Wednesday, May 20, 2015

तंत्र पर तमाचा



टिप्पणी

बीकानेर के केन्द्रीय जेल में दो गुटों के बीच हुए खूनी संघर्ष में तीन कैदियों के मारे जाने के बाद न केवल बीकानेर बल्कि समूचे प्रदेश की जेलों में अब उस तरह की कवायद हो रही है, जो सुरक्षा व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है। आनन-फानन में जेलों में तलाशी अभियान चलाए जा रहे हैं। नए सिरे से दिशा-निर्देश जारी हो रहे हैं। गैंगवार के कारण तलाशे जा रहे हैं। गरमागरम बहसों के बीच कानून व्यवस्था की समीक्षा हो रही है। इन सब सवालों के मूल में घूम-फिर कर एक ही बात आती है, यह सब अब ही क्यों? तीन कैदियों की हत्या के बाद हरकतस्वरूप जितने हाथ-पांव अब चलाए जा रहे हैं, उतने पहले चला लिए जाते तो शायद ही इतना बड़ा घटनाक्रम होता। जितने जतन अब हो रहे हैं, वह सब ईमानदारी एवं गंभीरता के साथ समय-समय पर नियमित अंतराल पर कर लिए जाते तो संभवत: इस गैंगवार से बचा जा सकता था।
खैर, इतना कुछ होने के बाद भी पुलिस व प्रशासन की भूमिका तो 'कुल्हड़ में गुड़ फोडऩे ' जैसी रही। वारदात होने के सात-आठ घंटे बाद तक जेल की चारदीवारी में एकत्रित अधिकारियों में कोई भी 'सच' बताने का साहस दिखाने की सूरत में नहीं था। पता नहीं ऐसा कौनसा 'डर' था, जिसने अधिकारियों के मुंह पर ताले लगा दिए। सब एक दूसरे का हवाला देकर कुछ भी कहने या बताने से बचते रहे। जाहिर सी बात है कि इस तरह का रवैया और हालात भी तो कई सवालों को जन्म देते हैं। संदेह के बादलों को गहरा करते हैं। जितने सवाल इस घटनाक्रम को लेकर हैं, कमोबेश उतने ही इसके होने के बाद भी पैदा हुए हैं। मामले की जानकारी 'छिपाने' और 'दबाने' के पीछे भी पुलिस-प्रशासन की किसी सुनियोजित रणनीति से इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन इस तरह का व्यवहार चौंकाने वाला जरूर है।
बहरहाल, जेल में कैदियों के बीच हुई गैंगवार समूचे तंत्र पर तमाचा है। यह नए सिरे से सोचने को मजबूर भी करती है। इस गैंगवार ने साबित भी कर दिया है कि यह सब पूर्व में हुई घटनाओं को हल्के में लेने का ही परिणाम है। अब भी अगर बीकानेर के घटनाक्रम से कोई सबक नहीं लिया गया तो यकीन मानिए इस प्रकार की गैंगवार पर प्रभावी अंकुश नहीं लग सकता। दो चार 'जिम्मेदारों' पर गाज गिराने की बजाय सियासत और अपराध की 'जुगलबंदी ' के कारण तलाशे जाएं और उन पर प्रभावी रोक के प्रयास किए जाएं। सिस्टम को सुधारने के लिए 'सरकारी संरक्षण' और 'सियासत की सरपरस्ती' पर रोक भी बेहद जरूरी है, अन्यथा इस प्रकार के वाकये हमको डराते रहेंगे।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 26 जुलाई 14 के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी...

अनुकरणीय पहल

टिप्पणी

वैसे तो प्रतिस्पर्धा एवं व्यावसायिकता की दौड़ में चिकित्सकीय पेशा भी अछूता नहीं रहा है। गाहे-बगाहे ऐसी खबरें आती भी रहती हैं, जब इस पेशे की पवित्रता तथा धरती के भगवान की निष्ठा पर सवाल उठे हैं। इतना ही नहीं विश्वास की डोर से बंधा यह नाजुक रिश्ता कई बार टूटा भी है। तभी तो मरीज-चिकित्सकों के संबंधों की नए सिरे से व्याख्या की जाने लगी है। ऐसे प्रतिकूल एवं संक्रमण के माहौल में एक सुखद खबर आई है, जो किसी मिसाल से कम नहीं है। बीकानेर के पास गुरुवार शाम को हुए सड़क हादसे के बाद घायलों के इलाज में चिकित्सकों ने जो जज्बा एवं हौसला दिखाया वह वाकई काबिलेतारीफ है। इस दौरान कई बातें ऐसी हुईं, जो बीकानेर में पहले शायद ही हुई हैं। हादसे की जिस भी चिकित्सक को सूचना मिली, वह तत्काल अस्पताल पहुंचा। अस्पताल पहुंचने वालों में वे चिकित्सक भी शामिल थे, जिनकी या तो ड्यूटी नहीं थी या वे ड्यूटी करके जा चुके थे। इतना ही नहीं रेजीडेंट डाक्टरों ने तो जिस सदाशयता एवं सहृदयता का परिचय दिया, उसने तो चिकित्सकीय पेशे की प्रतिष्ठा को बढ़ा दिया है। वे धन्यवाद के पात्र इसलिए भी हैं, क्योंकि उन्होंने हड़ताल से जरूरी चिकित्सकीय धर्म को समझा और दर्द से कराहते घायलों के इलाज में जुट गए। अजमेर में रेजीडेंट डाक्टर के साथ हुई मारपीट की घटना के बाद वहां चल रही हड़ताल का समर्थन बीकानेर के डाक्टरों ने भी किया था। वे गुरुवार को हड़ताल पर थे, लेकिन घायलों की सेवा सुश्रुषा करके उन्होंने सही मायनों में यह साबित कर दिखाया कि उनको धरती का भगवान क्यों कहा जाता है। वैसे तो बीकानेर में सेवाभावी लोगों की कमी नहीं है। पीडि़त मानवता की सेवा में यहां के लोग कभी पीछे नहीं रहते हैं लेकिन इस बार चिकित्सकों ने भी अनुकरणीय पहल करके एक नजीर पेश की है।
बहरहाल, मरीज-चिकित्सक के रिश्तों पर हावी होती व्यावसायिकता एवं प्रतिस्पर्धा के बीच ऐसा वाकया सुखद बयार से कम नहीं है। छोटी-मोटी मांगों एवं अन्य मसलों को लेकर मरीजों की अनदेखी कर आंदोलन करने वाले चिकित्सकों को बीकानेर के घटनाक्रम से सीख लेनी चाहिए। सचमुच बाकी चिकित्सक ऐसा कर पाए तो निसंदेह वे चिकित्सकीय पेशे में आई गिरावट को दूर कर मापदण्डों को फिर से पुनस्र्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ पाएंगे। चिकित्सकों को ऐसा करना भी चाहिए, आखिरकार सही अर्थों में उनका धर्म भी तो यही है कि वे पीडि़त मानवता की सेवा को सर्वोपरि रखें।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 11 जुलाई 14 के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी...

बार-बार दिन ये आए...

टिप्पणी
बीकानेर की आबोहवा इन दिनों बदली-बदली सी है। जनहित से जुड़े अधूरे व लम्बित कामों का द्रुतगति से निस्तारण होने लगा है। लम्बे समय से रखरखाव की बाट जोह रहे कामों के तो यकायक पंख लग गए हैं। सड़कों के गड्ढ़े ठीक करने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। बंद पड़ी रोडलाइटें अचानक जगमग हो गई हैं।। धूल एवं गंदगी से अटे रास्तों के भी दिन फिर गए हैं। कहीं प्रमुख रास्तों के आजू-बाजू टूटी-फूटी चारदीवारी नए सिरे से बन रही है तो कहीं पर आनन-फानन में नए फुटपाथों का निर्माण किया जा रहा है। इतना ही नहीं रोड डिवाइडरों एवं दीवारों पर रंग-रोगन करने का काम तेजी से चल रहा है। आवारा पशु मु य मार्गों से गायब हो गए हैं। यातायात व्यवस्था में भी कुछ सुधार दिखाई देने लगा है। दरअसल, यह सारी कवायद ' सरकार आपके द्वार' कार्यक्रम के लिए हो रही है। बीकानेर को इतना चकाचक एवं साफ-सुथरा बनाने की दौड़-धूप इसलिए भी की जा रही है ताकि 'सरकार' को यहां पर सब ठीक-ठाक लगे और किसी प्रकार की कोई समस्या नजर ही नहीं आए। खामियों को दुरुस्त करने तथा व्यवस्था को चाकचौबंद करने का यह सिलसिला जिला मुख्यालय से लेकर उपखण्ड व पंचायत समितियों तक चल रहा है। जनसुनवाई के माध्यम से जनसमस्याओं को रेखांकित किया जा रहा है। जनहित से जुड़ मुद्दे सूचीबद्ध हो रहे हैं। ज्ञापन-दर-ज्ञापन लिए जा रहे हैं। 'सरकार' के आगमन से पहले यह सब ट्रायल के तौर पर हो रहा है, ताकि बाद में किसी तरह से मीन-मेख निकालने वाले हालात नहीं बने।
इतना सब कुछ होते देख लोग खुश हैं और चकित भी। खुशी इसलिए कि काम बिना किसी रोकटोक के रातोरात हो रहे हैं और चकित होने की वजह यह है कि जिन कामों को कभी मौसम के नाम पर तो कभी स्टाफ या संसाधन की कमी का बहाना बनाकर लम्बित रखा गया था, उन सबको अब 'चमत्कारिक' रूप से निपटाया जा रहा है। इतना सब होते देख सवाल उठना भी लाजिमी है। वैसे सारा तंत्र ईमानदारी से अपने काम पूरा करे तो इस प्रकार के उपक्रम करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। न तो इतनी कसरत करनी होगी और न धूप में पसीना बहाने की जरूरत पड़ेगी।
बहरहाल, 'सरकार' ने बीकानेर की सुध लेने का मानस बनाया, यह काबिले तारीफ है लेकिन इसका फायदा आमजन तक तभी पहुंचेगा जब 'जंग' लगी व्यवस्था में परिवर्तन हो। सभी अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी के साथ करें। सिर्फ 'सरकार' के आगमन के उपलक्ष्य में 'सब कुछ ठीक' करने से आमजन का भला नहीं होने वाला, क्योंकि कुछ दिनों बाद काम करने का सरकारी ढर्रा फिर पुराने अंदाज में लौट आएगा। 'सरकार' के द्वार आने की सार्थकता भी तभी है जब व्यवस्था से लेकर सरकारी कामकाज के ढर्रे में कुछ बदलाव दिखाई दे, क्योंकि तात्कालिक बदलाव तो चार दिन की चांदनी की तरह ही है। वैसे सरकार चाहे तो क्या कुछ नहीं हो सकता।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 12 जून 14 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी

...गुड़ जैसी बात तो करें

टिप्पणी
यकीन मानिए अगर बीकानेर का मौसम सामान्य रहता तो विद्युत निगम को बिजली कटौती के दूसरे कारण तलाशने होते। ऐसा इसलिए है क्योंकि विद्युत लाइनों के रखरखाव के नाम पर जिला मुख्यालय पर रोजाना दो से तीन घंटे होने वाली कटौती हो या फिर अघोषित कटौती, इन दोनों ही परिस्थितियों में विद्युत निगम प्रमुख कारण प्रतिकूल मौसम को ही बताता रहा है। कुछ हद तक निगम के जवाब से संतुष्ट जरूर हुआ जा सकता है, लेकिन एकमात्र कारण मौसम को ही मानना बेमानी है। सुचारु विद्युत आपूर्ति के निगम के दावों का दम तो सामान्य परिस्थितियों में रोजाना दो तीन बार लगने वाले अघोषित विद्युत कट ही निकाल देते हैं। वोल्टेज में उतार-चढ़ाव की समस्या तो लगभग स्थायी हो चुकी है। प्रचंड गर्मी में जब पारा 45 डिग्री से ऊपर चल रहा है, जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित है। धरती किसी भट्टी की मानिंद भभक रही है। ऐसे में एक पल की विद्युत कटौती कितनी दुखदायी होती है, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। फिर भी रखरखाव के नाम पर की जाने वाली कटौती की बात सुनकर उपभोक्ता सब्र कर लेते हैं। इसके बावजूद अचानक बिजली गुल होना उपभोक्ताओं के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है तो निगम के लिए एक बड़ी चुनौती भी है।
वैसे देखा जाए तो विद्युत कटौती की समस्या जिला मुख्यालय के बनिस्पत ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है। जिले में हाल में मारपीट की करीब आधा दर्जन घटनाएं भी हुईं हैं, जब उपभोक्ताओं का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने कानून हाथ में लेने में संकोच नहीं किया, हालांकि ऐसी घटनाओं से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो इसके लिए निगम के आला अधिकारियों ने मातहत कर्मचारियों के मोबाइल नम्बर सार्वजनिक किए ताकि वे उपभोक्ताओं के सम्पर्क में रहें और समय रहते उनकी समस्याओं का निराकरण कर सके। इस कवायद का उद्देश्य उपभोक्ताओं के तात्कालिक आक्रोश को शांत करना भी था। इतना कुछ करने के बाद भी उपभोक्ताओं को अभी राहत नहीं मिली है। कई शिकायतें ऐसी भी सामने आई हैं जब परेशान उपभोक्ताओं ने संबंधित कर्मचारी को फोन तो लगाया लेकिन उसे अटेंड ही नहीं किया।
बहरहाल, मौसम पर किसी का जोर नहीं है। वह कब बिगड़ जाए कहना मुश्किल है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में आपूर्ति सुचारु कैसे रहे, इसके लिए निगम अधिकारियों को नए सिरे से सोचना होगा। बीकानेर की भौगोलिक परिस्थितियों को मद्देनजर रखते हुए लाइनों के रखरखाव के परम्परागत तरीकों में बदलाव करना होगा। लोड बढ़ रहा है तो उसके वास्तविक कारण तलाशे जाने चाहिए। विद्युत चोरी एवं छीजत रोकने के लिए प्रभावी एवं कारगर कदम उठाने की दिशा में ईमानदार कोशिश की जाए। और अगर यह सब नहीं हो सकता तो कम से कम उपभोक्ताओं के निरंतर सम्पर्क में रहने के साथ-साथ उनके सवालों का संतोषजनक जवाब तो दिया ही जा सकता है। देखा गया है कि अक्सर हालात तभी बिगड़े हैं, जब उपभोक्ताओं एवं निगम के बीच संवादहीनता की स्थिति बनी है या फिर उपभोक्ताओं की समस्याओं को न तो ठीक सुना गया और न ही उस पर कार्रवाई की गई। उम्मीद की जानी चाहिए निगम इस मामले में सार्थक पहल करेगा। कहावत भी है कि 'भले ही गुड़ ना दें लेकिन गुड़ जैसी बात तो करें।' अगर निगम यह काम भी नहीं कर सकता है तो फिर गर्मी में घोषित/ अघोषित कटौती से उकताए उपभोक्ताओं से ठण्डे मिजाज से पेश आने की उम्मीद कैसे रखी जा सकती है?

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 11 जून 14 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी

संकल्प का दिन


टिप्पणी
वक्त बदला, लोग बदले, उनकी भूमिकाएं बदली लेकिन बीकानेर नहीं बदला। बदलाव की बयार से एकदम अछूता व अलमस्त शहर। परम्पराओं, मान्यताओं एवं अतीत पर इतराने वाला तो मान, सम्मान एवं स्वाभिमान के लिए जीने वाला। संस्कृति और साहित्य का संगम तो गंगा-जमुनी तहजीब का संवाहक। सामाजिक समरसता व साम्प्रदायिक सद्भाव की जीती जागती नजीर। धर्म-कर्म की नगरी तो धन्ना सेठों की जननी। बीकानेरी जायके का जादू तो समूची दुनिया में सिर चढ़कर बोलता है। जीवंतता और जीवटता से भरे यहां के वाशिंदे लोकरंग, उत्सव, पर्व इस कदर मानते हैं कि संस्कृति जीवंत हो उठती है। बीकानेर ही ऐसा शहर है जहां स्थापना दिवस पर चिलचिलाती धूप में पतंग उड़ाने की परम्परा है। सचमुच जितने यहां के लोग अनूठे हैं, उतने ही यहां के रीति रिवाज। जब सारा देश सोता है, तब रात को घरों से बाहर पाटों पर बैठकर हथाई एवं देश दुनिया पर चिंतन-मनन करने वाले भी बीकानेरी ही होते हैं। वाकई यह शगल अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं है।
बहरहाल, स्थापना के 527वें साल में प्रवेश कर रहा बीकानेर अपने अल्हड़पन की वजह से आज भी जवान है, सदाबहार है। बस समय के साथ बीकानेर का फैलाव बढ़ गया है और इसी वजह से कुछ समस्याओं के साथ जरूरतों ने भी पैर पसार लिए। मसलन, बदहाल यातायात व्यवस्था लाइलाज बीमारी का रूप अख्तियार कर चुकी है। शहर के बीचोबीच गुजर रही रेलवे लाइन से दिन में कई बार जाम लगता है। लम्बे समय से यहां रेलवे रिंग रोड व रेलवे बाइपास की आवश्यकता महसूस की जा रही है। औद्योगिक विकास समय की मांग है। बीकानेर में करीब साढ़े चार सौ औद्योगिक इकाइयां हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। मेगा फूड पार्क, हवाई सेवा, ड्राइपोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट पूरे हो जाएं तो बीकानेर के औद्योगिक विकास को पंख लग सकते हैं।
वैसे गाहे-बगाहे मुद्दों एवं मांगों पर चर्चा तो होती है लेकिन वह मुखर नहीं हो पाती है। इसकी बड़ी वजह है यहां के लोग, जो भाग्यवादी ज्यादा हैं, जिनकी सहनशीलता ही उनकी दुश्मन है। दमदार नेतृत्व का अभाव भी इसका बड़ा कारण रहा है। स्थापना दिवस के मौके पर शहरवासी संकल्प करें कि वे सहनशील बने रहेंगे, अपनी फितरत से किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे लेकिन जायज मांगों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने से भी गुरेज नहीं करेंगे। यकीनन वे ऐसा कर पाए तो फिर बीकानेर की उम्मीदों को पंख लगना तय है।

 राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 18 मई 14 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी

Thursday, February 27, 2014

... तो क्या कुत्ते काटना छोड़ देंगे!



टिप्पणी

रायपुर में कुत्ते के हमले में हुई मासूम की मौत के बाद समूचे प्रदेश में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि खूंखार होते आवारा कुत्तों से पार कैसे पाया जाए? नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने आनन-फानन में प्रदेश के निकायों को आवारा कुत्तों से निपटने के दिशा-निर्देश जारी किए हैं। साथ ही 28 फरवरी तक कुत्तों से निपटने के लिए किए उपायों के संबंध में रिपोर्ट भी मांगी गई है। शासन के आदेशों की अनुपालना में निगमों में हरकत शुरू हो गई है। दुर्ग एवं भिलाई निगम के अधिकारी भी इसी उधेड़बुन में हैं कि निर्देशों का जवाब किस तरह तैयार किया जाए, ताकि शासन को संतुष्ट किया जा सके। वैसे देखा जाए तो दोनों ही निगमों में कुत्तों से निबटने के लिए कभी गंभीरता नहीं दिखाई गई। तभी तो निगमों के पास न तो कोई संसाधन है और ना ही प्रशिक्षित कर्मचारी। कुत्तों को पकड़कर उनकी नसबंदी करने के लिए भी निजी एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता है। भिलाई निगम के अधिकारी तो दावा कर रहे हैं कि पिछले साल दिसम्बर में करीब 25 सौ कुत्तों की नसबंदी की गई, लेकिन दुर्ग में तो इस प्रकार की कोई योजना ही अमल में नहीं आई। अकेले जनवरी में दुर्ग के जिला अस्पताल में 471 मरीजों ने एंटी रैबीज इंजेक्शन लगवाया। निजी अस्पतालों में जाकर इंजेक्शन लगवाने वालों की संख्या इससे अलग है।
दिन-प्रतिदिन गंभीर होती इस समस्या के लिए अब परम्परागत तरीकों मे बदलाव करना बेहद जरूरी हो गया है। सिर्फ नर कुत्तों की नसबंदी करने से ही समस्या का हल नहीं होने वाला। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब आवारा कुत्तों की वास्तविक संख्या का आंकड़ा ही पता नहीं है, तो फिर नसबंदी का लक्ष्य कैसे निर्धारित कर दिया गया। वैसे भी आवारा कुत्तों का कोई क्षेत्राधिकार नहीं होता है। वो एक से दूसरी जगह भी जाते हैं। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के निर्देशों में आवारा कुत्तों से स्थायी छुटकारा पाने का रास्ता दिखाई नहीं देता। ऐसे में दिशा-निर्देश कागजी ज्यादा नजर आते हैं। इनकी पालना ईमानदारी से होगी, इसमें भी संशय है। और अगर किसी तरह से लागू भी किए गए तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह सब करने के बाद कुत्तों के आतंक से मुक्ति मिल जाएगी।
बहरहाल, समस्या कुत्तों की फौज बढऩे के अलावा उनके खूंखार व हिंसक होने की ज्यादा है। शासन के दिशा-निर्देशों में कहीं पर भी यह उल्लेख नहीं है कि ऐसा करने से कुत्ते काटना छोड़ देंगे। नसबंदी कर देने से, मटन-मछली की दुकान कम करने या उनको बंद कर देने से कुत्तों का आतंक खत्म हो जाएगा, यह बेहद हास्यास्पद बात लगती है। ऐसे में समस्या के स्थायी समाधान के लिए ठोस एवं कारगर उपाय खोजने की जरूरत है। अब जरूरी हो गया है कि आवारा पशुओं की तर्ज पर आवारा कुत्तों को पकड़कर उनको एक जगह रखने की व्यवस्था हो। आवारा कुत्तों के साथ पालतू कुत्तों व मादा कुत्तों की नसबंदी भी हो..। अगर यह उपाय जल्द नहीं खोजे गए तो कुत्ते यूं ही काटते रहेंगे। काटना उनकी आदत है।


 भिलाई पत्रिका के  बुधवार 19 फरवरी के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी..।

आठ दिन का सप्ताह


बस यूं ही 

आज सुबह टीवी पर गाना आ रहा था, गीत के बोल थे.. 'फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुस्कान है, रंग तेरा देख के रूप तेरा देख के कुदरत भी हैरान है। वैसे यह गीत कॉलेज के जमाने में कई बार सुना है। उस वक्त यह गीत नया-नया आया था और बार-बार सुनने को मन करता था, लेकिन आज गीत ने सोचने पर मजबूर कर दिया। सोचने की सबसे बड़ी वजह थी युवा पीढ़ी का प्रमुख त्योहार वेलेंटाइन डे। हमारे देश के बड़े एवं चुनिंदा शहरों में ही कभी इसकी शुरूआत हुई थी। प्रेमी युगल डरे सहमे एवं छिप-छिपकर पाश्चात्य संस्कृति से रचे-बसे इस त्योहारों को मनाते थे। इसके बाद तो जो हुआ बस पूछिए मत..। नकल करने में माहिर देशवासियों ने इस त्योहार को हाथो हाथ लेकर इसकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए। रफ्ता-रफ्ता इसे वेलेंटाइन सप्ताह का रूप दे दिया गया। हर दिन एक अलग-अलग गतिविधि। मतलब एक ही सप्ताह में प्रेम का अंकुरण प्रस्फुटित होने से लेकर प्रेम के पेड़ बनने तक की कहानी पूर्ण हो जाती है। यह बात दीगर है कि इस वेलेंटाइन सप्ताह में सात की बजाय आठ दिन होते हैं। यकीन ना आए तो गिनती कर लीजिए..। शुक्रवार को इस सप्ताह का पहला दिन था और आठवें दिन वेलेंटाइन डे है। खैर, प्रेम एवं युद्ध में सब जायज है, इस कारण सप्ताह में सात की बजाय आठ दिन भी हो सकते हैं। सप्ताह के पहले दिन को नाम दिया गया रोज डे..। यानि की प्रेम की राह पर बढऩे या चलने की शुरुआत करने वाले इस दिन एक दूसरे को गुलाब का फूल देते हैं। मुझे गीत के बोल फिर याद रहे थे.. मैं सोच में डूबा था कि जब चेहरा ही फूलों जैसा है तो फिर उसे अलग से फूल देने की जरूरत ही कहां रह जाती है। बात फूलों की चली तो फिर फूलों से वाबस्ता कई तराने जेहन में घूम गए। ए गुलबदन, फूलों की महक कांटों की चुभन, तुम्हे देख के कहता है मेरा दिल कहीं आज महोब्बत ना हो जाए..। ऐ फूलों की रानी, बहारों की मल्लिका, तेरा मुस्कुराना गजब हो गया.. ना दिल होश में हैं ना हम होश में नजर का मिलाना गजब हो गया। वैसे, जहां चेहरे ही फूलों जैसे हों, वहां अलग से फूल देना या देने की बात करने का कोई मतलब नहीं होता है। हां, इतना जरूर है कि साल भर ग्राहकों के इंतजार में हाथ पर हाथ धरकर बैठने वाले फूल विक्रेताओं के लिए रोज डे व्यस्तता भरा रहता है। वे युगलों की शक्ल एवं हैसियत देखकर मुंहमांगी कीमत जो वसूलते हैं। इसके अलावा करें भी क्या.? कल गुलाब के फूल को पूछेगा भी कौन..। बात फूलों से आगे जो बढ़ जाएगी। अरे भई प्रपोज डे जो आ जाएगा। प्रपोज बोले तो प्रेम के इजहार करने का दिन। इसके बाद तो कभी चाकलेट डे, कभी टेडी डे, कभी प्रोमिस डे तो कभी कुछ और इन सबके बाद वेलेंटाइन डे आता है। इन सात आठ दिन में इजहार, वादा सब कुछ हो जाता है।
मैं ख्यालों में अभी खोया ही था कि दूसरा गीत बजने लगा.. 'प्यार किया नहीं जाता.. हो जाता है, दिल दिया नहीं जाता.. खो जाता है। वेलेंटाइन सप्ताह में गीत के बोल मुझे बेमानी से लग रहे थे। क्योंकि मौजूदा दौर में वेलेंटाइन सप्ताह में किस दिन क्या करना है, यह सब मुकर्रर है। ऐसे में इस सप्ताह के अलावा प्यार करने और दिल खोने की तो वैसे भी कल्पना नहीं जा सकती।

काश, बयान का समर्थन होता...!!!


बस यूं ही 

गरीब की कोई जाति नहीं होती है। और हमारे देश में शायद ही ऐसी कोई जाति होगी, जिसमें गरीब नहीं हैं। कहने का आशय यह है कि हर जाति में गरीब व अमीर मिल जाएंगे। हां, इतना जरूर है कि गरीब-अमीर का प्रतिशत कुछ ऊपर-नीचे जरूर हो सकता है, लेकिन मिलेंगे सब जातियों में। इसके बावजूद हमारे देश की सियासत आजादी के समय से ही गरीबी का आधार जाति को मानती रही है, ताकि वोट बैंक सुरक्षित रहे। समय-समय पर आरक्षण विधेयकों में बहुत संशोधन किए गए। प्रतिशत घटाने-बढ़ाने का अंकगणित भी खूब चला लेकिन केन्द्र बिन्दु में जाति ही रही। जिस जाति का ज्यादा वोट बैंक उसको आरक्षण देने में या उनका कोटा बढ़ाने में प्राथमिकता बरती गई। और इसी आधार पर आरक्षण का लाभ भी दे दिया। वोट बैंक खिसकने एवं जनाधार कम होने के डर से किसी ने भी सच जानने के बावजूद आरक्षण के खिलाफ बोलने का साहस नहीं किया। विशेषकर, चुनाव के आसपास आरक्षण को लेकर राजनीतिक शिगूफे प्रायोजित तरीके से छोड़े जाते हैं, ताकि मतदाताओं की भावनाओं का भरपूर दोहन कर लाभ उठाया जा सके। कुछ इसी तरह का शिगूफा हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने छेड़ा है। जाति आधारित आरक्षण खत्म करने की वकालत करते हुए द्विवेदी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से आग्रह किया है कि वे इस मामले में पहल करें। द्विवेदी यहीं नहीं रुके, साहसिक अंदाज में उन्होंने यह तक कह दिया कि .. सामाजिक न्याय की अवधारणा आजकल जातिवाद में बदल गई है। इसे खत्म करने की जरूरत है।
कांग्रेस नेता द्विवेदी के इस ऐतिहासिक बयान के कई मायने हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि साठ के दशक से राजनीति करते आ रहे द्विवेदी का यह नया बयान राजनीति से प्रेरित नहीं है। लेकिन सबसे यक्ष सवाल यही है कि आजादी से लेकर अब सर्वाधिक सत्ता में रही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता को यह नेक और सद्विचार इतने लम्बे समय के बाद क्यों आया? दरअसल, मौजूदा दौर में चुनावी रण में इतने दल हो गए हैं कि अब चुनाव जीतना आसान काम नहीं है। जिस आरक्षण के नाम पर राजनीतिक दल और उनके नुमाइंदे चुनावी वैतरणी पार करते थे, उस पर अब कई दल सवार हैं। जातियों के भी कई पैरोकार पैदा हो गए हैं। ऐसे में आरक्षण देने का श्रेय कई दलों में बंट गया है। आरक्षण का अब उम्मीदानुसार फायदा किसी दल को नहीं मिल पा रहा है। इसलिए आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित करना कांग्रेस नेता की एक तरह से देखा जाए तो मजबूरी भी है। द्विवेदी को उम्मीद है कि अगर कांग्रेस ऐसा करने में कामयाब रही तो आरक्षण से वंचित तबका उसके खेमे आ सकता है। और इसी मसले के सहारे के कांग्रेस फिर सत्ता में वापसी कर सकती है।
बहरहाल, देश में जाति आधारित आरक्षण की बुनियाद रखने में कांग्रेस का ही प्रमुख योगदान था। उस वक्त आरक्षण का मुख्य उद्देश्य दबे, कुचले एवं पिछड़े लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोडऩा था। यह बात राजनीतिज्ञों को बहुत जल्दी समझ में आ गई थी कि जिन उद्देश्यों से आरक्षण की परिकल्पना कर इसे लागू किया गया था, वह उन उद्देश्यों पर खरा नहीं उतर रहा है। चंद लोग ही इसका फायदा उठा रहे हैं। दबा कुचला वर्ग मुख्यधारा से नहीं जुड़ पा रहा, आदि-आदि। यह कड़वा सच जानने के बाद कमोबेश सभी राजनीतिक दल इसको नजरअंदाज करते रहे, क्योंकि यह ऐसा मसला था, जिसका विरोध करने का मतलब सीधे-सीधे आरक्षण से लाभान्वित तबके को नाराज करना था। ऐसे में गरीबी के आधार पर आरक्षण के बात दरकिनार की जाती रही। आजादी के 67 साल बाद अब कांग्रेस नेता द्विवेदी को लग रहा है कि आरक्षण का आधार जाति ना होकर गरीबी ही होना चाहिए था। वैसे द्विवेदी भले ही गरीबी के आधार पर आरक्षण की पैरवी कर इसमें अपना नफा-नुकसान तलाशे लेकिन यह सुझाव बुरा नहीं है। सभी दलों को राजनीतिक चश्मे से इतर इस मसले पर गंभीरता दिखानी चाहिए ताकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को सही मायनों में जिंदा रखा जा सके। वैसे इस मसले पर अगर सभी राजनीतिक दल सहमत होते हैं तो यह देर से ही लेकिन एक कालजयी फैसला होगा, जिसके कई तरह के दूरगामी फायदे होंगे।
वैसे बयान को लेकर कांग्रेस ने खंडन जारी कर दिया है। पार्टी का कहना है कि यह जनार्दन द्विवेदी के निजी विचार हैं, पार्टी का इससे कोई सरोकार नहीं है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी द्विवेदी के बयान से खुद को अलग करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा से ही आरक्षण का समर्थन करती आई है और इसे लेकर उसकी नीतियां जगजाहिर हैं। काश, द्विवेदी के बयान का पार्टी समर्थन करती। सुझाव पर अमलकरने का साहस दिखाती लेकिन ऐसा हो न सका। इस सारे घटनाक्रम से यह बात तो सामने आती है कि नेताओं को हकीकत तो पता है लेकिन जानबूझकर वो अपने लब सीलकर रखते हैं। द्विवेदी ने लब खोलने की हिम्मत दिखाई लेकिन पार्टी ने पल्ला झाड़ लिया।

खुशियां मनाओ, झूमो और गाओ.!


बस यूं ही

यह हम सब के लिए खुशी का दिन है। जश्न मनाने का दिन है। ढोल बजाकर नाचने और झूमने का दिन है। मिठाई बांटकर खुशी का इजहार करने का दिन है। एक दूसरे के गले मिलकर बधाई देने का दिन है। यकीन कीजिए यह बहुत बड़ा दिन है। देश के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि वाला दिन है। देश की गंभीर एवं विकट समस्या को हल करने का रास्ता खोजने का दिन है। ऐतिहासिक, अविस्मरणीय व अविश्वसनीय दिन है। यह जागती आंखों से सपने देखने का दिन है। यह एक तरह का कमाल है, एक तरह का प्रयोग है, जो हाल में खोजा गया है, हालांकि शुरुआत तो दो तीन साल पहले ही हो गई थी लेकिन सफलता की कसौटी पर खरा यह अब जाकर उतरा है। अब, दिमाग के घोड़े मत दौडा़ओ...।
दरअसल, खुशी इस बात की है कि हमारे देश से गरीबी खत्म हो रही है। इतनी तेज रफ्तार से गरीबी उन्मूलन हो रहा है कि दुनिया की तमाम तरह की रफ्तारें इस रफ्तार के आगे पानी भर रही हैं। आजादी से लेकर बड़े-बड़े धुरंधर जो काम नहीं कर पाए वो काम अब क्रिकेट के ट्वंटी-ट्वंटी मैच की तर्ज पर हो रहा है। वैसे गरीबी ने कई लोगों का भविष्य बनाया। उनकी जिंदगी संवार दी। गरीबी हटाओ के नारे से न जाने कितनी ही नेताओ की डूबती नैया पार लगी। न जाने कितनों ने ही इसके सहारे सफलता की सीढ़ी चढ़कर सत्ता का सुख भोगा। गरीबी मिटाने के नाम पर न जाने कितनों ने अपनी जेबें भरी। खूब माल बटोरा। इतने करने के बाद भी गरीबी कम नहीं हुई है। जनसंख्या बढऩे के साथ गरीबी भी बढ़ती गई। शायद इसीलिए भी कि अगर गरीबी खत्म कर दी गई तो कोई बड़ा मुद्दा बचेगा ही नहीं। खैर, हमारे नेताओं को अब सदबुद्धि आ गई है। लगता है उन्होंने यह मुद्दा खत्म करने का मानस बना ही लिया है। नेताओं को लगने लगा है कि अब जनता जाग गई है। गरीबी के नाम पर ज्यादा दिन तक उसको बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है, इसलिए गरीबी का खात्मा जरूरी हो गया है।
जमाना हाइटेक है, सूचना एवं प्रौद्योगिकी का है, लिहाजा गरीबी उन्मूलन भी उसी तर्ज पर हो रहा है। वैसे बचपन में एक कहावत सुनी थी कि बड़ी लकीर को अगर छोटा करना है तो उसके पास उससे भी बड़ी एक लकीर खींच दो.. पहले वाली लकीर अपने आप छोटी हो जाएगी। देश से गरीबी भी कुछ इसी अंदाज में खत्म की जा रही है। नेताओं ने गरीबी का पैमाना ही बदल दिया है। इससे गरीब अपने आप ही कम हो रहे हैं। अब देखिए ना सन 2011 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा था कि प्रतिदिन 32 रुपए कमाने वाला शहरी और 23 रुपए कमाने वाला ग्रामीण गरीब नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि उस वक्त इस बात का विरोध करने वाली भाजपा ने भी अब कमोबेश वैसा ही रास्ता अख्तियार कर लिया है। गुजरात सरकार ने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग को हाल ही में जारी किए गए एक पत्र में कहा है कि हर माह 324 रुपए कमाने वाले ग्रामीण और 501 रुपए कमाने वाले शहरी को गरीबी रेखा से ऊपर रखा जा सकता है। पिछले माह जारी किए गए इस पत्र के मुताबिक ग्रामीण की रोज की आय 11 रुपए और शहरी व्यक्ति की प्रतिदिन आय 17के करीब रुपए होती है।
अब, नए तरीके से देश से गरीबी खत्म हो रही है तो कई तरह की प्रतिक्रियाएं भी आना लाजिमी है। इसलिए जो गरीबी हटाने के समर्थन में हैं वे चुप रहे। और जिनको हमारे नेताओं का यह तरीका नागवार गुजरा हो तो कृपा करके वे इससे बेहतर कोई दूसरा नायाब तरीका बताएंगे तो मेहरबानी होगी। वरना, आप भी गरीबी कम होने का जश्न मनाओ।

बेचारा, गली का कुत्ता!


बस यूं ही

सुबह आंखें कुछ देरी से खुली थी। नित्यकृमों से निवृत्त होने के बाद तत्काल कार्यालय के तरफ दौड़ पड़ा। घर से निकला उस वक्त दस बजकर दस मिनट हो चुके थे। मैं लगभग दौडऩे वाले अंदाज में लम्बे कदम भरते हुए कार्यालय के तरफ चला जा रहा था। रास्ते में अचानक पांच छह कुत्तों का झुण्ड मेरे सामने आ गया। मैंने देखा कि उन कुत्तों के बीच मेरी गली का कुत्ता फंसा हुआ था। उसका अंदाज तो बिलकुल बदला हुआ था। हो भी, कैसे नहीं, बेचारा भूले-भटके दूसरी गली में जो आ गया था। उसकी दुम दोनों टांगों के बीच दबी हुई थी। बिलकुल यू टर्न वाले अंदाज में। उसके भौंकने की आवाज तो बिलकुल बदली हुई थी। भौंक नहीं रहा बल्कि इस अंदाज में रिरिया रहा था, गिड़गिड़ा था, जैसे कह रहा हो कि.. भइया गलती हो गई, आइंदा ऐसी गुस्ताखी नहीं होगी। इस बार के लिए कृपया माफ कर दो, आदि- आदि। लेकिन वो बाहर वाले कुत्ते तो जैसे मौका ही तलाश रहे थे। वे गली के कुत्ते को छोडऩे के मूड में कतई नहीं थे। उनकी लाल-लाल आंखों से गुस्सा साफ जाहिर हो रहा था। मेरी गली वाला कुत्ता बचाव की मुद्रा में हल्के से गुर्राता.. दांत दिखाता और कदम वापस खींचने के जतन कर रहा था। वह और कर भी क्या सकता था। माहौल अनुकूल न होने के कारण उसका कोई जोर भी तो नहीं चल रहा था। बिलकुल निरीह और बेचारा बना हुआ था। लेकिन दूसरे कुत्ते तो जैसे मौके की ताक में ही थे। वे गुस्से में गुर्रा रहे थे, दांत दिखा रहे थे, जैसे कह रहे हों, अरे वाह, कल तो अपनी गली में शेर बना हुआ था। कैसे भौंक रहा था। छोटे से लेकर बड़े कुत्तों तक से पंगा ले रहा था, बड़ी दिलेरी के साथ। पता नहीं अपनी गली में इतनी हिम्मत कहां से आ गई थी। किसी को भी नहीं बख्शा था। तभी तो आसपास के मोहल्लों में नम्बर वन होने का तमगा हासिल कर लिया।
बाहरी कुत्तों का गुस्सा देखकर मैं तनिक सा घबराया कि कहीं गली का समझकर ये मेरे को ना घेर लें। इसलिए मैं चुपचाप अजनबी ही बना रहा। गली के कुत्ते के गले में पट्टा देखकर अचानक सारे कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे, मानो वह मेरी गली के कुत्ते पर अट्टाहास कर रहे हों। मजाक में ठहाके लगा रहे हों। मैंने वहां ज्यादा देर रुकना उचित नहीं समझा और कुत्तों से बचते हुए तत्काल कार्यालय की तरफ बढ़ गया।
कार्यालय में सुबह की मीटिंग निबटा कर घर पहुंचा उस वक्त दोपहर के साढ़े बारह बज चुके थे। सुबह जल्दबाजी में क्रिकेट मैच को भी भूल गया था। घर आते ही टीवी ऑन किया। वैसे मैच केवल इसीलिए देख रहा था कि शायद अंतिम वन डे जीतकर हमारे खिलाड़ी बची-खुची लाज तो बचा लें.. लेकिन ऐसा नहीं हो सका। हमारे धुरधंरों ने बड़ी आसानी से आत्समर्पण कर दिया। बड़ी शर्मनाक हार हो चुकी थी। टीवी से तत्काल मैच हटाकर समाचार चैनलों की तरफ बढ़ा तो उन पर भी भारतीय टीम की हार छाई हुई थी। मैंने टीवी बंद किया तो जेहन में सुबह का दृश्य फिर जीवंत हो उठा.. बेचारा गली का कुत्ता। अपनी गली में तो शेर था लेकिन आज उसकी उन बाहरी कुत्तों ने क्या गत बनाई। निरीह बनकर कैसे दुम दबाकर खड़ा था उस वक्त। ।
कमरे से उठकर मैं बाहर आया और छत्त से नीचे झांका तो बेचारा पेड़ की छांव में अपनी जीभ से जख्मों को चाटने में जुटा था, बीच-बीच में कराह भी रहा था। उसके आसपास कुछ युवक खड़े थे जो कुत्ते के गले से नम्बर वन लिखा पट्टा गायब होने पर चिंतातुर थे। 

Friday, January 31, 2014

स्थायी सुध लो तो बात बने


(दुर्ग रेलवे स्टेशन की व्यथा) 

 
चौंकिए, मत मैं आपका वही कथित 'मॉडल रेलवे स्टेशन' दुर्ग ही हूं। यह तो जीएम साहब का दौरा होने वाला है, इसलिए रंगरोगन करके मेरी सूरत सुधार दी गई है, वरना आप लोगों से हकीकत छिपी हुई थोड़े ही है। दौरे के कारण पखवाड़ेभर से अधिकारियों की यहां आवाजाही भी बढ़ी है। कभी रायपुर से कोई आ रहा है तो कोई कभी बिलासपुर से। जीएम साहब को स्टेशन चकाचक दिखना चाहिए, इसके लिए सबने दिन रात एक कर रखा है। चर्चा तो यहां तक है कि साहब के संभावित सवालों के जवाब तक पहले से ही तैयार कर लिए गए हैं। समस्याओं व अधूरे निर्माण कार्यों पर पर्दा डालने की भी भरपूर कोशिश कर ली गई है। प्रयास तो यहां तक किए जा रहे हैं कि साहब केवल वो ही जगह देखें, जिसको मातहत दिखाना चाह रहे हैं। कछुआ गति से हो रहे कुछेक काम तो आनन-फानन में युद्ध स्तर पर निपटाए गए हैं। रेलवे अधिकारियों की इतनी तत्परता देखकर मैं सोच में डूब गया हूं। काश, इतनी तत्परता या जल्दबाजी ये लोग पहले दिखाते तो इस प्रकार की नौबत ही नहीं आती। निर्माण कार्य कैसे एवं किस गति से हो रहे हैं, यह देखने की किसी को फुर्सत ही नहीं थी। जो भी अधिकारी इन कार्यों का निरीक्षण करने आते रहे हैं, उन्होंने मुंह दिखाई की औपचारिता ही ज्यादा निभाई।
अब जीएम साहब के दौरा करने से कौन से यहां के दिन फिर जाएंगे। यह सारी चिंता और दौड़-धूप केवल उनके दौरे तक ही सीमित है। देख लेना, जैसे ही उनका कार्यक्रम निपटेगा अधिकारी अपने-अपने काम में लग जाएंगे। ऐसा पहले भी हो चुका है। एक दो बार नहीं कई बार। मैंने तो कई अधिकारियों के दौरे देखें हैं। वैसे जीएम साहब का दौरा किसी नेता की सभा से कम नहीं है। आलम यह है कि तैयारियों पर ही काफी पैसा एवं वक्त जाया किया जा चुका है। गुस्ताखी माफ हो जीएम साहब, आपको मातहत कर्मचारियों की शक्ल ही देखनी है तो वह आप कभी भी देख सकते हैं। आपके ही स्टाफ के लोग हैं। आपको अगर दौरा ही करना था तो फिर इसकी सूचना क्यों? क्या बिना सूचना के यह सब संभव नहीं था? आप बिना घोषणा के आकस्मिक दौरा करते तो वह सब देख पाते जो अब शायद ही दिखाई दे।
वैसे दुर्ग-भिलाई के साथ रेलवे का दोयम व्यवहार किसी से छिपा नहीं है। रेलवे विभाग मेरे को मॉडल रेलवे स्टेशन कहता है, लेकिन बाहर से आने वाले यात्री मेरी खिल्ली उड़ाते हैं। रेलवे व देश की प्रगति में दुर्ग-भिलाई का योगदान कौन नहीं जानता,फिर भी पता नहीं क्यों रेलवे की इधर नजर ही नहीं है। अब देखिए भला, आपने मेरे को मॉडल स्टेशन तो कह दिया (बनाया नहीं है) लेकिन कुछ एक्सप्रेस ट्रेनों का तो यहां ठहराव तक नहीं है। सुविधाओं में विस्तार करना तो दूर की बात है। यह तो सरासर नाइंसाफी है। बेचारे लोग कहां जाएं, किसको कहें। यहां के जनप्रतिनिधि भी तो पत्र लिखकर औपचारिता निभा लेते हैं।
जीएम साहब, आपके दौरे की सार्थकता तभी है, जब अधूरे निर्माण कार्य तत्काल पूरे हों। यहां पर व्याप्त समस्याओं का अविलम्ब निराकरण हो तथा मॉडल स्टेशन पर मिलने वाली तमाम सुविधाओं में विस्तार हो। क्योंकि दौरे करने, मातहत कर्मचारियों को दिशा-निर्देश देने या उनको घुड़की पिलाने से अब बात बनेगी नहीं। यह सिलसिला अब लम्बा हो गया है। मेरी अब स्थायी सुध लेने की जरूरत है। अब और देरी ठीक नहीं है। आपका दौरा सामान्य न होकर यादगार बने इसके लिए कुछ पहल तो जरूर करते जाइएगा।

भिलाई पत्रिका के शुक्रवार 17 जनवरी के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी..।

Wednesday, January 15, 2014

बदलाव की बयार


टिप्पणी..

यकीनन यह बदलाव की बयार है। अपने हक के लिए उठ खड़े होने की। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की। यह एक शुरुआत है, अपनी बात बुलंद करने की, बुराई के खिलाफ बिगुल बजाने की। वाकई यह एक नई सुबह है, आधी दुनिया के जागने की, होश संभालने की। सचमुच यह एक सुखद पहल है, पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से उबर कर शर्म-शंका का पर्दा उतारने की, घर की दहलीज को लांघकर समाज को नई दिशा देने की। वास्तव में यह नजीर है, एक नए युग से कदमताल करने की। एक छोटी सी, लेकिन कारगर पहल है सोए हुए प्रशासन को जगाने की, उसे हरकत में लाने की। बदलाव का बीड़ा उठाने वाली ये महिलाएं बालोद एवं दुर्ग जिले के छोटे-छोटे गांवों की हैं। इन महिलाओं को इस बात का अहसास भली-भांति हो चुका था कि पुलिस-प्रशासन का मुंह ताकने या उनके यहां बार-बार गुहार लगाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला, क्योंकि ऐसा वे एक बार नहीं बार-बार कर चुकीं, लेकिन सुधार नहीं हुआ और न ही भविष्य में होने की कोई गुंजाइश दिखाई दे रही थी। आखिरकार उन्होंने ऐसा साहसिक एवं ऐतिहासिक कदम उठाया, जो पुलिस एवं प्रशासन को आइना दिखाता है। उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। ग्रामीण महिलाओं की यह पहल समाज को सीख देती है। कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर में घुसपैठ कर चुकी शराब के खिलाफ महिलाओं का आंदोलन इसलिए भी अनूठा है, क्योंकि उन्होंने न केवल थानाप्रभारी से लेकर कलेक्ट्रेट का घेराव तक किया बल्कि खुद ही शराब जब्त करके व्यवस्था पर करारा तमाचा भी जड़ दिया। महिलाओं ने साबित कर दिया है कि अगर ठान लिया जाए तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। एकजुटता से समस्या का सामना किया जाए, उसके खिलाफ आवाज उठाई जाए तो सफलता सुनिश्चित है।
भिलाई से सटे ढौर गांव से अवैध शराब के खिलाफ उठी आवाज अब मुखर हो रही है। रानीतराई के असोगा गांव के बाद बालोद जिले में तो महिलाओं ने कमाल ही कर दिखाया। महिलाओं की छोटी सी मुहिम अब मिसाल बन रही है। निसंदेह इस बदलाव के कालांतर में सुखद परिणाम आएंगे। वैसे भी आधी दुनिया की चुप्पी के चलते ही इस समस्या ने बड़े पैमाने पर पैर पसारे। अब जाग रही हैं तो यकीनन परिणाम प्रेरणादायी एवं सकारात्मक ही होंगे। जरूरत है कि यह उत्साह और जज्बा इसी तरह बना रहे।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-33 

 
खिड़की से हवा के थपेड़ों से हल्की सर्दी का अहसास होने लगा था। पसीने से गीली बनियान अभी सूखी नहीं थी। इस कारण भी सर्दी कुछ ज्यादा लग रही थी। मैंने तत्काल खिड़की गिराई और पुरी व उसके आसपास के क्षेत्रों के प्रसिद्ध स्थानों के बारे में पढऩे लगा। तीन दिन और दो रात पुरी में बिताने के बाद भी काफी कुछ देखने से छूट गया था। पुस्तक पढ़ी तो पता चला। पुरी में भगवान जगन्नाथ के मुख्य मंदिर के अलावा छोटे-बड़े सैकड़ों मंदिर हैं। इनमें एक लोकनाथ का मंदिर है जो पुरी में सबसे प्राचीन है। जिसमें शंकर भगवान श्री लोकनाथ जी के नाम से पूजित है। यह मंदिर श्री मंदिर से तीन किमी दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा में है। हर साल शिव चतुर्दशी को यहां बड़ा मेला लगता है। कहा जाता है कि दशरथ सुत रामच्रद जी ने लंका जाते समय यहां शिव की पूजा की थी। पुरी के मंदिरों की फेहरिस्त वास्तव में बेहद लम्बी है
खैर, ज्यादा मलाल तो भुवनेश्वर के मंदिर ना देख पाने का था। यहां चार-पांच ऐतिहासिक मंदिर हैं तथा नंदन कानन चिडिय़ा घर है। मैं इन सबके के बारे में पढ़ ही रहा था कि पढ़ते-पढते कब आंख लगी पता ही नहीं चला। सुबह देखा तो हम छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश कर चुके थे। बस अब इंतजार था तो बेसब्री से घर पहुंचने का..। आखिरकार ट्रेन भिलाई पहुंची और हम ऑटो करके घर पहुंचे थे। घर आते ही और कुछ नहीं सूझ रहा था सिवाय सोने के। स्मृति में मंदिर, सागर, कोर्णाक, चंद्रभागा की यादें रह-रहकर ताजा हो रही थीं।
बहरहाल, हमारा आनन-फानन में तय हुआ पुरी जाने का कार्यक्रम इतना यादगार एवं ऐतिहासिक होगा सोचा नहीं था। अब तो आलम यह है कि दुबारा कब वक्त मिले और फिर से जाने का कार्यक्रम बनाएं। वाकई पुरी दर्शनीय जगह है। वक्त मिले तो एक बार यहां पर जाकर आना चाहिए। बस थोड़ी सी अक्ल एवं समझदारी से काम लेंगे तो आपको ज्यादा रुपए खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सावधानी और सतर्कता बरतने की भी जरूरत है। वैसे पुरी के दो मिजाज हैं। आधुनिक एवं परम्परावादी। यहां दोनों ही तरह के लोग हैं। आप किनसे प्रभावित हैं और वहां जाकर क्या करते हैं, यह आपके सोच पर निर्भर है। वैसे मैंने शुरू में भी कहा था कि अक्ल बादाम खाने से नहीं भचीड़ खाने से आती है। हमको भी अक्ल आ चुकी है। पुरी के बारे में काफी कुछ जान गया हूं। माहौल, व्यवस्था और लोगों के बारे में। वहां जाने वालों को बता सकता हूं कि आपको क्या करना है क्या नहीं। खैर, अति व्यस्तता के बावजूद देखो ना, प्रभु के आशीर्वाद से पुरी पर काफी कुछ लिख दिया है। अपने लेखन में मैंने भगवान के अस्तित्व पर या उनकी सत्ता पर किंचित मात्र भी अंगुली नहीं उठाई, जो लिखा वह केवल वहां की व्यवस्था पर है। प्रभु जग के नाथ हैं और रहेंगे लेकिन वहां बिचौलियों के कारण वे जग के ना होकर पैसों के नाथ हो गए हैं। अगर ऐसा कहना गलत है तो मैं एक बार फिर प्रभु के चरणों में नतमस्तक होकर क्षमाप्रार्थी हूं। इसी के साथ एक बार फिर मेरे साथ मिलकर जयकारा लगाइए.. बोलिए.. जग के नाथ की... जय, प्रभु जगन्नाथ की जय। ..................इति।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-32 

 
वहीं स्टेशन पर एक गट्टे पर पसर गया। हल्की से झपकी लगी। काफी देर तक हम वहां बैठे रहे। इस बीच कैमरे से पुराने फोटो भी देखते रहे। आखिर चार बजे हम वहां से खड़े होकर लैगेज रूम आए, वहां से सामान लिया और स्टेशन पर ही रुक गए। डिसप्ले बोर्ड पर अभी यह नहीं बताया जा रहा था कि ट्रेन कौनसे प्लेटफार्म पर आएगी। शाम के भोजन के लिए चर्चा के बाद तय हुआ कि यहीं से पैक करवा लेते हैं। रास्ते में ट्रेन में ही भोजन कर लेंगे। इसके बाद गोपाल जी के दोनों बच्चे, उनकी धर्मपत्नी एवं मेरी धर्मपत्नी चारों जने रेलवे की केन्टीन की तरफ चल गए। पीछे मैं दोनों बच्चे एवं गोपाल जी रुक गए। उनको गए हुए करीब आधा घंटा हो गया था। इस बीच प्लेटफार्म नम्बर एवं ट्रेन के नाम की उद्घोषणा हो गई। डिसप्ले बोर्ड पर जानकारी आने लगी थी। घड़ी में 4.40 हो गए थे। ट्रेन छूटने में मात्र 25 मिनट शेष रहे थे लेकिन भोजन लेने गए लोगों का कोई अता-पता नहीं था। गोपाल जी ने कहा, बन्ना जी मैं उनको कैन्टीन की तरफ देखकर आता हूं। वो केन्टीन में गए और थोड़ी देर बाद वहीं से हाथ हिलाया तो मैं भी सोच में डूब गया कि अचानक यह लोग कहां चले गए। गोपाल जी तत्काल स्टेशन से बाहर दौड़े, इधर-उधर नजर मारने के बाद बदहवाश से मेरे पास आए बोले बन्ना जी, पता नहीं कहां चली गई, कहीं पर भी दिखाई नहीं दी। इसके बाद गोपाल जी दो तीन बार केन्टीन तक होकर आए लेकिन कुछ जानकारी नहीं मिल रही थी। मैंने गोपाल जी से कहा कि आज तो ट्रेन छूटना तय है। मात्र 15-20 मिनट की मुश्किल से शेष बचे थे। इसके बाद मैंने गोपाल जी को बच्चों के पास खड़ा किया और केन्टीन के तरफ दौड़ पड़ा। मैंने केन्टीन का कोना-कोना छान मारा लेकिन, वहां कोई हो तो दिखाई दे। इसके बाद मैं केन्टीन से गोपाल जी तरफ हाथ हिलाता हुआ निराश कदमों से आ ही रहा था कि मेरे को चारों लोग स्टेशन परिसर में अंदर प्रवेश करते हुए दिखाई दिए। इसके बाद मैं गुस्से में पूरी आवाज के साथ चिल्लाया। कहने लगा क्या मतलब है, यहां ट्रेन छूटनी वाली है और आप लोगों को परवाह ही नहीं है। इसके बाद गोपाल जी ने भी जोरदार आवाज में डांट लगाई, वे बेहद आग बबूला थे। सचमुच उनका इतना रौद्र रूप पहली बार देखा।
यकीन मानिए, स्टेशन पर उस वक्त सन्नाटा पसरा था। ट्रेन व प्लेटफार्म की घोषणा होने के कारण उससे संबंधित यात्री वहां से रवाना हो गए थे। बाकी बचे यात्री सुस्ता रहे थे। हमारा वार्तालाप सुनकर वे चौंक गए। सब हमको कौतुहल से देख रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी फिल्म का क्लाइमेक्स सीन फिल्माया जा रहा है। वाकई यह हमारी पुरी यात्रा का क्लाइमेक्स ही था। इधर दोनों की धर्मपत्नियां बिलकुल निरूतर थी। तत्काल सबने सामान उठाया और दौड़ पड़े ट्रेन की तरफ, हांफते-हांफते । यहां सुस्ताने का मतलब किसी खतरे से खाली नहीं था। तेज चलने एवं भारी सामान होने के कारण पसीने से लथपथ हो चुका था। ट्रेन में सामान रखा, उस वक्त घड़ी पांच बजकर पांच मिनट दिखा रही थी। थोड़ी ही देर में ट्रेन में चलने लगी। हमने प्रभु जगन्नाथ का जोरदार जयकारा लगाया और अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गए। ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी।... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-31

 
धर्मपत्नी मेरे को कुछ असहज एवं असामान्य सी दिखाई दी। पास आने पर मैंने वजह पूछी तो वह थोड़ी घबराई हुई सी थी। थोड़ा सामान्य होने के बाद कहने लगी... मेरे तो वहम हो गया..। उसने मेरे से हाथ से वह सामग्री वापस ले ली। मैंने कहा पूरी कहानी बताओ, तो कहने लगी कि मंदिर के अंदर एक पण्डे ने हाथ में कुछ सामग्री रखते हुए कहा था कि यह तेरे सुहाग से संबंधित है, तेरा सुहाग बना रहे, ला कुछ दक्षिणा दे दे। धर्मपत्नी ने बताया कि जब उसने पण्डे को दस रुपए देने चाहे तो वह नाराज हो गया और कहने लगा कि दस से बात नहीं बनेगी। धर्मपत्नी जब दस से आगे नहीं बढ़ी तो उसने हाथ में रखी सामग्री वापस ले ली। मैंने धर्मपत्नी को धीरज बंधाया और कहा कि यह सब तुम जैसे धर्मभीरू लोगों को डराकर, भयभीत करके राशि ऐंठने का बहाना है। तुम मस्त रहो, किसी प्रकार की चिंता मत करो। इसके बाद गोपाल जी के बड़े वाले सुपुत्र ने बताया कि अंकल मंदिर में एक पुजारी प्रसाद बांट रहा था। उसने प्रसाद यह सोचकर ले लिया कि किसी ने प्रसाद चढ़ाया है, इसलिए शेष प्रसाद वितरित किया जा रहा है लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं था। बालक ने जैसे ही प्रसाद के लिए हाथ आगे बढ़ाया पुजारी ने प्रसाद का पैकेट हाथ पर रखते हुए उससे पैसे मांग लिए। बालक झट से समझ गया और पैकेट वापस पुजारी को थमा दिया। यहां से निकलने के बाद हमने दो और मंदिर देखे। ऑटो वाला दिलीप कहने लगा.. साहब बहुत देर हो रही है, थोड़ा जल्दी करो.। वह टूटी-फूटी हिन्दी बोल रहा था। बातचीत में वह कुछ खुला तो बिलकुल दार्शनिक वाले अंदाज में कहने लगा, ऊपर वाला देखता है, तभी तो आपसे ज्यादा किराया नहीं लिया है। दूसरे ऑटो वाले आपसे तीन सौ या चार सौ रुपए ले लेते, लेकिन वह ऐसा नहीं करेगा। दिलीप कह रहा था कि उसने अपनी माता का मुंह नहीं देखा, वह जन्म देते ही भगवान को प्यारी हो गई। इसलिए वह वाजिब किराया ही लेता है। आखिरी मंदिर में हम पहुंचे तो वहां से बंगाल की खाड़ी पास ही थी। एक बार फिर हम समुद्र की तरफ दौड़ पड़े। कुछ विदेशी सनबॉथ में व्यस्त थे। हम भी वहां कुछ देर खड़े रहे। कुछ फोटो खींचे। ऑटो वाले को जल्दी थी, इसलिए समुद्र को प्रणाम कर हम वहां से रवाना हुए। ऑटो वाले ने हमको रेलवे स्टेशन छोड़ दिया।
रेलवे स्टेशन परिसर में एक बोर्ड लगा है। उस पर एक तरफ हिन्दी में तो दूसरी तरफ उडिय़ा में लिखा गया है। उस पर लिखा था कि 1939 में गांधी जी पुरी से 29 किमी दूर देलांग आए थे। लेकिन उन्होंने जगन्नाथ मंदिर के दर्शन नहीं किए, क्योंकि यहां हरिजनों का प्रवेश वर्जित था। इतना ही नहीं गांधी जी ने कस्तूरबा गांधी और महादेव देसाई को मंदिर में दर्शन करने पर फटकार भी लगाई थी। मैं सोच में डूबा था कि आखिर यह ऐसी क्या उपलब्धि है, जिसको स्टेशन के सामने टांग कर रखा गया है। खैर, इसके लिए मैंने स्टेशन पर मंदिर कमेटी की और से स्थापित बुक स्टॉल से दो किताबें भी खरीदी लेकिन मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई। उस वक्त दो बजे थे और ट्रेन शाम 5.10 की थी। हम सभी लोग पहले तो बाहर चाय पीकर आए इसके बाद स्टेशन पर आकर बैठ गए। थकान से बदन दोहरा हो रहा था।.... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-30

 
वहीं मंदिर परिसर में एक वृद्ध महिला दिखाई दी, जो बर्तन को धोने में व्यस्त थी। आश्वर्य की बात यह थी कि सारे बर्तन पत्थरों के बने हुए थे।
इसके बाद ऑटो वाला, जिसका नाम दिलीप था, हमको गुंडिचा मंदिर ले गया.. । गुंडिचा मंदिर का दूसरा नाम जनकपुर भी है। यह श्री मंदिर से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर उतर दिशा में है। मंदिर की लम्बाई 430 फीट है और चौड़ाई 320 फीट है। राजा इन्द्रद्युम्न की रानी गुंडिचा के नाम पर इस मंदिर का नाम गुंडिचा रखा गया है। श्री जगन्नाथ महाप्रभु की रथ यात्रा से बाहुड़ा यात्रा (वापसी यात्रा) तक श्री मंदिर को छोड़कर यहां आकर रहते हैं। वैसे इस मंदिर को महावेदी भी कहा जाता है। यह नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि यहां राजा इन्द्रद्युम्न ने वेदी बनाकर अश्वमेध यज्ञ किया था। यहां पांच सौ वर्षों तक आहुति देने के कारण इसे यज्ञ मंडप भी कहते हैं। विग्रहों का मूल जन्म स्थान होने के कारण इसे जनकपुरी या जन्मस्थान भी कहते हैं। बताते हैं कि इस जगह को जनकपुरी इसीलिए भी कहते हैं क्योंकि इस क्षेत्र में राजा जनक ने हल जोतते समय सीता माता को प्राप्त किया था। इसके अलावा इसको नृसिंहक्षेत्र व आड़पमंदिर आदि भी कहा जाता है।
खैर, यहां भी टिकट कटाने के बाद ही अंदर जाने दिया जाता है। हमने चार टिकट खरीदी थी। काउंटर पर टिकट चैक करने वाला युवक अड़ गया, बोला बच्चों का भी टिकट लगता है। मैंने एवं गोपाल जी ने उससे बहस न करते बच्चों एवं धर्मपत्नियों को अंदर भेज दिया। फिर मन में ख्याल आने लगे कि दर्शन के लिए भी टिकट, मंदिर ना हुआ कोई सर्कस या फिल्म हो गई। खैर, अचानक मेरे को शरारत सूझी। मैंने गोपाल जी से कहा कि सामने यह जो बोर्ड टंगा है, इसकी एक फोटो ले लो। गोपाल जी ने जैसे ही क्लिक किया, वह युवक दौड़ कर हमारे पास आया, बोला यहा फोटो खींचना मना है। वैसे टिकट लेकर अंदर जाने वालों को कोई पूछ ही नहीं रहा था लेकिन हमसे वह चिढ़ा हुआ था, लिहाजा फोटो खींचने से मना कर रहा था। बोर्ड पर चार भाषाओं, हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला एवं उडिय़ा में दिशा- निर्देश लिखे थे। हिन्दी में लिखा था कि अंदर क्यामेरा ले जाना मना है लेकिन अंग्रेजी में इसका कहीं पर कोई उल्लेख नहीं था। हमारी बहस इसी बात को लेकर थी..। बहस बढ़ी तो दो युवक और आ गए। वो तीन और हम दो। मैंने उन दोनों से कहा कि आपको बीच में बोलने की जरूरत नहीं है, हमारी बात आपसे नहीं है। तो बोले.. हम सब स्टाफ सदस्य हैं। हमने कहा कि जब कैमरे के संबंध में कुछ लिखा ही नहीं है तो लोग क्यों बेवजह मामले को तूल दे रहे हो। इतने में एक युवक बोला, आपको उडिय़ा आता है क्या? मैंने असहमति में सिर हिलाया तो वह खुशी से उछल पड़ा और कहने लगा. आपको उडिय़ा नहीं आता है और हमको हिन्दी। हमारी उडिय़ा में लिखा है कि कैमरा ले जाना मना है। इस पर मैंने युवक से अंग्रेजी भाषा की तरफ ध्यान दिलाया तो कहने लगा कि हमको और किसी भाषा से मतलब नहीं है। हमको उडिय़ा आता है बस। हमारी युवकों के साथ बहसबाजी जारी थे कि इसी दौरान धर्मपत्नी एवं बच्चे बाहर आते दिखाई दिए। ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-29

 
इस तालाब को उत्कल नरेश भानुदेव जी के मंत्री नरेन्द्र देव ने खुदवाया था। हर साल वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) से लेकर 21 दिन तक इस तालाब पर जगन्नाथ जी का चंदन यात्रा (जल विहार) उत्सव मनाया जाता है।
खैर, ऑटो वाले ने कहा कि जूते-चप्पल व सामान यहीं छोड़ जाओ और आप लोग दर्शन कर आओ। अजनबी आदमी पर यकायक भरोसा नहीं हुआ। तत्काल कैमरा निकाला और ऑटो के नम्बर प्लेट सहित फोटो खींच लिया। इसके बाद हम लोगों तालाब की तरफ बढ़े।
यह बहुत बड़ा तालाब है। लेकिन बदहाल है। पानी का भी लम्बे समय से जमाव होने के कारण उस पर काई जम चुकी है। तालाब के प्रवेश द्वार के बाहर भी एक तरफ कचरे का ढेर लगा था। पानी के अंदर टूटी-फूटी नाव खड़ी थी। पानी के बीचोबीच मंदिर बना हुआ है। वहां तक पहुंचने के लिए पुलनुमा बनाया हुआ है। हम सीढिय़ों से तालाब में उतरे। सीढियां उतरने के बाद सामने एक काउंटर था, जिस पर टिकट मिल रही थी। हम सीधे ही आगे बढ़े तो एक युवक चिल्लाया टिकट ले लो, टिकट, खैर टिकट लेने के बाद हम आगे बढ़े। युवक से पूछा काहे का मंदिर है, तो वह बोला बुआजी का। मैंने जिज्ञावश पूछा यह बुआजी कौन है तो युवक बोला, बुआजी को नहीं जानते.. अरे भैया, कुंती मैया का मंदिर है। वैसे मंदिर ज्यादा बड़ा नहीं है। अंदर घुसे तो वहां मौजूद पुजारी पूछ बैठे.. पूजन करोगे या प्रसाद लोगे। हम ने दर्शन किए और बाहर निकले तो वहीं बगल में दो छोटे-छोटे मंदिर और दिखाई दिए..। एक पर लड्डू गोपाल मंदिर लिखा था जबकि एक अन्य मंदिर था। मैं दर्शन करके टिकट चैक करने वाले युवक के पास आया और नाम पूछा तो उसने अपना नाम जगन्नाथ बताया। मैंने उससे मजाक में कहा कि पुरी में इतने मंदिर हैं.. ऐसे में यहां शायद ही कोई बेरोजगार होगा। भगवान के नाम पर कितने को रोजगार मिला हुआ है यहां। वह युवक मेरा बातें सुनकर मुस्कुराने लगा। पास से गुजर रहे एक सज्जन ने हमारा वार्तालाप सुन लिया.. बोले, पुरी के पण्डे आपको दूसरी जगह काम करते दिखाई नहीं देंगे.. क्योंकि प्रभु की कृपा से उनको पुरी में ही रोजगार मिला हुआ है।
यहां से हमको ऑटोवाला एक आश्रम की तरफ ले गया। उस पर लिखा था क्षीमंदिर। बेहद की शांत वातावरण था। मंदिर की शीतल छांव में थोड़ी देर बैठकर हम लोगों ने आराम किया। वहीं एक युगल बैठा था। दुनिया से बेखबर भविष्य की सपने बुनने में। मंदिर के शांत माहौल को बच्चों की मस्ती ने भंग कर रही थी। मंदिर में साफ शब्दों में लिखा था, यहां फोटो खींचना मना है। मंदिर के आगे ही एक पार्क था। काफी पेड़-पौधे लगे थे। यहां का नैसर्गिंक माहौल इतना अच्छा लगा कि बस यहीं पर सो जाए लेकिन अभी यात्रा जारी थी। यहां से सामने ही दूसरे मंदिर में गए। वहां समाधि बनी थी। यहां भी फोटोग्राफी वर्जित थी। बच्चों का शोर सुनकर एक वृद्ध संत अंदर से निकले और बच्चों को चुप रहने की नसीहत देने लगे। । दरअसल, उनको इस बात का अंदेशा था कि बच्चे कहीं अपनी मस्ती में समाधि स्थल तक ना चले जाएं। खैर, हमने समाधि के दर्शन किए। . ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-28

 
सुबह के 11 बजे का समय होगा लेकिन मंदिर की कहीं परछाई दिखाई नहीं दी, तो जेहन में वह आठ आश्चर्य वाली याद फिर जिंदा हो गई। मंदिर के शिखर पर लगी ध्वजा भी उसी दिशा में उड़ रही थी, जैसी पहले दिन देखी थी। शिखर पर लगे चक्र को भी बड़ी तल्लीनता, गंभीरता एवं गौर के साथ देखा.. वाकई उसको किधर से भी देखो वह सीधा ही दिखता है। वैसे मंदिर बहुत ही भव्य एवं विशाल है। श्री मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में गंग वंश के प्रतापी राजा अनंगभीम देव के द्वारा हुआ था। लभग 800 साल पुराना यह मंदिर कलिंग स्थापत्य कला और शिल्पकला का बेजोड़ उदाहरण है। मंदिर के पत्थरों पर की गई नक्काशी का तो कहना ही क्या..। इसकी ऊंचाई 214 फीट और इसका आकार पंचरथ जैसे है। इस मंदिर के चारों तरफ दीवारें हैं, जिसे मेघनाद प्राचीर कहते हैं। इसकी लम्बाई 660 फीट और ऊंचाई 20 फीट है। मंदिर के चार भाग हैं, विमान, जगमोहन, नाट्यमण्डप और भोगमण्डप। श्रीमंदिर में मुख्यत: तीन विग्रह हैं। बाएं से श्री बलभद्र जी, बीच में सुभद्रा मैया और दाहिनी ओर श्री जगन्नाथ जी। ये विग्रह नीम की लकड़ी के बने हैं। स्थानीय भाषा में लकड़ी को दारु कहते हैं। जिस साल मलमास या दो आषाद आते हैं, उसी साल नवकलेवर होता है। नवकलेवर का मतलब नए विग्रह बनाने से है। यह नवकलेवर 12 साल में अंतराल में होता है। वैसे पुरी की रथयात्रा विश्वभर में प्रसिद्ध है। जगन्नाथ की सारी यात्राओं में से रथयात्रा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यह यात्रा आषाढ शुक्ल द्वितीय तिथि पर होती है। जगन्नाथ जी, बड़े भाई बलभ्रद जी, बहन सुभद्रा देवी के साथ सुसज्जित तीन रथों में बैठकर यात्रा श्री गुडिंचा मंदिर को जाती हैं। जगन्नाथ जी के रथ को नंदिघोष, बलभद्र जी के रथ को तालध्वज और सुभद्रा जी के रथ देवदलन कहा जाता है।
इसके अलावा मंदिर की रसोई भी भारत में काफी चर्चित है। रसोई आकर्षण केन्द्र इसीलिए भी क्योंकि इसमें बड़े पैमाने पर प्रसाद तैयार होता है। इस महाप्रसाद को तैयार करने में पांच सौ रसोइयों एवं तीन सौ सहायकों को जुटना पड़ता है।
हम मंदिर से बाहर निकले तो तीन-चार विदेशियों की टोली भगवा कपड़े पहने..हरे रामा हरे कृष्णा गाने में मगन थी। कोई हारमोनियम बजा रहा था तो कोई ढोलक पर थाप लगा रहा था। यह लोग मंदिर के आगे के मुख्य मार्ग पर प्रभु की आराधना कर रहे थे। लगा ही नहीं कि ये कोई विदेशी हैं। हम काफी देर तक उनको देखते रहे। गोपाल जी ने उनकी एक फोटो भी खींच ली। इसके बाद हम एक नारियल वाले के यहां रुके। सबने पानी पीया और इसके बाद एक ऑटो वाले के पास पहुंचे। उससे हमने पुरी के प्रमुख मंदिर दिखाने की बात की तो उसने ऑटो किराया 250 रुपए मांगे। हम तैयार हो गए। क्योंकि हमारी ट्रेन शाम को थी। बाकी बचे समय का हम सदुपयोग करना चाहते थे। ऑटो में सवार होकर हम पुरी भ्रमण पर निकल पड़े। सबसे पहले ऑटो वाला हमको नरेन्द्र तालाब लेकर पहुंचा। इसको चंदन तालाब भी कहते हैं। इस तालाब की लम्बाई 873 फीट और चौड़ाई 834 फीट है। ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-27

 
तभी तो सड़क पर जगह-जगह पान की पीक थूकी हुई थी। एक तरह सड़क लाल हो रखी थी। ऐसे में हमको कदम बचा-बचाकर रखने पड़ रहे थे। मंदिर के आगे पहुंचकर जूते जमा करवाए और पानी के बीच से होकर मंदिर में प्रवेश किया। मोबाइल इस बार पर्स में रखे लेकिन सुरक्षाकर्मी ने जांच के नाम पर पकड़ लिया। पहले बच्चों की जेब में डाल रहे थे। ऐसा कर लेते तो शायद कोई चैक नहीं करता है। खैर, दुकान पर फिर वापस आए और मोबाइल जमा करवाने के बाद प्रवेश किया। इस बार भी हम लोगों ने मंदिर के बायीं ओर से प्रवेश किया। मंदिर परिसर के अंदर मुख्य मंदिर के अलावा छोटे-छोटे कई मंदिर हैं और उन सब में पण्डे बैठे थे। इन छोटे मंदिरों के बाहर भी पण्डे मंडरा रहे थे। जिज्ञासावश कोई इन छोटे मंदिरों को देखने के लिए रुका तो झट से पण्डा दौड़ कर आपके पास आएगा, कहेगा दर्शन करो.. दर्शन करो..। हम तो सब को अनसुना करते हुए आगे बढ़ रहे थे। एक पूरा चक्कर लगाने के बाद हम मंदिर के दाहिनी तरफ आए। लम्बी लाइन लगी थी। लोग इतने सट के खड़े थे कि तिल भी डालो तो नीचे नहीं गिरे। लाइन के लिए वर्गीकरण नहीं किया गया था। मतलब महिला, पुरुष, बच्चे-बुजुर्ग सभी एक लाइन में लगे थे। इनके लिए अलग लाइन के लिए व्यवस्था करे भी तो कौन? सभी निशुल्क प्रवेश वाले जो होते हैं। इसलिए भीड़ में धक्के खाने की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी। भीड़ को देखकर धर्मपत्नी का धैर्य जवाब दे गया था। बोली मैं तो बच्चों को लेकर बाहर ही बैठी हूं, आप दर्शन कर आओ। खैर, हम लाइन में लगे। करीब बीस मिनट तक धकमपेल चलती रही और हम आगे बढ़ते रहे। आखिरकार हम मंदिर में प्रवेश कर गए। मैं और गोपाल जी एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे, मानों हमने कोई तीर मार लिया हो। अंदर फिर एक लाइन थी। जगन्नाथ प्रभु को थोड़ा और नजदीक से देखने की। हमको तो वहीं से दर्शन हो गए। वहां भी एक पण्डे ने आकर आग्रह किया। बोला, एकदम नजदीक से दर्शन करा दूंगा, केवल बीस रुपए लूंगा। हम चुप्प थे। हमारा मूड भांपकर वह मुंह बनाता हुआ वहां से चला गया। दर्शन कर हम वापस लौटे तो मंदिर के दीवार पर पान की पीक थूकी हुई दिखाई दी।
बहुत बुरा लगा यह देखकर. मन ही मन बुदबुदाया, हे प्रभु तेरे ये भक्त कितने नासमझ हैं, जो ऐसा करते हैं। हम बाहर निकले तो एक पण्डा मोबाइल पर बतियाता हुआ दिखाई दिया। मन में फिर वही भाव आया.। भक्तों में भेदभाव का। आम आदमी के लिए मोबाइल की अनुमति नहीं है, लेकिन पण्डे ऐसा कर सकते हैं। मन में फिर सवालों का सैलाब उडऩा स्वाभाविक था। मन ही मन कहने लगा, प्रभु यह सब करने के लिए आपने तो नहीं होगा। यह व्यवस्था, यह छूट का प्रावधान किसने बनाया। ऐसा करो, ऐसा मत करो.. ऐसा तो आप नहीं कह सकते प्रभु। सवालों का मेरे पास कोई हल नहीं था। वे अबूझ पहेली हैं। मेरी लिए नहीं, उन सबके लिए जिनको यह व्यवस्था अखरती है। वैसे मंदिर की शिल्पकला कमाल की है। ऐसे में कोणार्क मंदिर की याद फिर याद गई। ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-26

 
मौसम वाकई सर्द था, ऐसे में मेरी हिम्मत पानी में घुसने की नहीं हो रही थी। वैसे मेरे को फोटोग्राफी करने में ही आनंद आ रहा था। सूर्योदय होने ही वाला था, लेकिन इससे पहले ही बीच पर चहल-पहल बढ़ गई थी। हल्की सी कंपकंपी छूटने लगी थी। कभी कैमरे को जेब में डालकर दोनों हाथों को परस्पर रगडऩे का उपक्रम करता तो कभी तेजी से चहलकदमी। वैसे इतनी भी सर्दी नहीं थी कि सहन नहीं की जाए चूंकि मैं पानी में नहीं था, नहीं तो सर्दी नहीं लगती। बच्चे मस्ती करने में मशगूल थे। बादलों के बीच सूर्यदेव हल्के से झांके तो मैंने नजारा कैमरे में कैद कर लिया। वाकई समुद्र के किनारे सूर्योदय का नजारा बड़ा ही मनोहारी होता है। बच्चे और खेलना चाह रहे थे लेकिन वक्त इजाजत नहीं दे रहा था। मैंने जोर से आवाज लगाई तो छोटा बेटा एकलव्य बाहर आया। बाहर आते ही वह कांपने लगा था। वैसे नहाते-नहाते उसके होठ नीले हो चुके थे लेकिन वह लोभ संवरण नहीं कर पा रहा था और सर्दी को बर्दाश्त करते हुए नहा रहा था। खैर, बाहर आते ही उसको गर्म कपड़ा ओढ़ाया और एक कप चाय पिलाई तो वह थोड़ा सामान्य हुआ। इसके बाद एक-एक करके सब बाहर आ गए और तत्काल होटल की तरफ दौड़े। होटल में सभी ने बारी-बारी से स्नान किया। तैयार होकर नीचे आए। होटल वाले का हिसाब किया और इसके बाद राजू से रेलवे स्टेशन छोडऩे के लिए कहा। वैसे तय कर लिया गया था कि सामान रेलवे के लैगेज रूम में जमा करवाकर दिन भर पुरी के शेष रहे मंदिरों के दर्शन करेंगे। स्टेशन पहुंचे तो राजू ने कहा कि उसका एक किराया आ गया है, सामान जमा करवा दो और फोन कर देना, वह लौट आएगा। हमने स्टेशन के लैगेज रूम में सामान जमा करवाया। वहां बताया गया कि सभी सामान के ताला होना चाहिए, तभी सामान जमा होगा। मैं तत्काल स्टेशन से एक दुकान से छोटे तीन ताले खरीद लाया। इसके बाद सामान की तरफ से निश्चिंत होकर हम केन्टीन पहुंचे। भर पेट नाश्ता करने के बाद स्टेशन से बाहर निकले।
अब हमने राजू को फोन करने के बजाय वहीं स्टेशन के आगे खड़े ऑटो वाले से जगन्नाथ मंदिर के पास छोडऩे के लिए कहा। उसने किराया पचास रुपए बताया तो हम चौंक गए। हमें राजू की शराफत पर संदेह होने लगा था। भोली सी सूरत बनाकर करीब दिन तीन वह हमारे साथ रहा था और उसने जैसा किराया मांगा वह दिया.. उसके बातचीत के अंदाज पर। खैर, यहां सबक यही मिला कि किसी की सूरत या बातचीत से प्रभावित हुए बिना दो तीन जगह और मोलभाव करने में कोई हर्ज नहीं है। हमने उसी ऑटो से पुरी शहर के सभी मंदिर दिखाने का किराया पूछा तो उसने 450 रुपए बताए। हमने उससे ज्यादा मोलभाव नहीं किया और मंदिर आ गए। वास्तव में किसी जगह की हकीकत देखनी हो तो दिन में ही जाना चाहिए। मंदिर के बाहर तो जो चौड़ा मार्ग है, इस पर कतार से दीन-हीन व निशक्त भिखारी बैठे थे। यह आलम सड़क के दोनों तरफ था। पुरी के पण्डे ही नहीं आम लोग भी पान खाने के शौकीन कुछ ज्यादा ही हैं। .... जारी है।