Monday, February 25, 2013

मूंछों का है जमाना


बस यूं ही 
 
वैसे तो मूंछों की शान में अनगिनत कशीदे पढ़े गए हैं। तभी तो मूंछों को आन, बान, शान और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है। विशेषकर राजस्थान जैसे परम्परावादी राज्य में तो मूंछों को लेकर काफी कुछ कहा गया है। देखा जाए तो
मूंछें प्राचीनकाल से ही लोगों को लुभाती रही हैं और वर्तमान में भी इनकी प्रासंगिकता बरकरार है। मूंछों को लेकर कई किस्से, कहानियां, लोकोक्तियां एवं मुहावरे भी प्रचलन में है। मैं भी कई दिनों से मूंछों पर कुछ लिखने की सोच रहा था लेकिन न तो समय निकाल पाया और ना ही लिखने की कोई बड़ी वजह मिली। 
आज बैठे-बैठे अचानक ब्लॉग पढऩे का मन किया। सबसे पहले नजर श्री रतनसिंह जी भाईसाहब के ब्लॉग ज्ञान दर्पण में हाल में लिखी गई रचना ठाकुर साहब की अकड़ और मूंछ की मरोड़ का राज पढ़ा तो फिर मूंछों की याद आ गई। हालांकि मूंछों से वाबस्ता फिल्मी जुमला मूंछे हों तो नत्थूलाल जैसी तो बचपन में ही सुन लिया था, लेकिन तब यह बात समझ में नहीं आई थी कि आखिर नत्थूलाल की मूंछों में ऐसा क्या है। बाद में फिल्म में देखी तो जिज्ञासा शांत हुई। मूंछों संबंधी जिज्ञासा तो शांत हो गई लेकिन फिल्मों का चस्का ऐसा लगा कि एक तरह की लत ही लग गई । यह फिल्मों का ही असर था कि एक बार अपने भी तोते उड़ गए थे। तोते उडऩे का यह डायलॉग भी अजय देवगन की प्यार तो होना ही था, फिल्म में सुना था। सैलून में मूंछें सेट करवाते हुए नाई जब बातों-बातों में अजय देवगन की एक तरफ की मूंछ साफ कर देता है, और फिर डर के मारे वह जोर-जोर से चिल्लाता है, उस्ताद तोते उड़ गए, उस्ताद तोते उड़ गए। हकीकत जानने पर अजय देवगन ने थोड़ा गुस्सा होने के बाद दूसरी तरफ की मूंछ भी साफ करवा ली थी। 
खैर, तीन साल के लिए मैंने भी मूंछें साफ करवाई थी। कोई वजह पूछता तो अपने पास भी वही परम्परागत बहाना तैयार था। कह देते कि मूंछें सेट करते समय एक तरफ की कुछ ज्यादा छोटी हो गई। देखने में बुरी लग रही थी, इसलिए साफ ही कर दी। अधिकतर लोग तो इस तर्क से संतुष्ट हो जाते। कोई ज्यादा समझदार जब मानने को तैयार नहीं होता तो फिर उसे राजेश खन्ना की फिल्म का डायलॉग सुना देते और कह देते..अरे भई यह तो मर्दों की खेती है, जब चाहे उगा ली और जब चाहे काट ली, इसमें आपका क्या? वैसे चिकना बनने का यह बुखार कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही चढ़ा था और पत्रकारिता की एबीसीडी सीख कर जब मैदान में उतरे तो बाकायदा मूंछें साथ थी। मतलब तीन साल तक बिना मूंछों के रहने का अनुभव भी अपुन के साथ चस्पा हो गया। वैसे ईमानदारी की बात यह है कि अपनी गुडबुक में मूंछ वाले हीरो ही ज्यादा रहे हैं, मसलन, राजकपूर, अनिल कपूर, राकेश रोशन आदि, हालांकि अनिल कपूर भी एक बार लम्हे में बिना मूंछों के नजर आए। राकेश रोशन ने भी एक-दो फिल्मों में अपनी मूंछे कटवाईं। यह बात दीगर है कि फिल्मों में कथानक के अनुसार कई नायकों ने मूंछे रखी हैं, भले ही असली जिंदगी में उन्होंने मूंछों से परहेज किया हो। ऐसे नायकों की फेहरिस्त बेहद लम्बी है। खैर, खलनायक तो अपवादस्वरूप ही किसी फिल्म में बिना मूंछों का नजर आया, वरना मूंछों के साथ दाढ़ी तो कई फिल्मों में खलनायक की पहचान बन गई।
खैर फिल्मी दुनिया से इतर भी मूंछों का महत्त्व रहा है। मूंछें चेहरे का रौब बढ़ा देती हैं। दुबारा मूंछे रखने के बाद मैं अपने कई मूंछ ना रखने वाले दोस्तों से मजाक-मजाक में पूछ बैठता कि बिना बात किए आपको किस आधार पर पहचाना जाए कि आप पुरुष हो। वैसे भी मौजूदा पहनावा एवं लाइफ स्टाइल ऐसे हैं कि पुरुष एवं महिलाओं में भेद तक करना मुश्किल हो रहा है। दोस्तों से संतोषजनक जवाब ना मिलने पर विजयी मुस्कान के साथ मैं कहता, मूंछों से ही इंसान की पहचान होती है। हो भी कैसे नहीं। मूंछों को लेकर दर्जनों मुहावरें हैं, जो अलग-अलग संदर्भों में प्रयुक्त किए जाते हैं। मुहावरों की बानगी देखिए...। मूंछ मरोडऩा, मूंछें फरकाना, मूंछों पर ताव देना। मूंछों को बल देना। मूंछें ऊंची होना। मूंछें नीची होना। मूंछ लम्बी होना। मूंछ का बाल।  मूंछ ही लड़ाई
मूंछ का सवाल आदि आदि। इन मुहावरों का भावार्थ देखा जाए तो मूंछों को इज्जत से जोड़कर देखा गया है। मूंछे ऊंची होना जहां सम्मान की बात है, वहीं मूंछें नीची होने का मतलब बेइज्जत होना है। इसी तरह मूंछों को ताव देने से आशय चुनौती देना है तो मूंछ का सवाल का अर्थ प्रतिष्ठा का सवाल है। इन मुहावरों से साफ होता है कि मूंछों की दर्जा काफी ऊंचा हैं और मूंछों के साथ इज्जत को जोड़कर देखा जाता रहा है।
खैर, मेरे विचारों से कोई यह ना समझ लें कि मैं मूंछ ना रखने वालों का विरोधी हूं, ऐसा नहीं है। बस बात की बात है और विषयवस्तु प्रासंगिक है, लिहाजा लिखने को मन कर गया। वैसे भी मैं तो पहले ही स्पष्ट कर चुका हूं कि मेरे पास भी बिना मूंछ रहने का तीन साल का अनुभव है। फिर भी फिल्मी नायकों को देखकर या उन जैसा बनने की हसरत रखने वाले जरूर मूंछें साफ करवाने में विश्वास रखते हैं लेकिन पिछले दो 
तीन  सालों में फिल्मवालों का मूंछ प्रेम भी यकायक बढ़ गया है। हाल ही में आधा दर्जन से ज्यादा फिल्मी आई हैं, जिनमें नायक बाकायदा बड़ी-बड़ी मूंछों के साथ अवतरित हुए हैं। उदाहरण के लिए राउडी राठौड़ में अक्षय कुमार, दबंग व दबंग-2 में सलमान खान, बोल बच्चन में अजय देवगन, तलाश में आमिर खान,  मटरू की बिजली का मन डोला में इमरान खान,  जिला गाजियाबाद में संजय दत्त को देखा जा सकता है। राजस्थान के मंडावा में फिल्माई गई फिल्म पीके में भी संजय दत्त ने मूंछों में किरदार निभाया है। 
लब्बोलुआब यह है कि फिलहाल मूंछों का बोलबाला है और जमाना कहें तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए। अपन तो मूंछ पहले से ही रखे हुए हैं, लिहाजा आजकल मूंछें छोटी या बड़ी रखने की वजह बताने में कोई दिक्कत नहीं है। कई बहाने मिल गए हैं। ना रखी थी तब भी और सामान्य से कुछ बड़ी कर ली तब भी। वैसे अपुन की मूंछें भी आजकल कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। यह जानकारी भी तब लगी जब कुछ परिचितों ने हाल की एक फोटो को फेसबुक पर देखकर चेहरे की बजाय मूंछों पर ही टिप्पणी कर दी। किसी ने साउथ का फिल्मी हीरो बता दिया तो किसी ने मूंछों को भारी बता दिया। किसी ने सिंघम तक कह दिया तो कोई बोला मूंछ मोटी कर ली। एक दोस्त ने तो यहां तक कह दिया कि मूंछ है तो सब कुछ है। फोटो पर आई इन टिप्पणियों से इतना तो तय है कि चेहरा देखते समय सर्वप्रथम ध्यान मूंछों पर ही जाता है। इसलिए एक बार मूंछ रखने का अनुभव भी तो लिया ही जा सकता है। और फिर बकौल राजेश खन्ना, यह तो मर्दों की खेती है। जमी तो रख ली, ना जमी तो साफ।

Monday, January 28, 2013

डोंगरगढ़ यात्रा



 बस यूं ही

दो सप्ताह पहले की बात है। दोपहर को घर पर बैठा था कि अचानक बिलासपुर से साथी नरेश भगोरिया का फोन आ गया। बोले, सर इस बार गणतंत्र दिवस पर क्या कर रहे हो। मैंने कहा कि यार, मैंने तो कुछ विचार नहीं किया है। आप बताओ क्या कर रहे हो? इस पर नरेश जी बोले, सर, डोंगरगढ़ चलते हैं। मैंने बिना देर किए या धर्मपत्नी से सलाह लिए, तत्काल हां कर दी। काफी दिनों से डोंगरगढ़ जाने की हसरत थी। ऐसे में नरेश जी ने डोंगरगढ़ की कह कर मेरे मन बात कह दी थी। आखिरकार गणतंत्र दिवस भी आया। और नरेश भगोरिया अपनी प्यारी सी बिटिया एवं श्रीमती के साथ बिलासपुर से रवाना हो गए। सभी की टिकट ऑनलाइन करवाई थी। हमको दुर्ग से बैठना था। निर्धारत समय पर मैं दोनों बच्चों एवं धर्मपत्नी के साथ रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया। दुर्ग से डोंगरगढ़ जाने में करीब एक घंटे का समय लगता है। डिब्बे में नरेश जी के साथ रणधीर को देख चौंक गया और पूछ लिया। अरे भाई आपका तो कहीं नाम ही नहीं था। अचानक यह सब कैसे हो गया। रणधीर, नरेशजी से मुखातिब होते हुए बोला, सर ने कहा इसलिए आ गया। रात को सो भी नहीं पाया। अलसभोर चार बजे के करीब तो आफिस से फ्री हुआ। फिर छह बजे के करीब रेलवे स्टेशन आ गया। बातों के इस सिलसिले में एक घंटा कब बीता पता ही नहीं चला और हम डोंगरगढ़ पहुंच गए। ट्रेन से नीचे उतर कर स्टेशन से बाहर आ गए। तभी नरेश जी को ख्याल आया बोले, सर वापसी की ट्रेन की जानकारी अभी कर लेते हैं। इसके बाद ही आगे का कार्यक्रम तय करेंगे। हमने पता किया तो दोपहर दो और ढाई के बीच दो ट्रेन थी। सोचा दो बजे तक फ्री नहीं हो पाएंगे, लिहाजा वापसी में बस से दुर्ग से आ जाएंगे। यहां से हम घर चले जाएंगे और नरेश जी बिलासपुर के लिए ट्रेन पकड़ लेंगे। खैर, यह तय करने के बाद हम जैसे ही बाहर निकले एक ऑटो वाला आ गया। और बैठने का आग्रह करने लगा। बोला प्रति सवारी दस रुपए लूंगा, बैठो। हम बैठ गए। आखिरकार हम मंदिर के पास या यूं कहें कि पहाड़ी के पास पहुंच गए, क्योंकि मंदिर तो पहाड़ी पर है। मंदिर जाने से पहले तय हुआ कि पहले चाय पी ली जाए, इसके बाद दर्शनों के लिए रवाना होंगे। डोंगरगढ़ जैसे छोटे से कस्बे में एक साधारण से होटल में निहायत अदने से डिस्पोजल गिलास में एकदम फीकी चाय की कीमत दस रुपए चुकाकर मेरा चौंकना लाजिमी था। लेकिन यह क्षणिक ही था। मुझे यह अच्छी प्रकार से मालूम है कि अक्सर ऑटो, होटल संचालक एवं स्थानीय दुकानदार बोलचाल के आधार पर यह जान लेते हैं कि अमुक व्यक्ति स्थानीय नहीं हैं और इसी का फायदा गाहे-बगाहे उठा भी लेते हैं। मैं इस प्रकार की कई घटनाओं का साक्षी रहा हूं। विशेषकर ऐसे देहाती इलाकों में जहां लोग स्थानीय भाषा में बात करना जानते हैं, वे इस प्रकार की मुंहमांगी कीमत के शिकार नहीं होते लेकिन हमारे साथ यह दिक्कत थी हम में से कोई भी छत्तीसगढ़ से नहीं था। मैं राजस्थान से, नरेश जी मध्यप्रदेश तो रणधीर बिहार से। खैर, चाय पीकर हम जैसे ही होटल से निकले तो प्रसाद की अस्थायी दुकानों से आवाजें आने लगी। हर कोई लुभाने का जतन कर रहा था। हमने होटल के पास ही एक दुकान पर अपना सामान रखा और वहां से प्रसाद लिया। बदले में दुकान पर जूते आदि रखने का सुविधा भी निशुल्क मिल गई। खाना चूंकि घर से बनाकर ही ले गए थे, इसलिए तय किया गया, इसको मां के दर्शन करने के बाद पहाड़ी के ऊपर ग्रहण किया जाएगा। लिहाजा, खाना साथ में लेकर चल पड़े। तय हुआ कि रोप वे में जाएंगे और उसी में लौट आएंगे। टिकट काउंटर के बाहर दो तरह की कीमत लिखी थी। एक स्पेशल और एक साधारण। चूंकि रोप वे मेरे लिए पहला अनुभव था, इसलिए मैंने जिज्ञावावश नरेश जी की तरफ देखा तो वे बोले सर साधारण एवं स्पेशल में कोई खास फर्क नहीं है। ऐसा करते हैं अपन साधारण का टिकट ही लेते हैं। यह कहकर नरेश जी उत्साह के साथ काउंटर की ओर बढ़े और जल्द ही निराशा के साथ वापस लौट आए। मैंने पूछा तो बोले, सर वेटिंग चल रहा है। नम्बर आने में दो घंटे लगेंगे। मैंने कहा कोई नहीं पैदल ही चलते हैं दो घंटे कौन इंतजार करेगा। हालांकि मन में एक अजीब सा रोमांच भी था। कई दिनों बाद पहाड़ पर चढऩे का मौका जो मिल गया था। खाने का सामान मेरे पास ही था। मैंने कहा कि इसको अब तो नीचे रख देते हैं, वापसी में लौटकर खा लेंगे। क्यों बिना मतलब वजन ऊपर लेकर जाएं। लेकिन मेरी सलाह किसी ने नहीं मानी और खाने की टोकरी को ऊपर पहाड़ पर ले जाने का निर्णय हो गया। सीढिय़ा शुरू होते ही रणधीर ने काउंटर पर बैठे वृद्ध से पूछ लिया ... कि कितनी सीढ़ी है। जवाब आया 11 सौ। जवाब सुनकर रणधीर सकपकाया लेकिन बिना कुछ बोले चुपचाप सीढिय़ों की तरफ बढ़ गया। हम कुल आठ लोग थे। पांच बड़े और तीन बच्चे। नरेश जी की बिटिया छोटी है, इस कारण वह गोद में थी। हमारे दोनों सुपुत्रों को सीढिय़ों का खेल बेहद पसंद आया। और बिना मदद लिए वे भी चढऩे लगे। खाना और सामान जिस में रखा था वह टोकरी बार-बार एक दूसरे के हाथों में बदलती रही ताकि कोई थके नहीं। करीब सौ सीढिय़ा चढऩे के बाद पैरों की पिंडलियों में खिंचाव सा होने लगा और सांसें तेज हो गई। लगा कि अब और नहीं चढ़ा जाएगा। मेरी जैसी हालत लगभग सभी की थी।
पत्रकाािरता के क्षेत्र में होने तथा देर रात सोने के कारण शारीरिक श्रम कहां हो पाता है। समय ही नहीं है। मौसम भले ही सर्दी का हो लेकिन माथे से पसीना टपकने लगा था। रास्ते में मैंने फिर सुझाव दिया कि खाना आते समय खा लेंगे। यह टोकरी किसी दुकान में रख दो। आखिरकार इस बार मेरी सलाह सुन ली गई और एक दुकान में वह टोकरी रख दी गई। आखिर कुछ वजन तो कम हुआ। सांस फूलने की सबसे बड़ी वजह वे सीढिय़ां थी, जिनकी बनावट समान नहीं थी। कहीं बिलकुल आराम से कदम रखे जा रहे थे तो कहंी-कहीं सीढिय़ों के बीच एक से डेढ़ फीट का अंतराल था। सीढी भी ढलवा ना होकर एकदम खड़ी थी, इसलिए थकान ज्यादा एवं जल्दी हो रही थी। सीढिय़ां चढ़ते समय व्यक्ति बोरियत इसलिए महसूस नहीं करता क्योंकि पूरे रास्ते में सैकड़ों दुकानें हैं, जहां चाय-पानी के अलावा पूजन सामग्री की बिक्री होती है। वैसे बच्चों एवं महिलाओं से संबंधित साजो सामान भी इन दुकानों पर खूब सजा है। आखिरकार खरीदारी भी तो यही वर्ग ज्यादा करता है। आधे रास्ते के बाद एकलव्य ने हाथ खड़े कर दिए और मुंह लटकाने वाले अंदाज में बोला, पापा थक गया हूं। प्लीज गोद में ले लो। बच्चे को क्या दोष देता जब मैं खुद ही हाथ खड़े करने वाले अंदाज में था। भारी थकान के बाद भी एकलव्य को गोद में लेकर सीढिय़ां चढऩे लगा। इसके अलावा और कोई विकल्प भी तो नहीं था। वैसे इस मामले में योगराज ने दिलेरी का काम किया। उसकी स्टेमिना वाकई गजब की है। वह दौड़कर सबसे आगे चला जाता और फिर नीचे आता। इस प्रकार से उसने तो हमसे दुगुनी सीढिय़ों को पार किया। रास्ते में नरेश जी कैमरे पर हाथ चला रहे थे लेकिन उस वक्त पहला मकसद तो किसी तरह मंदिर तक पहुंचना था। पता नहीं नरेश जी को किसने कह दिया था, वे बोले मंदिर के पट 12बजे बंद हो जाएंगे। यह सुनना तो और भी कष्टकारी था, क्योंकि मंजिल अभी दूर थी और घड़ी साढ़े ग्यारह बजा चुकी थी। सांसें अब और भी तेज होकर लोहार की धोकनी की तरह चलने लगी थी। बिलकुल हांफने वाले अंदाज में आ चुके थे हम। मैं कभी एकलव्य को गोद में लेता कभी नीचे उतारता। हां, एक दूसरे को देखकर और खुद जैसे ही हाल में पाकर हम सभी एक दूजे को मन ही मन में दिलासा दे रहे थे। आखिरकार बैठते-बैठते हम मंदिर के पास पहुंच चुके थे। यहां श्रद्धालुओं की संख्या कुछ ज्यादा इसलिए हो गई थी कि क्योंकि रोप वे से आने वाले भी आगे इसे रास्ते से कुछ सीढिय़ां चढ़ते हैं। मंजिल नजदीक देख जोश आया लेकिन पिंडलियां एवं जांघें ऐसा लग रहा था मानो जमकर पत्थर बन गई हैं। फिर भी जयकारे के साथ हम बढ़ते गए। मंदिर बामुश्किल दस मीटर की दूरी पर ही था कि अचानक रणधीर को चक्कर आ गया। उसको तत्काल एकांत में भेजकर लेटने का कहा। वह पूरी रात नहीं सोया।
दूसरे लगभग पूरे रास्ते में नरेश जी बिटिया उसी की गोद में रही, तीसरा वह सेहत के मामले में भी कुछ कमजोर है। सारे मेल मिल गए थे, लिहाजा ऐसा हो गया। पहाड़ की सबसे ऊँची चट्टान पर मां का मंदिर है। चट्टान को निर्माण करके कुछ बड़ा कर दिया गया है ताकि मंदिर परिसर में श्रद्धालु आसानी से परिक्रमा लगा सकें। दोनों बच्चों के हाथ थामे में मंदिर परिसर में लाइन में लगा था। थोड़ी से धक्का मुक्की हुई और दोनों बच्चे भीड़ में फंस गए तो मैंने योगराज को अपने आगे खड़ा किया जबकि एकलव्य को फिर गोद में लिया। दर्शन करने के बाद मन में सुकून से आया। चेहरे पर एक विजयी मुस्कान उभर आई थी। सभी ने दर्शन करने के बाद करीब आधा घंटे तक वहंी मंदिर के पास खाली जगह पर बैठकर आराम किया। वहां के वातावरण में इतनी शीतलता था कि अगर लेट जाते तो नींद आ जाती। यहां आराम करने के बाद खुद को  तरोजाता महसूस किया तो थोड़ा नीचे आए। इसी दौरान एक स्थान दिखा। वहां काफी युगल फोटो खिंचवा रहे थे। हम सब भी वहां गए। दूसरे तरफ नजर गई तो चौंक गया। उस तरफ एकदम खड़ा पहाड़ था। और ऐसा लग रहा था कि किसी ऊंचे भवन या टंकी पर चढ़ गए और सीधा धरती को देख रहे हों। इतनी ऊंचाई से देखना किसी रोमांच से कम नहीं था। चक्कर से आने लगे थे मुझे। मैंने दोनों बच्चों के हाथ कसकर पकड़ लिए। कुछ फोटो खिंचवाने के बाद हम यहां से लौट आए। यह स्थान इसलिए भी रोचक है क्योंकि यहां एक बड़ी चट्टान है, जो एक तरफ हवा में है। ऐसा लगता है कि अभी लुढ़क जाएगी लेकिन ऐसा है नहीं। जाते समय जो दर्द पिंडलियों एवं जांघों में हो रहा था वह अब पीठ में होने लगा था। संतुलन बनाए रखने के लिए खुद को टेढ़ा रखना जरूरी है वरना औंधे मुंह गिरने की आशंका रहती है। रास्ते में खिलौनों की दुकानें देख दोनों बच्चे मचल गए। पूछा तो बोले खिलौना दूरबीन लेंगे। वही दूरबीन जो सामान्य मेले में दस से बीस रुपए में मिल जाती है लेकिन आज यह पहाड़ पर बिक रही थी लिहाजा कीमत भी पहाड़ जैसी ही थी। सौ रुपए में दोनों बच्चों को दूरबीन दिलाई। दूरबीन पाकर उनकी खुशी का ठिकाना ना था। जैसे-जैसे सीढिय़ां कम हो रही थी, थकान बढ़ती जा रही थी। आखिरकार वह दुकान आ गई जहां खाना रखा था। वहीं एक गुमटी में बैठकर हम सब ने भोजन ग्रहण किया। इसके बाद धीरे-धीरे फिर सीढिय़ां उतरने लगे। करीब सवा दो बज चुके थे। दुकान पर आकर सामान संभाला जूते पहने और ऑटो में बैठ गए। मैंने ऑटो वाले से कहा कि अभी कोई ट्रेन तो है नहीं आप बस स्टैण्ड छोड़ दो। वह बोला साहब इस वक्त तो ट्रेन भी है आप कहें तो स्टेशन छोड़ दूं। मैंने मना किया और बस स्टैण्ड चलने को ही कहा। रास्ते में रेलवे फाटक बंद मिला, वह उतर पर फाटक वाले के पास गया और बोला अहमदाबाद-पुरी ट्रेन बिलासपुर जाती है ना। अंदर बैठे व्यक्ति ने भी उसके बात सुने बिना ही स्वीकृति में सिर हिला दिया। उसका सकारात्मक जवाब पाकर ऑटो चालक जोश में आ गया, बोला देखो भाईसाहब मैं कह रहा था ना कि ट्रेन है। मैंने नरेश जी को कहा कि एक बार ठीक से पड़ताल कर लो। पता नहीं नरेश जी ने किससे पूछा। आकर बोले हां सर ट्रेन है। स्टेशन ही चलते हैं। तत्काल ऑटो घुमाया गया और स्टेशन पहुंच गए। स्टेशन पहुंचे तो पता चला कि ट्रेन बिलासपुर नहीं जाएगी, बल्कि रायपुर से ही पुरी के लिए दूसरे रास्ते पर चली जाएगी। आखिरकार तय हुआ कि दुर्ग तक इसी ट्रेन में चलेंगे। हम घर चले जाएंगे आप दुर्ग से बिलासपुर की टे्रेन पकड़ लेना। इस तरह शाम पांच बजे के करीब हम घर पहुंच गए और उधर नरेश जी रात नौ बजे के करीब पहुंचे। यकीन मानिए लम्बे समय बाद ऐसी नींद आई कि जिस करवट सोया सुबह खुद को उसी अंदाज में पाया। जागने के बाद करवट बदलने की सोची तो मुंह से हल्की से आह निकल गई। पूरा बदन दर्द कर रहा था। गनीमत रही कि दूसरे दिन रविवार था और इस दिन मेरा साप्ताहिक अवकाश होता है। नरेश जी ने फोटो मेल कर दिए थे। आफिस नहीं जा पाया था लेकिन श्रीमती के मल्टीमीडिया मोबाइल पर मेल चैक करके फोटो देख लिए। आज सोमवार सुबह तक शरीर दर्द कर रहा था। शाम को हिम्मत करके आफिस आ गया। सोचा यादगार यात्रा की है तो कुछ कलम चला ली जाए। बस फिर क्या था, लिखने बैठा और लिखते ही गया...।

प्रदूषण की जद में डोंगरगढ़

मां बम्लेश्वरी के दर्शन, ऐतिहासिक तालाब, उसमें बोटिंग करते लोग, रोप वे का नजारा तथा पहाड़ से दिखाई देता विहंगम दृश्य। निसंदेह यह सब एक अलग अनुभव है डोंगरगढ़ जाने वालों के लिए। मेरे लिए भी यह सब बिलकुल नया था। जैसा सुना था उससे कहीं बढ़कर पाया डोंगरगढ़ को। एक बात और अमूनन लोग किसी स्थान पर जाने से पहले उसके बारे में पूरी जानकारी जुटाते हैं लेकिन मेरे साथ इससे ठीक उलटा हुआ। मैंने केवल इतना सुना था कि डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी देवी का ऐतिहासिक मंदिर है और उसकी समूचे छत्तीसगढ़ में काफी मान्यता है। यह बात नवरात्र के दौरान मैं देख भी चुका था। फिर भी मंदिर का इतिहास, किस्से, कहानियों का मुझे  बिलकुल भी पता नहीं था। डोंगरगढ़ से लौटने के बाद जब नेट पर देखा तो काफी कुछ लिखा हुआ पाया डोंगरगढ़ के बारे में। काफी पुराना एवं बेहद समृद्ध इतिहास रहा है डोंगरगढ़ का। मैंने सोचा कि ऐसा क्या लिखा जाए जो किसी ने लिखा ना हो। हालांकि क्या लिखना है यह तो मैंने डोंगरगढ़ प्रवास के दौरान ही तय कर लिया था। फिर संदर्भ के लिए नेट का सहारा लिया तो पाया कि जो मैंने सोचा है वैसा कुछ भी नहीं लिखा है। डोंगरगढ़ में सर्वप्रथम जो बात खटकी वह यह कि सीढिय़ों के सहारे मंदिर तक जो दुकानें, होटल एवं भोजनालय बने हुए हैं, उन सब का कचरा पहाड़ पर ही फेंका जाता है। कुछेक स्थानों पर उसको जलाते हुए भी देखा गया लेकिन बहुत सी जगह कचरा बिखरा पड़ा है। उसको ना तो एकत्रित किया जाता है और ना ही उसका निस्तारण। बड़े पैमाने पर पहाड़ के अंदर ही कचरा डम्प हो रहा है। यह कचरा बड़े स्तर पर पर्यावरण प्रदूषण की वजह बन रहा है। दूसरी बात यह अखरी कि मंदिर परिसर में फोटो खींचना मना है का बोर्ड तो लगा रखा है लेकिन यह बोर्ड केवल दिखाने के लिए ही है। मंदिर परिसर में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके हाथ में कैमरा या कैमरे वाला मोबाइल ना हो। कोई किसी को रोक ही नहीं रहा था। फोटोग्राफी का शौक तो ऐसा दिखाई दिया कि जगह-जगह कई युगल विभिन्न मुद्राओं में फोटो खींचवाते हुए दिखाई दिए। बड़ी सी चट्टान के पास बने स्पॉट पर तो युवाओं की भरमार थी। जान की परवाह किए बिना कोई कैसे तो कोई कैसे फोटो खिंचवा रहे थे। कइयों ने बतौर याददाश्त चट्टान पर अपना नाम लिखकर भी छोड़ रखा है। करीब चार घंटे के डोंगरगढ़ प्रवास के दौरान मुझे अधिकतर युवा ही दिखाए दिए। वह भी जोड़ो के रूप में। आखिरकार डोंगरगढ़ धार्मिक स्थली होने के साथ-साथ पर्यटन नगरी भी तो है। कुल मिलाकर लोग गंदगी न फैलाने का संकल्प लें और वहां के दुकानदार भी एक जगह कचरा एकत्रित करने की शपथ लें। यही समय की मांग भी है। वरना आने वाले समय में इस कचरे की वजह से डोंगरगढ़ के नैसर्गिक सौंन्दर्य पर ग्रहण लग जाए तो बड़ी बात नहीं है। बड़े पैमाने पर पर्यावरण प्रदूषण हो रहा है यहां पर। दूसरा युवाओं में श्रद्धा का जो शगल पनपा है वह भी मर्यादा में तभी रह सकता है कि जब वहां पर सुरक्षा के कड़े प्रबंध हों। कहने को मंदिर परिसर में सीसी कैमरे जरूर लगे हैं लेकिन कैमरों की परवाह करता कौन है। मैंने सच लिखने का साहस किया है। कोई गलती हो तो मां बम्लेश्वरी माफ करें।
 बोलिए मां बम्लेश्वरी देवी की जय।

Friday, January 18, 2013

जरूरी है बदलाव


टिप्पणी 
 
आमाडुला के आदिवासी कन्या आश्रम के अतीत पर जमी गर्द कुछ साफ हुई तो वहां की असलियत और अधीक्षिका की सियासी गलियों में अहमियत सामने आई। प्रकरण से पर्दा उठने की देर थी कि अब परत-दर परत उघड़ रही है। अधीक्षिका से रसूखदारों के रिश्तों की पोल भी रफ्ता-रफ्ता खुल रही है। आक्रोश को शांत करने तथा लोगों को तात्कालिक तसल्ली देने के लिए मामले में गंभीरता की जगह गफलत बरतने वालों पर भी गाज गिरी है। वैसे यह समूचा प्रकरण लगातार विरोध के बावजूद उस पर विराम न लगाने का नतीजा था। सरकारी संरक्षण पाकर अधीक्षिका की हिम्मत और हौसले दिन-प्रतिदिन बढ़ते गए। मतलब और महत्वाकांक्षा को जब सियासत का साथ और सम्पर्कों का सहारा मिला तो कायदे टूटते गए। गठजोड़ के गलियारों में नियम नतमस्तक हो गए। दलीलें दम तोडऩे लगी तो तर्क तिरस्कृत हो गए। तभी तो अनियमितताओं एवं अव्यवस्थाओं को जागती आंखों से अनदेखा कर दिया गया। आश्रम की व्यवस्थाओं में सुधार की जगह प्रशंसा के पुल बंधने लगे। पदक और पुरस्कारों की तो झाड़ी सी लग गई। जिम्मेदारों ने जब यह जुगलबंदी देखी तो वे भी जड़वत हो गए और कुछ तेज थे, उन्होंने इस तालमेल में ताल से ताल मिलाकर घालमेल करने से गुरेज नहीं किया। दबे स्वर में कहीं विरोध हुआ भी तो उसे दबा दिया गया। और जब अति ही हो गई तो उसकी परिणति ऐसी होनी ही थी।
बहरहाल, अक्षीक्षिका को निलम्बित करने के अलावा विकासखंड शिक्षा अधिकारी व मंडल संयोजक को हटा दिया गया है। लेकिन इस कार्रवाई से लोग संतुष्ट नहीं हैं। सर्व आदिवासी समाज ने तो इस पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच करवाने, अधीक्षिका को बर्खास्त करने, कलक्टर को निलंबित करने तथा अधीक्षिका एवं आश्रम से ताल्लुकात रखने वाले तमाम अधिकारियों को पद से हटाने की मांग की है। फिलवक्त सबसे जरूरी यही है कि जो मांगें उठ रही हैं, उन पर गंभीरता से विचार किया जाए। क्योंकि शुरू से सब कुछ सही होता तो सियासत की सरपरस्ती में संबंधों एवं सम्पर्कों के सहारे यह अवैध साम्राज्य खड़ा ही नहीं होता। इतना तो तय है कि नियमों को नजरअंदाज कर स्वार्थ की बुनियाद पर तैयार हुआ यह बेमेल गठजोड़ दो चार लोगों पर गाज गिरने से नहीं टूट पाएगा। जरूरी है आश्रम की नीचे से लेकर ऊपर तक जुड़ी तमाम व्यवस्थाओं में बदलाव किया जाए।

साभार- पत्रिका भिलाई के 18 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।

Thursday, January 10, 2013

घोषणाओं का सब्जबाग!



टिप्पणी 
 
सपने देखना या दिखाना तभी सार्थक है, जब उनको निर्धारित समय सीमा में पूरा कर लिया जाए। कुछ ऐसे ही सपने बालोद जिले के लोगों ने देखे थे या यूं कहें कि दिखाए गए थे। लम्बे समय से विकास की बाट जोह रहे एवं मुख्यधारा से कटे लोगों की खुशी का उस वक्त ठिकाना नहीं था, जब बालोद को जिला बनाने की घोषणा की गई थी। यह सपने पूरे होने की दिशा में उठाया गया एक कदम माना गया। एक तो नए जिले की सौगात ऊपर से घोषणाओं की बरसात, एक तरह से मुंह मांगी मुराद पूरी होने जैसा ही तो था। लोगों की उम्मीदें जवां हो गई थीं। जिला बनने का जश्न भी जोरदार तरीके से मना। हर किसी के चेहरे पर एक अलग ही चमक नजर आई। जिला बनने की प्रथम वर्षगांठ पर प्रदेश के मुखिया एक बार फिर बालोद आ रहे हैं, लेकिन क्षेत्र के लोगों में वैसा उत्साह एवं जोश नजर नहीं आ रहा है, जैसा पिछले साल था। आए भी कैसे, बीते एक साल में न तो बालोद की सूरत बदली और न ही सीरत। हालात भी कमोबेश वैसे ही हैं, जैसे एक साल पहले थे। चुनावी साल होने के कारण इतना तो तय है कि प्रदेश के मुखिया इस बार भी करोड़ों रुपए के विकास कार्यों की घोषणा और भूमिपूजन की झड़ी लगाने से नहीं चूकेंगे। कुछ इसी तरह की घोषणाएं उन्होंने पिछले साल भी की थीं, लेकिन उनका हश्र क्या हुआ, यह बालोद के लोग बेहतर जानते हैं। हो सकता है मुख्यमंत्री के इस दौरे के चलते पिछले साल की घोषणाओं पर जमी गर्द साफ हो जाए। बालोद में वैसे भी धूल ज्यादा उड़ती है, तभी तो मुख्यमंत्री ने पिछले साल शहर को धूलमुक्त बनाने की घोषणा की थी। यह घोषणा भी, अभी तक घोषणा ही बनी हुई है और धूल यूं ही उड़ रही है। इसके अलावा और भी कई घोषणाएं अभी आधी-अधूरी हैं। बुनियादी एवं मूलभूत सुविधाओं का तो हाल ही बुरा है। गांवों को जोडऩे वाले रास्ते इतने बदहाल हैं कि पैदल चलना भी मुश्किल है।
बहरहाल, मुख्यमंत्री के आगमन से उनके दल एवं कार्यकर्ताओं में भले ही जोश हो लेकिन आम आदमी खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। तभी तो मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर आम लोगों में उत्सुकता तो है, लेकिन उत्साह नजर नहीं आ रहा है। उनमें जिज्ञासा जरूर है, लेकिन उम्मीदें कम हैं। सतारूढ़ दल की ओर से वर्षगांठ के बहाने अगर आगामी चुनाव में लाभ के लिए ही यह सारा उपक्रम किया जा रहा है तो इसे न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। मुखिया होने के नाते मुख्यमंत्री का दायित्व बनता है कि वे जो घोषणाएं करें वे नियत समय में पूरी हों और लम्बित घोषणाएं भी जितना जल्दी हो पूरी हो जानी चाहिएं। और अगर इतिहास ही दोहराना है तो यह चुनावी मौसम में सब्ज बाग दिखाने से ज्यादा कुछ नहीं है। सुविधाओं को तरसते लोगों के लिए यह सब्जबाग किसी छलावे से कम नहीं होगा।

साभार- पत्रिका भिलाई के 10 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित। 


Saturday, December 29, 2012

...हमको जगा गई दामिनी


बस यूं ही

 
शर्मिन्दा तो हम उसी दिन हो गए थे लेकिन आज शोकाकुल हैं। दामिनी के दर्द से हम इतने गमगीन हैं कि गुस्सा भी एक बार इस पहाड़ जैसे गम में गुम हो गया है। हम स्तब्ध भी हैं और निशब्द भी। आज हमारा आक्रोश, अफसोस में बदलकर आंसुओं तक पहुंच गया है। संवेदनाओं के सैलाब की तो कोई सीमा ही नहीं है। कल तक जिन होठों पर प्रार्थनाएं थी, आज उन पर पछतावा है। दरिंदगी की शिकार हुई दामिनी की सलामती के लिए मांगी गई दुआएं भी एक-एक कर दम तोड़ गई। उम्मीदें तो पहले दिन से ही आशंकाओं से घिरी थी, लिहाजा तेरह दिन बाद वे भी साथ छोड़ गई। वैसे जिंदगी की जंग के परिणाम आशाओं के अनुरूप नहीं आए, लेकिन सही मायनों में जंग अब शुरू हुई है। दीपक खुद चलता है लेकिन दूसरों को राह दिखाता है। वह पथ प्रदर्शक का काम करता है। दामिनी का दर्जा तो दीपक से भी बड़ा है। वह तो बिजली है। एक बार 'कौंधकर' हकीकत बता गई। हमको आइना दिखा गई, औकात बता गई। जाते-जाते एक नई राह और दिशा भी दिखा गई। पखवाड़े भर पहले तक न तो उसको कोई जानता था, लेकिन आज हर दिल में दामिनी के लिए दर्द है। हर दिल दुखी है। फर्क फकत इतना है कि अब दुआओं की जगह आहें हैं। ऐसे आहें, जो हर ओर से और हर आदमी के दिल से उठ रही है। खुद चिरनिद्रा में सोकर हम सबको जगा गई है दामिनी।
समूचा देश दामिनी के दर्द से दुखी है। लोगों ने जिस जज्बे एवं हौसले के साथ दुष्कर्म के विरोध में जो आवाज उठाई है, निसंदेह उसके दूरगामी परिणाम होंगे, इसमें कोई दोराय नहीं होनी चाहिए। वैसे देश में कदम-कदम पर प्रताडि़त होने वाली दामिनियों की कमी नहीं है। सोचिए हम उनके समर्थन में कितना आगे आते हैं। दामिनी जैसी हमदर्दी और हिम्मत अगर हम हर बार और हर मामलो में दिखाएं तो यकीन मानिए ऐसा दु:साहस कोई सपने में भी नहीं करेगा। सिर्फ संवेदना जताने, जज्बाजी स्लोगन लिखने या मोमबत्ती जलाने से हमारी फितरत नहीं बदलने वाली। हमको अब संवेदनाओं को सब्र देने का कोई सबब चाहिए। वह किसी संकल्प के रूप में भी हो सकता है। दूसरों से उम्मीद न करते हुए शुरुआत खुद से कीजिए। परिवार से कीजिए। बच्चों को संस्कार दीजिए। दामिनी ने चेतना की जो नई लौ प्रज्वलित की है, वह निरंतर और अनवरत जलती रहे, यही उसको सच्ची श्रद्धांजलि होगी। नए साल की शुरुआत इसी संकल्प के साथ करेंगे तो सचमुच सोने पे सुहागा होगा।

Friday, December 21, 2012

जिम्मेदारी को समझें


टिप्पणी 

 
हमारी फितरत ही कुछ ऐसी है कि हमें केवल तात्कालिक हादसों पर ही गुस्सा आता है। कभी-कभी तो हम इतने हिंसक हो जाते हैं कि तोडफ़ोड़ करने से भी नहीं चूकते। दिल्ली में मेडिकल छात्रा से हुए गैंगरेप का मामला भी कुछ इसी तरह का है। समूचे देश में सड़क से लेकर संसद तक बवाल मचा हुआ है। शर्मसार करने वाले इस वाकये की निंदा दुर्ग-भिलाई में भी हो रही है, लेकिन जैसा गुस्सा और आक्रोश देश के बाकी हिस्सों में दिखाई दिया वैसा यहां नहीं दिखा। और जो थोड़ा बहुत गुस्सा कहीं दिखा, वह भी तात्कालिक ही है। वैसे दुर्ग व भिलाई के लोग न केवल स्थानीय बल्कि देश-विदेश की गतिविधियों पर प्रतिक्रिया स्वरूप अजीबोगरीब प्रदर्शन कर ध्यान बंटाते रहते हैं, लेकिन गैंगरेप मामले में एक दो कागजी बयान एवं कैंडलमार्च को छोड़कर कुछ नहीं हुआ। क्या दोनों शहरों में ऐसे जागरूक लोग व संगठन नहीं हैं, जो इस अत्याचार के खिलाफ इतनी आवाज बुलंद करें कि उसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दे और यहां भी कोई इस प्रकार का कृत्य करने की सपने में भी ना सोचे। बदकिस्मती से ऐसा हो नहीं रहा है। तभी तो दोनों शहरों में बेटियों से अनाचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। दुर्ग जिले में इस साल अब तक अस्मत लुटने के छह दर्जन से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं जबकि छेड़छाड़ की घटनाएं तो डेढ़ सौ के पार हो गई। यह तो वे मामले हैं जो पुलिस के पास पहुंचे और दर्ज हुए। वरना बहुत से मामले कभी संस्कारों के नाम पर, कभी गरीबी के नाम पर तो, कभी सत्ता पक्ष के दबाव के चलते तो कभी मजबूरी के चलते दबा दिए जाते हैं। और फिर कोई विरोध भी नहीं जताता। आम लोगों की चुप्प्पी के साथ-साथ नारीवादी स्वयंसेवी संगठनों का हाल भी एक जैसा ही है। कमोबेश यही हालात पुलिस की है। हाल ही में भाई-बहन के अपहरण के प्रयास में प्रयुक्त गाड़ी बिना नम्बर की थी और उसके शीशों पर काली फिल्म चढ़ी थी। अपहर्ताओं में से एक ने नकाब भी बांध रखा था। गाडिय़ों तथा शीशों की जांच नियमित होती तो क्या ऐसे वाहन सड़कों पर नजर आते? अपहर्ताओं में एक नकाबपोश क्या नजर आया अब सड़क पर चलने वाला हर नकाबपोश ही पुलिस की नजरों में संदिग्ध हो गया है। इस मामले में पुलिस शुरू से ही गंभीर होती तो क्या आज ऐसे अभियान चलाने की जरूरत पड़ती? भिलाई की पहचान शिक्षानगरी के रूप में है। यहां बाहर से बड़ी संख्या में विद्यार्थी अध्ययन करने आते हैं। शहरवासियों व सामाजिक संगठनों की चुप्पी तथा पुलिस की उदासीनता से निसंदेह अपराधियों के हौसले बढ़ेंगे। फिर ऐसे माहौल में कोई यहां क्यों व किसलिए आएगा, समझा जा सकता है।
बहरहाल, हम सभी हादसों को जल्दी भूल जाने की बीमारी से ग्रसित हैं। इसलिए सबसे पहले याददाश्त दुरुस्त करने की जरूरत है। न केवल आम आदमी को बल्कि पुलिस और नारीवादी स्वयंसेवी संगठनों को भी। यकीन मानिए सभी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी तो दुर्ग को 'दिल्ली' बनते देर नहीं लगेगी। बदकिस्मती से ऐसा हुआ तो शिक्षा के मामले में अव्वल शहर की शान पर ऐसा धब्बा लग जाएगा जो लाख चाहने के बाद भी मिट नहीं पाएगा।



साभार - पत्रिका भिलाई के 21 दिसम्बर 12 के अंक में प्रकाशित। 

Sunday, December 16, 2012

आंखें


आंखें करती
हैं बातें,
आंखों से
चुपचाप।
आंखों का
यह बोलना
भी आंखों
को ही सुनाई
देता है।
आंखों की
भी अलग
ही दुनिया
है, अजीब
सी और,
भाषा भी।
इस भाषा
को आखें
ही समझती
हैं, सुनती हैं
और जवाब
देती हैं।
अंखियां लड़ती
भी हैं,
बिना किसी
शोरगुल के।
कोई हो-हल्ला
भी नहीं
करती हैं।
आदमी की
तरह लड़कर,
अलग भी
नहीं होती,
हैं आखें।
अंखियां घर
भी बसा
लेती हैं,
एक दूजे
के पास।
कितने ही
किस्से जुड़े
हैं आखों
के साथ।
और मुहावरों
की तो
बहुत लम्बी
सूची है।
आंख लगना,
आंख मिलना,
आंखें दिखाना,
आखें लड़ाना,
आंखें चुराना,
आंख मूंदना,
आंख मारना,
आंख फेरना,
आंख झुकाना,
आंख का तारा,
आंख की किरकिरी,
और भी
न जाने
क्या क्या
जुड़ा है
आंखों से।
आखें सागर है,
नदिया है,
झील है,
तभी तो
प्यास भी
बुझाती हैं,
आखें।
आंखें भी
कई तरह
की होती हैं।
उनींदी आखें,
सपनीली आखें,
नीली आखें,
काली आखें,
भूरी आंखें।
आखें कटार
भी हैं
और तलवार
भी।
अजूबा है,
इन आंखों
का संसार,
अनूठा है,
निराला है,
बिलकुल रोचक,
कितना कुछ
करवाती हैं
आखें।
बिना बोले
चुपचाप,
एकदम चुपचाप।

मन

मन, तो
मन है।
इसकी
थाह भला
कौन
ले पाया।
कितने ही
अर्थ जुड़े

हैं मन से।
और हां,
नाम भी
कई हैं
मन के।
और रूप
भी तो हैं कई।
कभी मन
मीत बन
जाता है
तो कभी
मन मौजी।
और कभी कभी
मन मयूरा
भी हो जाता है।
मन किसी
को चाहने भी
लगता है।
मन ही मन।
कोई आस
अधूरी रह
जाती है
तो मन
मसोस
दिया
जाता है।
और कोई
चाह पूरी
होती है तो,
वह मन
की मुराद
बन जाती है।
मन तो
रमता जोगी
है, एक पल
में ही
कितनी
सीमाएं लांघ
जाता है।
पलक झपकते
ही दुनिया
की सैर
कर आता है
कभी
आसमान में
उड़ता है।
चांद-तारों की
बात करता है।
मन तो मन है।

दिन


दिन,
आज भी
उसी अंदाज में
निकला,
और
ढल गया।
रोज ही तो
ऐसा होता है।

बस लोगों का
नजरिया,
अलग है।
किसी ने
सुबह को सर्द
तो किसी ने
सुहानी कहा।
और धूप
उसको भी
कहीं गुनगुनी तो
कहीं चटख
नाम से
पुकारा गया।
दिन ढला
उसे भी
सुहानी शाम,
सिंदूरी शाम,
नाम दे
दिया, गया
दिन,
रोज ही
तो ऐसे
निकलता है,
वह कहां
बदलता है,
मौसम
बदलता है
आदमी
बदलता है
लेकिन दिन तो
दिन ही
रहता है
सदा,
वह बदलता
नहीं
बस नजरिया
बदल जाता है।
और हां,
तारीख बदलती है
माह बदलता है
साल बदल जाते हैं
लेकिन दिन तो
दिन ही
रहता है
हां हमने दिन
का नामकरण
कर दिया है
हर साल
उसको
उसी नाम से
पुकारते हैं
लेकिन
दिन तो दिन ही
रहता है,
बदलता नहीं।

आदमी

शेरो शायरी का शौक तो बचपन से ही रहा है। आज कविता लिखने की सोची। संयोग देखिए शुरुआत आदमी से हुई। अति व्यस्तता के बीच कल्पना के घोड़े दौड़ाना वैसे बड़ा मुश्किल काम है। फिर भी तुकबंदी के सहारे कुछ तो लिखने में सफल हो गया। कभी फुर्सत मिली तो और लिखूंगा। फिलहाल तो इतना ही...



 आदमी



आदमी,
आज का आदमी,
अपनों से कट गया है,
जाति में बंट गया है,
भूल सब रिश्ते-नाते,
खुद में सिमट गया
है
आदमी,
आज का आदमी।
दर्प से चूर हुआ है,
फिर भी मजबूर हुआ है,
भरी भीड़ में देखो,
अपनों से दूर हुआ है।
आदमी
आज का आदमी।

Friday, December 14, 2012

ममता


बस यूं ही 
 
शुक्रवार सुबह आफिस गया तो वह कुतिया उसी अंदाज में पिल्ले के शव के पास बैठी थी लेकिन दोपहर को लौटा तो ना वह कुतिया दिखाई दी और ना ही उसके बच्चे का क्षत-विक्षत शव।  घर पहुंचा तो श्रीमती ने बताया कि आपके जाने के बाद सफाई वाला आया था, वह लेकर चला गया। मन ही मन खुद को दिलासा दिया कि चलो अच्छा हुआ। दो दिन से जो नजारा मेरी आंखों ने देखा, वह मेरे लिए असहनीय था।
दस-बारह दिन पहले ही की तो बात है, जब मोहल्ले में रहने वाली एक कुतिया ने पांच पिल्लों को जन्म दिया था। उसने अपने रहने का ठिकाना वहीं सामने एक सूखे नाले को बना लिया था। ऊपर से ढंका हुआ था, इसलिए रात को सर्दी से व दिन में तल्ख धूप से बचाव को जाता था। पिल्ले कुछ बड़े हुए और उन्होंने हलचल शुरू की तो नाले से बाहर आना शुरू हो गए। मोहल्ले के सभी बच्चों के लिए यह पिल्ले देखते-देखते मनोरंजन का साधन बन गए। सभी बच्चों को उनसे एक तरह का लगाव हो गया था। मैंने भी बचपन में काफी पिल्ले पाले थे। करीब दर्जनभर, लेकिन सभी एक-एक करके दूर हो गए। मैं खूब रोता था। मां  दिलासा देती थी। समझाती और कहती बेटा, तू कुत्ता पालना छोड़ दे। पता नहीं क्यों तू जो कुत्ता पालता है वह जिंदा नहीं रहता है। यकीन मानिए कुत्तों के वियोग में मैं रो-रोकर आंखें सूजा लेता था।
खैर, सब बताने का आशय है कि जीवों के प्रति प्रेम रखने का यह शगल मेरे दोनों बच्चों में
भी है। मोहल्ले के पिल्लों से उनको भी गहरा लगाव हो गया। रोजाना शाम को जाना और गोद में लेकर उनको सहलाना एक नियम सा बन गया। मंगलवार रात को घर पहुंचा तो श्रीमती ने बताया कि आज तो एक पिले को कोई वाहन कुचल गया। काफी देर तक शव सड़क पर ही पड़ा रहा। बाद में किसी ने वहां से फिंकवा दिया। श्रीमती ने कहा कि पिल्ले का शव देखकर कुतिया बार-बार उसके पास जा रही थी। वह न केवल उसको सूंघ रही बल्कि चाट भी रही थी। मन में अचानक अफसोस के भाव आए। लम्बी सांस छोड़ते हुए बिना कुछ कहे मैं कपड़े बदलने की तैयारी में जुट गया।
बुधवार को छोटे बेटे एकलव्य को लेकर लौट रहा था तो एक कार बगल से निकली। मेरी नजर कार पर ही टिकी थी कि एक पिल्ला दौड़ता हुआ कार के पास पहुंच गया। चालक की नजर शायद पर उस पर पड़ गई थी। उसने ब्रेक लगा दिए थे। इस दौरान मेरी आंखें अनहोनी की आशंका में यकायक बंद हो गई और मुंह से हल्की से आह भी निकली। मैं हल्के से बुदबुदाया, भगवान उसे बचा लो। आंखें खोली तो कार रुकी हुई थी लेकिन पिल्ला उसके नीचे घुस गया और काफी देर बाद निकल कर सड़क के दूसरे छोर पर चला गया। यह नजारा देखकर उस दिन यह आशंका घर कर गई थी कि कुतिया ने अपना आशियाना गलत जगह बना लिया है। पिल्ले अब बड़े होकर रोड पर जाने लगे हैं। सभी वाहन चालक तो एक जैसे होते नहीं है। आंख मूंदकर रफ्तार से चलते हैं। आदमी तक को नहीं देखते हैं, बेचारे पिल्ले कहां से दिखाई देंगे। मैं मन ही मन अनहोनी की आशंका में थोड़ा विचलित भी था। मेरी आशंका दूसरे दिन सही साबित हुई। गुरुवार दोपहर को मैं बड़े बेटे योगराज को बस स्टॉप से लेकर आया और जैसे ही घर की तरफ मुड़ा तो पिल्ले के शव को सड़क पर पड़े देखा। कुतिया पास खड़ी उसको चाट रही थी। बेजुबान जानवर की अपने बच्चे के प्रति ममता देखकर मैं भावुक हो उठा। योगराज पूछता रह गया पापा, क्या हो गया...। मैं बिना कुछ बोले ही ना की मुद्रा में गर्दन हिलाते हुए उसको घर ले आया।
इसके बाद फिर छोटे बेटे एकलव्य को लेने गया तो कुतिया वहीं बैठी थी। शाम चार बजे आफिस के लिए निकला तो भी वहीं बैठी थी। वाहनों की आवाजाही से पिल्ले का शव सड़क से चिपक चुका था। किसी ने सड़क से कुरचकर क्षत-विक्षत शव को साइड में कर दिया था। शव देखकर फिर हल्की सी आह निकली और मैं चुपचाप आफिस के लिए बढ़ गया। रात को 11 बजे लौटा तो कुतिया सर्दी में सिकुड़ी हुई नाले में बैठे शेष पिल्लों के पास जाने के बजाय उसी पिल्ले के शव के पास बैठी थी। घर जाकर श्रीमती को बताया कि देखो वह कुतिया दोपहर से उसी पिल्ले के पास बैठी हुई है। सचमुच वह नजारा देखकर मन बहुत दुखी हुआ। शुक्रवार सुबह का नजारा देखकर मैं चौंक गया था। कुतिया उसी स्थान पर उसी मुद्रा में बैठी थी। सर्दी से कांप भी रही थी। योगराज को स्कूल बस में बैठाने के बाद मैं घर लौटा और बिस्तर में दुबक गया लेकिन नींद उचट चुकी थी। लेटे-लेट मैं सोच रहा था। मेरे बार-बार जेहन में यही सवाल उमड़ रहे थे लेकिन मैं जवाब नहीं ढूंढ नहीं पा रहा था। सवाल यही कि औलाद का पालन-पोषण एवं परवरिश करते समय लोग अक्सर यही सोचते हैं कि यह बड़ा होकर बुढापे की लाठी बनेगा। दुख एवं संकट में सहारा देगा। मदद करेगा। बचपन से यही बात बड़े बुजुर्गों से भी सुनी है, लेकिन बेजुबानों को कौन से सहारे की जरूरत होती है। आदमी तो अपना दुख रोकर कम कर लेता है, किसी को बताकर बांट लेता है लेकिन बेजुबान क्या करें। इसी उधेड़बुन में सोचता रहा। नींद गायब हो गई थी। शुक्रवार दोपहर को आफिस से आने के बाद छोटे बेटे को लेकर आ रहा था तो दिमाग में ख्याल आया कि नाले में बैठे पिल्लों को तो देख लूं। देखा तो दो पिल्ले नींद में सुस्ता रहे थे। मैं फिर से सन्न रह गया। एक और कहां गया। देखा तो वह पड़ोसी के घर के आगे बैठा था। मैंने संतोष की लम्बी सांस छोड़ी और बेटे को लेकर घर में घुस गया। वाकई ममता तो ऐसी ही होती है। क्या इंसान और क्या जानवर।

अब तो कुछ कीजिए

 टिप्पणी 

फोरलेन पर गुरुवार को फिर एक और हादसा हो गया। एक महिला की मौत हो गई। साथ में दो युवतियां भी घायल हो गई। इस हादसे ने किसी की हंसती खेलती जिंदगी में कोहराम मचा दिया। जिंदगी भर उसको यह दर्द सालता रहेगा। लेकिन भिलाई की यातायात पुलिस के लिए तो यह रोजमर्रा की बात है। वह इस प्रकार के हादसों की अभ्यस्त हो चुकी है। उसको इस प्रकार के हादसे न तो डराते हैं और ना ही वह इनसे कोई सबक लेती है। भले ही लोग यातायात नियमों का मखौल उड़ाएं। अपनी मनमर्जी से वाहन चलाएं। रोज अकाल मौत के शिकार हों, लेकिन यातायात पुलिस को इससे कोई सरोकार नहीं है। यातायात पुलिस की यह कार्यप्रणाली न केवल चौंकाने वाली बल्कि चिंतनीय भी है। वह न तो हादसों से कोई सबक लेती है और ना ही कार्यप्रणाली में कोई सुधार होता है। लगातार हादसे होने के बाद भी यातायात पुलिस की नींद कभी टूटती ही नहीं है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि फोरलेन के अलावा दूसरी जगह यातायात पुलिसकर्मी नजर क्यों नहीं आते। पता नहीं
क्यों उनको शहर की अंदरूनी सड़कों पर यातायात नजर नहीं आता है। उनकी मुस्तैदी सिर्फ हाइवे पर ही दिखती है। और इस जरूरत से ज्यादा मुस्तैदी के कारण भी सबको पता हैं।
बहरहाल, हादसों से तनिक भी विचलित नहीं होने वालों पर पीडि़तों का रुदन असर डाल पाएगा। उनके जमीर को झाकझाोर पाएगा, इसमें संशय है। लम्बे समय से जड़ें जमाए बैठे पुलिसकर्मी एवं अधिकारी क्या जनहित में फैसले लेने ही हिम्मत जुटा पाएंगे। बेलगाम यातायात पर नकेल ना कसना यातायात पुलिस की नाकामी को ही उजागर करता है। और यह नाकामी तभी दूर को सकती है जब कारगर एवं प्रभावी कार्रवाई हो। हालात बद से बदतर होने को हैं और यातायात पुलिस को अब भी आंकड़ों को दुरुस्त करने तथा राजस्व बढ़ाने की कार्रवाई से ही फुरसत नहीं है। हर तरफ सुविधा शुल्क का ही शोर है। आखिर कब तक लोग यूं ही अकाल मौत मरते रहेंगे। बहुत हो चुका। कुछ तो तरस खाइए। अब तो कुछ कीजिए। ज्यादा कुछ नहीं तो खुद को यातायात पुलिसकर्मी की बजाय इंसान समझाने की हिम्मत जुटा लो। शायद उससे कुछ सद्बुद्धि आ जाए और शहर का भला हो जाए। यूं ही लोग अकाल मौत के शिकार तो नहीं होंगे।



 साभार : पत्रिका भिलाई के 14 दिसम्बर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Saturday, December 8, 2012

पूरी हुई तलाश की आस


बस यूं ही 

 
शनिवार सुबह बच्चों का स्कूल में पिकनिक का कार्यक्रम था, वह भी नौ बजे का। इस कारण मैं देर तक सोता रहा। सुबह आठ बजे पत्नी की आवाज से आंख कुछ इस अंदाज में खुली कि बातचीत का दौर नोकझोंक के साथ ही शुरू हुआ। उसने चाय के लिए जगाते हुए कहा कि साब आठ बज गए। अक्सर निर्धारित समय से कुछ समय ज्यादा हो जाता है तो वह इसी अंदाज में कहती है। उठते ही मैंने थोड़े तल्ख लहजे में कहा कि

यह क्या तरीका है। कभी साब साढ़े पांच बज गए, कभी आठ बज गए। समय पर उठा करो। देरी से क्यों उठते हो। मेरा इतना कहना ही था कि श्रीमती जी के चेहरे की त्योरियां चढ़ गई और आंखों में पानी आ गया। गुस्से में उसने दोनों बच्चों को तैयार किया। दरअसल, श्रीमती का साब आठ बजे कहने का आशय यह था कि उसको उठने में कुछ देरी हो गई है, लिहाजा मैं बच्चों को तैयार करवाने में उसकी थोड़ी मदद कर दूं। और मैंने मदद तो दूर नोकझोंक शुरू कर दी। खैर, दोनों बच्चे तैयार होकर नौ बजे स्कूल के लिए घर से निकल लिए। इसके बाद हम दोनों के बीच गिले-शिकवे का दौर शुरू हुआ। कभी दोनों नरम पड़े तो कभी गरम भी हुए लेकिन बाद बनी नहीं। दोनों खुद को सही साबित करने की बात पर अड़े रहे। दिमाग में यह बात भी थी कि श्रीमती के गुस्से होने की वजह एक यह भी हो सकती है कि वह सप्ताह भर से आमिर खान की हालिया प्रदर्शित फिल्म तलाश देखने के लिए कह रही थी। शनिवार को देखने के लिए दबाव इसलिए बनाया क्योंकि इस दिन बच्चों को पिकनिक पर जाना था। उनके स्कूल से लौटने का समय तीन बजे का था। वैसे भी श्रीमती बच्चों को यह फिल्म दिखाने की पक्षधर नहीं थी। बच्चों के पिकनिक से लौटकर आने से पहले ही वह फिल्म देखकर आने की सोच रही थी। और इधर फिल्म को लेकर मैंने सुबह से ही कोई बात नहीं की। हो सकता है फिल्म की चर्चा न करना भी उसको नागवार गुजरा हो।
नोकझोंक के कारण दस बज चुके थे। समय ज्यादा होता देख मैंने कार्यालय में कह दिया कि आज सुबह की मीटिंग में नहीं आ पाऊंगा। इस बीच मेरे एवं श्रीमती के बीच तकरार एवं मनुहार का दौर चलता रहा। सुबह के 11 बज चुके थे। मैंने परिचित को फोन लगाया और श्रीमती के साथ हुए वाकये को सुनाया तो उनका कहना था कि आपको भाभीजी को माह में एक बार तो  आउटिंग पर ले जाना चाहिए। मैंने कहा कि नाराजगी तो दोनों तरफ है, इसलिए मैं ऐसा क्यों करूं.. तो उनका कहना था कि कोई बात नहीं है। गलती चाहे किसी की भी हो आपको तो  आउटिंग पर जाना ही चाहिए। इस दौरान 11.10 बज चुके थे। परिचित की बात अचानक क्लिक कर गई और मैंने तत्काल श्रीमती को कहा कि तैयार हो जाओ फिल्म देखने चलते हैं। टाइम कम है। शो साढ़े 11 बजे शुरू हो जाएगा, जल्दी करो। मैं फटाफट बाथरूम गया और नहाकर लौट आया और 11.18 पर कपड़े, जूते आदि पहनकर तैयार हो गया। श्रीमती को फिल्म की कहकर तो मैंने जैसे उसकी मुंह मांगी मुराद  पूरी कर दी। समय की नजाकत को देखते हुए वह बिना नहाए हुए हाथ-मुंह धोकर तैयार हो गई। जल्दबाजी में किसी तरह सिनेमाघर पहुंचे। फिल्म शुरू हो चुकी थी। पर्दे पर फिल्म का दुर्घटना से संबंधित दृश्य चल रहा था। फिल्मी पुलिस दुर्घटना के कारणों की तलाश में जुटी थी। श्रीमती ने कहा कि कुछ फिल्म शायद निकल गई है, तो मैंने कहा कि ज्यादा नहीं निकली है। मैंने समीक्षा पढ़ी है यह शुरुआती सीन है। इसके बाद वह फिल्म देखने में तल्लीन हो गई।
फिल्म को लेकर काफी कुछ लिखा जा चुका है। कई समीक्षकों ने तो बाकायदा फिल्म की प्रशंसा में कसीदे गढ़े हैं तो कइयों ने संतुलित शब्दों में व्याख्या कर बीच का रास्ता निकाल लिया। एक लाइन में कहूं तो मुझे फिल्म सामान्य सी लगी। कुछ विशेष नजर नहीं आया इसमें। छोटी सी कहानी को बेवजह लम्बा खींचा गया। आप यकीन नहीं करेंगे आमिर, रानी, करीना सहित कुल 26-27 कलाकार हैं, जिनका फिल्म में छोटा-बड़ा रोल है। करीब सवा दो घंटे की फिल्म और उसमें मुख्य किरदारों के अलावा 26-27 कलाकार हों तो प्रत्येक के हिस्से में कितना समय आएगा, सोचने की बात है। तवायफों की गली में काम करने वाले लंगड़े  तैमूर (नवाजुद्दीन सिद्दकी) पर काफी सीन फिल्माए गए हैं। कई फिल्म समीक्षकों ने फिल्म की पटकथा में कसावट की बात कही है लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं। कई सीन तो बेवजह ही लम्बा खींचे हुए प्रतीत होते हैं। हो सकता है बनाने वालों के पास इसको लेकर कोई जवाब हो लेकिन मुझे यह सीन फिल्म के मूल कथानक के साथ न्याय करते नजर नहीं आए।  तैमूर  का नोटों से भरा बैग लेकर भागने से लेकर उसके मर्डर तक का अकेला दृश्य ही करीब दस मिनट का है। हां यह अलग बात है कि इस सीन को रेलवे स्टेशन की रेलमपेल के बीच बेहतरीन तरीके से फिल्माया गया है। फिल्म में रहस्य है और उससे पर्दा आखिर में जाकर उठता है। आत्माओं को सिरे से नकारने वाले फिल्म के नायक आमिर खान के साथ जब हकीकत में ऐसा होता है तो वह आत्मओं के अस्तित्व को स्वीकार कर लेता है। फिल्म के गीत भी ऐसे नहीं है कि जो जुबान पर चढ़ जाएं।  पुत्र की मौत के वियोग में आमिर अपराध बोध से ग्रसित रहता है। रह-रह कर उसके जेहन में यही विचार कौंधते हैं अगर वह बच्चे को अकेले जाने की बजाय उसके साथ खेलने को कहता या उसके साथ चला जाता तो ऐसा हादसा नहीं होता। बस यही सोच कर वह खुद को गुनहगार मानता है। उसी ऊहापोह में न तो वह अपनी पत्नी को समय दे पाता है और ना ही खुद को। पुत्र की मौत के बाद आमिर एवं रानी अपना दर्द कम करने का रास्ता खोजते हैं। आमिर जहां रातों को करीना से बातें करते नजर आते हैं, वहीं रानी पड़ोस में रहने वाली उस महिला से प्रभावित नजर आती है, जो आत्माओं से बात करवाती है। फिल्म में आमिर महाराष्ट्र पुलिस के इंस्पेक्टर बने हैं और उनका नाम है सूरजनसिंह शेखावत। फिल्म में रानी उनको सूरी कहती है जबकि पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर शेखावत के नाम से पुकारते हैं। खुद आमिर भी अपना परिचय इसी नाम से देते हैं।
बहरहाल, सिनेमाघर की आधी से ज्यादा खाली कुर्सियां और बीच-बीच में उठकर जाने वाले दर्शक यह जाहिर कर रहे थे कि फिल्म दर्शकों को बांधे रखने या उनका मनोरंजन करने के उद्देश्य में खरी नहीं उतरी है। मेरे जैसा शख्स भी इसलिए बैठा रहा ताकि श्रीमती यह आरोप ना लगा दे कि यह तो होना ही था। आप तो गए ही आधे अधूरे मन से थे, इसलिए बीच में आ गए। बस इसी बात को ध्यान में रखकर मैं न चाहते हुए बैठा रहा। मध्यांतर में भी नहीं उठा। खैर, फिल्म के प्रति मेरी जैसी धारणा बनाने वाले कम नहीं थे। हो सकता है आत्माओं के अस्तित्व को स्वीकारने वालों को यह विषय भा जाए। आमिर, करीना एवं रानी जैसे सितारों के नाम सुनकर अच्छी फिल्म की उम्मीद में आए कई युवाओं को तो निराशा ही हाथ लगी। कइयों ने फिल्म को टाइमपास करने तथा महज पैसा वसूल हो जाए इसी अंदाज में देखा। ऐसा मुझे उस वक्त लगा जब श्रीमती के साथ मैं सिनेमाघर से बाहर निकल रहा था तो हमारे पीछे-पीछे आ रही दो युवतियों की बातें कानों में पड़ी। वे कह रही थी यार फिल्म मेरे तो ऊपर से निकल गई। वाकई गंभीरता के साथ फिल्म ना देखने वालों के साथ ऐसा ही होता है। आखिकार सवा दो बजे हम फिल्म देखकर घर लौट आए। श्रीमती के चेहरे पर गुस्सा गायब हो चुका था और उसकी जगह लम्बी चौड़ी मुस्कान ने ली थी। मुस्कान की सबसे बड़ी वजह यही थी कि लम्बे समय से तलाश देखने की उसकी आस आज इस बहाने पूरी हो गई थी। हां यह बात दीगर है कि इतना कुछ होने के बाद भी उसने टोक ही दिया कि आप फिल्म दिखाने ले तो जाते हो लेकिन साथ वालों का कुछ ख्याल नहीं रखते। देखा नहीं लोग कैसे कोल्ड ड्रिंक और पॉपकार्न खरीद कर ला रहे थे। दूसरों को देखकर तो कुछ समझ जाया करो। और मैं बिना कुछ बोले मन ही मन मुस्कुरा रहा था।

Friday, December 7, 2012

आप शुरुआत तो कीजिए...


टिप्पणी 


माननीय, पुलिस अधीक्षक, दुर्ग
काफी समय से आप दुर्ग जिले की कमान संभाल रहे हैं। इस दौरान दुर्ग एवं भिलाई की यातायात व्यवस्था का तो आपको अच्छा-खासा अनुभव हो गया होगा। दोनों शहरों की हालत कमोबेश एक जैसी ही है। सड़कों पर न तो कहीं यातायात नियमों का पालन होता है और न ही आपके मातहत नियमों के प

ालन के प्रति गंभीर नजर आते हैं। आलम यह है कि दोनों शहरों की सड़कों पर पैदल चलना भी खतरे से खाली नहीं है। शायद ही ऐसा कोई दिन नहीं बीतता है जब इन शहरों के अंदरुनी इलाकों से हादसों की खबरें न आती हों। वाहनों चालकों में यातायात पुलिस का जरा भी खौफ नजर ही नहीं आता। यह डर क्यों, कब एवं कैसे गायब हुआ, आपको भी पता है। डर होता तो क्या दुपहिया वाहन चालक बिना हेलमेट चलते? क्या दुपहिया पर तीन-तीन, चार-चार लोग सवारी करते? क्या स्कूली बच्चे बिना लाइसेंस वाहन दौड़ाते? इतना ही नहीं, चलते वाहन पर मोबाइल फोन पर बात करना, सीट बेल्ट न लगना, नम्बर की जगह संगठन और खुद का नाम, कारों के शीशों पर काली फिल्म और सरकारी वाहनों की तर्ज पर लाल पट्टी बनवा लेना भी यातायात नियमों से खिलवाड़ है। लेकिन दुर्ग-भिलाई में यह सब आम है। यह सब रोकने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे कहते हैं- कार्रवाई हो रही है। सोचिए, अगर कार्रवाई होती तो क्या इस प्रकार यातायात नियमों का मजाक बनता?
दुर्ग-भिलाई के ऑटो चालकों को तो मानो आपके मातहतों ने मनमानी का अघोषित परमिट दे दिया है। क्षमता से अधिक सवारी बैठाना, जहां मर्जी ब्रेक लगाना, मर्जी से ही रूट बदल देना मनमानी नहीं तो और क्या है? किसी वीआईपी के आगमन के दौरान यातायात पुलिस एवं परिवहन विभाग के बीच गजब का तालमेल दिखता है? सड़कों से पशु गायब हो जाते हैं। फोरलेन की सर्विस लेन पर भी कोई वाहन खड़ा नजर नहीं आता। ऐसे चौराहों पर भी यातायात पुलिसकर्मी मुस्तैद नजर आते हैं, जहां सामान्य दिनों में कभी उनको देखा तक नहीं जाता। क्या ऐसा रोजाना नहीं हो सकता? ऐसा कभी होता भी है तो वसूली पर ध्यान 'यादा होता है। येन-केन-प्रकारेण लक्ष्य हासिल हो जाए। उसके बाद व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है। अगर आप यातायात नियमों की कड़ाई से पालना करवाएंगे तो यह जनहित का बड़ा काम होगा। और फिर आपको न तो लक्ष्य हासिल करने के लिए विशेष अभियान चलाने की जरूरत पड़ेगी और न ही न्यायालय के दिशा-निर्देश पर दिन-रात एक करना पड़ेगा। लोग व्यवस्था बनाने में सहयोग को तैयार बैठे हैं, बस जरूरत शुरुआत करने की है।



साभार : पत्रिका भिलाई के 5 दिसम्बर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Wednesday, December 5, 2012

अतीत से सीख लें


टिप्पणी 

 
वक्त फिर अपने आप को दोहरा रहा है। ठीक वैसे ही हालात अब दुबारा बन रहे हैं। जिला भी वही और विभाग भी। अधिकारी और कर्मचारी भी लगभग वही हैं। तकरीबन जिन कमियों की वजह से दुर्ग के हाथों से ट्रोमा यूनिट निकली थी, कमोबेश वैसी ही परिस्थितियां मेटरनिटी चाइल्ड हेल्थ यूनिट को लेकर बन रही हैं। यूनिसेफ की

ओर से मेटरनिटी चाइल्ड हेल्थ यूनिट के लिए दुर्ग जिला अस्पताल एवं लाल बहादुर अस्तपाल सुपेला को पांच करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। यूनिट के तहत दुर्ग में 60 और सुपेला में 40 बिस्तर की व्यवस्था प्रस्तावित है। इस काम के लिए यूनिसेफ ने अस्पताल प्रबंधन को बाकायदा आठ माह का समय भी दिया था, लेकिन समय पर उचित फैसला न लेने की कमी यहां भी दिखाई दी और आठ माह में भी कार्ययोजना तैयार नहीं हो पाई। कहने को अस्पताल प्रबंधन, जीवनदीप समिति एवं जिला प्रशासन के बीच इस संबंध में चार बार बैठकें भी हुई, लेकिन उनका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला। इतना नहीं इन बैठकों में अतीत में हुई भूलों से भी कोई सबक नहीं लिया गया। आठ माह में सिर्फ जगह की तलाश पूरी की गई। निर्धारित समय सीमा में काम न होने के कारण यूनिट के प्रस्ताव पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यूनिट के लिए ठोस कार्ययोजना न बन पाने तथा प्रस्ताव की प्रगति की रिपोर्ट देखकर यूनिसेफ के प्रतिनिधियों ने हाल ही में रायपुर में हुई बैठक में न केवल नाराजगी जाहिर की, बल्कि प्रस्ताव निरस्त करने की बात तक डाली। तभी तो सीएमएचओ ने सिविल सर्जन को पत्र लिखकर यूनिट के लिए तत्काल कार्ययोजना तैयार करने को कहा है।
बहरहाल, ट्रोमा यूनिट के मामले में गंभीरता न बरतने वाले अगर इस मामले में भी गंभीर नहीं हुए तो यकीनन यह काम फिर घोर लापरवाही की श्रेणी में आ जाएगा। दुर्ग जिले की बदहाल एवं बेपटरी चिकित्सा व्यवस्था को पटरी पर लाने की दिशा में उम्मीद की कोई हल्की सी किरण दिखाई देती है तो विभाग को उस पर तत्परता एवं सजगता से काम करना चाहिए, ताकि पीडि़त लोगों को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिले। अगर दुर्ग व सुपेला में यूनिट स्थापित होती है तो सामान्य व गंभीर मरीजों के लिए अलग से वार्ड बनेगा, साथ ही नवजात एवं प्रसुताओं को भी विशेष सुविधाएं मिलना तय है। जिले के प्रशासनिक एवं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को अतीत से सीख लेकर मेटरनिटी चाइल्ड हेल्थ यूनिट से संबंधित तमाम औपचारिकताओं को जितना जल्दी हो पूर्ण करना चाहिए। समय की मांग भी यही है।
 
 साभार : पत्रिका भिलाई के 5 दिसम्बर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Saturday, December 1, 2012

मिलग्यो... मिलग्यो-पार्ट 2



बस यूं ही

मोबाइल मिलने की सूचना तो रात को ही मिल चुकी थी लेकिन मेरी जिज्ञासा इस बात में थी कि यह सब अचानक हुआ कैसे? कार्यालय का काम पूर्ण कर रात साढ़े 11 बजे के करीब घर पहुंचा और पहुंचते ही श्रीमती से पहला सवाल यही किया कि आपका मोबाइल बंद कैसे बता रहा है। दोनों नम्बर ही नहीं लग रहे है। बोली पता नहीं क्या है। मोबाइल पर मैसेज आ रहा है सिम रजिस्टे्रशन फेल्ड। मैंने मोबाइल देखा तो वाकई ऐसा ही था। कोई सिम काम नहीं कर रही
थी। तत्काल मोबाइल खोलकर दोनों सिम निकाली फिर बंद करके दोबारा चालू किया तो भी सफलता नहीं मिली। फिर दोनों सिम का स्थान बदला तो एक सिम एक्टीवेट हो गई। मेरे फोन से डायल करके चैक भी कर लिया। घंटी बज गई थी। इस मशक्कत में 12 बज गए। इसके बाद रात का भोजन लिया सोते-सोते 12.30 हो गए। खाने के दौरान बीच-बीच में मोबाइल खोने की कहानी भी चल रही थी। श्रीमती ने बताया कि बच्चे नीचे खेल रहे थे। पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि मोबाइल को वहीं पेड़ के इर्द-गिर्द बने गट्टे (चबूतरे) पर छोड़ दिया। बाद में श्रीमती ने जो कहानी बताई उसे जानकर मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सका। उसने कहा कि दिन से ही फोन टीवी वाले कमरे में लगे सोफे पर रखा था। दोपहर बाद उसी सोफे पर कपड़े डाल दिए और फोन उन कपड़ो के नीचे दब गया। रात को बड़े बेटे ने कपड़े कमरे के अंदर रखे तो मोबाइल उन कपड़ों में लिपट कर साथ ही चला गया।
श्रीमती को मोबाइल की याद
आती भी नहीं  लेकिन उसको व दोनों बच्चों को टीवी धारावाहिक कौन बनेगा करोड़पति देखने का शौक है। वह कई सवालों के जवाब में एसएमएस करती है। कल भी एक सवाल का जवाब देने के चक्कर में ही उसने मोबाइल संभाला, नहीं मिला तो होश फाख्ता हो गए। फौरी तौर पर इधर-उधर देखा, नहीं मिला तो घबरा गई। तत्काल दौड़ी-दौड़ी पड़ोसन के पास गई और अपनी पीड़ा जाहिर की। उसने कहा दीदी आप अपना नम्बर बता दो, मैं उस पर डायल कर देती हूं। लेकिन घबराहट में श्रीमती को खुद के छत्तीसगढ़ वाले नम्बर भी याद नहीं रहे। राजस्थान वाले नम्बर तो याद रहने का सवाल ही नहीं था। हां, इतना जरूर था कि ऐसी घबराहट के बावजूद उसको मेरे नम्बर याद रहे, तभी तो उसने मेरे को मोबाइल गुमशुदगी की सूचना दे दी। मैंने भी पहले छत्तीसगढ़ वाले तथा उसके बाद राजस्थान वाले नम्बरों पर डायल किया। कपड़ों के अंदर दबे मोबाइल की आवाज भी बड़े बेटे को सुनाई दी और और वह तत्काल मोबाइल को कपड़ों से बाहर निकाल लाया और बोला, मम्मा आपका मोबाइल तो यह रहा। श्रीमती खुशी से झाूम उठी।
श्रीमती से पूरा वाकया सुनने के बाद मैंने रात को ही तय कर लिया था कि मोबाइल मामले की दूसरी किश्त भी लिखनी है। शनिवार सुबह उठा तो पूरा बदन दर्द कर रहा था। रात को ही श्रीमती यह फैसला कर चुकी थी कि बच्चों को शनिवार को स्कूल नहीं भेजेंगे, वैसे उसका रोजाना सुबह उठने का समय पांच बजे का और मेरा साढ़े पांच बजे का है। बच्चों को स्कूल न भेजने का निर्णय होने के कारण हम निश्चिंत होकर सो गए। यह बता दूं कि श्रीमती सुबह मेरे से आधा घंटे पहले इसलिए उठती है, क्योंकि वह बच्चों का टिफिन और उनको नहलाकर तैयार करती है। इसके बाद मेरे को जगाती है। बड़े बच्चे की बस सुबह पौने छह बजे के करीब आती है। स्कूल बस का स्टॉपेज घर से करीब तीन सौ मीटर की दूरी पर है। मौसम परिवर्तन के कारण आजकल सूर्योदय अपेक्षाकृत देरी से होता है। इसक कारण सुबह-सुबह अंधेरा रहता है। उसने कहा कि अकेली महिला का अंधेरे में हाइवे पर बस के इंतजार में खड़ा होना उचित नहीं है। बात की गंभीरता को समझते हुए ही मैंने तय किया कि बड़े बेटे को मैं छोड़ आ जाऊंगा। छोटे बेटे की बस सुबह साढे सात बजे आती है तक तक काफी उजाला हो जा
ता है और लोगों की आवाजाही शुरू हो जाती है।
खैर, यह सब बताने का मकसद यह था कि सुबह देर से उठा। उठने की इच्छा ही नहीं हुई। दोनों बच्चे अलसुबह उठकर टीवी के सामने जम चुके थे जबकि श्रीमती रोजमर्रा के कार्य में व्यस्त थी। एक बार तो सोचा तबीयत कुछ खराब है आज सुबह की मीटिंग में नहीं जाऊंगा लेकिन ऐसा हो नहीं सका। मीटिंग के बाद आफिस में ही कुछ ऐसा उलझा कि दोपहर का डेढ़ बज गया। इस बीच श्रीमती का फोन भी आया, बोली आज आना नहीं है क्या है? भोजन का समय हो गया। इसके बाद दो बजे घर पहुंचा। खाना तैयार था। भोजन ग्रहण करने के बाद बैठने की हिम्मत नहीं हो रही थी, तो सो गया। बीच में दो तीन बार पर हल्की सी आहट पर आंख खुली लेकिन उठा नहीं लेटा ही रहा। आखिर में जब आंख खुली तो कमरे में छाया अंधेरा इस बात का आभास दिला रहा था कि समय कुछ ज्यादा ही हो गया है। घड़ी देखी तो वह सवा चार बजा रही थी। वैसे चार बजे आफिस चला जाता हूं। आज देर हो गई थी। बदन अब भी दर्द कर रहा था। सिर दर्द भी था। गले में खरखराहट और हल्की सी खांसी देखकर समझ गया था कि जुकाम ने अपना असर कर दिया है। मर्ज को कभी खुद पर हावी न होने की प्रवृत्ति बचपन से ही रही है, मैंने तत्काल मुंह धोया और फटाफट कपड़े पहनकर धड़धड़ाते हुए सीढिय़ों से नीचे उतरकर लम्बे कदमों से कार्यालय की ओर चल पड़ा। कार्यालय आ तो गया लेकिन मन यहां भी अनमना ही रहा। कुछ देर तो सोच में डूबा रहा कि क्या करूं.. घर चलूं कि नहीं। आखिरकार तय किया कि काम करुंगा। इस पूरी उधेड़बुन में मोबाइल की कहानी गौण हो चुकी थी। शाम का रोजमर्रा का काम कुछ हल्का हुआ तो ख्याल आया कि मोबाइल गुमशुदगी की दूसरी
किश्त तो लिखी ही नहीं है। बस फिर क्या था, हो गया शुरू और लिखकर ही दम लिया। मामला न केवल रोचक बल्कि श्रीमती से जुड़ा था, इसलिए इस पर लिखना बनता ही है। अब यह पूछकर शर्मिन्दा ना करें कि मोबाइल पर लिखकर मैंने श्रीमती पर व्यंग्य किया या फिर उसका मनोबल बढ़ाया। धन्यवाद।

Friday, November 30, 2012

...मिलग्यो... मिलग्यो



बस यूं ही

सूचना एवं प्रौद्योगि
की क्रांति के चलते आज मोबाइल फोन रोजमर्रा की जरूरत बन गया है। विशेषकर युवा वर्ग तो इसके बिना खुद को अधूरा पाता है। मेरी धर्मपत्नी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। शुक्रवार रात पौने दस बजे अचानक मेरा मोबाइल बजा। उस वक्त मैं कार्यालय में अपने कक्ष से बाहर था। आकर चैक किया तो स्क्रीन पर नम्बर दिखाई दिए। अपनी आदत के अनुसार मैंने वापस कॉल किया तो चौंक गया। सामने से आवाज श्रीमती की थी। अजनबी नम्बर से श्रीमती का फोन देखकर मैं समझ तो गया था कि कहीं न कहीं गड़बड़ तो हो गई। खैर, जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। सामने से धर्मपत्नी की बिलकुल घबराई हुई सी आवाज आई। मुझसे बोली मेरा फोन नहीं मिल रहा है। आप एक बार फोन पर घंटी करो, शायद बज जाए। मैंने तत्काल फोन काट कर श्रीमती के फोन पर डायल किया तो वह स्विच ऑफ बता रहा था। मैंने पलटकर फोन किया और श्रीमती को बताया कि आपका फोन तो बंद है। मेरा जवाब सुनकर श्रीमती एकदम निराश हो गई। बोली आज तो फोन गया। नीचे बैठी थी, बच्चों के साथ, शायद वहीं भूल गई और कोई ले गया। लम्बी सांस छोड़ते हुए वह फिर बोली, हाय राम उसने बंद भी कर लिया, मतलब चोरी हो गया मेरा फोन। पत्नी के जवाब पर मैं भी अवाक था और मन ही मन गुस्सा भी। मैंने उसको फोन पर हल्का सा डांट भी दिया कि ध्यान क्यों नहीं रखा। आपने लापरवाही की है, इसलिए उसका परिणाम भी भोगो। यह अलग बात है कि मेरे मन में भी उम्मीद थी कि शायद कहीं रखकर भूल गई होगी। उसकी भूलने की आदत है और अक्सर चीजें रखकर भूल जाती है। तभी तो मैंने उसको बताया कि घर में ढूंढ लो, शायद मिल जाएगा। मेरा इतना कहते ही फोन कट गया। यह भी हो सकता है कि श्रीमती ने मेरे को फोन करने से पहले मोबाइल की तलाश अपने स्तर पर की हो। उसने जिस फोन से मेरे को फोन किया उसी फोन से अपने नम्बर पर भी किया हो। किसी तरह का हल न निकलने पर ही उसने मेरे को फोन किया हो। दूसरा यह भी हो सकता है कि उसको राजस्थान वाले नम्बर याद ना हो क्योंकि उसका उपयोग यहां कम ही होता है। ऐसे में आखिरी विकल्प मैं ही था। मेरे पास श्रीमती के दोनों नम्बर सेव हैं।
मैं श्रीमती की पीड़ा भली भांति महसूस कर ही रहा था कि तत्काल अतीत जिंदा हो गया। पांच साल पहले झुंझुनू कार्यालय में मेरी टेबल पर रखा नया मोबाइल किसी ने बड़ी ही सावधानी के साथ पार कर दिया था। नया नया ही तो खरीदा था। बड़े ताने सुनने के बाद। पांच-छह साल तक तो नोकिया के 3310 मॉडल से ही काम चलाया। बेचारा कितना साथ निभाता खराब हो गया, तो जुगाड़ से चलाया। बैटरी खराब हुई तो वह भी बदल ली। एक दिन आफिस में बैटरी लॉ होने की समस्या ढूंढने के लिए खुद ही मैकेनिक बन गया। अचानक हाथ से छूटा और ऐसा टूटा कि फिर ठीक ही नहीं हुआ। दुकान पर गया नया मोबाइल लेने तो साथ वाले ने कहा कि भाईसाहब नोकिया 6300 खरीदो। एकदम लेटेस्ट मॉडल है। बहुत दिन हो गए पुराने मोबाइल के साथ। अब तो कुछ नया करो। यकीन मानिए मैं सस्ता मोबाइल ही लेने गया था और आज भी सस्ता मोबाइल ही इस्तेमाल करता हूं लेकिन साथी ने चांद पर चढ़ाकर जेब से 11 हजार रुपए ढीले करवा दिए। ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे उसको खरीदे हुए। बहुत दुख हुआ जब चोरी हुआ। मैंने मोबाइल की गुमशुदगी की पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाई। इससे पहले घर आकर पैकेट देखकर ईएमईआई नम्बर नोट किए और पुलिस थाने जाकर निवेदन किया। लेकिन आज तक मोबाइल का पता नहीं लगा है।
मैं समझ गया था कि अगर चोरी हुआ तो अब मिलने से रहा। यकायक दिमाग में कई तरह के सवाल भी कौंध गए। फोन मल्टीमीडिया था और डबल सिम वाला। सिम भी दो लगी थी। एक छत्तीसगढ़ की तो दूसरी राजस्थान की। कितना सहेज कर रखती है धर्मपत्नी उसको। छह माह पहले मायके गई तब लिया था। अभी दीपावली पर गई तो राजस्थान के नम्बरों की एक सिम और डलवा ली। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि मोबाइल में मेरी, बच्चों एवं श्रीमती की बहुत सारी फोटो भी थी। मन ही मन में दिलासा दिया कि खो गया तो खो गया लेकिन फोटो भी गई। बहुत सी यादें जुड़ी थी उनके साथ। फिर ख्याल आया अभी रिचार्ज भी करवाया था, पांच सौ रुपए का। शायद पुलिस में शिकायत करने से भले ही मोबाइल एवं फोटो ना मिले यह राशि तो मिल जाएगी। इस तरह दिमाग में कई सवालों का द्वंद्व और अधेड़बुन चल ही रही थी अचानक ख्याल आया कि क्यों ना एक बार राजस्थान वाले नम्बरों पर डायल किया जाए। फोन लगाया तो घंटी बज गई। जब तक श्रीमती ने फोन अटेंड नहीं किया। ऐसे में दिमाग में पहला विचार तो यह आया कि फोन बंद तो नहीं हैं। एक नम्बर पर तो घंटी जा रही है। दूसरे ही पल ख्याल आया कि यह राजस्थान का नम्बर है हो सकता है चोरी करने वाले ने मोबाइल से एक सिम निकाल ली हो। तीसरा विचार यह आया कि कहीं उसने राजस्थान वाली सिम दूसरे मोबाइल में तो नहीं डाल ली। मेरे दिमाग में यह विचार कौंध ही रहे थे कि अचानक घंटी बंद हो गई और सामने से आवाज आई... मिलग्यो... मिलग्यो...। मैं कुछ बोलता, इससे पहले ही फोन कट गया। मतलब मैं समझ गया था कि श्रीमती की चिंता दूर हो गई थी और मोबाइल मिलने की खुशी में उसके मुंह से केवल दो ही शब्द निकल पाए।
आखिर में एक बात और जिसको मैंने बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया है। आदमी हो या महिला जब वह बहुत अधिक गुस्से में होता तब और दूसरा जब वह बहुत अधिक खुश होता है तो उसके मुंह से स्थानीय भाषा ही निकलती है। श्रीमती के साथ भी वैसा ही हुआ है। वह अक्सर हिन्दी में ही बात करती है लेकिन मोबाइल मिलने की खुशी में हिन्दी भूलकर मारवाड़ी पर उतर आई। मैंने श्रीमती को दुबारा फोन लगाया तो दोनों ही नम्बरों पर नहीं लगा। शायद ज्यादा खुश हो गई या फिर सिम बंद होने के कारण तलाशने में जुट गई। कारण जो भी
हो घर जाने के बाद ही पता चलेगा। अभी तो इतना ही कह सकता हूं... वाह रे मोबाइल। तेरी भी अजीब माया है। न हो तो भी दिक्कत और हो तो भी। तेरी माया से कोई नहीं बच पाया।

Wednesday, November 28, 2012

का वर्षा जब कृषि सुखाने


प्रसंगवश 

 
अक्सर देखा गया है कि लोकप्रियता एवं वाहवाही बटोरने के चक्कर में प्रदेश की राज्य सरकार लोक लुभावन योजनाएं तो शुरू कर देती हैं, लेकिन उन योजनाओं के क्रियान्वयन में गंभीरता नहीं बरती जाती। प्रदेश में ऐसी योजनाओं की फेहरिस्त लम्बी हैं, जो तात्कालिक लाभ लेने के लिए जोरशोर से शुरू तो

कर दी गई, लेकिन वे जल्द ही अपने उद्देश्यों से भटकती नजर आई। बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने के नाम पर शुरू की गई सरस्वती नि:शुल्क साइकिल वितरण योजना का हश्र भी कुछ ऐसा ही है। सबसे पहले 2004 में यह योजना अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की कक्षा नवमी में अध्ययन करने वाली छात्राओं के लिए शुरू की गई थी। इसके बाद 2008 में इस योजना का लाभ गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की छात्राओं को भी दिया जाने लगा। इस योजना के प्रति छात्राओं ने खासा उत्साह दिखाया, लेकिन साइकिल को पाने की प्रक्रिया छात्राओं एवं उनके अभिभावकों का मनोबल तोडऩे का काम ज्यादा कर रही है। चयन से लेकर आवंटन तक की प्रकिया जटिल व लम्बी है। प्रवेश प्रक्रिया में ही एक-दो माह गुजर जाता है। इसके बाद चयनित छात्राओं की रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी के पास तथा वहां से पूरे जिले की रिपोर्ट मंत्रालय को भेजी जाती है। इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है और लगभग पूरा सत्र इंतजार में ही बीत जाता है। साइकिल देरी से मिलने की समस्या समूचे प्रदेश में है और सभी स्कूलों में हालात एक जैसे हैं। साइकिल लेने के प्रति छात्राओं की कितनी दिलचस्पी है, इस बात की पुष्टि साल दर साल आंकड़ों में होने वाली बढ़ोतरी ही बयां कर देती है। अविभाजित दुर्ग जिले में सत्र 2011-12 में साइकिल पाने वाली छात्राओं की संख्या 12091 थी। इसके बाद दुर्ग से अलग होकर बालोद एवं बेमेतरा जिले में अस्तित्व में आ गए। सत्र 2012-13 में तीनों जिलों से करीब 14501 छात्राओं को साइकिल मिलने का अनुमान है। बहरहाल, राज्य सरकार को इस योजना पर पुनर्विचार कर इसमें संशोधन करना चाहिए और ऐसी व्यवस्था हो कि छात्राओं को नवमी कक्षा में प्रवेश के दौरान ही साइकिल मिल जाए। ऐसा हो तभी इस योजना का फायदा है, वरना तो यह, 'का वर्षा जब कृषि सुखाने' वाली कहावत को ही चरितार्थ करती है। मामला बेटियों से जुड़ा है, लिहाजा राज्य सरकार को तत्काल सोचना चाहिए।




साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 28  नवम्बर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Monday, November 26, 2012

चुप्पी तोड़ो


टिप्पणी

रोज-रोज पैदल चल लम्बा सफर तय कर स्कूल जाने की मजबूरी और शोहदों से फब्तियां सुनने की लाचारी से आजिज आ चुकी नेहा ने आखिर समस्या की मूल जड़ पर ही चोट करने का फैसला किया। उसे भली-भांति मालूम था कि इन दोनों समस्याओं के पीछे प्रमुख कारण अतिक्रमण ही है। उसने हिम्मत जुटाई और सांसद द्वारा किए गए अतिक्रमण की शिकायत करके ही दम लिया। दुर्ग शहर की न्यू पुलिस कॉलोनी में रहने वाली कक्षा आठ की छात्रा नेहा ने वाकई साहसिक काम किया है। नेहा का यह काम अपने आप में बहुत बड़ा है। समाज के जागरूक लोगों को आईना दिखाकर उसने न केवल एक मिसाल कायम की है, बल्कि सुस्त समाज को जगाने की दिशा में एक अनूठी सीख भी दी है। नेहा ने यह साबित कर दिया है कि इच्छाशक्ति दृढ़ हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। निसंदेह नेहा ने सियासी भंवर में फंसे उदासीन शहर को झिाझाोड़ दिया है। नेहा का पत्र सोचने को मजबूर करता है और समाज की कड़वी हकीकत को भी बयां करता है। दरअसल, दुर्ग में लोगों की सहनशीलता इस कदर बढ़ गई है कि कोई मुंह खोलना ही नहीं चाहता। इसी वजह से जिम्मेदार व प्रभावशाली लोग जो चाहे वो करने की जुर्रत कर बैठते हैं। कभी-कभार किसी ने हिम्मत भी दिखाई तो पंगु प्रशासन से किसी तरह का सहयोग नहीं मिला। सांसद के अतिक्रमण की दबे स्वर में एक-दो लोगों ने पहले शिकायत की थी, लेकिन उनको अनुसना कर दिया गया। वैसे भी यह अतिक्रमण कोई रातोरात नहीं हुआ था। दो साल से अधिक समय हो गया था। ऐसे में इस बात की संभावना बेहद कम है कि शासन-प्रशासन को इसकी जानकारी न हो। और इससे भी गंभीर बात तो यह है कि गाहे-बगाहे अनूठे प्रदर्शन कर सस्ती लोकप्रियता पाने वाले भी इस मामले में अब तक खामोश ही रहे। उनको इस बात की जानकारी कैसे नहीं मिली यह भी किसी रहस्य से कम नहीं है।
वैसे भी शासन-प्रशासन के लिए इस अतिक्रमण को हटाना किसी चुनौती से कम नहीं है। शासन-प्रशासन को चाहिए कि वह नेहा की हिम्मत की दाद देते हुए अतिक्रमण के मामले में कार्रवाई करे। सुराज का मतलब भी तभी है। और इधर खुद को जनप्रतिनिधि कहलाने में गर्व महसूस करने वाली सांसद को भी महिला होने के नाते नेहा और उस जैसी कई लड़कियों की मजबूरी को समझना चाहिए। प्रशासन कोई कार्रवाई करे, इससे पहले सांसद को अपना अतिक्रमण हटा कर एक नजीर पेश करनी चाहिए।

 साभार - पत्रिका भिलाई के 26  नवम्बर 12 के अंक में प्रकाशित 

इन तालाबों पर कुछ तो तरस खाइए


हमें पर्यावरण की याद अक्सर तभी आती है जब बात खुद से जुड़ जाती है। हाल में मनाया गया छठ पर्व इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसके लिए बड़े पैमाने पर तालाबों की सफाई भी की गई थी। इतना ही नहीं सफाई को लेकर कुछ संगठनों की ओर से तो बड़े-बड़े दावे भी किए गए थे, लेकिन पर्यावरण एवं तालाब की चिंता करने वाले इन तथाकथित पर्यावरण प्रेमियों के दावों का दम छठ पूजा के दूसरे दिन ही निकल गया। दुर्ग व भिलाई के उन सभी तालाबों पर जहां छठ पूजा की गई थी, वहां यत्र तत्र सर्वत्र बिखरी पूजन सामग्री, फूलमालाएं एवं पॉलीथीन की थैलियां बदहाली की कहानी बयां कर रही हैं। दुर्ग-भिलाई जैसे शहरों में पर्यावरण को सुरक्षित एवं संरक्षित रखना अपने आप में बड़ी चुनौती है, ऐसे में इन शहरों में तालाबों की दुर्दशा सोचनीय एवं चिंतनीय विषय है।  वैसे भी तालाब अकेले दुर्ग व भिलाई की ही नहीं, बल्कि समूचे छत्तीसगढ़ की पहचान हैं। इन तालाबों से अतीत की कई सुनहरी कहानियां व यादें जुड़ी हैं, लेकिन इनकी दुर्दशा को लेकर न तो निगम प्रशासन गंभीर है और ना ही आमजन। गणेश पूजन, नवरात्रि आदि आयोजन पर भी बड़े पैमाने पर तालाबों में प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है, लेकिन इसके बाद के हालात पर किसी को तरस नहीं आता है। अगले साल तक फिर अवसर विशेष आने पर ही इन तालाबों की याद आती है। दुर्ग-भिलाई में बीएसपी के टाउनशिप इलाके को अपवादस्वरूप छोड़ दें, तो दोनों निगमों में सफाई व्यवस्था के हालात कमोबेश एक जैसे ही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब टाउनशिप इलाके में पर्यावरण को लेकर जितने गंभीरता बरती जाती है, उतनी निगम क्षेत्रों में क्यों नहीं? निगम व शासन के स्कूलों में गठित इको क्लब भी महज कागजी ही साबित हो रहे हैं, जबकि बीएसपी के स्कूलों इको क्लब न केवल उल्लेखनीय काम कर रहे हैं, बल्कि लगातार पुरस्कार भी जीत रहे हैं। रविवार को पर्यावरण संरक्षण दिवस मनाया जाएगा। दोनों शहरों में निगमों की कार्यप्रणाली किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में यहां के जागरूक, सेवाभावी एवं उत्साही लोग अगर प्रदूषित तालाबों की सुध लें एवं उनकी देखभाल का संकल्प कर लें तो निसंदेह वे पर्यावरण बचाने की दिशा में बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं।



साभार - पत्रिका भिलाई के 25 नवम्बर 12  के अंक में प्रकाशित।