Wednesday, December 28, 2016

कडवा घूंट -4


फोटो सेशन
पिछले दिनों बीकानेर में हुई ओलावृष्टि को भला अभी तक कौन भुला पाया है। विशेषकर वे किसान जिन्होंने परिश्रम से पसीना बहाकर से यह फसल तैयार की थी। उनकी तो साल भर की कमाई आंखों के सामने देखते-देखते खराब हो गई। ओलावृष्टि के बाद सर्वे आदि का काम भले ही समान रूप से सब जगह एक साथ शुरू नहीं हुआ लेकिन जनप्रतिनिधि एवं छुटभैये नेताओं में इस तरह की समानता जरूर दिखाई दी। जैसे ही ओलावृष्टि हुई सब के सब नुकसान का जायजा लेने के नाम पर खेतों में पहुंच गए। सभी ने हाथों में नष्ट हुई फसल के टुकड़े लेकर फोटो जरूर खिंचवाए। हावभाव से सभी ने यह साबित करने का प्रयास किया कि वे किसानों के हमदर्द हैं तथा वे किसानों के इस दुख से बेहद दुखी हैं। खैर, किसानों के हितैषी बने जनप्रतिनिधियों के हाव भावों में कितनी सच्चाई है यह तो अलग बात है लेकिन राजनीतिक गलियारों में भी कई तरह की चर्चाएं चटखारे के साथ चल रही हैं। ओलावृष्टि के बाद हुए फोटो सेशन की सब अपने-अपने तरीके से व्याख्या जो कर रहे हैं।
विवादों का साया
परीक्षा चाहे अकादमिक हो या फिर प्रतियोगी। इन पर आजकल किसी न किसी तरह का लफड़ा़ कहीं न कहीं चस्पा जरूर हो ही जाता है। हाल ही में हुई वन विभाग की भर्ती भी इससे अछूती नहीं बची है। इस परीक्षा पर भी विवादों का साया मंडरा रहा है। विशेषकर बीकानेर के विभिन्न हिस्सों में हुई परीक्षा पर भी सवाल निशान उठने शुरू हो गए हैं। जिस तरह कोटा एवं उदयपुर में अपनों को रेवडिय़ा बांटने की बातें सामने आई हैं। इसी बात की पड़ताल में बीकानेर में विभाग के एक पूर्व रेंजर भी जुटे हुए हैं। उनका आरोप हैं कि बीकानेर में भी कोटा एवं उदयपुर की तरह अपनों की उपकृत करने में गुरेज नहीं किया है। विभाग की कार्यप्रणाली से यह पूर्व रेंजर बेहद खफा हैं लेकिन उसका आत्मविश्वास गजब का है। अधिकारियों/कर्मचारियों में किसका कौन रिश्तेदार परीक्षा में बैठा इस बात के पुख्ता सबूत के लिए वे सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांग रहे हैं लेकिन विभाग गंभीरता से नहीं ले रहा है। कहीं यह लेटलतीफी किसी गड़बड़ की तरफ इशारा तो नहीं कर रहीं?
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया
आ मदनी अठनी खर्चा रुपया वाली कहावत तो कई बार कही एवं सुनी जा चुकी है। इस बार यह कहावत बीकानेर सहकारी उपभोक्ता होलसेल भंडार पर चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। हाल में भंडार को लेकर कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप सामने आए। इस तरह का काम करने वाले कोई बाहर के लोग नहीं थे। इतना ही नहीं आरोप-प्रत्यारोपों व भंडार सदस्यों एवं पदाधिकारियों के इस तरह के तेवरों के हालात सामान्य व सहज दिखाई नहीं देते। बताया जा रहा है कि भंडार की तरफ से शहर में महिला मिनी मार्केट में सौन्दर्य प्रसाधनों से संंबंधित दुकान खोली गई। दुकान के लिए बाकायदा एक महिला को भी रखा बताया। माह के अंत में जब हिसाब किया गया तो स्थिति जितने के ढोल नहीं थे उतने के मंजीरे फूटने वाली हो गई। चर्चाओं में कितना दम है। उसमेंसच व झूठ का कितना कितना समावेश है यह तो आरोप-प्रत्यारोप करने वाले ही बेहतर जानते हैं लेकिन इतना जरूर है कि इस शोर-शराबे के बीच कुछ तो है, जो इस रूप में बाहर आ रहा है।
फिर भी जाना पड़ा
भ्रष्टाचार के विरोध में कुछ अधिकारी ऐसे भी होते हैं जो अंदर ही अंदर बिलकुल बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपना मिशन जारी रखते हैं लेकिन भ्रष्टाचार करने वालों को भला इस तरह की मुहिम कहां रास आती है, लिहाजा अंदरााने एक तरह का शीत युद्ध जारी रहता है। युद्ध की जानकारी बाहर तभी आती है, जब बात काफी आगे बढ़ जाती है। ऐसा ही कुछ यूआईटी के एक अधिकारी के साथ हुआ। उन्होंने अपने ब्लॉग में साफ-साफ लिखा है कि कार्यकाल के दौरान उनके काम के तरीके से स्टाफ के सदस्य तो खफा हुए ही, सबसे ज्यादा तकलीफ तो प्रभावशाली लोगों को हुई। अधिकारी ने बेबाकी से लिखा है कि उनको इस बात को लेकर धमकियां भी मिली लेकिन उन्होंने अपना काम जारी रखा तथा लोकायुक्त को शिकायत भी भेजी। खैर, ब्लॉग में अधिकारी ने अतिरिक्त पद छोडऩे की जानकारी देते हुए अपना मूल पद संभालने के बात कही है। एेसे में सवाल उठना लाजिमी है कि अधिकारी ने अपनी मर्जी यह पद छोड़ा या फिर उनको यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया गया।
बातूनी
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 20 मार्च 16 के अंक में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम ....

कडवा घूंट -3


औचित्य पर सवाल
कु छ गड़बड़ तो है वरना न तो चर्चा होती और न ही इस तरह का िवरोधाभास सामने आता। शुक्रवार को जिला परिषद में हुई गोष्ठी में घटते लिंगानुपात पर चिंता जताई गई। बताया गया कि जिले में बाल लिंगानुपात अप्रत्याशित रूप से कम हुआ है और हो रहा है। यह कम कैसे हो रहा है यह जांच का विषय है, क्योंकि जिले में प्रसव पूर्व जांच के मामले तो सामने आने लगभग बंद ही हो गए हैं। न इस तरह का काम करने वाले किसी सेंटर पर कार्रवाई की कोई खबर आई। मामले बंद होने तथा कार्रवाई होने का मतलब तो यही निकलता है कि सब ठीक है। अगर सच में ऐसा है तो फिर इसके लिए गठित सेल का औचित्य ही क्या रह जाता है। वैसे लिंगानुपात घटना और किसी तरह की गड़बड़ सामने ना आना ही अपने आप में काफी कुछ कहता है। साथ ही लिंगानुपात में गिरावट की खबरों से सरकारी आंकड़ों के दावों की पोल भी खुल रही है। 
यह बेचैनी क्यों? 
पु लिस के नाम से तो अक्सर कइयों को डरते देखा है लेकिन इन दिनों खाखी के एक अधिकारी की बेचैनी बढऩे की बातें सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि बेचैनी दूर करने के लिए यह पुलिस अधिकारी खबरनवीसों को फोन कर रहे हैं और मैसेज के माध्यम से भी पूछ रहे हैं। दरअसल, हडकंप की वजह सोशल मीडिया में चल रही है जोरदार चचार्एं है। चर्चाएं तरह तरह की है। एक चर्चा तो पुलिस अधिकारी की कथित अंतरंग वीडियो क्लिप किसी खबरनवीस के पास होने की है तो दूसरी यह है कि यही पुलिस अधिकारी अपनी किसी महिला मित्र के साथ मेडिकल मैदान में बैठे हुए देखे गए बताए। फिलहाल इस तरह की चर्चाएं जोरों पर हैं और जितने मुंह उतनी बातें हंै। सभी की एकसूत्री जिज्ञासा अधिकारी का नाम जानने की है। खैर, इस मामले में जिस तरह की बेचैनी देखी जा रही है, उससे शक तो होता ही है। वैसे भी आग के बिना भला धुआं उठता ही कहां है। 
प्रशासन की छूट है...
क हावत है कि खूंटा मजबूत हो तो बछड़ा खूब उछल कूद कर सकता है। कुछ ऐसा ही इन दिनों शराब बेचने वालों के साथ हो रहा है। निर्धारित समय के बाद शराब बेचने की शिकायतें तो साल भर से लगातार आती रही लेकिन आबकारी एवं पुलिस दोनों ही विभाग जानबूझकर अनजान बने रहे। अब नए ठेकों की लॉटरी निकलने के साथ ही नई दुकानों की जगह तय हो चुकी हैं। चूंकि नई दुकानों में अभी समय है कि इसलिए पुराने दुकान वाले अब पूरी फॉर्म में हैं। वे न केवल दुकानें देर तक खोल रहे हैं बल्कि निर्धारित दर से ज्यादा कीमत भी वसूल रहे हैं। सुरा प्रेमियों के लिए वाकई यह माह जेबें ढीली करने वाला है। ऐसा हो नहीं सकता है कि विभाग को सुरा प्रेमियों से हो रही लूट का पता नहीं हो। पता होने के बावजूद कार्रवाई न करने को तो लोग प्रशासन की छूट की संज्ञा ही देंगे। 
वाह रे राजनीति
रा जनीति में न तो कोई स्थायी दुश्मन होता है ना ही स्थायी मित्र, अलबत्ता अवसर के हिसाब से फैसले जरूर लिए जाते हैं। अवसर विशेष पर लिए जाने वाले फैसलों में जोड़तोड़ करने से भी गुरेज नहीं किया जाता। हाल ही में रेल समितियों के सदस्य बनाने के मामले को भी इसी से जोडक़र देखा जा रहा है। समिति में कुछ नाम तो चौंकाने वाले थे। मतलब नेपथ्य में चल रहे कुछ लोगों की लॉटरी लग गई तो कुछ जो हमेशा चर्चा में रहते थे वे ताकते रह गए। बताया जाता है कि यह सब पार्टी को मजबूत करने के लिहाज से किया गया है लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह सब एक पार्टी के बड़े नेता के विरोध के बावजूद किया गया। वैसे भी राजनीति में नफा-नुकसान दोनों का महत्व है लेकिन जब कम नुकसान में बड़ा नफा हो रहा हो तो फिर दांव खेलने में किसी तरह की हिचकिचाहट होती दिखाई नहीं देती है। 
-बातूनी
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 13 मार्च 16 के अंक में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम...

दोहरा चरित्र!

टिप्पणी

राज्य में शिक्षण संस्थानों से सौ मीटर की दूरी पर शराब बेचने पर पूर्णतया रोक के दावे के बाद भी शिक्षा के मंदिर में शराब ठेकेदारों की किस्मत तय करने में गुरेज नहीं करना विडम्बना है। इससे यह तो साफ जाहिर हो ही जाता है कि प्रतिबंध कैसा है। उसकी पालना करवाने में कितनी गंभीरता बरती जाती है। शुक्रवार को बीकानेर के डूंगर कॉलेज में शराब ठेकों की लाटरी निकाली गई। इस दौरान कॉलेज में नियमित कक्षाएं भी लगी। दलील है कि ठेकों की लॉटरी के लिए दिए भवन से अध्ययन-अध्यापन पर असर नहीं पड़ा। और फिर लॉटरी तो शराब की दुकानों की थी, शराब की नहीं। खैर, दलील देने की कोई बड़ी वजह या मजबूरी हो सकती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसे कामों के लिए शिक्षा के मंदिरों का चयन ही क्यों किया जाता है? जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को इससे मुफीद और कोई जगह क्यों नहीं मिलती? क्या ऐसा करना उचित है?
यह सही है कि शराब से मोटा राजस्व मिलता है, लेकिन विद्यार्थियों को नशे से दूर रहने की नसीहत दिए जाने वाले शिक्षण संस्थानों में शराब ठेकों का निर्धारण करना कितना न्यायसंगत है। नशे के दुष्परिणाम बताए जाते हैं। नशा उन्मूलन के लिए जागरुकता विषयक रैलियां निकाली जाती हैं। जहां नशा न करने के संकल्प किए जाते हैं। शपथ ली जाती है। ऐसा विरोधाभास क्या विद्यार्थियों को खटकेगा नहीं? उनको कचोटेगा नहीं? कहने को कुछ विद्यार्थियों ने कॉलेज परिसर में लॉटरी प्रक्रिया का विरोध जरूर जताया है लेकिन यह महज कागजी है। औपचारिक भर है। वह इसलिए है क्योंकि लॉटरी के स्थान की घोषणा दो रोज पहले ही हो चुकी है। वाकई उनको कॉलेज की या उसके माहौल की चिंता होती तो उनका विरोध तो स्थान घोषणा वाले दिन ही हो जाना चाहिए था।
वैसे, यह न केवल जिम्मेदारों बल्कि सरकार की कथनी एवं करनी में भेद उजागर करता है। यह दोहरा चरित्र नहीं है तो और क्या है। लॉटरी का स्थान तय करते समय जिम्मेदारों के जेहन में एक पल के लिए भी यह विचार क्यों नहीं आया कि इससे विद्यार्थियों पर क्या असर पड़ेगा? खैर, इस पहलू को सिरे से नजरअंदाज किया गया तभी तो यह सब हुआ।
बहरहाल, जो होना था वो हो चुका लेकिन भविष्य में ऐसा न हो इस पर सोचने की जरूरत है। कम से कम शिक्षा के मंदिरों को ऐसी लॉटरी से अलग रखना चाहिए। इससे पहले वेटरनरी में यह लॉटरी निकाली जाती रही है लेकिन वहां भी तो शैक्षणिक माहौल ही है। सब चलता रहा। सरकार का काम है तो सरकारी मुलाजिम कैसे विरोध करेंगे, यह बात तो जिम्मेदारों को सोचनी चाहिए। उम्मीद है जिम्मेदार अधिकारियों को इस बात की गंभीरता को समझते हुए भविष्य में लॉटरी के लिए ऐसा स्थान तय करना चाहिए, जिस पर कोई किन्तु-परन्तु ना हो।


राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 12 मार्च 16 के अंक में प्रकाशित..

ख्याल

मेरी 20वीं कहानी

बड़ी हिम्मत जुटाकर तथा किसी की मौत पर बैठने के बहाने से वह मीडिया कार्यालय आई थी। परिधान से वह किसी संभ्रांत परिवार की लग रही थी लेकिन चेहरे के हाव भाव से जाहिर हो रहा था कि किसी न किसी बात को लेकर वह परेशान जरूर है। वह ससुराल पक्ष से परेशान थी, और मदद के लिए कोई रास्ता नहीं सूझा रहा था। किसी ने मीडिया कार्यालय जाने की सलाह दे दी तो चली आई। उसने रोते हुए अपनी बात रखी। इसकी हालत देखकर वहां मौजूद सभी लोगों के मन उसके प्रति सहानुभूति के भाव थे। वह कहने लगी कि बस उसका पति लाइन पर आ जाए। उसका कहा मान ले। पुलिस अगर इस मामले मेंवकार्रवाई करे तो उसके पति को सद्बुद्धि आ सकती है। एक खबरनवीश का दिल पसीजा और उसने तत्काल पुलिस थाने का फोन लगाया और महिला की मदद करने की बात कही। लगे हाथ महिला की बात भी पुलिस अधिकारी से करवा दी। वह बड़ी गंभीरता के साथ सर, सर कहते हुए सवालों के जवाब दे रही थी। आखिर में उसके चेहरे के भाव कुछ बदले। वह बोली, नहीं सर, अभी नहीं आप कार्रवाई दो चार दिन बाद रुक कर करना। अभी मेरी बड़ी सास का निधन हो रखा है। ऐसे माहौल में पुलिस का हस्तक्षेप अच्छा नहीं लगेगा। वहां मौजूद लोग महिला का जवाब सुनकर चौंक गए। सब के मन में सवाल कौंध रहा था कि कैसी महिला है। प्रताडऩा की शिकार है, कार्रवाई भी चाहती है लेकिन परिवार की प्रतिष्ठा का ख्याल भी है। सब सोच में डूबे थे।

धारणा

मेरी 19वीं कहानी

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी की मीडिया के प्रति धारणा देखकर मैं स्तब्ध था। किसी खबर के सिलसिले में उन्होंने मेरे को फोन लगाया था। कहने लगे सेना का कोई अपना घर होता है क्या? वह किसके लिए काम करती है? मुझे सवाल में दम लगा। मैं सुनता रहा वो कहे जा रहे थे। सेना देश के लिए काम करती है, हम जो भी काम करवाते हैं उसमें कहीं न कहीं सुरक्षा का भाव जुड़ा होता है। इसलिए यह सुरक्षा से जुड़ा मसला है, इसमें आप हस्तक्षेप ना करें। मैं चुपचाप सुने जा रहा था। वे आगे बोले, फिलहाल मैं बाहर हूं, लौटूंगा तो आपसे जरूर मिलूंगा। आप कभी आइए मेरे बंगले पर बैठते हैं। चर्चा करते हैं। और हां आपके लिए खाने व पीने का पूरा पूरा प्रबंध रहेगा। खाने-पीने का नाम आते ही मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे कानों में गर्म शीशा डाल दिया है। मैंने उनकी बात बीच में काटते हुए कहा कि मुलाकात जरूर कर लेंगे पर खाने-पीने की चीजों मैं दूर ही रहता हूं। मुझे इनका शौक नहीं है। बात सुनते ही कहने लगा कि अरे, यह भी कोई बात हुई है। बरखा दत को नहीं जानते क्या? मैं चुपचाप सुने जा रहा था, ध्यान अब अफसर की बातों की बजाय सोचने पर ज्यादा था। सेना भी ऐसा ही सोचती है मीडिया के बारे में। आखिर ऐसी धारणा यूं ही तो नहीं बनती। जरूर कुछ न कुछ अनुभव रहा होगा। मैं सेना के अधिकारी की खान-पान की पेशकश की बात से हैरान जरूर था। बार-बार एक ही सवाल दिमाग को मथ रहा था। मीडिया के प्रति यह धारणा बदलेगी या और अधिक पुष्ट होगी?

सवाल

मेरी 18वीं कहानी

उसकी आंखों से टप टप आंसू गिर रहे थे। गला भर्राया हुआ था। गोद का बच्चा भी जोर-जोर से रो रहा था। उसकी अंगुली थामे वह पांच साल की मासूम बेटी जरूर खामोश थी लेकिन उसके चेहरे से बयां हो रहा था कि मां की हालात से वह भी दुखी है। किसी तरह से भावनाओं पर काबू रखते हुए उस महिला ने चुप्पी तोड़ी। मैं बहुत दुखी हूं। मेरा पति व ननदें तंग करती हैं। बात-बात पर घर से निकल जाने की धमकी देते हैं। खाने को राशन भी समय पर नहीं देते हैं। दरअसल, मेरे पति के पड़ोसी महिला से संबंध हैं। वो नौकरीपेशा है और विधवा है। मेरा पति मेरे सामने ही उसको गाड़ी में घूमाने ले जाता है। मैं मना करती हूं लेकिन मेरी बात का कोई असर नहीं है। पत्नी होने के नाते यह सब कैसे बर्दाश्त कर लूं। रोते हुए बच्चे को थपकी से शांत कराने का उपक्रम करते हुए वह लगातार कहे जा रही थी। आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। बीच-बीच में वह उनको पौंछती जा रही थी। अचानक चेहरे पर थोड़ी तल्खी लाते हुए वह फिर बोली, मैने पुलिस थाने में भी शिकायत की है और महिला थाने में भी लेकिन पति ने पैसे खिला दिए। मेरी कहीं सुनवाई नहीं हो रही है। वह फूट-फूटकर रोने लगी। मैं और बाकी साथी यह सब देखकर सन्न थे। खुद को संभालते हुए उसने हमारी तरफ मुखातिब होते हुए सवाल किया, पड़ोसन से पति के संबंध शादी से पहले के ही हैं तो उन्होंने फिर मेरे से शादी ही क्यों की? उस पड़ोसन से ही कर लेते, कम से कम मेरी जिंदगी तो नरक नहीं बनती। हम सब उसके सवाल पर स्तब्ध थे और एक दूसरे को मुंह ताक रहे थे।

लापरवाही का करंट

 टिप्पणी

बीकानेर संभवत: प्रदेश का इकलौता शहर होगा, जहां रखरखाव के नाम पर साल भर शहर के विभिन्न हिस्सों में तीन से चार घंटे तक की विद्युत कटौती की जाती है। सर्दी-गर्मी या बारिश कैसा भी मौसम हो विद्युत निगम का रखरखाव का काम उपभोक्ताओं को होने वाली पीड़ा को दरकिनार कर अनवरत चलता रहता है। इतना कुछ होने के बाद भी सुधार दिखाई नहीं देता है। रखरखाव के नाम पर कटौती का दंश झेलने वाला उपभोक्ता भी आश्वस्त नहीं दिखता है। हालात जस के तस हैं। मौसम में हल्का सा परिवर्तन होने पर ही उपभोक्ता बिजली गुल होने की आशंका में सहम जाते हैं। उनकी यह आशंका सही भी साबित होती है। शहर में थोड़ी सी हवा चले या फिर हल्की बूंदाबांदी हो, बिजली गुल होना आम है। चिंता का विषय यह है कि बारिश के मौसम में लोग घर से बाहर निकलते हुए भी डरते हैं। डर की वजह है कई जगह करंट प्रवाहित होना। पिछले साल बारिश के मौसम में करंट से कई जगह गोवंश काल कलवित हुआ। जनहानि भी हुई। शुक्रवार को भी मामूली बारिश के बाद शहर में कई जगह प्रवाहित हुआ लापरवाही का करंट आधा दर्जन से ज्यादा गोवंश के लिए जानलेवा साबित हुआ। गंभीर बात तो यह है कि करंट की घटनाएं भी एक साथ कई जगह हुई हैं। इसी से विद्युत निगम की कार्यप्रणाली का अंदाजा लगाया जा सकता है। आखिर कब तक यह करंट दौड़ता रहेगा? कब तक जनहानि करता रहेगा? कब तक रखरखाव के नाम पर कटौती होती रहेगी? इन सवालों के साथ बड़ा सवाल यह भी है कि कटौती के नाम पर उपभोक्ताओं को राहत देने में विद्युत निगम नाकाम क्यों है। क्या यह सेवा में कमी नहीं है? क्या यह उपभोक्ताओं के हितों से खिलवाड़ नहीं है? क्या यह लोगों को सीधे-सीधे मौत के मुंह में धकेलने जैसा नहीं है?
बहरहाल, निगम का यह रखरखाव जांच का विषय है। इसकी पड़ताल जरूरी है। इतना समय एवं पैसा खर्च करने के बाद भी हालात संतोषजनक नहीं है तो जरूर कहीं न कहीं लापरवाही है। गड़बड़ है। गफलत है। और यह लगातार हो रही है। रखरखाव के साथ प्रतिकूल मौसम में बिजली गुल होना उपभोक्ताओं पर दोहरी मार के समान है। यह सही है कि प्रतिकूल मौसम में विद्युत आपूर्ति सुचारू रखना विभाग के लिए चुनौती है लेकिन उपभोक्ताओं को भी तो ऐसे समय में ही विद्युत की जरूरत ज्यादा होती है। सामान्य परिस्थितियों में आपूर्ति सुचारू रखना कोई बड़ी बात नहीं है। विभाग को इस चुनौती को स्वीकारना चाहिए कि ना कि उसको मजबूरी बताकर अपनी कमी को छिपाना चाहिए। जहां-जहां करंट की शिकायतें हैं, उनको प्राथमिकता से हल करना चाहिए। साथ ही ऐसी कोई ठोस कार्ययोजना बने ताकि इस रखरखाव के खेल से आम उपभोक्ताओं को राहत मिले।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 06 मार्च 16 के अंक में प्रकाशित....

कड़वा घूंट-2

🔹एक जैसा हाल
राजनीति में अक्सर लाभ तलाशे जाते हैं। इस चक्कर में दल बदलने में भी गुरेज नहीं किया जाता। अच्छे भविष्य की चाह में वर्तमान से खिलवाड़ तक कर लिया जाता है। वैसे दल बदलने का यह काम चुनावों के मौसम में ज्यादा होता है, लिहाजा कई बार तो सफल भी हो जाता है लेकिन कइयों के लिए यह सौदा महंगा भी साबित होता है और हालात ‘खुदा ही मिला ना विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर...’ वाले हो जाते हैं। बीकानेर में भी पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा-कांग्रेस के दो नेताओं ने बड़ी उम्मीद और कुछ पाने के चक्कर में अपने-अपने दल बदले थे। चुनाव हुए ढाई साल बीत गए लेकिन दोनों के हालात कमोबेश एक जैसे हैं। पिछले दिनों संयोग से दोनों नेता आपस में टकरा गए। दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराए और हाल चाल जाने। मजे की बात यह है कि दोनों का जवाब एक जैसा ही था। वैसे भी दोनों नेताओं के साथ पुरानी पार्टी के लोग ही ज्यादा नजर आते हैं। इनकी कसमसाहट को देखते हुए राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दोनों को आपस में अदला-बदली कर लेनी चाहिए।
🔹कमाल का ऑफर
बीकानेर शहर में सडक़ किनारे दीवार निर्माण का काम हाल ही में खासा चर्चा में रहा। सबसे बड़ी बात यह कि इस मामले में सभी विभागों की चुप्पी चौंकाने वाली रही। काम चलता रहा लेकिन जिम्मेदारों के हाथ कार्रवाई करने से हिचकिचा गए, लिहाजा नोटिस देकर इतिश्री कर ली गई। इधर निर्माण करने वाले बेखौफ होकर दीवार का निर्माण करते रहे। एक-दो जागरूक लोगों को यह निर्माण खटका तो उन्होंने इसकी शिकायत बाकायदा फोटो सहित मीडिया कार्यालयों में भी कर दी, लेकिन पत्रकारिता का धर्म इक्का-दुक्का ने ही निभाया। खबरें सार्वजनिक हुई तो विभाग के अधिकारियों के कान खड़े हुए। पहले तो संबंधित मीडिया कार्यालयों में फोन करके विरोध जताया गया। बात नहीं बनी तो कई तरह के ऑफर की पेशकश की जाने लगी। अनुशासन को सर्वोपरि रखने वाले विभाग के अधिकारियों का व्यवहार व सोच अखरने वाली है। वैसे वो अधिकारी बार-बार इस निर्माण को सुरक्षा की दृष्टि से महत्वूपर्ण बताकर अपनी दलील देते रहे लेकिन उनके ऑफर ने मामले को संदिग्ध जरूर बना दिया।
🔹पर्दे के पीछे का सच
सरकारी विभागों की जांच से जुड़े कई पहलू सामने नहीं आते हैं लेकिन जब आते हैं तो चौंकाते हैं। ऐसे ही चौंकाने वाले कुछ बिन्दु पिछले दिनों दो भुजिया कारोबारियों के यहां हुए सर्वे में सामने आए। मजे की बात यह है कि एक व्यापारी तो अपने उत्पाद को बनाने के लिए गुणवत्ता वाले तेल का उपयोग करने की दुहाई देते नहीं थकते, लेकिन सर्वे में जो कागजात एवं तेल मिला है वह गुणवत्ता में कमजोर एवं अपेक्षाकृत सस्ता होता है। व्यापारी की इस सत्यावादिता के आगे सर्वे करने वाले अधिकारी एवं जानकार लोग चकित हैं। इसी तरह दूसरे व्यापारी के घर में जांच के दौरान तो सर्वे करने वाले अधिकारी भी सकते में आ गए। वहां फर्श और दीवारों में कागजात व पैसे इत्यादि छुपा कर रखे हुए बताए गए। बड़ी बात तो यह सामने आई कि इन कागजात एवं पैसे की जानकारी परिवार के सदस्यों को भी आपस में नहीं थी। मतलब उन्होंने यह सब काम दूसरे से छिपाकर किया।
🔹संबंधों का सहारा
अक्सर देखा जाता है कि संकट के समय ही किसी मददगार की तलाश की जाती है ताकि कुछ राहत मिल जाए। पुलिस से संबंधित मामलों में तो संबंध रामबाण औषधि माने जाते हैं। प्रभावित लोगों का प्रयास किसी बड़े अधिकारी से संपर्क साधकर तथा संबंधों का हवाला देकर मामले में राहत पाने का होता है। यही हाल संभाग के एक अधिकारी का है। लोग दस साल पुराने संबंध निकालकर उनके पास पहुंच जाते हैं। ऐसे में किसी मामले की जांच बदलती है तो किसी की शुरू होती है। खैर, संभाग के यह अधिकारी महोदय संबंधों की वजह से तो चर्चा में हैं ही, इनकी लिखी गई किताब के भी इन दिनों अच्छे खासे चर्चे हैं। किताब का पिछले दिनों विमोचन किया गया था। इसकी कीमत इतनी ज्यादा है कि आम आदमी तो खरीदते हुए ही सौ बार सोचेगा। किताब का कोई आशातीत रिस्पॉन्स नहीं मिलने पर इसकी सेल बढ़ाने का उपाय खोजा गया। बताते हैं कि किताब को खरीदने के लिए ‘अपने’ ही लोगों को मौखिक रूप से कहा गया है। मामला अधिकारी का है, इसलिए कोई मातहत मुंह खोलने को भी तैयार नहीं है। भले ही किताब उनके काम की हो या नहीं हो।
🔹बातूनी
 राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 06 मार्च 16 के अंक में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम ....

यह डर खत्म कीजिए

 टिप्पणी
शहर के बीचों-बीच तथा अक्सर व्यस्त रहने वाले चौराहे के पास से एटीएम उखाडक़र ले जाने की वारदात पुलिस अधिकारियों के लिए निंसदेह चिंता का विषय है। साथ में अपराधियों की धरपकड़ करना एक बड़ी चुनौती भी है। चूंकि अपराध हर जगह है लेकिन उनका तरीका अलग-अलग होता है। बीकानेर में एटीएम तोडऩे व लूटने आदि की वारदातें पहले भी हुई हैं लेकिन इस तरह की वारदात अपने आप में पहली है। इस अंदाज में एटीएम लूटना पुलिस को मांद में मात देने के समान ही है। वैसे चालू पखवाड़ा पुलिस के लिए परेशानी भरा ही रहा रहा है। अपराधों का आंकड़ा भी अचानक बढ़ गया है। सरेआम गोलियां चल रही हैं। लूट हो रही है। राह चलते गाडिय़ां तक छीनी जा रही है। यह वारदातें पुलिस की सक्रियता पर सवाल उठाती हैं। अपराध का यह चेहरा आम आदमी को डराता है। चौंकाता है। वह अनहोनी की आशंका में सहमा हुआ है। वह घर से निकलते हुए घबराता है। वह भयभीत भी है। पुलिस का स्लोगन, आमजन में विश्वास, अपराधियों में भय उसे अब बेमानी लगता है। बीकानेर की हालिया घटनाओं के मद्देनजर यह स्लोगन प्रासंगिक नहीं 
लगता है। उसकी प्रासंगिकता को बनाए रखना समूचे पुलिस महकमे के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। 
दरअसल, इस प्रकार की वारदातों का हो जाना कोई संयोग नहीं है। ये अकस्मात भी नहीं होती है। इनके पीछ़े कहीं न कहीं कोई चूक जरूर होती है। अक्सर देखा गया है कि छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना ही इस प्रकार की वारदातों की वजह बनती है। सबसे बड़ी बात यही है कि पुलिस महकमा छोटी-मोटी शिकायतों पर तो हरकत में ही नहीं आता है। सारा शहर जानता है कि बीकानेर में देर रात तक शराब की बिक्री होती है। पुलिस के फेसबुक पेज पर भी कई लोगों ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई है। फिर भी शराब की बिक्री बदस्तूर जारी है। कौन करवा रहा है यह बिक्री? कौन है जो पुलिस से भी नहीं डरता? यह सवाल आम आदमी के जेहन में उठते हैं। आमजन में विश्वास जगाने, बेहतर तालमेल व सामंजस्य के लिए होने वाली सीएलजी की बैठकें कब होती हैं, कब खत्म होती है, इस बात की जानकारी सिर्फ सीएलजी सदस्यों एवं संबंधित थाने के अलावा किसी को नहीं होती। इन बैठकों में किस तरह के सुझाव आते है, उन पर कितना काम होता है। यह इन दोनों पक्षों के अलावा तीसरा कोई नहीं जानता। जनता से जुड़े कामों में इतना पर्दा क्यों? सीएलजी बैठकों की प्रासंगिकता ही 
क्या है फिर। बीट प्रणाली भी कागजों तक सीमित हो गई है। शहर में कौन आया, कौन गया। होटलों में कौन ठहरा, कब ठहरा आदि की जानकारी भी ठीक से नहीं की जाती।
सब जानते हैं और मानते भी हैं कि चमत्कार को ही नमस्कार होता है। बिना कुछ किए कभी जय-जयकार नहीं होती। लेकिन बीकानेर में तो बिना कुछ किए ही जय-जयकार की परिपाटी चल रही है। पदभार ग्रहण करते ही स्वागत सत्कार का दौर शुरू हो जाता है। बाकायदा अभिनंदन होता है। कौन हैं ये अभिनंदन करने वाले? किस बात का अभिनंदन कर रहे हैं? किस उपलब्धि पर अभिनंदन कर रहे हैं? यह सवाल कचोटते हैं। अभिनंदन करना/ करवाना बुरा नहीं है लेकिन बिना वजह ही होता है तो फिर सवाल उठने लाजिमी है। आपके पूर्ववर्ती अधिकारियों ने तो एक अलग ही तरह परंपरा शुरू की थी यहां। यह परंपरा थी थानों के सौन्दर्यीकरण की। कौन थे पैसे देने वाले? उन्होंने इस तरह के निर्माण में दिलचस्पी क्यों दिखाई? यह राज अब तक राज ही है। सीमावर्ती जिला होने के कारण बीकानेर वैसे ही संवदेनशील है। हथियार तस्करी के मामले तो गाहे-बगाहे सामने आते रहते हैं। जुए सट्टे के मामले भी लगातार उजागर होते रहे हैं। 
बहरहाल, अब चूक पर चर्चाएं होंगी, तो तंत्र पर लगे तमाचे को तमाम तरह के तर्कों से कम करने की तसल्ली दी जाएगी। लापरवाही पर लगाम लगाने की बातें होंगी तो गफलत बरतने एवं गलती करने वालों पर गाज गिराई जाएगी। बड़ी बड़ी बातों एवं बयानों की बाढ़ आएगी तो मनोबल मजबूत करने की मुहिम भी चलाई जाएगी। कड़ी कार्रवाई करने एवं कारगर कदम उठाने की कवायद होगी। खैर, कुछ भी हो लेकिन आमजन में विश्वास जमाना सबसे ज्यादा जरूरी है। जनता का डर खत्म करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। कंट्रोल रूम जैसी बेहद संवदेनशील जगह को तो चौबीस घंटे चाक चौबंद एवं चुस्त 
दुरुस्त रखने की जरूरत है। शिकायतों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति को त्यागना होगा अन्यथा इस तरह की वारदातें पुलिस को पस्त करती रहेंगी।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 01 मार्च 16 के अंक में प्रकाशित...

'कड़वा घूंट ' मेरी


घर का मामला
हाथी के दांत खाने व दिखाने के लिए अलग-अलग होते हैं। यह कहावत तो सब ने सुनी ही होगी। हाल में यह चरितार्थ भी हो गई। बात यह थी कि शहर में डीजे देर रात तक ना बजे इसके लिए पुलिस कप्तान ने निर्देश जारी किए हैं। इसी आदेश ने खाकी को धर्मसंकट में डाल दिया। पिछले दिनों एक थानाधिकारी के नजदीकी रिश्तेदार की शादी में डीजे रात दस बजे के बाद तक बजता रहा। खास बात यह रही कि उस वक्त मौके पर विभाग के कई आलाधिकारी भी मौजूद थे। एक खबरनवीस ने मौके की नजाकत को ताड़ते हुए थानाधिकारी के कान में धीरे से फुसफुसा ही दिया और घड़ी की तरफ ध्यान दिलाया कि ग्यारह बज चुके हैं। खबरनवीस की बात से थानाधिकारी के चेहरे की रंगत कुछ क्षण के लिए जरूर बदली लेकिन मामला घर का ही था, लिहाजा डीजे देर रात तक बजता रहा।
पद का मोह
राजनीति में पद का मोह भला किसे नहीं होता। बहुत कम होंगे जो बिना पद के काम करते हैं, बाकी तो पद पाने को लालायित ही रहते हैं। यहां तक कि इसको पाने के लिए कई तरह की जुगाड़ लगाने में भी गुरेज नहीं करते। ऐसे में पद से लगाव लाजिमी है। विशेषकर जो पूर्व में किसी पद पर रह चुके होते हैं उनसे यह मोह जल्दी से छूटता भी नहीं है। सतारूढ़ दल के ही एक पूर्व अध्यक्ष के साथ भी ऐसा ही संयोग जुड़ा हुआ है। इन महाशय ने अपने कार्यकाल के दौरान संभवत: थोक में लैटर पैड छपवा लिए। कार्यकाल छोटा रहा, इस कारण बच गए। खैर, वक्त बीता, कार्यकारिणी भी नई बन गई लेकिन अध्यक्ष महोदय लैटर पैड़ पुराने ही उपयोग कर रहे हैं। रेल बजट पर इन महाशय ने अपनी प्रतिक्रिया भी अखबार के द तरों में पुराने लैटर पैड़ पर ही भिजवाई लेकिन सावधानी से अपने पद के आगे बालपैन से पूर्व जरूर लिख दिया।
गले की हड्डी
कई बार नई सुविधा इसलिए गले की हड्डी बन जाती है क्योंकि उसमें सब कुछ नए सिरे से करना पड़ता है और बात जब मशीन की आती है तो सिरदर्दी बढऩी ही थी। मामला रसद विभाग का है और पॉस मशीनों के वितरण से जुडा है। इन मशीनों का वितरण तो कर दिया गया है लेकिन उनका उपयोग करने में विभाग एवं डीलर दोनों ही हाथ खींच रहे हैं। बताया जा रहा है कि मशीन के उपयोग के बाद वह सब नहीं होगा जो अब तक होता आया है। अब चर्चा जोरों पर है कि जब मशीन लगानी ही है तो फिर इनका वितरण क्यों किया गया। खैर, देरी का माजरा अब धीरे धीरे सब के समझ में आ रहा है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि कृत्रिम देरी इसलिए पैदा की जा रही है ताकि परपंरागत तरीके का जितना हो सके फायदा लिया जा सके। कुछ भी हो लेकिन देरी अब सवाल खड़े कर रही है।
निर्देशों की हकीकतस रकारी निर्देशों में कितनी गंभीरता बरती जाती है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। विशेष कर साप्ताहिक बैठकों में जारी होने वाले निर्देश तो अक्सर कागजों में ही दफन हो जाते हैं। पिछले दिनों जिला प्रशासन की बैठक में ट्रेफिक लाइट को सुधारने के निर्देश जारी किए गए थे। बाकायदा इस काम के लिए दस दिन की समय सीमा भी दी गई थी। खैर, हालात यथावत हैं। जाहिर सी बात है कि निर्देशों की पालना नहीं हुई। खराब रोड लाइट अब भी मुंह चिढ़ा रही हैं। इधर लोग दबे स्वर में चर्चा कर रहे हैं कि जब मातहत अधिकारी ही अपने आला अधिकारियों को नहीं गांठ नहीं रहे तो फिर आमजन की तो बिसात ही क्या है। जागरूक लोग निर्देशों की खबरों की फोटो खींच कर मोबाइल से जिला प्रशासन के पास भेज रहे हैं लेकिन उधर से भी कोई हरकत दिखाई नहीं दे रही है। वैसे चर्चाओ में दम नजर आता है।
बातूनी
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 28 फरवरी 16 के अंक में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम।

इलाज के नाम पर पीड़ा-3

कटु सत्य 
ईसीजी की रिपोर्ट लेकर मैं लेबेाट्री के पास आकर बैठ गया। अचानक मन में ख्याल उठा कि हो न हो इस अस्पताल का मैनेजमेंट कोई तो संभाल रहा होगा। पता किया तो मैनेजर साहब का कक्ष बता दिया गया। उस वक्त वो सीट पर नहीं थे। रिसेप्शन काउंटर पर दस मिनट बाद नंबर लगे। मिलाया तो वो अपनी सीट पर आ गए। मुलाकात हुई तो उनको अस्पताल के हालात के बारे में बताया। उन्होंने धन्यवाद दिया कि आपने फीडबैक दिया है उसमें सुधार करेंगे। कई देर तक चर्चा चलती रही। आखिर डेढ़ बजे के करीब मैं बाहर आकर पिताजी के पास बैठ गया। आधा घंटे के इंतजार के बाद आखिरकार मैं लेबोट्री गया और पापा जी का नाम बताकर वो रिपोर्ट ले ली। अब संबंधित डाक्टर के कक्ष में घुसना था। वहां भी कोई सिस्टम नहीं था। जिस हाथ से पहले फाइल ले ली गई उसका नम्बर पहले। लाइन तो है नहीं। आखिरकार करीब दो बजकर बीस मिनट पर नंबर आया। नई पर्ची लिख दी गई थी। इस पर सारे जांच वगैरह के प्रिंट वहीं रख लिए। फोटो कापी भी नहीं दी। पर्ची की फोटो कापी मेरे को थमा दी गई। चूंकि मैं समझ गया था कि फिर ईसीएचएस पॅालिक्लिनिक जाना पड़ेगा, लिहाजा मैं पापा जी को ऑटो में लेकर घर आ गया। दूसरे दिन छह फरवरी को मैं ईसीएचएस गया। वहां काउंटर पर दो चार मरीज थे। इस कारण पर्ची बनाकर काउंटर वाले ने वहीं रख ली। डाक्टर के कक्ष के बाहर दो जने बैठे थे। एक अंदर था। इस हिसाब से मेरा चौथा नंबर था, लेकिन उसने रोक लिया। आखिरकार तीनों मरीज के जाने के बाद मैं चिकित्सक के कक्ष में घुसने ही लगा तो एक युवक दौड़ता हुआ आया मेरे को टोका। कहने लगा आपकी पर्ची दिखाओ। मैंने दिखाई तो कहने लगा इस पर नंबर नहीं है। मै उसका चेहरा ताकने लगा। थोड़ी ऊंची आवाज में मैंने कहा किस बात के नंबर। मैं किसी नंबर के बारे में नहीं जानता। वह बोला भीड़ होती है तो नंबर डालते हैं पर्ची पर। मैंने कहा कि यह काम मेरा नहीं है, आपका है। मेरे को क्या मालूम भीड़ को काबू करने के लिए आपने क्या तरीका अपना रखा है। 
इसके बाद मैंने कहा कि रही बात भीड़ की तो अब कोई तो है भी नहीं तो किस बात के नंबर डलवाऊं? मेरे सवाल पर युवग बगले झाांकने लगा। कहने लगा। ठीक है ठीक है आप तो डाक्टर साहब को दिखाओ। मैं अंदर दाखिल हुआ और डाक्टर के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। मेरे बैठते ही डाक्टर एवं व उस युवक ने फिर टोका। दोनों साथ-साथ बोले और कहा कि आप इधर वाली कुर्सी पर आ जाएं। उनका आशय उस कुर्सी से था जो डाक्टर के पास रखी थी और जिस पर बैठाकर वो मरीज को चैक करते हैं। मैं मन ही मन मुस्कुराया और बैठा रहा। युवक ने खीझते हुए कहा आपको सुना नहीं क्या? मैंने कहा सुन लिया है लेकिन मैं मरीज नहीं हूं। दोनों मेरा मुंह ताकने लगे। कहने लगे फिर क्यों आए हो। मैंने कहा दवा लेने और बाकी पर्चियों का पुलंदा डाक्टर के आगे खिसका दिया। डाक्टर ने पहले की तरह की ही एमएन के डाक्टर की पर्ची को कार्बन लगाकर दो पर्ची मेरे को दे दी। मैं दवा काउंटर पर गया। तीन तरह की दवा दे दी। 
मैं दवा लेकर जल्द से बाहर निकलता उससे पहले ही मेरी नजर अस्पताल की दीवार पर लिखे एक स्लोगन पर पड़ी। मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था ईसीएचएस का मोटो...हम आपकी सेवा करके आप पर कोई उपकार नहीं कर रहे हैं बल्कि आप हमारे यहां इलाज करवाकर हम पर उपकार कर रहे हैं। यह स्लोगन पढ़कर मैं खूब हंसा। खुद ब खुद हंसता रहा। इस हंसी के बीच न जाने कितने ही सवालों ने जेहन में घर बना लिया था। मैं घर लौट रहा था लेकिन रह-रहकर सवाल कौंध रहे थे। उपकार कौन किस पर रहा है यह समझा नहीं पा रहा था। हालात, व्यवहार, चक्कर पर चक्कर तथा पर्चियों के खेल में उपकार शब्द मेरे को बेहद बौना दिखाई दे रहा था। इलाज लेने से पहले ही मरीज को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। कितना समय बर्बाद होता है। एकसूत्री ध्येय होना चाहिए। यह पर्चियों की औपचारिकता किसलिए व क्यों। बेचारे मरीज की या उसके परिजन की तो वाट लग जाती है। फुटबाल बन जाता है वह। समझ नहीं आता कि सरकार सुविधाओं के नाम पर पूर्व सैनिकों को यह पीड़ा क्यों पहुंचा रही है। आश्चर्य की बात यह है कि ईसीएचएस कार्ड धारको के प्रति व्यवहार ऐसा है जैसे वो कोई फ्री में इलाज करवा रहे हों। वाकई यह गंभीर मसला है। देश सेवा करने वाले वीर जांबाजों के स्वास्थ्य के प्रति इस तरह का तरीका किसी अपमान से कम नहीं है। -इति-

इलाज के नाम पर पीड़ा-2

कटु सत्य 
अगले दिन रविवार होने के कारण मैं 25 को जनवरी को दवा लेने ईसीएचएस पॉलिक्लिनिक पहुंचा। दवा वितरण कक्ष पर जाकर जैसे ही मैंने डाक्टर की पर्ची रखी तो वहां बैठे प्रतिनिधि ने कहा, पहले पर्ची कटवाओ। मैंने कहा पर्ची तो साथ लेकर आया हूं ना डाक्टर की। वह बोला यह नहीं रिसेप्शन पर नई पर्ची बनेगी। मैं पीछे मुड़ा तो काउंटर पर कोई नहीं था। पांच मिनट के इंतजार करने के बाद एक सज्जन आते हुए दिखाई। इससे पहले ख्याल आया क्यों ना इस नजारे का मोबाइल से वीडियो बना लूं। फिर यही सोचकर कि कहीं ख्वामखाह पंगा ना हो विचार बदल दिया। कुछ देर बाद काउंटर पर आते ही सज्जन ने कहा कि कार्ड दिखाओ। मैंने कहा कि कार्ड में तो मैं नहीं लाया, डाक्टर की यह पर्ची है। इतना सुनने के बाद उसने कहा नाम बताओ। मैंने पिताजी का नाम एवं पद बताया। उसने कार्बन लगाकर दो पर्ची काट दी। इसके बाद डाक्टर के पास जाने को कहा। 
मैं तेजी से डाक्टर के केबिन में घुसा। अंदर एक बुजुर्ग व गर्म कपडों से लकदक सज्जन को देखकर मैं चौंका। बड़ा सा हीटर भी लगा था। ऊपर बोर्ड देखा तो लिखा था मेडिकल ऑफिसर, डा..... , रिटायर्ड। मैं मंद-मंद मुस्करा रहा था। डाक्टरों की कमी यहां भी है। और कमान भी एक बुजुर्ग व सेवानिवृत्त चिकित्सक के हाथों में। उन्होंने भी कार्बन लगाकर दोनों पर्चियों पर वही नोट हुबहू कर दिया जो एमएन के चिकित्सक ने किया था। मैं दोनों पर्ची लेकर दवा वितरण केन्द्र पर पहुंचा। उसने दो तरह की टेबलेट एवं एवं गले में लगाने का बेल्ट दे दिया। मैं घर लौट आया। सप्ताह भर की दवा थी। 
तीन फरवरी को दवा खत्म हो गई थी। चार को व्यस्तता की वजह से मैं अस्पताल जा नहीं पाया। पांच फरवरी को पहले ऑफिस आ गया। इसके बाद घर श्रीमती को फोन करके कहा कि पर्ची पर डाक्टर के मोबाइल नंबर लिखे हुए हैं, उस पर कॉल करके पता कर लो कि वह अस्पताल में कितने बजे आते हैं। थोड़ी देर में उसने बताया कि साढ़े ग्यारह से साढ़े तीन बजे तक का टाइम है। करीब साढ़े ग्यारह बजे मैं कार्यालय से निकला और करीब दस मिनट बाद अस्पताल पहुंच गए। चूंकि पर्ची बनी थी इसलिए इसलिए अब ईसीएचएस दुबारा जाने की जरूरत नहीं थी। मैं सीधा डाक्टर के केबिन तक गया लेकिन वहां कोई नहीं था। पता किया तो बताया कि डाक्टर साहब आने ही वाले हैं। मैंने टाइम पूछा लेकिन किसी ने नहीं बताया। बस दस मिनट में आ रहे हैं, दस मिनट में आ रहे हैं यही जवाब मिलता रहा। इसके बाद रिसेप्शन पर बैठी युवती से डाक्टर के आने का समय पूछा तो उसने कहा बस आते ही होंगे। टाइम उसने भी नहीं बताया। मैं इस तरह के जवाबों से उकता गया। तभी मुमताज जी वहां घूमते हुए दिखाई दिए। मैंने खड़े होकर उनका नाम पुकारा तो वो मुड़े। मैंने कहा डाक्टर साहब कब तक आएंगे। तो बोले आने वाले हैं। टाइम हो गया है। मैंने कहा कि आप तो टाइम बताओ तो वो बोले साढे बारह बजे आते हैं। मैंने माथा पकड़ लिया। वापस श्रीमती को फोन लगाया और पूछा कि कहीं गलती से उसने साढ़े बारह को साढ़े ग्यारह तो नहीं सुन लिया लेकिन उसने फिर वही जवाब दिया, साढे ग्यारह से साढ़े तीन बजे। मैं सोच में डूबा था कि आखिर क्या करूं। इतने देर में डाक्टर के कक्ष में हलचल बढ़ी तो देखा तो डाक्टर की सहायक थी। मरीज उसके पास जा रहे थे। मैं भी चला गया। ईसीएचएस की तेईस जनवरी को पर्ची दिखाई तो बोली आप अपनी फाइल लेकर आओ। मैं सीधा ऊपर गया मुमताज जी के पास, क्योंकि फाइल उन्होंने ही रखी थी। वहां से जवाब मिला कि फाइल रिसेप्शन काउंटर पर है। मैं वहां आया और पर्ची युवती की तरफ बढ़ाई लेकिन उसकी दिलचस्पी नकद पैसे देकर रसीद काटने वालों में ज्यादा थी। मैं हाथ में पर्ची लिए खड़ा रहा लेकिन उधर कोई हलचल नहीं हुई। तभी बगल में बैठी दूसररी युवती ने कहा ईसीएचएस से रैफर है क्या? मैंने सहमति में सिर हिलाया तो उसने पर्ची मेर हाथ से ली और एक दूसरे व्यक्ति को दे दी। करीब दस मिनट बाद उसने फाइल बनाकर दी। 
मैं फाइल लेकर वापस डाक्टर के केबिन में चला गया। डाक्टर तब तक नहीं आए थे लेकिन सहायक मौजूद थी। मैंने फाइल दिखाई तो उसने खून की जांंच व ईसीजी करवाने के लिए लिख दिया। सप्ताह भर पहले जो जांच हुई वह दुबारा करवाई जा रही थी। खून की जांच के लिए लेबोरेट्री में गए तो बोले ऊपर से पर्ची बनावा कर लाओ। मैं इन पर्चियों के खेल से परेशान हो गया था। पर्ची दर पर्ची ने फुटबाल बना दिया था। मैं दौड़कर फिर ऊपर गया। मुमतातजी अपनी सीट पर थे। मैंने वह जांच लिखी पर्ची उनके आगे की तो उन्होंने एक रसीदबुकनुमा छोटी से पुस्तिका उठाई और कार्बन लगाकर जैसे ही लिखने लगे मोबाइल बज उठा। पैंट की जेब टटोलते हुए उन्होंने मोबाइल निकाला और कान के लगा लिया। संभवत: बात वन रैंक वन पेंशन योजना को लेकर थी। मैं अभी खड़ा ही था, बात-करते-करते हुए उन्होंने मेरे को बैठने का इशारा किया। मोबाइल पर हंसी-हंसी ठहाके लग रहे थे। साथ में बताया जा रहा था कि सरकार इतनी जल्दी नहीं देनी वाली। फौजियों की कौन सुनता है। फौजी तो बावळी .@@@@... होते हैं। किसी तरह वह वार्तालाप खत्म हो गया। लेकिन थोड़ी देर में फिर घंटी बज उठी। इस बार किसी शादी की बात हुई। लेकिन बाद में मुद्दा फिर पूर्व सैनिकों पर आ गया। यकीनन सामने वाला भी कोई पूर्व सैनिक ही था। मैं कुर्सी पर सामने जरूर बैठा था लेकिन मुंह फेरे हुए यह प्रदर्शित करने का प्रयास कर रहा था कि मैं फोन पर हो रहे इस वार्तालाप से खुश नहीं हूं। आखिरकार फोन बंद हुआ। इसके बाद दो पर्ची बनी उनको लेकर मैं आया। इसके बाद खून की जांच हुई। बताया गया कि रिपोर्ट दो बजे मिलेगी। फिर ईसीजी में गए। वहां मैंने नर्सिंगकर्मी से पूछा कि इस रिपोर्ट में क्या है तो उसने अनभिज्ञता जताते हुए कहा कि डाक्टर साहब ही बता पाएंगे। क्रमश:

बस मलाल और सवाल

टिप्पणी

सचमुच यह सरकार के पगफेरे का ही कमाल था। तभी तो थोड़े से समय में ही फटाफट धमाल हो गया, लेकिन अब कर्मचारी-अधिकारी सब फिर से निष्क्रिय हैं। नेता भी शांत हैं और जनता ने भी चुप्पी साध ली है। ना कोई उबाल है और ना ही किसी तरह का बवाल। हां, मन में मलाल जरूर है और साथ में कई सवाल भी। क्योंकि शहर के हाल फिर बदहाल हो चले हैं। चमत्कारिक रूप से चुटकियों में चमका शहर फिर से बदसूरत हो रहा है। सरकारी डंडे व कड़ी कार्रवाई के डर से हटे कब्जे संरक्षण व शह पा फिर से पसरने लगे हैं। एक ही स्थान पर दिन में सात-सात बार सफाई करने वाले अब नहीं दिखते। सरकार के स्वागत में आनन-फानन में चौड़े हुए रास्ते भी फिर से संकरे होने लगे हैं। पखवाड़े भर पूर्व दिखाई गई तत्परता एवं तल्लीनता अब उपेक्षा एवं उदासीनता में बदल गई है। फटाफट चले फव्वारे सूख रहे हैं। गणतंत्र दिवस पर गायब हुई गंदगी फिर दिखने लगी है। रातों-रात रोशन हुई रोडलाइट भी रफ्ता-रफ्ता बुझती जा रही है। सब कुछ उसी तेजी से बिगड़ रहा है जिस गति से सुधरा था।
खैर, प्रशासन की आंखों का सुरमा इतनी जल्दी निकलने की कल्पना किसी ने नहीं की होगी। जैसे भी हुआ, जो भी काम हुआ स्थानीय प्रशासन की निगरानी में ही तो हुआ। चंद दिनों में शहर को चकाचक करने वाले बाहर से नहीं आए थे। संसाधन सहित सब कुछ स्थानीय ही था, लेकिन काम करने के तौर-तरीकों ने बीमार शहर की तबीयत ठीक करने की उम्मीदों को पंख लगा दिए थे। सुनहरे सपने जगा दिए थे। लगने लगा कि जड़ व जंग लगी व्यवस्था में सरकार के आगमन से सुधार हो गया है और यह आगे भी जारी रहेगा। बदकिस्मती समझिए या अधिकारियों की अकर्मण्यता, शहर के हालात कमोबेश फिर पुराने ढर्रे पर हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि बीमार शहर की नब्ज तभी टटोली जाएगी, जब मुख्यमंत्री या किसी बड़े नेता का पगफेरा होगा? क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कोई अहमियत ही नहीं? या अधिकारी उनको गांठते तक नहीं?
गणतंत्र दिवस तक इन अधिकारियों को वह सब दिख रहा था जो आमजन को खटकता है, लेकिन उसके बाद सभी ने आंखों पर पट्टी बांध ली। सब कुछ जानने, पहचानने एवं समझने के बावजूद प्रशासन 'धृतराष्ट्र की भूमिका निभाने पर आमादा क्यों है? यह समझ से परे है। इस तरह के हालात शक पैदा करते हैं। सवाल खड़ा करते हैं। तय मानिए कहीं न कहीं गड़बड़ जरूर है। वरना इस तरह गफलत नहीं होती। काम करने वालों के यह दो चेहरे चौंकाते हैं। आखिरकार किस मजबूरी में यह खामोशी पसर रही है। लोकसेवक होने के बावजूद क्यों लोकलाज को गौण किया जा रहा है।
बहरहाल, सरकार के आगमन से पूर्व एवं बाद के परिदृश्यों से यह तो जाहिर है कि प्रशासन चाहे तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। समस्याओं का हल बड़ा मसला नहीं है। जब व्यवस्थाएं तब दुरुस्त हो सकती है तो अब क्यों नहीं? इस सवाल का जवाब यकीनन प्रशासन के पास ही है। जरूरी है वह जनहित को सर्वोपरि रखे। अधिकारी वर्ग, लोकसेवक होने की अवधारणा को चरितार्थ करते हुए दृढ़ इच्छा शक्ति दिखाएं। ज्यादा नहीं तो कम से कम जो व्यवस्थाएं तब बनाई गई थी, उनको यथावत ही रखवा दें। शहर वैसे भी सहनशील है, लेकिन उसकी बार-बार परीक्षा लेना भी ठीक नहीं है।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 09 फरवरी 16 के अंक में प्रकाशित...

इलाज के नाम पर पीड़ा-1

कटु सत्य 
पिताजी को चक्कर आने के मर्ज ने करीब सात साल से घेर रखा है। इस दौरान उनको सरकारी, निजी अस्पतालों के अलावा प्राइवेट चिकित्सकों को घर पर भी दिखाया, कई तरह की जांच भी करवाई लेकिन आराम नहीं मिला। किसी ने सलाह दी कि इनको बीकानेर से बाहर दिखाओ तो किसी ने कहा कि ईसीएचएस में दिखा लो। पिताजी सेना में रहे हैं, इस कारण उनका ईसीएचएस का कार्ड बना हुआ है। इस कार्ड से पूर्व सैनिक अपना इलाज करवा सकते हैं। वैसे इस कार्ड को बने करीब आठ नौ साल हो गए लेकिन कभी इस्तेमाल नहीं किया। आखिरकार पिछले माह 23 जनवरी को धर्मपत्नी उनको लेकर ईसीएचएस पहुंची। वहां से पिताजी को बीकानेर के ही एमएन अस्पताल रैफर कर दिया गया। 
श्रीमती का फोन आ गया था, लिहाजा आफिस की सुबह की बैठक के बाद मैं अस्पताल पहुंच गया। तब तक उनकी जांच की पर्ची बन चुकी थी। कई तरह की जांचें थी। सबसे पहले खून व पेशाब की जांच वाली लेबोरेट्री में घुसे। वहां गहमागहमी थी। नंबर आया। खून व पेशाब की शीशी रखने के बाद वह बोला ढाई बजे के बाद रिपोर्ट मिलेगी। उस वक्त यही कोई पौने बारह बजे होंगे। इसके बाद मैं उनको लेकर ईसीजी वाले कक्ष में गया। वहां पैर, पेट व छाती पर लिक्विड लगाकर ईसीजी उपकरण लगा दिए गए। इसके बाद नर्सिंगकर्मी ने नैपकीन देते हुए कहा अंकल जी इससे साफ कर लो। मैंने नर्सिंगकर्मी से वह नैपकीन लिया और वह लिक्विड साफ किया। सच में बहुत गुस्सा था, उस वक्त। सोच रहा था सरकारी एवं प्राइवेट में अंतर ही क्या है फिर? 
खैर, इसके बाद उसने ईईजी की जांच के लिए पिताजी को कुर्सी पर बिठाया। करीब अठारह पिन उसने सिर में चिपका दी। हर पिन लगाने से पहले उसने सिर में लिसलिसा फेविकोलनुमा पदार्थ लगाया। ऊपर से रुई लगा दी। करीब आधे घंटे की जांच की बाद उसने फिर कहा अंकल जी, जाओ वाश वेसिन में सिर धो लो। हालांकि वाश वेसन तक वह साथ गया और नल चलाकर लौट आया। पापाजी ने सिर नल के नीचे किया और मैंने हाथों से वह लिसलिसा पदार्थ बड़ी मुश्किल से धोया। गुस्सा बढ़ चुका था लेकिन मौके की नजाकत देखकर चुप रहा। अब एक्सरे करवाना था। वहां एक महिला नर्सिंगकर्मी एक्सरे कर रही थी। वह उस कमरे में एक्सरे करती जबकि दूसरे में जाकर प्रिंट निकालती। पिताजी की गर्दन के दो एक्सरे हुए। वह दूसरे कमरे में गई लेकिन कपड़े बदल कर तेजी से बाहर निकल गई। मैंने जाते-जाते पूछा मैडम एक्सरे कहां है। तो उसने कहा कि प्रिंट की कमांड दे दी है , दूसरा बंदा आएगा वह एक्सरे दे देगा। मैं मन ही मन बुदबुदाया। आखिरकार करीब तीन घंटे बाद हम डाक्टर के पास पहुंचे। उसने रिपोर्ट को देखा और दवा लिख दी। पिताजी से कुछ नहीं पूछा। 
डाक्टर की दवा लिखी पर्ची लिखी मैं दूसरे कक्ष में पहुंचा, जहां पिताजी की फाइल बननी थी। मैं नाम पूछते हुए वहां पहुंचा। एक बुजुर्गवार शख्स को बाहर निकलते देख मैंने कहा मुमताज जी से मिलना है। वह बोले अंदर चलिए आता हूं। मैं बैठा तो बुजुर्ग आए और मेरे हाथ से तमाम जांच रिपोर्ट, एक्सरे लेकर बाहर निकल लिए। थोड़ी देर बाद लौटे तो मूल जांच रिपोर्ट की फोटो कॉपी साथ थी। मूल जांच रिपोर्ट व एक्सरे को उन्होंने फाइल में लगा लिया जबकि जांच रिपोर्ट व डाक्टर की पर्ची की कॉपी मेरे को दे दी। मैं तो इस चक्कर में आया था कि पर्ची देखकर यह दवा देंगे लेकिन खाली पर्ची देखकर मैं ठिठका। 
मैंने पूछा दवा कहां है? 
फाइल ठीक करते हुए वो बोले, ईसीएचएस में मिलेगी। 
मैंने कहा, यह तो बेहद पीड़ादायक बात है। मरीज तो बेचारा फुटबाल बन जाता है। 
वो बोले, इसमें पीड़ादायक क्या है? इलाज घर में थोड़े ही होता है।
मैंने कहा, घर पर तो नहीं होता लेकिन फिर सरकारी एवं प्राइवेट में अंतर ही क्या है
बोले, यह कौनसा प्राइवेट है, सरकारी ही तो है, आपके कौनसे पैसे लगे हैं। 
मैंने कहा, जी बिलकुल पैसे लगे हैं। आप कैसे कह सकते हैं यह निशुल्क है
बोले, मामूली से तो पैसे कटते हैं।
मैंने कहा, सारे पूर्व सैनिक इलाज भी नहीं लेते। 
 थोड़ा विषयांतर होते हुए बोले, ईसीएचएस बहुत बढिय़ा स्कीम है। 
मैंने कहा, जी में सब जानता हूं, कितनी बढिय़ा है। मैंने नजदीक से देखा है। 
इतने सुनते ही वे थोड़ा सा सककपाए, जैसे मैंने उनकी दुखती रग पर हाथ धर दिया हो। बोले, हमारे अस्पताल का सत्तर लाख रूपया अटका पड़ा है। समय पर भुगतान ही नहीं होता है। 
मैं मन ही मन बुदबुदाया। नहीं हो रहा है तो क्या मजबूरी है। क्यों ढोए जा रहे हो। तोड़ लो अनुबंध। 
इसके बाद मैं पर्ची लेकर घर लौट आया। 
... क्रमश:

हिमाकत

मेरी 17वीं कहानी

अलसुबह मोबाइल की घंटी से मेरी आंख खुल गई। मैं उठाता उससे पहले फोन कट गया। मोबाइल रख कर मैं फिर सो गया। अचानक मोबाइल वाइब्रेट हुआ। देखा तो व्हाट्सएप पर मैसेज था। यह वो ही नंबर था, जिससे थोड़ी देर पहले फोन आया था।
मोबाइल स्क्रीन पर मैसेज डिस्प्ले हुआ ' हैलो सर'
मैंने पूछा आप?
जवाब आया ' सर आपसे बात करनी है पर डर लगता है। '
मैंने कहा रहने दो फिर ।
थोड़ी देर बाद नया मैसेज आया। ' सर वो अगस्त में अपने प्रेमी अमित के साथ भागी लड़की सुषमा लौट आई है।'
मैं चौंका और प्रत्युतर में लिखा कि ' तो '।
उसने फिर लिखा, ' सर वह पांच माह के गर्भ से है। और वह बच्चा अमित का है। '
मैंने फिर वही सवाल दोहरा या ' तो'।
वह कहता रहा ' सुषमा अपने पति के पास है। '
मैंने कहा कि आप अमित हो?
उसने हां लिखा और कहने लगा 'सर मेरी मदद कीजिए। सुषमा का पति वह गर्भ गिराना चाहता है। '
मैंेने फिर 'तो ' ही लिखा तो उसने कहा ' पेट में पल रहा बच्चा मेरा है। वो उसे मार देंगे।'
मैंने कहा कि आपने गलत किया।
इस पर कहने लगा ' सर, मैं तो गलत हूं लेकिन उस बच्चे का क्या कसूर? '
मैंने उसे वकील से मिलने की सलाह देते हुए किसी तरह पीछा छुड़ाया पर उसकी हिमाकत पर हैरान था।

मुद्दे, मौसम और सियायत

टिप्पणी

जोर-शोर से उठा मुद्दों का मौसम अब लगभग शांत हो चुका है। पर चर्चाएं जारी है। पहले से भी ज्यादा तीखी और मुखर। साथ में चटखारे भी जुड़ गए हैं। यह कहीं जले पर नमक छिड़क रहे हैं तो कहीं थकावट दूर करने का कारगर तरीका हैं। नए जुमले गढ़े जा रहे हैं। कुल मिलाकर कल तक के गंभीर मुद्दे, उम्मीद व आस अब पूरी तरह मनोरंजन में तब्दील हो चुकी है। नफा-नुकसान का आकलन भी होगा। सियासी समीकरणों की नए सिरे से व्याख्या की जाएगी। किसने क्या खोया किसने क्या पाया इस पर भी माथापच्ची होगी। जी हां, यह परिदृश्य इन दिनों बीकानेर का है।
राज्य स्तरीय गणतंत्र दिवस समारोह का स्थान तय होने के दिन से शुरू हुई बीकानेर के विकास की बातें २६ जनवरी आते-आते चरम पर थी। यह जरूर है कि इसके बीच जनता केवल आस ले खामोश ही रही। समारोह की तैयारियों के चलते सभी जगह नहीं तो भी काफी काम हुए। यह बात दीगर है कि गुणवत्ता पर भी सवाल उठे। बावजूद इसके सड़कें सुधरी, सर्किलों का सौन्दर्यीकरण हुआ। बस स्टॉपेज पर कुर्सियां आईं। रोडलाइट सुधरी। दीवारों पर रंगरोगन हुआ। मात्र माहभर में ही करोड़ों खर्च हो गए। क्या बिना समारोह इसकी कल्पना की जा सकती थी? बीकानेर की लंबित उम्मीदें पूरी होने की आस में दिग्गज कांग्रेस नेता भी कूद पड़े। बड़ी लड़ाई का ऐलान तक कर दिया। कहीं न कहीं एयरपोर्ट उद्घाटन में मिली तवज्जो जहन में रही होगी। जन मुद्दों के लिए आंदोलन जायज व जरूरी है, लेकिन मौसम और मौका भी नहीं देखा गया। बिन मौसम तो बरसात भी नहीं होती। यहां भी ऐसा ही हुआ। तवज्जो ही नहीं मिली। समारोह हो गया। मुख्यमंत्री ने शहर भी घूम लिया, लेकिन घोषणाओं व विपक्षी आंदोलनकारियों को आश्वासन का पन्ना कोरा रहा। सियासत में तो अक्सर ऐसा ही होता है। श्रेय की ही तो लड़ाई है सारी। ऐसे में अंादोलनकारियों ने दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में आंदोलन खत्म करने के साथ संघर्ष जारी रखने में ही खैर मानी। अचानक उपजे आंदोलन का पटाक्षेप भी उसी अंदाज में हो गया।
बहरहाल, समारोह और आदोंलन दोंनों ही शांतिपूर्वक हो गए, लेकिन दोनों की बातें याद आती रहेंगी और सालती भी रहेंगी। घोषणाओं की बातें करने वाले भी अपनी झेंप आंदोलन को कारण बता मिटा रहे हैं। कह रहे हैं आंदोलन नहीं होता तो कुछ मिल जाता। इधर भी तर्क है कि घोषणाएं हो जाती तो आंदोलनकारियों को श्रेय मिलने का डर था। इस तरह एक नई बहस, लेकिन निरर्थक सी बहस खड़ी हो गई। खैर, जितनी मुंह उतनी बात, लेकिन बीकानेर की तस्वीर कुछ तो सुधरी ही है। भले ही किसी बहाने से सुधरे, लेकिन इस पर संतोष तो नहीं किया जा सकता ना।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 27 जनवरी 16 के अंक में प्रकाशित 

हां मंत्री जी, हम पिछड़े हैं...

पलटवार 
वाह मंत्री जी वाह। आपकी सोच को सलाम। आपकी समझ के तो कहने ही क्या। आपने पिछड़ेपन को पानी से जोड़ दिया और लगे हाथ अपने प्रदेश के साथ तुलना भी कर डाली। वैसे आपके प्रदेश के बारे में कहा जाता है कि यहां के लोग हाजिर जवाब एवं मुंहफट होते हैं। हम आपके पड़ोसी हैं तो कुछ संस्कार तो आने स्वाभाविक हैं। रोटी-बेटी का रिश्ता जो ठहरा। तभी तो आपके बयान का बदला अपनी बात से उतारने में गुरेज नहीं कर रहा हूं। आपके प्रदेश की प्रगति किस तरह की है यह किसी से छिपा नहीं है। फिलहाल वहां किस तरह के हालात हैं और वहां का युवा किधर जा रहा है कि कहने की जरूरत नहीं रह जाती है। आप भी भली भांति जानते हैं। बिना फौज में गए या नौकरी किए भी वहां पैसे की त्रिवेणी बह रही है, शायद इसलिए कि पानी की उपलब्धता के बाद वहां कि जमीन पैसा उगलने लगी। उसकी कीमत आसमान को छू गई और उसको बेच-बेच कर लोग मालामाल हो गए। इतने मालामाल कि ऐशोआराम के तमाम साधन तक जुटा लिए। और हां हम पिछड़े ही हैं तो फिर आपके प्रदेश के लोग इस पिछड़े इलाके में जमीनें क्यों खरीद रहे हैं। यहां तो कोई सुविधा ही नहीं है। पानी भी नहीं है। क्या करेंगे वो इस जमीन का। समृद्ध इलाके को छोड़कर डार्क जोन क्षेत्र में जमीन खरीदना भला कहां की समझदारी है। बताइए जरा। खैर, पानी ही पिछड़ेपन का कारण है तो उसके जिम्मेदार भी आप ही हो। आपसे तात्पर्य राजनीतिज्ञों से है। आप तो दल बदल कर गंगा नहाए हो गए लेकिन जिस दल से आपका लंबे समय से नाता रहा है, कमोबेश उसी दल का शेखावाटी में भी आजादी के बाद से लगातार दबदबा रहा है। क्यों नहीं दूर कर पाए आप यह पिछड़ापन? क्यों नहीं दे पाए आप पानी? हम आपके भरोसे बैठे रहते तो क्या भूखे नहीं मर जाते? पानी तक तो दे नहीं पाए आप लोग, अन्न का तो सवाल ही नहीं उठता। आखिर आपके भरोसे कब तक रहते। आप राजनीतिज्ञों ने तो हमारा भरोसा बार-बार तोड़ा है। आप भरोसा नहीं तोड़ते तो यहां के धन्ना सेठ पलायन नहीं करते। गनीमत देखिए उन्होंने शेखावाटी से बाहर जाकर खूब नाम कमाया लेकिन अपनी माटी को नहीं भूले। उनका अपनी जड़ों से जुड़ाव आज भी है। यह शेखावाटी के धन्ना सेठों की सोच का ही कमाल है कि आज शेखावाटी शिक्षा में सिरमौर बना हुआ है। वो पिछड़े होते तो क्या इतना लंबा सोचते। कतई नहीं। उन्होंने शिक्षा का उजियारा फैलाकर हमको जागरूक बनाया। शिक्षा की लौ प्रज्वलित करने के पीछे उनका किसी तरह का स्वार्थ भी नहीं था। केवल और केवल उनका पुरुषार्थ था और परोपकार की भावना थी। शेखावाटी आज एजुकेशन हब के रूप में तेजी से उभर रहा है, यह उनकी जागरुकता की ही देन है। 
मंत्री महोदय, आपने फरमाया कि ज्यादा फौजी पिछड़ेपन की निशानी हैं और रोजगार के लिए युवा फौज और पुलिस में जाते हैं। यह बड़ा ही हास्यास्पद बयान है। इसमें विरोधाभास भी है। रोजगार कौन नहीं चाहता। जीवन यापन के लिए श्रम जरूरी है और श्रम किसी भी क्षेत्र में भी किया जा सकता है। रही बात फौज में जाने की तो वहां कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा तो भर्ती होता नहीं है। कुछ मापदण्ड हैं और कड़ी प्रतिस्पर्धा भी। सेना में शेखावाटी के सैनिक ज्यादा हैं तो क्या किसी की मेहरबानी से हैं? किसी ने यह नौकरी उनको खैरात में दी है? क्या शेखावाटी के युवाओं को फौज में भर्ती में कोई छूट मिलती है? क्या यहां के युवाओं के लिए कोई अलग से कोटा या आरक्षण की व्यवस्था है? खैर जाने दो। आप इस दिशा में सोचते तो शायद ऐसा बयान ही नहीं देते हैं। शेखावाटी का जर्रा-जर्रा बलिदान की खुशबू से महकता है। गांव-गांव में लगी शहीदों की प्रतिमाएं देशप्रेम की कहानी कहती हैं। यहां देश व सेना के प्रति श्रद्धा है, सम्मान है। यहां का युवा जज्बाती है। उसमें जज्बा है, जुनून है, जोश है। उसमें योग्यता है। क्षमता है। सेना में जाना यहां शगल है। एक परम्परा है। निसंदेह आपके बयान से शेखावाटी के मान, सम्मान व स्वाभिमान को ठेस पहुंची है। यह सही है कि पढ़े लिखे आदमी के लिए रोजगार की कहीं कमी नहीं होती है। फिर क्यों वह सीमा पर गोली खाने जाएगा? केवल पिछड़ा है इसलिए? नहीं, कतई नहीं मंत्री जी। शेखावाटी तो वह इलाका है, जहां वतन की खातिर प्राणोत्सर्ग करने की परंपरा आजादी से पहले से चली आ रही है। उस वक्त तो यहां पर पानी की किल्लत नहीं थी। फिर क्यों जाते थे सेना में? और हां जब आपने हमको पिछड़ेपन की उपमा से नवाज ही दिया है तो बताइए कि हमसे भी ज्यादा पिछड़े इलाकों के लोग सेना में क्यों नहीं हैं? अच्छे पैकेज को ठुकरा कर शेखावाटी का युवा सेना में क्यों जाना चाहता है? इन सवालों के जवाब किसी के पास ही नहीं है। मंत्री जी, सेना में भर्ती होने के लिए फौलाद का जिगर चाहिए। हिम्मत चाहिए, हौसला चाहिए। सामने जब साक्षात मौत हो तब उसका मजबूती से डटकर मुकाबला करने का साहस चाहिए। प्रतिकूल परिस्थितियों में मोर्च पर पर मुस्तैद रहने का जुनून चाहिए। यह सब यहां के लोगों के खून में है। आपका बयान हमारे युवाओं का मनोबल तोडऩे वाला है, उनको हतोत्साहित करने वाला है। मंत्री जी, बातों से देश का भला नहीं होने वाला। और अगर फौज या पुलिस में जाना ही पिछड़ेपन की निशानी है तो फिर हमको पिछड़ा ही रहने दो। हम पिछड़े होकर भी आप जैसे राजनीतिज्ञों के तरह अपनी स्वार्थ के खातिर पार्टियां नहीं बदलते। हम वतन पर जान देने वाले लोग हैं। इसलिए आप जैसों से तो हम पिछड़े ही बेहतर हैं।

तह तक जाना जरूरी

टिप्पणी 
बीकानेर जिले के छतरगढ़ उपखण्ड के कस्बे सत्तासर में हथियार बनाने का कारखाना पकडऩा पुलिस के लिए बड़ी कामयाबी हो सकती है लेकिन संवदेनशील क्षेत्र में इस तरह हथियार बनाने का साजो सामान मिलना कहीं न कहीं व्यवस्था में सुराख भी है। सत्तासर से अंतरराष्ट्रीय सीमा की दूरी बामुश्किल पचास-पचपन किलोमीटर होगी। पुलिस के अनुसार सत्तासर कस्बे की एक पंक्चर की दुकान में यह हथियार बन रहे थे। चौंकाने वाली बात तो यह सामने आ रही है कि हथियार बनाने का गोरखधंधा काफी समय से चल रहा था। संभवत: यह खेल बेखौफ व बेरोकटोक ही चल रहा था, क्योंकि इतने लंबे समय तक कानून व पुलिस की आंखों में धूल झौंकना संभव नहीं लगता। किसी तरह की मिलीभगत या तालमेल से घालमेल करने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। हथियार बनाने का यह गैरकानूनी खेल बदस्तूर चलते रहना और किसी को कानों-कान खबर तक नहीं होने की बात शायद ही किसी के गले उतरे।
आरोपित का अचानक ही कब्जे में आना, सब कुछ हाथों-हाथ उगल देना तथा फटाफट ही हथियार बनाने का कारखाना पकड़ लेना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। ऐसे में यह समूची कार्रवाई भी संदिग्ध व संदेह के घेरे में नजर आती है। वैसे सरेआम हथियार बनाने का खेल हमारी व्यवस्था पर सवाल उठाता है। उसको कठघरे में खड़ा करता है। सवाल भी एक दो नहीं बल्कि कई तरह के हैं। मसलन छोटे से कस्बे में यह हथियार बनते रहे हैं और किसी को खबर तक नहीं हुई? इस दुकान के आगे से गुजरने वाले आंखें बंद करके गुजरते रहे? आरोपित अकेला ही इतने बड़े कार्य को अंजाम देता रहा? किसी ने इस काले कारोबार के खिलाफ कभी आवाज ही नहीं उठाई? यदि उठाई तो कहीं अनसुनी या दबा तो नहीं दी गई? क्या वह इतना शातिर था कि जो गुपचुप तरीके से अपना काम करता रहा ? क्या आरोपित हथियार कहीं और बनाता था और यहां लाकर बेचता था? कहीं इस खेल में कोई बड़ा गिरोह तो नहीं? क्या पकड़ा गया आरोपित महज मोहरा तो नहीं? खैर, इस प्रकरण से जुड़े सवाल और भी हैं और जांच के दायरे में शामिल करने के लायक भी। जैसे यहां से बने हथियार कहां-कहां गए? क्या इस खेल में और भी चेहरे हैं? कानून के रखवाले इस दुकान से अनजान कैसे बने रहे? क्यों उसकी गतिविधियों पर किसी को शक नहीं हुआ? यह सवाल सभी के जेहन में हैं, लिहाजा इन सबकी तह तक जाना जरूरी है। सबका खुलासा होना तो बेहद जरूरी है। जाहिर सी बात है कि इस खेल में कहीं न कहीं घालमेल और तालमेल है। व्यवस्था से जुड़ी कोई न कोई कमजोर कड़ी जरूर है। नोखा क्षेत्र का रहने वाला आरोपित छतरगढ़ के पास सत्तासर में जाकर यह सब कर रहा है तो मान लेना चाहिए कि इस खेल की जड़ों ने गहरे तक घुसपैठ कर रखी है।
बहरहाल, इस समूचे प्रकरण को हथियार तस्करी से जोड़ कर भी देखा जाना चाहिए। जिस तरह बीकानेर अवैध हथियारों की मंडी बना है वह किसी से छिपा नही है। हथियार तस्करी से जुड़े प्रकरण अक्सर सामने आते रहते हैं। लेकिन जिस अंदाज में आधुनिक एवं देसी हथियारों की बरामदगी होती रही है तथा हो रही है उससे लगता है कि बेचने व खरीदने वालों में किसी तरह का भय नहीं है। जि मेदारों को तस्करी व तालमेल के इन तारों को तोडऩे का तरीका जल्द खोजना होगा। ऐसा न हो सिरदर्द बना हथियार तस्करी का यह खेल कहीं लाइलाज मर्ज बन जाए और बीकानेर जैसे शांत व सीमा से सटे इलाके का अमन-चैन भंग कर दे।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 17 जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित

जागरूकता की मशाल

 टिप्पणी

नि:संदेह यह बदलाव की बयार है। यह बयार है नेतृत्व करने की। सकारात्मक सोच के साथ अपनी बात मुखरता से रखने की तथा उसे पूरा करवाने की। यह एक नई सुबह है, जागृति का नया बिगुल फूंकने की और जनजागरण की। यह सुखद पहल है, शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा करने की। उनसे जवाबदेही तय करने की। बदलाव का यह बीड़ा उठाने वाले उत्साही एवं ऊर्जावान युवा हमारे ही शहर बीकानेर के हैं। इन युवाओं की नई सोच, नई राह दिखाती है, उम्मीद की किरण जगाती है। बीकानेर का युवा जंग लगी व्यवस्थाओं को ठीक करने/ करवाने का माद्दा रखता है। वह शहर की चिंता करता है। जनहित के लिए आगे आता है। युवाओं को एकजुटता के सूत्र में पिरोने की पहल करता है। हालिया उदाहरणों से यह जाहिर भी हुआ है कि बीकानेर का युवा अब मुखर हो रहा है। बदहाल यातायात हो, चाहे पीबीएम की पटरी से उतरी व्यवस्थाएं। उजड़े पार्क हो चाहे, तकनीकी विवि का मसला। बीकानेर का युवा भली भांति जान चुका है कि पुराने नेतृत्व के भरोसे अब नहीं रहा जा सकता। युवाओं की ऐसी ही नई पहल से यह लगने लगा है कि बीकानेर का आने वाला कल उजला है। इसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं। काम करने का जज्बा और जागरूकता की ज्योत इसी तरह प्रज्ज्वलित होती रही तो यकीनन न केवल शहर का भला होगा बल्कि कुंद पड़े विकास कार्यों को भी गति मिलेगी।
 स्वामी विवेकानंद जयंती यानी राष्ट्रीय युवा दिवस के उपलक्ष्य में राजस्थान पत्रिका की ओर से बीकानेर की समस्याएं और समाधान विषय पर आयोजित परिचर्चा में शहर के युवाओं ने जिस बेबाकी व जोश के साथ अपने विचार साझा किए वो काबिलेतारीफ हैं। युवा दिवस पर युवाओं ने जो संकल्प लिया वह नि:संदेह विकास की नई इबारत लिखने में सहायक होगा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि 'युवा वह है जो अनीति से लड़ता है। जो दुर्गुणों से दूर रहता है। जो काल की चाल को बदल देता है। जिसमें जोश के साथ होश भी है। जिसमें राष्ट्र के लिए बलिदान की आस्था है। जो समस्याओं का समाधान निकालता है। जो प्रेरक इतिहास रचता है तथा जो सिर्फ बातों का बादशाह नहीं बल्कि करके दिखाता है। यकीनन यह सारी बातें बीकानेर के युवा में है। जरूरत है कि वह शहरहित एवं राष्ट्रहित के लिए रचनात्मक काम करे।
 अगर आगाज अच्छा है तो यकीनन अंजाम भी परिणाममूलक ही होगा। उम्मीद है बीकानेर का युवा स्वामी विवेकानंद के उन विचारों से और अधिक प्रेरणा लेगा, जब उन्होंने कहा था कि ' सभी कमजोरी, सभी बंधन मात्र कल्पना है। कमजोर ना पड़ें। मजबूती के साथ खड़े हो जाओ। शक्तिशाली बनो। आपके भीतर अनंत शक्ति है। उठो जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। क्योंकि 'आप जैसे विचार करेंगे, वैसे आप हो जाएंगे। अगर अपने आपको निर्बल मानेंगे तो आप निर्बल बन जाएंगे और यदि आप अपने आपको समर्थ मानेंगे तो आप समर्थ बन जाएंगे। जागरूकता की मशाल रोज रोशन रहे इसलिए जरूरी है कि हर दिन को युवा दिवस माना जाए।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर में 13 जनवरी 2016 को प्रकाशित

भोलापन

मेरी 16वीं कहानी

उसके घर पर दो मोबाइल थे। एक पत्नी के पास जबकि दूसरा नंबर उसके माता-पिता के पास। माता-पिता का नम्बर उसकी फोन बुक में होम के नाम से सेव था जबकि पत्नी वाला नम्बर होम-2 के नाम से। एक दिन वह नई सिम लेकर आया। माह भर होने का आया। आखिरकार एक दिन, नए नंबरों की सुध ले ली गई। अरे सुनो तो, आपने जो नया नंबर लिया है वो बताना तो। पत्नी ने जब यह सवाल किया तो पति चौंक गया। उसने कहा, तुम भी गजब हो कितने दिन हो गए नंबर लिए और तुमको पता ही नहीं है। पत्नी बोली, आपने दिया ही कब था? और हां नए नंबरों के बारे में अपने परिचितों, रिश्तेदारों एवं मित्रों को भी बता दो। बेफिक्र होते हुए पति ने जवाब दिया, अभी तो ऑफिस वाले से काम चल रहा है जब जरूरत पड़ेगी, तब बता देंगे। खैर, पति ने पत्नी के मोबाइल पर मिस्ड कॉल दी और पत्नी ने उसे सेव कर लिया। थोड़ी देर बाद पत्नी बोली देखो मैंने आपका नंबर सेव कर लिया। पति ने जिज्ञासा से पूछा तो पत्नी से झट से मोबाइल आगे कर दिया। मोबाइल की स्क्रीन पर पतिदेव-2 डिस्पले हो रहा था। नाम देखकर वह मुस्कुराया और पत्नी से कहा जानती हो क्या लिखा है? पत्नी खामोश, लेकिन थोड़ी देर बाद जोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ी। फिर तो दोनों हंस रहे थे, पर दोनों की हंसी के अर्थ अलग थे।

पुलिसवाला

मेरी 15वीं कहानी
तीखे नयन नक्श तथा गठीले शरीर वाला वह नौजवान बड़े ही आत्मविश्वास के साथ मेरे पास आया। उसने आते ही पूछा ' अशोक जी, आप ही हैं?' मैंने असहमति में सिर हिलाया और बगल में बैठे युवक की तरफ इशारा कर दिया। दरअसल, अशोक मेले की व्यवस्था देखने वाले का नाम था लेकिन उस वक्त वह अपनी सीट पर मौजूद नहीं था जबकि मैं उसकी बगल वाली सीट पर बैठा था। मेरा इशारा भांपकर उसने पड़ोस में बैठे युवक से भी यही सवाल दागा तो उसने कहा, हां बोलिए क्या काम है। वह बोला मैं पुलिस में हूं। मेरे को दो जनों के लिए झूले का पास चाहिए। बैठे हुए युवक ने थोड़ी तल्खी दिखाते हुए कहा, अच्छा पुलिस वाले हो। जरा अपना आईडी कार्ड तो दिखाइए। इतना कहते ही नौजवान की आंखों में चमक आ गई। उसने फट से अपना पर्स टटोला और उसमें कार्ड निकाल कर दिखा दिया। युवक ने संतुष्ट होने के बाद सहमति में सिर हिलाया। उस नौजवान को तो जैसी मुंह मांगी मुराद मिल गई थी। बैठे हुए युवक ने कड़क आवाज में फिर कहा, सुनो केवल एक झूला ही निशुल्क रहेगा। युवक हां कहता हुआ झूले की तरफ बढ़ गया जबकि मैं सब देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।

जागने का वक्त

टिप्पणी
नया साल, नए सपने व संकल्प ले आ रहा है। बड़ी बात तो यह है कि इस बार सपने साकार होने की प्रबल उम्मीद है। इसका कारण है कि प्रदेश स्तरीय गणतंत्र दिवस समारोह के सिलसिले में राज्य सरकार खुद बीकानेर आ रही है। इससे पहले भी भाजपा राज्य सरकार गत कार्यकाल में प्रदेश स्तरीय स्वाधीनता दिवस यहां मना चुकी है। करीब डेढ़ साल पहले सरकार आपके द्वार के तहत यहां मुख्यमंत्री सहित समूचा मंत्रिमंडल दस्तक दे चुका है। फिलहाल गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियां व्यापक स्तर पर चल रही हैं। प्रशासन के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी यकायक सक्रिय हो गए हैं। तैयारियों के बहाने कई लंबित मुद्दे यकायक चर्चा में आ गए है। वैसे तो बीकानेर में बुनियादी समस्याओं से ले बड़े स्तर की कई समस्याएं हैं। फिर भी रेल फाटक ,समस्या, तकनीकी विवि की पुनसर््थापना व बीकानेर से हवाई सेवा यात्रा शुरू होना सहित करीब डेढ़ दर्जन मसले हैं जो पूरे हो जाएं तो बीकानेर की तस्वीर बदल जाए। फिलहाल ये कमजोर राजनीतिक नेतृत्व एवं दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में अटके हुए हैं। सामूहिक प्रयासों का भी अभाव रहा।
कमजोर कड़ी यह रही है कि जनता अपने प्रतिनिधियों के भरोसे रही और प्रतिनिधि समस्या न तो प्रभावी तरीके से उठा पाए और न ही हल की दिशा में कारगर प्रयास करा पाए। रेल फाटकों की समस्या तो लंबे समय से नासूर बनी हुई है। जयपुर में मेट्रो ट्रेन सहमति पत्र बनने व ट्रेन संचालन में मात्र पांच साल का समय लगा। मेट्रो का मार्ग कैसे बना, कितने ओवर ब्रिज बने सबके सामने है। इससे यह तो जाहिर है कि सरकार चाहे तो मुश्किल कुछ भी नहीं है। रेल फाटक समस्या हल के नाम पर कभी बाईपास तो कभी एलीवेटेड रोड के नाम पर चर्चाएं चलती रही, आंदोलन होते रहे, लेकिन निचोड़ नहीं निकला। रेलफाटकों का मामला वैसे हाईकोर्ट में विचाराधीन है और जो लोग इस मामले के पीछे हैं वो बाईपास को सर्वाधिक उपयुक्त हल बता रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं आज नहीं तो कल बाईपास ही हल है तो यह तैयार कब तक होगा। इसेे बनाने में कितना वक्त लगेगा। इस पर सब चुप हैं। जब तक बाइपास नहीं बने तब तक क्या सरकार मूकदर्शक बने लोगों को धक्के खाते देखती रहेगी या कोई विकल्प भी तैयार करेगी।
कुछ ऐसा ही हाल नाल स्थित हवाई अड्डे का है। जितनी जल्दबाजी एवं तत्परता उसको तैयार करने में एवं उद्घाटन करने में दिखाई गई वैसी अब नहीं है। तकनीकी विवि का हश्र तो किसी से छिपा नहीं है।
बहरहाल, भाजपा राज्य सरकार पूरे लवाजमे के साथ तीसरी बार बीकानेर आ रही है। अब तक तो यही देखा गया है कि सरकार के पगफेरे से सूरसागर की सूरत जरूर चमक जाती है। रंगरोगन हो जाता है, फव्वारे चल जाते हैं, लेकिन आम जन की जरूरतों से जुड़े मुद्दों पर ठोस काम के बजाय बयानबाजी हो रह जाती है। सरकार को चाहिए कि जनहित से जुड़े मसलों को गंभीरता से ले क्योंकि जनप्रतिनिधियों से उम्मीद की आस लगाए बैठे लोगों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। इसकी सुगबुहाहट भी शुरू हो गई है। ऐसा होना भी चाहिए। सही में यह जनता के जागने का वक्त है। अब तक जन समस्याओं को लेकर प्रदर्शन टुकड़ों में या प्रायोजित होते आए हैं। अगर इन प्रदर्शनों ने एकजुटता का रूप धारण कर लिया तो सरकार के लिए चुनौती पैदा हो सकती है। जनता जाग रही है, लिहाजा सरकार को भी जागना चाहिए। देर बहुत हो गई है। सरकार को चाहिए कि वह बीकानेर से जुड़े इन सपनों को साकार करे ताकि शहर की सूरत बदले। नए साल का मौका भी है।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर में एक जनवरी 2016 को प्रकाशित

Tuesday, December 29, 2015

विकल्प

मेरी 14वीं कहानी 

'सर, कल मेरी शादी की वर्षगांठ है, इसलिए मैं कार्यालय नहीं आ पाऊंगा।' एक ही सांस में यह सब बोलने के बाद बैंक का बाबू उतनी ही तेजी के साथ मैनेजर के कक्ष से बाहर निकला। 'अरे सुनो तो। ' मैनेजर की आवाज कानों में पड़ी तो वह पलटा। मैनेजर की तरफ मुखातिब होते हुए वह बोला। 'जी सर आपने कुछ कहा।' मैनेजर ने कहा 'यार कमाल करते हो। तुम्हारे बच्चे शादी के योग्य हो गए हैं और तुम अब भी वर्षगांठ के नाम पर छुट्टी लेते हो। क्या करोगे ऐसा? कहीं बाहर जा रहे हो क्या ? ' मैनेजर की बातें सुनकर बाबू मुस्कुराने लगा। थोड़ी देर रुकने के बाद मैनेजर फिर बोला 'मेरे को देखो, तुमसे जवान हूं। अभी शादी को भी ज्यादा वक्त नहीं हुआ। मेरी शादी की वर्षगांठ भी पिछले माह ही थी। आपने देखा, मैंने छुट्टी ली क्या? ' मैनेजर के सवाल पर बाबू अपनी हंसी नहीं रोक पाया। वह जोर से ठहाका लगाते हुए बोला ' सर आपकी और मेरी क्या बराबरी। आप की तो मजबूरी है और फिर मेरा तो कार्यालय में विकल्प भी है। आप दूसरे बाबू से भी तो काम चला सकते हो।' इतना कहकर बाबू, मैनेजर के कक्ष से बाहर आ गया। मैनेजर के कानों में रह-रहकर बाबू के मजबूरी और विकल्प वाले शब्द गूंज रहे थे।

ईमानदारी

मेरी 13वीं कहानी

दस मिनट के लिए बस रुकी तो वह नीचे उतरा। तापमान जीरो डिग्री से नीचे था लेकिन वातानुकूलित बस में उसका एहसास नहीं हुआ। बस से बाहर आते ही वह कंपकपाने लगा। तेजी से दुकान की तरफ बढ़ा और गर्मागर्म चाय पलक झपकते ही हलक के नीचे उतार ली। सर्द हवाओं से बचाव के लिए वह फटाफट बस में चढ़ गया। जैसे ही सीट की तरफ बढ़ा, पीछे बैठी खूबसूरत युवती की आवाज से चौंक पड़ा। आवाज आई 'एक्सक्यूज मी सर। आपकी सीट के नीचे आपके रुपए गिरे हैं। ' युवक तेजी से नीचे झुका तो सौ रुपए का नोट सीट के नीचे पड़ा था। उसने नोट उठाया और तत्काल अपना पर्स निकाला। 'जी मेरे तो नहीं है।' उसने युवती की तरफ देखे बिना ही जवाब दिया, लेकिन सौ रुपए का नोट हाथ में था। नोट का क्या किया जाए, तत्काल कोई हल नहीं सूझा। अचानक विचार आया क्यों ना परिचालक को दे दिया जाए। वह फिर बोला ' बस में मिले हैं, इसलिए बस वाले को ही दे देते हैं।' युवती ने भी सहमति में सिर हिला दिया। तभी परिचालक आया उसने सौ रुपए का नोट उसको सौंप दिया। परिचालक की सवालिया नजरों का आशय वह समझ गया था। 'हमारा नहीं है। आपकी बस में ही मिला है, इसलिए रख लो।' परिचालक मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया। मैं चुपचाप यह घटनाक्रम देख रहा था। ईमानदारी के लगातार दो उदाहरण देख खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। साथ ही जेहन में सवाल भी कौंधा, यह ईमानदारी आखिर सभी जगह क्यों नहीं मिलती?

सरप्राइज

मेरी 12वीं कहानी

हाथ जोड़ हुए और चेहरे पर मासूमियत के भाव लिए उसने मेरे कक्ष में प्रवेश किया। मैं उसकी मनोदशा देखकर सोच में डूब गया कि हमेशा हंसमुख रहने वाला मल्टीनेशनल कंपनी का जनरल मैनेजर आज इस तरह के हावभाव में कैसे? वह हाथ जोड़े-जोड़े ही कुर्सी पर बैठ गया। वह कुछ बोलता उससे पहले मैंने ही सवाल दागा, क्या हुआ आनंद जी? आप इतने उदास क्यों हैं? क्या बात हो गई? उसने कहा, सर मेरी धर्मपत्नी शहर में एक क्लिनिक चलाती है। शादी के बाद मैंने उसको बहुत कम समय दिया है। उसका अब 31 दिसम्बर को जन्मदिन आ रहा है और मैं उसको सरप्राइज गिफ्ट देना चाहता हूं। जवाब सुनकर मैं चौंका और मन ही मन बुदबुदाया, सरप्राइज गिफ्ट का भला अखबार से क्या वास्ता। मैंने पूछा, सरप्राइज गिफ्ट आपको देना है तो फिर मेरे को क्यों बता रहे हो और मेरे पास क्यों आए हो। यह तो आप दोनों के आपस का मामला है। वह कुर्सी छोड़ कर खड़ा हो गया और बोला सर प्लीज, मेरी मदद कीजिए। मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह मेरे से किस तरह की मदद की उम्मीद लेकर आया। मैंने हिम्मत बंधाते हुए कहा आनंद जी, घबराइए मत, निसंकोच बताइए। इतना सुनकर वह कहने लगा कि सर, कल विवि में दीक्षांत समारोह है। मेरी धर्मपत्नी को भी उसमें डिग्री मिलेगी। अगर आप उसकी फोटो अखबार में छाप दें तो यह उसके लिए सरप्राइज गिफ्ट होगा। जवाब सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुराया। किसी तरह अपनी हंसी को काबू करते हुए मैं उसको देखता रहा, लेकिन वह तो जैसे ठोस आश्वासन पाने की जिद पर ही अड़ा था। आखिरकार मैंने कहा समारोह तो परसों है ना, कोई नहीं देख लेते हैं। मेरा जवाब सुनकर उसके चेहरे पर खुशी आई और जोश से हाथ मिलाते हुए थैंक्यू सर कह कर वो चला गया पर सरप्राइज गिफ्ट की बात से मैं सरप्राइज था। सोच रहा था क्या-क्या करने लगे हैं लोग।