Friday, November 29, 2013

प्रचार से अब तक मुद्दे गायब

पाटन विधानसभा

दुर्ग जिले की पाटन विधानसभा में एक बार फिर मुख्य मुकाबला दोनों रिश्तेदारों एवं परम्परागत प्रतिद्वंद्वियों के बीच ही माना जा रहा है। कहने को यहां बसपा एवं स्वाभिमान मंच ने भी प्रत्याशी उतारे हैं, लेकिन वे अभी तक मुकाबले में दिखाई नहीं देते हैं। नामांकन वापसी के बाद यहां से कुल 11 प्रत्याशी मैदान में हैं। भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल यहां से तीसरी बार, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी भूपेश बघेल पांचवीं बार मैदान में हैं। विजय बघेल यहां से एक बार जबकि भूपेश बघेल तीन जीत चुके हैं। सन 1977 में अस्तित्व में आए इस विधानसभा क्षेत्र में अब तक आठ मुकाबलों में छह में बाजी कांग्रेस के हाथ लगी है, जबकि दो बार भाजपा ने जीत हासिल की है। पाटन विधानसभा क्षेत्र में मुकाबले हमेशा रोचक ही रहे हैं और हार-जीत का अंतर हमेशा आठ हजार मतों से कम ही रहता है। मजे की बात तो यह है कि यहां सबसे बड़ी जीत 1980 में 7983 मतों से कांग्रेस प्रत्याशी के नाम दर्ज है, तो सबसे कम अंतर 1985 में 2934 मत की जीत का सेहरा भी कांग्रेस के सिर पर ही बंधा है।
कुर्मी एवं साहू समाज निर्णायक
पाटन विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी एवं साहू समाज की भूमिका हर बार निर्णायक रहती हैं, क्योंकि क्षेत्र में दोनों समाज की बहुलता है। इसके अलावा अनुसूचित जाति के रूप में सतनामी समाज की भी यहां अच्छी खासी दखल है। पिछले चुनाव में भाजपा का समर्थन करने वाले साहू समाज ने इस बार टिकट वितरण के दौरान भाजपा प्रत्याशी के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए टिकट मांगा था। अगर यह नाराजगी मतदान तक कायम रही तो फिर विजय बघेल के लिए खतरा हो सकता है। भाजपा एवं कांग्रेस दोनों के प्रत्याशी कुर्मी जाति से हैं, ऐसे में छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच ने यहां दीनू साहू को टिकट थमाया है, लेकिन उससे नुकसान कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को ज्यादा होने के आसार हैं।
लगातार बढ़ रहा है जीत का अंतर
एक रोचक तथ्य यह भी जुड़ा है कि 1985 के बाद से लगातार जीत का अंतर बढ़ रहा है, जो पिछले चुनाव में 7842 था। बुनियादी सुविधाओं में पिछड़ा होने के बावजूद पाटन विधानसभा क्षेत्र के लोग मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। पिछले विधानसभा में यहां 79 प्रतिशत मतदान हुआ था। बहरहाल, चुनावी शतरंज पर पुराने खिलाड़ी होने की वजह से मतदाताओं में खास उत्साह दिखाई नहीं देता है। भाजपा प्रत्याशी के जहां अपने कार्यकाल की 'उपलब्धियों एवं 'विकास के नाम पर मतदाताओं के बीच वोट मांग रहे हैं, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी अपने कार्यकाल की तुलना करते हुए जनता के बीच हैं, लेकिन 'विकास के शोर में क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे गौण हो गए हैं।
अधूरी घोषणाएं पड़ सकती हैं भारी
पाटन विधानसभा क्षेत्र के लोग प्रत्याशियों के मुंह से विकास के दावे सुनकर हैरान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर विकास कहां हुआ है। देखा जाए तो मतदाताओं की यह हैरानी जायज भी है। क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं भी लोगों को ठीक से मयस्सर नहीं हैं। क्षेत्र में कई प्रमुख मुद्दे हैं, जो इस बार चुनाव में रंग दिखा सकते हैं। उपकोषालय के यहां के लोगों को दुर्ग जाना पड़ता है। ग्रामीणों की मानें तो मुख्यमंत्री ने यहां छह माह में उपकोषालय की घोषणा की थी, लेकिन वह घोषणा अमल में नहीं आई। आईटीआई भी पाटन में न खुलकर दरबारमुखली में खुल गई, लेकिन वहां भी उसमें संसाधनों का अभाव है। पाटन में महिला महाविद्यालय की मांग भी अधूरी ही रह गई। इसके अलावा नल योजना व वृहद पेयजल योजना भी यहां के प्रमुख मु्द्दे हैं। क्षेत्र की टूटी-फूटी सड़कें भी इस बार चुनाव में प्रभावी भूमिका निभाएंगी। इतना ही नहीं हाल में करोड़ों रुपए के बजट से बनाई गई सड़कें तो दो माह भी नहीं चल पाई। सड़क निर्माण में हुई अनियमितता के चलते लोगों में आक्रोश है।

2008 में मतदाता  155806
2013 में मतदाता 170581
मतदाता बढ़े 14775
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 साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ में 15 नवम्बर 13 के अंक में प्रकाशित।

नई बिसात, पुराने मोहरे

भिलाईनगर विधानसभा

प्रदेश के सर्वाधिक साक्षर एवं जागरूक विधानसभा क्षेत्र भिलाईनगर के साथ यह विडम्बना जुड़ी है कि इस बार चुनावी बिसात में भी वो ही चेहरे आमने-सामने हैं, जो न केवल पिछले चुनाव बल्कि बीस साल से एक-दूसरे के खिलाफ जोर आजमाइश करते आए हैं। आचार संहिता की सख्ती एवं मतदाताओं की चुप्पी ने प्रत्याशियों के समक्ष दुविधा खड़ी कर दी है। तभी तो राजनीति के खांटी खिलाड़ी एवं परम्परागत प्रतिद्वंद्वियों को इस बार जीत के लिए खूब पसीना बहाना पड़ रहा है। मतदान में मात्र सप्ताहभर का समय शेष होने के बाद भी कोई भी जीत के प्रति आश्वत दिखाई नहीं दे रहा है। इतना ही नहीं प्रत्याशियों के समर्थकों में भी बेचैनी कुछ कम नहीं। वे भी कुछ भी हो सकता है, मान कर चल रहे हैं। इन सब को देखते हुए भिलाईनगर का चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प एवं कांटे की टक्कर वाला होने की उम्मीद लगाई जा रही है। भाजपा के प्रेमप्रकाश पाण्डेय लगातार छठी बार भाग्य आजमा रहे हैं तो कांग्रेस के बदरुद्दीन कुरैशी भी लगातार पांचवीं बार मैदान में हैं। पाण्डेय तीन बार जीत चुके हैं, जबकि कुरैशी दो बार। नामांकन वापसी के बाद भिलाईनगर से कुल १८ प्रत्याशी मैदान में हैं। पिछले चुनाव में यहां से 12 प्रत्याशी मैदान में हैं। निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या में वृद्धि होने के भी राजनीतिक गलियारों में कई तरह के अर्थ लगाए जा रहे हैं। सांसद सरोज पाण्डेय की भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में सभाओं को लेकर भी लोग कई तरह के कयास लगा रहे हैं।
कोई नया मुद्दा नहीं
जागरूक विधानसभा क्षेत्र के लिए प्रत्याशियों के पास कोई नया मुद्दा नहीं है। भाजपा के प्रेमप्रकाश पाण्डेय अपने पुराने कार्यकाल में किए गए कार्यों के सहारे की चुनावी वैतरणी पार करवाने के प्रयास में जुटे हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी कुरैशी भी श्रमिकों के सम्मान और गांधी जयंती पर प्रतिभावान विद्यार्थियों को पुरस्कृत करने को ही अपनी उपलब्धि मानते हुए इससे भुनाने का उपक्रम कर रहे हैं।
जमने लगी है चुनावी रंगत
नामांकन वापसी तथा दीपोत्सव व छठ पर्व के बाद भिलाईनगर विधानसभा क्षेत्र में चुनावी रंगत रफ्ता-रफ्ता जमने लगी है। मतदान की तिथि नजदीक आने के साथ ही प्रत्याशियों के जनसम्पर्क अभियान में यकायक गति आ गई है। नुक्कड़ नाटकों एवं गली-गली में जनसम्पर्क का सिलसिला भी परवान पर है। प्रत्याशियों के परिजनों ने भी मोर्चा संभाल लिया है। वैसे चुनाव का ज्यादा असर पटरीपार के खुर्सीपार इलाके में ज्यादा देखने को मिल रहा है। घर-घर भाजपा-कांग्रेस के झंडे टंगे हुए हैं। टाउनशिप में इस प्रकार का माहौल नहीं है, लेकिन प्रमुख रास्तों पर लगाए गए होर्डिंग्स आने-जाने वालों का ध्यान जरूर खींचते हैं। भाजपा प्रत्याशी की कार्ययोजना में भिलाई को विकास की दौड़ में सबसे आगे खड़ा करना और टाउनशिप को फिर से पुराना स्वरूप देने का की है, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी भिलाई को शांति और अमन की राह पर ले जाने तथा गुण्डागर्दी खत्म कर लोगों में एकता स्थापित करने का सपना लिए चुनावी समर में डटे हैं।
मंच ने उतारा प्रत्याशी
चुनावों की घोषणा होने तक चुप्पी साधने के बाद छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच ने यहां से अपना प्रत्याशी मैदान में उतार दिया है। भाजपा प्रत्याशी के खेमे में इस बात को लेकर खुशी व्यक्त की जा रही है। दरअसल ऐसा इसलिए हो रहा है कि पिछले चुनाव में मंच ने भाजपा के प्रत्याशी के खिलाफ प्रचार कर अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस प्रत्याशी की मदद की थी। भाजपा समर्थक मानते हैं कि इस बार मंच का उम्मीदवार खड़ा होने से नुकसान कांग्रेस को होगा। भाजपा प्रत्याशी के समर्थक इस बात को गाहे-बगाहे भुना भी रहे हैं। इधर, कांग्रेस समर्थकों का मानना है कि मंच ने भले ही उम्मीदवार खड़ा कर दिया, लेकिन वह कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगा इस बात के आसार कम हैं।
बदरुद्दीन कुरैशी 52848
प्रेमप्रकाश पाण्डे 43985
जीत का अंतर 8863

 साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ में 12 नवम्बर 13 के अंक में प्रकाशित।

इस बार चौंकाने वाला होगा परिणाम

वैशालीनगर विधानसभा

वैशालीनगर विधानसभा सीट से भाजपा-कांग्रेस ने भले ही प्रत्याशी फाइनल करने में वक्त लगाया हो, लेकिन यहां इस बार मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है। आलम यह है कि वैशालीनगर की नस-नस से वाकिफ दोनों प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर होने के पूरे-पूरे आसार दिखाई दे रहे हैं। क्षेत्र में फिलहाल न कोई मुद्दा है और न ही किसी तरह की लहर। ऐसे में चुनावी परिणाम चौंकाने वाला ही होगा। दोनों दलों के प्रत्याशियों के नाम फाइनल होने के बाद मतदाताओं में फिलहाल चर्चा पर जरूर विराम लगा है, लेकिन जेहन में यह सवाल जरूर उठ रहा है कि आखिरकार लम्बे इंतजार एवं इतनी देरी के बाद प्रत्याशी घोषित करने के पीछे वजह क्या है? यह बात दीगर है कि दोनों ही प्रत्याशी देरी से टिकट मिलने के पीछे कोई बड़ा कारण नहीं मानते।
अजब संयोग से वास्ता
संयोग ही है कि प्रत्याशी घोषणा करने के मामले में दोनों ही दलों ने अपने पत्ते देर से खोले, लेकिन नाम की घोषणा एक ही दिन मंगलवार को हुई। दोनों ही दलों के प्रत्याशी पंजाबी समुदाय से संबंधित हैं और दोनों वैशालीनगर के स्थानीय वाशिंदे हैं। इतना ही नहीं है दोनों न तो वैशालीनगर के लिए अनजान हैं और न ही वैशालीनगर के लिए दोनों अजनबी। दोनों जाने-पहचाने एवं परखे हुए चेहरे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी जहां साडा अध्यक्ष रहने के साथ वर्तमान में विधायक हैं, वहीं भाजपा प्रत्याशी भिलाई निगम के महापौर रह चुके हैं। दोनों ही प्रत्याशियों के बंगले आलीशान हैं। वैशालीनगर के साथ यह भी संयोग है कि परिसीमन के बाद दो चुनाव में एक में भाजपा व एक में कांग्रेस के हाथ जीत लगी है।
अब कार्यकर्ताओं पर दारोमदार
बुधवार सुबह 11 बजे के करीब का समय। पूर्व महापौर विद्यारतन भसीन के आवास के बाहर अन्य दिनों के मुकाबले ज्यादा चहल-पहल नजर आ रही है। वाहनों की आवाजाही भी निरंतर बनी हुई है। भसीन के बंगले में बना गैरेज अब मिनी कार्यालय में तब्दील हो चुका है। अंदर कुर्सियों लगा दी गई हैं। बैठने वालों को गर्मी न लगे, इसलिए पंखे भी लगाए जा रहे हैं। समर्थकों से घिरे भसीन के मोबाइल की घंटी थमने का नहीं ले रही है। वे मोबाइल पर न केवल समर्थकों की बधाई स्वीकार कर रहे हैं, लगे हाथ उनसे सहयोग और चुनाव में जुट जाने की अपील भी कर रहे हैं। कार्यालय में एक मेज पर फूलों की माला रखी है, तो ऊपर एक थाली में मिठाई रखी है। समर्थकों के आने का क्रम जारी है। कोई चरण-स्पर्श करता है तो कोई हाथ मिलाता है। खुशी से सराबोर कार्यकर्ता कहते हैं रतन भैया, पार्टी ने भले ही देर से घोषणा की, लेकिन फैसला अच्छा किया है। पलटकर भसीन जवाब देते हैं अब सारा दारोमदार आप पर ही है। पार्टी ने तो फैसला कर दिया अब उसको परिणाम में बदलने का दायित्व आप सभी का है।
होई वही जो राम रुचि राखा
बुधवार सुबह 11.45 बजे। भजनसिंह निरंकारी अपने आवास में बनाए गए अपने कार्यालय में अपने पांच समर्थकों के साथ बैठे हैं। सभी खामोश हैं। अचानक खामोशी टूटती है। एक समर्थक सवाल पूछता है 'टिकट मिलने में इतनी देरी कैसे हो गई? सवाल सुनकर निरंकारी मुस्कुराते हैं, थोड़ा रुकने के बाद कहते हैं 'देरी, कहां? सब कुछ समयानुसार ही होता है। फिर कहते हैं 'होई वही जो राम रुचि राखा..। ऊपर वाले के घर न देर है न अंधेर है। सब कुछ निश्चित है, वैसे भी टिकट तो तय ही था। इतना कहकर वे समर्थकों की तरफ देखते हैं, और सभी लोग 'हां, यह बात तो है कहकर निरंकारी का समर्थन करते हैं। फिर खामोशी छा जाती है। फिर सवाल एक उठता है 'भाजपा ने तो भसीन जी को टिकट दी है। निरंकारी थोड़े दार्शनिक होते हुए कहते हैं 'मैं किसी से मुकाबला नहीं करता है। मैं सिर्फ अपनी लाइन पर भरोसा करता हूं। इसी बीच दो समर्थक और आते हैं। निरंकारी को बधाई देते हैं। इतने में चाय आती है, साथ में मिठाई थी। निरंकारी समर्थकों को कहते हैं, 'फार्म भरने से संबंधित तैयारी पूरी कर के रखो।

फैक्ट फाइल
2008 में मतदाता- 2,05,504
2013 में मतदाता- 2,31,457

मतदाता बढ़े- 25,953

2008 के विधानसभा चुनाव में

कांग्रेस के बृजमोहन सिंह को मिले थे - 41,811

भाजपा की सरोज पाण्डे को मिले थे - 63,078

जीत का अंतर - 21,267

2009 के विधानसभा उपचुनाव में

कांग्रेस के भजन सिंह निरंकारी को मिले थे- 47,225

भाजपा के जागेश्वर साहू को मिले थे- 42,997

जीत का अंतर- 1228

निष्कर्ष
वैशालीनगर विधानसभा क्षेत्र परिसीमन के बाद 2008 में पहली बार अस्तित्व में आया, लिहाजा यह किसी दल की परम्परागत सीट नहीं रही है। दोनों की प्रत्याशियों के मुकाबला इसलिए आसान नहीं, क्योंकि भितरघात एवं गुटबाजी का फैक्टर दोनों जगह है, जो इस से पार पाने में सफल रहेगा उसकी राह उतनी ही आसान होगी। स्वाभिमान मंच के भिलाई निगम में पार्षद जांनिसार अख्तर ने भी यहां से अपनी दावेदारी पेश की है। अख्तर अल्पसंख्यक समुदाय के मतों से आस लगाए हुए हैं। अगर ऐसा हुआ तो नुकसान कांग्रेस को ही ज्यादा होने के आसार हैं, क्योंकि अल्पसंख्यक कांग्रेस के परम्परागत मतदाता रहे हैं। लब्बोलुआब यह है कि वैशालीनगर का मुकाबला बेहद करीब एवं रोचक रहने की उम्मीद की जा रही है।

साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ में 1 नवम्बर 13 के अंक में प्रकाशित।

Thursday, November 28, 2013

क्रिकेट... सचिन... और मैं...(3)

बस यूं ही

बस में जैसे ही रेडियो ऑन किया तो उसमें नेटवर्क गायब हो गया। वह खिलौना बन गया था। उसका एंटीना निकालकर खिड़की से बाहर भी किया लेकिन सिवाय सरसराहट के कुछ सुनाई नहीं दिया। किसी ने सुझाव किया कि बस के अंदर रेडिया नहीं चलेगा छत पर बैठ जाओ। फिर क्या था रेडियो लेकर बस की छत पर बैठ गया। बारात चूरू जिले के हडिय़ाल गांव गई थी। बारात के पहुंचने तक श्रीलंका की पारी पूरी हो गई थी। बारात नाश्ता करती तब तक भारत की पारी शुरू हो चुकी थी। इसके बाद ढुकाव (तोरण) का वक्त हो गया। बाराती बैंडबाजी की धुन पर मगन होकर अपनी मस्ती में नाचने लगे थे। इधर, मैं कान के रेडियो लगाए सबसे पीछे चल रहा था। सचिन उस विश्व में अच्छा खेल रहे थे। उनसे सेमीफाइनल भी वैसी उम्मीद थी। और वो उम्मीद के हिसाब से खेले भी। सचिन ने इस मैच में 88 गेंदों पर 65 रन बनाए थे। सचिन के आउट होते ही भारतीय पारी अप्रत्याशित रूप से ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। महज 22 रन के अंतराल में सात विकेट गिर गए। कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन और अजय जड़ेजा तो बिना कोई रन बनाए ही पवेलियन लौट गए थे। थोड़ी देर पहले 98 रन पर एक विकेट का स्कोरकार्ड अब बदल कर आठ विकेट पर 120 रन हो गया था। विनोद कांबली नाबाद थे दस रन पर। 35वां ओवर फेंका जा रहा था। क्रिकेट के प्रति मैं बेहद सकारात्मक एवं आशान्वित रहता हूं। इतने प्रतिकूल हालात के बावजूद मैं विनोद कांबली से चमत्कार के उम्मीद लगाए बैठा था कि शायद वह कुछ जौहर दिखा दे। अचानक दर्शकों का पारा गरम हो गया और वे मैदान में बोतल आदि फेंकने लगे। स्टेडियम में एक जगह तो आग भी लगा दी गई। कोलकाता के ईडन गार्डन में हाहाकार मचा था। भारतीय टीम के पोचे प्रदर्शन के चलते दर्शक बेहद गुस्से में थे। तनावपूर्ण हालात देखते हुए मैच रोक दिया गया। उम्मीद की किरण अब भी जिंदा थी कि शायद मैच शुरू हो और कांबली कुछ कर के दिखा दे। बारात ढुकाव पर पहुंच चुकी थी। दूल्हा तोरण मारने चला गया और बाराती बगल में लगे टैंट में भोजन के लिए बढऩे लगे। सांसें ऊपर नीचे हो रही थी.. पता नहीं क्या होगा..। अचानक घोषणा हुई। मैच रैफरी ने श्रीलंका को विजयी घोषित कर दिया। मैं बिलकुल आवाक था। मेरे लिए यह झटका बेहद असहनीय था। मैं बिना भोजन किए रेडियो को बंद कर चुपचाप निराश कदमों से जहां बारात रुकी थी उस तरफ दौड़ पड़ा। आंखों में आंसू थे और सिर मारे दर्द के फट रहा था। वहां पहुंचा तो गांव के दो तीन बुजुर्ग बैठे थे। उन्होंने मेरे को देखकर टोका, अरे जल्दी कैसे आ गया.. भोजन हो गया क्या.. मैंने लगभग सुबकते हुए ही सिर हिलाकर हामी भर दी। सर्दी का मौसम था..। मैंने रजाई उठाई और बिलकुल उदास, निराश एवं हताश होकर अपना मुंह उसमें छिपा लिया। सचमुच उस मैच के बाद मेरे को सामान्य होने में करीब सप्ताह भर का समय लग गया था।
अब भी भारत की हार पर मन दुखी तो होता है लेकिन वैसा नहीं जैसा 1996 में हुआ था। बीच-बीच में सट्टेबाजी एवं मैच फिक्सिंग को लेकर क्रिकेट की काफी छिछालेदर हुई लेकिन मेरा क्रिकेट से मोह भंग नही हुआ। वैसे भी क्रिकेट को लेकर सभी के अपने-अपने तर्क है। आलोचक, समालोचक, समर्थक सभी तरह के व्यक्ति मिलेंगे। लेकिन जब 1985-86 में जब क्रिकेट खेलना सीखा तब से लेकर आज के माहौल को देखता हूं तो आमूलचूल एवं क्रांतिकारी बदलाव आया है, लोगों की सोच में। गांव में उस वक्त प्रतियोगिता के लिए जाते तो मुश्किल से 11 खिलाड़ी भी नहीं हो पाते थे। मान-मनौव्वल करके किसी तरह 11 का आंकड़ा बनाते थे। और आज गांव का हाल ये है कि छह से सात टीम तो गांव में बन जाएंगी। सौ से ज्यादा खेलने वाले हो गए। और इधर जो बुजुर्ग क्रिकेट को लेकर उस वक्त हम पर ताने कसते थे। कहते थे, क्रिकेट महंगा गेम है.. इसने परम्परागत खेलों की लील लिया.. इसको कोई भविष्य नहीं है, आज उनको भी क्रिकेट के रंग में रंगा देखता हूं तो हंसी आती है। माना क्रिकेट में प्रतिस्पर्धा बेहद कड़ी है। लेकिन मनोरंजन तो मनोरंजन है। भले ही कोई कपड़े की गेंद बनाकर कपड़े धोने की थापी का बल्ला कर खेले या लेदर गेंद से। बहरहाल, मैं तो जैसा कि बता ही चुका हूं, समय मिलता है तो क्रिकेट खेलने से खुद को रोक नहीं पाता..। अपने बच्चों के साथ भी..। हार पर आंसू बहाने की आदत पर तो किसी हद तक काबू पा लिया लेकिन खेलने पर शायद ही काबू पा सकूं... दिल तो बच्चा है जी..।

क्रिकेट... सचिन... और मैं...(2)


बस यूं ही

 
कल भावनाओं पर काबू नहीं था। यह सब लाजिमी भी था। ऐसा नजारा पहले कभी नहीं देखा। ना ऐसा संन्यास और ना ही ऐसी विदाई। सचमुच कल मेरे लिए सब कुछ अविस्मरणीय था। वैसे क्रिकेट के प्रति मेरा जुनून बचपन से ही रहा है। अब भी गांव जाता हूं तो बच्चों के साथ खेलने से खुद को रोक नहीं पाता हूं। यह अलग बात है कि इसके बाद तीन चार दिन तक सारा शरीर अकड़ा रहता हैं, दर्द होता है सो अलग। न जाने कितनी ही बार दर्द निवारक गोलियां खाकर काम चलाया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अब नियमित अभ्यास नहीं हो पाता है। जुलाई 2000 तक तो क्रिकेट खेला हूं। उस वक्त बिना क्रिकेट खेले शायद ही कोई दिन नहीं बीतता था। जिले की शायद ही ऐसी कोई बड़ी क्रिकेट प्रतियोगिता रही होगी, जिसमें मैं नहीं खेला ..। इतना ही नहीं गांव में भी लगातार तीन साल तक बड़े पैमाने पर क्रिकेट प्रतियोगिता करवाई। कमरे की अलमारियों में सजे क्रिकेट प्रतियोगिताओं में जीते इनाम व स्मृति चिन्ह देखकर मैं आज भी रोमांचित हो उठता हूं। वैसे विश्वविद्यालय टीम के लिए ट्रायल देने से पहले की बात का जिक्र तो भूल ही गया था। बीए द्वितीय वर्ष के दौरान लगातार तीन माह तक अलसभोर गांव से बगड़ आया। उस वक्त मां घर के कामों में व्यस्त रहती है, इस कारण बस चाय पीकर चुपके से निकल लेता। दिन भर भूखा ही क्रिकेट खेलता। बीच-बीच में चाय एवं कुछ बिस्किट्स का दौर जरूर हो जाता, नहीं तो क्रिकेट के जुनून में भूख महसूस ही नहीं होती थी। यह क्रिकेट के प्रति समर्पण था, प्यार था, दीवानगी थी। उस दौरान खाई चोटों के निशान आज भी अतीत को जिंदा कर देते हैं। सिर से लेकर पैर तक शरीर का कोई भी अंग चोट से अछूता नहीं बचा। नाक भी टूटी, सिर भी फूटा, और तो और दोनों हाथों की लगभग सभी अंगुलियां भी टूटी हैं। क्रिकेट के दौरान लगी यह सभी चोट आज तक राज ही हैं, किसी को नहीं बताया। चुपचाप दर्द सह लेता लेकिन बताता नहीं था। मन में यही डर रहता था कि अगर बता दूंगा कि तो फिर वाले घर क्रिकेट खेलने ही नहीं देंगे। एक बार जरूर चोट ऐसी लगी थी जो छुपाई नहीं जा सकी। विकेटकीपिंग करते वक्त स्टम्पस से टकराकर गेंद सीधी नाक पर आकर लगी थी। नाक से खून बहने लगा था। कई देर तक ग्राउंड पर ही लेटा रहा। खून जब रुका उस वक्त नाक पर काफी सूजन आ चुकी थी। यूं समझ लीजिए कि नाक की साइज सामान्य से दुगुनी हो गई थी। रुमाल से नाक छिपाने का बहुत प्रयास किया लेकिन घर पर पता चल ही गया। लेकिन झूठ बोलकर अपना बचाव किया। यह कहकर कि कैच लेने के प्रयास में दौड़ रहा था और दूसरे खिलाड़ी से भिड़ गया। इसीलिए चोट लग गई।
खैर, चोट लगने के इस प्रकार के वाकये तो बहुत हैं। बात तो भावुक होने की चल रही थी। एक वह भी दौर था जब सोते-उठते-बैठते बस क्रिकेट के अलावा कुछ नहीं सूझता था। पता नहीं क्यों, उस दौरान किसी भी मैच में भारत के हारने के बाद मैं खुद को सामान्य नहीं रखा पाता था। बड़ी तकलीफ होती थी। और बिना खाना खाए ही सो जाता था। कमोबेश ऐसा ही हाल भारत की रोमांचक जीत के दौरान भी होता था। जीत की खुशी से इतना उत्साहित हो जाता कि बस कुछ खाने की इच्छा ही नहीं होती थी। इसको पागलपन कहा जाए या दीवानापन लेकिन भारत की हार-जीत के साथ यह दोनों संयोग मेरे साथ लम्बे समय तक जुड़े रहे हैं। बड़ी मुश्किल से इस अनूठी आदत पर काबू पाया है फिर भी कभी-कभी भावुकता हावी हो ही जाती है। 1996 के विश्व कप के सेमीफाइनल में भारत की शर्मनाक हार तो जेहन में आज भी जिंदा है। उस मैच का एक एक-एक लम्हा याद करता हूं तो साथ में एक रोचक वाकया भी याद आता है। 13 मार्च को खेले गए उस मैच के ही दिन गांव में एक शादी थी..। बारात भी जाना था और मैच भी था। दोनों काम जरूरी थे। अब क्या किया जाए.. बारात की बस में रेडिया लेकर बैठ गया। डे-नाइट मैच था। बारात दोपहर बाद ही रवाना हुई थी, उस वक्त मैच शुरू हो चुका था। भारत ने टॉस जीतकर पहले क्षेत्ररक्षण करने का निर्णय लिया था.। क्रमश...।

क्रिकेट... सचिन... और मैं...(1)


बस यूं ही

 
सुबह घर से कार्यालय के लिए निकला था उस वक्त वेस्टइंडीज के दूसरी पारी के पांच विकेट गिर चुके थे। आखिरकार वैसा हुआ जैसी संभावना थी। लंच का समय आते-आते वेस्टइंडीज की पूरी टीम सिमट गई और भारत मैच जीत गया था। मैंने कार्यालय की मीटिंग से फारिग होकर कम्प्यूटर पर नजर डाली तो न्यूज वेबसाइट पर पट्टी चल रही थी। भारत टेस्ट जीता, मैदान से लौटते वक्त सचिन की आंखों में आंसू। मैं कम्प्यटूर शट डाउन करके केबिन से निकला ही था कि श्रीमती की कॉल आ गई। बोली सचिन की फेयरवेल चल रही है, टीवी पर लाइव आ रहा है जल्दी से घर आ जाओ। मैं तत्काल घर पहुंचा। ससुर जी एवं श्रीमती दोनों टीवी के सामने जमे थे। उस वक्त रवि शास्त्री ने माइक संभाल रखा था। उन्होंने सचिन को बुलाया। शरद पवार ने उनको श्रीलंका की तरफ से प्रतीक चिन्ह भेंट किया। इसके बाद वेस्टइंडीज के कप्तान आए। इसके बाद जब सचिन को फिर कुछ कहने के लिए बुलाया गया तो समूचे स्टेडियम में सन्नाटा पसरा था। सचिन इतने भावुक हो गए थे कि कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। भावनाओं पर काबू पाते हुए उन्होंने बोलना शुरू तो किया लेकिन बार-बार सूखे होठों पर जीभ फेरते सचिन की मनोदशा समझी जा सकती थी। उन्होंने अपनी बात पूरी करने तक तीन-चार बार पानी भी पीया। सचिन की एक-एक बात सुनकर लोग भावुक थे। वानखेड़े स्टेडियम में मौजूद सभी लोग गमगीन थे। सबकी आंखों में नमी थी। क्या युवा, क्या बड़े, यहां तक विदेशी भी यह नजारा देखकर उदास थे। सबके चेहरे लटके हुए थे। सचिन-सचिन की गूंज के बीच संवदेनाओं का सैलाब सा आ गया था। सचिन की पत्नी, पुत्र एवं पुत्री भी रोने लगे थे। सचमुच स्टेडियम पर ऐसा नजारा मैंने आज तक नहीं देखा। इधर, हमारी दशा भी ऐसी ही थी। आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी, बगल में बैठी धर्मपत्नी का भी यही हाल था। आगे कुर्सी पर बैठे ससुर जी भी बार-बार चश्मे को ऊपर कर गीली आंखों को पौंछ रहे थे। सचमुच भावनाओं की बारिश हो रही थी। वानखेड़े स्टेडियम में भी और बाहर भी। सचिन क्रिकेट से विदा हो गए लेकिन दिल में हमेशा रहेंगे, जिंदगीभर। आज बस इतना ही.. भावनाओं पर काबू नहीं है। कल क्रिकेट, सचिन व खुद के बारे में कुछ लिखा तो फेसबुक के साथी भाई तौफिक ने कहा सर, आप इमोशनल हो गए। सचमुच तौफिक भाई मैं हूं ही भावुक एवं संवदेनशील... आज फिर इमोशनल हो गया हूं। क्रिकेट एवं सचिन को लेकर शायद पहली बार इतना.. भावुक। और इसी भावुकता के साथ कई पुरानी यादें भी ताजा हो गई हैं। यादों के बारे में फिर कभी आज तो बस इतना ही... सलाम सचिन..। क्रमश:

क्रिकेट... सचिन... और मैं...


बस यूं ही

 
मास्टर ब्लास्टर सचिन आज अपने आखिरी टेस्ट मैच में शतक से चूक गए। उनके समस्त प्रशंसकों को इसी बात का मलाल रहा कि काश, वे शतक बनाते। वैसे सचिन जिस अंदाज में खेल रहे थे, उससे ऐसा लग भी रहा था कि शतक मार देंगे, लेकिन ऐसा हो न सका। क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल ऐसे ही नहीं कहा जाता। यह खेल होता पर नहीं है पर चलता है। फिर भी दिल है कि मानता ही नहीं। मैं भी सचिन का मुरीद हूं। आज से नहीं बस उसी दिन से जब उन्होंने अपने साथी खिलाड़ी विनोद काम्बली के साथ 664 रनों की साझेदारी कर विश्व रिकार्ड बनाया था। उस वक्त मैं सातवीं कक्षा में था। आज भी याद है कि इंडिया टूडे में इस साझेदारी के बारे में पढ़ा था। काम्बली एवं सचिन का फोटो भी साथ में लगा था। संभवत: यह खबर चर्चित चेहरे वॉले कॉलम में लगी थी। वैसे मेरे गांव में क्रिकेट ने भारत के 1983 में वल्र्ड कप जीतने के बाद ही ज्यादा जोर पकड़ा। गांव के चुनिंदा युवा ही उस वक्त क्रिकेट खेला करते थे। बचपन में गांव के युवाओं को क्रिकेट खेलता देख मैं भी इस खेल की तरफ आकर्षित हुआ। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच का सीधा प्रसारण देखना तो उस सपने जैसा ही था। गांव में टीवी जो नहीं थे। इस कारण रेडियो ही प्रमुख साधन था, जिसके माध्यम से आंखों देखा हाल बड़ी तल्लीनता के साथ सुना जाता था। दस-बारह युवाओं के बीच रेडिया तेज आवाज करके रख जाता था और सब बड़े गौर से कमेंटरी सुनते थे। इसके बाद 1985-86 में गांव में अस्थायी रूप से एक टीवी लगा। शारजाह में भारत-पाक के बीच क्रिकेट प्रतियोगिता के कारण। बिलकुल स्कूल की बगल में ही था वह घर। स्कूल से बीच-बीच में बंक मार कर टीवी देखने पहुंच जाते। धीरे-धीरे क्रिकेट इतना रच बस गया कि बस सोते-उठते क्रिकेट ही दिखाई देता। उस दौर में गांव में क्रिकेट का खेल भी बड़ा रोचक होता था। लेदर बॉल उस वक्त शायद 32 रुपए की आती थी। ठीक-ठाक बल्ला भी 150-200 के बीच आ जाता था। गेंद के लिए बाकायदा चंदा किया जाता था। सभी खेलने वालों का योगदान रहता था, उसमें। जो पैसे नहीं देता वह खेल नहीं पाता था। मैं छोटा था, इस कारण मेरे को गांव के युवा इसलिए नहीं खिलाते थे कि कहीं चोट ना लग जाए। यह सब देखकर मैं मन ही मन बहुत दुखी होता लेकिन कोई चारा नहीं था। पापाजी उस वक्त अजमेर में सेवारत थे। मैंने उनको पत्र लिखकर बल्ला और गेंद मंगवाने की मांग कर डाली। घर में सबसे छोटा होने के कारण सभी का चहेता रहा हूं, विशेषकर पापाजी का स्नेह तो मेरे पर कुछ ज्यादा ही रहा है और आज भी है। वो बल्ला और कॉर्क गेंद ले लाए। अब तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, गेंद और बल्ले को मालिक होने के कारण भला अब मेरे को खिलाने से कौन रोक सकता था। स्कूल से आने के बाद बस क्रिकेट ही दिखाई देता था। कई बार झूठ मूठ में तबीयत खराब होने का बहाना बनाकर स्कूल मिस कर के भी क्रिकेट खेला। मां बहुत डांटती, टोकती लेकिन बस उस वक्त क्रिकेट के अलावा सूझता ही नहीं था।
दरअसल, यह सब कहानी बताने का मकसद इतना है कि सचिन ने जिस उम्र में अंतराष्ट्रीय मैचों में पदार्पण किया, उस वक्त मेरे जैसा किशोर भी क्रिकेट को लेकर सपने देखा लगा था। मन में ख्याल था कि जब सचिन ऐसा कर सकता है तो अपन क्यों नहीं..। बस धुन सवार हो गई। और वह धुन ऐसी चढ़ी कि आठवीं कक्षा तक हमेशा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने का सिलसिला नवमीं कक्षा से बंद हो गया। बड़ी मुश्किल नवमीं-दसवीं उत्तीण कर पाया वह भी द्वितीय श्रेणी से। घर वालों की डांट डंपट के बाद भी मैं परीक्षा के दौरान भी क्रिकेट खेलने से गुरेज नहीं करता। परीक्षा परिणाम खराब रहना, उसी का नतीजा था। यही हाल ११ व १२ वीं कक्षा में रहा..। कॉलेज में प्रवेश लेने के साथ तो क्रिकेट परवान चढ़ गया। कॉलेज टीम के ट्रॉयल में ही इतना धांसू खेल दिखाया कि चयन हो गया। वैसे मैं क्रिकेट के तीनों फोरमेट में आजमाया गया। मतलब बल्लेबाजी, गेंदबाजी एवं विकेट कीपिंग और तीनों में ही मैंने खुद को साबित किया। बीए फाइनल तक क्रिकेट के प्रति दीवानगी ऐसी बढ़ी कि साल भर में केवल चार पीरियड ही अटेंड किए। इस बीच अंतर विश्वविद्यालयीन क्रिकेट मैच भी खेले। आगे बढऩे का सपने तो उस वक्त धराशायी हुए जब ट्रायल देने अलवर गया था। राजस्थान विश्वविद्यालय के करीब 147 खिलाड़ी पहुंचे थे वहां पर और जब टीम की घोषणा हुई तो 147 में से दो चार नाम ही थे। बाकी का चयन तो पहले ही हो चुका था। बहुत निराशा हाथ लगी थी उस वक्त। अलवर से घर लौटना भी मुश्किल हो गया था। ....... क्रमश :...

वैज्ञानिक प्रयोग.. अजीबोगरीब पात्र...


बस यूं ही

 
बच्चों का आग्रह था कि पापा दिवाली को तो आपका अवकाश है। आप आफिस नहीं जाओगे, प्लीज क्रिश-३ दिखा दो। मैं मासूमों के प्यार भरे आग्रह का नकार नहीं सका। रविवार को दोपहर 2.30 बजे वाला शो देखने का समय तय किया गया लेकिन बच्चों में उत्सुकता इतनी थी कि दस बजे ही नहा धोकर तैयार हो गए। दो बजने से पहले से मेरे से कम से दर्जन बार पूछ बैठे कि पापा कितना टाइम और बचा है। वैसे शुरू में तो कार्यक्रम बच्चों को लेकर जाने का ही था, लेकिन बाद में धर्मपत्नी ने कहा कि मैं भी चलूं क्या.? मैंने कहा, आपको को किसने रोका है, आप भी चलो। वह भी तैयार हो गई। मकान मालिक का बच्चा भी बच्चों का हमउम्र ही है। उसको भी साथ ले लिया। इसके अलावा साढू जी की बिटिया भी इन दिनों सास-ससुर जी के साथ भिलाई आई हुई है। इस प्रकार कुल चार बच्चे और दो हम मियां बीवी कुल छह लोग हो गए। निर्धारित समय से करीब 20 मिनट पहले ही सिनेमाघर पहुंच गए। बच्चों की उत्सुकता एवं उत्साह देखते ही बन रहा था। आखिर सिनेमाघर का दरवाजा खुला और हम अंदर प्रवेश कर गए। दर्शक उतने नहीं थे, जितने किसी बड़े बैनर की फिल्म के शुरुआती सप्ताह में होते हैं। कम दर्शक होने के दो ही कारण मेरे समझ में आए.. या तो दिवाली का दिन होने के कारण लोगों ने फिल्म देखने में दिलचस्पी कम दिखाई या फिर दो दिन में ही फिल्म लोगों के मन से उतर गई। समीक्षक फिल्म के फिल्मांकन, हैरतअंगेज एक्शन, स्पेशल इफेक्ट्स एवं ऋतिक की सुपरमैन की छवि को लेकर कशीदे गढ़ रहे हैं लेकिन फिल्म मेरे को बच्चों के मुकाबले कम ही जमी। इतना ही नहीं फिल्म के आखिरी सीन में ऋतिक के बेटे का जन्म तथा उसका अचानक अस्पताल से गायब होना यह बताता है कि फिल्म की अगली किश्त बनना तय है। फिल्म में इतने शीशे टूटे और फूटे हैं, यकीन मानिए आज तक ऐसा किसी फिल्म में नहीं हुआ होगा।
तकनीकी प्रेमी जरूर फिल्म देखकर ताज्जुब कर सकते हैं, हैरान हो सकते हैं। फिल्म में नायक का हवा में उडऩा मेरे को किसी कॉमिक्स के पात्र की तरह नजर आया। वैज्ञानिक प्रयोगों से तैयार किए गए पात्र बेहद ही अजीबोगरीब लगे। यह बात दीगर है कि बच्चे इन सबको देखकर अन्य दर्शकों की तरह जोर-जोर से हल्ला कर रहे थे, चिल्ला रहे थे। फिल्म में एक जानकारी मिली सूरप्रथा की। इसके माध्यम से कंगना रानौत किसी की भी शक्ल धारण कर लेती है। कभी वह पुरुष बन जाती है तो कभी महिला..। बड़ी-बड़ी इमारते गिरती हैं और सुपरमैन ऋतिक उनसे जनहानि नहीं होने देता। गाडिय़ां हवा में उड़ती हैं, हेलीकॉप्टर इशारे भर से भस्म हो जाते हैं। पुलिस की राइफल की दिशा घूम जाती हैं। विलेन का किला भी बेहद रहस्यमयी नजर आया। भला विज्ञान के इस युग में इस तरह या ऐसा हो सकता है, मैं तो नहीं मानता। फिल्मों को समाज का आइना कहा जाता है लेकिन यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं है। इस तरह के फिल्मांकन से फिल्म को प्रयोगवादी व फंतासी की श्रेणी में रखा जा सकता है। इतना कुछ कहने के बाद भी मैं किसी को यह नहीं कह रहा कि फिल्म देखने योग्य नहीं है... समय बर्बाद ना करें। यह मेरी व्यक्तिगत राय है, क्योंकि बच्चे तो घर लौटने तक फिल्म में ही डूबे थे। उनकी जुबान पर फिल्म के ही किस्से थे। दो तीन बार तो पास आकर थैक्यूं भी बोल दिया। कारण पूछा तो बोले आपने इतनी अच्छी फिल्म दिखाई। मैं इतना जरूर सोच रहा था कि वही एक नायक और विलेन की कहानी.. दोनों के बीच अदावत.. थोड़ा सा सस्पेंस और थ्रिलर..और आखिर में विलेन का अंत। आखिर ऐसी कहानी तो लगभग हर भारतीय फिल्म में होती है। बस अंतर इतना है कि इस कहानी को इस अंदाज में फिल्माया गया जो दर्शकों को कुछ नएपन का अहसास जरूर करवाती है।

एक दिन पहले ही दिवाली..


बस यूं ही

 
यकीनन भारत की जीत से आज समूचा देश एवं क्रिकेट प्रेमी झूम रहे हैं लेकिन पटाखा विक्रेताओं की खुशी तो और भी बढ़ गई होगी। दीपावली के लिए लाए गए पटाखे लोगों ने एक दिन पहले ही जो फोड़ लिए। जब से भारत की जीत का समाचार आया है तब से लेकर अब धमाकों का दौर लगातार जारी है। भिलाई में पटाखे फूट रहे हैं आतिशबाजी हो रही है। मेरा मानना है कि ऐसा सिर्फ यहीं नहीं कमोबेश पूरे देश में हो रहा होगा। वैसे बैंगलोर के चिन्ना स्टेडियम स्वामी स्टेडियम में भी धमाके कम नहीं हुए। भाग्यशाली हैं, वो क्रिकेटप्रेमी, जिन्होंने यह मैच अपनी आंखों से देखा। वे भी कम भाग्यशाली नही, जिन्होंने इसको टीवी पर देखा। खैर, अपने हिस्से तो किसी भी प्रकार का प्रसारण नहीं आया, लिहाजा मैं तो नेट पर स्कोरकार्ड देखकर ही खुश हो लिया। इतना बड़ा स्कोर बनाने के लिए निसंदेह विस्फोटक क्रिकेट खेलना ही पड़ता है। नतीजा कुछ भी रहा दीपावली की पूर्व संध्या इस यादगार एवं ऐतिहासिक मैच से और भी सुहानी हो गई। चौकों एवं छक्कों की बरसात तो ऐसी हुई लोग लम्बे समय तक याद रखेंगे। दोनों पारियों में कुल 38 छक्के लगे। मतलब कुल 709 रनों में से 228 रन तो छक्कों से ही बन गए। चौके भी कम नहीं लगे। दोनों टीमों की तरफ से कुल 59 चौके लगे। इसका मतलब 236 रन चौकों से बन गए। इस प्रकार 464 रन तो चौकों एवं छक्कों की मदद से बन गए। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है मैच कितना विस्फोटक था। दोनों टीमों की तरफ से 19-19 छक्के लगे। यही कहानी चौकों की रही। भारत ने 30 तो आस्टे्रेलिया टीम ने 29 चौके लगाए। जब इस बेरहमी के साथ बल्लेबाजी हो तो बेचारे गेंदबाजी का पिटना तो स्वाभाविक ही है। बल्ले द्वारा बेदर्दी से की गई इस कुटाई को भी गेंदबाज भूल नहीं पाएंगे। मैंने भी लम्बे समय तक क्रिकेट खेला है। इसलिए क्रिकेट प्रेम आज भी जिंदा है। मैच को लेकर मैं भी बेहद रोमांचित हो गया। सचमुच जिस अंदाज में आस्ट्रेलिया खिलाडिय़ों ने नवें विकेट के लिए साझेदारी की, उसने एक बार तो धड़कने बढ़ा दी थी। इसी सीरिज में एक ओवर में 30 रन लेकर भारत के हाथों से जीत छीनने वाले जेम्स फॉकनर तो इस मैच में इतने आक्रामक थे कि बस पूछिए मत। खैर, क्रिकेट अनिश्चिताओं का खेल है। जब तक आखिरी गेंद ना हो कुछ भी कहना मुश्किल होता है। आखिरी गेंद की नौबत तो इस मैच में नहीं आई लेकिन आस्टे्रेलियाई पुछल्लों ने मैच में रोमांच बरकरार रखा। मेरा मानना है आसान जीत की बजाय रोमांच के बीच जो जीत मिलती है उसका मजा ही कुछ और होता है। तो इसी के साथ कल दीपावली दुगुने उत्साह के मनाएंगे, ऐसा यकीन है। भारत जीत की बधाई की साथ-साथ सभी को दीपावली की भी राम-राम, बधाई, शुभकामनाएं।

Monday, October 28, 2013

समाज का सवाल, सियासत में उबाल


जनसम्पर्क व दौरे को लेकर बन रही हैं रणनीतियां
 दु र्ग जिले का पाटन विधानसभा क्षेत्र। चुनावी रंगत फिलहाल यहां परवान नहीं चढ़ी है। अलबत्ता शुरुआती दौर में प्रत्याशी मतदाताओं का मानस टटोलने में जरूर जुट गए हैं। ग्रामीण इलाकों में गुप्त बैठकों के माध्यम से मतदाताओं का रुझान पता किया जा रहा है। नामांकन भरने से लेकर जनसम्पर्क व कार्यकर्ता सम्मेलनों तक की रणनीति बनाई जा रही है। इसके लिए जिम्मेदारियां भी सौंपी जा रही हैं। फिलहाल पाटन क्षेत्र में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है और न ही किसी तरह की कोई लहर। मतदाता अभी खामोश हैं, लेकिन समाजों में सियासी हलचलों का दौर शुरू हो चुका है। इन सियासी हलचलों के कारण कहीं नए समीकरण बन रहे हैं तो कहीं बिगड़ भी रहे हैं।
करीब 15 हजार मतदाता बढ़े
पाटन में इस बार गत चुनाव के मुकाबले पौने पन्द्रह हजार मतदाता ज्यादा हैं। पिछले चुनाव में यहां 155806 मतदाता थे, इस बार 170581 हो गए हैं। पिछले चुनाव में विजय बघेल को 59000 तो भूपेश बघेल को 51158 मत प्राप्त हुए थे। जीत का अंतर 7842 मतों का रहा था। तब करीब 79 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले थे।
निचोड़
कुर्मी एवं साहू समाज की बहुलता वाले इस विधानसभा क्षेत्र में फिलहाल तो टिकट वितरण का मामला गर्माया हुआ है। साहू समाज के पदाधिकारियों ने सांसद से मुलाकात कर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है। साहू समाज की नाराजगी दूर करने की दिशा में फिलहाल कोई प्रयास या आश्वासन सामने नहीं आया है। इसके अलावा सतनामी समाज के वोट भी यहां निर्णायक हैं। दोनों समाजों का रुख ही दोनों दावेदारों की जीत का मार्ग प्रशस्त करेगा। वैसे विजय बघेल के विधानसभा क्षेत्र बदलने की चर्चाओं ने उनके सामने मुसीबत खड़ी कर दी है। माना जा रहा है इस बार मुकाबला दिलचस्प होगा। वैसे क्षेत्र में विकास एवं सिंचाई से संबंधित मामले मतदान के नजदीक आते-आते जोर पकडऩे के पूरे आसार हैं। भ्रष्टाचार का मसला भी प्रभावी भूमिका निभा सकता है, क्योंकि अभी-अभी बनी पाटन-उतई रोड पूरी तरह उधड़ चुकी है। सड़क पर उड़ती धूल एवं बिखरे पत्थर भी इस बात के साक्षी हैं कि सड़क निर्माण में जमकर अनियमितता बरती गई है।

धोराभांठा गांव में गुप्त बैठक
भिलाई से करीब दस किसी दूरी पर आबाद धोराभांठा गांव में बुधवार दोपहर ग्रामीण अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हैं। महिलाएं हैंडपम्प से पानी भर रही हैं तो पंक्चर की दुकान पर दो युवक अपने काम में तल्लीन हैं। कोई तालाब की तरफ नहाने जा रहा है तो कोई नहाकर लौट रहा है। गांव के चौक में संसदीय सचिव विजय बघेल का सड़क सीमेंटीकरण से संबंधित पत्थर लगा है, लेकिन सड़क की हालात खराब है। शिलान्यास पट्टिका पर 2010 का साल अंकित है। चौक से थोड़ा आगे बेहद ऊबड़-खाबड़ व तंग गली में एक घर के बाहर तीन महिलाएं हाथ में लाठी लिए हुए बंदरों के झुण्ड को भगाने में लगी हैं। किसी की कानोंकान तक खबर नहीं कि गांव में कहीं पर कोई बैठक भी हो रही है। गांव के मंदिर के पास एक मकान में करीब पांच दर्जन ग्रामीण अंदर एकत्रित हैं। अंदर तखत पर कांग्रेस के भूपेश बघेल बैठे हैं। उनकी बगल में तिलक लगाए एक वृद्ध बैठा है। बाकी सभी लोग दरी पर बैठे हैं। बारी-बारी से ग्रामीण सदस्यता अभियान और भाजपा की रणनीति के बारे में बताते हैं। बातचीत के इस दौर में कभी माहौल यकायक गंभीर होता है तो कभी ठहाके गंूजते हैं। बारी-बारी से बोलने का क्रम टूटता है और सब एक साथ बोलने लगते हैं। शोरगुल बढ़ता है। भूपेश बघेल सबको चुप कराते हुए चुनाव में जिम्मेदारी सौंपते हैं। कहते हैं एक-एक व्यक्ति दस-दस घरों के सम्पर्क में रहें और प्रचार करें। प्रचार के लिए वे तीन चार मामले गिनाते हैं। कहते हैं उनके कार्यकाल में दस साल पहले बनी सड़क आज भी ठीक है, जबकि हाल ही बनी सड़कें टूट रही हैं।
वे ग्रामीणों को केन्द्र सरकार की उपलब्धियां मतदाताओं के समक्ष गिनाने की बात कहते हैं। बघेल कहते हैं कि राज्य की मौजूदा सरकार ने बोनस के नाम पर किसानों का ठगा है। चुनावी साल में बोनस दिया, जबकि बाकी साल किसान इंतजार करते रहे। करीब घंटेभर के विचार-विमर्श के बाद बैठक समाप्ति की ओर है। मुट्ठीभर से कम नमकीन और दो-दो बिस्कुट रखी कागज की प्लेटें ग्रामीणों के बीच घुमाई जाती हैं। बघेल उठकर बाहर आते हैं। पीछे-पीछे ग्रामीण भी उठते हैं। अंदर से आवाज आती है, चाय बन रही है। बघेल अपनी गाड़ी में अगले गांव के लिए रवाना होते हैं।

विजय बघेल का आवास
गुरुवार यही कोई सुबह के 11.30 बजे हैं। संसदीय सचिव विजय बघेल के आवास के बाहर एक पोस्टर लगा है, जिस पर लिखा है 'कृपया, यहां पर वाहन खड़े न करें।' इसी स्लोगन के ठीक सामने दुपहिया व चौपहिया वाहन खड़े हैं। आवास के अंदर भी नसीहत भरे दो पोस्टर चस्पा किए हुए हैं। एक पर लिखा 'कृपया कार्यालय में अपने मोबाइल बंद रखें।' जबकि दूसरे पर 'कृपया जूतों चप्पलों को बाहर रखें।' लिखा हुआ है। कार्यालय के अंदर कुर्सियां खाली हैं। आवास के बाहर संसदीय सचिव के गार्ड के इर्द-गिर्द पांच युवक आपस में कानाफूसी में जुटे हैं। आवास के ठीक सामने बनाई गई खटाल की साफ-सफाई भी चल रही है।
अचानक विजय बघेल बाहर आते हैं और आवास के सामने खड़े एक प्रचार रथ के पास जाकर रुक जाते हैं। आसपास बैठे सभी लोग भी बघेल के अगल-बगल में खड़े हो जाते हैं। प्रचार रथ के पास कुर्सी डालकर बैठे युवक-युवती खड़े होते हैं। प्रचार रथ से पर्दा उठता है तो एक बड़ा स्पीकर दिखाई देता है। युवती माइक लेती है। अचानक संगीत चलता है, इसी के साथ 'ईश्वर ही सत्य है' 'सत्य ही शिव है' 'शिव की सुंदर है।' 'सत्यम शिवम सुंदरम'  बोल गूंजते हैं। थोड़ी देर सुनने के बाद बघेल उसे रुकने का इशारा करता है। युवक दौड़ता हुआ आता है, और कहता है सर आपका गीत 'दुख के सब साथी..' भी हमारे पास है। बघेल उसको बुक करने के लिए हामी भरते हैं। इसी बीच दो युवक और आते हैं.. कहते हैं सर, हमारा डेमो भी देख लो। बघेल कहते हैं, आपने देर कर दी, सब फाइनल कर दिया। बघेल लौटते हैं। कुछ परेशान से हैं। समर्थक वजह पूछते हैं तो कहते हैं, अरे भाई, क्या बताऊं, तबीयत खराब है। देखो ना.. बघेल हाथ आगे बढ़ाते हैं। फिर कहते हैं तबीयत के चक्कर में सुबह से नहाया ही नहीं हूं। धीरे-धीरे चहलकदमी करते हुए अंदर जाते हैं। दो-चार समर्थक भी उनके पीछे-पीछे हैं। बघेल का मोबाइल बजता है और वे बतियाते हुए अंदर प्रवेश कर जाते हैं। बाहर खड़े युवकों में फिर चर्चा शुरू हो जाती है। प्रचार रथ वाला भी अपना साजो-सामान समेट कर चल पड़ता है।

 साभार- पत्रिका छत्तीसढ़ में 26 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित


मतदाता मौन और समर्थकों में सरगर्मी

 
वर्तमान पर अतीत हावी : बीस साल से आमने सामने

दु र्ग जिले का भिलाईनगर विधानसभा क्षेत्र। जिला मुख्यालय से एकदम सटा हुआ, लेकिन सूरत एवं सीरत दोनों ही अलग। तभी तो चुनाव की सरगर्मी का असर खुर्सीपार को छोड़कर शेष हिस्सों में कम ही दिखाई दे रहा है। इसका प्रमुख कारण समूचे क्षेत्र में नौकरीपेशा आदमी होना है। यहां पर चुनाव के प्रति वैसा जुनून भी नजर नहीं आता, जैसा दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में आता है। फिलहाल यहां मतदाता मौन हैं, लेकिन प्रत्याशियों के समर्थकों में सरगर्मी शुरू हो चुकी है। दोनों ही प्रत्याशियों के साथ एक संयोग भी जुड़ा है। दोनों के वर्तमान पर अतीत हावी है। इस बात की गवाही दोनों प्रत्याशियों के बंगलों के बाहर टंगे बोर्ड देते हैं। एक पर लिखा है पूर्व विधानसभा अध्यक्ष तो दूसरे पर पूर्व मंत्री छत्तीसगढ़ शासन। फिलहाल पूरे प्रदेश की नजर भिलाईनगर विधानसभा पर टिकी है। यहां मुकाबला रोचक एवं दिलचस्प होने के कयास लगाए जा रहे हैं।
बीस साल से ही प्रतिद्वं द्वी
भिलाईनगर विधानसभा समूचे प्रदेश में इकलौता ऐसा क्षेत्र है, जहां के लगभग सभी मतदाता भिलाई स्टील प्लांट के कर्मचारी या सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। थोड़ा सा हिस्सा खुर्सीपार का है, जिसमें बीएसपी से संबंधित लोग नहीं रहते हैं। यही कारण है कि इस सीट पर स्थानीय या राज्यस्तरीय मुद्दे उतना महत्त्व नहीं रखते, जितना बाकी सीटों के लिए रखते हैं। खुर्सीपार में चाय की दुकानों पर जरूर चुनावी चर्चाएं हैं, लेकिन सेक्टर एरिया के मतदाताओं में ऐसा कोई माहौल नहीं है। दोनों ही दलों ने अपने पुराने नेताओं पर विश्वास जताया है। दोनों नेता 20 साल से लगातार एक दूसरे के सामने चुनाव लड़ते आ रहे हैं।
1.65 लाख मतदाता
भाजपा प्रत्याशी प्रेमप्रकाश पाण्डे का यह छठा चुनाव है, जबकि कांग्रेस के बदरुद्दीन कुरैशी पांचवीं बार भाग्य आजमा रहे हैं। पाण्डे अब तक तीन बार चुनाव जीत चुके हैं, जबकि कुरैशी ने दो विजयश्री हासिल की है। भिलाईनगर विधानसभा में पिछले चुनाव में 162778 मतदाता थे, जो इस बार बढ़कर 165549 हो गए हैं। पिछली बार यहां के 62.93 मतदाताओं ने वोट डाले थे। पिछले चुनाव में कुरैशी को 52848 तथा पाण्डे को 43985 मत प्राप्त हुए थे।
लगातार दो बार कोई नहीं जीता
भिलाईनगर विधानसभा के साथ एक संयोग यह भी जुड़ा है कि 1993 के बाद से यहां कोई भी विधायक लगातार दूसरी बार नहीं जीता है। 1993 में जहां भाजपा के प्रेमप्रकाश पाण्डे ने बदरुद्दीन कुरैशी को हराया वहीं, 1998 के चुनाव में कुरैशी ने जीत दर्जकर हिसाब चुकता कर दिया। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहली बार 2003 में हुए चुनाव में पाण्डे ने कुरैशी को हराकर जीत दर्ज की तो इससे अगले चुनाव 2008 में कुरैशी ने पाण्डे को फिर हरा दिया। इस बार दोनों प्रत्याशी फिर आमने-सामने हैं।
निष्कर्ष
बाकी दलों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। विशेषकर छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच ने भी यहां कोई प्रत्याशी अभी तक घोषित नहीं किया है। बीएसपी में कार्यरत अधिकतर स्थानीय लोगों ने पिछले चुनाव में मंच को वोट डाले थे। हाल ही बीएसपी यूनियन चुनाव में बाजी सीटू के हाथ लगी, लेकिन मंच समर्थित यूनियन ने दूसरा स्थान हासिल किया था। ऐसे में मंच की प्रभावी भूमिका रहेगी। मंच के प्रत्याशी न उतारने पर बीएसपी के स्थानीय वोटरों का झुकाव हार जीत के परिणाम तय करेगा।
बदरुद्दीन कुरैशी का बंगला
मंगलवार सुबह सुबह 11.20 बजे। कांग्रेस प्रत्याशी बदरुद्दीन कुरैशी के बंगले के बाहर करीब आधा दर्जन दुपहिया वाहन खड़े हैं। बंगले के ठीक सामने सड़क पर पटाखों के जले हुए कागज हवा के साथ उड़ रहे हैं। अंदर कार्यालय में चार लोग बैठे हैं। सभी अखबार पढऩे में तल्लीन। इसी कार्यालय के बगल में एक छोटा सा एक और कमरा। उसी में कुरैशी धीर-गंभीर मुद्रा में बैठे हैं। टेबल पर एक फूलों की माला रखी है, जबकि एक गुलदस्ता बगल में रखा हुआ है। उनका चश्मा टेबल पर रखा है। दोनों कुहनिया टेबल पर टिकाए कुरैशी के चेहरे पर आने वाले उतार-चढ़ाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहे हैं। टिकट मिलने की बधाई देने वाले बीच-बीच में आ जा रहे हैं। कोई चरण स्पर्श कर रहा है तो कोई हाथ मिला रहा है। आने वालों को मिठाई खिलाई जा रही है। बांटने वाला एक ही व्यक्ति, लेकिन मिठाई के प्रकार दो। किसी को लड्डू तो किसी को काजू कतली। इसी बीच दो समर्थक आते हैं, टिकट मिलने की कहानी पूछते हैं। कुरैशी खामोशी तोड़ते हैं। कुछ कहने पर जोर से ठहाका लगाते हैं, फिर कहते हैं, आप को तो पता ही है, टिकट कैसे मिलता है। बड़ा मुश्किल काम हो गया है। बिना रुके कुरैशी फिर कहते हैं, अरे यह तो इन दिनों दिल्ली आना-जाना कम कर दिया वरना, इतनी दिक्कत नहीं आती। अचानक कुरैशी उठते हैं और कार्यालय में आ जाते हैं।
प्रेमप्रकाश का बंगला
मंगलवार दोपहर 12.05 बजे भाजपा प्रत्याशी प्रेमप्रकाश पाण्डेय के घर करीब तीन दर्जन समर्थक मौजूद हैं। सभी अलग-अलग झुण्ड बनाकर बातचीत में तल्लीन। कोई मोबाइल पर बतिया रहा है तो कोई मोबाइल से खेल रहा है। करीब आधा घंटे के इंतजार के बाद यकायक सब खामोश हो जाते हैं। लुंगी पहने तथा शर्ट की आस्तीन के बटन बंद करते हुए पाण्डेय समर्थकों के बीच आते हैं। जब तक पाण्डेय बैठे नहीं सभी खड़े रहते हैं। उनके बैठते ही सब बारी-बारी से चरण स्पर्श करते हैं। उम्रदराज हो चाहे युवा, सभी यही करते हैं। इधर पाण्डेय हाथों को बांधे चरण स्पर्श करने वालों को बड़े ही सोचने वाले अंदाज में देखते हैं। एक खाली कुर्सी पाण्डेय की बगल में रखी है, जिस पर उनका छोटा तौलिया रखा है। सब खामोश हैं। एक समर्थक फोन लाकर पाण्डेय को देता है। थोड़ी देर फोन पर हूं..., हां..., करने के बाद फोन वापस समर्थक को थमा दिया जाता है। अचानक एक पार्षद का नाम पुकारते हैं। वह खड़ा हो जाता है। इसके बाद पाण्डेय एक दूसरा नाम पुकारते हैं, वह व्यक्ति भी हाथ जोड़े ही पाण्डेय की तरफ मुखातिब होता है। आंखों ही आंखों में इशारा होता है। चार-पांच पार्षद/पार्षद पति चुपचाप उठते हैं एक कमरे में चले जाते हैं। पाण्डेय अपनी कुर्सी से उठते हैं। थोड़ी ऊंची आवाज में कहते हैं, अरे चाय लाओ और वह भी उस कमरे में प्रवेश कर जाते हैं। बाहर बैठे लोगों में फिर चर्चा छिड़ जाती है।

साभार- पत्रिका छत्तीसढ़ में 24 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित


फिर आम आदमी सुरक्षित कहां?


बस यूं ही

 
आज दोपहर को झुंझुनू के पुराने परिचित को फोन लगा लिया। हाल-चाल जानने के बाद मैंने 'कहा कल तो झुंझुनू में राहुल गांधी आए थे।' जवाब आया 'हां, भाईसाहब, बहुत ही तगड़ी व्यवस्था थी। बाहर दीवार के पास खड़े होने वाले को भी पास जारी किए गए थे। दिल्ली से आए सुरक्षाकर्मियों ने तो हवाई पट्टी के आस-पास के कुछ घरों को भी खाली करवा लिया।' वह एक सांस में यह सब बोल गया। थोड़ा रुकते ही फिर बोला 'कलक्टर-एसपी तक को नहीं जाने दिया, बहुत की तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी। ' मैंने इतना सुनने के बाद पूछा और क्या खास रहा तो वो बोला भाईसाहब खास तो कुछ नहीं है। मैंने कहां चूरू में राहुल के कार्यक्रम की खबर तो यहां छत्तीसगढ़ में भी लगी है। मेरा इतना कहना ही था कि वह फट ही पड़ा बोला 'भाईसाहब आज के सभी अखबारों में राहुल की एक जैसी ही खबर है। सभी ने यही लिखा है दादी को मार दिया, पिता को मार दिया मेरे को भी मार देंगे।' मैंने उत्सुकतावश पूछा 'तो क्या हो गया?' वह बोला 'हुआ तो कुछ नहीं लेकिन यह भी कोई खबर है क्या..' 'कैसे?' मैंने फिर पूछा तो बोला 'इसमें खबर तो यह थी कि इतनी तगड़ी और जेड प्लस की सुरक्षा वाला भी खुद को देश में सुरक्षित नहीं मान रहा है। खुद के मार दिए जाने की आशंका जता रहा है। ऐसे में आदमी की बिसात ही कहां है? वह सुरक्षित कहां है?' थोड़ा रुकते हुए मजाकिया लहजे में वह फिर बोला 'आदमी के पास जेड प्लस तो दूर जेड माइनस भी सुरक्षा ही नहीं है भाईसाहब।' मुझे उसकी बातों में दम नजर आया। वाकई जब देश का इतना बड़ा आदमी खुद को सुरक्षित नहीं मान रहा है तो फिर आम आदमी किसके भरोसे खुद को सुरक्षित माने? कौन उसको सुरक्षा का दिलासा दिलाएगा? मेरे भी जेहन में विचारों का द्वंद्व चलने लगा। सोचते-सोचते यही सोचना लगा कि देशवासी भावुक है। भावुकता से भरी कहानी सुनकर वे भावना में बह जाते हैं। हिस्से में सिवाय आंखें गीली करने के कुछ नहीं आता है। सचमुच हम बेहद इमोशनल हैं और प्रोफेशेनल लोग हमारा दोहन कर लेते हैं। कभी विकास के नाम पर...। कभी सपनों के नाम पर तो कभी किसी कहानी के नाम पर। हमारे दोहन के इस अंतहीन सिलसिले का क्रम कब रुकेगा राम ही जाने...। क्योंकि देश भगवान भरोसे ही है और हम सब भी।

वो मेरे से बड़ी हो गई


बस यूं ही

 
सरकारी दस्तावेजों में गलती की बानगी का आलम उनसे पूछिए जो इनसे बावस्ता हैं। बात चाहे मतदाता परिचय पत्र की हो या फिर राशन कार्ड की, सब जगह रापांरौळ (गड़बड़ी) ही है। पता नहीं कब पति को पिता बना दे या पिता का पुत्र। इतना ही नहीं लिंग परिवर्तन तक कर दिया जाता है। महिलाओं को पुरुष तो पुरुषों को महिला तक बना दिया जाता है। गलत फोटो चस्पा तक कर दी जाती हैं। पत्रकारिता के पेशे में होने के कारण इस प्रकार की विसंगतियों से वास्ता कई बार पड़ा है। मतदाता परिचय पत्र में नाम को लेकर संशोधन करवाने के लिए मैंने स्वयं ने दो तीन बार प्रयास किए लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। अब आदमी का हाल क्या होगा बताने की शायद जरूरत ही नहीं है। हालिया मामला राशनकार्ड से जुड़ा है। अभी गांव गया तो पापाजी ने बताया कि नए राशनकार्ड बनकर आ गए हैं। उत्सुकतावश जब राशनकार्ड देखे (घर में सभी के राशनकार्ड अलग अलग हैं) तो वे पहले के मुकाबले साइज में कुछ छोटे नजर आए। कार्ड के ऊपर लिखा था एपीएल उपभोक्ताओं के लिए। नीले रंग में राजस्थान के नक्शे के साथ कार्ड का कवर पेज एक नजर देखने में आकर्षक नजर आया। अंदर देखा तो सारी इंट्री कम्प्यूटरीकृत थी। मतलब पैन या बालपैन का कहीं उपयोग नहीं हुआ था। सारा का सारा काम कप्यूटर के माध्यम से सम्पादित किया गया था। राशनकार्ड में लिखी गई जानकारी कितनी सही एवं सटीक है, इसको गंभीरता के साथ नहीं देख पाया।
दूसरे दिन दिल्ली से भाईसाहब आए तो मैंने उनको बताया कि नए राशनकार्ड बन गए हैँ। इसके बाद फिर कार्ड को देखने लगा। तीसरे पेज पर एक कॉलम था. आयकरदाता- उसके आगे नहीं लिखा गया था। मैं चौंका क्योंकि दो साल तो आयकर के पैसे कट रहे हैं फिर भी आयकरदाता नहीं हूं। खैर, इसके बाद मेरे को डबल गैस सिलेण्डर धारक उपभोक्ता बताया गया वह भी बगड़ की गैस एजेंसी का। हकीकत तो यह है कि मैं डबल गैस सिलेण्डर धारक उपभोक्ता ही हूं लेकिन जिस एजेंसी का हवाला दिया गया है, वहां का नहीं हूं। मैंने छत्तीसगढ़ आने के बाद बिलासपुर से गैस कनेक्शन लिया और तबादला होने के बाद उसको भिलाई स्थानांतरित करवा लिया। अब राशनकार्ड बनाने वालों को पता नहीं क्या आगे की सूझ गई, जो उन्होंने गैस एजेंसी का नाम बगड़ डाल दिया। मेरे लिए तो यह दोनों जानकारी ही चौंकाने के लिए पर्याप्त थी लेकिन आखिर में परिवार के सदस्यों के नाम देखकर तो मैं एक तरह से उछल ही पड़ा। चूंकि राशनकार्ड मैंने गैस कनेक्शन के उद्देश्य से ही पहले से ही अलग बनवा लिया था, इस कारण उसमें मेरा, धर्मपत्नी एवं बच्चों के नाम हैं। पुराने राशनकार्ड में भी उम्र को लेकर कुछ विरोधाभास था लेकिन नए वाले में तो जबरदस्त विरोधाभास नजर आया है। हकीकत में मेरी उम्र 37 हो गई है लेकिन राशनकार्ड बनाने वालों ने इसे 26 ही लिखा। इतना ही नहीं बड़े बच्चे योगराज की उम्र आठ व छोटे एकलव्य की छह साल है लेकिन राशनकार्ड में दोनों की उम्र छह साल लिखी हुई है। मतलब दोनों जुड़वा हो गए। अति तो धर्मपत्नी की उम्र के साथ कर दी गई। राशनकार्ड में उसकी आयु 29 साल दिखा रखी है। इस हिसाब से वह मेरे से तीन साल बड़ी हो गई। यह सब देखकर मेरे पास राशनकार्ड बनाने वालों के सामान्य ज्ञान को दाद देने के अलावा कोई चारा नहीं था। वैसे अखबार से जुड़े होने के कारण इस प्रकार की गलतियां अखरना लाजिमी भी है। भिलाई लौटने के बाद जब यही बात धर्मपत्नी से साझा की और मजाक में कहा कि अब तो तुम मेरे से बड़ी हो गई हो गई हो? यह बात बिलकुल प्रमाणिक और सरकारी दस्तावेज में दर्ज है। मेरे इस मजाक को उसने बड़ी ही साफगोई के साथ शांत कर दिया, बोली, पत्नी हमेशा पति से छोटी हो यह जरूरी तो नहीं होता, अभिषेक एवं एश्वर्या का उदाहरण ही ले लो। अब भला मैं क्या बोलता। हां मन ही मन में इतना जरूर सोच रहा था कि कहीं राशनकार्ड बनाने वाला भी धर्मपत्नी जैसी सोच व मानसिकता वाला तो नहीं था?

यह प्राइवेट बस वाले...


बस यूं ही

 
बचपन में देखी फिल्म शोले का गीत 'स्टेशन से गाड़ी जब छूट जाती है तो एक दो तीन हो जाती है... कोई हसीना जब रुठ जाती है तो...' वैसे तो कई बार सुना है लेकिन गीत की इस लाइन की गंभीरता उस दिन समझ में आई जब वास्तव में गाड़ी छूट गई। गाड़ी छूटने के बाद हुई दिक्कतों का उल्लेख तो कर ही चुका हूं लेकिन गाड़ी छूटने का वाकया भी बड़ा रोचक है। आठ अक्टूबर को दोपहर बाद 3.25 बजे दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से गोंडवाना एक्सप्रेस में मेरा कन्फर्म टिकट था। करीब इसी समय पर एक बार पहले राजधानी एक्सप्रेस से भिलाई जा चुका हूं, इसलिए इस बात से आश्वस्त था कि सुबह जल्दी चलकर आराम से स्टेशन पहुंच जाऊंगा। तैयार होकर सुबह गांव से बस पकड़कर नजदीकी बस स्टैण्ड बगड़ पहुंचा तब साढ़े सात बज चुके थे। पौने आठ बजे के करीब एक प्राइवेट बस आई, जिस पर राजस्थान राज्य पथ परिहवन निगम से अनुबंधित लिखा हुआ। उस पर लिखा था झुंझुनू से हरिद्वार वाया दिल्ली। अनुबंधित तथा दिल्ली व हरिद्वार लिखा देखकर मैं बस में यह सोचकर बैठ गया कि लम्बी दूरी की बस है, समय पर दिल्ली पहुंचा ही देगी। तसल्ली के लिए बस में बैठते वक्त परिचालक से पूछा तो उसने दोपहर डेढ़-दो बजे के बीच दिल्ली पहुंचने की बात कही। बस चल पड़ी। थोड़ी देर बाद परिचालक मेरे पास आया और किराया मांगा। मैंने किराया दिया तो बोला भाईसाहब बस हजरत निजामुद्दीन नहीं जाकर केवल धोलाकुआं तक जाएगी। मैं कुछ बोलता इससे पहले ही वह फिर बोला, धोलाकुआं से हजरत निजामुद्दीन के लिए काफी बसें हैं। आप उनमें चले जाना। खैर, उसकी बातों को सुनकर मैं चुप ही रहा। बस की रफ्तार एवं छोटे-छोटे गांव में उसके ठहराव को देखकर मन में आशंका घर कर चुकी थी लेकिन फिर भी मन ही मन खुद को दिलासा देता रहा कि अभी तो काफी समय बाकी बचा है। बगड़ से बस चिड़ावा पहुंची थी कि पीछे से हरियाणा रोडवेज की बस आई और तेजी के साथ निकल गई। यह वही बस थी, जिसमें पिछली बार दिल्ली गया था और निर्धारित समय से पहले ही पहुंच गया था। चूंकि किराया दे चुका था इसलिए चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया। परिचालक भी उस वक्त पता नहीं कहां गायब हो गया था। आखिरकार साढ़े आठ बजे के करीब बस चिड़ावा से रवाना हुई। सिंघाना जाने के बाद फिर बस रोक दी गई। लम्बे-लम्बे ठहराव देखकर यकीन मानिए बहुत बुरा लग रहा था लेकिन कोई जोर भी नहीं चल रहा था। सिंघाना से नारनौल के बीच में भी उसने कई बार रोका। नारनौल पहुंचते-पहुंचते साढ़े दस बज चुके थे। नारनौल से बगड़ की दूरी करीब 70 किमी के लगभग है लेकिन वहां पहुंचने में उसने पौने तीन घंटे लगा दिए थे। नारनौल से रेवाड़ी की दूरी भी 60 किमी के करीब है लेकिन सड़क उपेक्षाकृत खराब है, लिहाजा बस उतनी रफ्तार से नहीं चल रही थी, जितनी चलनी चाहिए। और कम से कम ऐसे हालात में मेरे को तो लगती भी कैसे। इंतजार करते-करते अंतत: 12 बजे बस जैसे-तैसे रेवाड़ी बस स्टैण्ड पहुंची। करीब पन्द्रह मिनट बाद परिचालक आया और बोला, धारूहेड़ा, मानेसर व बिलासपुर की सवारी बस में ना बैठें। केवल दिल्ली और गुडग़ांव के यात्री बैठे रहें। इस घोषणा के बाद दो चार सवारी जो उक्त स्थानों की थी वे उतर गई। बस में कोल्डड्रींक बेचने वाले एक लड़के ने बताया कि रास्ते में बहुत बड़ा जाम लगा हुआ है कल शाम से ही..इस कारण बसें वाया पटौदी होकर दिल्ली जा रही हैं। उसकी बात सुनकर धड़कन और तेज हो गई। इसी दौरान परिचालक आया और बोला सभी लोग अपनी टिकट दिखाकर बाकी का पैसा वापस ले लें। बस दिल्ली नहीं जाएगी। रेवाड़ी तक का किराया काटकर उसने पैसे वापस किए तो गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। साढ़े बारह का समय हो गया था। दिल्ली के लिए कोई बस है क्या इस वक्त?, तो परिचालक ने बगल में खड़ी एक प्राइवेट बस की तरफ इशारा करते हुए कहा, इसमें बैठ जाओ, यह दिल्ली जाएगी। उस बस के परिचालक के पास गया तो उसने कहा कि वह तो गुडग़ांव के इफको चौक तक ही जाएगी।
उस वक्त तय नहीं कर पा रहा था कि आखिर क्या किया जाए। बड़े ही विकट एवं विचित्र हालात बन गए थे। लगभग बदहवाशी की हालत में दिल्ली भाईसाहब को फोन लगाकर उनको बताया् फिर गांव में पापाजी को सारा वृतांत फोन पर ही सुनाया। भिलाई कार्यालय में भी फोन लगाकर घटनाक्रम से अवगत करा दिया। बस स्टैण्ड पर मेरे अलावा चार पांच युवक और खड़े थे, सभी को दिल्ली जाना था। मैंने टैक्सी से चलने का प्रस्ताव रखा तो एक बार तो सभी तैयार हो गए। इसी बीच एक बोला, टैक्सी वाला तो 25 सौ रुपए लेगा। मैंने कहा कि सभी के हिस्से पांच-पांच सौ आएंगे। इतना सुनते ही सब के सब चुप। मेरे पास भी जेब में उस वक्त तीन सौ रुपए ही थे। एटीएम से पैसे निकालवाने का विकल्प थी नहीं था क्योंकि कार्ड भिलाई में ही छोड़ दिए थे। आते वक्त पापाजी पांच सौ रुपए दे रहे थे लेकिन वो भी मैंने जानबूझकर नहीं लिए। पापाजी को कहा कि रास्ते में जो खर्चा होगा उतने तो जेब में हैं, काम चल जाएगा। पापाजी ने बार-बार कहा कि ले लो लेकिन मैंने नहीं लिए, हालांकि मैं पांच सौ रुपए रख भी लेता तो मेरे पास आठ सौ रुपए का ही जुगाड़ हो पाता। वैसे भी 25 सौ और आठ सौ में दूर दूर तक कोई समानता भी नहीं थी। हम सभी एक दूसरे का मुंह ताक ही रहे थे कि एक बुजुर्ग व्यक्ति ने चुप्पी तोड़ते हुए मेरे से कहा कि आपकी ट्रेन कितने बजे की है। मैंने साढे तीन बजे का समय बताया तो वह बोला, हमारी टे्रेन तो साढ़े पांच बजे की है, हम तो आराम से घूम फिर के पहुंच जाएंगे। बुजुर्ग की बाद सुनते ही सारे युवक वहां से खिसक लिए। मैं अकेला ही रह गया। इसी बीच अचानक एक बस आई, उस पर लोग टूट पड़े। भारी बैग को लेकर मैं भी किसी तरह बस में सवार हुआ। लेकिन उसके रंग-ढंग देखकर समझते देर नहीं लगी यह तो लोकल बस है और घूम-फिर कर दिल्ली जाएगी। ऐसे में बस से उतर जाना ही उचित समझा। दिमाग ने सोचना लगभग बंद कर दिया था। फैसला ही नहीं कर पा रहा था कि आखिर क्या किया जाए। स्टैण्ड से बाहर मुख्य सड़क पर इस उम्मीद से आया कि शायद कोई कार या जीप दिल्ली के लिए मिल जाए लेकिन वहां पर भी निराशा ही हाथ लगी। आखिरकार मन ही मन में फैसला कर लिया कि अब दिल्ली नहीं जाऊंगा। अब सामने दो दिक्कतें थी। दिल्ली-भिलाई के बीच वाले टिकट को निरस्त करवाना तथा दूसरा फिर से किसी ट्रेन में कन्फर्म टिकट की व्यवस्था। भिलाई कार्यालय के एक साथी से लगातार सम्पर्क में था। वह सभी रेलों की जानकारी बता रहा था। आखिरकार जयपुर-नागपुर में जाने का फाइनल कर दिया गया। इसके बाद एक रिक्शे वाले के पास गया और स्टेशन चलने को कहा तो वह बोला भाईसाहब ट्रेन पकडऩी है तो कोई ऑटो पकड़ लो। दस रुपए लेगा जल्दी पहुंचा देगा। मैंने कहा कि ट्रेन नहीं पकडऩी टिकट रद्द करवानी है। इसके बाद स्टेशन पहुंचा, वहां लाइन में लगने के बाद टिकट रद्द करवाया। ट्रेन रवाना होने के चार घंटे के अंतराल में टिकट रद्द करवाने पर कुल किराये का पचास फीसदी कट जाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। टिकट रद्द करवाकर ऑटो पकड़कर वापस स्टैण्ड आया। थोड़े से इंतजार के बाद ही बस आ गई थी लेकिन उसमें काफी भीड़ थी। नारनौल तक खड़ा आया। नारनौल में जगह मिली तो कुछ आराम आया। करीब बारह घंटे की बेमतलब की यात्रा के बाद शाम सात बजे घर पहुंचा। यकीन मानिए इन बाहर घंटे में इतनी मानसिक वेदना झेली कि कुछ भी याद नहीं रहा। पानी सुबह घर से पीकर निकला था। वापसी में सिंघाना आकर बोतल खरीदकर पानी पीया। खाना तो जैसा मां ने दिया था वैसा का वैसा रह गया। ऐसे हालात में बजाय किसी को दोष देने के मैं खुद को ही कोस रहा था कि क्यूं प्राइवेट बस में सवार हुआ। अगर पांच मिनट इंतजार करने के बाद हरियाणा रोडवेज की वह बस पकड़ लेता तो शायद यह सब होता ही नहीं। वाकई स्टेशन से गाड़ी जब छूट जाती है तो बड़ी पीड़ा होती है। अब यकीन तो आपको भी हो गया होगा। भगवान बचाए इन प्राइवेट बस वालों से।

वो 45 घंटे


बस यूं ही

 
बेहद ही थकाऊ व उबाऊ और अब तक की सबसे लम्बी यात्रा के बाद आखिरकार रविवार अलसुबह करीब पांच बजे मैं भिलाई पहुंचा। गांव (केहरपुरा कलां, राजस्थान) से भिलाई (छत्तीसगढ़) तक पहुंचने में वैसे तो 28 से 30 घंटे तक का समय लगता है लेकिन इस बार सारे रिकार्ड ध्वस्त हो गए। आठ अक्टूबर को भिलाई वापसी का कार्यक्रम (ट्रेन छूट जाने के कारण ) ऐसा गड़बड़ाया कि पटरी पर बड़ी मुश्किल से आया। किसी न किसी तरीके से और जितनी जल्दी हो सके भिलाई पहुंचना जरूरी था। तत्काल दिल्ली से भिलाई तक के बीच चलने वाली तमाम ट्रेन की जानकारी जुटाई गई मगर सभी में वेटिंग दिखाई दे रहा था। जयपुर से भिलाई के बीच चलने वाले रेलों की हालात भी कमोबेश ऐसी ही थी। वैकल्पिक हल के रूप में तय किया गया कि अगर कोई सीधी ट्रेन नहीं है तो क्यों न टुकड़ों में जाया जाए। बस यहीं से निर्धारित समय से ज्यादा समय खर्च होने की बुनियाद रख दी गई थी। जयपुर से नागपुर के बीच चलने वाली एक ट्रेन में उम्मीद की कुछ किरण दिखाई दी। लिहाजा, इसी ट्रेन की टिकट 8 अक्टूबर को ही बुक करा दी गई। आरएसी में 42 नम्बर मिला था। संतोष इस बात का था कि चलो बैठने का स्थान तो पक्का है। मन में विश्वास भी था कि आरएसी टिकट कन्फर्म हो जाएगी। कन्फर्म को लेकर उत्सुकता इतनी ज्यादा थी कि करीब चार दर्जन मैसेज 139 पर कर-करके अपडेट जानता रहा। 11 अक्टूबर को सुबह आठ बजे घर से रवाना होते वक्त भी मैसेज किया लेकिन उसमें 18 नम्बर पर आरएसी दिखा रहा था। जयपुर के लिए सीधी बस पकडऩे के लिए झुंझुनू बस डिपो जाने की बजाय बगड़ तिराहे पर ही उतर गया। पांच मिनट बाद ही राजस्थान रोडवेज की बस आई लेकिन भीड़ इतनी कि तिल रखने की भी जगह नहीं थी। बस की हालत देखकर मैं पीछे हट गया। गनीमत रही कि पीछे-पीछे एक प्राइवेट बस भी थी। भीड़ तो उसमें भी थी लेकिन खड़े होने लायक जगह थी। मैं उसमें सवार हो गया। झुंझुनू आने के बाद सभी यात्रियों को एक दूसरी बस में बैठने के लिए कहा गया। बस की सभी सीटें भरी हुई थीं, इतना जरूर था कि बस स्लीपर थी इस कारण इन पर भी यात्रियों की बैठाया गया था। सिंगल स्लीपर में दो तो डबल में चार यात्री बैठे थे। हिम्मत करके मैं भी डबल वाले स्लीपर में चढ़ गया, वह भी सबसे आखिर में। सीकर आते-आते बस लगभग खाली हो चुकी थी। ऊपर बैठे कई यात्री अब नीचे की सीटों पर आ गए थे। सीकर से निकलते ही अचानक तेज बारिश का दौर शुरू हो गया। हर तरफ पानी ही पानी। बस के अंदर भी काफी पानी हो गया था। कई जगह से पानी टपकने लगा था। रही सही कसर एक शीशे ने पूरी कर दी। शीशे को पेचकस से बंद करने के प्रयास में परिचालक से पूरा शीशा ही टूट गया। अब तो बारिश की बौछारें तेज हवा के साथ बस के अंदर तक आने लगी थी। पर्दे को शीशे की जगह लगाने का प्रयास किया लेकिन वह भी गीला होकर उडऩे लगा। तेज हवा और फुहारों से शरीर में सिहरन होने लगी थी। खुली खिड़की की जद में मैं ही जो आ रहा था। आखिकार दोपहर के करीब दो बजे बस जयपुर पहुंची। यहां बारिश कुछ हल्की थी। बूंदाबांदी के बीच तत्काल रिक्शे से जयपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा। तब तक बारिश कुछ तेज हो गई थी। भीगते हुए ही स्टेशन परिसर में प्रवेश किया। ढाई बज चुके थे। टिकट कन्फर्म को लेकर अभी भी ऊहोपाह की स्थिति थी। दो तीन बार दो मैसेज का जवाब नहीं आया। एक दो बार फेलियर का मैसेज भी आया। आखिरकार साढ़े तीन बजे चार्ट बना और टिकट कन्फर्म का मैसेज आया तो यकीन मानिए एक तरह का बोझ सा हट गया था। ट्रेन तो दो घंटे पहले ही प्लेटफार्म पर पहुंच गई थी और मैं भी। लेकिन चार बजे के करीब जब आरक्षण चार्ट ट्रेन पर लगाया गया तो शायद ही कोई यात्री होगा जिसका टिकट कन्फर्म ना हो। इसकी प्रमुख वजह यह थी कि यह ट्रेन अभी नई नई ही चली है। ऐसा लगा कि यात्रियों को इसके बारे में जानकारी कम है। आखिरकार निर्धारित समय शाम 4.30 बजे यह ट्रेन जयपुर से रवाना हुई। इसका रुट कुछ अलग था। यह वाया सवाइमाधोपुर होकर कोटा जाने की बजाय अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तोड़ होते हुए कोटा आई। दिन भर मध्यप्रदेश में दौडऩे के बाद दूसरे दिन शाम सात बजे यह ट्रेन नागपुर पहुंची। नागपुर से भिलाई का आरक्षण पहले ही करवा लिया था। भिलाई के लिए ट्रेन रात 11.35 पर थी। ऐसे में मेरे पास चार घंटे से ज्यादा समय था। पूछताछ की शायद कोई बस मिल जाए तो और भी जल्दी भिलाई पहुंच जाऊं। जल्दी पहुंचने की उत्सुकता इतनी थी कि ट्रेन का तत्काल में लिया टिकट भी रद्द करवाना तय कर लिया था। ऑटो लेकर नागपुर के बस स्टैण्ड तक हो आया लेकिन वहां उस वक्त ऐसी कोई बस ना थी जो ट्रेन से पहले भिलाई छोड़ दे। आखिकार वापस स्टेशन आ गया। यहां जूते निकाल कर आराम से बैठ गया। थोड़ी ही देर में पास में एक सज्जन आकर बैठ गए। अपने मोबाइल में कुछ टाइप करने में व्यस्त थे। अचानक मेरे से पूछ बैठे भाईसाहब घड़ी में एएम और पीएम का क्या मतलब होता है। मैं उनके सवाल पर थोड़ा सा हंसा और फिर उनको बताया। इसके बाद तो बातों सिलसिला ही चल पड़ा। वो सज्जन मूलत: जमशेदपुर (टाटानगर, झारखण्ड) के रहने वाले थे। अपने शहर जा रहे थे। बताया कि नागपुर के एक होटल में मास्टर सेफ हैं और अब यहां से इस्तीफा दे दिया है, झारखण्ड से लौटने के बाद रायपुर के किसी होटल में पदभार ग्रहण करना है।
बातचीत के इस दौर में दो घंटे बीत गए। अचानक हावड़ा-हटिया जाने वाली ट्रेन आई तो वो बोले इसी में निकल जाता हूं। जब तक दस सवा दस हो गए थे। स्टेशन पर भीड़ बढऩे लगी थी। श्रीमती के बीच में दो तीन फोन आ गए, वह बोली, आप रात को नागपुर में रुक जाओ, तूफान आने वाला है। मैं उसकी सलाह पर थोड़ा मुस्कुराया और उससे कहा कि अब इससे ज्यादा परेशानी और क्या होगी, जो होगा देखा जाएगा। खैर, निर्धारित समय से थोड़ा विलम्ब से ट्रेन स्टेशन पर आई। आखिरकार सुबह साढ़े चार बजे के करीब मैं दुर्ग रेलवे स्टेशन उतरा। घर पहुंचते-पहुंचते पांच बज चुके थे। समय की गणना करने लगा तो दो दिन और लगभग दो रात तो सफर में ही बीत गए थे। एक नया रिकार्ड बन गया था, 45 घंटे तक लगातार यात्रा करने का। यकीनन यात्रा बेहद तकलीफदेह एवं थकाने वाली रही लेकिन अपने साथ कई तरह के अनुभव छोड़ गई।

Monday, September 30, 2013

17 साल बाद


बस यूं ही


शीर्षक पढ़कर हो सकता है जेहन में कई तरह के ख्याल आए, दरअसल, यह सारी कवायद उस फोटो के लिए है, जो कल फेसबुक वॉल पर चस्पा की थी। फोटो के बारे में लिखने का विचार उस पर आए कमेंटस को पढ़कर आया। एक से बढ़कर एक कमेंट्स। मैंने हल्का सा उल्लेख भी किया था कि हर कमेंट्स किसी धरोहर से कम नहीं है और कमेंट्स के पीछे कोई ना कोई कहानी जुड़ी है। खैर, कमेंट्स आने का सिलसिला बदस्तूर जारी है, लेकिन आज थोड़ा फुरसत में था तो सोच लिया क्यों ना इस पर कुछ लिखा जाए...। वैसे कमेंट्स की कहानी भी कम रोचक नहीं है। कौन कैसे एवं किस अंदाज में सोचता है, इससे यह भी पता चलता है। किसी कमेंट्स को देखकर चेहरे पर मुस्कान आई तो किसी को देखकर अतीत जिंदा हो गया। कुछ तो ऐसे थे कि पढ़कर अकेला ही हंसने लगा। सबसे पहले बात हंसी वाले कमेंट्स से करता हूं..। झुंझुनू से लोकेन्द्र सिंह ने कहा 'दादा बटुआ दो तीन साल में बदल ही लिया करो। ' कुछ तरह का कमेंट्स श्रीगंगानगर के साथी संदीप शर्मा ने किया। वो लिखते हैं ' 17 साल से एक ही पर्स। बड़ी नाइंसाफी है। वैसे फोटो में 'कच्चा कला' लग रहे हो।' यकीन मानिए इन दोनों कमेंट्स को लिखते-लिखते हंसी छूट रही है। दोनों साथियों की पर्स के बारे में जिज्ञासा स्वभाविक है, जबकि हकीकत यह है कि पर्स समय के साथ बदलते रहे हैं। लेकिन उनमें कुछ कागजात और कुछ फोटो भी हैं, जो नया पर्स लेते ही सबसे पहले डाल लेता हूं। यह बात दीगर है कि बाद में विजिटिंग कार्ड वगैरह से पर्स मोटा हो जाता है और फोटो नेपथ्य में चली जाती है। कल वो सामने आई तो सोचा क्यों ना इसको फेसबुक पर सभी के साथ साझा कर लूं। बस यही सोचकर लगाई थी। वैसे पर्स 17 साल पुराना नहीं है। हंसी तो 'कच्चा कला' को लेकर भी है। कच्ची कली के बारे में तो सुना था। आज नया नामकरण हो गया। खैर, संदीप भाई का यह प्रयोगवादी नामकरण बेहद रोचक लगा। सर्वाधिक खुशी तो छात्र जीवन के साथियों के कमेंट्स को देखकर हुई, सचमुच अतीत जिंदा हो गया। कमेंट्स पढ़ते-पढ़ते फ्लेश बैक में चला गया।
बगड़ के राजसिंह जी राठौड़ लिखते हैं. 'तब तो हमारी याद जरूर आई होगी..।' इसके बाद बगड़ के साथी अजय कानोडिया कहते 'बगड़ के बिना महेन्द्र जी की स्टोरी अधूरी है।' इसके बाद बगड़ के ही अशोक राठौड़, जिनका ननिहाल मेरे गांव में है लिखते हैं 'वाह मामाश्री, पुरानी याद ताजा हो गई।' बगड़ के साथी संजय दाधीच कहते हैं 'द क्रिकेटर ऑफ पटवारी कॉलेज 1995-1999' इसी से मिलते जुलते कमेंट्स दो और साथियों के आए। बगड़ के भानजे और चिड़ावा के पास अडू्का गांव के रहने वाले और मेरे अजीज नीरज शेखावत ने दो बार कमेंट्स किया है। पहली बार उन्होंने लिखा 'दादोभाई आपका वो चैलेंज याद आ गया।' दूसरी बार कहा कि 'मेरे दादोभाई एक शानदार प्रतिभा के धनी, जो हमेशा से मेरे मार्गदर्शक रहे हैं। आई मिस यू महेन्द्र जी।' कुछ इसी अंदाज में एडवोकेट अर्जुनसिंह जी नरुका लिखते हैं 'यह फोटो देखकर आपकी पुरानी याद ताजा हो गई है' नरुका जी भी मूल रूप से चिड़ावा के पास बामनवास के रहने वाले हैं और हनुमानगढ़ जिले के पीलीबंगा कस्बे में वकालत के पेशे से जुड़े हुए हैं। वैसे तो आप सभी साथियों से फेसबुक और फोन के माध्यम से लगातार सम्पर्क में हूं लेकिन वो जमाना याद आ गया, जिसकी कल्पना मात्र से ही शरीर में रोमांच भर उठता है। वैसे बगड़ तो मेरे लिए वो जगह है जो मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहेगा। बगड़ के बारे में मैं अपने ब्लॉग http://khabarnavish.blogspot.in/2011/06/blog-post.html में पहले भी लिख चुका हूं।
पत्रकार साथी रमेश जी सरार्फ ने लिखा है.. 'फूल खिलता है, खिलकर बिखर जाता है, यादें रह जाती हैं लेकिन वक्त गुजर जाता है।' सचमुच वक्त का पता ही नहीं चलता। वह कितनी जल्दी गुजर जाता है। हम चाह कर भी न तो उसको रोक पाते हैं और ना ही उसकी रफ्तार धीमी कर पाते हैं। वक्त के आगे के हम सब बेबस हैं, लाचार हैं। उसके आगे कोई जोर नहीं चलता है। सिवाय पुरानी यादों को ताजा करने के। इसी तरह की भावना साथी राज जी बिजारणिया ने व्यक्त की। वे कहते हैं 'बचपन, जवानी, बुढापा गुजर जाएगा, यादगार के लिए सिर्फ फोटो ही रह जाएगा।'यकीनन यह फोटो ही हैं, जो हमारे हंसने और मुस्कुराने का माध्यम बन पाती हैं। उनको देखना और अतीत को याद करना कितना सुकून देता है, उसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। इसके बाद भिलाई के साथी साहित्यकार शिवनाथ जी शुक्ला ने तो तीन शब्दों में गागर में सागर भर दिया। वे कहते हैं 'मनमोहक रंगरुट सा।' मनमोहक हूं या नहीं यह तो शुक्ला जी जानें लेकिन सेना मेंजाने की हसरत तो बचपन से ही थी। लेकिन उसी जोश एवं जज्बे के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में डटा हुआ हूं, लिहाजा रंगरुट से तुलना करना न्यायसंगत नजर आता है।
पत्रकार साथी सिकंदर पारीक लिखते हैं 'केरपुरा को होनहार टाबर।' सच में मुझे मेरे गांव पर गर्व है। http://khabarnavish.blogspot.in/2011/06/blog-post_16.html.मेरा गांव संभवत: .जिले का इकलौता गांव है जहां के लोग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। वैसे गांव का नाम केरपुरा नहीं केहरपुरा कलां है पारीक जी। मेरे ही गांव के बड़े भाई जो सेना में सूबेदार हैं राजेन्द्रसिंह जी कहते हैं ' भाई इस फोटो को तो मैं भी पहचान जाता बट अभी वाली फोटो काफी चेंजिंग हो गया, इसलिए नहीं पहचानता था।'अब देखिए, करीब दस दिन पहले ही राजेन्द्रसिंह जी मेरे से फेसबुक पर जुड़े लेकिन जुडऩे के बाद कहा कि वो मेरे को जानते नहीं हैं। बाद में परिचय देने पर जान गए थे। संभवत: उन्होंने तभी ऐसा लिखा। भिलाई के अमित सोनी 'स्मार्ट बॉय' की संज्ञा देते हैं तो फिजी की रेनुका जी जिज्ञाववश 'इज देट यू ब्रॉदर' पूछ बैठती हैं। झुंझुनू के अशोक जी शर्मा 'यंग मैन' से नवाजते हैं तो साथी रामनिवास सोनी जी 'कलरफुल दुनिया है जी' कहकर शायद श्वेत-श्याम फोटो लगाने पर उलहाना दे रहे हैं। फोटोग्राफर जो हैं। इसी प्रकार के हनुमानगढ़ के महेन्द्र चौधरी, श्रीगंगानगर के लक्ष्मीकांत शर्मा, हनुमानगढ़ के सुनील गिल्होत्रा, झुंझुनू के तरुण भारतीय, हनुमानगढ़ के तुषार लालवानी ने भी फोटो पर कमेंट्स किए हैं। मैं उन सबका भी आभारी हूं। बहरहाल, लाइक का आंकड़ा तो 60 से ऊपर पहुंच चुका हैं, उन सभी का भी तहेदिल से शुक्रिया। आखिर में एक बात और अगर उनका जिक्र नहीं किया तो जितने भी शादीशुदा साथी हैं वो बखूबी जानते हैं। मतलब मेरी धर्मपत्नी निर्मल राठौड़। उन्होंने भी अंग्रेजी में कुछ लिखा है। मेरे से ज्यादा पढ़ी लिखी जो ठहरीं।
आप सभी के स्नेह का मैं बेहद कायल हूं। मुझे आप सब के स्नेह पर फख्र है। आपका साथ मेरे लिए अनमोल है। पुन: सभी का धन्यवाद। दिल से आभार।

Monday, September 23, 2013

बच्चों की बात


बस यूं ही

 
अभी दो दिन पहले की ही बात है। सुबह घर से कार्यालय पहुंचा ही था कि श्रीमती का फोन आ गया। मोबाइल पर श्रीमती के नम्बर देखकर चौंक गया। रिसीव करने से पहले ख्याल आया कि आखिरकार ऐसा क्या हो गया, अभी तो घर से आया था और पीछे-पीछे फोन आ गया। खैर,फोन अटेण्ड किया तो श्रीमती की आवाज सुनकर लगा कि वह बड़ी उत्साहित है। मैंने पूछा बोलो, क्या काम आ गया, तो बोली मैंने वो अखबार की रद्दी बेच दी है। मैंने कहा ठीक है लेकिन इसमें बताने की बात क्या है। इस वह बोली बात तो बताने वाली ही है, इसलिए तो फोन किया है। मैंने कहा कि अब बता दो कि आखिर ऐसा क्या है। उसने कहा कि आपने रद्दी आठ रुपए किलो के हिसाब से बेची थी जबकि उसने दस रुपए किलो के हिसाब से बेची है। मैंने उसको धन्यवाद दिया और अच्छा किया कहकर फोन काट दिया।
इसके बाद कार्यालय से दैनिक काम निबटाकर बच्चों को लेकर घर पहुंचा। बस्ता सोफे पर फेंकने के बाद योगराज कमरे की ओर दौड़ा। अंदर जाते ही वह जोर से बोला, 'अरे, मम्मा, अपने कमरे के अखबार कौन ले गया।' श्रीमती रसोई में व्यस्त थी, लिहाजा योगराज ने यही सवाल मेरे से पूछा। चूंकि मैं तो समूचे घटनाक्रम से वाकिफ था, इसलिए जानबूझाकर अनजान बना रहा है। जवाब ना पाकर योगराज की बेचैनी स्वाभाविक थी। वह मेरे पास आया और फिर बोला, 'अरे पापा कब से पूछ रहा हूं, बताओ ना, अखबार कहां गए? ' मैंने कहा बेटे अखबार तो आज चोरी हो गए। जवाब सुनकर वह छोटे भाई एकलव्य (चीकू) के पास गया और बोला 'चीकू, देख अपने अखबार चोरी हो गए।'
चीकू ने यह सुना तो वह भी दौड़कर कमरे में गया। इसके बाद दोनों भाई सोचने वाले अंदाज में बाहर आए। दोनों सोच में डूबे थे कि आखिर यह सब कैसे हो गया। अचानक योगराज बोला 'अरे, पापा अखबार चोरी हो गए,यह तो ठीक है लेकिन चोरों ने अपने को बताया क्यों नहीं?' मैं योगराज के भोलेपन पर मंद मंद मुस्कुरा ही रहा था कि हाजिरजवाब चीकू जल्दी से बोला.. 'अरे भाई, चोर कोई बताकर चोरी थोड़े ही करेगा।' चीकू का जवाब सुनते ही मैं हंस पड़ा। श्रीमती भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी। सचमुच बच्चों का अपना संसार है। वे बड़े ही जिज्ञासु होते हैं। उनके सवाल जितने अजीब व रोचक होते हैं तो जवाब उतने ही दिलचस्प। और एक बात और पोस्ट के साथ लगाई यह गई इस फोटो की कहानी भी बड़ी रोचक है। एक दिन स्कूल से आने के बाद दोनों भाई बाथरुम में जाकर खेलने लगे। इसी दौरान श्रीमती ने चुपके से आकर मेरे कान में कहा कि देखो बच्चे क्या कर रहे हैं। मैंने जाकर देखा तो हंसे बिना नहीं रह सका। दोनों अपने स्कूल के सफेद जूतों को धोने में जूटे थे। दोनों की यह गतिविधि मैंने मोबाइल मैं कैद कर ली। आज बच्चों के बारे में लिखने का ख्याल आया तो इस फोटो की भी याद आ गई।

कमाल का धमाल


बस यूं ही

लालों का कमाल,
मचा रहे धमाल,
पार्टी है बदहाल,
विपक्ष तो खुशहाल।

जी का जंजाल,
सब कुछ निढाल,
बुरा हुआ हाल,
चुनावी है साल।

हो गए हलाल,
रह गया मलाल,
समय का काल,
छोड़ गया सवाल।

थमता नहीं बवाल,
सियासत में उबाल,
तोड़ कोई निकाल,
काली लगती दाल।

Tuesday, September 17, 2013

सपनों की सियासत...4


बस यूं ही

 
सपनों की सियायत कम होने का नाम नहीं ले रही है। गाहे-बगाहे सपनों से जुड़ा कोई न कोई बयान आ ही जाता है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जाएंगे, वैसे-वैसे सपनों की फेहरिस्त और भी लम्बी होती जाएगी। ऐसे-ऐसे सपने जो आजादी के बाद से लगभग हर छोटे-बड़े चुनाव में दिखाए जाते रहे हैं। सपनों की इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए मंगलवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी राजस्थान के बारां में सपने दिखाए। कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि वे चाहते हैं कि देश का सबसे बड़ा सपना देश के गरीब को देखना चाहिए। वे चाहते हैं कि मजूदर का बेटा हवाई जहाज में चढऩे का सपना देखे। वैसे, सपना तो हर कोई देखता है, उस पर न तो कोई टैक्स लगता है और ना ही किसी तरह की पाबंदी है, लेकिन सपने गरीब ही देखे और वह भी सबसे बड़ा सपना.. यह तो सोचने वाली बात है। उनका यह बड़ा सपना पूरा होगा या नहीं यह तो बाद की बात है, लेकिन मेरा अनुभव तो यही कहता है कि मजदूर या गरीब व्यक्ति के हवाई जहाज में चढऩे से उन पर कर्जा जरूर चढ़ जाता है। यकीन नहीं है तो शेखावाटी के उन लोगों से पूछिए जिनके परिजन रोजगार की तलाश में अरब देशों में गए हुए हैं। अगर हवाई जहाज में चढऩे व उतरने मात्र से ही सपना साकार हो जाता तो फिर क्यों वे अपने वतन से दूर जाने को मजबूर होते। क्या यहीं पर कमा खा नहीं लेते? हां इतना जरूर है कि केवल हवाई जहाज में चढ़कर, उतरने का ही सपना है तो, मेरे हिसाब से उसे पूरा करना कोई मुश्किल काम नहीं है। वैसे भी देश में कई जगह संग्रहालयों में पुराने हवाई जहाज खड़े हैं। राहुल के निर्देश पर पार्टी गरीबों को यह सुअवसर उपलब्ध करवा सकती है। दरअसल, यहां हवाई जहाज में चढऩे से तात्पर्य प्रत्येक आदमी को रोजगार मिलने से है। रोजगार से आदमी इतना सक्षम और समर्थ हो जाएगा कि हवाई जहाज में बैठना उसके लिए मुश्किल काम नहीं होगा। तभी तो राहुल ने कहा भी कि उनकी पार्टी हर आदमी को रोजगार मुहैया करानी चाहती है। अरे भई, करवाओ ना.. किसने रोका है। स्वागत है। लेकिन सिर्फ कह भर देने से ही रोजगार नहीं मिलने वाला। यह देश आजादी से लेकर आज तक कई तरह के संकटों से जूझता रहा है। उनमें बेरोजगारी भी बड़ी समस्या है। हर साल शिक्षित व प्रशिक्षित बेरोजगारी की फौज बढ़ती ही जा रही है। यह सब सपने दिखाने का कमाल नहीं तो क्या है? आजादी के समय से ही रोजगार देने और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सोच लिया जाता तो आज ऐसे हालात शायद पैदा ही नहीं होते। बहरहाल, किसी गरीब और मजबूर का सपना पूरा होता है तो हम सब के लिए इससे बड़ी गर्व और गौरव की बात कोई और हो ही नहीं सकती। लेकिन सपने पूरे होने में संशय इसलिए है, क्योंकि देश में अगर गरीब और मजूदर रहेंगे ही नहीं तो फिर सपने देखेगा कौन? देश में वो ही तो एकमात्र ऐसा वर्ग है, जिसको सर्वाधिक सपने आज तक दिखाए गए हैं। भले ही इस वर्ग को दो जून की रोटी ठीक से मय्यसर ना हो लेकिन सपने तो देखे ही जा सकते हैं ना।                                                                                           जारी है..।

Monday, September 16, 2013

सपनों की सियासत...3


बस यूं ही

 
'मैं सपने नहीं देखता, क्योंकि सपने देखने वाला बर्बाद हो जाता है।' 'हमें सशक्त सरकार और सशक्त नेता के सपने को पूरा करना है।' पढऩे में यह दो साधारण वाक्य ही हैं लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। याद कीजिए यह दोनों बयान एक ही व्यक्ति के हैं। अंतर महज इतना सा है कि पहला बयान पखवाड़े भर पहले का है जबकि दूसरा एकदम ताजातरीन है और रविवार को ही आया है। दोनों बयानों में विरोधाभास है या समानता, यह आम आदमी भी आसानी से समझ सकता है। एक तरफ जनता को सपना दिखाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सपना देखने से होने वाले संभावित खतरे से आगाह भी किया जा रहा है। हां, इतना जरूर है कि दोनों बयान जारी हुए तब हालात जुदा-जुदा थे। एक बयान उस वक्त का है जब तस्वीर साफ होने में कुछ संशय था। उस पर विरोध के बादल मंडरा रहे थे। दूसरा बयान तस्वीर साफ होने के बाद का है। भले ही विरोध को दरकिनार कर दिया गया हो। इससे इतना तो तय हो गया कि परिस्थितियों के हिसाब से सपने की परिभाषा भी बदल जाती है। सपना अब व्यक्तिगत नहीं सामूहिक हो गया है, मतलब सब मिलकर सपना देखेंगे और फिर...सपने देखने वाला...हो गया.. तो, राम-राम, भगवान सलामत रखे। खैर, मेरे को तो दोनों बयान विरोधाभासी लगे। बयानों का इस तरह यू टर्न देखकर अब पक्का यकीन हो गया कि राजनीति में सब कुछ स्थायी क्यों नहीं होता है। महोब्बत और जंग की तरह राजनीति में भी सब कुछ जायज क्यों है। यह इसलिए क्योंकि यहां न तो कोई स्थायी मित्र होता है और ना ही स्थायी दुश्मन। परिस्थितियों के हिसाब से सब कुछ बदलता रहता है। तभी तो राजनीति करने वाले या इसमें रुचि रखने वाले अवसरवादिता से परहेज नहीं करते। बहरहाल, बयानों के इस तरह बाल की खाल निकालने की तर्ज पर भावार्थ तलाशने के कारण मेरे पर किसी विचारधारा विशेष का समर्थन करने जैसे गंभीर आरोप लगने लाजिमी हैं। वैसे भी मेरे विचारों से सभी संतुष्ट हों यह भी तो जरूरी नहीं है और हो भी नहीं सकते। हाथ की पांचों अंगुलियां ही बराबर नहीं होती तो फिर विचारधारा में समानता की कल्पना करना ही बेमानी है। खैर, यहां पर आलोचना किसी व्यक्ति विशेष की नहीं होकर उन दो बयानों की है, जो देश में खासे चर्चित हो गए हैं। वैसे मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूं कि हमारे देश में सपनों का कारोबार है, यहां सपने बिकते हैं। इसलिए सियासत में सपने देखे या दिखाए नहीं जाएंगे तो फिर सत्ता रूपी सफलता की सीढ़ी चढऩा असंभव ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा। बस देखने की बात यह है कि सपने पूरे किस तरह से होते हैं। क्योंकि सपनों को साकार करने के लिए मेहनत जरूरी है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि, जिसने कल्पना के महल नहीं बनाए उसे वास्तविक महल भी उपलब्ध नहीं हो सकता है। स्वामी जी के कहने का आशय यही था कि सपने देखने चाहिए लेकिन उनको पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत भी जरूरी है। लेकिन गौर करने लायक बात यह भी है कि सपने टूटने का ग्राफ सियासत में ही ज्यादा है। सपने जब टूटते हैं तो फिर गोपालदास नीरज याद आते हैं। और याद आता है उनका वह कालजयी गीत, जिसमें उन्होंने कहा है...
स्वपन झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे।
वाकई सियासत में जब सपने टूट जाते हैं तो गुबार ही हिस्से में आता है.। जारी है...

सपनों की सियासत...2


बस यूं ही

 
सियासत में इसी तरह के सपने दिखाए जाते हैं। आजादी से लेकर आज तक न जाने कितने ही सपने दिखाए गए। कोई हिसाब नहीं है। बिलकुल बेहिसाब। सपने दिखाते-दिखाते हालत यह हो गई है कि अब बात सपने देखें जाए या नहीं, इस विषय पर होने लगी है। तभी तो आजकल सपने पर बहस चल रही है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाल ही में दिए गए सपनों से संबंधित बयानों की जोरदार समीक्षा हो रही है। मोदी कहते हैं, वे सपने नहीं देखते। सपना देखने वाला बर्बाद हो जाता है। राहुल कहते हैं, आपके (जनता के) सपनों को मैं अपना सपना बनाना चाहता हूं.। मैं जनता के हर सपने को पूरा करना चाहता हूं। दोनों बयान कितने विरोधाभासी हैं। दोनों में कहीं कोई समानता नजर नहीं आती है। बिलकुल एक दूसरे के उलट हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, दोनों परस्पर विरोधी दलों के नेता जो ठहरे। इसके बावजूद मेरे को दोनों नेताओं के बयान में एक समानता दिखाई देती है। समानता इस बात की कि दोनों नेताओं के बयान पार्टी लाइन की बजाय व्यक्तिगत ज्यादा नजर आते हैं। यह बात अलग है कि दोनों ही दलों ने बयानों पर न तो कोई प्रतिक्रिया जाहिर है की और ना ही इनको व्यक्तिगत मामला बताकर अपना पल्ला झाड़ा है। ऐसा इसलिए है कि क्योंकि इन दोनों दिग्गज नेताओं के बयानों को चुनौती देने का काम कौन करे। यही बयान कोई छुटभैया दे देता तो यकीन मानिए, उससे स्पष्टीकरण मांग लिया जाता। भविष्य में इस तरह के बयान देने पर पाबंदी तक भी लग सकती थी। खैर, मोदी का ना हो लेकिन उनकी पार्टी का सपना है कि मोदी प्रधानमंत्री बने। इधर राहुल हर आदमी का सपना सच करने की कह रहे हैं कि जबकि उनकी पार्टी ने न जाने आज तक कितनों के सपनों को तोड़ा है। इसलिए मेरी नजर में तो दोनों बयान व्यक्तिगत ही हैं और इधर दोनों दल मजबूर हैं। बयानों के समर्थन हां में हां मिलाने या मौन रहने पर। चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते। कोई चारा भी नहीं है।
बहरहाल, देश में सपना आज भी प्रासंगिक है। सपना हमारे देश का एक तरह से यथार्थ बन गया है। देश में सपने का कारोबार है। यहां सपने बिकते हैं। यहां सपनों के सौदागर हैं। साहित्य से लेकर फिल्म तक हर जगह सपना मौजूं हैं। कॅरियर बनाने तक में सपना देखा जाता है। हर आम से लेकर खास तक सपना जुड़ा है लेकिन इसके हर वर्ग के हिसाब से मायने अलग हैं। दरअसल, सपना हमारे देश में एक बहुत बड़ा मुद्दा है। भ्रष्टाचार, महंगाई, साम्प्रदायिकता, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, जनसंख्या वृद्धि इन सबसे दीगर लेकिन सबसे कारगर। जिस प्रकार धर्म का राजनीति से घालमेल करके फायदा उठाया जाता है, उससे कहीं ज्यादा मुफीद तो सपना है। इसलिए सपना सियासत का सबसे कारगर हथियार है। सफलता पाने की पहली कड़ी ही सपना है। बिना सपने के सफलता मिलना संभव भी नहीं है। जारी है..

सपनों की सियासत...1


बस यूं ही

 
आजकल बेहद उधेड़बुन में हूं और असमंजस में भी। सोते-उठते जेहन में एक ही सवाल कौंधता है... सपने देखने चाहिए या नहीं...। बहुत दिमाग खपा लिया लेकिन फिलहाल किसी फैसले पर नहीं पहुंचा हूं..। कई बार तो मन ही मन प्रण ले लेता हूं कि कल से सपने के बारे में नहीं सोचूंगा, लेकिन कोई न कोई बात ऐसी निकल ही जाती है कि सपने का सवाल फिर उठ खड़ा होता है। अंदर ही अंदर विचारों का प्रवाह दौड़ता है। कभी कभी तो यह प्रवाह इतना उग्र हो जाता है कि विचारों में द्वंद्व होने लगता है। वैसे भी मौजूदा दौर में सपने पर कुछ बोलना या कहना खतरे से खाली नहीं है। सपनों के साथ आजकल सियासत जो जुड़ गई है। सपने का समर्थन करने या विरोध करने का सीधा सा मतलब खुद पर किसी दल की विचारधारा का ठप्पा लगवाने से कम नहीं है। राजनीतिक गलियारों में बयानों के भावार्थ न चाहते हुए भी निकाल ही लिए जाते हैं। बस यही सोचकर कई दिनों से चुप था लेकिन जब सपनों की बात बढ़ ही गई है तो फिर जोखिम उठाने की हिम्मत जुटा ही ली। वैसे भी हमारी जमात के प्रति नेक विचार होते ही कितनों के हैं। ऐसे संक्रमण के काल में जब जमात के कुछ साथी बिना कुछ किए व कहे नाहक ही बदनाम हो रहे हैं, उससे तो बेहतर है कि चुप्पी तोड़ ही दी जाए। खैर, मुद्दे की बात यह है कि मेरा सपने देखने और दिखाने के दर्शन में विश्वास मिलाजुला सा ही है। यह मेरी बेहद निहायत और निजी राय है। सपने देख भी लेता हूं और नहीं भी। यह बात दीगर है कि रात को सपने अपने आप जरूर आ जाते हैं। न चाहते हुए भी। कभी सुहावने तो भी डरावने। उन पर किसी की कोई बंदिश नहीं है.. कोई रोक नहीं है। मेरा मानना है कि इस प्रकार से सपने तो सभी को ही आते होंगे। फितरन कुछ लोग अपने सपनों को साझा भी करते हैं। कुछ तो सपने का फल जानने के लिए बड़े बेताब नजर आते हैं। यह तो हुई ना चाहते हुए भी सपने देखने की बात। अब मेरा तजुर्बा तो यह कहता है कि सपने देखने के साथ दिखाने भी पड़ते हैं। बात को आजमाना हो तो इसके लिए खुद के परिवार से बड़ा उदाहरण कोई नहीं है। किसी चीज को लेकर बच्चे जब जिद करते हैं.. रोते हैं.. रुठते हैं... तो हम या तो उनकी जिद पूरी कर देते हैं या फिर उनको भरोसा दिलाते हैं, उनसे वादा करते हैं... आश्वासन देते हैं। यह सब करना एक तरह का लॉलीपाप या सपना ही तो है। यही कहानी बच्चों की मां से जुड़ी होती है। उसकी कई मांगें तो तत्काल पूर्ण करने वाली ही होती हैं। कुछ हाथोहाथ पूरी नहीं भी हो पाती हैं, जिनको दूरगामी मांगें भी कह सकते हैं, उनके लिए सब्जबाग दिखाने की कलाकारी करनी पड़ती है। यह एक सपना ही तो है। भले ही आपने नहीं देखा लेकिन आपके आश्वासन से किसी ने तो देख लिया..। जारी है..

सूर्यनगरी जोधपुर-3


बस यूं ही

 
कार्य संबंधी तमाम औपचारिकताएं पूर्ण कर उसी दिन शाम को हम दोनों भाई-बहन गांव के लिए रवाना हो गए। ऐसे में जोधपुर देखने की हसरत पूरी नहीं हो सकी। मजे की बात तो यह है कि उस काम का परिणाम केवल एक हां पर ही टिका था। आखिरकार हां हो ही गई और इसके बाद रिश्तों की डोर कुछ कदर बंधी, कि मैं जिंदगी भर के लिए जोधपुर का होकर रह गया। इसके बाद तो जोधपुर पहले के बरक्स और भी अच्छा लगने लगा था। यह बात दीगर है कि व्यस्तता और पेशगत मजबूरियों के चलते जोधपुर जाना कम ही हो पाता है। कभी कारण विशेष के लिए जाना भी पड़ा तो कार्यक्रम इतना व्यस्त रहा कि बस वो कार्य ही बड़ी मुश्किल से हो पाया। घूमने-फिरने की हसरत फिलहाल भी अधूरी है। खैर, हालिया दो घटनाक्रमों के चलते जोधपुर की जो छवि देश-दुनिया में बनी है, उसको लेकर मैं बेहद व्यथित हूं। इसलिए नहीं कि मैं जोधपुर से जुड़ा हूं, मेरा उससे संबंध है, बल्कि इसलिए कि समृद्ध इतिहास और संस्कृति के धनी इस शहर की वर्तमान में जो तस्वीर बना दी गई है वह डराती है। झकझोरती है। कचोटती है। और शर्मसार भी करती है। आलम यह है कि चंद लोगों की कारगुजारियों की सजा न केवल जोधपुर के लोग बल्कि यहां का इतिहास, संस्कृति और सद्भाव भी भोग रहे हैं। यकीन मानिए आजकल जोधपुर का नाम लेने के बाद लोगों के चेहरे पर जो कुटिल मुस्कान दिखाई देती है, वो अपने आप में काफी कुछ कह देती है। बहुत दुख देती है यह मुस्कान। सच कहता हूं., अंदर ही अंदर बहुत दर्द होता है। एक चोट सी लगती है। पहले तो भंवरीदेवी और अब आसाराम प्रकरणों का प्रस्तुतिकरण नई पीढ़ी में एक अजीब सी जिज्ञासा पैदा कर रहा है। मैं टीवी पर अक्सर खेल या समाचार चैनल ही देखता हूं..। लेकिन आजकल वह देखने की भी इच्छा नहीं होती। इसलिए नहीं कि जोधपुर का नाम, बदनाम हो रहा है, उसकी छवि को बट्टा लग रहा है, बल्कि बच्चों के कारण मैंने यह सब बंद कर रखा है। कोई भी समाचार चैनल लगा लो.. सब पर जोधपुर ही जोधपुर है। बच्चे जब बार-बार जोधपुर दिखाने और बोलने का सबब पूछते हैं तो मैं निशब्द हो जाता हूं..।       
क्रमश: ...

सूर्यनगरी जोधपुर-2

बस यूं ही
 
उस वक्त जोधपुर की खूबियों और खासियतों की बारे में इतनी जानकारी भी नहीं थी। वैसे भी बचपन में इन सब का ध्यान रहता भी कहां है। खैर, समय के साथ जोधपुर के बारे में और जानकारी मिलती गई। गांव के काफी लोग भी काम के सिलसिले में जोधपुर रहते हैं। उनके मुंह से भी सूर्यनगरी की काफी तारीफ सुन चुका था। सेना में रहते हुए पापा भी जोधपुर जा चुके हैं। इतना कुछ सुनने और जानने के बाद जोधपुर के प्रति जेहन में अलग छवि बनना लाजिमी था। जोधपुर का इतिहास, वहां के ऐतिहासिक स्थल, मेहरानगढ़, मंडोर, वायुसेना स्टेशन, पत्थरों की नक्काशी व उम्मेद पैलेस आदि के बारे में जानने के बाद मेरी जोधपुर देखने की जिज्ञासा और भी बढ़ गई। बीच-बीच में जोधपुर से जुड़े समाचार लगातार मिलते रहे। कभी क्रिकेट मैच के आयोजन को लेकर तो कभी फिल्मों की शूटिंग के बारे में। 1998 में जोधपुर उस वक्त अचानक सुर्खियों में आया था जब फिल्म स्टार सलमान खान, सैफ अली खान, तब्बू और नीलम हिरण शिकार के मामले में फंस गए। यह सब चलता रहा लेकिन कभी जोधपुर जाना नहीं हो पाया। आखिरकार 2003 में पहली बार जोधपुर जाने का मौका मिला। आज भी याद है बड़ी बहन के साथ जयपुर से रात को जोधपुर के लिए बस पकड़ी थी। तारीख तो याद नहीं है लेकिन शायद अगस्त या सितम्बर में से कोई महीना रहा होगा। रात भर का सफर करने के बाद अलसभोर हम दोनों बुआजी के घर पहुंचे थे। दोनों को देखकर बुआजी भी विस्मित थी कि आखिर बिना सूचना के सुबह-सुबह ही अचानक यह लोग किस प्रयोजन से आ गए। मैं नित्यक्रम से निवृत्त होता तब तक बुआ-भतीजी दोनों बातों में ही मशगूल हो चुकी थी। इसी बीच हमारे जोधपुर आने का मकसद भी बुआजी जान चुकी थी। उस वक्त मैं श्रीगंगानगर में कार्यरत था, लिहाजा अवकाश मुश्किल से तीन या चार दिन का ही मिला था। अखबार का काम ही ऐसा है, लम्बे अवकाश की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए जोधपुर घूमने-फिरने की बात गौण हो चुकी थी, पहली प्राथमिकता तो वह काम ही था, जिसके लिए जोधपुर गए थे। क्रमश: ...

सूर्यनगरी जोधपुर-1


बस यूं ही

 
फेसबुक पर इन दिनों फिल्म अभिनेता सलमान खान और आसाराम बापू की फोटो खूब शेयर की जा रही है। इसी फोटो के नीचे लिखा है, 'पचास बार मना किया था, जोधपुर मत जाना।' इस फोटो को खूब लाइक मिल रहे हैं और टिप्पणियां भी की जा रही हैं। भले ही यह बात सलमान ने ना कही हो लेकिन जाहिर सी बात है, सलमान का भी जोधपुर को लेकर अनुभव अच्छा नहीं रहा है। आज से करीब पन्द्रह साल पहले 1998 में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'हम साथ-साथ हैं' की शूटिंग के दौरान सलमान, हिरण शिकार के मामले में ऐसे फंसे थे कि अभी तक पीछा नहीं छूट पाया है। संभवत: सलमान का आसाराम के साथ फेसबुक पर यह लिंक तभी जोड़ा जा रहा है। खैर, करीब पखवाड़े भर से जोधपुर फिर चर्चा में है। गूगल पर भी जोधपुर के नाम से सर्च करने पर आसाराम प्रकरण ही ज्यादा दिखाई दे रहा है। जोधपुर चर्चित शहर है, इसमें दो कोई दो राय है ही नहीं। न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी। सूर्यनगरी के नाम से विख्यात इस शहर की पहचान केवल विशेष प्रकार के पत्थरों से ही नहीं बल्कि यहां की अपणायत से है, जिसका कायल हर वो शख्स है जो जोधपुर से परिचित है या यहां आ चुका है। यहां की संस्कृति को समझ चुका है। यहां के लोगों स्वभाव में न तो शहर के नाम (सूर्यनगरी) से हिसाब से गर्मी है और ना ही यहां लोग पत्थरों का शहर होने के बावजूद पत्थर जैसे कठोर हैं। हां, मान-सम्मान एवं स्वाभिमान तो यहां रहने वालों की नस-नस में है। गौर करने की बात यह है कि जोधपुर की यह विशेषताएं या खूबियां मैंने नहीं गढ़ी हैं, बल्कि इस शहर के साथ सदियों से जुड़ी हुई हैं। बचपन में एक जुमला सुना था कि जोधपुर के लोग जब गुस्से में कुछ कहते हैं तो भी उनका गुस्सा, आम गुस्से जैसे नजर नहीं आता। कहने का मतलब यह है कि जोधपुर की बोली इतनी मीठी है कि वो किसी पराये को भी अपना बनाने पर मजबूर कर देती है। खैर, मैं तो इस शहर से वाबस्ता बचपन से ही हूं..। हल्की सी याद है कि बचपन में एक बारात में जोधपुर आया था। चौपासनी स्कूल में बारात ठहराई गई थी। करीब 28-29 साल पहले की बात है...। क्रमश:

13/13 का राज


बस यूं ही

 
आज 13 सितम्बर है और साल भी 2013 का। मतलब आज का दिन लिखा जाए तो दो बार 13 का उल्लेख होगा। आज के दिन ने किसी के अरमानों के पंख लगा दिए तो किसी की उम्मीदों का दिया बुझा दिया। वैसे भी तेरह के अंक के साथ कई तरह के किस्से एवं कहानियां जुड़े हुए हैं और अंधविश्वास भी। विशेषकर क्रिकेट की दुनिया में 13 का अंक बेहद ही अशुभ माना जाता है। शायद ही कोई खिलाड़ी होगा जो 13 नम्बर की टीशर्ट पहनता है। इसके अलावा 13 पर आउट होने वालों की फेहरिस्त भी खासी लम्बी है। 13 पर आउट होने के पीछे एक बहुत बड़ा मनोविज्ञान है। खिलाड़ी इस स्कोर पर पहुंचते खुद को असुरक्षित महसूस करता है और जल्दी से इसे पार पाने के प्रयास में आउट हो जाता है। खैर, क्रिकेट की दुनिया से इतर काफी जगह 13 को अशुभ और मनहूस माना जाता है। पश्चिमी देशों में 13 तारीख के अंक को इतना अशुभ व दुर्भाग्यशाली माना जाता है कि इर साल 13 सितम्बर को अंधविश्वास को नकारने के लिए डिफाय सुपरस्टिशन डे मनाते हैं। तेरह के अंक को विज्ञान में भी एक फोबिया का नाम दिया गया है। इतना ही नहीं पश्चिम देशों में होटलों में तेरहवीं मंजिल नहीं होती है। होटलों में तेरह नम्बर का कमरा भी नहीं होता। इतना ही नहीं हवाई जहाज में तेरह नम्बर की पंक्ति भी नहीं होती।
बहरहाल, आज 13 सितम्बर के दिन देश में दो ऐसे फैसले हुए, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए हैं। दोपहर बाद जहां दिल्ली के दामिनी सामूहिक अनाचार प्रकरण के दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई, वहीं शाम होते-होते भाजपा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना दावेदार घोषित कर दिया। हो सकता है, जिनको फांसी की सजा मिली है वे और उनके परिजन आज के दिन को कोस रहे हों, लेकिन पूरा देश इस इस फैसले पर झूम रहा है। इधर मोदी की ताजपोशी से आडवाणी और उनके समर्थकों को छोड़कर शेष भाजपा में दीवाली का सा माहौल है। पटाखे फूट रहे हैं। मिठाई बंट रही है। ढोल-ढमकों और गाजे-बाजे के साथ खुशियां मनाई जा रही हैं। ऐसा लग रहा है कि मोदी कोई उम्मीदवार न हुए गोया प्रधानमंत्री ही बन गए हैं। खैर, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन मोदी समर्थकों की खुशी और जोश आज देखते ही बन रहा है।
अपने व्यस्त समय के बीच से जब 13 के अंक के बारे में कुछ जानकारी जुटाई तो इस दिन वैसे तो कोई खास उपलब्धि नजर नहीं आई, हालांकि रचनाकार रांगेय राघव, साहित्यकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी और संगीतकार जयकिशन की पुण्यतिथि 13 सितम्बर को ही आती है। वीर दुर्गादास का जन्म 13 तारीख को ही हुआ था। प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार का निधन भी तेरह तारीख को ही हुआ था। वैसे 13 को अपशकुनी मानने का प्रचलन भारत में भी है। 13 का डर यहां भी कम नहीं है। किसी वर्ष 13 मास अर्थात अधिमास हो जाए तो उसे भी शुभ नहीं माना जाता है। तिथि क्षरण के कारण चंद्रपक्ष में तेरह दिन रह जाएं उसे भी अशुभ माना जाता है। मुम्बई में दो प्रमुख आतंकी हमलों के लिए भी 13 तारीख का ही चयन किया गया था।
वैसे तेरह से जुड़ी कुछ कहावतें भी हमारे देश में प्रचलन में है। मसलन, नौ नकद तेरह उधार, तीन बुलाए तेरह आए दे दाल में पानी, तीन में न तेरह में। इसके अलावा एक और राजस्थानी कहावत है कि तीन का तेरह कर देना, अर्थात बिगाड़ देना। संयोग की बात यह भी यह है कि ताश के पत्तों में एक रंग के तेरह ही पत्ते होते हैं। अगर इक्के से गिना जाए तो तेरहवां पत्ता बादशाह और दुग्गी से गिना तो तेरहवां पत्ता इक्का होता है। 13 के अंक के सभी के लिए अपने-अपने मायने हैं। भाजपा के लिए तो 13 खास महत्त्व रखता है। तभी तो मोदी का नाम तय करने में इतनी जल्दबाजी दिखाई गई है, वरना लोकसभा चुनाव में तो अभी छह-सात माह बाकी हैं। भाजपा के लिए 13 का अंक वैसे मिलाजुला ही रहा है। फिर भी पार्टी इसका मोह नहीं त्याग नहीं पा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी 1996 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उनका कार्यकाल मात्र 13 दिन का ही रहा था। इसके बाद 1998 में जब वे दोबारा प्रधानमंत्री बने तो 13 तारीख को ही शपथ ली। दूसरा कार्यकाल भी तेरह माह का रहा। यह भी संयोग है कि सहयोगी दलों की संख्या भी तेरह ही थी। और उनके सहयोग से उन्होंने तेरहवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इतना ही नहीं उनको पराजय भी तेरह तारीख को झेलनी पड़ी। इस तरह उनका चौथी बार प्रधानमंत्री बनने का सपना भी तेरह तारीख को ही टूटा था। इतना ही नहीं वाजपेयी के कार्यकाल में तथा भाजपा के समर्थन में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी।
बहरहाल, मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की घोषणा जिस अंदाज में हुई है। उसके मायने तो हैं। कहीं मोदी भी वाजपेयी के नक्शे कदम पर तो नहीं हैं? उनका तेरह के प्रति प्रेम देखते हुए लगता तो यही है, वह भी एक नहीं बल्कि डबल तेरह। अब यह 13/13 का अंक उनके लिए कैसा साबित होता है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि वे वाजपेयी की तरह कोई करिश्मा दिखाएंगे या आडवाणी की तरह पीएम इन वेटिंग के नाम से ही जाने जाएंगे।

सच कहां है...


बस यूं ही

सच कहने का साहस... सच सुनने का साहस...
सच लिखने का साहस...सच स्वीकारने का साहस...
सच के साथ रहने का साहस...सच के साथ काम करने का साहस..
सच के साथ जीने का साहस...सच के साथ मरने का साहस...
यह सब अब कहां है,

क्योंकि आजकल,
सच आपस में लड़ाता है..बेवजह गुस्सा दिलाता है...
सच से रिश्ते टूटते है...सच से दोस्त रुठते हैं...
सच से बात बिगड़ती है...सच से दुनिया अकड़ती है...
सच बोरिंग कहानी है...पागलपन की निशानी है...
यह हालत इसलिए है,

क्योंकि आजकल,
सांच को आंच है... झूठ की नहीं जांच है..
झूठ का बोलबाला है... सच का मुंह काला है..
झूठ से बात बनती है... झूठ से राह निकलती है..
झूठ बोलना शान है.. झूठ ही पहचान है...
तभी तो यह हो रहा है,

क्योंकि आजकल
सच बेचारा बीमार है... आदत से लाचार है...
सच प्रताडि़त है... सच पराजित है...
झूठ को अपना लिया.. सच को बिसरा दिया...
सच बुरी तरह घायल है... झूठ के सब कायल हैं..
यह हालत तब तक रहेगी..

जब तक हम,
अहसानों से दबते रहेंगे... जुल्म के प्रति चुप रहेंगे..
मुफ्त उपहार पाते रहेंगे... बदले में गुण गाते रहेंगे..
झूठ को अपनाते रहेंगे. सच को ठेंगा दिखाते रहेंगे..
आत्ममंथन करेंगे नहीं... भगवान से कभी डरेंगे नहीं..

इसलिए अब,
मजबूर हम होंगे नहीं... तो सच से दूर होंगे नहीं..
सोए जमीर को जगाना होगा.. झूठ को दूर भगाना होगा..
माध्यम हम बनें नहीं... बुरा किसी से सुनें नहीं...
सब कुछ सच के साथ करेंगे... प्रलोभन से नहीं डिगेंगे..

आज मैं ऊपर...

बस यूं ही
 
हो सकता है शीर्षक पढ़कर आप चौंक जाएं लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। दरअसल आज मेरी एक बहुप्रतीक्षित मुराद पूरी हो गई। बस उसी खुशी में यह गीत गुनगुना रहा था, अच्छा लगा तो शीर्षक दे दिया। खुशी इस बात की, कि कॉलेज लाइफ से दूर होने के करीब १६ साल बाद एक और डिग्री हासिल करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। परिणाम भी मंगलवार को ही जारी हुआ है। परिणाम जानने की बेताबी का आलम ऐसा था कि पिछले दो माह से राजस्थान विश्वविद्यालय की वेबसाइट को कोई सौ बार से ज्यादा देख चुका हूं। कई बार ऐसा भी हुआ कि साइट खुल ही नहीं पाई। कई बार खुली तो रिजल्ट का विवरण नहीं देख पाया। आज भी शाम चार बजे के करीब बड़ी उम्मीद के साथ वेबसाइट खोली थी। रिजल्ट पर जैसे ही क्लिक किया तो खुशी से उछल पड़ा। उस पर एमजेएमसी फाइनल का परिणाम शो हो रहा था। धड़कन तेज हो गई थी। परिणाम की साइट खुली तो रोल नम्बर मांगे गए। नम्बर भूल चुका था। प्रवेश पत्र भी घर पर रखा हुआ था। परीक्षा भी तो अप्रेल में हो चुकी थी, इतना लम्बे समय तक रोल नम्बर भला याद कैसे रख पाता। घर पर श्रीमती को फोन करने ही वाला था कि अचानक दूसरे विकल्प पर पड़ी। उसमें नाम लिखने को कहा गया था। जैसे ही नाम लिखकर की बोर्ड पर इंटर मारा। मार्कशीट खुल गई थी। परिणाम उम्मीद से बेहतर आया। परीक्षा देते समय जितने अंक का अनुमान लगाया था उससे कहीं ज्यादा अंक देखकर खुशी दोगुनी हो गई। मेरा प्रयास था कि किसी तरह 55 प्रतिशत अंक बन जाए ताकि आगे कोई और डिग्री लेने में दिक्कत ना हो। पूर्वाद्ध और उतराद्र्ध दोनों के अंक जोडऩे के लिए श्रीमती की मदद लेनी पड़ी। उसने फोन पर मार्कशीट देखकर नम्बर बताए तो प्रतिशत 59.44 के करीब आए। डिग्री हासिल करने की खुशी इसलिए ज्यादा है क्योंकि इसको मैंने चार साल की मेहनत के बाद हासिल किया है। वैसे तो यह दो साल में ही मिल जाती है। मैं यहां बात मास्टर इन जर्नलिज्म एंड मास कम्प्युनिकेशन (एमजेएमसी) की कर रहा हूं। इस डिग्री को हासिल करने की कहानी बड़ी ही दिलचस्प व रोचक है, इसलिए तो सभी के साथ साझाा कर रहा हूं। एमजेएमसी पूर्वाद्ध तो मैंने 2010में ही उत्तीर्ण कर ली थी। इसके बाद 2011 में जैसे ही एमजेएमसी उतराद्र्ध का परीक्षा टाइम टेबल घोषित हुआ मेरा तबादला झुंझुनू से छत्तीसगढ़ हो गया। छत्तीसगढ़ में ज्वाइनिंग 13 अप्रेल तक देनी थी। इसी चक्कर में मैं पहला एवं दूसरा पेपर नहीं दे पाया। बाद में बॉस से आग्रह किया तो शेष दो पेपरों की अनुमति मिल गई। जल्दबाजी में किसी तरह मैंने दो पेपरों की परीक्षा दे दी। स्थानांतरण के वक्त मैं केवल उतराद्र्ध का प्रेक्टिकल का पेपर ही दे पाया था, और दो पेपर लिखित के दिए। परिणाम तो जैसा पता था वैसा ही आया। खुशी इस बात की थी कि पे्रक्टिकल सहित बाकी दोनों विषयों में 60 प्रतिशत से ज्यादा अंक आए थे। लेकिन प्रथम एवं द्वितीय विषय के आगे डबल ए यानी अनुपस्थित (अबसेंट) लिखा गया था।
इसके बाद मैंने दोनों विषयों की परीक्षा अगले साल देने का निर्णय किया। परीक्षा फार्म व फीस आदि की औपचारिकता बीच में अवकाश लेकर पूरी कर गया था। परीक्षा तिथि घोषित हुई तो उसी के हिसाब से मैंने रेल टिकट का आरक्षित करवा लिए थे। दोनों पेपरों में सात दिन का गेप था लेकिन इतना लम्बा अवकाश एक साथ स्वीकृत नहीं हुआ, लिहाजा दो बार बिलासपुर से जयपुर आने एवं जाने का आरक्षण करवाया गया।
मैं परीक्षा देने के लिए जिस दिन रवाना होने वाला था कि ठीक उसी रात्रि को अचानक श्रीमती का फोन आया कि उसके पेट में तेज दर्द है। उस वक्त में कार्यालय में ही था। जैसा कि अक्सर करता आया हूं मैं खुद घर नहीं गया और एक स्टाफर के हाथों दवा घर भिजवा दी। दवा देने के बाद भी श्रीमती को आराम नहीं मिला और उसने फिर फोन लगाया और घर जल्दी आने का आग्रह किया। उसके आग्रह को अनसुना करते हुए काम पूर्ण होने के बाद रात करीब डेढ़ बजे मैं घर पहुंचा तो उसकी हालत देखकर दंग रह गया। मेरे होश फाख्ता हो गए। मुझो खुद पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों मैं फोन पर उसके दर्द को इतने हल्के में लेता रहा। वह दर्द के मारे बुरी तरह से छटपटा रही थी। पेट पकड़े हुए वह बार-बार करवट बदल रही थी लेकिन ऐसा करने से भी उसे राहत नहीं मिल रही थी। अंतत: रात ढाई बजे हिम्मत करके मैंने पड़ोसी डाक्टर को उठाया। उन्होंने दर्द निवारक इंजेक्शन लगा दिया, बोले इससे आराम मिल जाएगा और नींद भी आ जाएगी। इंजेक्शन लगाने के बाद बामुश्किल आधा घंटा ही बीता होगा श्रीमती फिर उसी तरह से करने लगी। रात के तीन बज चुके थे। समझा में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। आखिरकार एक स्टाफ सदस्य को फोन लगाया और अलसुबह करीब चार बजे के करीब श्रीमती को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया।
मैं घर पर बच्चों के साथ था। बच्चों की भी उस वक्त परीक्षा चल रही थी। मैंने सुबह उठकर उनको नहलाया। नाश्ते के लिए फल रखे थे वो ही टिफिन में डाल दिए। तब तक नीचे बच्चों का रिक्शा आ चुका था। उनको स्कूल के लिए रवाना करने के बाद में मैं अस्पताल पहुंचा। वहां देखा तो श्रीमती के ग्लूकोज चढ़ रहा था। चिकित्सकों ने अपेन्डिस की आशंका जताते हुए सोनाग्राफी करवाने की सलाह दे दी थी। आशंका सही निकली। स्टाफ सदस्यों की सलाह पर श्रीमती को उस अस्पताल से अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया। वह वहां पर तीन दिन तक भर्ती रही है। मैं तो दो पाटों के बीच फंसा था। एक तरफ घर पर बच्चे तो दूसरी तरफ श्रीमती। इस आपाधापी के बीच मैं परीक्षा कहां व कैसे दे पाता। रेल टिकट भी जैसे-तैसे रद़्द करवाए। इस तरह यह एक और साल भी यूं ही चला गया।
आखिरकार इस शैक्षणिक सत्र में तीसरी बार फिर फार्म भरकर परीक्षा के लिए आवेदन किया। अवकाश न मिलने के कारण फार्म भरने का काम परिचित के माध्यम से ऑनलाइन ही करवाया। फीस के पैसे भी उन्होंने ही दिए। फिर किसी प्रकार का व्यवधान ना हो, भगवान से इसी स्मरण के साथ मैं परीक्षा का इंतजार करने लगा। आखिरकार अप्रेल में परीक्षा की तिथि घोषित हुई। किसी तरह अवकाश मंजूर करवाकर नियत तिथि को परीक्षा देने पहुंचा। उसी वक्त परिचित के द्वारा दिए गए वो फीस के पैसे भी चुकाए। इसके बाद भिलाई लौट आया। परीक्षा की तैयारी कैसी थी, अब यह मत पूछना लेना। केवल टे्रन में जो वक्त मिला उसी दौरान कुछ नोट्स को पढ़ पाया। बाकी सब भगवान भरोसे था। पहला पेपर देने के बाद फिर बीमार पड़ गया, लेकिन गनीमत यह थी कि दोनों पेपरों के बीच सात दिन का गेप था और इस बार अवकाश भी आठ दिन का लिया था। इस प्रकार परीक्षा पूर्ण हुई। अब परिणाम के इंतजार में चार माह से अधिक का समय कैसे बीता मैं ही जानता हूं। बहरहाल, आज परिणाम आ गया है और खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। फिलहाल ऑफिस में हूं लेकिन अपनी भावनाएं व्यक्त करने से खुद को रोक नहीं पाया। आखिर चार साल बाद एमजेएमसी उत्तीर्ण जो की है। तभी तो गा रहा हूं आज मैं ऊपर...