Wednesday, December 28, 2016

सरकारी स्कूल


बस यूं ही
आखिरकार बड़े बेटे योगराज का आज यानि आठ अगस्त को विधिवत रूप से सरकारी स्कूल मतलब केन्द्रीय विद्यालय में दाखिला हो गया। उसका प्रवेश तकनीकी कारणों के चलते अटका हुआ था। छोटे पुत्र एकलव्य का प्रवेश तो पहले ही हो चुका था। अब दोनों भाई साथ-साथ एक ही स्कूल में जाते हैं। खैर, सरकारी स्कूलों की बात पर जोर इसलिए कि क्योंकि हमारा पूरा परिवार ही सरकारी स्कूल से जुड़ा है।
मैं दसवीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं। बाद में अनुदानित स्कूल/ कॉलेजों में शिक्षा ग्रहण की। एेसा करना मजबूरी भी थी क्योंकि जिले में उस वक्त कोई सरकारी कॉलेज नहीं होता था। मेरे से बड़े दोनों भाइयों ने भी कमोबेश मेरी ही तर्ज पर शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान में बड़े भाईसाहब दिल्ली में सरकारी स्कूल में अध्यापक हैं जबकि उनसे छोटे वाले भाईसाहब वायुसेना से सेवानिवृत होने के बाद एसबीआई चौमूं में पदस्थापित हैं। सरकारी स्कूल में पढ़कर सरकारी सेवा जाने का सपना मेरा भी था लेकिन किस्मत पत्रकारिता में ले आई। खैर, दिल्ली वाले भाईसाहब के दोनों बेटे भी सरकारी स्कूलों में पढ़े। बड़े वाले ने अभी बीटेक किया है और छोटे वाला कर रहा है। बड़े वाले भतीजे की तो हुंडई जैसी प्रतिष्ठित कंपनी में साढ़े छह लाख सालाना पैकेज पर नौकरी लग चुकी है। यह सब लिखने का तात्पर्य यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़कर भी मुकाम पाया जा सकता है। लेकिन भेड़चाल एवं स्टेट्स सिंबल के कारण हम बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं।

देशप्रेम हो सर्वोपरि

टिप्पणी

शायद श्रीगंगानगर जिले में शहीद व शहादत के मायने दूसरे हैं। संभवत: यहां के कुछ खास लोगों ने शहीद की एक अलग ही परिभाषा ईजाद कर रखी है। लगता है इन लोगों की नजरों में वह शहीद नहीं है, जो अपने घर-परिवार को छोड़कर सीमा पर जाकर प्रतिकूल परिस्थितियों में मोर्चा संभालता है। दुश्मन के नापाक इरादों को नेस्तनाबूद करता है। 
देश की खातिर हंसते-हंसते सीमा पर प्राणोत्सर्ग कर देता है। शहीद वीरांगनाओं के लिए भी इन खास लोगों के पास अलग ही शब्दकोष दिखाई देता है। इनकी नजरों में देश की जीत के संदर्भ भी दूसरे ही लगते हैं। दरअसल, यह खास लोग और कोई नहीं बल्कि श्रीगंगानगर जिले के प्रशासनिक अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि हैं। करगिल विजय दिवस के उपलक्ष्य में जिला मुख्यालय पर प्रशासन की तरफ से किसी तरह का कोई कार्यक्रम ना होना तो यही दर्शाता है। विडम्बना देखिए जब समूचा देश वीर सैनिकों की शहादत व बहादुरी को याद कर रहा था, उनकी जीत का जश्न मना रहा था, तब जिले के यह खास लोग खुद तक ही सीमित रहे। बिना किसी प्रचार के किसी ने चुपचाप यह जश्न मना लिया हो तो बात अलग है लेकिन उनके व्यवहार को देखकर लगता नहीं कि उन्होंने शहीदों को याद किया या उनको श्रद्धासुमन अर्पित किए हों। इन खास लोगों के दिल में अगर देश प्रेम का जज्बा होता तो वे कहीं पर भी कार्यक्रम करके शहीदों को याद कर सकते थे, लेकिन इतना कुछ करने का साहस यह खास लोग जुटा नहीं सके। जिम्मेदारों का यह रवैया न केवल गैर जिम्मेदाराना है बल्कि हौसले को तोडऩा वाला भी है। उनका इस तरह का व्यवहार शर्मसार करता है। शहीद परिवारों को संबल देने के बजाय उनका मनोबल कम करता है। उनके जज्बे को ठेस पहुंचाता है। आखिरकार इसी तरह की संकीर्ण सो च एवं सौतेला व्यवहार देश सेवा के लिए जाने वाले युवाओं की राह में रुकावट बनता है।
सीमावर्ती व संवदेनशील जिला होने के नाते यहां तो देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रम बड़ी संख्या में होने चाहिए। इनमें न केवल आमजन बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों का जोरदार जोश भी झलकना चाहिए। जनसहभागिता भी इतनी हो कि सीमा पर तैनात जवानों को लगाना चाहिए कि इस लड़ाई में वो अकेले नहीं हैं । उनके पीछे चिंता करने वाले कई हैं। कितना बेहतर होता कि जिला प्रशासन के तत्वावधान में सीमा के पास ऐसा देश भक्ति से जुड़ा कोई कार्यक्रम होता जो न केवल आमजन को बल्कि सरहद के पास तैनात सैनिकों में यह विश्वास पैदा करता है कि वाकई लोगों में सेना के प्रति सम्मान है। लेकिन अफसोसनजक तो यह है कि श्रीगंगानगर जिले के खास लोग न तो एेसा कोई कार्यक्रम कर या करवा पाए और ना ही ऐसा कोई संदेश नहीं दे प ाए। सोचिए, जिम्मेदार ही अगर इस तरह की उदासीनता बरतेंगे तो फिर आने वाली पीढी को प्रेरणा कौन देगा। आखिर देशप्रेम से बड़ा तो कोई नहीं है। हम सब के लिए देशप्रेम सर्वोपरि है। भले ही वो अधिकारी या जनप्रतिनिधि ही क्यों ना हों।
राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर के 27 जुलाई 16 के अंक में प्रकाशित.....

मिल रहे हैं चोर साहूकार

मिल रहे हैं चोर साहूकार अब।
पालते अपराधी को दरबार अब।
आदर्श-नैतिकता बने दिखावा,
केवल कुर्सी का कारोबार अब।
अवसरवाद की सारी कहानी,
बेमेलों से बनती सरकार अब।
महंगाई पर साधे हैं चुप्पी,
सरोकारों से है इनकार अब।
विकल्प सही मिले तो कैसे
पैसा है सबका आधार अब।
सपना सुराज का दोस्तो,
होता नहीं साकार अब।

मुक्तक

1
 राजनीति में चलते हैं, दांव-पेंच के खेल,
रोज यहां बनते-बिगड़ते, गठजोड़ बेमेल।
सत्ता सुंदरी के खातिर, सिद्धांत हुए गौण,
गाहे-बगाहे यारो, मां बेटी को रहे धकेल।
2
सलमान को मिला है देखो, शिव का यह वरदान,
सोमवार के दिन है आया, निर्णय बड़ा 'महान '।
साल अठारह तक जिसने, अटका रखे थे प्रान,
पीछा छूटा उस चिंकारा से, आई जान में जान।
.3
सहज, सरल, सीधे हैं हम, करते हैं सबका सम्मान,
पर चालाक पड़ोसी हमारा, करता रहता है अपमान।
पैंसठ, इकहत्तर व करगिल में नाको चने चबवाए हैं,
पर कुत्ते की दुम की तरह, नहीं सुधरा है बेईमान।
4
हिन्द देश के वीरों का जन-जन करता है सम्मान,
इतिहास का पन्ना-पन्ना, करता है इनके गुणगान।
अपमान के घूंट आखिर, कब तक पीते रहेंगे हम,
फिर से नए शंखनाद की, उम्मीद में है हिन्दुस्तान
5
काम की कीमत क्या होती है, समझा गए कलाम,
अपने करमों से कर गए वो, ऊंचा हिन्द का नाम।
मां भारती का सीना तो एेसे सपूतों से ही चौड़ा है,
कृतज्ञ राष्ट्र भी करता है, उस महामानव को सलाम।

'मां ' 'बहन' तक आ पहुंची राजनीति


'अंधे की औलाद अंधी' महाभारत काल में द्रौपदी के द्वारा कहे गए यह शब्द इन दिनों फिर से प्रासंगिक हो चले हैं। आखिर यही तो वो शब्द थे जो दुर्योधन को चुभ गए थे । इन्हीं शब्दों की वजह से महाभारत के युद्ध की बुनियाद रखी गई थी। यहां तक कि द्रौपदी को भरी सभा में निर्वस्त्र करने का प्रयास भी इन्ही शब्दों के कारण ही किया गया था। खैर, बोल जितने ज्यादा चुटीले या कड़वे होते हैं उनकी प्रतिक्रिया भी उतनी ही गंभीर और व्यापक होती है। दरअसल, बोल का हम भारतीयों में बड़ा महत्व है। इतिहास गवाह रहा है। रत्नावली के शब्द तुलसीदास को इतने चुभे कि वो संत तुलसीदास बने। संत कबीर ने भी कहा है कि ' वाणी एक अमोल है, जो कोई बोले जानी। हिये तराजू तौल के तब मुख बाहर आनी।' एक अन्य दोहे में भी उन्होंने कहा है कि 'शब्द संभारै बोलिए, शब्द के हाथ न पांव, एक शब्द मरहम करै, एक शब्द करै घाव। ' कहा भी गया है कि वाणी में वह शक्ति होती है जो ताप, तीर व तलवार में भी नहीं होती है। तलवार का घाव भर जाता है लेकिन कड़वी बोली से बना घाव कभी नहीं भरता ताउम्र बना रहा है।
हालांकि राजनीति में कड़वे बोलों को अक्सर जुबान फिसलने की संज्ञा देकर दरकिनार करने की कोशिश की जाती रही है लेकिन इन बोलो के पीछे सियासी समीकरण जरूर छिपे होते हैं। अब देखिए ना, भाजपा के दयाशंकर सिंह के द्वारा बसपा सुप्रीमो के बारे में कहे बोलो पर बवाल मचा है। बोलों के घमासान की गंभीरता को देखिए कि अभी से यूपी चुनाव नतीजों पर हार-जीत के कयास लगाए जाने लगे हैं। भले की हार-जीत समय के गर्भ में हो लेकिन राजनीतिक पंडित तो भविष्यवाणियां तक करने लगे हैं। बोल से आहत भाजपा में भी दयाशंकरसिंह की पत्नी के पलटवार से जान जरूर आ गई। बयानों के इस शोर ने राजनीति में आई गिरावट को जगजाहिर कर दिया है। गिरावट भी इतनी कि 'मां ' 'बहन' तक आ चुकी है। सियासी दलों को भी अब 'मां ' 'बहन' के मसले में ही सियासी फायदे नजर आने लगे हैं। बैठे बिठाए चुनावी मुद्दा भी मिल गया है। अब इससे ज्यादा शर्मनाक दौर और क्या होगा। बयानों पर बाहें चढाएं नेताओं की समझ पर सच में बड़ी कोफ्त होती है।

उल्फत की निशानियां


गजल-3

लफ्ज गूंगे हो गए, गहरा गई खामोशियां,
आंखें भी पथरा गई, रह गई बस तन्हाइयां।
महफिलें उनको क्या देंगी राहतें भला,
रास जिनको आने लगी हो वीरानियां।
टूटा दिल, टूटे सपने और हिज्र के आंसू,
होती यही हैं यारो, उल्फत की निशानियां।
दुनिया से आखिर मिलता उसे क्या 'माही',
नसीब में जिसके लिखी हों नाउम्मीदयां।

हर हाल में मुस्कुराता है...


गजल-2

इस शहर में जीने के अंदाज निराले हैं,
होठों पर लतीफे हैं, आवाज में छाले हैं।
करते हैं जो मुंह पर, चिकनी चुपड़ी बातें,
कभी आजमा लेना, दिल के कितने काले हैं।
बंद कमरों में करते हैं, जो दावे बड़े-बड़े,
भरी महफिल में, उनके लबों पर ही ताले हैं।
कमाल का शख्स है वह, हर हाल में मुस्कुराता है
एेसे ही बंदे तो 'माही' कहलाते दिलवाले हैं।

गजल

कल रविवार देर रात व्हाट्स एप पर बातों ही बातों में एक शेर बन गया। इसको फेसबुक पर साझा किया तो कद्रदानों ने बेहद पसंद किया। यही वजह रही कि शेर को गजल बनाने बैठ गया। बस दस मिनट में जोड़ तोड़ करके बना ही दी। आप भी देखें...
हाथ जोड़ लिए मैंने...
जहां मुंह देखकर तिलक लगाए जाते हैं,
उस दर के दस्तूर निभाने छोड़ दिए मैंने।
जहां अपने-पराये का होता रहा भेद सदा,
उस घर से रिश्ते सारे तोड़ लिए मैंने।
पग-पग पर बिकने के इस दौर में आखिर,
ईमान की खातिर ना एक ना करोड़ लिए मैंने।
सच को सच कहने का साहस रखने के खातिर,
छल, फरेब, मक्कारी के रस्ते सारे मोड़ दिए मैंने।
रिश्तों में ना आए कभी कड़वाहट कोई 'माही'
यही सोचकर छोटों के आगे हाथ जोड़ लिए मैंने।

सुल्तान, 'रेवाड़ी' और मैं

बस यूं ही 

करीब तीन साल बाद आज सपरिवार सलमान की फिल्म सुल्तान देखने गया। फिल्म पड़ोसी प्रदेश हरियाणा और वहां की अखाड़ा संस्कृति को पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर बनाई गई है। वैसे फिल्म की शुरुआत में हरियाणा राज्य के रेवाड़ी जिले का नाम देखकर मैं चौंक गया। रेवाड़ी न जाने कितनी ही बार गया हंू। रेवाड़ी के साथ बचपन का एक वाकया जुडा है। इस वाकये का जिक्र मैं अपने ब्लॉग बातूनी (http://khabarnavish.blogspot.in/ )में आज से पांच साल पहले कर चुका हूं। इसलिए रेवाड़ी जेहन में ताउम्र जिंदा रहेगा। खैर, फिल्म खेल से जुड़ी है और इसी के साथ-साथ पति-पत्नी का अंर्तद्वंद्व भी चलता है। पति को विश्व चैम्पियन होने का गुरुर हो जाता है तो पत्नी को इस बात का मलाल है कि खेल में गुरुर कैसा। यह गुरुर ही दोनों के बीच दरार पैदा करता है लेकिन खेल दोनों को जोड़े भी रखता है। दोनों को अलग होने का दर्द है और इस दर्द को दोनों चुपचाप पीते हैं। फिल्म में जिद और जुनून का जबरदस्त संयोग है। कहा भी गया है कि जुनून अगर सकारात्मक दिशा में हो तो वह मुकाम तक पहुंचता ही है। इसी फलसफे के इर्द-गिर्द फिल्म का ताना-बुना गया है। सुल्तान यानी सलमान पर पहले अपने प्यार को पाने का जुनून है तो बाद में प्रसव के दौरान पुत्र की मौत के बाद उसकी याद में ब्लड बैंक बनाने का। इन दो जुनून के बीच ही चलती है फिल्म। फिल्म को मैंने बड़ी शिद्दत एवं तल्लीनता के साथ देखा। विषयवस्तु पसंद की हो तो फिर एेसा करना लाजिमी भी है। कुश्ती एवं दंगल के नजारे में हरियाणा के अलावा सीमावर्ती इलाकों में आज भी प्रासंगिक हैं। मैंने भी बचपन में कुश्ती एवं अखाड़े खूब देखे हैं। पड़ोसी गांव किशोरपुरा में तो बाकायदा हरियाणा एवं दिल्ली के अखाड़ों के पहलवान हर साल होने वाली प्रतियोगिता में शिरकत करने आते रहे हैं। आज भी आते हैं। 
चूंकि फिल्म हरियाणा पृष्ठभूमि से जुड़ी है, लिहाजा हास-परिहास तो होना ही है। हरियाण की नहरें, हरियाणा रोडवेज, वहां का ग्राम्य जीवन आदि को देखकर बचपन जवां हो उठा। ननिहाल की गलियों की तरह के ही रास्ते। मेरा ननिहाल भी हरियाणा में ही है। सचमुच फिल्म में विशुद्ध रूप से हरियाणवी लुक है। लेकिन सलमान एवं अनुष्का की हरियाणवी मिश्रित हिन्दी थोड़ी कम जमती है। इससे अच्छी हरियाणवी तो सलमान के दोस्त बने अमित साध व अनुष्का के पिता बने कुमुद मिश्रा ने बोली है। उनके संवाद ठेठ हरियाणवी लगते हैं। वैसे फिल्म का कथानक इस तरह गूंथा गया है कि यह बोर नहीं करता। सुल्तान इन दिनों आने वाली फिल्मों के मुकाबले बड़ी जरूर है पर यह महसूस नहीं होती है। सलमान की फिल्मों के गाने फिल्म प्रदर्शित होने से पहले ही जुबान पर चढ चुके होते हैं। सुल्तान फिल्म के गानों के साथ भी ऐसा ही है। फिल्म में सलमान के लटके झटके देखकर सिनेमा हाल में न केवल सिटियां बजती हैं बल्कि आजकल के हुटिंग के शगल हूऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊ.... का शोर भी कई बार गूंजता हैं। 
चूंकि मैं खुद संवेदनशील एवं भावुक हैं, इस कारण अक्सर खुद से नियंत्रण खो बैठता हूं। मैं तब यह भूल जाता हूं कि यह फिल्मी दुनिया का सीन है। सुल्तान में भी दो बार आंखें न केवल भीगीं बल्कि आंसू बह निकले। पहले उस वक्त जब सुल्तान विश्व विजेता का खिताब जीतकर लौटता है लेकिन जब पता चलता है कि उसका नवजात बच्चा ग्रुप का खून न मिलने से दम तोड़ चुका है। इस सीन में अनुष्का-सलमान के संवाद वाकई जीवंत लगते हैं। दूसरी बार आंसू तब आए जब सुल्तान हारते-हारते बाजी जीतने में सफल हो जाता है। तब उसकी मेहनत को जीत में तब्दील होने की खुशी के आंसू थे। वैसे यह फिल्म शनिवार को देखने का विचार था, लेकिन आनन-फानन में विचार बना तो फिर बारह से तीन वाला शो देख ही आए। वैसे तो सब की अलग-अगल रूचि होती है लेकिन मेरे को फिल्म पसंद आई। आप भी परिवार के साथ फिल्म देख सकते हैं।

रेलवे की मेहरबानी-2


गृह जिले में गांव जाने वाले रास्ते पर बने अंडरब्रिज में पानी भरने का एक फोटो कल मैंने फेसबुक पर शेयर किया था और बताया भी था कि इस तरह के हालात बारिश के मौसम में कमोबेश हर अंडरब्रिज पर होते हैं। पोस्ट पर हर तरह के कमेंट आए। एक दो निराशावादियों ने तो यहां तक कह दिया है कि कुछ नहीं होने वाला। राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने इस समस्या को उस चश्मे से देखा। बहुतों ने सुझाव भी दिए तो कई ऐसे भी थे, जिन्होंने गेंद मेरे ही पाले में डाल दी। एक दो साथियों ने तो इस समस्या को नजरअंदाज कर बारिश का लुत्फ उठाने की नसीहत तक दे डाली। खैर, मैंने कल इस तरह की आशंका जता भी दी थी कि समस्या के संबंध में सबके अपने-अपने तर्क हो सकते हैं। मेरा मानना है कि अगर कोई समस्या है तो उसका समाधान भी है। इसके लिए जरूरी है अपनी बात उचित मंच पर रखी जाए। करीब दो साल मैं छत्तीसगढ़ प्रदेश के भिलाई शहर में रहा। भिलाई के बीचोबीच कोलकाता-मुम्बई रेलमार्ग गुजरता है। इस रेल मार्ग के एक तरफ भिलाई स्टील प्लांट व उसमें कार्यरत कर्मचारियों-अधिकारियों के आवास हैं तो दूसरी तरफ भिलाई नगर निगम क्षेत्र है। रायपुर-नागपुर सड़क मार्ग भी इस रेल लाइन के साथ-साथ ही गुजरता है। इस मार्ग पर लगातार रेलें गुजरती हैं। सवारी भी और कोयले से लदी गाडिय़ां भी हैं। भिलाई में दो तीन जगह रेल फाटक भी हैं लेकिन लगातार रेले गुजरने से वहां फाटकों पर वाहनों की कतार लगी ही रहती है। लोगों का समय जाया न हो इस लिहाज से वहां ओवर ब्रिज व अंडरब्रिज भी बने हुए हैं। चूंकि छत्तीसगढ़ में लगातार चार माह तक बारिश होती है, ऐसे में अंडरब्रिजों में वहां भी पानी भरना स्वाभाविक है। लेकिन वहां पानी निकासी के लिए अंडरब्रिज के नीचे जगह छोड़कर ऊपर जाल लगा दिए गए हैं। वहीं बगल में मोटर व पम्प लगा रखे हैं। इससे पानी हाथोंहाथ खाली होता रहता है। राजस्थान जैसे सूखे प्रदेश में छत्तीसगढ़ जैसी बारिश नहीं होती है। लेकिन एहतियातन सुरक्षा के कदम तो उठाने ही चाहिए। हमारे यहां बने अंडरब्रिज में चूंकि नीचे जगह ही नहीं छोड़ी गई है, इसलिए अब जुगाड़ के रूप में मोटर-पम्प ही सबसे मुफीद विकल्प है। 
 भले ही रेलवे ने इस तरह के अंडरब्रिज बनाकर मानव रहित फाटकों से मुक्ति पा ली हो लेकिन ऐसा करने में आमजन की बजाय ज्यादा फायदा रेलवे को ही हुआ है। क्योंकि कुछ जगह जहां सुरक्षाकर्मी तैनात थे, वहां भी अंडरब्रिज बना दिए हैं तो वहां भी कर्मचारी की जरूरत नहीं होगी। सोचिए रेलवे ने इन अंडरब्रिज के बहाने कितने सुरक्षाकर्मी को खाली करवा लिया। कितना मानव श्रम बचा या बेरोजगार हुआ यह बहस का विषय हो सकता है। रेलवे तर्क दे सकता है कि मानव रहित फाटकों पर दुर्घटना की आशंका रहती है। ऐसा सोचना सही भी हो सकता है क्योंकि इतिहास गवाह है इस तरह के हादसे हो चुके हैं। लेकिन कल्पना कीजिए अंडरब्रिज में पानी भरा है और किसी को तत्काल चिकित्सा की जरूरत है तो वह क्या करेगा? जब किसी तरह का कोई रास्ता दिखाई नहीं देगा तो वह रेल पटरी के ऊपर से जाने की ही कोशिश करेगा। इस तरह की परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार कौन? एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या इस तरह के अंडरब्रिज बनाने से पहले से संबंधित लोगों का फीडबैक लिया गया या नहीं? माना रेलवे यात्रियों को सुविधाओं देने तथा सफर को सुगम एवं सरल बनाने को तत्पर है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं है कि बाकी लोगोंं के लिए परेशानी खड़ी कर दे। जनहित को दरकिनार करना किसी भी सूरत में न्यायोचित नहीं हो सकता। आमजन को अगर सहुलियत देना ही मकसद है तो फिर अंडरब्रिज बनाने के तौर-तरीकों में बदलाव करने पर पुनर्विचार करना चाहिए ताकि और कहीं तो इस प्रकार के हालात न बने।

रेलवे की मेहरबानी-1


यह फोटो देखने में भले ही सामान्य लगे हैं लेकिन जिन पर बीत रही है वो इसका दर्द बखूबी जानते हैं। यह रास्ता मेरे जिले का ही है और मेरे गांव के बिलकुल पास का ही है। बगड़ से कालीपहाड़ी जाने वाले रास्ते की यह तस्वीर तीन जुलाई की है। कुछ इस तरह के हालात बगड़ से मेरे गांव केहरपुरा कलां जाने वाले रास्ते पर रतनशहर के पास बनते हैं। इस तरह के अंडरब्रिज आजकल कमोबेश हर जगह दिखाई देते हैं। रेलवे ने अपनी सिरदर्दी कम करते हुए रेल फाटकों को खत्म कर इस तरह के अंडरब्रिज बना तो दिए लेकिन बरसात में पानी की निकासी कैसे होगी इस बारे में नहीं सोचा गया। लिहाजा बारिश के दौरान अंडर ब्रिज पानी से लबालब हो जाते हैं। यात्री अपने गंतव्य तक समय पर नहीं पहुंच पाते हैं। सोचिए रेल आने के समय बमुश्किल पांच से दस मिनट तक ही तो वाहन चालकों को फाटक पर रुकना पड़ता है लेकिन पानी भरने के बाद कितने दिन तक परेशान होना पड़ेगा? या तो पानी अपने आप सूखेगा या फिर प्रभावित लोगों को अपने स्तर पर व्यवस्था करवानी पड़ेगी। बताया जा रहा है कि रेलवे ने मानव रहित फाटकों की जगह इस तरह के अंडरब्रिज बनाए हैं लेकिन मेरी नजर में एेसे कई फाटक हैं जहां पहले सुरक्षाकर्मी तैनात रहते थे, वहां भी अंडरब्रिज बना दिए गए। खैर, अंडरब्रिज को लेकर सबके पास अपने-अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन इस तरह के हालात में मैं इस सुविधा को जनहित में नहीं मानता।

पानी दिलाओ सरकार

 टिप्पणी

'रोम जब जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था।' यह जुमला इन दिनों श्रीगंगानगर जिले के सिंचाई विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों पर सटीक बैठ रहा है। बीते माह एक दिन भी किसानों को उनके शेयर (हिस्से) का पानी नहीं मिला। सब कुछ जानने के बावजूद सिंचाई विभाग के अधिकारी टालमटोल की नीति अपनाए हुए है। नहरी पानी की कमी, मौसम की बेरुखी और सिंचाई विभाग के रवैये से उकताए किसानों का धैर्य ऐसे में भला जवाब नहीं देता तो क्या करता। कौन होगा जो खून-पसीने की कमाई को अपनी आंखों के सामने बर्बाद होते देख चुप बैठेगा। तभी तो चौतरफा आहत अन्नदाता ने अपने हक के लिए हुंकार भरी तो प्रशासनिक स्तर पर हलचल भी शुरू हुई। सिंचाई विभाग से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों ने यह जताने का भरपूर प्रयास किया कि वे समस्या को लेकर गंभीर हैं और इसके समाधान के लिए प्रयासरत हैं। भले ही जवाबों में उनकी मजबूरी या प्रयासों का जिक्र हो लेकिन हकीकत यह है कि खेतों में फसलें सूख रही हैं, नहरें खाली पड़ी हैं। जिस धरतीपुत्र को इन दिनों खेत में होना चाहिए वह पानी के लिए सड़कों पर है। 
इतिहास गवाह रहा है कि नहरी पानी से सरसब्ज श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में आजादी के बाद हुए अधिकतर बड़े आंदोलनों/ प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में पानी ही रहा है। जब-जब यहां पानी का संकट गहराया है, तब-तब किसानों ने आंदोलन का रास्ता अपनाया है। इसके बावजूद इस समस्या का कभी स्थायी समाधान नहीं खोजा गया। उल्टे बहानों की फेहरिस्त जरूर तैयार हो जाती है। कभी केळी (एक तरह की घास) के नाम पर, कभी छीजत के नाम पर तो कभी चोरी के नाम पर। आरोप तो यहां तक है कि अगले साल पड़ोसी प्रदेश पंजाब में चुनाव है और किसानों को खुश रखने के लिए वहां नहरों में भरपूर पानी चलाया जा रहा है। राजस्थान के हिस्से वाले पानी पर भी कैंची चल रही है। खैर, चुनावी माहौल को देखते हुए आरोपों में दम नजर आता है, लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं हो सकता। दरअसल, पानी के मामले में हमारे अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि हमेशा कमजोर ही साबित हुए हैं, भले ही राज्य एवं केन्द्र में सरकारें किसी की हों, हर बार यही सुनने को मिलता है कि पड़ोसी प्रदेश ने हमारे हिस्से का पानी हड़प लिया। क्या ऐसा कहते हुए हमारे अधिकारी/जनप्रतिनिधि शर्मसार नहीं होते? आखिर हमारी ऐसी क्या कमजोरी है, जो हम हमारा हक लेने के बजाय नतमस्तक हो जाते हैं। केन्द्र में अकाली दल एवं भाजपा का गठजोड़ है। दोनों राज्यों में भी इन्हीं दलों की सरकारें हैं। इससे ज्यादा अनुकूल हालात और इस तरह के संयोग तो कभी-कभार ही बनते हैं। ऐसे माहौल में भी अगर पड़ोसी प्रदेश हमारा हक मार रहा है तो यकीन मानिए समस्या का समाधान निकट भविष्य में होने से रहा। यह सही है कि इस बार पर्याप्त बारिश नहीं होने से बांधों में पानी की आवक उतनी नहीं हो रही है जितनी होनी चाहिए। खेतों में खड़ी फसलें भी नहरी पानी पर ही निर्भर हैं। ऐसे में नहरी पानी की खपत ज्यादा बढ़ गई है। इस तरह के हालात में सिंचाई विभाग व प्रशासनिक अधिकारियों को ज्यादा गंभीरता एवं सक्रियता दिखाने की जरूरत थी। आखिर क्यों वे भाखड़ा व्यास मैनेजमेंट बोर्ड की बैठकों में अपनी बात प्रभावी तरीके से नहीं रख पाए। पानी लगातार घटने बावजूद वे चुप क्यों रहे? सवाल कई हैं जो शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा करते हैं। हर बार नए बहानों के साथ अपना बचाव करने वाली सरकार को अब इस समस्या का स्थायी समाधान खोजने की दिशा में तत्काल काम शुरू कर देना चाहिए। सरकार एवं उसके नुमाइंदों की पहली प्राथमिकता हमारे हिस्से का पानी लेने की होनी चाहिए। एेसा न हो कि इतिहास फिर से अपने को दोहरा दे।
राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर के 2 जुलाई 16 के अंक में प्रकाशित...

मीडिया और मानसून राग


बस यूं ही

अपुन को आज तक यह मानसून राग समझ नहीं आया। पता नहीं यह मानसून कब आता है, कहां अटकता है। कब सक्रिय होता है और कब बरसता है। कहने तो हर साल मीडिया में मानसून सुर्खियां बनता है। बड़ी-बड़ी भविष्यवाणियां होती हैं, बाकायदा तिथि तक का एेलान कर दिया जाता है कि फलां तारीख को मानसून भारत में प्रवेश करेगा। इतना ही नहीं यह तक बता दिया जाता है कि भारत में कौनसी दिशा से आएगा। मसलन, बंगाल की खाड़ी से आएगा, अरब सागर से घुसेगा या हिन्द महासागर से इंट्री मारेगा। भविष्यवाणियों की फेहरिस्त पर यहीं विराम नहीं लगता। काटो तो खून वाले हालात तो तब बनते हैं जब बताई गई तिथि को एक बूंद तक नहीं गिरती। लेकिन यहां फिर यू टर्न लेते हुए बताया जाता है कि मानसून भटक गया है। मानसून अटक गया है। मानसून ने रास्ता बदल लिया है आदि-आदि। मजे की बात तो यह है कि इस तरह की भविष्यवाणियां हर साल होती हैं। यह कितनी सही होती हैं और कितनी गलत यह तो अलग बात है लेकिन भविष्यवाणी करने का दौर बदस्तूर जारी रहता है। मानसून की चर्चा होने पर बचपन का एक वाकया जो पिताजी अक्सर बताते रहते हैं बरबस ही याद आ जाता है। पिताजी उस वक्त अजमेर थे। एक बार अजमेर में काफी तेज बारिश हुई। बाढ़ जैसे हालात बन गए। लोग बहुत परेशान हो गए। उनमें इस बात का गुस्सा था कि मौसम विभाग ने भविष्यवाणी नहीं की। इसके बाद तो भविष्यवाणियां जारी की जाने लगी। भले ही किसी दिन बादल छाए रहने की भविष्यवाणी की गई लेकिन बादलों के दर्शन ही नहीं हुए। आसमान साफ रहने की संभावना जताई गई लेकिन बादल छा गए। मौसम साफ रहने के बारे में बताया गया लेकिन तेज हवा चली या आंधी आ गई।
वैसे राजस्थान में मानसून का इंतजार किसी मेहमान से कम नहीं होता है। एेसे में इस तरह की भविष्यवाणियां बारिश का इंतजार करने वालों के भरोसे की परीक्षा लेती हैं। हां यह बात जरूर है कि मीडिया में मानसून की भविष्यवाणियां पढ़-पढ़कर मीडिया से जुड़े लोगों को ही विशेषज्ञ जरूर समझ लिया जाता है। मेरे साथ भी कई बार एेसा हुआ है। गांव जाने पर वहां लोग पहला सवाल मौसम का ही करते हैं। सीजन अगर बारिश का हुआ तो पूछ ही बैठते हैं कि बरसात कब तक हो जाएगी। मैं सिवाय मंद-मंद मुस्कुराने के उनकी बातों का कोई जवाब नहीं दे पाता। वाकई यह मानसून राग अपने तो पल्ले नहीं पड़ता। खूब माथापच्ची कर ली। अटकने, भटकने व बरसने की एबीसीडी नहीं मालूम। वैसे भविष्यवाणी सच न होने के पीछे सबसे बड़ा कारण मौसम का बेईमान होना भी है। मौसम पल-पल बदलता है। तभी तो मौसम की तरह बदलने के गीत भी लिखे गए हैं। ऐसे में मैं दोष मौसम पंडितों को न देकर मौसम को ही देता हूं जो बार-बार बदल जाता है। इसलिए मानसून दगा दे जाए तो गलती भविष्यवाणी करने वालों की नहीं मौसम की है। इसलिए खुशी व गम को भूलकर गुनगुनाइए 'यह मौसम भी गया...। '

कुछ भी कहो, आजादी है...

बस यूं ही

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश में कौन कब क्या बोल दे, इसका कोई भरोसा नहीं है। मीडिया जगत में भले ही इसे जुबान फिसलना करार दिया जाता रहा हो लेकिन यह एक सुनियोजित तरीका है, सस्ती लोकप्रियता पाने का, चर्चा में आने का। विशेषकर हमारे देश के नेता विवादित बयान जारी करने में कभी पीछे नहीं रहते। एक बयान जारी होता है और इसके तत्काल बाद विरोध और समर्थन में आवाजें उठने शुरू हो जाती हैं। सियासी नफे नुकसान का आकलन होने लगता है। रेप का मसला भी देश में 'गरीब की लुगाई' की तरह ही है। तभी तो कोई कुछ भी बयान जारी कर देता है। रेप को लेकर वैसे तो विवादित बयानों की फेहरिस्त लंबी है और ऐसा करने वाले ज्यादातर नेता ही हैं, लेकिन फिल्म अभिनेता सलमान खान भी इन दिनों चर्चा में हैं। उनके ताजा बयान की जमकर आलोचना हो रही है। सलमान में अपनी फिल्म सुल्तान की शूटिंग के दौरान कहा, 'जब शूट के बाद रिंग से बाहर निकल रहा था तो मुझे लगा कि मैं एक एेसी महिला हूं, जिसके साथ रेप हुआ है। मैं सीधे बिलकुल नहीं चल पा रहा था।' भला यह भी कोई कहने की बात है कि आप थके हुए हो तो कैसा महसूस करते हो? रेप और थकान में काहे की समानता? और फिर एक पुरुष रेप की पीड़ा का एहसास कैसे कर सकता है? यह बेहद बचकाना बयान है, जो केवल और केवल चर्चा मेें आने के लिए ही दिया गया है। खैर, चौतरफा आलोचना के बीच सलमान के समर्थन में फिल्म अदाकारा पूजा बेदी ने बयान जारी किया है। सलमान के पिता ने भी माफी मांगी है लेकिन इन लोगों के ऐसा करने से जो कहा गया है, उसकी गंभीरता खत्म नहीं होने वाली। आखिर ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी थी कि सलमान को थकान की तुलना रेप से करनी पड़ी।
बेतुके एवं बचकाने बयान जारी करने में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्केंडय काटजू का नाम भी आता है। सलमान के बयान के तर्ज पर उन्होंने भी मंगलवार को इंदौर में बयान दिया कि 'देश में महिला से रेप होना कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है। यह तो पहले भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा।' तरस आता है इस तरह के बयान देने वालों पर। आखिर वो किस आधार पर कह रहे हैं कि रेप आगे भी होता रहेगा। इसका मतलब तो यह है कि काटजू बहुत बड़े दूरदर्शी हैं और उनको देश की कानून व्यवस्था पर भरोसा भी नहीं है। 
सलमान एवं काटजू के हालिया बयानों से इतर बात करें तो रेप शब्द हमारे नेताओं की जुबान पर इस कदर चढ़ा हुआ है कि वो कुछ भी कह उठते हैं। नेताओं की बदजुबानी के किस्से कई हैं। मसलन यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कहा था ' एक महिला से चार पुरुष रेप कर ही नहीं सकते।' यूपी के ही सपा नेता आजम खान जब एक रेप पीडि़ता उनसे मिलने गई तो 'दुनिया को कैसे शक्ल दिखाओगी' कहकर फंस चुके हैं। कर्नाटक के गृहमंत्री केजे चार्ज हों या छत्तीसगढ़ के पूर्व गृहमंत्री रामसेवक पैकरा या फिर महाराष्ट, के पूर्व गृहमंत्री आरआर पाटिल यह सब नेता भी रेप पर विवादित बयान जारी कर चुके हैं। जार्च ने कहा था ' दो लोगों द्वारा किया रेप गैंग रेप नहीं है।' पैकरा ने कहा था ' रेप जान बूझकर नहीं धोखे से होता है। 'इसी तरह से पाटिल ने रेप मामले में फंसे एक उम्मीदवार को लेकर कहा था कि ' रेप करना ही था तो चुनाव के बाद करना था।' इसी तरह विवादत बयान जारी करने वालों में सीपीआई नेता अतुल अंजान एवं तृणमल कांग्रेस के तपस पाल भी पीछे नहीं रहे। 
खैर, इस तरह के बयान जारी कर तात्कालिक रूप से चर्चा में जरूर बना रहा जा सकता है लेकिन यह परिपक्वता की निशानी तो कतई नहीं कही जा सकती। इससे बयान जारी करने वालों की मानसिकता का स्तर तो पता चल ही जाता है। यह सिर्फ सस्ती लोकप्रियता पाने के अलावा और कुछ भी नहीं है। यह नारी शक्ति का अपमान है। यह बोलने की आजादी का सरासर दुरुपयोग है लेकिन दुर्भाग्य से इस दिशा में कोई सुधार होता दिखाई नहीं देता। राजनीतिक दल अक्सर संबंधित नेता का व्यक्तिगत मामला बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं तो बयानवीर भी बढ़ते विरोध के बाद पलट जाते हैं। ऐसे में सवाल शेष रह जाता है कि आखिर इस तरह के बयान जारी करने की जरूरत क्यों व कहां है?

पग-पग पर परीक्षा किसलिए

 टिप्पणी

दिवंगत अनुपम धींगड़ा की मां सुदर्शना को इन दिनों बार-बार एक ही सवाल परेशान कर रहा होगा कि आखिर सरकार उनसे चाहती क्या है? उनसे ऐसा क्या गुनाह हो गया जो पग-पर पर धैर्य की परीक्षा ली जा रही है। ऐसी कौनसी भूल हो गई जो अधिकारी उनके सम्मान से खिलवाड़ करने से गुरेज नहीं कर रहे? वो असमंजस में हैं और तय नहीं कर पा रही हैं कि आखिर किस किए की सजा मिल रही है। यकीनन यह बुजुर्ग महिला अपने उस फैसले को लेकर पछता रही होंगी तथा उस घड़ी को कोस रही होंगी, जब पुत्र की याद को चिरस्थायी रखने के लिए जीवनभर की कमाई सहर्ष दान कर दी थी। सरकार ने तब तो स्कूल का नामकरण उनके पुत्र के नाम पर कर दिया, लेकिन अब सरकार को इस नाम से परहेज हो गया लगता है। नियमों की आड़ में सरकारी नुमाइंदे अनुपम के नाम को मिटा देने पर आमादा हैं। ऐसा सालभर पहले भी हुआ। महीनेभर आंदोलन चला। नौबत यहां तक आ गई कि सुदर्शना को अपना सम्मान तक लौटाना पड़ गया। आखिरकार प्रशासन को इस विद्यालय को मर्ज से मुक्त करना पड़ा। अब फिर वो ही कहानी दोहरा दी गई है। यह एक तरह की प्रताडऩा है। शासन-प्रशासन का यह रवैया बड़ा पीड़ादायक है। दानदाताओं को सम्मान के बजाय दर्द देना किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं हो सकता। अगर इसी तरह दर्द मिलता रहा है तो भला क्यों कोई दानदाता आगे आएगा।
बहरहाल, शहरवासियों की भावना से जुड़े इस मसले ने सभी राजनीति दलों को एक जुट कर दिया है। वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सुदर्शना के समर्थन में आ जुटे हैं। कई संगठन तो पिछली बार की तरह इस बार भी साथ हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि नियमों में बदलाव तब हो सकता है तो अब क्यों नहीं? अगर स्कूल मर्ज तब सही था तो क्यों बदला गया? और गलत था तो वही गलती दुबारा क्यों दोहरा गई? यह सवाल अधिकारियों को कठघरे में खड़ा करते हैं। आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि अधिकारियों ने आधी-अधूरी रिपोर्ट पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर भेजी। खैर, स्कूल को अगर मर्ज से मुक्त करना है तो फिर किसका इंतजार किया जा रहा है? और अगर सब कुछ पिछले साल की तर्ज पर ही करना है तो देरी क्यों की जा रही है? शहर की आवाज बने इस मसले में अब ज्यादा देरी ठीक नहीं। जनभावनाओं का आदर करते हुए सरकार को इस दिशा में तत्काल कदम उठाना चाहिए। ऐसा करना न केवल दानदाता का सही अर्थों में सम्मान होगा बल्कि शहर हित में भी होगा।

राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर के 21 जून 16 के अंक में प्रकाशित....

भोले के नंदी का सेवक है 'भोला'


अनुकरणीय काम
देश में गोवंश को लेकर अक्सर सियासत होती आई है। कइयों ने तो इसको सुर्खियों में बने रहने की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करने से भी गुरेज नहीं किया। बड़ी बात तो यह है कि गोवंश पर संकट देश-प्रदेश में कहीं पर हो, उनके कथित हितैषी सब जगह मिल जाएंगे। रैलियां निकालेंगे, प्रदर्शन करेंगे यहां तक बाजार तक बंद करवा देते हैं। एेसे गोभक्तों की भक्ति पर मेरे को संशय तब होता है, जब यह निरीह प्राणी संकट में फंसता है। बेरहमी से लोग निराश्रित गायों को डंडे मारते हैं। कुछ तो इतने निर्दयी होते हैं कि बिलकुल दया नहीं दिखाते। एेसा ही एक वाकया मेरे गांव के पास भी करीब चार माह पूर्व हुआ। एक सांड का आगे का पैर को किसी सिरफिरे ने काट दिया। सांड के पैर से ख्ूान रिसता रहा लेकिन किसी का ध्यान नहीं गया। घाव में कीड़े पडऩे शुरू हो गए थे। सड़क किनारे पड़े सांड की दशा पर किसी का दिल नहीं पसीजा। आखिरकार चचेरे भाई सुरेन्द्र उर्फ भोला ने जब इस सांड को देखा तो वह खुद को रोक नहीं पाया। उसने सांड की दशा करने वालों को बहुत कोसा। बाद में पिकअप में सांड को डालकर उसे वह गांव में ले आया और खुले बाड़े में उसकी सेवा में जुट गया। सांड के पैर की रोज दवा एवं पट्टी करने में जुट गया। सुरेन्द्र की सेवा का प्रतिफल यह रहा कि सांड के पैर का जख्म भरने लगा और कीड़े मर गए। करीब चार माह की लगातार सेवा के बाद जख्म ठीक तो गया लेकिन सांड का पैर छोटा है, लिहाजा सुरेन्द्र उसे बुजुर्गों सूनी पड़ी हवेली में ले आया। यहां रोज सुबह वह सांड को हरा चारा खिलाता है। सप्ताह में मंगलवार एवं शनिवार को वह सांड को नहलाता है। मैं मार्च के प्रथम सप्ताह में गांव गया था तब और अब जून के प्रथम सप्ताह में जाकर आया। वाकई सुरेन्द्र की मेहनत एवं सेवा का असर साफ-साफ दिखाई दे रहा है। सांड की सेवा उसकी दिनचर्या की हिस्सा बन गई है। सुरेन्द्र सांड को भोलेनाथ (शिव) का नंदी बताता है और ख्ुाद को उसका सेवक। दोंनों एक दूसरे से हिलमिल भी गए हैं। वाकई निरीह पशु भी हमदर्द को पहचान लेते हैं। 

इस जीवन का यही है रंग रूप.......


कई बार चाह के भी हम कुछ नहीं बोल पाते तो कई बार मजबूरी में भी लब सीलने पड़ते हैं। कितने भी प्रयास कर लिए जाएं लेकिन अंदर ही अंदर काफी कुछ टूटता है। सालता है। टीस जगाता है और दर्द देता है। तालमेल व सामंजस्य रखने के कारण इस दर्द को अक्सर पीना भी पड़ता है। यह एक तरह का समझाौता ही तो है, बिलकुल अलिखित सा, लेकिन आंखें चुगलियां कर देती हैं। पोल खोल देती हैं। तभी तो बरबस बरस पड़ती हैं नादान। नासमझ हैं ना, शायद भावनाओं के आवेग में खुद को रोक नहीं पाती, बह जाती हैं। इसी कशमकश का नाम ही तो जिंदगी है। हालांकि रात और दिन की तरह जीवन में सुख-दुख, धूप-छांव और उतार-चढ़ाव का दौर चलता रहता है लेकिन बदलाव कष्टकारी होता है। भले ही कहा गया हो कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है लेकिन यह बदलाव बड़ा चुभता है, खटकता है, अखरता है। फिर भी जीवन के रंग अनंत हैं अथाह हैं, असीमित हैं। न तो सभी के साथ सामंजस्य बैठ सकता है और बैठ भी जाए तो सभी संतुष्ट हों इसका कोई भरोसा नहीं हैं। होना, न होना भी तो आखिर जीवन का ही अंग हैं। खैर...........।

सरकारी फरमान- मास्टरजी स्कूलों में ना पहनें जीन्स


बस यूं ही 

यह तो सभी जानते हैं कि अपनी हाजिर जवाबी और हास्य के लिए हरियाणा का कोई जवाब नहीं है। यहां हास्य बात-बात में है। लेकिन एक और बात है जो हरियाणा को सबसे अलग करती है, वो है यहां के अजीबोगरीब फरमान। यहां के फरमान अक्सर सुर्खियों में ही रहते हैं। हालांकि फरमान के मामले में हरियाणा का पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश भी चर्चा में रहता आया है। खास बात यह है कि फरमान जारी करने में अधिकतर पंचायतों के नाम ही सामने आते रहते हैं। पंचायतों के फरमान विशेषकर पहनावे एवं संस्कारों पर केन्द्रित होते हैं। प्रेम विवाह करने वालों के प्रति भी पंचायतों का रुख हमेशा कड़ा ही रहा है। इस बार का फरमान चर्चाओं में इसीलिए है क्योंकि इसे किसी पंचायत ने जारी नहीं किया। बाकायदा यह सरकारी फरमान है और सर्वाधिक जागरुक माने जाने वाले शिक्षा जगत से जुड़ा हुआ है। यह अध्यापकों पर लागू होगा। हरियाणा के मौलिक शिक्षा निदेशालय ने कहा कि प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में अध्यापकों का जींस पहनकर आना वाजिब नहीं है, इसलिए अध्यापक सामान्य कपड़े पहनकर ही स्कूल आएं। बात यहीं तक खत्म नहीं होती। अध्यापकों को यह भी कहा गया है कि वे मौलिक शिक्षा निदेशालय आएं तो भी जिन्स ना पहनें। इस सरकारी फरमान को लेकर हरियाणा के साथ-साथ समूचे देश में एक नई बहस छिड़ी हुई है, हालांकि हरियाणा में अजीबो गरीब फरमानों की फेहरिस्त लंबी है। महज अंतर इतना है कि इस बार किसी पंचायत का ना होकर सरकारी है। वैसे हरियाणा एवं यूपी के कुछ अजीबोगरीब फैसलों पर नजर डालेंगे कभी हंसी के फव्वारे छूटंेगे तो कभी आश्यर्य से आंखें फटी की फटी रह जाएंगी। पिछले साल हरियाणा के फरीदाबाद में दुष्कर्म के एक आरोपी पर 50 हजार रुपए जुर्माना तथा पांच जूते सार्वजनिक रूप से मारने का फरमान जारी हुआ था। इसी तरह यूपी के बागपत के बावली गांव में लड़कियों के जीन्स पहनने पर पाबंदी लगा दी गई थी। फरमान का उल्लंघन करने वाले परिवारों का बहिष्कार का एेलान कर दिया गया। यूपी के ही निगोहां में एक महिला के शादी के तीन साल तक बच्चा नहीं हुआ तो पंचायत ने शादी खत्म कर पति-पत्नी को अलग-अलग रहने का फरमान सुना दिया। इसी तरह यूपी के मुजफ्फरनगर व सहारनपुर के दस गांवों में लड़कियों के मोबाइल उपयोग करने तथा जींस व टीशर्ट पहनने पर रोक लगा दी गई थी। यूपी व हरियाणा से इतर महाराष्ट्र के महिला मोर्चा का एक फरमान भी अच्छा खासा चर्चा में रहा था। नवी मुंबई के गोथीवाली में महिलाओं के नाइट गाउन या मैक्सी पहनकर बाहर जाने पर रोक लगा दी गई थी। फरमान न मानने पर पांच सौ रुपए जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया था। यूपी के बाबूगढ़ में जारी किए गए एक फरमान ने तो सोचने पर मजबूर कर दिया। यहां एक विवाहिता अपने प्रेमी के साथ भाग गई तो पंचायत ने फैसला सुनाया कि विवाहिता का पति प्रेमी की पत्नी को अपने साथ रख ले। हरियाणा एवं पंजाब के एक समाज ने महिलाओं के डीजे के आगे नाचने पर प्रतिबंध लगा दिया। फरमानों की इस सूची का कोई अंत नहीं है। इसमें कई तरह के हास्यास्पद तो कई आश्चर्यजनक फरमान हैं। रोहतक में दस साल से ऊपर के लड़कियों के सलवार कमीज पहनने का मामला हो चाहे, एक गौत्र में शादी करने वालों को गांव से दूरी बनाने का फरमान। या फिर गौत्र की लड़की से शादी करने वाले को उसको बहन मानकर दस रुपए शगुन देने का फैसला। इस तरह एक से एक फरमान हैं। खैर, यह सभी फरमान पंचायतों की ओर से जारी किए गए हैं लेकिन ताजा फरमान सरकारी है और अध्यापकों से जुड़ा है, इसलिए बवाल मचना तय मानिए। वैसे समय के साथ कदमताल कर रहे देश में इस तरह के बेतुके फरमान बेमानी हैं।

यह टालमटोल क्यों?

 टिप्पणी

तो क्या यह मान लेना चाहिए कि माननीय न्यायालय के आदेशों के प्रति नगर परिषद प्रशासन गंभीर नहीं है? तो क्या इस बात पर यकीन कर लेना चाहिए कि शहर में जनप्रतिनिधि/ रसूखदार जैसा कहेंगे और चाहेंगे वैसा ही होगा? तो क्या वाकई नगर परिषद के अधिकारी, जनप्रतिनिधियों के दबाव के आगे नतमस्तक होकर माननीय न्यायालय के आदेशों को नजरअंदाज करते हैं? यह तीन सवाल मौजूदा हालात को बयां करते हैं और निगम प्रशासन को कठघरे में खड़ा करते हैं। बहुप्रतीक्षित अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर निगम प्रशासन के अधिकारियों की सुस्त तैयारी और जनप्रतिनिधियों की अतिसक्रियता के चलते इस मामले में सवाल उठना स्वाभाविक है। उनकी कार्यशैली, हावभाव एवं भूमिका से लगता ही नहीं है कि वे अतिक्रमण हटाने के प्रति गंभीर हैं। गंभीरता इसीलिए भी नहीं है क्योंकि अतिक्रमण को लेकर सियासी नफा-नुकसान तलाशे जाने लगे हैं। दरअसल, अतिक्रमण की जद में कुछ रसूखदार एवं जनप्रतिनिधि भी हैं। इस मसले को टाला कैसे जाए या बचा कैसे जाए, इसको ध्यान में रखकर नया पेंच फंसाने की कवायद हो रही है। विडम्बना देखिए जनप्रतिनिधियों को अतिक्रमण हटने के बाद पैदा होने वाले हालात की चिंता सता रही है जबकि निगम के अधिकारी मौसम को लेकर आशंकित हैं। बहाने खोजे जा रहे हैं। बजट नहीं है, जनाक्रोश भड़क सकता है। बारिश में हालात भयावह हो सकते हैं, आदि-आदि। कोई बता सकता है कि बहाने गढऩे वाले और भविष्य को लेकर चिंता जताने वाले पांच माह से क्या कर रहे थे? जाहिर सी बात है कि अतिक्रमण हटेंगे तो मलबा भी होगा, यह बात इन सभी को पता है लेकिन इसकी याद अभियान शुरू होने के आसपास ही क्यों आती है? यह सवाल अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों की नेक नियति को संदिग्ध बनाता है। कितना अच्छा होता ये लोग बहाने बनाने या अभियान को टालने के कारण खोजने के बजाय समस्या का समाधान तलाशते। जनप्रतिनिधि आगे चल कर अभियान में प्रशासन का सहयोग करने की पहल करते। बदकिस्मती से ऐसा हो नहीं हो रहा है। उल्टे जनप्रतिनिधियों की तरफ से राह में रोड़े अटकाने के उपक्रम किए जा रहे हैं। लाल निशान तक लगाने में उदासीनता बरती जा रही है। उनकी भूमिका से जाहिर हो रहा है कि उनकी दिलचस्पी अतिक्रमण हटाने में कतई नहीं है। जनप्रतिनिधि होने के नाते उनका मकसद यह होना चाहिए कि अभियान चले, भले ही शुरुआत कहीं से हो। जब सारे ही अतिक्रमण हटने हैं तो पहले यहां से क्यों जैसे सवाल करना ही बेमानी है। खैर, अभियान कारगर तरीके से चले। उसमें किसी तरह की बहानेबाजी और भेदभाव ना हो। अधिकारी किसी तरह के दवाब में ना आएं। किसी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप ना हो। ऐसा होगा तभी माननीय न्यायालय के आदेशों की पालना की सार्थकता है। और अगर औपचारिकता ही निभानी है तो फिर वो तो कैसे भी निभाई जा सकती है। अधिकारियों एवं जनप्रतिनियों के मौजूदा रुख से तो आसार इसी बात के दिखाई दे रहे हैं कि वे अभियान को महज रस्मी मानकर ही चल रहे हैं।
राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर के 2 जून 16 के अंक में प्रकाशित...

पत्रकारिता दिवस के बहाने


बस यूं ही 

पत्रकारिता दिवस के मौके पर आज फेसबुक पर कई साथियों के अनुभव जानने और पढऩे को मिले। किसी ने जमात की बिलकुल बेबाकी से बखियां उधेड़ी तो किसी ने बीच का रास्ता निकालकर अपनी बात बड़ी चतुराई से पेश की। यह सही है कि सभी लोग अपनी हकीकत जानते हैं। पत्रकार जमात भी उससे अछूती नहीं हैं। लेकिन मुझसे भला न कोय की तर्ज पर बुरा बनना भी कौन चाहता है। वैसे, कमोबेश हर क्षेत्र में दो तरह के लोग होते हैं। जमीर को जिंदा रखने वाले और जमीर का दम घोंटने वाले। इनके अलावा एक तीसरी प्रजाति भी होती है, जो अंदर ही अंदर जमीर को मारती भी है और दिखावे के तौर पर जिंदा रखने का ढोंग भी करती है। मैं पत्रकारिता में सबसे खतरनाक इस तीसरी प्रजाति को ही मानता हूं। तीसरी प्रजाति मतलब जिनके दो चेहरे होते हैं। सार्वजनिक रूप से ऐसे लोग छदम तरीके से बहुत ही नेक, ईमानदार एवं सिद्धांतवादी होने का ढिंढोरा पीटते हैं/ दिखावा करते हैं लेकिन अंदर खाने यही लोग जरा सा प्रलोभन मिलने पर ईमान से समझौता करने से नहीं चूकते। ऐसे उदाहरण एक दो नहीं दर्जनों हैं।
खैर, पत्रकारिता के मूल्यों में आ रही गिरावट के लिए लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, उदाहरण देते हैं, लेकिन खुद का गिरेबान नहीं झांकते। मेरा मानना है कि आप वो ही कहो जो आप करते हैं या करना पसंद करते हैं। मतलब कथनी और करनी में भेद नहीं होना चाहिए। आप प्याज का सेवन करते हैं तो आपको कोई अधिकार नहीं है आप लोगों से प्याज न खाने का आग्रह करें। ऐसे लोगों के लिए मेरे को शकील बदायूंनी के शेर ' पायल के गमों का इल्म नहीं, झंकार की बातें करते हैं, दो कदम जो कभी चले नहीं रफ्तार की बातें करते हैं... का भान हो उठता है। पत्रकारिता के मूल्यों एवं सिद्धातों को शिद्दत से निभाने वाले साथी माफ करें लेकिन मेरी आंखों ने ऐसे-ऐसे सच भी देखे हैं कि बताते हुए भी बड़ी कोफ्त होती है। पैगों के लिए प्रायोजक ढूंढने वालों को भी नैतिकता का पाठ पढ़ाते देखा है। लब्बोलुआब यह है कि जनता की नजरों में जो बदनाम हैं वो बदनाम ही रहते हैं। और चढ़ गए वो अक्सर चढ़े ही रहते हैं लेकिन दुख इस तीसरी प्रजाति से होता है। इस प्रजाति से सभी दुखी हैं। आखिरकार इसके घालमेल ने सारा गुड़ गोबर एक कर रखा है।
नोट - यह पोस्ट किसी भी तरह का प्रलोभन न लेने तथा ईमानदारी व जुनून के साथ पत्रकारिता धर्म निभाने वाले साथियों के लिए नहीं हैं। इसलिए इसे पढ़कर वे दिल पर ना लेवें