Wednesday, May 20, 2015

यह लाचारी क्यों?

टिप्पणी...

माननीया, जिला कलक्टर, बीकानेर।
आप बीकानेर में काफी समय से हैं, इसलिए यह तो हो ही नहीं सकता है कि यहां की खूबियों एवं खामियों से आप वाकिफ नहीं हैं? समय-समय पर आपने कार्यकुशलता एवं संवेदनशीलता का परिचय भी दिया है। इतना कुछ होने के बाद भी शहर का एक हिस्सा ऐसा भी है, जो लम्बे समय से प्रशासनिक उदासीनता का शिकार है। हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि यहां व्यवस्था नाम की चीज दिखाई ही नहीं देती। ऐसा लगता है सब कुछ मनमर्जी से हो रहा है। मामला पुलिस लाइन के पास कोलायत रोड पर बने रेलवे ओवरब्रिज की लाइटों और ब्रिज के नीचे फैली अराजकता का है। छोटी या मामूली सी लगने वाली इस बात की हकीकत बेहद गंभीर है। उदासीनता का आलम यह है कि लम्बे समय से विभिन्न माध्यमों के जरिये प्रशासन के संज्ञान में लाए जाने के बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ है। ऐसे में लोगों के जेहन में एक ही सवाल उठता है कि प्रशासन की यह लाचारी क्योंं? व किसलिए? आखिर ओवरब्रिज के आसपास रहने वाले तथा यहां से गुजरने वाले किस अपराध की सजा भुगत रहे हैं।
बीकानेर आपके लिए अब नया नहीं रहा। फिर भी बताते चलें कि ओवरब्रिज के पास महिला कॉलेज, अनाथालय, छात्रावास आदि हैं। लेकिन ब्रिज के नीचे का माहौल दिन में भी भले-चंगे को गश खाने पर मजबूर करने वाला है। दिन-दहाड़े ब्रिज के नीचे पियक्कड़ों व शोहदों के जमावड़े के बीच से रोज निकलने की यंत्रणा झेलने वाली कॉलेज छात्राओं की कल्पना मात्र ही सिरहा देने वाली है। इधर-उधर फैली शराब की खाली एवं फूटी बोतलें यहां पुलिस गश्त की चुस्ती की चुगली करती हैं। शाम ढलते-ढलते तो हालात और भी भयावह हो जाते हैं। कारण है घुप्प अंधेरा। ओवरब्रिज के ऊपर व आजू-बाजू में लगी लाइटें नियमित रूप से नहीं जलती हैं। लापरवाही की हद तो यह है कि अक्सर लाइट दिनभर जलती रहती हैं और रात को गुल हो जाती हैं। रात के अंधेरे में ब्रिज के नीचे का नजारा खुली बार में तब्दील हो जाता है। यहां शराब के दो ठेके भी हैं। कहने को ये तय समय पर खुलते-बंद होते हैं, लेकिन इससे शराब बिकना या जाम छलकना नहीं रुकता। बस जगह थोड़ी सी आगे-पीछे हो जाती है और कीमत बढ़ जाती है। ऐसे में देर रात तक वाहनों की आवाजाही व जमावड़ा लगा रहता है।
शायद आपकी जानकारी में न हो कि कुछ समय पहले तक रात के समय पुलिस/ होमगार्ड के दो जवान यहां ड्यूटी करते थे। उनकी आंखों के सामने भी यही सब चलता रहता था। अब तो यहां की व्यवस्था भगवान भरोसे है। किसी की ड्यूटी लगना भी बंद हो गई है।
बहरहाल, मौजूदा हालात से ऐसा प्रतीत होता है कि लाइटों को जानबूझकर बंद रखा जाता है ताकि कारनामों को आसानी से अंजाम दिया जा सके। कहने की आवश्यकता नहीं है, आप कभी भी मामले की सत्यता अपने किसी मातहत से या खुद जांच सकती हैं। मामला गंभीर हैं लेकिन आपके मातहतों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। इससे पहले ही कि यहां कोई अप्रिय वारदात या किसी तरह की कोई अनहोनी हो, आंखें खोलना जरूरी हो गया है। उम्मीद है कि आप इस दिशा में कोई कारगर पहल कर समस्या का निराकरण करवाएंगी।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 31 अक्टूबर 14 के अंक में प्रकाशित

चीकू का अंदाज

 बस यूं ही

दरअसल, यह फोटो फेसबुक पर अपलोड करने से मैं डर रहा था। जेहन में कई तरह के ख्यालात थे। और साथ में वो ही सबसे बड़ा रोग... क्या कहेंगे लोग..वाला जुमला भी। खैर, जिद के आगे मैंने आत्मसमर्पण कर ही दिया। बाल हठ जो ठहरी। चूंकि छोटा बेटा एकलव्य (चीकू) बचपन से ही ड्रामेबाज है। अभी वह साढ़े सात साल का हुआ है लेकिन अपने अभिनय से कई बार चौंका देता है। टीवी व फिल्मी कलाकारों को देखकर उनके जैसा बनने और उनकी स्टाइल कॉपी करने में उसकी खासी दिलचस्पी है। अभी कक्षा दो का छात्र है, लेकिन वह सांस्कृतिक गतिविधियों में हमेशा भाग लेता है। गायक हनीसिंह के लगभग गीत तो उसको कंठस्थ है। चीकू कम्प्यूटर पर हनीसिंह के अपने पसंदीदा गीत लगाकर डांस भी खूब करता है। आजकल तो वैसे भी बेहद खुश है। अपनी कक्षा का मॉनिटर जो बना हुआ है। अब बात पीके की। दो दिन के लिए मैं गांव गया था। बच्चे अपनी मम्मी के साथ बीकानेर में ही थे। रविवार को दोपहर बाद जब घर लौटा तो बड़ा बेटा योगराज अपनी मम्मी का मोबाइल लेकर आया बोला पापा देखो चीकू की फोटो। मैं फोटो देखकर मुस्कुरा उठा। बिलकुल आमिर खान वाले अंदाज में चीकू पीके बना हुआ था। निर्मल (धर्मपत्नी) ने बताया कि दोपहर को पता नहीं अचानक उसके क्या जची और दादोसा के पास जाकर रेडियो मांगने लगा। दादोसा का चीकू पर स्नेह कुछ ज्यादा ही है, उन्होंने बैग से रेडियो निकाल कर उसे दे दिया। उसके बाद दोनों बच्चों ने मिलकर यह फोटो खींच लिए।
खैर, मैं घटनाक्रम से अवगत होता तब तक चीकू भी पास आ गया कहने लगा पापा मेरी फोटो फेसबुक पर लगा दो। मम्मी के फोन से फेसबुक पर नहीं जाएगी। आप दुबारा खींचो अपने मोबाइल से और फेसबुक पर लगाओ।
मैंने एक दो बार तो मना कर दिया, लेकिन वह नहीं माना। आखिर बाल हठ के आगे झुकना पड़ा। फोटो खींचे तो दौड़कर आया और कहने लगा पहले मेरे को दिखाओ। इसके बाद उसने चार-पांच जगह वाटस एप पर फोटो भेज दिए। भानजे प्रदीप ने फोटो के साथ कुछ कलाकारी कर दी। उसने पीके लिख दिया और कुछ सीन जोड़ दिए। इसके बाद तो फोटो को फेसबुक पर लगाने की जिद जोर पकड़ गई। अंतत: फोटो फेसबुक पर रिलीज किया जब जाकर चीकू ने मेरा पीछा छोड़ा।

मासूमियत

 तीसरी लघु कथा

मुफलिसी में किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़़ करने वाले उस गरीब परिवार पर तो जैसे विपदाओं का पहाड़ ही टूट पड़ा था। पड़ोस की ढाणी में कक्षा पांच में जाने वाली उनकी बच्ची पर हवस के भूखे भेडिय़ों की बुरी नजर जो पड़ गई थी। यह सब करने वाले गांव के ही प्रभावशाली परिवारों के दो बिगड़ेल शोहदे थे। किसी तरह पुलिस में प्राथमिकी तो दर्ज कर दी गई लेकिन बात उससे आगे नहीं बढ़ी। प्रभावशाली परिवारों की पहुंच को देखते हुए वैसे पुलिस से कार्रवाई की उम्मीद भी बेमानी थी। इधर, पीडि़त परिवार को मुंह बंद रखने के लिए कई तरह के प्रलोभन भी दिए गए, लेकिन परिवार का मुखिया बड़ा खुद्दार था। उसका एकमात्र उद्देश्य आरोपियों को सजा दिलवाना ही था। वह खुद ब खुद ही कहता 'गरीब हूं तो क्या? भला इज्जत का सौदा कैसे कर लूं, मेरी लाडली के सपनों को कुचलने वालों की कड़ी से कड़ी सजा मिले, बस इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं चाहता।' खैर, इस घटनाक्रम को हुए करीब दो माह बीत गए। उस दिन से बच्ची स्कूल नहीं जा पाई। अचानक एक स्वयंसेवी संगठन को इस समूचे प्रकरण की जानकारी हुई। सारी टीम गांव पहुंची और पीडि़त परिवार और उस बालिका को अपने साथ जिला मुख्यालय ले आए। पीडि़त परिवार भी न्याय मिलने की उम्मीद में चला आया।
इसके बाद जिला मुख्यालय पर धरना प्रदर्शन का दौर शुरू हुआ। धीरे-धीरे जनसमर्थन मिलने लगा। बालिका के समर्थन में बढ़ती भीड़ देखकर कई सामाजिक संगठन एवं राजनीतिक पार्टियों के भी कान खड़े हो गए। छुटभैये नेता तो खुद ही समाचार पत्रों के कार्यालय पहुंचने लगे थे। धरने पर बैठे पीडि़त परिवार एवं बालिका के साथ फोटो खिंचवाने की होड़ सी लग गई। हद तो तब हो गई जब एक संगठन बालिका व उसके परिवार को लेकर समाचार पत्र कार्यालय पहुंच गया। उधर, कार्यालय का फोटोग्राफर टेबल पर फोटो फैलाकर उनका चयन करने में जुटा था। अचानक बालिका की नजर टेबल पर पड़े खुद के फोटो पर गई। वो जोर से चिल्लाई 'बाबा.. देखो मेरी फोटो..।' मैं हतप्रभ था, उसकी मासूमियत पर। सोच रहा था, अपने प्रचार के लिए लोगों ने एक मासूम को कैसे 'तमाशा' बना रखा है।

श्रेय की भूख

 दूसरी लघु कथा

हमेशा उत्साह एवं जोश से लबरेज दिखने वाले, साथियों को प्रोत्साहित करने तथा लक्ष्य के लिए दिन रात एक करने की सीख देने वाले गुरुजी आज बड़े उदास थे। घर में तेजी से चहलकदमी करते और एक हाथ की मुट्ठी बनाकर दूसरे हाथ पर मारते देख उनकी परेशानी का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था। उनके चेहरे पर कई तरह के भाव आ और जा रहे थे। रह-रह कर गुरुजी के कानों में पिताजी की वह नसीहत गूंज रही थी 'बेटा मंजिल पाने के लिए धैर्य रखो। इतनी जल्दी भी मत करो कि लोग दुश्मन हो जाए और अधिकारियों की आपसे अपेक्षा बढ़ जाए। झुंझलाहट में गुरुजी को कुछ नहीं सूझ रहा था। जेहन में विचारों का द्वंद्व चल रहा था। बार-बार एक ही सवाल गुरुजी को कचोट रहा था, आखिर इतनी मेहनत और निष्ठा का यह सिला क्यों? इन सब के बीच ख्याल आता, शायद पिताजी ने सही ही कहा था। वजह भी थी। गुरुजी ने असंभव से दिखने वाले काम को न केवल निर्धारित समय से पहले पूरा किया बल्कि राज्य स्तर पर पुरस्कार भी मिल गया। बस यही पुरस्कार उनके लिए जी का जंजाल बन गया। काम न करने वालों एवं मीन-मेख निकालने वालों को बड़ी पीड़ा हुई कि आखिर यह क्यों हो गया? इसके बाद कई लोग तो जैसे हाथ धोकर गुरुजी के पीछे ही पड़ गए। जिन अधिकारियों के दम पर गुरुजी आज तक यह सब करते आए थे, वो ही अब उनको शक की नजर से देखने लगे। टांग खींचने वाले लोग, अधिकारियों के कान भरने में सफल हो गए थे। दरअसल, गुरुजी के काम के साथ अधिकारियों ने भी सपना देखना शुरू कर दिया था। काम और मेहनत भले ही गुरुजी की थी लेकिन इससे अधिकारियों का भी हित जुड़ा था। अचानक एक बड़े अधिकारी के तबादले की चर्चा शुरू हो गई। गुरुजी को सौंपा गया काम शत-प्रतिशत पूरा होने को था। अधिकारी की प्रबल इच्छा थी कि काम उनके तबादले से पूर्व ही हो जाए ताकि उपलब्धि उनके खाते में जुड़ जाए। चूंकि गुरुजी अब दोराहे पर थे। 'शुभचिंतकों का असहयोग और अधिकारी का बार-बार 'मैंने तुमको राज्य स्तर पर सम्मानित करवा दिया.. कहना गुरुजी के कान में ऐसे गूंज रहा था जैसे किसी ने कानों में गर्म शीशा डाल दिया है..। उनको वह पुरस्कार अब तुच्छ दिखाई देने लगा..क्योंकि गुरुजी को अपनी मेहनत और निष्ठा पर श्रेय की भूख भारी पड़ती दिखाई दे रही थी।

मंत्रीजी का कुत्ता

पहली लघु कथा
वो बिलकुल तनाव में थे। झुर्रियां होने के बावजूद उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। पिछले 15 दिन से उनके दिन का चैन एवं रातों की नींद उड़ी हुई थी। वजह थी वह मोटरसाइकिल, जो चोरी हो गई। बैंक से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने यह मोटरसाइकिल खरीदी थी। पूरे एक सप्ताह तक चक्कर लगवाने के बाद पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली लेकिन मोटरसाइकिल का कोई सुराग नहीं लगा। वो बार-बार पुलिस थाने इस उम्मीद से जाते कि शायद कोई खुशखबर मिल जाए लेकिन हमेशा निराशा ही हाथ लगती। एक दिन तो पुलिसवाले नेझिड़क भी दिया। कहने लगा, रोजाना आने की जरूरत नहीं है, जब मिलेगी तो आपको फोन पर सूचित कर देंगे। वह मन मसोस कर रह गया। जिंदगी भर की कमाई से जो पैसा शेष बचा था, उसी तो बेटे के लिए मोटरसाइकिल खरीदी थी। थक हारकर उन्होंने सोचा क्यों ना अखबार में यह खबर दे दी जाए। इस उम्मीद के साथ कि खबर पढ़कर हो सकता है कोई मोटरसाइकिल की जानकारी दे दे। आखिरकार हिम्मत जुटाकर वह बेटे के साथ अखबार के दफ्तर पहुंचा। चेहरे पर चिंता के साथ आग्रह के कुछ भाव थे। पत्रकार ने जब उनसे आने की वजह पूछी तो उन्होंने एक प्रार्थना पत्र एवं पुलिस एफआईआर की कॉपी टेबल पर रख दी। पत्रकार ने पढऩे के बाद पूछा.. बताइए क्या करना है?। सज्जन बोले, पन्द्रह दिन हो गए मोटरसाइकिल खोए हुए कोई सुराग नहीं मिल रहा है। इस उम्मीद से आया हूं कि आपकी खबर से शायद काम बन जाए। पत्रकार थोड़ा मुस्कुराया फिर बोला, आप भी बड़े आशावान हैं, जब पुलिस ही नहीं तलाश पाई तो खबर से कैसे पता चलेगा। अचानक वो शख्स कुछ आवेश में आए और कहने लगे, भाईसाहब आपकी कलम में ही ताकत है, आप कुछ लिखेंगे, तभी यह पुलिसवाले कुछ हरकत में आएंगे। इनके लिए मोटरसाइकिल तलाशना कोई मुश्किल काम नहीं है। जब यह मंत्रीजी का कुत्ता तलाशने के लिए दिनरात एक कर सकते हैं तो फिर हमारे लिए क्यों नहीं? पत्रकार निरुतर था और वो सज्जन अपना प्रार्थना पत्र टेबल पर छोड़कर जा चुके थे।

आओ संकल्प लें


टिप्पणी


जब समूचा शहर मां दुर्गा की आराधना में डूबा हुआ है। शक्ति रूप में कन्याओं की पूजा की जा रही है। ऐसे समय में नाली में कन्या भ्रूण मिलना गंभीर है। एक ऐसी सामाजिक बुराई, जो हमको कचोटती है और झकझोरती भी है। एक ऐसा बदनुमा दाग जो हमको शर्मसार करता है। बीकानेर में एक सप्ताह के भीतर भ्रूण मिलने की यह दूसरी घटना है। बात शर्मनाक इसीलिए भी है कि यह सब हमारे शहर में हो रहा है। हमारा शहर जो छोटी काशी के नाम से विख्यात है। यहां आस्था की प्रगाढ़ता दूसरे शहरों के लिए किसी नजीर से कम नहीं है। धर्म-कर्म व सेवा भावना यहां के खून में है। धार्मिक पदयात्रियों के लिए कदम-कदम पर सेवा शिविर लगाकर खुद को धन्य समझने वाले भी हम ही लोग हैं। आवारा पशुओं के लिए हरा चारा खरीदकर उनकी निस्वार्थ सेवा करने वाले भी बीकानेरी ही हैं। सहयोग व सद्भाव यहां की परम्परा है। भाईचारे एवं इंसानियत के तो यहां कई उदाहरण हैं।
मानवीय संवेदनाओं को सहेजने और महसूस करने वाले हमारे बीकानेर में इस प्रकार का घटनाक्रम निसंदेह घिनौना कृत्य है। बीकानेर जैसे शहर एवं माहौल में ऐसे कृत्य घटित होना शोचनीय भी है। इतना ही नहीं प्रशासन एवं स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता बदलने तथा बेटा-बेटी को समान समझने के लिए कई तरह की इनामी योजनाएं भी ईजाद की गई हैं। अभी हाल ही में जिला कलक्टर ने तो अभिनव प्रयोग करते हुए किसी के घर में कन्या पैदा होने पर संबंधित दम्पती को बधाई संदेश भेजने का फैसला किया है। इस तरह की कवायद से परिणाम अनुकूल आएंगे। लेकिन शहर एवं जिले के मौजूदा जो हालात हैं वो चौंकाते हैं। जिले की तस्वीर डराती है। सन २००१ की जनगणना के मुकाबले २०११ की जनगणना में जिले में प्रति हजार पुरुषों के पीछे महिलाओं की संख्या में कुछ बढोतरी जरूर हुई लेकिन इस आंकड़े पर हम ज्यादा खुश नहीं हो सकते। क्योंकि ० से छह साल के बच्चों की तुलना करें तो लिंगानुपात कम हुआ है। सोचिए हम इसी रफ्तार से बढ़ते रहे तो बेटियों का अकाल पड़ जाएगा।
बहरहाल, संकल्प करें। इस बात की शपथ लें कि हम बेटियों को भी उतना ही मान-सम्मान, प्यार व स्नेह देंगे जितना बेटों को देते आए हैं। दोनों में किसी तरह का भेद नहीं करेंगे। समय की मांग भी यही है, अगर आज हमने इस मांग को अनसुना कर दिया तो कल कुंवारों की लम्बी चौड़ी फौज खड़ी हो जाएगी। चूंकि हमारा शहर सेवाभावी लोगों का है। यहां मानवीय संवेदनाएं अभी जिंदा हैं। जब नवरात्र में हम कन्याओं को दुर्गा का स्वरूप मान पूजा करते हैं तो बाकी दिनों में क्या यह संभव नहीं? नवरात्र से पुनीत एवं अच्छा मौका और कोई हो भी नहीं सकता। और हां, मां दुर्गा भी तभी खुश होंगी जब हम उनकी प्रतिमूर्तियों को बराबर का हक देकर मान-सम्मान के साथ उनको आगे बढाएंगे। खैर, अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है। हम सब ठान लें और प्रण करें कि इस बुराई को दूर करके रहेंगे तो मुश्किल कुछ भी नहीं है। वाकई मां दुर्गा की सच्ची पूजा भी तभी होगी।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 30 सितम्बर14  के अंक में प्रकाशित  

एमटीएस क्या लिया आफत मोल ले ली...


बस यूं ही

भिलाई से बीकानेर आने के बाद सबसे पहले मैंने घर पर इंटनरेट कनेक्शन के लिए प्रयास शुरू किए। ऐसा करना जरूरी भी था, क्योंकि मुझे भली भांति मालूम था कि बच्चे आते ही सबसे पहले कम्प्यूटर ही तलाशेंगे। वैसे कनेक्शन के लिए पहली प्राथमिकता बीएसएनएल ही थी लेकिन इसमें निजी फोन कंपनियों के बरक्श औपचारिकता कुछ ज्यादा थी। मैं धीरे-धीरे उनको पूरी कर ही रहा था कि अचानक एक परिचित से मैंने इसकी चर्चा कर दी। उन्होंने एमटीएस का कनेक्शन लेने का सुझाव दिया। बस फिर क्या था मैंने तत्काल फोन कंपनी के प्रतिनिधि को फोन लगाया। वह भी लगभग तैयार ही था। थोड़ी ही देर बाद वह कार्यालय में हाजिर हो गया। खैर, मैंने वाई फाई कनेक्शन का डोंगल ले लिया। शुरुआती दौर में स्पीड वगैरह ठीक मिली लेकिन जैसे-जैसे माह पूर्ण होने को आया स्पीड घटने लगी। उसी प्रतिनिधि से फिर पूछा तो जवाब दिया गया कि माह के आखिरी में अक्सर ऐसा ही होता है, आप बिल जमा करवा देंगे तो स्पीड ठीक हो जाएगी। ऐसा हुआ भी। वैसे बिल जमा करवाने की अंतिम तिथि माह की १८ तारीख होती है। मैं कभी भी आखिरी बॉल पर छक्का लगाने का पक्षधर नहीं रहा, लिहाजा समय से पहले ही बिल जमा करवाता रहा हूं। चाहे घर का बिजली बिल रहा हो या मोबाइल का। इतना ही नहीं एलआईसी एवं अन्य पॉलिसीज भी निर्धारित तिथि से पूर्व ही जमा करवाता हूं। दो चार दिन पहले करवाने के पीछे मंशा यही रहती है कि आखिरी दिन लम्बी लाइन में ना लगने पड़े तथा किसी प्रकार की अनावश्यक परेशानी भी न हो।
इस बार व्यस्तता ज्यादा थी। ना चाहते हुए भी इस बार बिल निर्धारित तिथि से पहले जमा नहंी हो पाया। आखिरी दिन 18 सितम्बर को बिल जमा करवा दिया गया, लेकिन कंपनी से बिल जमा होने का कोई मैसेज मोबाइल पर नहीं आया। मेरे पास बिल जमा करवाने का प्रमाण था। मैं आश्वस्त था कि मैसेज नहीं आया तो कोई बात नहीं यह कंपनी का सिरदर्द है, जो होगा देखा जाएगा। 19 सितम्बर को मोबाइल पर कम्पनी के दो मैसेज आए। मैसेज बिना पढ़े ही सेंडर का नाम देखकर मैंने अंदाजा लगाया कि शायद बिल राशि जमा होने के बारे में आए हैं। लेकिन मेरा ऐसा सोचना गलत था। मैसेज में लिखा था कि आपका बिल अभी ड्यू है, इससे तत्काल जमा करवाएं। संयोग देखिए इसके ठीक अगले दिन इंटरनेट सेवा ठप हो गई। तीन दिन तक यही सिलसिला चलता रहा। कार्यालय से घर जाता तो धर्मपत्नी उलाहना देनी लगी।
कहती तीन दिन से नेट नहीं चल रहा है, इसको ठीक क्यों नहीं करवाते?। इधर, मेरे जेहन में यही चल रहा था कि हो न हो बिल सही तरीके से जमा न होने (मोबाइल पर मैसेज नहीं आया था ) के कारण नेट का कनेक्शन विच्छेद कर दिया गया है। मन में गुस्सा भी था कि सब कुछ समय पर करने के बाद भी ऐसा क्यों हो रहा है। कुछ आक्रोश कंपनी की सेवा को लेकर भी था। कई बार कस्टयूमर केयर में स्पीड की शिकायत दर्ज करवा चुका था। आखिरकार उसी प्रतिनिधि को फोन लगाया, जिससे डोंगल लिया। पहले तो उसने कार्यालय के किसी अधिकारी के नम्बर दिए और कहा कि आप इनसे सुबह दस बजे के बाद बात करना। चूंकि मैं सुबह बात करना भूल गया। दोपहर को याद आया तो मैंने उनको करीब 10 से 15 बार तक फोन लगाया लेकिन उन्होंने अटेण्ड नहीं किया। मैंने फिर प्रतिनिधि को फोन लगाया और झल्लाते हुए अपनी पीड़ा बताई। वह बोला कि शाम छह बजे आफिस जाऊंगा तब आपकी बात करवा दूंगा। मैंने छह बजे फिर फोन लगाया तो उसने बात नहीं करवाई लेकिन कहा, कि अपने नम्बर मैसेज कर दो। मैं मन ही मन फिर झल्लाया और खुद से कहा कि.. भाई यह काम तो तू सुबह ही करवा सकता था, तेरे को यह नेक ख्याल आने में आठ से दस घंटे क्यों लग गए। खैर, मैंने उसको मैसेज किया तो उसका कहना था कि भाईसाहब आपका नेट चालू है। आपके कम्प्यूटर में कोई दिक्कत है, उसको चैक करवा लें।
उसकी सलाह पर मैने सीपीयू चैक करवाया लेकिन कोई गड़बड़ नहीं मिली तो। उसको इस संबंध में बताया तो कहने लगा कि आप डोंगल लेकर कार्यालय आ जाना। वहां दिखाने के बाद डोंगल ठीक हो गया। कम्प्यूटर पर नेट भी चलने लगा। थोड़ा दिलासा हुआ कि भले ही मैसेज नहीं आया लेकिन नेट तो चालू है। मतलब बिल संबंधी दिक्कत दूर हो गई है। लेकिन मेरा यह भरोसा दूसरे ही दिन टूट गया। जब बीकानेर के स्थानीय कार्यालय से फोन आया और पूछा गया कि आप बिल जमा कब करवा रहे हो? मैं हतप्रभ था। कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या जवाब दूं। मन में हल्का सा आक्रोश भी था। फिर भी संयमित होकर मैंने जवाब दिया कि भाईसाहब बिल तो मैं जमा करवा चुका हूं, मेरे पास बाकायद रसीद भी है। उसने रसीद को कार्यालय में आकर चैक करवाने की बात कहकर फोन काट दिया।
पिछले रविवार दोपहर तीन बजे फिर फोन आया। अटेण्ड किया तो फिर वही चिर-परिचित डायलॉग, आप बिल जमा कब करवा रहे हो। अब मेरा धैर्य जवाब दे चुका था। मैंने बिना कोई जवाब दिए सीधे ही कह दिया.. यार, मैंने एमटीएस का कनेक्शन का लेकर गुनाह कर दिया क्या?। मेरा इस प्रकार का जवाब सुनकर वह सकपका गया। पूछा भाईसाहब कैसे? मैंने कहा कि मैं कितनी बार बताऊं कि बिल जमा हो चुका है। मैं 18 सितम्बर को बिल जमा करवा चुका हूं। बिल 891 रु का आया था और मैंने 900 रुपए जमा करवाया है। मैं पिछले पांच माह से एमटीएस का ग्राहक हूं और हमेशा बिल समय से पहले ही जमा करवाया है। मेरी बात सुनकर वह बोला भाईसाहब मैं चैक करवा लेता हूं। हो सकता है बिल की जानकारी अपडेट ना की गई हो। मैने फिर कहा कि यह आपका मामला है लेकिन मैं कब तक जवाब देता रहूं। यकीन ना हो तो रसीद लेकर आपके कार्यालय आ जाऊं। संभवत: वह मेरा मिजाज भांप चुका था, लिहाजा वह थोड़ा नम्र होते हुए बोला, भाईसाहब भविष्य में आपको हमारे कार्यालय आने की जरूरत नहीं है। हम आपके पास आकर ही बिल की राशि ले जाएंगे। खैर, उसने कुछ संतोषजनक जवाब जरूर दिया लेकिन मन में शंका बरकरार थी।
खैर, मंगलवार को फिर वही घटनाक्रम दोहराया गया। सबसे पहले जयपुर से फोन आया। सामने से कोई मोहरतमा बिलकुल रिकॉर्डेड आवाज तरह बोले जा रहे थी। मैंने कहा कि आप अपनी ही सुनाएंगी या मेरी भी सुनेंगी। तो बोली आप को जो कहना है हमारे कार्यालय में जाकर बताइए, मैं कुछ नहीं जानती, आपको तो बिल जमा करवाना ही पड़ेगा। मैं बिलकुल अवाक था। मोहतरमा की इस तरह के व्यवहार पर गुस्सा आना लाजिमी थी। मैंने कहा कि मैडम, आपके आफिस मैं क्यों जाऊं। उसने कहा, आपकी मर्जी और फोन रख दिया। इसके बाद रविवार को एमटीएस के जिस नम्बर से मेरे पास फोन आया था, उस पर डायल किया तो जवाब आया अरे सर, आपका बिल जमा है लेकिन एक बार आफिस आ जाओ। मैंने वजह जानी तो बताया कि सीनियर से मिल लो। मैंने कहा कि आप सीनियर के नम्बर दे दो। उसने नम्बर दिए, तो मैं चौंक गया।
यह उसी शख्स के नम्बर थे, जिनको मैं पूर्व में कई बार फोन लगा चुका था लेकिन उन्होंने उठाया नहीं था। महोदय के फोन पर हैंगओवर की हेलो टून बज रही थी। मैंने मैसेज भी छोड़ा लेकिन कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद मैंने लैंडलाइन से लगाया। संयोग से इस बार फोन उठा लिया गया। मैंने कहा, अरे सर, आप तो बहुत बिजी हैं। आप तो फोन अटेण्ड ही नहीं करते। बड़े इंतजार के बाद आपने फोन उठाया है। सामने वाले सज्जन पता नहीं किस बात पर भन्नाए हुए थे, तपाक से बोले.. बाद में बात करना। बाजार में हूं, बाइक चला रहा हूं। मैंने कहा सर, आपका शुभनाम क्या है। बोले मेरा नाम ललित है, आप आधा घंटे बाद कार्यालय में आकर मिलना। मैं आगे कुछ कहता इससे पहले उन्होंने फोन काट दिया। मैं एमटीएस के नुमाइंदों के व्यवहार एवं कार्यप्रणाली से बेहद उकता गया था। मन ही मन सोच रहा था कि रात को एमटीएस का नेट धीमा क्यों हो जाता है? क्यों इतनी बड़ी कंपनी की सेवा संतोषजनक नहीं है? कर्मचारियों के साथ हुए वार्तालाप के बाद मुझे अपने सवालों के जवाब कुछ हद तक मिल चुके थे। फिर भी अपनी बात कहने के लिए मैं शाम को एमटीएस कार्यालय पहुंचा। सबसे पहले बिल जमा करवाने वाले काउंटर पर पहुंचा और रसीद दिखाते हुए और कुछ अनजान बनते हुए पूछा क्या यह आपने ही दी है?। पर्ची को देखकर युवक ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। चूंकि मैं गुस्से में था और खरी-खोटी सुनाने के पूरे मूड में था। युवक से पूछा कि यह मिस्टर ललित कौन हैं और कहां मिलेंगे। उसने बगल में इशारा कर दिया कि इस आफिस में मिलेंगे।
वहां से निकल कर मैं वह बगल वाले कक्ष में घुसा तो वहां बैठे सुरक्षाकर्मी ने मेरा परिचय पूछा तो मैं बिना कोई भूमिका बनाते हुए सीधे मिस्टर ललित से मिलने की इच्छा जताई। उसने कहा वो तो बाहर हैं, अभी नहीं मिल सकते। मैंने कहा कि उनके बाद कोई दूसरा जिम्मेदार तो होगा, जिसको मैं अपनी बात कह सकूं। तभी एक युवक आया, मैंने उसको अपनी पीड़ा बताई तो वह अंदर गया। कम्प्यूटर पर कुछ चैक करने के बाद वापस आया और कहने लगा कि आपका बिल जमा है, आपने तो उल्टे नौ रुपए ज्यादा जमा करवा रखे हैं। मैंने कहा कि जब यह सब कर रखा तो पिछले दस-बारह दिन से यह नौटंकी क्यों? वह बोला आपका बिल 19 सितम्बर को जमा हुआ है, लेकिन कुछ तकनीकी गड़बड़ की वजह से कम्प्यूटर पर शो नहीं कर रहा है। इसके बाद उस युवक ने मिस्टर ललित को फोन लगाया और सारी वस्तुस्थिति से अवगत कराया। मैं तो इस जिद पर अड़ा था कि मुझे एमटीएस के किसी बड़े पदाधिकारी के नम्बर मिल जाएं ताकि बीकानेर के कर्मचारियों की कार्यकुशलता की बड़ाई मैं उसके सामने कर सकूं। मैं कोई नम्बर या आईडी मांग रहा था, लेकिन सामने वाला युवक थोड़ा व्यवहार कुशल लगा। वह भी अपने साथी के व्यवहार पर अफसोस जताते हुए मेरे से पूछ बैठा भाईसाहब आप कहां के हो। जब मैंने झुंझुनूं का नाम लिया तो वह झट से पूछ बैठा झुुंझुनूं में कहां के तो मैंने चिड़ावा तहसील में अपना गांव बता दिया। मेरा इतना कहते ही वह बोला चिड़ावा में हमारे परिजन भी रहते हैं। मैंने युवक से पूछा तो उसने कहा कि वह भी झुंझुनूं के मलसीसर का रहने वाला है। उसने अपना नाम प्रदीप खेमका बताया।
फिर तो वह मेरे से खुलकर बातें करने लगा। उसने बताया कि जयपुर से जो फोन आ रहा है वह एमटीएस का न होकर एक एजेंसी का है। हम जो बिल जमा नहीं होते हैं, वह नम्बर एजेंसी को दे देते हैं। वहां से संबंधित उपभोक्ता के पास फोन आते रहते हैं। आपके पास दुबारा फोन नहीं आएगा। आखिरकार मैं उनके ऑफिस से बाहर आने लगा और फिर से नम्बर और मेल आईडी मांगी तो वह मुस्कुरा दिया, मानो कह रहा हो, अब रहने भी दो, इतना कुछ तो सुना चुके। उसने मेरे से मोबाइल नम्बर लिए, उसके बाद एक मिस्ड कॉल दी और बोला, यह मेरे नम्बर हैं आप इसे सेव कर लो। खैर, मिस्टर ललित से मिलने की अधूरी हसरत के साथ मैं वहां से घर लौट आया। आश्वासन तो मिल गया लेकिन मन में यह बात अभी भी घर किए हुए है क्योंकि मोबाइल पर मैसेज फिर भी नहंी आया है। वैसे मेरे पास उन सभी कर्मचारियों के मोबाइल नम्बर भी हैं, जिनके साथ मेरा वार्तालाप हुआ। मुझे सर्वाधिक पीड़ा तो उस ललित गौड़ नामक शख्स से है जो जिम्मेदार पोस्ट पर होने के बाद भी बचकानी हरकतें करने से बाज नहीं आया। एमटीएस को ऐसे नौसिखुओं की बजाय किसी व्यवहार कुशल व्यक्ति को जिम्मेदारी देनी चाहिए ताकि वे उपभोक्ताओं को कम से कम बातों से तो संतुष्ट कर सकें। बहरहाल, मैं इसे कर्मचारियों की लापरवाही कहूं या तकनीकी दिक्कत लेकिन मामला गंभीर तो है ही। मैं वह रसीद भी इस पोस्ट के साथ चस्पा कर रहा हूं। बस इसी उम्मीद के साथ के एमटीएस प्रबंधन के संज्ञान में यह मामला आए ताकि और किसी के साथ ऐसा अनुभव ना हो।

मगर चोट खा बैठा...


बस यूं ही
एशियाड में भारतीय तीरंदाजों द्वारा स्वर्ण पदक जीतना महज संयोग ही था, क्योंकि हमारा तीरंदाजी का कार्यक्रम पहले से ही तय था। रविवार सु़बह आठ बजे हम भी तीरंदाजी की बारीकियां सीखने पहुंचे। साथ में स्टाफ के कई सदस्य भी थे। वैसे मैंने आज से पहले तीरंदाजी को केवल टीवी पर ही देखा था। आज तीर चलाए, लेकिन चोट खा बैठा। इसमें गलती हमारी नहीं थी। प्रशिक्षु खिलाडिय़ों ने हम सब को तीरंदाजी की छोटी से लेकर बड़ी जानकारी तक बताई लेकिन चोट से बचने का तरीका नहीं बताया। चोट मेरे अकेले को ही नहीं बल्कि दो तीन साथियों को और भी लगी। मैंने कमान को जैसे ही खींच कर छोड़ा वह हाथ को छूती हुई निकली और चोट का निशान छोड़ गई। वैसे मैंने जिंदगी में पहली बार तीर चलाए। ना शब्दों के ना नैनों के बल्कि हकीकत वाले। निशाने भी वैसे बुरे नहीं थे। तीनों तीर लक्ष्य पर तो नहीं लगे लगे लेकिन उसके आसपास ही थे। वैसे इस खेल में एकाग्रता, संतुलन, धैर्य, आत्मविश्वास आदि का गजब समावेश है। हां इतना जरूर है कि तीर जब निशाने पर लगता हैं तो आत्मविश्वास बढ़ता जाता है। खैर, अब चोट को सहला रहा हूं। अनुभव तो यही कहता है कि तीर चाहे कैसे भी चलाओ, कुछ ना कुछ सीख/ सबक तो मिलता ही है।

ताकि कुछ तो सुधार हो

टिप्पणी

जिला कलक्टर ने गुरुवार को राजकीय अंध आवासीय विद्यालय तथा राजकीय मूक बधिर विद्यालय के औचक निरीक्षण में जो हालात देखे वो बेहद शोचनीय हैं। न केवल इसीलिए कि वहां अव्यवस्थाएं मिलीं, विद्यार्थियों के उपयोग में आने वाला सामान बंद ताले में मिला, बल्कि इसीलिए भी कि यह जिला मुख्यालय की तस्वीर है, जहां शिक्षा विभाग के जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक के आला अधिकारी बैठते हैं। यहां से पूरे प्रदेश के लिए नियम बनते हैं। दिशा-निर्देश जारी होते हैं। उसी विभाग की नाक के नीचे ऐसी बदइंतजामी सरासर लापरवाही है। अकर्मण्यता का जीता-जागता नमूना है। सबसे बड़ी गंभीर बात तो यह है कि सब निशक्त बच्चों के साथ हो रहा था। इसमें कोई दो राय नहीं कि कलक्टर के निरीक्षण के बाद विभाग हरकत में आएगा। व्यवस्था में सुधार भी होगा लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस प्रकार की परिस्थितियां पैदा ही क्यों होती हैं?
वैसे, यह कहानी अकेले इन दोनों विद्यालय की नहीं है। शहर व जिले में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। हां, इतना जरूर है कि ये हमको चौंकाते तभी हैं, जब सामने आते हैं। वरना सरकारी कामकाज के ढर्रे से भला अनजान व अनभिज्ञ है कौन? ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। शहर की सफाई, यातायात व्यवस्था, अतिक्रमण, चिकित्सा व्यवस्था आदि नासूर बन चुके हैं। पता नहीं क्यों जिम्मेदारों ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है। यह बात दीगर है कि जिला कलक्टर शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर गंभीरता दिखा रही हैं लेकिन हालात में आशातीत सुधार नहीं हो रहा है। हर सप्ताह की समीक्षा बैठक सफाई व्यवस्था को लेकर किए जा रहे प्रयासों की चुगली करती दिखाई देती हैं। बहरहाल, इस प्रकार के निरीक्षणों से मातहत कर्मचारियों में भय जरूर रहता है। इस बहाने से वे न केवल समय पर कार्यालय आते हैं बल्कि कामकाज के निष्पादन में भी अतिरिक्त सावधानी बरतते हैं। इसलिए जिला कलक्टर को लगे हाथ शहर की यात्रा भी कर लेनी ताकि उनको व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति व शहर के अंदरुनी हालात का पता तो लगे। इतना ही नहीं जिला कलक्टर की तर्ज पर अगर बाकी वरिष्ठ अधिकारी भी इसी तरह निरीक्षण करने की इच्छाशक्ति दिखाएं तो कु़छ सुधार की उम्मीद तो की ही जा सकती है। वैसे भी वास्तविकता के दर्शन तो फील्ड में जाने से ही संभव है। वातानुकूलित कक्षों में बैठ चिंता करने से शहर का भला नहीं होने वाला।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 19 सितम्बर 14 के अंक में प्रकाशित 

उम्मीद की किरण

टिप्पणी.

विधि विवि के वे दोनों छात्र बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने बीकानेर की बदहाली के लिए प्रशासन को न्यायालय तक खींचा। फड़बाजार, कोटगेट, सांखला फाटक आदि स्थानों पर प्रशासनिक अमले की जो हलचल इन दिनों दिखाई दे रही है, उसके मूल में यह दोनों युवक ही हैं। दोनों छात्रों ने शहर के प्रमुख स्थानों की सफाई व अतिक्रमण को लेकर न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। इस मामले में आखिरी फैसला अभी आना बाकी है लेकिन न्यायालय ने अब तक हुई सुनवाई में प्रशासन की कार्रवाई को उचित नहीं माना है।
वैसे भी युवा वर्ग कुछ करने की ठान ले तो फिर उनके हौसले के आगे मुश्किलें, हल होते देर नहीं लगती। उनकी सोच, जोश, जज्बा और जुनून को अगर सकारात्मक दिशा मिल जाए तो फिर परिणाम शर्तिया अनुकूल ही आते हैं। कुछ इसी जोश एवं जज्बे के साथ बीकानेर की बदहाल एवं बेपटरी हो चुकी व्यवस्था को पटरी पर लाने का बीड़ा इन दोनों उत्साही युवकों ने उठाया है। संख्या की दृष्टि से भले ही ये दो हों लेकिन इनकी सोच उम्मीद की किरण जगाती हैं। जड़ हो चुकी व्यवस्था को झकझोरने तथा सुषुप्त लोगों में चेतना जागृत करने को प्रेरित करती है। उनका यह प्रयास दिशा दिखाता है। धारा के विपरीत बहने का हौसला भी बंधाता है।
दरअसल, समूचा शहर मूलभूत समस्याओं को जूझ रहा है। कोई भी वर्ग इन समस्याओं से अछूता नहीं है। अव्यवस्थाओं के खिलाफ कहने को थोड़ा-बहुत विरोध कभी-कभार जरूर होता है लेकिन वह रस्मी और स्तही ज्यादा होता है। उसमें शहरहित कम स्वहित ज्यादा जुड़ा है। फिलवक्त निगम चुनाव के मद्देनजर कई समाजसेवी और जागरूक लोग अचानक व अकस्मात ही पैदा हो गए हैं। इनका विरोध कैसा है? क्यों व किसलिए है, कहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोग तात्कालिक कार्रवाई करवा अपना स्वार्थ जरूर साथ लेते हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इन अव्यवस्थाओं के खिलाफ कभी संगठित रूप से आवाज उठी ही नहीं। कभी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचा ही नहीं गया। समस्याओं के स्थायी निराकरण के बजाय फौरी तौर पर समाधान ढूंढा गया।
बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि लम्बे इंतजार और बड़ी मुश्किल से प्रज्वलित हुई उम्मीद की यह छोटी सी लौ कालांतर में जागरुकता की बड़ी ज्वाला बनेगी। ऐसा होना जरूरी भी है क्योंकि अब तक जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियों के आश्वासनों की रेवडिय़ों पर संतोष करते आए लोगों के हिस्से कुछ नहीं आया। अगर अब भी नहीं जागे तो फिर शहर के हालात और अधिक भयावह होंगे। हमको ऐसे युवाओं से न केवल सीख लेनी चाहिए बल्कि खुद के साथ-साथ अपने आसपास के युवाओं को भी शहरहित व समाज हित में काम करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। अगर शहर के लोग भी इन युवाओं की तरह जागरूक होकर आगे आएं तो निसंदेह शहर की सूरत एवं सीरत बदलते देर नहीं लगेगी।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 16 सितम्बर 14 के अंक में प्रकाशित .

यह चिंता ही तो आपका स्नेह है...


बस यूं ही
आपको क्या हो गया... सब ठीक तो है.. भाईसाहब आपको यह सब करने की जरूरत नहीं है... यह सब करना जरूरी है, आपने ठीक किया...। आपका तो ठीक है, दूसरों का बढ़ गया.. और भी न जाने कितनी ही तरह की प्रतिक्रियाएं। मैं उस फोटो की बात कर रहा हूं, जिसमें मैं अपने ब्लड प्रेशर की जांच करवा रहा हूं और आप सब ने उसको देखकर पता नहीं क्या-क्या कल्पनाएं कर ली।
दरअसल, अगस्त के आखिरी सप्ताह में राजस्थान पत्रिका बीकानेर के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में लगाए गए चिकित्सा शिविर की बात कर रहा हूं। इसमें ब्लड प्रेशर एवं शुगर की जांच भी गई थी। शाखा प्रभारी के साथ शिविर का अवलोकन करने मैं भी गया था। इसी दौरान हमारे शाखा प्रभारी ने बीपी एवं शुगर की जांच करवाई तो सहयोगियों ने मेरे से भी निवेदन किया कि मैं भी यह सब करवा लूं। जब ब्लड प्रेशर चैक करवाने लगा तो फोटोग्राफर ने दो तीन-फोटो खींच लिए..। फोटोग्राफर को देखकर बीपी जांचने वाला, जिसको यह पता नहीं था कि मैं कौन हूं, कहने लगा.. भाईसाहब फोटो तो बार-बार खींच रहे हैं लेकिन लगाएंगे या नहीं यह तय नहीं है। मैं उसकी बात सुनकर हंसने लगा। उससे परिचय पूछा तो बोला भाईसाहब मैं मनोज भादू हूं और सूडसर का रहने वाला हूं। मैं मंद-मंद मुस्कुराता रहा कुछ नहीं बोला। इसके बाद शुगर की जांच करवाई। हकीकत तो यह है कि अपने को पता ही नहीं है रक्तचाप कितना होता है तो सही होता है और कितना गड़बड़। यही हाल शुगर का था। मेरे को बताया गया कि ब्लड प्रेशर 80 से 130 है और शुगर 91 है। साथियों ने बताया कि आप एकदम फीट हो।
खैर, मैं आप सबके स्नेह से अभिभूत हूं। मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करता हूं जब शुभचिंतकों के इतने बड़े समूह को चिंता करते हुए देखता हूं। दरअसल, यह सब आप लोगों का साथ, सहयोग, स्नेह और बड़े-बुजुर्गों व ऊपर वाले का आशीर्वाद है कि पिछले 14-15 साल से प्रकृति के विपरीत काम करने के बाद भी पूर्णतया स्वस्थ हूं। वैसे कई साथी तो मेरे स्वास्थ्य के प्रति इतने आश्वस्त थे कि उन्होने दावा तक कर दिया. कि आपको यह सब करने की जरूरत ही नहीं है। आप बीमार तो हो ही नहीं सकते। बिलकुल आप सब की दुआएं साथ हैं तो सब ठीक है। ऑल इज वेल। शुक्रिया सभी का..।

आज हिन्दी दिवस है...


बस यूं ही

हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आज न केवल समाचार पत्र रंगे हुए थे बल्कि परिचितों के मोबाइल पर संदेश भी मिल रहे थे। फेसबुक और वाट्स एप भी हिन्दी दिवस के गुण गाए जा रहे हैं। हिन्दी दिवस को लेकर मेरे विचार कुछ अलग हैं। शाम को घर पर लेटे-लेटे कुछ विचार आए बस उनको तुकबंदी कर कविता का रूप दे दिया.. आप भी देखें..। 

सुना है, आज हिन्दी दिवस है,
खूब आयोजन-प्रयोजन होंगे।
हिन्दी को आगे बढ़ाने,
कई बातें और भाषण होंगे।
हिन्दी की महिमा और महत्ता
का आज बखान होगा।
सुबह से लेकर शाम तक
बस हिन्दी का ही गुणगान होगा।
अंग्रेजी के दीवाने आज,
हिन्दी में कविता सुनाएंगे।
तालियां बजवाकर श्रोताओं से,
अपना हिन्दी प्रेम दिखलाएंगे।
आयोजक भी वाह-वाह कर
खूद का धन्य समझेंगे ।
एक दिन के बाद ये तो,
फिर अगले साल ही गरजेंगे।
ऐसा साल में बस,
एक बार ही होता है।
जब समूचा देश,
हिन्दी की शान में
कई कशीदे गढ़ता/पढ़ता है।
लेकिन मैं कभी ऐसे,
दिवसों में विश्वास नहीं करता।
न किसी को बधाई देता,
और ना किसी की स्वीकारता।
क्योंकि मैं रोज ही,
हिन्दी बांचता हूं।
सफेद पन्नों पर ही नहीं,
कल्पनाओं में भी हिन्दी मांडता हूं।
हिन्दी मेरे खून में,
हिन्दी ही मेरा स्वभाव है।
मैं हिन्दी का मुरीद सदा,
मुझ पर हिन्दी का ही प्रभाव है।
हर सांस मेरा हिन्दी का,
हिन्दी का मेेरे पर उपकार हैं।
हर जन्म में मिले हिन्द/हिन्दी
परवरदिगार से विनती बार-बार है।
हिन्दी गौरव देश का,
हम सब की शान है।
बोलूंगा सदा ही हिन्दी,
जब तक जी में जान है।
.....जय हिन्द.... जय हिन्दी..।

दिल है कि मानता नहीं..


बस यूं ही

कुछ भूमिका बांधने या किसी तरह का स्पष्टीकरण देने से पहले बता दूं कि मैच हम चार रन से हार गए। उस वक्त 9 गेंद शेष बची थी लेकिन हमारी टीम इतनी जल्दबाजी में थी कि ऑलआउट हो गई। आखिरी बल्लेबाज के रूप में मेरा ही विकेट गिरा। बाहर जाती गेंद पर स्क्वायर ड्राइव लगाने के चक्कर में विकेट के पीछे लपका गया। दरअसल, मैं बात आज स्वाधीनता दिवस के उपलक्ष्य में प्रशासन एवं होटल, टूर एंड ट्रेवल्स एजेंसी संचालकों के मध्य खेले गए मैच की कर रहा हूं। बीकानेर में पत्रकार बनाम प्रशासन के बीच मैच होते रहे हैं। मैच के लिए कलेक्ट्रट कार्यालय से फोन आया भी आया था। मैं भी रेलवे ग्राउंड में गया तो उसी उद्देश्य से था कि पत्रकारों का मैच है, लेकिन वहां का नजारा दूसरा था। खैर, होटल, टूर एंड ट्रेवल्स एजेंसी संचालकों ने विशेष आग्रह किया तो नकार नहीं सका। वैसे भी खेलने की इच्छा तो मन में ठांठे पहले से ही मार रही थी। नियमित रूप से क्रिकेट खेले तो १५ साल हो गए। बीच-बीच में कभी-कभार मौका या समय मिलता है तो खुद को रोक नहीं पाता हूं, लेकिन अब नियमित अभ्यास नहीं है। जिस दिन खेल लेता हूं, बाद में बहुत तकलीफ पाता हूं। सप्ताह भर तो दर्द निवारक टेबलेट का सहारा लेना पड़ता है।
खैर, हमारी टीम टॉस हार चुकी थी। नतीजतन, हमारे को पहले क्षेत्ररक्षण करना था। इस दौरान क्रमश: दसवां और बारहवां ओवर मैंने किए। पहले में मात्र एक दिन रन दिया जबकि दूसरे में छह रन बने। इन छह रनों में एक चौका भी शामिल था, क्योंकि वह कैच था, जिसे हमारा क्षेत्ररक्षक पकड़ नहीं सका और गेंद सीमा रेखा के बाहर चली गई। दो ओवर में ही सांसें फूल गई। धूप एवं गर्मी से वैसे ही बुरा हाल था। मैच पहले 15 ओवर का घोषित किया था, इसलिए 15 ओवर तो आसानी से पूरे हो गए। इसके बाद मैच 20 ओवर का कर दिया गया। यकीन मानिए वो पांच ओवर मैदान में किस तरह बिताए मैं ही जानता हूं। यह सब नियमित न खेलने का नतीजा था। वरना नब्बे के दशक में जब अभ्यास था तो सुबह से लेकर शाम तक मैच खेल लेता लेकिन कभी थकान महसूस होती ही नहीं थी। इस मैच में थकान ऐसी हुई कि जब हमारी बल्लेबाजी की बारी आई तो मेरी पारी शुरुआत करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वैसे जब क्रिकेट नियमित रूप से खेलता था तब सलामी बल्लेबाज ही था। शुरुआत में मना क्या किया बाद में मेरे को आठ विकेट गिरने के बाद भेजा गया। हालांकि जब बल्लेबाजी करने आया तब तक तबीयत सामान्य हो चुकी थी। मैं पूर्ण आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरा था। चूंकि मेरे टीम के खिलाड़ी मेरे अतीत से परिचित नहीं थे, लिहाजा मेरे को तरह तरह की हिदायत दे रहे थे। ऐसे खेलो, वैसे खेलो और मैं चुपचाप बड़े ही इत्मिनान के साथ बल्लेबाजी करने लगा। पहली ही गेंद पर स्क्वायर लेग अंपायार के तरफ खेल कर एक रन लिया। दो तीन रन बाई/ लेगबाई के बने। हम धीरे-धीरे मंजिल के करीब आ रहे थे। जीत के लिए मात्र पांच रन की आवश्यकता था। 19 ओवर में स्ट्राइक मेरे पास थी। इस बीच एक विकेट और गिर चुका था। अंतिम जोड़ी बीच मैदान पर संघर्ष कर रही थी। पहली गेंद को मैंने कवर की तरफ खेला लेकिन वह मुस्तैद क्षेत्ररक्षक ने उसे पकड़ लिया। इसके बाद दूसरी गेंद को मैंने सुरक्षात्मक अंदाज में खेला, जिसे गेंदबाज ने पोलोथ्रू में पकड़ लिया। तीसरी गेंद ऑफ से काफी बाहर थी और थोड़ी सी ओवरपिच थी। बस मन ललचा गया। बिना फुटवर्क किए खड़े-खड़े खेलने का नतीजा यह हुआ कि गेंद बल्ले का हल्का किनारा लेते हुए विकेटकीपर के दस्तानों में जा चुकी थी। मैं अपने निर्णय पर पछता रहा था लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और हमारी टीम मैच हार गई। मैं मेरे प्रदर्शन पर बेहद नाखुश था।
खैर, मेरा क्रिकेट खेलने का अनुभव कहता है कि हारने के बाद थकान ज्यादा होती है। और मेरे जैसे अनियमित खिलाड़ी को तो होनी ही थी। मैदान से घर के लिए रवाना हुआ तो रास्ते में दवा की दुकान से दर्दनिवारक दवा ली और घर आया। घर पर आकर टेबलेट ली। वैसे क्रिकेट खेलकर हमेशा तकलीफ ही पाता हूं। शरीर का अंग-अंग दर्द करने लगता है। ऐसा दर्द ही कहीं से मांसपेशी में थोड़ा सा भी खिचाव होता है तो दर्द से कराह उठता हूं। लेकिन यह क्रिकेट का मोह पता नहीं कब छूटेगा। क्रिकेट देखकर दिल मचल उठता है, मानता ही नहीं है। कष्ट की कीमत पर भी भारी पड़ता है।

कभी 'घर' की सुध भी लिया करो

लेख
हम बीकानेर के लोग सचमुच सोचते बहुत हैं। सपने भी खूब देखते हैं, वो भी बड़े-बड़े। कल्पनाओं के सागर में भी अक्सर डूबते उतराते रहते हैं। हम देश-दुनिया के हर छोटे-बड़े घटनाक्रमों पर बड़ी बारीकी से नजर रखते हैं। किसी भी तरह की होनी-अनहोनी पर चिंता जताते हैं। प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। आंधी-बारिश भले ही टल जाए लेकिन हमारी प्रतिक्रिया सदाबहार है, वह आती जरूर है। यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक इस 'प्रतिक्रिया जताने की परम्परा' में शामिल हैं। इस काम में आलस्य तो बिलकुल भी नहीं है। वैसे प्रतिक्रिया के इस खेल में 'नाम' की फ्रिक छिपी है। 'नाम' की चाह ही ऐसी है। बस किसी भी तरह 'नाम' चर्चा में रहे, हम इसी प्रयास में रहते हैं, तभी तो इस 'नाम' नामक खेल में शहर की चिंता और चर्चा गौण हो गई। जनप्रतिनिधियों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। शहर में पक्ष-विपक्ष का तो पता ही नहीं है। दोनों में 'गठजोड़' है या 'लापता' हो गए भगवान ही जाने। बस उनका 'नाम' जुबान पर रहे, इसलिए किसी कार्यक्रम में फीता काटने या कहीं भाषण देते वक्त कभी-कभार इनके दर्शन लाभ जरूर हो जाते हैं, वरना इनके 'अज्ञातवास' के 'तिलिस्म' को कोई नहीं जानता। कहने का मतलब यही है कि जैसी 'प्रजा' है वैसे ही 'राजा' हो गए हैं। बिलकुल यथा राजा तथा प्रजा की तर्ज पर।
खैर, हमारी एक खासियत यह भी है कि हम इतिहास पर गर्व करते हैं, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को लेकर इतराते हैं, लेकिन वर्तमान को लेकर चिंता नहीं करते। आतिथ्य सत्कार तो हमारी रग-रग में है। पुलिस या प्रशासन का जिले में कोई भी नया अधिकारी आता है तो हम उसके कामकाज का ठीक से आकलन करने से पहले उससे नजदीकियां बढ़ाने का प्रयास करते हैं। स्वागत सत्कार व अभिनंदन करते हैं। खुशी-खुशी साथ में फोटो खिंचवाते हैं। दरअसल, अतिथि देवो भव: की परम्परा का निर्वहन करने के मूल में भी 'नाम' ही छिपा है। कौन किस अधिकारी के नजदीक है या कौन किसका खास है, इस बात का संदेश शहर में प्रसारित करने की कवायद शुरू हो जाती है। केवल 'नाम' के लिए हम में से कई तो दौड़-धूप में दिन रात एक कर देते हैं। इतना कुछ करने के बाद शहर को यहां भी नजरअंदाज किया जाता है। इधर जिले में आने वाले नए अधिकारी भी हमारे इस 'आतिथ्य सत्कार' और 'सादगी' के पीछे छिपे मर्म को तत्काल भांप लेते हैं। तभी तो वे गाहे-बगाहे हमारा 'बेजा फायदा' उठाने से भी नहीं चूकते। और हम 'नाम' बड़ा करने के चक्कर में हंसते-हंसते उनका 'सहयोग' करने को तत्पर रहते हैं।
बहरहाल, शहर में 'नाम' का बोलबाला इस कदर हावी है कि छोटी से लेकर बड़ी समस्याएं तक मुंह बाए खड़ी हैं लेकिन उन पर कोई चर्चा तक करने को तैयार नहीं है। समूचा शहर 'बीमार' और 'बदहाल' है। सड़क, बिजली, पानी, प्रकाश, सीवरेज, सफाई, यातायात, ड्रेनेज, शिक्षा, चिकित्सा आदि में कोई भी तो ऐसा नहीं है, जिस पर संतोष किया जा सके या गर्व के साथ किसी को बताया जा सके। कई जगह तो हालात गांवों से भी बदतर है। बाहर से आने वाले लोग हमारे शहर को 'एशिया के सबसे बड़े गांव' की संज्ञा देते हैं और हम यह नामकरण सुनकर बजाय चिंता करने के हंसते हैं। दरअसल, हमने कभी खुद से सवाल किया ही नहीं कि शहर के यह हालात क्यों हैं? इस दशा के लिए कौन जिम्मेदार है?। वैसे, जिस दिन हम खुद की या 'नाम' की चिंता छोड़कर इन सवालों के जवाब खोजने शुरू करेंगे, यकीनन शहर की दशा सुधरते देर नहीं लगेगी। बीकानेर 'भगवान भरोसे' नहीं रहेगा, बल्कि विकास की नई इबारत लिखेगा। आइए, हम सब 'नाम' की इस संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर शहर हित में सोचें और उसके विकास का संकल्प लें। ऐसे पुनीत काम के लिए स्वाधीनता दिवस से अच्छा अवसर और हो भी क्या सकता है।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 15 अगस्त 14  के अंक में प्रकाशित  लेख...

टूटता सब्र का बांध

टिप्पणी
क्या प्रशासन की भूमिका यही होती है कि वह संवदेनशील मसलों एवं बुनियादी जरूरतों की बात पर मूक बनकर सब देखता रहे और हालात जब नियंत्रण से बाहर होने लगे तो हरकत में आए? क्या प्रशासन इसीलिए होता है कि वह बार-बार लोगों के धैर्य की परीक्षा ले और सब्र का बांध टूटने का इंतजार करे? क्या प्रशासन का दायित्व यही है कि वह अपने कर्मचारियों की लापरवाही, उदासीनता एवं अकर्मण्यता को नजरअंदाज करता रहे। दरअसल, ये सारे सवाल ऐसे हैं, जो बीकानेर के संदर्भ में सटीक बैठते हैं। शहर के लोगों को बुनियादी सुविधाएं भी ठीक से मुहैय्या नहीं हैं। इसके लिए संबंधित जनप्रतिनिधि तो जिम्मेदार हैं ही, कमोबेश प्रशासन की भूमिका भी वैसी ही है। शहरभर की सफाई व्यवस्था बदहाल है। सीवरेज एवं डे्रनेज ने तो समूचे शहर की सूरत बिगाड़ रखी है। पुराने शहर के अंदरूनी हालात गांव-ढाणी से भी बदतर हैं। कहीं-कहीं पर तो पैदल चलना भी मुश्किल है। बिजली आपूर्ति का तो कहना ही क्या। वह कब आए और कब चली जाए पता नहीं है। सालभर रखरखाव के नाम पर दो से तीन चार घंटे तक बिजली कटौती करने के बाद भी यहां बत्ती गुल होना आम बात है। मामूली से फॉल्ट तक को ठीक करने में पांच-छह घंटे लग जाते हैं। यही हाल पेयजल आपूर्ति का है। सालभर शहरवासी पेयजल को लेकर परेशान रहते हैं। कहीं सप्लाई नियमित नहीं है तो कहीं मांग के हिसाब से पानी नहीं मिलता। यातायात व्यवस्था बेपटरी है। अतिक्रमण तो हर बड़े से लेकर छोटे-छोटे रास्तों तक पसरा हुआ है। आवारा पशुओं के स्वच्छंद विचरण पर किसी प्रकार की कोई रोक नहीं है।
इतना कुछ होने के बाद यह उम्मीद करना बेमानी है कि लोग चुपचाप रहें। व्यवस्था के खिलाफ कुछ ना बोलें और बर्दाश्त करते रहें। आखिर सहन करने की भी एक सीमा होती है। वैसे भी समस्याओं की लम्बे समय तक अनदेखी से आक्रोश भड़कना लाजिमी है। मंगलवार को ईदगाह क्षेत्र में हुआ प्रदर्शन भी इसी प्रकार की अनदेखी का नतीजा था। तीन दिन से यहां पेयजल किल्लत बनी हुई थी। ईद के बावजूद यहां पेयजल आपूर्ति के किसी तरह के बंदोबस्त नहीं किए गए। ऐसे में व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या लोगों के पास यही अंतिम रास्ता बचा है कि वे कानून को हाथ में लें। रास्ता रोक कर प्रदर्शन करें। शासन-प्रशासन को कोसें। पुतले फूकें, नारेबाजी करें। लब्बोलुआब यह है कि इस प्रकार के हालात किसी भी सूरत में अच्छे नहीं हैं।
बहरहाल, प्रशासन को व्यवस्था बिगडऩे तथा आक्रोश भड़कने का इंतजार करने की प्रवृत्ति से बचना होगा। यह बात दीगर है कि जिले में प्रशासन की मुखिया संवदेनशील हैं। वे हर छोटे से लेकर बड़े मामलों को सुलझाने में तत्परता दिखाती हैं। आमजन से जुड़े मसलों में वे जितनी संजीदा हैं, उनके मातहतों की कार्यप्रणाली उतनी ही उलट नजर आती है, जो उनके सारे किए-धरे पर पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ती। अगर मामले की गंभीरता को पहले ही समझ लिया जाता तो हालात इतने नहीं बिगड़ते। प्रशासन का काम आमजन का दर्द सुनने और उनका निराकरण करने के साथ व्यवस्थाओं पर सतत निगरानी रखना भी है ताकि कहीं कुछ गड़बड़ नहीं हो। उम्मीद करनी चाहिए शहर में इस प्रकार के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति नहीं होगी। साथ ही प्रशासनिक व्यवस्था में भी आशातीत सुधार होगा।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 30 जुलाई 14 के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी...

तंत्र पर तमाचा



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बीकानेर के केन्द्रीय जेल में दो गुटों के बीच हुए खूनी संघर्ष में तीन कैदियों के मारे जाने के बाद न केवल बीकानेर बल्कि समूचे प्रदेश की जेलों में अब उस तरह की कवायद हो रही है, जो सुरक्षा व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है। आनन-फानन में जेलों में तलाशी अभियान चलाए जा रहे हैं। नए सिरे से दिशा-निर्देश जारी हो रहे हैं। गैंगवार के कारण तलाशे जा रहे हैं। गरमागरम बहसों के बीच कानून व्यवस्था की समीक्षा हो रही है। इन सब सवालों के मूल में घूम-फिर कर एक ही बात आती है, यह सब अब ही क्यों? तीन कैदियों की हत्या के बाद हरकतस्वरूप जितने हाथ-पांव अब चलाए जा रहे हैं, उतने पहले चला लिए जाते तो शायद ही इतना बड़ा घटनाक्रम होता। जितने जतन अब हो रहे हैं, वह सब ईमानदारी एवं गंभीरता के साथ समय-समय पर नियमित अंतराल पर कर लिए जाते तो संभवत: इस गैंगवार से बचा जा सकता था।
खैर, इतना कुछ होने के बाद भी पुलिस व प्रशासन की भूमिका तो 'कुल्हड़ में गुड़ फोडऩे ' जैसी रही। वारदात होने के सात-आठ घंटे बाद तक जेल की चारदीवारी में एकत्रित अधिकारियों में कोई भी 'सच' बताने का साहस दिखाने की सूरत में नहीं था। पता नहीं ऐसा कौनसा 'डर' था, जिसने अधिकारियों के मुंह पर ताले लगा दिए। सब एक दूसरे का हवाला देकर कुछ भी कहने या बताने से बचते रहे। जाहिर सी बात है कि इस तरह का रवैया और हालात भी तो कई सवालों को जन्म देते हैं। संदेह के बादलों को गहरा करते हैं। जितने सवाल इस घटनाक्रम को लेकर हैं, कमोबेश उतने ही इसके होने के बाद भी पैदा हुए हैं। मामले की जानकारी 'छिपाने' और 'दबाने' के पीछे भी पुलिस-प्रशासन की किसी सुनियोजित रणनीति से इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन इस तरह का व्यवहार चौंकाने वाला जरूर है।
बहरहाल, जेल में कैदियों के बीच हुई गैंगवार समूचे तंत्र पर तमाचा है। यह नए सिरे से सोचने को मजबूर भी करती है। इस गैंगवार ने साबित भी कर दिया है कि यह सब पूर्व में हुई घटनाओं को हल्के में लेने का ही परिणाम है। अब भी अगर बीकानेर के घटनाक्रम से कोई सबक नहीं लिया गया तो यकीन मानिए इस प्रकार की गैंगवार पर प्रभावी अंकुश नहीं लग सकता। दो चार 'जिम्मेदारों' पर गाज गिराने की बजाय सियासत और अपराध की 'जुगलबंदी ' के कारण तलाशे जाएं और उन पर प्रभावी रोक के प्रयास किए जाएं। सिस्टम को सुधारने के लिए 'सरकारी संरक्षण' और 'सियासत की सरपरस्ती' पर रोक भी बेहद जरूरी है, अन्यथा इस प्रकार के वाकये हमको डराते रहेंगे।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 26 जुलाई 14 के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी...

अनुकरणीय पहल

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वैसे तो प्रतिस्पर्धा एवं व्यावसायिकता की दौड़ में चिकित्सकीय पेशा भी अछूता नहीं रहा है। गाहे-बगाहे ऐसी खबरें आती भी रहती हैं, जब इस पेशे की पवित्रता तथा धरती के भगवान की निष्ठा पर सवाल उठे हैं। इतना ही नहीं विश्वास की डोर से बंधा यह नाजुक रिश्ता कई बार टूटा भी है। तभी तो मरीज-चिकित्सकों के संबंधों की नए सिरे से व्याख्या की जाने लगी है। ऐसे प्रतिकूल एवं संक्रमण के माहौल में एक सुखद खबर आई है, जो किसी मिसाल से कम नहीं है। बीकानेर के पास गुरुवार शाम को हुए सड़क हादसे के बाद घायलों के इलाज में चिकित्सकों ने जो जज्बा एवं हौसला दिखाया वह वाकई काबिलेतारीफ है। इस दौरान कई बातें ऐसी हुईं, जो बीकानेर में पहले शायद ही हुई हैं। हादसे की जिस भी चिकित्सक को सूचना मिली, वह तत्काल अस्पताल पहुंचा। अस्पताल पहुंचने वालों में वे चिकित्सक भी शामिल थे, जिनकी या तो ड्यूटी नहीं थी या वे ड्यूटी करके जा चुके थे। इतना ही नहीं रेजीडेंट डाक्टरों ने तो जिस सदाशयता एवं सहृदयता का परिचय दिया, उसने तो चिकित्सकीय पेशे की प्रतिष्ठा को बढ़ा दिया है। वे धन्यवाद के पात्र इसलिए भी हैं, क्योंकि उन्होंने हड़ताल से जरूरी चिकित्सकीय धर्म को समझा और दर्द से कराहते घायलों के इलाज में जुट गए। अजमेर में रेजीडेंट डाक्टर के साथ हुई मारपीट की घटना के बाद वहां चल रही हड़ताल का समर्थन बीकानेर के डाक्टरों ने भी किया था। वे गुरुवार को हड़ताल पर थे, लेकिन घायलों की सेवा सुश्रुषा करके उन्होंने सही मायनों में यह साबित कर दिखाया कि उनको धरती का भगवान क्यों कहा जाता है। वैसे तो बीकानेर में सेवाभावी लोगों की कमी नहीं है। पीडि़त मानवता की सेवा में यहां के लोग कभी पीछे नहीं रहते हैं लेकिन इस बार चिकित्सकों ने भी अनुकरणीय पहल करके एक नजीर पेश की है।
बहरहाल, मरीज-चिकित्सक के रिश्तों पर हावी होती व्यावसायिकता एवं प्रतिस्पर्धा के बीच ऐसा वाकया सुखद बयार से कम नहीं है। छोटी-मोटी मांगों एवं अन्य मसलों को लेकर मरीजों की अनदेखी कर आंदोलन करने वाले चिकित्सकों को बीकानेर के घटनाक्रम से सीख लेनी चाहिए। सचमुच बाकी चिकित्सक ऐसा कर पाए तो निसंदेह वे चिकित्सकीय पेशे में आई गिरावट को दूर कर मापदण्डों को फिर से पुनस्र्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ पाएंगे। चिकित्सकों को ऐसा करना भी चाहिए, आखिरकार सही अर्थों में उनका धर्म भी तो यही है कि वे पीडि़त मानवता की सेवा को सर्वोपरि रखें।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 11 जुलाई 14 के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी...

बार-बार दिन ये आए...

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बीकानेर की आबोहवा इन दिनों बदली-बदली सी है। जनहित से जुड़े अधूरे व लम्बित कामों का द्रुतगति से निस्तारण होने लगा है। लम्बे समय से रखरखाव की बाट जोह रहे कामों के तो यकायक पंख लग गए हैं। सड़कों के गड्ढ़े ठीक करने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। बंद पड़ी रोडलाइटें अचानक जगमग हो गई हैं।। धूल एवं गंदगी से अटे रास्तों के भी दिन फिर गए हैं। कहीं प्रमुख रास्तों के आजू-बाजू टूटी-फूटी चारदीवारी नए सिरे से बन रही है तो कहीं पर आनन-फानन में नए फुटपाथों का निर्माण किया जा रहा है। इतना ही नहीं रोड डिवाइडरों एवं दीवारों पर रंग-रोगन करने का काम तेजी से चल रहा है। आवारा पशु मु य मार्गों से गायब हो गए हैं। यातायात व्यवस्था में भी कुछ सुधार दिखाई देने लगा है। दरअसल, यह सारी कवायद ' सरकार आपके द्वार' कार्यक्रम के लिए हो रही है। बीकानेर को इतना चकाचक एवं साफ-सुथरा बनाने की दौड़-धूप इसलिए भी की जा रही है ताकि 'सरकार' को यहां पर सब ठीक-ठाक लगे और किसी प्रकार की कोई समस्या नजर ही नहीं आए। खामियों को दुरुस्त करने तथा व्यवस्था को चाकचौबंद करने का यह सिलसिला जिला मुख्यालय से लेकर उपखण्ड व पंचायत समितियों तक चल रहा है। जनसुनवाई के माध्यम से जनसमस्याओं को रेखांकित किया जा रहा है। जनहित से जुड़ मुद्दे सूचीबद्ध हो रहे हैं। ज्ञापन-दर-ज्ञापन लिए जा रहे हैं। 'सरकार' के आगमन से पहले यह सब ट्रायल के तौर पर हो रहा है, ताकि बाद में किसी तरह से मीन-मेख निकालने वाले हालात नहीं बने।
इतना सब कुछ होते देख लोग खुश हैं और चकित भी। खुशी इसलिए कि काम बिना किसी रोकटोक के रातोरात हो रहे हैं और चकित होने की वजह यह है कि जिन कामों को कभी मौसम के नाम पर तो कभी स्टाफ या संसाधन की कमी का बहाना बनाकर लम्बित रखा गया था, उन सबको अब 'चमत्कारिक' रूप से निपटाया जा रहा है। इतना सब होते देख सवाल उठना भी लाजिमी है। वैसे सारा तंत्र ईमानदारी से अपने काम पूरा करे तो इस प्रकार के उपक्रम करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। न तो इतनी कसरत करनी होगी और न धूप में पसीना बहाने की जरूरत पड़ेगी।
बहरहाल, 'सरकार' ने बीकानेर की सुध लेने का मानस बनाया, यह काबिले तारीफ है लेकिन इसका फायदा आमजन तक तभी पहुंचेगा जब 'जंग' लगी व्यवस्था में परिवर्तन हो। सभी अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी के साथ करें। सिर्फ 'सरकार' के आगमन के उपलक्ष्य में 'सब कुछ ठीक' करने से आमजन का भला नहीं होने वाला, क्योंकि कुछ दिनों बाद काम करने का सरकारी ढर्रा फिर पुराने अंदाज में लौट आएगा। 'सरकार' के द्वार आने की सार्थकता भी तभी है जब व्यवस्था से लेकर सरकारी कामकाज के ढर्रे में कुछ बदलाव दिखाई दे, क्योंकि तात्कालिक बदलाव तो चार दिन की चांदनी की तरह ही है। वैसे सरकार चाहे तो क्या कुछ नहीं हो सकता।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 12 जून 14 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी

...गुड़ जैसी बात तो करें

टिप्पणी
यकीन मानिए अगर बीकानेर का मौसम सामान्य रहता तो विद्युत निगम को बिजली कटौती के दूसरे कारण तलाशने होते। ऐसा इसलिए है क्योंकि विद्युत लाइनों के रखरखाव के नाम पर जिला मुख्यालय पर रोजाना दो से तीन घंटे होने वाली कटौती हो या फिर अघोषित कटौती, इन दोनों ही परिस्थितियों में विद्युत निगम प्रमुख कारण प्रतिकूल मौसम को ही बताता रहा है। कुछ हद तक निगम के जवाब से संतुष्ट जरूर हुआ जा सकता है, लेकिन एकमात्र कारण मौसम को ही मानना बेमानी है। सुचारु विद्युत आपूर्ति के निगम के दावों का दम तो सामान्य परिस्थितियों में रोजाना दो तीन बार लगने वाले अघोषित विद्युत कट ही निकाल देते हैं। वोल्टेज में उतार-चढ़ाव की समस्या तो लगभग स्थायी हो चुकी है। प्रचंड गर्मी में जब पारा 45 डिग्री से ऊपर चल रहा है, जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित है। धरती किसी भट्टी की मानिंद भभक रही है। ऐसे में एक पल की विद्युत कटौती कितनी दुखदायी होती है, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। फिर भी रखरखाव के नाम पर की जाने वाली कटौती की बात सुनकर उपभोक्ता सब्र कर लेते हैं। इसके बावजूद अचानक बिजली गुल होना उपभोक्ताओं के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है तो निगम के लिए एक बड़ी चुनौती भी है।
वैसे देखा जाए तो विद्युत कटौती की समस्या जिला मुख्यालय के बनिस्पत ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है। जिले में हाल में मारपीट की करीब आधा दर्जन घटनाएं भी हुईं हैं, जब उपभोक्ताओं का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने कानून हाथ में लेने में संकोच नहीं किया, हालांकि ऐसी घटनाओं से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो इसके लिए निगम के आला अधिकारियों ने मातहत कर्मचारियों के मोबाइल नम्बर सार्वजनिक किए ताकि वे उपभोक्ताओं के सम्पर्क में रहें और समय रहते उनकी समस्याओं का निराकरण कर सके। इस कवायद का उद्देश्य उपभोक्ताओं के तात्कालिक आक्रोश को शांत करना भी था। इतना कुछ करने के बाद भी उपभोक्ताओं को अभी राहत नहीं मिली है। कई शिकायतें ऐसी भी सामने आई हैं जब परेशान उपभोक्ताओं ने संबंधित कर्मचारी को फोन तो लगाया लेकिन उसे अटेंड ही नहीं किया।
बहरहाल, मौसम पर किसी का जोर नहीं है। वह कब बिगड़ जाए कहना मुश्किल है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में आपूर्ति सुचारु कैसे रहे, इसके लिए निगम अधिकारियों को नए सिरे से सोचना होगा। बीकानेर की भौगोलिक परिस्थितियों को मद्देनजर रखते हुए लाइनों के रखरखाव के परम्परागत तरीकों में बदलाव करना होगा। लोड बढ़ रहा है तो उसके वास्तविक कारण तलाशे जाने चाहिए। विद्युत चोरी एवं छीजत रोकने के लिए प्रभावी एवं कारगर कदम उठाने की दिशा में ईमानदार कोशिश की जाए। और अगर यह सब नहीं हो सकता तो कम से कम उपभोक्ताओं के निरंतर सम्पर्क में रहने के साथ-साथ उनके सवालों का संतोषजनक जवाब तो दिया ही जा सकता है। देखा गया है कि अक्सर हालात तभी बिगड़े हैं, जब उपभोक्ताओं एवं निगम के बीच संवादहीनता की स्थिति बनी है या फिर उपभोक्ताओं की समस्याओं को न तो ठीक सुना गया और न ही उस पर कार्रवाई की गई। उम्मीद की जानी चाहिए निगम इस मामले में सार्थक पहल करेगा। कहावत भी है कि 'भले ही गुड़ ना दें लेकिन गुड़ जैसी बात तो करें।' अगर निगम यह काम भी नहीं कर सकता है तो फिर गर्मी में घोषित/ अघोषित कटौती से उकताए उपभोक्ताओं से ठण्डे मिजाज से पेश आने की उम्मीद कैसे रखी जा सकती है?

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 11 जून 14 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी

संकल्प का दिन


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वक्त बदला, लोग बदले, उनकी भूमिकाएं बदली लेकिन बीकानेर नहीं बदला। बदलाव की बयार से एकदम अछूता व अलमस्त शहर। परम्पराओं, मान्यताओं एवं अतीत पर इतराने वाला तो मान, सम्मान एवं स्वाभिमान के लिए जीने वाला। संस्कृति और साहित्य का संगम तो गंगा-जमुनी तहजीब का संवाहक। सामाजिक समरसता व साम्प्रदायिक सद्भाव की जीती जागती नजीर। धर्म-कर्म की नगरी तो धन्ना सेठों की जननी। बीकानेरी जायके का जादू तो समूची दुनिया में सिर चढ़कर बोलता है। जीवंतता और जीवटता से भरे यहां के वाशिंदे लोकरंग, उत्सव, पर्व इस कदर मानते हैं कि संस्कृति जीवंत हो उठती है। बीकानेर ही ऐसा शहर है जहां स्थापना दिवस पर चिलचिलाती धूप में पतंग उड़ाने की परम्परा है। सचमुच जितने यहां के लोग अनूठे हैं, उतने ही यहां के रीति रिवाज। जब सारा देश सोता है, तब रात को घरों से बाहर पाटों पर बैठकर हथाई एवं देश दुनिया पर चिंतन-मनन करने वाले भी बीकानेरी ही होते हैं। वाकई यह शगल अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं है।
बहरहाल, स्थापना के 527वें साल में प्रवेश कर रहा बीकानेर अपने अल्हड़पन की वजह से आज भी जवान है, सदाबहार है। बस समय के साथ बीकानेर का फैलाव बढ़ गया है और इसी वजह से कुछ समस्याओं के साथ जरूरतों ने भी पैर पसार लिए। मसलन, बदहाल यातायात व्यवस्था लाइलाज बीमारी का रूप अख्तियार कर चुकी है। शहर के बीचोबीच गुजर रही रेलवे लाइन से दिन में कई बार जाम लगता है। लम्बे समय से यहां रेलवे रिंग रोड व रेलवे बाइपास की आवश्यकता महसूस की जा रही है। औद्योगिक विकास समय की मांग है। बीकानेर में करीब साढ़े चार सौ औद्योगिक इकाइयां हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। मेगा फूड पार्क, हवाई सेवा, ड्राइपोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट पूरे हो जाएं तो बीकानेर के औद्योगिक विकास को पंख लग सकते हैं।
वैसे गाहे-बगाहे मुद्दों एवं मांगों पर चर्चा तो होती है लेकिन वह मुखर नहीं हो पाती है। इसकी बड़ी वजह है यहां के लोग, जो भाग्यवादी ज्यादा हैं, जिनकी सहनशीलता ही उनकी दुश्मन है। दमदार नेतृत्व का अभाव भी इसका बड़ा कारण रहा है। स्थापना दिवस के मौके पर शहरवासी संकल्प करें कि वे सहनशील बने रहेंगे, अपनी फितरत से किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे लेकिन जायज मांगों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने से भी गुरेज नहीं करेंगे। यकीनन वे ऐसा कर पाए तो फिर बीकानेर की उम्मीदों को पंख लगना तय है।

 राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 18 मई 14 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी

Thursday, February 27, 2014

... तो क्या कुत्ते काटना छोड़ देंगे!



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रायपुर में कुत्ते के हमले में हुई मासूम की मौत के बाद समूचे प्रदेश में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि खूंखार होते आवारा कुत्तों से पार कैसे पाया जाए? नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने आनन-फानन में प्रदेश के निकायों को आवारा कुत्तों से निपटने के दिशा-निर्देश जारी किए हैं। साथ ही 28 फरवरी तक कुत्तों से निपटने के लिए किए उपायों के संबंध में रिपोर्ट भी मांगी गई है। शासन के आदेशों की अनुपालना में निगमों में हरकत शुरू हो गई है। दुर्ग एवं भिलाई निगम के अधिकारी भी इसी उधेड़बुन में हैं कि निर्देशों का जवाब किस तरह तैयार किया जाए, ताकि शासन को संतुष्ट किया जा सके। वैसे देखा जाए तो दोनों ही निगमों में कुत्तों से निबटने के लिए कभी गंभीरता नहीं दिखाई गई। तभी तो निगमों के पास न तो कोई संसाधन है और ना ही प्रशिक्षित कर्मचारी। कुत्तों को पकड़कर उनकी नसबंदी करने के लिए भी निजी एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता है। भिलाई निगम के अधिकारी तो दावा कर रहे हैं कि पिछले साल दिसम्बर में करीब 25 सौ कुत्तों की नसबंदी की गई, लेकिन दुर्ग में तो इस प्रकार की कोई योजना ही अमल में नहीं आई। अकेले जनवरी में दुर्ग के जिला अस्पताल में 471 मरीजों ने एंटी रैबीज इंजेक्शन लगवाया। निजी अस्पतालों में जाकर इंजेक्शन लगवाने वालों की संख्या इससे अलग है।
दिन-प्रतिदिन गंभीर होती इस समस्या के लिए अब परम्परागत तरीकों मे बदलाव करना बेहद जरूरी हो गया है। सिर्फ नर कुत्तों की नसबंदी करने से ही समस्या का हल नहीं होने वाला। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब आवारा कुत्तों की वास्तविक संख्या का आंकड़ा ही पता नहीं है, तो फिर नसबंदी का लक्ष्य कैसे निर्धारित कर दिया गया। वैसे भी आवारा कुत्तों का कोई क्षेत्राधिकार नहीं होता है। वो एक से दूसरी जगह भी जाते हैं। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के निर्देशों में आवारा कुत्तों से स्थायी छुटकारा पाने का रास्ता दिखाई नहीं देता। ऐसे में दिशा-निर्देश कागजी ज्यादा नजर आते हैं। इनकी पालना ईमानदारी से होगी, इसमें भी संशय है। और अगर किसी तरह से लागू भी किए गए तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह सब करने के बाद कुत्तों के आतंक से मुक्ति मिल जाएगी।
बहरहाल, समस्या कुत्तों की फौज बढऩे के अलावा उनके खूंखार व हिंसक होने की ज्यादा है। शासन के दिशा-निर्देशों में कहीं पर भी यह उल्लेख नहीं है कि ऐसा करने से कुत्ते काटना छोड़ देंगे। नसबंदी कर देने से, मटन-मछली की दुकान कम करने या उनको बंद कर देने से कुत्तों का आतंक खत्म हो जाएगा, यह बेहद हास्यास्पद बात लगती है। ऐसे में समस्या के स्थायी समाधान के लिए ठोस एवं कारगर उपाय खोजने की जरूरत है। अब जरूरी हो गया है कि आवारा पशुओं की तर्ज पर आवारा कुत्तों को पकड़कर उनको एक जगह रखने की व्यवस्था हो। आवारा कुत्तों के साथ पालतू कुत्तों व मादा कुत्तों की नसबंदी भी हो..। अगर यह उपाय जल्द नहीं खोजे गए तो कुत्ते यूं ही काटते रहेंगे। काटना उनकी आदत है।


 भिलाई पत्रिका के  बुधवार 19 फरवरी के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी..।

आठ दिन का सप्ताह


बस यूं ही 

आज सुबह टीवी पर गाना आ रहा था, गीत के बोल थे.. 'फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुस्कान है, रंग तेरा देख के रूप तेरा देख के कुदरत भी हैरान है। वैसे यह गीत कॉलेज के जमाने में कई बार सुना है। उस वक्त यह गीत नया-नया आया था और बार-बार सुनने को मन करता था, लेकिन आज गीत ने सोचने पर मजबूर कर दिया। सोचने की सबसे बड़ी वजह थी युवा पीढ़ी का प्रमुख त्योहार वेलेंटाइन डे। हमारे देश के बड़े एवं चुनिंदा शहरों में ही कभी इसकी शुरूआत हुई थी। प्रेमी युगल डरे सहमे एवं छिप-छिपकर पाश्चात्य संस्कृति से रचे-बसे इस त्योहारों को मनाते थे। इसके बाद तो जो हुआ बस पूछिए मत..। नकल करने में माहिर देशवासियों ने इस त्योहार को हाथो हाथ लेकर इसकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए। रफ्ता-रफ्ता इसे वेलेंटाइन सप्ताह का रूप दे दिया गया। हर दिन एक अलग-अलग गतिविधि। मतलब एक ही सप्ताह में प्रेम का अंकुरण प्रस्फुटित होने से लेकर प्रेम के पेड़ बनने तक की कहानी पूर्ण हो जाती है। यह बात दीगर है कि इस वेलेंटाइन सप्ताह में सात की बजाय आठ दिन होते हैं। यकीन ना आए तो गिनती कर लीजिए..। शुक्रवार को इस सप्ताह का पहला दिन था और आठवें दिन वेलेंटाइन डे है। खैर, प्रेम एवं युद्ध में सब जायज है, इस कारण सप्ताह में सात की बजाय आठ दिन भी हो सकते हैं। सप्ताह के पहले दिन को नाम दिया गया रोज डे..। यानि की प्रेम की राह पर बढऩे या चलने की शुरुआत करने वाले इस दिन एक दूसरे को गुलाब का फूल देते हैं। मुझे गीत के बोल फिर याद रहे थे.. मैं सोच में डूबा था कि जब चेहरा ही फूलों जैसा है तो फिर उसे अलग से फूल देने की जरूरत ही कहां रह जाती है। बात फूलों की चली तो फिर फूलों से वाबस्ता कई तराने जेहन में घूम गए। ए गुलबदन, फूलों की महक कांटों की चुभन, तुम्हे देख के कहता है मेरा दिल कहीं आज महोब्बत ना हो जाए..। ऐ फूलों की रानी, बहारों की मल्लिका, तेरा मुस्कुराना गजब हो गया.. ना दिल होश में हैं ना हम होश में नजर का मिलाना गजब हो गया। वैसे, जहां चेहरे ही फूलों जैसे हों, वहां अलग से फूल देना या देने की बात करने का कोई मतलब नहीं होता है। हां, इतना जरूर है कि साल भर ग्राहकों के इंतजार में हाथ पर हाथ धरकर बैठने वाले फूल विक्रेताओं के लिए रोज डे व्यस्तता भरा रहता है। वे युगलों की शक्ल एवं हैसियत देखकर मुंहमांगी कीमत जो वसूलते हैं। इसके अलावा करें भी क्या.? कल गुलाब के फूल को पूछेगा भी कौन..। बात फूलों से आगे जो बढ़ जाएगी। अरे भई प्रपोज डे जो आ जाएगा। प्रपोज बोले तो प्रेम के इजहार करने का दिन। इसके बाद तो कभी चाकलेट डे, कभी टेडी डे, कभी प्रोमिस डे तो कभी कुछ और इन सबके बाद वेलेंटाइन डे आता है। इन सात आठ दिन में इजहार, वादा सब कुछ हो जाता है।
मैं ख्यालों में अभी खोया ही था कि दूसरा गीत बजने लगा.. 'प्यार किया नहीं जाता.. हो जाता है, दिल दिया नहीं जाता.. खो जाता है। वेलेंटाइन सप्ताह में गीत के बोल मुझे बेमानी से लग रहे थे। क्योंकि मौजूदा दौर में वेलेंटाइन सप्ताह में किस दिन क्या करना है, यह सब मुकर्रर है। ऐसे में इस सप्ताह के अलावा प्यार करने और दिल खोने की तो वैसे भी कल्पना नहीं जा सकती।

काश, बयान का समर्थन होता...!!!


बस यूं ही 

गरीब की कोई जाति नहीं होती है। और हमारे देश में शायद ही ऐसी कोई जाति होगी, जिसमें गरीब नहीं हैं। कहने का आशय यह है कि हर जाति में गरीब व अमीर मिल जाएंगे। हां, इतना जरूर है कि गरीब-अमीर का प्रतिशत कुछ ऊपर-नीचे जरूर हो सकता है, लेकिन मिलेंगे सब जातियों में। इसके बावजूद हमारे देश की सियासत आजादी के समय से ही गरीबी का आधार जाति को मानती रही है, ताकि वोट बैंक सुरक्षित रहे। समय-समय पर आरक्षण विधेयकों में बहुत संशोधन किए गए। प्रतिशत घटाने-बढ़ाने का अंकगणित भी खूब चला लेकिन केन्द्र बिन्दु में जाति ही रही। जिस जाति का ज्यादा वोट बैंक उसको आरक्षण देने में या उनका कोटा बढ़ाने में प्राथमिकता बरती गई। और इसी आधार पर आरक्षण का लाभ भी दे दिया। वोट बैंक खिसकने एवं जनाधार कम होने के डर से किसी ने भी सच जानने के बावजूद आरक्षण के खिलाफ बोलने का साहस नहीं किया। विशेषकर, चुनाव के आसपास आरक्षण को लेकर राजनीतिक शिगूफे प्रायोजित तरीके से छोड़े जाते हैं, ताकि मतदाताओं की भावनाओं का भरपूर दोहन कर लाभ उठाया जा सके। कुछ इसी तरह का शिगूफा हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने छेड़ा है। जाति आधारित आरक्षण खत्म करने की वकालत करते हुए द्विवेदी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से आग्रह किया है कि वे इस मामले में पहल करें। द्विवेदी यहीं नहीं रुके, साहसिक अंदाज में उन्होंने यह तक कह दिया कि .. सामाजिक न्याय की अवधारणा आजकल जातिवाद में बदल गई है। इसे खत्म करने की जरूरत है।
कांग्रेस नेता द्विवेदी के इस ऐतिहासिक बयान के कई मायने हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि साठ के दशक से राजनीति करते आ रहे द्विवेदी का यह नया बयान राजनीति से प्रेरित नहीं है। लेकिन सबसे यक्ष सवाल यही है कि आजादी से लेकर अब सर्वाधिक सत्ता में रही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता को यह नेक और सद्विचार इतने लम्बे समय के बाद क्यों आया? दरअसल, मौजूदा दौर में चुनावी रण में इतने दल हो गए हैं कि अब चुनाव जीतना आसान काम नहीं है। जिस आरक्षण के नाम पर राजनीतिक दल और उनके नुमाइंदे चुनावी वैतरणी पार करते थे, उस पर अब कई दल सवार हैं। जातियों के भी कई पैरोकार पैदा हो गए हैं। ऐसे में आरक्षण देने का श्रेय कई दलों में बंट गया है। आरक्षण का अब उम्मीदानुसार फायदा किसी दल को नहीं मिल पा रहा है। इसलिए आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित करना कांग्रेस नेता की एक तरह से देखा जाए तो मजबूरी भी है। द्विवेदी को उम्मीद है कि अगर कांग्रेस ऐसा करने में कामयाब रही तो आरक्षण से वंचित तबका उसके खेमे आ सकता है। और इसी मसले के सहारे के कांग्रेस फिर सत्ता में वापसी कर सकती है।
बहरहाल, देश में जाति आधारित आरक्षण की बुनियाद रखने में कांग्रेस का ही प्रमुख योगदान था। उस वक्त आरक्षण का मुख्य उद्देश्य दबे, कुचले एवं पिछड़े लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोडऩा था। यह बात राजनीतिज्ञों को बहुत जल्दी समझ में आ गई थी कि जिन उद्देश्यों से आरक्षण की परिकल्पना कर इसे लागू किया गया था, वह उन उद्देश्यों पर खरा नहीं उतर रहा है। चंद लोग ही इसका फायदा उठा रहे हैं। दबा कुचला वर्ग मुख्यधारा से नहीं जुड़ पा रहा, आदि-आदि। यह कड़वा सच जानने के बाद कमोबेश सभी राजनीतिक दल इसको नजरअंदाज करते रहे, क्योंकि यह ऐसा मसला था, जिसका विरोध करने का मतलब सीधे-सीधे आरक्षण से लाभान्वित तबके को नाराज करना था। ऐसे में गरीबी के आधार पर आरक्षण के बात दरकिनार की जाती रही। आजादी के 67 साल बाद अब कांग्रेस नेता द्विवेदी को लग रहा है कि आरक्षण का आधार जाति ना होकर गरीबी ही होना चाहिए था। वैसे द्विवेदी भले ही गरीबी के आधार पर आरक्षण की पैरवी कर इसमें अपना नफा-नुकसान तलाशे लेकिन यह सुझाव बुरा नहीं है। सभी दलों को राजनीतिक चश्मे से इतर इस मसले पर गंभीरता दिखानी चाहिए ताकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को सही मायनों में जिंदा रखा जा सके। वैसे इस मसले पर अगर सभी राजनीतिक दल सहमत होते हैं तो यह देर से ही लेकिन एक कालजयी फैसला होगा, जिसके कई तरह के दूरगामी फायदे होंगे।
वैसे बयान को लेकर कांग्रेस ने खंडन जारी कर दिया है। पार्टी का कहना है कि यह जनार्दन द्विवेदी के निजी विचार हैं, पार्टी का इससे कोई सरोकार नहीं है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी द्विवेदी के बयान से खुद को अलग करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा से ही आरक्षण का समर्थन करती आई है और इसे लेकर उसकी नीतियां जगजाहिर हैं। काश, द्विवेदी के बयान का पार्टी समर्थन करती। सुझाव पर अमलकरने का साहस दिखाती लेकिन ऐसा हो न सका। इस सारे घटनाक्रम से यह बात तो सामने आती है कि नेताओं को हकीकत तो पता है लेकिन जानबूझकर वो अपने लब सीलकर रखते हैं। द्विवेदी ने लब खोलने की हिम्मत दिखाई लेकिन पार्टी ने पल्ला झाड़ लिया।

खुशियां मनाओ, झूमो और गाओ.!


बस यूं ही

यह हम सब के लिए खुशी का दिन है। जश्न मनाने का दिन है। ढोल बजाकर नाचने और झूमने का दिन है। मिठाई बांटकर खुशी का इजहार करने का दिन है। एक दूसरे के गले मिलकर बधाई देने का दिन है। यकीन कीजिए यह बहुत बड़ा दिन है। देश के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि वाला दिन है। देश की गंभीर एवं विकट समस्या को हल करने का रास्ता खोजने का दिन है। ऐतिहासिक, अविस्मरणीय व अविश्वसनीय दिन है। यह जागती आंखों से सपने देखने का दिन है। यह एक तरह का कमाल है, एक तरह का प्रयोग है, जो हाल में खोजा गया है, हालांकि शुरुआत तो दो तीन साल पहले ही हो गई थी लेकिन सफलता की कसौटी पर खरा यह अब जाकर उतरा है। अब, दिमाग के घोड़े मत दौडा़ओ...।
दरअसल, खुशी इस बात की है कि हमारे देश से गरीबी खत्म हो रही है। इतनी तेज रफ्तार से गरीबी उन्मूलन हो रहा है कि दुनिया की तमाम तरह की रफ्तारें इस रफ्तार के आगे पानी भर रही हैं। आजादी से लेकर बड़े-बड़े धुरंधर जो काम नहीं कर पाए वो काम अब क्रिकेट के ट्वंटी-ट्वंटी मैच की तर्ज पर हो रहा है। वैसे गरीबी ने कई लोगों का भविष्य बनाया। उनकी जिंदगी संवार दी। गरीबी हटाओ के नारे से न जाने कितनी ही नेताओ की डूबती नैया पार लगी। न जाने कितनों ने ही इसके सहारे सफलता की सीढ़ी चढ़कर सत्ता का सुख भोगा। गरीबी मिटाने के नाम पर न जाने कितनों ने अपनी जेबें भरी। खूब माल बटोरा। इतने करने के बाद भी गरीबी कम नहीं हुई है। जनसंख्या बढऩे के साथ गरीबी भी बढ़ती गई। शायद इसीलिए भी कि अगर गरीबी खत्म कर दी गई तो कोई बड़ा मुद्दा बचेगा ही नहीं। खैर, हमारे नेताओं को अब सदबुद्धि आ गई है। लगता है उन्होंने यह मुद्दा खत्म करने का मानस बना ही लिया है। नेताओं को लगने लगा है कि अब जनता जाग गई है। गरीबी के नाम पर ज्यादा दिन तक उसको बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है, इसलिए गरीबी का खात्मा जरूरी हो गया है।
जमाना हाइटेक है, सूचना एवं प्रौद्योगिकी का है, लिहाजा गरीबी उन्मूलन भी उसी तर्ज पर हो रहा है। वैसे बचपन में एक कहावत सुनी थी कि बड़ी लकीर को अगर छोटा करना है तो उसके पास उससे भी बड़ी एक लकीर खींच दो.. पहले वाली लकीर अपने आप छोटी हो जाएगी। देश से गरीबी भी कुछ इसी अंदाज में खत्म की जा रही है। नेताओं ने गरीबी का पैमाना ही बदल दिया है। इससे गरीब अपने आप ही कम हो रहे हैं। अब देखिए ना सन 2011 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा था कि प्रतिदिन 32 रुपए कमाने वाला शहरी और 23 रुपए कमाने वाला ग्रामीण गरीब नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि उस वक्त इस बात का विरोध करने वाली भाजपा ने भी अब कमोबेश वैसा ही रास्ता अख्तियार कर लिया है। गुजरात सरकार ने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग को हाल ही में जारी किए गए एक पत्र में कहा है कि हर माह 324 रुपए कमाने वाले ग्रामीण और 501 रुपए कमाने वाले शहरी को गरीबी रेखा से ऊपर रखा जा सकता है। पिछले माह जारी किए गए इस पत्र के मुताबिक ग्रामीण की रोज की आय 11 रुपए और शहरी व्यक्ति की प्रतिदिन आय 17के करीब रुपए होती है।
अब, नए तरीके से देश से गरीबी खत्म हो रही है तो कई तरह की प्रतिक्रियाएं भी आना लाजिमी है। इसलिए जो गरीबी हटाने के समर्थन में हैं वे चुप रहे। और जिनको हमारे नेताओं का यह तरीका नागवार गुजरा हो तो कृपा करके वे इससे बेहतर कोई दूसरा नायाब तरीका बताएंगे तो मेहरबानी होगी। वरना, आप भी गरीबी कम होने का जश्न मनाओ।

बेचारा, गली का कुत्ता!


बस यूं ही

सुबह आंखें कुछ देरी से खुली थी। नित्यकृमों से निवृत्त होने के बाद तत्काल कार्यालय के तरफ दौड़ पड़ा। घर से निकला उस वक्त दस बजकर दस मिनट हो चुके थे। मैं लगभग दौडऩे वाले अंदाज में लम्बे कदम भरते हुए कार्यालय के तरफ चला जा रहा था। रास्ते में अचानक पांच छह कुत्तों का झुण्ड मेरे सामने आ गया। मैंने देखा कि उन कुत्तों के बीच मेरी गली का कुत्ता फंसा हुआ था। उसका अंदाज तो बिलकुल बदला हुआ था। हो भी, कैसे नहीं, बेचारा भूले-भटके दूसरी गली में जो आ गया था। उसकी दुम दोनों टांगों के बीच दबी हुई थी। बिलकुल यू टर्न वाले अंदाज में। उसके भौंकने की आवाज तो बिलकुल बदली हुई थी। भौंक नहीं रहा बल्कि इस अंदाज में रिरिया रहा था, गिड़गिड़ा था, जैसे कह रहा हो कि.. भइया गलती हो गई, आइंदा ऐसी गुस्ताखी नहीं होगी। इस बार के लिए कृपया माफ कर दो, आदि- आदि। लेकिन वो बाहर वाले कुत्ते तो जैसे मौका ही तलाश रहे थे। वे गली के कुत्ते को छोडऩे के मूड में कतई नहीं थे। उनकी लाल-लाल आंखों से गुस्सा साफ जाहिर हो रहा था। मेरी गली वाला कुत्ता बचाव की मुद्रा में हल्के से गुर्राता.. दांत दिखाता और कदम वापस खींचने के जतन कर रहा था। वह और कर भी क्या सकता था। माहौल अनुकूल न होने के कारण उसका कोई जोर भी तो नहीं चल रहा था। बिलकुल निरीह और बेचारा बना हुआ था। लेकिन दूसरे कुत्ते तो जैसे मौके की ताक में ही थे। वे गुस्से में गुर्रा रहे थे, दांत दिखा रहे थे, जैसे कह रहे हों, अरे वाह, कल तो अपनी गली में शेर बना हुआ था। कैसे भौंक रहा था। छोटे से लेकर बड़े कुत्तों तक से पंगा ले रहा था, बड़ी दिलेरी के साथ। पता नहीं अपनी गली में इतनी हिम्मत कहां से आ गई थी। किसी को भी नहीं बख्शा था। तभी तो आसपास के मोहल्लों में नम्बर वन होने का तमगा हासिल कर लिया।
बाहरी कुत्तों का गुस्सा देखकर मैं तनिक सा घबराया कि कहीं गली का समझकर ये मेरे को ना घेर लें। इसलिए मैं चुपचाप अजनबी ही बना रहा। गली के कुत्ते के गले में पट्टा देखकर अचानक सारे कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे, मानो वह मेरी गली के कुत्ते पर अट्टाहास कर रहे हों। मजाक में ठहाके लगा रहे हों। मैंने वहां ज्यादा देर रुकना उचित नहीं समझा और कुत्तों से बचते हुए तत्काल कार्यालय की तरफ बढ़ गया।
कार्यालय में सुबह की मीटिंग निबटा कर घर पहुंचा उस वक्त दोपहर के साढ़े बारह बज चुके थे। सुबह जल्दबाजी में क्रिकेट मैच को भी भूल गया था। घर आते ही टीवी ऑन किया। वैसे मैच केवल इसीलिए देख रहा था कि शायद अंतिम वन डे जीतकर हमारे खिलाड़ी बची-खुची लाज तो बचा लें.. लेकिन ऐसा नहीं हो सका। हमारे धुरधंरों ने बड़ी आसानी से आत्समर्पण कर दिया। बड़ी शर्मनाक हार हो चुकी थी। टीवी से तत्काल मैच हटाकर समाचार चैनलों की तरफ बढ़ा तो उन पर भी भारतीय टीम की हार छाई हुई थी। मैंने टीवी बंद किया तो जेहन में सुबह का दृश्य फिर जीवंत हो उठा.. बेचारा गली का कुत्ता। अपनी गली में तो शेर था लेकिन आज उसकी उन बाहरी कुत्तों ने क्या गत बनाई। निरीह बनकर कैसे दुम दबाकर खड़ा था उस वक्त। ।
कमरे से उठकर मैं बाहर आया और छत्त से नीचे झांका तो बेचारा पेड़ की छांव में अपनी जीभ से जख्मों को चाटने में जुटा था, बीच-बीच में कराह भी रहा था। उसके आसपास कुछ युवक खड़े थे जो कुत्ते के गले से नम्बर वन लिखा पट्टा गायब होने पर चिंतातुर थे। 

Friday, January 31, 2014

स्थायी सुध लो तो बात बने


(दुर्ग रेलवे स्टेशन की व्यथा) 

 
चौंकिए, मत मैं आपका वही कथित 'मॉडल रेलवे स्टेशन' दुर्ग ही हूं। यह तो जीएम साहब का दौरा होने वाला है, इसलिए रंगरोगन करके मेरी सूरत सुधार दी गई है, वरना आप लोगों से हकीकत छिपी हुई थोड़े ही है। दौरे के कारण पखवाड़ेभर से अधिकारियों की यहां आवाजाही भी बढ़ी है। कभी रायपुर से कोई आ रहा है तो कोई कभी बिलासपुर से। जीएम साहब को स्टेशन चकाचक दिखना चाहिए, इसके लिए सबने दिन रात एक कर रखा है। चर्चा तो यहां तक है कि साहब के संभावित सवालों के जवाब तक पहले से ही तैयार कर लिए गए हैं। समस्याओं व अधूरे निर्माण कार्यों पर पर्दा डालने की भी भरपूर कोशिश कर ली गई है। प्रयास तो यहां तक किए जा रहे हैं कि साहब केवल वो ही जगह देखें, जिसको मातहत दिखाना चाह रहे हैं। कछुआ गति से हो रहे कुछेक काम तो आनन-फानन में युद्ध स्तर पर निपटाए गए हैं। रेलवे अधिकारियों की इतनी तत्परता देखकर मैं सोच में डूब गया हूं। काश, इतनी तत्परता या जल्दबाजी ये लोग पहले दिखाते तो इस प्रकार की नौबत ही नहीं आती। निर्माण कार्य कैसे एवं किस गति से हो रहे हैं, यह देखने की किसी को फुर्सत ही नहीं थी। जो भी अधिकारी इन कार्यों का निरीक्षण करने आते रहे हैं, उन्होंने मुंह दिखाई की औपचारिता ही ज्यादा निभाई।
अब जीएम साहब के दौरा करने से कौन से यहां के दिन फिर जाएंगे। यह सारी चिंता और दौड़-धूप केवल उनके दौरे तक ही सीमित है। देख लेना, जैसे ही उनका कार्यक्रम निपटेगा अधिकारी अपने-अपने काम में लग जाएंगे। ऐसा पहले भी हो चुका है। एक दो बार नहीं कई बार। मैंने तो कई अधिकारियों के दौरे देखें हैं। वैसे जीएम साहब का दौरा किसी नेता की सभा से कम नहीं है। आलम यह है कि तैयारियों पर ही काफी पैसा एवं वक्त जाया किया जा चुका है। गुस्ताखी माफ हो जीएम साहब, आपको मातहत कर्मचारियों की शक्ल ही देखनी है तो वह आप कभी भी देख सकते हैं। आपके ही स्टाफ के लोग हैं। आपको अगर दौरा ही करना था तो फिर इसकी सूचना क्यों? क्या बिना सूचना के यह सब संभव नहीं था? आप बिना घोषणा के आकस्मिक दौरा करते तो वह सब देख पाते जो अब शायद ही दिखाई दे।
वैसे दुर्ग-भिलाई के साथ रेलवे का दोयम व्यवहार किसी से छिपा नहीं है। रेलवे विभाग मेरे को मॉडल रेलवे स्टेशन कहता है, लेकिन बाहर से आने वाले यात्री मेरी खिल्ली उड़ाते हैं। रेलवे व देश की प्रगति में दुर्ग-भिलाई का योगदान कौन नहीं जानता,फिर भी पता नहीं क्यों रेलवे की इधर नजर ही नहीं है। अब देखिए भला, आपने मेरे को मॉडल स्टेशन तो कह दिया (बनाया नहीं है) लेकिन कुछ एक्सप्रेस ट्रेनों का तो यहां ठहराव तक नहीं है। सुविधाओं में विस्तार करना तो दूर की बात है। यह तो सरासर नाइंसाफी है। बेचारे लोग कहां जाएं, किसको कहें। यहां के जनप्रतिनिधि भी तो पत्र लिखकर औपचारिता निभा लेते हैं।
जीएम साहब, आपके दौरे की सार्थकता तभी है, जब अधूरे निर्माण कार्य तत्काल पूरे हों। यहां पर व्याप्त समस्याओं का अविलम्ब निराकरण हो तथा मॉडल स्टेशन पर मिलने वाली तमाम सुविधाओं में विस्तार हो। क्योंकि दौरे करने, मातहत कर्मचारियों को दिशा-निर्देश देने या उनको घुड़की पिलाने से अब बात बनेगी नहीं। यह सिलसिला अब लम्बा हो गया है। मेरी अब स्थायी सुध लेने की जरूरत है। अब और देरी ठीक नहीं है। आपका दौरा सामान्य न होकर यादगार बने इसके लिए कुछ पहल तो जरूर करते जाइएगा।

भिलाई पत्रिका के शुक्रवार 17 जनवरी के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी..।

Wednesday, January 15, 2014

बदलाव की बयार


टिप्पणी..

यकीनन यह बदलाव की बयार है। अपने हक के लिए उठ खड़े होने की। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की। यह एक शुरुआत है, अपनी बात बुलंद करने की, बुराई के खिलाफ बिगुल बजाने की। वाकई यह एक नई सुबह है, आधी दुनिया के जागने की, होश संभालने की। सचमुच यह एक सुखद पहल है, पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से उबर कर शर्म-शंका का पर्दा उतारने की, घर की दहलीज को लांघकर समाज को नई दिशा देने की। वास्तव में यह नजीर है, एक नए युग से कदमताल करने की। एक छोटी सी, लेकिन कारगर पहल है सोए हुए प्रशासन को जगाने की, उसे हरकत में लाने की। बदलाव का बीड़ा उठाने वाली ये महिलाएं बालोद एवं दुर्ग जिले के छोटे-छोटे गांवों की हैं। इन महिलाओं को इस बात का अहसास भली-भांति हो चुका था कि पुलिस-प्रशासन का मुंह ताकने या उनके यहां बार-बार गुहार लगाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला, क्योंकि ऐसा वे एक बार नहीं बार-बार कर चुकीं, लेकिन सुधार नहीं हुआ और न ही भविष्य में होने की कोई गुंजाइश दिखाई दे रही थी। आखिरकार उन्होंने ऐसा साहसिक एवं ऐतिहासिक कदम उठाया, जो पुलिस एवं प्रशासन को आइना दिखाता है। उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। ग्रामीण महिलाओं की यह पहल समाज को सीख देती है। कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर में घुसपैठ कर चुकी शराब के खिलाफ महिलाओं का आंदोलन इसलिए भी अनूठा है, क्योंकि उन्होंने न केवल थानाप्रभारी से लेकर कलेक्ट्रेट का घेराव तक किया बल्कि खुद ही शराब जब्त करके व्यवस्था पर करारा तमाचा भी जड़ दिया। महिलाओं ने साबित कर दिया है कि अगर ठान लिया जाए तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। एकजुटता से समस्या का सामना किया जाए, उसके खिलाफ आवाज उठाई जाए तो सफलता सुनिश्चित है।
भिलाई से सटे ढौर गांव से अवैध शराब के खिलाफ उठी आवाज अब मुखर हो रही है। रानीतराई के असोगा गांव के बाद बालोद जिले में तो महिलाओं ने कमाल ही कर दिखाया। महिलाओं की छोटी सी मुहिम अब मिसाल बन रही है। निसंदेह इस बदलाव के कालांतर में सुखद परिणाम आएंगे। वैसे भी आधी दुनिया की चुप्पी के चलते ही इस समस्या ने बड़े पैमाने पर पैर पसारे। अब जाग रही हैं तो यकीनन परिणाम प्रेरणादायी एवं सकारात्मक ही होंगे। जरूरत है कि यह उत्साह और जज्बा इसी तरह बना रहे।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-33 

 
खिड़की से हवा के थपेड़ों से हल्की सर्दी का अहसास होने लगा था। पसीने से गीली बनियान अभी सूखी नहीं थी। इस कारण भी सर्दी कुछ ज्यादा लग रही थी। मैंने तत्काल खिड़की गिराई और पुरी व उसके आसपास के क्षेत्रों के प्रसिद्ध स्थानों के बारे में पढऩे लगा। तीन दिन और दो रात पुरी में बिताने के बाद भी काफी कुछ देखने से छूट गया था। पुस्तक पढ़ी तो पता चला। पुरी में भगवान जगन्नाथ के मुख्य मंदिर के अलावा छोटे-बड़े सैकड़ों मंदिर हैं। इनमें एक लोकनाथ का मंदिर है जो पुरी में सबसे प्राचीन है। जिसमें शंकर भगवान श्री लोकनाथ जी के नाम से पूजित है। यह मंदिर श्री मंदिर से तीन किमी दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा में है। हर साल शिव चतुर्दशी को यहां बड़ा मेला लगता है। कहा जाता है कि दशरथ सुत रामच्रद जी ने लंका जाते समय यहां शिव की पूजा की थी। पुरी के मंदिरों की फेहरिस्त वास्तव में बेहद लम्बी है
खैर, ज्यादा मलाल तो भुवनेश्वर के मंदिर ना देख पाने का था। यहां चार-पांच ऐतिहासिक मंदिर हैं तथा नंदन कानन चिडिय़ा घर है। मैं इन सबके के बारे में पढ़ ही रहा था कि पढ़ते-पढते कब आंख लगी पता ही नहीं चला। सुबह देखा तो हम छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश कर चुके थे। बस अब इंतजार था तो बेसब्री से घर पहुंचने का..। आखिरकार ट्रेन भिलाई पहुंची और हम ऑटो करके घर पहुंचे थे। घर आते ही और कुछ नहीं सूझ रहा था सिवाय सोने के। स्मृति में मंदिर, सागर, कोर्णाक, चंद्रभागा की यादें रह-रहकर ताजा हो रही थीं।
बहरहाल, हमारा आनन-फानन में तय हुआ पुरी जाने का कार्यक्रम इतना यादगार एवं ऐतिहासिक होगा सोचा नहीं था। अब तो आलम यह है कि दुबारा कब वक्त मिले और फिर से जाने का कार्यक्रम बनाएं। वाकई पुरी दर्शनीय जगह है। वक्त मिले तो एक बार यहां पर जाकर आना चाहिए। बस थोड़ी सी अक्ल एवं समझदारी से काम लेंगे तो आपको ज्यादा रुपए खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सावधानी और सतर्कता बरतने की भी जरूरत है। वैसे पुरी के दो मिजाज हैं। आधुनिक एवं परम्परावादी। यहां दोनों ही तरह के लोग हैं। आप किनसे प्रभावित हैं और वहां जाकर क्या करते हैं, यह आपके सोच पर निर्भर है। वैसे मैंने शुरू में भी कहा था कि अक्ल बादाम खाने से नहीं भचीड़ खाने से आती है। हमको भी अक्ल आ चुकी है। पुरी के बारे में काफी कुछ जान गया हूं। माहौल, व्यवस्था और लोगों के बारे में। वहां जाने वालों को बता सकता हूं कि आपको क्या करना है क्या नहीं। खैर, अति व्यस्तता के बावजूद देखो ना, प्रभु के आशीर्वाद से पुरी पर काफी कुछ लिख दिया है। अपने लेखन में मैंने भगवान के अस्तित्व पर या उनकी सत्ता पर किंचित मात्र भी अंगुली नहीं उठाई, जो लिखा वह केवल वहां की व्यवस्था पर है। प्रभु जग के नाथ हैं और रहेंगे लेकिन वहां बिचौलियों के कारण वे जग के ना होकर पैसों के नाथ हो गए हैं। अगर ऐसा कहना गलत है तो मैं एक बार फिर प्रभु के चरणों में नतमस्तक होकर क्षमाप्रार्थी हूं। इसी के साथ एक बार फिर मेरे साथ मिलकर जयकारा लगाइए.. बोलिए.. जग के नाथ की... जय, प्रभु जगन्नाथ की जय। ..................इति।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-32 

 
वहीं स्टेशन पर एक गट्टे पर पसर गया। हल्की से झपकी लगी। काफी देर तक हम वहां बैठे रहे। इस बीच कैमरे से पुराने फोटो भी देखते रहे। आखिर चार बजे हम वहां से खड़े होकर लैगेज रूम आए, वहां से सामान लिया और स्टेशन पर ही रुक गए। डिसप्ले बोर्ड पर अभी यह नहीं बताया जा रहा था कि ट्रेन कौनसे प्लेटफार्म पर आएगी। शाम के भोजन के लिए चर्चा के बाद तय हुआ कि यहीं से पैक करवा लेते हैं। रास्ते में ट्रेन में ही भोजन कर लेंगे। इसके बाद गोपाल जी के दोनों बच्चे, उनकी धर्मपत्नी एवं मेरी धर्मपत्नी चारों जने रेलवे की केन्टीन की तरफ चल गए। पीछे मैं दोनों बच्चे एवं गोपाल जी रुक गए। उनको गए हुए करीब आधा घंटा हो गया था। इस बीच प्लेटफार्म नम्बर एवं ट्रेन के नाम की उद्घोषणा हो गई। डिसप्ले बोर्ड पर जानकारी आने लगी थी। घड़ी में 4.40 हो गए थे। ट्रेन छूटने में मात्र 25 मिनट शेष रहे थे लेकिन भोजन लेने गए लोगों का कोई अता-पता नहीं था। गोपाल जी ने कहा, बन्ना जी मैं उनको कैन्टीन की तरफ देखकर आता हूं। वो केन्टीन में गए और थोड़ी देर बाद वहीं से हाथ हिलाया तो मैं भी सोच में डूब गया कि अचानक यह लोग कहां चले गए। गोपाल जी तत्काल स्टेशन से बाहर दौड़े, इधर-उधर नजर मारने के बाद बदहवाश से मेरे पास आए बोले बन्ना जी, पता नहीं कहां चली गई, कहीं पर भी दिखाई नहीं दी। इसके बाद गोपाल जी दो तीन बार केन्टीन तक होकर आए लेकिन कुछ जानकारी नहीं मिल रही थी। मैंने गोपाल जी से कहा कि आज तो ट्रेन छूटना तय है। मात्र 15-20 मिनट की मुश्किल से शेष बचे थे। इसके बाद मैंने गोपाल जी को बच्चों के पास खड़ा किया और केन्टीन के तरफ दौड़ पड़ा। मैंने केन्टीन का कोना-कोना छान मारा लेकिन, वहां कोई हो तो दिखाई दे। इसके बाद मैं केन्टीन से गोपाल जी तरफ हाथ हिलाता हुआ निराश कदमों से आ ही रहा था कि मेरे को चारों लोग स्टेशन परिसर में अंदर प्रवेश करते हुए दिखाई दिए। इसके बाद मैं गुस्से में पूरी आवाज के साथ चिल्लाया। कहने लगा क्या मतलब है, यहां ट्रेन छूटनी वाली है और आप लोगों को परवाह ही नहीं है। इसके बाद गोपाल जी ने भी जोरदार आवाज में डांट लगाई, वे बेहद आग बबूला थे। सचमुच उनका इतना रौद्र रूप पहली बार देखा।
यकीन मानिए, स्टेशन पर उस वक्त सन्नाटा पसरा था। ट्रेन व प्लेटफार्म की घोषणा होने के कारण उससे संबंधित यात्री वहां से रवाना हो गए थे। बाकी बचे यात्री सुस्ता रहे थे। हमारा वार्तालाप सुनकर वे चौंक गए। सब हमको कौतुहल से देख रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी फिल्म का क्लाइमेक्स सीन फिल्माया जा रहा है। वाकई यह हमारी पुरी यात्रा का क्लाइमेक्स ही था। इधर दोनों की धर्मपत्नियां बिलकुल निरूतर थी। तत्काल सबने सामान उठाया और दौड़ पड़े ट्रेन की तरफ, हांफते-हांफते । यहां सुस्ताने का मतलब किसी खतरे से खाली नहीं था। तेज चलने एवं भारी सामान होने के कारण पसीने से लथपथ हो चुका था। ट्रेन में सामान रखा, उस वक्त घड़ी पांच बजकर पांच मिनट दिखा रही थी। थोड़ी ही देर में ट्रेन में चलने लगी। हमने प्रभु जगन्नाथ का जोरदार जयकारा लगाया और अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गए। ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी।... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-31

 
धर्मपत्नी मेरे को कुछ असहज एवं असामान्य सी दिखाई दी। पास आने पर मैंने वजह पूछी तो वह थोड़ी घबराई हुई सी थी। थोड़ा सामान्य होने के बाद कहने लगी... मेरे तो वहम हो गया..। उसने मेरे से हाथ से वह सामग्री वापस ले ली। मैंने कहा पूरी कहानी बताओ, तो कहने लगी कि मंदिर के अंदर एक पण्डे ने हाथ में कुछ सामग्री रखते हुए कहा था कि यह तेरे सुहाग से संबंधित है, तेरा सुहाग बना रहे, ला कुछ दक्षिणा दे दे। धर्मपत्नी ने बताया कि जब उसने पण्डे को दस रुपए देने चाहे तो वह नाराज हो गया और कहने लगा कि दस से बात नहीं बनेगी। धर्मपत्नी जब दस से आगे नहीं बढ़ी तो उसने हाथ में रखी सामग्री वापस ले ली। मैंने धर्मपत्नी को धीरज बंधाया और कहा कि यह सब तुम जैसे धर्मभीरू लोगों को डराकर, भयभीत करके राशि ऐंठने का बहाना है। तुम मस्त रहो, किसी प्रकार की चिंता मत करो। इसके बाद गोपाल जी के बड़े वाले सुपुत्र ने बताया कि अंकल मंदिर में एक पुजारी प्रसाद बांट रहा था। उसने प्रसाद यह सोचकर ले लिया कि किसी ने प्रसाद चढ़ाया है, इसलिए शेष प्रसाद वितरित किया जा रहा है लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं था। बालक ने जैसे ही प्रसाद के लिए हाथ आगे बढ़ाया पुजारी ने प्रसाद का पैकेट हाथ पर रखते हुए उससे पैसे मांग लिए। बालक झट से समझ गया और पैकेट वापस पुजारी को थमा दिया। यहां से निकलने के बाद हमने दो और मंदिर देखे। ऑटो वाला दिलीप कहने लगा.. साहब बहुत देर हो रही है, थोड़ा जल्दी करो.। वह टूटी-फूटी हिन्दी बोल रहा था। बातचीत में वह कुछ खुला तो बिलकुल दार्शनिक वाले अंदाज में कहने लगा, ऊपर वाला देखता है, तभी तो आपसे ज्यादा किराया नहीं लिया है। दूसरे ऑटो वाले आपसे तीन सौ या चार सौ रुपए ले लेते, लेकिन वह ऐसा नहीं करेगा। दिलीप कह रहा था कि उसने अपनी माता का मुंह नहीं देखा, वह जन्म देते ही भगवान को प्यारी हो गई। इसलिए वह वाजिब किराया ही लेता है। आखिरी मंदिर में हम पहुंचे तो वहां से बंगाल की खाड़ी पास ही थी। एक बार फिर हम समुद्र की तरफ दौड़ पड़े। कुछ विदेशी सनबॉथ में व्यस्त थे। हम भी वहां कुछ देर खड़े रहे। कुछ फोटो खींचे। ऑटो वाले को जल्दी थी, इसलिए समुद्र को प्रणाम कर हम वहां से रवाना हुए। ऑटो वाले ने हमको रेलवे स्टेशन छोड़ दिया।
रेलवे स्टेशन परिसर में एक बोर्ड लगा है। उस पर एक तरफ हिन्दी में तो दूसरी तरफ उडिय़ा में लिखा गया है। उस पर लिखा था कि 1939 में गांधी जी पुरी से 29 किमी दूर देलांग आए थे। लेकिन उन्होंने जगन्नाथ मंदिर के दर्शन नहीं किए, क्योंकि यहां हरिजनों का प्रवेश वर्जित था। इतना ही नहीं गांधी जी ने कस्तूरबा गांधी और महादेव देसाई को मंदिर में दर्शन करने पर फटकार भी लगाई थी। मैं सोच में डूबा था कि आखिर यह ऐसी क्या उपलब्धि है, जिसको स्टेशन के सामने टांग कर रखा गया है। खैर, इसके लिए मैंने स्टेशन पर मंदिर कमेटी की और से स्थापित बुक स्टॉल से दो किताबें भी खरीदी लेकिन मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई। उस वक्त दो बजे थे और ट्रेन शाम 5.10 की थी। हम सभी लोग पहले तो बाहर चाय पीकर आए इसके बाद स्टेशन पर आकर बैठ गए। थकान से बदन दोहरा हो रहा था।.... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-30

 
वहीं मंदिर परिसर में एक वृद्ध महिला दिखाई दी, जो बर्तन को धोने में व्यस्त थी। आश्वर्य की बात यह थी कि सारे बर्तन पत्थरों के बने हुए थे।
इसके बाद ऑटो वाला, जिसका नाम दिलीप था, हमको गुंडिचा मंदिर ले गया.. । गुंडिचा मंदिर का दूसरा नाम जनकपुर भी है। यह श्री मंदिर से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर उतर दिशा में है। मंदिर की लम्बाई 430 फीट है और चौड़ाई 320 फीट है। राजा इन्द्रद्युम्न की रानी गुंडिचा के नाम पर इस मंदिर का नाम गुंडिचा रखा गया है। श्री जगन्नाथ महाप्रभु की रथ यात्रा से बाहुड़ा यात्रा (वापसी यात्रा) तक श्री मंदिर को छोड़कर यहां आकर रहते हैं। वैसे इस मंदिर को महावेदी भी कहा जाता है। यह नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि यहां राजा इन्द्रद्युम्न ने वेदी बनाकर अश्वमेध यज्ञ किया था। यहां पांच सौ वर्षों तक आहुति देने के कारण इसे यज्ञ मंडप भी कहते हैं। विग्रहों का मूल जन्म स्थान होने के कारण इसे जनकपुरी या जन्मस्थान भी कहते हैं। बताते हैं कि इस जगह को जनकपुरी इसीलिए भी कहते हैं क्योंकि इस क्षेत्र में राजा जनक ने हल जोतते समय सीता माता को प्राप्त किया था। इसके अलावा इसको नृसिंहक्षेत्र व आड़पमंदिर आदि भी कहा जाता है।
खैर, यहां भी टिकट कटाने के बाद ही अंदर जाने दिया जाता है। हमने चार टिकट खरीदी थी। काउंटर पर टिकट चैक करने वाला युवक अड़ गया, बोला बच्चों का भी टिकट लगता है। मैंने एवं गोपाल जी ने उससे बहस न करते बच्चों एवं धर्मपत्नियों को अंदर भेज दिया। फिर मन में ख्याल आने लगे कि दर्शन के लिए भी टिकट, मंदिर ना हुआ कोई सर्कस या फिल्म हो गई। खैर, अचानक मेरे को शरारत सूझी। मैंने गोपाल जी से कहा कि सामने यह जो बोर्ड टंगा है, इसकी एक फोटो ले लो। गोपाल जी ने जैसे ही क्लिक किया, वह युवक दौड़ कर हमारे पास आया, बोला यहा फोटो खींचना मना है। वैसे टिकट लेकर अंदर जाने वालों को कोई पूछ ही नहीं रहा था लेकिन हमसे वह चिढ़ा हुआ था, लिहाजा फोटो खींचने से मना कर रहा था। बोर्ड पर चार भाषाओं, हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला एवं उडिय़ा में दिशा- निर्देश लिखे थे। हिन्दी में लिखा था कि अंदर क्यामेरा ले जाना मना है लेकिन अंग्रेजी में इसका कहीं पर कोई उल्लेख नहीं था। हमारी बहस इसी बात को लेकर थी..। बहस बढ़ी तो दो युवक और आ गए। वो तीन और हम दो। मैंने उन दोनों से कहा कि आपको बीच में बोलने की जरूरत नहीं है, हमारी बात आपसे नहीं है। तो बोले.. हम सब स्टाफ सदस्य हैं। हमने कहा कि जब कैमरे के संबंध में कुछ लिखा ही नहीं है तो लोग क्यों बेवजह मामले को तूल दे रहे हो। इतने में एक युवक बोला, आपको उडिय़ा आता है क्या? मैंने असहमति में सिर हिलाया तो वह खुशी से उछल पड़ा और कहने लगा. आपको उडिय़ा नहीं आता है और हमको हिन्दी। हमारी उडिय़ा में लिखा है कि कैमरा ले जाना मना है। इस पर मैंने युवक से अंग्रेजी भाषा की तरफ ध्यान दिलाया तो कहने लगा कि हमको और किसी भाषा से मतलब नहीं है। हमको उडिय़ा आता है बस। हमारी युवकों के साथ बहसबाजी जारी थे कि इसी दौरान धर्मपत्नी एवं बच्चे बाहर आते दिखाई दिए। ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-29

 
इस तालाब को उत्कल नरेश भानुदेव जी के मंत्री नरेन्द्र देव ने खुदवाया था। हर साल वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) से लेकर 21 दिन तक इस तालाब पर जगन्नाथ जी का चंदन यात्रा (जल विहार) उत्सव मनाया जाता है।
खैर, ऑटो वाले ने कहा कि जूते-चप्पल व सामान यहीं छोड़ जाओ और आप लोग दर्शन कर आओ। अजनबी आदमी पर यकायक भरोसा नहीं हुआ। तत्काल कैमरा निकाला और ऑटो के नम्बर प्लेट सहित फोटो खींच लिया। इसके बाद हम लोगों तालाब की तरफ बढ़े।
यह बहुत बड़ा तालाब है। लेकिन बदहाल है। पानी का भी लम्बे समय से जमाव होने के कारण उस पर काई जम चुकी है। तालाब के प्रवेश द्वार के बाहर भी एक तरफ कचरे का ढेर लगा था। पानी के अंदर टूटी-फूटी नाव खड़ी थी। पानी के बीचोबीच मंदिर बना हुआ है। वहां तक पहुंचने के लिए पुलनुमा बनाया हुआ है। हम सीढिय़ों से तालाब में उतरे। सीढियां उतरने के बाद सामने एक काउंटर था, जिस पर टिकट मिल रही थी। हम सीधे ही आगे बढ़े तो एक युवक चिल्लाया टिकट ले लो, टिकट, खैर टिकट लेने के बाद हम आगे बढ़े। युवक से पूछा काहे का मंदिर है, तो वह बोला बुआजी का। मैंने जिज्ञावश पूछा यह बुआजी कौन है तो युवक बोला, बुआजी को नहीं जानते.. अरे भैया, कुंती मैया का मंदिर है। वैसे मंदिर ज्यादा बड़ा नहीं है। अंदर घुसे तो वहां मौजूद पुजारी पूछ बैठे.. पूजन करोगे या प्रसाद लोगे। हम ने दर्शन किए और बाहर निकले तो वहीं बगल में दो छोटे-छोटे मंदिर और दिखाई दिए..। एक पर लड्डू गोपाल मंदिर लिखा था जबकि एक अन्य मंदिर था। मैं दर्शन करके टिकट चैक करने वाले युवक के पास आया और नाम पूछा तो उसने अपना नाम जगन्नाथ बताया। मैंने उससे मजाक में कहा कि पुरी में इतने मंदिर हैं.. ऐसे में यहां शायद ही कोई बेरोजगार होगा। भगवान के नाम पर कितने को रोजगार मिला हुआ है यहां। वह युवक मेरा बातें सुनकर मुस्कुराने लगा। पास से गुजर रहे एक सज्जन ने हमारा वार्तालाप सुन लिया.. बोले, पुरी के पण्डे आपको दूसरी जगह काम करते दिखाई नहीं देंगे.. क्योंकि प्रभु की कृपा से उनको पुरी में ही रोजगार मिला हुआ है।
यहां से हमको ऑटोवाला एक आश्रम की तरफ ले गया। उस पर लिखा था क्षीमंदिर। बेहद की शांत वातावरण था। मंदिर की शीतल छांव में थोड़ी देर बैठकर हम लोगों ने आराम किया। वहीं एक युगल बैठा था। दुनिया से बेखबर भविष्य की सपने बुनने में। मंदिर के शांत माहौल को बच्चों की मस्ती ने भंग कर रही थी। मंदिर में साफ शब्दों में लिखा था, यहां फोटो खींचना मना है। मंदिर के आगे ही एक पार्क था। काफी पेड़-पौधे लगे थे। यहां का नैसर्गिंक माहौल इतना अच्छा लगा कि बस यहीं पर सो जाए लेकिन अभी यात्रा जारी थी। यहां से सामने ही दूसरे मंदिर में गए। वहां समाधि बनी थी। यहां भी फोटोग्राफी वर्जित थी। बच्चों का शोर सुनकर एक वृद्ध संत अंदर से निकले और बच्चों को चुप रहने की नसीहत देने लगे। । दरअसल, उनको इस बात का अंदेशा था कि बच्चे कहीं अपनी मस्ती में समाधि स्थल तक ना चले जाएं। खैर, हमने समाधि के दर्शन किए। . ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-28

 
सुबह के 11 बजे का समय होगा लेकिन मंदिर की कहीं परछाई दिखाई नहीं दी, तो जेहन में वह आठ आश्चर्य वाली याद फिर जिंदा हो गई। मंदिर के शिखर पर लगी ध्वजा भी उसी दिशा में उड़ रही थी, जैसी पहले दिन देखी थी। शिखर पर लगे चक्र को भी बड़ी तल्लीनता, गंभीरता एवं गौर के साथ देखा.. वाकई उसको किधर से भी देखो वह सीधा ही दिखता है। वैसे मंदिर बहुत ही भव्य एवं विशाल है। श्री मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में गंग वंश के प्रतापी राजा अनंगभीम देव के द्वारा हुआ था। लभग 800 साल पुराना यह मंदिर कलिंग स्थापत्य कला और शिल्पकला का बेजोड़ उदाहरण है। मंदिर के पत्थरों पर की गई नक्काशी का तो कहना ही क्या..। इसकी ऊंचाई 214 फीट और इसका आकार पंचरथ जैसे है। इस मंदिर के चारों तरफ दीवारें हैं, जिसे मेघनाद प्राचीर कहते हैं। इसकी लम्बाई 660 फीट और ऊंचाई 20 फीट है। मंदिर के चार भाग हैं, विमान, जगमोहन, नाट्यमण्डप और भोगमण्डप। श्रीमंदिर में मुख्यत: तीन विग्रह हैं। बाएं से श्री बलभद्र जी, बीच में सुभद्रा मैया और दाहिनी ओर श्री जगन्नाथ जी। ये विग्रह नीम की लकड़ी के बने हैं। स्थानीय भाषा में लकड़ी को दारु कहते हैं। जिस साल मलमास या दो आषाद आते हैं, उसी साल नवकलेवर होता है। नवकलेवर का मतलब नए विग्रह बनाने से है। यह नवकलेवर 12 साल में अंतराल में होता है। वैसे पुरी की रथयात्रा विश्वभर में प्रसिद्ध है। जगन्नाथ की सारी यात्राओं में से रथयात्रा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यह यात्रा आषाढ शुक्ल द्वितीय तिथि पर होती है। जगन्नाथ जी, बड़े भाई बलभ्रद जी, बहन सुभद्रा देवी के साथ सुसज्जित तीन रथों में बैठकर यात्रा श्री गुडिंचा मंदिर को जाती हैं। जगन्नाथ जी के रथ को नंदिघोष, बलभद्र जी के रथ को तालध्वज और सुभद्रा जी के रथ देवदलन कहा जाता है।
इसके अलावा मंदिर की रसोई भी भारत में काफी चर्चित है। रसोई आकर्षण केन्द्र इसीलिए भी क्योंकि इसमें बड़े पैमाने पर प्रसाद तैयार होता है। इस महाप्रसाद को तैयार करने में पांच सौ रसोइयों एवं तीन सौ सहायकों को जुटना पड़ता है।
हम मंदिर से बाहर निकले तो तीन-चार विदेशियों की टोली भगवा कपड़े पहने..हरे रामा हरे कृष्णा गाने में मगन थी। कोई हारमोनियम बजा रहा था तो कोई ढोलक पर थाप लगा रहा था। यह लोग मंदिर के आगे के मुख्य मार्ग पर प्रभु की आराधना कर रहे थे। लगा ही नहीं कि ये कोई विदेशी हैं। हम काफी देर तक उनको देखते रहे। गोपाल जी ने उनकी एक फोटो भी खींच ली। इसके बाद हम एक नारियल वाले के यहां रुके। सबने पानी पीया और इसके बाद एक ऑटो वाले के पास पहुंचे। उससे हमने पुरी के प्रमुख मंदिर दिखाने की बात की तो उसने ऑटो किराया 250 रुपए मांगे। हम तैयार हो गए। क्योंकि हमारी ट्रेन शाम को थी। बाकी बचे समय का हम सदुपयोग करना चाहते थे। ऑटो में सवार होकर हम पुरी भ्रमण पर निकल पड़े। सबसे पहले ऑटो वाला हमको नरेन्द्र तालाब लेकर पहुंचा। इसको चंदन तालाब भी कहते हैं। इस तालाब की लम्बाई 873 फीट और चौड़ाई 834 फीट है। ... जारी है।