Thursday, April 25, 2019

चुनाव प्रचार में क्षेत्रीय दलों से पीछे भाजपा-कांग्रेस

वाइएसआर कांग्रेस और टीडीपी में होर्डिंग वार
मतदान की तिथि नजदीक आने के साथ ही आंध्रप्रदेश में चुनावी रंगत परवान चढऩे लगी हैं। सड़कों किनारे बड़े-बडे होर्डिंग लग गए हैं। बड़े-बड़े कटआउट व पार्टी के रंग में रंगे व लाउडस्पीकर लगे वाहन दौडऩे लगे हैं। रेलवे स्टेशनों व बस स्टैंड पर भी राजनीतिक दलों का प्रचार हो रहा है।
चुनाव परिणाम अभी भविष्य के गर्भ में है, पर तेलुगुदेशम पार्टी व युवाजन श्रमिक रायतु कांग्रेस पार्टी (वाइएसआर कांग्रेस पार्टी) के बीच जबरदस्त होर्डिंग वार छिड़ी है। विशाखापट्टनम से विजयनगरम के बीच सड़क किनारे होर्डिंग लगाने की दोनों दलों में होड़-सी मची है, वहीं विजयवाड़ा से गुंटूर तक सड़क के दोनों ओर तेलुगुदेशम पार्टी का ही कब्जा है। होर्डिंग में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ही हैं, साथ में योजनाओं की जानकारी भी है।
कुछ होर्डिंग में तेलुगुदेशम पार्टी के संस्थापक एनटी रामाराव भी नजर आते हैं, पर वाइएसआर सीपी के पोस्टर व बैनर में जगन मोहन रेड्डी के साथ उनके दिवंगत पिता व पूर्व मुख्यमंत्री वाइएसआर राजशेखर रेड्डी का फोटो जरूर दिखाई दिया। चुनाव प्रचार में भाजपा व कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से काफी पीछे हैं।
रविवार को विजयवाड़ा का अधिकतर बाजार बंद ही रहता है। मैंने बस पकड़ी और निकल गया गुंटूर की ओर। इन दिनों कृष्णा नदी में पानी नहीं है। नदी पार कर बस आगे बढ़ी तो सड़क किनारे बड़े-बड़े होर्डिंग नजर आए। प्रचार के मामले में तेलुगूदेशम के अलावा और किसी भी पार्टी का यहां नामोनिशान ही नहीं है। बगल में बैठे युवक से बातचीत शुरू की। पेशे से शिक्षक हरीश ने जैसे-तैसे हिंदी में होर्डिंग का मजमून समझाया। हरीश ने बताया कि इस बार मुकाबला जोरदार होगा। हालात 'कुछ भी हो सकता है' वाले हो गए हैं। उसका कहना था कि उत्तरी आंध्रा में इस बार जनसेना मुकाबला त्रिकोणीय बना सकती है, पर दक्षिणी आंध्रा में मुकाबला टीडीपी व वाइएसआर सीपी के बीच ही होगा। बातों का सिलसिला चलता रहा और करीब 35 किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद हम गुंटूर पहुंचे। हरीश भी गुंटूर का ही निवासी है। केन्द्र में कौन पसंद है, के सवाल पर हरीश ने मोदी का नाम लिया।
गुंटूर की पहचान लाल मिर्च के लिए पूरे देश में हैं। यहां की मिर्च मंडी एशिया की सबसे बड़ी मानी जाती है। ऑफ सीजन के कारण मंडी में सन्नाटा पसरा था। चलते-चलते एक दुकान पर तीन युवकों को बैठे देखा। अंग्रेजी में पूछा, इस बार वोट किसको, तो उनमें से एक बोला, 'सेंटर में मोडी और स्टेट में रेड्डी।'

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 5 अप्रेल 19 के अंक में पत्रिका के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित ।

पार्टियों का झंडा उठाने में महिलाएं, पुरुषों से आगे

आंध्र की रैलियों में महिलाओं की भागीदारी अधिक
राजनीति के मामले में महिलाएं हाशिये पर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों का प्रचार करने के मामले में आंध्रप्रदेश की महिलाओं का कोई सानी नहीं। दल चाहे स्थानीय हों या राष्ट्रीय, लेकिन पार्टियों का झंडा उठाने में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ही आगे हैं। कोई इसे सीधा मजदूरी से जोड़ता है, तो कोई इस कारण को पार्टी हित की बात कह खारिज कर देता है।
प्रदेश में महिलाओं से जुड़ी एक उजली तस्वीर यह है कि महिला साक्षरता दर कम होने के बावजूद यहां लिंगानुपात राष्ट्रीय अनुपात से ज्यादा है। प्रदेश की 25 लोकसभा सीटों पर महिला सांसद दो ही हैं। 16वीं लोकसभा में मात्र 65 महिला सांसद चुनी गईं। यह आंकड़ा कुल क्षमता का महज 12.45त्न है।
दो रैलियां, दोनों में महिलाएं: विशाखापट्टनम से विजयनगरम जाते समय रास्ते में दो जगह चुनावी रैलियां नजदीक से देखीं। दोनों ही चुनावी रैलियों में महिलाएं प्रमुखता से नजर आईं। भीपाली बीच के पास तेलुगुदेशम पार्टी कार्यालय में एकत्रित महिलाएं साइकिल निशान का पीला झंडा व पीली टोपी लगाए बैठी थीं। निर्देश पाते ही सब कतारबद्ध हो नारेबाजी करते हुए कस्बे में प्रवेश कर गईं। इसी तरह तगरपोवलसा कस्बे में भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में निकाली जा रही रैली में भी पार्टी के झंडे और टोपी लगाए महिलाएं ही पर्चे बांट रही थीं।
प्रदेश में महिला श्रमिकों की अधिकता है। होटल हो या पेट्रोल पंप, महिलाओं का नजर आना सामान्य है। यही कारण है कि चुनावी रैलियों में महिलाओं प्रमुखता से नजर आती हैं। अनकापल्ली के गणेश कहते हैं कि महिलाओं को कम पारिश्रमिक देना पड़ता है, इसलिए पार्टियां उन्हें प्राथमिकता देती हैं। विजयवाड़ा के बीए छात्र कृष्णकांत कहते हैं कि महिलाएं भी तो पार्टी से जुड़ी होती हैं, उनके पास भी तो पद होता है।
देहाती इलाकों में दिखाई देती है चुनावी रंगत: आंध्रप्रदेश की चुनावी रंगत और पार्टी कार्यालयों के माहौल व गतिविधियों को जानने-समझने के लिए विशाखापट्टनम व आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण किया। देहात यानी ग्रामीण क्षेत्रों पर चुनावी रंग ज्यादा चढ़ा हुआ पाया। पहले दिन एनटीआर भवन (तेलुगुदेशम पार्टी के कार्यालय भवन) पहुंचा, जहां सन्नाटा था। वजह पूछी तो बताया गया कि चुनाव के चलते सब फील्ड में हैं। इसी तरह जब कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डॉ. टी. सुब्बारामी रेड्डी के आवास पर पहुंचा, तो वहां भी सन्नाटा था। एक युवक ने बताया कि नेताजी शहर से बाहर हैं।

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आज 4 अप्रैल 19 को राजस्थान पत्रिका के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित।

स्थानीय क्षत्रपों के बीच ही मुख्य मुकाबला

आंध्र का भरोसा: मोदी जीतें या राहुल, कुर्सी पर हम ही बैठाएंगे
लोकसभा 2019
समुद्र किनारे व पहाड़ों की गोद में बसे आंध्र प्रदेश के खूबसूरत शहर विशाखापट्टनम में सियासी गर्मी उतनी नहीं है, जितना कि यहां का तापमान। हिन्दी बोलने व समझने वालों की संख्या यहां बेहद कम है लेकिन राजनीतिक समझ गजब की है। आंधप्रदेश में लोकसभा की 25 सीटों के साथ 175 विधानसभा सीटों के लिए भी पहले चरण में ही मतदान हो रहा है। दोनों ही चुनावों में इस बार भाजपा व कांग्रेस के अलावा तीन प्रमुख स्थानीय पार्टियां मैदान में हैं। फिर भी मुख्य मुकाबला चंद्रबाबू नायडू की तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी ) व आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाइएसआर राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन मोहन रेड्डी की वाइएसआर कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है।
पिछले चुनाव में टीडीपी के साथ सहयोगी के रूप में चुनाव में उतरी भाजपा इस बार अपने दम पर मैदान में है। पिछले चुनाव में भाजपा ने इस प्रदेश से दो सीट जीती थीं। कांग्रेस के पास यहां खोने को कुछ नहीं है। पिछले चुनाव में उसका खाता भी नहीं खुला था। फिल्म अभिनेता चिरंजीवी के भाई पवन कल्याण भी इस बार मैदान में हैं। वह खुद फिल्म अभिनेता भी हैं। उनकी जन सेना पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में टीडीपी व भाजपा के लिए प्रचार किया था, पर इस बार उनका किसी भी पार्टी से गठबंधन नहीं है। नागपुर से विजयवाड़ा जाते वक्त ट्रेन में सवारियों से चर्चा हुई। जी सुपैप्या व अशोक वर्मा, दोनों ही इस बात पर एकमत थे कि केंद्र सरकार में आंध्र की हिस्सेदारी जरूर रहेगी।
हिन्दुत्व और रोजगार भी जुबान पर
आरके बीच पर सब अपनी ही मस्ती में मगन थे। नारियल पानी बेच रहे रामा रेड्डी से मैंने केवल पवन कल्याण के बारे में पूछा, तो रामा ने कहा कि आंध्र प्रदेश में नायडू के बाद अगर कोई नेता होगा तो वो पवन कल्याण ही होगा। चिरंजीवी ही राजनीति में नहीं चले तो फिर पवन कल्याण का क्या भविष्य है? तो कहने लगे जो बात पवन में है वह चिरंजीवी में नहीं। हमारी चर्चा सुनकर पास खड़े दूसरे शख्स ने तपाक से कहा, इस बार चुनाव में हिन्दुत्व भी मुद्दा रहेगा और इसका असर आंध्र प्रदेश में भी पड़ेगा। तभी वहां आकर रुके एक मोटरसाइकिल सवार ने हमारी बातें गौर से सुनी और जाते-जाते कह गया कि मुकदमा दर्ज होने पर सरकारी नौकरी नहीं मिलती है, पर जिस पर मुकदमे होते हैं, वह चुनाव लड़ सकता है। आंध्र प्रदेश में कई लोग मौजूदा मुख्यमंत्री के कार्यकाल की सराहना के साथ यह सवाल भी उठाते हैं कि जगन मोहन रेड्डी महज पिता के कामों को याद करके वोट मांग रहे हैं।

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2 अप्रेल 19 को राजस्थान के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित।

तू जी एे दिल जमाने के लिए

 अजीम प्रेम जी : भारत के सबसे बड़ा दानी
लोकसभा चुनाव की चर्चा शोर के बीच एक एेसा नेक व प्रेरणादायी काम भी हुआ, जिसकी धमक समूचे विश्व में सुनाई दी। यह काम इसीलिए भी विशेष है, क्योंकि एेसा कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं है। परोपकार से जुड़ा यह पुनीत काम किया है आईटी दिग्गज व विप्रो के अध्यक्ष अजीम प्रेेम जी ने। उन्होंने बीते सप्ताह विप्रो लिमिटेड के 34 फीसदी शेयर परोपकार कार्य के लिए दान कर दिए। इन शेयर का बाजार मूल्य 52,750 करोड़ रुपए हैं। बताते चलें कि प्रेमजी देश की तीसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी विप्रो के चेयरमैन हैं।  वह अपने फाउंडेशन के माध्यम से लोगों की मदद करने का काम करते हैं। इसमें वह अब तक 145,000 करोड़ रुपए दे चुके हैं। दरअसल, अजीम प्रेमजी ने 'अजीज प्रेमजी फाउंडेशन' समाजसेवा के लिए बनाया है। यह फाउंडेशन मुख्य रूप से शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है तथा इस क्षेत्र में काम करने वालों को आर्थिक मदद भी देता है। फाउंडेशन प्रमुख रूप से कर्नाटक, उत्तराखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पुडुचेरी, तेलंगाना, मध्यप्रदेश और उत्तर-पूर्वी राज्यों में सक्रिय है। वंचित तबकों के लिए काम कर रहे करीब 150 एनजीओ को पिछले पांच साल में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से फंड भी मिला है। फाउंडेशन की ओर से बेंगलुरू में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी का संचालन भी किया जाता है। बताया गया है कि जल्द ही यूनिवर्सिटी को पांच हजार छात्रों और 400 शिक्षकों की क्षमता वाला बनाया जाएगा। इसके बाद फाउंडेशन की उत्तर भारत में भी एक यूनिवर्सिटी खोलने की योजना है। प्रेमजी का जन्म 24 जुलाई 1945 में हुआ था और महज 21 साल की उम्र में उन्होंने विप्रो लिमिटेड  की स्थापना की। उनकी पत्नी का नाम यास्मीन हैं। प्रेमजी के दो पुत्र हैं। अपनी काबिलियत के चलते प्रेमजी ने साबुन-तेल बेचने वाली कंपनी को भारत की विशाल आईटी कंपनी बना दिया। संपत्ति के  शिखर पर पहुंचने के बावजूद प्रेमजी ने त्याग और परोपकार के गुणों को अपनाए रखा। प्रेमजी की दानशीलता पर बॉयोटेक की संस्थापक  किरन मजूमदार शॉ ने ट्वीट किया कि, 'अजीम प्रेमजी बेहद खास हैं। बेशकीमती हैं और सच्चे 'भारत रत्न' हैं। 

ठुकरा दिया था पाक जाने का प्रस्ताव
अजीम प्रेमजी का परिवार मूलत: पाकिस्तान से ही भारत आया था। बताते हैं कि विभाजन के समय पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने अजीम प्रेमजी के पिता मोहम्मद हाशिम प्रेमजी को पाकिस्तान चलने का आग्रह किया। इतना ही नहीं प्रेमजी के पिता ने पाकिस्तान का वित्त मंत्री बनने के प्रस्ताव को ठुकरा कर भारत में ही रहना ही पसंद किया। उस वक्त हाशिम प्रेमजी चावल और कुकिंग ऑयल के ख्यात कारोबारी थे और राइस किंग ऑफ  बर्मा कहे जाते थे।
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राजस्थान.पत्रिका के तमाम संस्करणों में 23 मार्च 19 के अंक में संपादकीय पेज पर प्रकाशित

केन तनाका: विश्व की सबसे उम्रदराज जीवित महिला

116 की उम्र में गणित का अध्ययन
भले ही पहला सुख निरोगी काया को माना गया हो, पर तनाव व भागदौड़ भरी जिंदगी में खुद को स्वस्थ रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। मौजूदा दौर में स्वस्थ व लंबा जीवन जीना किसी अजूबे से कम नहीं है। इस मामले में जापान के लोग खुशकिस्मत हैं। इसी सप्ताह गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रेकॉड्र्स ने जापान के फुकुओका में रहने वाली केन तनाका को दुनिया की सबसे उम्र-दराज महिला का खिताब दिया है। तनाका इस उम्र में भी गणित का अध्ययन करती है। मोतियोबिंद और कैंसर के कारण तनाका की सर्जरी भी हुई है। कैंसर को मात देने वाली केन को बोर्ड गेम ऑथेलो इतना पसंद है कि वह अब इसकी एक्सपर्ट बन गई हैं। बमुश्किल ही परिवार का कोई सदस्य इन्हें हरा पाता है। तनाका 9 मार्च 2019 तक 116 साल 66 दिन की जिंदगी जी चुकी हैं। तनाका को यह खिताब हाल ही फुकुओका के एक नर्सिंग होम में दिया गया, जहां वह रहती हैं। इस सेलिब्रेशन में उनके परिजन और शहर के मेयर मौजूद थे। बताते चलें कि तनाका का जन्म 2 जनवरी 1903 को हुआ था। वह अपने माता-पिता की सातवीं संतान हैं।
कुछ महीनों पहले दिए गए एक साक्षात्कार के मुताबिक तनाका खानपान पर विशेष ध्यान रखती हैं। डाइट में चावल, छोटी मछली और सूप लेती हैं तथा काफी मात्रा में पानी पीती हैं। तनाका के मुताबिक उनकी लंबी उम्र का राज खाने-पीने की आदत हैं। मिठाइयों के अलावा उन्हें कॉफी पीना अधिक पसंद है। वह रोजाना सुबह 6 बजे उठ जाती हैं और रात 9 बजे तक सो जाती हैं।
खास बात यह है कि तनाका से पहले सबसे बुजुर्ग जीवित व्यक्ति का खिताब जापान की ही एक अन्य महिला चियो मियाको के नाम था जिनकी 117 की उम्र में पिछले साल 22 जुलाई, 2018 को मृत्यु हो गई थी। 116 साल की केन अब तक जिए सबसे उम्रदराज शख्स का खिताब हासिल करने से छह साल पीछे हैं। यह खिताब पिछले 22 साल से फ्रांस की जेनी लुईस कालमेंट के पास है। 21 फरवरी 1875 को जन्मी जेनी ने 4 अगस्त 1997 को 122 साल 164 दिन की उम्र में आखिरी सांस ली थी। जापान के रहने वाले मासाजो नोनाका का 20 जनवरी 2019 को 113 वर्ष 179 दिन की उम्र में निधन के बाद सबसे ज्यादा लंबे समय तक जीवित रहने वाले पुरुष के रिकॉर्ड के लिए जांच चल रही है। नए रिकॉर्ड धारक की पुष्टि होने की जानकारी मिलने के बाद उसकी घोषणा की जाएगी। अब तक सबसे बुजुर्ग पुरुष का रिकॉर्ड जापान के जिरोमेन किमुरा के नाम है। उनका जन्म 19 अप्रैल 1897 को और निधन 12 जून 2013 को 116 वर्ष 54 दिन की आयु में हुआ था।
तनाका इस उम्र में भी गणित का अध्ययन करती है। मोतियोबिंद और कैंसर के कारण तनाका की सर्जरी भी हुई है। कैंसर को मात देने वाली केन को बोर्ड गेम ऑथेलो इतना पसंद है कि वह अब इसकी एक्सपर्ट बन गई हैं। बमुश्किल ही परिवार का कोई सदस्य इन्हें हरा पाता है।
आपको जान कर आश्चर्य होगा कि जापान के अधिकतर लोग सौ साल से ज्यादा जीते हैं। दूसरों देशों के मुकाबले जापान के लोग बीमार भी कम होते हैं। इसका प्रमुख कारण इनकी संयमित जीवनचर्या और खानपान है। जापान के लोग स्पेशल चाय दिन में कई बार पीते हैं। वे साफ सफाई के प्रति सजग रहते हैं और दिन में दो बार नहाते हैं। ज्यादा समय घर की बजाय बाहर बिताना पसंद करते हैं। जापानी लोग बैठने के बजाय चलने या खड़े रहने को प्राथमिकता देते हैं। यहां के लोग दिन की शुरुआत रेडियो टेसो से करते हैं। यह एक तरह ही जापानी मॉर्निंग एक्सरसाइज है।
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पत्रिका समूह के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर ..16 मार्च 19 के अंक.प्रकाशित....

21 की उम्र में रिएलिटी टीवी स्टार ने हासिल किया करिश्माई मुकाम

फेस ऑफ द वीक : काइली जेनर
संयोग देखिए, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आई यह खबर ऐसी महिला से जुड़ी है जो मात्र 21 साल की उम्र में ही सफलता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच गई। खबर ने उस आम धारणा को भी खारिज किया है जिसको लेकर कहा जाता है कि सफलता और प्रसिद्धि अक्सर बड़े होने के बाद ही आती है। 
अल्प समय में करिश्माई कामयाबी के अर्श पर पहुंचने की चौंकानी वाली यह कहानी अमरीका की रिएलिटी टीवी स्टार काइली जेनर से जुड़ी है। उपलब्धि यह है कि कॉस्मेटिक कंपनी की मालकिन काइली जेनर दुनिया की सबसे कम उम्र की अरबपति बन गई हैं। काइली से पहले ये खिताब फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग के पास था। मार्क 23 साल की उम्र में सबसे कम उम्र के अरबपति बने थे।
काइली की कंपनी 'काइलीकॉस्मेटिक्स' 360 मिलियन डॉलर की बिक्री करने में सफल रही है। मात्र तीन साल पहले वर्ष 2016 में काइली ने इस कंपनी की शुरुआत महज 29 डॉलर से की थी। वर्तमान में इस कंपनी की वेल्यू 90 करोड़ डॉलर यानी करीब 6120 करोड़ रुपए आंकी गई है। काइली की कंपनी के लिपस्टिक मैचिंग सेट और लिप लाइनर सबसे ज्यादा पॉपुलर हैं। काइलीकॉस्मेटिक्स के समूचे विश्व में एक हजार से ज्यादा स्टोर हैं। इनके ग्राहकों में अरबपति और हॉलीवुड स्टार्स भी शामिल हैं। इस उपलब्धि से पहले पिछले साल फोब्र्स मैग्जीन ने काइली को दुनिया की सबसे कम उम्र की अमीर महिलाओं की सूची में भी शामिल किया था। तब काइली को फोब्र्स मैगजीन के कवर पेज पर भी जगह मिली थी। काइली ने साल 2017 में ट्रेविस स्कॉट से शादी की। इन दोनों की एक बेटी भी है।
काइली जेनर पहली बार मीडिया में रिएलिटी शो, 'कीपिंग अप विद द कर्देशियन्स' में नजर आई थीं। तब वह सिर्फ 10 साल की थीं। वे रिएलिटी टीवी स्टार किम, क्लो और कर्टनी कर्देशियन की सौतेली बहन हैं। काबिलगौर है कि काइली जेनर की कमाई सोशल मीडिया से भी होती है। इंस्टाग्राम और स्नैपचैट पर उनके 12 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर हैं। फोब्र्स के कवर पेज पर जब काइली का फोटो प्रकाशित हुआ था, तब उन्होंने कहा था, 'मेरी किस्मत है कि मुझे जो अच्छा लगता है वह मैं हर दिन करती हूं।' वाकई काइली की सफलता में किस्मत का भी बड़ा योगदान है।
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राजस्थान पत्रिका के 9 मार्च 19 के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित ।

जूता महाकथा-

बस यूं ही
1994 में आई फिल्म हम आपके हैं कौन का वह जूते वाला गीत तो आपको याद ही होगा। आप उस दौर से गुजरे हैं तो बारातियों व दुल्हन की सहेलियों के बीच चुहलबाजी से भरा वह गीत यकीनन आपके होठों पर आ गया होगा। एक पक्ष जूते दे दो, पैसे ले लो कहता है तो दूसरा पक्ष पैसे दे दो जूते ले लो की जिद पकड़े रहता है। लब्बोलुआब यही कि जूतों के इस लेन-देन में पैसे दिए बिना काम नहीं चलेगा। पहले पैसे लिए जाएंगे तभी जूते मिलेंगे। खैर, यह गीत आज के दौर का होता तो जूते लेने या देने के पैसे कतई नहीं लगते। यह काम फ्री में हो जाता। वह भी एकदम निशुल्क। यकीन न हो वो कल उत्तरप्रदेश में हुए जूता प्रकरण को देख सकते हैं। एक ही दल के सांसद व विधायक के बीच हुई जूतम पैजार का लाइव नजारा पलक झपकते ही सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म पर वायरल हो गया। जुमलों के इस दौर में देश की सुरक्षा जैसे गंभीर मसले ही अछूते नहीं रहे तो भला जूता कहां से बच जाता है। जूते पर न जाने कितने ही जुमले गढ लिए गए। सर्जिकल स्ट्राइक व मेरा बूथ सबसे मजबूत भी जूते से जोड़ दिए गए। मेरा बूट सबसे मजबूत, सर्जिकल स्ट्राइक-3 टाइप। वैसे यह सोशल मीडिया का दौर है, जो किसी को बख्शता नहीं है। हालिया जूता प्रकरण पर भी कई चुटकुले व जुमले बने हैं। बानगी देखिए, सांसद के जूता कांड के बाद जूता समाज में खलबली मची। सांसदों, विधायकों, नेता मंत्रियों ने औने-पौने दामों में अपने जूते कबाडिय़ों को बेच डाले। जूता बाजार के शेयरों और बिक्री में भारी गिरावट। जूता समाज ने आगामी लोकसभा चुनावों में किसी भी राजनीतिक दल या निर्दलीय प्रत्याशी को जूता चप्पल चुनाव चिन्ह न देने की मांग निर्वाचन आयोग से की। राजधानी के एक संभ्रांत परिवार के शादी समारोह में दूल्हे की सालियों ने जूता चुराई रस्म अदायगी न करने के फैसले पर जम कर हंगामा किया। बालीवुड ने जूता टाइटल पर फिल्म बनाने के लिए दो दर्जन फिल्म के नाम पंजीकृत किए। देश के एक नामी गिरामी वकील ने जूता को एक असरदार हथियार के रूप में सूचीबद्ध करने के लिए अदालत में जनहित याचिका दायर की। जूता मरम्मत करने वाले कारीगरों के चेहरे पर मुस्कान और खुशी की लहर। जूता निर्माण उद्योग पर लगे जीएसटी की के लिए केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक इस मामले में संसद के विशेष अधिवेशन के बाद करने की ठानी। विश्वविद्यालयों में अगले वर्ष के शैक्षणिक सत्र से जूता विज्ञान पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार। आदि आदि। इसी तर्ज पर एक और जुमला आया, माइक टायसन की खूबी थी कि वो 2 सेकंड में 3 घूसे मारता था। सांसद ने 4 सेकंड में 7 जूते मार कर माइक टायसन को पछाड़ दिया है। इंडिया ने दिया टोक्यो 2020 के लिए स्वर्ण पदक का नया दावेदार..। लगे हाथ इस जुमले पर भी गौर फरमाइए, मीडिया कह रही है 13 जूते मारे हैं। पार्टी अध्यक्ष ने नौ बताए और मारने वाले सांसद ने कहा, हमारा काम जूते मारने का है गिनना विधायक का। है ना देश के मौजूदा परिदृश्य पर करार तंज। बहरहाल, जूत जिसने मारे और जिसने खाए उनके मनोभाव कैसे हैं और तब कैसे रहे होंगे यह तो वो ही जानते हैं लेकिन सोशल मीडिया पर विचरण करने वालों को गुदगुदाने या व्यंग्यबाण छोडऩे का मुद्दा बैठे बिठाए जरूर दे दिया है। क्रमश: ..

क्रिकेट में उपलब्धि भरा दिन

प्रसंग- वन डे में 500वीं जीत
भारत व आस्ट्रेलिया के मध्य चल रही पांच एक दिवसीय मैचों की शृंखला का दूसरा मैच भारतीय टीम ने जीत कीर्तिमान.बना दिया है। यह जीत इसलिए विशेष है, क्योंकि यह क्रिकेट में भारतीय टीम की 500वीं जीत है। इस एेतिहासिक जीत के साथ एक संयोग यह भी जुड़ा है कि इसमें कप्तान विराट कोहली ने शतक लगाया। इसके अलावा यह उपलब्धि हासिल करने वाला भारत विश्व का दूसरा देश भी बन गया है। खैर, पांच सौ जीत तय करने में भारतीय टीम को 44 साल लग गए। भारतीय टीम ने पहला वन डे 1975 में खेला था। इसके बाद भारत को सौ जीत करने में 18 साल लग गए। इसकी बड़ी वजह उस दौर में क्रिकेट का कम खेला जाना भी है, हालांकि यह वह दौर भी था जब कपिलदेव की अगुवाई में भारतीय टीम विश्व विजेता बनी। भारत में विदेशी टीमें तभी आती थी, तब सर्दी का मौसम होता। उस दौर में किसी ने कल्पना ही नहीं की थी कि कभी क्रिकेट साल भर खेला जाने लगेगा। दिन ही नहीं रात को भी खेला जाएगा, लेकिन समय के साथ यह सब संभव हुआ। उस समय कम खेलने के कारण ही भारत को सौवीं जीत दर्ज करने में 18 साल लग गए। भारत ने सौंवी जीत 1993 में दर्ज की थी। समय बदला तो क्रिकेट का अंदाज भी बदला। सफेद से ड्रेस भी रंगीन हुई तो गेंद भी सफेद हो गई। वन डे के छोटे व फटाफट प्रारूप टी-20 ने तो क्रिकेट में जबरदस्त रोमांच भर दिया। इसके बाद काउंटी की तर्ज पर शुरू किए आईपीएल ने तो क्रिकेटरों को अपनी प्रतिभा दिखाने के भरपूर अवसर दिया है। बहरहाल, भारतीय टीम ने सन 2000 में 200वीं जीत हासिल की तो 2007 में 300वीं। इसके बाद 2012 में भारतीय टीम ने 400वीं जीत दर्ज की और अब 2019 में 500वीं दर्ज की है। इस तरह से पहले के 18 साल में मात्र सौ जीत हिस्से आई तो इसके बाद के 26 साल में भारत के खाते में कुल चार सौ जीत आई । काबिलेगौर है कि इस मैच से पहले टीम इंडिया ने 962 वनडे खेले थे। यह भारत का 963 का मैच था। वनडे में अब तक सिर्फ ऑस्ट्रेलियाई टीम ही 500 या उससे ज्यादा मैच जीत पाई है। इस मैच से पहले आस्ट्रेलियाई टीम के खाते में 923 वनडे में से 558 में जीत दर्ज थी, आज हार के बाद यथावत है। भारत के अलावा पाकिस्तान की क्रिकेट टीम 400 या उससे ज्यादा वनडे जीतने में सफल रही है। पाकिस्तान ने 907 वनडे में से 479 जीते हैं। जीत के मामले में भारतीय टीम आस्ट्रेलिया से एक कदम आगे है लेकिन कुल वन डे खेलने में मामले में वह आस्ट्रेलिया से कहीं आगे है। भारत ने सर्वाधिक 158 वनडे श्रीलंका के खिलाफ खेले हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर आस्ट्रेलिया है, जिससे भारतीय टीम ने 132 वनडे खेले हैं। इनमें से भारतीय टीम 48 को जीतने में सफल रही है, जबकि 74 में उसे हार का सामना करना पड़ा है। 10 वनडे बेनतीजा रहे हैं। पाकिस्तान से भारतीय टीम ने 131 वन डे खेले हैं। फिलवक्त इस उपलिब्ध को हासिल करने पर भारतीय टीम व इस यादगार सफर में शामिल सभी क्रिकेट खिलाडि़यों के साथ-साथ क्रिकेट प्रशंसकों को भी बधाई।

वल्र्ड कप में गोल्ड पर निशाना

फेस ऑफ द वीक : अपूर्वी चंदेला
पुलवामा आतंकी हमले तथा भारत-पाक के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक ऐसी खबर भी आई, जो उम्मीद जगाती है। यह खबर निशानेबाज अपूर्वी चंदेला की एक ऐसी उपलब्धि से जुड़ी है, जिसने विश्व स्तर पर अपनी छाप छोड़ी है। अपूर्वी ने आइएसएसएफ विश्व कप की महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। खास बात यह है कि अपूर्वी ने यह पदक पुलवामा हमले में शहीद जवानों के नाम कर दिया।
गुलाबी नगरी जयपुर में 4 जनवरी 1993 को जन्मी अपूर्वी की प्रतिभा समय के साथ और अधिक निखरती जा रही है। अपूर्वी की स्कूली शिक्षा मेयो कॉलेज गल्र्स स्कूल, अजमेर और महारानी गायत्री देवी गल्र्स स्कूल, जयपुर से हुई। कॉलेज शिक्षा दिल्ली के जीसस एंड मैरी कॉलेज से हुई है। अपूर्वी ने समाज शास्त्र ऑनर्स में डिग्री हासिल की है। 26 वर्षीया अपूर्वी को निशानेबाजी के अलावा खेलना व डांस करना भी पंसद है। वह प्रकृति प्रेमी है, विशेषकर पशु-पक्षियों से उसको खास लगाव है। 'होनहार बिरवान के होत चिकने पात' कहावत को अपूर्वी ने 19 साल की उम्र में चरितार्थ कर दिया था, जबकि 2012 में उन्होंने राष्ट्रीय शूटिंग चैम्पियनशिप में भाग लिया और 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में सोने का तमगा जीता।
इसके बाद अपूर्वी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कई रिकॉर्ड उनके खाते में जुड़ते गए। 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स में भी अपूर्वी स्वर्ण पदक जीतने में कामयाब रही। अपूर्वी महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में 2016 के रियो ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई हुई और 51 प्रतियोगियों में क्वालिफिकेशन राउंड में 34वें स्थान पर रही। इतना ही नहीं, 2018 एशियाई खेलों में अपूर्वी ने 10 मीटर एयर राइफल मिश्रित टीम स्पर्धा में रवि कुमार के साथ जोड़ी बनाई और भारत को कांस्य पदक दिलाया।
अपूर्वी की ताजा उपलब्धि इसलिए बड़ी है, क्योंकि अपूर्वी ने शूटिंग वल्र्ड कप में न केवल स्वर्ण पदक जीता है, बल्कि 252.9 अंक भी हासिल किए हैं, जो विश्व रिकॉर्ड भी है। इतना ही नहीं, अंजलि भागवत के बाद अपूर्वी महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारत की दूसरी महिला निशानेबाज भी बनी है। भागवत ने 2003 के विश्व कप में स्वर्ण पदक जीता था। इस तरह सोलह साल बाद भारत के खाते में यह स्वर्ण आया है। अपूर्वी से पहले यह रिकॉर्ड चीन की रुओझू झाऊ के नाम था। झाऊ ने 2018 में 252.4 अंक के साथ स्वर्ण पदक हासिल किया था। रुओझू झाऊ इस प्रतियोगिता में 251.8 अंक के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। उनके ही देश की झू होंग 230.4 अंक हासिल कर तीसरे स्थान पर 
रही।
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राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पेज पर देश के तमाम संस्करणों में 2 मार्च 19 के अंक में प्रकाशित.। 

Monday, March 4, 2019

खेत से खेल तक कहीं नहीं हैं खौफ लेकिन चौपालों में चर्चाओं का विषय बदला

श्रीगंगानगर। पहले पुलवामा में आतंकी हमला। इसके बाद हिन्दुमलकोट क्षेत्र में फायरिंग और उसी दिन देर रात अनूपगढ़-रायसिंहनगर क्षेत्र में पाक की तरफ से आसमान में दो तेज धमाकों के साथ विमान की गडग़ड़ाहट सुनाई देना। पड़ोसी मुल्क की इन तीन हरकतों के बावजूद श्रीगंगानगर जिले की सीमा से लगते गांवों में किसी तरह का कोई खौफ नहीं है। पत्रिका टीम ने हिन्दुमलकोट से लेकर घड़साना तक सरहद से सटे छह गांवों में जाकर मौके के हाल जाने। सरहदी गांवों का माहौल, मौके के हालात भी समान दिखाई दिए। ग्रामीणों की भावनाओं को कुरेदा गया तो कमोबेश हर गांव की कहानी एक जैसी मिली। किसान खेतों में पहले की तरह की काम में जुटे हैं, वहीं गांव के युवा शाम को खेलने में मशगूल हो जाते हैं। कहीं कबड्डी खेली जा रही है तो वॉलीबाल। ग्रामीणों में चौपाल में कहीं हुक्के के सुट्टे हैं तो कहीं ताशपत्ती से मनोरंजन किया जा रहा है। लब्बोलुआब यह है कि सरहद क्षेत्र में सब कुछ सामान्य ही है। सब कुछ पहले जैसा ही है। हां भावना लगभग सभी की समान ही है। सभी चाहते हैं पाकिस्तान को इस बार सबक ठीक से सिखाना चाहिए ताकि भविष्य में कभी लड़ाई की सोचे ही नहीं।

१. मिर्जेवाला (हिन्दुमलकोट) क्षेत्र के गांव दौलतपुरा से लाइव
माहौल- जनजीवन सामान्य है। कामकाज पहले की तरह ही चल रहा है। चौपाल से खेत तक सब सामान्य।
मौके के हालात- चौपाल में ग्रामीण ताजा घटनाक्रमों की चर्चा करते मिले। किसान खेतों में व्यस्त दिखाई दिए।
ग्रामीणों की भावना- सेना का साथ पहले भी दिया था। इस बार भी सेना बदला लेगी इसका पूरा भरोसा है।

२. केसरीङ्क्षसहपुर क्षेत्र के गांव ७ एस द्वितीय से लाइव
माहौल- तारबंदी के पार खेती वाले किसान जरूर आशंकित हैं। बाकी सब सामान्य। दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं।
मौके के हालात- पाकिस्तान की धोखे से हरकत करने की बात की चर्चा। डर व भय नहीं, कहते हैं 'अठै कीं कोनी Ó।
ग्रामीणों की भावना- युद्ध हुआ तो गांव खाली नहीं करेंगे। सेना का सहयोग करेंगे, साथ देंगे।

श्रीकरणपुर क्षेत्र के गांव शेखसरपाल से लाइव
माहौल- जनजीवन सामान्य। दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं। ग्रामीणों में किसी तरह का भय या खौफ नहीं।
मौके के हालात- रोजमर्रा के काम करते मिलते ग्रामीण। गांव के युवा वॉलीबाल खेलते हुए मिले।
ग्रामीणों की भावना- जवानों का साथ देना चाहते हैं। पाकिस्तान को फिर से पटकनी देने की हसरत है।

रायसिंहनगर क्षेत्र के गांव काकूसिंह वाला से लाइव
माहौल- सब सामान्य है। खेत खलिहान से चौपाल तक पड़ोसी मुल्क से बदला लेने के चर्चा है।
मौके के हालात- बिना किसी भय के गांव की चौपाल पर ताशपत्ती खेलने में मशगूल मिले।
ग्रामीणों की भावना-आर पार की लड़ाई चाहते हैं। देश सेवा के लिए हर पल तैयार।

अनूपगढ़ क्षेत्र के गांव 27 से लाइव
माहौल- सब कुछ पहले जैसा। किसी तरह का कोई तनाव नहीं। ग्रामीण अपने अपने कामों में व्यस्त।
मौके के हालात- गांव में चल रही कबड्डी प्रतियोगिता देखकर उत्साहित थे ग्रामीण। हूटिंग भी कर रहे थे।
ग्रामीणों की भावना- इस बार नापाक हरकत का मुंह तोड़ जवाब दिया जाए ताकि दुबारा हिमाकत ही ना करे।

घड़साना क्षेत्र के गांव 8 केएसएम से लाइव
माहौल- सब कुछ सामान्य है। ग्रामीणों के उत्साह में किसी तरह की कोई कोई कमी नहीं। दिनचर्या में बदलाव नहीं।
मौके के हालात- ग्रामीण हीं ताशपत्ती खेलते तो कहीं हथाई करते मिले। युवाओं में खेल में व्यस्त नजर आए।
ग्रामीणों की भावना- कायरना हरकतों को पाकिस्तान को करारा जवाब मिलना चाहिए। सेना का सहयोग करने का तैयार।
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राजस्थान पत्रिका के 27 फरवरी 19 के अंक में तमाम संस्करणों में प्रकाशित।

सावधान! फोन पर मांगी जा रही सेना से जुड़ी जानकारी!

इंटनेट के माध्यम से किए जा रहे हैं फोन, पाक की करतूत का अंदेशा
श्रीगंगानगर. भारत-पाक के मध्य बढ़े तनाव के बीच एक नए तरीके का मामला सामने आया है। सरहद से सटे गांव के लोगों के पास तेरह डिजिट के नंबर से फोन आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह फोन इंटरनेट की मदद से किए जा रहे हैं। फोन करने वाला भारतीय सेना की लोकेशन संबंधी जानकारी मांगता है। एेसे में यह पड़ोसी मुल्क की करतूत भी हो सकती है। एेसा ही एक फोन सोमासर सरपंच पति तथा टिब्बा क्षेत्र संघर्ष समिति का संयोजक राकेश बिश्नोई के पास आया । राकेश बिश्नोई अभी एटा सिंगरासर माइनर निर्माण के लिए चलाए जा रहे आंदोलन के कारण चर्चा में रहे हैं। राकेश बिश्नोई ने बताया कि बुधवार सुबह साढ़े दस बजे के करीब उनके पास तेरह डिजिट वाले नंबरों से फोन आया। फोन करने वाले ने उससे सीमा पर भारतीय सेना है या नहीं? है तो कब से है? तथा क्या कर रही है ? आदि सवाल दागे लेकिन राकेश बिश्नोई ने इनका जवाब देने में असमर्थता जताते हुए पुलिस थाने में संपर्क करने को कहा। सवाल करने वाले ने सैन्य वाहनों व टैंकों की संख्या भी पूछी लेकिन उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी। फोन +3444172258965 नंबर से आया और दो मिनट चौबीस सेकंड तक बातचीत हुई लेकिन बिश्नोई ने उसको कोई जवाब नहीं दिया। बिश्नोई ने कहा कि इस तरह का फोन किसी के पास आ सकता है, इसलिए सेना से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी शेयर नहीं करें।
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राजस्थान पत्रिका के 28 फरवरी 19 के अंक में प्रकाशित।

पहली बार आए भारत, 100 अरब डॉलर के निवेश की खुली राह


सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान 90 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक
पुलवामा आतंकी हमले के बीच अगर कोई चर्चा में रहा है तो उनमें सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का नाम भी आता है। सलमान चर्चा में इसीलिए भी क्योंकि पुलवामा आतंकी हमले के बाद उन्होंने पाक की यात्रा की। सलमान के पाक से सीधे भारत आने पर जब भारत सरकार ने आपत्ति दर्ज कराई, तो वह पाक से पहले रियाद लौटे और फिर वहां से भारत आए। सलमान की यह पहली यात्रा थी। सलमान को एमबीएस नाम से भी जाना जाता है। वे अथाह संपत्ति के मालिक हैं तथा शाही जीवन शैली के लिए अक्सर चर्चा में रहते हैं।
सलमान का जन्म 31 अगस्त 1985 को हुआ था। एक रिपोर्ट के मुताबिक सलमान 90 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रिंस सलमान ने 3200 करोड़ रुपए की यॉट, 2,936 करोड़ रुपए की द विंची की पेंटिंग और 1,957 करोड़ रुपए में फ्रांसीसी महल खरीदे थे। इसके कारण वे सुर्खियों में रहे।
सलमान को सऊदी अरब की आतंकवाद निरोधक इकाई के प्रमुख के तौर पर साल 2003-06 में आतंकवादी संगठन अलकायदा के ठिकाने पर बमबारी करने के लिए भी जाना जाता है।
भले ही उनके भारत व पाक दौरे पर कई तरह की बातें की गई हों लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के साथ 20 अरब डॉलर के करार किए जबकि भारत व सऊदी अरब के बीच पांच करार हुए। सऊदी अरब, भारत में 100 अरब डॉलर (करीब 7.1 लाख करोड़ रु) का निवेश करेगा।
प्रिंस ने 850 भारतीय कैदियों को रिहा करने के आदेश भी दिए। एक अन्य रिपोर्ट के हिसाब से सलमान ने भारतीय हज यात्रियों की संख्या को बढ़ाकर 2 लाख कर दिया है। विदित रहे कि सऊदी अरब ने भारत के लिए आवंटित हज कोटे में करीब 25 हजार की बढ़ोतरी की है। इस कारण यह कोटा अब दो लाख हो गया है।
पिछले साल 1,75,025 लोग हज पर गए थे। काबिलगौर है कि सऊदी अरब भारत का चौथा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है। सऊदी अरब भारत की कुल जरूरत का 17 प्रतिशत कच्चा तेल और 32 प्रतिशत एलपीजी मुहैया करा रहा है। ऐसे में कालांतर में इस यात्रा के परिणाम भी दिखाई देंगे।
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  राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पेज पर 25 फरवरी 19 के अंक में तमाम संस्करणों में प्रकाशित। 


पाक जा रहा पानी रुके तो 30 % बढ़ जाएगा फसलों का उत्पादन

श्रीगंगानगर. आतंकी धमाके से निकली पानी की सियासत कोई नई नहीं है। पिछले तीन दशक में सतलुज और व्यास नदियों का 15 से 20 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) से ज्यादा पानी पाकिस्तान जा चुका है।
यह इतना पानी है कि इससे इंदिरा गांधी नहर को लगातार तीन साल तक चलाया जा सकता है। केन्द्र सरकार भारत के हिस्से का पानी रोकने की दिशा में गंभीरता से अमल करे तो देश के कई इलाकों की तस्वीर बदल जाएगी। अकेले राजस्थान को पाकिस्तान बहकर जाने वाले सतलुज और व्यास नदी के पानी का बीस प्रतिशत हिस्सा ही मिले तो इंदिरा गांधी नहर के साथ-साथ भाखड़ा और गंगनहर के किसानों को सिंचाई के लिए साल भर पानी की कमी नहीं रहेगी।
इस पानी का असर सीधे तौर पर खरीफ व रबी दोनों फसलों के उत्पादन पर पड़ेगा। इससे फसलों का उत्पादन तीस प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
रावी पर बांध निर्माण का काम धीमा
रावी के पानी को पाक जाने से रोकने के लिए शाहपुर कंडी बांध के निर्माण का काम पंजाब और जम्मू कश्मीर के बीच विवाद और केन्द्र से पर्याप्त राशि नहीं मिलने के कारण समय पर नहीं हो पाया। इसका निर्माण होने से रावी के पाक जाने वाले पानी का उपयोग पंजाब—राजस्थान कर सकेंगे।
नहर की मरम्मत हो तो हमारे 10 जिलों को लाभ
इंदिरा गांधी नहर: 10 से 11 हजार क्यूसेक पानी मिल रहा। क्षमता 18500 क्यूसेक, क्षतिग्रस्त होने के कारण नहीं ले सकती 12 हजार क्यूसेक से अधिक पानी। पुनर्निर्माण हो और पानी पाक न जाए तो मिलने लगेगा 1000 से 2000 क्यूसेक तक अतिरिक्त पानी। राजस्थान के 10 जिलों को मिलेगा लाभ।
गंगनहर : 2000 क्यूसेक पानी मिल रहा। क्षमता 3000 क्यूसेक। फिरोजपुर फीडर नहर का पुनर्निर्माण हो और पानी पाक न जाए तो 2500 से 3000 क्यूसेक तक पानी मिलने लगेगा।
भाखड़ा नहर : 1200 क्यूसेक पानी इंदिरा गांधी नहर से मिल रहा है। इस नहर का पुनर्निर्माण हो जाए और पानी पाक जाना रुक जाए तो 400-500 क्यूसेक पानी और मिलने लगेगा।
दोनों नहरें जर्जर हालत में
30 हजार से घटकर 20 हजार क्यूसेक रह गई है जलग्रहण क्षमता।
अगर बांधों से पानी की आवक 25 से 30 हजार क्यूसेक होगी तो 5 से 10 हजार क्यूसेक पानी पाक चला जाएगा।
बरसात के दिनों में हरिके हैडवक्र्स पर पानी की आवक 50 हजार से 1 लाख क्यूसेक प्रतिदिन हो जाती है तब अथाह जल राशि पाक जाती है।
इन पर हो काम तब देश में रुकेगा पानी
1. राजस्थान फीडर और फिरोजपुर फीडर का जीर्णोद्धार।
2. हुसैनीवाला हैडवक्र्स के गेटों की मरम्मत।
3. पाक जाने वाले पानी के उपयोग के लिए नहरी तंत्र को मजबूत और नई नहरों का निर्माण।
4. रोपड़ बांध के अलावा हरिके और हुसैनीवाला हैडवक्र्स का नियंत्रण भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड को
दिया जाए।
ऐसे समझिए पानी
का गणित
पिछले आठ वर्षों में हरिके हैडवक्र्स से 63 लाख 984 क्यूसेक डेज पानी पाकिस्तान जा चुका है। वर्ष 2009-10 में 16 हजार, 2011-12 में 11 लाख 30 हजार, 2011-12
में 22 लाख 8 हजार, 2012-13 में 51 हजार 500, 2013-14 में 16 लाख 27 हजार 500, वर्ष 2014-15 में 4 लाख, 2015-16 में पांच लाख तथा वर्ष 2016-17 में लगभग 8 लाख क्यूसेक डेज पानी पाकिस्तान गया।
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राजस्थान पत्रिका के 25 फरवरी 19 के अंक में राजस्थान के लगभग सभी संस्करणों में  प्रकाशित ।

मंत्रीजी झुंझुनूं आए क्यों थे!

बस यूं ही
रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा गुरुवार को झुंझुनूं आए थे। उनके जाने के बाद लोगों के जेहन में अब एक ही सवाल है कि मंत्रीजी झुंझुनूं आए क्यों थे? हालांकि मंत्रीजी के आने से पहले यह उम्मीद थी कि शायद वो कोई बड़ी सौगात देकर जाएंगे। खैर, मंत्रीजी आए और चले गए लेकिन न माया मिली न राम वाली कहावत चरितार्थ जरूर कर गए। हां आए थे सो कुछ तो करना बनता ही था, लिहाजा सीकर- दिल्ली के बीच केवल तीन दिन चलने वाली ट्रेन का नाम जरूर सैनिक एक्सप्रेस रख गए, वह भी झुंझुनूं सांसद के आग्रह पर। नामकरण शायद इसलिए कि यह सैनिक बाहुल्य इलाका है। सेना व सैनिकों के प्रति यहां के लोगों में श्रद्धा है। सम्मान है। यहां सेना के नाम से ही लोग खुश हो जाते हैं। रेल सैनिकों के नाम से चलेगी तो लोगों की भावनाएं खुद ब खुद जुड़ जाएंगी। और जब भावनाएं ही जुड़ जाएंगी तो और कुछ करने की जरूरत भी कहां रह जाती है। शायद इसी फीडबैक/ सुझाव के आधार पर मंत्रीजी इस ट्रेन का नाम सैनिक एक्सप्रेस करने की घोषणा कर गए, लेकिन भूल भी गए। यह नाम तो 25 साल पहले ही रखा जा चुका है। 1992 में तत्कालीन रेल मंत्री जाफर शरीफ इस रेल का नाम सैनिक एक्सप्रेस रख चुके हैं। तब भी यह सीकर-दिल्ली के बीच चलती थी, लेकिन नियमित थी। मीटर गेज लाइन हटी तो यह ट्रेन बंद हो गई। आमान परिवर्तन के बाद इस ट्रेन का संचालन फिर शुरू हुआ, वह भी सप्ताह में तीन दिन। स्थान वो ही सीकर से दिल्ली। लाइन नई तो रेल भी नई। शायद यही सोचकर सैनिक बाहुल्य इलाके को नामकरण की यह सौगात दी गई है। फिर भी कितना अच्छा होता वो इस ट्रेन को नियमित करने की घोषणा कर के जाते, पर वो एेसा कर न सके। करें भी क्यों? जब लोग नाम से ही खुश हो रहे हैं तो मंत्रीजी और ज्यादा देवे भी क्यों?
खैर, मंत्रीजी का दौरा था। इस कारण सीकर व झुंझुनूं के सांसद भी जुटे थे तो। एेसे में कुछ तो होना ही था। और नहीं तो मंत्रीजी डिस्प्ले बोर्ड ( नेशनल ट्रेन इंक्वायरी सिस्टम) का उद्घाटन ही कर गए। यह बात अलग है कि इस ट्रेक पर रेलों की संख्या ज्यादा नहीं है, लिहाजा इस बोर्ड का हाल फिलहाल ज्यादा उपयोग होगा भी नहीं। वैसे मंत्रीजी इस रेल को अगले माह से रींगस तक बढ़ाने तथा मई तक जयपुर तक करने की कहकर गए हैं। देखने की बात यह है कि मंत्रीजी की बात सच साबित होती है या नहीं। काश! उनकी यह घोषणा सच ही साबित हो क्योंकि समय की पालना पहले भी नहीं हुई।

जब ग्रामीणों ने ट्रैक्ट्ररों को बना दिया था 'टैंक'

दो दिन तक रोके रखा था पाक सेना को
श्रीगंगानगर/ श्रीकरणपुर.
यह कहानी जिले के श्रीकरणपुर उपखंड के सीमा से सटे गांव नग्गी की है। बात करीब 47 साल पुरानी है, जब ग्रामीणों ने दो दिन तक अपने दम पर पाक सैनिकों को आगे बढऩे से रोक दिया था। दरअसल, भारत-पाक के मध्य 1971 में हुए युद्ध को समाप्त हुए दस दिन बीत चुके थे। सीमा पर तैनात भारतीय सेना लौट चुकी थी। सरहद पर सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन सीमा के उस पार धोखे से हमला करने की साजिश रची गई। इसके बाद पाक सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए और करीब एक किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना को जब पाक की इस नापाक करतूत की जानकारी मिली तो चार पैरा बटालियन को क्षेत्र मुक्त करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। भारतीय सेना को मौके पर पहुंचने पर कुछ विलम्ब हुआ। सीमा पर पाक सैनिकों व टैंकों का जमावड़ा देख नग्गी के ग्रामीण चिंतित तो हुए लेकिन उन्होंने दिमाग से काम लिया। आसपास के गांवों से ट्रैक्टर एकत्रित कर उनके साइलेंसर निकाल लिए गए। इसके बाद तेज आवाज में उनको गांव में घुमाया गया। बिना साइलेंसर के ट्रैक्टरों की आवाज को पाक सैनिकों ने टैंकों की आवाज समझा और दो दिन तक वह आगे नहीं बढ़ पाए। इसके बाद भारतीय सेना ने आकर मोर्चा संभाल लिया था। क्षेत्रवासियों की ओर से सेना को दी मदद का आज भी सैन्य अधिकारी आभार जताते हैं। वहीं इस घटना के साक्षी जो कि अब उम्रदराज हो चुके हैं, वे इसे अपना फर्ज मानते हैं।
मात्र दो घंटे में खदेड़ दिया था पाक सेना को
आदेश मिलने के बाद 4 पैरा बटालियन ने 28 दिसम्बर की सुबह चार बजे पाक सैनिकों पर हमला बोला।मात्र दो घंटे की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना को फिर पराजय का मुंह देखना पड़ा और उसके सैनिक भाग खड़े हुए। भारतीय सेना के आक्रमण को विफल करने के लिए पाकिस्तानी सेना ने तोप से 72 गोले बरसाए जिससे 4 पैरा बटालियन के 4 अधिकारी व 21 जवान शहीद हो गए। युद्ध में शहीद रणबांकुरों की स्मृति में उसी जगह पर एक स्मारक बनाया गया। भारत पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज पांच सौ फीट दूर यह स्मारक आज भी उन वीरों की याद दिलाता है। यह लड़ाई भारतीय सेना के इतिहास में 'सैंड ड्यूनÓ के नाम से दर्ज है।
आज भी तैयार हैं ग्रामीण
नग्गी के ग्रामीण 1971 की तरह सेना की मदद को तैयार हैं। बुजुर्ग ग्रामीणों योगराज मेघवाल व अर्जुन राम ने आतंकी हमले की निंदा करते हुए कड़े कदम उठाकर की बात कही। उन्होंने 1971 के युद्ध का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय पाक ने गांव नग्गी में कई बम गिराए गए लेकिन वे गांव छोड़कर नहीं भागे और सेना का सहयोग किया। यही वजह थी कि कुछ ही देर में दुश्मनों को घर का रास्ता दिखा दिया गया। वार्ड पंच शिवभगवान मेघवाल, राजकुमार शर्मा, रामप्रताप मेघवाल, सतपाल डूडी, भानीराम ने कहा कि पाक को करारा जवाब देने के लिए वे आज भी सेना का हरसंभव सहयोग करने को तैयार हैं।
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राजस्थान पत्रिका के तमाम संस्करणों में 21 फरवरी 19 के अंक में प्रकाशित

शहीद की परिभाषा नहीं-3


बस यूं ही
सेनाओं में भारतीय सेना, वायुसेना व नौसेना शामिल हैं। सेना युद्ध के वक्त की मोर्चा संभालती है। युद्ध न होने या सामान्य दिनों में सेना के जवान छावनी में रहते हैं। वैसे सेना, वायुसेना व नौ सेना के लिए अलग-अलग रिहायशी क्षेत्र बनाए गए हैं। युद्ध नहीं होता है, तो सेनाएं वहीं रहती हैं हालांकि नौसेना का काम थोड़ा अलग है। उसका काम समुद्री सीमाओं की सुरक्षा का है। एेसे में शांति के समय भी नौ सैनिकों को समुद्री सीमाओं पर तैनात रहना पड़ता है। यह तीनों सेनाएं रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करती है। सेना में लेफ्टिनेंट, मेजर, कनज़्ल, ब्रिगेडियर, मेजर जनरल आदि रैंक होती हैं. सैनिकों को रिटायरमेंट के बाद पेंशन मिलती है। तीनों सेनाओं में करीब साढ़े तेरह लाख सैनिक हैं।
अब बात करते हैं अद्र्धसैनिक बलों की। इनमें सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआईएसफ, असम राइफल्स व एसएसबी शामिल हैं। वर्तमान में अद्र्धसैनिक बलों के जवानों की संख्या नौ लाख से ज्यादा बताई जाती है। इनमें भी सिविल पुलिस की तरह कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, एएसआई, असिस्टेंट कमांडेंट और कमांडेंट, डीआईजी, आईजी और डीजी की पोस्ट होती है। अद्र्धसैनिक बलों को सेवानिवृत्ति के बाद सेना की तरह पेंशन नहीं मिलती है। अद्र्धसैनिक बल गृह मंत्रालय के अधीन हैं। कौनसे बल को कहां तैनात किया जाता है तथा उसकी क्या भूमिका होती है। इसको हम इस तरह से समझ सकते हैं। सीआरपीएफ को आतंकवाद व नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात किया जाता है। इसको केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल भी कहा जाता है। इसी तरह बीएसएफ जिसे सीमा सुरक्षा बल भी कहते हैं। इसके जवानों को बांग्लादेश व पाकिस्तान से सटी सीमा पर तैनात किया जाता है। एक तरह से बीएसएफ शांति के समय सरहद की निगरानी रखती है। युद्ध काल में बीएसएफ की जगह सेना के जवान मोर्चा संभालते हैं। इसी तरह आईटीबीपी जिसे भारत-तिब्बत सीमा पुलिस भी कहा जाता है, इसके जवानों को भारत-तिब्ब्त सीमा पर लगाया जाता है। केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल अर्थात सीआईएसएफ पर सरकारी उपक्रमों की सुरक्षा की जिम्मा रहता है। असम राइफल्स के जवानों को असम के उग्रवाद प्रभावित इलाकों में तैनात किया जाता है तो एसएसबी मतलब सशस्त्र सीमा बल को भारत-नेपाल सीमा लगाया जाता है।
बहरहाल, सबसे ज्वलंत मसला अद्र्धसैनिकों बलों द्वारा सेना जैसी सुविधाओं व सहुलियतों की मांग करना है। अद्र्धसैनिक बलों की शिकायत यह है कि वह भी लगभग सेना जैसी परिस्थितियों में ही काम करते हैं। इतना ही नहीं देश के भीतर तथा सीमाओं पर तैनात रहते हैं, इसलिए उनको भी सेना की तरह सेवा शर्तें व सम्मान मिलना चाहिए।
अक्सर आम लोग भी लोग सेना और अद्र्धसैनिक बलों को एक मानने या समझने की भूल कर बैठते हैं। पुलवामा हमले के बाद तो इस बात ने ज्यादा जोर पकड़ा है। फिर भी सेना व अद्र्धसैनिक बलों का काम और सेवा शर्ते अलग-अलग होती हैं। अद्र्धसैनिक बलों की पेंशन संबंधी मांग को कॉन्‍फेडरेशन ऑफ रिटायर्ड पैरा मिलिट्री एसोसिएशन के महासचिव रणवीर सिंह के बयान से समझा जा सकता है। यह बयान उन्होंने एक वेबसाइट को दिया था। उनका कहना था कि 'सातवें वेतन आयोग में अद्र्धसैनिक बलों को सिविलयन मान लिया गया है। उनको वन रैंक वन पेंशन की बात तो दूर, सातवें वेतन आयोग में उनको भत्ता तक नहीं दिया। अद्र्धसैनिकों की न केवल पेंशन बंद कर दी गई है, बल्कि सैनिकों की तरह एमएसपी (सैन्य सेवा वेतन) भी नहीं दिया जाता है। उन्होंने बताया कि सेना के जवानों को कैंटीन में जीएसटी की छूट दी गई है, लेकिन अद्र्धसैनिक बलों के जवानों को कैंटीन में जीएसटी से कोई छूट नहीं मिली है। Ó फिर भी निष्कर्ष के रूप में यह जरूर कहा जा सकता है कि अद्र्धसैनिक बल भी सेना के साथ मिलकर देश और देश के नागरिकों सुरक्षा करते हैं, इसलिए उनकी सेवा को भी कम नहीं आंका जा सकता है।
-इति

सेना के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध को तैयार

श्रीगंगानगर . पाक सीमा से सटे श्रीगंगानगर जिले के ग्रामीण अब आरपार की लड़ाई के मूड में हैं। सरहदी गांवों के लोग कहते हैं कि इस बार वो सेना के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध करने को तैयार हैं। युद्ध हुआ तो पीछे नहीं हटेंगे। हिन्दुमलकोट में इसी बात की चर्चा है कि पाक को जवाब कैसे दें? अनूपगढ़ क्षेत्र में सीमा से ढाई किमी दूर आबाद गांव 27 ए और 32 ए में ग्रामीणों की चौपाल में अब चर्चा फसल-पानी की न होकर पुलवामा के शहीदों और केन्द्र सरकार की ओर से सेना को दी गई छूट की है। 1971 का युद्ध देख चुके गांव नग्गी के मामराज ने कहा कि उस समय पाक ने नग्गी में कई बम गिराए, लेकिन गांव छोड़कर नहीं भागे। पूर्व सरपंच रणजीत कहते हैं कि पाक सीमा पर नजर रखने के लिए कई ग्रामीण रात को पानी की बारी लगवा रहे हैं।

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.राजस्थान पत्रिका के लगभग सभी संस्करणों में 20 फरवरी 19 के अंक में प्रकाशित 

शहीद की परिभाषा नहीं-2

बस यूं ही
दरअसल शहीद के दर्जे की मांग से तात्पर्य उस सुविधा व पैकेज से भी जुड़ा है, जिसमें कइयों को ज्यादा भत्ता व पैकेज मिलता है तो कइयों को कम। वैसे तो यह सरकारों की इच्छा शक्ति तथा शहीद होने परिस्थितियों पर निर्भर होता है कि जवान ने किस हालात में प्राण गंवाए लेकिन इसको भी देश सेवा ही जोड़ा जाता है। वैसे नैतिक दृष्टि से शहीद को लेकर कोई विवाद नहीं है। जो सीमा, मजहब या सरोकार की रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग करे वह शहीद है। खैर, इनके सबके बावजूद एक सवाल लोगों के जेहन में और तैरता है, वह यह कि जब शहीद का दर्जा होता ही नहीं है तो अखबार व टीवी उनको शहीद क्यों पुकारते व प्रचारित करते हैं? वैसे मेरा मानना है कि शहीद को और कोई नाम देना बेमानी है। शहीद वही है जो देशहित में किसी खास उद्देश्य के लिए लड़ता हुआ प्राण त्याग दे। अगर कोई भागते हुए मारा जाता है तो वह शहीद नहीं हो सकता है। कई बार नेताओं को भी शहीद पुकारा जाता है, विशेषकर किसी बड़े पद पर रहते हुए जिनकी हत्या हो जाती है। यह बात दीगर है कि हताहत नेता देश सेवा से जुड़े थे लेकिन किसी युद्ध के मोर्चे पर नहीं थे। वैसे प्राणोत्सर्ग करने के बाद किसको क्या मिलना यह मिलना है यह तो भर्ती के समय ही तय हो जाता है। इतना होने के बावजूद युद्ध या ऑपरेशन में प्राणोत्सर्ग करने वालों के लिए शहीद की बजाय दो नाम जरूर तय किए गए हैं। एक है बैटल कैजुअल्टी तो दूसरा है ऑपरेशन केजुअल्टी। बैटल कैजुअल्टी मतलब लड़ाई में प्राण त्यागना और ऑपरेशन केजुअल्ट का अर्थ है कि किसी कार्रवाई में प्राण त्यागना। हां शहादत को सम्मान किस तरह का देना है? आर्थिक लाभ मसलन पेट्रोल पंप या पुरस्कार राशि यह सरकारों पर भी निर्भर होता है। इसके लिए सर्व सामान्य या सर्व स्वीकृत नियम भी नहीं है। अक्सर विवाद या बहस की वजह भी यही विषय बनते हैं कि फलां शहीद को इतना पैकेज मिला तो और फलां को इतना। भत्तों या पैकेज में अंतर भी बड़े असंतोष का बड़ा कारण भी बन जाता है।
बहरहाल, अद्र्धसैनिकों को शहीद का दर्जा देने के साथ-साथ उनकी पेंशन बंद का मामला भी गरमाया हुआ है। पेंशन के पीछे न मिलने के क्या कारण हैं तथा अद्र्धसैनिकों में कौनसी फोर्सेज शामिल हैं, पहले यह जानना भी जरूरी है।
क्रमश:

शहीद की परिभाषा ही नहीं-1

बस यूं ही
आजकल शहीद शब्द प्रासंगिक हैं। विशेषकर पुलवामा में जवानों के काफिले पर आतंकी हमले के बाद यह शब्द जबरदस्त प्रचलन में है। इसके साथ ही कई तरह के सवाल भी हैं, मसलन, शहीद कौन होता है? शहीद किसे कहते हैं? यह दर्जा कौन देता है? सैनिकों को शहीद तो अर्ध्दसैनिकों को शहीद का दर्जा क्यों नहीं? इस तरह के सवालों को लेकर सोशल मीडिया पर भी अच्छी खासी बहस चल रही है। कुछ इसी तरह के मामले में मेरा खुद का वास्ता भी आज पड़ा, लिहाजा मन किया कि इस विषय में लोगों की जो शंकाएं हैं, उनको दूर किया जाए। एक व्हाट्सएप ग्रुप में आज सुबह-सुबह ही एक मैसेज देखा। मैसेज क्या वह एक सवाल ही था, सीआरपीएफ के जवानों को शहीद का दर्जा दिया है या नहीं? कृपया अवगत कराएं। उसी के नीचे दूसरा संदेश था, अभी तक तो कोई आदेश नहीं हुआ शायद। फिर तीसरे साथी ने लिखा, फिर मीडिया इस शब्द का प्रयोग कर रही है, शायद चांस है? चौथे का मैसेज आया। यह मैसेज भी उन्हीं का था जिन्होंने पहला संदेश लिखा था। ना पेंशन मिलती है ना शहीद का दर्जा है, फिर हम इसके लिए मांग क्यों नहीं करते? फिर बहस लंबी चली। और इसी बहस का हिस्सा मैं था तो लगा इस तरह के सवाल और भी कई लोगों के होंगे। जरूर उनके जेहन में सवाल खड़ा होगा कि आखिर शहीद किसको माना जाता है और किसको नहीं?
दरअसल, लंबे समय से इस बात का जवाब मिला ही नहीं है कि शहीद किसको माना जाए। देश हित के लिए युद्ध में प्राणोत्सर्ग करने वाला शहीद है या आजादी की लड़ाई में संघर्ष कर प्राण न्योछावर करने वाले शहीद हैं। या एेसे राजनेता जिनकी देश के लिए कार्य करते समय हत्या हो गई वो शहीद हैं? सेना व अर्ध्दसैनिक बलों में अप्राकृतिक मौत पर भी लोग आजकल शहीद का दर्जा चाहते हैं। इतना ही नहीं युद्ध के अलावा छोटी मोटी सैन्य कार्रवाई में जान गंवाने वालों को भी शहीद का दर्जा देने की मांग उठती है। पाक समर्थित आंतकी हमलों में शिकार जवानों को भी शहीद प्रचारित किया जाता है।
खैर, इन सबके बीच महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश में शहीद की कोई स्पष्ट परिभाषा ही नहीं है। करीब तीन साल पहले देश के गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजु ने लोकसभा में कहा था कि शहीद की कोई परिभाषा नहीं है। इतना ही नहीं सशस्त्र सेना और रक्षा मंत्रालय ने भी शहीद की कोई व्याख्या नहीं की है। अब फिर सवाल उठता है कि जब परिभाषा ही नहीं है तो फिर शहीद कहा क्यों जाता है? एेसे में साधारण रूप से मानकर चला जाता है कि सरकार के आदेश पर देश व जनता की सुरक्षा के लिए सेना जब देश के बाहर के दुश्मनों से लड़ती है। और इस दौरान जो सैनिक काल कवलित हो जाता है, उनको शहीद कहा जाता है। यही कारण है भारत की सुरक्षा करते हुए चीन व पाकिस्तान की लड़ाई में प्राणोत्सर्ग करने वाले सैनिकों को शहीद कहा जाता है।
क्रमश:

अब और नहीं #AbAurNahi

हो जाए आर या पार
शायद यह पहला मौका था जब देश में शुक्रवार सुबह न सुप्रभात हुई और ना ही गुड मोर्निंग। सुबह से ही सबके मोबाइल पर संवेदनाओं का सैलाब था। सोशल मीडिया के तमाम माध्यमों पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देने की होड़ सी लगी थी तो गम और गुस्से में डूबा देश एक सुर में इस नापाक हरकत का मुंह तोड़ जवाब देने को उठ खड़ा हुआ। आक्रोश की आग में जल रहे देशवासियों की जुबां पर महज दो बातें, अब और नहीं, आर या पार ही थी। निहत्थे जवानों पर धोखे से किए शर्मनाक व कायराना हमले के खिलाफ देशवासियों को खून खौल रहा है। सब्र का बांध सीमाएं तोड़कर बदला लेने को आमादा हैं। आंसू तो अब आक्रोश में तब्दील हो चुके हैं। पानी नाक से ऊपर आ चुका है, सियासी बयानों से विश्वास उठने लगा है। देशवासियों को अब कुछ कहने या सुनने में यकीन नहीं है। वो अब कुछ कर गुजरने के अलावा और कुछ चाहते ही नहीं हैं। यह बात दीगर है कि हमारा देश हमेशा शांति का पक्षधर रहा है लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि शराफत का नाजायज फायदा ही उठा लिया जाए। सोचिए, शेर अगर दहाडऩा व शिकार करना छोड़ दे तो फिर गीदड़ भी आंख दिखाने की हिमाकत करने लगते हैं। सांप काटना छोड़ दे तो लोग खिलौना न बना लें। समय का तकाजा यही है कि मौका मिलने पर अपनी शक्ति दिखा देनी चाहिए। इस बार एेसी शक्ति दिखानी चाहिए कि पड़ोसी मुल्क की सात पुश्तें भी इस शक्ति को याद कर कर के कांप उठे।
यह सब करना इसीलिए भी जरूरी है कि ताकि सुरक्षा बलों का मनोबल ऊंचा बना रहे। आज समूचे देश ने एक सुर में जो संदेश दिया है यकीनन वह सेना का हौसला बढ़ाने वाला है, लेकिन इस तरह के हमलों के जवाब में कोई कार्रवाई होती रहे तो जवानों को यह भी लगता रहे कि उन्होंने अपने निहत्थे साथियों की मौत का बदला ले लिया। आज देश ही नहीं जवान भी बदले की आग में झुलस रहे हैं। उनको दुश्मन को नेस्तनाबूद करने को कह दिया गया है। यकीनन हमारे रणबांकुरे यह सब करके इतिहास रचेंगे। बात चाहे 1948 की हो, 1965 की हो, 1971 की हो या फिर करगिल युद्ध की। हमारे बहादुर सैनिकों ने हमेशा ही फतह हासिल की है लेकिन इस बार दिल कुछ एेसा चाहता है कि भविष्य में फिर कभी युद्ध जैसी नौबत आए ही नहीं। मतलब आर या पार....#AbAurNahi

Thursday, February 14, 2019

अभी और फैसले लेने होंगे


टिप्पणी
श्रीगंगानगर जिले में पुलिस व प्रशासन के मुखिया बदलने के बाद व्यवस्थाओं में सुधार का सिलसिला शुरू हुआ है। बीते पांच दिन में शहर की सबसे बड़ी और दिनोदिन गहराती समस्या से पार पाने के जो प्रयास हुए हैं, उनसे कुछ उम्मीद बंधती है, हालांकि व्यवस्था में सुधार के लिए इस तरह की कवायद पहले भी होती रही हैं लेकिन मॉनिटरिंग के अभाव में व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौटती रही। खुशी की बात यह है कि नई कवायद का आंशिक असर दिखाई देने लगा है। उम्मीद की जानी चाहिए कालांतर में व्यवस्था में और ज्यादा सुधार होगा। यह उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि अभी बेपटरी व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए गंभीर व ईमानदार प्रयास करने होंगे। जनहित में कड़े व बड़े निर्णय भी लेने होंगे। शाम सात से बारह के बीच बसों को जस्सासिंह मार्ग से निकालने के फैसले ने कोडा चौक से लेकर चहल चौक तक यातायात दवाब को कम किया है। जस्सासिंह मार्ग पर कुछ दूरी में सड़क संंकरी है और मलबा पड़ा है, जिससे आवागमन सुचारू नहीं रह पाता। स्वाभाविक सी बात है नई व्यवस्था बनाने में जोर आता है और जनहित को ध्यान में भी रखा जाता है। चौकों पर लगाने वाले जाम से अब राहत मिली है, हालांकि इस बदलाव के पक्ष व विपक्ष में दलील देने वाले भी कम नहीं हैं लेकिन यह फैसला समय की मांग को ध्यान में रखकर किया गया है। जस्सासिंह मार्ग पर बसंती चौक के पास जो समस्या है और जिस वजह से उसका भी यकीनन समाधान खोजना चाहिए। मीरा चौक व मटका चौक स्कूल खेल मैदान के पास पार्किंग बनाने का प्रस्ताव भी सिरे चढ़ा तो यह भी काफी राहत देगा। शिव चौक से सुखाडि़या सर्किल तक डिवाइडरों के कट बंद करने से भी जाम कम लगेगा। पंजाब जाने वाली बसों को तीन पुली से होकर गुजारने का फैसला भी अच्छा है, इससे भी यातायात का दबाव कम होगा। इधर मुख्य डाकघर से रेलवे स्टेशन को नोन वैंडिंग जोन घोषित करने से वहां अब रेहडि़यां खड़ी नहीं होगी। इस फैसले भी इस मार्ग पर जगह निकलेगी जो, रेंग-रेंग कर चलने वाले यातायात को गति देगी। 
बहरहाल जो फैसले अमल में आ चुके हैं, उनकी कड़ाई से पालना हो और साथ-साथ में समीक्षा भी ताकि कोई नई समस्या पैदा हो रही हो तो समाधान साथ-साथ खोजा जा सकता है। इसके अलावा जो प्रस्ताव बने हैं, उनकी जल्द से जल्द क्रियान्विति हो। यह सब करने के बाद भी काफी कुछ करने की गुंजाइश रह जाती है, मसलन, शहर में ऑटो हर कहीं खड़े हो जाते हैं, इनके लिए भी स्टैंड का निर्धारण हो। कई शहरों मंे ऑटो रिक्शा के लिए बकायदा स्टैंड निर्धारित हैं। एेसा करने से मनमर्जी का ठहराव नहीं होगा और इससे भी यातायात सुगम होगा। गोलबाजार के चौकों पर पसरा अतिक्रमण भी हटाया जाना चाहिए। चूंकि गोलबाजार में पैदल लोग ज्यादा आते हैं लेकिन चौपहिया व दुपहिया वाहनों के कारण उनको चलने में भी असुविधा होती है। यहां चौपहिया वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाता सकता है, या वैकल्पिक तौर पर सुबह-शाम जब यातायात दबाव होता है तब प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है। शहर में संचालित विभिन्न स्कूलों के वाहन भी एक साथ निकलते हैं। इससे भी जाम की स्थिति पैदा हो जाती है। स्कूल बसों के वर्तमान रूटों में भी बदलाव की जरूरत है। इन सबके अलावा पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को बीच-बीच में बदलाव का जायजा जरूर लेना चाहिए ताकि वह वस्तुस्थिति जान सके और जनता को होने वाली पीड़ा को करीब से महसूस कर सकें।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 13 फरवरी 19 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी । 

मतदाताओं को मुफ्तखोर बनाते राजनीति दल

बस यूं ही
आज एक फरवरी के समाचार पत्रों की प्रमुख खबर थी। 'खबर थी सामान्य वर्ग के स्नातक बेरोजगारों को एक मार्च से भत्ता जाएगा। इसके तहत सामान्य श्रेणी के पुरुष को तीन हजार तो सामान्य श्रेणी की महिला को साढ़े तीन हजार रुपए दिए जाएंगे। सामान्य श्रेणी के महिला-पुरुषों के लिए यह भत्ता तीस साल तक का होने तक दिया जाएगा।' यह खबर पढऩे के बाद से ही कई सवाल रह-रह कर कौंध रहे हैं। पहला सवाल तो यह है कि बेरोजगारी क्या तीस साल तक ही रहती है? इसके बाद क्या वह स्वत: समाप्त हो जाती है या फिर बेरोजगार इतना भत्ता पा लेेता कि वह आत्मनिर्भर बन जाता है? आखिर उम्र तय करने का पैमाना क्या है? खैर, इन सवालों के बीच एक दूसरा सवाल भी दिमाग को मथ रहा है। राज्य सरकार ने घोषणा तो साढ़े तीन हजार की थी कि लेकिन अब इसमें भी भेद किया गया है। अब महिला बेरोजगार को साढ़े तीन हजार तथा पुुरुष बेरोजगार को तीन हजार दिए जाएंगे। मान लो बेरोजगार दपंती है या भाई-बहन हैं तो फिर भी घर का मामला मानकर संतोष किया जा सकता है लेकिन क्या लिंगीय भेदभाव नहीं है? क्या इससे असमानता की भावना घर नहीं करेगी? खैर मेरी तरह यह सवाल कइयों के जेहन में दौड़ रहे होंगे। हो सकता है सरकार या उसके समर्थक यह दलील भी दे सकते है कि महिला शिक्षा को बढ़ावा देने या लिंगानुपात के प्रति लोगों की सोच बदलने के लिए राशि में अंतर किया है। लेकिन अगर एेसा है तो यह बढ़ावा चुनाव के दौरान भी दिया जाना चाहिए। टिकट वितरण के दौरान भी दिया जाना। मंत्रिमंडल के गठन के दौरान भी दिया जाना चाहिए। वैसे भी देश में बेरोजगारी भत्ते की राशि व उम्र को लेकर कोई समान मापदंड नहीं हैं। इसलिए यह विशुद्ध रूप से राज्य सरकारों पर निर्भर करता है कि किसको कितना देना है? कब तक देना है? किस तरह से देना है?
बहरहाल, प्रदेश में पंजीकृत व पात्रों की संख्या को देखते हुए राजकोष से हर माह 24 करोड़ का भुगतान किया जाएगा। यह राशि बढ़ भी सकती है, क्योंकि घोषणा होने के बाद पंजीकरण करवाने वालों की संख्या में इजाफा होना तय मानिए। हालांकि हम लोगों में स्विटजरलैंड की तरह निर्णय लेने का हौसला अभी नहीं है। वहां की 78 प्रतिशत जनता ने इस तरह के बेरोजगारी भत्ते लेने से इनकार कर दिया था लेकिन हमारे देश में राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मतदाताओं को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सरकारों की तरफ से दी जाने वाले तमाम मुफ्त योजनाएं एक तरह से मीठी गोली है, जो लोगों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बाधक बनती है। मुफ्तखोर बनाने की यह होड़ अब थमनी चाहिए। अगर राजनीति दलों को यह घोषणााएं मुफीद लगती है तो फिर उनको राजकोष को बख्श देना चाहिए। जब राजनीतिक दल अपने खुद के फायदे के लिए यह सब करते हैं तो फिर खर्चा भी खुद के पल्ले से ही होना चाहिए।

क्रांतिकारी बदलाव

बस यूं ही
कोख में बेटियों को कत्ल करने, बेटा-बेटी में भेद करने तथा लिंगानुपात में बड़ा अंतर होने की बड़ी वजह दहेज भी है। दहेज एक एेसी कुरीति है, जिससे कोई अछूता नहीं है लेकिन राजपूत समाज में यह इसका प्रचलन इस कदर है कि लड़की का बाप होना किसी गुनाह से कम नहीं है। लड़का पढ़ लिखकर योग्य हो गया तो फिर शादी के लिए उसकी बोली लगती है। बाकायदा लाखों रुपए का टीका और चौपहिया वाहन पहली शर्त है। टीके की राशि व चौपहिया वाहन का मॉडल वर की योग्यता के आधार तय होता है। सुयोग्य व रोजगार वाले वर के लिए लड़की का पिता मजबूरी में इस बोली में शामिल होता है और वह अपनी औकात से बाहर जाकर या कर्जा लेकर बेटी के हाथ पीले करता है। सामाजिक मंचों व सम्मेलनों में इस कुरीति के उन्मूलन के आह्वान कई बार हुए लेकिन मामला सिरे चढ़ा नहीं है। सार्वजनिक मंचों पर दहेज का विरोध करने वाले ही अंदरखाने इस खेल में शामिल होते देखे गए। दहेज लेना स्टेटस सिंबल बन गया। बड़ी शान से टीके की राशि व गाड़ी का मॉडल बताया जाने लगा। समाज में एक तरह की प्रतिस्पर्धा सी चल पड़ी है। फलां का बेटा तो फौज में है, उसके पांच लाख व कार आई है, मेरा तो डाक्टर है, उससे कमत्तर थोड़े ही है। विडम्बना देखिए यह तुलना लड़के वालों में खतरनाक स्तर पर है।
एेसे प्रतिकूल माहौल के बीच पिछले कुछ समय से परिदृश्य में बदलाव दिखाई देने लगा है। और इस बदलाव के अगुवा बने हैं समाज के युवा। इन युवाओं ने समाज के सामने एक नजीर रखी है। अपनी पुरानी पीढ़ी को आइना दिखाया है। राजपूत समाज के युवा दहेज को सिरे से खारिज कर रहे हैं। अभी संख्या भले ही कम है लेकिन यह सुखद शुरूआत है। यह एक क्रांतिकारी बदलाव का आगाज है। इसको बढ़ावा दिया जाना जाहिए। सामाजिक सम्मेलनों व मंचों पर दहेज न लेने वालों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा से लोग प्रेरित हो सकें। कहा भी गया है अच्छाई की मार्केटिंग होनी चाहिए। यह सब इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि बीते एक सप्ताह में राजपूत समाज के करीब सात एेसे विवाहों के बारे में सुना या पढ़ा है, जब समाज के युवाओं ने लाखों की नकदी को ठुकरा कर एक रुपया व नारियल लेने में अपना गौरव समझा। इन सात विवाहों में दो तो मेरे गांव केहपुरा कलां से ही संबंधित हैं। पहली शादी २२ जनवरी को भाई दिनेशसिंह की हुई जब उसने बतौर शगुन दो लाख रुपए लेने से मना कर दिए। दूसरी शादी कल ही २९ जनवरी को जयपुर में हुई है। भाईसाहब भगवानसिंह की बिटिया हिमानी कंवर के ससुराल पक्ष वालों ने साढ़े तीन लाख रुपए के टीके को नकार दिया। इस तरह बिना दहेज वाली तीन शादियां आज बुधवार को समाचार पत्रों की सुर्खियों में थी।
इस तरह के विवाहों की पहले कभी-कभार ही खबरें आती हैं लेकिन अब यह सिलसिला गति पकड़ रहा है। इसका गति पकडऩा समाज हित में है और देश हित में भी। इससे दूसरे समाजों को भी प्रेरणा मिलेगी। शादियों में फिजूलखर्ची व दिखावे पर भी रोक लगेगी। इन सब के अलावा सबसे बड़ी बात इससे बेटे-बेटी का भेद कम होगा। कोख में बेटियों का कत्ल होना कम होगा। बेटियां हैं तो कल हैं। बेटियां ही नहीं रहेंगी तो फिर बेटे बिना दुल्हन के ही घूमेंगे। एेसे भयावह हालात बनने भी लगे हैं। यह हालात तभी बदलेंगे जब दहेज रूपी कुरीति का पूर्ण रुपेण उन्मूलन हो जाए। आइए आप और हम भी कुछ इसी तरह का संकल्प करें।

यह उपेक्षा क्यों?



टिप्पणी
इसमें कोई दो राय नहीं कि बीकानेर रेल मंडल ने पिछले दो साल में क्षेत्र को कई रेलों की सौगात दी है। इनमें छोटे व बड़े दोनों रूटों की रेल शामिल हैं। इसके बावजूद श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ के लोगों के लिए जयपुर अभी भी दूर है। उन्हें रेल सेवाओं के विस्तार का लाभ उतना ही नहीं मिला, जितना कि अब तक मिल जाना चाहिए था। नए रूट बनाना तथा उन पर रेल चलाना नीतिगत फैसला हो सकता है लेकिन उसमें यह भी देखना चाहिए कि क्या यह व्यवहारिक या न्याय संगत हैं? उसमें किसी की उपेक्षा तो नहीं हो रही है? अब इन चार उदाहरणों से समझिए कि क्षेत्र के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के लोगों का सफर लंबा या अधूरा कैसे हो रहा है। श्रीगंगानगर से सादुलपुर के लिए इंटरसिटी चल रही है। जयपुर जाने वाले यात्री के लिए राजगढ़ से कोई सुविधा नहीं है। यात्री चूरू जाए या चूरू से सीकर जाए बस इतना ही कर सकता है। या फिर बस पकड़े। बिलासपुर से बीकानेर के बीच साप्ताहिक ट्रेन चलती है लेकिन यह बीकानेर से चलकर सूरतगढ़ से हनुमानगढ़ होकर आगे जाती है। इससे श्रीगंगानगर के यात्री वंचित हैं। एेसे में उन्हें सूरतगढ़ या हनुमानगढ़ जाकर ट्रेन पकडऩी पड़ती है। दूसरा यह है कि इस ट्रेन का रूट राजगढ़, चूरू, रतनगढ़, डेगाना होकर जयपुर है। एेसे में जयपुर का सफर लंबा हो गया। इतना लंबा घूमकर कौन जाएगा? अब एक नई साप्ताहिक ट्रेन शनिवार को बीकानेर से इंदौर के बीच चलेगी। इस ट्रेन का रूट श्रीडूंगरगढ़, रतनगढ़, चूरू, लक्ष्मणगढ़, फतेहपुर, सीकर, रीगंस, फुलेरा, अजमेर होते हुए इंदौर रखा गया है। इस ट्रेन से प्रत्यक्ष रूप से हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर के यात्रियों को फायदा नहीं है। दूसरी बात यह रेल राजधानी होकर नहीं निकलेगी। सबसे बड़ी चकित करने वाली बात तो यह है कि सूरतगढ़ से हनुमानगढ़ के बीच 27 जनवरी से रोजाना स्पेशल रेल चलेगी। इस रेल में नौ साधारण श्रेणी व दो गार्ड डिब्बों सहित 11 कोच होंगे। हनुमानगढ़ से सूरतगढ़ के बीच दूरी मात्र पचास किलोमीटर हैं। हनुमानगढ़ के बीच तीन स्टेशन हैं, रंगमहल, पीलीबंगा व डबलीराठान। इस लिहाज से इस रेल से लाभान्वित होने वाले यात्री खुशकिस्मत हैं। लेकिन सवाल यहीं से खड़े होते हैं। श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ को जयपुर जोडऩे की इच्छा शक्ति न तो रेलवे की लगती है न ही यहां के जनप्रतिनिधियों की। क्या सूरतगढ़-हनुमानगढ़ जैसी ट्रेन सीकर तक नहीं चल सकती? क्या नए-नए रूट इजाद करने वाले रेलवे को रींगस से जयपुर वाया फुलेरा का रूट नहीं दिखता? (जब तक रीगंगस-चौमूं-जयपुर मार्ग चालू नहीं हो जाता तब तक वैकल्पिक व्यवस्था कर यात्रियों को सुविधा दी जा सकती है।) क्या श्रीगंगानगर-सादुलपुर इंटरसिटी का फेरा सीकर तक नहीं किया जा सकता? श्रीगंगानगर से सीकर तक तो रेल का प्रस्ताव तैयार हुए भी सालभर के करीब हो गया लेकिन रैक न मिलने का बहाना बनाकर क्षेत्र की लगातार उपेक्षा की जा रही है। 
गाहे-बगाहे रेल सेवा शुरू करवाने का श्रेय लेने वाले जनप्रतिनिधियों को इस ट्रैक की याद क्यों नहीं आती? करीब दस साल से श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के यात्रियों के लिए जयपुर दूर है लेकिन फिर भी बहाने बनाकर देरी की जा रही है। रेलवे और यहां के जनप्रतिनिधियों को चाहिए इस मामले को प्राथमिकता में शामिल करें, क्योंकि ज्यादा उपेक्षा भी अच्छी नहीं होती।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 26 जनवरी 19 के अंक में प्रकाशित

है काम आदमी का, औरों के काम आना

बस यूं ही
चौबीस जनवरी की सर्द सुबह के ठीक आठ बजे मैं झुंझुनूं बस स्टैंड पहुंचा...। पता किया तो बताया श्रीगंगानगर के लिए बस साढे आठ बजे है। मैं बस की तरफ बढा तो एक शख्स ने सवालिया नजरों से देखा और बोले श्रीगंगानगर? मैं उनका आशय यही समझा कि यह बता रहे हैं जबकि वो मेरे से यह पूछना चाह रहे थे कि आप श्रीगंगानगर जा रहे हो क्या?
खैर, अपना बैग सीट पर रखकर मैं नीचे आया तो वह शख्स फिर मिल गए..। कुछ परेशान से थे। मैं थोड़ा पास गया तो पूछ बैठे, आप श्रीगंगानगर जाओगे? मैंने प्रत्युतर में सिर हिलाया तो उनका अगला सवाल था, श्रीगंगानगर में कहां?मैंने कहा शिवचौक। मेरा जवाब सुनकर उनकी परेशानी दूर नहीं.हुई।अब मेरी बारी थी, मैंने सवाल दागा क्या काम है श्रीगंगानगर में? कहने लगे खाता स्थानांतरित करवाया है, उसके कागजात श्रीगंगानगर भिजवाने है। बस वाला इस काम के 150 रुपए मांग रहा है। फिर बोले 29 जनवरी को जाना ही तो काहे के पैसे देने। मैंने कहा, ऐसा करना भी ठीक रहेगा, लेकिन उनके चेहरे से झलकती बेचैनी बयां कर रही थी कि उनका काम जरूरी है। मैंने कहा आप कागज मुझे दे दीजिए और मेरा नंबर लिख लो...अपने बेटे को बता देना..कल आफिस में आकर कागजात ले जाएगा। शख्स की चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान थी और उन्होंने पूछा, जी आपका आफिस कहां.हैं? मैंने जैसे ही राजस्थान पत्रिका कहा तो वो तपाक से बोले, आप शेखावतजी हो? मैं चकित था कि बिना मिले कैसे पहचान.लिया, वजह पूछी तो कहने लगे, मिला तो नहीं पर आपका नाम बहुत सुना है। पत्रिका आफिस भी जाना हुआ है तीन चार बार। फिर बताने लगे कि उनका गांव जेजूसर है। चालीस साल.से श्रीगंगानगर के भरतनगर में रहते हैं। जेजूसर और गंगानगर दोनों जगह आना जाना लगा रहता है। चालीस साल.पहले श्रीगंगानगर में ईंट भट्ठे का काम शुरू किया था, मकान भी वहीं बना.लिया। मैंने अपने मोबाइल नंबर नोट करवाए तो बोले आपका गांव कौनसा है? मैंने गांव.का नाम बताया तो कहने लगे वहां.हमारी दूर की रिश्तेदारी है। कुलदीप/ रामेश्वर लाल जी के यहां पर। मैंने बताया कि कुलदीप मेरा सहपाठी रह चुका है दसवीं तक। खैर, बस चलने को थी , मैंने शख्स से नाम पूछा तो उन्होंने देवकरण बताया। बस में चढते वक्त मैं उनकी तरफ पलटा तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। सच इस तरह की मुस्कान बड़ा सुकून देती है। जीवन का फलसफा भी यही है...जीना तो है उसी का, जिसने यह राज जाना... है काम आदमी का औरों के काम आना....।

हे पिता! तू तो जीवन है..

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अगर पिता जीवन है तो फिर वह प्राणों का प्यासा क्यों बन जाता है? अगर पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है तो फिर वह सृष्टि के अनमोल तोहफे को मिटाने पर आमादा क्यों हो जाता है? अगर पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है तो फिर वह जान का दुश्मन क्यों बन जाता है? अगर पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है तो फिर वह उस परिंदे का उडऩे से पहले ही गला क्यों घोट देता है? अगर पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं तो फिर इन सपनों को तोड़ क्यों देता है? अगर पिता सुरक्षा है, सिर पर हाथ है तो फिर वह इतना क्रूर क्यों बन जाता है? अगर पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान है तो फिर इतना निर्दयी व निष्ठुर क्यों हो जाता है? श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले में शनिवार को एेसी दो घटनाएं हुई जो सोचने पर मजबूर करती हैं। श्रीगंगानगर के रायसिंहनगर उपखंड के एक गांव में पिता अपने एक साल के मासूम की गला घोट कर जान ले लेता है जबकि खुद जहर पी लेता है। उधर हनुमानगढ़ जिले के टिब्बी क्षेत्र में एक पिता अपने दस साल के बेटे को सीने से लगाकर नहर में कूद जाता है लेकिन मासूम खुशकिस्मत है कि बच जाता है लेकिन पिता की मृत्यु हो जाती है। जान देने/ लेने जैसा कदम उठाने के पीछे कारण भी कोई बड़े नहीं हैं। एक का अपनी पत्नी से विवाद था तो दूसरा आर्थिक तंगी के चलते टूट गया।
दरअसल, श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले में बात-बात पर जान लेने या देने की घटनाएं इतनी होने लगी हैं कि यह अब सामान्य लगने लगी हैं। यह घटनाएं यहां न तो डराती हैं न ही चौंकाती हैं, लेकिन सोचने पर मजबूर जरूर करती हैं। आखिर लोगों में सहनशीलता खत्म क्यों रही है और इसकी वजह क्या है? विश्वास लगातार क्यों कम हो रहा है? जरा-जरा सी बातों पर उग्र होकर आवेश में आकर जान देना/ लेना ही क्या अंतिम उपाय है? बिना जान दिए/ लिए बिना क्या किसी समस्या का समाधान संभव नहीं? जीवन अनमोल है फिर भी इसकी कीमत क्यों नहीं समझी नहीं जा रही है? हादसे होने के बाद सिर्फ पछतावा ही शेष रहता है। किसी एक की गलती का दंश शेष रहा पूरा परिवार झेलता है। सोचिए आर्थिक तंगी से जान देने वाले उस शख्स के परिवार पर अब क्या बीत रही होगी? कल्पना कीजिए एक साल के मासूम के जाने के बाद उस मां का हाल क्या होगा?
खैर, आर्थिक तंगी, अवैध रिश्ते, एक दूसरे पर विश्वास की कमी, छोटे मोटे विवाद इन बड़े हादसों की वजह ज्यादा बनते हैं। ठंडे दिमाग से सोचा जाए तो इन सबका समाधान है। इस तरह के हादसे मानवीय मूल्यों को कमजोर करते हैं। जान की कीमत कभी समाधान नहीं हो सकती। जीवन की महत्ता समझनी चाहिए। हालात का हवाला देकर जीवन से हारना नहीं चाहिए। जीवन एक संघर्ष है। इस संघर्ष से डरना कैसा? वैसे भी डर के आगे ही तो जीत है। माता-पिता तो सृष्टि के सर्जक हैं, फिर भी सृष्टि के विपरीत धारा में क्यों बहने लगते हैं? माता पिता पर लिखी गई कवि ओम व्यास 'ओम; की कविता की यह पक्तियां मौजूं हैं..
'मां संवेदना है, भावना है, अहसास है मां
मां जीवन के फूलों में खुशबू का वास है मां,;
'पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है
पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।'

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 20 जनवरी 19 के अंक में प्रकाशित।

प्रभाव की पत्रकारिता विश्वसनीय नहीं

बस यूं ही
दबाव या प्रभाव में आकर पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता खो देती है। इसलिए बिना किसी प्रभाव या दबाव के अपना कर्म करते रहना चाहिए। यह बात हमेशा से ही की जाती है। करीब 19 साल पहले भोपाल में पत्रकारिता का ककहरा सीखने के दौरान भी कुछ इसी तरह की नसीहत मिली थी। तब बताया गया था कि पत्रकार को चार 'पी' से बचना चाहिए।
1. पैसा 2. प्रशंसा 3. पुष्प और 4. पद अर्थात इन चारों में किसी में पत्रकार भागीदार है तो फिर वह खबर के साथ न्याय नहीं कर पाएगा। पत्रकार को पूर्वाग्रह, दुराग्रह या किसी तरह के आग्रह से खुद को बचाकर रखना चाहिए। पत्रकार छत्रपति हत्याकांड का फैसला सुनाते हुए जज जगदीपसिंह ने जो कहा, वह भी तो कुछ एेसा ही है। उन्होंने कहा 'जर्नलिज्म एक सीरियस बिजनेस है जो सच्चाई को रिपोर्ट करने की इच्छा को सुलगाता है। इस नौकरी में थोड़ी बहुत चकाचौंध तो है लेकिन कोई बड़ा इनाम पाने की गुंजाइश नहीं है। पारंपरिक अंदाज में इसे समाज के प्रति सेवा का सच्चा भाव भी कहा जा सकता है। किसी भी ईमानदार और समर्पित पत्रकार के लिए सच को रिपोर्ट करना बेहद मुश्किल काम है। खास तौर पर किसी एेसे असरदार व्यक्ति के खिलाफ लिखना और भी कठिन काम हो जाता है जब उसे किसी राजनीतिक पार्टी से ऊपर उठकर राजनीतिक संरक्षण हासिल हो। यह देखने में भी आया है कि पत्रकार को ऑफर किया जाता है कि वह प्रभाव में आकर काम करे अन्यथा अपने लिए परेशानी या सजा चुन ले। जो प्रभाव में नहीं आते उन्हें इसके नतीजे भुगतने पड़ते हैं, जो कभी कभी जानर देकर चुकाने पड़ते हैं। यदि वह (पत्रकार) प्रभाव में आ जाता है तो अपनी विश्वसनीय खो देता है। अगर प्रभाव में आने से इनकार करता है तो जान से जाता है। इस तरह यह अच्छाई और बुराई के बीच की लड़ाई है। मौजूदा मामले में भी यही हुआ कि एक ईमानदार पत्रकार ने प्रभावशाली डेरा मुखी और उसकी गतिविधियों के बारे में लिखा और उसे जान गंवानी पड़ी। डेमोक्रेसी में भीड़ का रूप धारण कर किसी भी निर्दोष के खिलाफ हिंसा की अनुमति नहीं है। डेमोक्रेसी के पिलर को इस तरह ध्वस्त करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।'
खैर, इस पेशे में पथ से विचलित करने की कोशिश बहुत होती हैं। यह कोशिशें सिर्फ वित्तीय ही नहीं होती हैं। इसके कई रूप हैं। गिरावट हर क्षेत्र में आई है, पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं है लेकिन गाहे-बगाहे पत्रकारिता को बिकाऊ कहने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पेशे में रामचंद्र छत्रपति जैसे पत्रकार भी हैं जो जान की परवाह किए बिना सच कहने का साहस रखते हैं।