Tuesday, November 14, 2017

मैं कैसा लगता हूं...

बस यूं ही
देखने में आया है कि अधिकतर भारतीय दो ही विधाओं से जुड़े लोगों को हीरो मतलब नायक मानते हैं। एक तो सिनेमा और दूसरा क्रिकेट। सिनेमा में तो जरूर हीरो के साथ हीरोइन का विकल्प है लेकिन महिला क्रिकेट में कोई ख्यात नाम नहीं होने के कारण पुरुषों का ही बोलबाला है। वैसे हर इंसान की फितरत है और उसके मन के किसी कोने में यह बात जरूर दबी होती है कि वह कैसा लगता है। कुछ आत्मविश्वास से लबरेज व्यक्ति तो जरूर अपने बारे में खुल कर बता देते हैं लेकिन बहुत से एेसे भी हैं जो स्वभाव से शर्मीले होने के कारण कुछ बता नहीं पाते।
खैर, क्रिकेट व सिनेमा से जुड़े लोगों को आदर्श या हीरो मानने की बात अब तो फेसबुक भी मानने और जानने लगा है। तभी तो दो तीन दिन से एक एप चल रहा है जिसमें किसी सिने कलाकार या क्रिकेटर के साथ शक्ल मिलाई जाती है। शक्ल मिलाने के इस खेल में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। आपको एक लिंक क्लिक करना होता है उसके बाद आपकी एक सामने के फेस के फोटो का चयन करना होता है, बाकी काम फेसबुक पलक झपकते ही कर देता है।
वैसे फेसबुक पर फेक आईडी बनाकर किसी आकर्षक नयन नक्श वाली युवती की फोटो लगाकर ' मैं कैसी लग रही हूं.. ।' का काम भी बदस्तूर चल रहा है लेकिन एप से किसी क्रिकेटर या अभिनेता की शक्ल मिलाने का शगल दो तीन दिन से परवान पर है। फेसबुक से जुड़ा हर दूसरा या तीसरा शख्स यह जानने को बेताब है कि वह कैसा लगता है। कल रात को एक साथी की शक्ल अमिताभ बच्चन से मिली देखी तो अपने भी जिज्ञासा पैदा हो गई। करना क्या था एक क्लिक किया फोटो सलेक्ट की और अपनी भी फोटो अमिताभ से मिला दी गई। आज सुबह से देख रहा हूं। फेसबुक किसी को सचिन तेंदुलकर बना रहा है तो किसी को महेन्द्रसिंह धोनी। किसी को सलमान खान बना रहा है तो किसी को शाहरूख खान। किसी को नवजोतसिंह सिद्ध बना दिया तो किसी को आमिर खान। कोई अक्षय कुमार बना तो कोई कुछ। श्रीमती भी कल से यह सब देख कर रही थी। आखिर उसका भी मन ललचा ही गया। उसने भी वो ही तरीका अपनाया तो परिणाम दीपिका पादुकोण के रूप में सामने आया। खैर, इस तरह की परिणाम जानने की फेहरिस्त बेहद लंबी है। वैसे फेसबुक पर इस तरह के कई एप व लिंक हैं जिनको क्लिक करने से कई तरह के परिणाम सामने आते हैं। हालांकि यह सब एक तरह का मनोरंजन ही है। हकीकत से कोसो दूर फकत मनोरंजन।

बस यादें बाकी-4


स्मृति शेष- विनोद खन्ना
'कभी कभी एेसे इंसान भी जन्म लेते हैं, जो अपना नाम, अपनी याद तारीख में नहीं बल्कि लोगों के दिलों में महफूज कर जाते हैं।' संयोग देखिए दयावान फिल्म में बोला गया यह डायलॉग विनोद खन्ना पर मौजूं हो गया। विनोद खन्ना चले गए लेकिन उनका नाम उनकी याद तथा उनका काम दिलों में महफूज रहेगा। हमेशा हमेशा के लिए। विनोद खन्ना के डायलॉग इतने सहज व सीधे होते थे कि यह जल्द ही जुबान पर चढ़ जाते थे। साथ ही हर आदमी डायलॉग को अपनी बात समझने लगता है। 'मजदूर को मजदूरी पसीना सूखने से पहले और मजलूम को इंसाफ दर्द मिटने से पहले।' वाकई इस डायलॉग में आज की कड़वी हकीकत छिपी हुई है। काश उनका यह डायलॉग हकीकत के धरातल पर उतरता। विनोद यह डायलॉग तो कमोबेश सभी पर लागू होता है 'इज्जत वो दौलत है जो एक बार चली गई तो फिर कभी हासिल नहीं की जा सकती।' उनकी डायलॉग में गरीब का दर्द उजागर होता है। फिल्मों में गरीबों का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं। यह दो डायलॉग देखिए.. ' गरीब की जान की कीमत भी उतनी ही है जितनी पैसे वाले की जान की कीमत..' तथा 'गरीब का दिल अगर सोने का होता है तो हाथ फैलाद के होते हैं..। ' विनोद खन्ना का यह डायलॉग तो कई साथी आम बोलचाल में भी कह देते हैं कि ' मैंने जब से होश संभाला है खिलौनों से जगह मौत से खेलता आया हूं।' चांदनी फिल्म के डायलॉग 'दर्द की दवा न हो तो दर्द को ही दवा समझ लेना चाहिए ।' ने कई युगलों का संबल प्रदान किया। खैर, मौजूदा हालात में उनका यह डायलॉग तो आज भी प्रासंगिक है लगता है ' तलवार की लड़ाई तलवार से, प्यार की लड़ाई प्यार से और बेकार की लड़ाई सरकार से। ' इस तरह के विनोद खन्ना के डायलॉग कई हैं। सिनेमा, संन्यास और सियासत तीनों के समान रंग देख चुका रुपहले पर्दे का यह हीरों आज हमारे बीच नहीं है लेकिन इसकी यादें जेहन में जिंदा रहेंगी। जन्म जन्मांतर तक। इस कलाकार को मेरी श्रद्धांजलि।
इति।

बस यादें बाकी-3

स्मृति शेष- विनोद खन्ना
बीच में व्यस्तता इतनी बढ़ी कि विनोद खन्ना की सीरिज ही गौण हो गई। चूंकि दो नंबर पोस्ट के नीेचे क्रमश: चस्पा कर रखा था, लिहाजा लिखना तो बनता ही है। फिल्मों के नामों के बाद अब बात विनोद खन्ना के कुछ चुनिंदा गीतों की। विनोद खन्ना के कई गीत तो इतने कालजयी और अमर हैं वो कभी भी सुनो दिलो-दिमाग को सुकून प्रदान करते हैं। एक गीत में वो गुनगुनाते हैं और चलते रहने की सीख देते हैं 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के...' लेकिन एक दूसरे गीत में वो जिंदगी से अंसतुष्ट दिखाई देते हैं गोया वो जिंदगी के फलसफे को जान चुके हैं। तभी तो गाते हैं' जिंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा संग लेकर जाएगी....।' वैसे विनोद खन्ना के गीतों में प्रेम व निराशा का दोनों ही दिखाई देेते हैं। एक तरफ वो 'हम तुम्हे चाहते हैं एेसे, मरने वाला कोई जिंदगी चाहता हो जैसे... ' गीत गाकर प्रेम को बुलंदी प्रदान करते हैं लेकिन दूसरे ही पल कोई साथी न मिलने का मलाल वो इस तरह जाहिर करते हैं 'कोई होता जिसको अपना हम कह लेते यारो...। ' इस गीत में देखिए, प्यार होने पर वो महबूबा से इजाजत मांगते हैं 'हमको तुमसे हो गया है प्यार बोलो तो जीएं बोलो तो मर जाएं.. ' और इधर तो एक सलाम से ही खुद को तसल्ली देते नजर आते हैं 'जाते हो जाने जाना, आखिर सलाम लेते जाना..। ' फिर अचानक वो कह उठते हैं ' आज फिर तुम पे प्यार आया है..। ' विनोद प्रेम के साथ-साथ अपने साथी से मदद के लिए भी कहते हैं, 'छेड़ मेरे हमराही गीत कोई एेसा..' तो ' जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए, तुम देना साथ मेरा..।' इतना ही नहीं एक दूसरे के बिना जीने व रहने की कल्पना भी नहीं करते तभी तो गाते हैं ' वादा करले साजना तेरे बिना मैं रहूं मेरे बिना तू ना रहे ..। ' वो टूटे दिल के साथ सावन को दोष देते नजर आते हैं ,जब गाते हैं 'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है..।' खैर इस तरह के सदाबहार गानों की फेहरिस्त बेहद लंबी है। बहुत लंबी। कल बात विनोद के कुछ खास डॉयलाग की।
क्रमश:......

अंकित सोनी की फिरकी में उलझ रहे धुरंधर

श्रीगंगानगर. सप्ताहभर पहले क्रिकेट की दुनिया में अंकित सोनी अजनबी चेहरा था। क्रिकेट जानकारों के पास न तो अंकित का कोई डाटा उपलब्ध था और न ही किसी तरह का आंकड़ा। पिछले गुरुवार को जब अंकित गुजरात लॉयंस की टीम से जुड़े तब भी उनको अनजान चेहरा करार दिया गया। और, इसके बाद केवल तीन मैचों में अपने चमकदार प्रदर्शन से अंकित ने सभी का ध्यान खींच लिया है। हरफनमौला खिलाड़ी के रूप में टीम में शामिल किए गए अंकित ने बल्ले से जरूर कोई खास कमाल नहीं दिखाया लेकिन अपनी फिरकी के फेर में धुरंधर बल्लेबाज को एेसा बांधा कि वो रनों को तरस गए। विदित रहे कि अंकित सोनी राजस्थान का इकलौता खिलाड़ी है जिसने बगैर कोई रणजी या राष्ट्रीय मैच खेले सीधे आईपीएल में जगह बनाई है।
इस तरह मिली इंट्री
अंकित सोनी श्रीगंगानगर का रहने वाला है। उसने 2014 व 2015 में श्रीगंगानगर की तरफ से अंडर 16 व अंडर 19 प्रतियोगिताओं में भाग लिया। 2015 में अंकित को राजस्थान रॉयल्स टीम के बल्लेबाजों के समक्ष नेट में गेंदबाजी का मौका मिला। वर्ष 2015 व 2017 में अंकित ने आईपीएल ट्रायल दिए लेकिन किसी ने नहीं खरीदा। बाद में गुजरात लॉयंस के ड्वेन ब्रावो व शिविल कौशिक के चोटिल होने पर अंकित को टीम में शामिल किया गया।
सिक्सर किंग भी 'मजबूर'
लंबी कद काठी के अंकित के प्रदर्शन में मैच दर मैच निखार आ रहा है। पहले मैच में तीन ओवर में 28 रन लुटाने वाले अंकित ने दूसरे मैच में मुंबई इंडियंस के आक्रामक सलामी बल्लेबाज पार्थिव पटेल व जोस बटलर को बांधे रखा। इसी तरह तीसरे मैच में उन्होंने पुणे के शतकवीर बेन स्टोक्स व महेन्द्रसिंह धोनी को खुलकर शॉट नहीं लगाने दिए। मुंबई व पुणे के मैच में हालांकि अंकित की टीम जीत नहीं पाई लेकिन मैच रोमांचक बनाने में अंकित की किफायती गेंदबाजी महत्वपूर्ण रही।
अंकित सोनी का अब तक का प्रदर्शन
पहला मैच : रॉयल चैलेंजर बेंगलूरु - 3-0-28-1
दूसरा मैच : मुंबई इंडियंस - 4-0-16-1
राइजिंग पुणे सुपरजाएंट्स - 4-0-16-0
आईपीएल में अब तक के पांच सबसे महंगे गेंदबाज
इशांत शर्मा ने 2013 में चार ओवर में 66 रन दिए
उमेश यादव ने 2013 में चार ओवर में 65 रन दिए
संदीप शर्मा ने 2014 में चार ओवर में 65 रन दिए
वरुण एरॉन ने 2012 में चार ओवर में 63 रन दिए
अशोक डिंडा ने 2013 में चार ओवर 63 रन दिए
आईपीएल में अब तक के पांच सबसे किफायती गेंदबाज
नाम इकोनॉमी रेट
सुनील नरेन 6.17
रविचंद्रन अश्विन 6.55
अनिल कुंबले 6.57
लसिथ मलिंगा 6.67
मुथैया मुरलीधन 6.67
नोट - अंकित ने तीन मैचों में कुल 11 ओवर की गेंदबाजी में 60 रन खर्च कर 2 विकेट हासिल किए है। पहले मैच में अंकित जरूर महंगे साबित हुए लेकिन आखिरी दो मैचों में उनका इकोनॉमी 4 का रहा है। तीनों मैचों का औसत देखें तो अंकित की इकोनॉमी रेट 5.45 रहा है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगगर व हनुमानगढ संस्करण के 3 मई 17 के अंक में प्रकाशित 

बयानों के भरोसे कब तक

पहला बयान :-
'मैं देश को आश्वासन देना चाहता हूं कि हमले के पीछे दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. हमले में शहीद हुए जवानों को हम सैल्यूट करते हैं. राष्ट्र के लिए की गई उनकी सेवा हमेशा याद की जाएगी।'
-पिछले साल सितम्बर में कश्मीर में आतंकी हमले में 17 जवानों के शहीद होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बयान।
दूसरा बयान :-
'जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी. हम स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। हमें अपने जवानों पर गर्व है. उनकी शहादत को व्यर्थ नहीं जाने देंगे। इस हमले में घायल जवानों के जल्द से जल्द स्वस्थ होने की कामना करता हूं।'
- पिछले माह अप्रेल में छत्तीसगढ़ नक्सली हमले में 26 जवानों के शहीद होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बयान।
तीसरा बयान :-
'पाकिस्तान की यह हरकत अमानवीय है। ऐसी हरकत युद्ध के दौरान भी नहीं की जाती हैं। पूरे देश को सेना पर भरोसा है। सेना को जो प्रतिक्रिया करनी है, वह करेगी। जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।
-एक मई को कश्मीर में आतंकी हमले में दो जवानों के शव क्षत-विक्षत करने पर रक्षा मंत्री अरुण जेटली का बयान।
यह तीन बयान है। दो हमारे प्रधानमंत्री के हैं जबकि एक रक्षा मंत्री का। यह तीनों बयान पिछले नौ महीनों के दौरान आए हैं। इन तीनों बयानों में कई तरह की समानताएं हैं। मसलन, यह जवानों के शहीद होने के बाद आए हैं। इसमें जवानों की शहादत को याद किया गया तथा इन बयानों से देशवासियों को भरोसा भी दिलाया गया। आदि आदि। इसके बावजूद एक और खास बात है और वह कि जवानों की शहादत को व्यर्थ न जाने देने की। अमूमन इस तरह के बयान हर हमले के बाद आते हैं लेकिन देश को कभी शहादत को व्यर्थ न जाने देने वाले बयान का कारगर जवाब नहीं मिला। यह बात दीगर है कि कश्मीर हमले के बाद सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक तथा जवानों के शव क्षत-विक्षत करने के बाद जवाबी कार्रवाई करने की बात कही जा रही है। फिर भी बड़ा सवाल यह है कि जवानों के इस तरह शहीद होने का सिलसिला कब तक और क्यों?
दरअसल देशवासी अब नासूर हो चुकी इन समस्याओं का कारगर व स्थायी हल चाहता है। भले ही वह नक्सली हो या कश्मीर में आतंकी। दोनों समस्याओं के लिए बातचीत अब घिसा पिटा आजमाया हुआ तरीका हो चुका है। इस तरीके की भाषा न तो आतंकी समझते हैं और न ही नक्सली। ठीक वैसे ही जैसे लातों के भूत बातों से नहीं मानते। अतीत गवाह है 'कुत्ते की दुम' को सीधा करने के लिए कितने प्रयास किए जा चुके हैं लेकिन वह दुम कभी सीधी नहीं होती है। इस टेढ़ी दुम को सीधी करने के चक्कर में देश कई जवानों का बलिदान देख चुका है। इतने बलिदानों के बाद भी यह दुम सीधी नहीं हुई तो अब इसको काट देने में ही भलाई है। फैसला सरकार को लेना है। सेना को तो बस एक आदेश का इंतजार है।

बस यादें बाकी-2

स्मृति शेष- विनोद खन्ना
इस 'हिमालय पुत्र' को खून शब्द से इतना लगाव था कि कभी इसका 'गरम खून' 'वक्त का बादशाह' बना तो कभी 'मुकदर का बादशाह' कहलाया। कभी इस 'उस्ताद' ने 'खून का बदला खून' से लिया तो कभी इसने 'खून का कर्ज' उतारने का ' निश्चिय' भी किया। 'खून की पुकार' पर इस 'सेवक' ने 'इंसानियत के देवता' के रूप में भी 'पहचान' बनाई। इस 'फरेबी' 'चौकीदार' ने 'प्यार का रोग' भी पाला तो 'प्यार का रिश्ता' भी 'परम्परा' की तरह शिद्दत के साथ से निभाया। इस 'युवराज' की 'ताकत' की 'हलचल' इस कदर थी कि 'जाने-अनजाने' में भी लोग इसे 'सबका साथी' मानते रहे। 'मेरा गांव मेरा देश' के फलसफे में विश्वास करने वाले इस 'राजपूत' की 'प्रेम कहानी' का 'दीवानापन' कभी किसी 'परिचय' का मोहताज नहीं रहा। एक वक्त एेसा भी आया भी आया जब इस 'आखिरी डाकू' की 'परछाइयां' लोगों को डराने लगी लेकिन 'खुदा की कसम' इस 'जालिम' की 'अनोखी अदा' हमेशा 'नहले पर दहला' ही साबित हुई। ' मैमसाहब' का यह 'मस्ताना', ' गुड्डी' का यह 'प्रीतम' वैसे तो 'कच्चे धागे' की डोर में बंध जाता था लेकिन वक्त के हाथों मजबूर हो यह ' हत्यारा' बना तो कभी 'कुंवारा बाप' बनकर ' गद्दार' भी कहलाया। 'चोर-सिपाही' खेलने वाला यह 'एक बेचारा' ' द बर्निंग ट्रेन' में सवार हुआ तो 'हंगामा' हो गया। ' नतीजा' यह निकला कि इसने 'मुकदमा' भी झेला। 'सरकारी मेहमान' बन इसने ' दो यार' तो 'पांच दुश्मन; भी पैदा कर लिए। फिर भी ' दौलत के दुश्मन' ने कभी 'जमीर' का 'बंटवारा' नहीं किया। संभवत: यह सब इसकी 'परवरिश' का नतीजा था।
क्रमश:

बस यादें बाकी-1

स्मृति शेष : विनोद खन्ना
ठीक से तो याद नहीं लेकिन संभवत: नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर विनोद खन्ना की फिल्म 'हाथ की सफाई' आई थी। पूरी कहानी भी याद नहीं है लेकिन फिल्म का वह डायलॉग आज भी जेहन में गूंजता है। फिल्म एक जेबकतरे की कहानी पर आधारित थी। इसमें विनोद खन्ना की जेब जब कोई दूसरा काटता है तो वह उसका हाथ पकड़कर कहते हैं.. 'बच्चे जिस स्कूल में तुम पढ़ते हो हम उसमें हैडमास्टर रह चुके हैं।' यह डायलॉग बचपन में इतनी बार बोला कि यह जेहन में स्थायी रूप से चस्पा हो गया। इसी फिल्म के साथ दूसरा संयोग यह जुड़ा कि इसका गीत इतनी बार सुना और गुनगुनाया कि बरबस इसके बोल होठों पर आ ही जाते हैं। 'वादा करले साजना तेरे बिना मैं ना रहूं मेरे बिना तू ना रहे होके जुदा यह वादा रहा' खैर, खबर यह है कि प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना गुरुवार को हमारे से रुखसत हो गए। थोड़े दिन पहले ही उनकी एक फोटो वायरल हुई थी, जिसमें वे बेहद कमजोर और बीमार नजर आए। विनोद खन्ना की पहली फिल्मी पारी तो जन्म से पहले ही खेली जा चुकी थी लेकिन जब उन्होंने दूसरी पारी संभाली तब तक फिल्मों की चस्का लग चुका था। हालांकि साथ-साथ उनकी पहली पारी की फिल्में भी देखी। 'मुकदर का सिकंदर' तो इतनी पसंद है कि बार-बार देखने को जी करता है। खैर नब्बे के दशक में जब भी कोई फिल्म रिलीज होती तो बड़े ही ठसके से कहते यह विनोद खन्ना की फिल्म है।
आज इस कालजयी कलाकार के निधन पर उन्हीं की फिल्मों के नाम से लिखने तथा उनको श्रद्धांजलि देने की ठानी। हालांकि विचार आते-आते रात के साढ़े दस बज चुके थे। खैर, 'मन का मीत' यह ' महाबदमाश' 'दयावान' ' इंसान' जिंदगी के 'इम्तिहान' में इस कदर 'हेराफेरी' कर चला जाएगा किसने सोचा था। कभी 'शंकर शंभू' कभी ' महादेव' कभी ' मुकदर का सिकंदर' बना यह ' दबंग' जिंदगी की 'आखिरी अदालत' में इस तरह ' अचानक' हारेगा यकीन नहीं हो रहा है। इस 'फरिश्ते' की 'जन्मकुंडली' में इतना 'महासंग्राम' लिखा था कि 'खून-पसीने' से तैयार किए गए 'राजमहल' को छोड़कर चला गया। यह 'रखवाला' दिलों में आज इस कदर 'कैद' है कि जिंदगी भर कभी इसकी ' रिहाई' नहीं होगी। 'कुदरत' के आगे आज यह 'क्षत्रिय' हार गया। 'इंसाफ' और 'जुर्म' की दुनिया में इस 'दिलवाले' ने शोहरत और ' दौलत' भी खूब कमाई। ' अमर अकबर एंथोनी' के इस अमर पर 'आरोप' भी लगे 'लेकिन' 'सत्यमेव जयते; का यह पक्षधर अपने फैसलों पर अडिग रहा। यह कभी 'सूर्या' बनकर चमका तो कभी इसकी शीतल 'चांदनी ने आंखों को सुकून प्रदान किया।
क्रमश: .....

और 'टाइगर' चला गया

बस यूं ही
रात सवा बारह बजे घर पहुंचा तो श्रीमती को मुख्य दरवाजे पर खड़े देखकर चौंक गया। अक्सर रात को उसको फोन करके जगाना पड़ता है तब दरवाजा खुलता है। खैर, उससे मुखातिब होते ही मेरा पहला सवाल यही था कि इतनी रात गए यहां कैसे? मेरा सवाल सुनकर वह जोर से हंसने लगी। कहने लगी बच्चे आज टाइगर लेकर आए हैं। नाम सुनकर मैं फिर चौंका। मेरा हाथ पकड़कर वह चौक के कोने में बनाए अस्थायी एक छोटे से घर की तरफ ले गई। मैंने देखा उसके अंदर एक पिल्ला सोया हुआ है।
चारों तरफ ईंटें लगाकर एक तरह से बाड़ा बनाया गया था। मैंने पूछा तो कहने लगी कि बच्चे शाम को पार्क से लौट रहे थे तो यह पिल्ला रास्ते में मिल गया। किसी गाड़ी की नीचे आ ही जाता पर बच्चों ने बचा लिया। मकान मालिक का पोता भुवन्यू व अपने दोनों बच्चे इस पिल्ले को पाकर बड़ा खुश हैं। भुवन्यू ने तो अपनी मम्मी से लड़ाई भी कर ली चाहे कुछ भी हो जाए वह पिल्ला घर में ही रहेगा। घर लाकर पिल्ले को बच्चों ने बाकायदा नहलाया। उसके लिए बाहर से ईंट लेकर आए और उसके लिए घर बनाया। अंदर पायदान बिछा दिया गया। प्लास्टिक के एक पात्र पर स्कैच से टाइगर फूड लिखकर रख दिया। मैं बच्चों की मेहनत देख मुस्कुराए बिना नहीं रह सका। सोचते-सोचते अतीत में चला गया। मैंने भी कितने पिल्ले पाले। एक- दो नहीं पूरे आठ पर जिंदा एक भी नहीं बचा। मैं बहुत रोता था। जब नया लेकर आता तब मां डांटती थी। फिर भी यह शौक कम नहीं हुआ। खैर, रात को खाना खाकर उठा तो देखा पिल्ले की आवाज आ रही है। गेट खोल कर बाहर गया तो देखा वह अस्थायी घर की दीवारें लांघ कर चौक में घूम रहा था। मैंने श्रीमती को उसी वक्त कह दिया था कि यह पिल्ला इस तरह नहीं रुकेगा। हुआ भी वही सुबह टाइगर जा चुका था। बच्चों के लटके हुए चेहरे देखकर मैं भी दुखी था। बच्चों को दिलासा देते हुए मुंह से बस यही निकला बच्चों टाइगर चला गया। बच्चों ने इधर-उधर काफी जगह देखा पर टाइगर वास्तव में चला गया था।

कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं...

छत्तीसगढ़ में जवान गोली खा रहे हैं
और कश्मीर में पत्थर झेल रहे हैं,
अमन चैन और सदभाव के दावे
बस आगे से आगे टल रहे हैं।
फिर हम किस मुंह से कह रहे हैं
कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं।
दिल्ली में किसान मूत्र पी रहे हैं
लोग घुटन व तनाव में जी रहे हैं,
वादों और घोषणाओं के सब्जबाग
आम जन को यहां छल रहे हैं।
फिर हम किस मुंह से कह रहे हैं
कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं।
कांग्रेस मुक्त भारत की कहानी,
नई बोतल में है शराब पुरानी,
फकत सत्ता सुंदरी के खातिर,
भेष बहुरूपिए बदल रहे हैं।
फिर हम किस मुंह से कह रहे हैं
कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं।
नोटबंदी व लालबत्ती की बातें,
बिन मौसम की जैसी बरसातें,
करूं पड़ोसी से शिकवा क्या 'माही'
अपने ही अपनों को छल रहे हैं।
फिर हम किस मुंह से कह रहे हैं
कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं।

'शहरहित या स्वहित' ?

टिप्पणी
वाकई श्रीगंगानगर के जनप्रतिनिधि बड़े 'जागरूक' हैं। विशेषकर पार्षदों का तो कहना ही क्या। बात 'शहर-हित' की आती है तो यह लोग दलगत राजनीति छोड़कर एक हो जाते हैं। एेसे अवसर कई बार सामने आए हैं जब पार्र्टी गौण हो गई और सबने 'एकजुटता' का परिचय दिया। सभापति का चुनाव ही ले लीजिए। सभापति फिलहाल किसी दल से नहीं हैं लेकिन वो बाकायदा सभी दलों के पार्षदों के समर्थन के सहारे टिके हुए हैं। भले ही सभापति को लेकर कई तरह की शिकायतें हों, सार्वजनिक मंचों पर उनकी मुखालफत की जाती हो, परिषद की बैठकों में भी खूब नोकझोंक होती हो। वहां पार्षद एक दूसरे के खिलाफ बांहें चढ़ाते हों। कुर्सियां उछलती हों। जूतम पैजार या सिर फुटोव्वल जैसे हालात बनते हों लेकिन क्या मजाल कि कोई सभापति के खिलाफ पाला बदले। कांग्रेस और भाजपा के पार्षद यहां एक रंग में रंगे हुए नजर आते हैं। सभापति को समर्थन देने वालों की 'एकता' की यह जीती जागती नजीर है। संभवत: यह भी एक तरह का 'शहरहित' ही है जो सभी को 'एकजुटता' में बांधे हुए है।
अब देखिए ना पार्षदों का 'शहरहित'। भाजपा के कई पार्षद तो अपनी ही पार्टी और नेताओं से परेशान हैं। धरना दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी अपनी पीड़ा जाहिर कर रहे हैं। उनका एकसूत्री कार्यक्रम है कि भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो। रसद विभाग वाला मामला पार्षदों की नजर में इतना बड़ा है कि वो पार्टी व अपने नेताओं के खिलाफ भी बगावती सुर अलापने से बाज नहीं आ रहे हैं। वाकई भ्रष्टाचार ज्वलंत मुद्दा है और इसका विरोध होना लाजिमी है और पार्षद भी तो वही कर रहे हैं। बानगी देखिए, एक दल के पार्षद आंदोलन कर रहे हैं जबकि दूसरे दल के चुपचाप हाथ पर हाथ धरकर इस तरह बैठे हैं मानों उनकी इस मसले में मौन स्वीकृति हो। यही तो 'एकजुटता' है। इसे पार्षदों की दरियादिली कहिए या 'शहरहित' कि वो अपने वार्डों की छोटी-मोटी समस्याओं को नजरअंदाज कर केवल रसद विभाग के भ्रष्टाचार को बेनकाब करने के लिए प्रयासरत हैं। पार्षदों की नजर में शायद वार्डों की छोटी-मोटी समस्याएं रसद विभाग के भ्रष्टाचार के आगे बेहद छोटी हैं। पटरी से उतरी सफाई व्यवस्था, आवारा पशु, बंद पड़ी रोडलाइट, बदहाल पार्क, अतिक्रमण, नशाखोरी, पेयजल संकट आदि शहर की एेसी ज्वलंत समस्याएं हैं, जो पार्षदों की नजर में या तो समस्या ही नहीं हैं और अगर है तो रसद विभाग के भ्रष्टाचार से बेहद छोटी है। लगता है यह समस्याएं आम आदमी से संबंधित नहीं हैं। सिर्फ राशन प्रकरण ही जनता के सबसे नजदीक है। जनता उसी से ज्यादा प्रभावित और पीडि़त है। दरअसल, बाकी सब को गौण कर एक ही मसले में दिलचस्पी दिखाना या आंखें मूंद लेना यह भी तो एक तरह की 'एकजुटता' ही है। अपने प्रतिनिधियों के इस 'शहरहित' को देख कर आम लोग यकीनन मतदान के दिन को याद कर बार-बार अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे। खैर, इस 'शहरहित' के पीछे कहीं न कहीं 'स्व हित' भी जुड़ा है और इन दोनों हितों में इतना घालमेल हो चला है कि कई बार दोनों में अंतर तक करना मुश्किल हो जाता है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 21 अप्रेल 17 के अंक में प्रकाशित

कुछ तो तरस खाओ...

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सुबह सुहानी है ना यहां की शाम सिंदूरी है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त के मनोरम एवं आकर्षक प्राकृतिक नजारे को देखे हुए तो मुद्दत हो गई है। आसमान का रंग तक बदल गया है। पेड़ों से हरितिमा गायब हो चली है। सब जगह कालिमा का ही साम्राज्य दिखाई देता है। न शुद्ध हवा बची है ना शुद्ध पानी। जमीन अंदर से खोखली हो गई है। जल, जंगल एवं जमीन लगातार कम हो रहे हैं। हर तरफ राखड़ के ढेर लगे हैं। प्रदूषण की मार से तो शहर कोई कोना अछूता नहीं बचा है। जी हां, ऊर्जानगरी के नाम से विख्यात कोरबा जिले के साथ यह दर्दनाक सच जुड़ा हुआ है। वैसे भी कोरबा का नाम देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में पांचवें स्थान पर है। प्रतिदिन 55 हजार टन कोयले की राख अकेले कोरबा से निकल रही है। यही रफ्तार रही तो आने वाले समय में प्रदूषण के मामले में कोरबा पहले पायदान पर आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रदूषण से त्रस्त कोरबा के लोगों की चिंता न राज्य को है ना केन्द्र को। यहां की औद्योगिक इकाइयों को भी इससे कोई सरोकार नहीं है। सब यहीं से कमा रहे हैं लेकिन देने के नाम पर सभी के माथे पर बल पड़ते हैं। प्रदूषण को कम करने के लिए बने एक्शन प्लान का उदाहरण सबके सामने है। एक्शन प्लान को लागू करने के लिए जो राशि चाहिए, उसके लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। गेंद एक दूसरे के पाले में डालकर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा जा रहा है।
कोयला निकालने तथा बिजली पैदा करने की इस अंधी दौड़ में विकास के मुद्दे तो सिरे से ही गौण हो गए हैं। विडम्बना देखिए छत्तीसगढ़ के अलावा देश के सात राज्यों में बिजली निर्यात करने वाले कोरबा जिले के ही चालीस गांवों के लोग आज भी चिमनी एवं लालटेन के भरोसे हैं। पावर हब के नाम से विख्यात छत्तीसगढ़ एवं कोरबा जिले के लिए इससे शर्मनाक बात भला और क्या होगी। कोरबा में सरकारी दफ्तरों के लिए जमीन भले ही ना मिले लेकिन पावर प्लांट स्थापित करने में कोई दिक्कत नहीं है। आलम देखिए कि जिले का किसान पानी के लिए तरस रहा है जबकि पड़ोसी जिले रायगढ़ एवं जांजगीर चाम्पा में कोरबा के पानी से खेती लहलहा रही है। सरकार चाहे तो क्या नहीं हो सकता लेकिन यहां की खेती को भी सुनियोजित तरीके से उजाड़ा जा रहा है, ताकि औद्योगिक इकाई स्थापित करने के लिए जमीन आसानी से सुलभ हो जाए।
कोरबा में स्थापित सरकारी एवं निजी उपक्रमों पर नजर डालें तो उनकी नियत में खोट साफ नजर आता है। यह एक तरह से यहां के लोगों के साथ सरासर नाइंसाफी ही तो है। एसईसीएल यहां से खूब कमा रहा है लेकिन बदले में क्या दिया? अपोलो अस्पताल बिलासपुर में तो मेडिकल कॉलेज मनेन्द्रगढ़ चला गया। यहां के लोग बस सपने ही देखते रह गए। यही हाल बालको के हैं। यहां के लोगों के स्वास्थ्य को दरकिनार एवं नजरदअंदाज करते हुए बालको की ओर से रायपुर में तीन सौ करोड़ रुपए का केन्सर अस्पताल खोला जा रहा है। एनटीपीसी की हालत भी कुछ ऐसी ही है। भले ही उसने आईटीआई एवं इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना में सहयोग किया हो लेकिन एनटीपीसी के सहयोग से ही ट्रिपल आईटी की स्थापना राजनांदगांव में की जा रही है। कोरबा की बहुत सी प्रतिभाएं उच्च अध्ययन के लिए पलायन करने का मजबूर है लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया गया। छत्तीसगढ़ पावर जनरेशन कंपनी के अकेले कोरबा में चार प्लांट हैं लेकिन कंपनी अपना मुख्यालय तक यहां नहीं खोल पाई। कंपनी का मुख्यालय कोरबा में ही प्रस्तावित था, इसके लिए आंदोलन भी हुए लेकिन वह चुपचाप रायपुर में स्थापित कर दिया गया। कमोबेश यही हाल रेलवे का है। कोयले के लदान के लिए कोरबा से प्रतिदिन 34 से 38 के बीच मालगाडिय़ों का संचालन होता है लेकिन सवारी गाडिय़ों की संख्या इनके मुकाबले बेहद कम है। रेलवे स्टेशन को आदर्श स्टेशन बनाने का काम भी बेहद धीमा है। शहर को दो भागों में बांटने वाली लाइन पर बने फाटकों पर वाहन चालक घंटों परेशान होते हैं लेकिन रेलवे उनके लिए ओवरब्रिज तक नहीं बना पाया है। किसी प्लांट में कोयले के लदान का मामला होता तो रेलवे लाइन बिछाने में एक पल की भी देरी नहीं करता।
शहर के वर्तमान हालात के लिए औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ नगर निगम भी कम जिम्मेदार नहीं है। वह औद्योगिक इकाइयों से टैक्स तो वसूल रहा है लेकिन शहरवासियों के हित पर खर्च करने का अनुपात बेहद कम है। शहर की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यह करीब 30 किलोमीटर में फैला है लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर कोई सुविधा नहीं है। ऑटोचालक मनमर्जी का किराया वसूलते हैं। पेयजल समस्या का कोई स्थायी हल नहीं है। डे्रनेज एवं सीवरेज सिस्टम की तो कल्पना ही नहीं की गई है। आधुनिक सब्जी मंडी का मामला अधरझूल में है। एल्यूमिनियम पार्क, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी व सरकारी दफ्तरों के लिए जमीन उपलब्ध कराने तक के मामले लम्बित चल रहे हैं। इतना ही नहीं प्रदूषण की मार से बीमार हो रहे कोरबा के लोगों के लिए सभी सुविधाओं से परिपूर्ण अस्पताल तक भी नहीं है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी भी लगातार बनी हुई है। जरूरतों को देखते हुए मेडिकल एवं माइनिंग कॉलेज की मांग यहां से लगातार उठती रही है। इतना ही नहीं बेरोजगारों की लम्बी चौड़ी फौज के लिए रोजगार के साधन खोजने के कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं।
बहरहाल, उत्पादन के नाम पर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कतई उचित नहीं है। राज्य, केन्द्र एवं औद्योगिक इकाइयों के लिए स्वास्थ्य का मामला पहली प्राथमिकता शामिल होना चाहिए। यहां के जनप्रतिनिधियों को भी इस मामले में पहल करनी चाहिए। वैसे देखा गया है कि जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान ही जनता के साथ होते हैं। वादे करते हैं आश्वासनों की रेवडिय़ां बांटते हैं लेकिन बाद में वे भी औद्योगिक इकाइयों के सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं। लम्बे समय तक कोरबा की यह उपेक्षा उचित नहीं है। ऐसा न हो कि लोगों की शराफत की इंतहा हो जाए, उससे पहले सभी को कोरबा की हालात पर तरस खाना चाहिए। देरी किसी भी कीमत पर उचित नहीं है।

धोखे की बुनियाद पर धंधा

टिप्पणी 
यह विशुद्ध रूप से धंधा है, जो केवल और केवल धोखे की बुनियाद पर टिका है। यह धंधानिहायत ही दोयम दर्जे का है, जो विश्वास व रिश्तों का कत्ल भी करता है। यह धंधा बेहद घृणित व निम्नस्तर का है, जो झूठ व फरेब के सहारे चलता है। यह धंधा एक तरह का व्यापार है, जो मानवीय मूल्यों व रिश्तों की भाषा नहीं समझता। यह धंधा कुत्सित सोच का परिणाम है, जो केवल पैसों की भाषा ही जानता है। यह धंधा लालच की नींव पर बने गठजोड़ से चलता है। इस धंध में पैसे की भूख वाले दलाल तथा'धरती का भगवान कहे जाने वाले कुछ कुछ लालची किस्म के चिकित्सक शामिल हैं जो इस कुकृत्य को अंजाम दे रहे हैं। सभ्य समाज को शर्मसार करने वाले इस धंधे में वो माता-पिता भी शामिल हैं, जो बेटे-बेटियों में भेद करते हैं और कोख में कत्ल के पाप के भागीदार बनते हैं। दरअसल, यह धंधा कोख में कत्ल करने का है। यह धंधा पैसों के बदले अजन्मे बच्चों की हत्या का है। चिंताजनक व हैरत वाली बात यह है इस धंधे में कत्ल बेटियों के साथ-बेटों का भी हो रहा है। यह बात एक बार नहीं कई बार सामने आ चुकी है। फिर भी पाप का यह खेल बदस्तूर जारी है। विशेषकर हनुमानगढ़-श्रीगंगानगर जिलों में हाल में हुए डिकॉय आपरेशन में यह बात विशेष तौर पर सामने आई कि गर्भ में बेटी बताकर भी गर्भपात करवाया जा रहा है। महज इसीलिए कि कोख में बेटा बता दिया तो फिर गर्भपात कौन करवाएगा?
बड़ा सवाल यह भी है कि कानूनी धरपकड़, तमाम सरकारी अभियानों तथा जागरुकता विषयक कार्यक्रमों के बावजूद इस धंधे पर रोक क्यों नहीं लग रही? बेटी बचाओ व समानता के नारों के बीच मानसिकता में बदलाव आ क्यों नहीं रहा है? इन सवालों से जाहिर होता है कि कहीं न कहीं कमी जरूर है। भले ही वह सरकारी स्तर पर हो या सामाजिक रूप से स्वीकार्यता की। इस कमी को चिन्हित कर उसको दूर करने की सबसे पहले जरूरत है। समाज व सरकारी प्रयासों में बिना तालमेल के समानता की बात करना बेमानी है। एकसूत्री मंथन इस बात पर हो आखिर मानसिकता में बदलाव कैसे व किस तरह आ सकता है। बदलाव के प्रयासों पर सर्वाधिक जोर दिया जाना चाहिए। समानता में बाधक सामाजिक वर्जनाओं पर चोट हो। समानता के समर्थकों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जिलों में जरूरतमंद कन्याओं को शिक्षित करने तथा उनके हाथ पीले करवाने वाली सेवाभावी संस्थाओं की कमी नहीं है। सरकार के साथ-साथ इन संस्थाओं को भी इस दिशा में सोचना चाहिए। वैसे बेटा-बेटी में समानता में सबसे बड़ी बाधा दहेज भी है। दहेज के कारण समाज में लड़कियों को बोझ माना जाता है। दहेज का लेन-देन किस तरह से बंद हो, समाज की इसमें क्या भूमिका हो सकती है तथा सरकारी स्तर पर इसकी रोकथाम के लिए कानून में क्या संशोधन हो सकते हैं, इन सब बातों पर बड़े स्तर पर मंथन व चिंतन की जरूरत है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 8 अप्रेल 17 के अंक में प्रकाशित 

हे मां! एेसा रोज क्यों नहीं होता

टिप्पणी 
हे मां दुर्गा! यह मान मनुहार का दिन साल में एक-दो बार ही क्यों आता है? हे आदिशक्ति! यह खुले हाथ से उपहारों की बारिश एक दो दिन होकर थम क्यों जाती है? हे महाकाली! यह पूछ परख का सिलसिला अवसर विशेष का मोहताज क्यों बना हुआ है? हे शैलपुत्री! यह स्वागत सत्कार का दौर एक दो दिन तक ही सीमित क्यों है? हे ब्रह्मचारिणी! यह आदर व मान-सम्मान देने का मौका रोज क्यों नहीं आता है? हे चंद्रघटा! मां व बहन का स्वरूप आप में सिर्फ आज की क्यों दिखाई देता है? हे कुष्माण्डा! यह मेहमानों जैसी आवभगत साल भर में कभी-कभार ही क्यों होती है? हे कालरात्रि ! यह अपने-पराये का भेद सिर्फ दो दिन के लिए ही क्यों भुलाया जाता है? हे महागौरी! साल भर दूरी रखने वाले के दिलों में प्रेम व स्नेह की धारा अचानक ही कैसे बहने लगती है? हे सिद्धिदात्री! महज दो दिन के लिए धर्म-सम्प्रदाय की बातें गौण कैसे हो जाती हैं? हे स्कंदमाता! पुरुष प्रधान समाज की सोच चमत्कारिक रूप से यकायक कैसे बदल जाती है? हे कात्यायनी! यह कथनी एवं करनी में भेद क्यों है? हे महिषासुर मर्दिनी! एक साथ इतने सवाल पूछने की गुस्ताखी माफ करना। सवाल पूछने का इससे मुफीद मौका और हो भी नहीं सकता। नवरात्र पर आज दिन भर बेटियों की खूब आवभगत हुई। शक्ति स्वरूपा मानकर बेटियों की पूजा की गई। घोर आश्चर्य एवं खुशी तो उन बहनों को देखकर हुई जो समाज की मुख्य धारा से कटी हुई है और खेलने खाने की उम्र में सुबह से शाम तक दर-दर भटक कर भरपेट भोजन जुटाती है। हिकारत से देखी जाती हैं। याचक की भूमिका में दुत्कार एवं फटकार पाती हैं। आज इन बहनों की दीवाली और होली सब एक साथ थी। साफ-सुथरे कपड़ों में सजी-धजी बहनों को कभी मोटरसाइकिल पर ले जाया जा रहा था तो कभी किसी लग्जरी गाड़ी में। इतना ही नहीं आज इन बहनों के प्रति इतना प्रेम उमड़ रहा था कि जैसे वो ही सब कुछ हैं।
हे मां! छोटा मुंह बड़ी बात का आरोप भले ही लगे लेकिन मेरे को यह सब दिखावा लगता है। महज दिखावा। बेटियों के प्रति इतना ही स्नेह एवं प्रेम है तो वह रोज दिखाई क्यों नहीं देता? बेटियां शक्ति स्वरूपा है तो क्यों उनका कोख में ही कत्ल किया जा रहा है? आज पूजन के लिए बेटियों की तलाश करनी पड़ी इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है। वाकई बेटियों के प्रति इतनी हमदर्दी व श्रद्धा भाव है तो फिर लिंगानुपात में इतना अंतर क्यों व किसलिए है? देश में प्रति हजार पुरुषों के पीछे 943 महिलाएं हैं। यही आंकड़ा राजस्थान में आकर और भी कम हो जाता है। श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ में प्रति हजार पुरुषों के पीछे भी महिलाओं का अनुपात कम है। सोचिए, यह मान-सम्मान, यह आवभगत, यह पूछ परख अगर वाकई दिल से होती तो क्या यह आंकड़ा बराबरी पर नहीं होता?
हे मां! आपके नाम से बेटियों की पूजा करना मेरे को तो औपचारिक हीं नजर आता है। एक तरह का दस्तूर, जिसको निभाने की सब में होड़ लगी है। एक रस्म जिसको पूरी करने में सब लगे हैं। यह देखादेखी व एक दूसरे का अनुसरण करने से ज्यादा कुछ नहीं। बराबरी का दर्जा देने की बात तथा सशक्तिकरण के दावे इस औपचारिकता के आगे बेहद बौने नजर आते हैं। हे मां! सबको सदबुद्धि दो और उनकी सोच को बदलो ताकि बेटियांे के प्रति ऐसा समभाव हमेशा दिखाई दे।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ संस्करण के 5 अप्रेल 17 के अंक में प्रकाशित 

पुलिस कार्रवाई पर सवाल

टिप्पणी 
हनुमानगढ़ में एक बालिका से जबरन जिस्मफरोशी कराने का मामला सामने आने के तीन दिन बाद सक्रिय हुई पुलिस ने नौ जगह दबिश देकर देह व्यापार में संलिप्त 27 आरोपितों को पकड़कर अपनी साख बचाने की भरपूर कोशिश की है। पकड़े गए आरोपितों में सात दलाल/ ग्राहक एवं 20 महिलाएं शामिल हैं। इस कार्रवाई से यह तो साबित हुआ है कि पुलिस चाहे तो कुछ भी संभव है, लेकिन साथ में बड़ा सवाल यह भी है कि हालात यहां तक पहुंचे ही क्यों? आखिर एेसी कौनसी चूक या शह रही, जिससे देह व्यापार करने वालों के हौसले इतने बढ़ते गए कि वह पुलिस के ठीक नाक के नीचे यह धंधा बेखौफ संचालित करने लगे। कहीं न कहीं इन सवालों के जवाब तलाशेंगे तो कठघरे में पुलिस ही होगी। एक साथ कार्रवाई करने और उसमें सफलता हासिल करने से भी यही साबित होता है कि पुलिस को देह व्यापार के इन ठिकानों की जानकारी पहले से थी। और अगर जानकारी थी तो जिम्मेदार क्यों आंखें मंूदे रहे? पुलिस पर सवाल दोनों तरफ से हैं। कार्रवाई न करने पर भी और कार्रवाई करने के बाद भी। एेसा इसलिए क्योंकि जिस सुरेशिया चौकी से कुछ ही दूरी पर मासूम बालिका के सपनों व अरमानों को जबरन रौंदा जाता रहा है वह पुलिस को दिखाई नहीं दिया। लेकिन आनन-फानन में नौ ठिकाने खोज निकाले गए। अपनी खाल बचाने को पुलिस यह दलील जरूर दे सकती है कि देह व्यापार के अड्डों पर कार्रवाई से पहले ही आरोपित भूमिगत हो जाते हैं, इसलिए सफलता नहीं मिलती। खैर, किसी कार्रवाई को कितनी गोपनीयता से अंजाम दिया जाता है यह भी पुलिस से बेहतर कोई नहीं जान सकता।
हनुमागढ़ के नौरंगदेसर के पास ओवरलोड जीप का हादसा शेरगढ़ चौकी के पास हुआ। देह व्यापार का मामला भी पुलिस चौकी के पास ही हुआ। सुरेशिया में शांतिप्रिय एवं इज्जतदार लोग भी रहते हैं। लेकिन आज उस बस्ती की पहचान देह व्यापार के लिए कुख्यात बस्ती के रूप में है। जो इज्जतदार हैं वह इसलिए नहीं बोलते कि देह व्यापार का धंधा पुलिस चौकी की नाक के नीचे चल रहा है। पुलिस अधीक्षक अगर चाहें तो सुरेशिया के दस इज्जतदार लोगों को अपने दफ्तर में बुलाकर पुष्टि कर सकते हैं। खोजने पर इस तरह के उदाहरण और भी मिल जाएंगे। खास बात यह है कि इन हादसों/प्रकरणों से कोई सबक नहीं लिया जाता है। यह बात दीगर है कि तात्कालिक आक्रोश को शांत करने के उपाय जरूर खोज लिए जाते हैं। इसके बाद व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। 
बहरहाल, हनुमानगढ़ में देह व्यापार की शिकायतों को देखते हुए अभी और कार्रवाई की दरकार है। विशेष रूप से उन होटलों की गहनता से पड़ताल होनी चाहिए जिनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं। जंक्शन में बस अड्डे के आसपास ही एेसे कई होटल हैं जहां दिनदहाड़े जिस्मफरोशी की गतिविधियां संचालित होती है। आसपास के दुकानदार इन होटलों में चल रही गतिविधियों से परेशान हैं। शिकायत इसलिए नहीं करते कि पुलिस के साथ सांठगांठ का दावा होटल वाले करते रहते हैं। फिलहाल तो पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती मासूम से देह व्यापार करवाने की आरोपित महिला को पकडऩा है। संभव है उसके पकड़े जाने के बाद और कई चौंकाने वाले खुलासे हों। जरूरत ईमानदार व कारगर तथा लगातार कार्रवाई की है। सवालों से घिरी पुलिस के पास इससे बेहतर मौका और होगा भी क्या? आखिर जिस जनता की नजरों में आज वह खटक रही है, वही जनता उसको आंखों पर बैठाती है। यह पुलिस पर निर्भर करता है वह कौनसी राह चुनती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ संस्करण में 2 अप्रेल 17 को प्रकाशित

ईमानदार तहकीकत की दरकार

टिप्पणी
श्रीगंगानगर में राशन फर्जीवाड़े का मामला भले ही जयपुर पहुंच गया हो। विधानसभा में भी उठ गया हो। और तो और मंत्री ने कार्रवाई का भरोसा भी दे दिया हो लेकिन इस प्रकरण की पड़ताल ईमानदारी से होगी, इसमें संशय नजर आता है। प्रशासनिक एवं सरकार के स्तर पर अब तक हुई कार्रवाई तो कुछ इसी तरह के संकेत दे रही है। प्रकरण के खुलासे के तीन-चार दिन बाद महज दस राशन डीलरों के लाइसेंस निलंबित करने की कार्रवाई से समझा जा सकता है कि हुक्मरान इस गंभीर मसले को कितने हल्के में ले रहे हैं। सरकार की देर से की गई तथा औपचारिक व मजबूरी से भरी इस कार्रवाई से यह प्रकरण और भी संदिग्ध हो जाता है। संभव नहीं कि फर्जीवाड़े के खेल में अकेले राशन डीलर ही यह सब कर रहे थे, वह भी इतने बड़े पैमाने पर। वैसे इसकी टोपी उसके सिर रखने की होड़ ने इस फर्जीवाडे़ के सूत्रधारों, जिम्मेदारों और भागीदारों की भूमिका को भी संदेह के दायरे में ला दिया है। इसकी बानगी देखिए। राशन डीलर कहते हैं गड़बड़ी उन्होंने नहीं की, पोस मशीन खराब है या फिर ई मित्र वालों ने गड़बड़ की है। जबकि विभाग कह रहा है कि राशन उठाना आसान काम है। जिनके नाम से राशन उठाया गया है, उन्होंने राशनकार्ड आधार, भामाशाह व गैस कनेक्शन नंबर लिंक नहीं करवाए हैं। उन उपभोक्ताओं के साथ एेसा हो सकता है। विभाग की इसमें कोई गलती नहीं है। 
विभाग की दलील तो यह भी है कि ऑनलाइन काम में कंट्रोल नहीं रहता। मतलब जो कुछ हुआ उसके लिए केवल उपभोक्ता ही जिम्मेदार है। इधर, इस मामले में फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ करने वाले पार्षद तो डिपो धारक व अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं। आरोप सच्चाई के नजदीक नजर इसलिए भी आते हैं कि इस तरह का घपला जब बड़े स्तर पर होता है और कार्रवाई ऊंट के मुंह में जीरे के समान होती है। अक्सर देखा भी गया है कि फर्जीवाड़े के खेल में तालमेल से ही घालमेल होता है।
खैर, रसद विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल तो उस वक्त भी उठते रहे हैं जब राशन वितरण का काम ऑफलाइन होता रहा है। अब केवल निलंबन की कार्रवाई से भी सवाल उठते हैं। भले ही विभाग ने तात्कालिक कार्रवाई कर अपनी खाल बचाने का भरपूर प्रयास किया हो लेकिन निलंबन करना यह तो दर्शाता ही है कि गड़बड़ी हुई है। और गड़बड़ी हुई है तो फिर इसकी पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं? महज निलंबन करके रसद विभाग क्या किसी जांच से बचना चाहता है? क्या विभाग के अधिकारियों को डर है कि जांच हुई तो कहीं उसकी जद में वो न आ जाए? कहीं विभाग की भूमिका से पर्दा न उठ जाए?
बहरहाल, इस मसले में कुछ तो एेसा है ही जो अधिकारियों को इस प्रकरण को पुलिस तक ले जाने से रोक रहा है। वैसे इस प्रकरण का पर्दाफाश करने वालों को अब चुपचाप नहीं बैठना चाहिए। भ्रष्टाचार और घपले के इस खेल में शामिल सभी सूत्रधारों व भागीदारों के नाम सार्वजनिक तभी हो पाएंगे जब इसकी जांच ईमानदारी से होगी। क्योंकि सरकारी संरक्षण व शह पाकर मजबूत होने वाले गठजोड़ों की गांठ तोडऩा आसान काम नहीं होता। जांच भी स्वतंत्र एजेंसी से हो तभी दूध का दूध व पानी का पानी होने की उम्मीद है, वरना यह खेल जैसे चलता आया है वैसे ही चलता रहेगा। अनवरत... बदस्तूर...।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 30 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

...तो क्या हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं?

टिप्पणी,
श्री गंगानगर शहर के अंदर से गुजरने वाले नेशनल/स्टेट हाइवे पर अब शराब की दुकानें खुलेंगी। यह इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि राज्य सरकार ने नियमों की आड़ में पतली गली ढूंढ ली है। नए नियमों के बहाने दलील दी जा रही है कि नगर पालिका या परिषद क्षेत्र से गुजरने वाले नेशनल/स्टेट हाइवे जिनके बाइपास हैं, उन पर शराब की दुकानें खुल सकेंगी। आदेशों के तहत श्रीगंगानगर के लक्कड़ मंडी टी पाइंट से लेकर सूरतगढ़ बाइपास तक, शिव चौक से नाथांवाला बाइपास तक तथा कोडा चौक से पदमपुर बाइपास तक शराब की दुकानें खोली जा सकेंगी। नए आदेश एक अप्रेल से लागू हो जाएंगे। इन आदेशों से यह तो साफ जाहिर होता है कि कमाई के लिए राज्य सरकार कुछ भी कर सकती है और किसी भी हद तक जा सकती है। एेसा इसलिए है क्योंकि नियमों को ठेंगा दिखाने, उनमें संशोधन करने या उनको घुमा फिराकर नए सिरे से परिभाषित करने की कलाकारी सरकार व उसके हुक्मरानों को बखूबी आती है। खैर, शराब दुकानों के मामले में राज्य सरकार द्वारा इस तरह और इतने समय बाद नियमों का तोड़ निकालने से एक नई बहस जरूर खड़ी हो गई है। साथ ही कई तरह के सवाल भी हैं, जो सरकार व हुक्मरानों को कठघरे में खड़ा करते हैं। नियम बनाने वाले यह क्यों समझते हैं कि शराब का सेवन करने से हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं। शराब पीकर शहरी क्षेत्र में गाड़ी चलाने वालों से तो हादसे होते ही नहीं या फिर नगरपालिका या नगर परिषद क्षेत्र से गुजरने वाले एेसे नेशनल और स्टेट हाइवे जिनके बाइपास बने हुए हैं उन पर ही वाहन चलते हैं, वो शहर के अंदर आते ही नहीं। नियमों की आड़ में निकाले गए इस तरह के आदेशों से तो यही जाहिर होता है कि हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं और जान का खतरा भी केवल और केवल हाइवे पर ही होता है। बाकी जगह शराब पीकर किसी भी तरह गाड़ी चलाओ, जानमाल का कोई खतरा नहीं है।
राजस्व के लिए सरकार किस हद पर तक जा सकती है। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि जिस बाइपास का हवाला दिया जा रहा है वह अभी तक पूर्ण ही नहीं है। मुख्यमंत्री के उद्घाटन के बावजूद हाइवे का काम अभी तक अधूरा पड़ा है। अधिग्रहित की गई जमीन के बदले किसानों को मुआवजा वितरण अभी तक नहीं किया जा सका है। मुआवजा हुक्मरानों के बीच लंबे समय तक फुटबाल बना हुआ है। इस काम को पूर्ण करने के लिए शराब की दुकानों जैसी तत्परता दिखाई नहीं देती। हाइवे का अधूरा काम अगर तत्काल प्रभाव से भी शुरू होता है तो कम से कम छह माह पहले वह पूर्ण नहीं हो पाएगा।
बहरहाल, समूचे प्रदेश में शराब बंदी के लिए अनशन करने तथा जान की बाजी लगाने वाले शख्स के जिले में इस तरह नियमों की आड़ में दुकानें खोलना दिखाता है कि सरकार शराब के माध्यम से राजस्व प्राप्ति के लिए किस हद तक जा सकती है। यह फैसला शराबबंदी की मांग को मुखर करने वालों को ठेंगा भी दिखाता है और चिढ़ाता भी है। खैर, प्रतिबंध के बावजूद रात आठ बजे बाद शराब बेचने की अघोषित छूट की बात से इसको समझा जा सकता है कि सरकार को सिर्फ और राजस्व पसंद है, भले ही वह कैसे भी आए। जान जाती है तो चली जाए, अमन-चैन भंग होता है तो हो। सरकार को इससे सरोकार नहीं।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 25 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

धैर्य की परीक्षा कब तक?

टिप्पणी
यह सवाल है न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद का। केन्द्र की ओर से समर्थन मूल्य का निर्धारण होने तथा मंडी में सरसों की आवक शुरू होने के बावजूद अभी तक इसकी सरकारी खरीद शुरू नहीं हो पाई है। यह सवाल बहुत बड़ा है और लंबे समय से अनुतरित है। तभी तो यह कमोबेश हर साल उठता है और हर बार इसी तरह का विरोध होता है। व्यवस्थाओं में दोष के खिलाफ आक्रोश भड़कना लाजिमी है। इस कड़ी में आंदोलन होते हैं। वार्ताओं के दौर चलते है। ज्ञापन लेने की औपचारिकताएं निभाई जाती हैं तो आश्वासन की रेवडि़यां भी खूब बंटती हैं। अंततोगत्वा सियासी लाभ-हानि का गणित देखने तथा तात्कालिक परिस्थितियों के आधार पर विरोध को शांत करने के वैकल्पिक उपाय तलाशे जाते हैं। 
विडम्बना यह है कि इस तरह की प्रक्रिया हर साल दोहराई जाती है। इससे भी अफसोसजनक बात तो यह है कि हक हकूक से जुड़े मसले का कभी स्थायी समाधान नहीं खोजा जाता। जिम्मेदारों और हुक्मरानों ने रोजी-रोटी से जुड़े इस अहम सवाल को कभी गंभीरता से नहीं लिया। यह सवाल धरतीपुत्रों के हक से जुड़ा है। यह सवाल उनके कठोर परिश्रम के प्रतिफल से वाबस्ता है। यह सवाल उनके जीवन से इतना घुला-मिला और रचा बसा है कि इसके समाधान होने से ही उनके घर में खुशी आती है। 
यह सवाल है न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद का। केन्द्र की ओर से समर्थन मूल्य का निर्धारण होने तथा मंडी में सरसों की आवक शुरू होने के बावजूद अभी तक इसकी सरकारी खरीद शुरू नहीं हो पाई है। इसी मांग को लेकर श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले के धरतीपुत्र आंदोलन की राह पर हैं। उनमें आक्रोश उबल रहा है लेकिन जिम्मेदारों व हुक्मरानों के पास अभी कोई ठोस समाधान या आश्वासन नहीं है। सरकारी प्रयासों की बानगी देखिए कि श्रीगंगानगर जिले में अभी तक चने की सरकारी खरीद के लिए केवल एक केन्द्र बनाया गया है तथा गेहूं के लिए 34 केन्द्रों की स्थापना की गई है, लेकिन सरसों के लिए खरीद केन्द्र तक बनाने की जरूरत नहीं समझी गई। इससे समझा जा सकता है कि सरकार खरीद मामले में कितनी गंभीर है और किसानों की कितनी हमदर्द है। 
प्रदेश को धन-धान्य से परिपूर्ण करने वाले जिलों में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ का योगदान किसी से छिपा हुआ नहीं है, लेकिन यह सब करने के लिए किसान को पग-पग पर परीक्षा देनी पड़ती है। सड़कों पर आना पड़ता है। कभी पानी के लिए, कभी बारी के लिए। वह जैसे-तैसे इन समस्याओं से निबटता है तो फिर खरीद के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। दिन-रात एक कर कठोर परिश्रम दम पर रिकॉर्डतोड़ पैदावार लेने वाले धरतीपुत्र को उसकी मेहनत का वाजिब हक आखिरकार क्यों नहीं मिलता? 
बहरहाल, यह तो जगजाहिर है कि श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के किसानों ने अपनी मेहनत व लगन के दम पर दोनों ही जिलों को कृषि के मामले में अव्वल बनाया है। सरकारी स्तर पर पानी से लेकर जिंसों की खरीद तक उन्हें सहुलियत मिले तो नि:संदेह दोनों जिलों के खाते में उपलब्धियों के और भी रिकॉर्ड होंगे। पर यह सब सरकार व उनके हुक्मरानों की इच्छाशक्ति एवं संवदेनशीलता पर निर्भर करता है। धरतीपुत्रों की धैर्य की परीक्षा अब खत्म होनी चाहिए। उनके साथ सरकारी स्तर की यह संवेदनहीनता व नाइंसाफी किसी भी कीमत पर उचित नहीं है।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 22 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

लखटकिया प्रेम विवाह

लघुकथा
वो बिंदास अंदाज में कहे जा रहा था। बिलकुल बेझिझक व निसंकोच।दुनियादारी से अनजान व बेखबर वह अपने मित्रों से मुखातिब था। अचानक उसके शब्दों ने मेरा ध्यान खींचा। वह कहे जा रहा था, अंतरजातीय विवाह करने के बहुत फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि पांच लाख रुपए मिलते हैं। इतने में दूसरे मित्र ने उसकी हां में हां मिलाते हुए इसे नाम दिया लखटकिया प्रेम विवाह। फिर जोर से हंसी का ठहाका गूंजा। सभी ने ताली बजाने वाले अंदाज में एक दूसरे के हाथ पर हाथ मारा। फिर एक बोला, बेरोजगारी के दौर में यह आइडिया भी बुरा नहीं है। मैं चुपचाप यह सब देख व सुन रहा था। अचानक जेहन में विचारों का द्वंद्व शुरू हो गया। प्रेम दिलों से पैसों तक आ पहुंचा है। न चाहते हुए भी रह-रहकर मेरे कानों में प्रेम विवाह का नया नामकरण लखटकिया प्रेम विवाह गूंज रहा था।

बीकानेर के लोग और होली

मेरा दावा है कि राजस्थान में बीकानेर जैसी होली शायद ही कहीं देखने को मिले। पिछले साल बीकानेर की तणी तोड़ होली देखी थी। इस बार की होली श्रीगंगानगर में मनाई। रंग लगवाने व लगाने की परम्परा तो कमोबेश सभी जगह एक जैसी ही है लेकिन जिस मस्ती में जी कर तथा आनंद से सराबोर होकर बीकानेर के लोग होली मनाते हैं, उसका तो कहना ही क्या। हालांकि बीकानेर की होली के गीत व रसियों की गतिविधियां मर्यादाओं की परिधियां लांघ जाती हैं। फिर भी वहां के स्थानीय लोगों के यह सब आदत में आ चुका है। लिहाजा, उनको यह सब करना और देखना बिलकुल भी अजीब या अटपटा नहीं लगता। मस्ती व मनोरंजन के साथ जीना, साफगोई तथा आरामतलबी जैसी न जाने कितनी ही विशिष्टताएं बीकानेर के लोगों के खून में हैं। तभी तो बीकानेर के लोग कहीं पर भी हो अपनी छाप छोड़ते जरूर हैं। इतना सब कहने और भूमिका बांधने का सबब यही है कि श्रीगंगानगर में भी एक शख्स एेसा है जो बीकानेर की संस्कृति को जिंदा रखे हुए हैं। उम्र के सात दशक पार करने के बावजूद होली को शिद्दत से मनाने तथा उसको मस्ती एवं आनंद के उल्लास में जीने का अंदाज देखकर अच्छे खासे नौजवानों को भी इस 'युवा' से रस्क होता है।
बेहद हंसोड़ व जिंदादिल यह शख्स फरीद खान हैं । जी हां सेवानिवृत जनसंपर्क अधिकारी फरीद खान। मूलत: बीकानेर के रहने वाले हैं लेकिन घर श्रीगंगानगर में बना लिया है, लिहाजा संपर्क दोनों जगह ही है। पारिवारिक परेशानियों के चलते पिछले कुछ समय से इन्होंने खुद को खुद तक सीमित कर लिया था। हाल ही में राजस्थान पत्रिका में होली पर पुराने संस्मरण पर आधारित उनका साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था। बस फिर क्या था उनके अंदर का कलाकार फिर से जाग उठा। शाम को फोन करके बाकायदा निमंत्रण दिया। उनके आग्रह को मैं टाल नहीं सका और सुबह कार लेकर पत्रकार कॉलोनी की तरफ चल पड़ा। यह कॉलोनी अभी भी विकसित नहीं हुई है। मुझे बताया गया पार्क तलाशने में थोड़ा वक्त लगा। मैं रस्ते में था कि फोन आया। सामने से मर्दाना आवाज थी लेकिन कोई महिला बनकर बोल रहा था। आवाज आई शेखावत जी मैं बबीता हूं बीकानेर से आपसे मिलने आई हूं। आप कहां मिलेंगे। चूंकि होली के दिन इस तरह के मजाक से मैं वाकिफ था लिहाजा मैंने भी मजाकिया अंदाज में ही जवाब दिया और कहा कि बबीता जी बीकानेर में भी बहुत शेखावत हैं, आपने श्रीगंगानगर आने का कष्ट क्यों किया। इतना कहते ही फोन कट गया। थोड़ी देर बाद फिर फोन आया। वो ही बात, अरे शेखावत जी, मैं बबीता बोल रही हूं आपने मेरा फोन कैसे काटा। मैंने हंसते हुए जी मैंने फोन नहीं काटा, आपकी आवाज आना बंद हो गई थी। खैर, फोन फिर कट गया। आखिरकार मैं कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने में सफल रहा। वहां सारे ही अपरिचित चेहरे से एकबारगी तो मैं चौंका कि कहीं दूसरी जगह तो नहीं आ गया लेकिन बाद में फरीद खान जी के बेटे अमित से मुलाकात हुई। थोड़ी देर बात फरीद खान जी बड़ा सा पर्स लटकाए। टी शर्ट व स्कर्ट पहने पार्क में आए तो मेरी हंसी छूट पड़ी। आते ही उन्होंने आव देखा न ताव मुझे बांहों में भर लिया और कहने लगे देखो, आप बबीता से मिलने आ ही गए। पार्क में डेक पर होली के गीत बज रहे थे। फरीद खान जी के दो तीन रिटायर साथी भी वहां पूरे जोश व जुनून के साथ मैदान में डटे थे। दो तीन बार मुझे हाथ पकड़कर ले जाया गया लेकिन मैं केवल उनको प्रोत्साहित कर वापस आ जाता। करीब दो घंटे वहां रुकने के बाद मैं घर लौट आया, लेकिन फरीद खान की जिंदादिली व संजीदगी का कायल हो गया। उन्होंने पूरी कॉलोनी में जा जाकर महिलाओं को पार्क आने का निमंत्रण दिया। उनकी धर्मपत्नी व दोनों पुत्रों की पत्नियां भी वहां मौजूद थीं। वे बार-बार उनके पास जाकर नाचने को कहते लेकिन धर्मपत्नी तैयार नहीं हुई हालांकि मेरे के आने के बाद महिलाएं नाची थी लेकिन जब वे नाच नहीं रही थीं तो फरीद खान कहने लगे शेखावत जी, यह महिला सशक्तीकरण कागजों में ही है। सत्तर साल बाद भी इस तरह का शर्म संकोच किस काम का।
आज फेसबुक पर कल के कार्यक्रम के वीडियो देख रहा था तो सोचा क्यों न इस संस्मरण को शब्द दिए जाएं। वाकई फरीद खान जैसे शख्स ही हैं जिनके दम पर त्योहारों की अहमियत बढ़ जाती है। सच्चा हिन्दुस्तान एेसे ही लोगों के दिलों में बसता है। अल्लाह ताला फरीद खान साहब को लंबी उम्र दें। वे स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों।

कुएं में ही भांग!

टिप्पणी 
तय समय से भी देर तक अगर शराब की दुकानें खुली हुई दिखाई दे जाए तो बिना किसी शक सुबहा के यह मान लेना चाहिए कि यह सब गैरकानूनी रूप से बने गठजोड़ का कमाल है। ठेकों पर ठरके के साथ दिन दहाड़े निर्धारित से ज्यादा कीमत वसूली जाए तो यह जान लेना चाहिए कि यह सब जिम्मेदारों की जुगलबंदी के जादू का धमाल है। बार-बार शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो तो यह आसानी समझ जाना चाहिए कि दाल में काला नहीं अपितु दाल ही काली है। श्रीगंगानगर में बुधवार को पकड़े गए तीन सरकारी नुमाइंदों की कहानी से तो यही जाहिर होता है। 
आरोप है कि शराब ठेकेदारों से बंधी लेकर यह तीनों (एक पुलिस थानाधिकारी, एक आबकारी सहायक एवं सिपाही) उनको मनमर्जी से शराब बेचने की छूट देते थे। वैसे इस घटनाक्रम को एक बानगी के रूप में भी देखा जा सकता है, क्योंकि समूचे राजस्थान में कहीं पर भी चले जाओ। कमोबेश हर ठेके पर शराब ठेकेदारों के कारिंदों के रंग ढंग व मनमर्जी का खेल इसी अंदाज में चलता दिखाई देता है। तभी तो यह खेल बड़ा लगता है। श्रीगंगानगर जैसे ही हालात बाकी जगह नजर आते हैं। एेसे में यह मामला बेहद गंभीर हो जाता है। साथ ही इन आरोपों को भी बल मिलता है कि बंधी के बहाने मनमर्जी करने की छूट देने का खेल कहीं समूचे प्रदेश में तो नहीं खेला जा रहा? क्योंकि सभी जगह एक जैसी समानता समूचे सिस्टम को न केवल संदिग्ध बनाती है बल्कि उस पर सवाल भी उठाती है। सरकारी संरक्षण में ही इस तरह का अवैध काम फल फूल रहा है तो कैसे यकीन किया जाए कि बाड़ खेत की रखवाली भली भांति से कर रही है? इस तरह के हालात से तो भांग पूरे कुएं में ही घुली हुई नजर आती है। 
वैसे इस तरह के मामलों में अक्सर बंधी का हिस्सा ऊपर तक जाने की चर्चा भी सुनने को मिल जाती है। कहा जाता है कि नीचे से ऊपर तक एक चेन सिस्टम है, जिनमें यह हिस्सा बंटता है। लेकिन बात कभी चर्चाओं से आगे नहीं बढ़ती। बंधी ऊपर जाती है या नहीं? और जाती है तो इसमें किस-किस की भागीदारी और भूमिका है और किसकी नहीं ? जैसे सवाल अनुत्तरित ही रहते हैं। अब यह कैसे संभव है कि सिर्फ तीन सरकारी नुमाइंदों को बंधी देकर शराब ठेकेदार इतने बेफिक्र होकर बेखौफ शराब बेच रहे थे तथा अन्य किसी को कानोकान खबर तक नहीं थी? दरअसल यह कानोकान खबर न होने की बात ही बंधी के ऊपर जाने की चर्चा को बल देती है। 
यह तो जगजाहिर ही है कि गैरकानूनी काम जब सरेआम संचालित होते हैं तो सवाल उठते हैं और जिम्मेदारों को कठघरे में खड़ा भी करते हैं। क्या जिम्मेदार यह बताने की स्थिति में हैं कि शराब ठेकेदारों को ज्यादा कीमत वसूलने की हिम्मत कौन दे रहा है? कौन है जो इनको देर रात दुकान खोलने का साहस दे रहा है? कौन है जो इनके डर व शंका को खत्म कर रहा है? कौन है जो इनके खिलाफ आने वाली शिकायतों पर गौर नहीं करने दे रहा? सवालों की यह फेहरिस्त बताती है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। कोई कमजोर कड़ी है वरना अवैध कारोबार का संचालन इतनी आसानी से कैसे संभव है। बहरहाल, बड़ा सवाल यह भी है कि यह गठजोड़ तोड़ेगा कौन? इसलिए जिम्मेदारों की यह जुगलबंदी तोडऩे में जनता की जागरुकता ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 9 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित