं होना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना तो बेहद जरूरी है कि पालकों का हमदर्द कहलाने के चक्कर में किसी से दादागिरी या मनमानी तो बिलकुल ना हो। जरूरत है कि पालकों का हितैषी कहलवाने वाले अपने गिरेबान में झांकें, गलतियों से सबक लें और बिना किसी राजनीति व लाग लपेट के ईमानदारी के साथ पालक हित में काम करें।

साभार - भिलाई पत्रिका के 24 अगस्त 12 के अंक में प्रकाशित।

Saturday, August 18, 2012

सरासर जान से खिलवाड़

प्रसंगवश

 एक चर्चित जुमला है, रोम जब जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। कुछ ऐसा ही हाल राज्य सरकार एवं उनके नुमाइंदों का है। इन दिनों दुर्ग-भिलाई में सरकारी भवनों से प्लास्टर उखड़ने की खबरें लगातार आ रही हैं। वैसे भी बारिश के मौसम में सीलन आने से इस प्रकार के मामलों में यकायक इजाफा हो ही जाता है। प्लास्टर उखड़ने से प्रभावित लोग अपने बचाव के लिए जहां बन रहा है गुहार लगा रहे हैं लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। सरकार एवं उसके नुमाइंदे तो कुंभकर्णी नींद में ऐसे गाफिल हैं कि उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही हैं। यह तो गनीमत है कि प्लास्टर उखड़ने से जानमाल की कोई बड़ी हानि नहीं हुई। देखा जाए तो दुर्ग के जिला अस्पताल परिसर स्थित टीबी अस्पताल की छत्त का प्लास्टर उखड़ना ही अपने आप में बेहद गंभीर बात है। अस्पताल एक ऐसी जगह होती हैं, जहां लोग स्वस्थ होने की उम्मीद के साथ आते हैं, लेकिन यहीं पर भी हादसों से वास्ता पड़े तो फिर यह सरासर जान से खिलवाड़ ही है। बात अकेले अस्पताल की ही नहीं है, बल्कि दुर्ग में अधिकतर सरकारी कार्यालय एवं आवास बेहद पुराने एवं जर्जर हैं और इनसे अक्सर प्लास्टर उखड़ता रहता है। ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद अधिकारी-कर्मचारी एवं उनके परिजन जान जोखिम में डालकर इन आवासों में रहने को मजबूर हैं। 
पिछले दिनों पुलिस लाइन में भी इसी तरह प्लास्टर उखड़कर गिरने से एक महिला घायल हो गई थी। समस्या से प्रभावित महिलाएं जब अपना दुखड़ा सुनाने स्थानीय सांसद के पास गई तो उन्होंने अनर्गल बयान देकर जले पर नमक छिड़कने जैसा काम किया। जन से इस तरह रुखा व्यवहार करने के बाद भी खुद को जनप्रतिनिधि कहलवाना निसंदेह शर्मनाक एवं गंभीर बात है। जनप्रतिनिधि से उम्मीद की जाती है कि भले ही वह समस्या का निराकरण ना कर/करा पाए, कम से कम दिलासा तो दे। ज्यादा नहीं तो वह उम्मीद भरा आश्वासन तो दे ही सकता है, लेकिन सत्तारूढ़ दल एवं उसके नुमाइंदों से ऐसी उम्मीद करना भी बेमानी है।  
बहरहाल, पुलिस ऐसा विभाग है जिसके कंधों पर प्रदेश की कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी हैं। परिजनों पर मंडरा रही मौत की आशंका में पुलिसकर्मी अपने काम को कितनी ईमानदारी से कर पाएंगे, सोचा जा सकता है। कहा गया है कि जान है तो जहान है, लेकिन जब खतरा जान पर ही हो तो फिर सारे काम गौण हो जाते हैं। राज्य सरकार को भावी हादसे की दस्तक को तत्काल प्रभाव से समझते हुए आवश्यक कदम उठाना चाहिए। देखना यह है कि राज्य सरकार इस मामले में पहल अपने विवेक से करती है या किसी हादसे के बाद। और अगर जानमाल की हानि के बाद ही यह सब होना है तो सरकार एवं उसके नुमाइंदों को सद्‌बुद्धि देने के लिए भगवान से प्रार्थना के अलावा और कुछ किया भी नहीं जा सकता है।

साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ के  18 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, August 14, 2012

यह पानी निकलवा दीजिए


 टिप्पणी

माननीय, अनिल टुटेजा जी
आयुक्त नगर निगम, भिलाई।
आपको भिलाई नगर निगम की जिम्मेदारी संभाले हुए सप्ताह भर से अधिक समय हो गया है। इस अवधि में आपके काम करने का अंदाज देखकर लगा कि वाकई आपमें कुछ करने का जज्बा है। वैसे भिलाई निगम के लिए आप नए हो सकते हैं लेकिन आप छत्तीसगढ़ के ही जन्मे जाए हैं, लिहाजा यहां की जानकारी तो आ
पको पहले से है। विशेष रूप से भिलाई को तो आप भली-भांति जानते ही हैं। जानने की वजहें भी हैं। कौन होगा जो भिलाई को नहीं जानता। इस्पातनगरी एवं शिक्षा नगरी, यही तो दो नाम हैं, जो भिलाई का प्रतिनिधित्व करते हैं। बड़े गर्व की अनुभूति होती है भिलाई के लिए यह दोनों विश्लेषण सुनकर, लेकिन अफसोस की बात यह है कि इन विशेषताओं के साथ कई कड़वी हकीकतें भी जुडी हैं भिलाई के साथ। बुनियादी सुविधाओं के अभाव से लेकर प्रदूषण तक की कड़वी हकीकतें। खैर, रफ्ता-रफ्ता आप इन हकीकतों से वाबस्ता हो जाएंगे। आप संवदेनशील हैं तथा जनता के दर्द को भी समझते हैं। तभी तो पदभार ग्रहण करने के साथ ही आपने अधिकारियों-कर्मचारियों को निर्धारित समय पर कार्यालय आने की कड़ी नसीहत दे डाली। इतना ही नहीं लगे हाथ आपने शहर की टूटी सड़कों का जायजा भी ले लिया। चाहते तो आप मातहत को मौके पर भेजकर सड़कों की रिपोर्ट मंगवा सकते थे लेकिन आपने खुद मौका देखना उचित समझा। एक अधिकारी में ऐसा गुण होना भी चाहिए। वातानुकूलित कक्षों में बैठकर रिपोर्ट पर भरोसा करने वाले अधिकारियों का हश्र बाद में कैसा होता है, यह आप बखूबी जानते हैं। ऐसे अधिकारी कमोबेश हर जगह मिल जाएंगे। भिलाई में भी कमी नहीं है। आपके निगम में भी मिल जाएंगे।
कुछ ऐसे ही अधिकारियों की बदौलत तो भिलाई में मौर्या टाकीज के पास एक अंडरब्रिज बनकर तैयार हो गया। बनाने वालों ने यहां नियमों को अनदेखा किया ही, बनने के बाद भी उसकी किसी ने शायद ही सुध ली होगी। फिलवक्त महीने भर से चल रही बारिश के कारण यह अंडरब्रिज पानी से लबालब है। यहां भरे पानी को निकालने के किए जा रहे प्रयास नाकाफी हैं। अंडरब्रिज बंद होने के कारण पावर हाउस एवं सुपेला के रेलवे क्रासिंग पर यातायात का दवाब यकायक बढ़ गया है। जल्दी निकलने के चक्कर में वाहन चालक जान को दाव पर लगाने से भी नहीं हिचक रहे हैं। आप समझ सकते हैं, ऐसा वे जानबूझकर तो नहीं करते। परेशान लोगों के हालात व मजबूरी पर आपके मातहतों को कतई तरस नहीं आता है। आप ही सोचिए, आपके मातहत संवेदनशील होते तो क्या एक माह तक रास्ता इस तरह बाधित रहता?।
यकीन मानिए यह शहर अपनी विशेषताओं के कारण जितना प्रसिद्ध है, उनसे उतना ही परेशान एवं हलकान भी है। करने को भिलाई में बहुत काम है। समस्याओं की लम्बी फेहरिस्त है। बस एक बार नब्ज देखने और मर्ज जानने की जरूरत है। फिलहाल तो आप एक बार मौका देखकर किसी तरह पानी निकासी का प्रबंध करवा दीजिए। अगर इस पानी भराव का कोई स्थायी हल भी हो जाए तो सोने में सुहागा होगा। प्रभावितों के लिए यह बड़ा काम है लेकिन आप जैसे सक्षम अधिकारी के लिए कुछ भी असंभव नहीं। आप ऐसा करवा देंगे तो यकीनन प्रभावित लोग इस काम के लिए आपके ऋणी तो रहेंगे ही दिल से दुआ भी देंगे।
 
साभार -पत्रिका भिलाई के 14 अगस्त 12  में  प्रकाशित।

चुपचाप कट गया मैं...


पेड़ का दर्द

मेरी दशा देखकर आप समझ गए होंगे कि मेरा दर्द क्या है। सोमवार दोपहर को मैं मरते-मरते बचा हूं। वो तो भला हो एक दो जागरूक लोगों का, जिनकी बदौलत मेरा अस्तित्व रह गया। वरना मेरी हत्या तो लगभ तय थी। बेरहमों ने समय भी बड़ा मुफीद चुना। मैं बहुत चीखा, चिल्लाया भी, लेकिन कोई नहीं था, उस वक्त। वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि एक-दो पर्यावरण प्रेमी संयोग से वहां पहुंच गए और मैं बच गया। पता नहीं क्यों कोई यकायक मेरे खून का प्यासा हो गया। क्या बिगाड़ा था मैंने किसी का। मैं तो आसपास के लोगों को सुकून भरी छाया ही उपलब्ध कराता रहा हूं। सैकड़ों परिंदे मेरी शाखाओं पर बेखौफ होकर शिद्दत के साथ रात गुजारते रहे हैं।
अफसोस उन परिन्दों का आशियाना उजड़ गया। कहां रात गुजारेंगे वो। एकदम ठूंठ बन गया हूं मैं। हालात यह हो गई मैं अभी किसी को छाया तक भी नहीं दे सकता। काफी वक्त लगेगा मेरे जख्म भरने में। हुड़को में श्रीराम चौक के मैदान के पास मुझे बड़े आदरभाव व विधि विधान के साथ लगाया था। बरगद का पेड़ होने तथा सबका चहेता होने के बाद भी पता नहीं क्यों मैं किसी को अखर गया। खैर, यह आप लोगों के स्नेह एवं दुआओं का ही कमाल था कि मैं बच गया। फिर भी आपको आगाह करता हूं कि मेरे से दुश्मनी निकालने वाले को आप सजा जरूर दिलवाएं ताकि वह भविष्य में इस प्रकार की हिमाकत ही ना करे। अगर आज आप लोगों ने हिम्मत करके यह पुनीत कार्य कर दिया तो यकीन मानिए आप पर्यावरण प्रेम की नई इबारत लिख देंगे।

साभार -पत्रिका भिलाई के 14 अगस्त 12 में  प्रकाशित।

Saturday, August 11, 2012

इसकी टोपी, उसके सिर

प्रसंगवश

भिलाई में फोरलेन (राष्ट्रीय राजमार्ग-6) पर बने क्रासिंग पर सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं। आलम यह है कि भिलाई एरिया में 11 में से पांच क्रासिंग नियमों को नजरअंदाज करके बनाए गए हैं। यह तो अकेले भिलाई एरिया की कहानी है। फोरलेन में बहुत सी जगह ऐसी हैं, जहां नियमों एवं मापदण्डों को दरकिनार कर इस प्रकार के क्रासिंग छोड़े गए हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जनप्रतिनिधियों ने सस्ती लोकप्रियता पाने एवं वाहवाही बटोरने के चक्कर में फोरलेन बनाने वाली कम्पनी पर दबाव डालकर नियम विरुद्ध क्रासिंग बनवा लिए। निर्माता कंपनी ने भी बिना किसी ना नुकर के हाइवे में क्रासिंग इसलिए छोड़ दिए क्योंकि वह खुद भी कठघरे में है। शहर के बीचोबीच फोरलेन का निर्माण ही सवालों के घेरे में है। देखा जाए तो फोरलेन हाइवे में कट पाइंट बनाने का प्रावधान ही नहीं है। बावजूद इसके जनहित का हवाला देकर व दबाव बनाकर जनप्रतिनिधियों ने तात्कालिक लाभ उठाते हुए मनमाफिक रास्ते (क्रासिंग) खुलवा लिए। बढ़ते यातायात दबाव के कारण अब यही क्रासिंग जानलेवा साबित हो रहे हैं, लेकिन यहां सुरक्षा के प्रबंध करने के नाम पर कोई भी तैयार नहीं है। फोरलेन निर्माता कंपनी के नुमाइंदे, जनप्रतिनिधि व यातायात पुलिस के अधिकारी इसकी टोपी, उसके सिर पर की तर्ज पर बयान देकर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं। फोरलेन निर्माता कंपनी का कहना है कि बढ़ते हादसों के पीछे सबसे बड़ा कारण लोगों में जागरुकता का अभाव होना है। किसी हद तक यह बात सही भी है लेकिन बिना भय के कानून की पालना संभव नहीं है। अकेली जागरुकता के भरोसे के यातायात नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। गौर करने वाली बात तो यह है कि फोरलेन पर दो क्रासिंग तो पुलिस थानों के ठीक सामने बने हैं। यानि कानून की पालना करवाने वालों की आंखों के सामने ही कानून की धज्जियां उड़ रही हैं। सोचनीय विषय है कि किसी वीआईपी के आगमन के दौरान इन क्रासिंग पर यातायात पुलिस के जवान बड़ी मुस्तैदी के साथ ड्‌यूटी बजाते नजर आते हैं लेकिन आमजन की सुरक्षा के नाम पर उनके पास बगले झांकने के अलावा कोई जवाब नहीं है।
बहरहाल, सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। समय की नजाकत को देखते हुए फोरलेन कंपनी को जहां जरूरत है, वहां सूचना पट्‌ट, ब्लींकर या सिग्नल लगाने चाहिए। क्रासिंग पर बढ़ते यातायात दबाव को देखते हुए यातायात पुलिसकर्मियों की तैनाती भी बेहद जरूरी है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो उन जनप्रतिनिधियों की है, जो खुद को बचाने के चक्कर में जिम्मेदारी यातायात पुलिस एवं फोरलेन निर्माता कंपनी की बता रहे हैं। आखिर नियम विरुद्ध काम करवाने की बुनियाद तो जनप्रतिनिधियों ने ही रखी है। ऐसे में जान माल की सुरक्षा कैसे हो, यह भी तो उनको ही तय करना चाहिए।

साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ के 11 अगस्त 12 के अंक में प्रकाशित।


Thursday, August 9, 2012

स्थायी हल खोजना जरूरी

टिप्पणी 

नागपुर-रायपुर फोरलेन हाइवे में नियमों को दरकिनार कर सुपेला थाने के पास डिवाइडर को काटकर बनाया गया रास्ता अब लोगों को राहत कम परेशानी ज्यादा दे रहा है। चौराहे पर यातायात का दबाव सुबह से लेकर देर रात तक लगातार बना रहता है। हाइवे के दाएं-बाएं स्थित राधिका नगर व प्रियदर्शनी के अलावा सेक्टर एरिया के दुपहिया वाहन चालक भी शॉर्टकट के चक्कर में इसी चौराहे का उपयोग करते हैं। बहुत से स्कूली बच्चे भी जान जोखिम में डालकर रोज इधर से उधर एवं उधर से इधर आते हैं। यहां से गुजरने वाले वाहनों की रफ्तार पर न तो कोई अंकुश है और ना ही कोई डर। वे बेखौफ व बेलगाम होकर यहां से गुजरते हैं और अक्सर बेकाबू होकर हादसों का सबब बन जाते हैं। इतना कुछ होने के बाद भी इस चौराहे पर न तो कोई सिग्नल लगा है और ना ही यातायात पुलिस के किसी जवान की ड्‌यूटी लगती है। लब्बोलुआब यह है कि यहां सब कुछ स्वयं स्फूर्त एवं भगवान भरोसे ही है। तभी तो यहां एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब कोई हादसा नहीं होता हो। बुधवार दोप हर बाद हुआ हादसा भी तेज रफ्तार का नतीजा था। पहले निकलने की होड़ में दोनों वाहन टकरा गए। गनीमत यह रही कि हादसे में कोई जन हानि नहीं हुई। देखा जाए तो इस प्रकार के नियम विरुद्ध कामों का तात्कालिक लाभ जरूर हो सकता है लेकिन दूरगामी परिणाम हमेशा प्रतिकूल ही रहे हैं। जब यहां रास्ता छोड़ना इतना ही जरूरी था तो यहां से गुजरने वालों की जानमाल की सुरक्षा का ख्याल तो जेहन में सबसे पहले आना चाहिए था। आखिर जिनके लिए रास्ता छोड़ा जा रहा है, उनकी ही जान हथेली पर रहे तो फिर इस प्रकार के काम से फायदा भी क्या।
बहरहाल, हाइवे के आजू-बाजू दुर्घटना से देरी भली। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। रफ्तार का मजा, अस्पताल की सजा। गाड़ी धीरे चलाएं, घर पर कोई आपका इंतजार कर रहा है। जिन्हे जल्दी थी वे चले गए। आदि स्लोगन लिख भर देने से जागरुकता नहीं आएगी। जरूरी है कि नियमों की पालना कड़ाई से करवाई जाए। दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे यातायात के दवाब से इतना तो तय है कि इस समस्या का स्थायी हल खोजना अब बेहद जरूरी हो गया है। हल भी तभी संभव है, जब पीछे की भूलों में सुधार हो। भले ही वह यहां सिग्नल लगाकर या किसी यातायात पुलिसकर्मी की तैनाती के रूप में भी हो सकता है, लेकिन यह सब करना अब जरूरी है। पीछे की इस भूल में अब सुधार नहीं किया तो कालांतर में यह किसी बड़े हादसे की वजह भी बन सकती है। समस्या का हल जनभावना के अनुकूल हो तो फिर कहना ही क्या।
 
साभार : पत्रिका भिलाई के 9 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।




Saturday, August 4, 2012

किस काम के अंडरब्रिज


प्रसंगवश

मुम्बई-हावड़ा रेल मार्ग पर भिलाई के नेहरूनगर क्रॉसिंग के पास रेलवे मंत्रालय की ओर से अंडरब्रिज निर्माण की स्वीकृति की खबर से एक बार फिर बोतल में कैद जिन्न बाहर आ गया है। तय मानकों पर न बनने के कारण भिलाई में दो अंडरब्रिज पहले से ही लोगों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। ऐसे में नया अंडरब्रिज कितना कारगर साबित होगा, इस पर सवाल उठने लगे हैं। भिलाई के मौर्या टाकीज व प्रियदर्शनी नगर के अंडरब्रिज बारिश में किसी काम के नहीं रहते हैं। जमीन की स्तह से काफी नीचे होने के कारण दोनों अंडरब्रिज में थोड़ी सी बारिश में ही इतना पानी भर जाता है कि आवागमन अवरुद्ध हो जाता है। बारिश के मौसम में यह समस्या हर साल पैदा होती है। मौर्या टाकीज के पास तो बरसाती पानी की निकासी के लिए एक कुआं भी खोदा गया था लेकिन वह भी किसी काम नहीं आया। इसके बाद पम्प लगाकर अंडरब्रिज का पानी निकाला जाता है, लेकिन यह भी समस्या का स्थायी हल नहीं है। हर साल पम्प से पानी निकालने के खेल के चलते अंडरब्रिज के निर्माण के औचित्य पर ही सवाल उठ रहे हैं। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि जनहित को दरकिनार कर अंडरब्रिज का निर्माण कर दिया गया। हैरत वाली बात तो यह है कि अंडरब्रिज का निर्माण करने वाली रेलवे की अधिकृत ऐजेंसी राइट्‌स  की रिपोर्ट को अनदेखी करके इन अंडरब्रिज को बनवाया गया। अंडरब्रिज के निर्माण में बरती गई अनियमितता एवं अदूरदर्शिता का खमियाजा जनता को भुगतान पड़ रहा है। पानी से लबालब भरे व ऊपर से टपकते तथा करीब चार करोड़ की लागत से बने ये दोनों अंडरब्रिज कितने कारगर व उपयोगी हैं, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
बहरहाल, इनके निर्माण में कितनी पारदर्शिता बरती गई है। इनका निर्माण तय मानकों पर क्यों नहीं हुआ? आदि  बिन्दु़ओं की जांच जरूरी है। आखिर चार करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद जनता को बारिश के मौसम में परेशान होना पड़े तो फिर ऐसे अंडरब्रिज किस काम के। सुनने में आ रहा है कि व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए, इसके निर्माण में तय मानकों व जनहित को नजरअंदाज कर दिया गया। देखा जाए तो राहत पहुंचाने के नाम पर आमजन के साथ यह एक तरह का धोखा ही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नेहरू नगर के अंडरब्रिज के निर्माण में किसी तरह की अनियमिता व गड़बड़ी ना हो। अंडरब्रिज का निर्माण एकदम पारदर्शी तरीके, तय मानकों एवं भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो जैसी समस्या का सामना मौर्या टाकीज व प्रियदर्शनी नगर के अंडरब्रिज को लेकर आ रही है, वैसी ही नेहरूनगर के अंडरब्रिज में देखने को मिल जाए तो हैरत की बात नहीं होनी चाहिए।


साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ के 4 अगस्त 12  के अंक में प्रकाशित।

Thursday, July 26, 2012

शहादत को मिले सम्मान

टिप्पणी

यकीन मानिए अगर यह किसी फिल्मी कलाकार का कार्यक्रम होता तो लोग इतनी बड़ी संख्या में जुटते कि भिलाई का हुडको मैदान छोटा दिखाई देने लगता। अगर यह किसी पार्टी विशेष के बड़े नेता की सभा होती तो अकेली गाड़ियों का लवाजमा ही इतना हो जाता कि शहर की यातायात व्यवस्था लड़खड़ा जाती। अगर यह किसी हीरोइन या नृत्यांगना का कार्यक्रम होता तो भूख-प्यास की चिंता छोड़कर लोग सुबह से अपनी जगह सुनिश्चित करने का प्रयास करते दिखाई देते। अफसोस की बात यह है कि कार्यक्रम किसी फिल्मी कलाकार, किसी नेता या किसी नृत्यांगना का ना होकर एक शहीद की पुण्यतिथि का था। तभी तो छत्तीसगढ़ के एकमात्र करगिल शहीद कौशल यादव के स्मारक स्थल पर श्रद्धासुमन अर्पित करने जुटे लोगों की उपस्थिति वाकई सोचनीय थी। श्रद्धांजलि देने आए गिने-चुने लोगों को देखकर समझा जा सकता है कि आखिर छत्तीसगढ़ के युवाओं की सशस्त्र सेनाओं में भागीदारी कम क्यों है। श्रद्धांजलि सभा के लिए लगाए गए टैंट की अधिकतर कुर्सियां खाली पड़ी थी। समय निकाल कर पहुंचे चुनिंदा लोग भी इतनी जल्दी में थे कि वे सिर्फ मुंह दिखाई करके लौट गए।गनीमत रही कि दो चार स्कूलों के विद्यार्थियों ने राष्ट्रधर्म निभाते हुए स्मारक स्थल पर न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि शहीद को भावभीनी श्रद्धांजलि भी अर्पित की। कहने को महापौर एवं भिलार्इ नगर  विधायक ने भी स्मारक स्थल पर श्रद्धासुमन अर्पित किए लेकिन दोनों ने मंच पर साथ-साथ बैठने से परहेज किया। विधायक अपनी रस्म अदायगी कर पहले की निकल लिए जबकि महापौर तय समय पर पहुंची। वैशाली नगर विधायक तो दोपहर बाद श्रद्धाजलि अर्पित करके आए। इधर, देश की सुरक्षा एवं अस्मिता की दुहाई देने तथा देश के लिए मर-मिटने के दावे करने वाले दल भाजपा के छुटभैये नेताओं के अलावा नामचीन नामों की उपस्थिति न के बराबर थी। शर्मनाक बात तो यह भी थी कि कार्यक्रम में प्रशासनिक स्तर पर कोई अधिकारी या कर्मचारी नहीं पहुंचा। मरणोपंरात वीर चक्र से नवाजे गए शहीद कौशल यादव के प्रति ऐसा व्यवहार निहायत ही गैर जिम्मेदाराना एवं देशभक्ति के जज्बे को ठेस पहुंचाने वाला है।
बहरहाल, छत्तीसगढ़ प्रदेश के युवाओं की भागीदारी सशस्त्र सेनाओं में बेहद कम है। इसका यह तो कतई मतलब नहीं है कि यहां के युवाओं में देशभक्ति का जज्बा नहीं है। दरअसल यहां के युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने तथा उनको राष्ट्र सेवा की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास ही बहुत कम हुए हैं। यहां के युवाओं को शायद ही ऐसा माहौल मिला हो, जिसके दम पर उन्होंने देश सेवा करने का सपना पाला हो। लोगों में देश के प्रति जोश, जज्बा एवं जुनून बरकरार है, बस शर्त इतनी सी है कि उनकी इस भावना को समय-समय पर जगाया जाए। हाल ही में प्रदेश में हुई वायुसेना भर्ती इसका जीता जागता उदाहरण है। भर्ती के प्रति माहौल बनाया गया तो युवाओं को जुटने में भी देर नहीं लगी। फिर भी तेरह साल पहले शहीद के अंतिम संस्कार के दौरान हजारों की संख्या में जुटने वालों की संख्या बुधवार को दहाई तक सिमटना बेहद सोचनीय विषय है। इसके पीछे कहीं न कहीं सरकारी एवं प्रशासनिक उदासीनता ही  जिम्मेदार है। शहीद की पुण्यतिथि किसी उत्सव से कम नहीं होती है। उसकी शहादत को पूरा-पूरा सम्मान मिलना चाहिए ताकि युवा पीढ़ी के दिल में देशप्रेम का जज्बा पैदा हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में अकेले कौशल यादव ही नहीं बल्कि प्रदेश के अन्य शहीदों के प्रति ऐसा रुखा व्यवहार न हो तथा उनकी पुण्यतिथि महज रस्मी कार्यक्रम ना बने, तभी शहीदों की चिताओं पर हर वर्ष मेले लगने का स्लोगन चरितार्थ हो पाएगा।

साभार - पत्रिका भिलाई के 26  जुलाई 12  के अंक में प्रकाशित।

Saturday, July 14, 2012

तबादले पर उठते सवाल

प्रसंगवश
 
आखिकार वही हुआ, जिसका अंदेशा था। जिला शिक्षा अधिकारी बीएल कुर्रे का तबादला हो गया। नई जिम्मेदारी के तहत उनको धमतरी डाइट का प्राचार्य बनाया गया है। वैसे कुर्रे के तबादले के कयास उसी दिन से लगने शुरू हो गए थे, जिस दिन उन्होंने भिलाई के दो बड़े स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई की थी। यह ऐसी कार्रवाई थी,जो न केवल अनूठी थी बल्कि ऐतिहासिक भी रही। निजी स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई कर बड़े पैमाने पर जुर्माना लगाने का छत्तीसगढ़ प्रदेश का संभवतः यह इकलौता एवं पहला मामला था। आमजन ने इस कार्रवाई का तहेदिल से स्वागत भी किया था। इस कार्रवाई के बाद अभिभावकों में यह उम्मीद जगी थी कि आखिकार उनकी पीड़ा को समझने वाला कोई अधिकारी तो है। तभी तो प्रदेश के बाकी जिलों में भी इसी तर्ज पर कार्रवाई की मांग उठने लगी थी। खैर, कुर्रे की इस कार्रवाई का भले ही अभिभावकों एवं आम लोगों ने स्वागत किया हो लेकिन नियमों का पालन न करने वाले तथा राजनीतिक पहुंच रखने वाले कतिपय शिक्षण संस्थानों की आंखों की किरकिरी भी वे उसी दिन से बन गए थे। उनको भय सताने लगा था कि अगर कुर्रे कुछ समय और रह गए तो अगला नम्बर कहीं उन्हीं का न जाए। कहा भी जा रहा है कि दो बड़े स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई से उत्साहित कुर्रे करीब दर्जन भर स्कूलों के खिलाफ तैयारी में थे, लेकिन इससे पहले उनका तबादला हो गया। कुर्रे के तबादले के पीछे तरह-तरह की चर्चाएं सुनने को मिल रही हैं लेकिन सबसे अहम कारण यही माना जा रहा है कि निजी स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करना उनको भारी पड़ गया।
बहरहाल, अगर कुर्रे के तबादले के पीछे राजनीतिक कारण हैं तो यह किसी योग्य एवं ईमानदारी अधिकारी के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे माहौल एवं दबाव में भला कोई कैसे तटस्थ रहकर निष्पक्षता के साथ काम कर पाएगा। ईमानदारी के साथ काम करने की सजा अगर तबादला ही है तो फिर योग्य अधिकारियों एवं पारदर्शी काम की उम्मीद करना भी बेमानी है। कुर्रे के तबादले से तो इस बात को बल मिलता है कि राज्य सरकार भी गड़बड़ी करने वाले निजी स्कूलों के न केवल दबाव में है अपितु उनकी हां में हां भी मिला रही है। और अगर तबादला सामान्य प्रक्रिया है तो नए शिक्षा अधिकारी से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे कुर्रे के अधूरे कार्यों को अंजाम तक पहुंचाएंगे। 

साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 14 जुलाई 12  के अंक में प्रकाशित।


Friday, July 13, 2012

अपनै आप नं दारासिंह समझै है के....

 रुस्तम-ए-हिन्द दारासिंह के निधन का समाचार गुरुवार सुबह ही मिल गया था। टीवी एवं सोशल साइट्‌स पर दिन भर दारासिंह के निधन तथा उनसे जड़े किस्सों एवं संस्मरणों पर आधारित खबरों का बोलबाला रहा। शुक्रवार सुबह प्रिट मीडिया में भी दारासिंह ही छाए हुए थे। अधिकतर समाचार पत्रों में उनके निधन के समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। कई समाचार-पत्रों में तो अतिरिक्त पेज भी दिए गए। वे इसके हकदार भी थे, क्योंकि दारासिंह का जुड़ाव देश के लगभग हर छोटे- बड़े शहरों से रहा। कुश्ती के कारण देश में वे कई जगह घूमे थे। लिहाजा, अलग-अलग जगह पर समाचार-पत्रों में उनके अलग-अलग संस्मरण प्रकाशित हुए हैं। किसी ने दारासिंह के पहलवानी के पक्ष को रेखांकित किया तो किसी ने उनके राजनीतिक जीवन को। सर्वाधिक फोकस उनके रामायण धारावाहिक में निभाए गए हनुमान के किरदार को किया गया। कई समाचार-पत्रों ने इनके इस किरदार को अपने शीर्षकों में भी शामिल किया है। मसलन, राम के हुए हनुमान, राम के पास पहुंचे  हमारे हनुमान, राम के पास गए हनुमान आदि। लब्बोलुआब यह है कि निधन के कवरेज में दारासिंह के मूल काम के बजाय उनके हनुमान के किरदार को ज्यादा प्राथमिकता दी गई। दारासिंह मूल रूप से पहलवान थे और अपनी इसी खूबी और मजबूत कद काठी की बदौलत ही वे फिल्मों में आए। संभवत उनकी शारीरिक बनावट को देखकर ही रामायण में हनुमान का किरदार मिला। हनुमान के किरदार निभाने के कारण ही उनका राज्यसभा जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकार दारासिंह ने पहलवानी के अलावा अभिनेता एवं राजनेता दोनों  ही किरदार बखूबी निभाए।
फिलहाल बहस का विषय यह है कि दारासिंह को पहलवान के रूप में ज्यादा प्रसिद्धि मिली या फिर हनुमान का किरदार निभाने से। प्रसिद्धि का पैमाना क्या रहा है, यह सब लोगों ने टीवी, सोशल साइट एवं समाचार पत्रों के अवलोकन से लगा लिया होगा। अधिकतर जगह यही लिखा गया है कि उनको प्रसिद्धि हनुमान के किरदार से ज्यादा मिली। कुछ हद तक तक यह बात सही भी होगी लेकिन मैं इससे पूर्णतया सहमत नहीं है। मेरा मानना है कि दारासिंह को लोग हनुमान से पहले पहलवान के रूप में ही जानते थे। पहलवान रहते हुए दारासिंह ने वह काम कर दिखाया था जो किसी परिचय का मोहताज नहीं था। वह भी ऐसे दौर में जब न तो सोशल साइट्‌स थी और ना ही अखबारों का  जोर। टीवी भी उस वक्त गिने-चुने घरों की शान हुआ करते थे। विशेषकर शेखावाटी में दारासिंह की पहलवानी से जुड़ी एक लोकोक्ति प्रचलन में है। बचपन से इसको सुनते आए हैं और अब भी सुन रहे हैं। रामायण धारावाहिक तो 1987 में आया लेकिन लोकोक्ति इससे काफी पहले से बोली एवं सुनी जा रही है। दारासिंह से संबंधित से यह लोकोक्ति उर्फ जुमला बचपन में न केवल सुना है बल्कि कई बार बोला है। आज भी गाहे-बगाहे इस प्रयोग कर ही लिया जाता है। यह जुमला है अपनै आप नं दारासिंह समझै है के....। शेखावाटी में यह जुमला उस वक्त प्रयोग किया जाता है तब दो पक्षों के बीच नोकझोंक होती है और बात कुछ ज्यादा बढ़ जाती है। इसके अलावा यह जुमला उस वक्त भी बोला जाता है जब कोई बच्चा शरारत करता है। कहने का अर्थ यह है दादागिरी दिखाने वाले को भी इस जुमले से पुकारा जाता है। शेखावाटी में इस जुमले का प्रयोग सिर्फ बच्चे ही नहीं बल्कि बड़े भी करते हैं। हमारे गांव में तो एक युवक का नाम इसलिए दारासिंह रख दिया गया, क्योंकि उसने एक तेज धमाके वाले पटाखे को हाथ में ले लिया था। संयोग से वह पटाखा हाथ में लेने के बाद फट गया और वह युवक गांव के युवाओं की नजर में बहादुर मतलब दारासिंह हो गया। गांव में आज भी उस युवक को मूल नाम से कम और दारासिंह के नाम से ज्यादा जाना जाता है। 
कहने का मतलब यह है कि दारासिंह मूल रूप से पहलवान थे। उनकी पहचान उनकी ताकत थी। यह बात और है कि हनुमान के किरदार ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। आज दारासिंह हमारे बीच में नहीं है। भले ही हम उनकी अलग-अलग कामों के लिए चर्चा करें लेकिन उनका सबसे मजबूत पक्ष अभिनेता या नेता न होकर  पहलवानी ही था। उनकी ताकत ही उनकी प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण थी। 1947 से 1983 तक दारासिंह ने विभिन्न कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने पांच सौ पहलवानों को धूल चटाई। दारासिंह आज हमारे बीच से चले गए हैं लेकिन उनसे संबंधित जुमला लोगों की जुबान पर है और रहेगा। रुस्तम-ए-हिन्द को मेरा शत-शत नमन।

दोहरा चरित्र !


टिप्पणी

विडम्बना देखिए कि भिलाई के शांतिनगर एवं मॉडल टाउन के लोग वैधता के लिए जनप्रतिनिधियों एवं निगम अधिकारियों के यहां लगातार चक्कर लगा रहे हैं लेकिन उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। दोनों ही कॉलोनियों को वैधता तीन माह पहले दी जा चुकी है, लेकिन अभी तक विकास शुल्क निर्धारित नहीं किया गया है। नगर निगम की सामान्य सभा भले ही दो दिन चली हो लेकिन इस मसले पर कोई फैसला तो दूर चर्चा तक नहीं हुई। किसी ने बात कहने की कोशिश भी की तो हो हल्ला कर मामले को बहुमत के जोर पर दबा दिया गया। खैर, यह सामान्य सभा का एक पक्ष था। अब इसी सामान्य सभा का दूसरा पक्ष देखिए। वार्ड 24 में साप्ताहिक बाजार लगे या नहीं इस बात को लेकर मामला अदालत में विचाराधीन है। इसके बावजूद इसका प्रस्ताव सामान्य सभा में रखा गया। सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे की तर्ज पर इस प्रस्ताव पर मतदान करवाने की रस्म अदायगी भी गई ताकि भविष्य में किसी प्रकार के शिकवा-शिकायत की कोई गुंजाइश ही नहीं रहे। सदन में बहुमत कांग्रेस का है, चाहते तो प्रस्ताव वैसे ही पास हो जाता है लेकिन मतदान को आधार बनाकर यह संदेश दिया गया कि साप्ताहिक बाजार वार्ड 24 में ही लगना चाहिए। वैसे साप्ताहिक बाजार को लेकर प्रस्ताव पारित करने में जल्दबाजी दिखाना कई सवालों को जन्म देता है। आखिर ऐसी क्या वजह है कि अदालत के निर्णय का इंतजार किए बिना ही प्रस्ताव पारित कर दिया गया।
उक्त दोनों मामले यह साबित करते हैं कि जनहित से जुड़े मसलों  को लेकर हमारे जनप्रतिनिधि बिलकुल भी संजीदा नहीं है। ऐन-केन-प्रकारेण उनका ध्यान सिर्फ इस बात पर है कि उनको अधिकाधिक निजी लाभ कैसे हासिल किया जाए। स्वाभाविक सी बात है, मामला जब निजी लाभ या व्यक्तिगत स्वार्थों से जुड़ा होगा तो हो-हल्ला होना भी लाजिमी है। जब इस प्रकार के विवादों से नाता रखने वाले प्रस्ताव पारित हुए तो जमीर की आवाज पर काम करने वाले कुछ जनप्रनिधियों के लिए यह सब सहन करना बर्दाश्त से बाहर हो गया। वे झगड़े पर उतारू हो गए। तोडफ़ोड़ करने लगे, लेकिन उनका ऐसा करना भी तो उचित नहीं है। लोकतंत्र में अपनी बात रखने के कई माध्यम हैं। लोकतांत्रिक एवं गांधीवादी तरीके से भी अपनी बात रखी जा सकती है। इस प्रकार के हथकंडे अपनाकर चर्चा में बना जा सकता है लेकिन लोकप्रिय नहीं। यह सब महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने से ज्यादा कुछ भी नहीं है। कानून हाथ में लेकर हाथापाई करना, तोड़फोड़ करना, सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचाना, सदन का कीमती समय जाया करना किसी भी कीमत पर उचित नहीं हैं। सदन की अपनी मर्यादा है, अपनी गरिमा हैं। उसकी मर्यादा एवं गरिमा का ख्याल रखना जनप्रतिनिधियों का फर्ज है, लेकिन भिलाई नगर निगम में मर्यादा एवं गरिमा को तार-तार करना जनप्रतिनिधियों का एक सूत्री कार्यक्रम हो गया। वाहवाही लूटने के लिए हंगामा करने का रिवाज सा बन गया है। जनप्रतिनिधियों द्वारा नैतिक दायित्य का निर्वहन करना तो बिलकुल बेमानी हो गया है। शांतिपूर्वक चर्चा करना तो वे अपनी शान के खिलाफ समझने लगे हैं।
बहरहाल, जनप्रतिनिधियों को यह तय करना लेना चाहिए कि उनके लिए शहर का विकास सर्वोपरि है। इसमें किसी तरह का राजनीति करना या हंगामा खड़ा करना उचित नहीं है। तात्कालिक या निजी लाभ के लिए जनहित से जुड़े मुद्‌दों को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं है। शहरहित एवं जनहित में राजनीति का हस्तक्षेप ना तो ही बेहतर है। सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना भी सही नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए हमारे जनप्रतिनिधि पिछले सारे दुराग्रह व पूर्वाग्रह भुला कर विकास के मामलों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएंगे। अगर ऐसा नहीं कर पाए तो सिर-आंखों पर बैठाने वाली जनता दूसरा रास्ता भी दिखा सकती है, इतिहास गवाह है। जनप्रतिनिधियों को उससे कुछ सबक या सीख जरूरी लेना चाहिए।

साभार : पत्रिका भिलाई के 13 जुलाई 12  के अंक में प्रकाशित।