Saturday, January 28, 2017

बस एक माह के लिए बसता और उजड़ जाता है यह गांव!

श्रीगंगानगर. इस गांव की कहानी भी बड़ी अजीब है। यह विशुद्ध रूप से अस्थायी गांव है। यह केवल एक माह के लिए ही बसता है और फिर उजड़ भी जाता है। इतना ही नहीं बसने एवं उजडऩे की यह कहानी हर साल दोहराई जाती है। हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गोगामेड़ी में इस साल यह नया गांव बस चुका है। 

हर तरफ सैकड़ों की संख्या में तंबू और शामियाने तन गए हैं। कदम-कदम पर दुकानें खुल गई हैं। नोहर-भादरा मार्ग पर भी दोनों तरफ चार किलोमीटर तक कई तरह की दुकानें सजीं हैं। चारों ओर चहल-पहल और गहमागहमी का आलम है। कहीं भजन गूंज रहे हैं तो कहीं जयकारे लग रहे हैं। कहीं झूले लग रहे हैं तो कहीं मनोरंजन का साजोसामान। दरअसल, गोगामेड़ी में यह नया गांव (अस्थायी गांव) प्रसिद्ध लोकदेवता गोगाजी महाराज के वार्षिक मेले के दौरान बसता है। मेले के समापन के साथ ही यह अस्थायी गांव भी यहां से उठ जाता है। नए गांव के कारण गोगामेड़ी इन दिनों गुलजार है। मेला हिन्दी कलेण्डर के श्रावण माह की पूर्णिमा से शुरू होकर पूरे भाद्रपद मास चलता है। उत्तर भारत में संभवत: यह एकमात्र ऐसा मेला है, जो इतना लंबा चलता है। महीनेभर में यहां देशभर के पन्द्रह से बीस लाख तक श्रद्धालु आते हैं।  विदित रहे कि गोगामेड़ी में गोगाजी महाराज की मेड़ी (समाधि स्थल) तथा गोरक्षनाथ महाराज का प्राचीन टीला है। श्रद्धालु गोरक्षनाथ के धूणे के समक्ष शीश नवाने के बाद गोगामेड़ी के दर्शन करते हैं। बताया जाता है कि इस टीले पर नाथ संप्रदाय के गोरक्षनाथ महाराज ने धूणा रमाया था। 
एक हजार से ऊपर दुकानें
गोगामेड़ी में मेले में अधिकृत दुकानों की संख्या तो चार सौ से ऊपर हैं। यह दुकानें बकायदा आवंटित की गई हैं, इसके अलावा सड़क किनारे अस्थायी दुकानें तथा फेरी लगा कर सामान बेचने वाले भी कई हैं। इन सबको मिलाकर आंकड़ा एक हजार से उपर पहुंच जाता है। दुकानों का आवंटन यहां दो तरह से होता है। गोगामेड़ी क्षेत्र की दुकानें देवस्थान विभाग के अधीन हैं जबकि गोरक्षटीले की दुकानें गोरक्षटीला प्रन्यास (गोगाणा) देखता है। देवस्थान विभाग ने करीब 325 तथा गोगाणा ने करीब सौ दुकानों का आवंटन किया है। इसके अलावा खेतों एवं सड़क किनारे भी बड़ी संख्या में तंबू लग गए हैं। ये सब देखकर गोगामेड़ी में एेसा लगता है कि जैसे नया गांव बस गया हो। 

पॉलीथिन थैलियां नष्ट करने से होती मनोकामना पूरी!

श्रीगंगानगर. अगर आपने 21 पॉलीथिन थैलियां एकत्रित कर उनको नष्ट कर दिया तो आपकी मनोकामना पूरी होगी। अगर थैलियों की संख्या 51 हुई तो आपका धन दुगना हो जाएगा। इतना ही नहीं अगर आपने 101 या इससे अधिक थैलियां नष्ट की तो आपको संतान की प्राप्त होगी। चौंकिए मत। यह कोई घोषणा या दावा नहीं है बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए की गई एक तरह की अनूठी अपील है। हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गोगामेड़ी में चल रहे लोकदेवता गोगाजी महाराज के मेले में इस तरह की अपील लिखे बोर्ड आपको दिखाई दे जाएंगे।
विशेष रूप से गोगाणा में इस तरह के बोर्ड ज्यादा लगे हैं। यह बोर्ड तैयार करवाए हैं गोरक्षटीला प्रन्यास (गोगाणा) के महंत रूपनाथ महाराज ने। दरअसल, यह सारी कवायद पर्यावरण और गायों पर केन्द्रित है। 
बोर्ड में बकायदा यह भी लिखा गया है कि गोरक्षनाथ जी महाराज एवं गोगाजी महाराज दोनों ने ही गायों के लिए काफी कुछ किया है। इनकी पावन नगरी में पॉलीथिन न डालें क्योंकि पॉलीथिन थैलियां पर्यावरण प्रदूषण के साथ गायों की मौत का कारण बन रही हैं। विदित रहे कि गोमामेड़ी में पॉलीथिन का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। पर्यावरण प्रदूषण की वाहक बन रही इन थैलियों पर प्रशासनिक स्तर पर रोक के कोई प्रबंध नहीं हो रहे।
तैयार हो रही कपड़े की थैलियां
पर्यावरण संरक्षण को लेकर गोगाणा में एक नया काम भी शुरू किया गया है। यहां श्रद्धालुओं को कपड़े की थैली उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इस काम के लिए बकायदा एक टेलर भी लगाया गया है। गोगाणा में चढ़ावे के रूप में आने वाले कपड़े से ही यह थैलियां तैयार की जा रही हैं। इन थैलियों का वितरण स्थाई रूप से दुकान चलाने वाले दुकानदारों को नि:शुल्क किया जाता है।
फिर भी धड़ल्ले से बिक रही है पॉलीथिन
इस तरह की अपील जारी करने के बावजूद गोगाणा एवं गोमामेड़ी में पॉलीथिन का इस्तेमला धड़ल्ले से हो रहा है। दुकानों पर प्रसाद पॉलीथिन में रखकर दिया जाता है। गोगामेड़ी के पास के इलाके में तो जिधर नजर फैलाओ इधर पॉलीथिन की थैलियां दिखाई देती हैं। इस संबंध में बालयोगी महंत रूपनाथ महाराज बताते हैं कि वे श्रद्धालुओं को पॉलीथिन का उपयोग नहीं करने के लिए कहते भी हैं और जागरूक करने के लिए बोर्ड भी लगवाए गए हैं लेकिन जब तक प्रशासन की जब तक सख्ती नहीं होगी इस पर पर प्रभावी रूप से रोक संभव नहीं है।

यहां प्रसाद के रूप में चढ़ते हैं प्याज और दाल

 

श्रीगंगानगर. 

अमूमन मंदिरों में प्रसाद के रूप में कहीं मिठाई तो कहीं फल या नारियल का भोग लगाया जाता है लेकिन एक स्थान ऐसा भी है, जहां प्रसाद के रूप में प्याज, दाल एवं भुने हुए चावल को प्राथमिकता दी जाती है। सुनने में यह अजीब लगता है लेकिन हकीकत यही है। अपने आप में अनूठे प्रसाद का यह मामला हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में स्थित गोगामेड़ी से जुड़ा है।
उत्तर भारत के प्रसिद्ध लोकदेवता गोगाजी महाराज के प्रसाद में प्राथमिकता प्याज, दाल एवं भुने हुए चावल (खील) को दी जाती हैं। गोरक्षनाथ टीले पर भी पर यही तीनों चीजें प्रमुखता से चढ़ाई जाती हैं। लंबे समय से इस परम्परा का निर्वहन हो रहा है, हालांकि समय के साथ इसमें कुछ परिर्वतन जरूर हो गए हैं। अब नारियल, मखाणे व बताशे आदि भी प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाने लगे हैं। विदित रहे कि गोगाजी का महाराज का मेला पूरे भाद्रपद मास चलता है।
दाल पर महंगाई की मार
महंगाई का असर दाल पर भी पड़ा है। इस कारण श्रद्धालु दाल की बजाय प्याज व भुने हुए चावलों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले इस बार दाल का चढ़ावा लगभग आधा है, हालांकि मेला अभी शुरुआती दौर में है। इधर प्याज इस बार सस्ते हैं, इस कारण इनके चढ़ावे में किसी तरह की कटौती फिलहाल नजर नहीं आ रही।

इसलिए चढ़ता है यह प्रसाद
गोगाजी महाराज की जब मोहम्मद गजनवी से लड़ाई तय हो गई थी, तब उन्होंने अपने सगे-संबंधियों और मददगारों को रसद सामग्री के साथ युद्ध में आने का निमंत्रण दिया था। जानकार बताते हैं कि लड़ाई समय से पूर्व शुरू हो गई और धोखे से गोगाजी को घेर लिया गया। इसके बाद गोगाजी ने घोड़े सहित समाधि ले ली। युद्ध समाप्ति के बाद पहुंचे उनके सगे संबंधियों एवं मददगारों ने रसद सामग्री के रूप में साथ लाए गए प्याज, दाल एवं भुने हुए चावल उनकी समाधि पर अर्पित कर दिए। तभी से यह परम्परा चली आ रही है। रेगिस्तानी इलाके में प्याज एवं दाल का महत्व इसीलिए भी है क्योंकि यह दोनों लंबे समय तक खराब नहीं होते। 

यहां न ढोल बजता है और न ही कोई टॉर्च दिखाने वाला

श्रीगंगानगर. 

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है। खुले में शौच जाने वालों को रोकने के लिए प्रदेश स्तर पर कई तरह के अभियान चले थे। मसलन, किसी ने ढोल बजाया तो किसी ने टॉर्च की रोशनी दिखाई। कहीं सिटी बजाई गई तो कहीं मानव शंृखला बनाई गई। दरअसल, यह सारी कवायद खुले में शौच जाने वालों को शर्मसार कर उनको ऐसा करने से रोकने के लिए थी। इन अनूठे प्रयोगों के सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले लेकिन हनुमानगढ़ जिले के गोगामेड़ी में गोगाजी महाराज के वार्षिक मेले के चलते बसे अस्थायी गांव में खुले में शौच जाने पर किसी तरह की पाबंदी नहीं है। यहां न तो कोई ढोल बजाता है और न ही कोई टॉर्च दिखाने वाला है। 

प्रशासनिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से संचालित शौचालय भी ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में है लेकिन शौचालयों की संख्या अंगुलियों पर गिनने जितनी है। ऐसे में यहां संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। स्वच्छ भारत अभियान की धज्ज्यिां उड़ रही हैं, सौ अलग।
हो सकता  है समाधान 
मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शौचालय की व्यवस्था हो सकती है। हाल ही स्वच्छता के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार पाने वाले बीकानेर जिले के स्वच्छता समन्वयक महेन्द्र सिंह शेखावत बताते हंै कि मेले के दौरान खुले में शौच जाने वालों को रोकना चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन इसका समाधान भी है। हाल ही मध्यप्रदेश के उज्जैन में कुंभ के मेले में बड़ी संख्या में अस्थायी शौचालय बनाए गए थे जबकि वहां तो गोगामेड़ी से ज्यादा श्रद्धालु आए थे। ऐसी व्यवस्था यहां भी हो सकती है।
हरी झंडी मिले तो तैयार है संस्था 
गोगामेड़ी में स्वच्छता बनाए रखने की दिशा में काम करने के लिए हरियाणा के सजग भारत फाउंडेशन ने पहल की है। फिलहाल इस संस्था के पचास कार्यकर्ता गोगामेड़ी के रेलवे स्टेशन पर सेवा दे रहे हैं। संस्था की ओर से रेलवे स्टेशन पर 24 स्नानघर एवं 48 शौचालय जल्द संचालित किए जाएंगे। यह अस्थायी होंगे। संस्थान से जुड़े आनंद आर्य कहते हैं कि उनकी संस्था नि:शुल्क रूप से यह काम करती है। अगर प्रशासन की तरफ से उनको बिजली एवं पानी की मदद मिल जाए तो वे मेले में श्रद्धालुओं के लिए शौचालय की वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते हैं। आर्य कहते हैं कि इस काम के लिए उन्होंने प्रशासन से संपर्क भी किया लेकिन वहां से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई जबकि रेलवे ने उनको फटाफट स्वीकृति दे दी।  रेलवे के अधिकारियों का सहयोग भी उनको मिल रहा है।
खुले में शौच जाने के दुष्परिणाम
व्यक्ति के एक ग्राम मल से एक करोड़ वायरस फैलते हैं। 
 एक व्यक्ति से मल से तीन किलोमीटर का क्षेत्र संक्रमित 
होता है। 
मल से रोटा वायरस फैलता है, जिससे गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं। -अगर बारिश आ जाए तो संक्रमण फैलने की गति चौगुनी हो जाती है।
इस वायरस के पीडि़तों में डायरिया, उल्टी-दस्त, हैजे की आशंका बढ़ जाती है। 
 डायरिया से भारत में हर साल चार लाख बच्चों की मौत हो जाती है।
गोगामेड़ी में कहां कितने शौचालय 
गोगाणा-450
धर्मशालाओं में -400
नोहर रिलीफ सोसायटी में-350
अस्थाई-250
सुलभ शौचालय-200
बस स्टैंड-40
रेलवे स्टेशन -12
ग्राम पंचायत-50

ऐसा तालाब जिसके पानी से दूर होते हैं चर्मरोग

श्रीगंगानगर. 

भला तालाब के पानी से कभी रोग दूर हो सकते हैं? यह बात सुनने में अजीब लगे है लेकिन जिले के ढाबां झलार गांव के लोगों के लिए हकीकत है। गांव और आसपास के लोगों के लिए पड़पाटा धाम के तालाब का पानी  किसी चमत्कार से कम नहीं है। गांववालों के अनुसार दैवीय चमत्कार से फटी धरती के कारण यह तालाब बना, इसलिए यह अपने आप में अनूठा है। 

गांव के लोग हर माह अमावस्या को यहां आते हैं लेकिन भाद्रपद अमावस्या को यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है। विशेषकर महिलाओं की संख्या यहां ज्यादा होती है। यहां आने वाले लोग झाडू लेकर आते हैं। इसके बाद तालाब के किनारे बैठकर हाथ-पैर धोते हैं। मान्यता है तालाब का पानी शरीर पर लगाने से चर्मरोग दूर हो जाते हैं। श्रद्धालु साथ लाई झाडू यही अर्पित करके जाते हैं। इसके बाद तालाब के ठीक सामने बने शिव मंदिर में जाते हैं। यहां अनाज एवं चावल की खिल्ली चढ़ाई जाती है। शिव मंदिर के पास श्रद्धालु गुरुद्वारे में शीश नवाते हैं। ढाबां झलार के लोगों की पड़पाटा धाम के प्रति गहरी आस्था है और हर सम्प्रदाय के लोग पड़पाटा धाम समिति से जुड़े हुए हैं। मेले में समिति के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता हर तरह की व्यवस्था बनाने में सहयोग करते हैं। 

मेले में सजती हैं दुकानें
पड़पाटा धाम पर लगने वाले मेले में दुकानें भी सजने लगी है। विशेषकर इन दुकानों पर मनिहारी का सामान सस्ती दर पर सुलभ हो जाता है। इसके अलावा मनोरंजन के लिए यहां झूले भी लगने लगे हैं। इस बार तो यहां मोटरसाइकिल बिक्री की स्टॉल भी लगी थी। मेले में न केवल ढाबां झलार बल्कि आसपास के गावों के लोग भी आते हैं और दिन भर चलने वाले सत्संग का आंनद लेते हैं। 

अचानक से फटी धरती और समा गया सारा पानी, ढाबां झलार गांव में आज भी हैं निशां बाकी

श्रीगंगानगर.

 बरसात जोरों से बरस रही थी। पानी इतना बरसा कि घरों में चार-चार फीट पानी भर गया। पूरा गांव डूबने की कगार पर था। परेशान लोग भगवान से बारिश थमने की फरियाद कर रहे थे। अचानक तेज धमाका हुआ और गांव का पानी उतरने लगा। थोड़ी ही देर में गांव का सारा पानी गायब हो गया। गांव वालों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, क्योंकि उनके लिए यह नजारा किसी चमत्कार से कम नहंी था।  यह कोई फिल्मी कहानी नहीं बल्कि हकीकत की घटना है। जिले के ढाबां झलार गांव में 58 साल पहले सितम्बर माह में इस तरह का चौंकाने वाला वाकया घटित हुआ था। तेज बारिश के कारण गांव डूबने की कगार पर पहुंच गया था। गांव की पूर्व दिशा में अचानक से तेज धमाका हुआ और करीब चार बीघा में धरती फट गई और सारा पानी उसमें समा गया। इसे दैवीय चमत्कार मान ग्रामीण उस स्थान की पूजा करने लगे, तब से हर साल भाद्रपद अमावस्या को मेला लगता है और दिन भर धार्मिक आयोजन व संत्सग होते रहते हैं। इस समूचे आयोजन के लिए गांव पड़पाटा धाम समिति व्यवस्था करती है। साल दर साल यहां सुविधाओं का विस्तार होता जा रहा है। मेले में आसपास के गांवों के हजारों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। 
साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल
जहां जमीन फटी थी, उस जगह का नाम पड़पाटा धाम है। पड़पाटा धाम साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल है। वैसे भी ढाबां झलार में हर सम्प्रदाय के लोग हैं और सभी की पड़पाटा धाम में गहरी आस्था है। धाम में शिव मंदिर है तथा गुरुद्वारा भी है। इसके अलावा फटी जमीन के निशां बाकी है जो अब एक जोहडनुमा छोटे तालाब का रूप अख्तियार कर चुकी है। इसमें बरसाती पानी भरा रहता है। श्रद्धालु यहां झाडू चढ़ाते हैं। 

कमाल की आस्था, यहां चढ़ते हैं झाडू और नमक

श्रीगंगानगर. 

आस्था के कई रूप हैं तो आराध्य को प्रसन्न करने के विविध तरीके। हर जगह की अपनी विशेषता एवं इतिहास होता है। कहीं अनूठा तो कहीं परम्परागत। कहीं पूजा की विधि चौंकाने वाली होती है तो आराध्य को चढऩे वाला प्रसाद। जिले की सूरतगढ़ तहसील के अधीन आने वाले गांव ढाबां झलार का पड़पाटा धाम भी कई तरह की अनूठी विशेषताएं समेटे हुए हैं। धाम के तालाब के बनने की कहानी तो रोचक है ही। इस तालाब के पानी से चर्मरोग दूर होने की मान्यता भी किसी अचूबे से कम नहीं। इन सबके अलावा यहां एक और खास बात है जो चौंकाती है, वह है यहां चढऩे वाला प्रसाद। 

तालाब में हाथ-पैर धोने से पहले श्रद्धालु यहां प्रसाद के रूप में नमक, झाडू और अनाज चढ़ाते हैं। वैसे तो हर माह प्रत्येक अमावस्या को श्रद्धालु उमड़ते हैं लेकिन भाद्रपद अमावस्या को यहां हजारों लोग जुटते हैं। ऐसे में तालाब के पास झाडू, नमक एवं अनाज का ढेर लग जाता है।  पड़पाटा धाम के तालाब के बारे में मान्यता है कि इसके पानी से हाथ-पैर धोने से चर्म रोग दूर होते हैं। श्रद्धालु इस तालाब के पानी को बोतलों में भरकर अपने घर भी ले जाते हैं। झाडू एवं नमक के चढ़ावे के पीछे वजह ग्रामीण नहीं बता पाते। उनका कहना है  यह परम्परा लंबे समय से चली आ रही है। 

ढाई से तीन हजार झाडू 
पड़पाटा धाम की तमाम व्यवस्थाओं की देखरेख करने वाली पड़पाटा धाम सेवा समिति के अध्यक्ष सेवाराम धतरवाल बताते हैं कि भाद्रपद अमावस्या को तालाब के किनारे झाडुओं का ढेर लग जाता है। करीब दो क्विंटल झाडू एक ही दिन में एकत्रित हो जाती है। इनकी संख्या ढाई से तीन हजार के बीच होती है। नमक व अनाज भी बड़ी मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं। इसके अलावा हर माह अमावस्या को भी यहां डेढ सौ के करीब झाडू चढावे के रूप में आते हैं।

स्कूलों व मंदिरों में दे देते हैं झाडू
पड़पाटा धाम पर आने वाली झाडुओं को स्कूलों एव मंदिरों में वितरित कर दिया जाता है। इसके अलावा नमक को गोशालाओं में भिजवा दिया जाता है। चढ़ावे के रूप में आने वाले चढावे का समिति बेचान कर उस राशि को धाम के रखरखाव के नाम पर होने वाले कार्यों में खर्च करती है।

Tuesday, January 3, 2017

कागजी निर्देशों से नहीं बनेगी बात

 टिप्पणी 

श्रीगंगानगर के जिला शिक्षा अधिकारी (माध्यमिक) कार्यालय की ओर से सोमवार को एक निर्देश जारी किया है। निर्देशों में बताया गया है कि शिक्षा विभाग की ओर से जारी शिक्षा विभागीय कैलेंडर (शिविरा) में 24 दिसम्बर से सात जनवरी तक शीतकालीन अवकाश घोषित किया गया है। विभाग को शिकायत मिली है कि कुछ गैर राजकीय विद्यालयों (निजी/प्राइवेट) में इन निर्देशों की पालना नहीं की जा रही। शिकायत के बाद विभाग ने औपचारिकता के नाम पर निर्देशों की पालना नहीं करने वाले विद्यालयों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने की बात करते हुए पत्र जारी कर दिया। इस तरह के निर्देश जारी करने से यह तो साबित हो ही जाता है कि निर्देशों की पालना नहीं हो रही। साथ ही सवाल उठता है कि इन निर्देशों को मानता ही कौन हैं और अवहेलना करने वालों पर किस तरह की कार्रवाई होती है। देखा जाए तो वास्तविकता के धरातल से इनका वास्ता नहीं होता। इस तरह के निर्देश कमोबेश हर साल जारी होते हैं। एक नहीं कई तरह के निर्देश होते हैं लेकिन वो सिर्फ कागजी ही साबित होते हैं। कार्रवाई वास्तव में कड़ी होती तो क्या इस तरह के निर्देश जारी करने की रस्म निभानी पड़ती? विभाग का भय ही पर्याप्त है। कानून तो पहले से बने हुए हैं ही। भला यह कैसे संभव है कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण काम से जो जुड़े हैं उनको विभाग के कानून/ निर्देश याद नहीं हो।
दरअसल, निर्देशों की अवहेलना करने वालों में सिर्फ स्कूल ही शामिल नहीं है, वो अभिभावक भी हैं जिनकी मौन स्वीकृति होती है। अक्सर स्कूलों की तरफ से यह तर्क दिया जाता है कि अभिभावक नहीं चाहते कि उनके बच्चों का इतना लंबा अवकाश हो। और यह एक ऐसा तर्क है जिस पर अभिभावक कभी पलटकर जवाब नहीं देते। उनकी यह चुप्पी एक तरह की मजबूरी भी है। इसी चुप्पी को स्कूल ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हां अभिभावकों के नाम पर बने संगठन जरूर आवाज उठाते रहते हैं लेकिन उनको भी अभिभावकों का कितना समर्थन मिल पाता है?
खैर, श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों में प्रतिकूल मौसम के दौरान इस तरह की शिकायतें ज्यादा सामने आती हैं। अक्सर इस तरह के मौसम में जिला प्रशासन अवकाश घोषित करता है या फिर विद्यालयों का समय बदल दिया जाता है। यह मामला गंभीर इसलिए भी है कि फिलहाल घोषित अवकाश चल रहे हैं। शीतकालीन अवकाश के बावजूद कड़ाके की सर्दी के बीच स्कूल संचालन करना नियमों की अवहेलना के साथ विद्यार्थियों के साथ सरासर ज्यादती है। सर्दी और घने कोहरे के बीच स्कूलों भेजना नि:संदेह किसी सजा से कम नहीं है।
बहरहाल, अभिभावक किसी लाभ या मजबूरी के चलते चुप हैं इधर, संबंधित स्कूल किसी अन्य गतिविधियों के नाम पर कक्षाएं लगा रहे हैं। ऐसे में विभाग को इस तरह के औपचारिकता भरे निर्देश जारी करने के बजाय कार्रवाई का डंडा चलाना चाहिए। शिक्षा विभाग पर अगर आंखों पर पट्टी बांधे है तो जिला प्रशासन को तत्काल दखल देना चाहिए और नियमों की अवहेलना कर मासूमों से खिलवाड़ करने वालों पर नकेल कसनी चाहिए। अभिभावक भी इस तरह के मौसम में संवेदनशीलता दिखाते हुए पहल करें तो सोने पर सुहागा होगा।


राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 3 जनवरी 17 के अंक में प्रकाशित ....

Wednesday, December 28, 2016

जोश व जज्बा जगाती है दंगल


बस यूं ही

फिल्म रिलीज होने के पांच दिन बाद आज सपरिवार दंगल देख आया। इसलिए अब फिल्म को लेकर टीका टिप्पणी करना बेमानी सा लगता है। क्योंकि पांच दिन बाद तो दर्शकों/पाठकांे के पास सारा निचोड़ आ चुका होता है। हां, कुछ अच्छा लगा वो जरूर सबसे साझा करूंगा। फिल्म का कथानक मेरे को पहले से ही पता था लेकिन इसको इस कदर खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है यह देखने के बाद ही पता चला। हालांकि जीवन पर आधारित फिल्मों में मनोरंजन के लिए कल्पना का तड़का लगाया जाता रहा है। दंगल में भी कल्पना का तड़का है। मसलन, फाइनल मुकाबले में गीता के पिता महावीर फोगाट को एक कमरे में बंद दिखाना, फाइनल मुकाबले की खिलाड़ी का नाम बदलना, एकतरफा रहे मुकाबले को कड़ा दिखाना आदि आदि। दरअसल तड़का फिल्म की जरूरत भी होती है, अन्यथा दर्शक फिल्म पर उबाऊ होने का ठपा चस्पा करते देर नहीं लगाते। सोचिए वह फाइनल मुकाबला एकतरफा ही दिखा दिया जाता तो वह उतना आनंद व रोमांच नहीं दे पाता जितना कल्पना का तड़का लगाने के बाद देता है। 
खैर, बात मूल कथानक की करें तो वह हकीकत के नजदीक ही नजर आता है।
महावीरसिंह फोगाट उस राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां लिंगभेद की काली छाया, पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता तथा परम्पराएं हावी हैं। एेसी प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करना आसान नहीं होता। फोगाट अपनी लड़कियों को न केवल लड़कों जैसा लड़ाका बनाते हैं, बिलकुल उनके साथ दंगल में उतारने में भी नहीं हिचकते। वैसे हकीकत में यह काम महावीरसिंह करीब ढाई दशक पूर्व कर चुके हैं लेकिन फिल्म के माध्यम उनका काम पुराना नहीं लगता। आज भी परम्परावादी परिवारों में इस तरह की साहसिक फैसले नहीं लिए जाते। अपनी संतान को लायक बनाने का सपना तो कमोबेश हर मां बाप ही देखते हैं लेकिन जिस लगन, मेहनत, जीवटता व जुनून से महावीरसिंह मुकाम तक पहुंचते हैं वह वाकई काबिलेगौर है। 
आज दंगल बॉक्स आफिस पर धूम मचा रही है तो मान लेना चाहिए कि सकारात्मक कामों को भी वाहवाही मिलती है बशर्ते उनको दिखाने/ बताने का तरीका कुछ हटकर हो। दंगल मेरी नजर में अब तक देखी गई ऐसी इकलौती फिल्म है जो एक साथ कई विषयों की तरफ ध्यान बंटाती है। दंगल समाज को सकारात्मक संदेश देती है। हौसला देती है। मनोबल बढ़ाती है। उम्मीद जगाती है। यह परम्परावादी एवं दकियानूसी सोच पर करारी चोट भी करती है। यह लड़का-लड़की के भेद को मिटाती है। यह सामाजिक वर्जनाओं को अनसुना करती है। फोगाट की कहानी बताती है कि आदमी के हौसले के आगे सब कुछ बौना है। आदमी सोच ले तो क्या कुछ नहीं कर सकता। 
वैसे भी सच्ची कहानियां पसंद तो की ही जाती हैं वह दर्शक/श्रोता/पाठकों को अंदर तक प्रभावित भी करती है। यही कारण है कि गीता जब देश के लिए स्वर्ण पदक जीतती है तो आंखें सबकी नम होती है। मेरी आंखों से तो आंसू बह निकले। यकीन मानिए सिनेमा हॉल से बाहर निकलते तक मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे। भावनाओं से भरे यह पल ही तो आदमी के अंदर एक नई ऊर्जा पैदा करते हैं। जोश जगाते हैं। आगे बढऩे का जज्बा पैदा करते हैं। 
वैसे राजस्थान व हरियाणा के सीमावर्ती जिलों का आपस में रोटी बेटी का रिश्ता है। हालांकि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं बताया गया है, लेकिन मेरी जानकारी में है। गीता-बबीता का ननिहाल मेरे गृह जिले झुंझुनूं के बुहाना उपखंड के झारोड़ा गांव में हैं। निंसदेह बेटियों के आगे बढ़ाने में जितना योगदान महावीरसिंह का रहा है कमोबेश उतना ही उनकी पत्नी दयाकौर भी रहा है। बेटियों की सफलता में दयाकौर का त्याग भी छिपा है। देश व समाज को फिलहाल महावीरसिंह एवं दयाकौर जैसे किरदारों की ही जरूरत है। विशेषकर हरियाणा व मेरे गृह जिले में तो कहीं ज्यादा आवश्यकता है।

मनमर्जी का निर्माण

टिप्पणी

श्रीगंगानगर में इन दिनों एक सड़क का निर्माण कार्य चल रहा है। डामर को हटाकर उसकी जगह सीमेंट से यह सड़क बन रही है। लक्कड़ मंडी टी प्वाइंट से शिव चौक तक बन रही इस सड़क की दूरी बमुश्किल तीन किलोमीटर होगी। अगर दोनों तरफ की दूरी मिला दी जाए तो यह छह करीब किलोमीटर होगी। यह शहर की प्रमुख सड़क है और यातायात का दबाव इस पर सर्वाधिक रहता है। चौंकाने वाली बात यह है कि छह किलोमीटर का टुकड़ा बनते-बनते करीब चार माह हो चुके हैं लेकिन सड़क का काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है। सोमवार को शिव चौक से सुखाडिय़ा सर्किल तक यातायात एक बार तो बंद ही कर दिया गया। एक तरफ तो सड़क बन रही है जबकि दूसरी साइड सड़क की खुदाई शुरू कर दी। इससे वाहन चालक गलियों में भटकते रहे।
खैर, सोमवार ही क्यों। बीते चार माह में क्या-क्या नहीं हुआ। कछुवा गति से हो रहे इस काम की हालात यह है कि इसने शहरवासियों को बस रुलाया ही नहीं बाकी कोई कसर नहीं छोड़ी। इस सड़क का निर्माण तो शुरू से ही चर्चाओं में रहा है। सड़क बनाने के तौर-तरीकों को देखा जाए तो जाहिर भी होता है कि इसका काम मनमर्जी एवं बिना कार्ययोजना के हो रहा है। जनता को परेशानी हो तो हो अपनी बला से। सड़क बनाने वाले उसी अंदाज में बना रहे हैं। निर्माण कार्य कभी कहीं से शुरू किया तो कभी कहीं से। बड़ी बात यह है कि संबंधित विभाग भी आंखें मूंदे चुपचाप यह सब देख रहा है। विभाग की यह चुप्पी शर्मनाक एवं संदिग्ध इसीलिए भी प्रतीत होती है, क्योंकि दो बार सड़क निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर शिकायत तक हो चुकी है। ऐसा लगता है निर्माण एजेंसी को विभाग ने मनमर्जी से सड़क बनाने की खुली छूट दे रखी है। चार माह से लोग धूल फांक रहे हैं। शहर की अंदर की गलियों में धक्के खा रहे हैं। जाम में फंस रहे हैं, लेकिन सब के सब चुप। जन सरोकारों पर सबके मुंह पर ताला। अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि कोई कुछ नहीं बोल रहा। जो पीडि़त व प्रभावित है वह भले ही संबंधित निर्माण एजेंसी के कारिंदों के यहां गिड़गिड़ाए। गुहार लगाए लेकिन सब नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनता कौन है। वैसे तो सड़क निर्माण के लिए इस समय का चयन करना ही गलत था। बरसात के मौसम में सड़क के आसपास वाले दुकानदारों एवं लोगों ने कितनी पीड़ा भोगी है वो ही जानते हैं। त्योहारों व पर्व पर कितने ही दुकानदारों की ग्राहकी मारी गई उनसे बेहतर कौन जान सकता है। सड़क पर चलने वाला वाहन चालक या राहगीर ने कितनी धूल फांकी वो ही महसूस कर सकता है।
बहरहाल, जनता के लिए बनने वाले काम बिना वजह की देरी दर्द देने लगती है। जनहित से जुड़े कामों को प्राथमिकता से व तय सीमा समय से पूरा करने की कोशिश की जानी चाहिए। और हां विभाग द्वारा चुपी साधकर संबंधित एजेंसी की ढाल बनने या उसे अभयदान देने वाली बात जहां होती है वहां जनहित दरकिनार होता रहा है। संबंधित विभाग के लिए हमेशा जन हित सर्वोपरि होना चाहिए। विभाग को इस सड़क के काम से सबब लेना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की हिमाकत कोई दूसरी एजेंसी तो नहीं करे।

राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 15 नवम्बर 16 प्रकाशित...

...तो भयावह होंगे हालात

 टिप्पणी

 दो चार दिन पहले देश के विभिन्न हिस्सों में छाया स्मॉग तो सभी को याद ही होगा। किस तरह दिन भर धुआं सा छाया रहा। आंखों में जलन थी तो सांस तक आसानी से नहीं ले पा रहे थे लोग। इस स्मॉग से निपटने पर अच्छा खासा चिंतन मंथन भी शुरू हुआ। स्मॉग किस स्तर तक है इसको बाकायदा मापा भी गया। हालात इस कदर बिगड़े कि आठ नवंबर को राजस्थान राज्य प्रदूषण नियत्रंण मंडल ने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के निर्देशों की पालना में अलवर व भरतपुर जिलों में एक सप्ताह तक सभी स्टोन क्रेशर व ईंट भट्ठों के संचालन पर रोक लगा दी। इसी तरह दस नवम्बर को प्राधिकरण ने ही दिल्ली में थर्मल पावर प्लांट को अस्थायी रूप से बंद कर दिया। एक महत्वपूर्ण आदेश भी गुरुवार को दिया गया जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण पर केन्द्र को फटकार लगाते हुए कहा कि केन्द्र सरकार इस बात का इंतजार कर रही है कि लोग सड़कों पर प्रदूषण की वजह से मरें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ सांस लेना लोगों का मौलिक हक है।
ऐसे में सवाल उठता है कि स्वच्छ सांस लेने की बात क्या दिल्ली के लोगों तक ही सीमित है? प्रदूषण से स्वास्थ्य को सर्वाधिक खतरा उन्हीं को होता है? श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले के लोगों के जान की कीमत ही नहीं? बड़ी बात तो यह है कि श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ में प्रदूषण मापने का कोई पैमाना ही नहीं है जबकि दोनों जिलों में धूल, धुंध एवं धुआं कदम-कदम पर है। ईंट भ_ों की संख्या दोनों जिलों में बड़ी संख्या में हैं। दुपहिया एवं चौपहिया वाहनों की संख्या भी यहां दूसरे जिलों की अपेक्षा ज्यादा है। हनुमानगढ़-श्रीगंगानगर जिले में चावल की खेती खूब होती है। खेतों में पराली जलाने का प्रचलन इधर भी है। श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय की ही बात करें तो सड़कों पर उडऩे वाली धूल ही इतनी है कि भले चंगे आदमी को अस्पताल जाने को मजबूर कर देती है।
बहरहाल, स्मॉग को देखते हुए श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले में प्रदूषण का स्तर चिंता बढाने वाला है। जिम्मेदारों को इस दिशा में अविलंब पहल करनी चाहिए वरना हालात भयावह होते देर नहीं लगेगी। आम आदमी के स्वास्थ्य से जुड़े इस मामले में जागरूक लोगों को भी आगे आना चाहिए। जब अतिक्रमण जैसी समस्या के लिए यहां के जागरूक लोग अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं, प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं, तो जीवन से जुड़े इस मसले पर चुप्पी क्यों? प्रदूषण से बचाव की बात तो बाद की है पहले इसके स्तर को मापने की बाद तो करें। इसके लिए कोई ठोस एवं कारगर प्रयास तो हों।

राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 12 नवम्बर 16 प्रकाशित ....

ऐसी भी क्या जल्दी थी....


बचपन से एक कहावत सुनता आया हूं 'बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय, काम बिगाड़े आपणो जग में होय हंसाय...' अगर आप समझ रहे हैं तो ठीक हैं वरना समझा देता हूं कि यह बात देश में पांच सौ एवं हजार के नोट बंद करने के संदर्भ में हैं। मैं नोटो पर रोक लगाने का स्वागत व समर्थन करता हूं लेकिन जिस तरह आनन-फानन में बिना किसी कार्ययोजना के इसे लागू किया गया और इसके जो साइड इफेक्ट्स सामने आ रहे हैं, उनकी कुछ बानगी देखिए....
-रेल के अग्रिम आरक्षण पर रोक लगाई।
-हवाई यात्रा की अग्रिम बुक पर रोक लगाई।
-राष्ट्रीय राजमार्ग पर टोल नाके मुफ्त किए।
-स्टेट हाइवे भी टोल से मुक्त किए।
-पुराने नोट चलाने की अवधि बढ़ाई।
-एटीएम पर नए नोट अभी नहीं निकलेंगे।
यह चंद उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि यह फैसला कितनी जल्दबाजी में लिया गया था। जल्दबाजी को लेकर तर्क दिया जा सकता है कि मौका दिया जाता तो कालेधन को सफेद कर लिया जाता। हो सकता है ऐसा हो जाता, लेकिन ठोस कार्ययोजना बना कर कुछ छूट दी जा सकती थी। यथा-
-शादी वाले परिवार को पांच-से दस लाख रुपए हाथोहाथ बदलवाने की सुविधा दी जाती।
- बीमार, बुजुर्ग, दिव्यांग आदि के लिए अलग से काउंटर बनते।
- अनपढ़ एवं पहली बार बैंक जाने वाले के लिए किसी तरह की हेल्प डेस्क बनाई जाती।
-सोना खरीदने पर भी रोक तभी लगाई जा सकती थी।
-काला धन खपाने की जितनी गलियां थीं उनको पहले बंद किया जाता।
-नया नोट बड़ा है, क्यों ना उसकी साइज उतनी ही रख ली जाती, ताकि एटीएम सुविधा में विलंब ना होता।
- सभी का समय खराब न हो इसके लिए बेहतर था कि उपभोक्ताओं को सीरिज की घोषणा कर भुगतान किया जाता। मतलब अमुक नंबर से अमुक नंबर तक का भुगतान फलां तारीख को इतने बजे होगा।
-आपात एवं तत्काल राहत वालों के लिए अलग से काउंटर होता जो कुछ औपचारिकता पूरी करने के बाद उनको राहत देता।
-स्कूलों आदि में भी नकली नोट की जांच की मशीन लगाकर नोट बदलने के काउंटर लगाए जा सकते थे।
-सौ, पचास, बीस व दस के नोट बाजार में मौजूद कुल राशि का बीस प्रतिशत भी नहीं है, जबकि पांच सौ एवं हजार के 80 फीसदी से ज्यादा हैं। ऐसे में छोटे नोटों की किल्लत स्वभाविक है। दो हजार के साथ पांच सौ एवं हजार के नोट भी जारी होते। बड़ा नोट होने से उसके भुनाने की समस्या बरकरार है।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि यह निर्णय महत्वपूर्ण और देश हित में है लेकिन बेहद जल्दबाजी एवं हड़बड़ाहट में उठाया गया कदम है। निर्णय लागू होने के बाद पैदा होने वाली परिस्थितियों पर या तो ध्यान नहीं दिया गया या फिर जानबूझकर उनको नजरअंदाज किया गया है। जब सरकार ने इतने बड़े प्रोजेक्ट पर काम किया, तो लगे हाथ उसके साइड इफेक्ट्स/ समस्याओं पर भी काम होना चाहिए था। उनका हल भी खोज लेना चाहिए था। लोग तर्क दे रहे हैं जवान सीमा पर खड़े हैं, आप खड़े नहीं हो सकते क्या? देश हित में फैसला है सहयोग नहीं कर सकते क्या? इतना बड़ा काम है थोड़ी बहुत असुविधा सहन नहीं कर सकते क्या? और भी न जाने क्या-क्या? बिलकुल खड़े हो सकते हैं। सहयोग कर सकते हैं। असुविधा भी झेल सकते हैं लेकिन कब तक। कहना बड़ा आसान है लेकिन जिस पर बीत रही है वो ही जानता है.....। शिकायत फकत इतनी है कि यह सब कार्ययोजना बनाकर पूर्णत सोच विचार किया जा सकता था। भले यह सब गोपनीय ही होता। खैर....बहारों का मौसम है आनंद लीजिए।

तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय-जय

एक टीवी चैनल पर कथित देश विरोधी कवरेज दिखाने के आरोप में नौ नवंबर को प्रस्तावित कार्रवाई स्थगित कर दी गई है। कार्रवाई स्थगित करने के कारगर कारण तो सरकार या उसके नुमाइंदे ही बता सकते हैं लेकिन जो बात सामने आ रही है वह यह है कि सरकार ने चौतरफा विरोध को देखते हुए यह काम किया है। जो भी हो चैनल बैन करने के निर्णय का विरोध दर्ज करवाने वाले आज खुश हैं। सोशल मीडिया के प्रमुख माध्यम फेसबुक व व्हाट्स एप पर ब्लेक की गई डिपी भी वापस रंगीन होने लगी है। पर लगता नहीं कि सरकार निर्णय स्थगित करने के वास्तविक कारणों का खुलासा करेगी लेकिन मेरे जेहन में कुछ सवाल जरूर खदबदा रहे हैं। यकीनन मेरे जैसे हालात कइयों के होंगे। मसलन, यह कार्रवाई का फरमान सुनाया ही क्यों गया? सुनाया गया तो इतना देरी से क्यों? जो मैसेज जाना था वह तो लाइव रिपोर्ट से जा चुका था। अब एक दिन बंद करने से उसकी भरपाई कैसे हो जाती?
खैर, जो भी कारण रहे इस फैसले को लेकर भी लोग दो भागों में बंटे नजर आए। किसी ने समर्थन में सुर मिलाए तो किसी ने फैसले की जोरदार खिलाफत की। अब फिर निर्णय स्थगित करने को भी दो तरीके से देखा जा रहा है। सुर में सुर मिलाने वालों की दलील हो सकती है कि सरकार का काम संबंधित चैनल को एहसास करवाना था और वह काम एेसा करने से हो गया। साथ ही इस बहाने एक संदेश भी सभी चैनलों को दे दिया गया। लगे हाथ सरकार ने यह भी जान लिया कि कौन उसके समर्थन में है और कौन नहीं। इधर बैन के विरोध करने वाले इसे जीत प्रचारित कर रहे हैं। कह रहे हैं कि सरकार ने देशव्यापी दबाव को देखते हुए अपने कदम वापस खींच लिए।
बहरहाल , मेरे को इस समूचे घटनाक्रम में दोनों ही पक्षों की जीत लग रही है। एक वो पक्ष है जो तात्कालिक रूप से अपनी बढ़त को जीत मान रहा है जबकि दूसरे पक्ष ने इसके दूरगामी फायदे को न केवल बखूबी पहचान लिया है बल्कि एक तीर से कई तरह के निशाने भी साथ लिए हैं। इसलिए इस मामले में किसी एक पक्ष को जीता व एक को हारा हुआ नहीं माना जा सकता है। ठीक तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय। ना तुम जीते ना हम हारे की तर्ज पर। और हां दो धड़ों में विभक्त हुई इस लड़ाई में समर्थक अपने-अपने हिसाब से व्याख्या करेंगे लेकिन जो ना इधर गए ना उधर गए और चुपचाप इस बड़े 'ड्रामे' को देख रहे थे उनका भरपूर मनोरंजन हो गया है। तटस्थ दर्शकों ने समर्थन व विरोध के विचारों एवं शब्दों की जुगाली का जी भर के लुत्फ उठाया है। हां समय खराब जरूर हुआ। खैर, जहां मनोरंजन हो वहां समय मायने भी नहीं रखता।

मुक्तक

दो दिन का अवकाश था। कल शाम को बैठे-बैठे कल्पना के घोड़े दौड़ाए तो यह पांच मुक्तक तैयार हो गए। आप भी देखिए...
1.
अजब दिन हैं कल-आज के, अजब हैं ये त्योहार।
कल श्रीराम का दिन था तो आज श्रीकृष्ण का वार। 
मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम हैं तो प्रेम पथिक कृष्ण मुरार। 
मिलजुल के रहो और प्रेम करो, है यही जीवन आधार।
2.
जैसे रिश्तों में एहसास जरूरी है।
जैसे जिंदा शरीर में सांस जरूरी है।
अक्सर सड़ जाता है ठहरा हुआ पानी दोस्तो।
आगे बढने के लिए हरदम प्रयास जरूरी है।
3.
रिश्ते डिजीटल हो गए क्या करें अब जोर।
धुआं और धमाके अब तो करते हैं बस शोर।
रिश्तों की बुनियाद हिली है, ना रहे वो लोग,
प्यार महोब्बत की बातें जो करते थे चहुंओर।
4.
मुंह देखकर ही निभाते, यहां सभी लोग दस्तूर।
अदला बदली के खेल में मिलती दाद भरपूर।
डिजीटल रिश्तों की बस तुम बात न पूछो दोस्तो
एक पल में जो लगते अपने, दूजे पल हो जाते दूर।
5.
कॉपी पेस्ट पर मिलता देखो यहां स्नेह अपार,
पर जो मौलिक होता यारो, करते सभी दरकिनार
इस वाहवाही के खेल में, बने ग्रुप अनेक
जो रखता है सोच बडी, वो ही करता नेक व्यवहार।

भूख


22th लघुकथा
झुग्गी-झोंपडि़यों में रहने वाले खानाबदोश परिवारों के बच्चों को त्योहारों का बड़ा बेसब्री से इंतजार रहता। विशेषकर दीपावली आते-आते तो इन बच्चों का उत्साह चरम पर पहुंच जाता। शहर की कई सामाजिक संस्थाएं उनके दर्द बांटने के बहाने आगे आती। कोई उनको कपड़े देता तो कोई सर्दी से बचाव के लिए कम्बल व रजाई आदि। कोई संस्था मिठाई बांटती तो कोई आतिशबाजी के लिए पटाखे व फूलझडि़यां। यह परंपरा शहर में बरसों से चली आ रही थी। यह सिलसिला दीपावली के तीन चार दिन पहले से ही शुरू हो जाता। संस्थाओं में मदद करने की होड़ सी लग जाती। जैसे ही कोई गाड़ी बस्ती में आकर रुकती बच्चों का उत्साह हिलोरें मारने लगता। एक दिन तो बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। चार पांच लग्जरी गाडि़यां आई। उन में से कोई पन्द्रह बीस युवा उतरे। सबसे पहले सभी ने संस्था का बैनर दीवार पर चिपकाया। इसके बाद सभी ने अपने-अपने मोबाइल निकाले और फोटो लेने में जुट गए। ललचाई आंखों से बच्चे यह सब देख रहे थे। फोटो सेशन होने के बाद बच्चों को कतार में बिठाया गया। मददगार संस्था के सदस्यों ने आतिशबाजी के पैकेट गाड़ी से निकाले और एक-एक पटाखा व दो-दो फूलझडि़या बारी-बारी से सबको देने लगे। साथ में फोटो लेने का क्रम दुगुनी गति से जारी था। मैं चुपचाप इस समूचे को घटनाक्रम को देख रहा था। मेरे को उन बच्चों व संस्था पदाधिकारियों में एक समानता नजर आई। बच्चों में कुछ पाने की तो देने वालों में प्रचार की।

शिक्षित एवं बुद्धिजीवी लोग फैला रहे जातिवाद


बस यूं ही
करीब सात साल पहले की बात है। आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं पर झुंझुनूं में चिकित्सकों का एक सेमिनार था। इसमें सबसे चौंकाने वाली बात यह आई कि जहां साक्षरता दर ज्यादा है, वहां भ्रूण हत्या अधिक हो रही है। इस बात के लिए वक्ताओं ने बाकायदा झुंझुनूं और डूंगरपुर जिले के उदाहरण भी बताए। उनका कहना था कि झुंझुनूं में साक्षरता दर ज्यादा है लेकिन प्रति हजार पुरुषों के पीछे महिलाओं की संख्या कम है। इससे ठीक उलट डूंगरपुर जैसे आदिवासी जिले में साक्षरता दर कम होने के बावजूद प्रति हजार पुरुषों के पीछे महिलाओं का आंकड़ा ज्यादा है। इस तथ्य से यह साबित होता है कि पढ़े लिखे लोग वह घृणित काम ज्यादा करते हैं, जिसकी वजह से लिंगानुपात में अंतर आया। खैर, बात जातिवाद की हो रही थी। मैं दावे की साथ कह सकता हूं कि जिस तरह लिंगानुपात कम करने में शिक्षित वर्ग का हाथ रहा है, उसी तरह जातिवाद भी पढ़े लिखे एवं बुद्धिजीवी लोग ही ज्यादा फैला रहे हैं। जरूरी नहीं है कि जो जिस जाति से है उसी की हिमाकत करे। कुछ तो ऐसे भी हैं जो कथित जातिनिरपेक्ष होने का स्वांग भरते हैं लेकिन बड़ी ही होशियारी एवं कलाकारी से दूसरी जाति पर अवांछित टीका टिप्पणी करने से बाज नहीं आते। सोशल मीडिया पर आजकल इस तरह के जाति निरपेक्ष लोगों की भरमार है। अफवाहों को हवा देने का प्रमुख केन्द्र भी इसी तरह के लोग हैं। यह जाति निरपेक्ष लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि जातिवादी बारूद पर बैठे राजस्थान में उनकी जातिवाद से संबंधित टिप्पणी आग में घी का काम करेगी, और कम से एक वर्ग तो उसका समर्थन करेगा ही। तभी तो सुनियोजित तरीके से जानबूझकर इस तरह का खेल खेला जाता है। 
यह फितरती लोग प्रमाणिक तथ्यों में पूर्वाग्रहों का तड़का लगाकर इस तरह का घालमेल कर देते हैं कि तटस्थ पाठक तो भ्रमित होता ही है, जातीय संतुलन पर भी खतरा मंडराने लगता है। मैं इस तरह की जातिवादी बातें करने वाले एवं सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर वैमनस्यता फैलाने वाले बुद्धिजीवी लोगों का हमेशा विरोधी रहा हूं और रहूंगा। हां तार्किक एवं तथ्यात्मक बातों का मैं हमेशा हिमायती रहा हूं। 
खैर, मेरी सोच एवं लेखन किसी समाज को ऊंचा या नीचा दिखाने का कभी नहीं रहा। जो है वो है। तड़का लगाकर सस्ती लोकप्रियता पाने या चर्चाओं में बने रहने का काम मेरे को नहीं आता। मेरी सोच समग्र इसीलिए है कि मैं एक ऐसे गांव का प्रतिनिधित्व करता हूं, जहां इस तरह की बातें नहीं होती। 
मेरा तो सवाल ही यह है कि जातिवाद का जहर है ही क्यों? यह फैला कौन रहा है? तथा इससे फायदा किसको है? मैं अपने पड़ोसी से जाति के नाम पर हमेशा लड़ता रहूं क्या यह समझदारी है? जातिवाद जैसा शब्द सियासत में जरूर प्रासंगिक हो सकता है लेकिन यह हमारी साझा विरासत को नुकसान पहुंचा रहा है। यह हमको बांट रहा है। टुकड़े टुकड़े कर रहा है। जातिगत व्यवस्था कहें या वर्ण व्यवस्था आजादी से पूर्व कभी रही होगी, वर्तमान में लोकतंत्र हैं, सब समान हैं। किसी तरह का कोई भेद नहीं है। हम आजादी से पूर्व के उदाहरणों को जिनको हमने प्रत्यक्ष न भोगा न देखा केवल सुना भर है, उनका हवाला देकर कब तक यह आग फैलाते रहेंगे। भाई-भाई को आपस में लड़ाते रहेंगे। जरूर यह जहर फैलाने वाले लोग किसी न किसी विचारधारा से प्रभावित हैं और उनका मकसद यही है कि लोग टुकड़ों में बंटे रहे हैं ताकि उनकी बुद्धिमता का भ्रम बना रहे। कितना अच्छा हो यह बुद्धिजीवी लोग जातिवाद के जहर को कम करने के उपाय बताएं और हां अगर उपाय बताने में पेट में मरोड़ उठें तो कम से कम शांत तो रह सकते हैं। सामाजिक बैर भाव बढ़ाकर ही लोकप्रियता पाना ही जिनका मकसद है, तो लानत है ऐसे लोगों पर। देश को कमजोर करने वाली ताकतों का समर्थन करना देशभक्ति नहीं हो सकती।

धन, धान व धर्म की धरती


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टिप्पणी 
नि संदेह यह प्रदेश का सबसे समृद्ध व संपन्न जिलों में से एक है। इस सरसब्ज जिले में सद्भाव की सरिता बहती है तो आधुनिकता व पुरातन परम्पराओं का गजब समावेश भी है। यहां कई संस्कृतियों का संगम है तो सेवा करने का अनुकरणीय जज्बा भी। इतनी खूबियों एवं खासियतों को अपने अंदर समेटने के बावजूद राजनीतिक फलक पर अक्सर श्रीगंगानगर की उपेक्षा ही हुई है। इन सब बातों के अलावा श्रीगंगानगर के साथ एक अनूठा संयोग भी जुड़ा है। यह संयोग है 'ध' से विशेष लगाव। हिन्दी वर्णमाला का 19वां अक्षर यहां की संस्कृति में इतना रच बस गया है कि अब श्रीगंगानगर की पहचान ही इससे होने लगी है। इस जिले का धूप से इतना गहरा नाता है कि गर्मियों में तामपान 48 डिग्री से पार हो जाता है। कमोबेश इससे ठीक उलट सर्दियों में होता है जब तापमान शून्य से नीचे होता है और धुंध की वजह से सप्ताह भर तक सूर्यदेव के दर्शन तक नहीं होते। 'ध' से ही धूल है तो 'ध' से ही धुआं। कृषि में सिरमौर होने के कारण किसानों का धूल से ही वास्ता पड़ता है। पड़े भी कैसे नहीं आखिर धोरों की धरती को उन्होंने खून पसीना बहाकर सोना उगलने वाली भूमि जो बना दिया है। जिले में कहीं पहाड़ी न होने के कारण यहां ईंट भट्ठों का कारोबार बहुतायत में है। श्रीगंगानगर धान का कटोरा है तो धर्म की नगरी भी। यह धनकुबेरों का जिला है, तभी तो इसकी समूचे प्रदेश में अलग तरह की धाक है। धर्म-कर्म तो यहां के जर्रे-जर्रे में है। यहां के लोग इतने हरफनमौला है कि किसी न किसी विधा में धमाल करते रहते हैं। इन सबके बावजूद विडम्बना यह है कि आधुनिकता की चकाचौंध में धड़ाधड़ आगे बढ़ते श्रीगंगानगर की युवा पीढ़ी धीमे जहर (नशा) की गिरफ्त में आ रही है। इस धीमे जहर का धंधा यहां धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। इससे भी चिंताजनक यह है कि सद्भाव व स्नेह की नींव पर खड़ी इस जिले रूपी इबारत में धोखे का कारोबार सेंध लगाकर इसे धराशायी करने का दुसाहस कर रहा है। इस धरती के लोगों का धीरज धीरे-धीरे जवाब दे रहा है। उसकी जगह अब गुस्सा घुसपैठ करने लगा है। आदमी का आदमी के प्रति विश्वास कम हो रहा है। गलतफहमी इस कदर घर कर चुकी है कि रिश्तों का कत्ल होते देर नहीं लगती। कई तरह के अपराध भी शांति की अग्रदूत रही इस धरा पर पैर पसार रहे हैं। बहरहाल, श्रीगंगानगर स्थापना दिवस के पुनीत मौके पर हम सबको इस बात का संकल्प जरूर लेना चाहिए कि जिले के गौरव व संस्कृति को नुकसान पहुंचाने वाले तमाम तरह के तत्वों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ेंगे। चाहे वो सामाजिक कुरीतियां हों या फिर सद्भाव को प्रभावित करने के कुत्सित प्रयास। नशे का कारोबार हो या एक दूसरे के प्रति कम होता विश्वास। स्थापना दिवस मनाने की सार्थकता भी तभी है जब हम यहां के सद्भाव व सेवाभाव को बनाए रखने के साथ साथ तमाम तरह की विकृतियों/ कुरीतियों के खिलाफ एकजुट होकर शपथ  लें।
26 अक्टूबर 16 के श्रीगंगानगर संस्करण में प्रकाशित ..

तू जीए हजारों साल, है मेरी आरजू....


आज धर्मपत्नी निर्मल का जन्मदिन है। मेरा जन्मदिन भी अक्टूबर माह में ही आता है। दोनों के जन्मदिन में केवल सात दिन का अंतर है। मतलब मेरा 18 तो उसका 25 अक्टूबर। जन्मदिन की शुभकामना तो वैसे रात को ऑफिस से घर पहुंचते ही दे दी थी लेकिन सुबह कुछ शरारत सूझी। मैंने कहा जिंदगी के ......बसंत पूरे करने पर बधाई। (महिलाएं अपनी सही उम्र बताती ही कहां हैं। भला मैं सही बोलकर यह गुस्ताखी कैसे कर सकता हूं।) बस इतना सुनते ही बोली, जन्मदिन की बधाई ठीक है, उम्र का जिक्र मत करो। मैंने कहा हकीकत से क्यों भाग रहे हो। जो है वो तो है ही। खैर, इस विषय पर हम दोनों के बीच देर तक हंसी ठिठोली चलती रही।
इससे ठीक एक दिन पहले छोटे बेटे एकलव्य ने सवाल पूछकर धर्मसंकट खड़ा कर दिया था। उसने कहा था, पापा आप व्हाट्सएप की डीपी में दादीसा-दादोसा की फोटो ही क्यों लगाते हो। मैंने कहा बेटे वो मेरे माताजी-पिताजी हैं और मैं उनसे सर्वाधिक प्रेम करता हूं। इतना सुनते ही उसने कहा पापा याद है ना कल मम्मी का जन्मदिन है। मैंने कहा तो? तो कुछ नहीं मम्मी ने आपके जन्मदिन पर अपने व्हाट्सएप की डिपी बदली थी और स्टे्टस भी, क्या आप भी ऐसा ही करोगे? बड़ी मासूमियत से पूछे गए इस गंभीर सवाल का जवाब मैंने कुछ नहीं दिया। हां जरा सा मुस्कुरा भर दिया। आज सुबह उठते ही सबसे पहले व्हाट्स एप की डीपी एवं स्टेट्स चेंज किया।
बस एक ही चीज बची थी फेसबुक। उस पर जन्मदिन की शुभकामनाएं या बधाई लिखने की बजाय कुछ नया करने का विचार आया। लिहाजा, पहले तो यह भूमिका लिखने का मानस बनाया। बहरहाल, जन्मदिन के मौके पर यह चंद पंक्तियां निर्मल को ही समर्पित हैं--।
घर की रौनक तुमसे निर्मल, तुम ही घर की शान,
मेरी खुशी की खातिर तुम, कर देती नींदें कुर्बान।
हर काम से बड़ी है सचमुच, घर की सारी जिम्मेदारी,
तुम मेरे साथ न होती, तो ना मिलती ऐसी पहचान।
जन्मदिन की बहुत सारी बधाई.... शुभकामनाएं......।

प्रतिमाओं की पुकार

 टिप्पणी 

भई वाह! यह तो कमाल ही हो गया! समझ नहीं आ रहा, हम इस हालात पर हंसे, हंगामा करें या किसी तरह की कोई शिकवा-शिकायत। हमें पहचानों शहरवासियों, हम कोई गैर नहीं बल्कि आपके शहर के प्रमुख चौक-चौराहों पर लगी वो प्रतिमाएं हंैं, जिनको आप लोगों ने लगभग बिसरा दिया है। हम में से कोई क्रांतिकारी है तो कोई शहीद। कोई संविधान निर्माता है तो कोई राष्ट्रपिता। कोई श्रीगंगानगर का संस्थापक है तो कोई राजनेता। आप लोगों ने अपनी जरूरतों के हिसाब से समय-समय पर हमारी प्रतिमाओं को चौक-चौराहों पर स्थापित तो करवा दिया लेकिन अब हमारी परवाह किसी को नहीं। जन्मदिवस या पुण्यतिथियों की बात छोड़ दें तो बता दीजिए आप हमें याद करते ही कब हो। हां, चुनाव का मौसम होता है तब तो नेताओं को हमारी बहुत याद आती है। हम सबके प्यारे हो जाते हैं। कोई हमारे काम पर तो कोई नाम पर चुनाव लड़ता है। कोई तो हमारी शहादत तक को भुनाने से नहीं चूकता। खूब सियासत होती है हमारे नाम पर। हमारे सहारे सियासी फायदे एवं नुकसान तक खोजे जाते हैं।
खैर, आप सब जानते हो यहां के सद्भाव की, समृद्धता की व सपंन्नता की बात-बात पर मिसालें दी जाती हैं। सच-सच बताना, कितनी खुशी होती है यह सब सुनकर। यकीनन छाती गर्व से चौड़ी हो जाती है। जब इस तरह की खासियत, इस तरह की आत्मीयता, इस तरह का अपनापन, इस तरह की इंसानियत, इस तरह का सेवाभाव यहां है तो फिर हमसे ही यह बेरुखी क्यों? यह उपेक्षा क्यों? यह भेदभाव क्यों? अरे आप ही तो हो जो सालासर या रामदेवरा जाने वाले पदयात्रियों की सेवा में दिन-रात एक कर देते हो। नर को नारायण मानकर उनकी सेवा करते हो। अटूट लंगर व छबीलें लगाते हो। इस तरह की सोच व जज्बा रखने वाले लोग हो तो फिर हमको इस तरह लावारिस मत बनाओ। हम भी आपके अपने ही हैं।
हां हम इतना जरूर जानते हैं कि सियासी लोगों ने हमारा बहुत फायदा उठाया है। अब भी उठाते हैं। यहां के जिम्मेदार अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि तो पता नहीं किस नींद में गाफिल हैं। दूरदर्शिता का अभाव कहें या उनकी आपस की नूराकुश्ती, इन लोगों ने तो शहर को बदहाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे अधिकारी व जनप्रतिनिधि हमारी सुध लेंगे भी क्या?
हमको उम्मीद की किरण केवल और केवल यहां के सेवाभावी लोगों व युवाओं में ही नजर आती है। आप लोगों में सेवा का जज्बा है। श्रीगंगानगर का स्थापना दिवस आने वाला है। आप सब इस पुनीत मौके पर यह संकल्प जरूर लें कि आप न केवल समय-समय पर प्रतिमाओं की खैर-खबर लेंगे बल्कि इनके मान-सम्मान का भी पूरा ख्याल रखेंगे। यकीन मानिए आप लोगों ने यह सब कर दिखाया तो श्रीगंगानगर की ख्याति में चार चांद लग जाएंगे।

राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 22 अक्टूबर 16 के अंक में प्रकाशित ...

ताकि सुकून से मने दीपोत्सव

 टिप्पणी

बदहाली के भंवर में फंसे शहर की तमाम व्यवस्थाएं भगवान भरोसे नजर आती हैं। बद से बदतर होने की तरफ बढ़ रहे हालात हकीकत में हतप्रभ करने वाले हैं। दीपावली के चलते दर ओ दीवारों को दमकाने का दौर भले ही चल रहा हो लेकिन शहर गंदगी और गर्त के आगोश में है। यही कारण रहा कि मंगलवार को कुछ युवाओं ने सोए हुए प्रशासन को जगाने की एक छोटी सी कोशिश की। 
नगर परिषद कार्यालय में मोमबत्तियां जलाकर इन युवाओं ने प्रशासन, नगर परिषद एवं पार्षदों की कार्यशैली के खिलाफ विरोध जताया। भले ही यह विरोध प्रतीकात्मक रहा हो लेकिन यह साबित करता है कि लोगों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। शहर का आम आदमी दुखी है। वह अंदर ही अंदर सुलग रहा है। व्यवस्थाओं को कोस रहा है और मुखर होकर सडक़ पर आने लगा है।
वैसे भी शहर में ऐसी व्यवस्था नजर नहीं आती जिस पर संतोष किया जा सके। निराश्रित पशुओं का स्वच्छंद विचरण, श्वानों की बढ़ती फौज और गंदगी से बजबजाती नालियों में पनपते मच्छरों ने शहर व शहरवासियों की सेहत वैसे ही बिगाड़ रखी है। शहर की खूबसूरती से खिलवाड़ कर गंगानगर से गंदानगर होते शहर की फिक्र किसी को नहीं? सडक़ों पर उड़ती धूल, कचरे से अटी नालियां, कई जगह बंद पड़ी रोडलाइट, खराब हाइमास्ट, टूटी सडक़ें, क्षतिग्रस्त डिवाइडर, जगह-जगह पसरा अतिक्रमण, मनमर्जी की पार्किंग, बेतरतीब यातायात आदि यह बताते हैं कि व्यवस्थाएं यहां हांफ रही हैं तो प्रशासन पंगु जैसा हो चुका है। रही-सही कसर सियासी रस्साकशी ने पूरी कर दी। जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारी भी जनहित के जुड़े मसलों को दरकिनार कर खुद के अहं की तुष्टि करने में जुटे हैं।
बहरहाल, जनप्रतिनिधियों एवं जिम्मेदारों को इस सांकेतिक प्रदर्शन से अब जाग जाना जाहिए। शहरवासियों की दीपावली अच्छे से मने। शहर साफ सुथरा हो, अधूरे काम प्राथमिकता से जल्द पूरे हो, लगभग स्थायी बन चुकी समस्याओं के निराकरण के लिए ठोस एवं दूरगामी योजना बने। प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी एवं जनप्रतिनिधि ऐसा कर पाए तो यकीन मानिए शहर सुकून के साथ दीपोत्सव मना पाएगा।

राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 20 अक्टूबर 16 के अंक में प्रकाशित....