Thursday, November 16, 2017

इक बंजारा गाए-2


धमाका कुइयों का धमाका
श्री गंगानगर जिले को ओडीएफ घोषित करने की लगभग तैयारी हो चुकी थी। सत्यापन के लिए बाकायदा एक टीम भी आ गई थी। सब काम गुपचुप में चल रहा था। यह तो भला हो उस सरपंच का जिसने वाहवाही बटोरने से पहले ही ओडीएफ की सच्चाई को उजागर कर दिया। श्रेय लेने के लिए दिन-रात एक करने वालों को अब समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या करें। उनके लिए अब न निगलते बन रहा है और न ही उगलते। चौबे जी छब्बे जी बनने चले थे लेकिन दूबे जी बनकर ही रह गए, वाली कहावत चरितार्थ हो गई। यकीनन जिन धमाका कुइयों के बंद होने का दावा किया जा रहा था, रह-रह के उनके धमाके ओडीएफ करने वालों के कानों में गंूज रहे होंगे। इतना ही नहीं, इन धमाकों की गंूज लंबे समय तक सालती रहेगी। और हां, उस सरपंच को यह ओडीएफ वाले जरूर पानी पी पीकर कोस रहे होंगे।
रामलीला से पहले महाभारत
श्री गंगानगर शहर की तो बात ही निराली है। भले ही कोई शहर हित के लिए आगे आए न आए लेकिन मामला प्रतिष्ठा का हो तो कोई पीछे नहीं हटना चाहता। हालत यह हो जाती है कि खुद को साबित करने तथा अपना वजूद दिखाने के लिए कई तरह के जतन करने से भी गुरेज नहीं किया जाता। और बात जब किसी से बदला लेना या हिसाब चुकाने की हो तो उचित अवसर की तलाश हर कोई करता है। पिछले दशहरे पर रावण दहन के कार्यक्रम में न बुलाने की टीस दिल में दबाए रखने वाले सभापति को अब मौका हाथ लगा है। तभी तो अब तक दशहरा आयोजन करने वाली संस्था को इस बार रामलीला मैदान नहीं मिलेगा। रावण दहन के लिए उसको दूसरी जगह देखनी पड़ेगी। सभापति ने भी अलग से दशहरे की घोषणा कर दी है। ऐसे में तय मानिए इस साल शहर में दो-दो रावणों का दहन होगा।
शुक्र है इज्जत तो बची
हत् या के मामले में वांछित एक आरोपित की गिरफ्तारी के बाद खाकी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। खुशी भी दोहरी समझिए। इक तो बिना कोई बड़ी मशक्कत किए एक तरह से घर बैठे-बैठे ही मुर्गी जाल में फंस गई। दूसरी खुशी यह है कि सोशल मीडिया पर खाकी को रोजाना दी जाने वाली चुनौती से पीछा जो छूटा। लंबे समय से गिरफ्तारी न होने पर खाकी को लेकर लोगों के मन में कई सवाल भी घर कर गए थे। मसलन, खाकी की अंदरूनी गतिविधि उसको कैसे पता चल रही है। वह सोशल मीडिया पर सक्रिय है तो पुलिस उस तक पहुंच क्यों नहीं पा रही है। खैर, अब पुलिस भी यह मान कर खुश है कि चलो इज्जत तो बची। चाहे कैसे भी बचे।
घर का पूत कुंवारा डोले
मा रवाड़ी में एक चर्चित कहावत है 'घर का पूत कुंवारा डोले, पाड़ोसी का फेरा इसका तात्पर्य है कि खुद की औलाद भले ही कुंवारी बैठी रही, उसकी कोई चिंता नहीं लेकिन पड़ोसी के औलाद के फेरे अर्थात शादी हो जानी चाहिए। यूआईटी प्रमुख की सोच के साथ यह कहावत सटीक बैठती है। समाचार पत्रों में उनका बयान छपता है कि परिषद के पास बजट नहीं है तो यूआईटी देने को तैयार है। इस तरह के बयानों पर कल नुक्कड़ पर चाय की चुस्कियों के साथ एक बुजुर्ग ने चुटकी लेते हुए कहा कि नाथांवाला के पास स्वागत का सूचना पट्ट लंबे समय से धराशायी पड़ा है, वह तो ठीक हो नहीं रहा उल्टे महाशय परिषद में विकास कराने की रट लगाए हैं। वाकई बुजुर्ग की चुटकी में दम तो है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 21 सितंबर 17 के अंक में प्रकाशित 

मनमर्जी का खेल

टिप्पणी 
श्रीगंगानगर-सूरतगढ़ मार्ग पर कैंचिया के पास सोमवार सुबह निजी बस की टक्कर से ट्रैक्टर चालक की मौत हो गई। बताया जा रहा है बस तेज रफ्तार से दौड़ रही थी। इससे पहले बीते बुधवार को अनूपगढ़ में विद्युत तार छूने से लगी आग के कारण दो जनों की मौत हुई। आग से जो बस जली थी, उसी नंबरों की एक दूसरी बस को दूसरे दिन संचालित होते पाया गया। इन दो घटनाओं से समझा जा सकता है कि व्यवस्था किस कदर पटरी से उतरी हुई है। निजी बसों का संचालन बेखौफ व मनमर्जी हो रहा है। इतना ही नहीं मनमर्जी के इस खेल में मिलीभगत की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। अगर मिलीभगत न हो तो क्या एक नंबर की बसें एक ही जिले में संचालित हो सकती हैं? अगर मिलीभगत न हो तो क्या बसें निर्धारित रफ्तार से ज्यादा दौड़ सकती हैं? बसों में सफर करने वाले तो दावा यहां तक करते हैं कि सूरतगढ़ से श्रीगंगानगर का सफर चालीस-पैंतालिस मिनट में तय हो रहा है। सतर किलोमीटर की दूरी इस अंदाज में तय हो रही है तो सोचिए किस तरह जान जोखिम में डाली जा रही है। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों पर कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। तभी तो मनमर्जी से चलने वालों पर किसी तरह की रोकटोक व बंदिश न होना भी संबंधित विभागों को कठघरे में खड़ा करता है। श्रीगंगानगर-सूरतगढ़ मार्ग पर अवैध संचालन की शिकायतें लंबी हो रही है। शिव चौक के पास जीपों का संचालन सरेआम होता रहा है लेकिन जिम्मेदारों ने कभी कोई कारगर कार्रवाई नहीं की। इन जीपों का संचालन कम हो गया है लेकिन जान से खिलवाड़ तथा नियमों को ठेंगा दिखाने का सिलसिला रुका नहीं है। जान व नियमों से खेलने वालों के प्रति जिम्मेदारों विभागों का इस तरह से जानकर भी अनजान बने रहना बेहद चिंताजनक है। इतना भी तय है कि इस सिलसिले पर जल्द न रोक लगी तो हालात और भी बिगड़ेंगे।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 19 सितंबर 17 के अंक में प्रकाशित

लातों के भूत

टिप्पणी 
माना जाता है कि व्यवस्था में लापरवाही जड़ें जमा लेती है, तो उसको उखाडऩा बड़ा मुश्किल हो जाता है। इसी लापरवाही के कारण पटरी से उतरे काम को लाइन पर लाने में काफी वक्त भी लगता है। बदकिस्मती ही कहिए कि श्रीगंगानगर की प्रशासनिक व्यवस्था में लापरवाही इस कदर घर कर गई है कि अब तक किए प्रयासों के बावजूद यह पटरी पर नहीं आ रही है। प्रशासनिक स्तर की शायद ही कोई बैठक ऐसी होती होगी जिसमें लापरवाह कार्मिकों पर डांट-फटकार न पड़ती हो। नियमों व निर्देशों की हवाला भी कमोबेश हर बैठक में दिया जाता है। फिर भी अपेक्षित सुधार होता दिखाई नहीं दे रहा। शायद तभी जिला कलक्टर, अब तक जिन लापरवाह कार्मिकों को समझाइश, डांट-फटकार से माध्यम से सुधारना चाह रहे थे, उन्होंने उनके खिलाफ अब सख्ती करना शुरू कर दिया है। मामला शहर की सफाई का हो, शहर में पोस्टर-बैनर लगाने का हो या आवारा पशुओं का। बात अतिक्रमण की हो या फिर टूटी सड़कों की। जनहित व विकास से जुड़े हर काम में जिला कलक्टर ने दिलचस्पी दिखाई है। उन्होंने इसके लिए मातहतों पर कई बार फटकार भी लगाई है, लेकिन यहां 'लातों के भूत बातों से नहीं मानते वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यह एक तरह से ढीठता की भी पराकाष्ठा ही कही जाएगी। ऐसे में कलक्टर की कड़ी कार्रवाई कुछ उम्मीद जगाती है। अब जब उन्होंने इस तरह का रुख अख्तियार कर ही लिया है तो उनको पीछे हटना भी नहीं चाहिए। कड़ी कार्रवाई इसीलिए भी जरूरी है क्योंकि इसको देखकर या सुनकर शेष कार्मिकों में भी भय रहेगा। जिला कलक्टर को व्यवस्था में सुधार के लिए इस तरह की कार्रवाई आगे भी करनी होगी। वैसे भी शहर के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। इस काम के लिए भी जिला कलक्टर को बजाय किसी मातहत की रिपोर्ट पर विश्वास करने के एक सप्ताह या पखवाड़े में विभिन्न विभागों, आमजन की आवाजाही वाले सार्वजनिक स्थान तथा शहर का जायजा भी ले लेना चाहिए। इससे वे सच्चाई को और भी करीब से जान पाएंगे। तभी यह लग पाएगा कि वाकई वे शहर व जनहित को लेकर संजीदा हैं और गंभीर भी
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 17 सितंबर 17 के अंक में प्रकाशित 

इक बंजारा गाए-1

प्रशासन की शरण में
पिछले साल की ही तो बात है। करोड़ों की ठगी के आरोपित को रिमांड के दौरान कोतवाली थाने में वीआईपी ट्रीटमेंट मिलने का मामला समाचार पत्रों की सुर्खियां बना था। यही आरोपित इन दिनों फिर प्रशासन की शरण में जाने की तैयारी में है। सुनने में आया है कि प्रशासन से फेस टू फेस मुलाकात का सिलसिला सिरे नहीं चढ़ रहा है। लिहाजा, कुछ मध्यस्थ इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। गलियारों में आरोपित और मध्यस्थ मित्रों की भूमिका की चर्चा खूब हो रही है। चर्चा इस बात की भी है कि यह मित्र वाकई मित्र हैं या मतलब के यार हैं। खैर, मामला बीते शनिवार का ही है, जब ठगी के आरोपित को तीन व्यापारियों के साथ प्रशासन के द्वार के पास देखा गया था।
कम नहीं है इनके भी जलवे
पुलिस व प्रशासन के बड़े अधिकारियों का अपने कार्यालय में जनता से मिलने का अलग-अलग तरीका होता है। कोई मिलने का समय निर्धारित करता है तो कोई पर्ची के माध्यम से मिलता है। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनके यहां बिना पूछे ही एंट्री मिल जाती है। खैर, बड़े अधिकारियों के इस तौर-तरीकों को शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने भी अपना लिया है। साहब के जलवे ऐसे हैं कि आप उनसे सीधे तो मिल ही नहीं सकते। इनसे मुलाकात करनी है तो बाकायदा पर्ची भरनी पड़ती है। साहब से ओके होने के बाद ही मुलाकात संभव हो पाती है। अब इन साहब को यह कौन बताए कि पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों के पास तो हर तरह के ही लोग आते हैं जबकि उनके पास तो केवल उनके विभाग से वास्ता रखने वाले ही ज्यादा आते हैं।
कोई धणी-धोरी भी है यहां का?
जिला मुख्यालय की बजाय अक्सर दूरदराज के कार्यालयों में कर्मचारियों के देर से पहुंचने या बंक मारने की शिकायतें ज्यादा आती हैं। इसका एक कारण यह भी है कि जिला मुख्यालय पर प्रशासन के आला अधिकारी बैठते हैं, लिहाजा कर्मचारियों में भय भी रहता है। खैर, जिला मुख्यालय पर स्थित पंचायत राज विभाग व श्रीगंगानगर पंचायत समिति से जुड़े कार्यालय में भी इसी तरह की शिकायतें सुनने को मिल रही हैं। लोग कहते हैं कि इस कार्यालय में जाने पर न तो कर्मचारी मिलते हैं, न ही अधिकारी। शिकायत करने वालों का तो बाकायदा यह भी कहना है कि प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी यहां कभी भी औचक निरीक्षण करें तो सच्चाई जान सकते हैं। देखने की बात यह है कि निरीक्षण कब होता है।
कुछ तो लोग कहेंगे...
नेतेवाला में मुआवजे की मांग को लेकर चल रहा किसानों का धरना भले ही समाप्त हो गया है, लेकिन सवाल मुआवजे के निर्धारण को लेकर उठ रहे हैं। शुरू में मुआवजा इतना भारी भरकम तैयार क्यों हुआ? इसके पीछे क्या कारण रहे। इतने ही ज्यादा सवाल तो इसके बार-बार निर्धारण से उठे। शुरुआत में जो मुआवजा तय था, और जो आखिर में मिल रहा है, उसमें आधे से ज्यादा का अंतर है। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि किसान किसी की बातों में नहीं आए। आ जाते तो हो सकता है मुआवजा ज्यादा भी मिल जाता। खैर जितने मुंह उतनी बात। कहा तो यह भी जा रहा है कि किसानों का अपने स्टैंड पर कायम रहना ही मुआवजे के बार-बार निर्धारण की वजह बना।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 14 सितम्बर 17 के अंक में प्रकाशित

दो मौतों का जिम्मेदार कौन?

 टिप्पणी
अनूपगढ़ में बुधवार शाम को एक बस में विद्युत तारों को छूने से लगी आग के कारण दो जनों की मौत हो गई। दो परिवारों की खुशियों को अचानक ग्रहण लग गया और दो चिराग असमय ही बुझ गए। हादसा इसीलिए हुआ क्योंकि बस अपने निर्धारित मार्ग की बजाय दूसरे रास्ते से गुजर रही थी, क्योंकि निर्धारित मार्ग पर जाम लगा था। अब मौतों के कारण और जवाब तलाशे जाएंगे। मसलन, जाम था तो बस चली ही क्यों? जाम था तो यात्रा करनी जरूरी थी क्या? जाम लगा था तो दूसरे रास्ते पर बस वाला गया ही क्यों? आदि आदि। इतना ही नहीं, कोई बस वाले को कोसेगा तो कोई यात्रियों को ही कसूरवार ठहरा देगा। सवालों की इस फेहरिस्त में बड़ा सवाल यह भी है कि यह जाम लगा ही क्यों? जिले में जान माल व कानून की हिफाजत करने वाले जिम्मेदार आखिर कर क्या रहे हैं? इतना तो तय है कि यह जाम सरकार के खिलाफ है। प्रशासन के खिलाफ है लेकिन इसका खमियाजा आम लोग ही ज्यादा भुगत रहे हैं। किसी को जरूरी काम से कहीं जाना है तो वह नहीं जा पा रहा है। किसी को किसी साक्षात्कार या नौकरी के सिलसिले में बाहर जाना है लेकिन अटका पड़ा है। और फिर इस तरह के हालात में कोई निकल भी रहा है तो अपनी सुरक्षा का जिम्मेदार खुद ही है। शायद इसीलिए सरकार एवं उसके नुमाइंदे थोड़ी राहत महसूस कर रहे हैं। आमजन को होने वाली तकलीफ से न प्रशासन को सरोकार है और न आंदोलन करने वालों को। जाम को किस तरह खुलवाया जाए या आमजन हो रही तकलीफों को समझाइश से किस तरह से कम किया जाए, इस पर विचार नहीं हो रहा है। लोकतंत्र में मांगें मनवाने वालों के लिए धरना-प्रदर्शन-जाम आदि पहले भी होते रहते हैं। यह सब सरकार पर दबाव बनाने के तरीके हैं। बस देखने की बात यही है कि इस दबाव में जनता का अहित न हो। कल को आंदोलन भी खत्म होगा। आंदोलन करने वाले भी अपने घर चले जाएंगे लेकिन नहीं आएंगे तो अनूपगढ़ में जान गंवाने वाले यह दो शख्स। अब प्रशासन भले ही मुआवजे से मरहम का प्रयास करे लेकिन मृतकों के परिजन जाम से मिले दर्द को जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे। उनको यही सवाल सालता रहेगा कि इन मौतों का जिम्मेदार कौन? सरकार की हठधर्मिता, प्रशासन की भूमिका या फिर जाम, क्योंकि सवालों के जवाब इन्हीं के इर्द-गिर्द छिपे हैं।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 14 सितंबर 17 के अंक में प्रकाशित

शहर की सुध लेगा कौन?

टिप्पणी 
श्रीगंगानगर के लोग इन दिनों दोहरे संकट से गुजर रहे हैं। पहला संकट यह है कि शहर की अधिकतर सड़कों का सीना छलनी हो चुका है। पिछले दिनों आई सामान्य सी बारिश ने ही इन सड़कों की गुणवत्ता की पोल खोल दी थी। अब हालत यह है कि शहर की कई सड़कों पर बड़े गड्ढ़े हो चुके हैं। इस वजह से लोग आसानी से आवागमन नहीं कर पा रहे हैं। वैसे श्रीगंगानगर में सड़क निर्माण में घटिया निर्माण सामग्री के आरोप भी अक्सर लगते रहते हैं। इसके बावजूद सड़कों का टूटना बदस्तूर जारी है। आरोपों को अनसुना करने में अधिकतर पार्षद ही आगे रहे हैं। गारंटी पीरियड में सड़कें टूट जाती हैं, इसके बावजूद किसी ठेकेदार को ब्लेक लिस्टेड नहीं करना यह साबित करता है कि कमीशन का खेल कितना कारगर है, जो पार्षदों को बोलने से रोक रहा है। अब टूटी सड़कों को बनाने की मांग मुखर हो रही है तो इसमें भी जनहित की बजाय स्वहित ज्यादा नजर आता है, क्योंकि कमीशन जो आना है। कमीशन की कीमत पर बनी सड़कों का टूटना तो फिर तय है लेकिन इसकी वजह बारिश को मान लिया जाएगा। यह खेल हर साल इसी तरह चलता है।
दूसरा संकट यह है कि शहर में सीवरेज लाइन बिछाने के लिए हाल-फिलहाल बनी सड़कों को भी बेरहमी से तोड़ा जा रहा है। सीवरेज का काम देख रही कंपनी के तौर तरीकों को देखकर लगता है कि यह या तो अपनी मनमर्जी से काम कर रही है या फिर जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों ने इस कंपनी को अभयदान दे रखा है। यह कंपनी कहां काम कर रही है, किस तरह का काम कर रही है तथा इससे जनता को क्या-क्या तकलीफें हो रही है, यह सब जानने की फुरसत किसी को नहीं है। कंपनी के कर्मचारियों के काम करने का भी कोई मापदंड या पैमाना नहीं है। जहां इनकी मर्जी होती है, वहीं काम करते हैं। एक काम में कभी दस श्रमिक जुट जाते हैं तो कभी एक दो ही इसको करते नजर आते हैं। कभी यह काम बिल्कुल थम जाता है। कभी एक गली में होता है तो कभी दूसरी में। कहीं सड़कें खोद कर छोड़ दी हैं तो कहीं पर सड़क पर मिट्टी इस तरह से डाल दी गई है कि वाहन तक गुजर नहीं सकते। खोदी गई मिट्टी हवा के साथ उड़ती है, जो कोढ़ में खाज का काम कर रही है। इतना ही नहीं, जहां पाइप लाइन बिछा दी गई है, वहां भी सड़क पर मिट्टी के ढेर पड़े हैं। बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि इस दोहरे संकट से निजात कैसे मिले, इस काम को करवाने में पहल कौन करे तथा बदहाल शहर की सुध कौन ले। कमीशन के आगे शहर हित को गौण करने वालों से उम्मीद करना बेमानी है। राज्य सरकार को शहर के हालात से अवगत कराने का दावा करवाने वालों की बातों में भी दम कम ही दिखाई देता है। ऐसे हालात में शहर के वरिष्ठ अधिकारियों को ही पहल करनी होगी। वे शहर का भ्रमण करें। तमाम समस्याओं को नजदीक से देखें तथा जनता को होने वाली परेशानियों को महसूस करें। स्थानीय स्तर पर जिनका समाधान संभव है तो यहां करवाएं और जो राज्य सरकार के स्तर की है, उसके लिए प्रस्ताव भेजकर उस पर गंभीरता से काम करने के प्रयास होने चाहिए। ऐसा इसीलिए भी जरूरी है कि अब तक चुप्प्पी साध कर बैठी जनता जिस दिन सड़क पर आ गई तो फिर सबकी मुश्किलें बढ़ेंगी।

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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 9 सितंबर 17 के अंक में प्रकाशित

हे मां...!

 टिप्पणी
मां तो मां है। मां की कोई तुलना नहीं होती। मां के जैसा इस संसार में दूसरा कोई नहीं होता। मां खुद तकलीफ झेलती है लेकिन अपनी औलाद को जरा सा भी दुख नहीं देती। मां खुद गीले में सोती है लेकिन अपनी संतान को सूखे में सुलाती है। मां को कितनी ही उपमाएं दी जाएं, कम हैं लेकिन गुरुवार को श्रीगंगानगर जिले के रामसिंहपुर क्षेत्र में जो हुआ, वह सोचने पर मजबूर करता है। दो माह की दूधमुंही बच्ची को लेकर ट्रेन के आगे आकर जान देने वाली मां ने सोचिए अपने कलेजे पर कितना बड़ा पत्थर रखा होगा। कल्पना कीजिए उस मां की संवेदनाओं ने किस कदर दम तोड़ा होगा। उसने अपने अहसासों का गला क्यों कर दबाया होगा। अपनी लाडली को लोरी व प्यार की थपकियों से सुलाने वाली मां ने अपनी गोद से उसे कैसे अलग किया होगा। बेटियों को कोख में मारने के मामले तो गाहे-बगाहे सामने आते रहते हैं। नौ माह अपने गर्भ में रखने वाली मां अचानक इतनी निर्दयी कैसे हो गई। और हादसे के बाद जो तस्वीरें सामने आईं, वे सचमुच बेहद मार्मिक हैं। ये तस्वीरें अंतर्आत्मा को कचोटती हैं। इनको देखकर अनायास की आंखें गमगीन हो उठती हंै। कोमल सी मासूम फूल सी बच्ची को देखकर यकीनन वहां मौजूद लोग उस मां को तथा उसके आत्मघाती फैसले को जरूर कोस रहे होंगे। मां मजबूर हो सकती है, लाचार हो सकती है। दुखी हो सकती है। बेबस हो सकती है। गुस्सा भी हो सकती है लेकिन मां इतनी कठोर दिल कैसे हो सकती है। यह कठोरता, यह निर्दयीता, यह बेरुखी, यह बेगानापन मां के लिए हो ही नहीं सकता। क्योंकि मां तो मां है। मोम की तरह मुलायम बिल्कुल ममता की मूरत।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 8 सितंबर 17 के अंक प्रकाशित

नेताओं का विकास प्रेम

इक बंजारा गाए 

श्री गंगानगर के पार्षदों का विकास के प्रति प्रेम जगजाहिर है। यह दीगर बात है कि शहर में विकास दिखाई नहीं देता है लेकिन विकास की बातें, विकास के वादे, विकास के लिए धरना-प्रदर्शन व ज्ञापन आदि में श्रीगंगानगर के पार्षद कोई कमी नहीं छोड़ते। सत्तारूढ़ भाजपा पार्षदों की ही बात करते हैं। दर्जनभर पार्षद ऐसे हैं, जो गाहे-बगाहे चर्चा में बने रहते हैं। इन दिनों भी यही पार्षद फिर चर्चा में है। जिले के प्रभारी मंत्री के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। बड़े से बैनर पर हस्ताक्षर करवा रहे हैं। प्रभारी मंत्री का गुनाह इतना सा है कि उन्होंने पार्षदों की बात नहीं सुनी। पार्षद उनको शहर की बिगड़ी व्यवस्था से अवगत कराने गए थे। बात सुन लेते तो क्या पता शहर की बिगड़ी व्यवस्था कुछ पटरी पर आ जाती लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बस तभी से पार्षद गुस्से में हैं। मंत्रीजी के खिलाफ गरिया रहे हैं। हस्ताक्षर करवा कर मुख्यमंत्री के पास भेजेंगे। इन हस्ताक्षरों से प्रभारी मंत्री की सेहत पर कितना व कैसा असर पड़ेगा, यह तो फिलहाल तय नहीं है, लेकिन शहर में दबे स्वर में चर्चा जरूर शुरू हो गई है। मसलन, शहर की बदहाली के लिए जिम्मेदार कौन है? जो काम विपक्ष को करना चाहिए, वह काम सतारूढ़ दल के पार्षद करें तो समझा जा सकता है शहर के हालात कैसे हैं। हस्ताक्षर अभियान चलाने वाले पार्षद या तो भूल जाते हैं या फिर जानबूझकर याद रखना नहीं चाहते लेकिन हकीकत यह है कि शहर की सरकार भी उनके समर्थन से ही चल रही है, जबकि सभापति का सतारूढ़ दल से छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। फिर पार्षदों को लगता है कि पार्टी के नेता उनकी नहीं सुन रहे हैं तो फिर ऐसी पार्टी के प्रति निष्ठा दिखाने का क्या फायदा। ऐसी पार्षदी फिर किस काम की। त्याग क्यों नहीं देते यह पद। यह शहर अच्छी तरह जानता है कि हस्ताक्षर करवाने वाले पार्षद वे ही हैं जो बीतें दिनों नगर परिषद में भ्रष्टाचार के आरोपितों के समर्थन में खड़े थे। क्या इनमें से एक भी पार्षद सावर्जनिक रूप से यह कहने का साहस रखता है कि उसने भ्रष्टाचार के आरोपितों का समर्थन क्यों व किसलिए किया? क्या पार्षदों की कोई मजबूरी थी या आरोपितों के साथ कोई जुगलबंदी, जो उनको सच का साथ देने से रोक रही थी। विकास के नाम राजनीति करनी है तो बात अलग है, वरना है यह पार्षदों का यह दोहरा चरित्र। सब जानते हैं।

राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 7 सितम्बर 17 अंक में यह कॉलम लगा है।

तब श्रीगंगानगर में बने थे हजारों जीमेल अकाउंट!


श्रीगंगानगर. जमाना डिजीटल है, लिहाजा सारा खेल ही लाइक्स व हिट का है। डेरा सच्चा सौदा भी डिजीटल की चकाचौंध से अछूता नहीं है। डेरामुखी खुद भी ट्वीटर व फेसबुक आदि प्लेटफार्म पर सक्रिय रहे हैं। उनके फॉलोअर की संख्या भी अच्छी खासी है। लाइक्स व हिट के इस खेल में श्रीगंगानगर भी शामिल रहा है। यह बात 2014 की है, तब डेरामुखी की पहली फिल्म एमएसजी आने वाली थी। इस फिल्म को लोकप्रिय बनाने तथा इसके प्रचार की रणनीति पहले ही तैयार कर ली गई। सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रचार-प्रसार के लिए श्रीगंगानगर व तहसील मुख्यालयों पर डेरे की आईटी टीम की ओर से बड़े पैमाने पर जीमेल अकाउंट खोले गए थे।
इस तरह खुले थे अकाउंट
मनोज (बदला हुआ नाम) ने बताया कि इस काम के लिए उनके इंस्टीट्यूट से पांच लैपटॉप किराए पर लिए गए थे। इसके अलाव नेट डाटा कार्ड भी लिए गए। गूगल क्रॉम वेब ब्राउजर में तीन-चार अकाउंट के बाद फोन नंबर मांगता है जबकि अन्य वेब ब्राउजर में फोन नंबर शुरुआत में ही मांग लिए जाते हैं। इस कारण अधिकतर अकाउंट गूगल क्रॉम वेब ब्राउजर में ही बने। हालांकि मनोज ने आशंका जताई कि इतनी बड़ी संख्या में अकाउंट खोले गए तो इनके लिए सिम भी खरीदी गई होंगी। यह जांच का विषय हो सकता है।
ट्रेलर को मिले हजारों लाइक्स
एमएसजी फिल्म का ट्रेलर यू ट्यूब पर मौजूद है। यह ट्रेलर दिसम्बर 2014 में अपलोड किया गया। इस ट्रेलर के 59 लाख से अधिक व्यूज हैं। इस ट्रेलर को 46 हजार से अधिक लाइक्स मिले हैं। इतना ही नहीं इसको 19 हजार डिसलाइक भी मिले। इस ट्रेलर पर 3449 कमेंट भी आए हैं। एमएसजी-2 को तो 68 लाख से ज्यादा व्यूज मिले हैं। इसको 26 हजार लाइक्स व 16 हजार डिसलाइक्स मिले हैं जबकि इस ट्रेलर पर 3832 कमेंटस भी आए हैं।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 6 सितम्बर 17 के अंक में प्रकाशित 

चौके-छक्कों के साथ यहां लगता है अट्ठा



श्रीगंगानगर. क्रिकेट की सामान्य सी समझने रखने वाले भी यह बात भली भांति जानते हैं कि इस खेल में चौके या छक्के का क्या महत्व है। लेकिन, यहां जिस शॉट की बात हो रही है वह क्रिकेट की दुनिया में इस्तेमाल ही नहीं होता। हो सकता है इस शॉट का नाम सुनकर आपकी हंसी ही ना रुके या फिर आप अचंभे में पड़ जाएं। खासतौर पर ईजाद किए गए इस शॉट को अट्ठा कहा जाता है। यह शॉट जुड़ा है दुष्कर्म के मामले में सजा काट रहे डेरामुखी बाबा गुरमीतराम रहीम सिंह से। सिरसा के शाह सतनाम क्रिकेट स्टेडियम में डेरा प्रमुख की तरफ से करवाई जाने वाली क्रिकेट प्रतियोगिता में बल्लेबाज चौके-छक्कों के साथ अट्ठा भी लगाता रहा है। दरअसल, इसमें गेंद अगर तय सीमा रेखा से डेढ़ गुना दूर चली जाए तो उसको अट्ठा कहा जाता है। प्रतियोगिता के इस अजीबोगरीब नियम को बाबा ने ही बनाया। बाबा खुद क्रिकेट खेलते तथा अट्ठा मारकर अपने भक्तों को रिझाते। बाबा का अ_े से संबंधित वीडियो भी यू ट्यूब पर मौजूद है।
तीन तरह की पिच है मैदान में 
सिरसा के शाह सतनाम क्रिकेट स्टेडियम में तीन तरह की पिचें बनाई गई हैं। इनमें एक दिल्ली, दूसरी बैंगलूरु तथा तीसरी सिरसा बेस है। इस स्टेडियम की क्षमता 30 हजार दर्शकों की बताई जाती है। इसका ग्राउंड 75 यार्ड का है। बताया जाता है कि यह स्टेडियम मात्र 14 दिन में बनकर तैयार हो गया था। स्टेडियम को तैयार करने में डेरे के करीब 14 हजार सेवादारों ने दिन-रात काम किया था। स्टेडियम में फ्लड लाइट भी है। यह स्टेडियम 2004 में बना था।
विराट के साथ डेरा मुखी की फोटो वायरल
इन दिनों सोशल मीडिया पर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली व डेरा मुखी का एक फोटो वायरल हो रही है। हालांकि यह फोटो काफी पुराना है। यहां भारतीय क्रिकेट के खिलाड़ी भी आ चुके हैं। इस मैदान को एक साल के भीतर ही रणजी ट्रॉफी के अनुकूल मान लिया गया। यहां विजय हजारे ट्रॉफी के मैच भी हुए। स्टेडियम में क्रिकेट अकादमी भी चलती है, जिसमें भारत के पूर्व टेस्ट खिलाड़ी जुड़े हुए हैं।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 5 सितम्बर 17 के अंक में प्रकाशित

काश, ऐसी हमदर्दी मेरे लिए भी दिखाते

 टिप्पणी 
मैं श्रीगंगानगर हूं। आपका अपना शहर। मेरी हालत व दशा देखकर लोग मुझे गंदानगर भी कहने लगे हैं। मुझे कभी चंडीगढ़ का बच्चा तो कभी बाप बनाने की बात भी कई बार उठी है लेकिन आज मेरी हालत धोबी के कुत्ते जैसे हो गई है। अफसोस की बात यह है कि मेरी इस हालात पर किसी को तरस नहीं आता। नेता, अधिकारी, समाजसेवी सबको अपनी ही फिक्र है। सब अपनी ही चिंता में मग्न हैं। वैसे मैं यह बात भली भांति जानता हूं कि श्रीगंगानगर के लोग शांत जरूर हैं, लेकिन समझदार व अपनी बात कहने से चूकते नहीं हैं। श्रीगंगानगर के लोग धारा के विपरीत चलने के लिए भी जाने जाते हैं। श्रीगंगानगर के लोगों की संघर्षशीलता व जुझारूपन के उदाहरण भी कम नहीं हैं। तभी तो छोटी-मोटी बातों के लिए यहां लोग एकत्रित हो जाएंगे। प्रदर्शन कर लेंगे। इतना सब हो रहा है लेकिन श्रीगंगानगर को गंदानगर बनने से रोकने के लिए ईमानदार प्रयास नहीं हो रहे हैं। मेरी बदहाल दशा सुधारने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। सोमवार को पुलिस वालों के समर्थन में आए लोगों को देखकर तो मैं सोच में डूबा हूं। मैं तय ही नहीं कर पा रहा हूं कि यह समर्थन क्यों व किसलिए किया गया? पुलिस अधीक्षक ने अपने मातहतों पर कार्रवाई कर भी दी तो यह उनकी जांच का विषय है। हो सकता है जिन पर कार्रवाई की गई है, वे कल जांच में पाक दामन भी साबित हो जाएं। पर बड़ा सवाल यह है कि पुलिस की इस विभागीय कार्रवाई में जनहित की उपेक्षा कहां हो गई। 
खैर, पुलिस से प्रेम रखने वालों को मेरी बात से पीड़ा हो सकती है, लेकिन कड़वी हकीकत यह भी है कि सोशल मीडिया पर हत्या का एक आरोपी रोज पुलिस के खिलाफ गरियाता है। खुलेआम धमकाता है। वहां तो सब चुप्पी साधे बैठे हैं। क्या वहां पुलिस की बदनामी या किरकिरी नहीं हो रही? पुलिस तो पुलिस है वह चाहे किसी भी थाने की हो। अपने लाडलों की पुलिस के प्रति इतनी सहानूभूति देखकर मेरे जेहन में कई सवाल खड़े हो गए हैं। मसलन, टूटी फूटी सड़कों से मेरा सीना छलनी है, तब तो आप में से कोई नहीं बोलता। श्रीगंगानगर शहर व जिले में आए दिन नशीली दवाओं के मामले उजागर होते हैं। सट्टे की बीमारी तो यहां लाइलाज-सी हो गई है। कितना बेहतर होता कि आप नशे के कारोबार करने वालों व सट्टा करने वालों की सूची पुलिस को सौंपते। समूचा शहर अतिक्रमण से परेशान है, आप कोई सकारात्मक पहल तो करते या गंदगी के खिलाफ ही जनजाग्रति की कोई मुहिम ही चलाते। यह सब नहीं कर सकते तो कम से कम शहर के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा ही कर लेते। 
मेरे लाडलो, पुलिस के अधिकारी तो आते-जाते रहेंगे लेकिन यह शहर यहीं रहेगा। आप सब को भी यहीं रहना है। आप छुटपुट मामलों की बजाय शहर हित में कोई ऐसा काम करो कि आने वाली पीढिय़ां आपको याद करें। कुछ समय के लिए मान भी लें कि दबाव में पुलिस वालों के खिलाफ कुछ गलत हुआ तो वह आपके समर्थन से ठीक होने से रहा। उल्टे आपके समर्थन करने से आप पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। दूध का दूध और पानी का पानी तो जांच में हो पाएगा, इसलिए मेरी तो आप सब से विनम्र गुहार है कि मुझे गंदानगर होने से बचाओ। भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे विकास कार्यों पर निगरानी रखो। सोचो, मुझे कितनी खुशी मिलती अगर आप इतनी सहानुभूति, हमदर्दी व अपनापन मेरे प्रति दिखाते।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 5 सितम्बर 17 को प्रकाशित

अंधभक्ति : आशीर्वाद देती है डेरामुखी की यह डे्रस!

श्रीगंगानगर. बात सुनने में भले ही अटपटी लगे लेकिन है यह सच। डेरा सच्चा सौदा से जुड़े अनुयायियों की डेरा प्रमुख के प्रति इतनी गहरी अंधभक्ति है कि वो बाबा के कपड़ों के हाथ लगाकर आशीर्वाद लेते रहे हैं। इतना ही नहीं डेरामुखी के इस्तेमाल किए या हाथ लगाए कपड़े, साबुन, जूते आदि भी उनके अनुयायी महंगे दामों पर खरीदते रहे हैं। इनको खरीदने के लिए बकायदा बाबा के अनुयायियों में होड़ मचती रही है। श्रीगंगानगर के एक नाम चर्चाघर में भी इसी तरह की एक ड्रेस रखी हुई है। बताया जाता है कि बाबा के समर्थक इसको छूकर आशीर्वाद लेते रहे हैं। इसी नाम चर्चाघर में डेरामुखी की जूतियां, एक अन्य डे्रस व गिफ्ट इत्यादि रखे हुए हैं। दीवार पर डेरे के तीनों प्रमुखों की तस्वीर भी लगी है।
यह लिखा है ड्रेस के नीचे
श्रीगंगानगर के नाम चर्चाघर में डेरामुखी की जो डे्रस रखी है। उसके नीचे जानकारी दी गई है कि, 17 जुलाई 2011 श्रीगंगानगर ब्लॉक के गठन पर संत गुरमीत राम रहीमसिंहजी इंसा द्वारा उनके स्वयं के वस्त्र अपने कर कमलों से आशीर्वाद के रूप में सप्रेम भेंट किए गए। इस फ्रेम के ऊपर धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा लिखा हुआ है।
सिरसा डेरे से लाए गए फल, सब्जियां, जूते, चप्पल, शैंपू, साबुन, टूथपेस्ट इत्यादि श्रीगंगानगर व इससे लगते पंजाब के क्षेत्र में यह कहकर बेचे जाते थे कि इन पर डेरामुखी का हाथ लगा हुआ है। बताया जाता है कि डेरा प्रेमी एक छोटी सी मिर्च के भी सौ दो सौ रुपए देने को तैयार हो जाते थे। सीजन में अमूनन 15-20 रुपए किलो बिकने वाला किन्नू चार सौ पांच सौ रुपए तक बिकता रहा है। इतना ही नहीं सिरसा से लाई सौ-सौ ग्राम घी की पैंकिंग भी काफी महंगे दामों पर बिकी। इस पैंकिंग के बारे में प्रचारित किया गया था कि यह डेरामुखी द्वारा तैयार की गई हैं।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 4 सितम्बर 17  में प्रकाशित 

खामोश एफबी पेजों को भी मिल रहे हैं लाइक्स...

श्रीगंगानगर. 'हमने सदा कानून का सम्मान किया है। हालांकि हमारी बैक (अंग्रेजी में) में दर्द है फिर भी कानून की पालना करते हुए कोर्ट जरूर जाएंगे। हमें भगवान पर दृढ़ यकीन है। इसलिए सभी शांति बनाएं रखें।' यह वो मैसेज है जो 24 अगस्त को डेरामुखी की ओर से फेसबुक व ट्विटर पर पोस्ट किया गया था। यह अलग बात है कि इस मैसेज की पालना कितनी हुई तथा डेरा समर्थकों ने कितनी शांति बनाए रखी। हां इतना जरूर है कि जिस फेसबुक व ट्विटर अंकाउट से यह मैसेज पोस्ट किया गया था। वहां अब खामोशी है। 24 अगस्त के बाद से वहां से कोई अपडेट नहीं है। फेसबुक पर सेंट डॉ. एमएसजी के नाम से बने इस पेज को साढ़े सात लाख से ज्यादा लोग पसंद करते हैं। इधर, बाबा की कथित दत्तक पुत्री हनीप्रीत का फेसबुक पेज तो 15 अगस्त के बाद से ही अपडेट नहीं है। बढ़ रहे हैं एफबी
पेजों के लाइक्स
डेरा मुखी व हनीप्रीत के नाम से बने फेसबुक पेजों को लाइक्स करने वालों की संख्या बढ़ रही है। सेंट डॉ. एमएसजी के फेसबुक पेज पर शनिवार सुबह 11 बजे तक 7 लाख, 58 हजार 280 लाइक्स थे, जिनकी संख्या शाम साठ बजे बढ़कर 7 लाख, 58 हजार 420 हो गई। इसी तरह, हनीप्रीत इंसा के नाम से बने फेसबुक पेज के शनिवार सुबह 5 लाख 24 हजार 504 लाइक्स थे जो शाम साढे आठ बजे 5 लाख 25 हजार 060 हो गए।
आखिरी पोस्ट
पर हजारों लाइक्स-कमेंट्स
डेरा मुखी व हनीप्रीत के फेसबुक पेज आखिरी पोस्ट को हजारों लोगों ने न केवल लाइक्स किए बल्कि बड़ी संख्या में शेयर व कमेंटस भी किए गए हैं। डेरा मुखी के 24 अगस्त की आखिरी पोस्ट को 18 हजार लाइक्स मिले हैं। इस पोस्ट पर 9 हजार 854 कमेंट्स आए हैं जबकि इसको 3341 लोगों ने शेयर किया है। इसी तरह, हनीप्रीत के पेज पर 15 अगस्त की आखिरी पोस्ट को दो हजार लाइक्स मिले हैं। इस पोस्ट पर 683 कमेंट्स आए
हैं जबकि 119 लोगों ने शेयर
किया है।
बाबा का ट्विटर अकांउट सस्पेंड
24 अगस्त को डेरामुखी के ट्विटर अकाउंट डॉ. गुरमीत राम रहीम पर जो मैसेज पोस्ट किया था वह अकाउंट अब सस्पेंड कर दिया है। 24 अगस्त को यह अकाउंट सक्रिय था लेकिन अब यह बंद है। इंटरनेट पर सर्च करने पर इस अकाउंट को इंडिया में सस्पेंड कर दिया गया। इस अकाउंट के 38 लाख फालोअर्स थे लेकिन डेरामुखी को सजा के बाद इसमें दो लाख फालोअर्स कम हो गए। विदित रहे कि डेरे की तरफ से अभियान चलाकर डेरामुखी के ट्विटर का प्रचार-प्रसार किया गया था। डेरे की आईटी टीम की ओर से विभिन्न शहरों में शिविर लगाकर अकाउंट चलाने की जानकारी दी गई थी।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 3 सितंबर 17 के अंक में प्रकाशित 

बारिश, बचाव और बयान

टिप्पणी
बारिश के बाद अब बयानों की बारिश हो रही है। जिम्मेदार अपने बचाव में बचकाने व बेतुके बयान देकर खुद को पाक दामन साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। कभी पहले तो कभी बाद में। कभी थोड़ी कम तो कभी थोड़ी ज्यादा लेकिन बारिश तो हर साल ही आती है और शहर के हालात कमोबेश हमेशा ही ऐसे होते हैं। इतना ही नहीं बचाव में बयान या दलीलें भी हर बार इसी तरह की ही दी जाती हैं। फलां कॉलोनी में पंप लगाकर हमने पानी निकासी करवाई है। हमने खुद के खर्चे पर यह काम करवाया। हमने मौके का निरीक्षण किया आदि आदि। यह पंरपरागत बयान सुन सुनकर लोगों के कान पक चुके हैं। इस तरह के तात्कालिक उपायों के कारण पानी निकासी के ठोस समाधान की हमेशा अनदेखी होती रही है। जिम्मेदारों का ध्यान भी अक्सर तात्कालिक उपाय कर सस्ती लोकप्रियता पाने पर ही ज्यादा रहता है। बयानवीर जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को बयानों के साथ बहाने भी खूब आते हैं। मसलन, हमने तो पहले ही कह दिया था। हम क्या कर सकते हैं हालात ही ऐसे मिले थे। इतने सालों से ही कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा। हमारे पास कोई जादू थोड़े ही है। हमसे पहले वाले जनप्रतिनिधियों-अधिकारियों ने कुछ नहीं किया। आदि-आदि। यह सब एक तरह से जिम्मेदारी से मुंह मोडऩे के बहाने हैं। बारिश से बदहाल व बेचैन शहर को बेवकूफ बनाने के आसान उपाय हैं। इस तरह की बातें वो ही करते हैं, जो अपनीे जिम्मेदारी से भाग रहे हैं या जिनके पास विकास का विजन नहीं है। या फिर जिनके पास कोई दीर्घकालीन योजना नहीं है। कभी किसी तो किसी विभाग में तबादले करवाने तथा जिले या शहर से बाहर नहीं जाने वाले अधिकारियों ने इस समस्या को तो नजदीक से देखा व भोगा है। जब उनको इस शहर से इतना मोह है तो वे शहरवासियों की समस्याओं से अनजान क्यों बने हैं? जनप्रतिनिधि तो चुनाव ही विकास के नाम पर लड़ते हैं। शहर की सूरत देखकर ही वो बता दें कि यह कैसा व किस तरह का विकास है? बहरहाल, बारिश के इस मौसम में जनहित से जुड़े इस मसले में अब बहानों व बयानों से बात नहीं बनेगी। समय काफी हो चुका है। यह शहर अब समस्या का स्थायी समाधान चाहता है। जिम्मेदार अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस समस्या का समाधान खोजना ही होगा।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण में 3 सितंबर 17 के अंक में प्रकाशित 

Tuesday, November 14, 2017

लेकिन वो बात अब कहां.

 'इक बंजारा गाए
हम श्रीगंगानगर के लोग, जितने मस्तमौला हैं, उतने ही शायद भुलक्कड़ भी हैं। हम भूल बहुत जल्दी जाते हैं। हमारी यही आदत यहां आने वाले अधिकारियों में भी बहुत जल्दी घर कर जाती है। या यूं कह लीजिए यहां आने वाले अधिकारी भी हमारी संस्कृति व आचार-विचार आदि में इतने रच बस जाते हैं कि उनको देखकर लगता ही नहीं कि वे श्रीगंगानगर से बाहर के हैं। सांड की टक्कर से मोटरसाइकिल सवार एक वरिष्ठ नागरिक की मौत का मामला ज्यादा पुराना नहीं है। इतना तो याद ही होगा कि साक्षात मौत के इस वीडियो को देखकर रोंगटे खड़े गए थे। यह वीडियो अगर याद है तो इस मौत के बाद उपजे आक्रोश तथा नगर परिषद व जिला प्रशासन की वह तत्परता भी थोड़ी बहुत याद होगी। किस तरह हम लोगों ने अधिकारियों पर दबाव बनाया और फिर प्रशासनिक नुमाइंदों ने निराश्रित गोवंश की धरपकड़ शुरू की। सप्ताह भर तक तो यह काम ठीक ठाक चला लेकिन इसके बाद यह नेपथ्य में चला गया। जानमाल की सुरक्षा से जुड़ा यह मसला एक तरह से दरकिनार कर दिया गया। हम लोग तो भूले ही प्रशासनिक अधिकारियों की दिलचस्पी भी कम होती चली गई। हां, उस वक्त प्रशासन ने शहर ही नहीं समूचे जिले को निराश्रित गोवंश से मुक्ति दिलाने का दावा जरूर किया था। दावा भी भला अब किसको याद होगा। भूलने की आदत जो है! हालत देखिए शहर की सड़कों पर गोवंश अब भी इतनी ही स्वच्छंदता के साथ विचरण कर रहा है। सड़कों पर इनकी संख्या देखकर लगता ही नहीं है कि कोई कार्रवाई हुई भी थी क्या?
कभी कभी तो यह भी लगता है कि पकड़ा गया और गोशालाओं में भेजा गया गोवंश कहीं फिर से बाहर तो नहीं आ गया? पर अब सब चुप हैं। प्रशासन की स्मृति से यह तो मसला संभवतया गायब ही हो चुका है। और इधर, हम लोग भी लंबी तान के सोने में मशगूल हैं। यह चुप्पी व नींद तभी टूटेगी, जब फिर कोई नया हादसा होगा। हम फिर गुस्सा होंगे। हमारा आक्रोश देखकर ही तो प्रशासन को याद आएगा। वैसे भी जिस शहर में प्रजा और प्रशासन दोनों ही एक जैसे हो जाते हैं, वहां फिर व्यवस्थाएं ठीक से काम नहीं करती।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर के आज यानि 31 अगस्त के अंक में प्रकाशित

यह शहर है अमन का

टिप्पणी
यह शहर अमन का है तो सामाजिक समसरता का भी है। यह शहर साझा संस्कृति का है तो भाईचारे को जिंदा रखने वालों का भी है। यह शहर जोश व जज्बे वाले लोगों का भी उतना ही है, जितना इंसानियत व मानवता में विश्वास करने वालों का है। यह शहर अमनपसंद व मेहनतकश लोगों का है। यहां की सेवा भावना की तो अक्सर मिसालें दी जाती हैं। एक दूसरे के दुख-दुख दर्द में काम आना यहां के खून में है। खूबियों व खासियतों से परिपूर्ण इस तरह के शहर में शांति भंग होना किसके हित में है? कोई भी अफवाह भला यहां किसको राहत देगी? किसी तरह का भय व दहशत के माहौल में कौन चैन की सांस ले पाएगा? गणेश चतुर्थी जैसे पुनीत मौके के दिन जिस तरह सेशहर की शांति को भंग करने के मामले सामने आए हैं, वह न केवल चिंताजनक हैं बल्कि सोचने पर मजबूर भी करते हैं। पुरुषार्थ व परोपकार जैसे फलसफे में विश्वास करने वाले लोगों के बीच इस तरह की बातें खटकती हैं, कचोटती हैं। इस तरह के हालात में चुप बैठने के बजाय सद्भाव बढ़ाने के प्रयास और तेज होने चाहिएं। यह समय विश्वास को और ज्यादा प्रगाढ़ करने का है। यह समय प्रतिकूल परिस्थितियों का धैर्य के साथ सामना करने तथा और अधिक मजबूती से उठने का है। यह समय कानून व संविधान का सम्मान करने वालों के समर्थन का तथा व्यवस्था को बनाए रखने का है। यह समय सतर्क व चौकन्ना रहने का भी है। हम सब शहर के लोग हैं। हमेशा साथ-साथ रहते आए हैं। शहर का अमन-चैन हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी है। भला यह कौन चाहेगा कि मन में खटास पैदा हो। दूरियां बढ़ें। क्योंकि यह शहर भी यहीं रहेगा और शहर के लोग यहीं रहेंगे। लेकिन एेसी कोई खाई हम सबके बीच न हो। हमारे सद्भाव व भाईचारे पर एेसा कोई धब्बा न लगे जो बाद में शर्मसार करे। जिसकी टीस जिंदगी भर हमको व बाद में आने वाली पीढि़यों को सालती रहे। हम तो हमेशा दूसरों का भला करने की सोचने वाले लोगों मंे से हैं। तुलसीदास जी ने कहा भी है- 
परहित सरिस धर्म नहीं भाई,
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।
मतलब दूसरे की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरे को कष्ट देने के समान कोई और अधर्म, कोई और पाप कोई और नीचता नहीं है। परहित को सर्वोपरि मानने के इस जज्बे को बनाए रखें, मानवता को जिंदा रखें। भाईचारे को कायम रखें। यही तो हम सब की पहचान है। बस कुछ दिन धैर्य बनाएं रखें और अफवाहों पर बिल्कुल भी ध्यान न दें। आपका आज का धैर्य ही इस शहर के अमन, यहां की परम्परा, संस्कृति और सभ्यता को जीवंत बनाएगा।
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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 26 अगस्त 17 के अंक में प्रकाशित 

श्रीगंगानगर में कारगर नहीं रहा 'रोड डवलपमेंट कार्ड'

यह मामला बड़ा रोचक है। इसमें मुआवजे का निर्धारण सरकार के नुमाइंदों ने किया। बाद में उनको लगा कि यह निर्धारण तो ज्यादा है। सुनवाई हुई और मुआवजे की राशि कम हो गई। सरकारी नुमाइंदों को यहां भी संतोष नहीं हुआ, उनको लगा यह राशि भी ज्यादा है तो फिर से सुनवाई की गई। विधानसभा तक में घोषणा कर दी गई लेकिन मामला फिर अटक गया। अब फैसला 28 अगस्त को आएगा। देखना है सरकारी नुमाइंदे इस राशि को मानते हैं या फिर सुनवाई का राग अलापेंगे। कुछ इन्ही बिन्दुओं पर केन्द्रित है मेरी यह खबर जो,हुई है।
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नेशनल हाइवे-62 का मामला
तीन बार हो चुका है मुआवजे का निर्धारण
226 करोड़ से घटकर 139 करोड़ तक पहुंचा
श्रीगंगानगर. उदयपुर में 29 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रोड डवलपमेंट कार्ड का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलेगा या नहीं, यह तो अभी तय नहीं लेकिन श्रीगंगानगर में रोड डवलमटमेंट से ही जुड़ा एक मामला न केवल साढे़ तीन साल से अधूरा है, बल्कि मुआवजे के लिए किसानों को खून के आंसू भी रुला रहा है। किसानों को मुआवजे के रूप में फूटी कौड़ी तक नहीं मिली। इसके विपरीत मुआवजा तीन बार तय चुका तथा 226 करोड़ से घटाकर 139 करोड़ कर दिया गया है। भूमि अवाप्ति अधिकारी तथा नेशनल हाइवे ऑथारिटी के बीच अटके इस मामले में नुकसान किसानों को रहा है। देरी की वजह से इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की लागत बढऩा भी तय है। इस मामले में आबर््िाटेटर की सुनवाई में दर्जनभर से अधिक तारीखें पड़ चुकी हैं लेकिन फैसले का इंतजार है। किसान मुआवजे के लिए कई बार धरना प्रदर्शन कर चुके हैं।
साल पहले उद्घाटन, चार माह पहले टोल
विडम्बना देखिए कि हाइवे का काम अभी अधूरा है लेकिन इसका उद्घाटन हो चुका है और इस पर टोल टैक्स भी चालू हो गया है। पिछले साल 17 अगस्त को प्रदेश की मुख्यमंत्री तथा केन्द्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्री नितिन गड़करी उद्घाटन कर चुके हैं। इतना ही नहीं इस मार्ग पर करीब चार माह पूर्व टोल भी शुरू कर दिया गया है।
किसानों को सता रहा डर
प्रभावित किसानों का कहना है कि वे इस मामले में वे किसी भी स्तर पर पार्टी नहीं है। मुआवजा निर्धारण करने में भी उनकी कोई भूमिका नहीं है। मुआवज देने तथा निर्धारण का काम सरकार को ही करना है। हर बार मामला भूमि अवाप्ति अधिकारी व नेशनल हाइवे ऑथोरिटी के बीच अटक जाता है। हर बार सुनवाई होती है लेकिन नेशनल हाइवे ऑथोरिटी आपत्ति लगा देता है। किसानों को इस बार भी यकीन नहीं है कि नेशनल हाइवे ऑथोरिटी (एनएचए) आगामी फैसले पर भी सहमत होगा, उनको इसी बात का डर सता रहा है। किसानों का कहना है कि तीन साल से न तो वे जमीन में बुवाई कर पा रहे हैं न ही उनको मुआवजा मिला है।
फैक्ट फाइल
कांडला से पठानकोट को जोडऩे वाले नेशनल हाइवे 62 के पुननिर्माण का है मामला।
सरकार ने इसके लिए 1अपे्रल 2014 को किसानों की करीब 56.91 हैक्टेयर भूमि अधिग्रहित की थी।
करीब चार सौ किसानों से जुड़ा हुआ है मामला।
नोटिफिकेशन 24 जनवरी 2016 को जारी किया गया।
एडीएम सूरतढ़ ने 10 फरवरी 2016 में 225.89 करोड़ मुआवजे अवार्ड पारित किया।
एनएचए की आपत्ति पर ऑबिटेटर व तत्कालीन जिला कलक्टर ने इसे घटाकर 195 करोड़ कर दिया।
इसी मुआवजे में 26 मार्च 2017 को फिर कटौती करते हुए इसे 139 करोड़ कर दिया गया।
इसी मुआवजे की 28 मार्च 2017 को विधानसभा में भी घोषणा की गई थी।
हाइवे का नेतेवाला से साधुवाली तक करीब 14 किमी काम अभी भी अधूरा।
श्रीगंगानगर शहर के लिए बाइपास का काम करेगा यह हाइवे।
सुनवाई का काम पूरा हो चुका है। 28 अगस्त को फैसला सुना दिया जाएगा। इसके बाद 30 अगस्त को रिपोर्ट नेशनल हाइवे ऑथोरिटी को भेज दी जाएगी। आगे का फैसला वहीं से होना है।
ज्ञानाराम,
जिला कलक्टर, श्रीगंगानगर
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 25 अगस्त 17 के अंक में प्रकाशित 

एनओसी और आरोपों की हो जांच

शहर के वार्ड 34 के लोगों के संघर्ष का परिणाम रंग लाया। सप्ताहभर से वार्डवासी पार्षद के घर पर लग रहे एक मोबाइल टावर का विरोध जता रहे थे। आखिरकार विरोध व एकजुटता को देखते हुए नगर परिषद को टावर लगाने की कवायद रोकनी पड़ी। यह मामला महत्वपूर्ण इसीलिए है, क्योंकि यह लोगों की एकजुटता की जीत है। विरोध मोबाइल टावर का तो था ही इसकी एक बड़ी वजह जनप्रतिनिधि के घर पर लगना भी था। वह जनप्रतिनिधि जो वार्डवासियों के वोटों से जीता और उन्हीं को अंधेरे में रखकर यह टावर लगवाया जा रहा था। ऐसे में लोगों का गुस्सा बढऩा स्वभाविक था। टावर लगवाने के लिए भले ही पार्षद ने नगर परिषद से अनुमति (एनओसी) ली हो यह अलग विषय है लेकिन इसके गुपचुप तौर-तरीकों ने लोगों के विरोध को बढ़ाया। 
जनप्रतिनिधि शुरू में ही अगर खुद चलाकर ही वार्डवासियों की बात को स्वीकार कर लेते तो उनका कद बढ़ जाता। आज इस तरह किरकिरी तो नहीं होती। बहरहाल, वार्ड के लोग बधाई के पात्र हैं कि वे अपनी बात पर अडिग रहे और परिषद अधिकारियों को अंतत: उनकी बात माननी पड़ी। वाकई यह जीत जनता जनार्दन की है। यह जीत कई मायनों में अलग है। यह एकजुटता एक तरह की नजीर है। 'मेरा क्या लेता है।' 'मेरा क्या जा रहा है।' 'जब सामने वाला ही नहीं बोल रहा है तो मैं क्यों बोलूं। जैसी मानसिकता में जीने वालों को यह जीत दर्पण दिखाती है। और हां, इस तरह के संघर्ष केवल टावर तक ही सीमित नहीं होने चाहिए। जहां भी जनता के हितों की अनदेखी हो वहां इसी तरह एकजुटता से पेश आना चाहिए। जनता जिस दिन जिम्मेदारों से सवाल जवाब करेगी, उनको कठघरे में खड़ा करना शुरू करेगी, नि:संदेह आधी समस्याओं का निस्तारण स्वत: हो जाएगा। परिषद व प्रशासन इस बात से सबक जरूर लें कि इस तरह के मामलों में अनुमति जारी करने से पहले जनता का पक्ष भी जरूर जान लेना चाहिए। अगर यह नहीं जाना जाता या जानने में किसी तरह की चालाकी की जाती है तो जिला प्रशासन को पड़ताल कर संबंधितों के खिलाफ कार्रवाई करने से नहीं हिचकना चाहिए। इतना ही नहीं परिषद के नुमाइंदों पर मिलीभगत के जो आरोप सरेआम लगे हैं, उनकी जांच कर सच्चाई को सार्वजनिक करने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 24 अगस्त 17 के अंक में प्रकाशित 

सकारात्मक सोच से संवरी गांव की सूरत


श्रीगंगानगर. 'मान लो हार है और ठान लो तो जीत है। जीवन के फलसफे से जुड़ी इस कहावत को चरितार्थ करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। जिले की पदमपुर पंचायत समिति की ग्राम पंचायत घमूड़वाली के सरंपच राजाराम जाखड़ भी अच्छा करने की ठानने वाले विरले शख्सों में शामिल हैं। उनकी सकारात्मक सोच का ही नजीता है कि साफ-सफाई, स्वच्छता व हरियाली के मामले में घमूड़वाली न केवल जिले बल्कि समूचे बीकानेर संभाग में अपनी धमक रखता है। स्वच्छता के मामले में इस ग्राम पंचायत को पिछले दिनों संभाग स्तर पर सम्मानित भी किया गया।
घमूड़वाली ग्राम पंचायत का कार्यालय अपने आप में अनूठा है। बाहर से देखने पर यहां हरियाली दिखाई देगी। कार्यालय परिसर में ही बड़ा पार्क है, जिसमें छायादार पेड़ व मखमली दूब है। बैठने की व्यवस्था है तो शाम को फव्वारे भी चलते हैं। लोग यहां सुबह-शाम घूमने आते हैं। कार्यालय के भीतर का नजारा तो किसी कॉरपोरेट ऑफिस से कम नहीं। समूचा कक्ष वातानुकूलित है। बिजली गुल होने पर सोलर ऊर्जा से आपूर्ति होती है। बैठकें, प्रशिक्षण व कार्यशाला आदि के लिए फर्नीचरयुक्त बड़ा हॉल भी है। इतना ही नहीं है मेहमान के लिए रेस्ट हाउस है। इसमें डबल बैड, एसी, टीवी व अटैच लेट-बाथ है। शीघ्र ही पंचायत भवन में पुस्तकालय भी शुरू होने वाला है।
गांव के 80 प्रतिशत रास्ते पक्के
घमूड़वाली गांव के करीब 80 प्रतिशत रास्ते पक्के हैं। चौक हो या रास्ता सभी जगह इंटरलोकिंग की गई है। गांव में नाली नहीं है। इसके लिए घरों के आगे सोखते गड्ढे (कुइयां) बना दी गई हैं। गांव से गुजरने वाले रास्ते पर फुलवारी लगाकर रैलिंग लगाई गई है। गांव में मॉडल तालाब भी बनाया गया है। वहीं, गांव का मुक्तिधाम भी हरा-भरा है। वहां भी सौन्दर्यीकरण किया गया है।
पिताजी ने नहीं करने दी नौकरी
जाखड़ घमूड़वाली ग्राम पंचायत के दूसरी बार सरपंच बने हैं। इससे पहले 2005 से 2010 तक भी वे सरपंच रहे। इससे पहले वे जिला परिषद सदस्य तथा क्रय-विक्रय सहकारी समिति रिडमलसर के चैयरमैन रहे। राजाराम ने 1982 में अजमेर के राजकीय महाविद्यालय से एमए की लेकिन उनके पिता ने नौकरी नहीं करने दी। इसके बाद राजाराम ने राजनीति को ही सेवा का माध्यम बनाया। शेष रहे कार्यकाल में सरपंच की प्राथमिकताओं में इंटरलोकिंग का अधूरा काम पूरा करवाना, स्कूल भवन का जीर्णोद्धार, स्ट्रीट लाइट तथा सड़क के दोनों तरफ फुटपाथ बनाना है।
शुद्ध पानी के लिए यूरो सिस्टम
ग्रामीणों को शुद्ध व स्वच्छ पानी मिले, इसके लिए पंचायत कार्यालय में एक लाख रुपए की लागत से यूरो सिस्टम लगाया गया है। इसकी क्षमता चार हजार लीटर है। इसके लिए दो टंकियां रखी गई हैं। नहर का पानी यहां डिग्गी में आता है। डिग्गी से पानी फिल्टर करने के बाद टंकियों में डाला जाता है।
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ाजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 24 अगस्त 17 के अंक में प्रकाशित

आर्थिक अभावों पर शिक्षा के उजियारे की जीत


श्रीगंगानगर. आर्थिक दृष्टि से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली विद्यार्थी आगे की पढ़ाई किस तरह से जारी रखें तथा उनको स्वावलंबी कैसे बनाया जाए? यह दो ज्वलंत सवाल कमोबेश देश के हर छोटे या बड़े शहर में किसी न किसी रूप में जरूर मिल जाएंगे, लेकिन श्रीगंगानगर में इन दोनों सवालों का जवाब आज से 29 साल पहले ही खोज लिया गया था। तब छोटे स्तर पर शुरू हुई यह सकारात्मक पहल अब वटवृक्ष का रूप ले चुकी है। आर्थिक रूप से कमजोर सात हजार से अधिक विद्यार्थियों ने विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति से जुड़कर अपना भविष्य सुनहरा किया है। इनमें कई तो आरजेएस, इंजीनियर, व्याख्याता, डॉक्टर तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में मैनेजर तक बन चुके हैं। आठवीं तक संचालित इस स्कूल में फिलहाल करीब 300 बच्चे अध्ययनत हैं।
दानदाताओं की लंबी सूची
23 अक्टूबर 1988 को श्रीगंगानगर के एसजीएन खालसा महाविद्यालय के प्राध्यापक श्यामसुंदर माहेश्वरी की अगुवाई में विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति बनी, जिसमें समाज के गणमान्य नागरिकों ने सहयोग किया। वर्तमान में इस संस्था का सहयोग करने वालों की फेहरिस्त लंबी है। शिक्षा का उजियारा फैलाने के इस पुनीत के काम के लिए प्रो. माहेश्वरी को 2009 में पदमश्री से नवाजा जा चुका है।

निजी स्कूलों से कम नहीं है
दानदाताओं के सहयोग से बना विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति उच्च प्राथमिक स्कूल का भवन निजी स्कूल भवनों से कमत्तर नहीं। स्कूल में बच्चों के लिए टाट-पट्टी के बजाय फर्नीचर है। हर कक्षा-कक्ष में पंखे लगे हैं। विद्यालय परिसर में जगह-जगह स्लोगन लिखे हैं। विद्यार्थियों के लिए गणवेश, जूते, बस्ता व पढ़ाई सब नि:शुल्क है। यह विद्यायल भवन 1999 में बना। शिक्षा के साथ सिलाई, संगीत व कम्प्यूटर भीस्कूल में शिक्षा के साथ छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक कालांश सिलाई प्रशिक्षण का भी है। इसमें बाहर की जरूरतमद महिलाएं भी प्रशिक्षण ले सकती हैं। उनके लिए यह नि:शुल्क है। कम्प्यूटर लैब है तो संगीत की शिक्षा भी दी जाती है। स्कूल परिसर में एक पुस्तकालय भी है, जिसमें करीब तीन हजार किताबें हैं।
होती है बेहद खुशी
जरूरतमंद बच्चे समिति के प्रयासों से जब पढ़ लिखकर आत्मनिर्भर बनते हैं तो बेहद खुशी होती है। आठवीं तक तो बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं। आगे की पढ़ाई का खर्चा समिति वहन करती है। विद्यालय संचालन में शहर के दानदानाओं का योगदान है। समिति के सहयोग से पढ़े कई विद्यार्थी भी आत्मनिर्भर बन कर अब समिति की मदद कर रहे हैं। यह सब देखकर सुकून मिलता है।प्रो. श्यामसुंदर माहेश्वरी, सचिव, विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति, श्रीगंगानगर।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण में 13 अगस्त 17 को प्रकाशित

बेहद साधारण शख्स

 यह शख्स बेहद साधारण हैं, लेकिन इनकी सोच व काम बड़ा है। इसी काम के बूते 2009 में उनको पदमश्री से नवाजा गया था। यह फोटो श्री श्यामसुंदर माहेश्वरी जी का है। आज एक कार्यक्रम के सिलसिले में माहेश्वरी जी पत्रिका कार्यालय में आमंत्रित किए गए थे। इस दौरान इनसे रूबरू होने का मौका मिला। हालांकि नाम पहले सुन चुका था लेकिन मुलाकात आज ही हुई। करीब घंटे भर के संवाद में उनसे काफी बातें साझा कीं। माहेश्वरी जी मूलत:
्रीगंगानगर में कॉलेज में कॉमर्स विषय के व्याख्याता रहे हैं। इन्होंने श्रीगंगानगर में रहते 1988 में दबे-कुचले व मुख्यधारा से कटे बेहद गरीब घरों के बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया। माहेश्वरी जी का यह छोटा काम आज वट वृक्ष बन चुका है। इनके द्वारा विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति के नाम से बनाई गई संस्था है जो कि वर्तमान में आठवीं तक का एक स्कूल चलाती है। स्कूल में पढऩे वाले बच्चे बेहद गरीबों परिवारों के ही हैं। इनकी गरीबी का आकलन माहेश्वरी जी खुद बच्चों के घर जाकर करते हैं। घर के हालात से ही तय होता है कि बच्चा गरीब है। और हां प्रवेश के लिए सिफारिश किसी की नहीं चलती है। जो मापदंड तय हैं उन पर खरा उतरने वाला ही प्रवेश का हकदार होता है। स्कूल में पढाई, किताब, डे्रस, जूते आदि का तमाम खर्चा समिति ही उठाती है। वर्तमान में इस स्कूल में तीन सौ के करीब छात्र हैं। सबकी शिक्षा निशुल्क है। इस स्कूल से अब तक सात हजार से ज्यादा बच्चे शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं। खास बात है कि इस स्कूल से निकले विद्यार्थियों में से कोई जज है तो कोई डाक्टर है। कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे ओहदे पर हैं तो कोई आयकर विभाग में है। अपने शिष्यों की उपलब्धि पर इस गुरु को जिस आनंद की अनुभूति होती है उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। एक खास बात और माहेश्वरी जी ने कभी खुद के नाम या फोटो का मोह नहीं रखा। वो भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं और साथ ही यह भी कहते हैं इस प्रकृति ने, इस धरती ने तथा इस देश में मेरे का बहुत दिया है, ऐसे में मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं भी कुछ देऊं। वाकई माहेश्वरी जी का यह योगदान अनुकरणीय व प्रेरणास्पद है। उम्र के 65 बसंत देख चुके माहेश्वरी जी का जुनून व जज्बा देखते ही बनता है। सौ सौ सलाम इस गुरु को। स्कूल, इसके विद्यार्थियों व इसकी खासियत पर भी जल्द ही लिखूंगा..।

पत्थर भी मारो तो झुंझुनूं के बंदे को लगेगा...


बस यूं ही
काफी दिनों से कुछ लिखा नहीं। प्रमुख वजह तो काम की व्यस्तता ही रही। कोई रोचक विषय भी नहीं मिला। खैर, अपनी बात एक चर्चित जुमले से करता हूं। आप देश या दुनिया में कहीं पर भी चले जाओ आपको झुंझुनूं का आदमी मिल ही जाएगा। इसको इस तरह भी कहते हैं कि भरी भीड़ में पत्थर मारो तो एक दो जने झुंझुनूं के निकल ही जाएंगे, जिनके पत्थर लगेगा। मेरे साथ एेसे कई अनुभव हो चुके हैं, जहां भी गया झुंझुनूं का आदमी टकरा ही गया। हां समय के साथ किसी के नाम जरूर भूल गया हूं लेकिन घटनाक्रम याद हैं। बीए तक की शिक्षा तो झुंझुनूं में हुई। इसके बाद पत्रकारिता के सिलसिले में बाहर निकला तो भोपाल में रूम पार्टनर जो मिला वह झुंझुनूं के पौंख गांव का ही था। पत्रकारिता का प्रशिक्षण पूरा कर श्रीगंगानगर आया तो यहां एक दो जने तो गांव के ही मिल गए। एक और शख्स भडौंदा खुर्द के मिले। उस वक्त रिको में रहते थे। इसके बाद अलवर गया तो वहां भी हेजमपुरा के एक परिवार से परिचय हुआ संयोग से उनकी रिश्तेदारी भी गांव में निकल आई। सीकर व झुंझुनूं काम किया तो यहां तो झुंझुनूं के लोग मिलने ही थे। झुंझुनूं के बाद छत्तीसगढ़ बिलासपुर गया। संयोग देखिए जहां मकान किराये पर लिया उसी की बगल मे रहने वाले चिकित्सक नवलगढ़ के थे। पत्रिका में काम करने वाले एक युवती भी झुंझुनूं की निकली। एक दो संवाददाता भी एेसे मिले जिनके पूर्वज झुंझुनूं से पलायन कर बिलासपुर पहुंचे थे।। इसके बाद भिलाई आया तो वहां भी पौंख के सज्जन मिले। नाम भूल रहा हूं लेकिन इतना याद है कि उनका ससुराल और मेरा ससुराल भी एक ही निकला। वो काफी समय से भिलाई में रहते हैं, वहीं पर मकान बना लिए। भिलाई से बीकानेर आया, वहां तो झुंझुनूं के लोगों की भरमार है। और तो और गांव के भी सात आठ परिवार रहते हैं।
इसी बीच 2010 का वाकया याद आ रहा है। एक कार्यक्रम के सिलसिले में गुजरात के अहमदाबाद जाना हुआ। जयपुर से जो बस पकड़ी उसके परिचालक की आवाज जानी पहचानी लगी और तपाक से पूछ लिया, भाई झुंझुनूं का है के। उसने हां कहा झट से गांव पूछ लिया। उसने कहा ककडे़ऊ। मैंने फिर पूछ लिया छोटा या बड़ा। खैर, अहमदाबार से जब लौट रहा था और टिकट खिड़की पर गया तो काउंटर पर बैठे व्यक्ति के लहजे से ही समझ गया कि यह झुंझुनूं का है। आत्मविश्वास के साथ पूछ लिया तो वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया और स्वीकृति में सिर हिला दिया। वह मंडावा क्षेत्र का निकला।
बहरहाल, बीकानेर से श्रीगंगानगर आ गया। यहां पुलिस, नर्सिंग में झुंझुनूं के लोगों की भरमार है ही। पीडब्ल्यूडी व सर्किट हाउस में भी झुंझुनूं के लोग हैं। ताजा मामला शनिवार पांच अगस्त का है। मैं अपने सहयोगियों के साथ रायसिंनगर से श्रीगंगानगर लौट रहा था। श्रीगंगानगर बाइपास पर यातायात पुलिस के जवान ने हमारी कार को रोक लिया और कागजात मांगे। मैं जब उतर के उनके पास गया तो उन्होंने मेरा परिचय पत्र देखा। करीब पांच मिनट के वार्तालाप के बाद एक जने ने मेरे परिचय पत्र को पलटते हुए कहा कि आप बीकानेर के हैं क्या? मैंने कहा जी नहीं, यह परिचय पत्र बीकानेर शाखा से जारी हुआ है मैं बीकानेर का नहीं हूं। इस पर उनका अगला सवाल था कि आप कहां के रहने वाले हैं। मैंने झुंझुनूं का नाम लिया तो पास बैठे देवकरण नामक जवान के चेहरे पर मुस्कान आ गई है। और हिन्दी से ठेठ मारवाड़ी में आते ही कहने लगा कि भाईजी झुंझुनूं में कहां के हो। मैंने कहां चिड़ावा तहसील में है तो उन्होंने कहा गांव को नाम बताओ। मैंने जैसे ही गांव का नाम लिया तो देवकरण ने आसपास के कई गांव के नाम गिना दिए। मैं समझ चुका था कि देवकरण भी आसपास के गांव का ही है। मैंने पूछ लिया तो उसने अपने गांव का नाम घरड़ाना खुर्द बताया मैं मुस्कुरा रहा था झुंझुनूं का आदमी मिल ही जाता है। कहीं भी कभी भी।

ये निरीक्षण हैं किसके लिए

टिप्पणी 
श्रीगंगानगर में आजकल निरीक्षण का काम बहुत हो रहा है। कभी विभिन्न विभागों में कर्मचारियों की उपस्थिति जांची जा रही है तो कभी विद्यालयों में पोषाहार का निरीक्षण हो रहा है। जिला अस्पताल तो निरीक्षण की स्थायी जगह बन चुका है। यहां कमोबेश हर सप्ताह व्यववस्थाओं का जायजा लिया जाता है। निरीक्षण के दौरान मिलने वाले अनियमितताएं बाकायदा समाचार पत्रों की सुर्खियां भी बनती हैं। वैसे इन निरीक्षणों का मोटे तौर पर मकसद यही होता है कि इस बहाने एक तो विभाग की अंदरूनी व्यवस्थाएं जांच ली जाती हैं, दूसरा लापरवाह कार्मिकों में कार्रवाई का भय रहता है। सार के रूप में कह सकते हैं कि इन निरीक्षणों का उद्देश्य व्यवस्थाओं में जो खामियां हैं, उनमें सुधार करना या करवाना होता है। खैर, इतनी कवायद के बावजूद हालात जस के तस हों, मसलन न व्यवस्थाएं सुधरें और न ही लापरवाह कार्मिकों में भय दिखाई दे तो यह निरीक्षण महज रस्मी नजर आते हैं। इनसे गंभीरता गायब हो जाती है।
कुछ उदाहरण हैं जो यह साबित करते हैं कि इन निरीक्षणों से गंभीरता गायब हो रही है। श्रीगंगानगर एसडीएम लगातार अस्पताल का निरीक्षण कर रह ेहैं लेकिन व्यवस्थाओं में सुधार कैसा व कितना हुआ है, यह सबके सामने हैं। इसी तरह जिला प्रशासन भी निरीक्षण करके विभिन्न विभागों में कार्मिकों की उपस्थिति जांच रहा है, लेकिन कार्मिकों के अनुपस्थित मिलने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। इनकी संख्या में किसी तरह की कमी नहीं आई हुई दिखाई नहीं देती। इधर नगर परिषद में भी समय-समय पर निरीक्षण किया जाता है। खुद सभापति भी इस तरह के निरीक्षण कर चुके हैं लेकिन हालात बदले हुए नजर नहीं आते हैं।
बहरहाल, निरीक्षण केवल विभागीय काम का ही हिस्सा है तो भले ही चलता रहे लेकिन यह सारी कवायद अगर व्यवस्थाओं में सुधार कर आमजन को राहत देने के लिए है तो फिर कार्रवाई भी रस्मी नहीं होनी चाहिए। जब तक लापरवाही कार्मिकों में कार्रवाई का भय नहीं होगा उनकी लेटलतीफी दूर नहीं होगी। व्यवस्था में भी सुधार तभी होगा जब जिम्मेदारों कार्रवाई का डंडा चले। क्योंकि, इस तरह के निरीक्षणों की सार्थकता तभी है जब व्यवस्थाओं में सुधार हो और वह दिखाई भी दे। यह महज सुर्खियों बटोरने या तात्कालिक वाहवाही के लिए ही है तो अधिकारियों को इस तरह के निरीक्षणों से बचना चाहिए।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 5 अगस्त 17 के अंक में प्रकाशित 

आइए अफवाहों पर अंकुश लगाएं

टिप्पणी
श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ सहित प्रदेश के कई हिस्सों में इन दिनों एक अफवाह की चर्चा जोरों पर हैं। हालात यह हैं कि इस अफवाह ने लोगों को इस कदर भयभीत कर रखा है कि वे ठीक से सो नहीं पा रहे। कई गांवों में तो लोग रात-रात भर जागकर पहरा तक देने लगे हैं। यह अफवाह है कथित रूप से महिलाओं के बाल कटने की। अकेले श्रीगंगानगर जिले में कथित रूप से बाल कटने के दर्जनभर से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। खास बात यह भी है कि इन तमाम घटनाओं का कोई गवाह नहीं है। इसमें पीडि़त ही गवाह है और वह जो कहानी बताती है, वह किसी फंतासी फिल्म से कम नहीं होती। मसलन, किसी को अपने बाल कटे हुए दिखाई देते हैं तो किसी को बिल्ली नजर आती है। किसी को कुछ दिखाई नहीं देता सिर्फ पदचाप ही सुनाई देती है। 
वैसे यह जगजाहिर है कि अफवाह के पैर नहीं होते और वह आग से भी तेजी से फैलती है। इसका असर भी व्यापक स्तर पर देखना को मिलता है। कथित बाल कटने की घटना भी इसी का ही हिस्सा है। सप्ताह भर पहले तक इसकी कहीं चर्चा तक नहीं थी लेकिन आज इस अफवाह के चर्चे विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जन-जन की जुबान पर है। हालांकि मनोचिकित्सक, चिकित्सक, पुलिस, समाजशास्त्री व तर्कशील सोसायटी से जुड़े लोग इसको सिरे से खारिज कर रहे हैं और हकीकत भी यही है कि यह केवल कपोल कल्पित बातें हैं। हां एेसे बातों के प्रचार-प्रसार करने में कुछ शरारती तत्वों का दखल जरूर बढ़ जाता है। फिर भी कुछ सामान्य बातें जो यह साबित कर देती हैं कि यह अफवाह है। इसको इस तरह भी समझा जा सकता है कि कथित रूप से बाल केवल युवतियों/ महिलाओं के ही कट रहे हैं। इनमें भी अधिकतर कम उम्र की हैं और इस तरह की बातें ग्रामीण क्षेत्रों से ज्यादा जुड़ी हुई हैं। इतना ही नहीं प्रभावित परिवारों में अधिकतर में जागरुकता का अभाव भी नजर आता है। अधिकतर मामले कम पढ़े लिखे तथा नीचे तबके से जुड़े परिवारों के ही सामने आए हैं।
खैर, सर्वमान्य तथ्य यह भी है कि जहां जागरुकता की कमी होती है, वहां अंधविश्वास भी अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावी होता है। अपनी बात को या अंधविश्वास को पुष्ट करने वाले इस तरह को मामलों को हवा देने से नहीं चूकते हैं। वैसे चिकित्सक इसको एक तरह का रोग मानते हैं जबकि जानकारों का मानना है कि परिवार में उपेक्षित महिला/ युवती परिजनों से सहानुभूति पाने या उनको इस बहाने डराने के लिए भी इस तरह की अफवाहों का सहारा ले सकती है। बहरहाल, अफवाह रोकने की जिम्मेदारी उन सभी की है, जो जागरूक हैं। अंधविश्वास के खिलाफ लड़ते हैं तथा शिक्षा का उजियारा फैलाते हैं।
स्कूलों में अध्यापक प्रार्थना सभा के दौरान बच्चों को अच्छी तरह से समझा सकते हैं कि इस तरह का कोई मामला होता ही नहीं है। पुलिस भी लोगों को समझाएं तथा अफवाहें फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करे ताकि कोई लोगों को भयभीत करने की हिमाकत ही ना करे। इतना ही नहीं कोई शरारती तत्व इस तरह की अफवाहों का वाहक बन रहा है तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई हो। आइए हम सब भी मिलकर नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए इन अफवाहों पर अंकुश लगाएं तथा अपने आसपास भयमुक्त माहौल बनाएं
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राजस्थान पत्रिका के हनुमानगढ व श्रीगंगानगर संस्करण के 30 जुलाई 17 के अंक में प्रकाशित 

सवाल जवाब


यह सवाल जवाब उनके लिए नहीं हैं जो यह सब पढ़कर खुद को तटस्थ या निष्पक्ष नहीं रख पाते हैं। यह किसी समाज विशेष से संबंधित भी नहीं हैं, इसलिए ख्वामखाह दिमाग भी न लगाएं। हां इससे बेहतर सवाल-जवाब आपके जेहन में हैं तो आपके विचारों का स्वागत है। वैसे सवाल-जवाब से असहमति जताने वालों का भी स्वागत है लेकिन एक सीमा तक। 
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सवाल : नेता किसे कहते हैं?
जवाब : जो नेतृत्व करे वह नेता होता है।
सवाल- नेता कितने के प्रकार के होते हैं?
जवाब- नेता कई प्रकार के होते हैं। राजनीतिक नेता, सामाजिक नेता, स्वयंभू नेता आदि-आदि
सवाल : समाज का क्या एक ही नेता होता है?
जवाब : एेसे बहुत कम उदाहरण हैं जब किसी समाज का केवल एक ही नेता हो।
सवाल : समाज एक तो फिर नेता कई कैसे होते हैं?
जवाब : विचारधारा समान न होने पर समाज का नेतृत्व अलग-अलग नेता करने लग जाते हैं।
सवाल : यह विचाराधारा क्या होती है? थोड़ा विस्तार से बताओ।
जवाब : किसी के विचारों से सहमत नहीं होना अर्थात मतभेद होना।
सवाल : क्या सामाजिक नेताओं में मनभेद नहीं होता?
जवाब : होता है पर इसको मतभेद का नाम दे दिया जाता है।
सवाल : इतने सारे नेता, इतनी विचाराधारा फिर एकजुटता संभव है?
जवाब : बिलकुल नहीं हो सकती है। विचाराधारा एक होगी तभी एकजुटता संभव है अन्यथा बेमौसम का मेल।
सवाल : चलो यह बताओ राजनीतिक नेता समाज का होता है या सबका...?
जवाब : चुनाव से पहले समाज का, जीतने के बाद सबका।
सवाल : जीतने के बाद उसको भला समाज का करना चाहिए या सबका?
जवाब : जब नेता ही सबका है तो भला भी सबका का करना चाहिए।
सवाल : क्या नेता अपने समाज के जायज/नाजायज नैतिक/ अनैतिक काम के लिए बाध्य होता है?
जवाब : यह नेता की प्रकृति पर निर्भर करता है। राजनीतिक, सामाजिक व स्वयंभू नेताओं के अलग-अलग काम हैं।
सवाल : नेताओं की कार्यशैली किस तरह की होती है।
जवाब : हर प्रकृति का नेता हालात व परस्थितियों के हिसाब से काम करता है लेकिन भावनाओं से सब खेलते हैं। सारे नेाताओं में यही एक समानता होती है। भावनाएं भड़काने, भावनाएं भुनाने और भावनाओं से खेलने में इनका कोई मुकाबला नहीं होता है।

बिना विचारे जो करे...



टिप्पणी
'ज्यादा खुशी में कोई वादा ही नहीं करना चाहिए और गुस्से या आक्रोश की स्थिति में तत्काल किसी फैसले पर नहीं जाना चाहिए।, अक्सर यह नसीहत गाहे-बगाहे सुनने को मिल ही जाती है। श्रीगंगानगर में निराश्रित गोवंश को पकड़कर बाड़ेबंदी करने का फैसला भी आक्रोश की उपज ही माना जा सकता है। सांड की टक्कर से एक वरिष्ठ नागरिक की मौत के बाद उपजे आक्रोश के चलते नगर परिषद ने आधी अधूरी तैयारियों के साथ निराश्रित गोवंश पकडऩे की मुहिम शुरू की तथा दो तीन दिन की दौड़ धूप के बाद करीब चार सौ निराश्रित पशुओं को रामलीला मैदान में एकत्रित भी कर लिया। 
इतना कुछ करने के बाद भी पकड़े गए पशुओं से कहीं ज्यादा पशु अभी भी शहर की सड़कों व गलियों में विचरण करते दिखाई दे जाएंगे। रामलीला मैदान में जहां इस गोवंश को रोका गया, वहां शुरू में छांव को छोड़कर चारे व पानी की वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। तेज धूप के कारण तीन दिन तक गोवंश बेहाल रहा। फिलहाल निराश्रित गोवंश को पकडऩे का काम रुका हुआ है और अब सारी कवायद इस बात की चल रही है कि जो गोवंश रामलीला मैदान में रोक रखा है उसको कहां रखा जाए? प्रशासनिक अधिकारी आस-पड़ोस की गोशालाओं का निरीक्षण कर वहां संभावनाएं तलाश रहे हैं? निर्माणाधीन नंदीशाला के अधूरे काम को पूर्ण करने का निर्देश जारी हो रहे हैं। इन तमाम बातों का सार यही है कि बिना विचारे कोई काम शुरू कर दिया जाता है तो फिर उसका परिणाम इसी तरह का सामने आता है। आनन-फानन में अब जो तैयारियां हो रही हैं, वह पशुओं की बाड़ेबंदी किए बिना भी हो सकती थी। बेहतर होता कि सभी तैयारियां पूर्ण करने के उपरांत की निराश्रित गोवंश की धरपकड़ शुरू होती। बिना किसी कार्ययोजना के पहले तो आधे अधूरे पशु पकड़े और जो पकड़े उनको रखने के लिए माकूल जगह ही नहीं है? यह सर्वविदित है कि निराश्रित गोवंश से समूचा शहर परेशान है और इस समस्या का स्थायी व ठोस समाधान सभी चाहते हैं, लेकिन इस तरह का समाधान तो कोई नहीं चाहेगा। जो तैयारियां अब हो रही हैं वह सब पहले हो जाती और इसके बाद निराश्रित गोवंश को पकडऩे का काम शुरू किया जाता तो न तो वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ती और ना ही पशु धूप व गर्मी में बेहाल होते। निरीह प्राणी को इस तरह बदहाल व्यवस्था का शिकार भी नहीं होना पड़ता। बिना तैयारी के गोवंश पकडऩा आग लगने के बाद कुआं खोदने के जैसा ही है। बहरहाल, औपचारिक व वाहवाही वाली कार्रवाइयां शहर पहले भी बहुत देख चुका है। अब तो समस्या का स्थायी समाधान ही हो। भले ही दो की जगह चार दिन लग जाए।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 12 जुलाई 17 के अंक में प्रकाशित 

सिर्फ राजस्व की चिंता

 टिप्पणी
श्रीगंगानगर के शराब ठेकेदारों ने बुधवार को पुलिस कार्रवाई के विरोध में दुकानें बंद रखी और चाबियां आबकारी अधिकारी को सौंप दी। ठेकेदारों का आरोप है कि पुलिस ने मंगलवार रात कार्रवाई के नाम पर शराब दुकान का शटर तोड़ दिया। वैसे रात आठ बजे के बाद शराब बिकने की सूचना पर पुलिस ने मंगलवार रात को चहल चौक के पास स्थित दुकान पर छापेमार कार्रवाई की थी। दो-तीन दिन पहले पुलिस ने सुखाडि़या सर्किल-मीरा मार्ग के पास भी बार की तरह शराब पिलाने पर कार्रवाई की थी। इससे पहले एसडीएम भी धानमंडी के पास एक शराब गोदाम को सीज कर चुके हैं। बहरहाल, शराब ठेकेदारों का विरोध कथित शटर तोडऩे को लेकर ही है तो यह जरूर जांच का विषय है लेकिन इस विरोध प्रदर्शन के पीछे एकमात्र भावना रात आठ बजे के बाद बेरोकटोक शराब बेचने की है तो यह बेहद गंभीर विषय है और व्यवस्था पर सवाल भी है। वैसे भी शहर में शराब न केवल रात आठ बजे के बाद तक बिकती है बल्कि प्रिंट रेट से ज्यादा कीमत भी वसूली जाती है। यह सब पुलिस, प्रशासन व आबकारी विभाग की जानकारी में है और इस तरह के हालात अकेले श्रीगंगानगर शहर में ही नहीं हैं, अपितु ग्रामीण इलाकों व दूसरों जिलों के भी हैं। आबकारी विभाग ने लक्ष्य अधूरे रहने के डर से इस मामले में एक तरह से आंखें ही मूंद रखी हैं। यह आबकारी विभाग की अघोषित छूट का ही परिणाम है कि चाहे कैसे भी हो, बस लक्ष्य हासिल करो। एेसा इसलिए भी है क्योंकि विभाग ने अभी तक कोई कार्रवाई भी नहीं की है। एेसे में सवाल उठते हैं कि लक्ष्य हासिल करने के चक्कर में क्या नियमों से खिलवाड़ करना उचित है? क्या कानून को सरेआम ठेंगा दिखाना जायज है? खुले में शराब पिलाना क्या व्यवस्था को चुनौती देना नहीं है? भले ही पुलिस भी आबकारी विभाग का मामला बताकर इसमें सीधे कार्रवाई करने से बचे लेकिन कल को इससे कानून व्यवस्था या शांति भंग हुई तो जिम्मेदार कौन होगा?
दरअसल, इस मामले में एकमात्र कारण 'लक्ष्यÓ ही है। उसी ने आबकारी विभाग की नींद उड़ा रखी है और उसी ने ठेकेदारों का चैन छीन रखा है लेकिन इसका यह तो मतलब कतई नहीं है कि नियम विरुद्ध कुछ भी कर लिया जाए। सरकार और उसके नीति निर्धारकों को इस दिशा में न केवल सोचना चाहिए बल्कि पुनर्विचार भी करना चाहिए क्योंकि जान माल व कानून को ताक पर रखकर लक्ष्य हासिल करने के परिणाम हमेशा बुरे ही रहते हैं। सिर्फ लक्ष्य ही सब कुछ नहीं होता। और अगर कोई फैसला नहीं होता है तो फिर यही माना जाए कि सरकार को सिर्फ और सिर्फ राजस्व से मतलब है। भले ही वह कानून तोड़कर आए या अन्य किसी गैरकानूनी तरीके से।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 6 जुलाई 17 के अंक में प्रकाशित 

कोढ़ में खाज

टिप्पणी
पार्क किसी भी शहर की खूबसूरती और विकास का आईना माना जाता है। पार्क से शहर की पहचान भी होती है। पार्कों की दशा ही उस शहर के जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों की विकास के प्रति सोच के साथ-साथ यह भी बताती है कि वहां के लोग कितने जागरूक हैं। वैसे महज चारदीवारी के अंदर का भूखंड ही पार्क नहीं होता है। जहां हरी-भरी दूब, छायादार पेड़ व झूले आदि ही न हों, वह कैसा पार्क होगा समझा जा सकता है। पार्क वह, जहां पहुंचकर या बैठकर मन को सुकून मिलता है। जहां का स्वच्छ वातावरण और शुद्ध-ताजी हवा तन-मन में स्फूर्ति भरते हैं। जहां घर के समकक्ष आनंद की अनुभूति होती है। जहां बच्चे भरपूर मनोरंजन करें, मस्ती में खेलें तथा बुजुर्ग जी भर के बतियाएं आदि-आदि।
बदकिस्मती देखिए श्रीगंगानगर में कुछेक पार्क को छोड़कर कोई भी एेसा नहीं है जिसका नाम गर्व के साथ लिया जा सके या जिसका नाम लेते ही जेहन में सुखद एहसास हो। अधिकतर पार्क बदहाली के भंवर में फंसे हैं। प्रशासनिक उदासीनता के शिकार हैं। इन पार्कों की दशा देखकर मन में कोफ्त होती है। दुख होता है। व्यवस्था को कोसने को मन करता है। इन सब के बीच एक बात जो बेहद शर्मनाक होने के साथ-साथ अखरने वाली भी है, वह है बरसाती पानी को पार्कों में छोडऩे का फैसला। यह बरसाती पानी अगर सामान्य पानी हो तो कोई बात नहीं है लेकिन यह वह पानी है जो निकासी के अभाव में रास्तों में जमा होता है और प्रशासनिक अमला राहत के नाम पर मोटर लगाकर यह पानी पार्कों में खाली करवाता है। इन सब बातों को नजरअंदाज करके कि इस बरसाती पानी में नालियों का रोजमर्रा का मल-मूत्र व दूषित पानी भी मिला हुआ है। इस तरह का दूषित पानी पार्कों में छोडऩा कोढ में खाज के समान ही है। फौरी राहत के चक्कर में इस तरह करना उचित नहीं है। कल्पना कीजिए बदहाल पार्कों मंे इस तरह का दूषित पानी वहां के वातावरण को कितना प्रदूषित करेगा। शुद्ध ताजा हवा तथा सुकून की उम्मीद में पार्क में आने वालों को यह सब कितना अखरेगा। प्रशासनिक अमला इन सब से अनचान और अपनी खाल बचाने के लिए यह रास्ता लंबे समय से अपनाता आया है लेकिन यह सिलसिला कभी तो रुके। कभी तो ठोस समाधान हो।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 21 जून 17 के अंक में प्रकाशित