Saturday, March 10, 2018

हम दूध के जले हैं साहिब, शंका तो करेंगे ही

बस यूं ही
समाज के युवाओं की दशा व दिशा को लेकर कौन चिंतित नहीं होगा भला। होना भी चाहिए। आखिर कोई तो इस काम का बीड़ा उठाए। समाज का उत्थान करने तथा उसका हित करने के नाम पर वैसे तो कई संगठन बने हैं। कुछ असमय दम तोड़ गए तो कुछ चल भी रहे हैं। समाज का हित व उत्थान कैसा व कितना हुआ यह सबके सामने हैं। उन सामाजिक संगठनों ने किस तरह का काम किया? उनका मकसद क्या था? क्या वे इसमें सफल हुए या नहीं? इस तरह के हालात में क्या और संगठनों की जरूरत है? जैसे ज्वलंत सवालों पर चर्चा से पहले एक महत्वपूर्ण बात का जिक्र जरूरी है। दो रोज पहले ही समाज के कुछ चुनिंदा व जागरूक लोग, जिनमें अधिकतर सामाजिक व राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं। कुछ मीडिया जगत के साथी भी थे। इन लोगों ने अपने-अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने विशेषकर समाज के युवाओं की भूमिका पर चिंता जाहिर करते हुए इसमें सुधार कैसे हो इस पर गहरा मंथन किया। सामूहिक चर्चा के बाद इस प्रकार के कार्यक्रम प्रदेश भर में करने का निर्णय किया गया। इन बैठकों के माध्यम से युवाओं को कॅरियर मार्गदर्शन के लिए सेमिनार व स्वरोजगार के लिए प्रेरित करने का तय हुआ। इसके अलावा सरकारी स्किल डवलमेंट जैसे रोजगारोन्मुखी अवसरों की तरफ मोडऩे की बात भी कही गई। इन सबके अलावा सबसे बड़ी वह समझाइश होगी, जो इस मुहिम का मुख्य मकसद है। वह समझाइश है गैर जरूरी मुद्दों पर समाज के युवाओं को सड़क पर उतारने वालों को रोकना। इसी के साथ एक बात यह भी आई कि गलत को गलत कहने की जो आदत छूट गई है, उसको बदला जाए और हर गलत बात का कठोरता से प्रतिवाद किया जाए।
वैसे यह सब काम जितने कहने में आसान है, उतने हकीकत में है नहीं। बहुत मुश्किल व चुनौतीपूर्ण काम है यह। 
खैर, यह तो हुई नई मुहिम की बात। वैसे समाज के युवाओं के लिए कॅरियर मार्गदर्शन संबंधी सेमिनार पूर्व में होती रही हैं अभी भी कई जगह चल रही हैं। ऐसे में और सेमिनार होना निसंदेह फायदेमंद ही होगा, ऐसी उम्मीद करनी चाहिए। स्वरोजगार व कुरीति उन्मूलन की बातें तो तीस साल से लगातार सुन रहा हूं। हमेशा मुद्दा वही रहा लेकिन समय-समय पर मंच व कहने वाले बदलते गए। इन सब के बीच मुझे एक सवाल लगातार परेशान किए हुए है। वह सवाल है कि समाज के युवाओं को सड़क पर उतारने वाले वो कौन लोग हैं? क्या वो कोई विदेशी ताकतें हैं या किसी दूसरे समाजों का प्रतिनिधित्व करते हैं?  आखिर वो भी तो समाज हितैषी बनकर ही अस्तित्व में आए थे। उनको समाज से इतना स्नेह मिला कि वो इतने बड़े हो गए कि बाद में टुकड़े-टुकड़े हो गए। एक ही नाम पर चार संगठन संचालित हो रहे हैं प्रदेश में और सब के अलग-अलग मुखिया हैं। इन मुखियाओं ने खुद का कद बड़ा करने के लिए खूब शक्ति प्रदर्शन किए। एक दूसरे को नीचा दिखाने में भी किसी ने कसर नहीं छोड़ी। समझदार व जागरूक लोग तब चुप्पी साधकर यह सब होते देख रहे थे। एक गैंगस्टर व फिल्म के बहाने तो शक्ति प्रदर्शन चरम तक पहुंच गया। मेरी नजर में दोनों ही मसले न्यायसंगत न तब थे न अब है। विशेष रूप से विरोध करने का तरीका तो कतई लोकतांत्रिक नहीं था। इतना कुछ होने के बावजूद इनका नाम समाज के समर्थन के बलबूते ही चमका। समझदार व शिक्षित लोगों तक को भी इनके समर्थन में गरियाते देखा। कई तो आज भी गरिया रहे हैं। इसमें कोई दोराय नहीं समाज हमेशा भावनाओं में बहा है। तत्काल विश्वास करने की आदत हमेशा भारी पड़ती रही है। और समय-समय पर समाज ने इसकी कीमत भी चुकाई है।
बड़ी विडम्बना यह भी है कि समाज की जाजम से राजनीति शुरू करने वाले जब मुकाम पा गए तो फिर समाज को भूल गए। तब वह सर्वसमाज के नेता बन गए। इसीलिए इस तरह के सामाजिक प्रकल्पों में राजनीति न घुसे तो ही अच्छा है। किसी राजनीतिक दल से जुड़ा व्यक्ति या राजनीति में भाग्य आजमाने वाला इन सामाजिक प्रकल्पों से जुड़ता है तो अतीत के जख्म हरे होने लगते हैं। आशंका बलवती होने लगती है। दूध का जला का आदमी छाछ फूंक-फूंक कर पीता है।  जल्दी से यकीन होता भी नहीं है।
बहरहाल, यह मुहिम अच्छी पहल है। बशर्ते यह बिना किसी स्वार्थ, हित व राजनीति के संचालित हो। कोई प्रभाव या दवाब इस पर कारगर न हो। भगवान न करे अगर यहां भी राजनीति घुसी तो फिर फूंकने के लिए छाछ भी नहीं बचेगी। कहा भी कहा गया है विष दे विश्वास न दे अर्थात विश्वासघात करने से अच्छा है जहर ही दे दिया जाए। सही को सही कहना भी भी आदत है और मैंने भी उसी परिपाटी का निर्वहन  किया है।

इक बंजारा गाए-22

नमकीन के पैकेट
सट्टे की दुकानों पर पिछले दिनों छिटपुट कार्रवाई करने के बाद खाकी इन दिनों खामोश है। इतना समय बीतने के बाद इस कारोबार से जुड़े लोग फिर उसी अंदाज में लौट आए हैं। हां इस बार कुछ अलग तरह की तैयारी जरूर करके आए हैं। कहने का आशय यह है कि पहले इन सट्टे की दुकानों पर एक टेबिल-कुर्सी के अलावा कोई सामान नहीं होता था। ऐसे में इस तरह की दुकानें जल्द ही शक के दायरे में आ जाती थी। बताते हैं कि किसी खाकी के व्यक्ति ने इन्हें एक सुझाव दिया है, जिससे दुकानें सट्टे की न लगकर हकीकत की दुकानें लगें। अब इन सट्टे की दुकानों पर नमकीन व चिप्स के पैकेट टंगे हुए दिखाई दे जाएंगे। यह अलग बात यह है कि इन पैकेट को न तो कोई खरीदता है और न ही यह लोग उसको बेचते हैं। बस जनता में इस बात का वहम बना रहे कि वाकई यह किसी गैरकानूनी काम की नहीं वरन हकीकत की दुकान है। फिलहाल यह आइडिया लगभग सभी ने सट्टे के दुकानदारों ने कॉपी कर रखा है।
विवाद के मायने
राजनीति के कई रंग होते हैं। शतरंज की बिसात की तरह इसमें भी शह और मात का खेल चलता रहता है। बात चाहे दो दलों की हो या फिर एक ही दल की लेकिन सभी की आपस में बने यह जरूरी नहीं होता है। हाल ही विवादों में रहे एक दल के धरने का पटाक्षेप तो किसी तरह से हो गया। विवाद का निबटारा जरूरी भी हो गया था, क्योंकि पार्टी के मुखिया का पड़ोसी जिले में दौरा था। ऐसे में पार्टी के अंदरूनी विवाद की खबर मुखिया की भौंहें तन सकती थी, लिहाजा किसी न किसी तरह से दोनों पक्षों को राजी कर लिया गया। क्योंकि जिस तरह अपने-अपने नेताओं के समर्थन में समाज के लोग लामबंद हो रहे थे, उससे पार्टी की चिंता बढ़ाना स्वाभाविक भी था। खैर, ताजा मामला है कि छोटी सी बात पर शुरू हुआ यह विवाद निबटा जरूर है लेकिन अब इसका श्रेय लेने का खेल शुरू हो गया है। हालांकि इस श्रेय का जनता में कोई लाभ मिलने से रहा, लेकिन पार्टी में जरूर पीठ थपथपाई जा सकती है। फिर भी श्रेय की जंग जारी है।
मुहरों का मिलना
श्रीगंगानगर के जिला कलक्ट्रेट में करीब दो माह पूर्व न्याय शाखा से मुहरें गायब होना काफी चर्चा में रहा था। जिस अंदाज में यह मुहरें गायब हुई थीं, उससे यह तो जाहिर हो गया था कि जरूर यह अंदरूनी लड़ाई है और इस काम को किसी विभाग के आदमी ने ही अंजाम दिया है। मामला पुलिस तक पहुंचा। जांच भी शुरू हुई। इसके बाद मामला एक तरह से ठंडा पड़ गया। मंगलवार को इस मामले में अचानक से मोड़ आया जब डेढ़ दर्जन मुहरों में से करीब दस मुहरें स्टोर में मिल गई। मुहरें गायब होने के बाद जिस अंदाज में मिली हैं, उससे शक की सुई और भी गहरा गई है। मुहरों को देखकर प्रतीत भी होता है कि इनको यहां फेंका गया है। खैर, अब चोर का पकड़ा जाना ज्यादा जरूरी हो गया है। उसने न केवल मौका देखकर इन मुहरों को इधर-उधर किया बल्कि मौका पाकर यहां फेंक भी गया। देखने की बात है कि पुलिस चोर तक कब पहुंचती है या पहुंच ही नहीं पाती है।
गाड़ी का गम
अपनी जेब से अगर एक रुपया भी कहीं गिर जाए तो एकबार तो उसका भी गम होता है लेकिन बात जब लाखों की हो तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कुछ ऐसा ही हाल शहर में एक ब्लड बैंक चलाने वाले महाशय के साथ हो गया। लाखों रुपए की इनकी लग्जरी गाड़ी कोई धोखे से ले गया। मामला पुलिस तक पहुंचा है और पुलिस जांच में जुटी है। लोग बताते हैं कि किसी समय में ये महाशय एक छोटी सी प्राइवेट लैब पर नौकरी करते थे। वहां से पता नहीं कौनसे गुर सीखकर यह लाखों तक पहुंच गए। इसलिए गाड़ी जाने का दर्द तो होगा ही। वैसे जानकार बताते हैं कि खून के धंधे में भी मुनाफा कम नहीं होता है। शिविरों के माध्यम से आने वाले खून का लेखा जोखा कौन लेता है? ब्लड बैंक के खून के बदले खून भी लिया जाता है और पैसा भी। खैर, यह तो हुई जानकारों की बात, बहरहाल, गाड़ी वाले महाशय जी जरूर चिंता में डूबे हैं। बस किसी तरह से उनकी गाड़ी का पता लग जाए।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 8 मार्च 18 के अंक में प्रकाशित

हुसैनीवाला के कारण चर्चा में आया आसफवाला

भौगोलिक बदलाव के कारण पाक के पास आया फाजिल्का
श्रीगंगानगर. फाजिल्का जिले का आसफवाला गांव भारत-पाक के बीच 1971 में हुए युद्ध मेंं शहीद सैनिकों के याद में बने स्मारक स्थल के लिए ना जाता है। लेकिन एक सवाल यहां आने वालों के मन में जरूर कौंधता है कि शहीद स्मारक आसफवाला में ही क्यों बना? इस सवाल का जवाब आसफवाला स्मारक के संबंध में प्रकाशित एक ब्रॉशर में मिलता है। ब्रॉशर में दी गई जानकारी के अनुसार देश के विभाजन के समय क्रांतिकारी भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव का हुसैनीवाला स्थित समाधि स्थल पाकिस्तान क्षेत्र में रह गया था। भारतवासियों की हुसैनीवाला को भारतीय क्षेत्र में जोडऩे की प्रबल इच्छा बन रही। इसी के दृष्टिगत 20वीं सदी के छठे दशक में भारत-पाक की सरकारों के बीच क्षेत्रीय हस्तांतरण के लिए स्वर्णसिंह-शेख समझौता हुआ। इस समझौते के तहत हुसैनीवाला क्षेत्र तो फिरोजपुर के साथ मिला दिया गया लेकिन इसके बदले में फाजिल्का के निकटवर्ती ग्रामीण क्षेत्र व सुलेमानकी हैड पाकिस्तान को दे दिए गए। इस भौगोलिक बदलाव के कारण अंतरराष्ट्रीय सीमा फाजिल्का के बिलकुल पास आ गई। इतना ही नहीं फाजिल्का सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्र तीन ओर से पाकिस्तान से घिर गए। इसका सैन्य दृष्टिकोण से पाकिस्तान को फायदा हुआ। पाकिस्तान ने 1965 व 1971 के युद्ध के दौरान इस क्षेत्र पर कब्जा करने दुस्साहस किया। लेकिन भारतीय सैनिकों के साहस के आगे उसकी एक नहीं चली। लेकिन इस भीषण युद्ध में काफी सैनिक शहीद हुए। इसी कारण आसफवाला में यह युद्ध स्मारक है। जानकार युद्ध में इतने शहीद होने के पीछे भौगोलिक बदलाव को बड़ा कारण मानते हैं। ब्रॉशर में तो यहां तक कहा गया है कि हुसैनीवाला का स्मारक लेने की एवज में देश को भारी मूल्य चुकाना पड़ा और कालांतर में आसफवाला में एक ओर स्मारक का निर्माण हुआ तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
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पत्रिका डॉट कॉम पर 07 मार्च 18 को प्रकाशित 

शहीदों की याद में यहां हर साल लगता है मेला

मैराथन दौड़ होती है प्रमुख आकर्षण का केन्द्र
श्रीगंगानगर. शहीदों की मजार पर लगेंगे हर वर्ष मेले, वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा। कविता की पंक्तियां आसफवाला में बन युद्ध स्मारक तथा वहां पर हर साल लगने वाले शहीदी मेले पर सटीक बैठती है। भारत-पाक के बीच 1971 में हुए युद्ध में फाजिल्का सेक्टर में शहीद सैनिकों की याद में बनाए गए इस स्मारक का अनावरण 1972 में हुआ था। तब से हर साल यहां वीर सैनिकों की याद में शहीदी मेला तथा विजय दिवस कार्यक्रम जोश व उत्साह के साथ मनाया जाता है। चार दशक से अधिक समय से यहां देशभक्ति से ओतप्रोत तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। खास बात यह है कि फाजिल्का के जिला बनने क बाद स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवसों पर राजकीय कार्यक्रमों में ध्वजारोहण करने के लिए आने वाले पहले आसफवाला के स्मारक पर आकर श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। इसके बाद ही सकरकारी कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। शहीदी मेले तथा विजय दिवस पर यहां वरिष्ठ राजनेता, सैन्य अधिकारी, वरिष्ठ उच्च प्रशासिनक अधिकारी, सैनिक, गणमान्य लोग, शहीदों के परिजन तथा बड़ी संख्या में आम जन आते हैं। पिछले कुछ साल से वार्षिक विजल दिवस पर विद्यार्थियों की मैराथन दौड़ यहां खास आकर्षण और प्रेरणा का स्त्रोत बन चुकी है।
स्मारक परिसर में में निर्मित कम्युनिटी सेंटर में भारतीय सेना के अमोघ डिवीजन तथा शहीदों की समाधि कमेटी ने सीमावर्ती ग्रामीण लड़कियों के लिए एक कम्प्यूटर ट्रेनिंग सेंटर भी स्थापित किया है। इसका शुभारंभ 25 जुलाई 2012 को किया गया था। यह कम्प्यूटर ट्रेनिंग सेंटर ग्रामीण लड़कियेां के लिए उपयोगी साबित हो रही है। इसमें लड़कियों को कम्प्यूटर की मौलिक शिक्षा तथा ज्ञान नि:शुल्क दिया जा रहा है। पांच एकड़ के इस युद्ध स्मारक में प्राइमरी स्कूल व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी संचालित हो रहा है। खास बात तो यह है कि स्मारक प्रांगण में हरे-भरे पेड़ों तथा आकर्षक फूलों वाले सुंदर मैदान हैं। शहीद दृगपाल सिंह स्मृति पार्क में दर्शनीय स्थल हैं। विजय दिवस व शहीदी मेले से संबंधित कार्यक्रम इसी पार्क में होते हैं।

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पत्रिका डॉट कॉम पर 06 मार्च 18 को प्रकाशित 

यहां शहादत के किस्से जगाते हैं देशभक्ति का जज्बा

प्रेरक संग्रहालय में लगी हैं सभी शहीदों की तस्वीरें
श्रीगंगानगर. शहीदों की याद में आसफवाला बनाए गए युद्ध स्मारक (समाधि स्थल) के साथ-साथ और भी कई स्थान ऐसे हैं जो देशभक्ति का जज्बा जगाते हैं। युद्ध स्मारक में बना प्रेरक संग्रहालय इसका जीता जागता उदाहरण है। शहीदों की समाधि कमेटी का इस संग्रहालय को विकसित करने का सपना था। यह सपना था कि संग्रहालय को देखने वाले लोग शहीदों के बारे में जान सकें। उनकी शहादत के किस्से सुन सकें। कमेटी का यह सपना अब साकार होता दिखाई दे रहा है, क्योंकि संग्रहालय में जाने वालों को सारी जानकारी खुद-ब-खुद मिल जाती है। उनको किसी गाइड की जरूरत नहीं पड़ती। संग्रहालय में 1971 में भारत-पाक के बीच हुए युद्ध में फाजिल्का सेक्टर में शहीद होने वाले तमाम शहीदों के चित्र लगाए गए हैं। चित्रों के नीचे शहीदों से संबंधित विवरण भी दिया गया है। इतना ही नहीं युद्ध का विवरण तथा संग्रहालय से संबंधित जानकारी भी दीवारों पर चस्पा की गई। दुश्मन से युद्ध में जीते हुए टैंक, हथियार आदि के फोटो भी यहां लगे हैं। खास बात यह है कि यहां एक टेपरिकार्डर भी लगा रखा है जिस पर दिन भर शहादत के किस्से गूंजते हैं। यह किस्से यहां आने वालों के मन में देशभक्ति का जज्बा का जागते हैें। इस संग्रहालय की खास बात यह है कि यहां चार शहीदों की प्रतिमाएं भी लगी हैं। यहां आने वाले दर्शक इन प्रतिमाओं के समक्ष श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। चार प्रतिमाओं में दो 15 राजपूत रेजीमेंंट के जवानों की तथा 4 जाट रेजीमेंट के जवानों की है। 15 राजपूत रेजीमेंट के शहीद लांस नायक दृगपाल सिंह व मेजर ललित मोहन भाटिया तथा 4 जाट के मेजर नारायणसिंह व लांस हवलदार गंगाधर की प्रतिमा लगी हैं। दृगपाल को भारत सरकार की ओर से मरणोपरांत महावीर चक्र तथा भाटिया को वीर चक्र प्रदान किया गया था। इसी प्रकार मेजर नारायणसिंह व व गंगाधर को भी मरणोपंरात वीर चक्र प्रदान किया गया था। स्मारक स्थल पर बनाए गए स्मृति स्मारकों पर भी शहीदों के नामों का उल्लेख किया गया है। फाजिल्का सेक्टर में युद्ध में शामिल रेजीमेंट्स के अलग-अलग स्मृति स्मारक हैं, जिन पर सभी के नामों का विवरण दिया गया है। दर्शक इन पर भी श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

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पत्रिका डॉट कॉम पर 05 मार्च 18 को प्रकाशित 

जिम्मेदारी

लघुकथा
मैं सुबह आफिस के लिए घर से निकला ही था कि सामने सड़क पर कबाड़ के बोरों से भरे रिक्शे को गुजरते देखा। रिक्शे में बोरों के ऊपर दस-ग्यारह साल की मैले कुचेले व फटे कपड़ों में एक बालिका बैठी थी। रिक्शा चला रहे बालक का हाल भी कमोबेश बालिका जैसा ही था, हालांकि उम्र में वह उससे छोटा लग रहा था। वजन ज्यादा होने के कारण रिक्शे का संतुलन बिगड़ रहा था। वह सड़क पर लहराता हुआ चल रहा था। बालक बड़ी मुश्किल से खड़े हो होकर पैडल मार रहा था। उसकी हालात देखकर अनायास ही मेरे से निकला, अरे बेटे, तुमने तो सामान ज्यादा भर लिया। मेरी बात सुनकर बालक ने लंबी सांस छोड़ी और हल्का सा मुस्कुरा भर दिया, लेकिन रिक्शे पर बैठी वह बालिका बड़ी ही मासूमियत के साथ बोली, क्या करें अंकल मजबूरी है। उसका जवाब सुनकर मैं अवाक था। इतनी छोटी सी उम्र में उसने मजबूरी की परिभाषा समझ ली थी। जिम्मेदारी के बोझ ने उसका बचपन छिनकर असमय हीे समझदार जो बना दिया था।

पंजाब के सर्वश्रेष्ठ युद्ध स्मारकों में से है आसफवाला स्मारक

पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जेलसिंह ने किया था अनावरण 
श्रीगंगानगर. फाजिल्का जिले का आसफवाला वार मैमोरियल पंजाब के सर्वश्रेष्ठ 50 स्मारकों में शामिल है। इस स्मारक की शुरुआत छोटे से स्तर पर हुई लेकिन कालांतर में इसका विकास व विस्तार होता गया। 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद सैनिकों की सामूहिक अन्त्येष्टि के बाद फाजिल्का के लागों ने शहादत को चिर स्थायी बनाने के लिए यह स्मारक बनाने का निर्णय किया। इसके लिए वार मैमोरियल कमेटी का गठन किया गया। शुरुआत में 4 जाट रेजीमेंट के 82 जवानों की स्मृति में लगभग आधा एकड़ भूमि में शहीद के अंतिम संस्कार स्थल पर स्मारण निर्माण किया गया। इसमें क्षेत्रवासियों ने खूब सहयोग किया। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह जो कि उस वक्त पंजाब के मुख्यमंत्री थे, ने इस स्मारक का 22 सितम्बर 1972 को अनावरण किया था। इसके बाद 1991 में स्मारक का दायरा विस्तृत करने का निर्णय किया गया। इसी के तहत 15 राजपूत व 3 असम रेजीमेंट के स्मृति स्तम्भ स्मारक परिसर में स्थापित किए गए। इसके बाद सीमा सुरक्षा बल तथा होमगार्ड के जवानों जिन्होंने इस युद्ध में शहादत दी थी कि स्मृति स्तंभ भी समाधि प्रांगण में बनाए गए। यही कारण रहा कि स्मारक अब पांच एकड़ भूमि के बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। आसफवाला स्मारक के विकास, सौंदर्यकरण तथा रखरखाव का कार्य शहीदों की समाधि कमेटी, भारतीय सेना व प्रशासन के संयुक्त प्रयास से हो रहा है। 2011 में यहां आए इनफैंटरी ब्रिगेड के तत्कालीन ब्रिगेडियर अरुल डेनिस ने इस स्मारक की प्रशंसा करते हुए कहा था कि पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण में आसफवाला का स्मारक श्रेष्ठ है। फिलहाल क्षेत्रवासियों की भावना है कि आसफवाला के स्मारक को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में मान्यता दी जाए।
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पत्रिका डॉट कॉम पर 03 मार्च 18 को प्रकाशित 

इक बंजारा गाए-21

📌कमाल की एकजुटता
श्रीगंगानगर को अक्सर खामोश शहर कहा जाता है। यहां के लोग कभी विरोध जताने की पहल नहीं करते। इसी एकजुटता की कमी के कारण शहर बदहाल है। परंतु कोई मौका हो तो नेता कभी नहीं चूकते। शहर के जनप्रतिनिधियों का इस मामले में कोई जवाब नहीं है। वैचारिक मतभेद व अलग-अलग पार्टी होने के बावजूद उनकी आपस की समझ इतनी गजब की है वे जब चाहें एक जाजम पर बैठ जाते हैं। यह अलग बात है कि इस गजब की एकजुटता में फायदा जनता का न होकर जनप्रतिनिधियों का ही ज्यादा होता है। नगर परिषद तो इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां तो सर्वदलीय सरकार है। पक्ष-विपक्ष यहां सब एक हैं। इसी तरह एक युवक की मौत की संदिग्ध के बाद सभी दल एक साथ हो गए हैं। जनप्रतिनिधियों की इस एकजुटता पर लोग दबे स्वर में चुटकी लेने से भी नहंी चूक रहे। लोगों का कहना है कि काश बैठकों में लडऩे वाले तथा जनहित पर चुप्पी साधने वाले जनप्रतिनिधि इस तरह की एकजुटता कभी शहर के लिए भी दिखाएं तो कोई बात बने।
📌विशुद्ध राजनीति
मटका चौक स्कूल में प्रधानाचार्य व पीटीआई को एपीओ करने के बाद बुधवार को अचानक फिर से नया मोड़ आने से लगता है कि प्रकरण में कोई है, जो छात्राओं की आड़ लेकर पर्दे के पीछे खेल रहा है। छात्राओं का मोहरा बनाकर विभाग पर भरपूर दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे यह तो जाहिर हो गया है कि इस मामले में राजनीति हो रही है और इस राजनीति की आड़ में भोली भाली छात्राओं को आगे किया जा रहा है। मार्च का माह वैसे भी महत्वपूर्ण होता है, लेकिन विवाद से नाता रखने वालों को इस बात की परवाह ही कहां है। गुरु का यह काम तो कतई नहीं होता है कि वह शिष्यों के भविष्य से खिलवाड़ करे। गुरु तो शिष्यों का भविष्य बनाता है न कि अपने हित के लिए उनको आगे करे। इस मामले में अभिभावकों को चुप्पी तोडऩी चाहिए। उनको तह तक जाना चाहिए कि आखिर छात्राओं के इस आक्रोश की वजह कोई दूसरी तो नहीं?
📌पैरवी की वजह
शहर के जनप्रतिनिधि अक्सर सस्ती लोकप्रियता के रास्ते खोजते रहते हैं। वह जायज है या नहीं, इससे उनको कोई सरोकार नहीं होता। बस किसी न किसी बहाने चर्चा में बने रहना चाहते हैं। अब शिव चौक से जिला अस्पताल के बीच सड़क सौन्दर्यीकरण का मामला ही देख लीजिए। यूआईटी इस छोटे से टुकड़े पर लाखों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन जिस उद्देश्य से कर रही है, वह अगर पूरा ही नहीं हो तो फिर इतना खर्चा करने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। इस सड़क को न केवल चौड़ा करना प्रस्तावित है बल्कि जाली भी लगाई जानी है। जाली की बात से उन व्यापारियों की भौंहें तन गई हैं, जो बीच सड़क पर अतिक्रमण करके व्यापार कर रहे हैं। दबाव बनाने के लिए सभी व्यापारी एकजुट हुए और प्रस्तावित जाली लगाने का विरोध जताना शुरू किया। संकट में फंसे व्यापारियों की सहानुभूति बटोरने का इससे मुफीद मौका और होता भी क्या। लिहाजा शहर के एक नेताजी इनके समर्थन में कूद पड़े। देखना है अब ऊंट किस करवट बैठता है।
📌आश्वासनों की झड़ी
नेताओं के पास देने के लिए कुछ न कुछ होता ही है। भले ही वह आश्वासन ही क्यों न हो। छोटे से लेकर बड़े नेता सब अपनी हैसियत व योग्यता के हिसाब से आश्वासनों की रेवडिय़ा बांटते हैं। जो जनता को आश्वासन देकर प्रभावित कर ले वही पारंगत नेता माना जाता है। अब शहर में एक युवक की मौत के बाद हुई सभा में नेताओं ने जो-जो आश्वासन दिए उनका तो बस कहना ही क्या। ऐसे ही एक नेताजी जो सतारूढ़ पार्टी के हैं। इस बार विधानसभा चुनाव के लिए जीभ लपलपा रहे हैं। प्रेस नोट आदि भिजवाने के लिए दो चार चेले चपाटे भी पाल लिए हैं। इन नेताजी को आजकल जहां भी भीड़ दिखाई देती है, निसंकोच चले जाते हैं। भले ही उनकी पार्टी उस भीड़़ से दूरी ही बनाए। वैसे यह नेताजी कुछ खबरनवीसों के भी खास बने हुए हैं। तभी तो कल धानमंडी में मजदूरों की सभा के बाद इन नेताजी के प्रेस नोट जारी हो गए। समय के साथ नेताजी आश्वासन देना भी सीख गए हैं, जैसे कि उन्होंने कल दिए। गनीमत रही है चौतरफा दबाव से कार्रवाई हो गई और नेताजी की बात रह गई। वरना तो पोल खुलनी तय थी।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 01 मार्च 18 के अंक में प्रकाशित..

Wednesday, February 28, 2018

नाली बनाए बिना ही लगा दिया बोर्ड!

मेरे गांव की कहानी
स्वच्छता का नारा यहां बेमानी हो जाता है। यह कहानी मेरे गांव केहरपुरा कलां की है। ग्रामीण बेहद परेशान हैं। गांव से लगातार फोन आ रहे हैं। उनकी एक ही गुहार है कि समस्या का समाधान करवाओ। स्कूल जाने वाली बच्चियों को दिक्कत हो रही है। समस्या यह है कि बालिका स्कूल जाने वाले रास्ते पर कीचड़ है। इससे बालिकाओं को आने जाने में दिक्कत हो रही है। यह कीचड़ इसीलिए भरता है क्योंकि इस रास्ते को पक्का तो कर दिया गया है लेकिन नाली नहीं छोड़ी। इस समस्या के समाधान के लिए कथित रूप से कुछ घरों के आगे सोखती कुइयां भी बनाई तो कुछ घरों को एेसे ही छोड़ दिया गया। एेसे में घरों से दैनिक उपभोग का पानी रास्ते पर आता है और बिना बरसात बारह माह यहां कीचड़ रहता है। खास बात यह है कि राजकीय माध्यमिक विद्यालय केहरपुरा कलां से राजकीय औषधालय भवन तक खरंजा मय नाली तो लिखा हुआ है। खरंचा तो बना है लेकिन नाली नहीं है। इस काम को ग्राम पंचायत केहरपुरा कलां ने करवाई गया है। यह वर्ष 2015-16 में बना है। इस काम के लिए स्वीकृत राशि सात लाख 95 हजार थी जिसमें सात लाख 93 हजार 651 राशि खर्च होने की जानकारी दीवार पर चस्पा की गई है। इस जानकारी पर यकीन किया जाए तो तय मानिए नाली बनने का पैसा उठ चुका है लेकिन नाली बनी नहीं है। स्कूल के अलावा आंगनबाड़ी तथा सहकारी समिति भवन भी यही सड़क जाती है।
मेरे पास इस संबंध में आधा दर्जन से ज्यादा अलग अलग लोगों के फोन आ गए। इसके बाद मैंने सरपंच से बात की तो उनका कहना था कि समस्या उनकी जानकारी में है। फिलहाल वो बिजी है। मौके पर जाकर समस्या का समाधान करवा देंगे। उनका यह भी कहना था कि आम रास्ते पर पानी न फैलाने वालों को नोटिस दिए गए थे। स्कूल जाते वक्त एक मैडम फिसल कर गिर भी गई। पुलिस भी मौके पर जाकर आई और कीचड़ करने वालों को पाबंद किया था। खैर, सरंपच का आश्वासन पाकर मैं निश्चिंत हो गया और फोन करने वालों को कह भी दिया कि आप लोग समस्या का समाधान चाहते हैं, वह हो जाएगा। सरपंच ने भरोसा दिया है। इसके बाद कुछ दिन शांति रही। लेकिन फिर से फोन, फोटो व दीवार पर लिखी जानकारी का फोटो आ रहे हैं। मैं समझ चुका था कि समस्या यथावत है अभी समाधान नहीं हुआ। मैं भी चाहता हूं कि यह काम शांतिपूर्वक हो जाए। सिर्फ गांव के ही ग्रुप में यह पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद भी यही है कि मेरी बात सरपंच के पास एक बार फिर से पहुंचे और वो इस काम को प्राथमिकता से करवाएं। उम्मीद है वो इस पर गौर करेंगे।

शहादत व शौर्य की गाथा सुनाता है मंदिर

दो सौ ज्यादा शहीदों की समाधि है दर्शनीय स्थल 
श्रीगंगानगर. यह मंदिर शहादत की कथा सुनाता है। यह मंदिर शौर्य के किस्से बयां करता हैं। यह मंदिर शहीद सैनिकों की शौर्य गाथा का सजीव प्रतीक है। यहां कोई एक-दो नहीं बल्कि दो सौ से ऊपर शहीदों की सामूहिक अन्तेष्टि की गई थी। सन 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान फाजिल्का सेक्टर में सर्वाधिक भयानक लड़ाई हुई थी। इसमें टैंक, तोप व बंदूकों के माध्यम से भारत-पाक सैनिकों के बीच मुकाबला हुआ था। बताते हैं कि तब पाक सेना ने फाजिल्का शहर को हथियाने का निश्चय किया हुआ था। इसके लिए पाक सेना भारतीय क्षेत्र में आगे भी बढ़ गई थी लेकिन भारतीय सेना की जाबांज शूरवीरों ने न केवल पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे धकेला अपितु स्वयं एक अभेद्य चट्टान की भांति डटे रहकर दुश्मन के दांत खट्टे किए थे। इस आमने-सामने की लड़ाई में इस जगह पर 225 वीर सैनिक शहीद हुए थे। इनमें चार जाट रेजीमेंट, आसाम रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट, बीएसएफ, होमगार्ड के जवान शामिल थे। इस दौरान 450 सैनिक गंभीर रूप से घायल हुए इनमें से कुछ सैनिक स्थायी रूप से अपंग हो गए।
17 दिसंबर 1971 को युद्ध विराम के बाद फाजिल्का सेक्टर में प्राणोत्सर्ग करने वाले बहादुर सैनिकों का प्रमुख नागरिकों और ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से अंतिम संस्कार किया था। सामूहिक अंतिम संस्कार के लिए 90 फीट लंबी तथा 55 फीट चौड़ी चिता तैयार की गई थी। सर्वधर्म सभा के माध्यम से दिवंगत सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मुख्य समाधि के गर्भ गृह में इन शहीदों की पावन अस्थियों के अंशों का समावेश किया किया। फाजिल्का क्षेत्र के लोगों ने इन शहीद सैनिकों को फाजिल्का के रक्षक के रूप में मान्यता दी है। शहीदों के संस्कार के बाद अल्प समय में ही एक स्मारक का निर्माण किया है जो अब बेहद बड़ा स्वरूप ले चुका है। भारत-पाक सीमा पर सादगी पोस्ट पर पर रिट्रीट सेरेमनी देखने जाने वाले इस शौर्य मंदिर को देखने जरूर आते हैं तथा वीर सैनिकों की शहादत को याद करके शीश नवाते हैं।

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 पत्रिका डॉट कॉम पर 28 फरवरी 18 को प्रकाशित 

यहां शहीद सैनिकों की आत्माएं करती हैं हिफाजत

तीर्थ स्थल से कम नहीं है आसफवाला का शौर्य मंदिर

श्रीगंगानगर. यह न तो मंदिर है और न ही कोई मस्जिद। यह गुरुद्वारा, चर्च या कोई धार्मिक स्थान भी नहीं हैं। इसके बावजूद यह पूजा, अर्चना व श्रद्धा का स्थान है। यह एक स्मारक है और इसको तीर्थ स्थल के रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर शौर्य का मंदिर है। पड़ोसी प्रदेश पंजाब के फाजिल्का जिले से मात्र सात किलोमीटर की दूरी पर है यह शौर्य मंदिर स्थित है। जगह का नाम है आसफवाला। भारत-पाकिस्तान बॉर्डर इस शौर्य मंदिर से महज चार किलोमीटर की दूरी पर है। सन 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों की अस्थियां इस शौर्य मंदिर में बने समाधि स्थल के गर्भगृह में रखी हैं। इस समाधि पर लोग श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं तथा दीपक प्रज्वलित करते हैं। इस शौर्य मंदिर के साथ किवदंतियां व विश्वास जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि शौर्य मंदिर के गर्भ गृह में शहीद सैनिकों की आत्माएं निवास करती हैं, जो फाजिल्का क्षेत्र को प्रत्येक प्रकोप से बचाए हुए हैं। क्षेत्रवासियों का विश्वास है फाजिल्का शहर को सितम्बर 1988 की भीषण बाढ़ से शहीद सैनिकों की आत्माओं ने ही बचाया था। इस बाढ़ से दर्जनों सीमावर्ती गांव पूरी तरह बह गए थे। बाढ़ का पानी आसफवाला गांव के बाद फाजिल्का की तरफ बढ़ रहा था। आसफवाला का स्मारक भी घुटनों तक पानी में डूब गया लेकिन इसके बाद आश्चर्यजनक रूप से पानी का स्तर गिरना शुरू हो गया। इसके बाद क्षेत्रवासियों का इस शौर्य मंदिर के प्रति विश्वास और भी बढ़ गया। इसी शौर्य मंदिर के साथ दूसरी किवदंती यह भी जुड़ी है कि यहां सच्चे मन से श्रद्धा अर्पित करने वालों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। स्मारक को क्षेत्रवासी बेहद पवित्र मानते हैं। मान्यता यह भी है कि यहां शीश झुकाने वाला व्यक्ति जीवन की ऊंचाइयों को छूता है तथा समृद्धि को प्राप्त करता है। क्षेत्रवासियों की मानें तो इस प्रकार के कई उदाहरण हैं जो इन मान्यताओं की पुष्टि करते हैं।
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 पत्रिका डॉट कॉम पर 27 फरवरी 18 को प्रकाशित 

कारण खोजने होंगे

 टिप्पणी
श्रीगंगानगर के जवाहरनगर थाने में तोडफ़ोड़ और पथराव करना निसंदेह दुर्भाग्यजनक है, लेकिन जिस अंदाज में यह समूचा घटनाक्रम हुआ, इससे जाहिर होता है कि यह सब कुछ आक्रोश का प्रतिफल था। युवक की गुमशुदगी और पुलिस की भूमिका से तो लोग पहले ही गुस्सा थे। सोमवार को गुमशुदा युवक का शव मिलने के बाद आक्रोश और भड़क उठा। अब बात क्या हुआ, कैसे हुआ की बजाय यह सब क्यों हुआ पर होनी चाहिए। जो हुआ उसे तो समूचे शहर ने देख ही लिया। लेकिन यह हुआ क्यों? यह सवाल सभी के मन में है। इस सवाल के कारण खोजने होंगे। इस तरह का आक्रोश एक दिन में या यकायक तो पैदा हो नहीं सकता। वैसे भी शहर का जवाहरनगर थाना शेष अन्य थानों की बजाय ज्यादा चर्चा में रहता है। इससे भी बड़ी बात यह है कि आक्रोश पुलिस की बजाय थानाधिकारी के प्रति ज्यादा नजर आया। उनकी कार्यशैली पर लोग सवाल उठा रहे हैं। घटनाक्रम के बाद जिस तरह के आरोप लगाए गए हैं, वे बेहद गंभीर हैं। मसलन, जवाहरनगर थाना क्षेत्र में जुआ, सट्टा, वेश्यावृत्ति का धंधा कथित रूप से पुलिस संरक्षण में संचालित हो रहा है। आरोप तो यहां तक लगा दिए गए हैं कि जवाहरनगर थाने पर उच्च अधिकारियों का नियंत्रण ही नहीं है। आम आदमी की शिकायतों को अनसुना कर दिया जाता है। थानाधिकारी पर इस तरह के आरोपों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। फिर भी यह संभव नहीं है कि यह सब आरोप आज ही लगे? तथा यह सब तात्कालिक आक्रोश का ही नतीजा है।
बहरहाल, इस तोडफ़ोड़ के बाद पुलिस वह सब करेगी जो कानून के दायरे में आता है। तोडफ़ोड़ करने वालों पर मुकदमे दर्ज हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। पीडि़त परिवार को उचित जांच का आश्वासन भी मिलेगा। इसके अलावा आक्रोशित लोगों के समझाने के लिए कई तरह के प्रयास भी होंगे। यह भी हो सकता है कि आक्रोश शांत करने के लिए थानाधिकारी का स्थानांतरण भी कर दिया जाए, हालांकि उनको हटाने की मांग भी की जा रही है। और जब पुलिस इतना कुछ करेगी ही तो फिर इस समूचे घटनाक्रम के कारण भी तलाश लेने चाहिए। थानाधिकारी पर जितने भी आरोप हैं, उन सबकी ईमानदारी के साथ जांच हो। ऐसा न हो मामला शांत होने के साथ ही आरोप केवल आरोप ही रह जाएं या उनको अनसुना कर दिया जाए। समय रहते अगर कारण नहीं खोजे गए तो फिर कोई पीडि़त कानून हाथ में लेने को मजबूर हो जाएगा।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 27 फरवरी 18 के अंक में.प्रकाशित

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना...
निदा फाजली का यह चर्चित शेर मुझे आज मौजूं लग रहा है। विशेषकर उनके लिए जो कल एक सिने अदाकारा की मौत पर भावुक हो रहे थे। व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम की डिपी में उस दिवंगत अदाकारा की फोटो लगा रहे थे। कल और आज में जिस तरह से मौत के कारण बदले हैं, उसी अंदाज में श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के काम को भी कुछ विराम लगा है। वैसे किसी शख्यिसत का प्रशंसक होना बुरा नहीं होता। होना भी चाहिए लेकिन अंध प्रशंसक तो कभी भी नहीं होना चाहिए। वह भी तब जब किसी को हम पूरी तरह से जानते ही न हो। सिर्फ पर्दे की भूमिकाओं से हम किसी के संपूर्ण व्यक्तित्व का आकलन नहीं कर सकते। पर्दे की दुनिया और हकीकत की दुनिया में बहुत अंतर है। रूपहली दुनिया इस तरह के उदाहरणों से भरी पड़ी है। पर्दे पर दर्शकों की गालियां खाने वाले कई विलेन निजी जीवन में इतने सीधे होते हैं कि जानकर या पढ़कर आश्चर्य होता है। वैसे बचपन की सीख यहां भी प्रासंगिक लगती है। यही कि घृणा पाप से करो पापी से नहीं। वैसे ही प्रेम अभिनय से करो। अभिनेता या अभिनेत्री से नहीं। खैर, यह पसंद का मामला है। और पसंद हमेशा दिल से जुड़ी होती है। हो सकता है मेरी बात किसी को जमे, किसी को न जमे। किसी को नागवार गुजरे।

झुंझुनूं आने और फिर न जीतने का जुमला

बस यूं ही
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 8 मार्च को झुंझुनूं आने का कार्यक्रम प्रस्तावित है। बताया जा रहा है प्रधानमंत्री महिला दिवस के उपलक्ष्य में बेटी बचाओ, बेटी अभियान का संदेश देंगे। प्रधानमंत्री के झुंझुनूं आगमन की खबर के साथ इन दिनों एक बात की खासी चर्चा है। यह चर्चा सोशल मीडिया और कुछ स्थानीय समाचार पत्रों में भी आ चुकी है। चर्चा इस बात की है कि प्रधानमंत्री रहते जो भी नेता झुंझुनूं या जिले में आया वह फिर दुबारा प्रधानमंत्री नहीं बना। इसके समर्थन में कई उदाहरण भी बताए जा रहे हैं। इस सूची में कांग्रेस, भाजपा व जनता दल के प्रधानमंत्रियों के नाम भी गिनाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री रहते इंदिरा गांधी, राजीव गांधी अटलबिहारी वाजपेयी, एचडी देवगौड़ा के नाम बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है यह लोग प्रधानमंत्री रहते झुंझुनूं आए लेकिन इसके बाद दुबारा प्रधानमंत्री नहीं बने। अब नरेन्द्र मोदी का दौरा प्रस्तावित है तो इस बात ने फिर जोर पकड़ लिया है कि क्या मोदी भी न जीतने वालों की श्रेणी में शामिल होंगे या जीतकर इतिहास बनाएंगे। हालांकि हार जीत अभी दूर की कौड़ी है। ऊंट किस करवट बैठेगा अभी तय नहीं है लेकिन चौपाल व नुक्कड़ों पर बैठने वाले लोगों को जाने-अनजाने में एक चर्चा जरूर मिल गई है। यह चर्चा एक तरह की जिज्ञासा भी है, जिसका पटाक्षेप तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही हो पाएगा।
काबिलेगौर है प्रधानमंत्री ने 22 जनवरी 2015 को हरियाणा के पानीपत में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान का शुभारंभ किया था। इसके बाद 24 जनवरी को 2015 झुंझुनूं के शहीद पीरूसिंह स्कूल में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान पर कार्यक्रम हुआ था। जिसमें एक हजार से अधिक बेटियों का सम्मान किया गया था। इसी कार्यक्रम को लेकर 24 जनवरी 2017 को दिल्ली में झुंझुनूं जिले का सम्मान भी हुआ। झुंझुनूं में हुए कार्य की मोदी मन की बात में चर्चा कर चुके हैं। इसके अलावा टविटर पर भी इस अभियान की सराहना कर चुके हैं। इसीलिए माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री आठ मार्च को महिला दिवस पर झुंझुनूं आएंगे और अभियान के तहत काम का संदेश समूचे देश को दे सकते हैं, हालांकि उनका इसी तरह का दौरान 22 जनवरी को प्रस्तावित था लेकिन वह किन्ही कारणों के चलते निरस्त हो गया।
बहरहाल, कई तरह के कयासों का दौर जारी है। अंधविश्वास व टोने टोटकों में विश्वास करने वाले प्रधानमंत्री के दौरे के टलने की मन ही मन दुआ करें तो कोई बड़ी बात नहीं है। फिलहाल पहली बात तो यही देखने की है कि प्रधानमंत्री का दौरा बनता है या टलता है।

शिक्षित युवाओं की अनूठी पहल, खुद पढ़ेंगे भी और पढ़ाएंगे भी

अच्छी खबर
श्रीगंगानगर। कहा जाता है और माना भी जाता है कि देश का भविष्य युवाआें पर निर्भर होता है। अगर युवाओं की सोच सकारात्मक है तो निंसदेह देश प्रगति की राह पर अग्रसर होगा। कुछ इसी तरह की सकारात्मक सोच झुंझुनूं जिले की चिड़ावा पंचायत समिति की ग्राम पंचायत केहरपुरा कलां के युवाओं की है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए गांव के आधा दर्जन युवाओं ने एक अनूठी शुरुआत की है। वे न केवल खुद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करेंगे बल्कि गांव के जरूरमंद युवाओं को भी निशुल्क पढ़ाएंगे। फिलहाल यह व्यवस्था अध्यापक और पुलिस भर्ती की लिखित परीक्षा के लिए है। इन युवाओं ने तैयारी के लिए एक शेड्यूल भी बनाया है जो कि कालांश की तरह है। मतलब कुल तीन घंटे की कक्षा में। इनमें छह पीरियड होंगे, जिसके तहत हिन्दी, भूगोल, इतिहास, कला-संस्कृति, राजनीतिक विज्ञान तथा रिजनिंग का अध्ययन और अध्यापन होगा। एक कालांश साप्ताहिक होगा जो समसामयिक विषयों पर होगा। खास बात यह है कि सात युवकों के इस समूह में सारे ही उच्च शिक्षित है। इनमें चार तो एमए, बीएड व नेट हैं जबकि तीन एमए बीएड हैं। अनूठी कक्षा का यह बैच पांच रोज पूर्व 21 फरवरी से शुरू हो चुका है। युवाओं के इस काम की समूचे गांव में सराहना हो रही है।
ये हैं टीम में
सात युवकों की टीम में श्रीराम पाटिल, जितेन्द्र काला, ईश्वरसिंह शेखावत, सुनील लोहिया, मुकेश झाझडि़या, श्रीकांत लोहिया व मुकेश राठी शामिल हैं।

चमत्कार की उम्मीद

बताया जाता है कि श्रीगंगानगर पेरिस शहर के नक्शे पर बसा है। लोकतंत्र के रहनुमाओं की अदूरदर्शिता व अकर्मण्यता के चलते यह खूबसूरत बसावट वाला शहर गंदानगर हो चला है। योजनाएं बनती हैं, लेकिन उनमें जनहित गौण रहता है..। शिव चौक से जिला अस्पताल तक डेढ किमी सड़क का होने वाला कथित कायाकल्प भी कुछ ऐसी ही कहानी कहता है। इसी विषय पर केन्द्रित है मेरी यह जो  लगी है। 
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टिप्पणी 
शिव चौक से जिला अस्पताल तक 160 लाख रुपए की लागत से सर्विस रोड बनेगी। इस दिशा में बुधवार को काम शुरू हो गया। बताया जा रहा है रविवार को इस काम का विधिवत उदघाटन भी होगा। इस सर्विस रोड को लेकर बहुत कुछ बताया जा रहा है, मसलन, चंडीगढ-जयपुर की तर्ज पर बनेंगे डिवाइडर। फुटपाथ व हरियाली की व्यवस्था होगी, अत्याधुनिक स्ट्रीट लाइट लगेंगी। पैदल चलने वालों के लिए डिवाइडर ट्रेक, पशुओं को रोकने के लिए जाली, छोटे-बड़े वाहनों के लिए अलग-अलग लेने होंगी। डिवाइडर पर रैलिंग लगेगी। खाली जगह पर खास की तरह की घास लगाई जाएगी। फूलों के पौधे लगाए जाएंगे। साथ में ट्री गार्ड पर हरियाली व स्वच्छता से संबंधित स्लोगन लिखे जाएंगे। इनमें अधिकतर काम तीन माह में पूरा हो जाएगा। कल्पना कीजिए, तीन माह बाद शिव चौक से जिला अस्पताल तक सड़क जयपुर या चंडीगढ़ जैसा नजारा देगी। एक-डेढ़ किलोमीटर के इस टुकड़े से गुजरते वक्त एक अलग तरह का अहसास होगा। 
सच में ऐसा हो जाएगा और इसका नियमित रूप से रखरखाव होगा, इसमें संशय है। यूआईटी प्रशासन की मौजूदा कार्यशैली से तो कतई लगता नहीं है कि यह कल्पना इस रूप में साकार भी होगी। वर्तमान में शिव चौक से जिला अस्पताल सड़क के दोनों तरफ अतिक्रमण हैं। खुलेआम सड़कों पर व्यापार हो रहा है। रेते, ग्रिट के ढेर, बजरी से भरे ट्रक व टै्रक्टर से यहां दिन भर जाम की स्थिति रहती है। रोड लाइट नियमित रूप से नहीं जलती हैं। आवारा पशुओं को यहां वहां स्वच्छंद विचरण करते देखा जा सकता है। बरसाती पानी निकासी के नाले की सफाई भी तभी होती है, जब यह जाम हो जाता है। यह नाला भी एक तरफ ही है। इसी रोड पर स्थित दो होटलों के सामने तो सड़क इतनी नीची है कि बरसात के दिनों में डेढ़-डेढ़ फीट पानी भर जाता है। इस मार्ग पर सर्वाधिक धूल उड़ती है। 
क्या सर्विस रोड़ बनने से इतनी सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा? इस बात का यकीन कैसे किया जाए कि जिस यूआईटी प्रशासन ने आज अतिक्रमण करने वालों को अभयदान दे रखा है, वह कल उनके खिलाफ कार्रवाई करेगा? इतना ही नहीं, सिर्फ क्या जिला अस्पताल से शिव चौक तक मार्ग का कायाकल्प करने से शहर की छवि सुधर जाएगी? बाइपास से लेकर जिला अस्पताल तक की तस्वीर तो कुछ और ही कहानी बयां करेगी। महज एक -डेढ़ किमी सड़क का कथित कायाकल्प मौजूदा समस्याओं का समाधान किए बिना एक तरह से पैसे की बर्बादी ही है। इस मार्ग पर सबसे पहली जरूरत अतिक्रमण हटाने तथा बीच सड़क पर खुलेआम होने वाले व्यापार पर अंकुश लगाने की है। जो लोग आज जहां जमे हैं वे सड़क बनने के बाद फिर वहीं काबिज होंगे। यूआईटी प्रशासन की भूमिका से लगता नहीं है कि वह इन अतिक्रमियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। यकीन किया भी कैसे जाए , जो यूआईटी प्रशासन शहर को बदरंग करने वालों पर कार्रवाई नहीं करता, जो यूआईटी प्रशासन एक अदना सा होर्डिंग्स नहीं हटा सकता, वह अतिक्रमण करने वालों को खदेड़ देगा, इस पर बात पर फिलहाल तो यकीन नहीं किया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 23 फरवरी 18 के अंक में प्रकाशित 

लीपापोती क्यों?

टिप्पणी
वैसे तो पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना कोई नई बात नहीं है, लेकिन श्रीगंगानगर पुलिस किसी न किसी बहाने चर्चा में रहती ही है। पुलिस पर दबाव या प्रभाव में काम करने के आरोप भी गाहे-बगाहे लगते रहते हैं। हालिया दो मामले ऐसे हैं, जिनको लेकर पुलिस की भूमिका कठघरे में है। पहला मामला सप्ताह भर पहले गांव ९ जैड में हुए सड़क हादसे तथा उस संबंध में हुई गिरफ्तारी का है, जबकि दूसरा बुधवार को युवकों के टंकी पर चढऩे से संबंधित है। टंकी वाले घटनाक्रम में पुलिस व प्रशासन की याचक की सी भूमिका को तो समूचे शहर ने देखा। खैर, तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा होना स्वाभाविक था, लेकिन इसके बाद क्या हुआ? यह दबाव नहीं तो क्या था? या फिर इससे पहले टंकी पर चढऩे वालों पर की गईं तमाम कार्रवाइयां ही गलत थी? या फिर टंकी पर चढऩे पर मुकदमा दर्ज करने के आदेश महज कागजी थे? पुलिस व प्रशासन इस तरह नतमस्तक क्यों हुए? या फिर यह समूचा घटनाक्रम ही प्रायोजित था? कल को कोई भी अपनी छोटी-मोटी बात या मांग को लेकर इस तरह टंकी पर चढ़ गया तो क्या पुलिस प्रशासन उसके साथ भी इसी तरह से पेश आएंगे?
कुछ यही हाल ९ जैड के सड़क हादसे का है। यहां पर भी पुलिस पर प्रभाव में काम करने का आरोप हैं। दुर्घटना के दौरान कार कौन चला रहा था? चालक की पहचान कैसे हुई? सीसीटीवी फुटेज में क्या आया? चालक की पहचान किस तरीके से हुई? जैसे कई सवाल हैं जो अभी अनुत्तरित हैं। पुलिस ने इस मामले का खुलकर खुलासा भी नहीं किया। हादसे के आरोप में चालक की गिरफ्तारी से लेकर जमानत लेने तक का घटनाक्रम में भी पुलिस की भूमिका एक तरह की औपचारिकता निभाने जैसे ही रही है। छह जनों की मौत की तफ्तीश का अंजाम इस अंदाज में होने के आसार तो पहले दिन से ही लगने लग गए थे। जांच का आगाज ही जब सवालों से घिरा हो तो फिर अंजाम तो घिरना लाजिमी है।

हादसे वाले मामले में तो हैरत की बात यह थी कि कोई बोलने वाला ही नहीं सामने आया। सच है गरीब के लिए बोलने वाला कोई नहीं है। गरीब की जान की कीमत समझने वाला कोई नहीं। चींटी मरने या काटने पर हंगामा करने वाले शहर में छह मौतों पर छाई खामोशी भी बहुत कुछ कहती है। कथित जनसेवक व समाजसेवियों की जुबान भी इस मामले में तालु से चिपक गई। बहरहाल, जागरूक लोगों की चुप्पी तथा पुलिस प्रशासन की मुंह देखकर तिलक लगाने की आदत रही तो तय मानिए हालात और भयावह होंगे। फिर तो किसी गरीब की जान किसी आवारा कुत्ते की मौत से ज्यादा नहीं होगी। सच में जागरुक लोगों का संवेदनहीन होना बेहद चिंताजनक है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 16 फरवरी 18 के अंक में प्रकाशित।

गुरुजी चले गए

स्मृति शेष
मेरे स्कूली जीवन के पहले गुरु श्री रामजीलाल जी नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद दो रोज पूर्व मंगलवार को उनका निधन हो गया। गांव के ही राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में पहली व दूसरी क्लास में वो मेरे कक्षा अध्यापक रहे। छात्रों के प्रति उनका लगाव, जुड़ाव व प्रभाव साफ तौर पर देखा जा सकता था। मैंने उनको कड़क मास्टर के रूप में कभी नहीं देखा। मैंने उनके हाथ में डंडा जरूर देखा लेकिन इसका उपयोग उन्होंने शायद ही कभी किया हो। वो गुरु होने के साथ-साथ अभिभावक भी थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वो विद्यार्थियों के अभिभावकों के सतत संपर्क में रहते थे तथा उनसे फीडबैक लेने व देने का काम बखूबी करते थे। कोई विद्यार्थी अगर पढ़ाई में ध्यान नहीं देता था गुरुजी चलकर उसके घर जाते थे और अभिभावकों को उलाहना देकर आते थे। आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मैं दूसरे स्कूल में चला गया लेकिन गुरुजी से मेरा संपर्क बना रहा। मुझे याद है गुरुजी कई बार कुर्सी पर बैठे-बैठे ही झपकी ले लेते थे। यह काम वो इतना बखूबी करते थे हमको कानोंकान खबर तक नहीं होती। स्कूल में तब रामजीलाल जी व गुमानसिंह जी मास्टरजी की जोड़ी खासी चर्चित थी। इन दोनों गुरुओं को मैंने स्कूल में खाली वक्त के दौरान तथा स्कूल से बाहर भी अक्सर साथ-साथ ही देखा। खैर, उनका नश्वर शरीर इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनसे शिक्षित-दीक्षित उनके शिष्य देश व प्रदेश के विभिन्न कोनों में किसी न किसी क्षेत्र में परचम फहरा रहे हैं। एक अध्यापक के लिए यही तो जमा पूंजी होती है। गुरुजी को मेरा प्रणाम। भगवान उनको अपने श्री चरणों में स्थान दे तथा परिजनों व हम सब शिष्यों को यह अपार दुख सहन करने का संबल प्रदान करे।

अतीत जिंदा हो गया...

बस यूं ही
शादी समारोह में शामिल होने का सबसे बड़ा फायदा मेरी नजर में जो है वह यह है कि आपको एक साथ कई परिचित मिल जाते हैं। सामान्य दिनों में जाओ तो इतने मित्र एक साथ मिलना संभव नहीं हो पाता। परिचितों व दोस्तों से मुलाकात न केवल अतीत की यादें जिंदा कर देती हैं बल्कि सफर की थकान को भी भुला देती हैं। अति व्यस्त शेड्यूल होने के बावजूद मैं परिचित या दोस्तों के यहां होने वाले शादी समारोह में शिरकत करने को हमेशा उत्सुक रहता हूं। 17 फरवरी को दोपहर दो बजे शुरू हुआ सफर आज शाम पांच बजे पूर्ण हुआ। पहले दिन करीब 260 किलोमीटर की यात्रा कर श्रीगंगानगर से बीकानेर पहुंचा। रात्रि विश्राम बीकानेर में करने के बाद 18 फरवरी को अगला पड़ाव बगड़ था। यह भी 250 किलोमीटर की यात्रा हो गई। रात्रि विश्राम कालीपहाड़ी में करने के बाद फिर श्रीगंगानगर वापसी के लिए यात्रा। यह भी करीब 350 किलोमीटर का सफर है। इस तरह तीन दिन में 860 किलोमीटर की यात्रा कर ली। इस यात्रा के साथ बीकानेर व बगड़ में शादियों में भी शामिल हुआ। इससे भी बड़ी बात तो आत्मिक लगाव वालों से आत्मिक मुलाकातें रही। बीकानेर में श्री राजेन्द्र जी भार्गव की बिटिया की शादी में जब भार्गव जी से मुलाकात हुई तो उनकी चेहरे की खुशी से जाहिर हो रहा था कि मेरे शादी में जाने से वो बेहद प्रफुल्लित थे। अपने रिश्तेदारों से परिचय कराते हुए उन्होंने कह भी दिया कि यह होता है आना। यह हुई ना कोई बात। सच में बहुत खुश नजर आए वो।
इससे कहीं अधिक खुशी तो बगड़ में मिली। कॉलेज लाइफ में साथी रहे हिम्मतसिंह जी की बिटिया की शादी में हर दूसरा चेहरा जाना-पहचाना लगा। मुद्दतों बाद इतने लोगों से मुलाकात हुई। समय कम पड़ रहा था लेकिन परिचितों की सूची और मुलाकात के दौर का कोई छोर नहीं था। यहां हाथ मिलाने वाली औपचारिकता नहीं थी, बल्कि दोस्तों से गले मिलने वक्त वही कॉलेज टाइम वाली फीलिंग हो रही थी। सोते-सोते रात का एक बज चुका था लेकिन हथाई/ मुलाकातों का दौर थमा नहीं था। किसी से कॉलेज के समय की बातें तो किसी से क्रिकेट के किस्से। किसी से झुंझुनूं कार्यकाल का जिक्र तो किसी से कुछ। कॉलेज व क्रिकेट के समय युवा दिखाने वाले चेहरों पर अब झुर्रियां थी तो उस दौर के बच्चे नवयुवक बन चुके हैं। 18 से 24 साल पहले का दौर/ मजाक/ किस्से अब फिर ताजा हो गए। बगड़ तो वैसे भी गांव के जैसा ही है। आठ नौ साल तो लगातार बगड़ को दिए हैं। पढ़ाई व क्रिकेट के नाम रहा था यह समय। बाद में झुंझुनूं में पत्रकारिता के दौरान भी कई बार बगड़ आया। वैसे जिला मुख्यालय से गांव को जोडने वाला रास्ता भी बगड़ से होकर ही गुजरता है, इसलिए बगड़ आगमन होना तय ही है। सच में यह लगाव, यह स्नेह ही तो सभी को जोड़े रखता है। यह साथ इसी तरह से कायम रहे। आमीन।

इक बंजारा गाए-20


गरीब की जोरू
एक कहावत है गरीब की जोरू, सबकी भौजाई। इस कहावत का आशय है कि कमजोर आदमी से कोई डरता नहीं है। अपने यहां यह कहावत नगर विकास न्यास व नगर परिषद पर एकदम सटीक बैठती है। शहर में अवैध होर्डिंस लगाने वाले के प्रति यूआईटी व परिषद की भूमिका गरीब की जोरू जैसी है। यह विभाग न तो होर्डिंग्स हटाते हैं और न ही लगाने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई करते हैं। शहर में चौक चौराहों पर होर्डिंग्स टांगने का शगल ऐसा है कि हर कोई ऐरा-गैरा-नत्थू खैरा जहां मर्जी को वहां होर्डिंग्स टांग देता हैं। अब यह तो यूआईटी व परिषद के अधिकारियों को तय करना है कि वे इसी तरह की छवि को बरकरार रखना चाहते हैं या फिर कोई कारगर कार्रवाई कर पहल करेंगे?
वाह री पुलिस
खाकी चाहे तो क्या नहीं हो सकता। अपराधियों की धरपकड़ के लिए परिजनों को उठाने का तरीका तो काफी समय से प्रचलन से है। इधर परिजन को हिरासत में लिया और उधर आरोपित सरेंडर कर देता है। लेकिन कई बार खाकी मुंह देखकर टीका निकालने लग जाती है तो खुद ही सवालों के घेरे में आ जाती है। अब एक कार की टक्कर से छह जनों की मौत के बाद भी आरोपित पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। जब खाकी को कार के मालिक का पता है तो गिरफ्तारी में इतनी ढील की कुछ तो वजह है। प्रशासन ने तो पीडि़त परिवारों को पचास-पचास हजार दे दिए हैं लेकिन पुलिस अभी तक यह कहने की स्थिति में नहीं है कि कार चला कौन रहा था? कार में कितने लोग सवार थे? थानाधिकारी का बिना नाम पते जल्द गिरफ्तारी का कहना तो और भी बचकाना बयान है।
इतिहास बनेगा या दोहराया जाएगा!
श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज को लेकर और कुछ हो या न हो लेकिन राजनीति जमकर हो रही है। और इस राजनीति में जनता चक्करघिन्नी बनी है। वह तय नहीं कर पा रही है कि किसकी बात पर यकीन किया जाए। कौन सच्चा है और कौन सियासी चालें चल रहा है। खास बात तो यह है कि इस मामले में हर पक्ष के पास अपनी-अपनी दलीलें हैं। और सब यह साबित करना चाहते हैं कि उनके स्तर पर कोई गड़बड़ नहीं है। सोचा जा सकता है जब गड़बड़ ही नहीं है तो फिर काम क्यों रुका हुआ है। जैसे जैसे चुनाव व एमओयू की तिथि नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे सभी के सुर बदले-बदले नजर आ रहे हैं। कल सुबह मंत्री जी कुछ बोले और शाम होते-होते धरातल पर कुछ और दिखाया दिया। इस समूचे घटनाक्रम से यह तो साबित हो रहा है कि कुछ तो है? भले ही सकारात्मक हो या नकारात्मक। आज शाम को जयपुर से खबर आ गई कि मेडिकल कॉलेज बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अब सरकार और दानदाता दोनों ही एकमत हैं लेकिन चुनावी साल में मेडिकल कॉलेज बनकर इतिहास बनाएगा या पिछले चार साल के इतिहास को दोहराएगा, यह समय ही बताएगा!
पांच सौ में प्रचार
चुनाव नजदीक आने के साथ कई मौसमी नेता भी पैदा हो जाते हैं और इसी के साथ शुरू हो जाता है प्रचार-प्रसार का काम। भले ही चुनावी वैतरणी पार लगे या न लगे, यह अलग बात है परंतु नाम चर्चा में जरूर आ जाता है। यह एक तरह से होर्डिंग्स का तोड़ है। इसमें किसी तरह की कार्रवाई का खतरा भी नहीं है। श्रीगंगानगर में अपना पद व कद बड़ा करने के लिए प्रयासरत नेताजी इन दिनों इसी तरह के प्रचार को प्रमुखता दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह गाड़ी के पीछे नेताजी का नाम लिखने पर एक माह के पांच सौ रुपए मिल रहे हैं। पांच सौ में प्रचार के इस तरीके को कई लोग अपना रहे हैं। इस प्रचार में कार वालों को फायदा है। एक तो पैसे मिल रहे हैं। दूसरा फायदा यह है कि नेताजी का नाम लिखा देखकर पुलिस/ प्रशासन संबंधी कार्रवाई का भय भी खत्म हो जाता है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 15 फरवरी 18 के अंक में प्रकाशित।