बस यूं ही
- बस दो-चार दिन ही तो बाकी हैं, तुम्हारे आने में। चालीस दिन गिन-गिन के गुजार दिए मैंने अंगुलियों पे। आज इतने हो गए और इतने बाकी बचे हैं। सच में इंतजार के दिन काटना बड़ा मुश्किल काम है। इंतजार ना हो तो दिन, महीने और साल बीतते देर नहीं लगती लेकिन जब दिन तय हो तो एक-एक लम्हा भारी हो जाता है। खैर, बीते चालीस दिन में मैंने कुछ नहीं किया है। जैसा तुम छोड़ गई थी, वैसा ही है सब कुछ। कुछ नहीं बदला सिर्फ चेहरे की रंगत के सिवाय...। कमर की चौड़ाई कम-कम लग रही है। बेल्ट के घेरे में भी गेप बन गया है। बस इतना सा ही तो अंतर आया है, बाकी सब कुछ वैसा ही है...। वो पूजा की थाली, वैसी की वैसी ही है, जैसा तुम छोड़कर गई थी। हां, रोजाना नहाकर अगरबत्ती जरूर जला देता हूं लेकिन माचिस की तीलियों एवं अगरबत्तियों के अवशेषों से थाली भर चुकी है। वह गैस का चूल्हा जिसे तुम कपड़े में ढंक कर गई थी, अब भी वैसा ही है। काफी धूल जम चुकी है्र, उस पर है। और वो बर्तन जिनको धोकर तुम बड़े ही सलीके के साथ रखकर गई थी। उसी अवस्था में ही रखे हुए हैं। एक कटोरी व एक चम्मच के सिवाय मैंने किसी को हाथ नहीं लगाया। सोफे पर बच्चों के बिखरे कपड़े और किताबें आज भी वैसी ही हैं, चालीस दिन से... क्रमश:
और हां, वह तुलसी का पौधा आज भी वैसा ही हरा है। बारिश का पानी लगने से उसकी रंगत ही बदल गई है। फूटी हुई आधी मटकी को कितने प्यार से तुमने गमला बना दिया था। तेज आंधी एवं बारिश के कारण वह गमला कई बार लुढ़का है और टूट भी चुका है। मैंने कई बार उसको सीधा किया है, बड़ी ही मुश्किल से। हां, मैं रोज तुलसी में पानी देता हूं, लेकिन उसमें पानी अब कम ही ठहरता है। अंदर की मिट्टी भी कठोर होगई है। पानी अंदर जाता भी कम है। एक बार मिट्टी की खुदाई की थी लेकिन अब वह फिर दुबारा वैसी ही हो गई है। खैर, अब तुम्हारा ही इंतजार है कि ताकि इस टूटे एवं कृत्रिम गमले को फेंक कर उसकी जगह नया खरीदा जा सके। और हां, छत्त भी वैसी है, जैसी तुम छोड़कर गई थी। बारिश के कारण मिट्टी बहकर चली गई वरना, मैंने तो एक भी दिन बुहारी नहीं लगाई। पड़ोस में सड़क बनी है, इस कारण घर व छत्त पर धूल भी काफी जमा हो गई थी। खैर, बुहारी ही क्या कई मामलों में मैं आज भी आलसी हूं...। कितनी ही बार तुमने कहा है कि रोटी बनाना सीख.लो .. आप बाहर का खाना ठीक से नहीं खा पाते, लेकिन खाना बनाना बस का नहीं है। तुमने तो यह भी कहा कि बना नहीं सकते तो कम से कम घर के बाहर जो चाय का खोखा है, वहां तक ही चले जाया करो। सुबह उठकर चाय तो पी लिया करो...। लेकिन इतनी हिम्मत होती तो बना ही लेता ना... क्रमश...
अब तुम भले ही नाराज हो जाओ लेकिन पुराने अखबार की ढेर से इस बार मैंने रेसिपी वाले पन्ने बिलकुल भी नहीं निकाले। मुझे मालूम है पिछले पांच साल से तुम रेसिपी के पन्ने अखबार से निकाल कर रख सुरक्षित रख लेती हो लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। अभी दस दिन पहले की बात है मैंने सारी रद्दी बेच दी। पूरी पचास किलो हुई। खरीदने वाला भी बहुत खुश था, बोला भाईसाहब दिनभर अब भटकना नहीं पड़ेगा। तुम होती तो ऐसा हरगिज भी नहीं करने देती...। कोई नहीं थोड़े दिन की ही तो बात है, दुबारा एकत्रित कर लेना...। हां, इस बार एक बड़ा काम जरूर सीख गया हूं। करता भी क्या, चारा भी नहीं था। कहा भी गया है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। पिछले माह की ही तो बात है। एक दिन रात को अचानक मैसेज आया और कहा गया कि कल दोपहर को जयपुर के लिए निकलना है। कपड़े सारे मैले थे, रात को धोबी कहां से आता। यह तो गनीमत थी कि वाशिंग पाउडर डिब्बे में बचा हुआ था वरना पूरे अरमानों पर पानी फिर जाता। फोन पर पूरे बीस मिनट लगे थे तुमसे सारी प्रक्रिया जानने में...। वाशिंग मशीन में कितना पानी भरना है..। कितना पाउडर डालना है... कौनसा बटन कब दबाना... है। सब सीख गया। अब तो तीन बार ऐसा कर चुका हूं..। अब पूछने की जरूरत भी नहीं है। सब याद हो गया, कब क्या करना होता है..। सच में मजबूरी बहुत कुछ सीखा देती है....। .. क्रमश...
हां एक बात तो भूल ही गया था। पता नहीं तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी। खैर, आलसी होने का तमगा तो तुमने भिलाई आते ही दे दिया था। याद है ना, नए साल पर कॉलोनी में आयोजित कार्यक्रम में जब तुमको पति की एक कमजोरी बताने को कहा गया था और तुमने तपाक से मुझ पर आलसी होने का ठपा लगा दिया था। जब सार्वजनिक रूप से बदनाम ही हो गया तो फिर आलस्य कहीं दिखना भी तो चाहिए ना...। हां तो मैं कह रहा था कि बैडरूम में पिछले चालीस दिन से नहीं सोया हूं .. गर्मी ज्यादा थी। बाहर हॉल में ही कूलर लगा लिया। ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, वहीं दीवान पर बिस्तर लगा लिया। बैडरूम का नजारा तो वैसा का वैसा ही है। वो बैड के ऊपर बच्चों के द्वारा लगाया गया कलेण्डर आज भी वैसे ही लटका हुआ है। एक तरफ से उखडा हुआ है। मैंने उसको फिर से नहीं चिपकाया है। और वह दीवार पर टंगा कलेण्डर आज भी अप्रेल का पन्ना ही दिखा रहा था। घर जाने की खुशी में हम वो पन्ना पलटना ही भूल गए थे। और उसके बाद अप्रेल क्या... मई भी बीत गया और अब जून भी बीतने को है..। बैडरूम की वो खिड़कियां जो तुम बंद करके गई थी आज भी बंद ही हैं। खिड़की खोलकर बाहर का नजारा देखने की कभी इच्छा भी नहीं हुई। हां महीने भर से बैडरूम में जरूर जा रहा हूं.. कम्प्यूटर जो लगवा लिया है। तन्हाई का मौसम गुजारने में वो मेरा सबसे कारगर सहारा बना... क्रमश...
बात गैस चूल्हे की ही नहीं है, वो कूकर का ढक्कन भी तो दीवार पर उसी तरह टंगा हुआ है, जैसा तुम छोड़ कर गई थी। वह कैंची.... व मोबाइल का चार्जर भी वहीं के वहीं पर हैं। मैंने उनको हाथ नहीं लगाया है। और वो बड़ा सा स्टील का डिब्बा जिसमें ऑटा रखा है, मैंने उसको आज तक खोल कर नहीं देखा है। पता नहीं किस हाल में होगा। तुम ही कहती हो कि ऑटा ज्यादा पुराना हो जाए तो उसमें इल्लियां पड़ जाती हैं। हो सकता है पड़ गई हों, अब यह सब तुमको ही देखना है आकर। अरे हां खिड़की में रखा वह बड़ा सा शीशा भी वैसे का वैसा ही है। हो सकता है उस पर धूल जमी हो... पता भी कैसे चले... मैंने उसको छूकर भी नहीं देखा...। टीवी भी उसी हाल में है। उसका देखने की फुर्सत ही नहीं मिली। घर तो कहने भर का है। अधिकतर समय तो आफिस में ही गुजर रहा है। बस आधी रात बाद लौटने तथा खाने व सोने के अलावा फिलहाल घर पर और कोई काम भी नहीं है। हां टीवी की जगह अब कम्प्यूटर ने ली है। लेकिन उस पर बैठना भी तो तभी हो पाता है जब फुर्सत हो...। घंटे-आधा घंटे के लिए मेल एवं फेसबुक अपडेट चैक कर लेता हूं...। याद आया, वो पानी से भरी मटकी रिस-रिस कर आधी से ज्यादा सूख गई है लेकिन मैंने कभी उसको ना तो भरा और उसका पुराना पानी निकाला। दो चार पानी की बोतलें दो-चार दिन से भरकर फ्रीज में रख देता हूं..। फ्रीज भी खाली ही पड़ा है। इसको भी शायद तुम्हारा ही इंतजार है। कितना सामान ठूंस देती हो तुम फ्रीज में.. खोलते वक्त भी बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है, लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ नहीं है। फ्रीज को ठंडा करने का पैमाना तुम एक नम्बर पर करके गई थी, उसको जरूर मैंने दो पर कर दिया है। पानी कुछ कम ठण्डा हो रहा था..., बाकी कुछ नहीं छेड़ा है। फ्रीज पर रखी अपनी वो फोटो भी उसी अंदाज में रखी हुई है। फ्रीज खोलते-बंद करते वक्त वह एक दो बार गिरी लेकिन उसको फिर ठीक से जमा दिया..। बस इतना सा काम जरूर किया है....क्रमश:
सब कुछ वैसा का वैसा ही है लेकिन एक परिर्वतन और आ गया है मेरे में। मुझे मालूम है यह परिवर्तन तुमको बेहद खुशी देगा। सुबह बिना कुछ खाए आफिस जाने की मेरी को आदत लेकर अपने बीच कितनी ही बार बहस हुई है। मैं लेट होने का बहाना बनाकर हमेशा जल्दी निकलने का प्रयास करता और तुम....तुमको तो जैसे लेट से कोई मतलब ही नहीं है। कहती दो-चार मिनट लेट हो गए तो कौनसा पहाड़ टूट जाएगा। एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब तुमने बिना नाश्ता करवाए हुए आफिस भेजा हो। गांव में तुमको एवं बच्चों को जब छोड़कर जब वापस भिलाई आया तो तुमने लड्डू बनाकर दे दिए थे। और उसी अंदाज में कहा था कि सुबह खाली पेट आफिस मत जाना... । सच में लड्डुओं से काफी सहारा मिला लेकिन टिफिन का खाना खाकर मैं कहां रंजने वाला था, लिहाजा लड्डू किसी दिन ज्यादा भी खा लिए..। आखिर लड्डुओं का क्या दोष.. वो तो सीमित मात्रा में थे। बीस दिन पहले ही खत्म हो गए। लेकिन अब सुबह हल्का-फुल्का नाश्ता करके घर के आफिस जाने की आदत और अधिक मजबूत हो चुकी है। मैंने उसका भी विकल्प खोजा है और फल लाकर रख लेता हूं..। सुबह आफिस जाने से पहले उनका सेवन करना अब रोजमर्रा का हिस्सा बन चुका है। यह अलग बात है बीस दिन नाश्ते में सिर्फ फलों का ही सहारा है। तुम पास हो तो ऐसा कब होता है। रोजाना कुछ नया करने का आइडिया दिमाग में चलता ही रहता है। तभी तो सातों दिन अलग-अलग नाश्ता मिल जाता। इधर, सुबह-शाम के भोजन की बात ही मत पूछो.. बस पेट भरने के लिए खाना है, यह सोचकर खाता रहा...। टिफिन वाले ने तो दही या छाछ देने से इनकार कर दिया। रुखा-लूखा खाने की तो बचपन से ही आदत नहीं रही। इसीलिए तो आजकल बाजार से रोजाना दही लेकर आ रहा हूं.. दो टाइम चल जाता है। सच में अगर दही वाला आइडिया दिमाग में नहीं आता तो.. हालात और भी खराब हो जाती...। इतना कुछ करने के बाद भी दो दिन बार तो आधी-अधूरी भूख के साथ ही सोना पड़ा। तुम होती तो ऐसा बिलकुल नहीं होता.... क्रमश..।
और बैडरूम में लगी वो मच्छरदानी तो हमने उसी वक्त हटा दी थी जब हम गांव के लिए रवाना हुए थे। वापस आया तो गर्मी इतनी हो गई थी कि अंदर मच्छर गायब से हो गए थे। बाहर छत्त पर जरूर उनका साम्राज्य कायम था और अब भी है। वैसे अंदर सोने के कारण मच्छरदानी लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। ईमानदारी की बात तो यह है कि उसको लगाने में कितनी कसरत करनी पड़ती है। अब इतनी मशक्कत कौन करे... यही सोच कर मैंने मच्छरदानी को छेड़ा तक नहीं..। बारिश का मौसम एवं आंधी अंधड़ आने के कारण इन दिनों बिजली ने बहुत परेशान किया..। तुम्हारे जाने के बाद दो रातें ऐसी गुजरी हैं जब मच्छरों की वजह से ठीक से सो नहीं पाया हूं..। एक दिन तो जैसे ही आफिस से आया और कमरे की कुण्डी खोली और बिजली गुल। मोबाइल की हल्की सी रोशनी में मोमबत्ती का वह आधा टुकड़ा इधर-उधर देखने के बाद बड़ी मुश्किल से मिला। वो पूरा जल गया लेकिन बिजली नहीं आई। देर रात मोमबत्ती कहां से लाता। पड़ोसी के पास जाकर दो मोमबत्ती मांग कर लाया। उसके बाद अगले दिन तो पूरा पैकेट खरीद कर ले आया...। हां मच्छरदारनी की बात चल रही थी। वो हुआ यूं कि बिजली गुल होने पर होने पर अंदर गर्मी का भभका इस कदर था कि लेटना तो क्या बैठना तक मुश्किल हो रहा था। खाना खाया तब तक पसीने में सरोबार हो गया। तकिया एवं दरी लेकर बाहर छत्त पर आया तो मच्छरों की फौज इस कदर पीछे पड़ी जैसे वो मेरा ही इंतजार कर रही हो। अंदर जाकर पतली चद्दर लेकर आया लेकिन बाहर का मौसम भी चद्दर ओढऩे की अनुमति नहीं दे रहा था। सच में मुझे इस दिन तुम्हारी बहुत याद आई। तुम होती तो रात आंखों में नहीं बल्कि आराम से सो कर गुजरती। याद है एक बार पहले भी ऐसा हुआ था, तो तुमने छत्त पर पता नहीं इधर-उधर से रस्सी जोड़कर मच्छरदानी टांगने का जुगाड़ कर दिया था.... लेकिन मैं यह जुगाड़ कर नहीं पाया और रात भर मच्छरों से लड़ता रहा....। क्रमश...।
और हां, तुम्हारे होने और न होने का फर्क बस मैं ही जान सकता हूं और कोई नहीं...क्योंकि जो भुक्तभोगी होता है, वह बेहतर जानता है। हो सकता है तुम्हारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा हो लेकिन फिर भी हमारे हालात एवं प्रतिस्थितियों में दिन रात का अंतर है। मेरी तन्हाई वास्तव में तन्हाई है और तुम तन्हा होकर भी तन्हा नहीं हो। वो इसलिए क्योंकि... तुम्हारे पास बच्चे हैं, परिजन हैं, परिचित हैं, रिश्तेदार हैं। इतने लोगों के बीच वक्त कैसे गुजर जाता है तुमको भी पता होगा। और इधर, मेरा वक्त.. बस कुछ मत पूछो। लोग आफिस से जाने से जी चुराते होंगे लेकिन फिलहाल मेरे को तो घर से बेहतर आफिस ही लगता है। काम में व्यस्तता की वजह से तन्हाई महसूस ही नहीं होती है लेकिन आफिस से लौटने के बाद... टीवी और कम्प्यूटर ही तन्हाई के साथी हैं। बिजली चली जाए तो एक-एक लम्हा गुजारना भी मुश्किल हो जाता है। और आजकल नींद भी पता नहीं कहां चली गई है। तुम्हारे रहते तो कई बार मेरी दोनों मोबाइल के अलार्म से भी आंख नहीं खुल पाती थी। शायद जेहन में यह भरोसा था कि देरी नहीं होगी...। मैं जागूं ना जागूं तुम जाग जाओगी और उठा दोगी.. यह बात दिमाग में हो तो फिर नींद इत्मिनान के साथ ही आएगी ना। तभी तो बच्चों को स्कूल बस छोडऩे के बाद फिर अक्सर सो लेता था, तुम्हारे आने के बाद शायद यह क्रम फिर शुरू हो जाए... लेकिन अब का आलम तो यह है कि इत्मिनान की नींद सोए मुद्दत हो गई है। एक अनजाना सा भय रहता है, कहीं आफिस पहुंचने में देर ना हो जाए...। कहीं देर तक सोया हुआ ना रह जाऊं, इसी भय के चलते कभी-कभी तो सुबह चार-बजे भी आंख खुल जाती है। घड़ी ठीक दीवान के ऊपर है। जब भी आंख खुलती है तो बरबस नजर उसी को और उठ ही जाती है। कैसी विडम्बना है, अकेला होने के बाद भी चैन की नींद को तरस रहा हूं..। कभी सुबह की मीटिंग से जल्दी फारिग हो जाता हूं तो भी अकेलापन एवं घर का सन्नाटा डराता रहता है... ऐसे में नींद कहां... और चैन कहां.... क्रमश...।
देखो ना.. बच्चों के दिन में शोर के बावजूद भले ही थोड़ी देर के लिए लेकिन मैं कितना निश्चिंत होकर सो लेता था। मेरी इस आदत से तुम कितनी ही बार मेरे से चिढ़ गई। बार-बार एक ही शिकायत... अजीब आदमी हो इतने शोर में भी घोड़े बेचकर सो जाते हो...। दरअसल यह तुम्हारी पीड़ा है, क्योंकि तुम ऐसे माहौल में सोने की आदी नहीं हो...मैं भी नहीं था लेकिन खुद को समय के साथ ढाल लिया। वक्त ही कितना है.. और जो मिलता है वह टुकड़ों में... खैर अब किसी तरह का शोर नहीं है... अजीब सी खामोशी है... बिलकुल सब ठहरा हुआ सा लगता है। हर तरफ शांति है। इतना शांत माहौल कि पिन भी गिराओ तो आवाज आएगी... लेकिन फिर नींद नहीं है। सच में एकांतवादी होना भी कितना चुनौतीपूर्ण काम है। कभी यह आलम था कि एकांत से बेहतर कोई विकल्प ही दिखाई नहीं देता है... और अब यह आलम है कि एकांत से भी डर लगने लगा है। एकांतवाद के पक्षधरों एवं हिमायतियों के पास अपने-अपने तर्क होंगे लेकिन हकीकत यह है कि पारिवारिक सुख भोगने के साथ यकायक एकांतवादी हो जाना किसी सजा से कम नहीं है। मेरा अनुभव तो यही कहता है... और वह भी तब तब आप अपनी माटी एवं अपने लोगों से दूर हो...। अपनों से कटने तथा माटी से दूर होने का दर्द भी अगर शिद्दत के साथ महसूस किया जाए तो एकांत में ही होता है। अजनबी शहर एवं अजनबी चेहरों के बीच रहने और काम करने का हौसला भी तो सबसे पहले परिवार से ही मिलता है। ऐसे प्रतिकूल में हालात में अगर कोई एकांकी जीवन गुजारे तो कल्पना मात्र से मन सिहर उठता है। भावनाओं के तूफान में हिचकोले खाते हुए देखो ना मैं कैसे दार्शनिक अंदाज में बह गया... पता ही नहीं चला..। आखिरकार लब्बोलुआब यही निकलता है कि व्यक्ति की पहचान, उसका हौसला, उसका सहारा और उसका सम्बल उसके परिवार से ही है। घर की रौनक परिवार से है। वैसे भी अकेले और जड़ों से कटे आदमी और जानवर में मेरे को तो कोई बड़ा अंतर नजर नहीं आता.. क्रमश...
सुबह की शुरुआत चाय के साथ करने की तो पुरानी आदत रही है। बचपन से ही। पहले मां चाय बनाकर उठाया करती पढऩे के लिए। वैसे सुबह जल्दी उठकर चाय बनाने का क्रम गांव में आज भी जारी है। मां आज भी सबसे पहले ही उठती है और सबको चाय बनाकर पिलाती है। और इधर तुम...तुम भी तो कमोबेश ऐसा ही करती हो..। तभी तो पहली चाय बिस्तर में ही हो जाती है। आफिस जाते-जाते तो दूसरी भी बन जाती थी। तुमने कभी मना नहीं लिया... भूल से कभी मेरे को दूसरी याद नहीं रही तो तुमने ही पूछा, चाय नहीं लोगे क्या...। याद है ना एक दो बार तुमने भी कहा था, कभी तो आप भी चाय बना लिया करो...। और कुछ ना सीखो कम से चाय तो सीख लो। हम भी तो देखें कैसी चाय बनाते हो...। और मैंने न जाने कितनी ही बार तुम्हारे प्यार भरे आग्रह को बड़ी ही बेफिक्री वाले अंदाज में टाल दिया। लेकिन मेरा यह व्यवहार शायद ही तुमको नागवार गुजरा होगा। वैसे एक-दो बार तो चाय बनाने की कोशिश जरूर की है... और भी बनाई भी... लेकिन बात फिर वही आलस्य वाली आ जाती है। पता नहीं क्या हो गया है, गृहस्थी का काम मैं उतने उत्साह एवं रुचि के साथ नहीं कर पाता हूं जितना आफिस का करता हूं। घर आने के बाद भी आफिस से संबंधित न जाने कितने ही फोन आते हैं, उनमें कितना वक्त लगता है, लेकिन तुम बिना किसी शिकायत के चुपचाप अपने काम में तल्लीन रहती हो। क्रमश...11.मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि अंगुलियों पर दिन गिनने से न तो वे जल्दी बीतते हैं और ना ही कम होते हैं। वक्त तो अपने हिसाब से ही चलता है। फिर भी झूठी दिलासा समझो या मन को बहलाने का शगल.. रोजाना इतने गए... इतने शेष रहे की गिनती चलती ही रहती है। 43 दिन गुजर गए...। वैसे तो तुमको भिलाई से गए 62 दिन हो गए लेकिन बीच में एक मीटिंग के सिलसिले में जयपुर आया तो फिर दो दिन गांव रुक गया था। 8 मई को मैं भिलाई लौट आया था। यह दिन कैसे बीते हैं, कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है। खैर, अब तो एक दिन से भी कम समय शेष रहा है...। अगले पांच दिन भी बड़ी व्यस्तता भरे हैं। लगातार सफर ही सफर.... शुक्रवार सुबह दिल्ली पहुंचने के बाद इसी दिन रात को जोधपुर की गाड़ी पकडऩी है। 22 जून सुबह जोधपुर पहुंच जाऊंगा। शादी के नौ साल के बाद संभवत: यह पहला ही मौका होगा जब शादी की वर्षगांठ ससुराल में मनाऊंगा। वैसे तो सिर्फ पहली वर्षगांठ को छोड़कर हमने सारी वर्षगांठ साथ-साथ ही मनाई है। इस बार ससुराल का संयोग भी बना है... यह सब अकस्मात ही हो गया.. क्योंकि रेल में आरक्षण तो मैं 15 जून से ही करवाना चाह रहा था... बच्चों की स्कूल जो शुरू हो गई है, लेकिन वेटिंग-वेटिंग... देखते-देखते आगे बढ़ता गया.. तब जाकर यह आरक्षण संभव हो पाया है। वह भी टुकड़ों में... पांच दिन बाद जब वापस भिलाई पहुंचेंगे तो कोई बड़ी बात नहीं कि थकान से कमर टेढ़ी हो जाए... क्रमश:
- बच्चों की पढ़ाई से याद आया...। पिछले साल भी तो कुछ ऐसा ही हुआ था। याद है बिलासपुर से जब भिलाई तबादला था। इसके बाद बच्चों का दाखिला करवाते-करवाते पूरा जुलाई बीत गया था। करीब दो माह का होमवर्क पेंडिंग रह गया था। मासूम बच्चे इतना सारा काम कैसे करते। वो रुटीन का होमवर्क करें या फिर पेंडिंग को निबटाए.. मेरे को तो यही चिंता सताए जा रही थी लेकिन तुमने तुमने देखते-देखते ही चुटकियों में होमवर्क का काम पूरा कर दिया। कहने भर को इस काम में थोड़ी बहुत मदद मैंने भी की थी लेकिन सारा काम तुम्हारा ही था। पुस्तकों पर जिल्द चढ़ाने से लेकर उनके रखरखाव तक की जिम्मेदारी भी तुम्हारे ही जिम्मे है। बीते सत्र में एक दिन भी ऐसा नहीं था जब मैंने बच्चों को होमवर्क करवाया हो... उनको होमवर्क करवाने से लेकर परीक्षा के दौरान तैयारी करवाने तक का सारा काम तुमने ही तो देखा था...। वैसे भी तुमको पढ़ाने का अभ्यास ज्यादा ही है और बाकायदा पढ़ाने की डिग्री भी है। शादी के बाद जॉब करने की इच्छा तो तुम्हारी भी थी लेकिन मैंने ही मना कर दिया..। याद है ना मैंने कहा था कि बच्चे जब तक सक्षम नहीं हो जाते.. वे खुद उठकर नहाकर स्कूल जाने लग जाए तब कहीं जाकर जॉब करने की सोचना... ऐसा न हो कमाई के चक्कर में हम बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर बैठें...। खैर, मेरी बात तुम मान गई। अरे याद आया, इस बार भी तो बच्चे ज्यादा तो नहीं सप्ताह भर जरूर लेट हो जाएंगे। सात दिन का बकाया होमवर्क भी तो तुमको ही देखना... पिछले साल भी तो देखा था... क्रमश
एक बात और एकांकी आदमी भले ही रचनात्मक काम से ना जुड़ा हो लेकिन दिमाग में विचारों का द्वंद्व तो चलता ही रहता है। वह भूत-भविष्य के बारे में सोचता ही रहता है। कई तरह की कल्पनाएं करता है.. सुनहरे सपने देखता है..। इस बार एकांकीपन में मैंने भी कई बार सोचा... कई तरह की कल्पनाएं की हैं, कई सपने बुने..। खुद के बारे में भी और तुम्हारे बारे में खूब सोचा। न जाने कितनी ही बार घरेलू कामकाज को लेकर आपस में तुलना कर बैठा। केवल घर के मामलों में मेरे आलसी स्वभाव को लेकर अपनी कई बार स्वस्थ बहस हुई है...। लेकिन कभी झगड़े में तब्दील नहीं हुई है। मेरा मानना है यह सब अपने स्वभाव की समानता एवं परिवार से मिले संस्कारों का ही प्रतिफल है। वैसे भी यह चापलूसी या मस्का लगाने वाली बात नहीं है और ऐसा करना मेरी आदत भी नहीं है। मैं कई बार सोचता हूं... अगर तुम भी मेरी तरह घर के मामले में उतनी ही आलसी होती तो क्या गृहस्थी की गाड़ी आज जिस अंदाज में सुचारू चल रही है, वैसे चल पाती..। सच में अगर तुम मेरी ही तरह होती तो यकीनन गृहस्थी का गाड़ी का संतुलन बिगड़ता और वह हिचकोले ही खाते ही रहती..। मुझो खुशी इसी बात की है कि मेरी इस कमजोरी को... मेरे इस आलस्य को तुमने दिल पर बिलकुल नहीं लिया...। जीवन के प्रति सकारात्मक सोच एवं वर्तमान में जीने का अंदाज ही तुम्हारी सबसे बड़ी पूंजी है.. और मेरा सौभाग्य.. और यह सब होना या मिलना किस्मत की बात है... ऊपर वाले के हाथ है....क्रमश..।
भले ही कोई मेरी बात से संतुष्ट या सहमत ना हो लेकिन मेरा मानना है कि एकांकी आदमी ज्यादा सोचता है। वह अपनी तन्हाई में भी मनोरंजन के रास्ते खोजता है। मेरे को देखो ना.. वैसे भी काम लिखने-पढऩे का ही है... लेकिन वह निजी जिंदगी में भी रच-बस गया है। अक्सर ऐसा होता भी है। जॉब का असर निजी जिदंगी में कहीं न कहीं परिलक्षित होता ही है। पिछले साल भी तो कुछ ऐसा ही हुआ था। याद करो... तुम को गांव छोड़कर जब मैं बिलासपुर आया और पहले दिन तुमको मोबाइल पर मैसेज भेजा था। दिल की बात मैंने चार लाइन की रुबाई के माध्यम से व्यक्त की थी। तुमने हौसला क्या बढ़ाया वह तो रोजाना का हिस्सा बन गया। लगातार तीस दिन तक मैंने तुकबंदी कर-करके रुबाइयां लिखी और प्रतिदिन तुमको मैसेज भी भेजे। मोबाइल का सेंटबॉक्स फुल हो जाने के कारण मैंने वह सारी रुबाइयां एक डायरी में लिख ली थी। मोबाइल में ज्यादा दिन तक नहीं रख सकता.. वह मल्टीमीडिया नहीं है। बिलकुल साधारण सा होने के कारण उसकी मैमोरी भी ज्यादा नहीं है। खैर, डायरी में लिखने से दिल नहीं भरा तो उनको मैंने अपने ब्लॉग पर भी डाल लिया था। चूंकि इस बार हालात ऐसे बने नहीं...। व्यस्तता के चलते इस दिशा में देर से सोचा...। वह भी तब जब भिलाई से जोधपुर रवाना होने में मात्र तीन-चार दिन का समय शेष रह गया। लेकिन मुझे लगता है इस बार काम रुबाइयों से अधिक प्रभावी हैं.. हां एक बात और यह पोस्ट तुम लगातार पढ़ भी पा रही हो... तुमको मैंने फेसबुक से जो जोड़ दिया है। एक दो पोस्ट पर तो तुमने कमेंट भी कर दिए हैं..। कपड़े धोने की बात पर लगता है तुम ज्यादा ही खुश हो..। लेकिन मेरी आदत से तो तुम परिचित ही हो.. तुम्हारे आने के बाद मेरा द्वारा कपड़े धोने पर विराम लगना तो तय सा ही है.. क्रमश....
अब देखो ना... तन्हाई को सार्वजनिक करने से लोग डरते हैं। अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। शर्माते हैं...बस जेहन में एक ही सवाल.. पता नहीं लोग क्या सोचेंगे। इसमें डरना किस बात का है। मैंने जब से यह पोस्ट फेसबुक पर लगाई है तब से परिचितों एवं दोस्तों के काफी सुझाव मिल रहे हैं। इतना ही नहीं कई अजनबी भी बेझिझक अपनी राय दे रहे हैं। वैसे भी मैं तो साफ दिल का आदमी हूं... स्पष्ट व सच मुंह पर कहना मेरी फितरत है। तुम तो जानती ही हो..। मैं जीवन को रहस्यमयी तरीके से जीने का आदी कभी नहीं रहा। हमेशा खुली किताब की तरह जिंदगी बिताने के दर्शन में ही विश्वास करता आया हूं। बनावटीपन व दिखावा तो बिलकुल भी पसंद है नहीं...। विशुद्ध रूप से गांव का आदमी हूं... इसलिए अंदर-बाहर का भेद भी अपनी समझा से बाहर है। इसीलिए तो दुराव या भेदभाव जैसे शब्दों से भी अभी तक अछूता ही हूं..। बिलकुल कोरा... सफेद कागज की तरह...। मेरा मानना यह भी है कि चाहे सुख हो या दुख दूसरों के साथ साझा जरूर करना चाहिए....। बांटने से खुशी कम नहीं होती है.. लेकिन पीड़ा को बांटने से उसका एहसास हल्का जरूर हो जाता है। कुछ तसल्ली मिल जाती है..। मैंने भी अपनी तन्हाई रूपी पीड़ा सभी के साथ बांटी...। इसके बदले में जो आनंद की जो अनुभूति हुई वह मैं ही जानता हूं..। तुम्हारा गांव जाना तय था... इतने दिन मेरा अकेले रहना तय था। ऐसे में मैं अकेला अंदर ही अंदर घुटता रहता.. कूढ़ता रहता... तो सोचो जीवन क्या ऐसा होता.. क्या ऐसा लिख पाता.. शायद नहीं..। कहा भी गया है कि सोच बदलने से सितारे बदल जाते हैं। खैर, भावनाओं का प्रवाह ही ऐसा है कि फिर दार्शनिकों जैसी बातें कर रहा हूं..। हमारी-तुम्हारी बातें कहां से शुरू हुई और कहां तक पहुंच गई...। कहीं यह पराकाष्ठा तो नहीं... क्रमश...।
करीब डेढ़ माह ससुराल में बिताने के बाद पिछले 19 दिन से तुम मायके में हो...। ससुराल और मायके की भूमिका में फर्क बहुत होता है। जमीन-आसमान का। ससुराल की सीमाएं.. हैं मर्यादाएं.. हैं और अति व्यस्तता के चलते फोन पर तुमसे बात भी ठीक से नहीं हो पाती थी। लेकिन मायके में आकर तुम परिवार के बीच इतना खो गई कि कई बार मेरे को ऐसा आभास हुआ जैसे मैं गौण हो गया हूं...। फिर भी देर-सवेर तुम फोन जरूर करती हो। वैसे भी परिवार के बीच रहकर तुम भले ही कुछ ना करो.. उनके बीच में रहना भी तो किसी व्यस्तता से कम नहीं है। मेरे साथ भी तो यही होता है जब गांव जाता हूं..। वैसे फोन पर तुमसे जो नियमित वार्तालाप होता है...उससे लगता है कि तुम फेसबुक अपेडट भी चैक करती रहती हो.. फिर भी कभी-कभी न जाने क्यों एक पल ऐसा भी लगता है कि मैं इतनी मेहनत करके बड़ी ही तल्लीनता के साथ दिल से लिख तो रहा हूँ लेकिन क्या तुम पढ़ भी रही हो..। ऐसा संभव हो भी सकता है, क्योंकि मायके का माहौल, काम से आजादी और अपनों के बीच हंसी-ठहाकों के दौर के बीच ना चाहते हुए भी व्यस्तता बढ़ जाती है। यह सब इसीलिए कह रहा हूं क्योंकि फेसबुक पर मैंने अपने एकांकीपन की जो बातें सार्वजनिक की हैं और उन पर जो प्रतिक्रिया आ रही है.. वो सब एक से बढ़कर एक.. हैं। सब अपने-अपने अंदाज में उसको परिभाषित कर रहे हैं। उसके मायने निकाल रहे हैं। मेरे को कई तरह की उपमाएं दी जा रही हैं। एक साथी ने तो तुलसीदास तक से तुलना कर दी.. कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली... खैर, यह सब तुम्हारा, दोस्तों, परिचितों एवं जानकारों को स्नेह है जो इस रूप में प्रदर्शित हो रहा हैं। सभी का आभार जताते हुए और अगले विषय की खोज में फिलहाल मैं इस एपीसोड पर अब यहीं विराम लगाता हूं..। एक बार पुन: सभी को मेरी तन्हाई का न केवल राजदार बनाने के लिए बल्कि हौसला बढ़ाने के लिए...।धन्यवाद।
Thursday, June 20, 2013
तुम बिन....
Sunday, May 26, 2013
लोकप्रियता का खेल
टिप्पणी
चुनावी साल है, इसलिए लगे हाथ अरबों रुपए के विकास कार्यों का भूमिपूजन भी धड़ाधड़ हो रहा है। लेकिन जिन कार्यों का भूमिपूजन हो रहा है, वे कब पूरे होंगे, उनकी समय सीमा क्या है, यह बताने की स्थिति में कोई नहीं है। फिलहाल तो सरकार का एकसूत्री कार्यक्रम भूमिपूजन कर तात्कालिक वाहवाही बटारेने का ही दिख रहा है। प्रदेश में ऐसे विकास कार्यों की लम्बी फेहरिस्त हैं, जिनका भूमिपूजन या घोषणाएं हुए तो मुद्दत हो गई लेकिन वे आजतक अमलीजामा नहीं पहन पाए। कई जगह तो भूमिपूजन के पत्थर तक गायब हो गए और घोषणाएं हवा-हवाई साबित हुई। भिलाई एवं दुर्ग शहर भी इस प्रकार के भूमिपूजनों एवं घोषणाओं से अछूते नहीं है। प्रदेश के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मंत्री शनिवार को खुर्सीपार में प्रस्तावित दस बिस्तर वाले अस्पताल के जच्चा-बच्चा केंद्र का उद्घाटन करने आ रहे हैं। अस्पताल बाद में शुरू होगा, पहले जच्चा बच्चा केन्द्र शुरू होगा। इस अस्पताल का भूमिपूजन भी पांच साल पहले हो गया था। इसके भवन निर्माण के लिए दानदाताओं ने भी सहयोग किया था, फिर भी प्रदेश सरकार को यहां तक आने में पांच साल का लम्बा वक्त लग गया और अब तक भी काम पूर्ण नहीं हुआ है। प्रदेश के मुखिया की घोषणा की सबसे बड़ी बानगी तो भिलाई का लाल बहादुर शास्त्री शासकीय अस्पताल सुपेला ही है, जहां पांच साल पहले की गई घोषणा के बाद भी सुविधाओं एवं संसाधनों में आज तक विस्तार नहीं हुआ है।
बहरहाल, सस्ती लोकप्रियता पाने या तात्कालिक वाहवाही बटोरने की मंशा से जनता का भला नहीं होने वाला। प्रदेश के मुखिया एवं उनके मातहत अगर वाकई कुछ करने की हसरत रखते हैं तो उनको सबसे पहले कथनी एवं करनी के भेद को खत्म करना होगा। भूमिपूजन के पत्थर लगाकर भूलने की बीमारी का इलाज भी जरूरी है, क्योंकि भूमिपूजन करके पत्थर लगा देने या अस्पताल खोलने भर से ही पीडि़तों को राहत नहीं मिलती। जरूरी है उनमें पर्याप्त स्टाफ हो, संसाधन हो। अगर यह सब नहीं होता है तो फिर 'विकास' का नारा व 'विकास यात्रा' दोनों ही बेमानी है।
साभार - भिलाई पत्रिका के 25 मई 12 के अंक में प्रकाशित।
Monday, May 20, 2013
तुम्हारा रिश्ता क्या है?
बस यूं ही
ट्रेन दुर्ग रेलवे स्टेशन से नागपुर के लिए रवाना हुई थी कि डिब्बे में टीटीई आ गया। बारी-बारी से सबकी टिकटें चेक की। मैंने बताया था कि मेरी टिकट दूसरे टीटीई के पास है और उनका नाम पार्थो सरकार है। मेरा जवाब सुनकर वह संतुष्ट हो गया। इसके बाद युवक की तरफ मुखातिब हुआ तो युवक ने जेब से ई-टिकट निकाली। टीटीई ने जब युवती से टिकट मांगा तो उसने सामान्य डिब्बे का टिकट दिखाया। टीटीई यह सब देखकर ऊंचे लहजे में बोला, अरे आप, इस डिब्बे में कैसे? आपके पास तो टिकट सामान्य डिब्बे का है। उठिए, आप अपने डिब्बे में जाइए। टीटीई की बात सुनकर युवक एवं युवती दोनों के चेहरों का रंग पीला पड़ गया। थोड़ी हिम्मत जुटाकर युवक बोला हम एडजस्ट कर लेंगे। टीटीई, युवक का जवाब सुनकर सकपकाया और बोला, भला ऐसे कैसे हो सकता है। तो फिर बोला, प्लीज अंकल देख लीजिए ना, कह रहा हूं कि हम बर्थ पर एडजस्ट हो जाएंगे। टीटीई फिर बोला, भइया सीट पर एडजस्ट तो हो जाओगे लेकिन इस डिब्बे में बैठने के लिए जुर्माना लगेगा, आपकी रसीद कटवानी पड़ेगी। युवक ने जिज्ञासावश रसीद की राशि के बारे में पूछा तो टीटीई ने जेब से रेट कार्ड निकाला, हिसाब-किताब लगाकर बोला 1105 रुपए लगेंगे और दोनों को एक ही सीट पर बैठना पड़ेगा। अलग से कोई सीट नहीं मिलेगी। संभवत: नागपुर में टीटीई बदल जाए तो उसकी कोई गारंटी नहीं है। अगर कोई आए तो आप उससे निवेदन कर लेना। 1105 रुपए का नाम सुनते ही युवक बगले झांकने लगा। युवक संभवत: नौसिखुआ था, वह टीटीई के अंदाज को सही तरह से भांप नहीं पाया। टीटीई भी बार-बार पूछने लगता, क्या सोचा, क्या-सोचा? जल्दी करो, जल्दी करो।
करीब पन्द्रह बीस मिनट बाद युवक हिम्मत करके बोला आप रसीद काट दीजिए। इसके बाद युवक ने अपना पर्स निकाला तो उसमें सौ-सौ के दो चार नोट थे। बाकी छोटे नोट थे। चूंकि युवक को अपने पर्स का अंदाजा था, इसलिए कभी वह उसको खोलकर देखे तो कभी बंद कर दे। युवती चुपचाप यह माजरा देख रही थी। वह समझ गई थी कि मामला पैसे पर अटक रहा है। उसने बिना देरी किए तत्काल एक हजार रुपए का नोट निकालकर युवक को थमा दिया।
टीटीई ने तत्काल पैसे गिने और रसीद थमाकर अगले केबिन की ओर चला गया। इधर, युगल पर टिप्पणियों की बौछार होने लगी। रसीद के पैसे पर सभी ने कहा कि बिलकुल मंगल हो गया है। इसके बाद युगल और भी खुलकर बातें करने लगे। दरअसल, युवक मूलत: ओडिशा का रहने वाला था और रायपुर में ही उसने पढ़ाई की और यहीं पर बीपीओ में नौकरी करने लगा। जैसा कि युवक ने बताया कि युवती भी उसके साथ ही काम करती है। युवक किसी साक्षात्कार के सिलसिले में इंदौर जा रहा था। सफर में बोरियत ना हो लिहाजा वह युवती को भी साथ ले आया। उनके तौर-तरीकों एवं टिकट देखने से यह तो अंदाजा हो गया था कि युवक का कार्यक्रम पहले से तय था जबकि युवती का आनन-फानन में ही बना था। सुबह यह युगल भोपाल रेलवे स्टेशन पर उतरा। इस दौरान रोचक वाकया यह हुआ कि पूरे घटनाक्रम को देखने वाला रायपुर का एक सिंधी युवक आखिरी में युवक से पूछ बैठा, यार तुम्हारा रिश्ता क्या है?। सिंधी के सवाल पर केबिन में ठहाके गूंज उठे।ट्रेन दुर्ग रेलवे स्टेशन से नागपुर के लिए रवाना हुई थी कि डिब्बे में टीटीई आ गया। बारी-बारी से सबकी टिकटें चेक की। मैंने बताया था कि मेरी टिकट दूसरे टीटीई के पास है और उनका नाम पार्थो सरकार है। मेरा जवाब सुनकर वह संतुष्ट हो गया। इसके बाद युवक की तरफ मुखातिब हुआ तो युवक ने जेब से ई-टिकट निकाली। टीटीई ने जब युवती से टिकट मांगा तो उसने सामान्य डिब्बे का टिकट दिखाया। टीटीई यह सब देखकर ऊंचे लहजे में बोला, अरे आप, इस डिब्बे में कैसे? आपके पास तो टिकट सामान्य डिब्बे का है। उठिए, आप अपने डिब्बे में जाइए। टीटीई की बात सुनकर युवक एवं युवती दोनों के चेहरों का रंग पीला पड़ गया। थोड़ी हिम्मत जुटाकर युवक बोला हम एडजस्ट कर लेंगे। टीटीई, युवक का जवाब सुनकर सकपकाया और बोला, भला ऐसे कैसे हो सकता है। तो फिर बोला, प्लीज अंकल देख लीजिए ना, कह रहा हूं कि हम बर्थ पर एडजस्ट हो जाएंगे। टीटीई फिर बोला, भइया सीट पर एडजस्ट तो हो जाओगे लेकिन इस डिब्बे में बैठने के लिए जुर्माना लगेगा, आपकी रसीद कटवानी पड़ेगी। युवक ने जिज्ञासावश रसीद की राशि के बारे में पूछा तो टीटीई ने जेब से रेट कार्ड निकाला, हिसाब-किताब लगाकर बोला 1105 रुपए लगेंगे और दोनों को एक ही सीट पर बैठना पड़ेगा। अलग से कोई सीट नहीं मिलेगी। संभवत: नागपुर में टीटीई बदल जाए तो उसकी कोई गारंटी नहीं है। अगर कोई आए तो आप उससे निवेदन कर लेना। 1105 रुपए का नाम सुनते ही युवक बगले झांकने लगा। युवक संभवत: नौसिखुआ था, वह टीटीई के अंदाज को सही तरह से भांप नहीं पाया। टीटीई भी बार-बार पूछने लगता, क्या सोचा, क्या-सोचा? जल्दी करो, जल्दी करो।करीब पन्द्रह बीस मिनट बाद युवक हिम्मत करके बोला आप रसीद काट दीजिए। इसके बाद युवक ने अपना पर्स निकाला तो उसमें सौ-सौ के दो चार नोट थे। बाकी छोटे नोट थे। चूंकि युवक को अपने पर्स का अंदाजा था, इसलिए कभी वह उसको खोलकर देखे तो कभी बंद कर दे। युवती चुपचाप यह माजरा देख रही थी। वह समझ गई थी कि मामला पैसे पर अटक रहा है। उसने बिना देरी किए तत्काल एक हजार रुपए का नोट निकालकर युवक को थमा दिया।टीटीई ने तत्काल पैसे गिने और रसीद थमाकर अगले केबिन की ओर चला गया। इधर, युगल पर टिप्पणियों की बौछार होने लगी। रसीद के पैसे पर सभी ने कहा कि बिलकुल मंगल हो गया है। इसके बाद युगल और भी खुलकर बातें करने लगे। दरअसल, युवक मूलत: ओडिशा का रहने वाला था और रायपुर में ही उसने पढ़ाई की और यहीं पर बीपीओ में नौकरी करने लगा। जैसा कि युवक ने बताया कि युवती भी उसके साथ ही काम करती है। युवक किसी साक्षात्कार के सिलसिले में इंदौर जा रहा था। सफर में बोरियत ना हो लिहाजा वह युवती को भी साथ ले आया। उनके तौर-तरीकों एवं टिकट देखने से यह तो अंदाजा हो गया था कि युवक का कार्यक्रम पहले से तय था जबकि युवती का आनन-फानन में ही बना था। सुबह यह युगल भोपाल रेलवे स्टेशन पर उतरा। इस दौरान रोचक वाकया यह हुआ कि पूरे घटनाक्रम को देखने वाला रायपुर का एक सिंधी युवक आखिरी में युवक से पूछ बैठा, यार तुम्हारा रिश्ता क्या है?। सिंधी के सवाल पर केबिन में ठहाके गूंज उठे।
Monday, April 15, 2013
बिल, बयान और बवाल-10
बस यूं ही
लगता है रुबाई पढ़कर आप भी उलझ गए हैं, क्योंकि विषय ही कुछ ऐसा था। बात अब निर्णायक एवं अंतिम दौर में है लिहाजा थोड़ी सी गुस्ताखी तो बनती है ना। वैसे भी आजकल इसी विषय पर लिख रहा हूं, इस कारण सपनों में भी आइडियाज मिलते रहते हैं। वैसे अपुन को सपने कम ही आते हैं, लेकिन आज दोपहर को अखबार पढ़ते-पढ़ते जरा सी आंख लगने की ही देर थी कि सपना शुरू हो गया। सपने में नजारा किसी कस्बे का था। अपुन को सपने में दो तीन दुकानों पर जबरदस्त भीड़ दिखाई दी। कस्बे में इतनी भीड़ देखकर अपुन चौंक गए। जिज्ञासावश पहली दुकान के पास गए तो वह किसी तथाकथित तांत्रिक की थी। वह ताबीज बनाने में तल्लीन था। भीड़ को धकियाते हुए अपुन किसी तरह उस तांत्रिक के पास पहुंच गए। वहां का नजारा देखकर अपुन भूल गए कि यह सपना है या हकीकत। अपुन तो बस हकीकत समझकर उस तांत्रिक से सवाल पूछने में जुट गए। चूंकि एक ही सवाल में कई सवाल पूछ लिए इसलिए तांत्रिक कुछ देर तो सकुचाया, फिर अपुन को ऊपर से नीचे देखकर बोला, आप थोड़ा बैठिए, सभी सवालों का जवाब मिलेगा। करीब आधा घंटे बाद तांत्रिक ने भीड़ से दस मिनट की अनुमति ली और मेरे से मुखातिब हुआ। चूंकि सवाल अपुन पहले ही पूछ चुके थी इसलिए तांत्रिक ने प्वाइंट टू प्वाइंट बोलना शुरू किया। वह बोला मैं पहले बुरी नजर से बचाने का ताबीज बनाता था लेकिन धंधा मंदा हो गया था। एक-एक ग्राहक के लिए दिन भर तरसना पड़ता था। कोई भूला भटका या ग्रामीण ही आ जाए तो गनीमत है वरना दिन भर मक्खी मारने के अलावा कोई चारा नहीं था। बिलकुल फटेहाल एवं तंगहाल हो गया था।
इसी बीच एक दिन चमत्कार हो गया। अचानक सुबह-सुबह दुकान पर भीड़ लग गई। मैं समझ नहीं पाया कि यह सब क्या हो गया। लोगों से पता चला कि वे सब नजर का ताबीज मांग रहे थे। मैं अंदर ही अंदर सकपकाया कि ताबीज का क्रेज रातोरात कैसे बढ़ गया। तत्काल कुछ परिचितों से फोन पर बात करके पता किया तो जानकारी मिली कि अब किसी को घूरना या ताकना भी अपराध की श्रेणी में आता है। मतलब वह बुरी नजर मानी जाएगी। तांत्रिक लगातार बताता जा रहा था और अपुन बड़े गौर से उसकी बातों को सुन रहे थे। वह फिर बोला कि भीड़ देखकर मेरा मन ललचा गया। मैं हाथ आए मौके को खोना नहीं चाहता है। मैं ताबीज बुरी नजर से बचाने का बनाता था, और भीड़ में शामिल लोग भी वही चाहते थे। अपना धंधा चल निकला। अपुन ने बीच में उसकी बात काटते हुए उससे पूछा कि लोग आपके ताबीज पर इतना विश्वास क्यों करने लगे। इस पर वह बोला मैंने यह प्रचारित करवा रखा है कि ताबीज पहनने वालों को कोई खतरा नहीं है। और अगर कोई बुरी नजर से देखेगा भी तो उसका शर्तिया अहित होगा वह भी निर्धारित समय सीमा में। अपुन ने फिर टोका, इससे क्या फर्क पड़ा। वह बोला दरअसल यह निर्धारित समय सीमा में अहित होने वाली बात ही लोगों को ज्यादा पंसद आ रही है। लोगों का कहना है कि किसी ने बुरी नजर से देखा तो पहले तो पुलिस के पास जाओ। वह तरह-तरह के सवाल इस उम्मीद में पूछेगी ताकि जवाबों पर चटखारे लगाए जा सके हैं। घूरने से ज्यादा पीड़ा तो कई तरह के अजीबोगरीब सवालों से ही हो जाती है। और किसी तरह मान-मनौव्वल से अपराध दर्ज भी कर लिया तो फैसला आने में वक्त लग जाता है। लोगों से जब फैसलों में देरी की बात सुनी तो मैंने अवसर भुनाया और संजय दत्त का उदाहरण बता दिया। बस लोगों के दिमाग में एकदम फिट बैठ गया। और अपनी दुकान चल निकली।
तथाकथित तांत्रिक से अपनी जिज्ञासा शांत कर अपुन भीड़ वाली दूसरी दुकान पर पहुंचा। यहां दूसरे पक्ष के लोगों की भीड़ लगी थी। यह दुकान सीसी कैमरों की थी। सब दुकानें नई-नई खुली थी। दुकानदार को बात करने की भी फुर्सत ही नहीं थी। अपुन ने एक सैल्समैन को पटाया और भीड़ से अलग एक तरफ ले जाकर पूछा कि यह सब अचानक कैसे हो गया। उसने पलटवार करते हुए अपुन से कहा कि क्यों मजे ले रहो हो, आपको सब पता है, वह घूरने वाला कानून बना है ना, बस उसी से हमारे को रोजगार मिल गया है। अपुन के बिना पूछ ही वह बोला नया कानून तो बन गया है। अब दुनिया में सभी तरह के लोग हैं। जरूरी तो नहीं सभी कानून का सम्मान करें- उसका पालन करें। बहुत से ऐसे भी हैं जो इसका दुरुपयोग भी करेंगे। कई निर्दोष भी चपेट में आ सकते हैं। बस यही डर और अपनी सुरक्षा के लिए लोग सीसी कैमरे खरीद रहे हैं। विशेषकर स्कूलों एवं कॉलेजों में, आंखों के चिकित्सकों के यहां। सरकारी व निजी दफ्तरों तथा विशेष एकल उद्बोधन वाले कार्यक्रमों के लिए सीसी कैमरों की भारी डिमांड है।
ताबीज एवं सीसी कैमरों की दुकान देखकर अपुन ने मन ही मन धारणा बना ली कि कानून चाहे कैसा भी लेकिन इससे कई लोगों को रोजगार तो मिला है। रोजगार के नए-नए अवसर सृजित हो रहे हैं। अपुन यह सोचते-सोचते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि दो तीन धूप के चश्मे बेचने वाले मिल गए। बेचारे संकट में फंसे थे। रो तो नहीं रहे थे लेकिन रोने से कम भी नहीं थे। दुकानों के आगे सन्नाटा पसरा था। अपुन ने जरा कुरेदा तो फूट पड़े बोले भाईसाहब गर्मी के सीजन को देखते हुए लाखों रुपए का चश्मे मंगवा लिए। वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की थी कि इस बार बारिश देर से आएगी। हमने सोचा कि धूप देर तक पड़ेगी तो धंधा भी अच्छा चलेगा। लोग काले चश्मे खरीदेंगे। अपुन उनकी बात फिर भी नहीं समझे। तो बोले, वो कानून बना है ना घूरने वाला। सारी गड़बड़ उसके बाद से ही शुरू हो गई। इक्का-दुक्का ग्राहक आते थे लेकिन अब काले चश्मों का विरोध शुरू हो गया। कुछ संगठन मांग कर रहे हैं कि गाडिय़ों पर जब काला शीशा प्रतिबंधित है तो फिर चश्मे का काला शीशा उचित नहीं है। सच में प्रतिबंधित लग गया तो हम बर्बाद हो जाएंगे। सड़क पर आ जाएंगे। अपुन उनकी पीड़ा सुन ही रहे थे कि अचानक शोर सुनकर आंख खुल गई। देखा तो बच्चे बैड पर उछलकूद कर रहे थे। बच्चों की मौज मस्ती में अपुन को अखबार के पन्ने बिखरे हुए दिखाई दिए। अचानक नजर एक कार्टून पर पड़ी। कार्टून में तीन महिलाएं पुलिस को शिकायत करती दिखाई गई थी। वे बोल रही थी। चश्मे के शीशे काले हैं। इसलिए पता नहीं चल रहा है कि घूर रहा है या देख रहा है। अपुन यकायक हड़बड़ा गए। जो सपने में देखा वह हकीकत में भी होने जा रहा है। और ऐसा हो गया तो फिर काले शीशे के चश्मों को भी इतिहास बनने में देर नहीं लगेगी। ऐसे में काले शीशे का चश्मा लगाने वाली वह सलाह भी बेमानी ही समझो।
इतिश्री।
Saturday, April 13, 2013
बिल, बयान और बवाल-9
बस यूं ही
कल की कड़ी में चर्चा इस बात पर हो रही थी कि आखिर आंखों पर काला चश्मा लगाया जाए या फिर आंखें दान कर दी जाएं। अब बात इससे आगे की करते हैं। सुझाव के बीच एक आग्रह भी आया था कि जब आंखों पर लिख ही रहे हैं तो आंखें फिल्म के चर्चित गीत 'उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क की सरहद की निगाहबान हैं आखें...।' पर भी कुछ लिखो। कहने की जरूरत नहीं है, यह बहुत ही प्यारा गीत है। पुरानी कडिय़ों में इस गीत का जिक्र इसलिए भी नहीं किया था कि गीत देशभक्ति से जुड़ा है, लिहाजा देशभक्ति का जज्बा एवं संदेश आखिरी कडिय़ों में सार स्वरूप दिया जाए तो बेहतर है। गीत का विस्तार से जिक्र करने से पहले बता दूं कि जब इस विषय पर लिखना शुरू किया था, उस वक्त यह बिल कानून नहीं बना था, इस कारण अधिकतर कडिय़ों में भविष्य की संभावना/आशंका जताई गई थी कि कानून के अस्तित्व में आने के बाद ऐसा हो जाएगा। चूंकि अब कानून बन चुका है, ऐसे में अब संभावनाओं एवं आशंकाओं का दौर तो खत्म हो चुका। अब तो ध्यान यह रखना है कि कानून का दुरुपयोग ना हो और उसके संभावित दुरुपयोग से बचा कैसे जाए। इसमें कोई शक नहीं है कि कानून हमेशा अच्छी सोच के साथ एवं अच्छे परिणाम तथा पीडि़तों को न्याय मिलने की धारणा से प्रभावित होकर ही बनाए जाते हैं, लेकिन चालाक व चतुर लोग फिर भी इनसे बचने के रास्ते ढूंढ लेते हैं। कई तो कानून को हथियार के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं। विशेषकर प्रभावशाली एवं पहुंच वालों के लिए कानून का दुरुपयोग करना कोई मुश्किल काम नहीं है। बदकिस्मती है कि देश में आज कानून का दुरुपयोग ज्यादा हो रहा है। कहने का आशय यही है कि दुश्मनी निकालने के लिए, प्रायोजित तरीके से किसी को बदनाम करने लिए या फिर तात्कालिक लाभ लेने के लिए भी लोग कानून की आड़ लेते हैं। कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि पूर्व में भी लिखा था कि दहेज प्रताडऩा जैसा कानून जिसके बनाने के पीछे बहुत पाक मकसद रहा लेकिन वर्तमान में देखें तो दहेज प्रताडऩा के मामले जांच के बाद कितने फीसदी सच साबित होते हैं। खैर, मामला कुछ ज्यादा गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है।
चलो इस गंभीरता को यहीं पर विराम देकर फिर से हल्के फुल्के माहौल में चलते हैं। बात आखें फिल्म के गीत की हो रही थी। गीतों की बात न करने का वादा किया था लेकिन वादे टूट जाते हैं। वैसे यहां वादा जानबूझाकर तोड़ा जा रहा है, क्योंकि गीत देशभक्ति से जुड़ा है और अपुन को देश से बहुत प्रेम है। इसलिए गीत का उल्लेख तो बनता ही है। इसी गीत की एक-एक पंक्ति में बहुत बड़ा फलसफा छिपा है। आप भी गीत के कुछ चुनिंदा अंतरों का आंनद लीजिए- देखें.. हर तरह के जज्बात का ऐलान हैं आखें, शबनम कभी शोला कभी तूफान हैं आखें...। आगे देखिए.. आंखें ही मिलाती हैं, जमाने में दिलों को, अनजान हैं हम तुम अगर, अनजान हैं आखें...। लब कुछ भी कहें, इससे हकीकत नहीं खुलती, इंसान के सच झाूठ की पहचान हैं आखें...। गीत के दो चार अंतरे और भी है। गीत का एक-एक बोल वाकई अपनी पीछे बहुत बड़ी कहानी रखता है। बानगी देखिए.. हम तुम अनजान ही रहते हैं अगर आंखें भी अनजान हैं। कहने का मतलब है पहचान तो आंखें ही करती हैं। वाकई बहुत गहरे राज वाली पंक्तियां हैं ये।
बिलकुल वैसे ही जैसे कहा गया है कि 'सतसैया के दोहे, ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगे, घाव करें गंभीर..।' आंखें और सरहद से मकबूल गीतकार गुलजार की रचना याद आ गई। आज भले ही मखमली आवाज के धनी गजल गायक मेहंदी हसन इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन यह रचना उनसे सरोकार रखती है। आप भी देखिए... 'आंखों को वीजा नहीं लगता, सपनों की सरहद नहीं होती, बंद आंखों से रोज मैं सरहद पार चला जाता हूं, मिलने मेहंदी हसन से..। ' सच में न तो सपनों की सरहद होती है और ना ही बंद आंखों पर कोई कानून आड़े आता है। लेकिन गुलजार साहब से इतर विचार रखने वालों ने तो बंद आंखों से भी खतरा बता दिया है। जांनिसार अख्तर साहब फरमाते हैं 'लम्हा-लम्हा तिरी यादें, जो चमक उठती हैं, ऐसा लगता है, उड़ते हुए पल जलते हैं, मेरे ख्वाब में कोई लाश उभर जाती है, बंद आंखों में कई ताजमहल जलते हैं... ' अख्तर साहब की बात का समर्थन यह रुबाई भी करती है देखिए.. 'उम्र की राह में रस्ते बदल जाते हैं, वक्त की आंधी में इंसान बदल जाते हैं, सोचते हैं तुम्हे इतना याद न करें, लेकिन आंखें बंद करने से ही इरादे बदल जाते हैं..। ' सोचने की बात है बंद आंखों से ही इरादे बदलेंगे तो फिर तो कोई इलाज दिखाई भी नहीं देता है। बड़े-बड़े शायरों व शायरी की बातों का उल्लेख करते-करते अपुन का मूड भी शायराना हो गया है। वैसे राज की बात यह है कि शायरी के शौकीन तो अपुन शुरू से ही रहे हैं। कॉलेज लाइफ में तो जूनियरों ने विदाई देते समय टाइटल भी शायर का ही दिया था। इसलिए आज की कड़ी इन दो रुबाइयों के साथ पूर्ण कर रहा हूं। आप भी लुत्फ उठाइए..। 'जब भी उनकी गली से गुजरता हूं, मेरी आंखें एक दस्तक देती हैं, दुख ये नहीं वो दरवाजा बंद कर देते हैं, खुशी ये है वो मुझे अब भी पहचान लेते हैं।' कितना आशावादी सोच है। दाद देनी पड़ेगी इसकी। अब दूसरी रचना देखिए... 'इश्क है वही जो हो एकतरफा, इजहार है इश्क तो ख्वाइश बन जाती है, है अगर इश्क तो आंखों में दिखाओ, जुबां खोलने से ये नुमाइश बन जाती है..। ' अब धर्मसंकट यही है कि आंखों से इजहार करो तो खतरा और जुबां से करो तो नुमाइश..। उलझा के रख दिया इस रुबाई ने तो। फिलहाल अपुन इसके उलझन में उलझे हुए हैं, तब तक आप भी दिमाग के घोड़े दौड़ाइए ताकि इस धर्मसंकट से उबरने का कोई रास्ता दिखाई दे जाए। दिखाई दे तो चुप मत रहना, साझा कर लेना। बिना डरे बेहिचक और बेझिझक। .
.... क्रमश:
Friday, April 12, 2013
बिल, बयान और बवाल-8
बस यूं ही
वैसे, इस शीर्षक का अब कोई मतलब नहीं रहा है, क्योंकि बिल तीन अप्रेल को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन गया है। इस कानून को बनने में दो माह का समय लगा। तीन फरवरी को अध्यादेश जारी हुआ। इसके बाद 19 मार्च को लोकसभा में तथा 21 मार्च को यह राज्यसभा में पारित हुआ। अंतत: तीन अप्रेल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। दरअसल, इन दिनों व्यस्तता कुछ ज्यादा ही रही। पारिवारिक और कार्यालयीन दोनों ही जगह। बच्चों के दाखिले, फीस, किताबें, डे्रस आदि की याद भी इसी माह में आती है। इधर भिलाई के पास एक निर्माणाधीन सीमेंट प्लांट में आगजनी की बड़ी वारदात हो गई। दोनों ही बड़े एवं महत्वपूर्ण मसले थे, लिहाजा उनमें ही उलझा रहा। एंटी रेप बिल के बारे में आखिरी बार दो अप्रेल को लिखा था। दस दिन के इस अंतराल में अपडेट यह हुआ बिल अब कानून बन गया है। एंटी रेप लॉ अस्तित्व में आने के बाद इतना तो तय हो गया है कि आंखों को लेकर जो गीत प्रचलन में हैं और उनको लेकर जो शंकाएं जताई जा रही थी वे सब सही होने की राह पर हैं। आंखों से जुड़े गीत और भी हैं लेकिन पिछली पोस्ट में यह वादा भी तो कर दिया कि अब बात आंखों के अलावा होगी। कड़ी-दर-कड़ी लिखने का विचार तो पहले की कर चुका था लेकिन एक दिन ख्याल आया कि इस संबंध में कम से कम दस पोस्ट तो लिखी ही जानी चाहिए। बस का दस का वादा है इसलिए शीर्षक पुराना ही लगा दिया है। दस कड़ी लिखने की यह बात भी सार्वजनिक रूप से एक-दो मित्रों से शेयर भी कर ली थी। हां, मित्रों से याद आया कि यह पोस्ट लिखने का विचार भी तो मित्रों की ही देन है। उन्होंने इस विषय पर कुछ कलम चलाई तो अपुन को भी लगा वाकई विषय प्रासंगिक है, लिहाजा कुछ तो लिखा ही जाना चाहिए। बस फिर क्या था लिखना शुरू हो गए। मित्रों की हौसला अफजाई निरंतर होती रही। उनसे कई बातें सुनने को मिलीं, जो निसंदेह इस विषय को जिंदा रखने और आगे से आगे लिखने के लिए न केवल मार्ग प्रशस्त करती रही बल्कि प्रेरणास्पद भी बनी। दूसरी कड़ी लिखने के बाद एक मित्र ने सुझाव दिया कि घूरने की धारा से बचने का आसान तरीका, गहरा काला चश्मा रखो। इसी कड़ी पर एक दूसरे मित्र ने कहा कि अब तो आंखें दान कर देनी चाहिए। दोनों मित्रों ने सुझाव मौजूदा माहौल को देखते हुए दिए हैं, इसलिए उनमें गंभीरता है। चश्मा, और वह भी गहरा काले शीशे का लगाएंगे तो पता ही नहीं चल पाएगा कि आंखें क्या कर रही हैं। यहां कुछ संभावना है, मतलब विकल्प बताया गया है बचाव का। हो सकता है वर्तमान परिप्रेक्ष्य में और इस विचारधारा में विश्वास करने वाले काले चश्मे का उपयोग करने लग जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है। चश्मे से जुड़ा एक गीत भी याद आ रहा है। बोल हैं 'गौरे-गौरे मुखड़े पर काला-काला चश्मा, तौबा खुदा खैर करे खूब है करिश्मा....।'
वैसे एक बात साफ कर दूं कि अपुन ने भी चश्मा पहना है लेकिन नजर वाला। अपुन के चश्मे का किस्सा भी बड़ा रोचक है लिहाजा, बताना जरूरी है। बात आज से करीब दस साल पहले की है। कार्यालय में एक दिन कम्प्यूटर पर अचानक अक्षर ऊपर नीचे होते दिखाई देने लगे। दोनों हाथों से आंखो को रगड़ा लेकिन पढऩे में आ रही दिक्कत दूर नहीं हुई। ठण्डे पानी के छींटे आंखों में मारने के बाद भी जब कोई राहत नहीं मिली, तो आभास हो गया कि जरूर आंखों में कुछ गड़बड़ हो गई। दूसरे दिन तो आधा सिर भी दर्द करने लगा। दुकान से दर्द की टेबलेट ली, तब जाकर कुछ चैन आया। सिरदर्द और टेबलेट लेने का यह क्रम करीब पन्द्रह दिन तक बदस्तूर जारी रहा, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि आपकी आंखें कमजोर हो गई हैं। आखिरकार टेबलेट खाने से कुछ राहत मिलती न देख एक दिन एक चिकित्सक के पास गया तो उसने कहा कि भाईसाहब आपकी आंखें कमजोर हो गई हैं और चश्मा चढ़ाना पड़ेगा। मेरे को चिकित्सक की सलाह उस वक्त उपयुक्त भी लगी जब चश्मा लगाते ही सिर का दर्द उडऩ छू हो गया। अब तो चश्मा पहनना रोज का काम हो गया। इस बीच दो दिन बार चश्मा टूटा भी लेकिन नया ले लिया। कुछ समय बाद चश्मा लगाते-लगाते भी सिर दर्द होने लगा तो उसी चिकित्सक को दिखाया तो उसने माइग्रेन (घोबा- यह राजस्थानी शब्द है। इससे तात्पर्य है सिर के आधे हिस्से में रह-रहकर दर्द उठना। ) बताया। वैसे लोगों से सुना था कि माइग्रेन एक बार होने के बाद ठीक नहीं होता है, क्योंकि यह स्थायी मर्ज है। वाकई बड़ा तकलीफदायक था। किसी फोड़े की माफिक दुखता था अंदर ही अंदर। चिकित्सक ने एक माह की दवा दी और सिर का दर्द ठीक हो गया। इधर, रखरखाव उचित प्रकार से न कर पाने के कारण चश्मे के दोनों लैंस स्क्रेच कारण धुंधले हो गए थे। ऐसे में स्पष्ट देखने व पढऩे में फिर से दिक्कत होने लगी। पुन: उसी चिकित्सक के पास गया। उसको आंखें दिखाई। जांच-पड़ताल के बाद वह बोला आपकी आंखें एकदम ठीक हैं। आपको चश्मे की जरूरत ही नहीं है। मेरे लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। अमूमन एक बार चढऩे के बाद जो चश्मा जिंदगी भर नहीं उतरता, वह मेरी आंखों से मात्र पांच साल बाद ही उतर गया। बताने का आशय यही है कि पांच साल चश्मा लगाने का अनुभव अपनु भी रखते हैं, लेकिन उस वक्त ना कानून था और ना ही ऐसा माहौल, लिहाजा चश्मा लगाने के बचाव और फायदे अपुन हो मालूम नहीं है।
इधर, चश्मे की चर्चा में आंखें दान करने वाला सुझाव तो नजरअंदाज हो गया था। वैसे आंखें दान करने वाला आइडिया बुरा नहीं है लेकिन सवाल यही है कि दान कब की जाए। मरने के बाद की जाए तो कोई किन्तु-परन्तु ही नहीं हैं लेकिन जीते-जी कर दी तो यह बेहद खतरनाक है। आखिर एक खतरे से बचने के चक्कर में इतना बड़ी कुर्बानी और खुद की दुनिया में अंधेरा करना उचित नहीं होगा। इससे तो बेहतर होगा शिकायत का मौका ही नहीं दिया जाए।
....क्रमश:
Monday, April 8, 2013
यह 'आग' कब बुझेगी ...?
टिप्पणी
नंदिनी-अहिवारा के पास निर्माणाधीन सीमेंट प्लांट में लगी भीषण आग पर देर रात भले ही काबू पा लिया गया है लेकिन ग्रामीणों के दिलों में सुलग रही आग अब भी वैसी की वैसी ही है। पुलिस छावनी में तब्दील नंदिनी थाने के बाहर शुक्रवार को चिलचिलाती धूप में शासन, प्रशासन, पुलिस और प्लांट प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी करते ग्रामीणों का गुस्सा भी यही जाहिर कर रहा था कि आक्रोश की आग की लपटें अभी कमजोर नहीं हुई हैं। दुधमुंहे बच्चों को गोद में लेकर तेज धूप में पसीने से तरबतर होने के बावजूद चार-पांच किलोमीटर का पैदल मार्च कर नंदिनी थाने पहुंची इन महिलाओं की एक सूत्री मांग थी कि रात को घर से 'जबरन' उठाए गए परिजनों को पुलिस या तो बिना शर्त रिहा करे अन्यथा उनको भी गिरफ्तार कर ले। नारेबाजी के बीच पुलिस प्रशासन पर कई संगीन आरोप भी लगे। आरोपों की बानगी देखिए.. 'प्लांट प्रबंधन से मिलीभगत कर साजिशन ग्रामीणों को फंसाया है।' 'पुलिस ने अलसुबह चार बजे ग्रामीणों को घर से जबरस्ती उठाया है।' 'सारा प्रशासन बिका हुआ है।' 'हम ढाई माह से आंदोलनरत है लेकिन कभी किसी ने सुध क्यों नहीं ली' ... और भी कई तरह के आरोप सरेआम लगाकर शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पांच घंटे तक ग्रामीण एक ही मांग पर अडिग रहे लेकिन उनसे बात करने के लिए पुलिस एवं प्रशासन के अधिकारी बदलते रहे। सभी ने समझाइश के भरपूर प्रयास किए लेकिन ग्रामीण अपनी एक सूत्री मांग के समर्थन में टस से मस नहीं हुए और वहीं बैठ गए।
इधर निर्माणाधीन प्लांट तथा मलपुरी में कहने को खामोशी एवं सन्नाटा पसरा है लेकिन रात के घटनाक्रम के निशान दोनों जगह ही दिखाई देते हैं। प्लांट में आग से खाक हुए वाहन, जनरेटर, दुपहिया वाहन एवं अन्य उपकरण हादसे की भयावहता को बयां कर रहे थे, वहीं मलपुरी खुर्द के रास्तों में पसरा सन्नाटा एवं अजीब से भय के चलते छाई खामोशी भी यही बता रहे थे कि रात के अंधेरे में एक आग बुझाने के प्रयास में दूसरी 'आग' को किस कदर भड़काया गया है। नौकरी देने और न देने की दोनों पक्षों की 'जिद' ने बजाय कुछ पाने के बहुत कुछ खो दिया है, जिससे उबरने में दोनों को ही लम्बा वक्त लगेगा।
बहरहाल, सबसे मौजूं सवाल तो यही है कि विरोध की खाई को पाटने के बजाय गहरा करने वाली कार्रवाई तथा एक दूसरे के जान के दुश्मन बने दोनों पक्षों के बीच भविष्य में सदभाव, स्नेह एवं सहयोग किस तरह कायम हो पाएगा? और यह भी जरूरी नहीं है कि ग्रामीणों पर अपराध दर्ज करने के बाद इस प्रकरण का पटाक्षेप हो गया है, क्योंकि आक्रोश की चिंगारी अब 'आग' बन चुकी है। खैर, इस घटनाक्रम को अगर इसी अंदाज में अंजाम तक पहुंचाना था तो फिर शासन व प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठने लाजिमी हैं। वैसे भी यह सीमेंट प्लांट शुरू से ही विवादों में घेरे में रहा है। संवेदनशील मसला होने के बाद भी शासन-प्रशासन ने पता नहीं क्यों एवं क्या सोचकर इसको गंभीरता नहीं लिया। इतना ही नहीं प्रशासन ने विवाद को निबटाने की कभी ईमानदारी कोशिश भी नहीं की। समय रहते दोनों पक्षों के मध्य कोई बीच का रास्ता निकाल दिया जाता संभवत: इस प्रकार के हालात ही नहीं बनते। वैसे भी किसी विवाद का हल जोर-जबरदस्ती या बलात तरीके से आज तक नहीं हुआ है। इतिहास गवाह है कि विवादों का हल अक्सर बातचीत से ही संभव हुआ है।
साभार - पत्रिका भिलाई के 06 अप्रेल 13 के अंक में प्रकाशित।
Friday, April 5, 2013
साक्षात मौत और बदहवाश दौड़ते श्रमिक
नंदिनी अहिवारा से लौटकर
परिवार एवं सामान के साथ पैदल ही बदहवाश दौड़ते श्रमिकों को देखकर लगा कि वाकई जब जान खतरे में हो तो आदमी को जो भी सूझता है, वैसा ही करता है। नंदिनी अहिवारा में निर्माणाधीन सीमेंट प्लांट में गुरुवार शाम को जो हुआ वह श्रमिकों के लिए साक्षात मौत देखने जैसा ही था। निर्माणाधीन प्लांट से लेकर अहिवारा बस स्टैण्ड तक करीब तीन किलोमीटर रास्ते में महिला व पुरुष श्रमिकों की कतार लगी हुई थी। जान बचाने के चक्कर में उबड़-खाबड़ रास्ते एवं अंधेरे के बीच इन श्रमिकों की सांसें इस कदर उखड़ी हुई थी कि वे चाहकर भी कुछ नहीं बोल पा रहे थे। बार-बार कुरेदने पर बस इतना ही बोल पा रहे थे कि 'भइया, जान खतरे में है'। कहां से हो, तो अधिकतर ने यूपी-बिहार का निवासी बताया। प्लांट के प्रवेश द्वार तक पहुंचने से डेढ़ किलोमीटर पहले ही आग की लपटें एवं धुएं के गुबार दिखाई दे रहे थे। प्लांट के प्रवेश द्वार पर बिखरे पत्थर इस बात की गवाही दे रहे थे कि पथराव किस स्तर पर हुआ है। प्रवेश द्वार पर बड़ी संख्या में पुलिस जवान तैनात थे। अंदर का नजारा देखकर किसी भी भले चंगे आदमी के रौंगटे खड़े होना तय है। प्रवेश द्वार के पास बने केबिन के टूटे हुए शीशे एवं बिखरा सामान बता रहे थे कि हंगामा बहुत देर तक बरपा था। बस, जेसीबी और अन्य सामान से आग की लपटें बराबर उठ रही थी, लेकिन आग बुझाने के साधन वहां पर दिखाई नहीं दिए। आग से जलकर खाक पुलिस की गाड़ी के पास फायर बिग्रेड के कर्मचारी पानी तलाश रहे थे। उनकी गाड़ी का पानी खत्म हो चुका था, लिहाजा उनके पास सिवाय आग को देखने के कोई चारा नहीं बचा था। वहीं प्लांट के एक सुरक्षाकर्मी ने बताया कि यहां अंदर पानी नहीं है। जगह-जगह तैनात पुलिसकर्मी सभी मीडियाकर्मियों को अजनबी निगाह से घूर रहे थे। धुएं के गुबार व आगजनी के बीच फूटते पटाखे हालात को और भी भयावह बना रहे थे। हिम्मत और हौसला दिखाते हुए कुछ आगे बढ़े तो अंदर कुर्सी पर पुलिस के चार-पांच जवान रिपोर्ट बनाने में व्यस्त दिखाई दिए। पास ही एक व्यक्ति सिर पर पट्टी बांधे पुलिस अधिकारियों के सवालों का जवाब देने में तल्लीन था। एक सुरक्षाकर्मी भी आंख पर पट्टी बांधे दिखाई दिया। तभी ड्राइवर ने हमारी गाड़ी जलाने के सूचना दी, तो हम वापस प्रवेश द्वार की तरफ लपके। वहां एसपी हेलमेट लगाए और डंडा लिए खड़े थे। मौके की नजाकत देखते हुए हमने गाड़ी संयंत्र परिसर के अंदर पुलिस के वाहनों के पास खड़ी की। इसके बाद हम फिर आगजनी को देखने आगे बढ़े। सबसे खास बात यह दिखाई दी कि जो वाहन जल रहे थे, या जिस हालात में थे, वे जलते ही रहे। इसका कारण बाद में समझ में आया कि क्योंकि आग बुझाने के लिए जो दमकलें गई थी, उनकी संख्या आगजनी को देखते हुए ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी। कुछ और आगे बढ़े तो जिला कलक्टर लिखी गाड़ी दिखाई दी। आगे देखा तो दोनों हाथ पीछे बांधे अपने गनमैन के साथ कलक्टर लौट रहे थे। पत्रकारों को सामने देखा तो चौंक गए और बोले 'आ गए आप, आपको भी खबर हो गई।' जहां कलक्टर मिले थे वहीं से कुछ दूरी पर वह स्थान दिखा जहां दो-तीन दिन पहले मिट्टी धंसने की वजह से एक श्रमिक की मौत हो गई थी, जबकि दो घायल हो गए थे। हालांकि रास्तों पर बिजली के पोल लगे थे, लेकिन धुएं के गुबार के बीच रोशनी मंद पड़ चुकी थी। आगे बढ़े तो प्लांट के कुछ लोगों ने आगाह किया, 'आगे अंधेरा है, रास्ते भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहे हैं। आप संभलकर एवं अपनी रिस्क पर जाना।' उन लोगों की बातों को अनसुना करने के बाद हम लोग आगे बढ़ गए और वहां पहुंच गए, जहां प्लांट के लिए चिमनी लगी थी। आगे का नजारा देखकर तो अजीब से डर से घिर गया। चारों तरफ आग ही आग। प्लांट के अधिकारियों के लिए बनाए गए वातानुकूलित केबिन आग से स्वाहा हो चुके थे, जबकि दूसरी ओर के केबिन को भी आग अपने जद में ले चुकी थी। केबिन के अंदर आग की लपटें उठ रही थी। मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि इन केबिन में ही कम्प्यूटर वगैरह रखे हुए थे। केबिन के पास ही अंधेरे में ही फायर बिग्रेड के लोग आग बुझाने की मशक्कत कर रहे थे लेकिन आग इतने बड़े पैमाने पर लगी थी कि देर रात तक उस पर किसी तरह से काबू नहीं पाया जा सका था। वाहन जलने के बाद वह अपने आप ही बुझा रही थी। लौटते समय अधेंरे में इधर-उधर देखा तो रास्तों में बाल्टियां एवं जरीकेन हुए दिखाई दिए। पूछा तो बताया गया कि इन बाल्टियों में ज्वलनशील पदार्थ भरकर बाल्टी को लकड़ी में फंसा कर लाया गया और वाहनों एवं सामान पर डाल-डाल कर आग के हवाले कर दिया गया। रास्ते में हमको तीन जगह बाल्टी पड़ी दिखाई दी। आग से उठते धुएं व रह-रहकर उनमें होते विस्फोट के बीच ज्यादा देर खड़ा रहना संभव नहीं था। धीरे-धीरे वापस प्रवेश द्वार की ओर लौटने लगे। रास्ते में प्लांट के काफी सुरक्षाकर्मी हेलमेट व चेस्ट गार्ड लगाए दिखाई दिए। कुछ के हाथों में डंडे भी थे। लौटने लगे तो पुलिस के जले हुए वाहन के पास पुलिस के फोटोग्राफर दिखाई दिए। धीरे-धीरे प्रवेश द्वार तक आए और लौट आए। देर रात वहां हालात तनावपूर्ण, लेकिन नियंत्रण में थे। इधर पुलिस पांच-छह दर्जन ग्रामीणों पर अपराध कायम करने की तैयारी में जुटी हुई थी। प्लांट के प्रवेश द्वार पर तैनात उस महिला टीआई से यह कहकर अब जा रहे हैं हम भिलाई लौट आए। वाकई इतने बड़े पैमाने पर भीषण आगजनी देखने का यह अपना अलग अनुभव रहा। रास्ते में कई लाल-पीली बत्ती वाले वाहन सायरन बजाते हुए प्लांट की तरफ जाते मिले। नंदिनी का बाजार भी देर तक खुला था। वाहनों की लगातार आवाजाही से लोगों की नींद उड़ी हुई थी। आग की खबर तो उनको पहले ही लग चुकी थी।
साभार - पत्रिका भिलाई के 05 अप्रेल 13 के अंक में प्रकाशित।
Tuesday, April 2, 2013
बिल, बयान और बवाल-7
बस यूं ही
आंखों की चर्चा पर दो दिन से विराम रहा। अति व्यस्तता के चलते यह अधूरा काम अपने मुकाम तक नहीं पहुंच पाया। समय निकालने की कोशिश तो बहुत की लेकिन समय बचा ही नहीं। वैसे भी समय कब किसके लिए और कहां रुकता है। इन सब के बीच फिर बात मूड पर भी निर्भर करती है। कार्यालयीन कार्यों को प्राथमिकता से पूर्ण करने के कारण समय न के बराबर मिला। खैर, मेरे को भी लगने लगा है कि सिर्फ आंख और उससे संबंधित गीतों पर लगातार लिखना न केवल उबाऊ हो रहा है बल्कि और ज्यादा लिखा गया तो यह सरासर नाइंसाफी की श्रेणी में आएगा। फिर भी कुछ गाने और शेष हैं, उनको शामिल करने के बाद ही नए अंदाज में कुछ लिखने का विचार फलीभूत हो पाएगा। अजय देवगन की एक फिल्म का गीत देखिए.. 'अंख मेरे यार की दुखे मेरी आंखों में आ गया पानी..' क्या जबरदस्त संयोग एवं प्रेम है। एक को चोट लगती है तो दर्द दूसरे को होता है। आंखों से आंखों की दोस्ती एवं एक दूसरे का दर्द महसूस करने की यह आजादी भला अब कायम रह पाएगी ? अब किसी की आंख दुखती है तो दुखती ही रहेगी। बिलकुल 'जलती है तो जलने दे..।' गीत की तर्ज पर। अब आंख में बदले में पानी आना तो दूर कोई चिकित्सक के पास जाने की सलाह भी दे दे तो गनीमत समझिए। बचपन में अनिल कपूर की एक फिल्म देखी थी, नाम था रखवाला। इस फिल्म में अनिल कपूर गुस्से में मुठ्ठी भींचे हुए गाते नजर आते हैं 'तेरी आंखों में आंसू हैं मेरी आंखों में है ज्वाला...' यह काम थोड़ा उलटा है। यहां बदले में आंसू नहीं बह रहे हैं बल्कि आंसुओं के बदले ज्वाला भड़क रही है। दोनों गीत कितने विरोधाभासी लगते हैं। इन सब के बीच यह गीत जरूर कुछ संतुलित नजर आता है, देखिए 'आंख है भरी-भरी और तुम मुस्कराने की बात करते हो..।' स्वाभाविक सी बात है आंखों में आंसू हो तो मुस्कुराना कहां संभव होता है। यह बात दीगर है कि कई बार आंसू खुशी में या हंसते-हंसते भी आ जाते हैं।
खैर, आंखें बोलती भी हैं तभी तो गीतकार ने लिख दिया कि 'कहो ना कहो, ये आंखें बोलती हैं, ओ सनम...।' आंखें बोलने का आशय भी तो यही है कि आंखें इतनी संजीदा हैं कि कोई उनको देखता है तो वह बोलती हुई सी प्रतीत होती है। वरना हकीकत में आंखें कहां बोलती हैं। इधर देखिए.. यहां तो आंखें देखने से ही बुरा हाल हो रहा है। शाहरूख गाते हैं.. 'ये काली-काली आंखें, ये गौरे गौरे गाल देखा जो तुझे जानम हुआ है बुरा हाल...। ' आप ऐसी सोच रखने वालों को भला आंखों में चमकते हुए जुगनू कैसे दिखाई देंगे। लेकिन फिर भी लिखा गया है 'सूनी-सूनी अंखियों में जुगनू चमक उठे, जब से मिला है तेरा प्यार...। ' यहां जुगनू से तात्पर्य उम्मीद जवां होने से ही है। वैसे आंखों को रोशनी से जोड़कर भी देखा जाता है। तभी तो नैनों के माध्यम से दीप जल रहे हैं। 'तेरे नैनों के मैं दीप जलाऊंगा.. ।' इतना ही नहीं दूसरे की आंखों से संसार देखने तक की बातें भी की जाती रही हैं 'तेरी से आंखों से सारा संसार मैं देखूंगी....।' और यहां तो 'दिल में तुझे
बैठा के कर लूंगी मैं बंद आंखें...।' आंखों को प्रवेशद्वार ही बना दिया है। और उनको बंद रखकर अंदर ही अंदर बंद आंखों से दीदार करने की हसरत है। ईमानदारी की बात तो यह है कि कई गीत तो ऐसे हैं कि कल्पना की उड़ान भरते रहो। ऐसे कल्पना वाले गीत सुनने में अच्छे लगते हैं लेकिन हकीकत में उनकी पालना संभव दिखाई नहीं देती। आंखों से इस जाल में अपनु भी इतना उलझ चुके हैं कि बस आंखों की ही कल्पना करते रहते हैं। चूंकि आंखों से अपुन का सुनहरा अतीत जुड़ा है। वैसे यह राज की बात है लेकिन अब आपको राजदार बनाने में अपनु को कोई दिक्कत नहीं है। शादी के लिए जब अपुन लड़की देखने गए तो उसकी आंखें इतनी अच्छी लगी कि बस कल्पना करके अब भी मुस्कुरा लेता हूं। अब आप दिमाग मत दौडऩा। कोई उल्टे सीधे विचार भी मन में मत लाना, क्योंकि हसीन आंखों वाली वह लड़की अब अपुन की धर्मपत्नी है। तभी तो अपुन को 'तेरी आंखों के दो फूल प्यारे-प्यारे...।' तथा 'कितना हसीन चेहरा, कितनी प्यारे आंखे...।' भी बहुत अच्छे लगते हैं। गाने तो बहुत हैं, अब भी करीब दर्जनभर गीत याद हैं लेकिन अब विषय तो पूर्ण करना है लिहाजा उनका मोह तो छोडऩा ही पड़ेगा ना।
वैसे, आंखों की इस चर्चा में एक बात याद आ गई। उसका उल्लेख जरूरी है। आंखें भले ही कुछ ना बोले उनकी भाषा समझने वाले समझ ही जाते हैं। बड़े पारखी होते हैं। यह चर्चित दोहा अचानक याद आ गया। 'कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो मांस, ये दो नयना मत खाइयो, मोहे पिया मिलन की आस...। ' यह प्रेम की पराकाष्ठा है। नायिका मर रही है लेकिन मरते मरते भी आंखों को महफूज रखने की फरियाद करती है। वह इसलिए क्योंकि इंतजार करते-करते उसके प्राण तो निकल रहे हैं फिर भी उसको भरोसा है कि नायक आएगा। और आया तो आंखों से उसकी पीड़ा को पहचान लेगा। वाकई यह दोहा आंखों के साथ प्रेम को कितनी ऊंचाई प्रदान करता है। दोहों के बीच कुछ बात शेरो-शायरी की करें तो शायरों को आंखों के साथ-साथ अश्क में भी उम्मीद दिखाई दे जाती है। तभी तो साहिर लुधियानवी साहब फरमाते हैं 'पलकों से लरजते अश्कों से, तस्वीर झलकती है तेरी, दीदार की प्यासी आंखों को अब प्यास नहीं और प्यास भी है...। ' क्या बात है, अश्कों में तस्वीर क्या दिखी प्यास और बढ़ गई। इधर, वसीम बरेलवी साहब भी कहते हैं 'खुशी की आंख में आंसू की भी जगह रखना, बुरे जमाने कभी पूछकर नहीं आते...। ' यह कल्पना है लेकिन भविष्य के प्रति आगाह करती नजर आती है। और आखिर में जिगर मुरादाबादी के इस शेर के साथ 'वो और वफा-दुश्मन मानेंगे न माना है, सब दिल की शरारत है आंखों का बहाना है...। ' के साथ अब अगली कड़ी का इंतजार कीजिए...वाकई शरारत किसी और की ही होती हैं आंखें तो वैसे ही बदनाम हैं।
....क्रमश:
Monday, April 1, 2013
शह और संपर्क का खेल
टिप्पणी
भले ही यह जांच का विषय है लेकिन इतना तो तय है कि दुर्ग के बेथल चिल्ड्रन होम में अरसे से चल रहे 'अनाथों' से अनाचार के सनसनीखेज एवं घिनौने कृत्य में न केवल केयर टेकर व संचालक आरोपी हैं बल्कि वे सब भी बराबर के दोषी हैं, जो जानते हुए भी अनजान बने रहे। तभी तो जिला प्रशासन की ठीक नाक के नीचे बिना मान्यता के भी यह चिल्ड्रन होम बेरोकटोक चलता रहा। ऐसा शातिराना एवं शर्मनाक काम केवल शह, सम्पर्क और साठगांठ के सहारे ही संभव है, वरना एक सामान्य आदमी अचानक और आश्चर्यजनक रूप से अर्श पर कैसे पहुंच सकता है। रसूखदारों से रिश्ते, सियायत से सम्पर्क और जिम्मेदारों से जानकारी का फायदा उठाकर फर्जीवाड़े के सहारे यह अमानवीय कृत्य होता रहा। मिलीभगत के इस खामोश खेल का खुलासा अब भी नहीं हो पाता, अगर कुछ जागरूक संगठन पहल नहीं करते या लड़कियां होम से ना भागती। प्रदेश में आश्रमों की असलियल उजागर होने के बाद सामूहिक दुष्कर्म का यह बड़ा मामला है।
खैर, हकीकत सामने आने के बाद हड़कम्प मचाना स्वाभाविक है। थोड़ा बहुत तात्कालिक, रस्मी और औपचारिक हंगामा भी है। इस प्रकार के मामलों में ऐसा हमेशा ही होता है। झलियामारी एवं आमाडुला आश्रमों की हकीकत से पर्दा उठने से लेकर अब तक हुई हलचल का इतिहास और परिणाम सबके सामने हैं। आश्रमों की असलियत उजागर होने पर होने वाला आश्चर्य मिश्रित अफसोस इस बार भी है लेकिन हालात से हारे मासूमों की मदद के लिए कोई सामूहिक आवाज नहीं उठ रही है। उनकी तकलीफ समझना तो दूर उनको तमाशा बना दिया गया है।
दिल्ली की 'दामिनी' के लिए दुर्ग में जो दर्द दिखाई दिया वैसा दर्द मासूमों के साथ दुष्कर्म को लेकर नहीं दिख रहा है। अब ना तो कोई शर्मसार है और ना ही किसी चेहरे पर शिकन। किसी के गमगीन या गुस्सा होने का तो कहीं नामोनिशान तक नहीं है। संवेदनाओं का सैलाब भी सूख गया है। हमदर्दी और हिम्मत दिखाने वालों का भी अकाल है। कागजी बयानों की फेहरिस्त दिनोदिन जरूर लम्बी हो रही है। और इधर कार्रवाई के नाम पर चार पुलिस अधिकारियों को जांच सौंप कर इतिश्री कर ली गई है। ऐसे घिनौने और गंभीर मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए।
साभार- पत्रिका भिलाई के 01 अप्रेल 13 के अंक में प्रकाशित।
कुछ तो ऐसा कीजिए, जो याद रखें
टिप्पणी
श्रीमान, आयुक्त, नगर निगम, भिलाई
निगम आयुक्त का पदभार संभालने के बाद आपने शहर की बदहाल सड़कों को ठीक करने की दिशा में तत्परता दिखाते हुए ठेकेदारों के खिलाफ जो कार्रवाई की थी, उसको लोग अभी भूले नहीं हैं। यह बात दीगर है कि सड़कों की दशा में ज्यादा सुधार नहीं हो पाया। इसका प्रमुख कारण यह है कि आप जितनी मेहनत कर रहे हैं, उसका उतना न तो प्रतिफल मिल रहा है और ना ही कहीं प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। यह भी विडम्बना है कि भिलाई निगम क्षेत्र में आपके नेतृत्व में कई तरह के अभियान तो चलाए गए, लेकिन मंजिल तक कोई नहीं पहुंचा। अभियानों का आगाज जरूर प्रभावी अंदाज में हुआ, लेकिन उद्देश्य की पूर्ति किसी से भी नहीं हुई। सभी अभियानों का हश्र कमोबेश एक जैसा ही रहा और सभी पूर्ण होने से पहले ही दम तोड़ गए।
आपके खाते में ऐसे अधूरे अभियानों की फेहरिस्त बेहद लम्बी है। शहर में सरकारी आवासों से अवैध कब्जों को हटाने की मुहिम बड़े जोर-शोर से शुरू हुई थी, लेकिन कब्जे कितने हटे आप भी जानते हैं। यही हाल नाले पर अतिक्रमण हटाने का रहा। महज दो दिन फूं फां करके आपका अमला अचानक चुपचाप बैठ गया। नेहरूनगर के आवासों में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करने वालों को नोटिस देकर कार्रवाई के नाम पर रहस्यमयी चुप्पी साध ली गई। यही नहीं शहर में अवैध तथा बिना टोंटी के नलों को बंद करने की कार्रवाई भी पता नहीं क्यों बंद हो गई। गर्मी के मौसम में आज भी शहर के कई हिस्से पानी के लिए तरस रहे हैं। इधर, सुपेला में रविवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार को दूसरी जगह स्थानांतरित करने को भले ही आप और आपके मातहत बड़ी उपलब्धि मानें, लेकिन आज भी सुपेला की सड़क अतिक्रमण से मुक्त नहीं है। सड़क पर न केवल अस्थायी दुकानें बेखौफ लग रही हैं, बल्कि स्थायी दुकान वालों ने भी सामान सड़क तक खिसका कर कब्जा जमा लिया है। यकीन नहीं हो तो आप स्वयं मौका देख सकते हैं।
शहर में सर्वाधिक चर्चा तो सर्विस लेन से कब्जे हटाने की कार्रवाई को लेकर हो रही है। दो-चार दिन कार्रवाई चली, उसके बाद आप अवकाश पर चले गए और आपके मातहतों को अभियान बंद करने की जोरदार वजह मिल गई। पहले तो वे कहते रहे कि आयुक्त आएंगे तब कार्रवाई होगी, लेकिन आपके लौटने के बाद भी कोई हलचल नहीं हुई। उलटे जहां से कब्जे हटाए गए थे, वहां अतिक्रमी फिर से काबिज हो गए। अभियानों का इस तरह गला घोंटने से आपकी एवं मातहतों की कार्यप्रणाली पर कई तरह के सवालिया निशान और अवैध वसूली के चक्कर में अभियान से समझाौता करने तक के आरोप लग रहे हैं। इन सवालों और आरोपों का पटाक्षेप तभी होगा, जब तमाम तरह के हस्तक्षेप एवं दवाबों को नजरअंदाज कर अधूरे अभियानों को कारगर कार्रवाई कर पूर्ण किया जाए। बेहतर होगा जनहित से जुड़े अभियानों का आप स्वयं औचक निरीक्षण करें। और अगर अभियानों में इसी तरह औपचारिकता ही निभानी है तो बेहतर है उनको शुरू ही नहीं किया जाए।
बहरहाल, आम जन से जुड़े अभियानों का इस तरह गला मत घोंटने दीजिए। उनको जिंदा रखिए। अभियान जिंदा रहेंगे तभी आमजन को राहत मिलेगी। एक बात और, आरामतलबी एवं कामचोरी आपके जिन मातहतों की आदत में आ चुकी है, इनके लिए दिशा-निर्देश या फटकार किसी भी सूरत में कारगर नहीं हो सकते। ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ाई जरूरी है। अगर आप वाकई में कुछ करने का माद्दा रखते हैं तो आपको जनहित में कड़े फैसले व सख्त कार्रवाई से हिचकिचाना नहीं चाहिए। बात चाहे आपके मातहतों की हो या फिर अभियानों की, कुछ तो ऐसा कीजिए, ताकि भिलाई के लोग आपको कुशल व दक्ष अधिकारी के रूप में लम्बे समय तक याद रखें।
साभार- पत्रिका भिलाई के 31 मार्च 13 के अंक में प्रकाशित।
Saturday, March 30, 2013
बिल, बयान और बवाल-6
बस यूं ही
आंखों की जिंदगी में अहमियत इतनी है कि इनके बिना किसी तरह की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। आंख है तभी तो दुनिया रोशन है, रंगीन है। आंखों के बिना तो घुप अंधेरा है। आप देख ही नहीं पाएंगे कि दुनिया कैसी है और उसमें क्या हो रहा है। आंखों के फिल्मी गीतों से संबंध को लेकर संभवत: यह आखिरी कड़ी है। इसके बाद इस बिल के संभावित परिणाम पर नजर डाली जाएगी। वैसे आज भी आंखों से संबंधित करीब तीन दर्जन गीत याद आ रहे हैं। बहुत चर्चित गीत है, यकीनन आपने भी सुना होगा और गुनगुनाया भी होगा। 'तुम्हारी नजर क्यों खफा हो गई, खता बख्श दो गर खता हो गई...।' अब कोई नजरों से खफा होने के बारे में पूछेगा ही नहीं। ऐसे में खता होने की गुंजाइश भी कम हो जाएगी। लेकिन संकट यह भी है कि अब नजर खफा है या नहीं इसका पता लगाना भी टेढ़ी खीर होगा। अब तो नजर जैसी है, वैसी ही रहे तो गनीमत है। वैसे अपुन को आंखों पर लिखे कई मुहावरे व शेरो-शायरियां भी याद हैं लेकिन फिलहाल चर्चा गीतों की ही होगी। यह गीत देखिए 'नैनों में सपना, सपनों में सजना...' इसमें जरूर बचाव का रास्ता दिखाई दे रहा है। आखिर देखना या घूरना ही तो अपराध है। किसी के सपने देखना अपराध थोड़े ही है। वह चाहे जागती आंखों से देखे या फिर सोते हुए, यह उसकी मर्जी। हां भविष्य में सपनों पर भी रोक लग जाए तो कह नहीं सकता लेकिन फिलहाल इस गीत को सुनने या गुनगुनाने में मेरे कोई खतरा नजर नहीं आता। शायद फिल्म वालों को भी नहीं आता। तभी तो यही गीत पहले जितेन्द्र पर फिल्माया गया और और अब नए कलेवर में अजय देवगन पर। लेकिन इस प्रकार के बिना खतरे वाले गीत कम ही हैं। 'तेरे दिल ने न जाने क्या कहा, तेरे नैन मेरे नैन देखते रहे...।' अब यहां तो फंसने के पूरे-पूरे आसार बन रहे हैं। अब दिल चाहे कुछ भी कहे लेकिन नैन आपस में देखने से तौबा कर लेंगे।
खैर, बिल, बहस और बवाल को लेकर यह छठी कड़ी हैं और लगातार आंखों पर ही लिखा जा रहा है। लेकिन लेखन को लेकर कोई अपुन पर किसी तरह का 'वाद 'चस्पा ना करे। क्योंकि अपुन को न वाद पसंद है और ना ही विवाद। अपुन को तो बस निर्विवाद बना रहना चाहते हैं। वैसे ईमानदारी की बात तो यह है कि घूरने एवं ताकने को अपुन भी बुरा मानते हैं, लेकिन इसका पैमाना क्या होगा, बहस इसी बात को लेकर है। मतलब इसकी आड़ में इसका दुरुपयोग होने की आशंका रहेगी। अपुन उसी आशंका को आधार बनाकर लिख रहे हैं कि ऐसा हो जाएगा तो भी खतरा है। ऐसा भी नहीं है कि अपुन के लिखने से कानून या नियम तोडऩे वाला रुक जाएगा। देश में कानून एवं नियम अक्सर टूटते रहते हैं। गाहे-बगाहे उनका दुरुपयोग होता रहता है। वैसे अपुन की फितरत नियम एवं कानून को मानने एवं उनका पालन करने की ही रही है। इसलिए कोई यह ना समझ ले कि मैं ऐसा करके नियम या कानून पर कोई टीका-टिप्पणी कर रहा हूं। सार यही है कि लेख लिखने के पीछे अपुन की नेक नियति पर किसी को किसी तरह का शक ना हो और ना ही कोई सवाल उठाए। अपुन सभी का बराबर सम्मान करते हैं। भले ही वह आधी दुनिया हो या पूरी। अपना उद्देश्य केवल और केवल हास-परिहास एवं मनोरंजन है। अपुन का लिखा किसी को दिल पर लग रहा है तो माफ करे। किसी को भूल से भी दिल पर नहीं लेना चाहिए। भागदौड़ एवं तनाव भरी जिंदगी में वैसे भी हंसने या मनोरंजन के लिए किसके पास वक्त है। अपुन ने तो हंसाने का एक अदना सा प्रयास किया है। हाथ की पांचों अंगुलियां ही बराबर नहीं होती है तो फिर मानसिकता एक होना तो संभव ही नहीं है। अपुन तो यही सोच कर लिख रहे हैं कि अपुन के लिखे से किसी को बुरा नहीं लगे। फिर भी बात मानसिकता वाली आती है, लिहाजा किसी को बुरी लग भी सकती है। फिर भी पुरजोर शब्दों में आग्रह है कि , इस विषय को बेहद हल्के-फुल्के एवं मनोरंजन करने वाले अंदाज में ही लें, पढ़कर गंभीर तो कतई ना हों। अफसोस जताना है या नहीं यह अपुन आप सब के विवेक पर छोड़ते हैं।
अब, आंखों और बिल के बीच अपुन की बात भी तो रखनी थी ना। लेकिन बात रखने का अंदाज बड़ा हो गया और आंखों वाले गीत फिर छूट गए। चलो कोई नहीं। जब इतना ही झेल लिया तो फिर इतना तो हक बनता ही है। वैसे भी दो चार लाइन ज्यादा पढऩे से कौन सा फर्क पड़ जाएगा। एक बात और है, लिखना भी आपके मूड पर निर्भर रहता है। जिस दिन जैसा मूड होता है वह आपके विचारों में झलक जाता है। अब यह मत सोच लेना कि अपुन का मूड आज कैसा था जो आंखों से हटकर लिख दिया। सच बताऊं तो आज लिखने का मूड ही नहीं था। मतलब गंभीरता नहीं थी। आधे-अधूरे मन से ही शुरुआत की, वह भी काफी देर से। अब कड़ी तो पूरी करनी थी ना। सौ लगे रहे रबड़ की तरह बढ़ाने में। वैसे मूड मजाकिया भी नहीं था। बिलकुल बीच का सा था। अब बीच में रहने से नुकसान की आशंका ज्यादा रहती है। लगता है कि आज की कड़ी पूरी होने को है। जाते-जाते एक गीत याद आ रहा है। 'मेरे नैना, सावन भादो, फिर भी मेरा मन प्यासा...।' अपुन के पसंदीदा गायक किशोर कुमार का गाया यह गीत मौजूदा माहौल में जरूर प्रासंगिक लगता है। क्योंकि इस गीत के बोलों में अपुन को कोई खतरा नजर नहीं आता। ऐसे में यह गीत दुबारा चर्चा में आ जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जमाना रीमेक का है। हिम्मतवाला फिल्म का गीत आपके सामने है, जिसका जिक्र पूर्व में किया जा चुका हैं। तो आप भी नैन बंद करके सपने देखिए क्योंकि 'देखा एक ख्याब तो यह सिलसिले हुए, दूर तक निगाह में है गुल खिले हुए...' शायद आपको भी खिले हुए गुल नजर आ जाए। ...
क्रमश:
Friday, March 29, 2013
बिल, बयान और बवाल-5
बस यूं ही
बचपन से लेकर जवानी की दहलीज पर कदम रखने तक अपुन ने आंखों को केन्द्र मानकर लिखे गए बहुत से गीतों को बार-बार सुना है। क्यों एवं कैसे सुना इसमें आप दिमाग मत लगाना। अपुन को भारतीय संगीत से प्रेम है और सभी तरह के गीत सुने हुए हैं बस। फिल्म देखने का शौक तो बचपन में ही लग गया था, लिहाजा उन फिल्मों के गीत जुबान पर चढऩे लाजिमी थे। आलम यह था कि घर में नीम के पेड़ की सबसे ऊंची शाखा पर जाकर अपुन बैठ जाते और फिर जैसा भी बनता जोर-जोर से गाने लगते। उस वक्त जो भी गाना सुनते बस गुनगुनाने लगते। उम्र रही होगी यही कोई सात-आठ साल। एक दिन तो एक परिजन ने टोक ही दिया था। अपुन अपनी मस्ती में गाए जा रहे थे 'मोहब्बत बड़े काम की चीज है..' अब परिजन ने पलट के पूछ लिया बेटा यह मोहब्बत क्या होती है और यह किस तरह काम की चीज है। सच कह रहा हूं, यकीन कीजिए अपुन को अर्थ मालूम नहीं था, लिहाजा बगलें झांकने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। अब भी वह वाकया याद आता है तो सच में हंसी थमने का नाम नहीं लेती है। खैर, रेडियो तो घर में पैदा होने से पहले ही आ गया था लेकिन टेपरिकार्डर उस वक्त आया जब अपुन ने दसवीं पास की ही थी। बस ऑडियो कैसेट खरीदने का ऐसा चस्का लगा कि 1992 से लेकर 2000 के बीच में जो भी फिल्म प्रदर्शित होती अपुन कैसेट खरीद लाते। देखते-देखते में घर में साढ़े पांच सौ के करीब ऑडियो कैसेट एकत्रित हो गए। खूब गीत सुने। दिन भर यही एकसूत्री कार्यक्रम चलता और गीत सुनते-सुनते ही नींद आ जाती। पढ़ाई के दौरान भी गीत बजते रहते। शौक तो अब भी है लेकिन वक्त नहीं है। घर में अलमारी में रखे वो साढे पांच सौ कैसेट्स धूल फांक रहे हैं। वैसे जमाना हाइटेक हो गया आजकल मोबाइल जितना चाहो गीत डाउनलोड कर लो लेकिन अड़चन वही वक्त की आती है।
खैर, लम्बी चौड़ी भूमिका बांधने का आशय यही था कि गीत से अपुन को जबरदस्त लगाव है और कोई गीत किसी वजह से अप्रासंगिक हो जाए तो अपुन को नागवार गुजरता है। आंखों को लेकर काफी कुछ लिख चुका हूं फिर भी लगता है कुछ छूट रहा है। बस यही सोच कर आगे से आगे लिखता जा रहा हूं। बचपन में सुना यह गीत 'भूल-भुलैय्या सैंया अंखियां तेरी, रस्ता भूल गई मैं, ओ घर जाऊं कैसे...। ' क्या अब मौजूं रह पाएगा, क्योंकि अब रास्ता भूलने का झंझट ही नहीं रहेगा। ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी। चूंकि आंखों को आईना भी कहा गया है। याद आया इस पर एक गीत है 'ये आंखें हैं आईना मेरी जिंदगी का...।' आईने में जिस तरह अक्स उभरते रहते हैं वैसे ही अपनी स्मृतियों में जिंदा आंखों पर लिखें गीत एक-एक कर याद आ रहे हैं। 'तू कुछ कहे ना मैं कुछ कहूं आ बैठ मेरे पास तुझे देखता रहूं..।' कितने प्यारे बोल हैं इस गीत के। ना कुछ कहने की ना सुनने की बस और बस केवल देखने की हसरत है। लेकिन यह हसरत अब घूरने या ताकने की श्रेणी में गिनी जाएगी। 'तुझे देखा तो यह जाना सनम...।' की जुर्रत कौन करेगा। वैसे अपुन ने तो शुरू से ही स्पष्ट कर दिया था कि आंखें हैं तो सब कुछ हैं। अपुन अपने बयान पर अभी कायम हैं लेकिन लोग फिर जाते हैं। अब देखो ना जो सलमान खान दबंग फिल्म में 'मेरे दिल का ले गए चैन, तेरे मस्त-मस्त दो चैन...' गाते हुए नजर आते हैं लेकिन अपनी दूसरी फिल्म दबंग-2 में नैनों को दगाबाज कहने से नहीं चूकते। 'कल मिले थे, भूल गए आज रे, तोरे नैना बड़े दगाबाज रे...।' अब नैन मस्त से दगाबाज कैसे एवं क्यों बने यह तो सलमान ही बता सकते हैं। इधर अजय देवगन भी तो आंखों को तीर कमान समझ बैठे। तभी तो बोल बच्चन में 'चलाओ ना नैणों से बाण रे..। ' गाते हुए नजर आते हैं।
वैसे गीतकारों की नजरों में आंखें कभी सागर, तो कभी मयखाना है। मयखाने से एक गीत का अंतरा याद आ गया। 'इक सिर्फ हमीं मय को आंखों से पिलाते हैं... कहने को तो दुनिया में मयखाने हजारों हैं...। ' अब पीने-पिलाने की बात कहां संभव होगी। वैसे हकीकत की शराब महंगी बहुत हो गई है। ऐसे में लोगों के पास यह विकल्प था लेकिन अब तो यह भी जाता रहेगा। 'छलके तेरी आंखों से शराब और ज्यादा...।' तथा 'आंखों में मस्ती शराब की..।' अब गुजरे जमाने की बात हो जाएगी। ना ही आंखों से शराब छलकेगी और ना ही आंखों में शराब की मस्ती दिखाई देगी। किसी 'पियक्कड़ ' ने पीने की भूल की तो अंजाम के लिए भी तैयार रहे। कहने वालों ने तो यहां तक कह दिया कि 'ये हल्का-हल्का सुरुर है, सब तेरी नजर का कसूर, मुझे एक शराबी बना दिया रे मुझे जाम लबों से पिला दिया...।' लेकिन अब सुरुर पैदान करने के लिए दूसरा ठिकाना तलाशना ही बेहतर होगा।
बहरहाल, अभी तक तो आखें में सपने भी सजते रहे हैं और ख्वाब भी महकते रहे हैं। उदाहरण के लिए 'आंखों में हमने आपके सपने सजाए हैं..' , 'आपकी आंखों में कुछ महके हुए से ख्वाब हैं..।' तथा 'हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू...।' को सुना जा सकता है। कल्पना की ऐसी उड़ान क्या अब संभव है। जब देखना ही प्रतिबंधित हो जाएगा तब न सपने सजेंगे ना ही ख्वाब महकेंगे और ना ही महकती खुशबू का एहसास होगा। किसी ने गुस्ताखीवश या भूल से पूछ लिया कि 'आंखों में क्या जी..।' तो पलटवार करते हुए जवाब दिया जाएगा 'आंखों में कयामत के बादल..।' आंखों में कयामत के बादल साक्षात नजर आएंगे तो कोई आ बैल मुझे मार की कहावत क्यों चरितार्थ करेगा। इतना ही नहीं अब तो कोई यह कहकर कि 'तेरी आंख का जो इशारा ना होता.. तो बिस्मिल कभी दिल हमारा ना होता..। ' की दलील भी तो नहीं दे सकता...। क्योंकि आंखें, आंखों को देखेंगी ही नहीं तो बिस्मिल (घायल/ जख्मी) भला कहां से होंगी। .... क्रमश:
Thursday, March 28, 2013
बिल, बयान और बवाल-4
बस यूं ही
आंखों पर लिखे गए फिल्मी गीत और एंटी रेप बिल को लेकर यह चौथी किश्त है, लेकिन आंखों से संबंधित गानों की फेहरिस्त छोटा होने का नाम ही नहीं ले रही है। घूरने और ताकने के समर्थन एवं विरोध करने वालों के पास अपने-अपने तर्क हैं लेकिन मेरा मानना है कि कई बार नजर अनायास भी मिल जाती है। यकीन मानिए ऐसा कभी आप के साथ भी हुआ होगा। आप देखना कुछ और चाहते हैं लेकिन नजर यकायक कहीं और चली जाती है। यह अलग बात है कि ऐसा होने के बाद चौंकना या झेंपना लाजिमी है। फिर भी गीतकारों ने इस तरह के वाकये को भी कलमबद्ध कर दिया है। 'बेइरादा नजर मिल गई तो, मुझसे दिल वो मेरा मांग बैठे...।' गीत कुछ ऐसा ही है। अब किसी के साथ ऐसा हो जाए और कोई मांग पूरी नहीं करे तो फिर मौजूदा माहौल में हश्र क्या होगा समझा जा सकता है। हां, इस गीत से इतना तो तय है कि नजर इरादतन और बेइरादतन भी मिलाई जाती है। खैर, आंखों और गीतों का एपीसोड लम्बा हो रहा है, लेकिन लम्बे समय से गीतों का तलबगार रहा हूं और अब भी हूं, लिहाजा इस बहाने आंखों से वाबस्ता उन सभी गीतों को याद कर रहा हूं। क्या पता बाद में गीत सुनना तो दूर गुनगुनाने का मौका भी ना मिले। 'तेरे चहरे से नजर नहीं हटती...' यह गीत खूब गाया और गुनागुनाया गया है। कइयों ने गीत के माध्यम से दिल की बात दिलरुबा तक पहुंचाई। लेकिन अब नजर नहीं हटेगी तो हवालात की हवा खानी पड़ जाएगी। इसलिए नजरों की यह 'दादागिरी' अब खत्म ही समझो। चर्चित और हजारों दिलों को जोडऩे वाले गीत का इस तरह दर्दनाक द एंड हो जाएगा कभी सोचा भी ना था ? इसी तरह अब 'जरा नजरों से कह दो तुम निशाना चूक ना जाए...' लेकिन अब निशाना चूकना शर्तिया तय है, क्योंकि अब निशाना लगाना ही गुनाह हो रहा है।
वैसे आंखों की इस चर्चा में एक बात याद आ गई। बचपन में पढे कुछ शेर याद आ गए। ग्रामीण इलाकों में चलने वाली बसों के अंदर कई तरह की शेरों-शायरियां लिखी हुई होती हैं। पहले यह पेंटर से लिखवाई जाती थी, आजकल जमाना तकनीक का है ऐसे में बसों वाले आजकल रेडीमेड स्टीकर चिपका कर काम चला लेते हैं। शेर देखिए 'संत भला एकांत में संसार की बातें क्या जाने, जब नजरों पर पाबंदी हो वो प्यार की बातें क्या जाने..।' बीस-पच्चीस साल पहले लिखे गए शेर का भावार्थ भी यही है कि नजरों पर जब पाबंदी हो तो वे प्यार की बातें नहीं करेंगी। अब कोई 'नजर के सामने, जिगर के पास, कोई रहता है वो हो तुम..' कहेगा तो यकीनन कसूरवार माना या ठहराया जाएगा। 'दिल की आवाज भी सुन, मेरे फसाने पर ना जा, मेरी नजरों की तरफ देख जमाने पे ना जा..' लेकिन अब दिल की आवाज अनसुनी कर दी जाएगी। अब जमाने का नहीं बल्कि कानून का डर नजरों को देखने से रोकेगा। हां, तो चर्चा बसों में लिखे शेरों की हो रही थी। इसी तरह एक शेर था 'नजर से नजर मिली मगर कमाल ना हो सका, हाय रे हाथ उठाया था मगर सलाम ना हो सका..' अब ना कमाल होगा और ना सलाम। अब यह गीत 'अकेली ना बाजार जाया करो, नजर लग जाएगी..।' एक एकदम ही निरर्थक हो जाएगा। नजर तो तभी लगेगी ना जब कोई देखेगा। इसलिए अब नजर लगने का डर खत्म समझो। ऐसे में नजर उतारने वालों की दुकान पर ताला लगना तय है। नजर लगने से संबंधित यह गाना 'तुझे लागे ना नजरिया..' भी अब नेपथ्य में चला जाएगा।
'मुझको हुई ना खबर, कब प्यार की पहली नजर' जैसे गीत अपवाद स्वरूप जिंदा जरूर रह सकते हैं। क्योंकि यहां तो नायिका इतनी बेखबर है कि उसको खबर हुए बिना प्यार भरी नजर उसका दिल चुरा कर ले गई। वैसे गीतों से मेरे को बेहद प्यार है लेकिन यह गीत पता नहीं क्यों बिलकुल भी नहीं जमता। अब हकीकत में ऐसा हो नहीं सकता है, क्योंकि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। पहली नजर में प्यार होना तो सभी ने सुना है लेकिन बिना खबर हुए ऐसा होना तो किसी से आश्चर्य से कम नहीं है। उदाहरण के लिए 'सैंया ले गई जिया तेरी पहली नजर...'जैसे गीत को लिया जा सकता है। यहां नजरें पहली बार मिली और दिल भी लगा। कहने का आशय है कि एक दूसरे ने आपस में देखा तभी तो यह संभव हुआ ना। 'जादू तेरी नजर, खुशबू तेरा बदन...' पहले प्रंशसा के दो बोल कह कर बाद में हक जताने की हद भला अब माफी के काबिल कैसे होगी। 'तेरी झुकी नजर, तेरी हर अदा, मुझे कह रही है ये..' यहां तो कुछ कहना ही बेकार है। यहां तो झुकी हुई नजर भी बोल रही है। आखिर में एक गीत और याद आया 'लैला बेचारी क्या करती,, नजरिया मजनूं से लड़ गई..' देखिए गीत में लैला कितनी लाचार और मजबूर हो गई फिर भी दोष नजरों का ही बताया जा रहा है। बहरहाल, आंखों की महिमा अपरमपार है। आंखों से प्यार भला किसको नहीं होगा। हम सभी को है। और कोई आंखों से प्यार न कहने की बात करता है तो यकीनन वह झूठ बोल रहा है। लेकिन मौजूदा हालात में झूठ बोलने वालों की संख्या में दिनोदिन इजाफा हो रहा है। भले ही ऐसे लोग रात को तनहाई में 'किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है..' सुनें और गुनागुनाएं लेकिन बात वही कथनी और करनी में अंतर वाली ही है। इस गीत पर जरा गौर फरमाइए 'चंदन सा बदन, चंचल चितवन...' ऐसा होना स्वाभाविक है। तभी तो नायक सरेआम कहता भी कि उसको दोष मत देना। नायक का यह कहना उचित भी प्रतीत होता है। सुंदरता होती ही देखने के लिए है। उसकी बातों का समर्थन यह शेर भी तो करता है..। 'तुम देखने की चीज हो, इसलिए देखता हूं मैं, मुझको सजा ए मौत जो मेरा कसूर हो..। '
...क्रमश:
Tuesday, March 26, 2013
बिल, बयान और बवाल-3
बस यूं ही
बातचीत का सिलसिला इस विषय पर चल रहा था कि एंटी रेप बिल पास होने के बाद आंखों पर आधारित गीतों का हश्र क्या होगा? पिछली कड़ी में आंखों पर जो लिखा गया वह तो केवल परिचय भर ही था। देखा जाए तो आंखों के बिना फिल्मी गीतों का इतिहास ही अधूरा हैं। आंखों को लेकर कई तरह की कल्पनाएं की गई हैं। हां, इतना जरूर है कि कहीं आंखों को बेहद नाजुक एवं खूबसूरत बताया गया है, वहीं, कहीं पर नैन आक्रामक होकर वार करने से भी नहीं चूकते। हालिया प्रदर्शित एक फिल्म का यह गीत 'तेरी अंखियों का वार, जैसे शेर का शिकार' घूरने और ताकने के विरोध में कानून बनाने का समर्थन करने वालों के लिए ढाल की तरह काम करेगा। जब अंखियों का वार शेर के शिकार की तरह होगा तो भला कौन होगा जो ऐसे विकट हालात में आंखों से आंखें मिलाना चाहेगा। वो तो मैं पहले ही कह चुका हूं कि आंखों पर कई विरोधाभासी गाने लिखें गए हैं, फिर भी किसी ने आंखों का विरोध नहीं किया लेकिन मौजूदा समय में विरोध होना बड़ी बात नहीं है, क्योंकि देश में बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जिनको बेवजह बाल की खाल निकालने की आदत है। ऐसे लोगों के लिए मौजूदा माहौल एकदम मुफीद है। हालांकि इस बात की गुंजाइश ना के बराबर है, फिर भी कई गीतों में आंखों को आक्रामक और दबंग बताया गया है। घूरने और ताकने के आरोपों को यह गीत पुष्ट जरूर कर सकते हैं। यह गीत देखिए 'अंख लड़ गई मेरी अंख लड़ गई...।' यहां आंख लड़ रही है। 'आंख लडऩा।' एक चर्चित मुहावरा भी है। यह बात दीगर है कि आंखों के लडऩे के पीछे गहरा राज छिपा है। मतलब उनके एक होने से पहले इस तरह की लड़ाई होना लाजिमी है, लेकिन गीत ख्यामखाह की आंखों को लड़ाकू बता रहा है। 'आंखों का था कसूर छुरी दिल पर चल गई...' भला वास्तव में ऐसा होता है क्या.? फिर भी कसूरवार आंखें ही हैं, वो दिल पर छुरी चला रही हैं, इस कारण वो कातिल की भूमिका में हैं। 'एक आंख मारूं तो..' इस गीत में तो कल्पना की ऊंची और अविश्वनीय उड़ान है। पहले एक आंख फिर दूसरी और आखिर में दोनों आंखों के बारे में बताया गया है। मसलन एक आंख मारने से रास्ता रुक जाता है, तो दूसरी आंख मारने से जमाना झुक जाता है। दोनों साथ-साथ मारने से लड़की पटने का दावा किया गया है। हकीकत में ऐसा संभव है भला ? फिर भी गाना न केवल हिट है बल्कि बदस्तूर जारी है।
वैसे अक्सर बातचीत में कहा जाता है। आपने भी जरूर कहीं सुना होगा कि आंखों की भाषा आखें ही समझती हैं। अब आंखें, आंखों की तरफ देखेंगी ही नहीं फिर तो भाषा समझ में कैसे आएगी। सीधा सा फंडा है कि नजर से नजर मिलने पर ही पता चलता है कि आंखों की भाषा क्या है। लेकिन विरोधाभास की गुंजाइश यहां भी है। वह भी भरपूर मात्रा में है। लोग कहते हैं आखों की भाषा समझने के लिए आंखों का आपस में मिलना जरूरी है। कोई इनको लडऩा भी कहता है लेकिन अर्थ एक ही है। तभी तो इनके समर्थन में 'नैनों को करने दो, नैनों से बात आओ हम चुप बैठें...' जैसे गीतों की रचना हुई, क्योंकि जब नैन बात करते हैं तो जुबान खामोश हो जाती हैं। अब कोई इस तर्क को यह कहकर कि 'उनसे मिली नजर कि मेरे होश उड़ गए...' गलत साबित करने का प्रमाण दे तो दे लेकिन नजर मिलने से होश कितनों के उड़े। कम से मैंने तो ऐसा नहीं सुना और ना ही कोई मेरे को ऐसा मिला जिसके नैनों से किसी का होश उड़ गया हो..। खैर, जैसे दिन-रात, सच-झूठ अच्छा-बुरा आदि विषयों पर गाने लिखे गए हैं। वैसे ही आंखों पर लिखे गए हैं, इनका अंदाज अलग है लेकिन भावार्थ कमोबेश एक जैसा ही है। हां इतना जरूर है गीतों के बोल कहीं सरल, सीधे, सपाट एवं आसानी से समझ में आ जाते हैं तो कहीं वे गूढ़ और कलिष्ट हो जाते हैं।
आंखों से संबंधित गीतों के इस विरोधाभास के विवरण को आगे बढ़ाए तो पाएंगे कि एक तरफ 'अंखियों से गोली मारे, लड़की कमाल रे' 'आंख मारे, सिटी बजाए, ओ लड़की आंख मेरे', 'अंखियां लड़ी हो बीच बाजार..दिल मेरा लुट गया पहली बार' और 'रफ्ता-रफ्ता देखो आंख मेरी लड़ी है' जैसे गीतों की फेहरिस्त लम्बी है, जो आंखों के लडऩे, झगडऩे और उनसे गोली मारने तक की बात करते हैं। चूंकि हम आंखों के लडऩे की बात पहले कर चुके हैं। यहां गोली मारने का उल्लेख हुआ है, मतलब आंख अब बंदूक का काम भी करने लगी है। सचमुच में ऐसा हो तो फिर देश में सेना के लिए गोला-बारुद पर अरबों-खरबों रुपए खर्चने की जरूरत की कहां है। यह काम तो अंखियां ही कर देती। बहरहाल, आंखों को इस तरह आक्रामक, लड़ाकू, कातिल एवं बंदूक की संज्ञा देने वालों को एक तरह से नकारात्मक प्रवृत्ति का ही माना जाएगा, क्योंकि ऐसे गीतों की रचना होने के कारण ही तो आंखें बदनाम हो रही हैं। आंखों को खलनायक बनाने वाले इस तरह के गीत ही आरोपों को मजबूत कर रहे हैं। घूरने एवं ताकने को कानून बनवाने का समर्थन करने वालों के लिए ऐसे गीत बतौर सबूत काम आ सकते हैं। उदाहरण बन सकते हैं। वैसे यह सब अपना-अपना नजरिया है, वरना आंखों की महिमा किसी से छिपी नहीं है। आंखों की कीमत पूछनी है तो किसी अंधे से पूछो। कहा भी गया है कि आंख गई तो संसार गया है। इस प्रकार की सकारात्मक सोच वालों की बदौलत ही तो 'देखा है तेरी आंखों में प्यार ही प्यार..' तथा ' तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है....' जैसे गीत रचे गए हैं। लेकिन इनको अब याद कौन रखेगा। हमारी कथनी और करनी में अंतर की खाई बहुत गहरी हो चुकी है। कोई सच कहताभी है तो उसका विरोध हो जाता है। वह भी इसीलिए क्योंकि खुद को पाक दामन और चरित्रवान बताने का दावा अमूनन सभी करते हैं। ईमानदारी एवं दिल पर हाथ रखकर बताएंगे तो यकीनन 'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं..' वाला गीत चरितार्थ होते देर नहीं लगेगी। ऐसा हकीकत में है फिर भी दोगलापन दिखाया जा रहा है। पता नहीं क्यों...?
....क्रमश:
Friday, March 22, 2013
बिल, बयान और बवाल-2
बस यूं ही
एंटी रेप बिल अमल में आया तो फिल्मी गीतकारों को फिर नए अंदाज में सोचना पड़ेगा। नए सिरे से गीतों की रचना करनी पड़ेगी। कई कालजयी गीतों पर बेमानी होने का खतरा मंडराने लगेगा। गीतकार भविष्य में आंखों को केन्द्र में रखकर गीत लिखने से परहेज करने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं। क्योंकि घूरने या ताकने के लिए बजाय किसी हथियार या साधन के सिर्फ और सिर्फ आंखों की ही जरूरत पड़ती है और किसी ने आंखों का महिमामंडन तो दूर आंखों से संबंधित गीत भी गुनगुनाए तो वह भी गुनाह ही माना जाएगा। गुनाह करने वाले की प्रशंसा करना भी तो एक तरह का सहयोग ही हुआ और गुनाह में सहयोग तो सीधा-सीधा अपराध की श्रेणी में ही आएगा। खैर, आंखों से जुड़े गीतों को याद करने बैठा तो फिर लम्बी सूची बन गई। आंख, नैन, निगाह, नजर आदि सभी इसी श्रेणी में तो आएंगे। सबसे पहले गीत याद आया 'आंखों ही आंखों में इशारा हो गया...बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया...' लेकिन अब आंखों में इशारा कैसे होगा। आंखें, आखों को देखने से ही डरेंगी, तो इशारा भला क्या खाक करेंगी। और जब इशारा ही नहीं होगा तो जीने के सहारे का तो सवाल ही नहीं उठता है। इसी कशमकश के बीच एक और गीत याद आया 'अंखियों को रहने दे अंखियों के आसपास, दूर से दिल की बुझती रहे प्यास।' अब ऐसे माहौल और कानून के डर के आगे अंखियां, आंखों के पास कैसे रह सकती हैं। जाहिर सी बात है ऐसे में प्यास भी फिर अधूरी ही रहेगी। 'सरबती तेरी आंखों की गहराई में मैं डूब जाता हूं...' अब ऐसा कहना तो बड़ा ही संगीन अपराध होगा। जहां देखना तक गुनाह है, वहां डूबना तो उससे भी बड़ा अपराध हो जाएगा। लिहाजा डूबने की तो अब कल्पना करना ही बेकार है। 'ये रेशमी जुल्फे, ये सरबती आंखें, इन्हे देखकर जी रहे हैं सभी...' लेकिन अब ऐसा कहने वाले और जीने वालों की संख्या कितनी रह जाएगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। 'तुझे देखें मेरी आंखें, इसमें क्या मेरी खता है..' वाकई कभी ऐसा करना खता नहीं था लेकिन अब हो जाएगा और किसी ने दिल के हाथों मजबूर होकर यह खता कर भी दी तो उसकी खैर नहीं होगी। सोचनीय विषय तो यह है कि किसी को देखने को खता न मानने वाले ने भूल से भी यह गीत गुनागुनाया तो मान लिया जाएगा कि उसके ख्याल 'नेक' नहीं हैं। 'नैन लड़ जैहें तो मनवा मा कसक होय ब करी... ' लेकिन अब नैन लडऩे की संभावना पर लगभग पूर्ण विराम लग जाएगा तो फिर मन में न तो कसक होगी और ना ही प्रेम का पटाखा छूटेगा। दिल की बात अब दिल में रहेगी। और किसी ने 'चोरी-चोरी तेरे संग अखिंया मिलाई रे..' की तर्ज पर आंख मिला भी ली तो वह गंभीर परिणाम भुगतने के लिए खुद को तैयार रखे। एक और गीत है ना.. 'आंखों के रस्ते, तू हंसते-हंसते दिल में समाने लगा है..।' लेकिन आंखों के रास्ते पर अब बैरियर लग चुका है, लिहाजा आंखों के सहारे दिल की तरफ जाने का रास्ता अब बंद ही समझो । और किसी ने इस रास्ते पर चलने की सोची तो फिर 'सवारी अपने सामान की रक्षा स्वयं करे...' के जुमले को दिमाग में रखना होगा। 'अंखियों के झरोखे से तूने देखा जो सांवरे...' कल्पना कीजिए, बेचारा सांवरा क्या अब ऐसा कर पाएगा। वह तो आंखों के झरोखे से तो दूर सीधी आंखों से देखने से तौबा करता दिखाई देगा।
ऐसी विषम परिस्थितियों एवं प्रतिकूल माहौल में आंखों का अतिश्योक्ति वर्णन या कई तरह की उपमाओं का दौर खत्म हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे देश में विभिन्न मतों का समर्थन करने और उनको मानने वाले लोग रहते हैं लेकिन आंखों के साथ यह सुखद संयोग जुड़ा है कि उसको समर्थन ही मिला है। गीत चाहे कैसा भी हो, भले ही वह आंखों की बड़ाई करें, आलोचना करें, उलाहना दें या फिर कोई उपमा दें। ऐसा है तभी तो जो आंखें जीने का सहारा बनती हैं, वही आंखें जुल्मी भी बन जाती हैं। ठीक आंखों का तारा होना और आंखों की किरकरी होना की तर्ज पर। यकीन ना हो तो देखिए..। 'जीवन से भरी तेरी आंखें, मजबूर करे जीने के लिए...' यहां आखों में जीवन नजर आता है वो जीने के लिए मजबूर करती नजर आती हैं लेकिन दूसरे ही पल 'ओ गौरी तेरी नैना हैं जादू भरे, हम पे छुप-छुप जुल्म करे' वह जुल्म पर उतारू हो जाती हैं। कितना विरोधाभास है फिर भी कोई विरोध नहीं है, आलोचना नहीं है। लेकिन अब ऐसे गीत लिखे जाएंगे तो विरोध की आशंका बलवती हो उठेगी। क्योंकि विरोध ही नहीं हुआ तो लोग ऐसे गीतों से प्रेरणा लेंगे और वास्तविक जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे। इतिहास गवाह है। ऐसा होता आया है। देश में प्यार पनपाने में फिल्मों का बड़ा योगदान रहा है और अब भी मौजूं हैं। जब आंखों को इस देश में इतना मान-सम्मान मिला है। आंखों पर लिखे गए गीतों को गुणग्राहकों व कद्रदानों ने दिल से लगाया है तो फिर इस एंटी रेप बिल के बहाने आंखों को खलनायक बनाने का सवाल तो गलत ही हुआ ना। सभी भेड़ चाल में हां-हां में मिलाए जा रहे हैं। कोई आंखों का समर्थन कर रहा है तो उसका विरोध किया जा रहा है। वैसे यह देश विविधता से भरा है। यहां खुली आंखों के ही नहीं बल्कि बंद आंखों के मुरीद भी मिल जाएंगे। ऐसा है तभी तो 'ये तेरी आंखें झुकी -झुकी , ये तेरा चेहरा खिला-खिला, बड़ी किस्मत वाला है वो प्यार तेरा जैसा मिला' जैसे गीतों की रचना हुई। मौजूदा हाल में ऐसे गीतों में ही बचाव की आंशिक गुंजाइश नजर आती है, क्योंकि यहां कशीदे खुली आंखों के नहीं बल्कि झुकी हुई आंखों की शान में गढ़े और पढ़े जा रहे हैं। लेकिन जब कोई पलटवार करते हुए यह गाने लगे कि 'तुम्हारी नजरों में हमने देखा, अजब सी चाहत झलक रही है, ना देखो ऐसे झुका के पलकें हमारी नियत बहक रही है..।' अब इसका इलाज क्या होगा। यहां तो झुकी हुए पलकें देखकर ही नियत डोल रही है। ऐसे में तो फिर भगवान ही मालिक है। ......
क्रमश: ..
बिल, बयान और बवाल-1
बस यूं ही
अस्सी के दशक में आई फिल्म राम तेरी गंगा मैली का एक चर्र्चित गीत हम सभी ने सुना ही होगा। गीत के बोल थे 'सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन...' इसी गीत का एक अंतरा है, जिसके बोल हैं 'कोई हसीना कदम, पहले बढ़ाती नहीं, मजबूर दिल से ना हो, तो पास आती नहीं..' इसके ठीक अगले अंतरे के भाव भी कमोबेश ऐसे ही हैं 'तू जो हां कहे तो बन जाए बात भी, हो तेरा इशारा तो चल दूं मैं साथ भी..' दोनों ही अंतरों के भावार्थ देखें तो मतलब साफ है कि नायिका, नायक से यह अपेक्षा रखती है कि वही पहल करे और इशारा भी। ऐसा न कर पाने के लिए वह अपनी मजबूरी भी बयां करती हैं। प्रसिद्ध गीतकार हसरत जयपुरी की ओर से लिखे इस गीत के करीब 28 साल बाद जद यू नेता शरद यादव द्वारा दिया गया बयान भी इस गीत के बोलों के आसपास ही प्रतीत होता है। हाल ही में संसद में एंटी रेप बिल पर बहस के दौरान जद यू नेता यादव ने कहा था कि 'जब महिला से बात करनी होती है, तब पहल महिला नहीं करती है। पहल तो हमें ही करनी होती है। कोशिश तो हमें ही करनी पड़ती है। प्यार से बताना पड़ता है। यह पूरे देश का किस्सा है, हमने खुद अनुभव किया है। हम सब लोग उस दौर से गुजरे हैं, उसको ऐसे मत भूलो।' विडम्बना देखिए गीत सुपर-डुपर हिट रहा लेकिन बयान विवादित हो गया। बयान को लेकर चटखारे लिए जा रहे हैं, व्याख्याएं की जा रही हैं। बयान का विरोध एवं समर्थन करने वालों के पास अपने-अपने तर्क हैं और उसी के हिसाब से शरद बाबू के बयान को परिभाषित किया जा रहा है। देशव्यापी बहस चल रही है। इतना ही नहीं बहस घूरने एवं पीछा करने की बात पर भी चल रही है।
यह बिल वैसे तो शुरू से ही विवादों एवं चर्चा में रहा है। पहले सम्बंधों की उम्र १६ करने को लेकर बहस छिड़ी तो अब घूरने एवं पीछा करने जैसी बातों के लिए। संसद में जिस दिन यह बिल पास हुआ, उसी दिन मन में सवाल था कि घूरने एवं पीछा करने के आरोपों की सच्चाई जानने का पैमाना क्या होगा। मैंने घूरना शब्द के बारे में गंभीरता से सोचा। शब्दकोश में इस शब्द के पर्यायवाची भी देखे। सार यही रहा कि देखना से ही घूरना शब्द बना है और उसी को ताकना भी कहते हैं। ताकना से तात्पर्य स्थिर दृष्टि से ध्यानपूर्वक देखना व कुदृष्टि डालना होता है। इसी तरह घूरना का मतलब आंखें गड़ाकर देखना, क्रोधभरी नजर से देखना या कामातुर होकर देखना होता है। इन्ही शब्दों से मिलता-जुलता एक और शब्द है, निहारना। इसके मायने हैं, निरखना या गौर से देखना। विडम्बना यह है कि यह सभी शब्द आपस में समानार्थी हैं लेकिन इनका प्रयोग परिस्थितियों के हिसाब से किया जाता है। देखना या निहारना शब्द इतने आपत्तिजनक नहीं हैं, जितने कि ताकना या घूरना। ताकना या घूरना शब्द भी जरूरी नहीं गलत मकसद के साथ ही जोड़े जाएं या प्रयोग किए जाएं। मसलन कोई संकट के समय में मदद के लिए किसी की तरफ उम्मीद भरी नजरों से ताकता है तो कोई किसी अपराधी को सजा मिलने या पकड़े जाने की स्थिति में विजयी मुद्रा के हिसाब से भी देखता है, तब उसका अंदाज कमोबेश घूरने जैसा ही होता है। खैर, विषय रोचक लगा है, इसलिए अपन ने इस पर लिखने का मानस तो पहले दिन ही बना लिया था। रात को कार्यालयीन काम पूर्ण होने के बाद घर गया और धर्मपत्नी से रूबरू होते हुए कहा कि देश में अब महिलाओं को घूरना या ताकना भी अपराध हो गया है। मेरा सवाल पूर्ण होने से पहले ही धर्मपत्नी का जवाब आया इसका सबूत क्या होगा। यकीन मानिए उसके पलटवार का मेरे पास कोई माकूल जवाब नहीं था। भले ही मेरे तर्कों को महिला विरोधी मान लिया जाए लेकिन देश में दहेज प्रताडऩा एवं अनाचार के ऐसे मामलों में फेहरिस्त बहुत लम्बी है, जो जांच के बाद झूठे पाए गए। दहेज प्रताडऩा में गवाह एवं अनाचार के मामलों में मेडिकल जांच मामले की सत्यता जांचने का आधार बनते हैं लेकिन घूरना या ताकना के प्रावधान में तो ऐसी कोई संभावना भी तो नजर नहीं आती है। जाहिर सी बात है ऐसे में इस प्रावधान के गलत उपयोग की आशंका अधिक होगी। मन में विचारों का द्वंद्व चलता रहा लेकिन धर्मपत्नी के सवाल का जवाब खोज नहीं पाया।
द्वंद्व को शब्दों में पिरोने का विचार तो शुरू से ही था लेकिन आज बिल के राज्य सभा में पास होने की खबर होने के बाद एक वेबसाइट देखी तो चौंक गया। इसमें बताया गया था कि इस एंटी रेप बिल से घूरकर देखने के अपराध को प्रावधान हटा दिया गया है। एक पल फिर रुक गया, सोचा जब विषय ही खत्म हो गया है तो फिर लिखना प्रासंगिक नहीं होगा। अचानक ख्याल आया कि वेबसाइट पर दी गई जानकारी गलत भी तो हो सकती है। बस फिर क्या था लगातार टीवी चैनलों एवं समाचार पत्रों की वेबसाइट खंगालने में जुट गया। करीब एक घंटे की माथापच्ची करने के बाद भी सफलता नहीं मिली। आखिरकार अपनी पीड़ा को लिखकर संबंधित चैनलों एवं बेवसाइट के लिंक के साथ फेसबुक पर चस्पा कर दिया। इसके बाद सर्वप्रथम रतनसिंह जी भाईसाहब का कमेंट आया। उन्होंने भी इसी विषय पर ज्ञान दर्पण डॉट कॉम में विस्तार से लिखने की जानकारी दी। मैंने तत्काल उनकी पोस्ट पोस्ट पढ़ी। उन्होंने इस प्रावधान के अमल में आने के बाद की संभावित परिस्थितियों का जो खाका खींचा वह न केवल चौंकाने वाला बल्कि सोचने पर मजबूर भी करता है। सटीक शब्दों में व्यंग्यात्मक शैली में लिखी उनकी पोस्ट इतनी पठनीय लगी है कि मैं एक सांस में नॉनस्टॉप पढ़ गया। पोस्ट पढऩे के बाद द्वंद्व फिर शुरू होना लाजिमी था। रहा सहा पोस्ट पर कमेंट लिखा, जिसमें इसी विषय पर लिखने का जिक्र भी कर दिया। खैर, ईमानदारी से कहूं मैंने भी व्यंग्यात्मक शैली में लिखने का मानस बनाया था। लेकिन मेरा अंदाज अलग होगा।
क्रमश: ...
Thursday, February 28, 2013
ये लिफ्ट ठीक करवा दीजिए!
टिप्पणी
श्रीमान, जिला कलक्टर, दुर्ग।
विडम्बना देखिए, जिले के लोग दूर-दूर से हर सप्ताह जनदर्शन में अपनी फरियाद इस उम्मीद से लेकर आपके पास आते हैं कि उसका निर्धारित समय अवधि में निराकरण होगा। उनके साथ न्याय होगा, उनको राहत मिलेगी। खैर, फरियादियों की समस्याओं का निराकरण कितना होता है, यह अलग विषय है लेकिन आपके कार्यालय परिसर में ही एक समस्या पिछले आठ माह से बनी हुई है। बार-बार आपके संज्ञान में लाने के बावजूद यह समस्या यथावत है। करीब तेरह लाख रुपए खर्च करके जिस उद्देश्य की पूर्ति तथा जिन लोगों की सुविधा के लिए यह लिफ्ट लगाई गई थी, उसमें न तो यह कारगर साबित हुई और ना ही संबंधित लोगों को इसका लाभ मिल पाया। लिफ्ट के अभाव में निशक्त, बुजुर्ग एवं असहाय लोग मशक्कत करते हुए किस प्रकार आपके कक्ष तक पहुंचते हैं, यह आपसे भी छिपा हुआ नहीं है। एक-एक सीढ़ी चढ़ते, गिरते-संभलते किसी तरह आपके कक्ष तक यह लोग पहुंच तो जाते हैं लेकिन सीढिय़ों का यह सफर उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
वैसे जिले के लोगों ने देखा है कि आप जिले के मुखिया होने के साथ-साथ संवदेनशील इंसान भी हैं और मातहतों की बातों पर विश्वास न करके आंखों देखी पर ज्यादा यकीन रखते हैं। तभी तो गाहे-बगाहे कार्यालय का काम छोड़कर आप किसी भी विभाग का निरीक्षण करने निकल जाते हैं। इससे इतना तो जाहिर हैं कि आप जमीन से जुड़े हुए हैं। सोचनीय विषय यह है कि जब आपके व्यक्तित्व के साथ यह खूबी और खासियत जुड़ी है तो फिर लिफ्ट को ठीक करने की दिशा में अब तक कोई पहल क्यों नहीं हो पाई। यह सही है कि लिफ्ट के मामले में आपने ,मातहतों को निर्देश भी जारी किए लेकिन उन्होंने इसको कितनी गंभीरता से लिया, सबसे बेहतर आप ही जानते हैं। अगर मातहत आंखों के सामने ही आपके आदेशों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं तो जिले की बात करना बेमानी है। इतना ही नहीं पंचायत एवं समाज कल्याण विभाग ने आठ माह के दौरान पीडब्ल्यूडी को छह पत्र लिख दिए हैं फिर भी समस्या जस की तस है।
बहरहाल, जनदर्शन का मतलब और मकसद लोगों को राहत पहुंचाना है तो लिफ्ट ठीक करना भी उसी दायरे में आता है। उसको ठीक करने से भी संबंधितों को राहत ही मिलेगी। और यदि जनदर्शन का मतलब कार्यालय बुलाकर सिर्फ जन का दर्शन ही करना है तो फिर कुछ कहना या ना कहना एक समान है और चिराग तले अंधेरा वाली कहावत से आप भी अछूते नहीं है। आप जिले के मुखिया हैं इसलिए आपसे उम्मीदें ज्यादा हैं। यकीन मानिए निशक्तोंं बुजुर्गों की समस्या का निराकरण भले हो या न हो लेकिन सीढिय़ों के कष्टदायी सफर से मुक्ति तो मिल ही जाएगी। अगर आपने यह करवा दिया तो ये लोग आपको दुआ देंगे। वैसे भी आपके लिए यह कोई बड़ा काम नहीं है।
साभार - पत्रिका भिलाई के 28 फरवरी 13 के अंक में प्रकाशित।
Tuesday, February 26, 2013
यह फेसबुक है मेरी जान...
बस यूं ही
यह दुनिया बड़ी अजीब है। इस दुनिया में ना उम्र की सीमा है और ना ही समय का कोई बंधन। यहां दिन गुलजार हैं और रातें रंगीन व रोशन। नींद का तो यहां कोई नामलेवा भी नहीं है। यहां सच भी है लेकिन दिखावा और झूठ का बोलबाला भी कम नहीं है। यहां फर्जीवाड़े और फरेब का कॉकटेल है तो प्यार की सौंधी महक भी महसूस होती है। यहां मनोरंजन की चासनी में मोहब्बत का तड़का लगता है तो भक्ति एवं ज्ञान के प्रवचनों की गंगा भी प्रवाहित होती है। इसमें आधुनिकता का रंग तो पग-पग पर है लेकिन परम्परा से जुड़ाव भी दिखता है। यहां जोश, जुनून एवं जज्बा जगाया जाता है तो कड़वी हकीकत से रूबरू भी करवाया जाता है। आश्चर्य से भरी, कौतुहल जगाती, विस्मय पैदा करती तथा हकीकत के पास होते हुए भी हकीकत से दूर करती यह कोई तिलिस्मी नगरी ना होकर फेसबुक है। सूचना एवं प्रौद्योगिकी में आए क्रांतिकारी बदलावों के चलते महानगर तो क्या, छोटे-छोटे कस्बों, गांवों एवं ढाणी तक के लोग इस मायानगरी से जुड़ रहे हैं। सहज एवं सरल विधि ही इस मायानगरी की सबसे बड़ी खूबी और खासियत है। फेसबुक की मायावी नगरी आत्मविश्वास तो जगाती ही है हिम्मत और हौसला भी देती है। भले ही फेसबुक को लेकर सभी के दीगर मत हों लेकिन विचारों को बेझिझक संप्रेषित करने का सबसे सशक्त माध्यम भी है।
हम भी करीब दो साल से इस मायावी नगरी में विचरण रहे हैं। महाकाल की नगरी उज्जैन में इंटरनेट पर बैठे-बैठे अकस्मात की इस दुनिया से जुडऩे का सौभाग्य मिल गया। जुड़ तो गए लेकिन शुरू-शुरू में तो अपुन को इसका ककहरा भी नहीं आता था। नियम-कायदों का तो बिलकुल भी ज्ञान नहीं था। बस कम्प्यूटर बैठे और फिर धीरे-धीरे सीखते गए। आगे से आगे राह मिलती गई। अब भी पूर्णतया पारंगत तो नहीं हुए लेकिन खाते में अच्छा-खासा अनुभव जरूर जुड़ गया है। बस यह अनुभव ही लिखने का मजबूर कर गया। फेसबुक पर क्या देखा, जाना और सीखा, वह सब आपसे साझा करने को मन कर गया। खैर, फेसबुक के मामले में जो अनुभवी हैं, हो सकता है उनको यह लेख सामान्य सा लगे लेकिन फेसबुक की दुनिया में नवप्रवेशित लोगों को इससे फीडबैक जरूर मिलेगा, इसका दावा तो नहीं लेकिन यकीन जरूर है।
इस मायावी नगरी में प्रवेश करना आसान है लेकिन यहां के कुछ दस्तूर व उसूल भी हैं। अगर इन उसूलों एवं दस्तूरों का किसी ने पालन नहीं किया तो फिर वह अलग-थलग ही पड़ जाता है। मतलब लाइक एवं कमेंट। फेसबुक की दुनिया में प्रवेश करते समय पहले वास्ता इन दोनों से ही पड़ता है। आप किसी को नियमित लाइक करते रहे तो यकीन मानिए आपने कुछ लिखा तो यकीनन आपको भी लाइक मिलने लगेंगे। और अगर आप कमेंट तक आ गए तो फिर बदले में कमेंट मिलना भी लाजिमी है। यह क्रम नियमित रहना जरूरी है। बीच में एक बार टूटा तो फिर जोडऩे में या पटरी में लाने में वक्त लगता है। यह तो शुरुआती चरण है। अगर आप इतना सीख गए तो फिर तो अंदरुनी उठापटक को समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। यथा...फेसबुक का संसार बड़ा विचित्र है। इसके कई रंग हैं। यहां गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी है। एक दौड़ सी लगी है। बिलकुल अंधी होड़ है। और दौड़ और होड़ से कई तरह के प्रेमियों का जन्म होता है, मसलन देश प्रेमी, कला प्रेमी, खेल प्रेमी, प्रकृति प्रेमी, और भी कई तरह के प्रेमी। प्रेमियों के ज्ञान की तो बस पूछिए ही मत।
यहां कोई धर्म कर्म की बात करेगा तो कोई किसी देवता या संत की फोटो को लाइक या शेयर करने पर शर्तिया कुछ अच्छा होने की गारंटी देगा। फेसबुक पर लोग ज्ञानी बन जाते हैं। निशुल्क ज्ञान बांटते हैं, प्रवचन देते हैं। न कुछ कटने का झंझट और ना कुछ सम्पादित होने का डर। जो बोला या लिखा सबके सामने। यहां मौलिकता कोई मायने नहीं रखती है। इसकी टोपी उसके सिर पर की तर्ज पर कट, कॉपी, पेस्ट का खेल एकदम बिंदास अंदाज में चलता है। कोई संस्मरण सुनाता है तो कोई यात्रा वृतांत। तभी तो फेसबुक ज्ञान, नसीहत, नीति एवं धर्म की राह पर चलने वाले अमूल्य विचारों का खजाना है। यह खजाना खत्म नहीं होता है। अनवरत चलता ही रहता है। आगे से आगे। कुछ शेयर करते हैं तो कुछ अलग से सेव करके अपने नाम से चलाते हैं लेकिन सिलसिला थमता नहीं है।
सेंतमेत में प्रचार करने का भी तो फेसबुक सबसे जोरदार जरिया है। विज्ञापन लगाने काम भी यहां बदस्तूर चल रहा है। कोई प्रचार कर रहा है अपने उत्पाद का तो कोई दुकान का। पुस्तकों का विमोचन भी अब तो फेसबुक पर होने लगा है। राजनीति का अखाड़ा भी है फेसबुक है। यहां केवल दिशा-निर्देश ही नहीं बल्कि वोट तक मांगे जा रहे हैं फेसबुक पर। प्रधानमंत्री तक का फैसला फेसबुक पर होने लगा है। रायशुमारी तक कर ली जाती है।
इतना ही नहीं जो जिस विधा में माहिर, वह उसके बारे में विशेषज्ञ की तरह पेश आता है। और जिसके पास फन नहीं है वह अपनी शानोशौकत दिखाने के लिए घर, वाहन आदि की फोटो तक को चस्पा कर रहा है। सचमुच कितनी कौतूहल भरी है यह फेसबुक की दुनिया। कोई दुनिया और अंतरिक्ष की रोचक जानकारी जुटाता है तो कोई फेसबुक पर मुशायरा करवा देता है। कोई कविताओं, शेर, शायरी व लघु कथाओं का मुरीद है तो किसी को किस्से, चुटकुले आदि लुभा रहे हैं। कोई अपनी रचनाएं, कोई फोटो तो कोई कार्टून लगा रहा है। सारी उधेड़बुन यही रहती है कि प्रतिस्पर्धा में खुद को बरकरार कैसे रखा जाए। कुछ विसंगतियों को पकडऩे का काम करते हैं तो कुछ वर्तमान एवं अतीत की गलतियों को जोड़कर पेश करते हैं। गाहे-बगाहे बहस का दौर तो चलता ही रहता है। कुछ फेसबुक पर लाइक एवं कमेंट की उम्मीद में सवाल छोड़ देते हैं तो कई बहस करते हैं। कुछ उन्मादी भावातिरेक में बह जाते हैं। बाहें चढ़ाते हैं। एक दूसरे को चुनौती देते हैं। वाकई ज्ञान का भंडार है फेसबुक। कहने को काफी कुछ है इसके बारे में। सामाजिक कुरीतियां भीं यहां दूर होती हैं तो परम्पराएं भी यहां पर सहेजी जा रही हैं। कोई बालिकाओं को बचाने की अपील कर रहा था तो कोई अपने दोस्तों को जन्मदिन की बधाई देने से भी नहीं चूकता। कुछ ऐसे भी हैं जिनके लिए गुड मार्निंग एवं गुड नाइट से ज्यादा कुछ नहीं है फेसबुक। वाकई फेसबुक कई तरह के सवालों का जवाब है तो कई जवाबों का सवाल भी है।
इतने गुण होने के बाद फेसबुक के साथ विरोधाभास जुड़ा है। शादी के लड्डू की तरह सभी लाइक व कमेंट की उम्मीद तो रखते हैं लेकिन टैग किसी को फूटी आंख भी नहीं सुहाता है। टैंग करने वाले फेसबुकियों से कुछ परेशान हैं तो कुछ आदतन शिकायताकर्ता। कोई टैग कर दे तो फिर आसमान सिर पर उठाते हैं। नैतिकता की दुहाई देते हैं।
पिछले माह फेसबुक के गुणगान करने वाली एक पोस्ट भी देखी। बंदे ने क्या जोरदार खाका खींचा। फेसबुक पर विचरण करने वालों का प्रकृत्ति के हिसाब से नामकरण भी कर दिया। करीब दर्जनों नाम लिखे थे। कुछ तो याद हैं अभी तक आप भी देखिए। फेसबुक मुर्गा- जो सबको गुड मोर्निंग कह कर जगाता है। फेसबुक सेलीब्रिटी- जो पांच हजार फ्रेंड की लिमिट को पूरा करता है, भले ही सभी मित्रों के बारे में सही जानकारी ना हो। फेसबुक बाबा- भगवान व धर्म से संबंधित पोस्ट ही लगाएंगे। फेसबुक चोर- दूसरों के स्टेटस एवं पोस्ट चोरी करके अपने नाम से अपने वॉल पर डालते हैं। फेसबुक देवदास-दर्दभरी कविताएं यां शायरी कहते हैं और अपने दुख दुनिया से साझा करते हैं। फेसबुक न्यूज रिपोर्टर- खबरों के बारे में जानकारी देते रहते हैं। फेसबुक टीकाकार- खुद कुछ नहीं लिखते लेकिन दूसरों की पोस्ट पर जाकर टिप्पणी करते रहते हैं। फेसबुक विदुषक-यह लोग खुद भले ही दुखी हों लेकिन कमेंट एवं पोस्ट से दूसरों को हंसाते रहते हैं। फेसबुक लाइकर- यह लोग कमेंट करने में कंजूसी बरतते हैं लेकिन चुपके से लाइक कर देते हैं। फेसबुक विचारक-यह लोग अपने विचार अपनी पोस्ट के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते हैं। फेसबुक कवि और कवियित्री-इनको कविता के अलावा कुछ नहीं दिखता, बस अपनी कविताएं ही पोस्ट पर डालते हैं। फेसबुक टपोरी- यह फेसबुक पर छिछोरी हरकतें करते हैं और हलकट पोस्ट लगाते हैं। फेसबुक द्वेषी-इनको फेसबुक पर किसी की तारीफ करना अच्छा नहीं लगता है। बस लोगों से द्वेष करते हैं। फेसबुक चैटर- इनको फेसबुक पर चैटिंग के अलावा कुछ काम नहीं सूझता। फेसबुक लिंग परिवर्तक-यह फेक आईडी बनाते हैं। इसमें मेल, फीमेल बन जाता है और फीमेल, मेल। फेसबुक खिलाड़ी- यह दिन भर फेसबुक पर गेम खेलते रहते हैं। फेसबुक बंदर- जो कमेंट में कुछ नहीं बोलते, केवल हा, हा या ही, ही करते रहते हैं। फेसबुक भिखारी- ऐसे लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट अक्सर ब्लॉक कर दी जाती है और यह लोग फ्रेंड बनने के लिए भीख मांगते रहते हैं। और सबसे आखिर में फेसबुक कलेक्टर, जो केवल ग्रुप या पेज ही ज्वाइन करते हैं।
बहरहाल, फेसबुक पर इतना लिखने के बाद भी ऐसा लग रहा है कि काफी कुछ छूट रहा है। यही तो फेसबुक की माया है। आजकल हर जगह इसी की धमक है और इसी के चर्चे हैं। इसके बिना सब बेनूर है, बैरंग है, बेमजा है और यह संस्कृति की संवाहक है। सचमुच कमाल की चीज है। जितना इससे दूर जाने को मन करता है उतना ही पास आते हैं। मायावी की माया है। इससे कोई अछूता नहीं है।
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