Monday, March 4, 2019

खेत से खेल तक कहीं नहीं हैं खौफ लेकिन चौपालों में चर्चाओं का विषय बदला

श्रीगंगानगर। पहले पुलवामा में आतंकी हमला। इसके बाद हिन्दुमलकोट क्षेत्र में फायरिंग और उसी दिन देर रात अनूपगढ़-रायसिंहनगर क्षेत्र में पाक की तरफ से आसमान में दो तेज धमाकों के साथ विमान की गडग़ड़ाहट सुनाई देना। पड़ोसी मुल्क की इन तीन हरकतों के बावजूद श्रीगंगानगर जिले की सीमा से लगते गांवों में किसी तरह का कोई खौफ नहीं है। पत्रिका टीम ने हिन्दुमलकोट से लेकर घड़साना तक सरहद से सटे छह गांवों में जाकर मौके के हाल जाने। सरहदी गांवों का माहौल, मौके के हालात भी समान दिखाई दिए। ग्रामीणों की भावनाओं को कुरेदा गया तो कमोबेश हर गांव की कहानी एक जैसी मिली। किसान खेतों में पहले की तरह की काम में जुटे हैं, वहीं गांव के युवा शाम को खेलने में मशगूल हो जाते हैं। कहीं कबड्डी खेली जा रही है तो वॉलीबाल। ग्रामीणों में चौपाल में कहीं हुक्के के सुट्टे हैं तो कहीं ताशपत्ती से मनोरंजन किया जा रहा है। लब्बोलुआब यह है कि सरहद क्षेत्र में सब कुछ सामान्य ही है। सब कुछ पहले जैसा ही है। हां भावना लगभग सभी की समान ही है। सभी चाहते हैं पाकिस्तान को इस बार सबक ठीक से सिखाना चाहिए ताकि भविष्य में कभी लड़ाई की सोचे ही नहीं।

१. मिर्जेवाला (हिन्दुमलकोट) क्षेत्र के गांव दौलतपुरा से लाइव
माहौल- जनजीवन सामान्य है। कामकाज पहले की तरह ही चल रहा है। चौपाल से खेत तक सब सामान्य।
मौके के हालात- चौपाल में ग्रामीण ताजा घटनाक्रमों की चर्चा करते मिले। किसान खेतों में व्यस्त दिखाई दिए।
ग्रामीणों की भावना- सेना का साथ पहले भी दिया था। इस बार भी सेना बदला लेगी इसका पूरा भरोसा है।

२. केसरीङ्क्षसहपुर क्षेत्र के गांव ७ एस द्वितीय से लाइव
माहौल- तारबंदी के पार खेती वाले किसान जरूर आशंकित हैं। बाकी सब सामान्य। दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं।
मौके के हालात- पाकिस्तान की धोखे से हरकत करने की बात की चर्चा। डर व भय नहीं, कहते हैं 'अठै कीं कोनी Ó।
ग्रामीणों की भावना- युद्ध हुआ तो गांव खाली नहीं करेंगे। सेना का सहयोग करेंगे, साथ देंगे।

श्रीकरणपुर क्षेत्र के गांव शेखसरपाल से लाइव
माहौल- जनजीवन सामान्य। दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं। ग्रामीणों में किसी तरह का भय या खौफ नहीं।
मौके के हालात- रोजमर्रा के काम करते मिलते ग्रामीण। गांव के युवा वॉलीबाल खेलते हुए मिले।
ग्रामीणों की भावना- जवानों का साथ देना चाहते हैं। पाकिस्तान को फिर से पटकनी देने की हसरत है।

रायसिंहनगर क्षेत्र के गांव काकूसिंह वाला से लाइव
माहौल- सब सामान्य है। खेत खलिहान से चौपाल तक पड़ोसी मुल्क से बदला लेने के चर्चा है।
मौके के हालात- बिना किसी भय के गांव की चौपाल पर ताशपत्ती खेलने में मशगूल मिले।
ग्रामीणों की भावना-आर पार की लड़ाई चाहते हैं। देश सेवा के लिए हर पल तैयार।

अनूपगढ़ क्षेत्र के गांव 27 से लाइव
माहौल- सब कुछ पहले जैसा। किसी तरह का कोई तनाव नहीं। ग्रामीण अपने अपने कामों में व्यस्त।
मौके के हालात- गांव में चल रही कबड्डी प्रतियोगिता देखकर उत्साहित थे ग्रामीण। हूटिंग भी कर रहे थे।
ग्रामीणों की भावना- इस बार नापाक हरकत का मुंह तोड़ जवाब दिया जाए ताकि दुबारा हिमाकत ही ना करे।

घड़साना क्षेत्र के गांव 8 केएसएम से लाइव
माहौल- सब कुछ सामान्य है। ग्रामीणों के उत्साह में किसी तरह की कोई कोई कमी नहीं। दिनचर्या में बदलाव नहीं।
मौके के हालात- ग्रामीण हीं ताशपत्ती खेलते तो कहीं हथाई करते मिले। युवाओं में खेल में व्यस्त नजर आए।
ग्रामीणों की भावना- कायरना हरकतों को पाकिस्तान को करारा जवाब मिलना चाहिए। सेना का सहयोग करने का तैयार।
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राजस्थान पत्रिका के 27 फरवरी 19 के अंक में तमाम संस्करणों में प्रकाशित।

सावधान! फोन पर मांगी जा रही सेना से जुड़ी जानकारी!

इंटनेट के माध्यम से किए जा रहे हैं फोन, पाक की करतूत का अंदेशा
श्रीगंगानगर. भारत-पाक के मध्य बढ़े तनाव के बीच एक नए तरीके का मामला सामने आया है। सरहद से सटे गांव के लोगों के पास तेरह डिजिट के नंबर से फोन आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह फोन इंटरनेट की मदद से किए जा रहे हैं। फोन करने वाला भारतीय सेना की लोकेशन संबंधी जानकारी मांगता है। एेसे में यह पड़ोसी मुल्क की करतूत भी हो सकती है। एेसा ही एक फोन सोमासर सरपंच पति तथा टिब्बा क्षेत्र संघर्ष समिति का संयोजक राकेश बिश्नोई के पास आया । राकेश बिश्नोई अभी एटा सिंगरासर माइनर निर्माण के लिए चलाए जा रहे आंदोलन के कारण चर्चा में रहे हैं। राकेश बिश्नोई ने बताया कि बुधवार सुबह साढ़े दस बजे के करीब उनके पास तेरह डिजिट वाले नंबरों से फोन आया। फोन करने वाले ने उससे सीमा पर भारतीय सेना है या नहीं? है तो कब से है? तथा क्या कर रही है ? आदि सवाल दागे लेकिन राकेश बिश्नोई ने इनका जवाब देने में असमर्थता जताते हुए पुलिस थाने में संपर्क करने को कहा। सवाल करने वाले ने सैन्य वाहनों व टैंकों की संख्या भी पूछी लेकिन उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी। फोन +3444172258965 नंबर से आया और दो मिनट चौबीस सेकंड तक बातचीत हुई लेकिन बिश्नोई ने उसको कोई जवाब नहीं दिया। बिश्नोई ने कहा कि इस तरह का फोन किसी के पास आ सकता है, इसलिए सेना से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी शेयर नहीं करें।
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राजस्थान पत्रिका के 28 फरवरी 19 के अंक में प्रकाशित।

पहली बार आए भारत, 100 अरब डॉलर के निवेश की खुली राह


सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान 90 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक
पुलवामा आतंकी हमले के बीच अगर कोई चर्चा में रहा है तो उनमें सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का नाम भी आता है। सलमान चर्चा में इसीलिए भी क्योंकि पुलवामा आतंकी हमले के बाद उन्होंने पाक की यात्रा की। सलमान के पाक से सीधे भारत आने पर जब भारत सरकार ने आपत्ति दर्ज कराई, तो वह पाक से पहले रियाद लौटे और फिर वहां से भारत आए। सलमान की यह पहली यात्रा थी। सलमान को एमबीएस नाम से भी जाना जाता है। वे अथाह संपत्ति के मालिक हैं तथा शाही जीवन शैली के लिए अक्सर चर्चा में रहते हैं।
सलमान का जन्म 31 अगस्त 1985 को हुआ था। एक रिपोर्ट के मुताबिक सलमान 90 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रिंस सलमान ने 3200 करोड़ रुपए की यॉट, 2,936 करोड़ रुपए की द विंची की पेंटिंग और 1,957 करोड़ रुपए में फ्रांसीसी महल खरीदे थे। इसके कारण वे सुर्खियों में रहे।
सलमान को सऊदी अरब की आतंकवाद निरोधक इकाई के प्रमुख के तौर पर साल 2003-06 में आतंकवादी संगठन अलकायदा के ठिकाने पर बमबारी करने के लिए भी जाना जाता है।
भले ही उनके भारत व पाक दौरे पर कई तरह की बातें की गई हों लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के साथ 20 अरब डॉलर के करार किए जबकि भारत व सऊदी अरब के बीच पांच करार हुए। सऊदी अरब, भारत में 100 अरब डॉलर (करीब 7.1 लाख करोड़ रु) का निवेश करेगा।
प्रिंस ने 850 भारतीय कैदियों को रिहा करने के आदेश भी दिए। एक अन्य रिपोर्ट के हिसाब से सलमान ने भारतीय हज यात्रियों की संख्या को बढ़ाकर 2 लाख कर दिया है। विदित रहे कि सऊदी अरब ने भारत के लिए आवंटित हज कोटे में करीब 25 हजार की बढ़ोतरी की है। इस कारण यह कोटा अब दो लाख हो गया है।
पिछले साल 1,75,025 लोग हज पर गए थे। काबिलगौर है कि सऊदी अरब भारत का चौथा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है। सऊदी अरब भारत की कुल जरूरत का 17 प्रतिशत कच्चा तेल और 32 प्रतिशत एलपीजी मुहैया करा रहा है। ऐसे में कालांतर में इस यात्रा के परिणाम भी दिखाई देंगे।
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  राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पेज पर 25 फरवरी 19 के अंक में तमाम संस्करणों में प्रकाशित। 


पाक जा रहा पानी रुके तो 30 % बढ़ जाएगा फसलों का उत्पादन

श्रीगंगानगर. आतंकी धमाके से निकली पानी की सियासत कोई नई नहीं है। पिछले तीन दशक में सतलुज और व्यास नदियों का 15 से 20 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) से ज्यादा पानी पाकिस्तान जा चुका है।
यह इतना पानी है कि इससे इंदिरा गांधी नहर को लगातार तीन साल तक चलाया जा सकता है। केन्द्र सरकार भारत के हिस्से का पानी रोकने की दिशा में गंभीरता से अमल करे तो देश के कई इलाकों की तस्वीर बदल जाएगी। अकेले राजस्थान को पाकिस्तान बहकर जाने वाले सतलुज और व्यास नदी के पानी का बीस प्रतिशत हिस्सा ही मिले तो इंदिरा गांधी नहर के साथ-साथ भाखड़ा और गंगनहर के किसानों को सिंचाई के लिए साल भर पानी की कमी नहीं रहेगी।
इस पानी का असर सीधे तौर पर खरीफ व रबी दोनों फसलों के उत्पादन पर पड़ेगा। इससे फसलों का उत्पादन तीस प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
रावी पर बांध निर्माण का काम धीमा
रावी के पानी को पाक जाने से रोकने के लिए शाहपुर कंडी बांध के निर्माण का काम पंजाब और जम्मू कश्मीर के बीच विवाद और केन्द्र से पर्याप्त राशि नहीं मिलने के कारण समय पर नहीं हो पाया। इसका निर्माण होने से रावी के पाक जाने वाले पानी का उपयोग पंजाब—राजस्थान कर सकेंगे।
नहर की मरम्मत हो तो हमारे 10 जिलों को लाभ
इंदिरा गांधी नहर: 10 से 11 हजार क्यूसेक पानी मिल रहा। क्षमता 18500 क्यूसेक, क्षतिग्रस्त होने के कारण नहीं ले सकती 12 हजार क्यूसेक से अधिक पानी। पुनर्निर्माण हो और पानी पाक न जाए तो मिलने लगेगा 1000 से 2000 क्यूसेक तक अतिरिक्त पानी। राजस्थान के 10 जिलों को मिलेगा लाभ।
गंगनहर : 2000 क्यूसेक पानी मिल रहा। क्षमता 3000 क्यूसेक। फिरोजपुर फीडर नहर का पुनर्निर्माण हो और पानी पाक न जाए तो 2500 से 3000 क्यूसेक तक पानी मिलने लगेगा।
भाखड़ा नहर : 1200 क्यूसेक पानी इंदिरा गांधी नहर से मिल रहा है। इस नहर का पुनर्निर्माण हो जाए और पानी पाक जाना रुक जाए तो 400-500 क्यूसेक पानी और मिलने लगेगा।
दोनों नहरें जर्जर हालत में
30 हजार से घटकर 20 हजार क्यूसेक रह गई है जलग्रहण क्षमता।
अगर बांधों से पानी की आवक 25 से 30 हजार क्यूसेक होगी तो 5 से 10 हजार क्यूसेक पानी पाक चला जाएगा।
बरसात के दिनों में हरिके हैडवक्र्स पर पानी की आवक 50 हजार से 1 लाख क्यूसेक प्रतिदिन हो जाती है तब अथाह जल राशि पाक जाती है।
इन पर हो काम तब देश में रुकेगा पानी
1. राजस्थान फीडर और फिरोजपुर फीडर का जीर्णोद्धार।
2. हुसैनीवाला हैडवक्र्स के गेटों की मरम्मत।
3. पाक जाने वाले पानी के उपयोग के लिए नहरी तंत्र को मजबूत और नई नहरों का निर्माण।
4. रोपड़ बांध के अलावा हरिके और हुसैनीवाला हैडवक्र्स का नियंत्रण भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड को
दिया जाए।
ऐसे समझिए पानी
का गणित
पिछले आठ वर्षों में हरिके हैडवक्र्स से 63 लाख 984 क्यूसेक डेज पानी पाकिस्तान जा चुका है। वर्ष 2009-10 में 16 हजार, 2011-12 में 11 लाख 30 हजार, 2011-12
में 22 लाख 8 हजार, 2012-13 में 51 हजार 500, 2013-14 में 16 लाख 27 हजार 500, वर्ष 2014-15 में 4 लाख, 2015-16 में पांच लाख तथा वर्ष 2016-17 में लगभग 8 लाख क्यूसेक डेज पानी पाकिस्तान गया।
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राजस्थान पत्रिका के 25 फरवरी 19 के अंक में राजस्थान के लगभग सभी संस्करणों में  प्रकाशित ।

मंत्रीजी झुंझुनूं आए क्यों थे!

बस यूं ही
रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा गुरुवार को झुंझुनूं आए थे। उनके जाने के बाद लोगों के जेहन में अब एक ही सवाल है कि मंत्रीजी झुंझुनूं आए क्यों थे? हालांकि मंत्रीजी के आने से पहले यह उम्मीद थी कि शायद वो कोई बड़ी सौगात देकर जाएंगे। खैर, मंत्रीजी आए और चले गए लेकिन न माया मिली न राम वाली कहावत चरितार्थ जरूर कर गए। हां आए थे सो कुछ तो करना बनता ही था, लिहाजा सीकर- दिल्ली के बीच केवल तीन दिन चलने वाली ट्रेन का नाम जरूर सैनिक एक्सप्रेस रख गए, वह भी झुंझुनूं सांसद के आग्रह पर। नामकरण शायद इसलिए कि यह सैनिक बाहुल्य इलाका है। सेना व सैनिकों के प्रति यहां के लोगों में श्रद्धा है। सम्मान है। यहां सेना के नाम से ही लोग खुश हो जाते हैं। रेल सैनिकों के नाम से चलेगी तो लोगों की भावनाएं खुद ब खुद जुड़ जाएंगी। और जब भावनाएं ही जुड़ जाएंगी तो और कुछ करने की जरूरत भी कहां रह जाती है। शायद इसी फीडबैक/ सुझाव के आधार पर मंत्रीजी इस ट्रेन का नाम सैनिक एक्सप्रेस करने की घोषणा कर गए, लेकिन भूल भी गए। यह नाम तो 25 साल पहले ही रखा जा चुका है। 1992 में तत्कालीन रेल मंत्री जाफर शरीफ इस रेल का नाम सैनिक एक्सप्रेस रख चुके हैं। तब भी यह सीकर-दिल्ली के बीच चलती थी, लेकिन नियमित थी। मीटर गेज लाइन हटी तो यह ट्रेन बंद हो गई। आमान परिवर्तन के बाद इस ट्रेन का संचालन फिर शुरू हुआ, वह भी सप्ताह में तीन दिन। स्थान वो ही सीकर से दिल्ली। लाइन नई तो रेल भी नई। शायद यही सोचकर सैनिक बाहुल्य इलाके को नामकरण की यह सौगात दी गई है। फिर भी कितना अच्छा होता वो इस ट्रेन को नियमित करने की घोषणा कर के जाते, पर वो एेसा कर न सके। करें भी क्यों? जब लोग नाम से ही खुश हो रहे हैं तो मंत्रीजी और ज्यादा देवे भी क्यों?
खैर, मंत्रीजी का दौरा था। इस कारण सीकर व झुंझुनूं के सांसद भी जुटे थे तो। एेसे में कुछ तो होना ही था। और नहीं तो मंत्रीजी डिस्प्ले बोर्ड ( नेशनल ट्रेन इंक्वायरी सिस्टम) का उद्घाटन ही कर गए। यह बात अलग है कि इस ट्रेक पर रेलों की संख्या ज्यादा नहीं है, लिहाजा इस बोर्ड का हाल फिलहाल ज्यादा उपयोग होगा भी नहीं। वैसे मंत्रीजी इस रेल को अगले माह से रींगस तक बढ़ाने तथा मई तक जयपुर तक करने की कहकर गए हैं। देखने की बात यह है कि मंत्रीजी की बात सच साबित होती है या नहीं। काश! उनकी यह घोषणा सच ही साबित हो क्योंकि समय की पालना पहले भी नहीं हुई।

जब ग्रामीणों ने ट्रैक्ट्ररों को बना दिया था 'टैंक'

दो दिन तक रोके रखा था पाक सेना को
श्रीगंगानगर/ श्रीकरणपुर.
यह कहानी जिले के श्रीकरणपुर उपखंड के सीमा से सटे गांव नग्गी की है। बात करीब 47 साल पुरानी है, जब ग्रामीणों ने दो दिन तक अपने दम पर पाक सैनिकों को आगे बढऩे से रोक दिया था। दरअसल, भारत-पाक के मध्य 1971 में हुए युद्ध को समाप्त हुए दस दिन बीत चुके थे। सीमा पर तैनात भारतीय सेना लौट चुकी थी। सरहद पर सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन सीमा के उस पार धोखे से हमला करने की साजिश रची गई। इसके बाद पाक सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए और करीब एक किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना को जब पाक की इस नापाक करतूत की जानकारी मिली तो चार पैरा बटालियन को क्षेत्र मुक्त करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। भारतीय सेना को मौके पर पहुंचने पर कुछ विलम्ब हुआ। सीमा पर पाक सैनिकों व टैंकों का जमावड़ा देख नग्गी के ग्रामीण चिंतित तो हुए लेकिन उन्होंने दिमाग से काम लिया। आसपास के गांवों से ट्रैक्टर एकत्रित कर उनके साइलेंसर निकाल लिए गए। इसके बाद तेज आवाज में उनको गांव में घुमाया गया। बिना साइलेंसर के ट्रैक्टरों की आवाज को पाक सैनिकों ने टैंकों की आवाज समझा और दो दिन तक वह आगे नहीं बढ़ पाए। इसके बाद भारतीय सेना ने आकर मोर्चा संभाल लिया था। क्षेत्रवासियों की ओर से सेना को दी मदद का आज भी सैन्य अधिकारी आभार जताते हैं। वहीं इस घटना के साक्षी जो कि अब उम्रदराज हो चुके हैं, वे इसे अपना फर्ज मानते हैं।
मात्र दो घंटे में खदेड़ दिया था पाक सेना को
आदेश मिलने के बाद 4 पैरा बटालियन ने 28 दिसम्बर की सुबह चार बजे पाक सैनिकों पर हमला बोला।मात्र दो घंटे की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना को फिर पराजय का मुंह देखना पड़ा और उसके सैनिक भाग खड़े हुए। भारतीय सेना के आक्रमण को विफल करने के लिए पाकिस्तानी सेना ने तोप से 72 गोले बरसाए जिससे 4 पैरा बटालियन के 4 अधिकारी व 21 जवान शहीद हो गए। युद्ध में शहीद रणबांकुरों की स्मृति में उसी जगह पर एक स्मारक बनाया गया। भारत पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज पांच सौ फीट दूर यह स्मारक आज भी उन वीरों की याद दिलाता है। यह लड़ाई भारतीय सेना के इतिहास में 'सैंड ड्यूनÓ के नाम से दर्ज है।
आज भी तैयार हैं ग्रामीण
नग्गी के ग्रामीण 1971 की तरह सेना की मदद को तैयार हैं। बुजुर्ग ग्रामीणों योगराज मेघवाल व अर्जुन राम ने आतंकी हमले की निंदा करते हुए कड़े कदम उठाकर की बात कही। उन्होंने 1971 के युद्ध का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय पाक ने गांव नग्गी में कई बम गिराए गए लेकिन वे गांव छोड़कर नहीं भागे और सेना का सहयोग किया। यही वजह थी कि कुछ ही देर में दुश्मनों को घर का रास्ता दिखा दिया गया। वार्ड पंच शिवभगवान मेघवाल, राजकुमार शर्मा, रामप्रताप मेघवाल, सतपाल डूडी, भानीराम ने कहा कि पाक को करारा जवाब देने के लिए वे आज भी सेना का हरसंभव सहयोग करने को तैयार हैं।
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राजस्थान पत्रिका के तमाम संस्करणों में 21 फरवरी 19 के अंक में प्रकाशित

शहीद की परिभाषा नहीं-3


बस यूं ही
सेनाओं में भारतीय सेना, वायुसेना व नौसेना शामिल हैं। सेना युद्ध के वक्त की मोर्चा संभालती है। युद्ध न होने या सामान्य दिनों में सेना के जवान छावनी में रहते हैं। वैसे सेना, वायुसेना व नौ सेना के लिए अलग-अलग रिहायशी क्षेत्र बनाए गए हैं। युद्ध नहीं होता है, तो सेनाएं वहीं रहती हैं हालांकि नौसेना का काम थोड़ा अलग है। उसका काम समुद्री सीमाओं की सुरक्षा का है। एेसे में शांति के समय भी नौ सैनिकों को समुद्री सीमाओं पर तैनात रहना पड़ता है। यह तीनों सेनाएं रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करती है। सेना में लेफ्टिनेंट, मेजर, कनज़्ल, ब्रिगेडियर, मेजर जनरल आदि रैंक होती हैं. सैनिकों को रिटायरमेंट के बाद पेंशन मिलती है। तीनों सेनाओं में करीब साढ़े तेरह लाख सैनिक हैं।
अब बात करते हैं अद्र्धसैनिक बलों की। इनमें सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआईएसफ, असम राइफल्स व एसएसबी शामिल हैं। वर्तमान में अद्र्धसैनिक बलों के जवानों की संख्या नौ लाख से ज्यादा बताई जाती है। इनमें भी सिविल पुलिस की तरह कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, एएसआई, असिस्टेंट कमांडेंट और कमांडेंट, डीआईजी, आईजी और डीजी की पोस्ट होती है। अद्र्धसैनिक बलों को सेवानिवृत्ति के बाद सेना की तरह पेंशन नहीं मिलती है। अद्र्धसैनिक बल गृह मंत्रालय के अधीन हैं। कौनसे बल को कहां तैनात किया जाता है तथा उसकी क्या भूमिका होती है। इसको हम इस तरह से समझ सकते हैं। सीआरपीएफ को आतंकवाद व नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात किया जाता है। इसको केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल भी कहा जाता है। इसी तरह बीएसएफ जिसे सीमा सुरक्षा बल भी कहते हैं। इसके जवानों को बांग्लादेश व पाकिस्तान से सटी सीमा पर तैनात किया जाता है। एक तरह से बीएसएफ शांति के समय सरहद की निगरानी रखती है। युद्ध काल में बीएसएफ की जगह सेना के जवान मोर्चा संभालते हैं। इसी तरह आईटीबीपी जिसे भारत-तिब्बत सीमा पुलिस भी कहा जाता है, इसके जवानों को भारत-तिब्ब्त सीमा पर लगाया जाता है। केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल अर्थात सीआईएसएफ पर सरकारी उपक्रमों की सुरक्षा की जिम्मा रहता है। असम राइफल्स के जवानों को असम के उग्रवाद प्रभावित इलाकों में तैनात किया जाता है तो एसएसबी मतलब सशस्त्र सीमा बल को भारत-नेपाल सीमा लगाया जाता है।
बहरहाल, सबसे ज्वलंत मसला अद्र्धसैनिकों बलों द्वारा सेना जैसी सुविधाओं व सहुलियतों की मांग करना है। अद्र्धसैनिक बलों की शिकायत यह है कि वह भी लगभग सेना जैसी परिस्थितियों में ही काम करते हैं। इतना ही नहीं देश के भीतर तथा सीमाओं पर तैनात रहते हैं, इसलिए उनको भी सेना की तरह सेवा शर्तें व सम्मान मिलना चाहिए।
अक्सर आम लोग भी लोग सेना और अद्र्धसैनिक बलों को एक मानने या समझने की भूल कर बैठते हैं। पुलवामा हमले के बाद तो इस बात ने ज्यादा जोर पकड़ा है। फिर भी सेना व अद्र्धसैनिक बलों का काम और सेवा शर्ते अलग-अलग होती हैं। अद्र्धसैनिक बलों की पेंशन संबंधी मांग को कॉन्‍फेडरेशन ऑफ रिटायर्ड पैरा मिलिट्री एसोसिएशन के महासचिव रणवीर सिंह के बयान से समझा जा सकता है। यह बयान उन्होंने एक वेबसाइट को दिया था। उनका कहना था कि 'सातवें वेतन आयोग में अद्र्धसैनिक बलों को सिविलयन मान लिया गया है। उनको वन रैंक वन पेंशन की बात तो दूर, सातवें वेतन आयोग में उनको भत्ता तक नहीं दिया। अद्र्धसैनिकों की न केवल पेंशन बंद कर दी गई है, बल्कि सैनिकों की तरह एमएसपी (सैन्य सेवा वेतन) भी नहीं दिया जाता है। उन्होंने बताया कि सेना के जवानों को कैंटीन में जीएसटी की छूट दी गई है, लेकिन अद्र्धसैनिक बलों के जवानों को कैंटीन में जीएसटी से कोई छूट नहीं मिली है। Ó फिर भी निष्कर्ष के रूप में यह जरूर कहा जा सकता है कि अद्र्धसैनिक बल भी सेना के साथ मिलकर देश और देश के नागरिकों सुरक्षा करते हैं, इसलिए उनकी सेवा को भी कम नहीं आंका जा सकता है।
-इति

सेना के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध को तैयार

श्रीगंगानगर . पाक सीमा से सटे श्रीगंगानगर जिले के ग्रामीण अब आरपार की लड़ाई के मूड में हैं। सरहदी गांवों के लोग कहते हैं कि इस बार वो सेना के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध करने को तैयार हैं। युद्ध हुआ तो पीछे नहीं हटेंगे। हिन्दुमलकोट में इसी बात की चर्चा है कि पाक को जवाब कैसे दें? अनूपगढ़ क्षेत्र में सीमा से ढाई किमी दूर आबाद गांव 27 ए और 32 ए में ग्रामीणों की चौपाल में अब चर्चा फसल-पानी की न होकर पुलवामा के शहीदों और केन्द्र सरकार की ओर से सेना को दी गई छूट की है। 1971 का युद्ध देख चुके गांव नग्गी के मामराज ने कहा कि उस समय पाक ने नग्गी में कई बम गिराए, लेकिन गांव छोड़कर नहीं भागे। पूर्व सरपंच रणजीत कहते हैं कि पाक सीमा पर नजर रखने के लिए कई ग्रामीण रात को पानी की बारी लगवा रहे हैं।

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.राजस्थान पत्रिका के लगभग सभी संस्करणों में 20 फरवरी 19 के अंक में प्रकाशित 

शहीद की परिभाषा नहीं-2

बस यूं ही
दरअसल शहीद के दर्जे की मांग से तात्पर्य उस सुविधा व पैकेज से भी जुड़ा है, जिसमें कइयों को ज्यादा भत्ता व पैकेज मिलता है तो कइयों को कम। वैसे तो यह सरकारों की इच्छा शक्ति तथा शहीद होने परिस्थितियों पर निर्भर होता है कि जवान ने किस हालात में प्राण गंवाए लेकिन इसको भी देश सेवा ही जोड़ा जाता है। वैसे नैतिक दृष्टि से शहीद को लेकर कोई विवाद नहीं है। जो सीमा, मजहब या सरोकार की रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग करे वह शहीद है। खैर, इनके सबके बावजूद एक सवाल लोगों के जेहन में और तैरता है, वह यह कि जब शहीद का दर्जा होता ही नहीं है तो अखबार व टीवी उनको शहीद क्यों पुकारते व प्रचारित करते हैं? वैसे मेरा मानना है कि शहीद को और कोई नाम देना बेमानी है। शहीद वही है जो देशहित में किसी खास उद्देश्य के लिए लड़ता हुआ प्राण त्याग दे। अगर कोई भागते हुए मारा जाता है तो वह शहीद नहीं हो सकता है। कई बार नेताओं को भी शहीद पुकारा जाता है, विशेषकर किसी बड़े पद पर रहते हुए जिनकी हत्या हो जाती है। यह बात दीगर है कि हताहत नेता देश सेवा से जुड़े थे लेकिन किसी युद्ध के मोर्चे पर नहीं थे। वैसे प्राणोत्सर्ग करने के बाद किसको क्या मिलना यह मिलना है यह तो भर्ती के समय ही तय हो जाता है। इतना होने के बावजूद युद्ध या ऑपरेशन में प्राणोत्सर्ग करने वालों के लिए शहीद की बजाय दो नाम जरूर तय किए गए हैं। एक है बैटल कैजुअल्टी तो दूसरा है ऑपरेशन केजुअल्टी। बैटल कैजुअल्टी मतलब लड़ाई में प्राण त्यागना और ऑपरेशन केजुअल्ट का अर्थ है कि किसी कार्रवाई में प्राण त्यागना। हां शहादत को सम्मान किस तरह का देना है? आर्थिक लाभ मसलन पेट्रोल पंप या पुरस्कार राशि यह सरकारों पर भी निर्भर होता है। इसके लिए सर्व सामान्य या सर्व स्वीकृत नियम भी नहीं है। अक्सर विवाद या बहस की वजह भी यही विषय बनते हैं कि फलां शहीद को इतना पैकेज मिला तो और फलां को इतना। भत्तों या पैकेज में अंतर भी बड़े असंतोष का बड़ा कारण भी बन जाता है।
बहरहाल, अद्र्धसैनिकों को शहीद का दर्जा देने के साथ-साथ उनकी पेंशन बंद का मामला भी गरमाया हुआ है। पेंशन के पीछे न मिलने के क्या कारण हैं तथा अद्र्धसैनिकों में कौनसी फोर्सेज शामिल हैं, पहले यह जानना भी जरूरी है।
क्रमश:

शहीद की परिभाषा ही नहीं-1

बस यूं ही
आजकल शहीद शब्द प्रासंगिक हैं। विशेषकर पुलवामा में जवानों के काफिले पर आतंकी हमले के बाद यह शब्द जबरदस्त प्रचलन में है। इसके साथ ही कई तरह के सवाल भी हैं, मसलन, शहीद कौन होता है? शहीद किसे कहते हैं? यह दर्जा कौन देता है? सैनिकों को शहीद तो अर्ध्दसैनिकों को शहीद का दर्जा क्यों नहीं? इस तरह के सवालों को लेकर सोशल मीडिया पर भी अच्छी खासी बहस चल रही है। कुछ इसी तरह के मामले में मेरा खुद का वास्ता भी आज पड़ा, लिहाजा मन किया कि इस विषय में लोगों की जो शंकाएं हैं, उनको दूर किया जाए। एक व्हाट्सएप ग्रुप में आज सुबह-सुबह ही एक मैसेज देखा। मैसेज क्या वह एक सवाल ही था, सीआरपीएफ के जवानों को शहीद का दर्जा दिया है या नहीं? कृपया अवगत कराएं। उसी के नीचे दूसरा संदेश था, अभी तक तो कोई आदेश नहीं हुआ शायद। फिर तीसरे साथी ने लिखा, फिर मीडिया इस शब्द का प्रयोग कर रही है, शायद चांस है? चौथे का मैसेज आया। यह मैसेज भी उन्हीं का था जिन्होंने पहला संदेश लिखा था। ना पेंशन मिलती है ना शहीद का दर्जा है, फिर हम इसके लिए मांग क्यों नहीं करते? फिर बहस लंबी चली। और इसी बहस का हिस्सा मैं था तो लगा इस तरह के सवाल और भी कई लोगों के होंगे। जरूर उनके जेहन में सवाल खड़ा होगा कि आखिर शहीद किसको माना जाता है और किसको नहीं?
दरअसल, लंबे समय से इस बात का जवाब मिला ही नहीं है कि शहीद किसको माना जाए। देश हित के लिए युद्ध में प्राणोत्सर्ग करने वाला शहीद है या आजादी की लड़ाई में संघर्ष कर प्राण न्योछावर करने वाले शहीद हैं। या एेसे राजनेता जिनकी देश के लिए कार्य करते समय हत्या हो गई वो शहीद हैं? सेना व अर्ध्दसैनिक बलों में अप्राकृतिक मौत पर भी लोग आजकल शहीद का दर्जा चाहते हैं। इतना ही नहीं युद्ध के अलावा छोटी मोटी सैन्य कार्रवाई में जान गंवाने वालों को भी शहीद का दर्जा देने की मांग उठती है। पाक समर्थित आंतकी हमलों में शिकार जवानों को भी शहीद प्रचारित किया जाता है।
खैर, इन सबके बीच महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश में शहीद की कोई स्पष्ट परिभाषा ही नहीं है। करीब तीन साल पहले देश के गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजु ने लोकसभा में कहा था कि शहीद की कोई परिभाषा नहीं है। इतना ही नहीं सशस्त्र सेना और रक्षा मंत्रालय ने भी शहीद की कोई व्याख्या नहीं की है। अब फिर सवाल उठता है कि जब परिभाषा ही नहीं है तो फिर शहीद कहा क्यों जाता है? एेसे में साधारण रूप से मानकर चला जाता है कि सरकार के आदेश पर देश व जनता की सुरक्षा के लिए सेना जब देश के बाहर के दुश्मनों से लड़ती है। और इस दौरान जो सैनिक काल कवलित हो जाता है, उनको शहीद कहा जाता है। यही कारण है भारत की सुरक्षा करते हुए चीन व पाकिस्तान की लड़ाई में प्राणोत्सर्ग करने वाले सैनिकों को शहीद कहा जाता है।
क्रमश:

अब और नहीं #AbAurNahi

हो जाए आर या पार
शायद यह पहला मौका था जब देश में शुक्रवार सुबह न सुप्रभात हुई और ना ही गुड मोर्निंग। सुबह से ही सबके मोबाइल पर संवेदनाओं का सैलाब था। सोशल मीडिया के तमाम माध्यमों पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देने की होड़ सी लगी थी तो गम और गुस्से में डूबा देश एक सुर में इस नापाक हरकत का मुंह तोड़ जवाब देने को उठ खड़ा हुआ। आक्रोश की आग में जल रहे देशवासियों की जुबां पर महज दो बातें, अब और नहीं, आर या पार ही थी। निहत्थे जवानों पर धोखे से किए शर्मनाक व कायराना हमले के खिलाफ देशवासियों को खून खौल रहा है। सब्र का बांध सीमाएं तोड़कर बदला लेने को आमादा हैं। आंसू तो अब आक्रोश में तब्दील हो चुके हैं। पानी नाक से ऊपर आ चुका है, सियासी बयानों से विश्वास उठने लगा है। देशवासियों को अब कुछ कहने या सुनने में यकीन नहीं है। वो अब कुछ कर गुजरने के अलावा और कुछ चाहते ही नहीं हैं। यह बात दीगर है कि हमारा देश हमेशा शांति का पक्षधर रहा है लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि शराफत का नाजायज फायदा ही उठा लिया जाए। सोचिए, शेर अगर दहाडऩा व शिकार करना छोड़ दे तो फिर गीदड़ भी आंख दिखाने की हिमाकत करने लगते हैं। सांप काटना छोड़ दे तो लोग खिलौना न बना लें। समय का तकाजा यही है कि मौका मिलने पर अपनी शक्ति दिखा देनी चाहिए। इस बार एेसी शक्ति दिखानी चाहिए कि पड़ोसी मुल्क की सात पुश्तें भी इस शक्ति को याद कर कर के कांप उठे।
यह सब करना इसीलिए भी जरूरी है कि ताकि सुरक्षा बलों का मनोबल ऊंचा बना रहे। आज समूचे देश ने एक सुर में जो संदेश दिया है यकीनन वह सेना का हौसला बढ़ाने वाला है, लेकिन इस तरह के हमलों के जवाब में कोई कार्रवाई होती रहे तो जवानों को यह भी लगता रहे कि उन्होंने अपने निहत्थे साथियों की मौत का बदला ले लिया। आज देश ही नहीं जवान भी बदले की आग में झुलस रहे हैं। उनको दुश्मन को नेस्तनाबूद करने को कह दिया गया है। यकीनन हमारे रणबांकुरे यह सब करके इतिहास रचेंगे। बात चाहे 1948 की हो, 1965 की हो, 1971 की हो या फिर करगिल युद्ध की। हमारे बहादुर सैनिकों ने हमेशा ही फतह हासिल की है लेकिन इस बार दिल कुछ एेसा चाहता है कि भविष्य में फिर कभी युद्ध जैसी नौबत आए ही नहीं। मतलब आर या पार....#AbAurNahi

Thursday, February 14, 2019

अभी और फैसले लेने होंगे


टिप्पणी
श्रीगंगानगर जिले में पुलिस व प्रशासन के मुखिया बदलने के बाद व्यवस्थाओं में सुधार का सिलसिला शुरू हुआ है। बीते पांच दिन में शहर की सबसे बड़ी और दिनोदिन गहराती समस्या से पार पाने के जो प्रयास हुए हैं, उनसे कुछ उम्मीद बंधती है, हालांकि व्यवस्था में सुधार के लिए इस तरह की कवायद पहले भी होती रही हैं लेकिन मॉनिटरिंग के अभाव में व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौटती रही। खुशी की बात यह है कि नई कवायद का आंशिक असर दिखाई देने लगा है। उम्मीद की जानी चाहिए कालांतर में व्यवस्था में और ज्यादा सुधार होगा। यह उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि अभी बेपटरी व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए गंभीर व ईमानदार प्रयास करने होंगे। जनहित में कड़े व बड़े निर्णय भी लेने होंगे। शाम सात से बारह के बीच बसों को जस्सासिंह मार्ग से निकालने के फैसले ने कोडा चौक से लेकर चहल चौक तक यातायात दवाब को कम किया है। जस्सासिंह मार्ग पर कुछ दूरी में सड़क संंकरी है और मलबा पड़ा है, जिससे आवागमन सुचारू नहीं रह पाता। स्वाभाविक सी बात है नई व्यवस्था बनाने में जोर आता है और जनहित को ध्यान में भी रखा जाता है। चौकों पर लगाने वाले जाम से अब राहत मिली है, हालांकि इस बदलाव के पक्ष व विपक्ष में दलील देने वाले भी कम नहीं हैं लेकिन यह फैसला समय की मांग को ध्यान में रखकर किया गया है। जस्सासिंह मार्ग पर बसंती चौक के पास जो समस्या है और जिस वजह से उसका भी यकीनन समाधान खोजना चाहिए। मीरा चौक व मटका चौक स्कूल खेल मैदान के पास पार्किंग बनाने का प्रस्ताव भी सिरे चढ़ा तो यह भी काफी राहत देगा। शिव चौक से सुखाडि़या सर्किल तक डिवाइडरों के कट बंद करने से भी जाम कम लगेगा। पंजाब जाने वाली बसों को तीन पुली से होकर गुजारने का फैसला भी अच्छा है, इससे भी यातायात का दबाव कम होगा। इधर मुख्य डाकघर से रेलवे स्टेशन को नोन वैंडिंग जोन घोषित करने से वहां अब रेहडि़यां खड़ी नहीं होगी। इस फैसले भी इस मार्ग पर जगह निकलेगी जो, रेंग-रेंग कर चलने वाले यातायात को गति देगी। 
बहरहाल जो फैसले अमल में आ चुके हैं, उनकी कड़ाई से पालना हो और साथ-साथ में समीक्षा भी ताकि कोई नई समस्या पैदा हो रही हो तो समाधान साथ-साथ खोजा जा सकता है। इसके अलावा जो प्रस्ताव बने हैं, उनकी जल्द से जल्द क्रियान्विति हो। यह सब करने के बाद भी काफी कुछ करने की गुंजाइश रह जाती है, मसलन, शहर में ऑटो हर कहीं खड़े हो जाते हैं, इनके लिए भी स्टैंड का निर्धारण हो। कई शहरों मंे ऑटो रिक्शा के लिए बकायदा स्टैंड निर्धारित हैं। एेसा करने से मनमर्जी का ठहराव नहीं होगा और इससे भी यातायात सुगम होगा। गोलबाजार के चौकों पर पसरा अतिक्रमण भी हटाया जाना चाहिए। चूंकि गोलबाजार में पैदल लोग ज्यादा आते हैं लेकिन चौपहिया व दुपहिया वाहनों के कारण उनको चलने में भी असुविधा होती है। यहां चौपहिया वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाता सकता है, या वैकल्पिक तौर पर सुबह-शाम जब यातायात दबाव होता है तब प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है। शहर में संचालित विभिन्न स्कूलों के वाहन भी एक साथ निकलते हैं। इससे भी जाम की स्थिति पैदा हो जाती है। स्कूल बसों के वर्तमान रूटों में भी बदलाव की जरूरत है। इन सबके अलावा पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को बीच-बीच में बदलाव का जायजा जरूर लेना चाहिए ताकि वह वस्तुस्थिति जान सके और जनता को होने वाली पीड़ा को करीब से महसूस कर सकें।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 13 फरवरी 19 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी । 

मतदाताओं को मुफ्तखोर बनाते राजनीति दल

बस यूं ही
आज एक फरवरी के समाचार पत्रों की प्रमुख खबर थी। 'खबर थी सामान्य वर्ग के स्नातक बेरोजगारों को एक मार्च से भत्ता जाएगा। इसके तहत सामान्य श्रेणी के पुरुष को तीन हजार तो सामान्य श्रेणी की महिला को साढ़े तीन हजार रुपए दिए जाएंगे। सामान्य श्रेणी के महिला-पुरुषों के लिए यह भत्ता तीस साल तक का होने तक दिया जाएगा।' यह खबर पढऩे के बाद से ही कई सवाल रह-रह कर कौंध रहे हैं। पहला सवाल तो यह है कि बेरोजगारी क्या तीस साल तक ही रहती है? इसके बाद क्या वह स्वत: समाप्त हो जाती है या फिर बेरोजगार इतना भत्ता पा लेेता कि वह आत्मनिर्भर बन जाता है? आखिर उम्र तय करने का पैमाना क्या है? खैर, इन सवालों के बीच एक दूसरा सवाल भी दिमाग को मथ रहा है। राज्य सरकार ने घोषणा तो साढ़े तीन हजार की थी कि लेकिन अब इसमें भी भेद किया गया है। अब महिला बेरोजगार को साढ़े तीन हजार तथा पुुरुष बेरोजगार को तीन हजार दिए जाएंगे। मान लो बेरोजगार दपंती है या भाई-बहन हैं तो फिर भी घर का मामला मानकर संतोष किया जा सकता है लेकिन क्या लिंगीय भेदभाव नहीं है? क्या इससे असमानता की भावना घर नहीं करेगी? खैर मेरी तरह यह सवाल कइयों के जेहन में दौड़ रहे होंगे। हो सकता है सरकार या उसके समर्थक यह दलील भी दे सकते है कि महिला शिक्षा को बढ़ावा देने या लिंगानुपात के प्रति लोगों की सोच बदलने के लिए राशि में अंतर किया है। लेकिन अगर एेसा है तो यह बढ़ावा चुनाव के दौरान भी दिया जाना चाहिए। टिकट वितरण के दौरान भी दिया जाना। मंत्रिमंडल के गठन के दौरान भी दिया जाना चाहिए। वैसे भी देश में बेरोजगारी भत्ते की राशि व उम्र को लेकर कोई समान मापदंड नहीं हैं। इसलिए यह विशुद्ध रूप से राज्य सरकारों पर निर्भर करता है कि किसको कितना देना है? कब तक देना है? किस तरह से देना है?
बहरहाल, प्रदेश में पंजीकृत व पात्रों की संख्या को देखते हुए राजकोष से हर माह 24 करोड़ का भुगतान किया जाएगा। यह राशि बढ़ भी सकती है, क्योंकि घोषणा होने के बाद पंजीकरण करवाने वालों की संख्या में इजाफा होना तय मानिए। हालांकि हम लोगों में स्विटजरलैंड की तरह निर्णय लेने का हौसला अभी नहीं है। वहां की 78 प्रतिशत जनता ने इस तरह के बेरोजगारी भत्ते लेने से इनकार कर दिया था लेकिन हमारे देश में राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मतदाताओं को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सरकारों की तरफ से दी जाने वाले तमाम मुफ्त योजनाएं एक तरह से मीठी गोली है, जो लोगों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बाधक बनती है। मुफ्तखोर बनाने की यह होड़ अब थमनी चाहिए। अगर राजनीति दलों को यह घोषणााएं मुफीद लगती है तो फिर उनको राजकोष को बख्श देना चाहिए। जब राजनीतिक दल अपने खुद के फायदे के लिए यह सब करते हैं तो फिर खर्चा भी खुद के पल्ले से ही होना चाहिए।

क्रांतिकारी बदलाव

बस यूं ही
कोख में बेटियों को कत्ल करने, बेटा-बेटी में भेद करने तथा लिंगानुपात में बड़ा अंतर होने की बड़ी वजह दहेज भी है। दहेज एक एेसी कुरीति है, जिससे कोई अछूता नहीं है लेकिन राजपूत समाज में यह इसका प्रचलन इस कदर है कि लड़की का बाप होना किसी गुनाह से कम नहीं है। लड़का पढ़ लिखकर योग्य हो गया तो फिर शादी के लिए उसकी बोली लगती है। बाकायदा लाखों रुपए का टीका और चौपहिया वाहन पहली शर्त है। टीके की राशि व चौपहिया वाहन का मॉडल वर की योग्यता के आधार तय होता है। सुयोग्य व रोजगार वाले वर के लिए लड़की का पिता मजबूरी में इस बोली में शामिल होता है और वह अपनी औकात से बाहर जाकर या कर्जा लेकर बेटी के हाथ पीले करता है। सामाजिक मंचों व सम्मेलनों में इस कुरीति के उन्मूलन के आह्वान कई बार हुए लेकिन मामला सिरे चढ़ा नहीं है। सार्वजनिक मंचों पर दहेज का विरोध करने वाले ही अंदरखाने इस खेल में शामिल होते देखे गए। दहेज लेना स्टेटस सिंबल बन गया। बड़ी शान से टीके की राशि व गाड़ी का मॉडल बताया जाने लगा। समाज में एक तरह की प्रतिस्पर्धा सी चल पड़ी है। फलां का बेटा तो फौज में है, उसके पांच लाख व कार आई है, मेरा तो डाक्टर है, उससे कमत्तर थोड़े ही है। विडम्बना देखिए यह तुलना लड़के वालों में खतरनाक स्तर पर है।
एेसे प्रतिकूल माहौल के बीच पिछले कुछ समय से परिदृश्य में बदलाव दिखाई देने लगा है। और इस बदलाव के अगुवा बने हैं समाज के युवा। इन युवाओं ने समाज के सामने एक नजीर रखी है। अपनी पुरानी पीढ़ी को आइना दिखाया है। राजपूत समाज के युवा दहेज को सिरे से खारिज कर रहे हैं। अभी संख्या भले ही कम है लेकिन यह सुखद शुरूआत है। यह एक क्रांतिकारी बदलाव का आगाज है। इसको बढ़ावा दिया जाना जाहिए। सामाजिक सम्मेलनों व मंचों पर दहेज न लेने वालों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा से लोग प्रेरित हो सकें। कहा भी गया है अच्छाई की मार्केटिंग होनी चाहिए। यह सब इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि बीते एक सप्ताह में राजपूत समाज के करीब सात एेसे विवाहों के बारे में सुना या पढ़ा है, जब समाज के युवाओं ने लाखों की नकदी को ठुकरा कर एक रुपया व नारियल लेने में अपना गौरव समझा। इन सात विवाहों में दो तो मेरे गांव केहपुरा कलां से ही संबंधित हैं। पहली शादी २२ जनवरी को भाई दिनेशसिंह की हुई जब उसने बतौर शगुन दो लाख रुपए लेने से मना कर दिए। दूसरी शादी कल ही २९ जनवरी को जयपुर में हुई है। भाईसाहब भगवानसिंह की बिटिया हिमानी कंवर के ससुराल पक्ष वालों ने साढ़े तीन लाख रुपए के टीके को नकार दिया। इस तरह बिना दहेज वाली तीन शादियां आज बुधवार को समाचार पत्रों की सुर्खियों में थी।
इस तरह के विवाहों की पहले कभी-कभार ही खबरें आती हैं लेकिन अब यह सिलसिला गति पकड़ रहा है। इसका गति पकडऩा समाज हित में है और देश हित में भी। इससे दूसरे समाजों को भी प्रेरणा मिलेगी। शादियों में फिजूलखर्ची व दिखावे पर भी रोक लगेगी। इन सब के अलावा सबसे बड़ी बात इससे बेटे-बेटी का भेद कम होगा। कोख में बेटियों का कत्ल होना कम होगा। बेटियां हैं तो कल हैं। बेटियां ही नहीं रहेंगी तो फिर बेटे बिना दुल्हन के ही घूमेंगे। एेसे भयावह हालात बनने भी लगे हैं। यह हालात तभी बदलेंगे जब दहेज रूपी कुरीति का पूर्ण रुपेण उन्मूलन हो जाए। आइए आप और हम भी कुछ इसी तरह का संकल्प करें।

यह उपेक्षा क्यों?



टिप्पणी
इसमें कोई दो राय नहीं कि बीकानेर रेल मंडल ने पिछले दो साल में क्षेत्र को कई रेलों की सौगात दी है। इनमें छोटे व बड़े दोनों रूटों की रेल शामिल हैं। इसके बावजूद श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ के लोगों के लिए जयपुर अभी भी दूर है। उन्हें रेल सेवाओं के विस्तार का लाभ उतना ही नहीं मिला, जितना कि अब तक मिल जाना चाहिए था। नए रूट बनाना तथा उन पर रेल चलाना नीतिगत फैसला हो सकता है लेकिन उसमें यह भी देखना चाहिए कि क्या यह व्यवहारिक या न्याय संगत हैं? उसमें किसी की उपेक्षा तो नहीं हो रही है? अब इन चार उदाहरणों से समझिए कि क्षेत्र के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के लोगों का सफर लंबा या अधूरा कैसे हो रहा है। श्रीगंगानगर से सादुलपुर के लिए इंटरसिटी चल रही है। जयपुर जाने वाले यात्री के लिए राजगढ़ से कोई सुविधा नहीं है। यात्री चूरू जाए या चूरू से सीकर जाए बस इतना ही कर सकता है। या फिर बस पकड़े। बिलासपुर से बीकानेर के बीच साप्ताहिक ट्रेन चलती है लेकिन यह बीकानेर से चलकर सूरतगढ़ से हनुमानगढ़ होकर आगे जाती है। इससे श्रीगंगानगर के यात्री वंचित हैं। एेसे में उन्हें सूरतगढ़ या हनुमानगढ़ जाकर ट्रेन पकडऩी पड़ती है। दूसरा यह है कि इस ट्रेन का रूट राजगढ़, चूरू, रतनगढ़, डेगाना होकर जयपुर है। एेसे में जयपुर का सफर लंबा हो गया। इतना लंबा घूमकर कौन जाएगा? अब एक नई साप्ताहिक ट्रेन शनिवार को बीकानेर से इंदौर के बीच चलेगी। इस ट्रेन का रूट श्रीडूंगरगढ़, रतनगढ़, चूरू, लक्ष्मणगढ़, फतेहपुर, सीकर, रीगंस, फुलेरा, अजमेर होते हुए इंदौर रखा गया है। इस ट्रेन से प्रत्यक्ष रूप से हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर के यात्रियों को फायदा नहीं है। दूसरी बात यह रेल राजधानी होकर नहीं निकलेगी। सबसे बड़ी चकित करने वाली बात तो यह है कि सूरतगढ़ से हनुमानगढ़ के बीच 27 जनवरी से रोजाना स्पेशल रेल चलेगी। इस रेल में नौ साधारण श्रेणी व दो गार्ड डिब्बों सहित 11 कोच होंगे। हनुमानगढ़ से सूरतगढ़ के बीच दूरी मात्र पचास किलोमीटर हैं। हनुमानगढ़ के बीच तीन स्टेशन हैं, रंगमहल, पीलीबंगा व डबलीराठान। इस लिहाज से इस रेल से लाभान्वित होने वाले यात्री खुशकिस्मत हैं। लेकिन सवाल यहीं से खड़े होते हैं। श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ को जयपुर जोडऩे की इच्छा शक्ति न तो रेलवे की लगती है न ही यहां के जनप्रतिनिधियों की। क्या सूरतगढ़-हनुमानगढ़ जैसी ट्रेन सीकर तक नहीं चल सकती? क्या नए-नए रूट इजाद करने वाले रेलवे को रींगस से जयपुर वाया फुलेरा का रूट नहीं दिखता? (जब तक रीगंगस-चौमूं-जयपुर मार्ग चालू नहीं हो जाता तब तक वैकल्पिक व्यवस्था कर यात्रियों को सुविधा दी जा सकती है।) क्या श्रीगंगानगर-सादुलपुर इंटरसिटी का फेरा सीकर तक नहीं किया जा सकता? श्रीगंगानगर से सीकर तक तो रेल का प्रस्ताव तैयार हुए भी सालभर के करीब हो गया लेकिन रैक न मिलने का बहाना बनाकर क्षेत्र की लगातार उपेक्षा की जा रही है। 
गाहे-बगाहे रेल सेवा शुरू करवाने का श्रेय लेने वाले जनप्रतिनिधियों को इस ट्रैक की याद क्यों नहीं आती? करीब दस साल से श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के यात्रियों के लिए जयपुर दूर है लेकिन फिर भी बहाने बनाकर देरी की जा रही है। रेलवे और यहां के जनप्रतिनिधियों को चाहिए इस मामले को प्राथमिकता में शामिल करें, क्योंकि ज्यादा उपेक्षा भी अच्छी नहीं होती।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 26 जनवरी 19 के अंक में प्रकाशित

है काम आदमी का, औरों के काम आना

बस यूं ही
चौबीस जनवरी की सर्द सुबह के ठीक आठ बजे मैं झुंझुनूं बस स्टैंड पहुंचा...। पता किया तो बताया श्रीगंगानगर के लिए बस साढे आठ बजे है। मैं बस की तरफ बढा तो एक शख्स ने सवालिया नजरों से देखा और बोले श्रीगंगानगर? मैं उनका आशय यही समझा कि यह बता रहे हैं जबकि वो मेरे से यह पूछना चाह रहे थे कि आप श्रीगंगानगर जा रहे हो क्या?
खैर, अपना बैग सीट पर रखकर मैं नीचे आया तो वह शख्स फिर मिल गए..। कुछ परेशान से थे। मैं थोड़ा पास गया तो पूछ बैठे, आप श्रीगंगानगर जाओगे? मैंने प्रत्युतर में सिर हिलाया तो उनका अगला सवाल था, श्रीगंगानगर में कहां?मैंने कहा शिवचौक। मेरा जवाब सुनकर उनकी परेशानी दूर नहीं.हुई।अब मेरी बारी थी, मैंने सवाल दागा क्या काम है श्रीगंगानगर में? कहने लगे खाता स्थानांतरित करवाया है, उसके कागजात श्रीगंगानगर भिजवाने है। बस वाला इस काम के 150 रुपए मांग रहा है। फिर बोले 29 जनवरी को जाना ही तो काहे के पैसे देने। मैंने कहा, ऐसा करना भी ठीक रहेगा, लेकिन उनके चेहरे से झलकती बेचैनी बयां कर रही थी कि उनका काम जरूरी है। मैंने कहा आप कागज मुझे दे दीजिए और मेरा नंबर लिख लो...अपने बेटे को बता देना..कल आफिस में आकर कागजात ले जाएगा। शख्स की चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान थी और उन्होंने पूछा, जी आपका आफिस कहां.हैं? मैंने जैसे ही राजस्थान पत्रिका कहा तो वो तपाक से बोले, आप शेखावतजी हो? मैं चकित था कि बिना मिले कैसे पहचान.लिया, वजह पूछी तो कहने लगे, मिला तो नहीं पर आपका नाम बहुत सुना है। पत्रिका आफिस भी जाना हुआ है तीन चार बार। फिर बताने लगे कि उनका गांव जेजूसर है। चालीस साल.से श्रीगंगानगर के भरतनगर में रहते हैं। जेजूसर और गंगानगर दोनों जगह आना जाना लगा रहता है। चालीस साल.पहले श्रीगंगानगर में ईंट भट्ठे का काम शुरू किया था, मकान भी वहीं बना.लिया। मैंने अपने मोबाइल नंबर नोट करवाए तो बोले आपका गांव कौनसा है? मैंने गांव.का नाम बताया तो कहने लगे वहां.हमारी दूर की रिश्तेदारी है। कुलदीप/ रामेश्वर लाल जी के यहां पर। मैंने बताया कि कुलदीप मेरा सहपाठी रह चुका है दसवीं तक। खैर, बस चलने को थी , मैंने शख्स से नाम पूछा तो उन्होंने देवकरण बताया। बस में चढते वक्त मैं उनकी तरफ पलटा तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। सच इस तरह की मुस्कान बड़ा सुकून देती है। जीवन का फलसफा भी यही है...जीना तो है उसी का, जिसने यह राज जाना... है काम आदमी का औरों के काम आना....।

हे पिता! तू तो जीवन है..

टिप्पणी
अगर पिता जीवन है तो फिर वह प्राणों का प्यासा क्यों बन जाता है? अगर पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है तो फिर वह सृष्टि के अनमोल तोहफे को मिटाने पर आमादा क्यों हो जाता है? अगर पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है तो फिर वह जान का दुश्मन क्यों बन जाता है? अगर पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है तो फिर वह उस परिंदे का उडऩे से पहले ही गला क्यों घोट देता है? अगर पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं तो फिर इन सपनों को तोड़ क्यों देता है? अगर पिता सुरक्षा है, सिर पर हाथ है तो फिर वह इतना क्रूर क्यों बन जाता है? अगर पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान है तो फिर इतना निर्दयी व निष्ठुर क्यों हो जाता है? श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले में शनिवार को एेसी दो घटनाएं हुई जो सोचने पर मजबूर करती हैं। श्रीगंगानगर के रायसिंहनगर उपखंड के एक गांव में पिता अपने एक साल के मासूम की गला घोट कर जान ले लेता है जबकि खुद जहर पी लेता है। उधर हनुमानगढ़ जिले के टिब्बी क्षेत्र में एक पिता अपने दस साल के बेटे को सीने से लगाकर नहर में कूद जाता है लेकिन मासूम खुशकिस्मत है कि बच जाता है लेकिन पिता की मृत्यु हो जाती है। जान देने/ लेने जैसा कदम उठाने के पीछे कारण भी कोई बड़े नहीं हैं। एक का अपनी पत्नी से विवाद था तो दूसरा आर्थिक तंगी के चलते टूट गया।
दरअसल, श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले में बात-बात पर जान लेने या देने की घटनाएं इतनी होने लगी हैं कि यह अब सामान्य लगने लगी हैं। यह घटनाएं यहां न तो डराती हैं न ही चौंकाती हैं, लेकिन सोचने पर मजबूर जरूर करती हैं। आखिर लोगों में सहनशीलता खत्म क्यों रही है और इसकी वजह क्या है? विश्वास लगातार क्यों कम हो रहा है? जरा-जरा सी बातों पर उग्र होकर आवेश में आकर जान देना/ लेना ही क्या अंतिम उपाय है? बिना जान दिए/ लिए बिना क्या किसी समस्या का समाधान संभव नहीं? जीवन अनमोल है फिर भी इसकी कीमत क्यों नहीं समझी नहीं जा रही है? हादसे होने के बाद सिर्फ पछतावा ही शेष रहता है। किसी एक की गलती का दंश शेष रहा पूरा परिवार झेलता है। सोचिए आर्थिक तंगी से जान देने वाले उस शख्स के परिवार पर अब क्या बीत रही होगी? कल्पना कीजिए एक साल के मासूम के जाने के बाद उस मां का हाल क्या होगा?
खैर, आर्थिक तंगी, अवैध रिश्ते, एक दूसरे पर विश्वास की कमी, छोटे मोटे विवाद इन बड़े हादसों की वजह ज्यादा बनते हैं। ठंडे दिमाग से सोचा जाए तो इन सबका समाधान है। इस तरह के हादसे मानवीय मूल्यों को कमजोर करते हैं। जान की कीमत कभी समाधान नहीं हो सकती। जीवन की महत्ता समझनी चाहिए। हालात का हवाला देकर जीवन से हारना नहीं चाहिए। जीवन एक संघर्ष है। इस संघर्ष से डरना कैसा? वैसे भी डर के आगे ही तो जीत है। माता-पिता तो सृष्टि के सर्जक हैं, फिर भी सृष्टि के विपरीत धारा में क्यों बहने लगते हैं? माता पिता पर लिखी गई कवि ओम व्यास 'ओम; की कविता की यह पक्तियां मौजूं हैं..
'मां संवेदना है, भावना है, अहसास है मां
मां जीवन के फूलों में खुशबू का वास है मां,;
'पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है
पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।'

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 20 जनवरी 19 के अंक में प्रकाशित।

प्रभाव की पत्रकारिता विश्वसनीय नहीं

बस यूं ही
दबाव या प्रभाव में आकर पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता खो देती है। इसलिए बिना किसी प्रभाव या दबाव के अपना कर्म करते रहना चाहिए। यह बात हमेशा से ही की जाती है। करीब 19 साल पहले भोपाल में पत्रकारिता का ककहरा सीखने के दौरान भी कुछ इसी तरह की नसीहत मिली थी। तब बताया गया था कि पत्रकार को चार 'पी' से बचना चाहिए।
1. पैसा 2. प्रशंसा 3. पुष्प और 4. पद अर्थात इन चारों में किसी में पत्रकार भागीदार है तो फिर वह खबर के साथ न्याय नहीं कर पाएगा। पत्रकार को पूर्वाग्रह, दुराग्रह या किसी तरह के आग्रह से खुद को बचाकर रखना चाहिए। पत्रकार छत्रपति हत्याकांड का फैसला सुनाते हुए जज जगदीपसिंह ने जो कहा, वह भी तो कुछ एेसा ही है। उन्होंने कहा 'जर्नलिज्म एक सीरियस बिजनेस है जो सच्चाई को रिपोर्ट करने की इच्छा को सुलगाता है। इस नौकरी में थोड़ी बहुत चकाचौंध तो है लेकिन कोई बड़ा इनाम पाने की गुंजाइश नहीं है। पारंपरिक अंदाज में इसे समाज के प्रति सेवा का सच्चा भाव भी कहा जा सकता है। किसी भी ईमानदार और समर्पित पत्रकार के लिए सच को रिपोर्ट करना बेहद मुश्किल काम है। खास तौर पर किसी एेसे असरदार व्यक्ति के खिलाफ लिखना और भी कठिन काम हो जाता है जब उसे किसी राजनीतिक पार्टी से ऊपर उठकर राजनीतिक संरक्षण हासिल हो। यह देखने में भी आया है कि पत्रकार को ऑफर किया जाता है कि वह प्रभाव में आकर काम करे अन्यथा अपने लिए परेशानी या सजा चुन ले। जो प्रभाव में नहीं आते उन्हें इसके नतीजे भुगतने पड़ते हैं, जो कभी कभी जानर देकर चुकाने पड़ते हैं। यदि वह (पत्रकार) प्रभाव में आ जाता है तो अपनी विश्वसनीय खो देता है। अगर प्रभाव में आने से इनकार करता है तो जान से जाता है। इस तरह यह अच्छाई और बुराई के बीच की लड़ाई है। मौजूदा मामले में भी यही हुआ कि एक ईमानदार पत्रकार ने प्रभावशाली डेरा मुखी और उसकी गतिविधियों के बारे में लिखा और उसे जान गंवानी पड़ी। डेमोक्रेसी में भीड़ का रूप धारण कर किसी भी निर्दोष के खिलाफ हिंसा की अनुमति नहीं है। डेमोक्रेसी के पिलर को इस तरह ध्वस्त करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।'
खैर, इस पेशे में पथ से विचलित करने की कोशिश बहुत होती हैं। यह कोशिशें सिर्फ वित्तीय ही नहीं होती हैं। इसके कई रूप हैं। गिरावट हर क्षेत्र में आई है, पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं है लेकिन गाहे-बगाहे पत्रकारिता को बिकाऊ कहने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पेशे में रामचंद्र छत्रपति जैसे पत्रकार भी हैं जो जान की परवाह किए बिना सच कहने का साहस रखते हैं।

2019 में हों यह 19 काम तो श्रीगंगानगर बने ‘चंडीगढ़ का बच्चा’

21वीं सदी के 18 साल पूर्ण हो गए। मंगलवार से 19वां साल लग रहा है। सदी के बीते अठारह साल मतलब श्रीगंगानगर के अतीत पर नजर डाली जाए तो हालात संतोषजनक दिखाई नहीं देते। समय- समय पर श्रीगंगानगर को ‘चंडीगढ़ का बच्चा’ या ‘चंडीगढ़ का बाप’ बनाने की बातें तो खूब हुई लेकिन व्यवस्था दिनोदिन पटरी से उतरती ही गई। आज हालात विकट हो चले हैं। खैर, इन सबके बीच नया साल कुछ नया करने की प्रेरणा देता है। साल की शुरुआत में संकल्प भी होते हैं। संकल्प होने भी चाहिए लेकिन उनको पूरा करने की ईमानदार कोशिश बेहद जरूरी है। श्रीगंगानगर के लिए भी बहुत से संकल्प हैं, जो पूरे हो जाएं तो यकीनन लोग खुद काफी राहत महसूस करेंगे। वैसे श्रीगंगानगर से संबंधित संकल्प लगभग पुराने हैं। यह संकल्प हर बार दोहराए जाते हैं पर इनका पूरा न होना अफसोसजनक है। पूरा न होने का आशय यह भी नहीं है कि इनको पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए दृढ इच्छा शक्ति की जरूरत है। आपस में सहयोग व तालमेल की आवश्यकता है। उम्मीद इसीलिए ज्यादा है कि राज्य में नई सरकार का गठन हुआ है। शहर को नया विधायक मिला है। इतना ही नहीं है नया साल आते-आते जिला कलक्टर भी नए आ गए हैं। 19 का साल है लिहाजा शहर से जुड़े 19 मसलों पर प्रभावी व ईमानदारी से काम हो तो यकीनन श्रीगंगानगर को ‘चंडीगढ़ का बच्चा’ या ‘चंडीगढ़ का बाप’ बनाने की दिशा में जो बाधाएं वह सब दूर हो जाएंगी।
1. अतिक्रमण
वर्तमान में श्रीगंगानगर की सबसे बड़ी समस्या है तो वह है अतिक्रमण। इस अतिक्रमण के कारण शहर की सडक़ें संकरी हो रही हैं। बाजारों में अस्थायी अतिक्रमण के कारण आवागमन बाधित हो रहा है। अतिक्रमण यूआईटी व नगर परिषद दोनों क्षेत्रों में है। इसके समाधान के लिए कारगर कदम नहीं उठाए गए। एक जनहित याचिका पर हाईकोर्ट के आदेशानुसार अतिक्रमण हटा लेकिन वह भी आधा अधूरा ही हटा। नगर परिषद, यूआईटी व प्रशासिनक अमला अतिक्रमण के प्रति गंभीर नजर नहीं आता है। यही कारण है हालात दिन प्रतिदिन बदत्तर होते जा रहे हैं।
2. पार्किंग
अतिक्रमण के बाद शहर की दूसरी बड़ी समस्या पार्किंग हैं। या यूं कह सकते हैं कि शहर में पार्किंग के लिए कोई जगह ही चयनित नहीं है। चौपहिया हो या दुपहिया, सभी वाहन सडक़ों पर खड़े होते हैं। यह समस्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है, लेकिन इसका स्थायी समाधान नहीं खोजा गया है। जब तक शहर में पार्किंग के लिए जगह नहीं तलाशी जाएगी तब तक यह समस्या बढ़ती ही जाएगी। हाल ही में व्यापारियों ने पार्किंग व्यवस्था के लिए प्रस्ताव तैयार करने की बात कही है। इस तरह के प्रस्ताव जल्दी से जल्दी बनें और उनका अमल में आना समय की मांग है और शहर के हित में भी है।
3. सफाई
नगर परिषद के तमाम दावों के बावजूद शहर की सफाई व्यवस्था संतोषजनक नहीं कही जा सकती है। कई स्थानों पर कचरे का नियमित उठाव भी नहीं होता है। शहर की सफाई व्यवस्था सही न होने के कारण अक्सर श्रीगंगानगर को गंदानगर भी कह दिया जाता है। नालियों की सफाई भी नियमित नहीं होती है। अक्सर उनका गंदा पानी सडक़ों पर बहता है। सूरतगढ़ रोड पर भरे गंदे पानी का निस्तारण होने से जरूर लोगों को राहत मिली है। लेकिन इस तरह के गड्ढे शहर में भी है। गंदे पानी के जमाव से शहर में मक्खी मच्छर भी खूब हैं। साफ-सफाई के लिए गंभीरता से प्रयास करने होंगे।
4. आवारा पशु
शहर की सफाई तथा यातायात व्यवस्था को भंग करने में आवारा पशुओं का भी योगदान है। इन आवारा पशुओं के कारण शहर में आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती है। हादसों के वक्त प्रशासन जरूर हरकत में आता है लेकिन उसके बाद पशु उसी अंदाज में विचरण करते हैं। इतना ही नहीं पशुओं को चारा डालने की टाले भी शहर के बीच संचालित हो रही है, उनसे चारा लेकर वहीं डाल दिया जाता है। इससे पशुओं का नियमित जमावड़ा रहता है। पशुपालक भी रात को अपनी भैंसें खुली छोड़ देते हैं। आवारा श्वान भी शहर में बहुतयात में हैं। आवारा पशुओं की समस्या के समाधन की बात दूर पशुपालकों पर कभी कार्रवाई नहीं होती।
5. नशा
श्रीगंगानगर जिला नशे की गिरफ्त में है। यह नशा कई तरह का है। महंगे से लेकर सस्ते स्तर का नशा शहर व जिले में हो रहा है। इन दिनों बड़ी मात्रा में नशीली गोलियां बरामद की गई है लेकिन इस काम पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया है। अफीम, डोडा पोस्त से लेकर स्मैक व हेरोइन तस्करी के मामले भी सामने आते रहते हैं। यह बड़ा नेटवर्क है, जिसका भंडाफोड़ जरूरी है, ताकि समस्या का स्थायी समाधान खोजा जा सके। छुटपुट कार्रवाई से उपलब्धियों का आंकड़ा जरूर बढ़ रहा है लेकिन नशे के कारोबार पर अंकुश नहीं लगा है। नशे का शिकार युवा पीढ़ी ज्यादा हो रही है।
6. सडक़ें
्र्रशहर कई हिस्सों में सडक़ें टूट चुकी हैं। इससे वाहन चालक रोज परेशान होते हैं। टूटी सडक़ों के कारण हादसे होने की आशंका भी बनी रहती है। नई सडक़ के नाम पर सडक़ तोडऩा तो अलग विषय है लेकिन शहर में कुछ जगह सडक़ों की मरम्मत तक नहीं हुई है। विडम्बना देखिए मीरा चौक से ओवरब्रिज तक एक तरफ सडक़ कका पेचवर्क कर दिया गया लेकिन दूसरी तरफ ध्यान नहीं दिया गया। जिस तरफ सडक़ टूटी पड़ी है उधर बसें खड़ी होने लगी हैं। एक तरह से एक सडक़ बंद है। लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। जिम्मेदारों को नई सडक़ें जल्दी से तैयारी करवानी चाहिए तथा टूटी सडक़ों का पेचवर्क हो।
7. सौन्दर्यीकरण
सौन्दर्यीकरण के नाम पर शहर में कुछ काम नहीं हो रहा है। उल्टे सौन्दर्य के नाम पर जो चौक चौराहे हैं वे अवैध होर्डिंग्स, बैनर आदि से बदरंग हो रहे हैं। इस बदरंगता को लेकर गंभीरता नहीं बरती जाती। उल्टे नगर परिषद व यूआईटी के प्रतिनिधि भी खुद के फोटो लगे बैनर लगवाने में गुरेज नहंी करते हैं। अभी भी शहर के कुछ चौक पर नवनिर्वाचित विधायक के होर्डिंग्स लगे हैं। मनमर्जी से शहर को बदरंग करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिए। इसके लिए कठोर कार्रवाई की दरकार है। सडक़ डिवाइडरों के बीच लगाए गमले व पेड़ भी बदहाल हैं, उनकी सुध भी ली जानी चाहिए।
8. सीवरेज
वर्तमान में जहां सीवरेज का काम चल रहा है, वहां के वाशिंदे तथा उधर से गुजरने वाले लोग व्यवस्था को जरूर कोसते हैं। सीवरेज का काम अव्यवस्थित व धीमी गति से होने के कारण लोग परेशान हैं। सीवरेज के कारण एक साल से ज्यादा समय से सडक़ें खुदी पड़ी हैं, लेकिन इनका कोई धणी धोरी नहीं है। सीवरेज के पहले चरण के काम पर भी सवाल उठ चुके हैं लेकिन सीवरेज काम से जुड़ी एजेंसी ने कोई सुधार नहीं किया। सीवरेज की मुख्य एजेंसी ने काम नीचे सब ठेकेदारों को बांट रखा है, इससे काम की प्रभावी मॉनिटरिंग भी नहीं हो पा रही है। इन सब का खामियाजा शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है।
9. ड्रेनेज
बरसात के समय श्रीगंगानगर की सबसे बड़ी समस्या ड्रेनेज को लेकर है। बरसाती पानी निकासी सही नहीं होने के कारण पानी गलियों में जमा रहता है। या फिर इस पानी को पंप लगाकर आसपास के पार्कों में छोड़ दिया जाता है। इससे पार्कों की आबोहवा भी दूषित होती है। डे्रेनेज को लेकर प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। गनीमत यह रहती है कि श्रीगंगानगर में बरसात कम हो रही है। गत दिनों बरसात के कारण बाढ़ के से हालात बन गए थे। सेना को आना पड़ा था। इस समस्या को लेकर जनप्रतिनिधि गंभीर नहीं है। उनका जवाब होता है फिर सेना बुला लेंगे, मतलब हल नहीं खोजना।
10. पार्क
पार्क का नाम आते ही जेहन में एक ऐसी तस्वीर उभरती है, जहां हरियाली हो, मखमली दूब हो। बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले-फिसलपट्टी आदि हों। बैठने के लिए बैंच तथा घूमने के लिए फुटपाथ हो। अफसोस की बात है श्रीगंगानगर के अधिकतर पार्कों में ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। लगभग सभी पार्क बदहाल हैं। इनकी दशा सुधारने की कभी ईमानदार पहल नहीं हुई। यूआइटी के पास एक खाली भूख्ंाड है, जिसकी चारदीवारी के अंदर कचरा पड़ा है, उसके बाहर भी पार्क का बोर्ड लगा है। यूआईटी व नगर परिषद के अधीन पार्कों को संवारने की की सख्त जरूरत है।
11. रोडलाइट
श्रीगंगानगर में वैसे तो अधिकतर स्थानों पर रोड लाइट लगी है लेकिन ये रात को सभी जगह रोशन नहीं होती। कभी कोई सा हिस्सा तो कभी कोई सा हिस्सा अंधेरे में रहता है। इससे यह समस्या तकनीकी कम बल्कि मानव जनित ज्यादा नजर आती है। रोडलाइट से रात को न केवल शहर आकर्षक नजर आता है, बल्कि रात को गुजरने वाले राहगीरों व वाहन चालकों को भी आसानी होती है। जिम्मेदारों ने इस संबंध में आंखें मूंद कर रखी हैं। फिलहाल शहरवासियों को उस दिन का इंतजार है, जब शहर के सभी हिस्सों की रोडलाइट रोशन होगी।
12. नहरी पानी
इसमें कोई दो राय नहीं कि नहरी पानी श्रीगंगानगर के लिए जीवन है। यहां की अर्थव्यवस्था नहरी पानी पर टिकी है। पानी की थोड़ी सी कमी यहां आक्रोश की आग भडक़ा देती है। धरतीपुत्र सडक़ों पर उतर आता है। पानी की कमी के साथ-साथ पानी चोरी भी बड़ा मसला है। नहरी पानी की कमी व चोरी से संबंधित कुछ समस्याएं स्थानीय स्तर की होती हैं, लेकिन उनका समाधान तभी होता है, जब किसान सडक़ों पर उतरता है। नहरी पानी के नेटवर्क पर नजर रख इस समस्या का कारगर हल खोजना चाहिए। टैंकरों से पानी चोरी खुलेआम हो रही है, लेकिन सब चुप हैं।
13. पेयजल
जल ही जीवन है। स्वाभाविक सी बात है बिना जल के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। श्रीगंगानगर में नहरी पानी तो खूब है लेकिन पेयजल की शुद्धता पर कई बार सवाल उठाए जाते हैं। शुद्ध पेयजल उपलब्ध करवाना बड़ी चुनौती है। आज भी जलजनित रोगों के मरीज अस्पतालों में ज्यादा पहुंचते हैं। इसकी बड़ी वजह पेयजल का शुद्ध न होना भी माना जाता है। प्रशासन को इस संबंध में वर्तमान व्यवस्था की फिर से समीक्षा कर पानी की गुणवत्ता को जांचने की सर्वसुलभ व्यवस्था करवानी चाहिए।
14.भ्रष्टाचार
श्रीगंगानगर जिले को लेकर दूसरे जिलों में एक धारणा है। वह यह कि यहां कोई अधिकारी आना नहीं चाहता और अगर आ गया तो फिर यहां से जाना नहीं चाहता। इसकी बड़ी वजह है भ्रष्टाचार। अक्सर सुविधा शुल्क देकर काम करवाने की चर्चाएं आती रहती हैं। पंचायतीराज में भ्रष्टाचार के लगातार मामले सामने आए। इनमें कइयों की जांच चल रही है। मामला चाहे सौर लाइट का हो, रंगीन कुर्सियों का हो या फिर इंटरलॉकिंग टाइल्स का। सवालों के घेरे में सारे काम आए हैं। कामों में पारदर्शिता का अभाव है। भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्ति कैसे मिले, यह कम कैसे हो, इस दिशा में भी काम करने की जरूरत है।
15. भिक्षावृत्ति
शहर में भिक्षावृत्ति भी बढ़ रही है। प्रत्येक शनिवार को शनि मंदिर के आसपास भिखारियों का जमावड़ा होता है। साधुनुमा इन भिखारियों की संख्या इतनी होती है कि इससे आवागमन भी बाधित होता है। इतना ही नहीं रेलवे स्टेशन के पास तो इनका स्थायी अड्डा बन चुका है। इस कारण शहर आने वालों का सबसे पहले वास्ता इनसे ही पड़ता है। इसी तरह के लोग शाम होने पर शराब ठेकों के पास भी देखे जाते हैं। पूर्ण रूप से स्वस्थ व सक्षम लोगों को इस धंधे से हटाकर मुख्यधारा में जोडऩा चाहिए लेकिन शहर में ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
16 उदासीनता
प्रशासनिक स्तर के फैसले भी जिले के विकास में महत्ती भूमिका निभाते हैं। श्रीगंगानगर में लंबे समय से ऐसे अधिकारी की जरूरत महसूस की जाती रही है जो जिले के हित में कोई फैसला लेकर क्रियान्वित करवाए। श्रीगंगानगर जिले में कृषि के अलावा पर्यटन में भी काफी संभावनाएं हैं। हिन्दुमलकोट, बुड्ढ़ा जोहड़, लैला मजनूं की मजार आदि ऐसे स्थल हैं, जो सरकारी संरक्षण पाकर देश के पटल पर आ सकते हैं। इन स्थानों को लेकर चर्चाएं तो कई बार हुई हैं, प्रस्ताव भी बने हैं लेकिन वह सब कागजों में ही दफन होकर रह गए। नए साल पर इस दिशा में गंभीरता से सोचा जा सकता है।
17. कानून व्यवस्था
कानून व्यवस्था का मतलब होता है, जहां शांति हो। आपराधिक गतिविधियां न हो। अपराधियों में खौफ हो। अवैध व गलत काम करने वाले कांपे। श्रीगंगानगर जिले में कानून व्यवस्था न अच्छी है न बुरी है। हालांकि शराब की बिक्री रात को भी बेखौफ होती है। पुलिस व आबकारी के सामने होती है। प्रिंट रेट से ज्यादा होती है लेकिन इस अवैध काम पर अंकुश न तो पुलिस लगवा पाई है और न ही आबकारी विभाग। कभी मामला बढ़ जाता है तो दोनों विभाग मामला क्षेत्राधिकार का बताकर अपना बचाव जरूर कर लेते हैं। बसों के माध्यम से नशे का सामान आने पर भी रोक नहीं लग पाई है।
18. यातायात व्यवस्था
शहर की यातायात व्यवस्था सही नहीं कही जा सकती। बसें ओवरलोडेड दौड़ रही हैं। ऑटो बेलगाम हैं। यातायात नियमों की पालना कहीं होती दिखाई नहीं दे रही। वाहन चालकों में पुलिस के प्रति भय नहीं है। यातायात पुलिस के कुछ चुनिंदा व स्थायी ठिकाने हैं, वह उस दायरे से कभी बाहर नहीं निकलती। और जहां तैनात है वहां भी ज्यादा ध्यान बजाय व्यवस्था को बनाए रखने के, चालान काटने पर होता है। प्रभावी कार्रवाई की दरकार है, तभी वाहन चालकों में भय पैदा होता है। नए साल में यातायात पुलिस को ऐसा कुछ करना चाहिए, ताकि लोग कम परेशान हों।

19. चिकित्सा व्यवस्था
नए पीएमओ आने के बाद व्यवस्था में आंशिक बदलाव हुआ है। फिर भी अस्पताल की साफ-सफाई में अभी और सुधार की दरकार है। कई नर्सिंग सदस्यों का व्यवहार व कामकाज व्यवस्था के हिसाब से नहीं है। वे व्यवस्था को प्रशिक्षु नर्सिंग छात्रों के भरोसे छोडकऱ बंक मारते हैं। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिए। जिले का सबसे बड़ा अस्पताल होने के बावजूद कई तरह की जांच नहीं होती। कुछ उपकरणों के उपयोग में न आने की बातें भी सामने आती रहती हैं। जिले के पीएचसी व सीएचसी पर सामान्य केस रेफर करने की प्रवृत्ति पर बढ़ी है, जिससे जिला अस्पताल में अव्यवस्था होती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में...01 जनवरी 19 के अंक में प्रकाशित।

Wednesday, December 26, 2018

पर जीने की वजह बदल गई

बस यूं ही 
जीने की कोई न कोई वजह तो होती है, वजह ही न हो तो फिर जीवन कैसा? हां वजह सदा एक जैसी नहीं रहती, यह अक्सर बदल जाया करती हैं। कभी परिस्थितिवश तो कभी मजबूरी में। वजह सुखद और दुखद भी होती है। खैर, वजह कैसी भी हो, इस पर इंसान का बस नहीं चलता। इंसान वजह के द्वंद्व में जीवन भर फंसा रहता है। मैं भी इन दिनों कुछ ऐसे ही द्वंद्व में फंसा हूं। मां के जाने के बाद जीवन की दशा व दिशा अचानक से बदल गई। रोजमर्रा की जो दिनचर्या भी वह प्रभावित हो गई। ' मां', यह एक ऐसा शब्द है, जिसके बोलने भर से ही मुंह भर जाता है। सुखद अनुभूति होती है। खुद के बच्चे बने रहने का एहसास होता है। यह शब्द अब केवल बातों में रह गया है। और जब भी इस शब्द का जिक्र या ख्याल आता है तो आंखें नम हो उठती हैं। वैसे ख्याल का कोई समय निश्चित नहीं होता। वह रात या दिन नहीं देखता है। करीब डेढ़ माह में ऐसा कोई दिन नहीं बीता जब मां की याद में आंखें नम न हुई हों। कभी फूट-फूट के भी रोया हूं। यह शाश्वत सच है। यह कड़वी हकीकत है कि मां सदा सदा के लिए चली गई लेकिन उसकी यादें रह-रहकर कचोटती हैं। खुद को व्यस्त रखने का खूब प्रयत्न करता हूं पर कुछ अच्छा नहीं लगता। लाख कोशिश करता हूं चित को एकाग्र रखने की लेकिन मन उचट जाता है। पता नहीं यह कैसी अवस्था है और कब तक ऐसा होगा। सच यह कि इन दिनों मन कहीं नहीं लगता। खुशी जैसे रुठ गई है। खाली-खाली सा लगता है। यह हालात घर, आफिस, बाहर, बाजार सब जगह कमोबेश एक जैसे हैं। व्यवहार में हास , परिहास, उमंग आदि की जगह नैराश्य हावी हो गया है। उमंग, उल्लास व उत्साह पर नीरसता ने जैसे जबरन कब्जा कर लिया है। एक अजीब सी खामोशी। अंदर ही अंदर डरा देने वाला सन्नाटा और इस तरह के हालात के बीच बेहद गमगीन व गुमशुम पापा को देखकर सच में बेहद व्यथित व विचलित हो उठता हूं। सिर्फ डेढ़ माह में क्या से क्या हो गया। खुशी की जगह खामोशी तो उमंग की जगह उदासी का आलम हो गया। इस तरह के हालात मुझे डराते हैं। चिंतित करते हैं। सवाल और जवाब का दौर खुद से ही होता है। जेहन में विचारों का आवेग बड़ी तीव्र गति से होकर गुजरता है। यकीनन इस आवेग के गुजरने के बाद अक्सर अफसोस, अवसाद व आशंकाएं ही हाथ आती हैं। अपने इस बदलाव से हालांकि मैं हतप्रभ हूं, इससे उबरने की मन ही मन सोचता भी हूं लेकिन फिर कोई ख्याल आकर उसी अवस्था में फिर ले जाता है। पता नहीं यह क्यों हो रहा है और कब तक होगा?