Saturday, December 1, 2012

मिलग्यो... मिलग्यो-पार्ट 2



बस यूं ही

मोबाइल मिलने की सूचना तो रात को ही मिल चुकी थी लेकिन मेरी जिज्ञासा इस बात में थी कि यह सब अचानक हुआ कैसे? कार्यालय का काम पूर्ण कर रात साढ़े 11 बजे के करीब घर पहुंचा और पहुंचते ही श्रीमती से पहला सवाल यही किया कि आपका मोबाइल बंद कैसे बता रहा है। दोनों नम्बर ही नहीं लग रहे है। बोली पता नहीं क्या है। मोबाइल पर मैसेज आ रहा है सिम रजिस्टे्रशन फेल्ड। मैंने मोबाइल देखा तो वाकई ऐसा ही था। कोई सिम काम नहीं कर रही
थी। तत्काल मोबाइल खोलकर दोनों सिम निकाली फिर बंद करके दोबारा चालू किया तो भी सफलता नहीं मिली। फिर दोनों सिम का स्थान बदला तो एक सिम एक्टीवेट हो गई। मेरे फोन से डायल करके चैक भी कर लिया। घंटी बज गई थी। इस मशक्कत में 12 बज गए। इसके बाद रात का भोजन लिया सोते-सोते 12.30 हो गए। खाने के दौरान बीच-बीच में मोबाइल खोने की कहानी भी चल रही थी। श्रीमती ने बताया कि बच्चे नीचे खेल रहे थे। पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि मोबाइल को वहीं पेड़ के इर्द-गिर्द बने गट्टे (चबूतरे) पर छोड़ दिया। बाद में श्रीमती ने जो कहानी बताई उसे जानकर मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सका। उसने कहा कि दिन से ही फोन टीवी वाले कमरे में लगे सोफे पर रखा था। दोपहर बाद उसी सोफे पर कपड़े डाल दिए और फोन उन कपड़ो के नीचे दब गया। रात को बड़े बेटे ने कपड़े कमरे के अंदर रखे तो मोबाइल उन कपड़ों में लिपट कर साथ ही चला गया।
श्रीमती को मोबाइल की याद
आती भी नहीं  लेकिन उसको व दोनों बच्चों को टीवी धारावाहिक कौन बनेगा करोड़पति देखने का शौक है। वह कई सवालों के जवाब में एसएमएस करती है। कल भी एक सवाल का जवाब देने के चक्कर में ही उसने मोबाइल संभाला, नहीं मिला तो होश फाख्ता हो गए। फौरी तौर पर इधर-उधर देखा, नहीं मिला तो घबरा गई। तत्काल दौड़ी-दौड़ी पड़ोसन के पास गई और अपनी पीड़ा जाहिर की। उसने कहा दीदी आप अपना नम्बर बता दो, मैं उस पर डायल कर देती हूं। लेकिन घबराहट में श्रीमती को खुद के छत्तीसगढ़ वाले नम्बर भी याद नहीं रहे। राजस्थान वाले नम्बर तो याद रहने का सवाल ही नहीं था। हां, इतना जरूर था कि ऐसी घबराहट के बावजूद उसको मेरे नम्बर याद रहे, तभी तो उसने मेरे को मोबाइल गुमशुदगी की सूचना दे दी। मैंने भी पहले छत्तीसगढ़ वाले तथा उसके बाद राजस्थान वाले नम्बरों पर डायल किया। कपड़ों के अंदर दबे मोबाइल की आवाज भी बड़े बेटे को सुनाई दी और और वह तत्काल मोबाइल को कपड़ों से बाहर निकाल लाया और बोला, मम्मा आपका मोबाइल तो यह रहा। श्रीमती खुशी से झाूम उठी।
श्रीमती से पूरा वाकया सुनने के बाद मैंने रात को ही तय कर लिया था कि मोबाइल मामले की दूसरी किश्त भी लिखनी है। शनिवार सुबह उठा तो पूरा बदन दर्द कर रहा था। रात को ही श्रीमती यह फैसला कर चुकी थी कि बच्चों को शनिवार को स्कूल नहीं भेजेंगे, वैसे उसका रोजाना सुबह उठने का समय पांच बजे का और मेरा साढ़े पांच बजे का है। बच्चों को स्कूल न भेजने का निर्णय होने के कारण हम निश्चिंत होकर सो गए। यह बता दूं कि श्रीमती सुबह मेरे से आधा घंटे पहले इसलिए उठती है, क्योंकि वह बच्चों का टिफिन और उनको नहलाकर तैयार करती है। इसके बाद मेरे को जगाती है। बड़े बच्चे की बस सुबह पौने छह बजे के करीब आती है। स्कूल बस का स्टॉपेज घर से करीब तीन सौ मीटर की दूरी पर है। मौसम परिवर्तन के कारण आजकल सूर्योदय अपेक्षाकृत देरी से होता है। इसक कारण सुबह-सुबह अंधेरा रहता है। उसने कहा कि अकेली महिला का अंधेरे में हाइवे पर बस के इंतजार में खड़ा होना उचित नहीं है। बात की गंभीरता को समझते हुए ही मैंने तय किया कि बड़े बेटे को मैं छोड़ आ जाऊंगा। छोटे बेटे की बस सुबह साढे सात बजे आती है तक तक काफी उजाला हो जा
ता है और लोगों की आवाजाही शुरू हो जाती है।
खैर, यह सब बताने का मकसद यह था कि सुबह देर से उठा। उठने की इच्छा ही नहीं हुई। दोनों बच्चे अलसुबह उठकर टीवी के सामने जम चुके थे जबकि श्रीमती रोजमर्रा के कार्य में व्यस्त थी। एक बार तो सोचा तबीयत कुछ खराब है आज सुबह की मीटिंग में नहीं जाऊंगा लेकिन ऐसा हो नहीं सका। मीटिंग के बाद आफिस में ही कुछ ऐसा उलझा कि दोपहर का डेढ़ बज गया। इस बीच श्रीमती का फोन भी आया, बोली आज आना नहीं है क्या है? भोजन का समय हो गया। इसके बाद दो बजे घर पहुंचा। खाना तैयार था। भोजन ग्रहण करने के बाद बैठने की हिम्मत नहीं हो रही थी, तो सो गया। बीच में दो तीन बार पर हल्की सी आहट पर आंख खुली लेकिन उठा नहीं लेटा ही रहा। आखिर में जब आंख खुली तो कमरे में छाया अंधेरा इस बात का आभास दिला रहा था कि समय कुछ ज्यादा ही हो गया है। घड़ी देखी तो वह सवा चार बजा रही थी। वैसे चार बजे आफिस चला जाता हूं। आज देर हो गई थी। बदन अब भी दर्द कर रहा था। सिर दर्द भी था। गले में खरखराहट और हल्की सी खांसी देखकर समझ गया था कि जुकाम ने अपना असर कर दिया है। मर्ज को कभी खुद पर हावी न होने की प्रवृत्ति बचपन से ही रही है, मैंने तत्काल मुंह धोया और फटाफट कपड़े पहनकर धड़धड़ाते हुए सीढिय़ों से नीचे उतरकर लम्बे कदमों से कार्यालय की ओर चल पड़ा। कार्यालय आ तो गया लेकिन मन यहां भी अनमना ही रहा। कुछ देर तो सोच में डूबा रहा कि क्या करूं.. घर चलूं कि नहीं। आखिरकार तय किया कि काम करुंगा। इस पूरी उधेड़बुन में मोबाइल की कहानी गौण हो चुकी थी। शाम का रोजमर्रा का काम कुछ हल्का हुआ तो ख्याल आया कि मोबाइल गुमशुदगी की दूसरी
किश्त तो लिखी ही नहीं है। बस फिर क्या था, हो गया शुरू और लिखकर ही दम लिया। मामला न केवल रोचक बल्कि श्रीमती से जुड़ा था, इसलिए इस पर लिखना बनता ही है। अब यह पूछकर शर्मिन्दा ना करें कि मोबाइल पर लिखकर मैंने श्रीमती पर व्यंग्य किया या फिर उसका मनोबल बढ़ाया। धन्यवाद।

Friday, November 30, 2012

...मिलग्यो... मिलग्यो



बस यूं ही

सूचना एवं प्रौद्योगि
की क्रांति के चलते आज मोबाइल फोन रोजमर्रा की जरूरत बन गया है। विशेषकर युवा वर्ग तो इसके बिना खुद को अधूरा पाता है। मेरी धर्मपत्नी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। शुक्रवार रात पौने दस बजे अचानक मेरा मोबाइल बजा। उस वक्त मैं कार्यालय में अपने कक्ष से बाहर था। आकर चैक किया तो स्क्रीन पर नम्बर दिखाई दिए। अपनी आदत के अनुसार मैंने वापस कॉल किया तो चौंक गया। सामने से आवाज श्रीमती की थी। अजनबी नम्बर से श्रीमती का फोन देखकर मैं समझ तो गया था कि कहीं न कहीं गड़बड़ तो हो गई। खैर, जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। सामने से धर्मपत्नी की बिलकुल घबराई हुई सी आवाज आई। मुझसे बोली मेरा फोन नहीं मिल रहा है। आप एक बार फोन पर घंटी करो, शायद बज जाए। मैंने तत्काल फोन काट कर श्रीमती के फोन पर डायल किया तो वह स्विच ऑफ बता रहा था। मैंने पलटकर फोन किया और श्रीमती को बताया कि आपका फोन तो बंद है। मेरा जवाब सुनकर श्रीमती एकदम निराश हो गई। बोली आज तो फोन गया। नीचे बैठी थी, बच्चों के साथ, शायद वहीं भूल गई और कोई ले गया। लम्बी सांस छोड़ते हुए वह फिर बोली, हाय राम उसने बंद भी कर लिया, मतलब चोरी हो गया मेरा फोन। पत्नी के जवाब पर मैं भी अवाक था और मन ही मन गुस्सा भी। मैंने उसको फोन पर हल्का सा डांट भी दिया कि ध्यान क्यों नहीं रखा। आपने लापरवाही की है, इसलिए उसका परिणाम भी भोगो। यह अलग बात है कि मेरे मन में भी उम्मीद थी कि शायद कहीं रखकर भूल गई होगी। उसकी भूलने की आदत है और अक्सर चीजें रखकर भूल जाती है। तभी तो मैंने उसको बताया कि घर में ढूंढ लो, शायद मिल जाएगा। मेरा इतना कहते ही फोन कट गया। यह भी हो सकता है कि श्रीमती ने मेरे को फोन करने से पहले मोबाइल की तलाश अपने स्तर पर की हो। उसने जिस फोन से मेरे को फोन किया उसी फोन से अपने नम्बर पर भी किया हो। किसी तरह का हल न निकलने पर ही उसने मेरे को फोन किया हो। दूसरा यह भी हो सकता है कि उसको राजस्थान वाले नम्बर याद ना हो क्योंकि उसका उपयोग यहां कम ही होता है। ऐसे में आखिरी विकल्प मैं ही था। मेरे पास श्रीमती के दोनों नम्बर सेव हैं।
मैं श्रीमती की पीड़ा भली भांति महसूस कर ही रहा था कि तत्काल अतीत जिंदा हो गया। पांच साल पहले झुंझुनू कार्यालय में मेरी टेबल पर रखा नया मोबाइल किसी ने बड़ी ही सावधानी के साथ पार कर दिया था। नया नया ही तो खरीदा था। बड़े ताने सुनने के बाद। पांच-छह साल तक तो नोकिया के 3310 मॉडल से ही काम चलाया। बेचारा कितना साथ निभाता खराब हो गया, तो जुगाड़ से चलाया। बैटरी खराब हुई तो वह भी बदल ली। एक दिन आफिस में बैटरी लॉ होने की समस्या ढूंढने के लिए खुद ही मैकेनिक बन गया। अचानक हाथ से छूटा और ऐसा टूटा कि फिर ठीक ही नहीं हुआ। दुकान पर गया नया मोबाइल लेने तो साथ वाले ने कहा कि भाईसाहब नोकिया 6300 खरीदो। एकदम लेटेस्ट मॉडल है। बहुत दिन हो गए पुराने मोबाइल के साथ। अब तो कुछ नया करो। यकीन मानिए मैं सस्ता मोबाइल ही लेने गया था और आज भी सस्ता मोबाइल ही इस्तेमाल करता हूं लेकिन साथी ने चांद पर चढ़ाकर जेब से 11 हजार रुपए ढीले करवा दिए। ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे उसको खरीदे हुए। बहुत दुख हुआ जब चोरी हुआ। मैंने मोबाइल की गुमशुदगी की पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाई। इससे पहले घर आकर पैकेट देखकर ईएमईआई नम्बर नोट किए और पुलिस थाने जाकर निवेदन किया। लेकिन आज तक मोबाइल का पता नहीं लगा है।
मैं समझ गया था कि अगर चोरी हुआ तो अब मिलने से रहा। यकायक दिमाग में कई तरह के सवाल भी कौंध गए। फोन मल्टीमीडिया था और डबल सिम वाला। सिम भी दो लगी थी। एक छत्तीसगढ़ की तो दूसरी राजस्थान की। कितना सहेज कर रखती है धर्मपत्नी उसको। छह माह पहले मायके गई तब लिया था। अभी दीपावली पर गई तो राजस्थान के नम्बरों की एक सिम और डलवा ली। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि मोबाइल में मेरी, बच्चों एवं श्रीमती की बहुत सारी फोटो भी थी। मन ही मन में दिलासा दिया कि खो गया तो खो गया लेकिन फोटो भी गई। बहुत सी यादें जुड़ी थी उनके साथ। फिर ख्याल आया अभी रिचार्ज भी करवाया था, पांच सौ रुपए का। शायद पुलिस में शिकायत करने से भले ही मोबाइल एवं फोटो ना मिले यह राशि तो मिल जाएगी। इस तरह दिमाग में कई सवालों का द्वंद्व और अधेड़बुन चल ही रही थी अचानक ख्याल आया कि क्यों ना एक बार राजस्थान वाले नम्बरों पर डायल किया जाए। फोन लगाया तो घंटी बज गई। जब तक श्रीमती ने फोन अटेंड नहीं किया। ऐसे में दिमाग में पहला विचार तो यह आया कि फोन बंद तो नहीं हैं। एक नम्बर पर तो घंटी जा रही है। दूसरे ही पल ख्याल आया कि यह राजस्थान का नम्बर है हो सकता है चोरी करने वाले ने मोबाइल से एक सिम निकाल ली हो। तीसरा विचार यह आया कि कहीं उसने राजस्थान वाली सिम दूसरे मोबाइल में तो नहीं डाल ली। मेरे दिमाग में यह विचार कौंध ही रहे थे कि अचानक घंटी बंद हो गई और सामने से आवाज आई... मिलग्यो... मिलग्यो...। मैं कुछ बोलता, इससे पहले ही फोन कट गया। मतलब मैं समझ गया था कि श्रीमती की चिंता दूर हो गई थी और मोबाइल मिलने की खुशी में उसके मुंह से केवल दो ही शब्द निकल पाए।
आखिर में एक बात और जिसको मैंने बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया है। आदमी हो या महिला जब वह बहुत अधिक गुस्से में होता तब और दूसरा जब वह बहुत अधिक खुश होता है तो उसके मुंह से स्थानीय भाषा ही निकलती है। श्रीमती के साथ भी वैसा ही हुआ है। वह अक्सर हिन्दी में ही बात करती है लेकिन मोबाइल मिलने की खुशी में हिन्दी भूलकर मारवाड़ी पर उतर आई। मैंने श्रीमती को दुबारा फोन लगाया तो दोनों ही नम्बरों पर नहीं लगा। शायद ज्यादा खुश हो गई या फिर सिम बंद होने के कारण तलाशने में जुट गई। कारण जो भी
हो घर जाने के बाद ही पता चलेगा। अभी तो इतना ही कह सकता हूं... वाह रे मोबाइल। तेरी भी अजीब माया है। न हो तो भी दिक्कत और हो तो भी। तेरी माया से कोई नहीं बच पाया।

Wednesday, November 28, 2012

का वर्षा जब कृषि सुखाने


प्रसंगवश 

 
अक्सर देखा गया है कि लोकप्रियता एवं वाहवाही बटोरने के चक्कर में प्रदेश की राज्य सरकार लोक लुभावन योजनाएं तो शुरू कर देती हैं, लेकिन उन योजनाओं के क्रियान्वयन में गंभीरता नहीं बरती जाती। प्रदेश में ऐसी योजनाओं की फेहरिस्त लम्बी हैं, जो तात्कालिक लाभ लेने के लिए जोरशोर से शुरू तो

कर दी गई, लेकिन वे जल्द ही अपने उद्देश्यों से भटकती नजर आई। बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने के नाम पर शुरू की गई सरस्वती नि:शुल्क साइकिल वितरण योजना का हश्र भी कुछ ऐसा ही है। सबसे पहले 2004 में यह योजना अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की कक्षा नवमी में अध्ययन करने वाली छात्राओं के लिए शुरू की गई थी। इसके बाद 2008 में इस योजना का लाभ गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की छात्राओं को भी दिया जाने लगा। इस योजना के प्रति छात्राओं ने खासा उत्साह दिखाया, लेकिन साइकिल को पाने की प्रक्रिया छात्राओं एवं उनके अभिभावकों का मनोबल तोडऩे का काम ज्यादा कर रही है। चयन से लेकर आवंटन तक की प्रकिया जटिल व लम्बी है। प्रवेश प्रक्रिया में ही एक-दो माह गुजर जाता है। इसके बाद चयनित छात्राओं की रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी के पास तथा वहां से पूरे जिले की रिपोर्ट मंत्रालय को भेजी जाती है। इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है और लगभग पूरा सत्र इंतजार में ही बीत जाता है। साइकिल देरी से मिलने की समस्या समूचे प्रदेश में है और सभी स्कूलों में हालात एक जैसे हैं। साइकिल लेने के प्रति छात्राओं की कितनी दिलचस्पी है, इस बात की पुष्टि साल दर साल आंकड़ों में होने वाली बढ़ोतरी ही बयां कर देती है। अविभाजित दुर्ग जिले में सत्र 2011-12 में साइकिल पाने वाली छात्राओं की संख्या 12091 थी। इसके बाद दुर्ग से अलग होकर बालोद एवं बेमेतरा जिले में अस्तित्व में आ गए। सत्र 2012-13 में तीनों जिलों से करीब 14501 छात्राओं को साइकिल मिलने का अनुमान है। बहरहाल, राज्य सरकार को इस योजना पर पुनर्विचार कर इसमें संशोधन करना चाहिए और ऐसी व्यवस्था हो कि छात्राओं को नवमी कक्षा में प्रवेश के दौरान ही साइकिल मिल जाए। ऐसा हो तभी इस योजना का फायदा है, वरना तो यह, 'का वर्षा जब कृषि सुखाने' वाली कहावत को ही चरितार्थ करती है। मामला बेटियों से जुड़ा है, लिहाजा राज्य सरकार को तत्काल सोचना चाहिए।




साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 28  नवम्बर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Monday, November 26, 2012

चुप्पी तोड़ो


टिप्पणी

रोज-रोज पैदल चल लम्बा सफर तय कर स्कूल जाने की मजबूरी और शोहदों से फब्तियां सुनने की लाचारी से आजिज आ चुकी नेहा ने आखिर समस्या की मूल जड़ पर ही चोट करने का फैसला किया। उसे भली-भांति मालूम था कि इन दोनों समस्याओं के पीछे प्रमुख कारण अतिक्रमण ही है। उसने हिम्मत जुटाई और सांसद द्वारा किए गए अतिक्रमण की शिकायत करके ही दम लिया। दुर्ग शहर की न्यू पुलिस कॉलोनी में रहने वाली कक्षा आठ की छात्रा नेहा ने वाकई साहसिक काम किया है। नेहा का यह काम अपने आप में बहुत बड़ा है। समाज के जागरूक लोगों को आईना दिखाकर उसने न केवल एक मिसाल कायम की है, बल्कि सुस्त समाज को जगाने की दिशा में एक अनूठी सीख भी दी है। नेहा ने यह साबित कर दिया है कि इच्छाशक्ति दृढ़ हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। निसंदेह नेहा ने सियासी भंवर में फंसे उदासीन शहर को झिाझाोड़ दिया है। नेहा का पत्र सोचने को मजबूर करता है और समाज की कड़वी हकीकत को भी बयां करता है। दरअसल, दुर्ग में लोगों की सहनशीलता इस कदर बढ़ गई है कि कोई मुंह खोलना ही नहीं चाहता। इसी वजह से जिम्मेदार व प्रभावशाली लोग जो चाहे वो करने की जुर्रत कर बैठते हैं। कभी-कभार किसी ने हिम्मत भी दिखाई तो पंगु प्रशासन से किसी तरह का सहयोग नहीं मिला। सांसद के अतिक्रमण की दबे स्वर में एक-दो लोगों ने पहले शिकायत की थी, लेकिन उनको अनुसना कर दिया गया। वैसे भी यह अतिक्रमण कोई रातोरात नहीं हुआ था। दो साल से अधिक समय हो गया था। ऐसे में इस बात की संभावना बेहद कम है कि शासन-प्रशासन को इसकी जानकारी न हो। और इससे भी गंभीर बात तो यह है कि गाहे-बगाहे अनूठे प्रदर्शन कर सस्ती लोकप्रियता पाने वाले भी इस मामले में अब तक खामोश ही रहे। उनको इस बात की जानकारी कैसे नहीं मिली यह भी किसी रहस्य से कम नहीं है।
वैसे भी शासन-प्रशासन के लिए इस अतिक्रमण को हटाना किसी चुनौती से कम नहीं है। शासन-प्रशासन को चाहिए कि वह नेहा की हिम्मत की दाद देते हुए अतिक्रमण के मामले में कार्रवाई करे। सुराज का मतलब भी तभी है। और इधर खुद को जनप्रतिनिधि कहलाने में गर्व महसूस करने वाली सांसद को भी महिला होने के नाते नेहा और उस जैसी कई लड़कियों की मजबूरी को समझना चाहिए। प्रशासन कोई कार्रवाई करे, इससे पहले सांसद को अपना अतिक्रमण हटा कर एक नजीर पेश करनी चाहिए।

 साभार - पत्रिका भिलाई के 26  नवम्बर 12 के अंक में प्रकाशित 

इन तालाबों पर कुछ तो तरस खाइए


हमें पर्यावरण की याद अक्सर तभी आती है जब बात खुद से जुड़ जाती है। हाल में मनाया गया छठ पर्व इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसके लिए बड़े पैमाने पर तालाबों की सफाई भी की गई थी। इतना ही नहीं सफाई को लेकर कुछ संगठनों की ओर से तो बड़े-बड़े दावे भी किए गए थे, लेकिन पर्यावरण एवं तालाब की चिंता करने वाले इन तथाकथित पर्यावरण प्रेमियों के दावों का दम छठ पूजा के दूसरे दिन ही निकल गया। दुर्ग व भिलाई के उन सभी तालाबों पर जहां छठ पूजा की गई थी, वहां यत्र तत्र सर्वत्र बिखरी पूजन सामग्री, फूलमालाएं एवं पॉलीथीन की थैलियां बदहाली की कहानी बयां कर रही हैं। दुर्ग-भिलाई जैसे शहरों में पर्यावरण को सुरक्षित एवं संरक्षित रखना अपने आप में बड़ी चुनौती है, ऐसे में इन शहरों में तालाबों की दुर्दशा सोचनीय एवं चिंतनीय विषय है।  वैसे भी तालाब अकेले दुर्ग व भिलाई की ही नहीं, बल्कि समूचे छत्तीसगढ़ की पहचान हैं। इन तालाबों से अतीत की कई सुनहरी कहानियां व यादें जुड़ी हैं, लेकिन इनकी दुर्दशा को लेकर न तो निगम प्रशासन गंभीर है और ना ही आमजन। गणेश पूजन, नवरात्रि आदि आयोजन पर भी बड़े पैमाने पर तालाबों में प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है, लेकिन इसके बाद के हालात पर किसी को तरस नहीं आता है। अगले साल तक फिर अवसर विशेष आने पर ही इन तालाबों की याद आती है। दुर्ग-भिलाई में बीएसपी के टाउनशिप इलाके को अपवादस्वरूप छोड़ दें, तो दोनों निगमों में सफाई व्यवस्था के हालात कमोबेश एक जैसे ही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब टाउनशिप इलाके में पर्यावरण को लेकर जितने गंभीरता बरती जाती है, उतनी निगम क्षेत्रों में क्यों नहीं? निगम व शासन के स्कूलों में गठित इको क्लब भी महज कागजी ही साबित हो रहे हैं, जबकि बीएसपी के स्कूलों इको क्लब न केवल उल्लेखनीय काम कर रहे हैं, बल्कि लगातार पुरस्कार भी जीत रहे हैं। रविवार को पर्यावरण संरक्षण दिवस मनाया जाएगा। दोनों शहरों में निगमों की कार्यप्रणाली किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में यहां के जागरूक, सेवाभावी एवं उत्साही लोग अगर प्रदूषित तालाबों की सुध लें एवं उनकी देखभाल का संकल्प कर लें तो निसंदेह वे पर्यावरण बचाने की दिशा में बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं।



साभार - पत्रिका भिलाई के 25 नवम्बर 12  के अंक में प्रकाशित।

Saturday, November 10, 2012

'राजनीति' में पिस रही जनता


प्रसंगवश

प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग की मशक्कत के बाद आखिरकार दुर्ग में डायरिया पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा चुका है। जिला कलक्टर ने भी सफाई व्यवस्था का जायजा लेने के लिए बाकायदा टीमें गठित की हैं। इसके बावजूद बदहाल व्यवस्था से परेशान लोगों का धैर्य जवाब दे रहा है। डायरिया प्रकरण

सामने आने के बाद अब तक दो बार प्रदर्शन हो चुके हैं। पहले डायरिया प्रभावित क्षेत्र की महिलाओं ने स्थानीय कांग्रेसी नेताओं के साथ निगम कार्यालय में प्रदर्शन किया। इसके बाद स्थानीय पार्षद के नेतृत्व में वार्डवासियों ने पंचायत मंत्री व स्थानीय विधायक हेमचंद यादव एवं महापौर डा. शिव कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर उनके पुतले फूंके। पीडि़त लोगों का आरोप तो यहां तक है कि डायरिया से मौत का जो आंकड़ा प्रशासन की ओर से बताया जा रहा है, वह हकीकत से दूर है। डायरिया प्रभावित स्थानों पर आज भी अव्यवस्था फैली हुई है। गौर करने की बात यह है कि दुर्ग के ऐसे हालात तब हैं जब निगम पर कब्जा भाजपा का है। वहां के विधायक भी भाजपा के हैं और राज्य सरकार में मंत्री हैं। इतना ही नहीं दुर्ग की सांसद भी भाजपा से संबंधित है। कहने का आशय यह है कि नीचे से लेकर ऊपर तक एक ही दल के लोग काबिज हैं, इसके बावजूद लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना पड़ रहा है। शासन-प्रशासन के आगे गिड़गिड़ाना पड़ रहा है। वैसे भी दुर्ग के हालात आज किसी से छिपे हुए नहीं है। जिला मुख्यालय होने के बावजूद दुर्ग विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है। जिला मुख्यालय के कई हिस्से तो गांवों से भी बदतर हैं और वहां के लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। दुर्ग की बदहाल सफाई व्यवस्था के पीछे के कारणों में पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों का न होना तथा लगातार मानिटरिंग न होना तो है ही। इसके अलावा प्रमुख एवं अहम कारण जनप्रतिनिधियों का राजनीतिक द्वंद्व भी है। वर्चस्व की इस लड़ाई में आम लोग पिस रहे हैं। ऐसे में इस आशंका को बल मिलना स्वाभाविक है कि कंडरापारा में डायरिया फैलने के पीछे नेताओं के अहम की लड़ाई भी जिम्मेदार है।
बहरहाल, आम जन की इस तरह से उपेक्षा लम्बे समय तक बर्दाश्त से बाहर है। अगर वह चाहें तो अर्श से फर्श पर भी ला सकते हैं। इसलिए जनप्रतिनिधियों को अब राजनीति से ऊपर उठकर दुर्ग की चिंता करनी चाहिए। राजनीति बहुत हो चुकी है, शहर एवं लोग अब विकास चाहते हैं। जनप्रतिनिधियों को अपनों को उपकृत करने की मानसिकता से उबरना होगा, तभी दुर्ग का भला होगा वरना लोग यूं ही मरते रहेंगे और व्यवस्था को कोसते रहेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि वजूद की लड़ाई में उलझे राजनीतिज्ञों का दिल परेशान जनता के आर्तनाद से कुछ तो पिघलेगा।



साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 10  नवम्बर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Wednesday, November 7, 2012

ऐसा भी होता है


बस यूं ही...
 

सुबह बिस्तर से उठने के बाद लघुशंका के लिए बाथरूम में घुसा ही था कि मोबाइल की घंटी बज गई। वापस लौटा तब तक कॉल पूरी हो चुकी थी। मोबाइल देखा तो फोन झुंझुनू के परिचित का था। मैंने वापस फोन लगाया और फिर रोज की तरह बातों का सिलसिला लम्बा खींच गया। बातों ही बातों में एक ऐसी बात सामने आ गई, जिसको सुनकर मैं जोर-जोर से हंसने लगा। अब भी वह बात याद आ रही है तो हंसी छूट रही है। खैर
मुख्य बात पर लौटता हूं...। झुंझुनू के परिचित महेश से हालचाल पूछने के बाद मैंने पूछा और कोई खास समाचार है क्या? तो उसने बड़ी तल्लीनता एवं सहज भाव से एक घटनाक्रम के बारे में बिना कोई भूमिका बांधे विस्तार से बताना शुरू किया। शुरू में तो मुझे भी पता भी नहीं था कि महेश का यह घटनाक्रम क्लाइमेक्स पर पहुंचते-पहुंचते यू टर्न ले लेगा, क्योंकि उसने घटनाक्रम कुछ ऐसे ही अंदाज में शुरू किया था, आप भी देखिए.... बोला भाईसाहब मंगलवार रात को एक दोस्त के साथ पिलानी चला गया। वहां इन दिनों सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा है। हम दोनों सांस्कृतिक कार्यक्रम की उम्मीद लेकर ही गए थे लेकिन वहां जाने के बाद पता चला कि आज तो कवि सम्मेलन हो रहा है। चूंकि कार्यक्रम विद्यार्थियों के द्वारा ही आयोजित था, इसलिए सार्वजनिक नहीं था। हां बाहर का कोई व्यक्ति देखने जाए तो उसके लिए टिकट लेना अनिवार्य था। हमने भी चार सौ-चार सौ रुपए की दो टिकट ले ली और हॉल के अंदर चले गए। महेश ने बताया कि हॉल में घुसने से पहले उन्होंने पिलानी के अपने एक और परिचित को बुला लिया था। उसके आने के बाद तीनों हॉल के अंदर चले आए। जब तीनों हॉल में घुसे तो वहां खामोशी पसरी थी लेकिन अंदर का माहौल देखकर महेश हतप्रभ था। दर्शकों में सभी युवा थे। कई युगल तो दीन ओर दुनिया से बेखकर बिलकुल अपने ही अंदाज में मस्त थे। इसके बाद कवि सम्मेलन शुरू हुआ तो महेश और उसके साथी तीनों आपस में एक दूसरे का मुंह ताकने लगे जबकि दर्शक जोर-जोर से हंस रहे थे। तीनों यह तो समझ गए कि मंच पर कवि ने जरूर कोई चुटकुला सुनाया है, इसलिए दर्शक हंस रहे हैं। इसके बाद महेश एवं उसके पिलानी वाले दोस्त ने तय किया है कि भले ही कवि का सुनाया उनके समझ में आए या ना आए लेकिन दर्शक को देख कर वे भी उनके साथ-साथ हंसेंगे ताकि दूसरों के लगे कि वे भी कार्यक्रम का आंनद उठा रहे हैं। लेकिन बनावटी हंसी भला कब तक चलती। पांच-सात मिनट बाद महेश का धैर्य जवाब दे गया। वह अपने झुंझुनू वाले मित्र से बोला, आपको कुछ समझा में आ रहा है क्या? इस पर महेश के दोस्त ने हां कहने के अंदाज में सिर हिलाया। दोस्त का जवाब सुनकर महेश अपने पिलानी वाले दोस्त के साथ बाहर आ गया। थोड़ी देर बाहर लॉन में घूमता रहा। अचानक महेश की नजर अपने झुंझुनू वाले मित्र पर पड़ी। वह भी निराश भाव से हॉल बाहर आ गया था। इसके बाद दोनों ने पिलानी वाले दोस्त से अनुमति ली और झुंझुनू के लिए रवाना हो गए।
मैंने पूछा कि आपने चार सौ-चार सौ रुपए टिकट लिए इसके बावजूद इतनी जल्दी क्यों लौट आए? आप तो कवि सम्मेलनों के शौकीन हो। आपको तो पूरे कवि सम्मेलन का आंनद उठाना चाहिए था। मेरा इतना कहते ही महेश जोर से बोला. आनंद कहां से उठाते... कवि सम्मेलन अंग्रेजी में था और सारे कवि अपनी रचनाएं अंग्रेजी में ही सुना रहे थे। हमारे कुछ समझ में नहीं आया। बाकी दर्शक हमको मूर्ख ना समझ लें इसलिए हमको उनको देख कर उनके साथ ठहाके लगा रहे थे। मैंने कहा जब आप बाहर आए तो आपका झुंझुनू वाला मित्र क्यों नहीं आया तो महेश ने कहा कि उसने पहले बताया कि उसको अंग्रेजी समझ में आती है लेकिन हकीकत यह थी कि उसने जोश-जोश में अंग्रेजी की बात कह तो दी कि लेकिन उसका हाल भी हमारे जैसा ही था, इसलिए थोड़ी देर बाद वह भी बाहर चला आया। महेश के मुंह से समूचा घटनाक्रम सुनने के बाद मेरी हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। वह बोला ठीक है भाईसाहब आपका सब कुछ बता दिया इसलिए आप हंस रहे हो। आप भी मजे ले लो, कोई बात नहीं। मैंने कहा कि बात तो मजे वाली ही है, इसलिए ले रहा हूं। जब मैंने उसको कहा कि इस घटनाक्रम पर मैं ब्लॉग लिखूंगा तो महेश यकायक सुरक्षात्मक अंदाज में आकर गिड़गिड़ाने लगा। बोला प्लीज भाईसाहब मैं आपसे निवेदन करता हूं आप ऐसा मत करना। मेरी इज्जत का कुछ तो ख्याल करो। मैंने कहा कि इज्जत का तो पूरा ख्याल है लेकिन मामला रोचक है, इसलिए मैं इस पर कुछ न कुछ तो लिखूंगा। उसने बार-बार निवेदन किया और मुझको ऐसा करने के लिए मना करता रहा। आखिरकार एक रास्ता मैंने ही निकाला और उसको कहा कि ठीक है मैं तेरी इज्जत का पूरा ख्याल रखूंगा। मैं ऐसा करता हूं कि तेरे नाम की जगह काल्पनिक नाम रख दूंगा। मेरे इस सुझाव पर वह सहमत हो गया। हालांकि उसने मेरे सुझाव पर भी सवाल उठाया और बोला कि आखिर परिचित लोग तो उसको काल्पनिक नाम से भी पहचान लेंगे। वैसे आप समझ गए होंगे मेरे परिचित का हकीकत में नाम दूसरा है। उससे वादा किया था, इसलिए महेश उसका काल्पनिक नाम है। खैर, यह वाकया याद आते ही चेहरे पर मुस्कान फैल जाती है। इसलिए नहीं कि चार-चार सौ रुपए देने के बाद भी वे कवि सम्मेलन का लाभ नहीं उठा सके, बल्कि इसलिए कि महेश अपने आप को बहुत ज्यादा स्मार्ट समझता है। बस यही सोच के हंस रहा हूं कि उसकी होशियारी यहां काम क्यों नहीं आई। हर काम ठोक बजाकर कहने की बात कहने वाले महेश ने टिकट लेते समय पूछ लिया होता तो शायद वह कवि सम्मेलन में कभी नहीं जाता। वैसे महेश के लिए यह टेंशन वाली बात इसलिए भी नहीं है क्योंकि टिकटों का भुगतान उसकी जेब से ना होकर उसके झुंझुनू वाले मित्र ने किया था। बात पैसे लगने का नहीं होकर महेश की समझदारी की थी और ज्यादा होशियारी ही उस पर भारी पड़ गई। मुझे उसकी होशियारी पर अब हंसी आ रही है। बहुत ज्ञान बांटता है वह। हर किसी को ही बेवजह और बेमतलब।

Monday, November 5, 2012

मच्छरों से लगाव


टिप्पणी
 

भिलाई एवं दुर्ग नगर निगमों का पर्यावरण व जीव प्रेम सबसे अलग, सबसे जुदा है। पर्यावरण एवं जीवों के प्रति प्रेम की ऐसी नजीर दूसरे निगमों में शायद ही देखने को मिले। अगर केवल मच्छरों की ही बात करें तो दोनों शहरों में उनकी संख्या दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है। अगर ईमानदारी के साथ गहनता
से जांच की जाए तो दुर्ग व भिलाई में मच्छरों की कई तरह की प्रजातियां मिल जाएंगी। इन प्रजातियों को पनपाने का लगभग श्रेय दोनों निगमों को ही जाता है। संयोगवश कहें या बदकिस्मती कि भिलाई में डेंगू के दो तीन मामले सामने आ गए तो निगम के अमले को मच्छरों के खिलाफ बुझे मन से ही कार्रवाई करनी पड़ रही है, उनके संभावित ठिकानों पर पूरे लाव लश्कर के साथ दबिश दी जा रही है, वरना निगम की तरफ से तो मच्छरों के सौ खून माफ हैं। उधर दुर्ग में फैला तो डायरिया है, लेकिन किसी तरह का इल्जाम मच्छरों पर ना आ जाए, इसलिए एहतियातन दवा का छिड़काव किया जा रहा है, ताकि मच्छर दूसरे मोहल्ले में सुरक्षित जगह पर चले जाएं।
वैसे भी मच्छरों को लेकर लोग निगम प्रशासन को नाहक ही कोसते हैं। विरोध करने वालों को शायद पता नहीं है कि मच्छरों के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपए की योजनाएं बनती हैं। बजट आता है। अगर मच्छर ही नहीं होंगे तो बजट कैसे बनेगा। योजनाएं बनें, बजट पारित हो और उसमें सभी की बराबर की हिस्सेदारी हो, इसके लिए जरूरी है कि मच्छर पैदा हों। मच्छर होंगे तभी मलेरिया व डेंगू जैसे रोग फैलेंगे। उनको काबू में करने के लिए फिर लाखों-करोड़ों रुपए का बजट पारित होगा। मच्छररहित शहर की परिकल्पना इसलिए भी नहीं की जा सकती कि आखिर मच्छरों के उन्मूलन के लिए तय राशि फिर कौनसी मद में खर्च होगी। देश में लम्बे समय से यही परम्परा चल रही है। भला इसे तोडऩे का दुस्साहस कौन करे। इसको बंद करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही तो है। इतना ही नहीं मच्छरों को भगाने के नाम पर कई तरह के मॉस्किटो क्वाइल, स्प्रे , अगरबत्ती एवं और न जाने कितने ही उत्पाद बाजार में हैं। हजारों लोग जुड़े हुए हैं, इस कारोबार से। कइयों की रोजी-रोटी का तो साधन ही यही है। गौर फरमाइएगा, इतना होने के बाद भी मॉस्किटो क्वाइल, अगरबत्तियां एवं स्प्रे मच्छरों को मारते नहीं बल्कि भगाते हैं, क्योंकि जीव हत्या का पाप कोई अपने सिर नहीं लेना चाहता। और फिर मच्छर जंगल में जाकर करेंगे भी क्या? किसको काटेंगे वहां पर। सोचिए, निगम प्रशासन अगर इन पर कार्रवाई करेगा तो कितने जीवों की हत्या का पाप चढ़ेगा उस पर। इसलिए नफा-नुकसान, धर्म-कर्म, पाप-पुण्य का हिसाब-किताब लगाकर प्रशासनिक अमला चुप है। बेहतर है आप भी चुप ही रहें। जीव हत्या का संगीन आरोप लगवाने से अच्छा है कि आप भी जीव बचाने एवं पर्यावरण प्रेमी कहलवाने वालों की सूची में अपना नाम दर्ज करवाएं और मच्छरों के खिलाफ बोलने की गुस्ताखी तो कभी भूलकर भी ना करें। बेहतर है निगम के अधिकारियों की तरह आप भी दयालु बन जाओ, आखिर मच्छरों की रगों में भी तो इंसानी खून ही दौड़ रहा है।


 साभार - पत्रिका भिलाई के 05 नवम्बर 12 के अंक में प्रकाशित

Saturday, November 3, 2012

किस काम की जागरूकता


प्रसंगवश

 

कल्पना कीजिए कोई आपको समस्या बताए या किसी खतरे से अवगत कराए लेकिन उन पर पार पाने का कोई रास्ता ना सुझाए तो आप पर क्या बीतेगी? कुछ इसी तरह की परेशानी से इन दिनों दुर्ग-भिलाई के दूध उपभोक्ता गुजर रहे हैं। उनको समस्या तो बता दी गई है लेकिन उसका समाधान नहीं बताया गया, लिहाजा उपभोक्ता पशोपेश में हैं कि वे कहां जाएं और क्या करें। हाल ही में रायपुर सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ की टीम ने कामधेनू विश्वविद्यालय के छात्रों के सहयोग से दुर्ग-भिलाई के छह स्थानों पर घरों से दूध के सैम्पल एकत्रित कर उनकी जांच की तो परिणाम चौंकाने वाले निकले। सभी जगह 60 से 80 फीसदी तक दूध के सैम्पल मानकों पर खरे नहीं उतरे। जांच के आंकड़े यह साबित करने के पर्याप्त है कि दूध में बेखौफ धड़ल्ले से मिलावट की जा रही है। जांच में यह भी सामने आया कि मिलावट के अधिकतर मामले पानी से संबंधित हैं, लेकिन जांचकर्ताओं ने आशंका भी जताई है कि दूध में जो पानी मिलाया जाता है वह दूषित होता है। दूषित पानी मिले दूध का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए तो हानिकारक है ही साथ में यह कई गंभीर बीमारियों की वजह भी बनता है। गंभीर विषय तो यह है कि दूध में मिलावट के मामले लगातार सामने आने के बाद भी सिर्फ दुर्ग के बोरसी इलाके को छोड़कर दूध विक्रेताओं में किसी तरह का डर दिखाई नहीं दिया। दूध उसी अंदाज में बिकता रहा। करीब दस दिन तक चले इस अभियान से लोगों को भले ही कुछ हासिल या फायदा नहीं हुआ हो अलबत्ता उनमें हड़कम्प जरूर मच गया। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि बिना कोई रास्ता सुझाए या विकल्प बताए मिलावट के प्रति जागरूकता का ढिंढोरा पीटना कितना न्यायसंगत है? दुग्ध संघ द्वारा की गई सघन इस जांच के पीछे प्रयोजन क्या है? वैसे दूध में मिलावट के प्रति उपभोक्ताओं को जागरूक करना बड़ी बात है, लेकिन कितना अच्छा होता कि दुग्ध उत्पादक संघ इस जागरूकता के साथ-साथ उपभोक्ताओं को इस बात का यकीन भी दिलाता कि उनको अब खुला दूध खरीदने की मजबूरी से मुक्ति दिलाई जाएगी। उनको अब देवभोग का पैकेट वाला शुद्ध दूध मिलेगा। संघ के अधिकारियों को यह भी भली प्रकार से मालूम है कि दुर्ग एवं भिलाई में देवभोग दूध की आपूर्ति कुल मांग की दस फीसदी भी नहीं है। ऐसे में उपभोक्ताओं को जागरूक करने का फायदा भी तभी है जब उनको आवश्यकतानुसार दूध मिले। केवल जांच भर कर देने, उपभोक्ताओं में हड़कम्प मचाने और मांग के हिसाब से आपूर्ति न करने से संघ खुद सवालों में घेरे में है, क्योंकि मिलावट के डर से उपभोक्ता खुले दूध के बजाय पैकेट वाले दूध को ज्यादा प्राथमिकता देंगे। और जब देवभोग के दूध के पैकेट नहीं मिलेंगे तो जाहिर सी बात है कि उपभोक्ता मजबूरी और मिलावट के डर के चलते दूसरी कम्पनियों का पैकेट वाला दूध खरीदेंगे। बहरहाल, दूध में मिलावट की जांच करने का औचित्य तभी है जब उपभोक्ताओं को शुद्ध दूध वाजिब दाम पर आसानी से उपलब्ध हो जाए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। ऐसे में मजबूर उपभोक्ताओं के पास दो ही विकल्प हैं या तो वे पैकेट वाला महंगा दूध पीएं या फिर सस्ते के लालच में गुणवत्ता से समझाौता कर लें। दुग्ध संघ को इस मामले में गंभीरता से विचार करना चाहिए।

  साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 03  नवम्बर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Tuesday, October 30, 2012

बड़ा ईमान



बस यूं ही...

सुबह नहाने के बाद जैसे ही जींस पहनी तो एकदम से सन्न रह गया। जेब से पर्स गायब था। माह का अंतिम दौर होने के कारण पर्स में पैसे तो ज्यादा नहीं थे लेकिन उसमें दो एटीएम जरूर थे। एक स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर का तो दूसरा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का। एक दो और जरूरी कागजात भी थे। मैं बिलकुल अवाक था, कुछ सूझ नहीं रहा था कि अब क्या किया जाए। मन के कोने में एक हल्की सी उम्मीद जरूर 
थी कि शायद पर्स आफिस में मिल जाए। इस उम्मीद की सबसे बड़ी वजह तो यह थी कि कई बार पर्स आफिस में गिर भी चुका है, लेकिन हाथोहाथ संभाल लेने के कारण किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई। बस इसीलिए थोड़ी सा आशा बची थी। मन व्याकुल था और आफिस पहुंचने से पहले ही हकीकत जानने का उत्सुक भी। फिर सोचा अभी तो साढ़े नौ बजे हैं। कार्यालय सहायक, सफाईकर्मी एवं सुरक्षा गार्ड के अलावा अभी कौन होगा वहां। किससे पूछूं कि वह मेरे कक्ष में जाकर देखे.. कहीं पर्स तो नहीं पड़ा है। इसी कशमकश में तैयार हो रहा था। अचानक सुरक्षा गार्ड का ख्याल आया। अरे उसके नम्बर तो मेरे पास हैं, क्यों ना उसको ही पूछ लूं। फोन लगाया तो नहीं लगा...बेचैन मन को चैन कहां था, लिहाजा पांच-छह बार लगाया, नहीं लगा तो फिर सब्र की लम्बी सांस खींचकर तैयार होने लगा। तैयार होकर सीढिय़ों से नीचे उतर रहा था तो नजर नीचे इस उम्मीद से निहार थी कि शायद पर्स कहीं दिख जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दरवाजे से बाहर उस स्थान को भी दो-तीन बार देखा कि शायद मोटरसाइकिल से उतरते वक्त कहीं गिर गया हो लेकिन सब बेकार। आखिर तेज कदमों से कार्यालय की ओर से रवाना हो गया। रास्ते में कई तरह के विचार जेहन में आ जा रहे थे। सोच रहा था, अगर पर्स नहीं मिला तो एटीएम कहां से बनवाऊंगा। बैंक खाते की बुक एवं चैक बुक का अभी तक कोई पता नहीं मिल पाया। पता नहीं स्थानांतरण के दौरान पैकिंग करते समय किस जगह उनको रख दिया। अब एकमात्र एटीएम ही तो सहारा था, जिसके माध्यम से पैसे निकलवा रहा था। अब एटीएम नहीं है तो फिर बैंक जाना पड़ेगा। बैंक भी तो बिलासपुर का है। मन ही मन में तय किया कि किसी दिन फुर्सत से समय निकाल कर बिलासपुर जाऊंगा और खाते की बुक एवं एटीएम के लिए नए सिरे से कवायद करूंगा। दूसरे ही पल फिर नया ख्याल आया कि अपने किसी साथी को कहकर भी तो यह काम करवा सकता हूं, लेकिन फिर सवाल कौंधा कि इस काम के लिए शायद स्वयं को उपस्थित होना होगा। विचारों की इसी उधेड़बुन में मैं कब आफिस पहुंचा एहसास ही नहीं हुआ। आफिस घुसते ही सबसे पहले गार्ड ने नमस्कार किया तो मैंने बताया कि शायद मेरा पर्स रात को कार्यालय में गिर रहा है। इतना कहते ही वह मेरे पीछे-पीछे हो लिया और बोला, साहब शायद आपके केबिन में गिरा गया हो. । आप काका. से पूछ लें। वह आपके केबिन में ही सफाई कर रहा है। मैं तेजी से सीढिय़ां चढ़कर अपने केबिन की तरफ आया, तभी काका एकदम से उठा और रोजाना की तरह सावधान होकर उसने मुझे सेल्युट मारा। करीब पचास-पचपन उम्र के काका का पूरा नाम मोहन सागर है और वह आफिस में साफ-सफाई का काम देखता है। मेरी चेहरे की परेशानी को काका भांप चुका था। बिना पूछे ही तत्काल दौड़कर आया बोला, साब.. आप का पर्स आपकी कुर्सी पर गिरा था। तोलिये के नीचे था दिखाई नहीं दिया। तोलिया उठाया तो नीचे गिर गया। उसे आपकी टेबिल की दराज में रख दिया है, साब। इतना सुनते ही मैंने एक लम्बी सांस छोड़ी और तत्काल दराज की तरफ लपका। काका ने सुरक्षा के लिए दराज के ताला लगा दिया लेकिन चाबी दराज में लगी हुई छोड़ दी थी। मैंने तत्काल चाबी घुमाकर दराज खोला और पर्स देखकर चेहरे पर चमक लौट आई। तब तक काका सफाई का काम छोड़कर मेरे पास केबिन में आ चुका था। बोला साब, पर्स संभाल लो। मैं मन ही मन मुस्कुराया। सोच रहा था कि अब पर्स संभालने की जरूरत ही कहां है। अगर गायब होता तो पूरा ही पर्स हो जाता है। मुझे काका की ईमानदारी ने बेहद प्रभावित किया और मैंने तत्काल उसे सौ रुपए बतौर इनाम देना चाहा तो वह थोड़ा सा हिचकिचाया। मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा कि काका मेरी ओर से तो पूरा पर्स ही गायब हो चुका था। आप की वजह से ही मुझे मिला है। मैं खुशी से आपको दे रहा हूं आप रख लो। इतना कहने के बाद काका ने सौ का नोट रख लिया।
बहुत भारी तनाव से मुक्त होने के बाद मेरी खुशी का ठिकाना न था। और इसी खुशी में मैं फिर सोचने लगा... और अतीत की यादों में खो गया। कुछ इसी तरह का मामला तो करीब पांच साल पहले भी हो चुका है, जब कार्यालय के दो हजार रुपए मैं आफिस में अपने टेबिल के दराज में रखकर भूल आया था। इतना ही नहीं दराज के चाबी लगाना तो दूर उसको दराज में लटकता हुआ ही छोड़कर आ गया था। कुछ अनहोनी की आशंका रात को ही हो गई थी और दूसरे दिन हुआ भी वैसा। सुबह आफिस पहुंचा था दराज से चाबी गायब थी। तलाश की तो वह बगल की ट्रे में डाली मिल गई थी। बदहवाश हालात में मैंने तत्काल दराज खोला तो रुपए कम दिखाई दिए। गिनने लगा तो सौ-सौ के नौ नोट गायब थे। आफिस में सबसे पूछा लेकिन सभी ने अनभिज्ञता जाहिर कर दी। अचानक विचार आया कि सुबह पांच बजे सफाई वाला आता है। कहीं उसी ने तो ऐसा नहीं कर दिया। शक को बल तब और ज्यादा मिल गया जब उसने उस दिन के बाद आफिस आना बंद कर दिया। खैर, वह पैसे मैंने अपने खाते से जमा किए।
संयोग देखिए दोनों ही घटनाएं आफिस में हुई लेकिन दोनों में अंतर कितना है। मैं इसी सोच में डूबा था। मेरी यह बात बहुत अच्छी तरह से समझ में आ गई थी कि क्यों सभी लोग एक जैसे नहीं होते और क्यों सभी को एक जैसा नहीं समझना चाहिए। वाकई काका की ईमानदारी ने मेरा सीना चौड़ा कर दिया। इसलिए नहीं कि उसने मेरा पर्स लौटा दिया बल्कि इसलिए कि एक अदना सा कर्मचारी होने के बाद भी उसका ईमान कितना बड़ा है। बहुत बड़ा। सलाम उसकी ईमानदारी को।

Saturday, October 27, 2012

जनहित की अनदेखी


प्रसंगवश
सड़कों की खराब दशा को लेकर अभी पखवाड़े भर पूर्व दुर्ग शहर में कांग्रेस पदाधिकारियों ने पीडब्ल्यूडी कार्यालय के समक्ष भैंस के आगे बीन बजाई थी। विरोध जताने के इस अनूठे प्रदर्शन ने सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा जरूर लेकिन, आमजन से जुड़ी यह समस्या आज भी निराकरण की बाट जोह रही है। आमजन से ही जुड़ी ट्रैफिक सिग्नल समस्या को हल करवाने के लिए अब दुर्ग शहर के वकीलों ने कमर कसी है। वकील गांधीगीरी करते हुए एक नवम्बर को राज्योत्सव के दिन चंदा मांगेंगे और एकत्रित राशि जिला प्रशासन को सौंपेंगे। वकीलों का कहना है कि दुर्ग के पटेल चौक पर 20 साल पहले ट्रैफिक सिग्नल लगाया गया था। इसके माध्यम से यातायात को संचालित किया जाता रहा। वर्तमान में स्वचालित सिग्नल लगा होने के बाद भी चौक चौराहों पर ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए यातायात पुलिसकर्मियों को मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे में यह सिग्नल अनुपयोगी है। यातायात सुचारू हो, चौक-चौराहों पर डिजीटल ट्रैफिक सिग्नल लगे, इसलिए चंदा एकत्रित किया जा रहा है। काबिलेगौर है कि ट्रैफिक सिग्नल की मांग को लेकर गांधीगीरी पर उतरे वकील इससे पहले शहर में सड़कों के गड्ढ़े, धूल, गंदगी और अव्यवस्थित यातायात को लेकर धरना प्रदर्शन कर चुके हैं लेकिन उनके आंदोलन का कोई नतीजा नहीं निकला। दुर्ग जिले के प्रति सरकार के अब तक के मौजूदा रुख से लगता नहीं है कि वह वकीलों की गांधीगीरी पर भी कोई दरियादिली दिखाएगी।
वैसे भी सियासी दावपेंचों में उलझे दुर्ग शहर में समस्याओं की लम्बी फेहरिस्त है। तभी तो इनके निराकरण के लिए आंदोलन करना या विरोध दर्ज करवाना एक परम्परा सी बन गई है। शासन-प्रशासन का ध्यान आकर्षिक करने के लिए यहां विरोध के नित नए तरीके भी आजमाए जाते हैं। इसके बावजूद शासन-प्रशासन की आंखें नहीं खुलती हैं। विडम्बना तो यह है कि सरकार एवं उसके नुमाइंदे बड़ी-बड़ी योजनाओं का भूमिपूजन करके वाहवाही बटोरने से गुरेज नहीं करते लेकिन बुनियादी सुविधाओं के सुधार की तरफ उनका ध्यान नहीं जाता। एक बात और। कोई किसी भी तरह से आंदोलन कर ले राज्य सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगती। शासन-प्रशासन का रवैया भैंस के आगे बीन बजाने जैसा ही हो गया है। बहरहाल, वकीलों के पास मांग मनवाने के लिए दूसरा रास्ता भी है। पटरी से उतरी बदहाल व्यवस्था हो चाहे व्यवस्था में दोष, वकील अगर चाहें तो इसको कानून के माध्यम से भी ठीक करवा सकते हैं। कानून का सहारा लेकर समस्या का निराकरण करवाना भी तो गांधीगीरी की श्रेणी में ही आता है। ऐसे में अदालत का दरवाजा खटखटाने से गुरेज नहीं करना चाहिए। देश-प्रदेश में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जब शासन-प्रशासन से नाउम्मीद हो चुके लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और उनको वहां न्याय मिला। इसलिए धरना-प्रदर्शन एवं गांधीगीरी की भाषा का जहां कोई अर्थ न हो, वहां कानून का सहारा लेने में ही भलाई है। वकीलों से बेहतर यह काम भला और दूसरा वर्ग कौन जान सकता है।



 साभार- पत्रिका छत्तीसगढ़ के 27 अक्टूबर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Friday, October 26, 2012

जोर जबरदस्ती का खेल


प्रसंगवश 

 
कोरबा जिले की कटघोरा तहसील के ग्राम पंचर में पावर ग्रिड की ओर से हाइटेंशन लाइन बिछाई जा रही है। इस काम के चलते खेतों में खड़ी धान की फसल को नुकसान हो रहा है। तार बिछाने के काम से धान की बालियां टूट कर गिर रही हैं। बिना किसी अधिग्रहण के हो रहे इस काम को एक तरह से जोर जबरदस्ती ही मा

ना जाएगा। अपनी मेहनत के मोतियों को आंखों के सामने बिखरते देख किसानों का खून के आंसू रोना और आक्रोशित होना स्वाभाविक है। किसानों ने अपनी पीड़ा प्रशासन तक पहुंचाई है। इधर, राजस्व अधिकारी नुकसान का आकलन करने के बाद मुआवजा प्रकरण तैयार होने की बात कह रहे हैं, लेकिन हालात ऐसे लगते नहीं हैं कि किसानों को यहां आसानी से इंसाफ मिल जाएगा। स्वयं किसान ही यह बात कह रहे हैं कि प्रति किसान को 20 से 25 हजार रुपए के करीब नुकसान हुआ है लेकिन मुआवजा बेहद कम तैयार किया जा रहा है। यह एक तरह से ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। वास्तविक नुकसान और उसके बदले दिए जाने वाले मुआवजे में जमीन आसमान का अंतर ही किसानों के आक्रोश की वजह बन रहा है। सवाल उठता है कि ऐसे हालात पैदा होने ही क्यों दिए जा रहे हैं। आखिर ऐसी क्या जल्दबाजी है कि किसानों की जमीन का अधिग्रहण किए बिना ही युद्धस्तर पर टावर लगाने व लाइन बिछाने का निर्णय कर लिया। अगर यही काम समय रहते कर लिया जाता तो न फसल बर्बाद होती और ना ही किसान आक्रोशित होते। इससे तो यही जाहिर होता है कि नियम कानून सब बड़ों के लिए ही है। सरकार कुछ भी कर ले, उसको कोई चुनौती नहीं दी जा सकती है। चूंकि पावर ग्रिड का काम अभी शुरुआती दौर में है और इसकी जद में आने वाले गांव एवं किसानों की संख्या भी इक्का-दुक्का ही है, लेकिन भविष्य में यह काम इसी तर्ज पर आगे बढ़ा तो किसानों को एकजुट होने में देर नहीं लगेगी। इसलिए सरकार को तत्काल किसानों का दर्द समझाना चाहिए और जिनका जितना नुकसान हो रहा है उनको उतना मुआवजा मिलना चाहिए। अगर सरकार यह काम नहीं कर सकती तो उसको किसानों की हमदर्द होने का दंभ भरने का राग अलापना भी बंद कर देना चाहिए।
 
 साभार- पत्रिका छत्तीसगढ़ के 26 अक्टूबर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Wednesday, October 24, 2012

काश! हर दिन नवमी हो जाए...


( एक बच्ची का खुला पत्र )




 टिप्प्पणी

मंगलवार का दिन मेरे लिए ऐतिहासिक रहा। दिन भर खूब पूछ-परख हुई। घरों से लगातार निमंत्रण आते रहे। दुर्ग के सती चौरा माता मंदिर के पास कन्याओं के सामूहिक भोज का नजारा तो मेरे लिए अविस्मरणीय है। दो हजार से अधिक मेरी बहनें लाल चुनरी ओढ़े ऐसी लग रही थी मानो मैया साक्षात अवतरित हो आई हों। सामूहिक भोज से पूर्व शक्ति स्वरूपा मेरी बहनों का जगह-जगह स्वागत हुआ। गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकली। मंदिर परिसर पहुंचने के बाद हुआ स्वागत तो अपने आप में अनूठा रहा। पुरुष प्रधान मानसिकता रखने वाले समाज का यह श्रद्धा-भाव देखकर मैं गदगद् हूं।
लेकिन क्या करूं, मैं जानती हूं मेरी यह खुशी स्थायी नहीं है। साल भर में नवमी जैसे एक-दो आयोजन ही ऐसे आते हैं, जब हमारी इतनी पूछ-परख एवं आवभगत होती है। वरना हमारी हालत किसी से छिपी नहीं है। कौन परवाह करता है हमारी? कदम-कदम पर चुनौतियां हैं। और इन सब के पीछे जो कारण छिपा है वह है पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता। लिंग भेद की काली छाया से तो समूचा देश ही अछूता नहीं है। छत्तीसगढ़ का हाल भी ठीक नहीं है। गर्भ में ही गला घोंट देने तथा लड़का-लड़की में भेद करने के उदाहरण यहां भी हर जगह मिल जाएंगे। तभी तो पूरे प्रदेश में लिंगानुपात गड़बड़ाया हुआ है। महिला सशक्तिकरण की बातें करने वालों से कोई पूछे जरा कि प्रदेश में प्रति हजार पुरुषों के पीछे हमारा अनुपात 991 क्यों है? दुर्ग जिले में तो यह और भी कम है। यहां प्रति हजार पुरुषों के पीछे 988 महिलाएं ही हैं। लिंगानुपात में अंतर के अलावा महिलाओं की हालत भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। मेरी बहनों पर अनाचार एवं शोषण का रिकार्ड शर्मसार करने वाला है। प्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार से जुड़े आंकड़े तो निसंदेह चौंकाने वाले हैं। बलात्कार, अपहरण, दहेज हत्या, पति से प्रताडऩा, लड़कियों की तस्करी व दहेज प्रताडऩा के सन 2010 में 4146 मामले पंजीबद्ध हुए थे। 2011 में ये मामले बढ़कर 4219 हो गए। इसके अलावा बहुत से मामले तो ऐसे भी हैं, जो पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते। बहुत दुख एवं आश्चर्य होता है यह सब जानकर। जिस देश में एक से बढ़कर एक विदुषी महिलाएं पैदा हुईं। नारियों की जहां पूजा होती है, वहां देवताओं के निवास का फलसफा भी तो मेरे देश ने दिया है। वैसे भी देखा जाए तो किस मामले में कम हैं मेरी बहनें। आखिर कौनसा ऐसा काम है जो मेरी बहनें नहीं कर सकती? धरती से लेकर आकाश, घर से लेकर संसद, खेल से लेकर कला, सभी जगह मेरी बहनें अपनी दमदार उपस्थिति दे रही हैं। इतना कुछ होने के बाद भी यह दोहरा व्यवहार क्यों?  क्यों एक-दो दिन मान-मनुहार करने के बाद हमको हमारे हाल पर छोड़ दिया जाता है? क्यों मेरी बहनों को दया का पात्र बना दिया जाता है? आखिर ऐसा क्या गुनाह कर दिया हमने? समाज में हमारा भी तो बराबर योगदान है। हम भी तो सम्मान से जीना चाहती हैं। इसलिए एक-आध दिन पूछ परख कर साल भर आंखें मूंदने की प्रवृत्ति त्यागनी होगी। हर दिन को ही नवमी मान लें तो बहुत सारी समस्याओं का निराकरण स्वत: ही हो जाएगा। काश! हर दिन नवमी हो जाता।


 साभार- पत्रिका भिलाई के 24 अक्टूबर 12 के अंक में प्रकाशित


Saturday, October 20, 2012

निरीक्षण की औपचारिकता


प्रसंगवश
बिलासपुर रेलवे जोन के अधिकारियों ने गुरुवार को दुर्ग रेलवे स्टेशन का निरीक्षण किया। इससे पहले बुधवार को रायपुर रेलवे मंडल के अधिकारियों ने भी स्टेशन का जायजा लिया था। रायपुर रेलवे मंडल के अधिकारियों के दुर्ग आने की सूचना सम्बंधित ठेकेदार को मिल गई थी, इस कारण अव्यवस्थाओं पर परदा डालने का प्रबंध कर दिया गया। एक नम्बर प्लेटफार्म को तो तुरत-फुरत चकाचक कर दिया गया। दुर्ग स्टेशन पहुंचे रायपुर के अधिकारियों ने जायजे के दौरान प्रसाधन कक्ष के फ्लोर टाइल्स, वेंटिलेशन खिड़की और वाश बेसिन का संधारण करने के निर्देश दिए। इसके अलावा स्लीपर एवं एसी डारमेट्री टीटीई कक्ष का निरीक्षण कर चादर एवं कंबल नियमित बदलने तथा सफाई व्यवस्था सुचारू रखने के लिए भी कहा। अधिकारियों ने स्टेशन परिसर में चल रहे निर्माण कार्यों की धीमी गति पर भी नाराजगी जताई। वैसे, रायपुर की टीम ने निरीक्षण में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई भी नहीं। उनका मकसद तो यही था कि बिलासपुर से आने वाली टीम को कोई बड़ी अव्यवस्था ना मिल जाए, इसलिए क्यों ना उसको समय रहते ही दूर कर लिया जाए। लिहाजा, सम्बंधितों को दिशा-निर्देश जारी कर अधिकारी रायपुर लौट गए। गुरुवार को पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार बिलासपुर जोन के अधिकारी दुर्ग स्टेशन पहुंंचे तो जरूर, लेकिन उनके दौरे में गंभीरता कम ही दिखाई दी। इन अधिकारियों ने भी वही कुछ देखा या दिखाया गया जो रायपुर के अधिकारी एक दिन पूर्व देख चुके थे। अधिकारियों ने पूरे स्टेशन परिसर का निरीक्षण करना भी उचित नहीं समझाा। अधिकारियों के आगमन को देखते हुए जिन अव्यवस्थाओं के दुरुस्त होने की उम्मीद बंधी थी, वे वैसे की वैसे मुंह बाए खड़ी रही। हाल ही में चर्चा में आए पार्सल विभाग की तरफ तो अधिकारियों ने देखना तक उचित नहीं समझाा। पार्किंग एवं पेयजल व्यवस्था की भी यही कहानी रही। वैसे निरीक्षण का मतलब सिर्फ औपचारिकता निभाना ही नहीं है। इसका उद्देश्य मौके की वास्तविकता से अवगत होना तो है ही। व्यवस्थाओं में किसी तरह की गड़बड़ी न हो, स्टेशन पर आने वाले यात्रियों को किसी तरह की असुविधा का सामना ना करने पड़े आदि तमाम बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। निरीक्षण की सार्थकता भी तभी ही है। सिर्फ कागजी आंकड़े दुरुस्त करने या महज रस्म अदायगी करने से अव्यवस्थाएं दूर नहीं होने वाली। इसके लिए पहली प्राथमिकता तो यही है कि रेलवे के अधिकारी कामकाज के अपने परम्परागत ढर्रे में बदलाव लाएं। यात्री भार देखते हुए दुर्ग का स्टेशन रायपुर-बिलासपुर के समकक्ष ही है। इतना ही नहीं, दुर्ग स्टेशन को मॉडल स्टेशन का दर्जा भी दिया गया लेकिन सिर्फ मॉडल स्टेशन का झाुनझाुना देकर इतिश्री कर ली गई। भिलाई स्टील प्लांट के रेलवे के विस्तारीकरण में योगदान को नकारा नहीं जा सकता। इसके बावजूद सुविधाओं में विस्तार न करके रेलवे एक तरह से दुर्ग-भिलाई के यात्रियों के साथ नाइंसाफी ही कर रहा है। अगर दुर्ग को मॉडल स्टेशन का दर्जा मिला है, तो फिर सुविधाएं भी उसी हिसाब से मिलनी चाहिए। रेलवे का दुर्ग-भिलाई से सौतेला व्यवहार समझा से परे है।
 साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 20 अक्टूबर 12  के अंक में प्रकाशित। 

Sunday, October 14, 2012

उद्‌देश्य से ना भटके अभियान

टिप्पणी

 
सुप्रीम कोर्ट की ओर से वाहनों के शीशों पर लगाई जाने वाली काली फिल्म हटाने के लिए अगस्त माह में जारी किए गए आदेशों की याद जिला पुलिस को अब आ रही है। आदेशों की अनुपालना में पुलिस ने शनिवार को वाहनों के शीशों पर काली फिल्म लगाने वाले विक्रेताओं के साथ बैठक की और प्रतिबंधित फिल्म विक्रय न करन

े की हिदायत दी। बढ़ती आपराधिक गतिविधियों के मद्देनजर वाहनों के शीशों पर काली फिल्म हटाने की मांग लम्बे समय से उठ रही थी, लेकिन यातायात पुलिस ने इस विषय पर कभी गंभीरता से विचार नहीं किया। कभी ज्यादा दबाव आया तो औपचारिकता के नाम पर एक-दो दिन कार्रवाई जरूर की गई, वरना वाहन यूं ही बेखौफ दौड़ते रहे। सबसे बड़ी बात तो यह है कि पुलिस, यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों में किसी प्रकार का डर पैदा नहीं कर पाई। पुलिस अधिकारी खुद स्वीकार कर रहे हैं कि जुर्माना लगाने के बावजूद लोग वाहनों के शीशों पर काली फिल्म लगवा रहे हैं। मतलब साफ है कि वाहन चालक जुर्माना देकर भी कानून तोड़ने से बाज नहीं आ रहे हैं। यातायात नियमों की पालना करवाने में अगर शुरू से ही गंभीरता बरती जाती तथा कड़ी कार्रवाई होती तो इस प्रकार फिल्म विक्रेताओं के साथ न तो बैठक करने की जरूरत पड़ती और ना ही कानून हाथ में लेने वालों का हौसला बढ़ता। शीशों पर काली फिल्म हटाने के लिए पुलिस पहले भी कई बार अभियान चला चुकी है, लेकिन उन अभियानों का हश्र सबके सामने है। वैसे भी भिलाई में यातायात व्यवस्था को दुस्त-दुरुस्त करने के लिए कई तरह के अभियान चलाए गए हैं, लेकिन शायद ही कोई अभियान होगा, जिसका व्यापक असर दिखाई दिया हो। यातायात पुलिस भले ही अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए आंकड़ें प्रस्तुत कर दे, लेकिन हकीकत इससे अलग है। बात भिलाई में दुपहिया वाहन चालकों द्वारा हेलमेट न लगाने लगाने की हो या फिर नाबालिग वाहन चालकों की। कहने को पुलिस इन सबके खिलाफ भी अभियान चला चुकी है, लेकिन सड़क पर इक्का-दुक्का वाहन चालकों के अलावा किसी के सिर पर हेलमेट दिखाई नहीं देता है। सैकड़ों की संख्या में स्कूली बच्चे दोपहिया वाहनों पर फर्राटे भरते नजर आते हैं। इतना ही नहीं वाहनों के कागजात जांचने की याद भी यातायात पुलिस को अवसर विशेष या त्योहारों के नजदीक ही ज्यादा आती है। इधर, दुर्ग-भिलाई के बीच चलने वाले ऑटो चालक जो चाहे वो कर रहे हैं। वे क्षमता से अधिक सवारियां बैठा रहे हैं। मनमर्जी से रूट तय कर रहे हैं। वे यहां-वहां रुककर यातायात नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। आधे घंटे में तय होने वाले सफर में एक-एक, डेढ़-डेढ़ घंटे का समय लगा रहे हैं, लेकिन यह सब पुलिस को दिखाई नहीं दे रहा है। इस मामले में पुलिस की भूमिका से तो ऐसा लगता है कि जैसे कि ऑटो का संचालन वह स्वयं करवा रही हो।
बहरहाल, यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ईजाद किया जाने वाला कोई भी अभियान बुरा नहीं होता है। उसका सफल या असफल होना पुलिस की कार्यशैली पर निर्भर करता है। वाहनों के शीशों पर काली फिल्में उतारने का अभियान भी ईमानदारी से चले, उसकी कड़ाई से पालना हो और कार्रवाई में किसी तरह का भेदभाव न हो। तभी इसके तत्कालिक एवं दूरगामी फायदे होंगे। अभियानों की सार्थकता भी तभी है, वरना अतीत इस बात का गवाह है कि बिना कार्य योजना एवं गंभीरता के चलाए जाने वाले अभियानों से सिर्फ कागजी आकंड़े ही दुरुस्त होते हैं, व्यवस्था में सुधार नहीं होता।
 
साभार - भिलाई पत्रिका के 14 अक्टूबर 12  के अंक में प्रकाशित।
 
 

Saturday, October 13, 2012

जांच के नाम पर लीपापोती

प्रसंगवश 

अविभाजित दुर्ग जिले के सुदूर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग की व्यवस्था बेहद ही लचर एवं बदहाल स्थिति में है। इन स्थानों पर विभाग की लापरवाही एवं कारगुजारियों के किस्से अक्सर उजागर होते रहते हैं। बालोद नेत्रकांड तथा इसके बाद डौंडीलोहारा में रिकॉर्ड नसबंदी ऑपरेशन के मामले अभी चर्चा में ही हैं कि कुछ इसी तरह का एक और प्रकरण सामने आया है। बेमेतरा जिले के अमोरा गांव में शिवनाथ नदी पर बने पुल के नीचे ग्रामीणों को दवाइयों का बड़ा जखीरा मिला। इस मामले का पर्दाफाश पानी से उठी दवा की गंध के कारण हुआ। ग्रामीणों ने गंध की वजह टटोली तो बोरों में भरे दवा के पैकेट दिखाई दिए। पानी में बहाए गए दवाओं के पैकेट पर जो जानकारी लिखी गई है, उसके मुताबिक यह दवा बाजार में बिक्री के लिए नहीं थी और यह अवधिपार भी नहीं है। इसको सन्‌ 2013 व 2014 तक उपयोग किया जा सकता था। पैकेट्‌स को देखते हुए इनको यहां डाले भी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। जाहिर
सी बात है कि जिम्मेदारों ने इस दवा को पात्र व्यक्तियों को वितरित करने के बजाय पानी में बहाना बेहतर समझा। खैर, इस तरह से नदी के पास दवा मिलना तो अपने में अजूबा है ही। दवा मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग की भूमिका उससे भी बड़ा अजूबा है। अधिकारियों का रवैया तो निहायत ही गैर -जिम्मेदाराना रहा। शुरुआत में तो उन्होंने दवा मिलने की बात को सिरे से ही नकार दिया। अधिकारियों के बयानों की बानगी भी ऐसी थी कि लोगों ने आश्चर्य से दांतों तले अंगुली दबा ली। सीएमएचओ एवं बीएमओ दोनों के ही बयान न केवल विरोधाभासी थे, बल्कि सच से भी कोसों दूर दिखाई दिए। सीएमएचओ ने नदी के पास मिली दवा को नष्ट करवाने की बात कही, तो बीएमओ तो उनसे चार कदम आगे निकले। उनका कहना था कि वहां ऐसा कुछ मिला ही नहीं है। इस तरह बिना सोचे समझे बयान देना तथा गलती स्वीकारने या जांच का आश्वासन देने के बजाय सरासर झूठ बोलना बेशर्मी की हद है। स्वास्थ्य जैसे संवदेनशील विषय पर लगातार लापरवाही उजागर हो रही है, लेकिन सरकारी एवं प्रशासनिक स्तर पर कोई हलचल दिखाई नहीं दे रही हैं। गंभीर एवं विचारनीय विषय तो यह है कि सरकार एवं उसके नुमाइंदे तो हमेशा की तरह इस मामले में भी नींद में गाफिल हैं। दवा मिलना तथा इसके बाद गलत बयानबाजी के बावजूद मामले को बेहद हल्के से लेना यह साबित कर रहा है कि सरकार को स्वास्थ्य से कोई सरोकार नहीं है। जब इस तरह से सरेआम सफेद झूठ बोलने वालों के हाथों में स्वास्थ्य सेवा की डोर हो तो सोचा जा सकता है कि लोग किस हाल में जी रहे हैं। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा से जुड़ी गफलतों को देखकर इतना तो तय है कि जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर गलत बयानबाजी करने वालों को शासन का कोई डर नहीं है। पीड़ितों को राहत देने तथा दोषियों पर कार्रवाई के नाम पर राज्य सरकार एवं उसके प्रतिनिधि महज मूकदर्शक की भूमिका ही निभा रहे हैं। सरकार की भूमिका से तो ऐसा लग भी रहा है कि यह सब उसके संरक्षण में ही चल रहा है। जैसे कि सरकार ने कुछ भी करने की अघोषित छूट दे रखी हो।
 
साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 13  अक्टूबर 12 के अंक में प्रकाशित।

Saturday, October 6, 2012

पोस्टर प्रेम का नया शगल


प्रसंगवश

छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के कार्यकर्ताओं ने गुरुवार को भिलाई के छावनी थाने के समक्ष विरोध प्रदर्शन कर अपने गुस्से का इजहार किया। कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर आक्रोश था कि शहर में लगाए गए मंच के पोस्टरों को किसी ने बिना वजह के फाड़ दिया। मंच कार्यकर्ताओं ने पोस्टर फाड़ने वालों के खिलाफ जुर्म दर्ज करने की मांग को लेकर थानाधिकारी को ज्ञापन भी दिया। पोस्टर से संबंधित कमोबेश ऐसा ही एक वाकया पखवाड़े भर पूर्व भी हो चुका है। उस वक्त भिलाई महापौर के जन्मदिन की बधाई से संबंधित पोस्टरों पर कालिख पोत दी गई थी। इस मामले की भी पुलिस थाने में शिकायत की गई थी। पोस्टरों से संबंधित उक्त दोनों घटनाओं से यह तो जाहिर है ऐसा करने वाला यकीनन पूर्वाग्रह से तो ग्रसित था ही उसकी मानसिकता भी निहायत ओछी थी। हो सकता है यह सब करने के पीछे तात्कालिक गुस्से को शांत करना रहा हो लेकिन यह एक तरह की कायराना हरकत ही है। अगर किसी को कुछ शिकायत है भी तो वह इस प्रकार का कृत्य क
रने से दूर नहीं हो जाती। फिलहाल, दोनों ही मामले पुलिस के पास विचाराधीन हैं लेकिन इतना तो तय है कि इन प्रकरणों का मूल कारण सियासी अदावत ही है। वैसे पोस्टर लगाने का शगल बड़ी तेजी के साथ पनपा है। अकेले भिलाई ही नहीं समूचे प्रदेश में यह अब फैशन में तब्दील हो चुका है। छुटभैयों के लिए यह प्रचार करने का सबसे कारगर तरीका है तो उनके आकाओं के लिए किसी शक्ति प्रदर्शन से कम नहीं। पोस्टर लगाने के लिए वे अक्सर अवसरों को तलाशते रहते हैं। कभी त्योहारों के नाम पर तो कभी राष्ट्रीय पर्व के नाम पर। सारे नियम-कायदे भी यहीं से तार-तार होना शुरू हो जाते हैं। सोचनीय विषय तो यह है कि जिम्मेदार लोग अपने समर्थकों के इस प्रेम को बिलकुल भी गंभीरता से नहीं लेते। उनकी भूमिका से तो ऐसा लगता है, जैसे उनके इशारे पर ही यह सब होता है। संभवतः इसी चक्कर में इन पोस्टरों को हटाने की हिमाकत प्रशासनिक अमला भी नहीं कर पाता है। तभी तो अवसर बीत जाने के बाद अप्रसांगिक होते हुए भी पोस्टर टंगे रहते हैं। न तो निगम प्रशासन उनको हटवाने की जहमत उठाता है और न ही लगाने वालों को इनकी याद आती है। कोई रोकने या टोकने वाला भी नहीं है। मनमर्जी का यह खेल यूं ही बदस्तूर चलता रहता है। बहरहाल, पोस्टर फाड़ने या उन पर कालिख पोतने का विरोध करने वालों के पास अपना तर्क हो सकता है, लेकिन कड़वी हकीकत यही है कि इन पोस्टरों के सहारे कुछ हद तक सस्ती लोकप्रियता जरूर हासिल की जा सकती है लेकिन जनता का दिल नहीं जीता जा सकता है। इस नए शगल से सिवाय पैसे की बर्बादी के कुछ हासिल नहीं है। शहर बदरंग होता है वह अलग। इस दिशा में गंभीरता से सोचने एवं उस पर विचार करने की जरूरत है।
 
साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 06 अक्टूबर 12 के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, October 2, 2012

बस एक दिन याद आता हूं मैं...

बापू बोले


गौर से देखिए मेरी प्रतिमा को। याद कीजिए भिलाई के जलेबी चौक पर कितने जोश-खरोश एवं मान-सम्मान के साथ मुझे प्रतिष्ठापित किया गया था। मेरी याद को चिरस्थायी रखने के लिए पता नहीं क्या-क्या संकल्प भी आप लोगों ने उस दिन लिया था। मैं खुश था आप लोगों का उत्साह एवं जोश देखकर। लेकिन मेरा यह सोचना गलत था। कुछ ही समय में आप लोग सब कुछ भूल गए। कड़वी हकीकत यह है कि आप लोगों को जरूरत के समय ही मेरी याद आती है। अक्सर चुनाव में कई नेता तो मेरे नाम के सहारे ही चुनावी नैया पार लगाने की कवायद में जुट जाते हैं। उस वक्त पार्टी, आदर्श, सिद्धांत आदि गौण हो जाते हैं। चुनाव की बात छोड़ भी दूं तो आप लोगों को साल में दो बार ही मेरी याद आती है। शहीद दिवस 30 जनवरी को तथा दो अक्टूबर को मेरी जयंती पर। कई जगह तो लोग उक्त दोनों तिथियां भी भूल जाते हैं। भूलना एक अलग बात है लेकिन दुखद विषय यह है कि मेरा राजनीतिकरण कर दिया गया है। एक दल के लोग अवसर विशेष पर गाजे-बाजे के साथ आते हैं लेकिन बाकी दल के लोग पता नहीं क्यों एवं क्या सोच कर मेरी प्रतिमा पर श्रद्धा के दो फूल चढ़ाने में भी शर्म-शंका करते हैं। खैर, ऐसे हालात के लिए दोष आपका नहीं समय का है। मौजूदा दौर में मानवीय मूल्य गौण हो गए हैं। व्यक्तिगत सोच के चलते लोग स्वार्थी हो गए हैं। अपने घर-परिवार वालों से भी ठीक से पेश नहीं आते हैं। फिर मैं क्या लगता हूं उनका। मेरा कौनसा खून का रिश्ता है उनसे। यह तो उनकी मर्जी पर निर्भर करता है कि चाहें तो याद करें चाहें तो नहीं। अब दुर्ग में भी मेरी प्रतिमा साल भर से उपेक्षित पड़ी थी। ऐसा भी नहीं कि मैं किसी कोने में लगा था। बिलकुल हिन्दी भवन के सामने मेरी प्रतिमा लगी है। साल भर मेरी प्रतिमा यहां अपनी बदहाली पर आंसू बहाती र। मेरी प्रतिमा पर लगा चश्मा और एक चरण पादुका कब गायब हुई किसी को खबर तक नहीं हुई। दो अक्टूबर आया तो मेरी याद आई। किसी ने देखा तो सोचा बड़ा मुफीद मौका है क्यों न भुना लिया जाए। बस ठान ली साफ-सफाई करने की। अचानक मेरे प्रति प्रेम उमड़ पड़ा। मैं मन ही मन अपने सपूतों की समझदारी पर मुस्कुरा रहा था। जयंती से एक दिन पहले ही उनको अपने कर्तव्य का बोध हो गया था। आखिरकार मेरी प्रतिमा की सफाई हुई। लम्बे समय से प्रतिमा पर जमी धूल को हटाया गया। इतना ही नहीं मुझे नया चश्मा भी पहनाया गया और चरण पादुका भी। मंगलवार को भी जयंती के उपलक्ष्य में कई आयोजन-प्रयोजन होंगे। वैसे भी चुनावी समय नजदीक है, ऐसे में दूसरे दल के लोग भी आकर श्रद्धा-सुमन चढ़ा जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। देखा जाए तो साल भर अपनी बदहाली पर आंसू बहाने वाली मेरी प्रतिमा ही इकलौती नहीं है। शहर में और भी कई महापुरुषों की प्रतिमाएं चौक-चौराहों पर लगी हैं, जिनकी याद भी अवसर विशेष पर ही आती है। मैं आपसे ज्यादा नहीं मांगता, आप मेरी जयंती पर यह संकल्प लें कि न केवल मेरी प्रतिमा बल्कि दुर्ग-भिलाई में जितने भी महापुरुषों की प्रतिमाएं लगी हैं, उनकी सार-संभाल एवं नियमित सफाई का जिम्मा उठाएं। अगर आप लोग ऐसा कर पाए तो निसंदेह यह मेरे साथ बाकी महापुरुषों के लिए बहुत बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

साभार : पत्रिका भिलाइ के 02 अक्टूबर 12 के अंक में प्रकाशित।


Saturday, September 29, 2012

बंद हो आंकड़ों का खेल

प्रसंगवश 

छोटा परिवार सुखी परिवार की अवधारणा को पुष्ट करने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार हर साल परिवार नियोजन पर करोड़ों रुपए खर्च करती हैं, लेकिन गाहे-बगाहे ऐसी घटनाएं दरपेश आती हैं, जो इस अभियान की सफलता पर सवालिया निशान लगाती हैं। मंगलवार को बालोद जिले के डौंडीलोहारा कस्बे के सामुदायिक स्

वास्थ्य केन्द्र में लगा नसबंदी शिविर इसका जीता जागता उदाहरण है। शिविर में शुरू से लेकर आखिर तक अव्यवथाएं हावी रहीं। हद तो उस वक्त हो गई जब सुबह दस बजे शुरू होने वाला शिविर शाम सात बजे बाद चिकित्सक के आने पर शुरू हुआ। इसके बाद आनन-फानन में ऑपरेशन शुरू किए गए तो बीच में बिजली गुल हो गई। करीब एक घंटे तक तो टॉर्च की रोशनी में ही ऑपरेशन होते रहे। बिजली आने के बाद रात 11 बजे तक ऑपरेशन हुए। ऑपरेशन का आंकड़ा तो वाकई चौंकाने वाला है। कुल 138 महिलाओं के नसबंदी ऑपरेशन मात्र चार घंटे में एक चिकित्सक ने कर दिए। यकीन नहीं होता इस आंकड़े को देखकर। किसी चमत्कार के होने जैसा ही है यह सब। गंभीर बात तो यह है कि संबंधित चिकित्सक इसको सामान्य-सी बात मान रहे हैं। वैसे चिकित्सकों का मानना है कि नसबंदी ऑपरेशन करने में दस से पन्द्रह मिनट तक का समय लगना सामान्य-सी बात है।
शिविर में घोर लापरवाही के बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों ने इस मामले में जरा भी गंभीरता नहीं दिखाई। एसडीएम ने तो बीएमओ को नोटिस देकर इतिश्री कर ली। इधर, राज्य सरकार के मुखिया एवं उसके नुमाइंदे अक्सर सभाओं में राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर खुद की पीठ थपथपाने से गुरेज नहीं करते। लेकिन, उनके बड़े-बड़े दावे उस वक्त बेमानी लगने लगते हैं, जब इस तरह के प्रकरण सामने आते हैं। नसबंदी शिविरों में अक्सर अव्यवस्थाएं उजागर होती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार इन सब से अनजान है। सरकार को यह भी पता है दुर्ग-बेमेतरा एवं बालोद जिले में केवल एक ही सर्जन हैं, जो नसबंदी के ऑपरेशन करते हैं, लेकिन इसका यह मतलब तो कतई नहीं है, उस इकलौते चिकित्सक को कुछ भी करने की छूट मिल जाए। नेत्रकांड के बाद बालोद जिले में ही परिवार नियोजन अभियान की पोल खोलने वाला यह शर्मनाक मामला है। सोचनीय विषय यह भी है कि आमजन के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले लगातार इस प्रकार के कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं और राज्य सरकार नींद में गाफिल है। इससे तो यही समझा जाना चाहिए कि राज्य सरकार की कथनी और करनी में समानता तो कतई नहीं है। आखिर, इस तरह लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने से हासिल भी क्या होगा। सरकार अगर वाकई परिवार नियोजन के प्रति गंभीर है तो उसको नसबंदी शिविरों के लिए तत्काल नए दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। संबंधित चिकित्सक पर कार्रवाई तथा अव्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के साथ-साथ शिविरों में चिकित्सकों के देर से आने तथा रात में ऑपरेशन करने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी चाहिए। वरना, यही समझा जाएगा कि राज्य सरकार भी लोगों के स्वास्थ्य को दरकिनार कर लक्ष्य पूर्ति के आंकड़ों के खेल में अपनी सहभागिता निभा रही है।
 
साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ के 29 सितम्बर 12 के अंक में प्रकाशित।

Monday, September 24, 2012

उम्मीदों को पंख...



पत्रिका को टि्‌वनसिटी में दो साल पूरे हो गए। इन दो वर्षों में पत्रिका ने बेबाक, निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता के नए आयाम गढ़े हैं, यह बात पत्रिका का पाठक बखूबी जानता है। दो वर्षों में पत्रिका ने जनहित से जुड़े अनेक मुद्‌दों को अपनी आवाज दी और अंजाम तक पहुंचाया। मुद्‌दे उठाना और परिणाम तक पहुंचाना ही पत्रिका की खासियत है। हाल ही में पत्रिका के अमृतम्‌ जलम्‌ अभियान को टि्‌वनसिटी के पाठकों ने जो समर्थन एवं सहयोग दिया, वह अभूतपूर्व है। पाठकों के इसी साथ ने एक और एक दो नहीं बल्कि ग्यारह होने की अवधारणा को पुष्ट किया। टि्‌वनसिटी में ऐसे मुद्‌दों की फेहरिस्त लम्बी है, जिनको पत्रिका ने बड़ी शिद्‌दत के साथ उठाया और मुहिम का ऐसा रंग दिया कि आखिकार शासन-प्रशासन को ध्यान देना पड़ा।
टि्‌वनसिटी के दोनों शहरों दुर्ग-भिलाई के बीच भौगोलिक दूरी आज भले ही मिट गई हो, लेकिन दोनों की अलग-अलग खासियतें एवं खूबियां हैं। पत्रिका ने टि्‌वनसिटी की इन खासियतों से रूबरू कराया तो विकास की विसंगतियों को भी लगातार उजागर किया। बीएसपी आयुध भंडार के पास अवैध बस्ती के खिलाफ  पत्रिका की मुहिम को तो पाठक आज भी याद करते हैं। बीएसपी प्रबंधन को आखिरकार उस बस्ती को वहां से हटवाना पड़ा। इतना ही नहीं, शहर में बाइपास या फोरलेन के मामले में भी पत्रिका की मुहिम पर निगम प्रशासन ने मुहर लगाई। फोरलेन की विसंगतियों को भी पत्रिका ने बेबाकी के साथ उठाया। शहर में खस्ताहाल चिकित्सा व्यवस्था से लेकर सेक्टर एरिया की समस्याओं तक जनहित से जुड़े हर मुद्‌दे पर पत्रिका की पैनी निगाह रही।
यह तो शुरुआत है। टि्‌वनसिटी में विकास की भरपूर गुंजाइश है। उम्मीदों का आकाश पंख फैलाने को बेताब है। जरूरत है तो बस इच्छाशक्ति जगाने व सोच बदलने की। पत्रिका ने दोनों ही कामों में अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाने का प्रयास किया है। पाठकों के विश्वास और उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए कलम यूं ही बेबाक, निष्पक्ष एवं निर्भीक बनी रहेगी, लगातार... अनवरत...।

साभार - पत्रिका भिलाई के 24 सितम्बर 12 के अंक में प्रकाशित।

Saturday, September 22, 2012

गंभीर है यह मर्ज

प्रसंगवश

भले ही समस्याओं का निराकरण हो या ना हो लेकिन वैशालीनगर विधायक भजनसिंह निरंकारी इससे कोई सरोकार नहीं रखते हैं। वे जनसमस्याओं के निराकरण के लिए लगातार चिटि्‌ठयां लिखते रहते हैं। कभी जिला प्रशासन को तो कभी राज्य सरकार को। हाल ही में उन्होंने भिलाई निगम आयुक्त को चिट्‌ठी लिखी है। चिट्‌ठी में उन्होंने जिस मामले को उठाया है, वह वाकई आम आदमी से जुड़ा है और समय की मांग भी है। चिट्‌ठी में उन्होंने निगम आयुक्त को अवगत कराया है किभिलाई निगम क्षेत्र में भवन निर्माण के लिए अनुमति लेने की प्रकिया बेहद जटिल है। इससे लोगों को परेशानी होती है। जब तक अनुमति मिलती है, तब तक निर्माण कार्य ही पूर्ण हो जाता है। ऐसे में इस प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाना बेहद जरूरी है। इसी पत्र में विधायक ने कुछ गंभीर बातें भी कही हैं। उन्होंने कहा कि निगम क्षेत्र में अवैध कब्जों एवं अवैध निर्माण की बाढ़ आई हुई है और इन पर निगम प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है। विधायक यहीं तक नहीं रुके, उन्होंने इसके लिए अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया है। अवैध निर्माण के लिए उन्होंने निगम के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराते हुए आयुक्त से इन पर शिकंजा कसने की मांग भी की है। खैर, भवन निर्माण की अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिल होना तो अपने आप में बड़ी समस्या है ही लेकिन अधिकारियों की भूमिका को लेकर जो सवाल उठाए गए हैं, वे वाकई ही गंभीर हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं। कोई सामान्य या अदना सा आदमी अगर यही आरोप लगाता तो हो सकता है, उसे अनसुना कर दिया जाता लेकिन लम्बा राजनीतिक अनुभव तथा जनप्रतिनिधि होने के नाते निरंकारी की बातों में दम नजर आता है। उनके आरोप सच्चाई के नजदीक इसलिए भी दिखाई देते हैं, क्योंकि निगम और उसके अधिकारी उनके लिए अजनबी नहीं हैं। हालांकि कांग्रेसी महापौर वाले निगम में आयुक्त को चिट्‌ठी लिखना ही अपने आप में बड़ी बात है। राजनीतिक हलकों में इस चिट्‌ठी के कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, फिर भी आरोप तो आरोप ही हैं।
दरअसल, निगम क्षेत्र में अवैध कब्जे व अवैध निर्माण तो गंभीर विषय है ही, इनके अलावा भी बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं, जो लम्बे समय से निराकरण की बाट जोह रही हैं। इधर निगम अधिकारियों का हाल यह है कि वे समस्याओं को लेकर जरा सी भी गंभीरता नहीं दिखाते। अपने आप से तो उनको कोई काम कभी सूझता ही नहीं है। वैसे अधिकारियों की इस तरह की उदासीनता एवं मनमर्जी कमोबेश हर सरकारी विभाग में दिखाई दे जाएगी। सरकारी कार्यालयों के कामकाज का ढर्रा ही ऐसा है कि बिना सेवा शुल्क दिए तो कोई काम होता ही नहीं है। आलम यह है कि छोटे-छोटे कामों के लिए भी भेंट पूजा करनी पड़ती है। निगम के तो हाल और भी बुरे हैं। नल कनेक्शन जैसी बुनियादी सुविधा पाने के लिए भी अधिकारियों का मुंह ताकना पड़ता है। बहरहाल, निगम आयुक्त को विधायक की चिट्‌ठी को गंभीरता से लेने की जरूरत है। अगर अधिकारियों के के संरक्षण (जैसा कि विधायक ने आरोप लगाया है) में अवैध कब्जे या अवैध निर्माण इसी प्रकार होते रहे तो फिर निगम प्रशासन के होने या न होने में कोई खास फर्क नहीं रह जाता।
 
साभार- पत्रिका छत्तीसगढ़ के 22 सितम्बर 12 के अंक में प्रकाशित।
 

Wednesday, September 19, 2012

स्वरूप भी हैं जुदा-जुदा


 प्रथम पूज्य देव गणेश के वैसे तो कई नाम हैं लेकिन अब उनके स्वरूप भी भिन्न-भिन्न दिखाई देने लगे हैं। यकीन नहीं होता है तो बाजार जाकर देखिए। गणेश जी विविध स्वरूपों में विद्यमान हैं। गणेश चतुर्थी को देखते हुए इस बार एक से बढ़कर प्रतिमाएं तैयार की गई हैं। कुछेक के लिए तो बाकायदा ऑर्डर दिए गए हैं जबकि अधिकतर प्रतिमाओं की परिकल्पना कलाकारों ने स्वयं ही की है। आकर्षक एवं चटकीले रंगों के माध्यम से बनाई गए मिट्‌टी की प्रतिमाएं श्रद्धालुओं को खासी पसंद आ रही हैं। प्रतिमाओं पर किए जाने वाले रंग में भी इस बार बदलाव किया गया है। देव प्रतिमाओं पर किए जाने वाले परम्परागत रंग के अलावा इस पार नीला, गुलाबी, काला सहित कई रंगों का प्रयोग किया है। खास बात यह है कि गहरे रंगों की प्रतिमाएं भी बाजार में हैं लेकिन इस बार हल्के रंगों को प्राथमिकता दी गई है। इसके अलावा  प्रतिमाओं के साथ खास बात यह जुड़ी है कि इनको दूसरे देवताओं के साथ मर्ज कर दिया है। इस कारण गणेश की प्रतिमा में दूसरे देवता का आभास होता दिखाई देता है।












अकेले गणेश की प्रतिमा बनाने की अब पुरानी हो गई है। कुछ नया करने के प्रयास में इस बार गणेश को दूसरे देवताओं के साथ जोड़ कर प्रतिमाएं तैयार की गई हैं। मसलन श्रद्धालु अभी तक श्री कृष्ण को मुरली बजाते हुए ही देखते आए हैं लेकिन इस बार यह काम गणेश भी बखूबी कर रहे हैं। बात यहीं तक सीमित नहीं है रंग-रूप श्रीकृष्ण जैसा ही है। शिव के अलावा भला ताण्डव नृत्य और कौन कर सकता है, लेकिन इस बार गणेश नृत्य भी कर रहे हैं। वेशभूषा भी शिव वाली है। रंग भी एकदम काला। इसी तरह गणेश के माथे पर बड़ा चांद बनाया गया है। कलाकारों की मानें तो चांद लगे गणेश जी श्रद्धालुओं को खासा लुभा रहे हैं। कुछ ने तो आर्डर देकर भी बनवाया है। टीवी धारावाहिक बाल हनुमान की तर्ज पर भी गणेश प्रतिमाएं तैयार की गई हैं। गणेश गदा लेकर खड़े हैं। उनको एकबार सरसरी नजर से देखें तो बाल हनुमान का ही आभास होता है। और भी ऐसी कई प्रतिमाएं हैं, जिनको देखकर दूसरे देवताओं का ख्याल जेहन में यकायक आ जाता है। इसके अलावा मोर की सवारी करते गणेश भी काफी आकर्षक बन पड़े हैं। तीन मुखी एवं पंच मुखी गणेश की प्रतिमाएं भी श्रद्धालुओं को चौंकाने के साथ लुभाती भी हैं। इसके अलावा कहीं हनुमान अपने हाथ पर गणेश को उठाए हुए हैं तो कहीं गणेश शेषनाग के साथ दिखाई दे रहे हैं। गणेश का मुनीम का स्वरूप भी दिया गया है। बिलकुल उसी अंदाज में पगड़ी पहने बही-खातों में हिसाब-किताब करने में तल्लीन दिखाई देते हैं। मौसम क्रिकेट का है, लिहाजा इससे भी गणेश अछूते नहीं है। क्रिकेट विश्व कप के साथ मर्ज करके भी गणेश की प्रतिमा तैयार की गई है।

साभार - पत्रिका भिलाई के 19 सितम्बर 12 के अंक में प्रकाशित।

Monday, September 17, 2012

मैं मर रहा हूं! प्लीज, मुझे बचा लो


रहनुमाओ मुझे पहचानो। मैं कोई गैर नहीं बल्कि आपका अपना ही हूं। थोड़ा गौर से देखो मुझे, शायद कुछ याद आ जाए। नहीं पहचाना। अरे, मैं स्टेडियम हूं। याद करो कुछ। पंडित रविशंकर स्टेडियम नाम है मेरा। फिलहाल मैं अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा हूं। बदहाली पर आंसू बहा रहा हूं। मैं राज्य सरकार के नुमाइंदों एवं नीति नियंताओं के उदासीन व उपेक्षित रवैये से अर्श से फर्श पर आ गया हूं। आप भी जानते हैं कितना गौरवशाली इतिहास रहा है मेरा। तभी तो अतीत मुझे रह-रहकर याद आता है। रुस्तम-ए- हिन्द दारासिंह के चरण कमल जिस दिन यहां पड़े थे मैं धन्य हो गया था। ब्लड बैंक के लिए खेला गया वह सहायतार्थ मैच तो मेरी सबसे बड़ी थाती है। बड़े-बड़े खिलाड़ी आए थे उस दिन। न जाने कितने ही रणजी मैच खेले गए हैं यहां। दुर्ग की बेटी सबा अंजुम ने भी मेरे ही आगोश में खेल के गुर सीखे हैं। यकीन मानिए, उस दिन खुशी मुझे भी हुई थी, जिस दिन मध्यप्रदेश से अलग होकर नया
प्रदेश छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया। पता नहीं क्या-क्या सोच बैठा था मैं। उस वक्त प्रदेश में सबसे बड़ा स्टेडियम भी तो मैं ही था, लेकिन सियासत करने वालों ने मेरे साथ ही सियासत कर दी। मेरे सपने पूरे होने से पहले ही टूट गए। नया राज्य बनना मेरे लिए घाटे का सौदा रहा। मेरी बदकिस्मती रही कि उसी दिन से ही मेरे दुर्दिन शुरू हो गए। मेरी हालत दिनोदिन खराब होती गई और एक दिन ऐसा भी आ गया जब मैं किसी काम का नहीं रहा। देखरेख के अभाव में मैं जंगल में तब्दील हो गया। लम्बे समय से पानी का जमाव होने के कारण कई तरह की वनस्पति उग आई हैं यहां। मेरी दीवारें रखरखाव के अभाव में दरक रही हैं। आज भी मेरा नाम सुनकर बच्चे दौड़े चले आते हैं, लेकिन यहां आकर उनको निराशा ही हाथ लगती है। मायूस होकर लौट जाते हैं वे। हां, एक काम तो बखूबी होता है यहां। गणतंत्र दिवस एवं स्वतंत्रता दिवस बड़े धूमधाम से मनाए जाते है यहां। राज्य सरकार के नुमाइंदे तथा प्रशासनिक अधिकारी सभी तो आते हैं यहां। बड़ा दुख होता है अतिथियों का भाषण सुनकर। मैं रोने लगता हूं उनके श्रीमुख से विकास की लम्बी-चौड़ी गाथा सुनकर। हां, दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन भी तो यहीं किया जाता है। भला मेरे से मुफीद जगह और मिलेगी भी कहां। सोचनीय विषय तो यह है जिला कलेक्टर ही मेरी देखरेख करने वाली क्रीड़ांगन समिति के पदेन अध्यक्ष हैं लेकिन उधर से भी अभी तक कुछ राहत नहीं मिली है। कलेक्टर साहब आप तो नए हैं और बड़े रहमदिल भी। सुना है आप मौके पर जाकर वस्तुस्थिति देखते हैं। लगे हाथ मेरा भी कुछ भला कर दीजिए ना। दुर्ग के लोगों की तो नहंीं कह सकता लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से आपका ऋणी रहूंगा, जिदंगी भर। मैं नहीं बोलना चाहता था कि यह सब कहूं लेकिन क्या करूं, अब उपेक्षा की अति हो गई है और मेरे इंतजार की इंतहा। इतना कुछ होने के बाद भी मेरी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। किसी का दिल नहीं पसीज रहा है। मेरी हालत पर कुछ तो तरस खाओ। मैं किश्तों में मर रहा हूं। मुझे बचा लो, प्लीज मुझे बचा लो। मैं आपका अपना ही हूं। मैं अब भी सबा अंजुम जैसी कई प्रतिभाओं को निखार सकता हूं। बस, मेरी खैर-खबर ले लीजिए। प्लीज मुझे बचा लीजिए। मुझे बचा लीजिए।
 
साभार - पत्रिका भिलाई के 17 सितम्बर 12  के अंक में प्रकाशित।

Sunday, September 16, 2012

आठ साल बाद बरफी !






 बस यूं ही


लम्बे समय के बाद आज सिनेमाघर गया था। मुद्‌दत हो गई थी सिनेमाघर में फिल्म देखे। दिमाग पर जोर डाला तो याद आया कि आठ साल पहले जोधपुर में फिल्म देखी थी। मुझसे शादी करोगी नाम था उसका। धर्मपत्नी के साथ वह मेरी पहली फिल्म थी और शादी के करीब दो माह बाद देखी थी। हंसना मत शादी के बाद ऐसे टाइटल वाली फिल्म जो देखी थी। खैर, उसके बाद पारिवारिक एवं पेशेगत जिम्मेदारियां इतनी बढ़ी कि कभी फिल्म का ख्याल ही नहीं आया। अब भी नहीं आता लेकिन कुछ योगदान तो टीवी का रहा, जिस पर आजकल रिलीज होने वाली फिल्मों के बारे में खूब दिखाया जाता है। दूसरी भूमिका धर्मपत्नी की रही। उसने बच्चों को मानसिक रूप से तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई। यह तो पता नहीं है कि धर्मपत्नी एवं बच्चों के बीच इस मामले में सहमति कैसे एवं क्यों बनी, लेकिन दोनों बच्चे सप्ताह भर से 16 सितम्बर का इंतजार कर रहे थे। इस दिन रविवार होता है यानि कि मेरे साप्ताहिक अवकाश का दिन। साप्ताहिक अवकाश लिए भी तो जमाना बीत गया था। भिलाई आने के बाद ही शुरू किया है। बच्चे सिनेमाघर जाने की जिद करते रहे लेकिन मैंने उनकी बातों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। शनिवार रात को आफिस से घर पहुंचा तब तक बच्चे सो चुके थे। धर्मपत्नी के सामने भी मैंने जानबूझकर चर्चा नहीं की। शायद वह मेरा मिजाज भांप चुकी थी, क्योंकि दो दिन पहले ही मैंने फिल्म के लिए बजट न होने की कह दी थी। भिलाई आने के बाद हाथ इन दिनों कुछ तंग ही चल रहा है। खैर, रविवार का दिन होने के कारण किसी तरह का अलार्म नहीं भरा गया, लिहाजा सुबह सभी देर से उठे। इधर मैं फिल्म शो का टाइम एवं टिकट की व्यवस्था पहले ही कर चुका था। सुबह करीब नौ बजे मैंने कहा कि जल्दी तैयार हो जाओ, फिल्म देखने चलेंगे। मेरा इतना कहते ही दोनों बच्चे खुशी से चहक उठे। धर्मपत्नी के चेहरे पर भी प्रसन्नता के भाव दिखाई देने लगे। वह इतना ही बोली आप भी सरप्राइज देना सीख गए हो।
फिल्म शो का टाइम 11.30 बजे का था। हम चारों निर्धारित समय पर सिनेमाघर पहुंच गए। फिल्म के बारे में हल्की सी जानकारी थी कि इसके नायक का नाम मरफी होता है लेकिन उसको सब बरफी कहकर ही बुलाते हैं। दूसरा कल परसों अखबारों में पढ़ा था कि मरफी रेडियो कम्पनी ने फिल्म निर्माता को नोटिस भेजा है। नोटिस की वजह बिना पूछे मरफी के नाम का उपयोग करना बताया गया था। शायद आप समझ गए होंगे। यहां बात णवीर कपूर की हिन्दी दिवस पर प्रदर्शित फिल्म बरफी की हो रही है। टीवी पर ट्रेलर देखकर बच्चों ने इसे कॉमेडी फिल्म मान रखा था। मुझे भी फिल्म के कथानक के बारे में कोई ज्यादा जानकारी नहीं थी। इतनी भी नहीं थी कि नायक मूक-बधिर है और नायिका अल्प विकसित दिमाग वाली। शायद इसकी जानकारी पहले होती तो मैं यह फिल्म देखता ही नहीं। लेकिन जो तय हो चुका होता है वह अक्सर होकर रहता है। फिल्म देखने के बाद लगा कि वाकई कई दिनों बाद एक अच्छी फिल्म देखने को मिली और ढाई घंटे बेकार नहीं गए। जब इतनी भूमिका बांध ही दी है तो लगे हाथ कुछ बातें फिल्म की भी बताता चलूं। 
सबसे पहले तो बात फिल्म निर्देशक अनुराग बसु की ही करते हैं। एक सामान्य से विषय को बड़ी शिद्‌दत के साथ पेश किया है उन्होंने। फिल्म आखिर तक दर्शकों को बांधे रखती है। मूक-बधिर नायक की भूमिका में रणवीर कपूर से बसु ने वह काम करवाया है तो संभवतः अभिनेता बोल कर भी नहीं कर पाते। नायक के कुछ इशारे तो इतने जीवंत हैं कि युवाओं के जेहन में लम्बे समय तक जिंदा रहेंगे। मुस्कुराहट तथा प्रेम का इजहार करने के उनके इशारे से एक नया शगल शुरू हो जाए तो भी कोई बड़ी बात नहीं। यकीन मानिए उनके अंदाज आज के युवा अपनाते दिखाई भी दे जाएंगे। जिंदादिल युवक की भूमिका में रणवीर कपूर बिना कुछ कहे ही काफी कुछ कह जाते हैं। निर्देशक ने उनको फिल्म में भले ही मूक-बधिर का किरदार अदा करवाया हो लेकिन उनका अभिनय फिल्म के बाकी कलाकारों पर भारी पड़ा है। वह मूक-बधिर होकर भी दर्शकों से सहानुभूति नहीं बटोरता। वह चंचल है, चपल है, हंसमुख है, बिलकुल मस्तमौला एवं खिलंदड स्वभाव का। वह लापरवाह भी है लेकिन संवेदनशील भी गजब का है। और चालक एवं चतुर कितना है यह बात भला फिल्म में पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभाने वाले सौरभ शुक्ला से बेहतर कौन जान सकता है। शुक्ला फिल्म के एक दृश्य में कहते भी हैं बरफी उनकी जिंदगी में ना आता तो शायद वे भी एसपी की रैंक तक पहुंच जाते। फिल्म में एक चीज खटकती है, नायक जिंदादिल होने के बाद भी सच्चे प्रेम को समझने में नाकाम हो जाता है। प्रेम का मापने का तरीका भी अजीब सा है उसका। लकड़ी के ऊपर लैम्प बांधकर नीचे बोतल रख देना और उसके बाद लैम्प को बोतल पर गिराता है। नायक के साथ इस दृश्य में अभिनेत्री एलिना डी क्रूज कुछ असहज हो जाती है लेकिन अल्प विकसित दिमाग वाली प्रियंका चौपड़ा यही दृश्य देखकर कुछ नहीं करती। बस इसी पैमाने से नायक यह समझ लेता है कि सच्चा प्यार तो उसे प्रियंका ही करती है। इधर शादी होने के बाद भी एलिना के दिलोदिमाग पर बरफी ही छाया रहता है, लेकिन उसको अपने प्यार का एहसास उस वक्त होता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। 
प्यार बलिदान चाहता है, के फलसफे को एलिना ने फिल्म में बखूबी जिया है। फिल्म के आखिर में प्यार के खातिर वह अपने पति का घर बिना कुछ सोचे एवं झिझके एक झटके के साथ छोड़ कर चली आती है। फिल्म का यह दृश्य भी तो प्रेम को कितना महान बना देता है। यादगार दृश्य है यह। पति कहता है कहां जा रही हो? लेकिन वह रुकती नहीं है और तेजी से घर की दहलीज तक पहुंच जाती है। तभी पति पुनः कहता है कि जहां जा रही है, वहीं रहना, वापस मत आना। लेकिन साहस जुटाते हुए वह पति की इस धमकी को भी अनसुना कर देती है। एलिना एक पल सोचे बिना घर से निकल पड़ती है। यह प्रेम की पराकाष्ठा है। अपने प्रेम की खातिर वह इतना बड़ा बलिदान देती है। इतना ही नहीं बरफी और प्रियंका के बीच के रिश्ते को देखकर वह तत्काल ही हालात से समझौता भी कर लेती है। इतना कुछ होने के बाद भी वह अपना गम जाहिर नहीं होने देती। वह बरफी से इतना प्रेम करती है कि उसको हर पल खुश देखना चाहती है तभी तो वह दोनों की शादी भी करवाती है। फिल्म की शुरुआत भी एलिना से होती है और समापन भी उसी पर होता है। फिल्म दर्शकों को बीच-बीच में कई बार गुदगुदाती है तो कई बार सोचने पर मजबूर भी करती है। फिल्म का अंत दुखद है लेकिन इससे बेहतर एवं दर्शकों की संवेदना पाने का दूसरा कोई विकल्प शायद हो नहीं सकता था। फिल्म में सभी कलाकारों ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। प्रियंका ने भी अल्प विकसित दिमाग वाली लड़की की भूमिका में जान डाल दी है। सबसे ज्यादा प्रभावित तो सौरभ शुक्ला ने किया। जो बिना हंसे भी दर्शकों को हंसा देते हैं। हां इतना जरूर है फिल्म के आखिरी दृश्यों में उनका धीर-गंभीर अभिनय एक पल के लिए सोचने पर मजबूर करता है। 
कुल मिलाकर बरफी मौजूदा दौर से बिलकुल अलग फिल्म है। मारधाड़, अश्लीलता, फूहड़ता, द्विअर्थी संवाद तथा आइटम सांग आदि किसी भी चासनी को अपनाए बिना फिल्म अपना संदेश देने में सफल रहती है। कई दिनों बाद आज प्रत्यक्ष देखा कि आज भी ऐसे निर्देशक हैं जो पूरे परिवार के साथ बिना किसी शर्म शंका के देखने वाली फिल्म बनाने का माद्‌दा रखते हैं। इस तरह का प्रयोग करने की हिम्मत रखते हैं। कम डायलॉग होने के बाद भी बरफी हंसाती भी है और रुलाती भी है। प्रेम त्रिकोण के कारण फिल्मों में अक्सर लात व घूंसे चलते हैं लेकिन बरफी में बिना मारधाड़ के इस त्रिकोण को मंजिल तक पहुंचाना अपने-आप में अजूबा है। नायक-नायिका के निशक्त होने के बावजूद उनका भावपूर्ण एवं अर्थपूर्ण अभिनय उनके लिए मील का पत्थर साबित होगा। आखिर में एक बात और। फिल्म के निर्देशक अनुराग बसु लीक से हटकर विषय का चयन करने और अपनी बात बड़ी असानी के साथ कहने में सफल रहे। आप लोग शायद न जानते हो लेकिन बताता चलूं कि अनुराग बसु का बचपन भिलाई में ही बीता है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी भिलाई में ही हुई है। उनके पिता भिलाई में इप्टा के संस्थापकों में से एक थे। पिता जब मुम्बई गए तो अनुराग भी वहीं चले गए लेकिन बसु भिलाई को भूले नहीं है। वे अब भी भिलाई आते रहते हैं। अगर फिल्म गौर से देखी है या देखना है तो इस बात पर गौर करना कि शुरुआती दृश्य में जब मरफी रेडिया की चर्चा चलती है तो फरमाइश करने वाले लोगों के नाम के साथ भिलाई एवं रायपुर के नाम भी सुनाई देते हैं। कल को फिल्म सफलता के आयाम तय करती है तो यकीन मानिए उससे न केवल फिल्म कलाकारों, निर्देशक बल्कि भिलाई का नाम भी ऊंचा होगा। फिल्म की विषय वस्तु भी भिलाई के ही एक निशक्त स्कूल से ली गई बताई है।  
कुल मिलाकर आठ साल बाद फिल्म देखना सार्थक हो गया। इसके लिए मैं अपनी धर्मपत्नी एवं बच्चों का आभारी हूं, जिन्होंने इस फिल्म के लिए मुझे तैयार किया। संयोग यह भी है कि आठ साल पहले देखी गई फिल्म मुझसे शादी करोगी मैं भी नायिका प्रियंका चौपड़ा ही थी और बरफी में भी वही नजर आई। इतना ही नहीं, उस फिल्म में अक्षय-सलमान व प्रियंका का त्रिकोण था जबकि इसमें रणवीर-एलिना व प्रियंका की कहानी है। फर्क इतना है कि उसमें पूरी तरह कॉमेडी थी जबकि बरफी में बीच-बीच में। मैं अपनी विचारधारा से मेल खाने वाले साथियों से कह सकता हूं कि अगर वे फिल्म देखने की सोच रहे हैं तो देख ही डालिए। एक अलग ही तरह का सुकून एवं आनंद मिलेगा। बिलासपुर के साथी नरेश भगोरिया एवं रणधीर कुमार ने फिल्म देखकर यह रसास्वादन कर लिया। मेरी तरह नरेश भगोरिया भी फिल्म से बेहद प्रभावित हुए। संयोग देखिए मैं जब फिल्म के बारे में लिखने बैठा, ठीक उसी वक्त उनका मेल मिला। अटैच फाइल देखी जो चौंक गया। उन्होंने भी बरफी की समीक्षा लिख कर ही भेजी थी। शीर्षक था शुगर फ्री बरफी। सच ही तो कहा है उन्होंने, जब आज फिल्म हिट करवाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। शुगर रूपी चासनी डाली जाती है फिर भी फिल्में बॉक्स आफिस पर दम तोड़ जाती है। बरफी में किसी तरह की चासनी नहीं है फिर भी वह लोकप्रिय हो रही है। समाज को इसी तरह की फिल्मों एवं निर्देशकों की जरूरत है। साफ-सुथरी एवं प्रेरणादायी फिल्में मौजूदा समय की मांग है। अक्सर सामाजिक प्रताड़ना झेलने वाले निशक्तों के लिए भी यह फिल्म संजीवनी बूटी का काम करेगी। यह फिल्म न केवल उनका मनोबल बढाएगी बल्कि उनको संबल भी प्रदान करेगी।

Saturday, September 15, 2012

समझें मितानिनों का दर्द

प्रसंगवश 

प्रदेश की मितानिनें अपनी मांगों के समर्थन में वैसे तो समय-समय पर आवाज उठाती रही हैं, लेकिन बुधवार को दुर्ग में जो हुआ उससे मान लेना चाहिए कि उनका सब्र अब जवाब देने लगा है। उनके आक्रोश को इसी बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य सचिव एवं संचालक मितानिन नोडल अधिकारी के खिलाफ जुर्म दर्ज कराने का निर्णय ले लिया, बल्कि थाने के समक्ष प्रदर्शन कर अपने गुस्से का इजहार भी किया। मितानिनों का कहना था कि सरकार उनसे बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार कर रही है। वे लम्बे समय से कार्यरत हैं। इस काम का उनको प्रशिक्षण भी दिया गया है, लेकिन मानदेय नहीं मिल रहा है। भले ही मितानिनें समझाइश के बाद लौट गईं, लेकिन यह मामला अब इस तरह से शांत होने वाला नहीं है। दुर्ग से शुरू हुआ विरोध कल को समूचे प्रदेश में फैल जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। देखा जाए तो प्रदेशभर में मितानिनों का बड़ा नेटवर्क है। करीब ६० हजार मितानिनें स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी में अपना योगदान दे रही हैं। मातृ-मृत्युदर एवं शिशु-मृत्युदर को कम करने की राज्य सरकार की महती योजना को अमलीजामा पहनाने की दिशा में मितानिन अंतिम कड़ी के रूप में गिनी जाती हैं। ग्रामीण महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने में मितानिनों का प्रमुख योगदान है। उनकी मदद के बिना मातृ-मृत्यदर एवं शिशु-मृत्युदर में सुधार शायद संभव भी नहीं है। गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण करवाने तथा प्रसूताओं को अस्पताल तक लाने का काम भी उनके ही जिम्मे है। कहने को सरकार ने टीकाकरण एवं प्रसव के लिए उनके लिए पारिश्रमिक तय कर रखा है, लेकिन मेहनत एवं समय को देखते हुए न केवल पारिश्रमिक कम है, बल्कि उसको पाने की प्रक्रिया भी बेहद जटिल है। इन विरोधाभासी नियमों के चलते प्रायः मितानिनों को कुछ नहीं मिल पाता। मानदेय के लिए संघर्षरत मितानिनों की यह दलील भी तर्कसंगत है कि दूसरे प्रदेशों में यही काम एवं जिम्मेदारी निभानी वाली महिलाओं को बाकायदा मानदेय मिल रहा है। 
राज्य सरकार की मितानिनों के प्रति सोच इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि एक तरफ मितानिनों को ग्रामीण इलाकों में होने वाली राजनीतिक सभाओं में भीड़ बढ़ाने के लिए ले जाया जाता है जबकि दूसरी तरफ उनके लिए हर २३ नवम्बर को मितानिन दिवस मनाया जाता है। यह विरोधाभास क्यों? अगर सरकार को लगता है कि मितानिनें कोई बड़ा काम नहीं रही हैं तो फिर उनको जिम्मेदारी से मुक्त क्यों नहीं कर देती? अगर, उनकी महत्ता को जानती है तो फिर कुछ जिम्मेदारियां बढ़ाकर उनका मानेदय तय करने में हर्ज ही क्या है? स्वास्थ्य मिशन में मितानिनों के योगदान को नजरअंदाज करना या उनको मानदेय न देना एक तरह से सरकार की हठधर्मिता को ही उजागर करता है।
बहरहाल, महिला सशक्तीकरण का नारा देने वाली राज्य सरकार का मितानिनों के प्रति इस प्रकार का सौतेला व्यवहार कतई उचित नहीं है। बिना काम किए ही लोगों को सस्ता चावल देकर वाहवाही बटोरने वाली सरकार को स्वास्थ्य मिशन को गति देने वाली मितानिनों का दर्द तत्काल समझना चाहिए। उनकी न्यायसंगत मांगों पर तत्काल अमल करना चाहिए ताकि उनको मेहनत का वाजिब फल मिल सके। मामले में ज्यादा देरी अब उचित नहीं है।
 
साभार - पत्रिका छत्तीसगढ़ के 15  सितम्बर 12  के अंक में प्रकाशित।

Thursday, September 13, 2012

ऐसे मनाओ मेरा बर्थ-डे


बोले बप्पा 

पृथ्वी लोक पर इन दिनों मेरा जन्मदिन मनाने की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। कोई मूर्ति बनाकर बेचने में व्यस्त है तो कोई पंडाल सजा रहा है। कोई निमंत्रण पत्र बांट रहा है तो कोई चंदे की रसीदें काटने में मशगूल है। रंगीन पोस्टर भी युद्ध स्तर पर प्रकाशित हो रहे हैं। जिसको जो जिम्मेदारी मिली है, वह उसको बड़ी ही ईमानदारी व शिद्‌दत के साथ निभा रहा है।
प्यारे भक्तो, आजकल जमाना हाइटेक हो गया है और मेरा जन्मदिन भी। कल दुर्ग शहर में मेरे कुछ भक्त आक्रोशित हो गए। उनका कहना था कि मूर्ति बेचने वाला देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को दुकान से बाहर रखकर उनका अपमान करवा रहा है। इससे भक्तों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। कल-परसों भी मेरे कुछ भक्तों ने मूर्ति बनाने वाले कलाकारों को मूर्तियां संयमित व परम्परागत तरीके से बनाने की हिदायत दी थी। चूंकि मामला मेरे से ही जुड़ा है लिहाजा पूछना भी लाजिमी है। तालपुरी में विसर्जित की जाने वाली मेरी प्रतिमाएं साल भर अपनी बदहाली पर आसूं बहाती हैं। कितनी गंदगी पसरी है वहां पर। जितनी ऊर्जा रास्ता रोकने और प्रदर्शन करने में लगाते हो, उतनी श्रमदान करके सफाई करने में लगा दो तो कितना अच्छा लगेगा मुझे। आप मानते हो कि मैं तो सर्वव्यापी हूं। कण-कण में विराजमान हूं। और यह भी कहते हो कि प्रतिमा अगर विधि विधान से प्रतिष्ठापित नहीं है तो फिर वह प्रतिमा ही कैसी? आप लोगों का यह विरोधाभास मेरी समझ में नहीं आया। मेरी परम्परागत तरीके से बनाई गई प्रतिमाएं ही खरीदने का संकल्प भी अगर आप ले लो तो फिर कोई क्यों ऐसी प्रतिमाएं बनाएगा। आप भी तो पोस्टरों में मेरे से बड़ी फोटो और नाम खुद का लगवा लेते हो। मैं तो कहीं दिखाई ही नहीं देता।
प्यारे भक्तो, मैं तो समय-समय पर आपकी नासमझी और नादानी पर पर्दा डाल देता हूं लेकिन जब बात चली है तो कह देता हूं कि मेरा जन्मोत्सव मनाने के नाम पर जोर-जबरदस्ती और धमकी-चमकी देकर चंदा उगाहने वाले भी तो आप ही हैं। कल आप लोग रास्ता रोककर पंडाल लगा देंगे। चोरी की बिजली से झांकी सजाएंगे। झांकी दिखाने के लिए सशुल्क टिकटें कटेंगी। ध्वनि प्रदूषण भी खूब होगा। पंडाल में मेरे दर्शन करवाने में भी भेदभाव होगा।
प्यारे भक्तों, मेरे लिए तो आप सब समान हैं। मैं तो किसी में भेद नहीं करता। माना जन्मदिन मनाना जरूरी है लेकिन मेरे नाम से इस प्रकार के काम भी तो मत करो। पैसे की इतनी बर्बादी क्यों एवं किसलिए? मैं तो भाव एवं प्रेम का भूखा हूं। जो सच्चे मन से याद कर लें मैं तो उसी का हूं। और अगर मेरा जन्मदिन ही मनाना है तो कुछ अलग अंदाज में मनाओ। किसी गरीब की मदद करो। किसी भूखे को भोजन कराओ। किसी असहाय को सहारा दो। अगर आप ऐसा करोगे तो बहुत खुशी होगी मुझे। और जन्मदिन का सबसे बड़ा तोहफा भी।
 
साभार -पत्रिका भिलाई के 13 सितम्बर 12  के अंक में प्रकाशित।