Friday, April 21, 2017

चांद-3


इस तरह के गीतों से साबित होता है कि चांद की हर किसी ने अपने हिसाब से व्याख्या की है। कई बार तो चांद की तुलना ऐसी-ऐसी चीजों से कर दी जाती है कि सुनकर चेहर पर डेढ़ इंची मुस्कान दौड़ जाती है। शाहरूख खान अभिनीत एक फिल्म का गीत, समझकर चांदजिसको आसमां ने दिल में रखा है, मेरे मेहबूब की टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा है...। अब देखिए यहां चांद का दर्जा टूटी हुई चूड़ी के समकक्ष रखा गया है। कहां तो चांद प्रेम का प्रतीक बना था और कहां उसकी अहमियत टूटी चूड़ी के बराबर कर दी गई। यह सब कल्पना का ही तो कमाल है।
पचास के दशक में आई फिल्म दाग का गीत भी कमोबेश ऐसा ही था, इस गीत में चांद की तुलना बेवा की टूटी हुई चूडी से की गई है। देखिए, चांद एक बेवा की चूड़ी की तरह टूटा हुआ, हर सितारा बेसहारा...। दरअसल यह गीतकार पर निर्भर करता है, क्योंकि वह परिस्थितियों के हिसाब से ही गीत की रचना करता है। ऐसे में चांद पर इस तरह के प्रयोग होते रहते हैं। चांद सिफारिश जो करता हमारी....., चांद मेरा दिल, चांदनी हो तुम.... मैं तेरा चांद तू मेरी चांदनी...चांद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर....उस चांद से प्यारे चांद हो तुम...वो चांद जैसी लड़की इस दिल पर छा रही है... रात की हथेली पर चांदजगमगाता है...ये रात ये चांदनी फिर कहां...ये वादा करो चांद के सामने...आदि गीत अलग-अलग फिल्मों के हैं लेकिन इनके मूल में प्रेम है। इन गीतों को सुनने से प्रेम की अनुभूति होती है। इन गीतों में नायक चांद है और नायिका उसकी चांदनी, मतलब देानों एक दूसरे के पूरक और एक दूजे की पहचान भी। अब देखिए इस गीत में कल्पना की ऊंची उड़ान है तो हुस्न का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन। फिर भी यह गीत अपने दौर के हर नायक को लुभाता रहा है। गौर फरमाइए, चांद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे, हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे। साठ के दशक में आई फिल्म फूल बने अंगारे का यह गीत मुकेश की आवाज में बेहद दिलकश बन पड़ा है। कुछ इसी तरह का गीत मैं चुप रहूंगी फिल्म का है। गीत के बोल हैं, चांद जाने कहां खो गया, तुमको चेहरे से पर्दा हटाना न था...। लब्बोलुआब यह है कि सारा खेल कल्पना का ही है, तभी तो इस गीत में चांद की तुलना एक आवारा व निराश प्रेमी से कर दी गई है। आवारगी फिल्म का गीत, चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला, मेरी आवारगी ने मुझे आवारा बना डाला... यह चरितार्थ भी करता है। ....क्रमश:

चांद-2


अब देखिए ना हिमालय की गोद फिल्म के गीत, चांद सी महबूबा होगी मेरी कब मैंने ऐसा सोचा था...यहां महबूबा के चांद सी होने की कल्पना की जाती है लेकिन नब्बे के दशक में आई फिल्म आओ प्यार करें में नायक कहता है, चांद से पर्दा कीजिए कहीं चुरा ना ले चेहरे का नूर। मतलब वहां चांद सी महबूबा की कल्पना तो यहां चांद से पर्दा करने की नसीहत दी जाती है। कभी-कभी चांद इतना खूबसूरत हो उठता है कि महबूबा की तुलना ही उसी कर दी जाती है। तभी तो चौहदवीं का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो..जैसे गीत की रचना होती है। इसी तरह सावन को आने दो फिल्म का चांद जैसे मुखड़े पे बिन्दिया सितारा भी.. इसी से मिलता-जुलता गीत है। इतना ही नहीं चांद कभी मामा बनता है। चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा... चंदा मामा दूर के.. जैसे गीतों में चांद को मामा बताया गया है। वैसे बहुत पहले चंदामामा नाम से बच्चों की पुस्तक भी आती थी।
खैर, चांद को हमने क्या-क्या नहीं बना दिया। कहीं बेटे को चांद जैसा समझा जाता है, मेरा चंदा है तू सूरज है तू... कहीं वो संदेशवाहक बन जाता है, चंदा रे मेरे भैया से कहना.. मेरे भैया को संदेश पहुंचना रे चंदा...। चांद भाई की भूमिका भी निभाता है, तभी तो बहन कह उठती है, मेरे भैया, मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन...। चांद महबूब भी है तभी तो तुम आए तो आया मुझे याद गली में आज चांद निकला.. की कल्पना की जाती है। चांद प्रियतम से मिलने का सहारा भी है। तभी तो नायक कहता है, तुझे चांद के बहाने देखूं, तू छत पर आजा गौरी ए..। चांद की चांदनी युगल को कितना सुकून देती है तभी तो, धीरे-धीरे चल चांद गगन में.. की गुहार लगाई जाती है। इसी तरह आधा है चंद्रमा है रात आधी.. गीत भी कुछ इसी मिजाज का है। इतना ही नहीं कई बार तो चांद से आगे भी जाने की कल्पना कर ली जाती है, बिलकुल सितारों से आगे एक जहां और भी है की तर्ज पर। पाकीजा फिल्म का चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो गीत से तो यही साबित होता है। वैसे चांद की तुलना चेहरे से भी की जाती रही है। इसके अलावा चांद दीवाना भी है। आशिक भी है। यह शमा भी है और यही परवाना है। छुपा रूस्तम फिल्म के इस गीत के बोल तो यही साबित करते हैं। देखिए, यह चांद कोई दीवाना है, कोई आशिक बड़ा पुराना है। पीछे किसके ये भागे, यह शमा है या परवाना है, दीवाना है। ....क्रमश:

चांद-1


किसी वस्तु या व्यक्ति की आरजू या हसरत उस वक्त और अधिक बढ़ जाती है जब वह पहुंच से दूर हो जाए। कल यह बात फिर प्रासंगिक हो उठी, जब चांद बादलों की ओट में ऐसा छिपा कि निकलने का नाम तक नहीं लिया।। चांद के इंतजार में कई महिलाओं की रात तो आंखों में ही कट गई लेकिन बेरहम चांद का दिल जरा सा भी नहीं पसीजा। अगर कहीं थोड़ा बहुत पसीजा भी तो बादलों ने दाल भात में मूसलचंद की भूमिका निभाई। सर्द हवा एवं हल्की बूंदाबांदी के बीच दिन भर से भूखी प्यासी महिलाएं चांद के दीदार के लिए न जाने कितनी ही बार छत की सीढियां चढ़ी व उतरी। इंतजार की इंतहा होते देख कई तो भूखी ही सो गई। चांद का यह इंतजार संकटचतुर्थी यानि तिलकुट्टा चौथ के उपलक्ष्य में था। इस व्रत में चांद के दर्शन करने के बाद उपवास खोलने का विधान है, लेकिन प्रतिकूल मौसम ने सुहाहिनों की कड़ी अग्नि परीक्षा ले ली। वैसे चांद की बात चली है तो दूर तलक तो जाएगी ही। चांद कहां पर नहीं है। यह उम्र की सीमा नहीं देखता। हर किसी के जीवन से जुड़ा है चांद। बालक हो, जवान हो, महिला हो। सबके लिए अहमियत रखता है चांद। और तो और गंगा-जमुनी संस्कृति का जीता जागता उदाहरण है चांद। इसकी प्रशंसा में कई गीत लिखे गए हैं लेकिन कल तो चांद को लेकर शिकवा-शिकायतों का दौर हावी था। कह रही थी यह मुआ चांद है ही ऐसा। इसकी फितरत ही ऐसी है। न जाने यह कितनों को तडफ़ाता है। तरसाता है। वाकई कल तो चांद ने इतना तरसाया कि कई चांद से चेहरे मुरझाए हुए नजर आए। चांद जैसे रोशन चेहरे बुझे-बुझे से दिखाए दिए।
वैसे चांद का जिक्र आते ही जेहन में अनगिनत गाने व शेरो-शायरी का ख्याल जिंदा हो उठता है। चांद की शान में क्या-क्या नहीं कहा गया। यह अब गाना देखिए- 'खोया- खोया चांद, खुला आसमान, आंखों में सारी रात जाएगी, तुमको भी कैसी नींद आएगी... ' यह गीत बड़ा कर्णप्रिय है लेकिन देखिए ना गाने के बोल कल बेमानी थे। चांद खोया (गुमशुदा) था, क्योंकि आसमान खुला ( साफ) नहीं था, लेकिन फिर भी रात आंखों में गुजर गई। हां, हम दिल दे चुके सनम फिल्म के गीत 'चांद छिपा बादल में शरमा के मेरी जाना..' गीत जरूर मौजूं लगा। कल तो शायद चांद शरमा ही गया वरना वह इतना निष्ठुर कहां है। वैसे चांद से बावस्ता गीतों की फेहरिस्त बेहद लंबी है। ...क्रमश:

जवानों में जोश भर देते हैं भारत माता के जयकारे


श्रीगंगानगर. 
वाकई यह पल जोश जगाने वाले होते हैं। देशभक्ति का जज्बा इस कदर हिलोरें मारता है कि भारत माता के जयकारे के साथ भींची हुई मुट्ठियां हवा में लहराती है। यह जयकारे जवानों में जोश भरने का काम करते हैं। भारत-पाक सीमा पर सादकी पोस्ट के पास यह नजारा रोज शाम को होता है। सैन्य भाषा में इसे रिट्रीट सेरेमनी कहा जाता है। पंजाब के फाजिल्का से मात्र 15 किमी की दूरी पर स्थित सादकी बॉर्डर पर जवानों की यह अनूठी परेड देखना बेहद रोमांचक होता है। जीरो लाइन के बीच भारत-पाक के जवान मार्च करते हैं।
मार्च के दौरान जवान पैरों को अपने सिर के ऊपर तक ले जाते हैं। दोनों देशों के जवानों की इस अनूठी परेड देखने आए लोग भी खूब हौसला बढ़ाते हैं। हुटिंग करते हैं और अपने-अपने देश के समर्थन में नारेबाजी करते हैं। पड़ोसी मुल्क के लोग अपने देश के समर्थन में नारे लगाते हैं तो इधर, भारतीय जवानों के समर्थन में 'भारत माता की जय '  'वंदेमातरम' व 'हिन्दुस्तान जिंदाबाद' के नारे लगते हैं। जवानों की पदचाप इतनी तेज होती है कि इसे आसानी से सुना जा सकता है। परेड के दौरान जवानों के चेहरे की भाव भंगिमाओं से इनका गुस्सा साफ जाहिर होता है। इससे माहौल एकबारगी तनावपूर्ण हो जाता है। परेड के बाद बैंड की कर्णप्रिय धुन के बीच दोनों देशों के जवान अपने राष्ट्रीय ध्वज को बड़े ही रोचक एवं नाटकीय अंदाज में उतारते हैं। इस दौरान दोनों देशों के दो-दो घुड़सवार जवान दोनों तरफ खड़े रहते हैं। ध्वज उतारने के बाद ही दोनों तरफ से तेज धुन में देशभक्ति गीत गूंजते हैं। दोनों तरफ से गीतों की आवाज बेहद तेज होती है।
सेल्फी लेने की होड़
रिट्रीट सेरेमनी के दौरान और इसके बाद फोटो लेने वालों की बाढ़ सी आ जाती है। यह सिलसिला दोनों तरफ है। बिलकुल जीरो लाइन के पास दर्शक सेल्फी लेते हैं। दोनों तरफ खास बात यह देखने को मिलती है कि लोग अपने देश के सैनिकों के साथ सेल्फी लेने में खासी दिलचस्पी दिखाते हैं।

जानिए एक ऐसे युवक के बारे में जिसकी पीठ पर लिखा 'इश्तहार' ही है उसकी पहचान

श्रीगंगानगर.

 न तो उसका नाम गुम है और न ही चेहरा बदला है। और तो और आवाज भी उसकी पहचान नहीं है। बस पीठ पर चस्पा एक छोटा सा 'इश्तहार' ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है। यह अजीब सी दास्तां हैं ताराचंद वाटिका के पास रहने वाले दिव्यांग चमकौरसिंह की। परिजन वैसे तो उस पर नजर रखते हैं लेकिन कई बार वह चुपचाप घर से निकल जाता है। एेसे में उसको तलाशने के लिए परिजनों ने एक अजीब सा तरीका अपना रखा है। चमकौर की पीठ पर कमीज पर एक सूचना लगा दी गई है। इस पर लिखा है ' यह बच्चा मानसिक रूप से बीमार है, अगर कहीं मिले तो फोन करने की कृपा करें।' इस सूचना के नीचे दो मोबाइल नंबर लिखे हुए हैं। 

दरअसल, इस तरह का आइडिया चमकौर के परिजनों को किसी शुभचिंतक ने ही दिया था। कुछ दिन पहले चमकौर जलालाबाद चला गया था। बाद में फेसबुक के माध्यम से वह मिल गया। इसके बाद उसकी पीठ पर यह सूचना लगा दी गई है। वह घर से बाहर जाता है तो लोग उसकी पीठ पर लिखे नंबर देखकर फोन कर देते हैं। इससे परिजन चमकौर को आसानी से तलाश लेते हैं।

मंदिर जहां भगवान नहीं, पूजे जाते हैं उनके वस्त्र


फोन करके परिजनों को बुलाया
चमकौर पदमपुर रोड स्थित कल्याण भूमि में सोमवार को किसी के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ। पीठ पर चस्पा सूचना देखकर वहां मौजूद लोगों ने फोन लगाया तो परिजन वहां आए और चमकौर को लेकर गए। चमकौर के बड़े भाई गुरप्रीत ने बताया कि वे तीन भाई हैं। उन्होंने बताया कि चमकौर ने दस साल तक तपोवन मनोविकास विद्यालय में अध्ययन किया है। वह दिव्यांग है। घर के सब लोग उस पर ध्यान रखते हैं लेकिन कई बार वह घर से निकल जाता है। घर का रास्ता भूल जाता है इसीलिए पीठ पर नंबर लिखे हैं ताकि सूचना पर वहां पहुंचा जा सके।  

सुरक्षा बलों के खाने पर पहले भी उठते रहे हैं सवाल

 खाने की गुणवत्ता को लेकर सीमा सुरक्षा बल के एक जवान द्वारा वायरल किए गए वीडियो की हकीकत भले ही अभी जांच के दायरे में हो लेकिन कड़वी हकीकत यह भी है सेना व सुरक्षा बलों के खाने पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं। 
 नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की पिछले साल जारी रिपोर्ट में तो कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए थे। मसलन, जम्मू कश्मीर तथा पूर्वोतर क्षेत्र में तैनात जवानों को ताजा खाना नहीं मिलता है और जो मिलता है वह भी भरपेट नहीं मिलता। 
इतना ही नहीं कैग रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि सेना के जवानों को एक्सपायरी डेट गुजरने के बाद भोजन के पैकेट भेजे जा रहे हैं। कैग रिपोर्ट एव हालिया सीमा सुरक्षा बल के जवान के आरोप से आखिररकार यह तो जाहिर होता ही है कि खाने को लेकर किसी न किसी स्तर पर गड़बड़ तो है। 
सेना में भोजन को लेकर हो हल्ला पहले भी होता रहा है, लेकिन अंदरूनी स्तर पर ही इनको निबटा लिए जाने के कारण बाहर बवाल कम हुआ। 
भारतीय सेना की नौकरी को जोश-जुनून व जज्बे वाली कहा जाता है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि सेना में अनुशासन सर्वोपरि है। यहां अनुशासन भंग करने पर सैन्य नियमों/ कानूनों के तहत कड़ी सजा का प्रावधान है। इतना कुछ होने के बावजूद भोजन की गुणवत्ता पर सवाल उठना ही अपने आप में अनुशासन को खंडित करने जैसा है। सुरक्षा बलों की अंदर की बात बाहर आना ही अनुशासनहीनता की श्रेणी में माना जाता है। उस पर बवाल मचना व बहस छिड़ना भी लाजिमी है। वैसे भी थल, नभ व जल सेना तीनों में ही भोजन की व्यवस्था तीन स्तर पर होती है। उच्च स्तर के अधिकारी, मध्यम स्तर के अधिकारी तथा जवान। तीन स्तर पर खाने/पकाने की व्यवस्था भी अलग-अलग होती है। इन सबके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि जवानों के भोजन पर ही अक्सर बवाल क्यों मचता है? इससे भी गंभीर बात यह है भोजन कि गुणवत्ता पर सवाल भी अक्सर जवानों ने ही उठाए हैं। अफसरों के द्वारा गुणवत्ता पर सवाल उठाने के उदाहरण कम ही सामने आते हैं। जानकारों की मानें तो गुणवत्ता पर सवाल तभी उठते हैं जब निर्धारित कोटे में कटौती कर दी जाती है या गुणवत्ता में गिरावट कर राशन बचाने का उपक्रम होता है। इस तरह की बातों का समर्थन सेना में रह चुके पूर्व जवान भी करते हैं। वितरण व्यवस्था सही नहीं होने से भी अक्सर विवाद खड़ा हो जाता है। कुछ उदाहरण इस तरह के भी सामने आए हैं, जब जवानों को भरपेट भोजन की बजाय गिनती के हिसाब से रोटियां दी गई। अनुशासन की बुनियाद पर खड़े सेना या अर्द्धसैनिक बलों के अंदरूनी हालात अगर हकीकत में इस तरह के हैं तो यह हम सब के लिए चिंताजनक हैं। यह सही है कि वेत्तन, भते व सुविधाओं के हिसाब से तो अफसर व जवान की कोई तुलना नहीं हो सकती है लेकिन बात जब भोजन की आती है तो उसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। 
 सीमा सुरक्षा बल के जवान के वीडियो की हकीकत भले ही सामने आए या न आए लेकिन इस बहाने सेना एवं अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को दिए जा रहे भोजन की गुणवत्ता तो ही जांची जा ही सकती है और जांचनी भी चाहिए। मामला संवेदनशील है और सीधा-सीधा देश की सुरक्षा से भी जुड़ा है। 
भरपेट भोजन न मिलने या गुणवत्ताहीन भोजन करने वाले जवान सीमा पर कितनी मुस्तैदी से ड्यूटी कर पाएंगे सहज ही कल्पना की जा सकती है? विपरीत परिस्थतियों में काम करने वालों के लिए तो गुणवत्ता से परिपूर्ण भोजन बेहद जरूरी है।

राशन पर हो हल्ले का है पुराना इतिहास


बस यूं ही 
सीमा सुरक्षा बल के जवान द्वारा खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाने की बात कोई नर्ई नहीं है। सेना व अद्र्धसैनिक बलों में खाने को लेकर हो हल्ला पहले भी मचता रहा है। आज सुबह चाय के दौरान पापाजी से सेना के खाने को लेकर चर्चा चल पड़ी। बातों-बातों में वो अतीत में चले गए। कहने लगे राशन की गुणवत्ता को लेकर सेना में इस तरह के हो हल्ले पहले होते रहे हैं। पापाजी ने सन 1965 के युद्ध के बाद का वाकया बताया कि उस दौरान नासिक थे. उनको लंगर कंमाडर बनाया गया था। यह जिम्मेदारी अस्थायी रूप से होती थी और दो माह के लिए दी जाती थी। स्टोर से राशन संबंधित रेजीमेंट में आता था और वहां से कंपनीज में। हर कंपनीज में लंगर कंमाडर होते थे जिनकी निगरानी में भोजन तैयार होता था। पापा जी ने बताया कि उस वक्त ज्यादा मारामारी रोटियों को लेकर होती थी, जबकि एक जवान के लिए छह सौ ग्राम आटा निर्धारित था। इसके बावजूद उनको रोटियां गिन-गिन कर दी जाती थी। पापाजी ने बताया कि उन्होंने पहला काम यह किया है जवान को रोटी गिन के नहीं बल्कि वो जितनी खाता है उतनी दी जाए। पापाजी ने बताया कि एक दिन उन्होंने देखा कि लांगरी मतलब भोजन बनाने वाला कुक अपने एप्रीन में बहुत सारी रोटियां छिपा रहा था। पापाजी ने उसका टोका तो वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसके बाद पापाजी ने वहां नियम बना दिया कि जो लांगरी भोजन करना चाहता है वह वहीं करे लेकिन जाते समय एप्रीन को झाड़ कर ही जाएगा। बस फिर क्या था। हो हल्ला बंद हो गया। न केवल रोटियां बचने लगी बल्कि राशन भी बचने लगा। दो माह के बचे राशन को स्टोर में जमा करवा दिया गया।
खैर, इस वृतांत से मैं यह समझा कि राशन पर विवाद की कहानी पुरानी है। इसमें सबसे पहले तो लंगर कमांडर की भूमिका की महत्वूपर्ण होती है। उसकी मर्जी के बिना कुछ भी संभव नहीं है। पापाजी की बात से यह भी साबित होता है राशन की कोई कमी नहीं है बशर्ते उसका वितरण हिसाब से हो। हां राशन को बाजार में बेचने के जो आरोप लगते हैं, उनके पीछे भी प्रमुख रूप से दो कारण हो सकते हैं। ईमानदारी से बचे राशन को स्टोर में जमा न करवाकर सीधे बेच देना या फिर मात्रा में कटौती कर राशन बचाना और फिर उसे बेच देना, लेकिन सैन्य नियमों के तहत ऐसा करना अपराध है। कोई अगर ऐसा करता है तो इसमें गिने-चुने लोगों की भूमिका हो सकती है। समूची सेना इसके लिए न तो जिम्मेदार है और न ही उसको बदनाम करना चाहिए। वैसे यह सेना का अंदरूनी मामला है और जब इस तरह की शिकायतें होती हैं तो उन पर अमल भी होता है।

हंगामा क्यों है.बरपा ..


बस यूं ही 
सीमा सुरक्षा बल के जवान के समर्थन में समूची सेना/ सुरक्षा बलों को कठघरे में खड़े करने वालों से मेरा पहला सवाल यही है कि वो जिस भी क्षेत्र में काम कर रहे हैं कि क्या वहां शत-प्रतिशत पारदर्शिता है? मतलब सारे काम ईमानदारी से ही होते हैं या सारे लोग ही दूध के धुले हैं? यकीनन सभी का उत्तर नहीं ही आएगा। फिर भी अगर कोई हां कहता है तो शर्तिया वह झूठ बोलता है। इस अजीब व अटपटे सवाल से अपनी बात शुरू करने का मतलब यही है कि हम जिस भी क्षेत्र से आते हैं, (भले ही व्यक्तिगत रूप से आप कैसे भी हो यह मायने नहीं रखता है) वहीं अगर गड़बड़ है तो हमको दूसरों पर अंगुली उठाने का या आइना दिखाने का कोई अधिकार नहीं है। और उठाते हैं तो यह उन लोगों का अपमान है जो ईमानदारी के पथ पर चल रहे हैं। हां एक मछली द्वारा सारे तालाब को गंदा करने वाली बात से जरूर सहमत हुआ जा सकता है। खैर, सोशल मीडिया में आज बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं। कई तरह की उपमाएं दी जा रही हैं। सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कई तरह के तर्क व अनुभव बताए जा रहे हैं। सैन्य अनुशासन को तार-तार करने वाले एक सीमा सुरक्षा बल के जवान को बतौर हीरो बनाया जा रहा है। बात यहीं तक सीमित नहीं है जवान के समर्थन में उतरे लोग तो बीएसएफ की तरफ से दिए गए जवाबों पर ही सवाल उठा रहे हैं। याद दिला देता चलूं कि यह वही लोग हैं जो कुछ रोज पहले सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सेना व जवानों के सम्मान में बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थें। 
इन सब के बीच मान भी लें कि सीमा सुरक्षा बल के जवान के साथ अन्याय हुआ लेकिन इंसाफ पाने के लिए जवान ने जो रास्ता अपनाया क्या वह सही है? क्या जवान को ऑन ड्यूटी मोबाइल रखने की इजाजत है? क्या घर की शिकायत घर के मुखिया के बजाय छत्त पर खड़े होकर चिल्ला चिल्लाकर बतानी चाहिए? आज कमोबेश हर दूसरा या तीसरा आदमी उस जवान के साहस को सलाम करता नजर आ रहा है। सोशल मीडिया पर जवान के समर्थन में जबरदस्त बहस छिड़ी है। यह तो भी सभी जानते हैं कि सेना हो या अद्र्धसैनिक बल। इनके लिए अनुशासन बड़ी चीज होती है। अनुशासन भंग करके कोई अपनी पीड़ा बता रहा है तो वह सैन्य कानून के हिसाब से गुनाहगार है। अनुशासन जहां भंग होता है, वहां कुछ भी हो सकता है। बिना अनुशासन के तो अराजकता ही फैलेगी। कल्पना कीजिए अगर हर जवान ही इस तरह अनुशासन भंग करने लगा तो फिर तो सेना के औचित्य पर ही बड़ा सवाल खड़ा हो जाएगा। सीमा सुरक्षित कैसे रहेगी। इधर, जवान की अनुशासनहीनता को साहस भरा कदम बताने वाले कल फिर प्रलाप कर सकते हैं जब इस जवान पर कोई गाज गिरेगी। 
खैर, एक बात और इस जवान के नाम से फेसबुक अकाउंट भी है। यह सही है या गलत है इसकी कोई पुष्टि मैं नहीं करता लेकिन इस अकाउंट को चमत्कारित रूप से फालो करने वालो की बाढ़ सी आ गई है। यह आंकड़ा एक लाख के करीब पहुंच चुका है। इसी अकाउंट पर वह वीडियो अपलोड किए हुए हैं जिन पर देश भर में बवाल मचा हुआ है। अब जरा अपलोड वीडियो, मैसेज एवं उनके समय की बात कर ली जाए। जवान का वीडियो फेसबुक अकांउट पर 8 जनवरी को शाम 5.35 बजे अपलोड किया गया है। इससे पहले दोपहर 2.30 बजे दाल वाला वीडियो अपलोड किया हुआ है। इसके बाद 9 जनवरी को सुबह 7.28 पर दाल का एक और वीडियो अपलोड किया गया है। इसके बाद सुबह 8.12 बजे जली हुई रोटी का वीडियो तथा 8.13 मिनट पर कथित जवान का वर्दी में फोटो अपलोड किया गया है। और अब मंगलवार शाम आठ बजे से 18 घंटे पहले ओके गुड नाइट नया वीडियो देखो का मैसेज पोस्ट किया गया है। 17 घंटे पहले मोबाइल नंबर तथा 16 घंटे पहले टूटी फूटी हिन्दी में एक और मैसेज पोस्ट किया गया है जिसमें कहा है कि वह सभी धर्मो का सम्मान करता है। 
इसके बाद रोमन में एक पोस्ट लिखी गई थी, जो अब डिलीट कर दी गई है। इसमें एक महिला की फोटो के साथ लिखा गया था कि वह जवान की पत्नी है उसका कल शाम से ही पति से संपर्क नहीं हो पा रहा है। यह पोस्ट अब अकाउंट से हटा दी गई है। इसके बाद एक नई पोस्ट भी अंग्रेजी में लिखी है कि सम पीपल आर ट्राइंग टू से देट इट इज फेक आईडी सो आई वान्ट टू से देट आईएम वाइफ ऑफ ( जवान का नाम) हू इज यूजिंग दिस आईडी। इन तमाम वीडियो एवं पोस्ट को बड़ी संख्या में शेयर किया जा रहा है। कमेंट्स की तो जबरदस्त भरमार है। बहरहाल, जवान के नाम पर संचालित अकाउंट पर अचानक पत्नी के नाम से मैसेज आना, फिर उसका डिलीट होजाना। पहले टूटी फूटी हिन्दी में लिखना। फिर अंग्रेजी में बात कहना। आखिर में यह कहना कि पत्नी ही पति का अकाउंट चला रही है। इन तमाम बातों से यह जाहिर जरूर हो रहा है कुछ गड़बड़ है। विरोधाभासी मैसेज संदिग्ध प्रतीत होते हैं। बहरहाल, मैं व्यक्तिगत रूप से सेना एवं अध्यापकों का हमेशा से ही सम्मान करता रहा हूं। फिर भी जो आरोप लगे हैं उनकी गहनता व ईमानदारी से जांच होनी चाहिए। आरोपों की भी और संबंधित जवान की भी। और साथ में उस फेसबुक अकाउंट की भी। 
 और हां फेसबुक के माध्यम से सेना पर अनर्गल टिप्पणी करने वालों यह मत भूलो कि देश सेना के हाथों ही महफूज है। कभी अपने किसी परिजन को फौज में भेजकर देखो फिर बताना सेना कैसी है। हमेशा यह बात याद रखो कि सेना में अगर दो चार जयचंद हैं भी तो उसके लिए पूरी सेना जिम्मेदार नहीं है। 
जय हिन्द। जय भारत की सेना।

यह जीवन है....


बस यूं ही
कल शुक्रवार रात सवा नौ बजे के करीब फेसबुक पर मैसेज रिक्वेस्ट आई। स्वीकार करने के बाद देखा तो ग्वालियर के कोई राम उपाध्याय थे। उनका पहला संदेश था 'हैलो'। बाद में लिखा 'क्या आप स्वर्गीय प्रभुसिंह शेखावत जो कि 30-35 साल पहले ग्वालियर (एमपी) में निवास करते थे, उनके दो पुत्र विजेन्द्र व महेन्द्र हैं आप जानते हैं प्लीज।' संदेश पढ़कर मैं पहले तो हल्का सा मुस्कुराया। फिर उनके संदेश का जवाब दिया 'माफी चाहूंगा श्रीमान जी, शेखावत सरनेम के लोग बड़ी संख्या में हैं। मूगलकाल के दौरान शेखावतों का आविर्भाव हुआ तथा यह राजस्थान के झुंझुनूं व सीकर में ही ज्यादा होते थे लेकिन बाद में यह समूचे देश में फैलते चले गए। वैसे शेखावत मूल रूप से कुशवाहा राजपूत हैं जो ग्वालियर से ही राजस्थान आए थे। अगर आप गांव वगैरह का नाम बता पाएं तो शायद मैं आपकी कुछ मदद कर पाऊं।' रात को संभवत: उन्होंने मेरा संदेश नहीं देखा। शनिवार सुबह उनका जवाब आया 'बड़ागांव, झुंझुनूं' इस पर मैंने जवाब दिया ' मेरे गांव के पास ही है, शाम तक आपको पता करके बताता हूं।' उन्होंने पलटकर धन्यवाद दिया तथा मेरे मोबाइल नंबर मांगे। मैंने उनको मोबाइल नंबर दिए तो उनका फोन आ गया। कहने लगे भाईसाहब मैं ग्वालियर मध्यप्रदेश से राम उपाध्याय बोल रहा हूं। प्रभुसिंह शेखावत व उनका परिवार यहीं रहता था। हमारी माताजी उनको धर्म का भाई मानती थी। प्रभुसिंह की तो मृत्यु हो चुकी है लेकिन दोनों बेटे अभी जिंदा हैं। मैंने उनकी तलाश के लिए बहुत प्रयास किए। फेसबुक पर महेन्द्र शेखावत की कई आईडी सर्च की। आखिरकार आपका सरनेम देखा तो उम्मीद जगी कि शायद आप बता देंगे। इसलिए आप को मैसेज किया। आप अगर उनका पता बता देंगे तो मेहरबानी होगी। मैंने उनको भरोसा दिलाया कि अभी पता करके बताता हूं। 
इसके बाद मैंने बड़ागांव में परिचित अशोकसिंह जी बड़ागांव का फोन लगाया तो उन्होंने नामों की पुष्टि कर दी और मोबाइल नंबर थोड़ी देर में देने की बात कही। आधा घंटे बाद उनका दुबारा फोन आया और मोबाइल नंबर दे दिए। इसके बाद मैंने राम उपाध्याय को फोन लगाया और नंबर बताए तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने कम से दस बार धन्यवाद दिया। इसके बाद मैं आफिस चला आया। इसके बाद फिर फोन आया। कहने लगे भाईसाहब हमारी बात हो गई। आज तीस साल बाद उनसे संपर्क हुआ है। हमारी माताजी भी आपको आशीर्वाद दे रही हैं। बात-बात पर उनकी जुबान पर धन्यवाद था। बरसों पुरानी मुराद पूरी होने की खुशी राम उपाध्याय जी की बातों में झलक रही थी, जिसे मैं महसूस भी कर रहा था। इधर, मेरे को भी खुशी थी कि मेरे प्रयास रंग लाए।

वाकई दुनिया गोल है....

बस यूं ही
सरकारी स्कूलों में इन दिनों शीतकालीन अवकाश चल रहे हैं। यह सात जनवरी तक चलेंगे। दो जनवरी को श्रीगंगानगर के जिला शिक्षा अधिकारी ने एक निर्देश जारी किया, जिसमें बताया गया था कि विभाग को शिकायत मिली है कि कुछ गैर राजकीय विद्यालय शीतकालीन अवकाश में भी कक्षाएं लगा रहे हैं। इस तरह कक्षाएं लगाने वाले स्कूलों पर विभागीय कार्रवाई की जाएगी। यह तो हुई निर्देशों की बात। संयोग से मैं दो जनवरी को सुबह नोहर से श्रीगंगानगर लौट रहा था, मैंने रास्ते में कई जगह स्कूल बसें भी देखी तो कुछ जगह विद्यार्थियों को स्कूल बस के इंतजार में खड़े भी देखा। दोपहर को हनुमानगढ़ से किसी विकास शर्मा का फोन आया। उनका कहना था कि हनुमानगढ़ में शीतकालीन अवकाश के बावजूद स्कूल लग रहे हैं। हमने इन स्कूलों की सूची प्रशासन को दी है, आप खबर लगाए ताकि मासूमों को सर्दी के मौसम में परेशानी न हो। खैर, शाम को जिला शिक्षा अधिकारी के निर्देशों को आधार बनाते हुए खबर बनाई। हनुमानगढ़ से भी इनपुट मंगवाया। साथ में टिप्पणी भी लिखी। दूसरे दिन जिला शिक्षा अधिकारी के निर्देशों की खबर अन्य समाचार पत्रों में भी थीं। संयोग देखिए अगले दिन तीन जनवरी को सुबह ही एक महिला का फोन आया। उन्होंने मेरे से पूछा कि आपने तो सात जनवरी तक का अवकाश बताया है लेकिन मेरे बच्चे की स्कूल लग रही है। इतनी सर्दी में बच्चे को स्कूल भेजना किसी सजा से कम नहीं है। मैंने उनको कहा कि हमने भी यही लिखा है कि सात तक अवकाश हैं लेकिन कुछ स्कूल लग रहे हैं, लेकिन वो तो तत्काल राहत पाने के मूड में थी। किसी तरह उनको जवाब देकर मैंने बात समाप्त की। दोपहर को फिर घर के बाहर खड़ा था तो कुछ बच्चों को बस्ता पीठ पर लटकाए हुए गुजरते देखा तो माथा फिर ठनका। अब मेरे पास दो प्रमाण थे कि स्कूल लग रहे हैं। इस आधार पर शाम को फिर खबर बनवाई गई कि आदेशों की पालना नहीं हो रही है। अगले दिन चार जनवरी को एक मेल मिलता है। प्रेषक ने अपने नाम की जगह संगठन का नाम लिखा और साथ में इस तरह की खबर न छापने व अखबार के बहिष्कार की चेतावनी तक दे डाली। प्रेषक ने अपनी पीड़ा काफी विस्तार से लिखी। मसलन, हम तो शिक्षित बेरोजगार युवाओं को नौकरी देते हैं, वरना वो अपराध की दुनिया में जाते या आत्महत्या कर लेते। हम गरीब एवं कमजोर बच्चों को अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर पढ़ाते हैं तो कौनसा गुनाह करते हैं। और न जाने कितने की सुझाव, सलाहें व शिकायतें, लेकिन सारी की सारी पूर्वाग्रह से लिपटी हुई। प्रेषक ने न तो नाम दिया न ही सम्पर्क करने के लिए कोई नंबर। मैंने उसकी मेल आईडी को गूगल प्लस पर सर्च किया लेकिन उसमें भी मुझे हकीकत कम फर्जीवाड़ा ज्यादा नजर आया।
इन तमाम घटनाक्रमों के बाद हद तो तब हो गई जब दोपहर बाद एक फोन आया। खुद को पुरानी आबादी निवासी बताने वाले शख्स ने पहले मेरा परिचय पूछा और कहा कि आपसे एक बात कहनी है कृपया इसको अन्यथा ना लें। मैंने प्रत्युत्तर में हामी भरी तो बोले, आप अवकाश में स्कूल खुलने का जो समाचार लगा रहे हैं वो छोटे बच्चों के लिए तो ठीक है लेकिन बड़ों के स्कूल जाने में क्या हर्ज है। बड़े बच्चे घर पर शैतानी करते हैं, इससे अच्छा तो है वो स्कूल ही जाएं। हम बच्चे को स्कूल जाने की कहते हैं तो वो उलटा हमको को टोकता है कि अखबार में आया है। कृपया आप इस तरह के समाचार प्रकाशित न करें। बहरहाल दो तीन दिन के इस घटनाक्रम के बाद मैंने अपना माथा पकड़ लिया। मतलब शिकायत हर तरफ से है। वाकई यह दुनिया गोल है। यहां कुछ भी कर लो शिकायत फिर भी रहती है।

 

गणतंत्र दिवस के ध्वजारोहण से पहले इस शौर्य मंदिर में चढ़ाते हैं फूल


मान्यता : दिल से मांगी गई हर मुराद होती है पूरी...

श्रीगंगानगर. यह शौर्य का मंदिर है। इस मंदिर में प्रवेश करते ही सिर श्रद्धा से अपने आप झुक जाता है तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। इस मंदिर का दर्जा प्रथम पूज्य देव गणपति के समकक्ष ही है, तभी तो यहां स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस समारोह के झंडारोहण से पहले श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते हैं। किसी भी तरह का चुनाव हो तो नामांकन से पहले प्रत्याशी यहां मत्था टेकते हैं। और तो और अधिकारी भी इस मंदिर में शीश झुकाने के बाद ही पदभार ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में दिल से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। यह अनूठा मंदिर पड़ोसी प्रदेश पंजाब के फाजिल्का जिले में है। फाजिल्का से मात्र सात किलोमीटर की दूरी पर भारत-पाक सीमा के नजदीक आसफ वाला नामक स्थान पर बना है यह शौर्य मंदिर। दरअसल, यह मंदिर उन सैनिकों की समाधि है, जो 1971 में भारत-पाक के मध्य हुए युद्ध में शहीद हो गए थे। इन सैनिकों के समाधि के गर्भगृह में शहीदों की अस्थियों के अंश भी हैं। इसके साथ ही समाधि स्थल के साथ ही एक संग्रहालय भी है। इसमें शहीद सैनिकों के नाम एवं चित्र लगाए गए हैं।
पंजाब के युद्ध स्मारकों में सर्वश्रेष्ठ
आसफ वाला के स्मारक को पंजाब में स्थापित लगभग 50 युद्ध स्मारकों में से सबसे सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। शहीद स्मारक को प्रारंभ में लगभग आधा एकड़ भूमि के लघु श्रेत्र में बनाया गया था। बाद में इसका विस्तार किया गया। अब यह साढ़े पांच एकड़ भूमि के बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें एक युद्ध स्मारक, संग्रहालय, कम्प्यूनिटी सेंटर में कम्प्यूटर सेंटर, शहीद दृगपाल सिंह स्मृति पार्क, एक सरकारी हाई एवं प्राइमरी स्कूल व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बने हुए हैं। स्मारक के प्रांगण में हरे-भरे पेड़ व आकर्षक फूल भी लगे हुए 
90 फीट चौड़ी और 18 फीट लंबी बननी थी चिता
समाधि स्थल के बगल में एक सूचना पट्ट लगा है। इसमें बताया गया है कि 17 दिसम्बर 1971 को रात आठ बजे भारत-पाक युद्ध समाप्ति की घोषणा की गई। इसके अगले दिन 18 दिसम्बर को सुबह सात से लेकर दोपहर बाद तीन बजे तक शहीदों की पार्थिव देह को एकत्रित किया गया। इसके बाद 90 फीट चौड़ी और 18 फीट लंबी चिता तैयार कर शाम चार बजे सभी शहीदों की सामूहिक अन्त्येष्टि की गई। इसके बाद शहीदों की याद में फाजिल्का के निवासियों ने 1972 में यादगार के रूप में इस समाधि व स्मारक का निर्माण करवाया। समाधि में सभी शहीदों की अस्थियां शामिल हैं।
सभी के चित्र तो चार सैनिकों की प्रतिमाएं
स्मारक परिसर में एक संग्रहालय भी बनाया हुआ है। इसमें सभी शहीद सैनिकों के चित्र लगाए गए हैं। यहां 15 राजपूत रेजीमेंट के शहीद लांस नायक दृगपाल सिंह महावीर चक्र और मेजर ललित मोहन भाटिया वीर चक्र, 4 चार जाट रेजीमेंट के मेजर नारायण सिंह वीर चक्र व लांस हवलदार गंगाधर वीर चक्र की प्रतिमा लगी है। इन सभी को मरणोपरांत भारत सरकार की ओर से अंलकृत किया गया था। इन सभी की प्रतिमाएं संग्रहालय के प्रवेश एवं निकास द्वार पर लगाई हुई है। साथ ही युद्ध का संक्षिप्त विवरण व आकर्षक चित्र भी संग्रहालय में लगाए गए हैं।
सभी के हैं स्मृति स्तम्भ
आसफ वाला में स्मारक में शुरुआत में 4 जाट रेजीमेंट के 82 शहीद जवानों की स्मृति में निर्माण किया गया था। इसके बाद 1991 में स्मारक का दायरा विस्तृत करने का निर्णय किया गया। इसी के तहत 15 राजपूत व आसाम रेजीमेंट के जवानों के स्मृति स्तम्भ स्मारक परिसर में स्थापित किए गए। युद्ध में शहादत देने वाले सीमा सुरक्षा बल तथा होमगाडज़् के जवानों के स्मृति स्तम्भ यहां बनाए गए हैं। विदित रहे कि इस जगह पर 4 जाट रेजीमेंट, 3 आसाम रेजीमेंट, 15 राजपूत रेजीमेंट, 67 इनफेन्टरी ब्रिगेड, अश्वरोही सेना, सीमा सुरक्षा बल व होमगार्ड के कुल 225 सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की थी जबकि 450 सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इनमें से कुछ तो स्थायी रूप से अपंग भी हो गए थे।

Thursday, February 16, 2017

प्रेमी युगलों की मुराद पूरी करती है यह मजार

साल भर आते हैं प्रेम की दुआ मांगने वाले
श्रीगंगानगर. यहां प्रेम फलता-फूलता है। यहां प्रेम की सलामती की दुआएं मांगी जाती हैं। खास बात यह है कि  यहां आने वाले प्रेमी जोड़ों को नफरत भरी नजरों से नहीं देखा जाता। तभी तो यहां प्रेमी साल भर आते हैं। मत्था टेकते हैं और प्रेम की खुशहाली की मन्नते मांगते हैं। मान्यता है कि सच्चे दिल से मांगी गई मुराद यहां पूरी होती है। यह जगह भारत-पाक सरहद से बिलकुल सटी है। श्रीगंगानगर जिले की अनूपगढ़ तहसील का छोटा सा गांव बिंजौर प्रेेम की भाषा समझने वालों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। हो भी कैसे नहीं आखिर, अमर प्रेम के प्रतीक एेतिहासिक प्रेमी युगल लैला-मजनूं की मजार जो यहां हैं। हालांकि इस मजार के कोई एेतिहासिक दस्तावेज तो नहीं मिलते हैं लेकिन कई तरह की किवदंतियों में इस बात का दावा किया जाता है कि यह हकीकत वाले लैला मजनूं ही हैं। इस मजार पर वैसे तो साल भर ही आने जाने वालों का क्रम लगता रहता है लेकिन प्रत्येक वर्ष 10 से 15 जून तक लगने वाले मेले में सैकड़ों श्रद्धालु उमड़ते हैं। इनमें प्रेमी युगल व नवविवाहित जोड़ों की संख्या ही अधिक होती है। मान्यता यह भी है कि जिनके संतान नहीं होती है वे भी इस मजार पर आकर मन्नतें मांगते हैं तो वह पूरी होती है।

हिन्दू ही करते हैं मजार की देखरेख
बिंजौर गांव के पास घग्घर नदी के मुहाने पर बनी लैला-मजनूं की मजार की देखरेख हिन्दू करते हैं। बिंजौर गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है। खास बात यह है कि मजार के रखरखाव तथा वार्षिक मेले के लिए गठित कमेटी में भी कोई मुस्लिम नहीं है। मजार पर सभी धर्मों के लोग आते हैं। कमेटी के मुखिया भागसिंह बताते हैं कि गांव में कोई मुस्लिम परिवार नहीं है लेकिन मजार की देखरेख हिन्दू ही करते हैं। मजार पहले खुले में थी, अब इसके ऊपर गुम्बद बना दिया गया है। प्रवेश द्वार पर घंटी लगी है। अमूनन इस तरह की घंटियां मंदिरों के प्रवेश द्वार पर होती हैं। गुम्बद की छत में भी चार रोशनदान बनाए गए हैं। बताया जाता है कि रोशनदान छोडने के बाद ही गुम्बद तैयार हुआ अन्यथा इसके बनाने में दिक्कत आ रही थी।
अलग-अलग कहानियां
लैला-मजनूं की मजार को लेकर कई तरह के किस्से व कहानियां प्रचलन में हैं। लोग बताते हैं लैला-मजनूं पाकिस्तान के सिंध प्रांत के रहने वाले थे और दोनों की इसी जगह पर मौत हुई थी। लैला-मजनूं की मौत को लेकर भी लोग एकमत नहीं है। किसी का कहना है कि दोनों के प्रेम की जानकारी होने पर लैला के भाई ने मजनूं की हत्या करवा दी। बाद में मजनूं की तलाश में भटकती लैला उसके शव के पास पहुंंची और खुदकुशी कर ली। कुछ लोगों का कहना है कि दोनों घर से भाग थे। बाद में दर-दर की खाक छानते हुए दोनों ने भूख व प्यास के कारण साथ-साथ ही प्राण त्याग दिए। इधर लैला-मजनूं कमेटी के मुखिया भागसिंह का कहना है कि लैला-मजनूं यहां आए थे और उम्र पूरी होने के बाद सामान्य तरीके से इनकी मौत हुई। उनकी याद में ही यह मजार बनी है। मजार किसने बनवाई तथा कब बनवाई इस बात का जवाब भागसिंह के पास नहीं है लेकिन उनका कहना है कि मजार चार सौ साल पुरानी है।

पहले खुले में थी मजार
लैला मजनूं की मजार पहले घग्घर नदी के बीच में खुले में ही थी। कालांतर में इसके चार दीवारी बनी और अब गुम्बद बन चुका है। चारदिवारी के दरवाजे से मजार तक शैड भी बनाया गया है ताकि दर्शनों के लिए कतार में खड़े श्रद्धालुओं को धूप न लगे। मजार के बारे में कहा जाता है कि जब-जब घग्घर नदी में पानी आता था तो मजार को छूता नहीं था। यह मजार के दोनों तरफ से निकल जाता था। इस बात पर भी भागसिंह कहते हैं कि नदी काफी चौड़ी होती थी। पानी तीन-तीन फुट तक आता लेकिन मजार नहीं डूबी। वैसे अब तो घग्घर में पानी आना भी कम हो गया है और मजार के चारदिवारी बनने से उसके पास पानी आ भी नहीं सकता। भागसिंह ने बताया कि पहले रात को यहां अंधेरे में दिया जलता दिखाई देता था। सबसे पहले इस बात की जानकारी सेना को हुई और उसके बाद लोगों को पता चला।

Saturday, January 28, 2017

बस एक माह के लिए बसता और उजड़ जाता है यह गांव!

श्रीगंगानगर. इस गांव की कहानी भी बड़ी अजीब है। यह विशुद्ध रूप से अस्थायी गांव है। यह केवल एक माह के लिए ही बसता है और फिर उजड़ भी जाता है। इतना ही नहीं बसने एवं उजडऩे की यह कहानी हर साल दोहराई जाती है। हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गोगामेड़ी में इस साल यह नया गांव बस चुका है। 

हर तरफ सैकड़ों की संख्या में तंबू और शामियाने तन गए हैं। कदम-कदम पर दुकानें खुल गई हैं। नोहर-भादरा मार्ग पर भी दोनों तरफ चार किलोमीटर तक कई तरह की दुकानें सजीं हैं। चारों ओर चहल-पहल और गहमागहमी का आलम है। कहीं भजन गूंज रहे हैं तो कहीं जयकारे लग रहे हैं। कहीं झूले लग रहे हैं तो कहीं मनोरंजन का साजोसामान। दरअसल, गोगामेड़ी में यह नया गांव (अस्थायी गांव) प्रसिद्ध लोकदेवता गोगाजी महाराज के वार्षिक मेले के दौरान बसता है। मेले के समापन के साथ ही यह अस्थायी गांव भी यहां से उठ जाता है। नए गांव के कारण गोगामेड़ी इन दिनों गुलजार है। मेला हिन्दी कलेण्डर के श्रावण माह की पूर्णिमा से शुरू होकर पूरे भाद्रपद मास चलता है। उत्तर भारत में संभवत: यह एकमात्र ऐसा मेला है, जो इतना लंबा चलता है। महीनेभर में यहां देशभर के पन्द्रह से बीस लाख तक श्रद्धालु आते हैं।  विदित रहे कि गोगामेड़ी में गोगाजी महाराज की मेड़ी (समाधि स्थल) तथा गोरक्षनाथ महाराज का प्राचीन टीला है। श्रद्धालु गोरक्षनाथ के धूणे के समक्ष शीश नवाने के बाद गोगामेड़ी के दर्शन करते हैं। बताया जाता है कि इस टीले पर नाथ संप्रदाय के गोरक्षनाथ महाराज ने धूणा रमाया था। 
एक हजार से ऊपर दुकानें
गोगामेड़ी में मेले में अधिकृत दुकानों की संख्या तो चार सौ से ऊपर हैं। यह दुकानें बकायदा आवंटित की गई हैं, इसके अलावा सड़क किनारे अस्थायी दुकानें तथा फेरी लगा कर सामान बेचने वाले भी कई हैं। इन सबको मिलाकर आंकड़ा एक हजार से उपर पहुंच जाता है। दुकानों का आवंटन यहां दो तरह से होता है। गोगामेड़ी क्षेत्र की दुकानें देवस्थान विभाग के अधीन हैं जबकि गोरक्षटीले की दुकानें गोरक्षटीला प्रन्यास (गोगाणा) देखता है। देवस्थान विभाग ने करीब 325 तथा गोगाणा ने करीब सौ दुकानों का आवंटन किया है। इसके अलावा खेतों एवं सड़क किनारे भी बड़ी संख्या में तंबू लग गए हैं। ये सब देखकर गोगामेड़ी में एेसा लगता है कि जैसे नया गांव बस गया हो। 

पॉलीथिन थैलियां नष्ट करने से होती मनोकामना पूरी!

श्रीगंगानगर. अगर आपने 21 पॉलीथिन थैलियां एकत्रित कर उनको नष्ट कर दिया तो आपकी मनोकामना पूरी होगी। अगर थैलियों की संख्या 51 हुई तो आपका धन दुगना हो जाएगा। इतना ही नहीं अगर आपने 101 या इससे अधिक थैलियां नष्ट की तो आपको संतान की प्राप्त होगी। चौंकिए मत। यह कोई घोषणा या दावा नहीं है बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए की गई एक तरह की अनूठी अपील है। हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गोगामेड़ी में चल रहे लोकदेवता गोगाजी महाराज के मेले में इस तरह की अपील लिखे बोर्ड आपको दिखाई दे जाएंगे।
विशेष रूप से गोगाणा में इस तरह के बोर्ड ज्यादा लगे हैं। यह बोर्ड तैयार करवाए हैं गोरक्षटीला प्रन्यास (गोगाणा) के महंत रूपनाथ महाराज ने। दरअसल, यह सारी कवायद पर्यावरण और गायों पर केन्द्रित है। 
बोर्ड में बकायदा यह भी लिखा गया है कि गोरक्षनाथ जी महाराज एवं गोगाजी महाराज दोनों ने ही गायों के लिए काफी कुछ किया है। इनकी पावन नगरी में पॉलीथिन न डालें क्योंकि पॉलीथिन थैलियां पर्यावरण प्रदूषण के साथ गायों की मौत का कारण बन रही हैं। विदित रहे कि गोमामेड़ी में पॉलीथिन का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। पर्यावरण प्रदूषण की वाहक बन रही इन थैलियों पर प्रशासनिक स्तर पर रोक के कोई प्रबंध नहीं हो रहे।
तैयार हो रही कपड़े की थैलियां
पर्यावरण संरक्षण को लेकर गोगाणा में एक नया काम भी शुरू किया गया है। यहां श्रद्धालुओं को कपड़े की थैली उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इस काम के लिए बकायदा एक टेलर भी लगाया गया है। गोगाणा में चढ़ावे के रूप में आने वाले कपड़े से ही यह थैलियां तैयार की जा रही हैं। इन थैलियों का वितरण स्थाई रूप से दुकान चलाने वाले दुकानदारों को नि:शुल्क किया जाता है।
फिर भी धड़ल्ले से बिक रही है पॉलीथिन
इस तरह की अपील जारी करने के बावजूद गोगाणा एवं गोमामेड़ी में पॉलीथिन का इस्तेमला धड़ल्ले से हो रहा है। दुकानों पर प्रसाद पॉलीथिन में रखकर दिया जाता है। गोगामेड़ी के पास के इलाके में तो जिधर नजर फैलाओ इधर पॉलीथिन की थैलियां दिखाई देती हैं। इस संबंध में बालयोगी महंत रूपनाथ महाराज बताते हैं कि वे श्रद्धालुओं को पॉलीथिन का उपयोग नहीं करने के लिए कहते भी हैं और जागरूक करने के लिए बोर्ड भी लगवाए गए हैं लेकिन जब तक प्रशासन की जब तक सख्ती नहीं होगी इस पर पर प्रभावी रूप से रोक संभव नहीं है।

यहां प्रसाद के रूप में चढ़ते हैं प्याज और दाल

 

श्रीगंगानगर. 

अमूमन मंदिरों में प्रसाद के रूप में कहीं मिठाई तो कहीं फल या नारियल का भोग लगाया जाता है लेकिन एक स्थान ऐसा भी है, जहां प्रसाद के रूप में प्याज, दाल एवं भुने हुए चावल को प्राथमिकता दी जाती है। सुनने में यह अजीब लगता है लेकिन हकीकत यही है। अपने आप में अनूठे प्रसाद का यह मामला हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में स्थित गोगामेड़ी से जुड़ा है।
उत्तर भारत के प्रसिद्ध लोकदेवता गोगाजी महाराज के प्रसाद में प्राथमिकता प्याज, दाल एवं भुने हुए चावल (खील) को दी जाती हैं। गोरक्षनाथ टीले पर भी पर यही तीनों चीजें प्रमुखता से चढ़ाई जाती हैं। लंबे समय से इस परम्परा का निर्वहन हो रहा है, हालांकि समय के साथ इसमें कुछ परिर्वतन जरूर हो गए हैं। अब नारियल, मखाणे व बताशे आदि भी प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाने लगे हैं। विदित रहे कि गोगाजी का महाराज का मेला पूरे भाद्रपद मास चलता है।
दाल पर महंगाई की मार
महंगाई का असर दाल पर भी पड़ा है। इस कारण श्रद्धालु दाल की बजाय प्याज व भुने हुए चावलों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले इस बार दाल का चढ़ावा लगभग आधा है, हालांकि मेला अभी शुरुआती दौर में है। इधर प्याज इस बार सस्ते हैं, इस कारण इनके चढ़ावे में किसी तरह की कटौती फिलहाल नजर नहीं आ रही।

इसलिए चढ़ता है यह प्रसाद
गोगाजी महाराज की जब मोहम्मद गजनवी से लड़ाई तय हो गई थी, तब उन्होंने अपने सगे-संबंधियों और मददगारों को रसद सामग्री के साथ युद्ध में आने का निमंत्रण दिया था। जानकार बताते हैं कि लड़ाई समय से पूर्व शुरू हो गई और धोखे से गोगाजी को घेर लिया गया। इसके बाद गोगाजी ने घोड़े सहित समाधि ले ली। युद्ध समाप्ति के बाद पहुंचे उनके सगे संबंधियों एवं मददगारों ने रसद सामग्री के रूप में साथ लाए गए प्याज, दाल एवं भुने हुए चावल उनकी समाधि पर अर्पित कर दिए। तभी से यह परम्परा चली आ रही है। रेगिस्तानी इलाके में प्याज एवं दाल का महत्व इसीलिए भी है क्योंकि यह दोनों लंबे समय तक खराब नहीं होते। 

यहां न ढोल बजता है और न ही कोई टॉर्च दिखाने वाला

श्रीगंगानगर. 

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है। खुले में शौच जाने वालों को रोकने के लिए प्रदेश स्तर पर कई तरह के अभियान चले थे। मसलन, किसी ने ढोल बजाया तो किसी ने टॉर्च की रोशनी दिखाई। कहीं सिटी बजाई गई तो कहीं मानव शंृखला बनाई गई। दरअसल, यह सारी कवायद खुले में शौच जाने वालों को शर्मसार कर उनको ऐसा करने से रोकने के लिए थी। इन अनूठे प्रयोगों के सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले लेकिन हनुमानगढ़ जिले के गोगामेड़ी में गोगाजी महाराज के वार्षिक मेले के चलते बसे अस्थायी गांव में खुले में शौच जाने पर किसी तरह की पाबंदी नहीं है। यहां न तो कोई ढोल बजाता है और न ही कोई टॉर्च दिखाने वाला है। 

प्रशासनिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से संचालित शौचालय भी ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में है लेकिन शौचालयों की संख्या अंगुलियों पर गिनने जितनी है। ऐसे में यहां संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। स्वच्छ भारत अभियान की धज्ज्यिां उड़ रही हैं, सौ अलग।
हो सकता  है समाधान 
मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शौचालय की व्यवस्था हो सकती है। हाल ही स्वच्छता के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार पाने वाले बीकानेर जिले के स्वच्छता समन्वयक महेन्द्र सिंह शेखावत बताते हंै कि मेले के दौरान खुले में शौच जाने वालों को रोकना चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन इसका समाधान भी है। हाल ही मध्यप्रदेश के उज्जैन में कुंभ के मेले में बड़ी संख्या में अस्थायी शौचालय बनाए गए थे जबकि वहां तो गोगामेड़ी से ज्यादा श्रद्धालु आए थे। ऐसी व्यवस्था यहां भी हो सकती है।
हरी झंडी मिले तो तैयार है संस्था 
गोगामेड़ी में स्वच्छता बनाए रखने की दिशा में काम करने के लिए हरियाणा के सजग भारत फाउंडेशन ने पहल की है। फिलहाल इस संस्था के पचास कार्यकर्ता गोगामेड़ी के रेलवे स्टेशन पर सेवा दे रहे हैं। संस्था की ओर से रेलवे स्टेशन पर 24 स्नानघर एवं 48 शौचालय जल्द संचालित किए जाएंगे। यह अस्थायी होंगे। संस्थान से जुड़े आनंद आर्य कहते हैं कि उनकी संस्था नि:शुल्क रूप से यह काम करती है। अगर प्रशासन की तरफ से उनको बिजली एवं पानी की मदद मिल जाए तो वे मेले में श्रद्धालुओं के लिए शौचालय की वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते हैं। आर्य कहते हैं कि इस काम के लिए उन्होंने प्रशासन से संपर्क भी किया लेकिन वहां से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई जबकि रेलवे ने उनको फटाफट स्वीकृति दे दी।  रेलवे के अधिकारियों का सहयोग भी उनको मिल रहा है।
खुले में शौच जाने के दुष्परिणाम
व्यक्ति के एक ग्राम मल से एक करोड़ वायरस फैलते हैं। 
 एक व्यक्ति से मल से तीन किलोमीटर का क्षेत्र संक्रमित 
होता है। 
मल से रोटा वायरस फैलता है, जिससे गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं। -अगर बारिश आ जाए तो संक्रमण फैलने की गति चौगुनी हो जाती है।
इस वायरस के पीडि़तों में डायरिया, उल्टी-दस्त, हैजे की आशंका बढ़ जाती है। 
 डायरिया से भारत में हर साल चार लाख बच्चों की मौत हो जाती है।
गोगामेड़ी में कहां कितने शौचालय 
गोगाणा-450
धर्मशालाओं में -400
नोहर रिलीफ सोसायटी में-350
अस्थाई-250
सुलभ शौचालय-200
बस स्टैंड-40
रेलवे स्टेशन -12
ग्राम पंचायत-50

ऐसा तालाब जिसके पानी से दूर होते हैं चर्मरोग

श्रीगंगानगर. 

भला तालाब के पानी से कभी रोग दूर हो सकते हैं? यह बात सुनने में अजीब लगे है लेकिन जिले के ढाबां झलार गांव के लोगों के लिए हकीकत है। गांव और आसपास के लोगों के लिए पड़पाटा धाम के तालाब का पानी  किसी चमत्कार से कम नहीं है। गांववालों के अनुसार दैवीय चमत्कार से फटी धरती के कारण यह तालाब बना, इसलिए यह अपने आप में अनूठा है। 

गांव के लोग हर माह अमावस्या को यहां आते हैं लेकिन भाद्रपद अमावस्या को यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है। विशेषकर महिलाओं की संख्या यहां ज्यादा होती है। यहां आने वाले लोग झाडू लेकर आते हैं। इसके बाद तालाब के किनारे बैठकर हाथ-पैर धोते हैं। मान्यता है तालाब का पानी शरीर पर लगाने से चर्मरोग दूर हो जाते हैं। श्रद्धालु साथ लाई झाडू यही अर्पित करके जाते हैं। इसके बाद तालाब के ठीक सामने बने शिव मंदिर में जाते हैं। यहां अनाज एवं चावल की खिल्ली चढ़ाई जाती है। शिव मंदिर के पास श्रद्धालु गुरुद्वारे में शीश नवाते हैं। ढाबां झलार के लोगों की पड़पाटा धाम के प्रति गहरी आस्था है और हर सम्प्रदाय के लोग पड़पाटा धाम समिति से जुड़े हुए हैं। मेले में समिति के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता हर तरह की व्यवस्था बनाने में सहयोग करते हैं। 

मेले में सजती हैं दुकानें
पड़पाटा धाम पर लगने वाले मेले में दुकानें भी सजने लगी है। विशेषकर इन दुकानों पर मनिहारी का सामान सस्ती दर पर सुलभ हो जाता है। इसके अलावा मनोरंजन के लिए यहां झूले भी लगने लगे हैं। इस बार तो यहां मोटरसाइकिल बिक्री की स्टॉल भी लगी थी। मेले में न केवल ढाबां झलार बल्कि आसपास के गावों के लोग भी आते हैं और दिन भर चलने वाले सत्संग का आंनद लेते हैं। 

अचानक से फटी धरती और समा गया सारा पानी, ढाबां झलार गांव में आज भी हैं निशां बाकी

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 बरसात जोरों से बरस रही थी। पानी इतना बरसा कि घरों में चार-चार फीट पानी भर गया। पूरा गांव डूबने की कगार पर था। परेशान लोग भगवान से बारिश थमने की फरियाद कर रहे थे। अचानक तेज धमाका हुआ और गांव का पानी उतरने लगा। थोड़ी ही देर में गांव का सारा पानी गायब हो गया। गांव वालों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, क्योंकि उनके लिए यह नजारा किसी चमत्कार से कम नहंी था।  यह कोई फिल्मी कहानी नहीं बल्कि हकीकत की घटना है। जिले के ढाबां झलार गांव में 58 साल पहले सितम्बर माह में इस तरह का चौंकाने वाला वाकया घटित हुआ था। तेज बारिश के कारण गांव डूबने की कगार पर पहुंच गया था। गांव की पूर्व दिशा में अचानक से तेज धमाका हुआ और करीब चार बीघा में धरती फट गई और सारा पानी उसमें समा गया। इसे दैवीय चमत्कार मान ग्रामीण उस स्थान की पूजा करने लगे, तब से हर साल भाद्रपद अमावस्या को मेला लगता है और दिन भर धार्मिक आयोजन व संत्सग होते रहते हैं। इस समूचे आयोजन के लिए गांव पड़पाटा धाम समिति व्यवस्था करती है। साल दर साल यहां सुविधाओं का विस्तार होता जा रहा है। मेले में आसपास के गांवों के हजारों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। 
साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल
जहां जमीन फटी थी, उस जगह का नाम पड़पाटा धाम है। पड़पाटा धाम साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल है। वैसे भी ढाबां झलार में हर सम्प्रदाय के लोग हैं और सभी की पड़पाटा धाम में गहरी आस्था है। धाम में शिव मंदिर है तथा गुरुद्वारा भी है। इसके अलावा फटी जमीन के निशां बाकी है जो अब एक जोहडनुमा छोटे तालाब का रूप अख्तियार कर चुकी है। इसमें बरसाती पानी भरा रहता है। श्रद्धालु यहां झाडू चढ़ाते हैं। 

कमाल की आस्था, यहां चढ़ते हैं झाडू और नमक

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आस्था के कई रूप हैं तो आराध्य को प्रसन्न करने के विविध तरीके। हर जगह की अपनी विशेषता एवं इतिहास होता है। कहीं अनूठा तो कहीं परम्परागत। कहीं पूजा की विधि चौंकाने वाली होती है तो आराध्य को चढऩे वाला प्रसाद। जिले की सूरतगढ़ तहसील के अधीन आने वाले गांव ढाबां झलार का पड़पाटा धाम भी कई तरह की अनूठी विशेषताएं समेटे हुए हैं। धाम के तालाब के बनने की कहानी तो रोचक है ही। इस तालाब के पानी से चर्मरोग दूर होने की मान्यता भी किसी अचूबे से कम नहीं। इन सबके अलावा यहां एक और खास बात है जो चौंकाती है, वह है यहां चढऩे वाला प्रसाद। 

तालाब में हाथ-पैर धोने से पहले श्रद्धालु यहां प्रसाद के रूप में नमक, झाडू और अनाज चढ़ाते हैं। वैसे तो हर माह प्रत्येक अमावस्या को श्रद्धालु उमड़ते हैं लेकिन भाद्रपद अमावस्या को यहां हजारों लोग जुटते हैं। ऐसे में तालाब के पास झाडू, नमक एवं अनाज का ढेर लग जाता है।  पड़पाटा धाम के तालाब के बारे में मान्यता है कि इसके पानी से हाथ-पैर धोने से चर्म रोग दूर होते हैं। श्रद्धालु इस तालाब के पानी को बोतलों में भरकर अपने घर भी ले जाते हैं। झाडू एवं नमक के चढ़ावे के पीछे वजह ग्रामीण नहीं बता पाते। उनका कहना है  यह परम्परा लंबे समय से चली आ रही है। 

ढाई से तीन हजार झाडू 
पड़पाटा धाम की तमाम व्यवस्थाओं की देखरेख करने वाली पड़पाटा धाम सेवा समिति के अध्यक्ष सेवाराम धतरवाल बताते हैं कि भाद्रपद अमावस्या को तालाब के किनारे झाडुओं का ढेर लग जाता है। करीब दो क्विंटल झाडू एक ही दिन में एकत्रित हो जाती है। इनकी संख्या ढाई से तीन हजार के बीच होती है। नमक व अनाज भी बड़ी मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं। इसके अलावा हर माह अमावस्या को भी यहां डेढ सौ के करीब झाडू चढावे के रूप में आते हैं।

स्कूलों व मंदिरों में दे देते हैं झाडू
पड़पाटा धाम पर आने वाली झाडुओं को स्कूलों एव मंदिरों में वितरित कर दिया जाता है। इसके अलावा नमक को गोशालाओं में भिजवा दिया जाता है। चढ़ावे के रूप में आने वाले चढावे का समिति बेचान कर उस राशि को धाम के रखरखाव के नाम पर होने वाले कार्यों में खर्च करती है।