Saturday, July 27, 2019

नहरों में दूषित पानी

-प्रसंगवश
पंजाब से राजस्थान आने वाली नहरों में दूषित पानी आने का सिलसिला पुराना है। पंजाब के प्रमुख शहरों का बायोवेस्ट, सीवरेज का पानी तथा कारखानों का अपशिष्ट नदियों में मिलता है और इन्हीं नदियों का पानी नहरों के माध्यम से राजस्थान आता है। इस पानी का उपयोग श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ सहित प्रदेश के दस जिलों के लोग करते हैं। इस दूषित पानी को लेकर समय-समय पर विरोध के स्वर मुखरित होते रहे हैं लेकिन जिम्मेदारों पर इसका कभी कोई असर नहीं पड़ा और दूषित पानी नहरों में बदस्तूर आता रहा। एक बार फिर श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले में इस दूषित पानी के खिलाफ लोग लामबंद होने लगे हैं। जागरूक लोग और संगठन, केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तक अपनी गुहार लगा चुके हैं। बैठकों का दौर जारी है। बड़े आंदोलनों की रूपरेखा तय हो रही है। मतलब साफ है स्वास्थ्य से जुड़े इस मसले पर लोग समझौता करने के पक्ष में नहीं हैं। आंदोलन की इसी कड़ी में श्रीगंगानगर के पंजाब के पटियाला गए प्रतिनिधिमंडल के सामने पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नुमाइंदे स्वीकार कर चुके हैं कि राजस्थान जा रहा पानी पीने योग्य नहीं है। पन्द्रह मिनट तक इस पानी से नहाने पर एलर्जी हो जाती है, तो पीने से होने वाले नुकसान का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। इधर, राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का बीकानेर क्षेत्रीय कार्यालय इसी नहरी पानी के नमूने लेने के बावजूद कभी यह बताने की स्थिति में नहीं होता है कि पानी में प्रदूषण की मात्रा कितनी है। नमूने जयपुर और वहां से कोटा स्थित प्रयोगशाला में भी भिजवाए जाते हैं, पर शायद ही कभी नमूनों को सार्वजनकि किया गया हो। बल्कि हमेशा यही बताया जाता रहा है कि पानी सही है। खैर, पंजाब में नदियों में मिलते गंदे नालों के चलते फैल रहे प्रदूषण ने जो जन विरोध खड़ा किया है, वह किसी बड़े संकट की आहट है।
----------------------------------------------------------------------------------------------
6 जुलाई 19 को राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पेज पर प्रकाशित। 

कब तक लगेंगे कट



इन दिनों सोशल मीडिया पर बिजली को लेकर एक जुमला जबरदस्त तरीके से वायरल हो रहा है। मजमून कुछ इस तरह से है। कर्मचारी कहता है, सर बाहर नीम के पत्ते हिल रहे हैं। इस पर अधिकारी कहता है लाइट काट, आंधी आ गई। खैर, श्रीगंगानगर में न नीम के पत्ते हिल रहे हैं और न ही आंधी आ रही है। लेकिन बिजली फिर भी कट रही है। बिजली कटने का कोई समय निर्धारित नहीं है। यह रात को भी गुल हो जाती है और और दिन में भी। ये कट उस घोषित कटौती से अलग हैं जो विद्युत निगम शहर के किसी न किसी कोने में रखरखाव के नाम पर रोज करता है। रखरखाव कितना हुआ, कैसा हुआ यह अलग विषय है लेकिन आंधी आने पर बिजली गुल होना तो तय है। भले ही एहतियातन कटे या आंधी से नुकसान की आशंका के चलते लेकिन बिजली जाती जरूर है। खैर, बीते चौबीस घंटे में श्रीगंगानगर में आंधी, तूफान या बारिश जैसा कुछ नहीं लेकिन बिजली के असंख्य कट बदस्तूर लग रहे हैं।
निगम की ओर से बताया जा रहा है कि मौसम अनुकूल न होने के कारण बिजली की खपत लगातार हो रही है। इसी कारण लाइन ट्रिप हो रही है। जंपर उड़ रहे हैं। अब यह बिजली की खपत कैसे बढ़ती है? क्यों बढ़ती है? यह निगम के अधिकारी बखूबी जानते हैं। यकीनन वो इसका संतोषजनक जवाब भी बता देंगे लेकिन शायद यह नहीं बता पाएंगे कि खपत बढऩे में ईमानदार उपभोक्ताओं का योगदान या दोष क्या है? और अगर कोई दोष या योगदान नहीं है तो यह सिलसिला कब तक चलेगा और ईमानदार उपभोक्ता अपनी ईमानदारी की कीमत कब तक चुकाएगा। विद्युत निगम रखररखाव के नाम पर विद्युत चोरी क्यों नहीं पकड़ता? निर्धारित लोड से ज्यादा बिजली खर्च करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं करता? निगम यह सब करने लग जाए तो ईमानदार उपभोक्ताओं को अपनी ईमानदारी की कीमत नहीं चुकानी पडेग़ी। ईमानदार उपभोक्ता उसकी सजा भोगे ही क्यों जो गलती उसने की ही नहीं। विद्युत निगम से कुछ छिपा नहीं है। एेसा संभव ही नहीं है कि ज्यादा लोड या बिजली चोरी का निगम को पता नहीं हो।
बहरहाल, प्रतिकूल मौसम या तकनीकी कारणों से बिजली गुल होना आम है लेकिन कट लगना व बार-बार लगना तथा गर्मी के मौसम में लगना कहीं न कहीं निगम की कार्यकुशलता को कठघरे में खड़ा करता है। उम्मीद की जानी चाहिए निगम के अधिकारी व कर्मचारी लाइन के रखरखाव के नाम पर पेड़ों की छंगाई या तार कसने तक ही सीमित नहीं रहेंगे बल्कि विद्युत चोरी करने वालों को भी चिन्हित करेंगे। विद्युत चोरी सिर्फ कुंडी डालना ही नहीं है। निर्धारित लोड से ज्यादा बिजली उपभोग करना भी तो एक तरह की चोरी ही है।
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 30 जून 19 के अंक में  प्रकाशित 

घर में नहीं दाने...!

श्रीगंगानगर नगर परिषद हो या नगर विकास न्यास। दोनों ही निकायों में बैठे जिम्मेदारों को पता नहीं यह बात समझ नहीं आती या फिर वो जानबूझकर ऐसा करते हैं। क्या उनको पता नहीं कि शहर के लिए कौनसा काम जरूरी है तथा किस काम को प्राथमिकता से करवाया जाना चाहिए। अलबत्ता, इन दोनों ही निकायों की भूमिका भूखे आदमी को पेट भरने के लिए रोटी देने के बजाय मिठाई के सपने दिखाने जैसी रही है। श्रीगंगानगर शहर की हालत कमोबेश उस भूखे आदमी जैसी ही है। शहर के लिए जो काम सबसे पहले होना चाहिए, वह होता नहीं है और जो जरूरी नहीं है, उसके लिए प्रस्ताव बनते हैं।
अब नगर परिषद ने श्रीगंगानगर में गुजरात के सूरत शहर की तर्ज पर पार्कों में ओपन जिम लगवाने के लिए डेढ़ करोड़ रुपए खर्च करने का निर्णय किया है। इसी तरह पार्कों में पक्षी विहार बनाने पर 1.40 करोड़ रुपए का बजट है। इधर, पदमपुर रोड स्थित कल्याण भूमि व पुरानी आबादी स्थित कब्रिस्तान में सौन्दर्यीकरण के नाम पर भी पचास लाख रुपए खर्च किए जाने हैं। यह ठीक है, समय के साथ चलना चाहिए। सुविधाओं में विस्तार हो, लेकिन मूलभूत सुविधाओं में सुधार के बिना यह काम किस तरह उचित ठहराए जा सकते हैं। क्या श्रीगंगानगर के अधिकतर पार्क हरे-भरे हैं? क्या वहां लगे पेड़-पौधे सुरक्षित हैं? क्या पार्कों की देखरेख, रखरखाव व सुरक्षा की कोई स्थायी व्यवस्था है? हकीकत तो यह है कि चाहे नगर विकास न्यास के पार्क हो या फिर नगर परिषद के, अधिकतर पार्क बदहाल हैं। सुबह-शाम चैन व सुकून तलाशने के लिए इन पार्कों में आने वालों को निराशा ही हाथ लगती है। क्या ओपन जिम से ज्यादा जरूरी वहां हरियाली नहीं है? क्या पक्षी विहार से ज्यादा वहां सुविधाएं व उनके रखरखाव की व्यवस्था आवश्यक नहीं है?
खैर, क्या जरूरी है और क्या जरूरी नहीं है, यह जिम्मेदारों को अच्छी तरह से पता है। फिर भी इस तरह के बेवजह पैसे खर्च करने के प्रस्ताव तैयार किए जाते हैं। शिव चौक से जिला अस्पताल तक सडक़ किनारे टाइल्स लगाने का काम इसकी जीती-जागती नजीर है। टाइल्स लगाने के बाद इस रास्ते का स्वरूप कैसा रहा तथा यह आम आदमी के लिए कितना मुफीद रहा, किसी से छिपा नहीं है। कोई बड़ी बात नहीं कि टाइल्स लगाने जैसी ही कहानी ओपन जिम, पक्षी विहार तथा कब्रिस्तान व कल्याण भूमि के सौन्दयीज़्करण की हो। बात नवाचार की नहीं बल्कि नवाचार से आम आदमी को होने वाले फायदे की होनी चाहिए। विडम्बना देखिए बदहाल पार्कों की दशा सुधारने के लिए भले ही बजट न हो लेकिन सूरत शहर की तर्ज पर ओपन जिम व पक्षी विहार के लिए पैसा है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पार्कों को बदहाल करने में नगर परिषद की भूमिका ही सबसे ज्यादा रही है। बरसात के समय गलियों में भरने वाले पानी को जब पम्पों व मोटरों के माध्यम से पार्कों में डाला जाता है, तब जिम्मेदारों को इन पार्कों पर तरस नहीं आता। ड्रेनेज व सीवरेज मिश्रित पानी की दुर्गन्ध पार्कों को दूषित करती है, तब जिम्मेदारों को यह सब दिखाई नहीं देता। कितना बेहतर होता शहर की पानी निकासी के लिए कोई ठोस, कारगर व दूरदर्शी प्रस्ताव तैयार होता। पर ऐसा करने के लिए इच्छा शक्ति चाहिए और यह कोई मुश्किल काम भी नहीं।
ईमानदारी से इस दिशा में काम किया जाए तो समाधान संभव है लेकिन जिनको हर साल पानी निकासी के नाम पर बजट खर्च करने की आदत पड़ी हो वो भला इसका स्थायी समाधान खोजकर इस खर्च पर पूर्ण विराम कैसे लगवा सकते हैं?
बहरहाल, शहर के हालात अच्छे नहीं हैं। बात पार्कों की नहीं है। सडक़ हो, नाली हो, सफाई हो या निराश्रित पशु हो। बदंरग चौक-चौराहे हो या फिर बेपटरी सफाई व्यवस्था। इनके सुधार के लिए भी तो कोई प्रस्ताव बने। माना बरसाती पानी की शहर से निकासी नगर परिषद के जिम्मेदारों के लिए बड़ा काम है लेकिन छिटपुट समस्याओं का समाधान न खोज पाना भी उनकी कार्यकुशलता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। इतना ही नहीं, जैसा कि कुछ पार्षदों ने कहा है कि परिषद का खजाना खाली है। अगर यह बात सच है तो फिर इस तरह के प्रस्ताव बनाना भी तो 'घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने' जैसा ही है।
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 26 जून 19 के अंक में प्रकाशित ।

विकास के लिए बदलाव जरूरी

पिछले चार दिन से झुंझुनूं के प्राइवेट बस स्टैंड (ताल) से चलने वाली बसों का आवागमन बंद है। बसें बंद होने की प्रमुख वजह प्राइवेट बस स्टैंड को ताल से खेमी शक्ति मंदिर के पास शिफ्ट करने का निर्णय है। पिछले सात साल से ज्यादा समय से खेमीशक्ति के पास बस स्टैंड बनकर तैयार है लेकिन राजनीतिक इच्छा शक्ति और वोट बैंक के नफे नुकसान के चक्कर में यह मामला सिरे नहीं चढ़ा। दिन प्रतिदिन बढ़ते यातायात व शहर के अंदरूनी इलाकों में लगने वाले जाम से पार पाने के लिए करीब दशक भर पहले एक प्रयोग किया गया था। प्रयोग काफी कारगर रहा था। दरअसल गांधी चौक से मल्टीपर्पज स्कूल जो अब शहीद जेपी जानू के नाम से जानी जाती है तक सुबह-शाम दो घंटे वन वे किया गया था। इसका भी एक बार दबे स्वर में विरोध हुआ था लेकिन जब लोगों के समझ में आया कि यह फैसला उनकी सहुलियत है लिए तो फिर यह सबकी आदत में आ गया। सुबह-शाम दो-दो घंटे के वन वे से आवागमन काफी सुगम हो चला है। चूंकि वाहनों की संख्या दिनोदिन बढ़ रही है, इस कारण पंचदेव से लेकर ताल तक दिन भर जाम बना रहता है। इसी जाम को खत्म करने व आवागमन सुचारू करने के मकसद से झुंझुनूं जिला कलक्टर ने बस स्टैंड खेमी शक्ति के पास शिफ्ट करने के लिए हरी झंडी दे दी। तब से ही इसका विरोध होना शुरू हो गया। ताल के रेहड़ी वाले व दुकानदार ग्राहकी पिटने का हवाला देकर आंदोलन कर रहे हैं लेकिन बस ऑपरेटर्स का आंदोलन में शामिल होकर बसों का संचालन रोकना समझ से बाहर है। बस स्टैंड शिफ्ट करने के फैसले से पता नहीं उनको क्या भय सता रहा है। वैसे भी बस स्टैंड शिफ्ट होने से उनको प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से किसी प्रकार का नुकसान नहीं है। और भविष्य में नुकसान होगा ऐसा भी नहीं लगता, क्योंकि ग्रामीण बसें उस रुट पर चलती हैं, जहां रोडवेज बसें न के बराबर हैं। एेसे में जिसको गांव से शहर आना जाना है पहले की तरह इन्हीं बसों में आएगा जाएगा।इसलिए बस आपरेटर्स की मांग बेतूकी है। अपने गांव से झुंझुनूं आने वाला ताल उतरे या खेमी शक्ति उससे बस आपरेटर्स को कोई फायदा या नुकसान नहीं है। जब ऐसा है तो फिर बस ऑपरेटर्स खुद का हित देखने के बजाय दूसरों के दुख में क्यों दुबले हुए जा रहे हैं। वो खुद का नुकसान करके तथा जनता को परेशान करके जबरन हितैषी क्यों बन रहे हैं। रेहड़ी वालों को एक स्थायी जगह आवंटित की जा सकती है। रहा मामला दुकानदारों का तो उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि ताल में बस से उतर कर लोग गांधी चौक, नेहरू बाजार, और आगे जेपी जानू स्कूल तक आबाद दुकानों पर भी तो बिना बस के ही जाते हैं। वह वहां जाया सकता है तो ताल में भी आया जा सकता है।.ताल.तो खेमी शक्ति बस स्टेंड के सबसे करीब भी रहेगा। 
खैर, बस स्टैंड के विरोध के साथ अब समर्थन में भी लोग सामने आने लगे हैं। यह होना भी चाहिए। यह फैसला शहर हित में है। यह बढ़ते शहर के यातायात दबाव को कम करने के लिए जरूरी है। अगर आज किसी अच्छे फैसले का समर्थन नहीं किया गया तो एक गलत परंपरा शुरू होने का खतरा हमेशा बना रहेगा। फिर तो कोई भी भीड़ एकत्रित कर दवाब बनाकर अपनी बातें मनवाता रहेगा। आज सारे के सारे जनप्रतिनिधि भी वोटों की राजनीति के चक्कर में चुप्पी साधे बैठे हैं। मतलब सही को सही कहने का साहस उनमें भी नहीं रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि, विकास के लिए बदलाव जरूरी है। यह बात आंदोलन करने वालों को समझनी चाहिए। उनको तात्कालिक नुकसान के बजाय दूरगामी फायदे को देखना चाहिए। धन्यवाद के काबिल हैं वो लोग जो इस बस स्टैंड को शिफ्ट करने के समर्थन में रैली निकाल रहे हैं।
बहरहाल, बस की हड़ताल से आम लोगों को रही है तकलीफ को भी जिला कलक्टर ने शिद्दत से महसूस किया है। उन्होंने रोडवेज प्रबंधन से बात करके ग्रामीण रुटों पर रोडवेज बसें संचालित करने को कहा है। यह सही भी है। आजकल हड़ताल किसी की होती है लेकिन कंधा किसी दूसरे का इस्तेमाल करके अपना उल्लू सीधा करने की परिपाटी सी चल पड़ी है। ग्रामीण रुटों पर रोडवेज बसों के संचालन से यह परिपाटी भी टूटेगी। जिला कलक्टर का निर्णय शहर हित में है। इस फैसले से प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से लाभान्वित होने वालों की संख्या विरोध करने वालों से कहीं ज्यादा है, बहुत ज्यादा है, लिहाजा बहुमत जिला कलक्टर के फैसले के साथ है। फिर भी जरूरी है उनके फैसले के समर्थन में ज्यादा से ज्यादा लोग उठ खड़े हों ताकि आमजन को तकलीफ में डालकर दबाव की रणनीति से अपनी मांगें मनवाने वाले अपने मंसूबों में कभी भी कामयाब न हो। चूंकि मैं भी इस जिले का जन्मा जाया हूं तथा पांच साल झुंझुनूं प्रवास के दौरान इस समस्या को न केवल नजदीक से देखा है बल्कि भोगा भी है। इसलिए मैं जिला कलक्टर के फैसले स्वागत करता हूं। मैं भी चाहता हूं कि प्राइवेट बस स्टैंड खेमी शक्ति मंदिर के पास शिफ्ट हो।
आखिर में एक बात और मेरे गांव से झुंझुनूं जाने वाली प्राइवेट बसें भी बंद हैं। बसों की हड़ताल से तकलीफ मेरे गांव के भाई-बंधुओं तथा इस रुट के अन्य लोगों को भी हो रही है। इतना ही नहीं मेरे गांव वाले रूट पर रोडवेज बसों की भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हुई लेकिन इसके बावजूद मैं बस स्टैंड को शिफ्ट करने के फैसले के साथ हूं। क्योंकि मैं.सही को सही कहने का हिमायती तथा सच का सारथी हमेशा रहा हूं।

सीनाजोरी

35वीं लघु कथा
'अरे सात नहीं दस रुपए निकाल, पूरे दस ही लगेंगे।' रोडवेज बस परिचालक तैश में आकर बोला तो सवारी को भी गुस्सा आ गया। उसने झट से दस रुपए का नोट निकाला और परिचालक को थमाते हुए कहा, 'यह लीजिए दस रुपए, अब आप टिकट दे दीजिए।' 'अरे टिकट किस बात की। टिकट लेगा तो फिर बीस रुपए लगेंगे। तेरे को इतनी रात को बीच से बैठाया है। यहां कोई स्टैंड नहीं है। शुक्र मना तेरे दस कम लग रहे हैं। वरना टिकट पिछले स्टैंड से बनेगा। ' परिचालक कड़क आवाज में बोला। सवारी को अब कोई बात नहीं सूझ रही थी। उसने पलट कर इतना भी नहीं पूछा कि जब निर्धारित स्टैंड ही नहीं था तो आपने बस रोकी ही क्यों? लेकिन ज्यादा पैसे ना लगे इस डर व लालच के चलते वह परिचालक की सरेआम चोरी और सीनाजोरी को न चाहते हुए भी बर्दाश्त करता रहा।

यादगार दिन...

कल यानी 22 जून का दिन मेरे लिए खास होता है। इस बार गांव में मकानों की मरम्मत के सिलसिले में 18 जून को गांव गया था। 21 जून शाम को वहां से चलकर 22 जून सुबह श्रीगंगानगर पहुंचना तय था। लेकिन एन वक्त पर प्लान बदला और फिर तय किया कि 22 को सुबह जल्दी चलकर शाम चार बजे तक श्रीगंगानगर पहुंच जाऊंगा। हर बार इसी बस से जाता हूं। खैर, सुबह छह बजे उठ भी गया लेकिन...थोडी सी देर और सोने के लालच में आंख ऐसी लगी कि जागा तब घड़ी 9.58 बजा रही थी। मेरे होश फाख्ता हो गए थे। फटाफट घर का सारा सामान जमाया। कमरों के ताले लगाए....फिर तैयार हुआ तब तक 11.30 हो गए थे। घर की चाबी काकीसा को देने गया तो उन्होंने खाना खाने को कहा लेकिन मुझे और लेट नहीं करनी थी। मैंने छाछ एक कप पीया और फटाफट बस स्टैंड आया। वहां आकर पता चला कि बसों की हड़ताल है। अब संकट यही था अगले शहर के स्टेंड तक कैसे पहुंचा जाए। खैर,एक बाइक सवार से लिफ्ट मांगी और सुलताना आया...तेज धूप व उमस से मैं पसीना पसीना था...। तभी वहां जूस की रेहड़ी पर बिल्व का जूस पीया...और बस का इंतजार करने लगा। साढे बारह हो चुके थे तभी बस आई....और उससे चिड़ावा पहुंचा। वहां भी आधा घंटे के इंतजार के बाद बस आई और पिलानी पहुंचा। तब तक दो बज चुके थे। पिलानी में प्यास लगी तो पानी की बोतल ली लेकिन पानी पीते ही गले में तेज दर्द होने लगा...पानी की एक बूंद गटकना भी बड़ा पीडादायक लगा। गले में अचानक तकलीफ मेरी समझ से बाहर थी। राजगढ पहुंचा तब तक 3.50 हो गए थे। वहां भादरा के लिए बस खड़ी थी लेकिन ठसाठस भरी थी, लिहाजा मैं उससे नीचे उतर गया और दूसरी बस का इंतजार करने लगा। इस बीच सेव का ज्यूस लाया। बोतल एकदम ठंडी थी...जैसे ही पहला घूंट लिया गले में तेज जलन और चिरमिराहट होने लगी। दर्द से पसीना पसीना हो गया था। बोतल को बैग में रखकर में बस में आकर बैठ गया। साढे चार बजे चुके थे। बस की रवानगी का टाइम पांच बजे था। मतलब घर से राजगढ तक की 75 किमी की दूरी में साढे पांच घंटे बीत गए थे। पांच बजे चलकर बस साढे छह बजे भादरा पहुंची...यहां चाय पी तो कुछ आराम सा मिला...फिर तय किया कि ठंडे पानी से ही तकलीफ है। इसके बाद ठंडे पानी की बजाय सामान्य पानी ही पीया।
भादरा से बस सवा सात बजे रवाना हुई। हनुमानगढ पहुंचा तब सवा दस हो चुके थे। मुझे हार हाल में बारह बजे से पहले श्रीगंगानगर पहुंचना था लेकिन तब श्रीगंगानगर के लिए कोई साधन नहीं था..। पूछा तो बताया कि बस तो है लेकिन साढे ग्यारह बजे आएगी....मेरे माथे पर शिकन थी...पता था साढे ग्यारह चलकर बारह बजे तक श्रीगंगानगर नहीं.पहुंचा जाएगा। ऐसे में तय किया कि हनुमानगढ से गाड़ी किराये पर ली जाए। गाड़ी फोन पर बुक करवाकर मैं उसका इंतजार करने लगा। तभी एक कार आकर रुकी, मैं उम्मीद भरी नजरों से उसकी ओर गया...और यकीनन जैसा सोचा वैसा ही हुआ...कार श्रीगंगानगर ही आ रही थी। मैं फटाफट उसमें बैठा। रात 11.29 पर उसने मुझे श्रीगंगानगर के चहल चौक उतारा। उस वक्त वहां कोई ऑटो रिक्शा नहीं था, लिहाजा करीब डेढ किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय की....घर पहुंचा तब तक पौने बारह हो गए थे। उस वक्त बच्चे व निर्मल मेरा ही इंतजार कर रहे थे। पसीने से शरीर कचपचा रहा था, सो सबसे पहले बाथरूक घुसा। नहाकर बाहर निकला तो तीनों ने कमरे का गेट बंद कर दिया...लाइट आफ की और कहा अब बाहर आओ....बाहर गया तो मेज पर केक सजा था....सरप्राइज था यह मेरे लिए...इसके अलावा दो टी शर्ट भी बतौर उपहार मेरे लिए लाई गई थी....फिर हम सबने मिलकर केक काटा....एक दूसरे को विश किया....रात का एक बजने को था....तेज धूप व उमस में बारह घंटे की यात्रा वह भी सात अलग अलग साधनों से तय करने के बाद थकान से बदन दोहरा होना तय था लेकिन वर्षगांठ के जश्न में यह सारी थकावट दूर हो गई थी...एक यादगार दिन.....।

अब तो जागो सरकार!

निर्विवाद सत्य है कि राजस्थान में सरकार चाहे किसी भी दल की रहे, वह पंजाब से अपने हिस्से का निर्धारित पानी लेने में कभी सफल नहीं हुई। चाहे दोनों प्रदेशों में सरकार एक दल की हो, फिर समान विचारधारा या गठबंधन में सहयोगी दल की हो, लेकिन पानी की समस्या का हल कभी नहीं हुआ। निर्धारित पानी नहीं लेने के साथ-साथ राज्य सरकार के समक्ष दूसरी बड़ी चुनौती शुद्ध जल की भी है। शुद्ध जल पीने का सपना भी कमोबेश निर्धारित पानी न लेने जैसा ही है। यह सर्वविदित है कि पंजाब से जुडऩे वाली राजस्थान की सभी नहरों में दूषित पानी लंबे समय से आ रहा है। पंजाब में नदियों किनारे आबाद शहरों में संचालित कारखानों, उद्योगों का अपशिष्ट, अस्पतालों का बायो मेडिकल वेस्ट व सीवरेज का पानी इनमें बहाया जाता है । इन्हीं नदियों का पानी इंदिरा गांधी नहर व गंगनहर के माध्यम से राजस्थान आता है। इंदिरागांधी नहर के पानी का उपयोग श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ सहित प्रदेश के आठ जिलों मंे होता है जबकि गंगनहर के पानी का उपयोग श्रीगंगानगर जिले के करीब आधे हिस्से में होता है।
खैर, पानी की कमी की तरह ही पानी को प्रदूषण मुक्त करवाने के लिए भी राजस्थान व पंजाब में समय-समय पर आवाज उठती रही है। एक बार फिर उठी है। इस बार खास बात यह है कि राजस्थान व पंजाब के संगठनों ने जनजागरण की मुहिम सामूहिक रूप से चलाने का निर्णय किया है। इसी मुहिम के तहत शुक्रवार को पंजाब के पटियाला में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) के अध्यक्ष व सदस्य सचिव को ज्ञापन भी दिया गया। दोनों प्रदेशों के सामूहिक प्रतिनिधिमंडल के समक्ष पीपीसीबी के अधिकारियों ने कबूला कि राजस्थान जा रहा पानी पीने के लायक नहीं है। इस पानी से पंद्रह मिनट तक नहा लिया जाए तो पीने के पानी से भी ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है। पीपीसीबी अधिकारियों ने न केवल वस्तुस्थिति से अवगत करवाया बल्कि गेंद सरकार के पाले में डालकर अपनी मजबूरी भी बता दी।
यह सही भी है कि इस गंभीर समस्या का निराकरण दोनों प्रदेशों की राज्य सरकारों की दृढ़ इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। चूंकि यह मामला न केवल स्वास्थ्य बल्कि सीधा-सीधा आमजन की जिंदगी से खिलवाड़ का है। नहरी पानी का उपयोग करने वाले जिलों मंे होने वाली गंभीर बीमारियों को साइड इफेक्टस के रूप में देखा जा सकता है। जानलेवा बन रहे इस पानी को अब रोकना होगा। परिणाम भयावह हो चुके हैं, लिहाजा सरकार को अब चेत जाना चाहिए। आखिरकार इससे भयावह हालात और होंगे भी क्या?
बहरहाल, शनिवार को श्रीगंगानगर आए जिले के प्रभारी मंत्री को भी इस गंभीर विषय से अवगत कराया गया। लोकसभा चुनाव से पहले यहां हुई जनसभाओं में स्वयं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी पानी के मुद्दे पर पंजाब सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह से व्यक्तिगत रूप से बात करने का आश्वासन भी दिया था। अब पहल सरकार को करनी है। सरकार को अब इस मसले में कोई सियासत या स्वार्थ खोजे बिना समाधान की दिशा में काम शुरू करना होगा। वरना अंतिम व आखिरी विकल्प कानून तो है ही। कानून आत्महत्या को अपराध मानता है, किसी को मरने की इजाजत नहीं देता, तो वही कानून हमारे लिए शुद्ध हवा व जल आदि में बाधक बने कारणों को दूर भी तो करवा सकता है। फिलहाल बिना वक्त गंवाए पहल राज्य सरकारों को करनी है, समय की मांग भी यही है। अब और देर ठीक नहीं है।
-------------------------------------------------------------------------------------------
राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 16 जून 19 के अंक में प्रकाशित 

Wednesday, June 12, 2019

मुकाम तक पहुंचे मुहिम

टिप्पणी
पंजाब से राजस्थान आने वाली नहरों में दूषित पानी आता है, यह सर्वविदित है। विशेषकर, श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के लोगों के लिए यह नई बात है भी नहीं। सभी को पता है नहरों में क्या-क्या बहकर आता है। नहरों मंें दूषित पानी का मसला भी ठीक वैसा ही है, जैसा कि नहरों में पानी कमी का। पीछे का इतिहास देखें तो दोनों मुद्दों में मोटा अंतर यही दिखाई देता है कि पानी कमी का मुद्दा जहां हमेशा चर्चा में रहता आया है, वहीं दूषित पानी का मुद्दा कभी-कभार या अवसर विशेष के दौरान ही उछला है। विधानसभा चुनाव के बाद एक बार फिर श्रीगंगानगर में दूषित जल मुद्दा बना है। 
पिछले तीन दिन से यह मुद्दा चर्चा में है। शनिवार को गंगानगर सांसद निहालचंद का बयान आया कि दूषित जल पर रोक लगाने की मांग संसद में उठाई जाएगी और इससे भी बात नहीं बनी तो धरना भी लगाया जाएगा। इसी बयान के अगले दिन शहर के कुछ लोगों का एक प्रतिनिधिमंडल, पत्रकारों के साथ पंजाब के उन स्थानों पर पहुंचता है, जहां सतुलज नदी में यह दूषित जल मिलता है और वहां से नहरों के माध्यम से राजस्थान में आता है। 
पत्रकारों को पंजाब का भ्रमण करवाने का उद्देश्य भी यही था कि वो भी उन स्थानों को देखें और लोगों को प्रदूषण की भयावहता व उसके परिणामों के बारे में गंभीरता से अवगत करवाएं। ‘दूषित जल- असुरक्षित कल’ नाम से शुरू की गई इस मुहिम के तहत बुधवार शाम को फिर बैठक बुलाई गई है। इसके अगले दिन गुरुवार को भी इसी तरह की बैठक पंजाब में प्रस्तावित है तथा वहां भी दूषित जल के खिलाफ मुहिम चलाने वाले संगठन के साथ मिलकर पटियाला में पंजाब प्रदूषण बोर्ड को ज्ञापन दिया जाएगा। शुद्ध जल हर आदमी को मिले तथा दूषित जल के खिलाफ जनजागरण हो, यह सभी चाहते हैं लेकिन अतीत के कुछ कड़वे अनुभवों के कारण इस मुहिम के शुरू होने के साथ सवाल उठने भी शुरू हो गए हैं। क्योंकि दूषित पानी को लेकर पूर्व में भी बड़ी-बड़ी बात कहने वालों ने जिस नाटकीय अंदाज में इस गंभीर मामले का पटाक्षेप किया, वह बेहद अफसोजनक रहा। लोग आज तक समझ नहीं पाए कि वो अभियान शुरू क्यों और किसलिए हुआ था और उसके अगुवाई करने वाले फिर यकायक शांत क्यों हो गए? चर्चा यह भी है कि जब राजस्थान में भाजपा और पंजाब में भाजपा-अकाली दल की सरकारी थी तब इस मामले में चुप्पी क्यों साधी गई? एक सवाल यह भी है कि कहीं यह निकाय चुनाव की तैयारी तो नहीं? खैर, सवाल उठते रहेंगे। उठने भी चाहिए। लेकिन इस तरह के गंभीर मसले में सियासत तो कतई नहीं होनी चाहिए। और हां, इसको व्यक्तिगत लाभ या दलगत लाभ-हानि के चश्मे से भी देखना नहीं चाहिए। 
बहरहाल, मुहिम अच्छी है। देर सवेर किसी को तो पहल करनी ही होगी । आमजन के स्वास्थ्य से जुड़ी यह मुहिम स्वागत योग्य है। उम्मीद करनी चाहिए यह मुहिम पूर्व के आंदोलनों से अलग होगी और बिना किसी राजनीति के मुकाम तक पहुंचेगी। और अगर यह मुहिम भी पूर्व के अनुभवों से आगे नहीं बढ़ी तो कोई बड़ी बात नहीं जनजागरणों की एेसी मुहिमों से जन की सहभागिता ही गायब हो जाए?
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगागर संस्करण में 11 जून 19 के अंक में प्रकाशित।

मनमर्जी की ‘लूट’

टिप्पणी
करीब तीन माह पहले की बात है। पड़ोसी जिले बीकानेर के जिला कलक्टर ने देर रात तक शराब की दुकानें खुलने की शिकायत पर शराब ठेकों का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्हें शहर में एक जगह शराब की दुकान खुली मिली। उन्होंने वहां से निर्धारित कीमत से ’यादा राशि चुकाकर शराब खरीदी। बाद में उन्होंने आबकारी अधिकारी को मौके पर बुलाया। इसी मामले में बाद में एक थानाधिकारी पर भी गाज गिरी। खैर, बीकानेर जैसे सूरतेहाल ही श्रीगंगानगर के भी हैं। यहां भी शराब की दुकानें देर रात तक खुलती हैं तथा निर्धारित कीमत से ’यादा राशि वसूल कर शराब बेची जा रही है, लेकिन यहां जिला प्रशासन ने इस मामले में कभी हस्तक्षेप नहीं किया। आबकारी व पुलिस विभाग दोनों एक दूसरे के क्षेत्राधिकार का मामला बताकर हमेशा कार्रवाई से बचते रहे हैं। हकीकत यही है कि शराब ठेके देर रात तक खुले रहते हैं। भले ही शटर नीचे गिरा हो लेकिन उसके बगल में बनाई गई मोरी (छेद) से काम बेधडक़ बदस्तूर चलता रहता है। दूसरी मनमर्जी यह है कि निर्धारित कीमत से ’यादा कीमत पर बिक्री हो रही है। मनमर्जी की कीमत वसूलने के लिए ठेकेदारों ने बकायदा पूल बना लिया है। वैसे पूल बनने से पहले भी ’यादा राशि ली जा रही थी। पूल बनने के बाद राशि और बढ़ा दी गई है। आश्चर्य की बात नहीं, श्रीगंगानगर में सुरा शौकीनों को ड्राइ डे के दिन भी शराब आसानी से सुलभ हो जाती है। इतना ही नहीं शराब ठेकों पर रेट लिस्ट तो शायद ही देखने को मिले। और किसी ने दिखावे के लिए लगा भी रखी तो है तो उसकी पालना नहीं होती। यह हाल जिला मुख्यालय का है, जहां पुलिस व आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी बैठते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह खेल बेखटके चलता है। वहां तो अवैध ब्रांचें तक खुलने की शिकायत मिली हैं। मतलब जहां ठेका स्वीकृत ही नहीं है, वहां भी ठेके चल रहे हैं। यह सारा खेल खुलेआम चल रहा है। पुलिस या आबकारी विभाग को इसकी जानकारी न हो, ऐसा हो नहीं सकता। ऐसे में सवाल उठते हैं कि इन पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? या लक्ष्य पूर्ति करने के लिए आबकारी विभाग ने सबको खुली छूट दे रखी है?
या फिर यह मान लेना चाहिए कि मनमर्जी के इस खेल पर कोई अंकुश लगेगा ही नहीं और जिला प्रशासन, पुलिस व आबकारी विभाग के सारे के सारे अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से आंखें चुराकर यह तमाशा होने देंगे? इतना ही नहीं जांच का विषय यह भी है कि निर्धारित कीमत से ’यादा वसूले गए पैसे के भागीदार व साझीदार कौन-कौन हैं तथा यह पैसा कहां कहां तक व किस किस की जेब में जा रहा है?

---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 01जून 19 के अंक में प्रकाशित ।
...

मेरी आंध्रा यात्रा-12

होटल के तमाम कर्मचारी हिन्दी कम समझ रहे थे। इस कारण उनसे समन्वय स्थापित करने में बड़ी दिक्कत हुई। एेसे में उनसे टूटी फूटी अंग्रेजी व गूंगे ही तरह इशारों मंे ही संवाद स्थापित किया। कमरे में अपना सामान जमाने के बाद मैं होटल से बाहर आया। पास ही चाय की दुकान पर गया। चाय पीने के बाद दस रुपए का नोट थमाया तो उसने तीन रुपए वापस कर दिए। वाकई सात रुपए में जोरदार घर जैसी चाय। मैं सोच रहा था सब जगह दस रुपए में मिलती है लेकिन विजयवाड़ा में सात रुपए। मैं अचंभित था। इसक बाद एक चालीस रुपए का बिस्कुट पॉकेट लिया और होटल चला गया। शाम गहरा चुकी थी। अब भोजनालय की तलाश शुरू की। आसपास कोई होटल न था। मैं उस ऑटो वाले को कोस रहा था। करीब एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुझे एक होटल दिखाई दिया। अम्मा होटल नाम था। एक नवयुवक काउंटर पर बैठा था। हिन्दी बोल व समझ रहा था, इसलिए उससे थोड़ी चुनावी चर्चा की। भोजन किया और चला आया होटल। भोजन वो ही था दाल चावल वाला, लिहाजा होटल आकर बिस्कुट का पैकेट खोला। बिस्कुट खाए पानी पीया और सो गया। यह मेरा आंध्रप्रदेश में चौथा दिन था। अगले दिन ३१ मार्च को सुबह तैयार होकर होटल से बाहर आया। कोई ऑटो नहीं मिला तो पैदल ही चलता रहा। करीब तीन किलोमीटर पैदल चल लिया। पसीने से तरबतर था। रास्ते में एक चाय के खोखे पर रुका। पहले पानी पीया फिर एक कप चाय। मैंने दस का नोट थमाया तो उसने चार रुपए वापस कर दिए। मतलब यहां चाय छह रुपए की थी। स्वाद भी वैसा ही था, जैसी चाय पहले दिन शाम को पी थी। मुझे आश्चर्य हो रहा है था कि छह रुपए में एेसी चाय पिलाकर भी यह कमा रहा है जबकि रेलवे या अन्य शहर के लोग दस में गर्म पानी पिलाते है। दस रुपए की चाय वाले तो डिस्पोजल गिलास की साइज भी एेसी ढूंढकर लाते हैं, कि उसको ठीक से पकडऩा भी नहीं बनता। खैर, चाय पीने के बाद मैं एक बार फिर होटल आया। थोड़ी देर रुम में बैठकर पसीना सुखाया। इतने में रूम का दरवाया बजा, देखा तो एक बुजुर्ग महिला आई और सफाई करने लगी। इसके बाद वह टीप मांगने लगे। मैंने दस रुपए दिए और फिर निकल लिया। सड़क पर एक रिक्शा जाता दिखाई दिया। हाथ करके उसको रुकवाया और बस स्टैंड के लिए पूछा। बीस रुपए में उसने बस स्टैंड छोडऩा तय किया। रिक्शे में मछलियों से भरी पोटली रखी थी। चूंकि वो सीट के नीचे थी लेकिन मेरे दोनों पैर उस पोटली के दोनों तरफ थे। एेसे में मछलियों की तीखी गंध सीधे नाक से टकरा रही थी। इस गंध से मैं असहज हो चुका था। जैसे-तैसे बस स्टैंड आया। वहां सड़क किनारे तोते लिए असंख्य ज्योतिषी बैठे थे। तोते के माध्यम से पर्ची उठवा कर यह लोगों के भाग्य के बारे में बता रहे थे। थोड़ा सा रुकना के बाद में बस स्टैंड परिसर की ओर चल पड़ा। । इतना बड़ा व भव्य बस स्टैंड देखकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। एेसा मैंने पहली बार देखा। एक ही रुट के लिए दस काउंटर। मतलब आपको कहीं जाना है तो उस स्थान के लिए बसों के दस काउंटर। राजस्थान के कई बस स्टैंड पर तो कुल जमा ही दस काउंटर नहीं होते। यहां सौ से ऊपर काउंटर। और बैठने की शानदार व्यवस्था। बिलकुल हवाई अडडे की तर्ज पर। बड़े बड़े एलईडी लगे हुए। बस स्टैंड परिसर के ऊपर शॉपिंग की बहुत सारी दुकानें। पूरा स्टैंड सफाई से एकदम चकाचक। मुझे गुंटूर जाने वाले रुट का काउंटर देखना था। पूछते-पूछते वहां तक पहुंचा। उस जगह तब पांच बसें खड़ी। सब की सब गुंटूर के लिए। कोई एसी बस तो कोई नॉन एेसी। कोई प्राइवेट तो कोई आंध्रा रोडवेज की। मैं सबसे पहले कौनसी चलेगी का पूछकर एक बस में बैठ गया। गुंटूर की गिनती एशिया की सबसे बड़ी मिर्च मंडी के रूप में होती है। मैं यह देखने गया कि चुनावी गतिविधियों का मिर्च मंडी पर कैसा असर है। खैर, बस रवाना हो गई और शहर से बाहर आते ही हवा से बातें करने लगी। मैंने अनुभव किया आंध्र रोडवेज की बस राजस्थान व हरियाणा रोडवेज के मुकाबले तेज चलती हैं। विजयवाड़ा के किनारे कृष्णा नदी है। इस पर बहुत बड़ा पुल बना है। बस वाले मार्ग पर नदी में कहीं-कहीं ही पानी दिखाई दिया। बाकी नदी सूखी पड़ी थी। विजयवाड़ा से गुंटूर की दूरी करीब चालीस किलोमीटर है। घंटे भर बाद में गुंटूर बस स्टैंड पर उतरा। बारह सवा बारह का समय हो चुका था। तेज धूप व गर्मी से फिर पसीना पसीना हो गया था। बाहर आकर एक ऑटो वाले से मिर्च मंडी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि मंडी शहर से बाहर है। मैं ऑटो के माध्यम से मिर्च मंडी पहुंचा। गेट से जैसे ही अंदर प्रवेश किया, एकदम सन्नाटा पसरा था। जैसा सोचकर आया था, वैसा माहौल मिला नहीं। मंडी में इन दिनों ऑफ सीजन चल रहा है, इसलिए चहल-पहल कम थी, लेकिन दुकानें अधिकतर खुली हुई थी। कहीं सड़क पर मिर्च सुखाई हुई थी तो कहीं बोरों में भरी जा रही थी। मतमलब जो काम था वह मंडी की अंदर ही था। बाहर से आवक या जावक नहीं हो रही थी। वैसे यहां से मिर्च थोक के हिसाब से समूचे देश में जाती है। एक मिर्च मंडी तेलंगाना के खम्मम में भी है लेकिन गुंटूर की मिर्च मंडी उससे काफी बड़ी है। हवा में मिर्च के कण थे, लिहाजा मिर्च की गंध नथुनों से टकरा रही थी। आंखों से भी पानी बहने लगा। छीकें शुरू हो गई। यहां काम करने वाले मुंह पर कपड़ा बांधकर काम करते हैं, इसलिए मिर्च की गंध उनको परेशान भी नहीं करती। वैसे भी वो इस काम में अभ्यस्त हो चले हैं। मैं दुकानों पर घूमता रहा लेकिन मुझे वहा हिन्दी या टूटी फूटी अंग्रेजी वाला कोई नहीं मिला। इसकी बड़ी वजह यहां अधिकतर मजदूर लोगों का होना भी रहा, जो पल्लेदारी का काम करते हैं। एक दुकान पर श्रमिकों से थोड़ी से बातचीत कर मैं वापस पलटा। मंडी के बाहर धूप के बचने के लिए कुछ न था। दोपहर का एक बज चुका था। मैं धूप में ऑटो का इंतजार करने लगा। करीब दस ऑटो इस दौरान गुजरे, सभी को हाथ दिया लेकिन किसी ने नहीं रोका। मन ही मन सोचा आज तो बुरे फंसे लेकिन कोई चारा नहीं था। प्यास से गला सूख गया चुका था। करीब घंटे भर धूप में खड़ा रहा। रुमाल निकाल सिर पर रख लिया था। तभी एक ऑटो आया। हाथ दिया, तो रुका लेकिन अंदर ठसाठस भरा था। किसी तरह सिर नीचा करके अंदर घुस गया और उसी मुद्रा में करीब पांच किलोमीटर का सफर किया। वह बस स्टैंड नहीं गया। फिर दूसरा टैम्पो पकड़ा और बस स्टैंड आया। दुकान से पानी की बोतल लेकर गला तर किया। वैसे गुंटूर का बस स्टैंड भी विजयवाड़ा की तरह ही बड़ा सा व एकदम साफ सुथरा था। दो स्थानों के बस स्टैंड देखने के बाद मुझे यकीन हो गया था कि आंध्रप्रदेश में लगभग बस स्टैंड इसी तर्ज पर बने हैं। मैंने विजयवाड़ा की बस पकड़ी और स्टैंड आया। विजयवाड़ा स्टैंड से बाहर आया। ऑटो वाले ने चालीस रुपए मांगे। मैंने उसको होटल भी बता दिया था और खाने वाला रेस्टोरेंट भी लेकिन पता नहीं वो मेरी बात समझा नहीं या जानबूझकर नजरअंदाज कर गया। थोड़ा चलने के बाद एक रेस्टोरेंट के पास लोकर बोला सर, आपका रेस्टोरेंट आ गया। मैंने असहमति में सिर हिलाया और किसी से पूछने के लिए कहा। पूछने के बाद वह मुझे अम्मा होटल ले आया। मैंने सौ का नोट निकाला तो बोला बीस रुपए और दीजिए। मैं उसके मुंह की तरफ देख रहा था। चालीस की बात थी, और एक सौ बीस मांग रहा है। मैंने कहा जाते समय रिक्शा वाला बीस में लेकर गया तू एक सौ बीस काहे के मांग रहा है। कहने लगा इतना ही लगता है। इसके बाद उसने पास खड़े रिक्शा वाले को बुलाया और लोकल भाषा में बात करने के बाद बोला। आप पूछिए इनसे। यहां से बस स्टैंड का किराया एक सौ बीस रुपए है। मैं समझ नहीं पा रहा था। क्या किया जाए। मैंने सौ रुपए देकर पीछा छुड़ाया और खाना खाकर होटल चला आया।
क्रमश:

Tuesday, June 11, 2019

बीकानेर संभाग की सबसे बड़ी जीत के मायने भी हैं बड़े!



टिप्पणी
गंगानगर लोकसभा से भाजपा उम्मीदवार निहालचंद मेघवाल ने चार लाख से ज्यादा मत प्राप्त कर न केवल अपना पिछला रिकॉर्ड दुरुस्त किया बल्कि संभाग के तीनों लोकसभा क्षेत्रों में उन्होंने सबसे बड़ी जीत भी दर्ज की है। यह निहालचंद का अब तक का सातवां चुनाव था, जिनमें उनको पांच में उन्हें सफलता मिली है। इस तरह उन्होंने गंगानगर से पांच बार सांसद बनने के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है। इससे पहले इस सीट से कांग्रेस के पन्नालाल बारूपाल 1952 से लेकर 1971 तक लगातार पांच बार सांसद रहे थे। खास बात यह है निहालचंद ने पिछले दो चुनाव लगातार जीते हैं। संभाग के तीनों सांसदों में निहालचंद के साथ यह उपलब्धि भी जुड़ी है कि वो सबसे ज्यादा बार सांसद बने हैं। वैसे तो गंगानगर लोकसभा क्षेत्र श्रीगंगानगर जिले के पांच विधानसभा तथा हनुमानगढ़ जिले के तीन विधानसभाओं से मिलकर बना है लेकिन संभाग के दो अन्य लोकसभा क्षेत्रों में भी इन दोनों जिलों की सहभागिता है। इस तरह से हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर जिले के 11 विधानसभाओं के मतदाताओं की पहली पसंद भाजपा रही है। यह बात दीगर है कि नवम्बर में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में गंगानगर लोकसभा की आठ सीटों पर कांग्रेस व भाजपा में मुकाबला बराबरी का था, लेकिन लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने भाजपा को बढ़त दी। इसी प्रकार चूरू लोकसभा में शामिल हनुमानगढ़ की दो विधानसभाओं में एक पर माकपा व एक पर कांग्रेस काबिज हुई थी लेकिन लोकसभा चुनावों में इन दोनों विधानसभाओं में भी भाजपा जीतने में सफल रही है। बीकानेर लोकसभा में शामिल अनूपगढ़ विधानसभा क्षेत्र से भी दोनों ही चुनाव में भाजपा जीती है। गंगानगर लोकसभा से निहालचंद की जीत से साफ जाहिर है कि आठों विधानसभाओं में न तो कांग्रेस का जादू चला और न ही उनके विधायकों का। और तो और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से बागी होकर चुनाव लडऩे वाले को फिर से पार्टी में शामिल करने का निर्णय भी कोई करिश्मा नहीं दिखा सका। बड़ी जीत के साथ ही निहालचंद मेघवाल के समर्थकों में उनको मंत्री बनाने की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, हालांकि बातचीत में निहालचंद कहा कि वो पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता बनकर ही काम करना पसंद करेंगे। लेकिन केन्द्र से मंत्री बनने का प्रस्ताव आने के सवाल पर वो हामी भी भरते हैं। जीत के बाद अपनी प्राथमिकताओं में निहालचंद ने श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज व हनुमानगढ़ में रेलवे की वाशिंग लगाया बताया। मतदाता यह तो मानते हैं कि निहालचंद के कार्यकाल में रेल सुविधाओं में विस्तार हुआ लेकिन मंत्री पद रहते जो होना चाहिए था, वैसा हुआ नहीं। खैर, इस बार जीत बड़ी है। मतदाताओं ने इस विश्वास के साथ निहालचंद में विश्वास जताया है उससे उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उम्मीद की जानी वो लोकसभा के सभी क्षेत्रों को बिना किसी राजनीतिक चश्मे के समान रूप से देखेंगे क्योंकि इस बार सभी विधानसभाओं के मतदाताओं ने उनकी झोली भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 24 मई 19 के अंक में प्रकाशित ।

शाबाश श्रीगंगानगर!

टिप्पणी 
‘सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं होता।’ ‘सरकार स्कूलों में तो सिर्फ औसत अंक वाले बच्चे पढ़ते हैं।’ ‘सरकारी स्कूलों में अध्यापकों के पद रिक्त रहते हैं।’ लंबे समय से सुने जा रहे इन परम्परागत जुमलों का अर्थ व मायने अब बदलने लगे हैं। बारहवीं विज्ञान, वाणिज्य तथा बुधवार को आए कला वर्ग के परीक्षा परिणामों ने साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी की बपौती नहीं होती। इन परिणामों में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों ने भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। विशेषकर श्रीगंगानगर जिले के संदर्भ में तीनों संकायों के परिणामों को देखें तो वाकई यह खुशी की बड़ी वजह बन रहे हैं। सरकारी स्कूल की बालिका गीता ने तो कला वर्ग में समूचे प्रदेश में अव्वल आकर उस मिथक को भी तोड़ दिया है कि सिर्फ निजी स्कूलों के बच्चे ही अच्छे अंक प्राप्त करते हैं। दरअसल, श्रीगंगानगर जैसे कृषि आधारित जिले के लिए गौरव की बात इसलिए भी है कि इस बार वाणिज्य वर्ग में वह पूरे प्रदेश में दूसरे स्थान पर रहा है। इसके अलावा यह परिणाम खास इसीलिए भी हैं कि क्योंकि इस बार सरकारी स्कूलों के परिणाम में उत्साहजनक सुधार हुआ है। आंकड़ों की बात करें तो वार्णिज्य वर्ग में 16 में 13 सरकारी विद्यालयों का परिणाम शत-प्रतिशत रहा है। इसी तरह विज्ञान वर्ग में 49 में से 31 सरकारी विद्यालयों का परिणाम सौ फीसदी रहा है। थोड़ा विस्तार में बात करें तो वाणिज्य वर्ग में 681 विद्यार्थियों में से 661 विद्यार्थी सफल रहे हैं। इनमें 461 प्रथम श्रेणी से उत्तीण हुए हैं। इसी तरह, विज्ञान वर्ग में कुल 4651 विद्यार्थियों में 4194 उत्तीर्ण हुए हैं। इनमें 3349 प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए हैं। कला वर्ग का परिणाम भी उत्साहजनक रहा है। कुल 17724 विद्यार्थियों में से 8522 प्रथम श्रेणी तथा 6606 द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हुए हैं। यह परिणाम इसीलिए भी अलग हैं कि क्योंकि सभी संकायों में बेटियों ने बेटों से ज्यादा अंक प्राप्त किए हैं।
देखा जाए तो सरकारी स्कूलों के परिणााम सुधरने के पीछे कई कारण रहे हैं। विद्यार्थियों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करने के लिए कई तरह की योजनाएं तथा इनाम व छात्रवृत्तियों की बड़ी भूमिका है। इसके लिए सरकारी स्कूलों में रिक्त पदों के भरने से भी काफी असर पड़ा है। इन सबके अलावा अभिभावकों का सरकारी स्कूलों में विश्वास जताना भी बड़ा कारण माना जा रहा है। सरकारी स्कूलों में बढ़ता नामांकन यह बताता है कि अभिभावक फिर से सरकारी स्कूलों की ओर रुख करने लगे हैं।
प्रदेश स्तर पर श्रीगंगानगर की पहचान खेती व खेलों के लिए है, लेकिन इस बार शिक्षा के क्षेत्र में भी उसने दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई है। यह उपलब्धि बड़ी है। इस बड़ी सफलता के लिए विद्यार्थी, उनके अध्यापक व अभिभावक सभी बधाई के पात्र हैं। अभिभावकों की सोच व अध्यापकों की मेहनत के चलते नि:संदेह प्रदर्शन में साल दर सुधार आएगा तथा सरकारी स्कूलों के बारे में बनी धारणा भी टूटेगी, ऐसी उम्मीद करनी चाहिए।

--------------------------------------------------------------------------------------------------------
 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 23 मई 19 के अंक में प्रकाशित। 

मेरी आंध्रा यात्रा- 11

यकीन मानिए किसी अनहोनी की आशंका में मेरी आंखों से नींद गायब हो चुकी थी। एक मित्र को फोन लगाकर सारे घटनाक्रम से अवगत कराया। उससे मदद का आग्रह भी किया लेकिन वहां से भी जवाब आया नहीं। सच में बहुत डरा हुआ था। किसी तरह रात बीती। सुबह जल्दी तैयार होकर चेक आउट करने आया। और पांच रुपए का नोट थमाया तो उसने सारे रख लिए। मैंने कहा बात तो एक हजार की हुई थी, बोला नहीं 11 सौ ही लगेंगे। मैं ज्यादा उलझा नहीं। अपना बैग उठाया और सड़क पर आ गया। सामने एक टैम्पों को हाथ दिया। स्टेशन छोडऩे के उसने पचास रुपए मांगे। मैंने कहा आधा किलोमीटर तो है भी नहीं है और पचास रुपए किस बात के। वह कहने लगा रास्ता इधर से नहीं है घूमकर जाना पड़ेगा। मैं उसकी चालाकी समझ रहा था। दो गलियां घूमाने के बाद वह वापस उसी सड़क पर आया जहां से कुछ दूरी पर मैंने ऑटो पकड़ा था। मैं उसकी चालाकी पर मुस्करा रहा था। खैर, उसको पचास का नोट थमाकर मैं टिकट काउंटर की तरफ बढा। विजयवाड़ा की टिकट मांगी तो उसने कहा उसने कहा अभी कोई ट्रेन नहीं है। मैंने जब भी है टिकट तो दे। उसके टिकट लेकर प्लेटफार्म नंबर पूछकर मैं सीढियां चढ़ गया। सुबह के आठ बज चुके थे। प्लेटफार्म नंबर दस। महिला कर्मचारी स्टेशन की सफाई करने में जुटी थी। पूरा स्टेशन एकदम साफ सुथरा। तभी आंध्रा एक्सप्रेस आकर रुकी। यह ट्रेन दिल्ली के लिए थी। पूरी की पूरी वातानुकूलित। मैं आराम से एक कुर्सी पर बैठा ट्रेन रवानगी का इंतजार करने लगा। चूंकि मेरे पास सामान्य टिकट था, इस कारण नजर टीटीई को भी खोज रही थी कि उससे पहले पूछ लूं कि टिकट अंदर बन जाए तो मैं बैठूं, क्योंकि मैं उस ट्रेन में बैठने का पात्र नहीं था। नौ बजकर बीस मिनट के करीब सफेद ड्रेस में एक जना दिखाई दिया। मेरी आंखों में थोड़ी चमक आई। मैं उसकी तरफ बढ़ा और एक्सक्यूज मी, मुझे विजयवाड़ा जाना है। क्या मैं इस ट्रेन में यात्रा कर सकता हूं। मेरे पास सामान्य टिकट है। मेरी बात सुनकर टीटीई ने कहा साढ़े पांच सौ रुपए लगेंगे, आप किसी भी डिब्बे में बैठ जाएं। एक लंबी सांस छोड़ते हुए खुद को रीलेक्स महसूस करते हुए मैं एक डिब्बे में सवार हो गया। लगभग सीट खाली पड़ी थी। बैठ सीट के नीचे के लगाया और लैबटॉप ऊपर की बर्थ पर रखकर दिया। मैं अब टीटीई का इंतजार कर रहा था। साढ़े पांच सौ रुपए व सामान्य टिकट मैंने हाथ में रखे हुए थे। करीब आधा घंटे बाद वह आया मैंने टिकट मांगा तो हाथ से इशारा करके मुझे रुकने की कहकर वह आगे बढ़ गया। बीच में टीटीई कई बार आया मैने पांच सौ पचास रुपए और टिकट उसकी तरफ िकया लेकिन लेकिन उसने न तो टिकट बनाई न ही सीट दी। बस इतना कहा वेट कीजिए। इस दौरान काफी स्टेशन आए और सभी सीट भर चुकी थी। अब मेरी पास खड़ा रहकर यात्रा करने के अलावा कोई चारा नहीं था। कोच के अंदर खड़ा होना भी कोई आसान काम नहीं है। आने जाने वालों के कारण मुझे बार बार एक तरफ होना पड़ रहा था। इन सबसे बचने के लिए मैं कोच से निकलकर दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया....तभी वहां एक युवक आया। मेरी आदत है सो पूछ लिया कहां जाओगे , उसने बताया राजस्थान। इतना सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई... तेलुगू बाहुल्य इलाके में कोई हिन्दी भाषी तो मिला....खैर, मैंने पूछा राजस्थान.में कहां से, जवाब आया झुंझुनूं से....मैंने फिर पूछा झुंझुनूं में कहां से, तो जवाब मिला.पिलानी। पिलानी या कोई गांव? तो बताया गया जसवंतपुरा। सुनकर खुशी हुई। मैंने भी कहा मैं भी झुंझुनूं से ही हूं...यह.जानकर उस बीएसएफ जवान.के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई..वह जल्दी में था..नाम नहीं पूछ पाया न बता पाया। युवक चला गया। इस बीच टीटीई फिर टकराया मैंने फिर सीट के लिए पूछा तो उसने कहा कहा बी 4 में सीट नंबर 71 खाली हो रही है। वहां चले जाओ। जब सीट 71के लिए मैं उस कोच को क्रोस कर दूसरे कोच में जाने लगा तो पीछे से आवाज आई...मुडकर देखा तो वही जवान अडेंटेड की सीट पर सोते हुए पूछ रहा था सीट मिल.गई क्या..मैंने स्वीकृति में.सिर.हिलाया तो उसके चेहरे पर फिर.मुस्कान थी। मैं निर्धारित सीट पर आकर बैठ गया। करीब दस मिनट बाद ही टीटीई आया और इशारा किया मैंने फिर पांच सौ पचास और टिकट निकाले और उसको दे दिए....उसने पचास का नोट और टिकट मुझे फुर्ती से वापस थमाए और बडी तेजी से आगे बढ गया....मैं आवाज लगाता ही रह गया लेकिन वह नहीं रुका। मेरे सामने बैठे शख्स पोल्लाराव हंसने लगे। टिकट नहीं दी मतलब पांच सौ का नोट गया जेब में.....विजयवाड़ा आने को था, एेसे में टीटीई को तलाशना मेरे लिए संभव नहीं था। और तलाश भी लेता तो शायद वह मुझे टिकट नहंी देता। खैर, करीब चार बज चुके थे। मैं विजयवाड़ा स्टेशन उतरा। स्टेशन से बाहर की तरफ आया। एक ऑटो से बोला मुझे एेसी जगह छोड़ दे जहां होटल भी हो और मारवाड़ी भोजनालय की व्यवस्था हो। उसने हामी में सिर हिलाया और एक होटल ले आया।
क्रमश:

मेरी आंध्रा यात्रा-10

चुनाव के चलते रास्ते में सुरक्षा बलों ने हमारी कार रुकवाई। मेरा सारा सामान चैक किया और हम फिर आगे बढ़े। अब विजयनगम आ गया था। बताता चलूं कि विजयनगरम, पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री अशोक गजपति राजू का शहर है। राजू राजसी परिवार से आते हैं और तेलुगूदेशम पार्टी के नेता है। शहर में उनका प्राचीन महल भी है। इसके आधे हिस्से में अब कॉलेज संचालित होता है, एक तरफ उनका आवास है। वहीं एक नीबू पानी की रेहड़ी पर हम रुके हैं और कार चालक वेंकट के आग्रह पर नमकीन शिंकजी पी। यहां रेहड़ी वाले ने डस्टबीन लगा रखा था। शिकंजी पीने वाले डिस्पोजल गिलास उसी में डाल रहे थे। सफाई व्यवस्था यहां भी अच्छी नजर आई। दोपहर हो चुकी थी। तय कार्यक्रम के हिसाब से मुझे विजयनगरम ही रुकना था लेकिन बाद में पता चला कि मैं तो उत्तर की बजाय दक्षिण में आ गया हूं, इसलिए वापस विशाखापट्टनम जाना ही बेहतर समझा। इसलिए वेंकट को कहा कि मुझे फिर से विशाखापट्नम ही छोड़ दे। विजयनगरम शहर का एक चक्कर लगाने के बाद हम वापस विशखापट्नम की ओर चल पड़े। रास्ते में एक जगह वेंकट ने डेढ़ सौ साल से से ज्यादा पुराना चर्च दिखाया। दरअसल इस इलाके में अंग्रेज काफी पहले आ गए थे। इस कारण अंग्रेजों से जुड़ी कई चीजें आज भी यहां हैं । इस क्षेत्र के विकसित होने का बड़ा कारण अंग्रेजों का यहां आना भी है। आगे बढ़े तो ऋषिकोण्डा बीच आया। वेंकट ने कहा सर भूख लगी है क्यों न भोजन कर लिया जाए। मैंने कहा चपाती वाले रेस्टारेंट पर चलें लेकिन वहां चपाती नजर नहीं आई। आखिर वेंकट की तरह मुझे भी चावल, दाल व दही से काम चलाना पड़ा। कुछ सब्जियां और भी लेकिन वह में नहीं खा पाया। हां चावल के लिए मेरा चम्मच मांगना और फिर चम्मच से खाते देख कई लोग चौंके जरूर क्योंकि वे सब बिना चम्मच के हाथों से खा रहे थे। वह भी अंगुलियों के बजाय पूरे हाथ से मुट्ठी भर के। भोजन के उपरांत वेंकट ने कहा सर, आप थोड़ा बीच देख आएं तब मैं भी धूम्रपान कर लेता हूं। दोपहर हो चुकी थी। धूप व तेज गर्मी के कारण मैं पसीना पसीना हो गया। एसी गाड़ी में लंबा सफर करने के बाद यकायक बाहर आने से वैसे भी गर्मी ज्यादा लगती है। ऋषिकोंडा बीच के किनारे पहाड़ पर आंध्र्रप्रदेश पर्यटन विभाग की ओर से पर्यटकों के लिए बंगले बनाए गए हैं, जो कि 12 घंटे के हिसाब से रेंट पर मिलते हैं। बीच एकदम साफ सुथरा। गंदगी तनिक भी नहीं। बीच किनारे डस्टबीन रखे हुए थे। दस मिनट यह सब देखने के बाद मैं कार की तरफ पलटा। मुझे आता देख वेंकट ने हाथ हिला दिया था। हम चल पड़े विशाखापट्टनम की ओर। बातों ही बातों में मैंने शिपिंग यार्ड की चर्चा की तो वेंकट सीधा मुझे वहीं ले गया। चारों तरफ मछलियों की गंध। बहुत बड़ी मंडी सजी थी। यहां से जिंदा मछलियां बड़ी मात्रा में निर्यात होती हैं। जिधर देखो नाव ही नाव। जहां तक नजर जाए नाव ही नाव। यहां से ड्राई मछलियां भी खूब निर्यात होती हैं। महिलाएं ड्राई मछलियों की दुकानों पर बैठी नजर आई। सड़कों पर मछलियों को सुखाया जाता है। मैं थोड़ी देर कार से उतर कर वहां घूमा लेकिन मछलियों की तेज गंध ने सांस लेना मुश्किल कर दिया। फोन की बैटरी खत्म हो चुकी थी और पावर बैंक भी लगभग जवाब दे गया था, लिहाजा मैं जल्दी से कार में आया और चल पड़े। इसके बाद वेंकट मुझे पुराने विशाखापट्नम लेकर गया। यहां अंगे्रजों के जमाने की बनी करीब दो सौ साल पुरानी स्कूल का भवन दिखाया। नए विशाखापट्टनम की बजाय पुराना शहर थोड़ा संकरा है। मैंेने वेंकट से आग्रह किया वह मुझे रेलवे स्टेशन के आसपास किसी होटल में छोड़ दे ताकि मैं दूसरे दिन अलसुबह किसी और शहर के लिए निकल सकूं। वह मुझे होटल ले गया। होटल वाले ने एक हजार में एसी रूम बताया और एक युवक को कमरा दिखाने को कहा। वह युवक दूसरे होटल लेकर गया और कमरा दिखा दिया। मैं आश्वस्त था कि एक हजार का बोला है तो एक हजार का होगा। खैर, यह दिमाग लगाने से पहले मैं पहले मैंने वेेकट का भुगतान करना बेहतर समझा। । मैंने दो हजार रुपए निकाले और इस उम्मीद से कि वेंकट मुझे चार सौ रुपए लौटाएगा। उसने कहा सर जी दो सौ रुपए और दीजिए। मैं चौंका यह सब कैसे। बोला 120 के बाद हर दस किलोमीटर का सौ रुपया होगा। गाड़ी 188 चल गई। मैं उसकी चालकी पर हैरान था। मैं सोच रहा था कि इसको खाना खिलाया है तो यह एहसानमंद होकर यह सब दिखा रहा था। खैर, ना चाहते हुए दो सौ रुपए और दिए। अब कहने लगा सर, टीप तो दीजिए। मैंने हाथ जोड़ लिए और कहा जो खाना खिलाया उसको टीप समझो मुझे अब माफ करो। वेंकट का हिसाब कर मैं होटल आया और कमरे में घुसा तो वह गर्मी से भभक रहा था। अपना सामान जमाने के बाद मैंने एसी ऑन किया तो तो वह नहीं चला। । मैं काउंटर पर गया और युवक से कहा कि एसी चलाओ, तो वह पलट कर बोला एक हजार में नॉन एसी कमरा मिलेगा। मैंने कहा कि मुझे एक हजार ही बताया तो पास खड़े दूसरा युवक जो संभवत: नशे में था, बिलकुल घूरने वाले अंदाज में बोला। आप को रहना है तो रहिए वरना अपना सामान उठाइए और दूसरे होटल चले जाइए। अजनबी जगह और मुंबइया फिल्मों के के टपोरी टाइम गुंडों जैसे युवक देखकर सच में मैं डर गया । मन ही मन में सोचा आज तो फंस गए हैं, खैर भगवान ही मालिक है। तभी एक युवक बोला है ठीक है एसी ऑन करते हैं आप अपने कमरे में जाइए। मैं कमरे में आ तो गया लेकिन घबराहट के कारण नींद गायब थी। मैंने रूम के अंदर की चिटखनी लगाई और लेट गया।
क्रमश:

लाइलाज मर्ज !

टिप्पणी..
अगर आप वाहन चालक हैं और कभी गोलबाजार में गाड़ी पार्क की है तो यकीनन यातायात पुलिस से आपका वास्ता जरूर पड़ा होगा। गोलबाजार में किसी चौक पर पार्क करने वाली गाड़ी को यातायात पुलिस के जवान क्रेन से उठाकर यातायात थाने में ले जाकर खड़ा कर देते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि गोलबाजार में पार्किंग के लिए कोई स्थान ही नहीं है। बिना पार्किंग एरिया में गाड़ी खड़ा करना कानूनन अपराध है। इसके लिए आपको जुर्माना भी देना पड़ता है। ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि जब तक कार्रवाई का भय नहीं होगा, कानून की पालना करवाना संभव नहीं होगा। तभी तो गोलबाजार में वाहनों की पार्किंग उतनी नहीं होती, जितने शहर के अन्य स्थानों पर होती है। शहर का कोई भी प्रमुख मार्ग या गली ऐसी नहीं है जहां वाहन न खड़े हों। यह तो गनीमत है कि यहां की सडक़ें अपेक्षाकृत चौड़ी हैं, इस कारण यातायात बाधित नहीं होता। बावजूद इसके गोलबाजार जैसी सख्ती व तत्परता शहर के अन्य हिस्सों में दिखाई नहीं देती।
निजों बसों के रूट में परिवर्तन करने का काम जरूर राहत भरा है, लेकिन अकेले इससे बात नहीं बनने वाली। शिव चौक से जिला अस्पताल तक सडक़ के दोनों तरफ वाहनों का जबरदस्त जमावड़ा है। यूआइटी की मेहरबानी से यहां अच्छी भली चौड़ी सडक़ को सौन्दर्य के नाम पर संकरी कर दिया गया है। यहां खड़े होने वाले वाहनों पर न तो यातायात पुलिस की नजर जाती है और न ही सडक़ पर बजरी-रेता बेचने वालों के खिलाफ यूआइटी कोई कदम उठाती है। ऐसा लगता है यातायात पुलिस और यूआइटी दोनों ने यहां कुछ भी करने की खुली छूट दे रखी है। इसी तरह चहल चौक चले जाएं। शॉपिंग मॉल में आने वालों की वजह से यहां दिनभर जाम की स्थिति रहती है। शाम को हालात और भी खराब हो जाते हैं। रोडवेज बस स्टैंड के आगे, कोडा चौक, बीरबल चौक, रेलवे स्टेशन आदि जगह भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। इतना ही नहीं शहर के छोटी-छोटी गलियों में भी आधा रास्ता यह वाहन रोकते हैं। आवासीय कॉलोनी में व्यावसायिक गतिविधियां होने के कारण वाहनों की आवाजाही लगी रहती है।
शहर के अंदरुनी यातायात की सर्वाधिक बैंड मैरिज होम वाले बजाते हैं। अधिकतर के पास पार्किंग की व्यवस्था ही नहीं है। इतना ही नहीं है कुछ मैरिज होम के जनरेटर सडक़ पर चलते हैं। शादी समारोह में आने वाले वाहनों के चलते सडक़ संकरी हो जाती है। इससे वाहन रेंग-रेंग कर चलते हैं। आखिर कौन है इस अव्यवस्था का जिम्मेदार। कमाई कोई करे और संकट कोई झेले, ऐसा क्यों? यातायात पुलिस ने शायद ही किसी मैरिज होम के बाहर अवैध रूप से खड़े वाहनों पर कार्रवाई का डंडा चलाया होगा। इस अव्यवस्था के लिए वो तमाम विभाग जिम्मेदार हैं, जो इन मैरिज होम को एनओसी जारी करते हैं। आमजन को तकलीफ में डालकर या रास्ता बाधित करके कारोबार करने वालों पर कारगर कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर कब तक आमजन इस अव्यवस्था के बीच पिसता रहेगा।

--------------------------------------------------------------------------------------------
राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 19 मई 19 के अंक में प्रकाशित 

मेरी आंध्रा यात्रा-9

सबसे बड़ी बात यह है कि यह पच्चीस किलोमीटर की दूरी टॉलीवुड (तेलुगू सिनेमा) के लिए प्रकृति प्रदत फ्री गिफ्ट है। इस मार्ग पर कई आकर्षक लोकेशंस हैं, जहां साल भर फिल्मों की शूटिंग चलती रहती है। नारियल व काजू के पेड़ यहां बहुतायत में है। सड़क से बंगाल की खाड़ी की तरफ छोटी-छोटी पहाडि़यां है, जो पानी के थपेड़े खाकर चिकनी व छोटी हो गई हैं लेकिन दूसरी तरफ ऊंचे पहाड़ हैं। हालांकि पहाड़ पूरे २५ किमी तक नहीं हैं। विशाखापट्टनम से भिमली बीच तक पहाड़ हैं। सड़क पहाडों व बंगाल की खाड़ी के बीच विभाजक का काम करती है। पहाड़ों पर भी ऊंची-ऊंची इमारतें बनी हुई हैं। रास्ते में एक पहाड़ की तरफ इशारा करके कार चालक वेंकट ने बताया है यह रामोजी का फिल्म स्टुडियो है। मैंने उस तरफ देखा पहाड़ की चोटी तक सड़क बनी है। सड़क पर शूटिंग वाले वाहनों की कतार लगी थी। ऊपर महलनुमा इमारत दिखाई दी। मैंने चलते-चलते ही यह सब देखा। स्टुडियो के मालिक डा. रामनायडु दागुबाती फिल्म निर्माता हैं तथा पूर्व सांसद रहे हैं। रामोजी का इतना ही परिचय शायद आपके लिए काफी न हो, इसलिए थोड़ा डिटेल में बताता हूं। फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुस्कान है.. गीत वाली फिल्म तो आपको याद होगी ही। जी हां १९९३ में आई फिल्म अनाड़ी के रामोजी प्रोड्यूसर थे। इतना ही नहीं अनाड़ी फिल्म की नायिका करिश्मा कपूर के बाद नायक वेंकटेश रामोजी के पुत्र हैं। यह अलग बात है कि वेंकटेश तेलुगू फिल्म में तो खूब चले लेकिन हिन्दी फिल्मों में ज्यादा सफल नहीं हुए। कार चालक वेंकट ने बताया कि यहां फिल्मों की शूटिंग चलती रहती है और काफी दर्शक देखने के लिए आते रहते हैं।
चलते-चतते सड़क पर अचानक एक मोड़ आया और वेंकट बोला, सर इधर, एक दूजे के लिए फिल्म में कमल हासन के मरने के सीन फिल्माया गया था। एक दूजे के लिए फिल्म तेलुगू फिल्म मारो चरित्र की रीमेक थी। मैं वेंकट से यह नहीं पूछ पाया कि यहां कौनसी फिल्म का सीन फिल्माया था। बाद में अपनी इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने नेट पर बहुत तलाश किया लेकिन कहीं पर इस लोकेशंस का जिक्र नहीं मिला। कुछ जगह गोवा के अलावा विशाखापट्टनम के दूसरे समुद्री किनारों का जिक्र जरूर पढ़ा। वैसे बता दूं कि एक दूजे के लिए फिल्म का अंत दर्दनाक था। इसके आखिर में नायक-नायिका दोनों सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं। इस फिल्म के बाद कई प्रेमी युगलों ने मौत को गले लगाया था। एेसे में फिल्म का अंत बदलने पर भी चर्चा हुई थी लेकिन बदला नहीं गया। मारो चरित्र व एक दूजे के लिए दोनों ही फिल्मों का अंत एक जैसा है। वेंकट ने मुझे वह इमारत भी दिखाई, जहां रति अग्निहोत्री के साथ रेप सीन फिल्माया गया था। थोड़ा सा विषयांतर होते हुए बता दूं कि मारो चरित्र १९७८ में आई थी जबकि एक दूजे के लिए १९८१ में प्रदर्शित हुई थी। एक श्वेत श्याम थी तो एक रंगीन। दोनों ही फिल्मों के निर्माता के बालाचंद्र थे। के बालाचंद्र को २०१० में दादा साहब फाल्के अवार्ड भी दिया गया था। २०१४ में इनकी मौत हो गई थी। करीब चार दशक पहले रिलीज हुई फिल्म एक दूजे के लिए तब ब्लॉकबस्टर थी। उस साल का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के अलावा यह फिल्म फेयर अवाड्र्स की 13 अलग-अलग कैटेगरी में नॉमिनेट हुई थी और बेस्ट एडिटिंग, लिरिक्स और स्क्रीनप्ले के लिए अवॉर्ड जीता भी। यह कमल हासन, रति अग्निहोत्री के साथ गायक एसपी बाला सुब्रमण्यम की भी पहली फिल्म थी। चूंकि एक दूजे के लिए फिल्म मेरी भी पसंदीदा रही है। घर पर न जाने कितनी ही बार इसको देखा है, लिहाजा उस अंतिम सीन वाले स्थानों को मैं मोबाइल में कैद करने की इच्छा हुई। मैंने वेंकट से कार रुकवाई और उस जीर्ण-शीर्ण इमारत को सड़क से क्लिक कर लिया। यहां से आगे चले तो सागर में खूब नाव नजर आई। वेंकट ने बताया कि कुछ शूटिंग यहां भी हुई है तो मैंने वहां भी कार रुकवा कर एक दो क्लिक कर लिए। अब हम विजयनगरम के पास पहुंच गए थे। वेंकट ने बताया कि विजयनगरम काफी प्राचीन शहर है।
क्रमश:

पुलिसवाला

34वीं लोककथा
हादसे में घायल महेश ने मोटरसाइकिल वाले के खिलाफ मामला दर्ज करवा दिया था। मोटरसाइकिल वाले की गलती यह थी कि उसने महेश को गलत साइड से आकर टक्कर मारी थी और भाग गया था। महेश को चालक का नाम नहीं पता था लेकिन मोटरसाइकिल के नंबर याद थे। इसी आधार पर मामला दर्ज करवाया गया। सारी औपचारिकताएं पूरी करवाने के बाद महेश पुलिस थाने से घर लौटा ही था कि मोबाइल बज उठा। रिसीव किया तो फोन थाने से ही था। बताया गया कि हादसा कारित करने वाले युवक की पहचान कर ली गई है, आप एक बार पुलिस थाने आ जाइए। महेश फिर से थाने पहुंचा। वहां युवक व उसके परिजन बैठे थे। सभी ने याचक की भूमिका में महेश की तरफ देखा और माफ करने के लिए हाथ जोड़ दिए। तभी युवक उठा और उसने महेश के पैर पकड़ लिए और सॉरी बोल दिया। यह सब देख महेश ने उसको माफ कर दिया। तभी सामने बैठा पुलिस का हवलदार उठा और महेश को एक तरफ ले जाकर में कान में फुसफुसाया, आपको चोट लगी है, कुछ खर्चा पानी चाहिए क्या? महेश ने असहमति में सिर हिलाया लेकिन पुलिस वाले के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी। उसने अपना मुंह महेश के कान के नजदीक करते हुए सवालिया लहजे में पूछा, वो तो ठीक है आप कुछ मत लो, हम तो हमारा हिसाब कर लें? महेश पुलिस वाले की हिसाब की बात मंद-मंद मुस्काया और घर चला आया लेकिन उसके जेहन में पुलिसवाले के हिसाब की बात ही घूम रही थी।

श्रीगंगानगर का दुर्भाग्य!

टिप्पणी
आज़ादी के सात दशक बीतने के बाद भी यह श्रीगंगानगर शहर का दुर्भाग्य ही है कि यहां समस्याएं जस की तस हैं। प्रदेश में कितनी ही सरकारें आई-गई लेकिन इस शहर की तस्वीर नहीं बदल पाई। लोक लुभावन नारों व वादों के सहारे बहुत से नेताओं अपना भाग्य चमकाया लेकिन शहर की सूरत नहीं चमका सके। श्रीगंगानगर को ‘चंडीगढ़ का बच्चा’ या ‘चंडीगढ़ का बाप’ बनाने वालों ने भी राजनीतिक रोटियां सेककर खुद का भला जरूर किया लेकिन शहर का भला नहीं कर सके। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य इस बात का है कि शहर में ऐसे जनप्रतिनिधि भी चुनकर आने लगे हैं, जिनके पास न तो खुद की कोई दूरदृष्टि है और न ही शहर को समस्या रहित बनाने की कोई कारगर कार्ययोजना। यहां आने वाले प्रशासनिक अधिकारी भी यहां के जनप्रतिनिधियों के नक्शेकदम पर ही चलते नजर आते हैं। 
शहर की सबसे बड़ी समस्या तो बरसाती पानी की निकासी है। यह हर साल पेश आती है। अभी मानसून पूर्व की जरा सी बारिश ने ही शहर की हालत खराब कर रखी है या यूं कहिए कि बरसाती पानी निकासी पानी के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करने वालों की पोल खोल कर रख दी। बड़ी बात है कि पानी की निकासी के नाम पर यह पैसा हर साल खर्च होता है। हर साल बजट बढ़ता जाता है लेकिन समस्या का ठोस या स्थायी समाधान नहीं होता। हो भी कैसे? ‘ बारिश ज्यादा आई तो सेना को बुला लेंगे।’ जैसे बयान देने वाले नेताओं के हाथ में शहर की बागडोर है। ऐसे नेता शहर का किस तरह से भला करेंगे, सहज ही सोचा जा सकता है। तभी तो यहां आने वाले अधिकारी भी शहर के प्रति गंभीरता नहीं दिखाते। नए नवेले अधिकारियों में एक-आध एक दो बार शहर भ्रमण करने की औपचारिकता निभा देते हैं, इसके बाद शहर भगवान भरोसे ही रहता है। अधिकारी भी बंद कमरे में ही शहर की चिंता करते नजर 
आते हैं। 
नगर परिषद व नगर विकास न्यास सौन्दर्य के नाम पर करोड़ों रुपए का मोटा बजट खर्च करते हैं। इन निकायों में बैठने वाले अधिकारियों का ध्यान बजट बनाने और उसे खर्च करने पर ही ज्यादा रहता है, भले ही वह लोगों के काम आए या नहीं। शिव चौक से जिला अस्पताल तक लगाई गई इंटरलोकिंग फुटपाथ तथा एक तरफ बनाया गया डिवाडर किसी काम का नहीं है। यह प्रस्ताव क्यों बना? किसके लिए बना? तथा इसका फायदा किसको हुआ? यह जानने समझने की बात न तो यहां के जनप्रतिनिधि करते हैं और न ही प्रशासनिक अधिकारी। इंटरलोकिंग के नाम पर लाखों रुपए मिट्टी में मिला दिए गए। इस तरह के उदाहरण यहां कई हैं। 
शहर की बदहाली और इसको लेकर जनाक्रोश न होने पर अक्सर श्रीगंगानगर को ‘मुर्दों का शहर’भी कह दिया जाता है। दरअसल, यहां विरोध तो होता है लेकिन उसमें शहर हित कम नजर आता है। विडम्बना यह भी है कि विरोध प्रदर्शन करने वालों में परम्परागत चेहरे ही ज्यादा नजर आते हैं। उनका जनता से जुड़ाव कम है या जनता उन्हें पसंद नहीं करती। कोई तो वजह है। और इसी वजह के कारण ही इसे ‘मुर्दों का शहर ’ कहा जाने लगा। अधिकारी व जनप्रतिनिधि शहर के प्रति उतनी दिचपस्पी नहीं दिखाते। जिस दिन विरोध में जनता उठ खड़ी हुई उस दिन तय मानिए, न तो सेना बुलाने जैसे हास्यास्पद बयान देने वाले नेता जीतकर आएंगे। और न ही बंद कमरों में बैठकर शहर का हित करने वाले अधिकारी यहां टिकेंगे। विकास कार्यों के नाम, उनसे आमजन को होने वाला फायदा तथा उन पर खर्च होने वाली राशि का विवरण जनता मांगना शुरू कर दे तो नि:सदेह बजट राशि का दुरुपयोग कम होगा। लेकिन यह बात भी तभी बनेगी जब जनता जागेगी।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------
श् राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 16 मई 19 के अंक में प्रकाशित। 

मेरी आंध्रा यात्रा-8

सुबह आंख जल्दी खुल गई थी। कहीं जाने का कार्यक्रम तय होता है तो यकीनन आपकी आंख अलार्म से पहले खुल जाती है। मेरा साथ तो अक्सर एेसा होता है। दिमाग की घड़ी पहले ही अलर्ट कर देती है। घड़ी का अलार्म बजता है तब तक सुस्ती दूर हो चुकी होती है। खैर, सारी तैयारी करने के बाद मैंने सुरेश को बुलाया और उसको बताया कि मुझे ग्रामीण क्षेत्र के टूर पर जाना है, इसलिए यहां से एक कार की व्यवस्था करनी है। सुरेश थोड़ी ही देर में एक शख्स को लेकर हाजिर हुआ। वह ट्रेवल एजेंसी से जुडा हुआ था। मैंने उससे गाड़ी की रेट पूछी तो उसने बताया कि यहां सौ किलोमीटर के 14 सौ रुपए हैं। यह यात्रा आप अधिकतम दस घंटे में तय कर सकते हो। आगे प्रत्येक दस किलोमीटर पर सौ रुपए बढ़ते जाएंगे और एक घंटा भी बढ़ता जाएगा। एेसा इसलिए होता है कि यहां जो लोग घूमने आते हैं तो कहीं रुककर या बंगाल की खाड़ी के किसी बीच पर नहाने या खाने का प्रोग्राम करते हैं। इस कारण यहां समय भी किराये के साथ जोड़ा गया है। मुझे विजयनगरम जाना था। उसकी विशाखट्टनम से दूरी 60 किलोमीटर के करीब है। इस तरह आना-जाना 120 किमी हो गया। एेसे में हमारा सौदा सोलह सौ रुपए और बारह घंटे में तय हुआ।
मैंने ट्रेवल्स एजेंसी वाले को साफ साफ कह दिया था कि मुझे एेसा चालक चाहिए जो मेरी बातों को समझ सकें। मतलब हिन्दी समझने व बोलने वाला हो तथा इलाके का जानकार हो। उसने कहा सर जी हो जाएगा। इसके बाद मैं बगल के रेस्टोरेंट गया। नाश्ते में एक परांठा लिया और कार का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर में कार वाला आ गया था। मैंने सामान जमाया और होटल के काउंटर पर आया। रिशेप्सन पर बैठी युवती ने टूटी फूटी हिन्दी में कहा सर बिल कच्चा चाहिए या पक्का। मैं समझा नहीं तो उसने बताया कि कच्चा मतलब बिना जीएसटी का और पक्का मतलब जीसएटी का। खैर, उसने बिना जीएसटी का बिल बनाया। मुझे दो सौ रुपए कम देने पड़े। मेरा बैग कार की डिग्गी में रख दिया था। अब मैं चालक की बगल की सीट पर बैठ गया और कार चल पड़ी। चालक 56 साल का अधेड़ था। नाम पूछा तो वेंकट बताया। हिन्दी ज्यादा तो बोल पा रहा था लेकिन वह मुझे समझाने का भरपूर प्रयास कर रहा था। होटल से चलकर हम शहर में आए तो वेंकट अब चालक के साथ-साथ गाइड की भूमिका में भी था।
वैसे गैर हिन्दी भाषी क्षेत्र में अपनी बात ठीक से कह पाना और सामने वाले की बात भली भांति समझ पाना एक हिन्दी भाषी के लिए आसान काम नहीं है। बिना संवाद के आदमी गूंगे के समान ही हो जाता है। दो दिन शहर व देहात की यात्रा करते हुए मोटा अंतर यही समझ आया कि चुनाव का असली रंग देहात यानि ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा चढ़ा हुआ है। सबसे पहले वेंकट मुझे भाजपा कार्यालय लेकर गया। यह शहर से थोड़ा बाहर था। कार्यालय के बाहर किसी तरह का कोई बोर्ड या झंडा नहीं लगा था। अंदर प्रवेश किया तो देखा वहां एक छोटा सा टैंट लगा हुआ है। पास के एक भवन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के साथ एक स्थानीय प्रत्याशी का बड़ा सा होडिँग रखा था। उस वक्त वहां चार पांच लोग जमा थे। मैं सामने कार के पास बैठे बुजुर्ग से मुखातिब हुआ तो उन्होंने बताया कि नेताजी का इंतजार हो रहा है। उस वक्त वहां एक दो झंडे जरूर टंगे हुए थी बाकी सारे समेटे हुए एक कुर्सी पर पड़े थे। मौके की नजाकत भांपते हुए मैं बाहर आया तो पुराने होर्डिंग्स के दो ढेर देखकर चौंका। अधिकतर होर्डिंग्स में उपराष्ट्रपति वेंकया नायडू नजर आए। यहां से हमने सीधे भीमली बीच की ओर रुख किया। तभी रास्ते में सड़क किनारे तेलुगुदेशम पार्टी का कार्यालय नजर आया। उस वक्त कार्यालय के आगे महज एक चौपहिया वाहन खड़ा था। कार्यालय के बाहर बहुत से पोस्टर लगे थे, लेकिन अंदर ज्यादा चहल पहल नहीं थी। इसी कार्यालय से थोड़ा आगे कस्बे की तरफ बढे तो युवाजन श्रमिक रायतु कांग्रेस पार्टी (वाईएसआर कांग्रेस पाटीज़् ) का कार्यालय दिखाई दिया। यह कार्यालय भी पोस्टरों के रंग भी रंगा हुआ था। अंदर तीन चार युवा कुसिज़्यों पर बैठे चुनावी मंत्रणा में मशगूल थे। यहां से थोड़ा आगे बढ़े तो अभिनेता से नेता बने पवन कल्याण की पार्टी जन सेना का कार्यालय का नजर आया। पवन कल्याण फिल्म अभिनेता चिंरजीव के भाई हैं। चिरंजीव ने भी राजनीति में भाग्य आजमाया था, अलग पार्टी भी बनाई लेकिन वो ज्यादा सफल नहीं हुए थे। पवन कल्याण के कार्यालय में युवाओं की टीम चुनावी सामग्री आदि को व्यवस्थित कर वितरित करने में जुटी थी। यहां से हम आगे बढे तो तगरपोवलसा नामक कस्बे में भाजपा की चुनावी रैली नजर आई। भीड़ तो नहीं थी लेकिन भाजपा के झंडे के रंग की साडी पहने महिलाएं पार्टी का झंडा उठाए बढ़ी जा रही थी। रैली में भीड़ ज्यादा नहीं थी लेकिन फिर भी लोग उसे देखने को रुक रहे थे। थोड़ी देर यहां रुकने के बाद हम आगे बढ़ गए। कार चालक वेंकट कहने लगा, आंध्रा में मुकाबला हमेशा एकतरफा ही होता रहा है लेकिन इस बार मामला रोचक है और कुछ भी हो सकता है वाले हालात बन गए हैं। विशाखापट्टनम से विजयनगरम के लिए अलग से हाइवे है लेकिन वेंकट मुझे दूसरे रास्ते से लेकर आया। यह रास्ता बंगाल की खाड़ी के किनारे-किनारे विजयनगरम तक गया है। करीब 25 किलोमीटर तक सड़क बंगाल की खाड़ी के साथ-साथ चलती है। सागर की उठती-उफनती लहरों को चलते-चलते भी देखा जा सकता है।
क्रमश:

निशब्द

33वीं लोक कथा
'एक तो तू बिना पूछे बैठे ही क्यों? ऊपर से पैसे भी नहीं दे रही है।' एक अधेड़ महिला को यह घुड़की पिलाते हुए परिचालक ने सिटी बजा दी और बस चल पड़ी। वह बस रुकवाने का आग्रह करते रही, उसका स्टैंड भी निकल गया लेकिन बस नहीं रुकी। करीब चार किलोमीटर चलने के बाद एक बुजुर्ग ने परिचालक से थोड़े तल्ख लहजे में कहा कि इस तरह आपको क्या हासिल होगा। इसका स्टैंड चला गया है, इसको उतार दो। परिचालक बोला, इसको आधा किलोमीटर ही जाना था तो यह बस में बैठी ही क्यों? अब चार किलोमीर पैदल चलेगी तब एहसास होगा और यह दुबारा एेसा कतई नहीं करेगी। चूंकि महिला गलती में थी, इसलिए उससे कुछ बोलते नहीं बना। वह निशब्द थी, लेकिन उसके रुंआसे चेहरे और आंखों में तैरते गुस्से को साफ पढ़ा जा सकता था। बस रुकी और वह चुपचाप उतर गई लेकिन सवारियों में महिला के पक्ष व विपक्ष में चर्चा चल पड़ी।