Saturday, September 29, 2018

राजस्थान में सुरक्षित सीटों पर हुआ नोटा का सर्वाधिक इस्तेमाल

श्रीगंगानगर. एससी/एसटी कानून के विरोध में अनारक्षित वर्ग के मतदाताओं ने किसी दल की बजाय नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) का अभियान चला रखा है। सोशल मीडिया पर मुहिम चलाई जा रही है, लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा का प्रयोग सामान्य की बजाय आरक्षित सीटों पर ज्यादा हुआ। आरक्षित वर्ग में भी एससी के बजाय एसटी सीटों पर सर्वाधिक लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया। सामान्य सीटों पर नोटा का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम हुआ। खास बात यह भी रही कि जिन जिलों की साक्षरता दर कम है, वहां भी नोटा का इस्तेमाल ज्यादा हुआ। विदित रहे कि केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने पिछले विधानसभा चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा बटन का विकल्प दिया था। हाल ही में नोटा का विकल्प छात्रसंघ चुनाव में भी इस्तेमाल किया गया। 
पिछले विधानसभा चुनाव में प्रदेश में 1.91 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया था। नोटा का सर्वाधिक इस्तेमाल सिरोही जिले की पिंडवाड़ा विधानसभा सीट पर हुआ था। भरतपुर की कामां सीट पर सबसे कम लोगोंं ने नोटा का इस्तेमाल किया था। यहां 0.22 प्रतिशत लोगों ने क्षेत्र के किसी भी प्रत्याशी पर भरोसा नहीं जताया था।
यहां ज्यादात मतदाताआें ने खारिज किए प्रत्याशी
एसटी के 5 शीर्ष विधानसभा क्षेत्र
पिंडवाड़ा-5.75%
चौरासी-5.00%
डूंगरपुर-4.74%
आसपुर-4.53%
बागीडौरा-4.43%
एसएसी के शीर्ष 5 विधानसभा क्षेत्र
केशोरायपाटन-4.40%
रेवदर-4.34%
जालौर-3.99%
कपासन-3.39
खांडर-3.08%
सामान्य के शीर्ष पांच विधानसभा क्षेत्र
खींवसर-3.86%
बड़ीसादड़ी-3.58%
देवली-उणियारा-3.54%
भीनमाल_3.46%
आसींद-3.36%
नोटा का सबसे कम इस्तेमाल: शीर्ष पांच विधानसभा क्षेत्र
कामां-.22%
कठूमर-.43%
 नगर-.45%
 भादरा-.48%
उदपुरवाटी-.48%
आदिवासी क्षेत्र में सबसे ज्यादा
इन पांच जिलों में नोटा को ज्यादा वोट
डूंगरपुर- 4.48% 59.46%
सिरोही-3.84% 55.25%
बांसवाड़ा-3.41% 56.33%
बूंदी-3.36% 61.52%
उदयपुर-3.11% 61.82%
जहां साक्षरता ज्यादा वहां नोटा कम
और इन पांच जिलों में सबसे कम
भरतपुर-.77% 70.11%
अलवर-.78% 70.72%
झुंझुनूं -1.06% 74.13%
जैसलमैर-1.08% 57.22%
हनुमानगढ़-1.22% 67.13%
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राजस्थान पत्रिका के राज्य के तमाम संस्करणों में 26 सितंबर 18 के अंक में प्रकाशित । 

नैतिकता के पथ में

नैतिकता के पथ में
चुनौतियां तो आती हैं।
पथ से भ्रमित करने,
ईमान डिगाने,
और 
सत्य से विमुख करने।
पग पग पर प्रलोभन
आरोपों की सौगात
चरित्र चित्रण करने
मति भरमाने
और
सिद्धांतों से समझौता करने।
सच में नैतिकता
का पथ नहीं आसान
चैन और सुकून भी
पड़ते है गायब करने
और
तिल तिल कर जीने..
नैतिकता के पथ में
ईमान की डगर में
सच के सारथी को
आते हैं लोग छलने...
और....और.....और..

जलोटा से जलन क्यों

बस यूं ही
जसलीन-जलोटा की जुगलबंदी ने रातोरात कई जुमले ईजाद कर दिए। जरा देखिए तो इस बेमेल जोड़ी के जलवों के प्रति किस कदर जलन का जलजला आया हुआ है। प्रेम को पाक व पवित्र जैसे शब्दों से पुकारने वालों को यकायक इस प्रकरण में पाप नजर आने लगा। सोशल मीडिया पर तो संगीत के इन साधकों को सनसनी बना दिया गया। उनकी सार्वजनिक 'साहसिक' स्वीकारोक्ति पर सवाल खड़े कर दिए गए। उम्र के उदाहरण देकर उनके आचरण पर अंगुलियां उठा दी गई। शायद इसीलिए कि वो भजन गाते हैं, इसलिए भगवान ही बने रहें? भजनों के बहाने अनूप में भगवान तलाशने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए वो कलाकार से पहले इंसान भी हैं। महज संबंधों को सबके सामने स्वीकारने के सच को बहस का इतना बड़ा बवंडर बना दिया गया कि हर कोई नैतिकता का शिक्षक बन आचरण का पाठ पढ़ाने लगा है। मोह माया का मान मर्दन कर मर्यादा के प्रति मुखर हो रहा है। निसंदेह इस खुलेआम खुलासे के पीछे बाजार है। उसी बाजार के वजह से यह बहस है। मामला जितना चर्चित उतना हिट। अनूप पर आपत्ति इसीलिए है कि वह भजन गाते हैं। उम्रदराज हैं। तीन शादियां कर चुके हैं। लेकिन क्या यह इतना गैरकानूनी है, जो इतना गरियाया जा रहा है। प्रेम अनंत है, अथाह है। वह उम्र, जाति बंधन या क्षेत्र विशेष की सीमाओं में कैद नहीं होता। जब इस दर्शन पर यकीन है तो इस जोड़ी पर जलन क्यो? जलोटा से जलन क्यों?
उम्र के बडे़ अंतराल के बावजूद दोनों पक्ष सहमत हैं, रजामंद हैं तो फिर बहस ही बेमानी है। उम्र के अंतराल के अनगिनत किस्से इतिहास में दर्ज हैं। अतीत को टटोलेंगे तो जलोटा-जसलीन से ज्यादा हैरतअंगेज जानकारियों से रूबरू होंगे। विशेषकर फिल्मी दुनिया में उम्र का अंतराल कोई अपराध नहीं हैं। कबीर बेदी तो याद होंगे। 70 साल की उम्र में चौथा विवाह किया था, वह भी उम्र से 29 साल छोटी युवती से। मीडिया जगत के बादशाह रुपर्ट मर्डोक ने 84 साल की आयु में 25 साल छोटी युवती से शादी की। इस तरह डोनाल्ड ट्रंप की तीसरी पत्नी उनकी बेटी की आयु की बताते है। प्रसिद्ध अभिनेता डिक वॅान डाइक ने खुद से 46 साल छोटी महिला से शादी से की। चर्चित मैगजीन प्लेबाय के फाउंडर डयूज हेफनर ने तो 86 में उम्र में अपने से 60 साल छोटी 26 साल की युवती से शादी की। इतना ही नहीं विश्व के संभवत सर्वाधिक आयु के जोआओ कोएल्हो 131 साल के हैं। वे ब्राजील में खुद से 62 साल छोटी पत्नी के साथ रहते हैं।
भारतीय सिनेमा में इस तरह के उदाहरणों की भरमार है।
बहरहाल, इस पोस्ट के बाद नैतिकता की दुहाई देने वाले, मर्यादा का पाठ पढ़ाने वाले, संस्कारों की नसीहत देने वालों के निशाने पर शायद मैं भी आ जाऊं लेकिन दो पक्षों की सहमति से बने संबंध गैरकानूनी नहीं होते। सामाजिक मान्यताएं अपनी जगह हैं लेकिन वो कानून से बड़ी नहीं हैं। और आपत्ति ही है तो यह बता दे कि इस प्रकरण में किसने किसको धोखा दिया और दोषी कौन है। दोषी हैं तो दोनों हैं अन्यथा कोई नहीं हैं।खैर, यह दिल का मामला है बाबू, इसकी कोई उम्र नहीं होती और ताली हमेशा दोनों हाथों से बजती आई है।

इक बंजारा गाए-46

शहर फिर बदरंग
सुंदर शहर, सजे हुए चौक चौराहे, साफ सुधरे डिवाइडर किसको अच्छे नहीं लगते। बाहर से आने वालों को भी यह सफाई व सुंदरता सुकून देती है लेकिन राजनीति से वास्ता रखने वाले अधिकतर लोगों को इस सुकून से कोई मतलब नहीं है। अपना चेहरा चमकाने के चक्कर में वो चौक चौराहों को बदरंग करने से गुरेज नहीं करते। राजनीति में नई-नई इंट्री मारने वाले एक नेताजी को भी चौक चौराहों पर टंगकर सस्ती लोकप्रियता पाने का चस्का जोरों से लगा है। समूचे शहर को पोस्टरों से बदरंग कर दिया है। शहर की सुंदरता को ग्रहण लगाकर इस तरह का व्यक्तिगत प्रचार लोगों को हजम कम ही हो रहा है।
आस्था के नाम पर
शहर की यातायात व्यवस्था रामभरोसे ही है। यातायात पुलिस के जवान नुक्कड़ व चौराहों पर चालान काटते जरूर दिख जाएंगे लेकिन वो अवैध पार्र्किंग को लेकर गंभीर नहीं है। यही हाल अतिक्रमण का है। आस्था के नाम पर शहर की मुख्य सड़क पर अस्थायी दुकानें सज जाती हैं। एेसे में यातायात की वैकल्पिक व्यवस्था तो की जाती है लेकिन अस्थायी दुकानों को लेकर कभी गंभीरता से नहीं सोचा गया। मुख्य सड़क को बंद कर अस्थायी दुकानें लगाने का शायद श्रीगंगानगर इकलौता उदाहरण है। अस्थायी दुकानों को अस्थायी जगह उपलब्ध करवाने की दिशा में भी सोचना चाहिए।
गीदड़ भभकी
निर्धारित कीमत से अधिक मूल्य वसूलने की शिकायत पर अंकुश लगाने में नाकाम आबकारी विभाग देर रात तक खुलने वाली शराब की दुकानों को लेकर कतई गंभीर नहीं है। हां, नए पुलिस कप्तान आने के बाद दो तीन बार निर्देश जारी हुए लेकिन कारगर कार्रवाई न होने के कारण यह गीदड़ भभकी ही ज्यादा साबित हुई। शहर के मुख्य मार्गों पर देर रात तक शराब की बिक्री बेरोकटोक जारी है। अधिक कीमत के नाम पर आबकारी ने तो आंखें शुरू से ही मूंद रखी हैं। पुलिस की चेतावनी भी अब बेअसर साबित हो रही है। यही कारण है कि शराब के कारिंदे अपना धंधा बेखौफ कर रहे हैं।
दूसरे दिन दूरियां
मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा को श्रीगंगानगर से गए दो सप्ताह से ज्यादा समय हो गया लेकिन इससे चर्चे आज भी नुक्कड़ या पान की दुकान पर सुनने को मिल जाते हैं। श्रीगंगानगर आगमन पर एक विधायक की मुख्यमंत्री से नजदीक देखी गई लेकिन दूसरे दिन उस प्रकार की नजदीकी दिखाई नहीं दी। बताते हैं कि रात को मुख्यमंत्री को स्थानीय जनप्रतिनिधियों व पदाधिकारियों ने विधायक के बारे में अच्छा खासा फीडबैक दिया था। राजनीतिक गलियारों मंे चर्चा है कि सिर्फ एक ही दिन में नजदीकी का दूरियों में बदल जाने के पीछे फीडबैक के कमाल को माना जा रहा है।
घर का पूत कुंवारा...
राजस्थानी में एक चर्चित कहावत है, 'घर का पूत कुंवारा डोले, पड़ोसी का फेरा Ó इस कहावत का तात्पर्य यही है कि आदमी खुद के घर की चिंता तो करता नहीं है लेकिन दूसरों को लेकर चिंतित रहता है। कुछ यही हाल यूआईटी का है। यूआईटी के ठीक सामने की सड़क सीवरेज लाइन के कारण साल भर से टूटी पड़ी है। मुख्यमंत्री के आगमन पर इस सड़क को आधा बनाकर छोड़ दिया है। अब यूआईटी नगर परिषद की सड़कों को लेकर तो चिंतित है लेकिन खुद की सड़कों की सुध लेने की फुर्सत नही है। कितना बेहतर हो, यूआईअी चिंता पहले अपने क्षेत्र की करे, दूसरे की चिंता तो बाद की बात है।
सरकारी धन
गाहे-बगाहे सरकारी राशि के दुरुपयोग की खबरें आती रहती हैं। कुछ एेसा ही श्रीगंगानगर में होने वाला है। सड़क निर्माण को लेकर यूआईटी व नगर परिषद के बीच चल रही नूरा कुश्ती में भले में यूआईटी किसी तरह सफल हो गई लेकिन मामले में पेच फिर फंस रहा है। जिन सड़कों को बनाया जा रहा है या बनाया जाएगा, उनको थोड़े समय बाद में टूटना तय है। यह बात स्थानीय अधिकारी भी जानते हैं, लेकिन ऊपर का आदेश मानकर सबने आंखें मूंद कर रखी है। सरकारी राशि का सदुपयोग हो या दुरुपयोग अधिकारियों को इससे कोई सरोकार भी नहीं है, क्योंकि जैसा ऊपर चाहेगा वैसा ही होगा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 20 सितम्बर 18 के अंक में प्रकाशित । 

कारगर विकल्प


प्रसंगवश
जल संसाधन विभाग की ओर से इंदिरा गांधी नहर में अगले साल 25 मार्च से 5 जून तक कुल 70 दिन की नहरबंदी प्रस्तावित है। इस नहर से श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर सहित प्रदेश के दस जिले जुड़े हैं। लाजिमी है कि नहरबंदी के कारण सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलेगा, साथ ही पेयजल संकट गहराने की आशंका भी रहेगी।
नहरों में रखरखाव के चलते नहरबंदी वैसे तो हर साल होती है। इसकी अवधि 30 से 35 दिन तक की होती है, पर इस बार यह अवधि लगभग दोगुनी है। इतनी लंबी नहरबंदी को लेकर किसानों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। किसानों की दलील है कि इससे उनकी दो फसलें प्रभावित होंगी। उनका मानना है गेहूं की फसल अप्रेल मध्य तक पक कर तैयार होती है और आखिर में पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। नहरबंदी के कारण यह पानी नहीं मिलेगा तो उत्पादन प्रभावित होगा।
किसानों की मानें तो इससे नरमा-कपास की बुवाई भी प्रभावित होगी, क्योंकि नहरबंदी 5 जून तक है। जब नहर में पानी छोड़ा जाएगा तो यह दस दिन बाद 15 जून तक खेतों में पहुंचेगा। ऐसे में नरमे की बुवाई का अनुकूल समय गुजर जाएगा। किसान इस नहरबंदी की अवधि कम किए जाने की मांग कर रहे हैं। जबकि जल संसाधन विभाग का मानना है कि नहर की हालत खराब होने के कारण राजस्थान अपने हिस्से का पूरा पानी नहीं ले पाता, क्योंकि नहर टूटने का खतरा बना रहता है। नहरों की मरम्मत समय की मांग है, यह जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही भविष्य में फायदा होगा। किसानों को तात्कालिक नुकसान के बजाय भविष्य के लाभ को ध्यान में रखते हुए नहरबंदी का समर्थन करना चाहिए। वैसे भी इंदिरा गांधी नहर के जीर्णोद्धार को इतना समय चाहिए भी।
नहरबंदी के दौरान जल संसाधन विभाग के सामने दूसरी बड़ी चुनौती पेयजल की रहेगी। हालांकि नहरबंदी के दौरान पेजयल संकट न गहराए, इसके लिए विभाग नहरों में डाइवर्शन (बीच-बीच में पानी रोक कर, साइड से कच्ची नहर निकालकर) के माध्यम से पेयजल आपूर्ति करता है। लेकिन, अतीत के अनुभव बताते हैं कि यह तरीका कारगर नहीं रहता। इस बार नहरबंदी की अवधि लंबी है और विभाग परंपरागत तरीका अपनाएगा तो नि:संदेह पेयजल संकट की चुनौती फिर खड़ी हो
सकती है।
विभाग जो भी वैकल्पिक उपाय करेगा, उसमें क्या व किस तरह की परेशानी आ सकती है, इसका आकलन समय रहते कर लिया जाना चाहिए। पेयजल आपूर्ति में अगर किसी तरह की खामी या कमी रही तो जनाक्रोश भडकऩे का अंदेशा भी रहता है। उम्मीद है कि जल संसाधन विभाग नहरबंदी के दौरान पेयजल के परंपरागत तरीकों में कुछ बदलाव कर कारगर वैकल्पिक उपाय करेगा ताकि आमजन के हलक सूखे नहीं।
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 राजस्थान पत्रिका के राजस्थान में प्रकाशित तमाम संस्करणों में 19 सितंबर 18 के अंक में प्रकाशित।

इक बंजारा गाए-45


मजदूरों की मौज
मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा हाल में श्रीगंगानगर जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों से गुजरी। पांचों विधानसभाओं में मुख्यमंत्री की कहीं बड़ी सभा तो कहीं स्वागत सभाएं हुई। दरअसल, इन सभाओं में विधानसभा चुनाव के दावेदारों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी थी। उनको मुख्यमंत्री के समक्ष यह साबित करना था कि उनके साथ कितने लोग हैं। खैर, यह शक्ति प्रदर्शन एक दो विधानसभाओं में ज्यादा दिखाई दिया, जहां सभाएं भी एक से ज्यादा हुईं। इनमें ज्यादा उपस्थिति दिखाने के चक्कर में मनेरगा मजबूरों को लाने की बातें भी सामने आ रही हैं। चर्चा है कि इन मजदूरों को टिकट के दावेदारों की ओर से 70 से 150 रुपए तक का भुगतान किया गया। खैर, इस बहाने मजदूरों की मौज जरूर हो गई।
सामूहिक गठबंधन
चुनाव में टिकट लेने और कटवाने के लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ता। इतना नहीं राजनीति में दोस्त कब दुश्मन हो जाए और दुश्मन कब मित्र बन जाए, इसका भी कोई अता-पता नहीं होता। हां किसी एक को टारगेट करने या कमजोर करने के लिए कई बार उसके दुश्मन जरूर एक हो जाते हैं। कहा भी गया है कि दुश्मन का दुश्मन मित्र होता है। मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा के दौरान एक विधानसभा में भी एेसा ही कुछ हुआ। जिले के एक बड़े नेता की सभा को छोटी या हल्की दिखाने के मकसद से टिकट के अन्य दावेदार एक हो गए और सभी ने सामूहिक रूप से सभा का आयोजन करवाया। वैसे सामूहिक हाथ मिलाने कामकसद बड़े नेता का कद छोटा करना ही ज्यादा नजर आया।
काली पगड़ी
मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा के दौरान हुई सभाओं में एहतियातन एक बात का विशेष ख्याल रखा गया। सभा में काले कपड़े या काले तौलिये के साथ जाने की इजाजत किसी को नहीं थी। इसके बावजूद अक्सर काली पगड़ी पहनने वाले भाजपा किसान मोर्चा से संबंधित एक सरदारजी काली पगड़ी में एक सभा में चले गए। चूंकि सरदारजी वहां के स्थानीय विधायक की आंखों में खटकते हैं, लिहाजा उनको सभा से बाहर करवाने के लिए प्रयास भी खूब हुए। सुरक्षा दल वालों ने भी सरदारजी को सभा से चले जाने को कहा लेकिन सरदारजी उनको पार्टी पदाधिकारी होने का हवाला देते रहे। आखिरकार सरदारजी के साथ आए लोगों ने सभा का सामूहिक बहिष्कार की बात कही तो फिर उनको किसी ने नहीं टोका।
छत्त पर भी सडक़
मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा लगभग सभी जगह निर्धारित समय से काफी विलम्ब से पहुंची। इस देरी का फायदा स्थानीय विधायकों, नेताओं, पदाधिकारियों व टिकट के दावेदारों ने जमकर उठाया, उनको बोलने का पर्याप्त मौका जो मिला। श्रीगंगानगर में सभा में एक स्थानीय विधायक ने तो एेसी बात कह दी कि सुनने वालों के हंस-हंस के पेट में बल तक पड़ गए। विधायक ने कहा कि उनकी सरकार ने विकास के बहुत काम करवाए हैं। गांव गांव में सडक़ें बना दी गई हैं। विधायक यहां नहीं रुके । उन्होंने आगे कहा कि विकास की यह रफ्तार भविष्य में भी जारी रहेगी और हम मकानों की छत तक सडक़ बना देंगे। विधायक के बयान का आश्य लोगों के अभी तक समझ नहीं आया, लेकिन हंसी नहीं थम रही।
एक तीर कई निशाने
श्रीगंगानगर में स्वागत सभा में शहर ही हालत को लेकर की गई शिकायत पर मुख्यमंत्री का कदम एक तीर से कई निशाने वाला माना जा रहा है। उन्होंने सभा में ही जिला कलक्टर को मंच पर बुलाकर सवाल जवाब किए। इतना ही नहीं रात को ही मंत्री व कलक्टर को शहर का निरीक्षण करने भेज दिया। उससे अगले दिन नगर परिषद आयुक्त को बदल दिया गया। वैसे जिस रोड को लेकर यह बवाल मचा था, उस पर यूआईटी की नजर काफी पहले से लगी थी, लेकिन मामला बैठ नहीं रहा था। खैर, अब मामला यूआईटी के पाले में है। वैसे इस समूचे प्रकरण के बाद मुख्यमंत्री को यह पता भी लग गया कि उनके खुद के दल के पार्षदों की भूमिका क्या है?
नजदीकी के मायने
राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता और मौका देखकर पाला बदलने का इतिहास भी रहा है। मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा से पहले एक विधायक के अचानक सक्रिय होने तथा एक पूर्व मंत्री के घर जाने के राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग अर्थ लगाए जाने लगे। मुख्यमंत्री के स्वागत में शहर के चौक चौराहों पर जिस अंदाज में विधायक के पोस्टर व बैनर लगे उससे कयास लगने लगे थे कि शायद बदलाव की कोई खबर सुनने को मिलेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वैसे अपने विधानसभा क्षेत्र में विधायक व मुख्यमंत्री साथ जरूर नजर आए लेकिन अन्य दावेदारों की तरह विधायक का कोई शक्ति प्रदर्शन नहीं हुआ। फिलहाल इस नजदीकी के मायने लगाने का दौर जारी है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 13 सितंबर 18 के अंक में प्रकाशित।

आखिर किस पर यकीन करें

बस यूं ही
डाक्टर को धरती का भगवान कहा जाता है लेकिन व्यावसायिकता की अंधी दौड़ से यह भगवान भी अछूता नहीं रहा है। मेरी यह पोस्ट लिखने के पीछे किसी को बदनाम करना या किसी की भावनाएं आहत करना नहीं है बल्कि यह सवाल खड़ा करना है कि आखिर मरीज किस चिकित्सक पर यकीन करे और क्यों करे। आज मैं पांच उदाहरण आपसे साझा रहा हूं जिनसे मेरा व्यक्तिगत वास्ता रहा है। पहला मामला करीब दस साल पहले का है। झुंझुनूं में रहते वक्त शाम को उकड़ू बैठा था तो बच्चे पीठ पर सवार हो गए और खड़ा होने का आग्रह करने लगे। खड़ा हुआ तो घुटने में खटक की आवाज आई। दूसरे दिन सोकर उठा था तो घुटने पर सूजन थी, खड़ा हुआ तो मैं चलने की स्थिति में नहीं था। दो जनों की मदद से मुझे एक सरकारी अस्पताल से सेवानिवृत्त चिकित्सक के निजी क्लिनिक ले जाया गया। उन्होंने बताया कि घुटने के बुश क्रेक हो चुके हैं, लिहाजा जयपुर ऑपरेशन करवाना पड़ेगा। मैं सोच में डूबा था कि 32 साल की उम्र में घुटने का ऑपरेशन क्या उचित रहेगा। खैर, किसी ने सलाह दी तो मैं एक देसी वैद्य के पास गया। उन्होंने दूध के साथ एक बूटी रोजाना पीने को कहा। दस दिन यह सब किया। तब से घुटने में कोई दर्द नहीं है। चिकित्सक की सलाह मानता तो ऑपरेशन हो चुका होता।
दूसरा मामला चार साल पहले का है, गांव में वॉलीबाल खेलते समय दूसरे घुटने में दर्द हुआ। तब छत्तीसगढ़ था, पैन कीलर खाकर वहां पहुंचा। तभी तबादला हुआ तो बीकानेर आया। वहां चिकित्सकों को दिखाया तो कहने लगे घुटने का लिंगामेंट गड़बड़ा गया है ऑपरेट करना पड़ेगा। फिर ऑपरेशन की बात से मैं डर गया था। किसी ने फिजियो के पास जाने की सलाह दी। उसने लगातार नी कैप पहनने की सलाह दी। कुछ समय लगाने के बाद नी कैप लगाना छोड़ दिया। तब से अब तक कोई दर्द नहीं है। यहां भी चिकित्सक की सलाह मानता तो ऑपरेशन करवा चुका होता।
तीसरा मामला एक फुंसी से जुड़ा है, जिसको मारवाड़ी में ईंठ भी कहते हैं। मतलब नीचे वाले होठ के साइड में एक छोटी सी फुन्सी होती है। शेव करते समय वह छिल गई तो असहनीय पीड़ा होने लगी। यह मामला तीन साल पहले का है। आखिरकार बीकानेर के एक चर्चित एवं देश विदेश में नाम कमाने वाले चिकित्सक के घर देर रात मैं गया। उन्होंने एक लैंस लगाकर गौर से देखा और बोले, आपके शरीर में वायरस चला गया है। मैं चकित था, पूछा वायरस क्या होता है? चिकित्सक बोले आपने किसी की जूठन खाई है। मैंने कहा नहीं, कतई नहीं। चिकित्सक बोले हम शादी समारोह में जाते हैं, वहां टेंट हाउस के बर्तन व क्रॉकरी आदि सही तरीके से धुली हुई नहीं होती। एेसे में संक्रमण होने की आशंका रहती है। मैंने पूछा तो वायरस का अब क्या इलाज होगा? चिकित्सक बोले यह स्थायी रूप से अंदर ही रहेगा। यह रह रहकर सक्रिय होगा, इसलिए आपको दवा खानी पड़ेगी तथा कुछ परहेज रखने होंगे। परहेज के नाम पर मेरा माथा फिर ठनका, मैंने पूछा क्या? तो बोले आपको बच्चों व पत्नी से दूर रहना होगा। अपने बर्तन भी अलग रखें। यहां तक कि आफिस में आप डिस्पोजल इस्तेमाल करें, क्योंकि आपका यूज किया हुआ बर्तन किसी ने उपयोग किया तो उसको भी संक्रमण हो जाएगा। चिकित्सक की बातों से मैं भी बुरी तरह घबरा गया। घर आया तो धर्मपत्नी ने लटका चेहरा देखकर वजह पूछी, तब मेरे मुंह से इतना ही निकला कि आज से मैं जात बाहर हो गया हूं। मेरे बर्तन व चारपाई अलग लगा दो। मेरा सवाल सुनकर वह भी चौंकी लेकिन उसने दूसरे चिकित्सक को दिखाने की सलाह दी। खैर, दूसरे दिन सबसे पहले यही काम किया। बीकानेर के एक दूसरे चर्म रोग विशेषज्ञ के पास गया। उन्होंने सात दिन की दवा लिखी और कहां चिंता की कोई जरूरत नहीं है। शंका का समाधान पूरी तरह करने के चक्कर में मैं तीसरे चिकित्सक के पास गया। उन्होंने कहा कि यह सीजनली इंफेक्शन है, आप तीन दिन दवा खाओ ठीक हो जाएगा। खैर, तीन साल में उस वायरस का कभी अटैक नहीं हुआ। हां पहले चिकित्सक के अनुसार चलता तो आज भी मेरे बर्तन व चारपाई अलग ही होते।
चौथा मामला श्रीगंगानगर आने के बाद का है। एक दिन थकान महसूस हुई और हल्का बुखार था तो आराम कर लिया। दूसरे दिन आफिस आया तो स्टाफ वालों ने कहा भाईसाहब आपको जांच तो करवा ही लेनी चाहिए। आजकल सत्तर तरह की बीमारियां फैली हुई हैं। मैं पूरी तरह ठीक महसूस कर रहा था कि लेकिन साथियों की सलाह पर जांच करवाई तो मुझे डेंगू बताया गया। हालांकि ब्लड प्लेट सही थी। दो दिन के आराम की सलाह दी गई थी, खूब पानी पीने तथा कीवी फल खाने को कहा गया। दो दिन बाद जांच करवाई तो डेंगू गायब। चिकित्सकों की ही मानें तो दो दिन में डेंगू ठीक होता ही नहीं है, मतलब डेंगू था ही नहीं, जबरन बता दिया गया। सोचिए तब मेरी मानसिक स्थिति कैसी रही होगी।
पांचवां मामला ताजा ही है। मतलब दो तीन दिन पहले का ही। धर्मपत्नी कई दिनों से परेशान थी। कभी कहीं दर्द तो कभी कहीं। श्रीगंगानगर में एक चिकित्सक से जांच करवाई तो उसने बताया कि आपको थाइराइड है और उसने दवा भी शुरू कर दी। करीब सप्ताह भर बाद एक परिचित नर्सिंगकर्मी की सलाह पर फिर से जांच करवाई तो पता चला कि थाइराइड है ही नहीं। अब पहले चिकित्सक की बात पर यकीन कर लिया जाता है तो दवा चलती ही रहती।
अब बताएं क्या सोचते हैं आप?

कुरीति

लघुकथा
सामाजिक सम्मेलन के आखिर में आयोजकों की तरफ से एक वक्ता बड़े ही जोश के साथ कहे जा रहे थे ' हमारा गांव तो आदर्श गांव है। यहां आपको कोई कुरीति दिखाई नहीं देगी। हम दहेज न लेते हैं और ना देते हैं। इतना ही नहीं हमारा गांव नशे से भी दूर रहता है। हमारे गांव में आपको कोई शराब का ठेका भी दिखाई नहीं देगा।' वक्ता की बातें सुनकर आसपास के गांवों से आए समाज बंधुओं को यह सुकून भरा आश्चर्य पच नहीं रहा था। अचानक सभा के पीछे से लड़खडा़ती हुई आवाज में एक अधेड़ चिल्लाया। ' बस.. बस.. बस.. इतना भी सफेद झूठ मत बोलिए। मैं आपके गांव के शराब ठेके से ही पीकर आया हूं।' श्रोताओं की टकटकी मंच से ठीक उलट उस शराबी पर थी, जिसने गांव की कुरीति का सच नशे में उगल दिया था। इधर वक्ता की हालत काटो तो खून नहीं वाली थी।

अव्यवस्थाओं का मेला

प्रसंगवश 
ग्रामीण परिवेश के मेले निस्संदेह लोकरंजन के प्रमुख केन्द्र होते हैं। लेकिन इनमें होने वाली अव्यवस्थाएं मन को खिन्न कर देती हैं। विशेषकर धार्मिक स्थलों पर लगने वाले मेलों में श्रद्धालुओं की संख्या की बजाय व्यवस्थाएं ‘ऊंट के मुंह में जीरे’ के समान होती हैं। गंभीर बात तो यह है कि धार्मिक मेलों में आस्था व श्रद्धा के समानांतर कुछ इस तरह के कुत्य भी सामने आने लगे हैं, जो श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत करते हैं।
इतना ही नहीं सुरक्षा व व्यवस्था में खामी देखकर मेलों में नशे के कारोबारियों तथा अवैध काम करने वालों की घुसपैठ भी होने लगी है। हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील का गोगामेड़ी मेला उत्तर भारत का प्रसिद्ध मेला है। एक माह तक चलने वाले इसमें देश के विभिन्न कोनों से पन्द्रह से बीस लाख तक श्रद्धालु पहुंचते हैं। अभी मेला जारी है। अव्यवस्थाओं व आपराधिक प्रकरणों को लेकर यह मेला चर्चा में रहता आया है।
बीते सप्ताह ही मेले में एक टैंट में ताशपत्ती पर जुआ खेलते सोलह लोगों को पकड़ा गया। पोस्त भी बरामद हुई। आइजी के निर्देश पर हुई इस छापेमार कार्रवाई के बाद गोगामेड़ी के थानाप्रभारी को भी हटा दिया। खैर, इतना कुछ होने के बावजूद मेले में शराब की बिक्री लगातार होती है। चूंकि मेले में आने वालों में देहाती लोग ज्यादा होते हैं, लिहाजा यहां नशा भी उसी प्रकार का है। चोरी-चकारी होना तो मेले में सामान्य-सी बात है। इस तरह की अनैतिक गतिविधियों के अलावा गोगामेड़ी में सबसे बडा संकट स्वच्छता का भी है। हर तरफ बिखरी गंदगी और उसमें उठती सड़ांध समूचे वातावरण को दुर्गंधमय बना देती है। गंदगी का आलम मेला खत्म होने के बाद तक रहता है। कहने को मेले में स्थायी व अस्थायी शौचालय बनाए जाते हंै लेकिन श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए यह बेहद कम हैं। ऐसे में यहां आने वाले श्रद्धालु हों, चाहे दुकानदार वो खुले में ही शौच जाते हैं।
देवस्थान विभाग को इस मेले से चढ़ावे व अस्थायी दुकानों के किराये के रूप में जो कमाई होती है, उसके अनुपात में सुविधाएं पर्याप्त नजर नहीं आती। कहने को तो व्यवस्थाएं चाक-चौबंद रखने को पुलिस व प्रशासन का अमला तैनात रहता है, फिर भी अव्यवस्थाएं हावी हैं। बहरहाल, मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की दिक्कत न हो। वो मेले में निर्भीक होकर उसका आनंद उठाए तथा उनको स्वच्छ वातावरण मिले तो निस्संदेह गोगामेड़ी आने वालों को और अधिक प्रसन्नता होगी।
देवस्थान विभाग व स्थानीय प्रशासन को व्यवस्थाओं में सुधार के रास्ते भी खोजने चाहिए। मेला समापन के बाद संतोष की सांस लेने की बजाय उसकी समीक्षा होनी चाहिए ताकि अगली बार उस तरह की समस्या ही नहीं आए। मेले की अव्यवस्थाओं व अनैतिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के प्रयास करने ही होंगे।
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राजस्थान पत्रिका के राजस्थान.के समस्त संस्करणों में 8 सितंबर 18 के अंक में संपादकीय पेज पर प्रकाशित।

इक बंजारा गाए-44


रोजगार का अवसर
आदमी में काबलियत हो तो रोजगार के अवसर मिल जाते हैं। हां रोजगार के अवसरों में समय के हिसाब से बदलाव होता रहता है। अभी चुनावी मौसम है और जमाना हाइटेक, लिहाजा चुनाव लडऩे के दावेदारों की सोशल मीडिया पर निर्भरता बढ़ गई है। कुछ दावेदारों को इस काम में महारत हासिल नहीं हैं, इस कारण वो यह काम अनुबंध पर करवाने लगे हैं। बाजार में इस तरह के काम करने वाले काफी हैं। वो दावेदारों को सोशल मीडिया के माध्यम से न केवल प्रचार के तरीके बताते हैं बल्कि दावेदारों के जनसंपर्क का कवरेज तक भी करते हैं। दावेदारों की खबर बनाकर उनके पेज पर वायरल करने का काम भी यही संभालते हैं।
धुधांधार प्रचार
शहर के एक नेताजी का इन दिनों सोशल मीडिया पर प्रचार देखकर ऐसा लगता है मानो टिकट उनको ही मिलने वाली है। अपनी तमाम तरह की गतिविधियों को यह नेताजी बढा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। इतना ही नहीं है आजकल सोशल मीडिया पर अपने नाम से एक पेज भी बना लिया है, उसके अंदाज से देखकर लगता है कि नेताजी ने खुद को विधायक के लिए मानसिक रूप से तैयार कर लिया है, हालांकि यह नेताजी विधायक का चुनाव लडऩे की बात कई बार नकार चुके हैं लेकिन सोशल मीडिया पर उनका अंदाज देखकर यह जाहिर होने लगा है कि उन्होंने पूरा मानस बना लिया है। बहरहाल, देखने की बात यह है कि नेताजी को टिकट मिलती है या नहीं?
बधाई संदेश
मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा के श्रीगंगागनर जिले में प्रवेश में अभी वक्त है लेकिन तैयारियां शुरू हो गई हैं। जनप्रतिनिधि व प्रशासनिक अधिकारी उनकी यात्रा संबंधी तैयारियों का जायजा ले रहे हैं। व्यवस्थाएं चाक चौबंद की जा रही हैं। कहीं किसी तरह की चूक न रह जाए, इसका विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इन के सब के बीच जगह-जगह टिकट के दावेदारों में बधाई संदेश देने की होड़ लगी है। पोस्टर बैनर टांगे जा रहे हैं, शहर व कस्बे बदरंग हो तो हों, कौन रोके और कौन टोके। इतना जरूर है कि इन बधाई संदेशों के कारण होर्डिंग्स व बैनर बनाने वालों का धंधा जरूर चमक गया है। चुनाव से पहले बैठे बिठाए काम जो मिल गया है।
अंधेर नगरी
यह विभाग रोशनी वाला है लेकिन इसके संचालन में इस तरह की खामियां हैं कि इसको 'अंधेर नगरी' कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं। यह विभाग हमेशा बिजली सुधार के दावे करता है, निर्बाध आपूर्ति देने की भी बात करता है लेकिन हालात इससे ठीक विपरीत हैं। शहर में सामान्य दिनों में रात या दिन को कट लगना आम बात है। इससे भी बड़ी बात इस निगम के अधिकारियों का व्यवहार बड़ा अजीब है। कोई उपभोक्ता अपनी तकलीफ भी बताता है कि यह तो इसको गंभीरता से नहीं लेते। इससे अच्छा तो जोधपुर से संचालित एक नंबर पर कोई उपभोक्ता अपना दर्द बयां करता हैं तो संतोषजनक जवाब भी मिलता है। इधर श्रीगंगानगर के अधिकारी तो उपभोक्ताओं के नंबर ही ब्लॉक कर देते हैं।
शक्ति प्रदर्शन
मुख्यमंत्री खुद चलकर इलाके में आ रही हैं तो संभावित दावेदारों के पास इससे बढिय़ा मौका और होगा भी क्या? यह यात्रा चूंकि चुनाव से पहले निकाली जा रही है। इस कारण टिकट के दावेदारों में होड़ लगी है। स्वाभाविक से बात है दावेदार कितने ही हों अंत में टिकट तो एक को मिलनी है। फिर भी मुख्यमंत्री की नजरों में खुद को इक्कीस साबित करने के प्रयास में संभावित दावेदार जी जान से जुटे हुए हैं। जनसंपर्क और सम्मेलन के बहाने दिन रात एक कर रखा है। अपनी तरफ से वे कोई प्रयास नहीं छोड़ रहे। दावेदारों का पूरा प्रयास है कि वे मुख्यमंत्री के सामने अपने समर्थकों के साथ मुलाकात के बहाने शक्ति प्रशर्शन कर अपना दावा पुख्ता करें।
पगफेरे का कमाल
यह मुख्यमंत्री के पगफेरे का ही कमाल है कि श्रीगंगानगर शहर के धीमी गति से चल रहे कामों में हलचल दिखाई देने लगी है। सड़कों के गड्ढे ठीक होने लगे हैं। सफाई व्यवस्था को भी दुरुस्त करवा जा रहा है। इतना ही नहीं है कई जगह तो रातोरात सड़क बनाने का काम तक चल रहा है। यूआईटी के पास रोड डेढ़ साल से खुदी रही लेकिन किसी ने खबर तक नहीं ली, लेकिन अब युद्ध स्तर पर इसको बनाया जा रहा है। इसी तरह यूआईटी से जिला अस्पताल की रोड एक माह से बंद पड़ी है। यहां से चौपहिया वाहन नहीं गुजर रहे हैं। देखते हैं जिम्मेदारों की नजर इस बंद रास्ते पर भी पड़ती है या आधा अधूरा सच दिखाकर ही वाहवाही बटोरी जाएगी।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 6 सितम्बर 18 के अंक में प्रकाशित । 

Friday, August 31, 2018

इक बंजारा गाए-43


सदस्यता से हलचल
राजनीति में पाला बदलने की रीत पुरानी है। वैसे यह काम अक्सर मौका देखकर किया जाता है। विशेषकर चुनावी मौसम में पाला बदलने या किसी पार्टी से जुडऩे संबंधी मामले ज्यादा सामने आते हैं। बदलाव के इस दौर से श्रीगंगानगर भी अछूता नहीं है। अब तक पर्दे के पीछे खेलते आए एक शख्स ने अब खुले में राजनीति करने का मानस बना लिया है। उन्होंने दामन भी विपक्षी दल का थामा है। बताते हैं कि पैसे की इस शख्स के पास कोई कमी नहंीं हैं। वैसे नए नवेले शख्स का पार्टी का दामन थामना पार्टी के स्थानीय पुराने नेताओं को रास कम ही आ रहा है। तभी तो टिकट की उम्मीद में प्रयासरत नेताओं में इस नई इंट्री से हलचल मची है।
औपचारिकता हावी
छात्रसंघ चुनाव में शहर को बदरंग करने वालों के प्रति प्रशासन का रवैया कड़ा न होकर केवल औपचारिकता वाला ही दिखाई दे रहा है। संबंधित कॉलेज वाले तो छात्रों की इस कारस्तानी को हमेशा ही नजरअंदाज करते आए हैं। प्रशासन ने भी कभी कार्रवाई नहीं की। इससे भी बड़ी बात यह है कि जनप्रतिनिधि भी इस बदरंगता के खिलाफ सामने नहीं आ रहे हैं। आए भी तो कैसे? शहर को बदरंग करने वालों में कहीं न कहीं इन जनप्रतिनिधियों के हित भी जुड़े हुए हैं। अब जिनके हित जुड़े हुए हैं, वह कानून की पालना किस मुंह से करवाए। लोकलाज कहिए या कानून का डर, लिहाजा कार्रवाई हो रही है लेकिन रस्म ही निभाई जा रही है।
घुड़की बेअसर
श्रीगंगानगर में शराब न केवल देर रात तक बिकती है बल्कि निर्धारित मूल्य से ज्यादा बिकती है और खुलेआम बिकती है। पिछले सप्ताह जब पुलिस कप्तान ने साफ तौर पर चेताया कि अब निर्धारित समय के बाद शराब दुकानें नहीं खुलेंगी तो लगा उनकी चेतावनी असरदार रहेगी। एक दो दिन असर रहा भी लेकिन इसके बाद शराब विक्रेताओं ने अपने-अपने रास्ते फिर खोज लिए। शराब फिर उसी पुराने ढर्रे पर बिकने की जानकारी मिली है। यह तो पुलिस की जांच का विषय है उसकी चेतावनी को इतनी गंभीरता से क्यों नहीं लिया जा रहा। वैसे सच्चाई पुलिस से छिपी भी नहीं हैं। कभी भी औचक छापेमारी कर वास्तविकता का पता लगाया जा सकता है।
टिकट का जुगाड़
चुनाव में हार-जीत तो जनता के मूड पर निर्भर होती है लेकिन टिकट का बड़ा योगदान होता है। टिकट किसको दी जाए और क्यों दी जाए, राजनीतिक दलों के लिए यह बात सबसे जरूरी होती है। खैर, टिकट की दौड़धूप के लिए सभी अपने-अपने घोड़े दौड़ा रहे हैं। सब खुद को इक्कीस साबित करने की कवायद में जुटे हैं। खास बात यह है कि अपनी बात कहने के लिए प्रेस कान्फ्रेंस तक आयोजित होने लगी हैं। पिछले दिनों तो एक ही पार्टी की दो प्रेस वार्ताएं वो भी एक ही दिन और एक ही समय पर थी। फर्क सिर्फ इतना था कि एक को पार्टी के जिलाध्यक्ष ने संबोधित किया तो दूसरी को उसी पार्टी के अनुसांगिक संगठन के जिलाध्यक्ष ने। पिछले दिनों एक धरने को लेकर भी दोनों के बीच अदावत देखी गई थी।
पार्टी की दूरी
सतारुढ़ दल के पार्टी के जिला संगठन के एक पदाधिकारी इन दिनों अच्छे खासे सक्रिय हैं। इनका एकमात्र ध्येय है किसी तरह से पार्टी का टिकट मिल जाए। इसके लिए न केवल तमाम कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं बल्कि जनता के बीच जाकर खुद का सक्रिय साबित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। पिछले दिनों भाईचारे के नाम पर बुलाया गया इनका सम्मेलन भी खासी चर्चा में रहा। वैसे इस सम्मेलन में उतना फायदा मिला भी नहीं, जितना सोचा गया था। नेताजी के समाज के लोगों ने समानांतर बयान जारी सम्मेलन पर सवाल उठा दिए। वैसे पार्टी का कोई बड़ा पदाधिकारी भी नेताजी के इस समेलन में नहीं आया। मतलब पार्टी ने सम्मेलन से दूरी बनाए रखी।
अध्यक्षी के लिए
चुनाव के समय समाजों की पूछ परख बढ़ जाती है। विशेषकर समाज विशेष के अध्यक्षों को मान-मनोव्वल खूब की जाती है। यही कारण है समाज का अध्यक्ष बनने के लिए खूब मेहनत करनी पड़ती है। समाज बंधुओं का ध्यान रखना पड़ता है। पिछले दिनों एक समाज के चुनाव में प्रतिस्पर्धा इस कदर बढ़ी कि समाज बंधुओं की बल्ले-बल्ले हो गई। इतना ही नहीं समाज बंधुओं के लिए अध्यक्षी के दावेदारों ने खाने के लिए अलग-अलग होटल तक बुक किए भी किए। भोजन के लिए पर्ची का सिस्टम तक अपनाया गया। अब यह बात जरूर चर्चा का विषय है कि यह खर्चा अध्यक्षी के दावेदारों ने किया कि पर्दे के पीछे फाइनेंसर कोई और था।

राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 30 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित

कमजोर प्रशासन!

टिप्पणी
छात्रसंघ चुनाव के मद्देनजर छात्र नेताओं के बीच चल रहे होर्डिंग्स वार के कारण शहर के चौक-चौराहे बदरंग हो चुके हैं। बड़ी बात यह है शहर को बदरंग होने से बचाने की जिनकी जिम्मेदारी है, वो न केवल चुप्पी साधे बैठे हैं बल्कि आंखें भी मंंूद रखी हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि जिला स्थायी लोक अदालत ने दो दिन पहले ही शहर के सौन्दर्य को बिगाड़ रहे अवैध होर्डिंग्स हटाने के संबंध में जो आदेश जारी किया था, उस पर भी कोई हलचल नहीं हुई। इससे साफ जाहिर है कि श्रीगंगानगर नगर परिषद व यूआईटी अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों की इस काम में कतई रुचि नहीं है। नियम विरुद्ध काम करने वालों के खिलाफ चुप्पी साध लेना एक तरह की प्रशासनिक कमजोरी है। यह एक तरह की खुली छूट है, जो कानून तोडऩे वालों का संरक्षण करती है, जबकि प्रदेश में दूसरे स्थानों पर शहर को बदरंग करने वालों पर बकायदा कार्रवाई हो रही है, वहां के जनप्रतिनिधि भी शहर को बदरंग होने से बचाने के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन श्रीगंगानगर में तो हालात कुएं में भांग जैसे हैं। जयपुर का ही उदाहरण है। वहां शहर को बदंरग करने के आरोप में निगम प्रशासन ने 16 छात्र नेताओं पर न केवल एफआईआर दर्ज करवाई बल्कि कुलपति से मुलाकात कर इन छात्र नेताओं को चुनाव के लिए अयोग्य घोषित करने की भी मांग की। इतना ही नहीं है जयपुर के महापौर ने उच्च शिक्षा मंत्री को पत्र भेजकर लिंगदोह कमेटी की पालना न करने वाले छात्र नेताओं को चुनाव के लिए अयोग्य घोषित करने की मांग की है। साथ ही शहर को बदरंग होने से बचाने का आग्रह भी किया है। इधर, श्रीगंगानगर में नगर परिषद व यूआईटी के अधिकारी तो हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। नगर परिषद व यूआईटी के मुखियाओं का ‘गूंगापन’ भी इसकी बड़ी वजह है। शहर के इस हालात पर उनको तरस क्यों नहीं आता? आए भी कैसे ? चौक चौराहों पर खुद के फोटो लगे पोस्टर/ बैनर लगवाने के मामले में ये मुखिया भी पीछे नहीं रहते। कमोबेश ऐसे ही हालात जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। खैर, कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ जब तक कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक शहर इसी तरह बदरंग होता रहेगा। यह प्रशासिनक कमजोरी का ही नतीजा है कि शहर के चौक-चौराहों को बपौती समझकर बदरंग करने वालों के हौसले बुलंद हैं। साल भर वो अपनी मनमर्जी से शहर को बदरंग करते रहते हैं लेकिन जिम्मेदारों ने कभी कार्रवाई नहीं की। उम्मीद की जानी चाहिए प्रशासन व जनप्रतिनिधि इस बदरंगता को दूर करने के लिए कारगर कदम उठाएंगे। साथ ही कड़ी कार्रवाई से ही कानून तोडऩे वालों के मन में भय होगा, अन्यथा नोटिस रूपी गीदड़ भभकियों से बात नहीं बनने वाली।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 26 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित 

अंदरखाने

लघुकथा
एक सामाजिक सम्मेलन में मंचासीन अतिथि एक दूसरे के हाथों में हाथ डालते हुए खडे़ हुए और हाथों को लहराते हुए संकल्प लिया। सभी ने एक स्वर में कहा हम समाज में जागरुकता लाएंगे। सामाजिक कुरातियों को दूर रहेंगे। दहेज प्रथा आज की सबसे बड़ी ज्वलंत समस्या है। अतिथियों ने दहेज न लेने व न देने के संकल्प उपस्थित लोगों से भी करवाया । सम्मेलन के बाद सभी अतिथि जब मंच से नीचे उतरने लगे तो भीड़ में शामिल एक शख्स उम्मीद भरी नजरों से मुख्य अतिथि से मुखाबित हुआ। हाथ जोड़ कर बोला हुकुम, मेरी बिटिया के लिए आपके लड़के का हाथ मांगता हूं। मेरा सामथ्र्य इतना ही नहीं कि मैं दहेज में मोटा सामान दे सकूं। आज आपने मंच से संकल्प दिलाया तो मुझे आपसे बेहतर कोई नजर नहीं आया। मुख्य अतिथि ने आंखें तरेरी और शख्स का हाथ पकड़कर एक तरफ ले जाकर कान में फुसफुसाए। मंच की बात पर मंच पर आ गई हो गई। अंदरखाने सब चलता है। आई बात समझ में.. हाथ जोड़े खड़ा वह शख्स जवाब सुनकर बिलकुल अवाक था।

पतली गली

लघुकथा 
अरे बाबोसा, पड़ोस के गांव में लड़का फौज में है, उसके टीके में पांच लाख और कार आई है। अपना बेटा तो अफसर है..अफसर, सोच लो कितने की डिमांड की जाए। तभी दूसरे युवक ने बात काटते हुए कहा अरे नहीं, नहीं काकोसा हुकुम काम तो अपनी कमाई से चलेगा। टीका लेने से कौन सी जिंदगी कट जाएगी, इसलिए अपने को दहेज बिलकुल भी नहीं लेना। बिना दहेज की शादी से समाज में अच्छा संदेश भी जाएगा। ठाकुर साहब असमंजस में थे कि किस की बात पर यकीन किया जाए। माथे की त्योरियां चढाते हुए बोले, अपने बबलू का रिश्ता फाइनल हो चुका है। दहेज में पांच लाख टीका और पांच लाख की गाड़ी की बात भी तय हो चुकी है। अब फैसला पलट नहीं सकते। कोई रास्ता बताओ कि काम भी हो जाए और समाज में संदेश भी चला जाए। अचानक तीसरा युवक उठा और ठाकुर साहब के कान में कुछ फुसफुसाया। ठाकुर साहब के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई। आखिरकार शादी का दिन आ गया। बारात लड़की वालों के यहां पहुंची। सहेले पर लड़की के पिता ने 11 लाख की कार की चाबी सौंप दी। साथ ही थाली में पांच लाख रुपए भी दिए, लेकिन ठाकुर साहब ने पैसे यह कहते हुए वापस कर.दिए कि टीका लेना हमारी शान के खिलाफ है। हम दहेज लेने के पक्षधर नहीं। खैर, अगले दिन अखबारों में इसी शादी के चर्चे थे। शीर्षक था दूल्हे ने टीके के पांच लाख लौटाकर समाज में अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। और इधर ठाकुर साहब कार को गिफ्ट बताकर मूंछ को ताव दे रहे थे।

पचास साल के युवा

बस यूं ही
सुधीर भाईजी। गांव में इनको हर युवा इसी नाम से पुकारता है। एक बार मैंने भाईसाहब कहा था तो टोक दिया और बोले भाईजी ही ठीक है। सुधीर भाईजी पेशे से अध्यापक होने के साथ-साथ न केवल खेल प्रेमी हैं बल्कि युवाओं जैसी ऊर्जा व फुर्ती भी रखते हैं। पचास साल के होने के बावजूद इनकी स्टेमना गजब की है। इनका परिवार पहले कोलकाता रहता था। छुट्टियों में यह लोग जब गांव आते थे तो क्रिकेट खेलते थे। इनको देखकर ही क्रिकेट के प्रति मोह पैदा हुआ। मैदान से बाहर बैठकर उनको खेलते देखता था। स्थायी रूप से गांव आने के बाद सुधीर भाईजी का क्रिकेट नियमित हो गया। आसपास के गांवों में जब भी क्रिकेट प्रतियोगिता होती सुधीर भाईजी का नाम सबसे पहले होता। सुधीर भाईजी सलामी बल्लेबाज की भूमिका में उतरते। धीरे-धीरे मैं भी अच्छा खेलने लगा। फिर तो सुधीर भाईजी के साथ ही खेलना होने लगा। हमने लंबे समय तक केहरपुरा कलां की क्रिकेट टीम की सलामी जोड़ी की भूमिका निभाई। गांव के खेल मैदान पर हम काफी समय तक साथ-साथ खेले हैं। वैसे सुधीर भाईजी को गांव के साथी सचिन भी कहते थे। यह भी एक संयोग है कि सुधीर भाईजी पहले कीपिंग भी करते थे। बाद में यह जिम्मेदारी मैंने संभाली। पत्रकारिता में आने के बाद मेरा क्रिकेट छूट गया लेकिन सुधीर भाईजी की पोस्टिंग नजदीकी गांवों में होने के कारण उनको खेल जारी रखने में दिक्कत नहीं हुई। फिलहाल गांव में वॉलीबाल पर जोर ज्यादा है। इस खेल में भी सुधीर भाईजी की फुर्ती देखने लायक होती है।
हाल ही में गांव के खेल मैदान को समतल किया गया है। इस पर ट्रेक बनाया जाना प्रस्तावित है। पिछले सप्ताह स्वाधीनता दिवस पर गांव गया था। ट्रेक निर्माण के सिलसिले में सरपंच प्रदीप झाझडि़या व युवा नेता बबूल चौधरी युवाओं के साथ मैदान पर पहुंचे थे। मैं भी खेल मैदान गया था। वहां सुधीर भाईजी के साथ एक फोटो ली। उसी मैदान की जहां हम साथ-साथ खूब खेले हैं। तेज धूप और दोपहर होने के कारण हम पसीने से लथपथ थे। हमको देखकर भाई राजेश भी पास आ गया। कहने लगा कि मैं भी तो आपकी टीम का हिस्सा रहा हूं। राजेश सेना की नौकरी से सेनानिवृत्त हो चुका है। उस वक्त राजेश का थ्रो बड़ा गजब का हुआ करता था। वह थ्रो इतनी तेजी से फेंकता कि मैदान के एक छोर से दूसरे छोर तक गेंद हवा में ही पहुंचा देता था। एेसा करना हर किसी के बस ही की बात नहीं होती है। बहरहाल, खुशी की बात यह है कि सुधीर भाईजी न केवल खुद खेलते हैं बल्कि खेलने वालों को प्रोत्साहित भी करते हैं। उनका यह जज्बा कायम रहे।

इक बंजारा गाए-43


फिर गफलत
यूआईटी के कामों में अक्सर कोई न कोई पंगा आता ही रहता है। शायद ही ऐसा कोई काम होगा, जो शांतिपूर्वक सिरे चढ़ा हो। ताजा मामला सुखडिय़ा सर्किल पर लगाए गए तिरंगे झंडे का है। श्रेय लेने के लिए झंडे को जल्दबाजी में लगा तो दिया लेकिन उसको उतारने या आधा झुकाने के विकल्प पर विचार नहीं किया गया। स्वाधीनता दिवस के दूसरे ही दिन पूर्व प्रधानमंत्री के निधन पर राजकीय शोक घोषित किया गया तो झंडा आधा झुकाने के बजाय पूरा ही उतार लिया गया। बताया जा रहा है कि तिरंगे झंडे को झुकाने की व्यवस्था नहीं है, लिहाजा उसे पूरा ही उतारा गया। देखते हैं अधूरा काम पूरा कब तक पूरा होता है लेकिन जल्दबाजी में हुई गफलत ने एक बार तो पंगा डाल ही दिया।
आदेश से आफत 
अक्सर काम करने की नसीहत दी जाती है। आराम को हराम तक की संज्ञा दे दी गई है। फिर भी कई बार कामों को रोकना पड़ता है। कारण चाहे कुछ भी हों। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के कारण राजकीय शोक के साथ कुछ राज्यों में अवकाश की घोषणा भी की गई, लेकिन इस अवकाश को ग्रामीण विकास के जिला स्तरीय कार्यालय ने गंभीरता से नहीं लिया। बताया जाता है कि यह विभाग रविवार को भी अक्सर खुला रहता है। शायद इसी कारण राजकीय अवकाश के दौरान भी इसको खुला रखने के निर्देश दे दिए गए। मामला तूल पकड़ गया तो जिम्मेदारों को इसका अहसास हुआ। आखिर कार्यालय आए कार्मिक श्रद्धांजलि अर्पित कर लौट गए।
बीमार जनप्रतिनिधि
रंगीन कुर्सियों के मामले में इन दिनों गांवों की सरकार में जबरदस्त हलचल मची हुई है। मामला अभी विचाराधीन है लेकिन जनप्रतिनिधियों में अच्छी खासी चर्चा का विषय बना हुआ है। विशेषकर रंगीन कुर्सी लगाने वाली पंचायतों के मुखियों में इसी बात का भय है कि अब आगे क्या होगा। जब तक जांच मुक्कमल नहीं हो जाती है, यह भय बना ही रहेगा। वैसे भय चीज ही ऐसी होती है, भले चंगों को भी बीमार बना देता है। सुनने में आ रहा है कि जांच के भय के चलते कई जनप्रतिनिधि बीमार हो गए हैं। कुछ जनप्रतिनिधि तो जिला मुख्यालय के अस्पतालों में स्वास्थ्य लाभ ले रहे बताए। यह अनजाना भय तभी दूर होगा जब जांच में दूध का दूध और पानी का पानी होगा।
मार्केटिंग का जमाना
नेकी कर और दरिया में डाल वाली कहावत कभी प्रासंगिक रही होगी, मौजूदा दौर में इस कहावत के मायने बदल गए हैं। अब तो तिल का ताड़ बनाने या थोड़ा करके ज्यादा गिनाने व बताने का जमाना है। श्रीगंगानगर शहर भी इस बदलाव से अछूता नहीं हैं। यहां भी कुछ इस तरह की संस्थाएं हैं, जो कथित समाजसेवा के नाम पर असहाय लोगों की मदद करती हैं। यह बात दीगर है कि इनकी मदद की तरीका बिलकुल प्रचार वाला ही होता है। मतलब किसी को भोजन भी कराया जाता है तो बकायदा उसका ढोल पीटा जाता है। कुछ संस्थाएं तो ऐसी हैं, जो सामान किसी दूसरे से लेती हैं और श्रेय खुद ले उड़ती हैं। इतना ही नहीं दूसरों के दान पर खुद का लेबल लगाकर सम्मानित होने का रिवाज भी इन दिनों प्रचनल में है।
पूछ-परख का दौर
चुनाव का मौसम होता ही ऐसा है। पता नहीं क्या क्या जतन करने पड़ते हैं। मतदाताओं की पूछ-परख तो अचानक से बढ़ जाती है। उनके दुख-दर्द में भागीदार बनने की होड़ सी लग जाती है। इतना ही नहीं मतदाताओं को रिझाने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाती। चुनाव की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आएगी मतदाताओं की मांग व नखरे भी बढ़ते जाएंगे। फिलहाल शहर में खाने-पिलाने का दौर शुरू हो चुका है। कई तो चुनाव लडऩे के लिए इतने अधीर हैं कि शक्ति प्रदर्शन तक करने लगे हैं। यहां तक कि मतदाताओं को होटल में ठहराने में भी गुरेज नहीं कर रहे। टिकट मिले या न मिले यह अलग बात है कि पर कुछ नेता तो चुनाव लडऩे का पूरा मानस बना चुके हैं। इस बहाने हाथ खोलकर खर्चा भी कर रहे हैं।
समय-समय की बात
एक पूर्व मंत्री के खासमखास इन दिनों संकट हैं और पूर्व मंत्री चाहकर भी इनकी कोई मदद नहीं कर पा रहे। वैसे भी पूर्व मंत्री में अब पहले वाली बात नहीं रही। दरअसल, मंत्रीजी के खासमखास पहले किसी होटल को लेकर मुसीबत में फंसे थे। वह मामला अभी पूरी तरह से निपटा भी नहीं कि अब एक पीजी की ऊंचाई अधिक होने की शिकायत हो चुकी है। वैसे यह पीजी पूर्व मंत्रीजी के खासमखास के भाई का बताया जा रहा है। समय-समय की बात है, कभी मंत्रीजी के एक फोन पर ही काम हो जाया करते थे लेकिन आज उनके नजदीकी व खास लोग संकट में हैं और कुछ भी नहीं कर पा रहे। फिलहाल पीजी में रहने वाली लड़कियों को ढाल बनाकर बचाव का प्रयास कितना कारगर रहता है यह देखने की बात है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर के 23 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित। 

सरहद की चौकसी में शामिल हैं ‘पाकिस्तानी’ श्वान

हिन्दुमलकोट क्षेत्र में है श्वानों की जोड़ी
श्रीगंगानगर. इंसानी फितरत भले ही सरहदों के भेद को माने लेकिन जानवरों के लिए सरहद की पाबंदी कोई मायने नहीं रखती है। इतना ही नहीं जानवर इंसानों की तरह भेदभाव या दुश्मनी की बातें भी नहीं जानते। तभी तो दो ‘पाकिस्तानी’ श्वान न केवल वफादारी से अपनी ड्यूटी कर रहे हैं बल्कि सीमा सुरक्षा बल के जवानों के साथ सरहद पर मुस्तैदी से चौकन्ना भी रहते हैं। इन ‘पाकिस्तानी’ श्वानों की सरंचना सामान्य श्वानों के मुकाबले कमजोर है फिर भी सामान्य श्वान इनके आगे दुम दबाकर भागने पर मजबूर हो जाते हैं।
श्रीगंगानगर से लगी भारत पाक अंतराष्ट्रीय सीमा पर आबाद हिन्दुमलकोट में दो ‘पाकिस्तानी’ श्वान सीमा सुरक्षा बल के जवानों से बेहद घुलमिल गए हैं।इन श्वानों की कहानी भी बड़ी रोचक है। सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने बताया कि कुछ समय पहले पाकिस्तान से तारबंदी पार कर एक मादा श्वान भारतीय सीमा में प्रवेश कर गई। उस वक्त मादा गर्भवती थी और यहां आने के बाद उसने तीन पिल्लों को जन्म दिया। पिल्लों के जन्म देने के बाद मादा श्वान की मौत हो गई। इसके बाद सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने इन पिल्लों को पाला। बाद में एक पिल्ले की भी मौत हो गई। शेष रहे दो पिल्ले अब जवान हो चुके हैं। जवानों ने बताया कि यह काले रंग के दोनों श्वान बेहद खुंखार हैं। रात भर चौकसी में न केवल उनके साथ देते हैं बल्कि हल्की सी आहट पर भी सचेत भी कर देते हैं। दोनों श्वान उनकी रात को जंगली जीव-जंतुओं से भी रक्षा करते हैं।
सांपों से भी करते हैं रक्षा
अब दोनों श्वान साल भर के हो गए हैं। देशी नस्ल के यह श्वान नाटे कद के हैं। लेकिन तेज तर्रार इतने कि सीमा चौकी क्षेत्र में किसी जानवर के घुसने पर उसे बाहर निकाल कर ही दम लेते हैं। इन दिनों इनका ठिकाना हिन्दुमलकोट का पुराना स्टेशन है जहां स्टेशन के पुराने भवन के जीर्णोद्धार का काम चल रहा है। वहां तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने बताया कि दोनों श्वान रात-भर इधर-उधर घूमते हुए पहरेदारी करते हैं। कई बार तो इन्होंने रात के समय जहरीले सांपों तक का मुकाबला कर जवानों को सचेत किया है। घूमते हुए यह तारबंदी तक भी चले जाते हैं। लेकिन उसे पार करने की बजाय वापस आ जाते हैं।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 22 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित

सावन सूखा बीत रहा

सावन सूखा बीत रहा
उमस रही सताय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन नहींं मनभावन
दो बर रहयो नहाय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन की इस गर्मी में
कछु नही सुहाय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन सूखा देखकर
मन नहीं हरषाय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन भी जेठ का
एहसास रहा दिलाय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन की सुहानी यादें
मन रहा बिसराय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय

बदहाल सौर ऊर्जा संयंत्र

प्रसंगवश
सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने तथा बिजली की बचत करने के मकसद से प्रदेश के ग्राम पंचायत मुख्यालयों व पंचायत समितियों के अटल सेवा केन्द्रों पर लगाए गए सौर ऊर्जा संयंत्र दम तोडऩे लगे हैं। अकेले श्रीगंगानगर जिले में ही पचास फीसदी के करीब संयंत्र उपयोग में नहीं आ रहे हैं। कमोबेश प्रदेश के दूसरे स्थानों पर भी हालात कोई खास संतोष-जनक नहीं कहे जा सकते।
उल्लेखनीय है कि ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर संयंत्र लगाने में करीब दो लाख रुपए जबकि अटल सेवा केन्द्रों पर दस लाख रुपए खर्च हुए थे। इस तरह श्रीगंगानगर जिले के 336 ग्राम पंचायत मुख्यालयों व नौ अटल सेवा केन्द्रों पर साढ़े सात करोड़ से भी ज्यादा की राशि खर्च की गई थी। श्रीगंगानगर जैसे हालात कमोबेश प्रदेश के सभी जिलों में हैं। पूरे प्रदेश के परिपे्रक्ष्य में देखें तो मामला और चौंकाता है। प्रदेश में करीब तीन सौ पंचायत समितियां व दस हजार के करीब ग्राम पंचायतें हैं। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि सभी जगह संयंत्र लगाने में कितनी राशि खर्च हुई। विडम्बना यह है कि जिस मकसद से संयंत्र स्थापित किए गए थे, वह पूरा ही नहीं हो रहा है। संयंत्रों को ठीक करने की उम्मीद की कोई किरण भी नजर नहीं आती है। इन संयंत्रों का भविष्य क्या होगा? इनका रखरखाव कैसे किया जाएगा तथा खराब होने की स्थिति में इनको ठीक कौन करेगा व कैसे करेगा, इसको लेकर भी कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश दिखाई नहीं देते। इन संयंत्रों का रखरखाव करने वाली कंपनी का अनुबंध भी पांच साल तक ही था। वह भी पूरा हो चुका है। सौर ऊर्जा संयंत्रों की सुध न लेना एक तरह से सरकारी राशि का दुरुपयोग जैसा ही है। जिम्मेदारों के अव्यावहारिक व अदूरदर्शिता भरे फैसले के कारण न तो सरकारी राशि का सदुपयोग हुआ और ना ही सौर ऊर्जा से ग्राम पंचायत मुख्यालय रोशन हुए। ऐसे हालात में बिजली बचत की बात तो बिल्कुल ही बेमानी ही हो गई। ऐसे में सौर ऊर्जा संयंत्रों की कहानी एक तरह से 'माया मिली न राम' वाले मुहावरे को ही चरितार्थ कर रही है। सरकार को इस समूचे प्रकरण की न केवल जांच करवानी चाहिए बल्कि इससे सबक भी लेना चाहिए ताकि भविष्य में तात्कालिक वाहवाही के बजाय ठोस काम हों और सरकारी राशि का सदुपयोग हो। तभी आमजन सरकारी योजनाओं से लाभान्वित हो सकेगा।
एक तरफ सरकार वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सौर ऊर्जा संयंत्रों की यह बदहाली है। बहरहाल, सरकार को खराब संयंत्रों को ठीक करने का कोई रास्ता खोजना चाहिए। इनका रखरखाव किस तरह से किया जाए ताकि इनका लाभ लंबे समय तक मिल सके। अन्यथा ये संयंत्र केवल अतीत की कहानी बन कर रह जाएंगे
 
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18 अगस्त 18 को राजस्थान पत्रिका के राजस्थान के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित 

एकजुटता का पाठ पढ़ा गए वाजपेयी

अलविदा अटल : स्मृति शेष 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भले ही पंचतत्व में विलीन हो गए हों, देशवासियों को भावनात्मक रूप से वे एकसूत्र पिरो गए। उनके विचार, उनके सिद्धांत तथा राजनीति में दिए गए उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। उनके निधन पर शायद ही एेसा कोई होगा जिसने राजनीति के इस पुरोधा को श्रद्धांजलि न दी हो। पक्ष- विपक्ष सभी ने इस चिंतक-विचारक को दिल से श्रद्धा सुमन अर्पित किए। समूचे देश में वाजपेयी के लिए संवेदनाओं का जो सैलाब उमड़ा वह साबित करता है कि देशवासियों के मन में उनके प्रति कितनी श्रद्धा थी। एेसा होना भी था, क्योंकि वाजपेयी के लिए भी देश सर्वोपरि था। सक्रिय राजनीति में वह जब तक रहे देश की उन्नति व उत्थान के लिए कार्य करते रहे। वाजपेयी न केवल भाजपा का उदारवादी चेहरा थे बल्कि वे करिश्माई नेता भी थे। उनमें श्रोताओं को बांधने की अद्भुत कला थी। यही कारण था, उनको सुनने जन सैलाब उमड़ता था। उनके बोलने का अंदाज श्रोताओं को प्रभावित करता था। उनके चेहरे की भाव भंगिमाएं तथा रुक-रुक कर बोलने की शैली लुभाती थी। वे अपने भाषणों में श्रोताओं को हंसाते थे, गुदगुदाते थे तथा सोचने पर मजबूर भी करते थे। तेरह दिन की उनकी पहली सरकार जब गिरी थी, तो संसद में दिया गया उनका भाषण कालजयी हो गया। आज भी सोशल मीडिया पर वाजपेयी के उसी भाषण को न केवल सुना जा रहा है बल्कि पसंद भी किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर वाजपेयी को जिस अंदाज में श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है, वह अपने आप में अनूठी है। कोई उनको उन्हीं की कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि दे रहा था तो कोई अपने संस्मरण में उनको याद कर रहा है। वाजपेयी प्रखर वक्ता होने के साथ-साथ कवि भी थे। उनकी कालजयी कविताएं आज जन-जन की जुबान पर है। वाजपेयी रिश्ते निभाने के लिए जाने जाते हैं, विशेषकर अपने दोस्तों के लिए वो हमेशा तैयार रहते थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा भैरोंसिंह शेखावत तीनों में गहरी दोस्ती रही। इनकी दोस्ती मिसाल मानी जाती रही है। परहित अर्पित तीन-मन के दर्शन में विश्वास करने वाले वाजपेयी ने पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नारे जय जवान, जय किसान को आगे बढ़ाते हुए इसमें जय विज्ञान भी जोड़ा। इतना ही नहीं पोकरण में परमाणु बम परीक्षण कर समूचे विश्व को हतप्रभ कर दिया। वाजपेयी पड़ोसी मुल्कों से रिश्ते मधुर रखने के हिमायती थे। इसके लिए उन्होंने कई बार प्रयास किए। उन्होंने पाकिस्तान की बस से यात्रा भी की। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को शिखर सम्मलेन के लिए आमंत्रित किया। इतना ही नहीं वाजपेयी की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना तथा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना सभी की जुबां पर है। राजस्थान से उनका गहरा नाता रहा। शायद ही एेसा कोई बड़ा शहर रहा होगा जहां वाजपेयी न आए हों। राजस्थान के कमोबेश हर शहर से वाजपेयी की यादें जुड़ी हैं। यही हाल देश के अन्य स्थानों का है। यही कारण है उनके निधन के बाद देश के कोने कोने से जन सैलाब उमड़ा। हर कोई अपने प्रिय नेता के अंतिम दर्शन करने तथा श्रद्धांजलि अर्पित करने को उत्सुक था। अंतिम यात्रा के दौरान सड़क के दोनों तरफ खड़ा हुजूम यह साबित कर रहा था कि वाजपेयी सच्चे अर्थों में जननेता थे। राजनीति के मौजूदा दौर में वाजपेयी जैसा चेहरा नजर नहीं आता। उदारवादी होने के साथ-साथ वे सर्वधर्म में विश्वास करने वाले नेता थे। वे एेसे नेता थे जिनके विपक्षी दलों से भी मधुर संबंध रहे। वाजपेयी की लोकप्रियता इसी से साबित होती है कि उन्होंने देश के विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा और जीता। भारतीय संसद को दिया गया उनका 52 साल का एेतिहासिक योगदान आने वाली पीढि़यों का मार्गदर्शन करता रहेगा।

हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर में 18 अगस्त के 18 के अंक में विज्ञापन परिशिष्ट में प्रकाशित

अटल जी : न भूतो न भविष्यति

स्मृति शेष 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे। उनके निधन के बाद संवेदनाओं का सैलाब, भावनाओं का भूचाल तथा श्रद्धांजलि का सिलसिला इस कदर है कि शायद ही पहले कभी ऐसा देखा गया हो। नेताओं को जी भर के गरियाने वाले इस दौर में शायद ही कोई नेता एेसा लोकप्रिय हुआ होगा, जिसके लिए आज समूचा देश गमगीन है। अपने दिवंगत नेता को सारा देश दल विशेष की राजनीति से ऊपर उठकर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दे रहा है। सोशल मीडिया पर कमोबेश आज हर पोस्ट अटलजी के नाम है। सचमुच देश ने आज एक प्रखर वक्ता व करिश्माई नेता खो दिया। उदारवादी चेहरा, चिंतक, राजनीति का चमकता चेहरा हमारे बीच से हमेशा हमेशा के लिए चला गया है। यह बात दीगर है कि राजनीतिक परिदृश्य से गायब होने बाद अटलजी सुर्खियों में रहे तो मौत की अफवाहों के कारण। साल में तीन चार बार तो उनकी मौत की खबर वायरल हो ही जाती लेकिन अपनी ही कविता मौत से ठन गई की तरह अटल मौत की अफवाहों के सामने अटल रहे, लेकिन इस बार इस जंग में जिंदगी हार गई और मौत जीत गई। 
उनके निधन की खबर से मन विचलित है। राजनीतिक पत्र-पत्रिकाओं को शुरू से पढऩे के कारण राजनीतिक समझ जल्द विकसित हो गई थी। यही कारण था राजनीति में रुचि बढऩे लगी। वाजपेयी की विद्वता, आंखें मूंदकर व सिर हिलाकर बोलने का अंदाज इतना लुभाता था कि मैं कब उनका फैन बना पता ही नहीं चला। टीवी रेडि़यों पर उनके कई भाषण सुने हैं लेकिन दो बार उनको साक्षात सुनने का मौका भी मिला है। सीकर के आईटीआई मैदान में अटलजी की सभा थी। तारीख व सन को लेकर थोड़ा असमंजस है, कि यह 1989 की बात है या फिर 1993 की। खैर, अटल जी को सुनने की उत्सुकता कई दिनों से थी। सभा की जानकारी तो मिल गई थी पर सुनने कैसे जाऊं, यही दुविधा में मन में घर किए हुए थी। आखिर पता चला कि पड़ोसी कस्बे सुलताना से सीकर के लिए बस जाएगी। मैं गांव से सुलताना चला गया और बस में बैठ गया। सीकर में जहां अटलजी की सभा थी, उससे काफी दूर ही वाहनों की पार्किंग दी गई थी, लिहाजा बस से उतर कर पैदल ही सभास्थल की ओर रवाना हुआ। इतनी भीड़ पहली बार देखी थी। भीड़ में धक्के खाता हुआ आखिर मैं भी सभा स्थल पहुंच गया। मैं जिनके साथ गया था, उनको किसी को नहीं जानता था। घर वालों को भी बिना बताए ही निकला था। सभा खत्म हुई तब तक शाम को चुकी थी। मैं भीड़ में धक्के खाता सुलताना की बस को तलाश रहा था। संयोग से बस मिल गई लेकिन तब तक वह अंदर से फुल हो गई थी। अकेला बस की छत पर बैठा। सीकर से उदयपुरवाटी होते हुए रात को बस सुलताना पहुंची। वहां से पैदल गांव आया तब तक रात के दो बज चुके थे। इस बात को लेकर जितनी डांट पड़ी उसका तो कहना क्या लेकिन अटल जी को साक्षात सुनने की हसरत जरूर पूरी कर ली। इसके बाद अटलजी, झुंझुनूं के सेठ मोतीलाल कॉलेज स्टेडियम में विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित करने आए थे, तब उनको सुना। यह शायद 1998 की बात है और तब भाजपा की टिकट पर चुनाव मोहम्मद गुल ने लड़ा था।
बहरहाल, लंबे समय से बीमारी से जूझते हुए अटल आज अनंत में समा गए, लेकिन देश के प्रति उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। वो सबको साथ लेकर चलने वाले नेता थे। दलगत विचारधारों के अलावा व्यक्तिगत जीवन में शायद ही कोई अटल जी का विरोधी होगा। पड़ोसी देश पाक से रिश्ते मधुर बनाने के लिए अटल जी ने हमेशा प्रयास किए। खैर, अटल जी जैसा नेता मुझे अतीत या वर्तमान दौर में कोई नजर नहीं आता है। राजनीति के पुरोधा अटल जी को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि। वो एक राजनेता के साथ साथ कवि और पत्रकार.भी थे। उनके विराट व्यक्तित्व के लिए इतना ही कहा जा सकता है कि ...
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा...

सेहत से खिलवाड़

प्रसंगवश 
श्रीगंगानगर के राजकीय जिला चिकित्सालय में 'भामाशाह स्वास्थ्य योजना' में अनियमितता का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य व चिकित्सा विभाग में प्रदेश स्तर तक हड़कंप मचा हुआ है। मामले की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने इसकी जांच भी शुरू कर दी है। यह मामला पिछले डेढ़ साल में 'भामाशाह स्वास्थ्य योजना' के तहत राजकीय जिला चिकित्सालय में आने वाले मरीजों से संबंधित है। अभी तक की जांच में सामने आया है कि जिला अस्पताल में भर्ती तो 42 सौ मरीज हुए, लेकिन 28 सौ रोगियों को प्राइवेट अस्पताल या नर्सिंग होम भेज दिया गया। इन मरीजों को यह कहते हुए निजी अस्पतालों में भेजा गया कि आपको ऑपरेशन के लिए तीन माह का इंतजार करना पड़ेगा। इस प्रकरण में अभी पांच चिकित्सकों की भूमिका संदिग्ध मानी गई है। अब मरीजों से जाकर पूछा जाएगा कि उनको प्राइवेट अस्पतालों में भेजने के पीछे इन चिकित्सकों की मंशा क्या थी?
खैर, बात अकेली भामाशाह स्वास्थ्य योजना में वेटिंग की ही नहीं है। वेटिंग का यह 'खेल' अधिकतर जांच व ऑपरेशन में बदस्तूर चल रहा है। दो-दो, तीन-तीन माह की आगामी तारीख देकर मरीजों को टरकाया जा रहा है। वेटिंग लंबी होने की प्रमुख वजह स्टाफ की कमी या मरीजों की अधिकता को बनाया जाता है, लेकिन सच कुछ और ही है। वेटिंग का यह 'खेल दरअसल, कमीशन से जुड़ा है। यह तो सभी जानते हैं कि ऑपरेशन या जांच करवाकर तत्काल राहत पाने की उम्मीद रखने वाला मरीज किसी भी सूरत में लंबा इंतजार नहीं कर सकता। एेसे में वह प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करता है। गंभीर बात यह है कि वेटिंग का सुनियोजित 'खेल' प्रदेश के कमोबेश हर सरकारी अस्पताल में देखने को मिल जाएगा। सस्ते व सहज-सुलभ इलाज की उम्मीद में सरकारी अस्पताल आने वाले मरीजों के साथ यह धोखा नहीं तो और क्या है? भामाशाह स्वास्थ्य योजना के तहत मरीजों को मुफ्त इलाज का ढिंढेरा पीटने वाली सरकार को यह सब नजर क्यों नहीं आता? ऐसे हालात कोरे भामाशाह कार्ड धारकों के लिए ही बन रहे हों ऐसा नहीं है। सरकारी अस्पतलों में मरीज इसीलिए जाने से घबराता है कि उसका ऑपरेशन हुआ तो समय पर नंबर आ पाएगा या नहीं। समय-समय पर मरीजों के परिजनों और डॉक्टरों के बीच कहासुनी व मारपीट की घटनाओं का बड़ा कारण मरीजों की अनदेखी के रूप में भी सामने आता है। सरकार को को तत्काल इस वेटिंग रूपी 'खेल' को बंद कर जिम्मेदारों पर नकेल कसनी चाहिए। वरना कमीशनखोरी की दीमक सरकार की 'भामाशाह' जैसी अहम योजना को दिन-ब-दिन खोखली करती जाएगी।

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राजस्थान पत्रिका के 11 अगस्त 18 को राजस्थान के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित

जल्दबाजी का नतीजा

टिप्पणी
सुरक्षा व सुविधाओं पर सवाल तब भी उठे थे, और आज भी यथावत हैं। व्यवस्थाओं में खामियों के जुमले तब भी बने जो अब चरम पर पहुंच गए हैं। अनिष्ट की आशंकाओं के बादल तो पहले दिन ही मंडरा गए थे, जब एक सांड अचानक हवाई पट्टी पर आ गया था। हवाई सेवा शुरू करने में बरती गई जल्दबाजी पर तंज तब भी कसे गए थे, जो अब मजाक में तब्दील हो चुके हैं। यह सब इतना आनन-फानन व जल्दबाजी में हुआ कि एक माह के भीतर इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच शुरू हुई हवाई सेवा ने लोगों को खुशी तो दी लेकिन लालगढ़ हवाई पट्टी के हालात देखकर ऐसा कोई नहीं था, जिसने प्रसन्नता जताई। पहले दिन जयपुर से उडकऱ विमान जब लालगढ़ की हवाई पट्टी पर उतरा तो उसे देखने जनसैलाब उमड़ा लेकिन सुविधाओं व सुरक्षा के नाम जो थोड़ा बहुत पहले दिन दिखाई दिया वह दूसरे दिन सिरे से गायब था। खैर, हवाई सेवा चालू तो हुई लेकिन हवाई पट्टी जाने व आने वाले यात्रियों के लिए या बिजली या पानी तक की व्यवस्था नहीं है। हवाई पट्टी के चारों तरफ चारदीवारी भी नहीं है। हवाई सेवा की बुकिंग वैसे तो ऑनलाइन होती है फिर भी सीट खाली रहने की स्थिति में एक युवक टिकट काटता है। यह सब ठीक उसी तर्ज पर होता है जैसे किसी देहाती इलाके में खुले में खड़े होकर बस परिचालक यात्रियों को टिकट थमाता है। गंभीर विषय तो यह है कि हवाई पट्टी के नजदीक सैनिक छावनी होने के बावजूद यात्रियों की जांच-पड़ताल तक की कोई व्यवस्था नहीं है। स्थायी एंबुलेंस व चिकित्सकों की टीम जैसा भी यहां कुछ नहीं है। बड़े विमान उतरने के लिए यह हवाई पट्टी वैसे भी अनुकूल नहीं है। इसके विस्तार के लिए भूमि अधिग्रहण का मामला भी राज्य सरकार के पास विचाराधीन है।
बहरहाल, संतोष करने की बात यह है कि इस हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई लेकिन इसकी वजह से कितनों की सांसें एकबारगी के लिए थमी, उसका कोई अंदाजा नहीं है। माना हवाई सेवा मौजूदा समय की जरूरत है लेकिन सुविधाओं और सुरक्षा को दरकिनार कर मानव जीवन को खतरे में डालने वाली सेवा किस काम की। हवाई पट्टी के हालात देखते हुए यह कहना उचित होगा कि हवाई सेवा आधी अधूरी तैयारियों के साथ जल्दबाजी में शुरू की गई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस मामले में गंभीरता से विचार करेगी तथा जो खामियां व कमियां हैं, उनका तुरंत निराकरण करवाएगी ताकि हवाई यात्रा करने वालों के जेहन में किसी तरह की आशंका पैदा ही न हो।


राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 09 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित । 

इक बंजारा गाए-42


सडक़ में भेद
यूआईटी के हाल ही करवाए गए कई कामों पर अंगुली उठी है। चाहे वो सूरतगढ़ मार्ग पर सर्विस रोड का मामला हो या फिर सदर थाने के पास बीच सडक़ में चौक बनाने की बात हो। कुछ इसी तरह की चर्चाएं शक्ति मार्ग पर बनी नई रोड को लेकर भी हो रही हैं। एक तो सडक़ बनाने का काम बहुत देरी से हुआ। दूसरा यह है कि इस सडक़ को कहीं पर तो वाल-टू-वाल बना दिया गया तो कहीं दोनों साइड में एक-एक, दो-दो फीट जगह छोड़ दी गई है। सडक़ बनाने में किस तरह के मापदंड अपनाए गए यह लोगों की समझ से बाहर हो रहा है।
सडक़ की लड़ाई
परिषद व यूआईटी प्रमुखों के बीच खुद को इक्कीस साबित करने की अंदरखाने की होड़ तो कभी की चल रही है। कभी कभार यह बाहर भी आ जाती है। बात यहां तक पहुंच जाती है तो दोनों एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने से भी नहीं चूकते। बड़ी और गंभीर बात तो यह है कि दोनों ही एक दूसरे पर शहर का विकास न करवाने का आरोप चस्पा करते हैं। वैसे शहर के हालात देखते हुए दोनों की बातों में ही दम नजर आता है। इस अहम की लड़ाई में जनता बेचारी उसी तरह पिस रही है, जैसे अनाज के साथ अक्सर घुन पिस जाता है। देखते हैं इस नूराकुश्ती का अंजाम क्या होता है।
कॉलेज का सपना
प्रदेश में नए मेडिकल कॉलेज भले ही शुरू हो गए हों लेकिन श्रीगंगानगर में यह मामला अभी लटका हुआ ही है। इतने लंबे इंतजार के बाद अब लोग न केवल सवाल उठाने लगे हैं बल्कि सोशल मीडिया पर भी अपनी पीड़ा व्यक्त करने लगे हैं। कोई दानदाता को कठघरे में खड़ा करता है तो कोई सरकार को। वैसे सोशल मीडिया में श्रीगंगानगर मेडिकल कॉलेज के नाम एक पेज भी बन गया है। खैर, श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज भले ही अस्तित्व में न आए लेकिन सोशल मीडिया का यह पेज, दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है, वाले शेर को चरितार्थ जरूर कर रहा है।
चुनाव की तैयारी
विधानसभा चुनाव के अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। चुनाव लडऩे के इच्छुकों में कोई समर्थकों से चर्चा कर रणनीति बना रहा है तो कोई कम समय का बहाना बनाकर सहानुभूति की लहर पर सवार होना चाहता है। विधायकी का सपना पालने वाले एक नेताजी का हाल भी इन दिनों ऐसा ही है। आजकल उनके कार्यालय में भीड़ भी जुटने लगी हैं। मंत्रणाएं होती हैं। कोई काम की आस में जाता है तो नेताजी मना नहीं कर रहे हैं, बस अफसोस जता रहे हैं कि कार्यकाल छोटा रहा, वरना पता नहीं क्या-क्या करता। खैर, जो किया जैसा किया वह भी किसी से छिपा नहीं है।
दुकानें बंद
कहते हैं खूंटा मजबूत हो तो बछड़ा उछल सकता है। मतलब पीठ पर हाथ होता है तो कोई कुछ भी कर सकता है। सट्टे की दुकान चलाने वालों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। इनका खूंटा इतना मजबूत था कि सब कुछ बेरोकेटोक खुलेआम चलता था। लेकिन पिछले एक सप्ताह से खूंटा कमजोर हुआ तो दुकानें के शटर भी गिर गए। खाकी में बदलाव के बाद सट्टे के खूंटे को हवालात की हवा खिलाई गई तो कइयों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। लोगों की दिलचस्पी अब इसमें है कि खूंटा उखाड़ा ही जाएगा या उखाडऩे की धमकी से ही काम चलाया जाएगा।
हवाई सेवा
श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच पिछले माह शुरू हुई हवाई सेवा पहले दिन से मजाक बनी हुई है। शुरुआत में इस सुरक्षा व सुविधाओं को लेकर खूब जुमले बने। किसी को और न सूझा तो विमान के एक इंजन पर ही चुटकी ले ली। मंगलवार को विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद तो चुटकुलों की बाढ़ सी आई हुई है। यहां तक एक एप के माध्यम से पंजाबी व मारवाड़ी में वीडियो तक बन गए हैं, जिसमें हवाई सेवा के बजाय बस में जाने का जिक्र है। दीवार व पेड़ के तने पर अटके विमान के फोटो के साथ चुटकुले सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं।

राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 09 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित
 

Saturday, August 4, 2018

चिराग तले अंधेरा

टिप्पणी 
श्रीगंगानगर से कोच्चुवेली के लिए सुपर फास्ट ट्रेन का उद्घाटन मंगलवार को हुआ। दरअसल, यह ट्रेन पहले बीकानेर से चलती थी, अब इसका फेरा बढ़ाकर श्रीगंगानगर से कर दिया गया है। इसी माह 11 अगस्त को श्रीगंगानगर से नांदेड़ के लिए भी नई ट्रेन का उद्घाटन होगा। कुछ दिन पहले बीकानेर-बिलासपुर ट्रेन की शुरूआत हो चुकी है। इससे पहले श्रीगंगानगर से तिरुचिरपल्ली के बीच भी हमसफर ट्रेन चली थी। इस तरह से कुछ समय के अंतराल में लंबी दूरी की चार ट्रेन श्रीगंगानगर को मिल चुकी हैं और सभी साप्ताहिक हैं। इसके अलावा श्रीगंगानगर से कुछ पैंसेजर ट्रेनों का संचालन भी शुरू हुआ। इतना कुछ करने के बावजूद रेलवे चिराग तले अंधेरा वाली कहावत चरितार्थ कर रहा है।
आज भी श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ के लोग एक ऐसी ट्रेन की इच्छा रखते हैं जो रोजाना जयपुर कम समय में पहुंचा सके। वर्तमान में इन दोनों जिलों के यात्रियों के लिए कोटा-श्रीगंगानगर इंटरसिटी एक्सप्रेस है, जो बीकानेर, नागौर आदि स्थानों से होकर जयपुर पहुंचती है। इस ट्रेन की सबसे बड़ी समस्या समय की है। हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच चलने वाली निजी बसों के मुकाबले इस ट्रेन में चार-पांच घंटे ज्यादा लगते हैं। समय की बचत मानिए या मजबूरी कि यात्री ज्यादा किराया देकर प्राइवेट बसों में सफर करते हैं। रेलवे चाहे तो इन यात्रियों की परेशानी का काफी हद तक समाधान कर सकता है। श्रीगंगानगर से सीकर तक रेलवे ट्रेक बन चुका है और वहां रेलों का संचालन भी होता है। अगर रेलवे सीकर तक सीधी रेल सेवा शुरू करता है तो दोनों जिले के यात्रियों को बड़ा फायदा होगा। इस संबंध में प्रस्ताव भी पारित है लेकिन पता नहीं है, ऐसी क्या वजह है कि रेलवे ने इस तरफ आंखें मूंद रखी हैं। सीकर से जयपुर के बीच आमान परिवर्तन का काम भी बेहद धीमा है। यह भी अपने आप में जांच का विषय है। यह भी सही है कि श्रीगंगानगर जिले में जो रेल सेवाएं नई शुरू हुई हैं, उनमें जनहित के बजाय रेलवे का हित ज्यादा जुड़ा है। वाशिंग लाइन इसकी बड़ी वजह है। समय के साथ लंबी दूरी की रेल सेवा भी जरूरी है लेकिन इसका यह मतलब तो कतई नहीं कि राज्य के भीतर सफर करने वालों को कुछ नहीं मिले। कम दूरी के यात्रियों की परेशानी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए रेलवे व जनप्रतिनितिधि इस ओर भी ध्यान देंगे, क्योंकि इंतजार बहुत लंबा हो चला है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 02 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित.