Wednesday, December 28, 2016

तह तक जाना जरूरी

टिप्पणी 
बीकानेर जिले के छतरगढ़ उपखण्ड के कस्बे सत्तासर में हथियार बनाने का कारखाना पकडऩा पुलिस के लिए बड़ी कामयाबी हो सकती है लेकिन संवदेनशील क्षेत्र में इस तरह हथियार बनाने का साजो सामान मिलना कहीं न कहीं व्यवस्था में सुराख भी है। सत्तासर से अंतरराष्ट्रीय सीमा की दूरी बामुश्किल पचास-पचपन किलोमीटर होगी। पुलिस के अनुसार सत्तासर कस्बे की एक पंक्चर की दुकान में यह हथियार बन रहे थे। चौंकाने वाली बात तो यह सामने आ रही है कि हथियार बनाने का गोरखधंधा काफी समय से चल रहा था। संभवत: यह खेल बेखौफ व बेरोकटोक ही चल रहा था, क्योंकि इतने लंबे समय तक कानून व पुलिस की आंखों में धूल झौंकना संभव नहीं लगता। किसी तरह की मिलीभगत या तालमेल से घालमेल करने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। हथियार बनाने का यह गैरकानूनी खेल बदस्तूर चलते रहना और किसी को कानों-कान खबर तक नहीं होने की बात शायद ही किसी के गले उतरे।
आरोपित का अचानक ही कब्जे में आना, सब कुछ हाथों-हाथ उगल देना तथा फटाफट ही हथियार बनाने का कारखाना पकड़ लेना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। ऐसे में यह समूची कार्रवाई भी संदिग्ध व संदेह के घेरे में नजर आती है। वैसे सरेआम हथियार बनाने का खेल हमारी व्यवस्था पर सवाल उठाता है। उसको कठघरे में खड़ा करता है। सवाल भी एक दो नहीं बल्कि कई तरह के हैं। मसलन छोटे से कस्बे में यह हथियार बनते रहे हैं और किसी को खबर तक नहीं हुई? इस दुकान के आगे से गुजरने वाले आंखें बंद करके गुजरते रहे? आरोपित अकेला ही इतने बड़े कार्य को अंजाम देता रहा? किसी ने इस काले कारोबार के खिलाफ कभी आवाज ही नहीं उठाई? यदि उठाई तो कहीं अनसुनी या दबा तो नहीं दी गई? क्या वह इतना शातिर था कि जो गुपचुप तरीके से अपना काम करता रहा ? क्या आरोपित हथियार कहीं और बनाता था और यहां लाकर बेचता था? कहीं इस खेल में कोई बड़ा गिरोह तो नहीं? क्या पकड़ा गया आरोपित महज मोहरा तो नहीं? खैर, इस प्रकरण से जुड़े सवाल और भी हैं और जांच के दायरे में शामिल करने के लायक भी। जैसे यहां से बने हथियार कहां-कहां गए? क्या इस खेल में और भी चेहरे हैं? कानून के रखवाले इस दुकान से अनजान कैसे बने रहे? क्यों उसकी गतिविधियों पर किसी को शक नहीं हुआ? यह सवाल सभी के जेहन में हैं, लिहाजा इन सबकी तह तक जाना जरूरी है। सबका खुलासा होना तो बेहद जरूरी है। जाहिर सी बात है कि इस खेल में कहीं न कहीं घालमेल और तालमेल है। व्यवस्था से जुड़ी कोई न कोई कमजोर कड़ी जरूर है। नोखा क्षेत्र का रहने वाला आरोपित छतरगढ़ के पास सत्तासर में जाकर यह सब कर रहा है तो मान लेना चाहिए कि इस खेल की जड़ों ने गहरे तक घुसपैठ कर रखी है।
बहरहाल, इस समूचे प्रकरण को हथियार तस्करी से जोड़ कर भी देखा जाना चाहिए। जिस तरह बीकानेर अवैध हथियारों की मंडी बना है वह किसी से छिपा नही है। हथियार तस्करी से जुड़े प्रकरण अक्सर सामने आते रहते हैं। लेकिन जिस अंदाज में आधुनिक एवं देसी हथियारों की बरामदगी होती रही है तथा हो रही है उससे लगता है कि बेचने व खरीदने वालों में किसी तरह का भय नहीं है। जि मेदारों को तस्करी व तालमेल के इन तारों को तोडऩे का तरीका जल्द खोजना होगा। ऐसा न हो सिरदर्द बना हथियार तस्करी का यह खेल कहीं लाइलाज मर्ज बन जाए और बीकानेर जैसे शांत व सीमा से सटे इलाके का अमन-चैन भंग कर दे।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 17 जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित

जागरूकता की मशाल

 टिप्पणी

नि:संदेह यह बदलाव की बयार है। यह बयार है नेतृत्व करने की। सकारात्मक सोच के साथ अपनी बात मुखरता से रखने की तथा उसे पूरा करवाने की। यह एक नई सुबह है, जागृति का नया बिगुल फूंकने की और जनजागरण की। यह सुखद पहल है, शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा करने की। उनसे जवाबदेही तय करने की। बदलाव का यह बीड़ा उठाने वाले उत्साही एवं ऊर्जावान युवा हमारे ही शहर बीकानेर के हैं। इन युवाओं की नई सोच, नई राह दिखाती है, उम्मीद की किरण जगाती है। बीकानेर का युवा जंग लगी व्यवस्थाओं को ठीक करने/ करवाने का माद्दा रखता है। वह शहर की चिंता करता है। जनहित के लिए आगे आता है। युवाओं को एकजुटता के सूत्र में पिरोने की पहल करता है। हालिया उदाहरणों से यह जाहिर भी हुआ है कि बीकानेर का युवा अब मुखर हो रहा है। बदहाल यातायात हो, चाहे पीबीएम की पटरी से उतरी व्यवस्थाएं। उजड़े पार्क हो चाहे, तकनीकी विवि का मसला। बीकानेर का युवा भली भांति जान चुका है कि पुराने नेतृत्व के भरोसे अब नहीं रहा जा सकता। युवाओं की ऐसी ही नई पहल से यह लगने लगा है कि बीकानेर का आने वाला कल उजला है। इसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं। काम करने का जज्बा और जागरूकता की ज्योत इसी तरह प्रज्ज्वलित होती रही तो यकीनन न केवल शहर का भला होगा बल्कि कुंद पड़े विकास कार्यों को भी गति मिलेगी।
 स्वामी विवेकानंद जयंती यानी राष्ट्रीय युवा दिवस के उपलक्ष्य में राजस्थान पत्रिका की ओर से बीकानेर की समस्याएं और समाधान विषय पर आयोजित परिचर्चा में शहर के युवाओं ने जिस बेबाकी व जोश के साथ अपने विचार साझा किए वो काबिलेतारीफ हैं। युवा दिवस पर युवाओं ने जो संकल्प लिया वह नि:संदेह विकास की नई इबारत लिखने में सहायक होगा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि 'युवा वह है जो अनीति से लड़ता है। जो दुर्गुणों से दूर रहता है। जो काल की चाल को बदल देता है। जिसमें जोश के साथ होश भी है। जिसमें राष्ट्र के लिए बलिदान की आस्था है। जो समस्याओं का समाधान निकालता है। जो प्रेरक इतिहास रचता है तथा जो सिर्फ बातों का बादशाह नहीं बल्कि करके दिखाता है। यकीनन यह सारी बातें बीकानेर के युवा में है। जरूरत है कि वह शहरहित एवं राष्ट्रहित के लिए रचनात्मक काम करे।
 अगर आगाज अच्छा है तो यकीनन अंजाम भी परिणाममूलक ही होगा। उम्मीद है बीकानेर का युवा स्वामी विवेकानंद के उन विचारों से और अधिक प्रेरणा लेगा, जब उन्होंने कहा था कि ' सभी कमजोरी, सभी बंधन मात्र कल्पना है। कमजोर ना पड़ें। मजबूती के साथ खड़े हो जाओ। शक्तिशाली बनो। आपके भीतर अनंत शक्ति है। उठो जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। क्योंकि 'आप जैसे विचार करेंगे, वैसे आप हो जाएंगे। अगर अपने आपको निर्बल मानेंगे तो आप निर्बल बन जाएंगे और यदि आप अपने आपको समर्थ मानेंगे तो आप समर्थ बन जाएंगे। जागरूकता की मशाल रोज रोशन रहे इसलिए जरूरी है कि हर दिन को युवा दिवस माना जाए।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर में 13 जनवरी 2016 को प्रकाशित

भोलापन

मेरी 16वीं कहानी

उसके घर पर दो मोबाइल थे। एक पत्नी के पास जबकि दूसरा नंबर उसके माता-पिता के पास। माता-पिता का नम्बर उसकी फोन बुक में होम के नाम से सेव था जबकि पत्नी वाला नम्बर होम-2 के नाम से। एक दिन वह नई सिम लेकर आया। माह भर होने का आया। आखिरकार एक दिन, नए नंबरों की सुध ले ली गई। अरे सुनो तो, आपने जो नया नंबर लिया है वो बताना तो। पत्नी ने जब यह सवाल किया तो पति चौंक गया। उसने कहा, तुम भी गजब हो कितने दिन हो गए नंबर लिए और तुमको पता ही नहीं है। पत्नी बोली, आपने दिया ही कब था? और हां नए नंबरों के बारे में अपने परिचितों, रिश्तेदारों एवं मित्रों को भी बता दो। बेफिक्र होते हुए पति ने जवाब दिया, अभी तो ऑफिस वाले से काम चल रहा है जब जरूरत पड़ेगी, तब बता देंगे। खैर, पति ने पत्नी के मोबाइल पर मिस्ड कॉल दी और पत्नी ने उसे सेव कर लिया। थोड़ी देर बाद पत्नी बोली देखो मैंने आपका नंबर सेव कर लिया। पति ने जिज्ञासा से पूछा तो पत्नी से झट से मोबाइल आगे कर दिया। मोबाइल की स्क्रीन पर पतिदेव-2 डिस्पले हो रहा था। नाम देखकर वह मुस्कुराया और पत्नी से कहा जानती हो क्या लिखा है? पत्नी खामोश, लेकिन थोड़ी देर बाद जोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ी। फिर तो दोनों हंस रहे थे, पर दोनों की हंसी के अर्थ अलग थे।

पुलिसवाला

मेरी 15वीं कहानी
तीखे नयन नक्श तथा गठीले शरीर वाला वह नौजवान बड़े ही आत्मविश्वास के साथ मेरे पास आया। उसने आते ही पूछा ' अशोक जी, आप ही हैं?' मैंने असहमति में सिर हिलाया और बगल में बैठे युवक की तरफ इशारा कर दिया। दरअसल, अशोक मेले की व्यवस्था देखने वाले का नाम था लेकिन उस वक्त वह अपनी सीट पर मौजूद नहीं था जबकि मैं उसकी बगल वाली सीट पर बैठा था। मेरा इशारा भांपकर उसने पड़ोस में बैठे युवक से भी यही सवाल दागा तो उसने कहा, हां बोलिए क्या काम है। वह बोला मैं पुलिस में हूं। मेरे को दो जनों के लिए झूले का पास चाहिए। बैठे हुए युवक ने थोड़ी तल्खी दिखाते हुए कहा, अच्छा पुलिस वाले हो। जरा अपना आईडी कार्ड तो दिखाइए। इतना कहते ही नौजवान की आंखों में चमक आ गई। उसने फट से अपना पर्स टटोला और उसमें कार्ड निकाल कर दिखा दिया। युवक ने संतुष्ट होने के बाद सहमति में सिर हिलाया। उस नौजवान को तो जैसी मुंह मांगी मुराद मिल गई थी। बैठे हुए युवक ने कड़क आवाज में फिर कहा, सुनो केवल एक झूला ही निशुल्क रहेगा। युवक हां कहता हुआ झूले की तरफ बढ़ गया जबकि मैं सब देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।

जागने का वक्त

टिप्पणी
नया साल, नए सपने व संकल्प ले आ रहा है। बड़ी बात तो यह है कि इस बार सपने साकार होने की प्रबल उम्मीद है। इसका कारण है कि प्रदेश स्तरीय गणतंत्र दिवस समारोह के सिलसिले में राज्य सरकार खुद बीकानेर आ रही है। इससे पहले भी भाजपा राज्य सरकार गत कार्यकाल में प्रदेश स्तरीय स्वाधीनता दिवस यहां मना चुकी है। करीब डेढ़ साल पहले सरकार आपके द्वार के तहत यहां मुख्यमंत्री सहित समूचा मंत्रिमंडल दस्तक दे चुका है। फिलहाल गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियां व्यापक स्तर पर चल रही हैं। प्रशासन के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी यकायक सक्रिय हो गए हैं। तैयारियों के बहाने कई लंबित मुद्दे यकायक चर्चा में आ गए है। वैसे तो बीकानेर में बुनियादी समस्याओं से ले बड़े स्तर की कई समस्याएं हैं। फिर भी रेल फाटक ,समस्या, तकनीकी विवि की पुनसर््थापना व बीकानेर से हवाई सेवा यात्रा शुरू होना सहित करीब डेढ़ दर्जन मसले हैं जो पूरे हो जाएं तो बीकानेर की तस्वीर बदल जाए। फिलहाल ये कमजोर राजनीतिक नेतृत्व एवं दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में अटके हुए हैं। सामूहिक प्रयासों का भी अभाव रहा।
कमजोर कड़ी यह रही है कि जनता अपने प्रतिनिधियों के भरोसे रही और प्रतिनिधि समस्या न तो प्रभावी तरीके से उठा पाए और न ही हल की दिशा में कारगर प्रयास करा पाए। रेल फाटकों की समस्या तो लंबे समय से नासूर बनी हुई है। जयपुर में मेट्रो ट्रेन सहमति पत्र बनने व ट्रेन संचालन में मात्र पांच साल का समय लगा। मेट्रो का मार्ग कैसे बना, कितने ओवर ब्रिज बने सबके सामने है। इससे यह तो जाहिर है कि सरकार चाहे तो मुश्किल कुछ भी नहीं है। रेल फाटक समस्या हल के नाम पर कभी बाईपास तो कभी एलीवेटेड रोड के नाम पर चर्चाएं चलती रही, आंदोलन होते रहे, लेकिन निचोड़ नहीं निकला। रेलफाटकों का मामला वैसे हाईकोर्ट में विचाराधीन है और जो लोग इस मामले के पीछे हैं वो बाईपास को सर्वाधिक उपयुक्त हल बता रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं आज नहीं तो कल बाईपास ही हल है तो यह तैयार कब तक होगा। इसेे बनाने में कितना वक्त लगेगा। इस पर सब चुप हैं। जब तक बाइपास नहीं बने तब तक क्या सरकार मूकदर्शक बने लोगों को धक्के खाते देखती रहेगी या कोई विकल्प भी तैयार करेगी।
कुछ ऐसा ही हाल नाल स्थित हवाई अड्डे का है। जितनी जल्दबाजी एवं तत्परता उसको तैयार करने में एवं उद्घाटन करने में दिखाई गई वैसी अब नहीं है। तकनीकी विवि का हश्र तो किसी से छिपा नहीं है।
बहरहाल, भाजपा राज्य सरकार पूरे लवाजमे के साथ तीसरी बार बीकानेर आ रही है। अब तक तो यही देखा गया है कि सरकार के पगफेरे से सूरसागर की सूरत जरूर चमक जाती है। रंगरोगन हो जाता है, फव्वारे चल जाते हैं, लेकिन आम जन की जरूरतों से जुड़े मुद्दों पर ठोस काम के बजाय बयानबाजी हो रह जाती है। सरकार को चाहिए कि जनहित से जुड़े मसलों को गंभीरता से ले क्योंकि जनप्रतिनिधियों से उम्मीद की आस लगाए बैठे लोगों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। इसकी सुगबुहाहट भी शुरू हो गई है। ऐसा होना भी चाहिए। सही में यह जनता के जागने का वक्त है। अब तक जन समस्याओं को लेकर प्रदर्शन टुकड़ों में या प्रायोजित होते आए हैं। अगर इन प्रदर्शनों ने एकजुटता का रूप धारण कर लिया तो सरकार के लिए चुनौती पैदा हो सकती है। जनता जाग रही है, लिहाजा सरकार को भी जागना चाहिए। देर बहुत हो गई है। सरकार को चाहिए कि वह बीकानेर से जुड़े इन सपनों को साकार करे ताकि शहर की सूरत बदले। नए साल का मौका भी है।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर में एक जनवरी 2016 को प्रकाशित

Tuesday, December 29, 2015

विकल्प

मेरी 14वीं कहानी 

'सर, कल मेरी शादी की वर्षगांठ है, इसलिए मैं कार्यालय नहीं आ पाऊंगा।' एक ही सांस में यह सब बोलने के बाद बैंक का बाबू उतनी ही तेजी के साथ मैनेजर के कक्ष से बाहर निकला। 'अरे सुनो तो। ' मैनेजर की आवाज कानों में पड़ी तो वह पलटा। मैनेजर की तरफ मुखातिब होते हुए वह बोला। 'जी सर आपने कुछ कहा।' मैनेजर ने कहा 'यार कमाल करते हो। तुम्हारे बच्चे शादी के योग्य हो गए हैं और तुम अब भी वर्षगांठ के नाम पर छुट्टी लेते हो। क्या करोगे ऐसा? कहीं बाहर जा रहे हो क्या ? ' मैनेजर की बातें सुनकर बाबू मुस्कुराने लगा। थोड़ी देर रुकने के बाद मैनेजर फिर बोला 'मेरे को देखो, तुमसे जवान हूं। अभी शादी को भी ज्यादा वक्त नहीं हुआ। मेरी शादी की वर्षगांठ भी पिछले माह ही थी। आपने देखा, मैंने छुट्टी ली क्या? ' मैनेजर के सवाल पर बाबू अपनी हंसी नहीं रोक पाया। वह जोर से ठहाका लगाते हुए बोला ' सर आपकी और मेरी क्या बराबरी। आप की तो मजबूरी है और फिर मेरा तो कार्यालय में विकल्प भी है। आप दूसरे बाबू से भी तो काम चला सकते हो।' इतना कहकर बाबू, मैनेजर के कक्ष से बाहर आ गया। मैनेजर के कानों में रह-रहकर बाबू के मजबूरी और विकल्प वाले शब्द गूंज रहे थे।

ईमानदारी

मेरी 13वीं कहानी

दस मिनट के लिए बस रुकी तो वह नीचे उतरा। तापमान जीरो डिग्री से नीचे था लेकिन वातानुकूलित बस में उसका एहसास नहीं हुआ। बस से बाहर आते ही वह कंपकपाने लगा। तेजी से दुकान की तरफ बढ़ा और गर्मागर्म चाय पलक झपकते ही हलक के नीचे उतार ली। सर्द हवाओं से बचाव के लिए वह फटाफट बस में चढ़ गया। जैसे ही सीट की तरफ बढ़ा, पीछे बैठी खूबसूरत युवती की आवाज से चौंक पड़ा। आवाज आई 'एक्सक्यूज मी सर। आपकी सीट के नीचे आपके रुपए गिरे हैं। ' युवक तेजी से नीचे झुका तो सौ रुपए का नोट सीट के नीचे पड़ा था। उसने नोट उठाया और तत्काल अपना पर्स निकाला। 'जी मेरे तो नहीं है।' उसने युवती की तरफ देखे बिना ही जवाब दिया, लेकिन सौ रुपए का नोट हाथ में था। नोट का क्या किया जाए, तत्काल कोई हल नहीं सूझा। अचानक विचार आया क्यों ना परिचालक को दे दिया जाए। वह फिर बोला ' बस में मिले हैं, इसलिए बस वाले को ही दे देते हैं।' युवती ने भी सहमति में सिर हिला दिया। तभी परिचालक आया उसने सौ रुपए का नोट उसको सौंप दिया। परिचालक की सवालिया नजरों का आशय वह समझ गया था। 'हमारा नहीं है। आपकी बस में ही मिला है, इसलिए रख लो।' परिचालक मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया। मैं चुपचाप यह घटनाक्रम देख रहा था। ईमानदारी के लगातार दो उदाहरण देख खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। साथ ही जेहन में सवाल भी कौंधा, यह ईमानदारी आखिर सभी जगह क्यों नहीं मिलती?

सरप्राइज

मेरी 12वीं कहानी

हाथ जोड़ हुए और चेहरे पर मासूमियत के भाव लिए उसने मेरे कक्ष में प्रवेश किया। मैं उसकी मनोदशा देखकर सोच में डूब गया कि हमेशा हंसमुख रहने वाला मल्टीनेशनल कंपनी का जनरल मैनेजर आज इस तरह के हावभाव में कैसे? वह हाथ जोड़े-जोड़े ही कुर्सी पर बैठ गया। वह कुछ बोलता उससे पहले मैंने ही सवाल दागा, क्या हुआ आनंद जी? आप इतने उदास क्यों हैं? क्या बात हो गई? उसने कहा, सर मेरी धर्मपत्नी शहर में एक क्लिनिक चलाती है। शादी के बाद मैंने उसको बहुत कम समय दिया है। उसका अब 31 दिसम्बर को जन्मदिन आ रहा है और मैं उसको सरप्राइज गिफ्ट देना चाहता हूं। जवाब सुनकर मैं चौंका और मन ही मन बुदबुदाया, सरप्राइज गिफ्ट का भला अखबार से क्या वास्ता। मैंने पूछा, सरप्राइज गिफ्ट आपको देना है तो फिर मेरे को क्यों बता रहे हो और मेरे पास क्यों आए हो। यह तो आप दोनों के आपस का मामला है। वह कुर्सी छोड़ कर खड़ा हो गया और बोला सर प्लीज, मेरी मदद कीजिए। मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह मेरे से किस तरह की मदद की उम्मीद लेकर आया। मैंने हिम्मत बंधाते हुए कहा आनंद जी, घबराइए मत, निसंकोच बताइए। इतना सुनकर वह कहने लगा कि सर, कल विवि में दीक्षांत समारोह है। मेरी धर्मपत्नी को भी उसमें डिग्री मिलेगी। अगर आप उसकी फोटो अखबार में छाप दें तो यह उसके लिए सरप्राइज गिफ्ट होगा। जवाब सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुराया। किसी तरह अपनी हंसी को काबू करते हुए मैं उसको देखता रहा, लेकिन वह तो जैसे ठोस आश्वासन पाने की जिद पर ही अड़ा था। आखिरकार मैंने कहा समारोह तो परसों है ना, कोई नहीं देख लेते हैं। मेरा जवाब सुनकर उसके चेहरे पर खुशी आई और जोश से हाथ मिलाते हुए थैंक्यू सर कह कर वो चला गया पर सरप्राइज गिफ्ट की बात से मैं सरप्राइज था। सोच रहा था क्या-क्या करने लगे हैं लोग।

Friday, December 25, 2015

बयानों के बवंडर कब तक

 मेरी टिप्पणी

तो क्या यह मान लेना चाहिए कि आश्वासनों की रेवडिय़ां अब कारगर नहीं रही। या इस बात पर यकीन कर लिया जाए कि कार्यकर्ताओं को दिलासा देने के सारे रास्ते अवरूद्ध हो गए हैं। लगता तो यही है, कि जनता को संतुष्ट करने वाले तरकश के सारे तीर इस्तेमाल कर लिए गए हैं, तभी तो बीकानेर जिले के प्रभारी मंत्री ने खुद की प्रतिष्ठा से जोड़ते हुए ब्रह्मास्त्र रूपी बड़े बयान का रास्ता इख्तियार किया और उनको कहना पड़ा कि 'अगर काम नहीं हुए तो वे इस्तीफा दे देंगे। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी भी है कि प्रभारी मंत्री को इस तरह का बयान देने की नौबत आखिरकार आई ही क्यों? क्या कार्यकर्ता अब इससे कम पर संतुष्ट नहीं हो रहे या परम्परागत जवाब सुन सुृन कर उनके कान पक गए और वो अब कुछ नया सुनना चाहते हैं। खैर, कारण जो भी हो लेकिन प्रभारी मंत्री के बयान ने एक नई बहस को जन्म जरूर दे दिया है। कुछ इसी तरह का बड़ा बयान करीब पौने दो साल पहले बीकानेर में सरकार आपके द्वार अभियान के दौरान प्रदेश के चिकित्सा मंत्री ने भी दिया था। उन्होंने पीबीएम अस्पताल का निरीक्षण करते समय व्यवस्थाओं में सुधार के लिए अस्पताल में सर्जरी की जरूरत बताई थी। पीबीएम की व्यवस्था कितनी सुधरी? वहां आज के हालात किस तरह के हैं? मंत्री के बयानानुसार सर्जरी की दिशा में कितना काम हुआ? इन सब सवालों के बारे में शहर का हर प्रबुद्ध एवं जागरूक शख्स जानता है।
वैसे भी बीकानेर शहर के हालात किसी से छिपे हुए नहीं हैं। प्रदेश सरकार के दो साल तथा स्थानीय निगम का एक साल होने के बाद भी शहर व जिले में कोई उल्लेखनीय काम दिखाई नहीं देता। इसके बावजूद प्रभारी मंत्री अस्सी फीसदी काम होने का दावा करते हैं। अगर वाकई उनके दावों में दम है तो फिर शेष बीस प्रतिशत के लिए जनता के बीच जाने की मजबूरी क्यों आन पड़ी? और अगर वो सही हैं तो फिर उनके ही दावों की हवा उनकी पार्टी के लोग ही क्यों निकाल रहे हैं?
खैर, प्रभारी मंत्री सरकार के दो साल पूर्ण होने के बाद जिले के आला अधिकारियों के साथ विधानसभा क्षेत्रों में जाने तथा आमजन के अभाव अभियोग सुनने की बात कहते हैं। जनप्रतिनिधि को जनता के बीच जाना भी चाहिए, ताकि वास्तविकता का पता लग सके। जिले के साथ-साथ लगे हाथ उनको बीकानेर शहर का भ्रमण भी कर लेना चाहिए। बिलकुल अपने हिसाब से एकदम औचक निरीक्षण की तर्ज पर शहर में घूमना चाहिए ताकि वो अपनी आंखों से वह सब देख सके जो अधिकारी उनको दिखाना नहीं चाहते। प्रभारी मंत्री रात को अंधेरे में डूबे शहर का हाल भी जान लें तो उनको हकीकत पता लगेगी कि वास्तव में कितना काम हुआ है। यह सब इसीलिए भी जरूरी है क्योंकि समूचे शहर की समस्याओं से वाकिफ हुए बिना, उनको महसूस या देखे बिना तो इसी तरह के दावे किए जाते रहेंगे।
बहरहाल, बीकानेर की बदहाली बयानों से दूर नहीं होगी। बयानों की बारिश से भी अब भला नहीं होने वाला। बयानों के बवंडर में जनता को भरमाना किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। दो साल पूर्ण होने के मौके पर बेहतर है बीकानेर को बेनजीर बनाने के ठोस एवं कारगर प्रयास हों। बचकाने एवं बेचारगी भरे बयानों से जनता वैसे ही आजिज आ चुकी है। उसकी सहनशीलता एवं धैर्य की परीक्षा लेने से अब बचना चाहिए। सरकार को अब ऐसा कुछ करना चाहिए कि आमजन को महसूस हो कि वाकई 'अच्छे दिन' चल रहे हैं।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 09 दिसम्बर 15 के अंक में प्रकाशित

अब बातें नहीं, काम हो

 टिप्पणी

शहर की सरकार ने दौड़ते-हांफते आखिरकार एक साल का समय पूरा कर ही लिया। सियासी उठापटक एवं विरोध प्रदर्शनों के बीच बीते साल में निगम के हिस्से में उपलब्धि कम विवाद ज्यादा आए। शहर के हालात के मद्देनजर कार्यकाल को लेकर किए जा रहे दावे, प्रतिदावे एवं सर्वे कुछ मायने नहीं रखते, क्योंकि बीमार, खस्ताहाल एवं विकास की बाट जोह रहे शहर की सूरत में रत्ती भर का भी बदलाव किसी भी स्तर पर नजर नहीं आता है। विशेष एवं बड़ी उपलब्धि के नाम पर पूर्ववर्ती बोर्ड की कथित अव्यवस्थाओं को सुधार कर व्यवस्था को पटरी पर लाने की बात भी गले नहीं उतरती। रोडलाइट का काम देखने वाली एजेंसी जरूर बदली है लेकिन शहर की राहें कितनी जगमग है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। जिन गली एवं मोहल्लों में साल भर पहले अंधेरा पसरा था, वहां आज भी अंधेरा ही है। आवारा पशुओं की समस्या यथावत है। समाधान के लिए जो बातें साल भर पहले कही गई, वैसी ही अब की जा रही है। अंतर इतना है कि पहले जमीन देखने की बात कही गई और अब कांजी हाउस की। सीवरेज लाइन बदलने की बात साल भर पहले भी कही गई और अब भी की जा रही है। मतलब आवारा पशुओं व सीवरेज पर सिवाय बयानबाजी के कोई काम नहीं हुआ। अब आगामी प्राथमिकताओं में शहर में सिटी बस चलाने एवं ऐलीवेटेड रोड बनाने की बात सामने आ रही है, लेकिन मौजूदा हालात एवं निगम के कामकाज करने के अंदाज से यह काम करवाना बड़ी चुनौती है। चुनौतीपूर्ण इसलिए भी है कि छिटपुट समस्याएं मसलन, सफाई व्यवस्था, नालियों की सफाई, टूटे चै बर आदि ठीक करवाने में ही अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।
शहर में अतिक्रमण एवं अवैध कब्जों को लेकर निगम प्रशासन कभी गंभीर नजर नहीं आया। कभी-कभार रस्मी तौर पर की गई कार्रवाई भी विवादों की भेंट चढ़ गई। फड़बाजार का उदाहरण सामने है। रिहायशी मकानों में व्यवसायिक गतिविधियां संचालन होने की शिकायतों पर लगाम नहीं लगी। निगम की आय बढ़ाने के गंभीरता से प्रयास नहीं हुए। पार्किंग व्यवस्था बदहाल है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि दो-दो साल से खुदी हुई सड़कों की सुध तक नहीं ली जा रही है। निगम में कमेटियों का गठन भी काफी विल ब से हुआ। जैसे-तैसे हुआ भी तो 16 में से मात्र तीन कमेटियों की बैठकें हो पाई हैं। शहर में खर्च की गई राशि भी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। काम भी नाली, सीसी ब्लॉक जैसे ही हुए हैं। जनहित से जुड़ी समस्याओं को लेकर विपक्ष ने साल भर महापौर एवं अधिकारियों को खरी- खोटी सुनाने तथा प्रदर्शन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उनके विरोध भी को भी दरकिनार कर दिया गया।
बहरहाल, बोर्ड के गठन के समय महापौर ने जनता के बीच सक्रिय रहकर जनता के साथ मिलकर काम करने की जो बात कही थी, वह एक साल बाद भी पूरी होती नजर नहीं आ रही। समन्वय एवं सहयोग का अभाव हर जगह दिखाई दिया। विपक्ष ही नहीं सत्ता दल के लोग भी अंदरखाने शह-मात का खेल खेलते नजर आए। विकास व सकारात्मक राजनीति के बजाय सस्ती वाहवाही लूटने के प्रयास ज्यादा हुए। अब उ मीद की जानी चाहिए कि शहर हित में पक्ष-विपक्ष दोनों सहयोग करेंगे, ताकि बीमार शहर की हालात में सुधार हो। अभी भी काफी समय शेष है। बस काम करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। जनहित को दरकिनार कर अगर निगम इसी तरह सियासी अखाड़ा बना रहा तो फिर विकास की बात करना बेमानी है। विकास कार्यों को हमेशा राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत छोडऩी होगी, यही शहर के हित में है और जनता के भी।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 28 नवम्बर 15 के अंक में प्रकाशित

दिलवाले

रिश्ता दिल का दिलवाले ही तोड़ जाते हैं,
नाता गमों से दिल का जोड़ जाते हैं।
खुद पर भरोसा करने का हुनर सीख लो दोस्तो,
सहारे कितने भी सच्चे हो साथ छोड़ ही जाते हैं।
करते हैं जो जिंदगी भर साथ निभाने का वादा,
मतलब निकलने पर अकेले ही दौड़ जाते हैं।
कितना यकीनं करें कोई उस माझी पर 'माही'
सफीने का रुख जो तूफानों की ओर मोड़ जाते हैं।

नमन बूढ़ी मां


दादी मां आज ही के दिन हमको छोड़कर गई थी। एक साल बीत गया। सांस-सांस में समाई बूढीमां को याद करके आंख न जाने कितनी ही बार नम हुई है। पापाजी तो इस हादसे से अभी तब उबर नहीं पाए हैं। जब भी अकेले होते हैं, तो मां को याद करके रोने लगते हैं। कितनी ही बार मैंने खुद को संभालते हुए उनको भी दिलासा दिया है। लेकिन अपनों के जाने का दुख भला कभी कम होता है। मैं खुद ही एक दिन आफिस में इतना भावुक हो गया कि आंखों से टपाटप आंसू गिरने लगे। चाह कर भी खुद रोक नहीं पाया। अविरल धारा बहती रही। कई बार तो महसूस होता है कि बूढ़ी मां यहीं है हमारे आस पास। अभी दीपावली पर गांव गया तो पता नहीं क्यों यही लगता रहा कि बूढी मां अपने कमरे में ही सोई हुई है और अभी अंदर से आवाज लगाएगी। वैसे दादी मां के बिना घर में पहली दिवाली थी। हर बार दीपावली पर बूढी मां के नेतृत्व में ही पूजन होता था। खैर, इस सच्चाई को दिल कभी मानेगा भी नहीं। अब भी आंसू बह निकले हैं। पहली पुण्यतिथि पर बड़े भाईसाहब केशरसिंह जी ने श्रद्धांजलि स्वरूप कवितांजलि भेजी है।
हरपल रहती यादों में, संबल साथ सहारा हो,
ना भूले, ना भूलेंगे, मां तुम तो प्यार हमारा हो।
स्वाभिमान, स्नेह, नेकी का पथ हरदम ही दिखलाया,
नमन आपको प्यारी मां, जीने का पाठ पढ़ाया।
चांद सितारों की संगत से नेकी की राह दिखाना,
सुख-दुख हो या ऊंच-नीच धीरज का पाठ पढ़ाना।
प्यारी बूढी मां को दिल की गहराइयों से पहली पुण्यतिथि पर...
नमन बूढी मां, आपको भावभीनी श्रद्धांजलि मां।

आदमी,

आदमी, आदमी से इतना डरता क्यों है
वफा की बात किसी से करता क्यों है
जरा सी भी उमंग नहीं है अगर मन में,
तो फिर घर से बाहर निकलता क्यों है।
सपने तो वो रोज ही देखता है चांद के
माचिस पकडऩे में मगर झिझकता क्यों है।
प्यार की राह पर चलने की देते हैं नसीहतें,
जमाने को फिर यह अखरता क्यों है।
गलत ही सुना है पत्थर दिल होते हैं लोग
तन्हाई में फिर रह-रह के वो मचलता क्यों है।
बड़ा ही पाक है 'माही' रुहों का दोस्ताना,
रिश्ता ये फिर टूट के बिखरता क्यों है

व्यवस्था पर सवाल

 मेरी टिप्पणी 

जरूरी नहीं है कि यह खबर सुनकर चिकित्सा विभाग चौंक ही पड़े या अपनी चूक को दुरुस्त करने के लिए चेत भी जाए, क्योंकि आंकड़ों का अंकगणित तो अक्सर उसकी कार्यकुशलता को सही ही ठहराता आया है। खबर यह है कि बीकानेर जिला कलक्टर डेंगू से पीडि़त हैं, हालांकि चिकित्सा विभाग के लिए यह साधारण व सामान्य सी बात हो सकती है। चिकित्सा जगत में यह सर्वविदित है कि मर्ज कैसा भी हो वह कभी पद व प्रतिष्ठा देखकर किसी को घेरता या ब शता नहीं है, वह किसी को भी हो सकता है। हां, आमजन में जिला कलक्टर का मर्ज न केवल चर्चा बल्कि चिंता का विषय जरूर बना हुआ है। वैसे आमजन की चिंता लाजिमी है। यह चिंता व्यवस्था पर सवाल उठाती है। यह चिंता दावा करने वालों को कठघरे में खड़ा करती है। यह चिंता बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए किए जाने वाले प्रयासों की पोल खोलती है। यह चिंता सरकारी इलाज की हकीकत को बयां करती है। यह चिंता सरकारी तंत्र के भरोसे को तोड़ती है। क्योंकि यह चिंता गलत नहीं है। इस चिंता के साथ-साथ आमजन के जेहन में सहज सा सवाल ाी है कि जब जिला कलक्टर ही मच्छरों से अछूती नहीं तो फिर आमजन की बिसात ही क्या है। उनके कार्यालय एवं आवास तो शहर के साफ सुथरे इलाकों में से हैं फिर बुनियादी सुविधाओं को तरसते एवं गंदगी से बजबजाते उन मोहल्लों का तो भगवान ही मालिक है। और हां, जब कलक्टर के मर्ज का रिकॉर्ड ही सरकारी पन्न्नों में दर्ज नहीं है तो इस विसंगति को समझा जा सकता है। कोई बड़ी बात नहीं है कि विभाग इस मर्ज को बाहर से संक्रमित बताकर अपना पल्ला भी झाड़ ले।
लब्बोलुआब यह है कि शहर के मौजूदा हालात चिंताजनक हैं। साफ-सफाई संतोषजनक नहीं है। गंदे पानी का जमाव कई जगह है। सीवरेज का गंदा पानी सडक़ों पर बहता है। आवारा पशुओं का मल-मूत्र सडक़ों पर पड़ा वातावरण को दूषित करता है। यह भी उन कारणों में शामिल हैं, जो मच्छरों को पनपाने या बीमारी फैलाने के वाहक बनते हैं, लेकिन इन कारणों पर प्रभावी अंकुश के लिए जि मेदारों की तरफ से कोई कारगर पहल नहीं की जाती। अक्सर यही होता आया है कि किसी क्षेत्र में बीमारी की सूचना आने के बाद ही सबंधित विभाग हरकत में आता है, वरना सब भगवान भरोसे ही चलता रहता है। विभाग को यह इंतजार करने की प्रवृति त्यागनी होगी। आग लगने पर कुआं खोदने की मानसिकता बदलनी होगी। बदलते मौसम के हिसाब से उपाय पहले ही कर लिए जाने चाहिए। अब जब समूचा शहर मच्छरों की जद में है तो फोगिंग सभी जगह पर क्यों नहीं करवाई जाती।
बहरहाल, चिकित्सा विभाग की भूमिका से तो ऐसे लगता है कि उसकी एकसूत्री दिलचस्पी आंकड़े कम दिखाने की लगती है। जितने कम आंकड़े होंगे उतनी ही उसकी कार्यकुशलता बेहतर मानी जाएगी। यही प्रमुख कारण है तभी तो वास्तविकता एवं विभाग के आंकड़ों में विरोधाभास है। आंकड़ों के इस खेल में हकीकत का पता कर पाना मुश्किल है। एेसे में मर्ज की गंभीरता भी खत्म हो जाती है और उसको हल्के में ले लिया जाता है। यह बात दीगर है कि विभाग के आंकड़े कम बताने से बीमारी के फैलने या न फैलने पर कोई असर नहीं पड़ता है। हकीकत यही है कि आज भी शहर में डेंगू के कई मरीज हैं, जो चिकित्सा विभाग की नजरों से ‘ओझल’ हैं। इसलिए विभाग को पहले ईमानदारी से सच स्वीकारना चाहिए, भले ही आकंड़ों का अंकगणित गड़बड़ा जाए। वैसे भी इलाज तो बाद की बात है।

 राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 11 नवम्बर 15 (दीपावली) के अंक में प्रकाशित

जिज्ञासा


बस यूं ही
बच्चों के स्कूल में वार्षिकोत्सव 31 व एक को है। पहले दिन छोटे वाले का तो दूसरे दिन बड़े का। दोनों वार्षिकोत्सव में भाग ले रहे हैं, लिहाजा उनके लिए बाजार से ड्रेस किराये पर लेने गया था। ड्रेस लेकर लौट रहा था। होटल ढोला मारू के आगे से निकले तो छोटे बेटे एकलव्य ने पूछा यह क्या है। मैंने बताया कि होटल का नाम है। तो कहने लगा कि ढोला मारू भी कोई नाम होता है क्या। मैंने टालने वाले अंदाज में बताया कि ढोला मारु पति-पत्नी थे। वह बोला, तो वो इतने प्रसिद्ध कैसे हो गए जिनके नाम पर होटल का नाम पडा। मैं सोच में डूब गया कि क्या जवाब दूं। तभी उसने अगला सवाल दागा पापा मेरी क्लास में एक लड़का है वह अपने नाम के आगे मारू लगाता है, वह कौन है। मैंने कहा यह मारू तो सरनेम है। और वह मारू नाम था। वह फिर बोला पापा किसी का नाम मारू हो और वह सरनेम मारू लगाए तो मारू-मारू हो जाएगा ना। मैं उसकी बातों पर हंसने लगा, लेकिन मन ही मन उसके सवालों एवं जानने की इच्छा पर सोच रहा था। वाकई बच्चे कितने जिज्ञासु होते हैं।

...तो नहीं बिगड़ते हालात

 टिप्पणी

तारीख की नजरों ने वो मंजर भी देखे हैं,
जब लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई।
यकीनन बीकानेर जिले के अमन पंसद लोग अब उस घड़ी को कोस रहे होंगे, जब श्रीडूंगरगढ़ कस्बे में जरा सी बात बड़े विवाद की वजह बन गई। किसी ने कल्पना तक भी नहीं की होगी कि डीजे बजने जैसी मामूली बात से शुरू हुआ विवाद बाद में इतना बड़ा होकर आगजनी और पथराव तक पहुंच जाएगा। आखिर ऐसा क्या था, जिसने साथ-साथ उठने-बैठने वालों को एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोलने पर मजबूर कर दिया। मजहब किसी का भी हो वह तो इसांनियत का पाठ ही पढ़ाता है। नेकी की राह दिखाता है। वह तो कभी बैर नहीं सिखाता, फिर क्यों लोग एक दूसरे की जान के दुश्मन हो गए। बीकानेर जिले के वाशिंदों की शांतिप्रियता एवं सहनशीलता की तोअक्सर नजीरें दी जाती रही हैं, फिर वे इतने उग्र क्यों व कैसे हो गए। इंसानियत व भाईचारे की तो यहां कदम-कदम पर मिसालें मिलती हैं। मानवता के प्रति सेवाभाव यहां का संस्कार है फिर क्यों लोगों का खून इतना उबाल मार गया। इस तरह के सवाल
बहुत से हैं, जो लंबे समय तक लोगों को सालते रहेंगे, कचोटते रहेंगे। 
वैसे इस घटनाक्रम की कल को जांच भी होगी। बात बिगडऩे के कारण भी सामने आएंगे। किसकी भूमिका कैसी रही शायद यह भी बताया जाए, लेकिन यह घटनाक्रम श्रीडूंगरगढ़ के इतिहास के साथ काले अध्याय के रूप में जरूर चस्पा हो गया। कस्बे के नाम के साथ यह भयावह व दर्दनाक मामला एक दस्तावेज की तरह जुड़ गया है, जो चाहते हुए भी कभी अलग नहीं हो पाएगा। जिले के सद्भाव पर जो वज्रपात हुआ है, उसकी भी भरपाई शायद ही हो पाए।
इधर पुलिस व प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। वह इसलिए क्योंकि इस मामले को सुलझाने में जितनी गंभीरता व सतर्कता पुलिस व प्रशासन ने बाद में दिखाई, उतनी समय रहते पहले बरत ली जाती तो शायद हालात इतने विकट नहीं होते। विवाद के तुरंत बाद अगर समझाइश के प्रयास शुरू होते तो इसको नियंत्रित करना काफी कुछ संभव था। शुरू में मामले को हल्के में लिया गया और देर रात जब पुलिस जाब्ता पहुंचा तब तक मामला उग्र होकर नियंत्रण
से बाहर हो गया था। सुबह भी जो मुस्तैदी पथराव व आगजनी के बाद दिखाई गई वैसा पहले कर लिया जाता तो स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं होती। पुलिस व प्रशासन द्वारा अतिरिक्त सतर्कता न बरतने, मामले की गंभीरता को न समझने तथा संवदेनशील मसले को हल्के में लेना भी विवाद बढ़ाने में प्रमुख कारक रहे। 
इन सब के बावजूद बीकानेर का सा प्रदायिक सदभाव गजब है, जिसको मिसाल के रूप में देखा जाता है। एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होना। त्योहारों व पर्वों में समान रूप से सहभागिता करना यहां की पुरातन परंपरा रही है। सेवा शिविर तो सबसे बड़े उदाहरण हैं, जहां मजहब तक गौण हो जाता है और सिर्फ भाईचारा ही भाईचारा दिखाई देता है।खैर, जो हुआ उसकी भरपाई तो अब किसी भी कीमत पर संभव नहीं हैलेकिन इस बात का संकल्प जरूर लिया जा सकता है कि ऐसा भविष्य में फिर ना हो। एेसे में जरूरत है कि सदभाव , अमन चैन एवं गंगा-जमुनी संस्कृति की अनुकरणीय परंपरा को न केवल बनाया रखा जाए अपितु इसको और अधिक प्रगाढ़ और मजबूत करने का प्रयास भी कियाजाए। वैसे भी सदभाव का रिश्ता विश्वास नामक धागे से बंधा होता है। इसलिए विश्वास के इस धागे को अफवाह एव दुष्प्रचार जैसे दुश्मनों से बचाना सबकी प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। बीकानेरवासियों की अपणायत देखते हुए यह संभव भी है। इधर, पुलिस व प्रशासन को भी इस प्रकार के घटनाक्रम से सबक लेना चाहिए एवं समय रहते चेत जाना चाहिए।
 राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 25 अक्टूबर 15 के अंक में प्रकाशित 

शर्म इनको मगर आती नहीं


 टिप्पणी

बीकानेर में जनहित के बड़े काम तय समय सीमा में पूरे होने की
तो कल्पना ही क्या की जाए, जब अच्छी खासी मशक्कत एवं पसीना बहाने के
बाद भी छोटे-छोटे काम ही नहीं होते। सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते फरियादियों की चप्पलें भले ही घिस जाएं, लेकिन
अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। उनके पत्थर दिल
को जरा सा भी तरस नहीं आता। कहने को पीडि़तों के प्रार्थना पत्र
जरूर रख लिए जाते हैं, पर कार्रवाई के नाम पर कोई हरकत
दिखाई नहीं देती। शहर में जनहित से जुड़े कामों को दरकिनार
करने वाले अधिकारियों की न केवल लम्बी फेहरिस्त है बल्कि
उनकी कार्यप्रणाली के भी कई किस्से व उदाहरण हैं। शहर भर
में उधड़ी सड़कें, उफान मारते सीवर, बंद पड़ी रोडलाइटें और
बेतरतीब यातायात व्यवस्था कुछ जीते-जागते नमूने हैं। पुलिस लाइन से रोशनीघर चौराहे तक की सड़क भी कुछ ऐसे ही अधिकारियों की उदासीनता, लापरवाही एवं अकर्मण्यता की जीती जागती नजीर है। दो साल से यह सड़क खुदी हुई है। लोग गड्ढों में धक्के खा रहे हैं, धूल फांक रहे हैं। वाहन चालक हिचकोले खाते हुए गुजर रहे हैं। इतना लम्बा समय बीतने तथा लोगों को हो
रही असुविधा को नजरअंदाज कर सभी जि मेदार चुप्पी साधे बैठे
हैं। ऐसी समस्याओं को लेकर पता नहीं क्यों सब के सब आंखों पर
पट्टी बांधकर 'धृतराष्ट्र' होने का धर्म निभा रहे हैं। वैसे,इस मामले में पीडि़त एवं प्रभावित जिला कलक्टर तक गुहार लगा चुके हैं, लेकिन समस्या यथावत है।
सड़क अब इस हाल में भी नहीं रह गई है कि उसकी मरम्मत की जा
सके। अब इसे नए सिरे से ही बनाना होगा। सार्वजनिक निर्माण का भी
यही कहना है कि सड़क नई बनानी पड़ेगी। बड़ा सवाल है कि यह
बनेगी कैसे? दरअसल, पहले सीवरेज लाइन तथा बाद में पेयजल पाइप
लाइन डालने से यह सड़क पूरी तरह टूट गई। पर्याप्त बजट न होने
के कारण यह सड़क फुटबाल बनी हुई है। जलदाय विनभाग तो अपने
हिस्से की राशि जमा भी करवा चुका है, लेकिन निगम इस मामले में
उतनी राशि नहीं दे रहा है जिससे सड़क बन सके। बस इसीलिए मामला
अटका हुआ है। लेकिन अंतत: फैसला तो निगम को ही करना है।
निगम के इस ना-नुकर के 'खेल' में जनभावनाओं के साथ सरासर
खुलेआम खिलवाड़ हो रहा है।
यही हाल सीवरेज समस्या से परेशान शहर के हैं। बात ज्यादा बढ़ जाने पर
फौरी निर्देश तथा कार्रवाई कर मामला निपटाने की कोशिश की जाती
है, लेकिन मूल समस्या सतह के नीचे पहले से भी ज्यादा विकराल हो खदबदाती
रहती है। नए ठेकेदार के आने के बाद भी शहर की रोडलाइट समस्या भी
हल नहीं हो पाई है। गाहे-बगाहे ठेकेदार को भुगतान कर समस्या हल होने
की खोखली कोशिशों तक ही मामला सीमित है। कहने की जरूरत नहीं है
विकास कार्यों को लेकर मौजूदा निगम प्रशासन एवं उसके मुखिया
की भूमिका कैसी है। आलम यह है कि बुनियादी सुविधाओं जैसे
काम भी सहजता के साथ नहीं हो रहे हैं। तभी तो जनहित से जुड़ी
समस्याओं को लेकर, न केवल आमजन बल्कि पार्षदों को भी शिकायत
रहती है कि उनकी बातों पर गौर नहीं होता है। निगम से
लेकर विधानसभा और फिर लोकसभा तक एक ही दल की सरकार
होने के बावजूद समस्याओं का समाधान न होना जनप्रतिनिधियों को
कठघरे में खड़ा करता है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि काम नहीं हो रहे हैं। एक छोटी सी सड़क को जो दो साल में भी ठीक नहीं करवा सके उनसे
और बड़े की क्या उम्मीद की जा सकती है। देर बहुत हो चुकी है। जिम्मेदारों को
अब पहल करते हुए जो भी रुकावट या बाधा है, उसका निस्तारण
कर तत्काल जनहित में निर्णय लेना चाहिए। वैसे भी दो साल तक धैर्य
रखना सामान्य बात नहीं है।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 16 अक्टूबर 15 के अंक में प्रकाशित

वक्त नहीं बदलता...


अक्सर कहते सुना है लोगों से,
वक्त सदा एक सा नहीं रहता।
वक्त बदलता रहता है,
नित नए रंग में ढलता है।
लेकिन मैं इस बात से,
कतई इतेफाक नहीं रखता,
वक्त भला कभी बदला है?
वह तो सदा एकसा ही रहता है,
बदलती है हमारी सोच,
बदलता है हमारा व्यवहार,
बदलती है हमारी दिनचर्या,
बदलता है हमारा मिजाज,
बदलती है हमारी रूचियां,
बदलता है हमारा शौक,
हम चुपके से बदलते हैं,
अंदर ही अंदर बदलते हैं,
वक्त का करके बहाना,
सच में हम ही बदल जाते हैं।
वक्त तो जैसा कल था
वैसा ही आज है
और कल भी वैसा ही रहेगा
क्योंकि वक्त नहीं बदलता
हम ही बदल जाते हैं।
----सोमवार रात 11.48 बजे

दिन-रात धमाके ही धमाके

मेरे संस्मरण-12

खैर, युद्ध के दौरान वैसे कई तरह के अनुभव हुए, जो जेहन में सदा के लिए अमिट हो गए। वैसे युद्ध के मैदान में साक्षात मौत को सामने देखकर भला कौन होगा, जिसकी धडक़न ना बढ़े और फिर हमारा युद्ध तो ऐसा हो गया था कि न तो हम दिन में ठीक से खाना खा पाते और ना ही रात को। नींद की बात ही क्या कहूं कभी-कभी तो झपकी के भी लाले पड़ जाते थे। खुला आसमान ही ओढऩा था कि और धरती बिछौना थी। भूखे-प्यासे व उनींदी आंखों से ही लगे रहे। बस एक ही धुन सवार थी, दुश्मन को नाकों चने चबवा देने हैं। वैसे युद्ध के दौरान हमारा भोजन भी बड़ा ही स्पेशल अंदाज में होता था। चलते-चलते व खड़े-खड़े ही कुछ हाथ लग गया तो खा लिया, वरना ठीक से बैठने तक की फुरसत नहीं थी। समय पर भोजन न करने तथा भरपूर मात्रा में करने के कारण सामान्य दिनों में सेना के लिए जितने राशन की खपत प्रतिदिन होती थी। वह उससे भी आधी होने लगी। राशन बचने लगा था। खराब ना हो जाए, इसके लिए पटियाला भिजवा दिया था। बांटने के लिए । इधर, दिनभर हम हमला करते और रात को पाकिस्तानी, इसलिए युद्ध के लिए अलावा और कुछ करने की फुरसत भी नहीं थी। चौबीसों घ्ंाटे बस धमाके ही धमाके ही दिनचर्या का हिस्सा बन चुके थे। दिन में गोलों की चमक वैसी दिखाई नहीं देती, जैसी रात को दिखती है। रात को एक साथ कई गोले छूटने पर ऐसा लगता था मानो आसमान में आग लगी है। आसमान में गोले जाते हुए साफ दिखाई देते हैं। ज्यादा दूरी का गोला किसी टूटते तारे जैसा नजारा पेश करता था। जहां तक मेरी जानकारी है विभाजन के दौरान 19 हैवी रेजीमेंट पाकिस्तान के हिस्से में चली गई थी जबकि भारत के पास मीडियम रेजीमेंट थी। हैवी रेजीमेंट की मारक क्षमता ज्यादा थी। हैवी गन को हम उस वक्त कडक़ बिजली के नाम से भी पुकारते थे। यह गोला इतनी तेज आवाज करता था कि जैसे कानों के पर्दे फट पड़ेंगे। हम खुले आसमान के नीचे गोलों को गिरना देखते थे। गनीमत रही कि कोई गोला एकदम से ऊपर नहीं आया। चकमता एवं आग उगलता अंगारा जब सामने से आता तो सिवाय आंखें करने के और कोई चारा नहीं था। धमाका तो इतना तेज होता था कि जैसे भूंकप का हल्का झटका महसूस हुआ हो। यह गोला चार बार आवाज करता था। तोप से निकलते हुए जोरदार धमाका होता। इसके बाद लक्ष्य तक पहुंचने तक यह इसकी आवाज इतनी कर्कश होती मानों दर्जनों हाथी एक साथ चिंघाड़ उठे हों। धरती पर फटते वक्त भी यह दो बार आवाज करता था। उस वक्त इन्फेंट्री के जवानों के पास स्टेशनगन, एलएमजी होती थी तो अफसरों के पास पिस्तौल रहती थी। चूंकि मैं तो तोपखाने में था, लेकिन मेरा काम आगे का ही था। आम्र्ड और इन्फेट्री के साथ तोपखाने का अफसर जाता था। मैं अफसर के साथ ही अटैच था। हम लोग ओपी पर जाते और वहां की परिस्थितियों को देखकर ही पीछे तोपखाने को मैसेज करते थे। कब आगे बढना है, कब पीछे हटना है, कहां फायर करना है, कहां गोला गिरवाना है आदि की जानकारी वायरलैस के माध्यम से ही तोपखाने को दी जाती थी।

वाकई सर्जरी की जरूरत

 टिप्पणी 

पीबीएम अस्पताल में सोमवार एक रोगी बच्चे के परिजनों एवं चिकित्सक में कहासुनी से शुरू हुआ विवाद धक्की-मुक्की एवं मारपीट में बदल गया। मामला तब और बढ़ गया जब दोनों ही पक्षों के समर्थक पहुंच गए और मोर्चा संभाल लिया। अस्पताल परिसर किसी अखाड़े में तब्दील नजर आया। इससे पहले रविवार को एक टैक्नीशियन द्वारा जांच रिपोर्ट जल्दी देने की एवज में पैसे मांगने का मामला भी सामने आया था। 
वैसे, संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल पीबीएम किसी न किसी तरह चर्चा में रहता ही आया है। इन दो दिन के घटनाक्रमों के चलते करीब डेढ़ साल पहले पीबीएम के निरीक्षण के दौरान दिया गया स्वास्थ्य मंत्री का बयान फिर प्रासंगिक हो गया। उन्होंने तब कहा था, पीबीएम बीमार है और यहां सर्जरी की जरूरत है। इस साल जून में भी स्वास्थ्य मंत्री फिर पीबीएम आकर गए लेकिन हालात कमोबेश वैसे ही रहे। उनका बयान केवल बयान ही साबित हुआ। बीच-बीच में पीबीएम के बेपटरी ढांचे को ढर्रे पर लाने के लिए विभिन्न संगठनों ने प्रयास भी किए। दवाब में थोड़ा बहुत सुधार भी हुआ, लेकिन अव्यवस्थाओं ने फिर पैर पसार लिए।
यह सही है कि रिक्त पद एवं घोषणाओं पर काम राज्य सरकार के स्तर पर होना है लेकिन सवाल उठता है कि निहायत ही स्थानीय स्तर की व्यवस्थाओं में सुधार के लिए भी क्या राज्य सरकार से उ मीद की जानी चाहिए? इस तरह के हंगामे-मारपीट, चोरी के मामले, बेपटरी पार्किंग व्यवस्था, बदहाल सफाई, दवा केन्द्रों पर दवा की किल्लत व मरीजों की कतार, अवांछित लोगों का अस्पताल में प्रवेश, चिकित्सकों के समय पर न पहुंचने की शिकायतें रोजमर्रा का काम है।
वैसे, इतिहास गवाह है और कई उदाहरण भी हैं। पीबीएम में कमोबेश हर प्रकरण के बाद जांच कमेटी तो जरूर बैठ जाती है, लेकिन जांच में क्या आया यह कागजों में ही दफन हो जाता है। पता ही नहीं चलता कौन दोषी था और किसको क्लीन चिट मिली। प्रबंधन के लुंज-पुंज फैसलों के कारण ही तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती है। वैसे भी जंग खा चुकी व्यवस्थाओं में सुधार तथा लंबे समय से जड़े जमाए बैठी अव्यवस्थाओं का उन्मूलन करने का साहस स्थानीय प्रबंधन में तो दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता।
बहरहाल, सोमवार का घटनाक्रम किसी भी लिहाज उचित नहीं है। यह अशोभनीय हरकत है और निंदनीय भी। इस हंगामे से भर्ती मरीजों की हुई असुविधा की भरपाई संभव नहीं है, लेकिन सबक जरूर लिया जा सकता है।
प्रबंधन की भूमिका को देखते हुए तथा लगातार हो रहे इस प्रकार के मामलों से लगता नहीं है स्थानीय स्तर पर कोई बड़ा फैसला होगा। सरकार को अब इस मामले की गंभीरता को समझना चाहिए। किसी घोषणा को क्रियान्वित करने में डेढ़ साल का समय बहुत होता है। वाकई अब पीबीएम को लेकर कठोर कदम उठाने तथा कड़े फैसले लेने का वक्त आ गया है। सरकार को तत्काल पीबीएम की सर्जरी करने की शुरुआत कर देनी चाहिए। ज्यादा इंतजार न तो सरकार के हित में है और न पीबीएम जाने वालों के और न ही पीबीएम में बैठकर इलाज करने वालों के।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 6 अक्टूबर 15 के अंक में प्रकाशित