Friday, December 25, 2015

वो ऐतिहासिक सफर

मेरे संस्मरण-3

रात भर का सफर करने के बाद मैं और नेमीचंद आगरा के राजा की मंडी स्टेशन पर पहुंच गए। यहां से हमको नासिक के लिए ट्रेन पकडऩी थी। हम दोनों रेलवे स्टेशन पर नासिक की ट्रेन की तलाश में भटकते रहे लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली। दरसअल, नासिक वाली ट्रेन आगरा छावनी से मिलनी थी लेकिन न तो हमको उसको जानकारी थी और ना ही किसी ने बताया। हमने स्टेशन पर कई लोगों से पूछा लेकिन कोई बताने को तैयार ही नहीं था। हम दोनों मन मसोस कर रहे गए। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। दोपहर हो चुकी थी। आखिर नेमीचंद ने स्टेशन पर खड़ी गाड़ी की तरफ इशारा किया और कहा कि चलो इसमें बैठ जाते हैं, यह कहीं तो जाएगी ही। और हम उस गाड़ी में बैठ गए। पता चला यह तो कानपुर जा रही है। हम रवाना हो चुके थे। मन में यही उम्मीद थी कि चलो कोई कानपुर में तो बताएगा। रात आठ बजे हम कानपुर पहुंच गए। शाम हो गई थी। हम प्लेटफार्म पर ही एक बैंच पर सो गए। रात 11.30 बजे टीटीई आया और बोला, कौन हो आप लोग। हमने परिचय दिया। उसने पूछा कहां जाना है। हमने नासिक जवाब दिया तो कहने लगा है पता भी है क्या नासिक कहां है और कौनसी रेल जाएगी। हमने असहमति में सिर हिलाते हुए कहा पता नहीं जो मिल जाएगी उसी में बैठ जाएंगे। टीटीई हमारा जवाब सुनकर हंसा। उसने कहा कि यहां रात को आपको कोई सोने नहीं देगा। पूछताछ के नाम पर आपको जगाया जा सकता है। ऐसा करो यह जो रेल खड़ी है, उसी में वापस चढ़ जाओ। यह यहां से यार्ड में जाकर खड़ी हो जाएगी। रात भर वहीं खड़ी रहेगी। ऐसा करो आप इसमें सो जाओ। आपको रात भर कोई परेशान नहीं करेगा। टीटीई हमको भला आदमी लगा। हम दोनों रेल के एक डिब्बे में चढ़ गए। खिड़की बंद कर ली और दरवाजों पर अंदर से कुंडी लगा ली। सुबह ट्रेन वापस स्टेशन आई। घर से रवाना हुए तीसरा दिन हो चुका था। मैं और नेमीचंद नहाने के लिए पास के ही नल पर चले गए। इतने में एक व्यक्ति हमारे पास आया और पूछा कहां के रहने वाले हो और कहां जा रहे हो। हमने उसके सवाल का जवाब दे दिया तो कहने लगा, अरे कहां फौज में भर्ती हो गए। जिंदगी भर परेशान हो जाओगे। ऐसा करो आप देानों मेरे साथ आ जाओ। मैं आपको बढिय़ा नौकरी दिलवा दूंगा। लेकिन हम दोनों ने उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। वह कई देर तक उसने हमको बरगलाने की कोशिश करने के बाद बड़बड़ाता वहां से चला गया। नहाने के बाद हम गाड़ी के पास आ गए। बताया कि यहां से आपको झांसी जाना है, वहां से आपको नासिक जाने वाली रेल मिल जाएगी। मैं और नेमीचंद गाड़ी में बैठ गए। डिब्बे लगभग खाली ही थे। हम दोनों सीट पर लेट गए। दोपहर बाद हम दोनों झांसी पहुंच गए थे। अब तक सफर छोटी रेल लाइन पर ही किया था। झांसी में रेलवे लाइन भी बड़ी थी। यहां से हमको मुंबई जाने वाले ट्रेन पकडऩी थी। 

ऐसे हुआ भर्ती


मेरे संस्मरण-2

यह अलग बात है कि गुमानसिंह भी बाद में भर्ती हुए। खैर, मेरा नम्बर आया तो धड़कन कुछ तेज हो गई लेकिन किस्मत यहां करवट बदल रही थी। शारीरिक नाप तौल एवं जांच के बाद मेरा चयन कर लिया गया। इसके बाद पता लिखवाने को कहा गया तो मैंने मना कर दिया। कहा कि मेरे साथ गांव के दो बंदे ही जब भर्ती नहीं हुए तो फिर मैं क्या करूंगा। मेरी बात सुनकर सैन्य अधिकारी मुस्कुराए और अचानक चेहरे के भाव बदलते हुए बोले अब कुछ नहीं हो सकता है। मैंने दुबारा आग्रह किया तो कड़क होते हुए बोले ज्यादा नखरे नहीं चुपचाप नाम लिखा दे वरना पुलिस पकड़ लेगी और नासिक (महाराष्ट्र ) ले जाकर छोड़ेगी। मैं डर गया और चुपचाप पता लिखवा दिया। इसके बाद मेरा नासिक का रेल का पास और अन्य कागजात बन गए। पास और कागजात मेरे को देते हुए कहा गया कि कल सुबह आ जाना। आपको जयपुर जाना है। खैर, मैं शाम को घर लौटा और मां व कंवरजी (पिताजी ) को जब यह खबर सुनाई तो दोनों रोने लगे। कहने अभी यह बच्चा है। इसके नौकरी के दिन थोड़े ही हैं। कहां जाएगा इस उम्र में। मैं परिवार में सबसे छोटा था। घर में हड़कंप मच गया था। चर्चा इसी बात को लेकर थी कि आखिर किस तरह भर्ती को निरस्त करवाया जाए। अचानक काकोसा बाघ सिंह को बुलाया गया। वे कुछ समय सेना में रह चुके थे। उनको कहा कि कल झुंझुनूं भर्ती दफ्तर जाकर इन्द्र का (मेरा) नाम कटवा कर आओ। काकोसा ने हां भर थी लेकिन मां एवं कवंरजी की आंखों में उस रात नींद नहीं थी। मैं भी ऊहापोह वाली स्थिति में था। किसी तरह रात बीती। सुबह थैले में कपड़े आदि रख कर हम दोनों झुंझुनूं पहुंचे। भर्ती दफ्तर पहुंचते ही काकोसा ने कप्तान को सेल्यूट मारी और पास जाकर बोले साब, यह अभी टाबर है। भूल से भर्ती में आ गया। इसका बाप अंधा है और मां बूढ़ी है। घर पर मवेशी भी बहुत हैं। यह फौज में चला गया तो मां-बाप की सेवा कौन करेगा? कौन मवेशियों को संभालेगा? ऐसा करो साहब आप इस टाबर का नाम काट दो। कप्तान मथुरासिंह (संभवत: यही नाम था) काकोसा की बात सुन फिर मुस्कुराए। बोले, अब कुछ नहीं हो सकता है। इसके भर्ती संबंधी कागजात बन गए हैं। भर्ती नहीं होना है तो कोई बात नहीं लेकिन एक बार नासिक तो जाना ही पड़ेगा। अच्छा है इस बहाने नासिक घूम आएगा, आपका कौन सा किराया लग रहा है। कप्तान साहब की बात सुनकर काकोसा के पास कहने को कुछ नहीं बचा था। वो मेरे सिर पर हाथ रखकर गांव के लिए रवाना हो गए। मेरे साथ पातुसरी गांव का एक लड़का भर्ती हुआ था। नाम था नेमीचंद। हम दोनों झुंझुनूं से जयपुर के लिए रवाना हो गए। शाम होते-होते हम जयपुर पहुंच गए। आगरा के लिए हमारी ट्रेन रात बारह बजे थी। हम दोनों स्टेशन पर एक ही बैंच पर लेट गए। इस बीच मैंने झुंझुनूं कार्यालय से बनाकर दिए गए कागजात को स्टेशन पर इस उम्मीद के साथ फेंक दिया कि जब कागजात ही नहीं होंगे तो यकीनन भर्ती नहीं करेंगे। रात बजे हमारी गाड़ी आ गई और हम आगरा के लिए रवाना हो गए।

ऐसे हुआ भर्ती....


मेरे संस्मरण-1

यह सन 1950 की बात है। उस वक्त मेरी उम्र 14 साल की थी। मैं पास के गांव किशोरपुरा की स्कूल में कक्षा सात का छात्र था। उस वक्त सातवीं को ही मिडल कहा जाता था। उस समय यातायात के साधन तो कल्पना में भी नहीं थे। गांव से किशोरपुरा पैदल की आना-जाना करते थे। गांव के और भी कई छात्र किशोरपुरा जाते थे। गांव में उस वक्त स्कूल नहीं था। हमारे मास्टरजी पातुसरी गांव के थे। नाम शायद बहादुर राम या सिंह ही था। छात्रों में उनका बड़ा खौफ था। उनके पीटने का तरीका भी बड़ा अलग तरह का था। वो पीठ पर मुक्के मारते थे। उस वक्त पुस्तकें आज की तरह आसानी से दुकानों पर उपलब्ध नहीं होती थी। सभी छात्रों से पैसे एकत्रित कर लिए जाते और एक अध्यापक जयपुर जाकर पुस्तके लेकर आता था। हमने पैसे जमा करवा दिए थे लेकिन पुस्तकें नहीं आई थीं। इसी बीच जन्माष्टमी व गोगानवमी पर स्कूल में दो दिन के अवकाश की घोषणा हो गई। मास्टरजी ने अवकाश के दौरान कुछ पाठ याद करने के लिए बोल दिया। अब धर्मसंकट यही था कि बिना पुस्तक के पाठ को कैसे याद किया जाए। उनकी मार की कल्पना कर मन में डर बैठ गया था। इसी अधेड़बून में डूबा था। दूसरे दिन पड़ोस के गांव सोलाना में गोगा जी का मेला लगा था। मैं भी वहां चला गया। मेले के दौरान दो लोग मुनादी कर रहे थे कि झुंझुनूं में सेना की भर्ती है, जिसको भी भर्ती में भाग लेना वह झुंझुनूं पहुंचे। भर्ती दो श्रेणियों में थी। ब्यॉयज और जवानों की। हाथ में लाठियां लिए यह लोग तेज आवाज में सबको भर्ती की सूचना दे रहे थे। उस वक्त सूचना प्रसारित करने का और कोई साधन भी तो नहीं था। मन में ख्याल आया कि क्यों ना भर्ती देखी जाए। मास्टरजी की मार से तो बच जाऊंगा। बस फिर क्या था दूसरे दिन झुंझुनूं के लिए रवाना हो गया। मां से झूठ बोला कि झुंझुनूं से पुस्तक खरीदने जा रहा हूं। इसके बाद पैदल ही पास के रेलवे स्टेशन रतनशहर पहुंचा। इस्लामपुर और माखर मैंने पहली बार ही देखे थे। स्टेशन पर गांव के सुमेरसिंह एवं गुमानसिंह मिल गए। मैं दोनों को देखकर चौंक गया। वे दोनों भी भर्ती के सिलसिले में ही आए थे। उन्होंने मेरे से पूछा तो मैंने फिर वही किताब का बहाना बना दिया। इसके बाद रेल से हम तीनों झुंझुनूं पहुंचे। उतरते ही दोनों साथियों ने भर्ती में चलने की कहकर जैसे मेरे मन की बात पूरी कर दी। मैं उनके साथ चला तो गया लेकिन बचपन में पैर टूटने की बात याद आ गई। खेत जाते वक्त ऊंट से गिरा और बाद में ऊंट की लात से मेरा पैर टूट गया था। हालांकि बाद में इलाज से ठीक तो गया लेकिन मन में यही डर था कि पैर टूटा होने के कारण मेरे को अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। मन ही मन मैं रुंआसा हो गया था। मेरे से पहले सुमेरसिंह की बारी आई। अध्यापक के डंडे की चोट की वजह से उनकी एक अंगुली टेढी थी। उनको कहा गया कि इलाज करवाकर आओ। यह अलग बात है कि वो बाद में सेना में ही भर्ती हुए। इसके बाद गुमानसिंह को भी आंखों का रंग लाल होने के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया। अब मेरी बारी थी।

मेरी बात


सेना के प्रति श्रद्धा और सम्मान बचपन से ही रहा है, अब भी है। इसका प्रमुख व एकमात्र कारण परिवार के कई सदस्यों का भारतीय सेना से जुडाव ही रहा है। बचपन में पापा से कहानियों की जगह सुने गए युद्ध के संस्मरणों ने न केवल देशभक्ति की भावना को पुष्ट किया बल्कि वीरता व अनुशासन का पाठ सीखने में भी सहायक साबित हुए। साथ ही यह भी जाना कि स्वाभिमान व खुददारी के साथ की गई कठोर मेहनत को कैसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। वाकई पापा के कार्यकाल की यह कड़वी हकीकत रही है कि उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों एवं स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। सेवानिवृत्ति के समय साथियों की सलाह को पापाजी ने बड़ी ही साफगोई के साथ मानने से इनकार कर दिया था। सलाह थी कि अधिकारियों से कुछ आग्रह कर लिया जाए तो शायद वो पसीज जाएं और एक पद का प्रमोशन मिल जाए जबकि पापा इस बात पर जोर देते रहे कि जब सब कुछ ईमानदारी के साथ किया है। समूचा कार्यकाल अधिकारियों के सामने है तो फिर एक पद के लिए गिड़गिड़ाना कैसा? और सचमुच पापा ने किसी तरह का आग्रह या निवेदन नहीं किया। यही कारण रहा कि 23 साल दो माह सेना की सेवा करने तथा दो युद्धों में सक्रिय भूमिका निभाने के बावजूद उनके हिस्से हवलदार जैसा पद ही आया। लेकिन पापा को इस बात का कभी कोई मलाल नहीं रहा। उन्होंने इस पद को भी बड़ी शिद्दत व गर्व के साथ जीया है। खैर, पापाजी के सेना से जुड़े संस्मरणों को शब्द देने का मानस तो बहुत पहले ही बना चुका था। बीच में कई बार प्रयास भी किए लेकिन अमलीजामा पहनाने में नाकाम रहा। चूंकि अब भारत-पाक के बीच 1965 में हुए युद्ध को पचास साल हो गए हैं। समूचे देश में युद्ध में हासिल की गई इस जीत का जश्न मनाया जा रहा है तो फिर इससे मुफीद मौका मेरे को और लगा भी नहीं। हो सकता है संस्मरणों के उतार-चढ़ाव पाठकीय नजर में अलंकारिक या अतिश्योक्तिपूर्ण लगे लेकिन यकीनन यह एक पूर्व सैनिक के द्वारा कहा गया सच एवं एक पत्रकार के द्वारा सुना गया सच का दस्तावेज ही होगा। भाव उनके होंगे और उनको शब्द देने का काम मेरा होगा। हालांकि पापा ने शुरुआत में यह कह भी दिया कि सच से उनके सम्पर्क में रहे तत्कालीन कुछ अधिकारियों की कथित वीरता बेनकाब भी हो सकती है और कुछ कड़वी हकीकत भी सामने आ सकती है। मेरे इस भरोसे के साथ कि आप तो जो हुआ है केवल वह बताते रहें, वो तैयार हो गए। एक बात और। मुझे ऐसा लगता है कि सेना में भर्ती होने के घटनाक्रम के बिना युद्ध के संस्मरण अधूरे से लगेंगे, लिहाजा शुरुआत भर्ती के समय के हालात और माहौल से करना ही उचित रहेगा। प्रयास यही है कि जैसा वो मेरे को बता रहे हैं, उसको प्रथम पुरुष की शैली में लिखूं। संस्मरणों की यह कड़ी नियमित रूप से सोशल मीडिया पर भी साझा करता रहूंगा। निसंदेह आपके सुझाव/ सलाह मेरे को और अधिक बेहतर करने या लिखने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। ____ धन्यवाद।

न तुम जीते न हम हारे


टिप्पणी 

अब यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि मेडिकल छात्रा की हादसे में मौत के बाद उपजा आक्रोश और उसके बाद चले घटनाक्रम का पटाक्षेप इस तरह नाटकीय अंदाज में होना पहले से ही तय था। यह स्वीकारने में भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि जो कुछ जायज/ नायायज हुआ उसमें दोनों ही पक्षों की कहीं न कहीं ज्यादा या कम भागीदारी रही है। तभी तो समझौते की बुनियाद रखने में किसी तरह की कोई किन्तु-परन्तु नहीं हुई। थोड़ी सी मान-मनोव्वल और ना नुकर के बाद अंततोगत्वा सहमति की इबारत तैयार हो गई। ना छात्र कानून हाथ में लेते और ना पुलिस बिना चेतावनी दिए लाठीवार करती तो शायद इस तरह के समझौते के आसार कम ही बनते। गलती के रूप में सामने आई दोनों ही पक्षों की कमजोर कड़ी ने इस सुलह में प्रमुख एवं कारगर भूमिका निभाई। खैर, जिस तरह के हालात पैदा कर दिए गए उसका सबसे मुफीद रास्ता इस सुलह के अलावा और कोई था भी नहीं। रेजीडेंट की चेतावनी अगर धरातल पर उतरती तो हालात और भी विकट हो जाते।
वैसे विरोध के तरीके और भी कई हो सकते हैं लेकिन रेजीडेंट को सबसे कारगर एवं जल्दी मांग मनवाने का शोर्टकट व सबसे बड़ा हथियार अक्सर हड़ताल ही नजर आता है। यह तो गनीमत रही कि बात हड़ताल तक नहीं पहुंची। अगर बात बढ़ती तो फिर पुलिस व मेडिकल छात्रों की इस लड़ाई की गाज आम जनता पर ही गिरना तय था। समझौते को लेकर भले ही दोनों पक्ष अपने-अपने हिसाब से व्याख्या करंे या उसके अर्थ निकालें लेकिन इसका बड़ा फायदा आम जन को ही मिला है। हां, इतना जरूर है कि इस समूचे घटनाक्रम और समझौते ने आम जन के जेहन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं जो कई दिनों तक सालते रहेंगे। मसलन, सहानुभूति की लहर पर सवार होकर जिस न्याय की उम्मीद की जा रही थी क्या वास्तव में वह न्याय उस छात्रा को मिला? जिन मांगों को लेकर आंदोलन किया क्या वे मुकाम तक पहुंची? क्या छात्रों के शरीर पर बने जख्मों के लिए यह समझौता कोई राहत या मलहम का काम कर पाएगा? शांतिभंग के आरोप में मेडिकल छात्रों के साथ गिरफ्तार किए बाकी छात्र कौन थे तथा उनको किस किए की सजा मिली, क्या इसका खुलासा कभी हो पाएगा? जो तोडफ़ोड़ हुई क्या इस समझौते से उसकी भरपाई हो पाएगी? दोनों पक्ष में किसी एक की भूमिका भी अगर सही होती तो क्या समझौते की राह इतनी जल्दी आसान हो पाती?
बहरहाल, उक्त सवाल भले ही अनुत्तरित रहे लेकिन इसमें किस पक्ष को कितनी राहत मिली यह तय करना भी मुश्किल है। हां, इतना जरूर है कि अगर जीत है तो भी दोनों पक्षों की है और हार भी है तो भी दोनों की। बिलकुल तुम्हारी भी जय-जय, हमारी जय-जय, ना तुम जीते ना हम हारे की तर्ज पर। उम्मीद की जानी चाहिए दोनों ही पक्ष इस घटनाक्रम से सबक जरूर लेंगे। एक नजीर के रूप में इसको आत्मसात करेंगे। क्योंकि जोर आजमाइश एवं शक्ति प्रदर्शन के रूप में तब्दील होते-होते बचा यह मामला अगर और आगे तक जाता है तो निंसदेह दोनों ही पक्षों की छवि को नुकसान जरूर पहुंचाता।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 29 अगस्त 15 के अंक में प्रकाशित 

अक्षम्य लापरवाही

 टिप्पणी 

इन दिनों बीकानेर के जागरूक एवं सेवाभावियों के जेहन में कुछ सहज एवं स्वाभाविक सवाल जरूर उठ रहे होंगे। मसलन, देश के लिए हंसते-हंसते प्राणोत्सर्ग करने वाले क्या किसी क्षेत्र विशेष के होते हैं? क्या उनको किसी धर्म या सम्प्रदाय से जोड़ा जा सकता है? या उनके सम्मान में किसी तरह का भेदभाव किया जा सकता है? यकीनन इन तीनों सवालों का एक ही जवाब, नहीं ही होगा लेकिन बीकानेर के संदर्भ में देखें तो इन सवालों के मायने बदल जाते हैं। स्वाधीनता दिवस पर जब प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तर जगमगा रहे थे तो दो शहीद स्मारक अंधेरे में डूबे थे। यह किसी भी सूरत में संभव नहीं है कि शहर के प्रमुख मार्गों पर स्थित इन शहीद स्मारकों पर किसी अधिकारी या अन्य की नजर नहीं पड़ी होगी। हद तो तब हो गई जब अधिकारी जिम्मेदारी एक दूसरे पर डाल कर खुद को पाक दामन साबित करने लगे। मामला बढ़ा तो न केवल कुछ उत्साही युवा आगे आए बल्कि पूर्व सैनिकों ने पहल करते हुए प्रशासन को आईना दिखाने का काम किया। आखिरकार प्रशासनिक अमला हरकत में जरूर आया लेकिन अभी भी एक शहीद स्मारक पर अंधेरा पसरा हुआ है। संभाग एवं जिले भर की प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन करने वाले अधिकारी जब सप्ताह भर बीतने के बाद व्यवस्था में कोई सुधार नहीं करवा पाते हैं तो सवाल उठने लाजिमी हैं। प्रशासनिक उदासीनता का दंश झेल रहा यह मामला अधिकारियों की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा तो करता ही है, वतन पर प्राण न्यौछावर करने वालों के प्रति इस तरह के रूखे एवं सौतेले व्यवहार को उजागर भी करता है। शहीदों को नजरअंदाज करने वाले जिले के जिम्मेदार अधिकारी क्या उस मां का दर्द समझ पाएंगे, जिसने अपने लख्तेजिगर को सीमा पर देशसेवा के लिए हंसते-हसंते भेज दिया। क्या वे उस पिता की पीड़ा भांप पाएंगे, जिसने बुढ़ापे की लाठी से बड़ा काम देश सेवा को समझा। क्या वे उस वीरांगना की विरह वेदना जान पाएंगे, जिसने देश के खुशहाल भविष्य के लिए अपने वर्तमान से समझौता कर लिया। क्या वे उस बहन की मनोस्थिति समझेंगे, जिसने भाई से खुद की सुरक्षा के संकल्प लेने की बजाय देश की सुरक्षा को जरूरी समझा। क्या वे उन बच्चों की हसरतों को समझ पाएंगे, जिनके सिर से पिता का साया उठ गया। इतना ख्याल अगर इन अधिकारियों को होता तो शायद वे इस तरह की लापरवाही नहीं करते और ना ही जिम्मेदारी एक दूसरे पर मंढऩे का उपक्रम करते। देश सेवा को सर्वोपरि समझने वालों के प्रति ऐसा रवैया न केवल अफसोसजनक बल्कि शर्मनाक भी है।
बहरहाल, ऐसा दोबारा न हो, इसके लिए नए सिरे से सोचने की जरूरत है। सरहदी जिला होने के नाते वैसे भी सेना व शहीदों के प्रति सम्मान तथा विश्वास बेहद जरूरी है। यह न केवल अधिकारियों बल्कि आम लोगों को भी समझना होगा कि अपने घर-परिवार से दूर सीमा पर तैनात जवान दिन रात चौकसी इसीलिए करते हैं ताकि हम चैन से सो सकें। ऐसे में उनके मान-सम्मान को बनाए रखना हमारा फर्ज है। उम्मीद की जानी चाहिए जो अव्यवस्थाएं शहीद स्मारकों के इर्द-गिर्द हैं वह तत्काल दूर होंगी तथा इस प्रकार की अक्षम्य लापरवाही भविष्य में फिर कभी नहीं होगी। शहीदों के योगदान को याद कर उससे प्रेरणा लेना ही तो उनको सच्ची श्रद्धांजलि है।

राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 22 अगस्त 15 के अंक में प्रकाशित 

मजबूरी

मेरी 11वीं कहानी

वह बहुत अच्छा लिखता था। इतना अच्छा कि कइयों को उसकी लेखनी से रस्क होने लगा था। लेकिन उसके समक्ष सबसे बड़ा संकट यही था कि उसको कोई प्लेटफार्म नहीं मिल रहा था। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होता था लेकिन उसके बदले मिलने वाला मानदेय ऊंट के मुंह में जीरे के समान था। उससे गृहस्थी की गाड़ी चलना बड़ा मुश्किल काम था। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। बचपन का दोस्त एक दिन अचानक बाजार में मिल गया। दुआ-सलाम होने के बाद जब परेशानी बयां की तो मित्र ने मुस्कुराते हुए कहा, काम तो मिल जाएगा लेकिन नींव का पत्थर बनना पड़ेगा। नींव का पत्थर मतलब? उसने जिज्ञासावश पूछ लिया तो मित्र कहने लगा, कुछ नहीं, बस लिखोगे तुम लेकिन नाम दूसरे का होगा। इतना सुनते ही उसकों पैरों के नीचे से जमीन खिसकती सी लगी। यही तो एकमात्र थाती थी उसकी और पहचान भी। अचानक आंखों के सामने जवान होती बहनों एवं परिवार की जिम्मेदारियों का अक्स घूमने लगा। मजबूरी के आगे सब सपने चकनाचूर हो गए थे। मित्र की सलाह पर उसने तत्काल हां कर दी। तब से वह गुमनामी के भंवर में लिखने लगा और दूसरे लोग उसके लेखन पर अपना लेबल लगाकर बड़े लेखक के रूप में स्थापित हो गए। बदले में मिलने वाले मानदेय से अब उसकी गृहस्थी की गाडी भी ठीक ठाक चलने लगी थी।

पुरस्कार मिला

दरअसल, दोपहर बाद करीब पौने चार बजे जब ऑफिस आया था उस वक्त पता नहीं था आज कोई मैच भी है। वह तो प्रसार विभाग के साथी चंद्रशेखर तिवाड़ी ने आने के बाद बताया कि राजस्थान पत्रिका स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आज हॉकर्स यूनियन एवं विज्ञापन एजेंसी व प्रबंधन की टीमों के बीच क्रिकेट मैत्री मैच प्रस्तावित है। आपका आना अति जरूरी है। कुछ जरूरी काम निबटाने के बाद मैं सार्दुल स्पोट्र्स स्कूल पहुंचा। मैच शुरू हो चुका था। हॉकर्स यूनियन की टीम बल्लेबाजी जबकि विज्ञापन एजेंसी व प्रबंधन की टीम क्षेत्ररक्षण कर रही थी। थोड़ी देर दर्शक दीर्घा में बैठा। अचानक कुछ हॉकर्स साथियों ने बड़ी जिद की कि आपको तो हमारे साथ खेलना ही पड़ेगा। आखिरकार उनके आग्रह को स्वीकार करते हुए मैदान में उतरा। जिस टीम में शामिल किया गया वह क्षेत्ररक्षण में जुटी थी। लिहाजा मैं भी अपने पसंदीदा स्थान फारवर्ड शार्ट लेग पर जाकर तैनात हो गया। तीन ओवर गेंदबाजी भी की। विकेट एक ही मिला लेकिन सबसे किफायती रही लेकिन बाकी गेंदबाजों ने हाथ खोल कर रन दिए। एक-एक ओवर में तीस-तीस रन तक लुटा दिए। गेंदबाजी के बाद में कुछ वक्त विकेटों की पीछे कीपर की भूमिका भी निभाई। मैच की जब एक पारी पूरी हुई तो हॉकर्स यूनियन का स्कोर सोलह ओवर में डेढ़ सौ के पार था। उम्मीद थी कि जीत जाएंगे लेकिन हॉकर्स यूनियन के प्रतिदिन खेलने वाले युवाओं ने शानदार गेंदबाजी की। जिसके चलते हमारी टीम के बल्लेबाज कुछ खास कमाल नहीं कर सके। लगभग पूरी टीम आया राम गयाराम की तर्ज पर वापस लौट गई। हमारी टीम 16 ओवर में मात्र 70 रन ही बना पाई। इसमें 36 रनों का योगदान मेरा भी था। काफी दिनों के बाद खेलने से बदन थकान से दोहरा हो गया था। पुरस्कार चूंकि विजेता और उपविजेता दोनों को मिले थे लिहाजा अपुन का नंबर भी आ गया। शाखा प्रबंधक श्री राकेश जी गांधी एवं सार्दुल स्पोट्र्स स्कूल के खेल प्रभारी श्री रणजीताराम जी बिश्नोई के हाथों पुरस्कार भी मिला।

जय हिन्द

भारतीय सेना में शामिल होने की हसरत शुरू से रही है। बचपन में पिताजी से कहानियां नहीं बल्कि 1965 व 1971 के युद्धों का वर्णन ही सुनता था। यही कारण रहा कि पिताजी के संस्मरणों ने अनुशासन, देश प्रेम और देशभक्ति के संस्कारों को और अधिक पुष्ट किया। सेना में शामिल होने के लिए कुल जमा दो प्रयास किए लेकिन काम नहीं बना। भले ही सेना में चयन नहीं हुआ लेकिन आज भी सेना के किस्से, सेना की बहादुरी, सेना का जोश तो रोम-रोम में समाया है। तभी तो भारतीय सेना का किसी भी तरह का कोई कार्यक्रम होता है तो खुद को रोक नहीं पाता। पता नहीं क्यों सेना का हर जवान मेरे को अपना सा लगता है। उनके बीच जाकर जो अनुभूति होती है उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। मंगलवार को भारतीय सेना की बीकानेर में दो दिवसीय युद्ध उपकरणों की प्रदर्शनी शुरू हुई। प्रदर्शनी का मकसद प्रमुख रूप से युवाओं को भारतीय सेना के गौरव से अवगत कराना और उनको सेना में जाने के लिए प्रेरित करना ही है। टैंक, तोप, राइफल, मोटार्र, वायरलैस सेट, राडार आदि को करीब से देखा, हालांकि इन सबके नाम पिताजी से कई बार सुन चुका। खैर, प्रदर्शनी देखना मेरे लिए यादगार रहा। सैनिकों से बात कर और उनसे उपकरणों के संबंध में जानकारी हासिल कर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। मां भारती के सपूतों को मेरा शत-शत सलाम। जिनकी बदौलत हमारी सीमाएं महफूज हैं। 

सूरत क्यों नहीं बदल रही?

टिप्पणी 

लगता है बीकानेर की समस्याएं भी मौसम की तरह हो गई हैं। बदलते मौसम के साथ बदल जाती हैं। मतलब बदलवा दी जाती हैं या थोप दी जाती हैं। भले ही समस्या का हल ना हो या फिर समस्या के निराकरण का कोई उचित आश्वासन भी नहीं मिला हो। हालात ऐसे हैं कि किसी प्रमुख समस्या का मसला यकायक ही गौण हो जाता है तो अकस्मात ही कोई नया मुद्दा मुखर हो उठता है। यह बात दीगर है कि कुछ समस्याएं परिस्थितिजन्य होती हैं, कुछ व्यवस्थागत तो कुछ स्थायी। लेकिन इससे उन लोगों को कोई सरोकार नहीं है जो जनहित का मुद्दा प्रचारित कर सिर्फ खुद का चेहरा चमकाने की जुगत में रहते हैं। कई उदाहरण तो ऐसे भी सामने आए जिनमें एकसूत्री मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही रहा, भले ही सूरत ना बदले। समस्या के समाधान की बजाय चर्चा में बने रहने के तरीके खोजने पर ध्यान ज्यादा दिया गया। यह आरोप इसलिए क्योंकि ईमानदारी से समस्याओं के लिए संगठित रूप से कोई आवाज उठती तो क्या बीकानेर के हालात ऐसे होते? क्या कोई मसला मुकाम तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाता? और जब समस्या इतनी गंभीर है व जन-जन से जुड़ी है तो फिर प्रदर्शनों से आम जन दूर क्यों हैं? शायद इसलिए कि आम लोगों को इन प्रदर्शनों की हकीकत तथा इनके पर्दे के पीछे का सच समझ में आ गया है? इस तरह के सवाल बीकानेर में बहुत से हैं।
वैसे, शहर में समस्याओं की फेहरिस्त लम्बी है। फर्श से लेकर अर्श तक की समस्याएं। हर तरह की समस्याएं। आम से लेकर खास तक की। सड़क, बिजली, पानी से लेकर यातायात व हवाई सेवा तक की। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक की। सीवरेज से लेकर डे्रनेज तक की। रेल फाटकों से लेकर अतिक्रमण व अवैध कब्जों तक की। बिजली चोरी से लेकर कमीशनखोरी तक की। अनियमितता से लेकर भ्रष्टाचार तक की। आवारा पशुओं से लेेकर गंदगी तक की। और भी न जाने कितनी ही समस्याएं। अनगिनत समस्याओं का अंबार लगा है यहां। दरअसल, इतनी समस्याएं हैं कि कथित समाधान करवाने वालों को विकल्प चुनने में कभी कोई दिक्कत नहीं होती। कभी यह तो कभी वो की तर्ज पर प्रदर्शनों की रूपरेखा तय होती रहती है। मौके की नजाकत देखते हुए सबसे प्रासंगिक मसले को न केवल हाथ में लिया जाता है अपितु भुनाया भी जाता है और फिर चुपके से दरकिनार भी कर दिया जाता है। विडम्बना देखिए, एक ही मसले पर सबका अलग-अलग दृष्टिकोण होता है और समाधान के तरीके भी दीगर। तभी तो ध्यान समस्या के समाधान की बजाय खुद को जन हितैषी बताने की कवायद पर ज्यादा रहता है।
बहरहाल, समस्याओं के समाधान के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन होते रहने चाहिए। इन आंदोलनों एवं प्रदर्शनों के माध्यम से ही तो शासन-प्रशासन का ध्यान समस्या की तरफ जाता है और उनको कार्रवाई करने पर मजबूर करता है, लेकिन चिंता की बात तो यह है कि सब कुछ जानने के बाद भी आंखें मूंद ली जाती हैं या कार्रवाई नहीं होती। शायद इसलिए कि बीकानेर का नेतृत्व कमजोर है? या जो विपक्ष में होता है वह यहां प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाता? या फिर यहां के प्रदर्शनकारी शहर के बड़े मर्ज की नब्ज टटोलने में प्रभावी नहीं है? और सबसे बड़ा कारण लोगों की जरूरत से ज्यादा सहनशीलता।
खैर, अब भी अगर एकजुटता के साथ समस्या के समाधान के लिए आखिरी तक लडऩे की आदत नहीं अपनाई गई तो शायद ही शासन-प्रशासन के कानों पर जूं रेंगेंगी। इसलिए इस बात पर गंभीरता से विचार कर उसको आदत में लाने की जरूरत है अन्यथा हालात और भी भयावह होंगे।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 05 अगस्त 15 के अंक में प्रकाशित 

बदहाली से निजात कब?

 टिप्पणी 

यह तो गनीमत है कि बीकानेर में राज्य के अन्य जिलों की तुलना में कम बारिश हुई है, अन्यथा हालात और भी खराब होते। फिलहाल जितनी भी बारिश हुई है, उसने शहर को बदहाल कर दिया है। सीवरेज और ड्रेनेज दोनों ही व्यवस्थाएं लगभग जवाब दे चुकी हैं। दोनों ही व्यवस्थाओं में इतना घालमेल है कि पता ही नहीं चलता है कि यह ड्रेनेज लाइन है या सीवरेज। सीवरेज की लाइन से बारिश का पानी निकल रहा है तो ड्रेनेज लाइन में सीवरेज का पानी जा रहा है। समय पर सफाई ना होने के कारण नाले अवरुद्ध हैं और बरसाती पानी घरों में घुस रहा है। शहर के अंदरुनी गली-मोहल्लों के साथ-साथ प्रमुख रास्ते भी गंदगी से बजबजा रहे हैं। जगह-जगह सड़कों पर गंदा पानी जमा है और सड़ांध मार रहा है। सड़कें टूटकर गड्ढों में तब्दील हो हादसों को न्योता दे रही हैं। कई जगह तो पैदल निकलना तक मुश्किल हो रहा है। इन समस्याओं से समूचा शहर परेशान है। इस प्रकार व्यवस्था में यह दोष ही लोगों के आक्रोश का कारण बन रहा है। आक्रोश भी इसीलिए ज्यादा है कि उनकी बात को ठीक से सुना नहीं जा रहा है। समस्या समाधान तो बाद की बात है।
पुरानी गिन्नाणी व मेहरों का बास के लोगों ने शनिवार को जो पीड़ा बयां की है वो कड़वी हकीकत है। वो सोचने पर मजबूर करती है और व्यवस्था पर सवाल भी उठाती है। आखिर कब तक लोग मूलभूत सुविधाओं में सुधार के लिए यूं ही चिल्लाते रहेंगे? कब तक ज्ञापन एवं प्रदर्शनों का दौर चलेगा। सीवरेज, नाली व सफाई जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार का इंतजार क्यों। क्यों अधिकारी, जनप्रतिनिधि इन समस्याओं से ऊपर उठकर सोच नहीं पा रहे हैं? क्या इस प्रकार के प्रदर्शनों से समस्याओं के समाधान का कोई रास्ता निकलेगा? दअरसल, निगम अधिकारियों के लिए प्रदर्शन आम हो गए हैं। वे इन प्रदर्शनों के आदी हो चुके हैं। छिटपुट ज्ञापन व पत्रों से तो हलचल ही दिखाई नहीं देती। आक्रोश ज्यादा तेज हुआ तो जरूर निगम का अमला कुछ हरकत करता दिखाई देता है और तात्कालिक आक्रोश जैसे-तैसे शांत भी कर दिया जाता है। विडम्बना देखिए आक्रोश शांत हो भी जाता है लेकिन समस्या यथावत रहती है और प्रदर्शनों का दौर बदस्तूर चलता रहता है।
बहरहाल, शहर जिस गति से बढ़ रहा है न तो उस रफ्तार से सुविधाओं में विस्तार हो रहा है और ना ही जो सुविधाएं हैं उनकी समय पर खैर-खबर ली जा रही है। सीवरेज लाइन के चैम्बर जगह-जगह लीकेज हैं। उनकी सफाई का परंपरागत तरीका ही काम में लिया जा रहा है। सीवरेज लाइन भी पुरानी हो चुकी है। ऐसे में इन सब समस्याओं को ध्यान में रखते हुए फिर से विचार करने की जरूरत है। अब समय आ गया है कि शहर के भीतरी इलाकों के लिए दीर्घकालीन योजना बने। ठोस एवं कारगर उपाय खोजे जाएं। बिना किसी राजनीतिक चश्मे के समूचे शहर के समग्र विकास का खांचा दूरदर्शिता के साथ खींचना अब बेहद जरूरी हो गया है। हालात बद से बदतर होने तक जा पहुंचे हैं, इसलिए अब स्थायी समाधान खोज ही लेना चाहिए
 
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 01 अगस्त 15 के अंक में प्रकाशित 

श्रेय की होड़ या...

 टिप्पणी 

कभी किसी हंगामे तो कभी किसी मरीज की मौत से सुर्खियों में रहने वाला संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल पीबीएम फिर चर्चा में है। शहर के सारे के सारे मुद्दे यकायक गौण हो गए हैं और सभी को केवल और केवल पीबीएम दिख रहा है। सोशल साइट्स पर भी पीबीएम छाया हुआ है। इस शोरशराबे में अस्पताल की बुनियादी सुविधाओं में सुधार के लिए हलचल की रफ्तार भले ही धीमी हो, लेकिन चिकित्सकों के दिल की धड़कनें जरूर बढ़ी हुई हैं। सवाल उठते हैं कि आखिर पीबीएम के लिए परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जिम्मेदारों की ऐसी मनोदशा क्यों? यह हड़कंप क्यों? चिकित्सक भी इतने भयभीत क्यों? पीबीएम के ऐसे हालात के लिए जिम्मेदार कौन ? और इन सब सवालों के बीच बड़ा सवाल यह भी कि क्या पीबीएम खुद बीमार है? दरअसल, इन सभी सवालों के मूल में दो ही बातें या कारण प्रमुख हैं। इच्छाशक्ति का अभाव और राजनीतिक हस्तक्षेप। इच्छाशक्ति का अभाव तो बीकानेर से लेकर जयपुर तक नजर आता है। राजनीतिक हस्तक्षेप के हाल भी कमोबेश वैसे ही हैं। पीबीएम में सब कुछ सामान्य एवं संतोषजनक नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि सुधार की कोशिश कभी हुई ही नहीं। प्रयास भी हुए और व्यवस्थाओं में भी सुधार हुआ, लेकिन टिक नहीं पाया। पीबीएम प्रशासन ने भी तात्कालिक आक्रोश को शांत करने के लिए हमेशा चलताऊ व जुगाड़ वाले ही हल खोजे। कारगर एवं ठोस उपायों को हमेशा दरकिनार किया। यही कारण रहा कि पीबीएम को लेकर गाहे-बगाहे विरोध एवं आंदोलन के सुर मुखर होते रहे। अव्यवस्थाओं का विरोध इन दिनों भी हो रहा है, लेकिन तरीका कुछ नया होने से ध्यान खींच रहा है। हालांकि आंदोलन के अंजाम को लेकर फिजाओं में कई तरह की शंकाएं और चर्चाएं भी तैर रही हैं। फिर भी ध्यान खींचने का सबब राजनीतिक दलों के लिए न केवल परेशानी बल्कि चर्चा में बने रहने का मुद्दा भी बन गया है। अब येन-केन-प्रकारेण ध्यान अपनी तरफ खींचने की कोशिश शुरू हो गई है। बड़े ही हास्यास्पद हालत बन गए हैं। कोई पीबीएम को बीमार बता रहा है तो कोई पीबीएम को ठीक। किसी को पिछली सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई योजनाएं याद आ रही हैं। परिस्थितियां अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग वाली हो गई है। फिर वही बात, क्या शहर हित में दलगत राजनीति से ऊपर नहीं उठा जा सकता? क्या वास्तव में सब के हित टकरा रहे हैं, जो उनको एक मंच पर लाने में बाधक बन रहे हैं। कितना अच्छा होता अगर बिना किसी राजनीति एवं हित के सभी पीबीएम को लेकर एकजुट होकर आवाज उठाते। इतनी मुखर आवाज कि जो सरकार को आमूलचूल परिवर्तन करने को मजबूर कर दे।
बहरहाल, अफसोस है कि सरकारें बदलती हैं लेकिन व्यवस्थाएं नहीं। ऐसे में परिवर्तन एवं सुधार की उम्मीद करना बेमानी है। जब तक बड़े निर्णय नहीं होंगे, वर्षों से जमी जड़ें नहीं उखड़ेंगी, कमीशनखोरी एवं घर पर दुकान सजाने की प्रवृत्ति पर प्रभावी अंकुश नहीं लगेगा, तब तक कैसे उम्मीद करें कि चिकित्सक-मरीज का विश्वास की डोर से बंधा रिश्ता कायम रह पाएगा। ऐसा भी नहीं है कि पीबीएम में सारे ही चिकित्सक एक जैसे हैं। कई ऐसे भी हैं जो आंधियों में भी चिराग जलाए बैठे हैं, लेकिन गेहूं के साथ घुन पिसने तथा एक मछली से सारा तालाब गंदा होने वाली लोकोक्तियों की वजह से नेपथ्य में हैं। इन आंदोलनों का पीबीएम की सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा यह तो वक्त बताएगा। फिलहाल चौपालों पर चर्चाओं के चटखारे का दौर चरम पर है। जनता से जुड़े मुद्दों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। मामले की तह में जाना चाहिए कि आखिर बीमारी की जड़ क्या है। एेसे मामलों में दिखावा या चेहरा चमकाने की जुगत तो बिलकुल नहीं हो। उम्मीद की जानी चाहिए सरकार पीबीएम को लेकर कोई बड़ा फैसला करेगी। हां, साफ-सफाई, पार्किंग जैसी निहायत बुनियादी सुविधाओं में सुधार तो स्थानीय प्रबंधन ही कर सकता है इसके लिए सरकार की जरूरत ही कहां है?
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 24 जुलाई 15 के अंक में प्रकाशित 

मेरा सलाम

चांद नवाब चावड़ा जैसे किरदार मौजूदा दौर में कम ही मिलते हैं। तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद चांद ऐसा काम कर दिखाता है जो वर्तमान की कड़वी हकीकत है। वह नफरतों के बाजार में मोहब्बत बेचने का प्रयास करता है लेकिन अफसोस उसे कोई खरीदार नहीं मिलता। लेकिन वह हार नहीं मानता। इंसानियत एवं मोहब्बत की खातिर अवाम को जगाने के लिए वह अपनी जान से खेलने में भी गुरेज नहीं करता। जी हां यह कहानी हालिया प्रदर्शित फिल्म बजरंगी भाईजान में उस पाकिस्तानी पत्रकार की है, जो हुकमरानों द्वारा बोई गई नफरत की फसल के बीच मोहब्बत का पौधा लगाने का प्रयास करता है। वह एक टीवी चैनल का छोटा सा स्ट्रिंगर है लेकिन उसका जज्बा बहुत बड़ा है। सचमुच पत्रकार होने के नाते चांद के किरदार ने मेरे को बहुत ज्यादा प्रभावित किया। मेरी आंखों में भी उस वक्त आंसू थे, जब चांद की आवाज को न केवल शिद्दत के साथ सुना जाता है बल्कि उसे स्वीकार भी किया जाता है। सच में यह खुशी के आंसू थे। यह चांद की जीत के आंसू थे। न केवल फिल्मी दुनिया बल्कि हकीकत में भी एेसे चांद हैं। आखिर ऐसे किरदारों के दम पर ही तो ईमानदारी एवं खुद्दारी जिंदा है। मानवता एवं इसांनियत के लिए कुछ कर गुजरने वाले ऐसे तमाम चांदों को मेरा सलाम।

कार्रवाई इन पर भी हो

टिप्पणी

बीकानेर के फड़बाजार में बुधवार को नगर निगम के अमले ने भारी पुलिस जाब्ते की मौजूदगी में बड़ी संख्या में अतिक्रमण हटाए। करीब साढ़े छह घंटे की कार्रवाई का छिटपुट विरोध ही हुआ। कई दिनों बाद शहर में ऐसी कार्रवाई देखने को मिली। अन्यथा किसी तरह का विरोध या जनप्रतिनिधियों के दवाब में आकर अक्सर इस तरह की कार्रवाई मुकाम तक पहुंचने से पहले रुक भी जाती हैं।
वैसे, अवैध कब्जों की भरमार अकेले फड़बाजार में ही नहीं अपितु शहर भर में है। अतिक्रमण की शिकायतों की फेहरिस्त लम्बी है, लेकिन कार्रवाई अंगुलियों पर गिनने जितनी भी नहीं है। फड़बाजार का मामला भी लगातार टलता आ रहा था, लेकिन उच्च न्यायालय के आदेशों के आगे निगम को कार्रवाई करनी पड़ी। अगर अदालत का दखल नहीं होता तो इतनी बड़ी कार्रवाई को इसी अंदाज में अंजाम देना शायद ही संभव था।
खैर, फड़बाजार में हटे कब्जों को देख कई तरह के सवाल फिजां में तैरने लगे हैं। मसलन, इतने कब्जे क्या रातों-रात कर लिए गए? जब यह कब्जे किए जा रहे थे तब निगम या अन्य महकमों के सम्बन्धित अधिकारी कहां थे? क्या बिना शह या मिलीभगत के इतनी बड़ी-बड़ी दीवारें व भवन तान देना संभव था? बात-बात पर नोटिस देने तथा भवन सीज करने वाले निगम अधिकारियों-कर्मचारियों ने इतने कब्जों को अनदेखा कैसे कर दिया? जांच का विषय तो यह भी है कि आखिर यह कब्जे किसकी सरपरस्ती में हुए? क्या कब्जे करने वालों के साथ-साथ वो सब दोषी नहीं है जिनकी जिम्मेदारी शहर में अवैध निर्माण रोकने की है? सवाल बहुत से हैं जो निगम को कठघरे में खड़ा करते हैं। अगर सब कुछ नियमानुसार होता तो क्या कल इतने बड़े अमले की जरूरत पड़ती? क्यों साढ़े छह घंटे तक तक लोग परेशान होते? क्यों इतने ससांधनों का उपयोग करने की जरूरत पड़ती? क्यों इतनी बड़े पैमाने पर तोडफ़ोड़ होती? बहरहाल, अकेले फड़बाजार में कब्जे तोडऩे से ही शहर के हालात नहीं सुधरने वाले। शहर में अतिक्रमण की भरमार है और अवैध निर्माण की शिकायत का सिलसिला भी थमा नहीं है। इसीलिए जरूरी हो जाता है कि अब कब्जे करने वालों को किसी भी तरह से नहीं बख्शा जाए। कार्रवाई का हथौड़ा बिना भेदभाव चले और लगातार चले। अचानक व बिना सूूचना के बजाय बाकायदा मुनादी करके कब्जे हटाए जाएं। लगे हाथ निगम प्रशासन को उनकी भी पहचान कर लेनी चाहिए कि जिनकी वजह से यह कब्जे हुए। क्योंकि जिनके मुंह खून लगा है वह आगे से ईमानदारी बरतेंगे इसकी क्या गारंटी है? और अगर ऐसे ही अधिकारियों-कर्मचारियों से काम चलाना है तो फिर कब्जे होने व तोडऩे का सिलसिला किसी भी सूरत में थमने वाला नहीं है। ऐसे अधिकारी-कर्मचारी के खिलाफ तो विभागीय कार्रवाई के साथ पुलिस में भी मामला दर्ज होना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए निगम प्रशासन कब्जों के मामलों में न केवल साहस दिखाएगा बल्कि उनको हटा नजीर भी पेश करेगा।


राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 17 जुलाई 15 के अंक में प्रकाशित 

लिहाज

मेरी दसवीं कहानी 

बाजार में उस दुकान पर काफी भीड़ थी। ग्राहकों की बारी भी देर से आ रही थी। निर्मल भी कतार में खड़ी थी। वाकई दुकानदार एवं उसके नौकर बहुत व्यस्त थे। इसी बीच राह चलती एक महिला ने बड़ी बेफिक्री के साथ पूछा, भईया बादाम क्या भाव दिए? दुकानदार बोला 220 रुपए के पाव। वह 210 के लिए बोली लेकिन दुकानदार नहीं माना तो वह नाक भौं सिकोड़ती हुई आगे बढ़ गई। इसी बीच एक ट्रैफिक पुलिस का जवान आया। बिना कतार में लगे वह ऊंची आवाज में बोला, सेठजी एक पाव बादाम देना। सेठजी ने तत्काल नौकर को इशारा किया। नौकर ने सारे काम छोड़े और बादाम का डिब्बा ले आया। जल्दबाजी में नौकर ने पलड़े में बादाम कुछ ज्यादा डाल दिए थे। वह एक-एक बादाम को उठाकर पलड़े का संतुलित करने का उपक्रम कर रहा था। यह सब देख जवान से रहा नहीं गया, वह जोर से बोला, अरे दस-बारह फालतू दे दोगे तो क्या बिगड़ जाएगा। नौकर के कानों तक बात नहीं पहुंची लेकिन सेठजी ने मौके की नजाकत ताड़ ली थी। वहीं से बोले, अरे रामू जल्दी करो, हवलदार जी को लेट हो रही हैं। बस फिर क्या था, रामू ने झूलते पलड़े से ही बादाम निकाले और पॉलिथीन की थैली में डालकर जवान की तरफ बढ़ा दी। जवान ने चुपके से उसे दो सौ रुपए थमाए और चल पड़ा। निर्मल मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। बारी से पहले, भाव से कम और तौल में भी ज्यादा। वह सोच रही थी आखिर पुलिस के प्रति इतना लिहाज क्यों है 

घालमेल

मेरी नौंवी कहानी

जंगल में खरगोश की गिनती फुटकर कहानी कविता लिखने वालों में होती थी। हाथी से दोस्ती के बाद तो खरगोश के दिन ही फिर गए। हाथी की जान पहचान जंगल के अच्छे लेखकों से थी और इसी के बलबूते खरगोश को सम्मानित करवा दिया। इसके बाद तो खरगोश ने जंगल में खूब नाम कमाया। तभी तो जंगल में लेखन से जुडे लगभग सभी कार्यक्रमों में खरगोश को बुलाया जाने लगा। अब तो खरगोश नवागंतुक लेखकों का हीरो बन गया। विशेषकर जंगल की कई लेखिकाएं खरगोश से बेहद प्रभावित थी। खरगोश मौके की नजाकत ताडने में माहिर था। उसने नई नवेली लेखिकाओं के लिए कुछ कहानी व कविताएं लिखकर जंगल में प्रकाशित होने वाले कुछ पत्र पत्रिकाओं में छपवा दी। बतौर लेखक नाम भी नई नवेली लेखिकाओं के ही थे। बस फिर क्या था, जंगल में लेखकों की भीड बढती गई। एक-एक कथित कहानी लिखने वाले भी लेखकों की सूची में शुमार होते गए। एक दिन घोडे के हाथ जंगल का एक अखबार लगा। अखबार में गिलहरी के नाम से प्रकाशित कहानी देखकर घोडा सोच में डूब गया। आकर्षक नयन नक्श वाली जो गिलहरी ठीक से शुद्ध हिन्दी लिख नहीं पाती थी, उसने लेखन में कलम तोड रखी थी। घोडा यह घालमेल समझ नहीं पा रहा था। वह सोच में डूबा था। जानवरों ने भी इंसानों की फितरत को अपना जो लिया था।

काउंटर


बस यूं ही
कल व्हाटस एप पर एक हाउस वाइफ के गुणगान करने वाली पोस्ट पढ़ी। बिलकुल महिला की तरफदारी करती हुई पोस्ट। पढ़ते ही दिमाग खटका, सोचा जरूर यह पुरुष विरोधी मानसिकता का कमाल है, वरना कुछेक अपवाद छोड़ दें तो व्यवहारिक जीवन में यह संभव है? पोस्ट के जवाब में कुछ लिखने का मानस उसी वक्त बना लिया और मात्र आधा घंटे में उसका जवाब तैयार कर उसी गु्रप में पोस्ट कर दिया है। जानकारी के लिए दोनों पोस्ट यहां चस्पां की जा रही हैं। तय आप करें कि हकीकत क्या है।
---व्हाटस एप की पोस्ट --- 
हाउस वाइफ का दुख, हाउस वाइफ ही जाने। आज ससुर तो कल सास बीमार। ससुर को डाक्टर के पास ले जाना है। सास को बैद जी को दिखाना है। मंदिर से लेकर अस्पताल तक साथ निभाना है। पति का सिर दुख रहा है, सिर पर बाम लगाना है। बेटा खांस रहा है, शरीर गर्म हो रहा है, उसे हल्दी मिला मिला दूध पिलाना है। चिड़चिड़ा हो रहा है, इसलिए पास भी बैठना है। स्कूल जाकर छुट्टी के लिए कहना है। गैस खत्म हो गई, कब आएगी पता नहीं, तब तक पड़ोसी से मांग कर काम चलाना है। काम वाली बाई आज आई नहीं, पर खाना तो बनाना है। बर्तनों को साफ करना है। मुंबई से नंदोई आए हैं, दो चार दिन उनका सत्कार करना हे। साथ में शहर दर्शन भी कराना है। कमी रह जाएगी तो महीनों सुनना पड़ेगा। छोटी बहन का फोन आया, ससुराल में विवाह है, शौपिंग के लिए बाजार साथ जाना है। दफ्तर के पति का फोन आया है। रात को अफसर का खाना है बढिया से बढिय़ा इंतजाम करना है। इज्जत का झंडा ऊंचा रखना है। जेठ जी का फोन आया, कल सवेरे की गाड़ी से आएंगे। पतिदेव तो दफ्तर जाएंगे इसलिए स्टेशन से लाना है। आज करवा चौथ का व्रत है, भूखे पेट भजन नहीं होता, हाउस वाइफ को घर तो चलाना है। खुद का बदन दुखे या पेट खाना तो बनाना है। छोटी छोटी बात का भी ख्याल रखना है। मां, बहू, भाभी, पत्नी का धर्म भी निभाना है। सब को खुश जो रखना है मन करता थोड़ा अपने मन का कर लें, इतने में कोई घंटी बजाता है। दरवाजा खोला तो सामने पड़ोसी खड़ा है। पत्नी की तबीयत ठीक नहीं अस्पताल साथ जाना है। इतना कुछ करती है फिर भी जिंदगी भर सुनना पड़ता है, दिन भर करती क्या हो तुम्हे कितना आराम है। काम के लिए तुम्हे दफ्तर नहीं जाना पड़ता। कैसे समझाए किसी को? निरंतर खटते-खटते उम्र गुजर जाती है। हर दिन दूसरों के लिए जीती है, फिर भी जिंदगी भर केवल हाउस वाइफ कहलाती है।--सभी गृहणियों को समर्पित।
---जवाब में लिखी पोस्ट ---
बस कहना ही आसान है
करना उतना ही मुश्किल है
सिर्फ पत्नी ही बेचारी है
पति तो बिलकुल नाकारा है।
बेचारा सुबह से लेकर शाम तक
गधे की तरह पिलता है
तब कहीं जाकर घर का 
चूल्हा मुश्किल से जलता है। 
आज ससुर बीमार है,
तो कभी सास की बारी है।
क्या यह लोग गैर हैं,
जो लगते इतने भारी हैं। 
पत्नी का सिर दुखता है
पति तो लोहे का बना है,
आफिस का तनाव तो
घर तक लाना मना है। 
एम गाड़ी के दो पहिये
फिर क्यों करें शिकायत
एक दूजे की करें मदद
समझें एक दूजे की जरूरत।
घर के काम करना कोई 
बड़ी बात है क्या?
अगर इनमें ही दिक्कत है 
तो फिर पत्नी और करेगी क्या?
जेठ, ससुर, सास से जितनी पीड़ा
क्या उतनी है खुद के मां-बाप से
हाउस वाइफ करे यह सवाल
कभी खुद अपने आप से।
पति भी उतना ही दुखी 
जितनी की पत्नी दुखी 
केवल मन का वहम हैं,
मानें तो दोनों दुखी। 
माना महिला होकर महिला की
पैरवी करना ठीक है,
लेकिन सारा दोष पति को देना
भला कहां की रीत है।
हाउस वाइफ घर संभालती,
पति करता रूजगार है
दोनों चलते साथ-साथ
बढ़ता तभी प्यार है। 
कृपया कर ऐसी 
अफवाहें ना फैलाएं
पति-पत्नी के रिश्ते में
ना कोई दीवार बनाएं।

आओ विकास की नई बुनियाद रखे

 टिप्पणी..
यह पहल को पंख लगाने का दिन है। यह नई परम्परा की बुनियाद रखने का अवसर है। यह बीकानेर में विकास की नई इबारत लिखने का मुफीद मौका भी है। बस जरूरत है तो अवसर को भुनाने तथा थोड़ी सी इच्छाशक्ति दिखाने की। अगर यह सब हो गया तो यकीनन बीकानेर नगर निगम के लिए ऐतिहासिक दिन होगा। ऐसा करना अब बीकानेर के लिए बेहद जरूरी भी हो गया है। वैसे ऐसा करना कोई मुश्किल काम भी नहीं है। क्योंकि हाल ही में कोटा नगर निगम ने इस प्रकार की पहल करके इसे साबित कर दिखाया है। कोटा निगम में पहली बार तीन दिन तक विशेष सत्र चला। इस अवधि में 14 घंटे निर्बाध चर्चा हुई तथा 120 से ज्यादा सवाल पूछे गए। इतना ही नहीं कई सवालों के जवाब आए तो कई समस्याएं तो मौके पर ही निबट गई। 
इस तरह की बैठक बीकानेर में इसीलिए भी जरूरी है क्योंकि यहां इंतजार की इंतहा हो गई है। धैर्य जवाब देने लगा है। शहर की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है। पिछली बैठकों का हश्र भी सभी देख चुके हैं। नए निगम के गठन के बाद तीन बैठकें हो चुकी हैं लेकिन हर बैठक में बात सफाई, आवारा पशुओं, बिजली एवं सीवरेज से आगे नहीं बढ़ पा रही है। हालत यह है कि न तो इन मुद्दों पर कोई कारगर फैसला हो पा रहा है और ना ही इनकी वजह से नए मसलों की बारी आ रही है। विपक्ष को तो हमेशा शिकायत रही है कि उनकी आवाज दबा दी जाती है। सदन की कार्यवाही में उनके सवाल तक शामिल नहीं होते हैं। हो-हल्ले एवं शोरगुल के बीच बैठक समाप्त कर दी जाती है। हो सकता है इस प्रकार के हो-हल्ले में किसी को फायदा दिखता हो लेकिन यह शहर हित में तो कतई नहीं हो सकता है। 
हकीकत यह है कि पार्षदों को जनता अब टोकने लगी है, चाहे वो किसी भी दल के हों। कई जगह तो जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच जाने में ही शर्मिंदगी महसूस होने लगी है। जब इस प्रकार के हालात पैदा हो जाए तो जनप्रतिनिधियों के लिए इससे बड़ी लाचारगी और बेचारगी क्या होगी? खैर, शहर हित में विकास कार्यों में सियासत तो बिलकुल भी नहीं होनी चाहिए। पक्ष-विपक्ष की परिधि से ऊपर उठकर केवल और केवल शहर को आगे बढ़ाने की बात हो। विपक्षी दल के सदस्य अगर शहर हित में कोई बात रखते हैं तो विरोध या हो-हल्ला करने की बजाय उनकी बात को गंभीरता से सुना जाए। उनको भी अपनी बात रखने का पूरा मौका मिले। ऐसा नहीं हो कि एक जना सवाल पूछे और और दस जने उसको टोकने वाले खड़े हो जाए। सभी को ठीक से सुन लिया जाए तो यह भी एक तरह से शहर हित में ही है। समाधान योग्य सवालों को सदन की कार्यवाही में शामिल करना भी उतना ही जरूरी है। 
अगर निगम की साधारण सभा की बैठकें पुराने एवं परम्परागत ढर्रे पर ही होती रही तो शहर के विकास की कल्पना करना तो दूर हम उसका खाका तक भी तैयार नहीं कर पाएंगे। और जब बात हो-हल्ले या तीन-चार मुद्दों से आगे ही नहीं बढ़े तो फिर बैठक बुलाने का औचित्य ही क्या है? जाहिर सी बात है जब मुद्दे ही नहीं आएंगे और किसी तरह की कोई चर्चा ही नहीं होगी तो फिर विकास की रूपरेखा तैयार करने की बात ही बेमानी है। बैठक की सार्थकता तभी है जब उनमें सारगर्भित चर्चा हो। शहर के विधायकों एवं सांसद से भी अपेक्षा की जाती है कि वे निगम बैठक में उपस्थित होकर शहर हित में अपना योगदान देवें। 
बहरहाल, पक्ष-विपक्ष के पार्षदों ने शहर हित में दो-तीन दिन सदन चलाने और दो-दो सवाल पूछने पर सैद्धांतिक सहमति दी है। अब गेंद महापौर एवं निगम सीईओ के पाले में हैं। उम्मीद है कि वे शहर व जनहित को देखते हुए उचित फैसला लेने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करेंगे। शहर की जनता लम्बे समय से उनको उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का यह सुनहरा मौका है। अगर महापौर व सीईओ शहर व जनहित को ध्यान में रखते हुए तथा पार्षदों की उम्मीदों के हिसाब से बैठक चला पाए तो यकीनन वो नई परम्परा का सूत्रपात करेंगे। उनको ऐसा करना भी चाहिए। इसका पहला असर तो निगम में लगने वाली फरियादियों की भीड़ और प्रदर्शनों के कम होने का ही दिखाई दे जाएगा। 
महापौर व सीईओ ने ऐसा कर दिया तो थोड़े में ही संतोष करने वाले बीकानेरी लोग यकीनन उनके इस योगदान को ताउम्र याद रखेंगे। अब यह उन पर निर्भर करता है कि वो लकीर के फकीर बनना ही पसंद करेंगे या लीक से हटकर नई पहल की शुरुआत कर इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाएंगे।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 01 जुलाई 15 के अंक में प्रकाशित .

केवल नाम बदलना नाकाफी

 टिप्पणी
बीकानेर-चेन्नई साप्ताहिक एक्सप्रेस को अब अणुव्रत एक्सप्रेस के नाम से जाना जाएगा। इससे पहले बीकानेर-जयपुर के बीच चलने वाली इंटरसिटी एक्सप्रेस का नाम लीलण एक्सप्रेस कर दिया गया था। अब सवाल यह खड़ा होता है कि नाम बदलने से क्या रेल सुविधा में विस्तार हो गया या यात्रियों कोई राहत मिल गई? सवाल इसलिए भी है क्योंकि रेल सुविधाओं में अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ है। अकेले बीकानेर रेल मंडल की ही बात करें तो अभी भी बहुत सारी घोषणाएं व सुविधाएं कागजों में ही हैं। यकीनन यह पूरी हों तो यात्रियों का काफी लाभ मिलेगा। बीकानेर की सबसे बड़ी समस्या रेल फाटकों पर लगने वाले जाम को लेकर भी है। उसके समाधान का मुद्दा फुटबाल बना हुआ है। न्यायालय के निर्देश के बावजूद किसी जनप्रतिनिधि ने इसके स्थायी हल के लिए कोई बड़ी पहल नहीं की। घोषणाओं की फेहरिस्त लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन उनका समाधान नहीं होता। मेड़ता-पुष्कर रेल लाइन का काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है। इसी तरह नोखा-सीकर रेल लाइन का सर्वे हुआ, रिपोर्ट भी बनी लेकिन फिर इसे भुला दिया गया। बीकानेर-बिलासपुर एक्सप्रेस काघोषणा के हिसाब से संचालन नहीं हो रहा है। बीकानेर-जयपुर इंटरसिटी को मेड़ता से बाइपास से निकालने का आदेश मुद्दत बाद भी लागू नहीं हो रहा। इस गाड़ी में एसी कोच लगाने की मांग भी लगातार नजरअंदाज की जा रही है। बीकानेर-डेगाणा के बीच पैसेंजर फिर से शुरू करने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है। बीकानेर से कोलकाता के लिए सिर्फ साप्ताहिक गाड़ी है लेकिन अलग से नियमित गाड़ी नहीं है। उदयपुर और अजमेर के लिए सीधी रेल सेवा नहीं है। हरिद्वार स्पेशल है लेकिन वह सिर्फ साप्ताहिक है। बीकानेर-दिल्ली सराय रोहिल्ला इंटरसिटी का गुडग़ांव में तथा जैसलमेर-हावड़ा का भदोही में केवल ठहराव करने भर से ही यात्रियों को काफी राहत मिलेगी। इसी तरह कुछ गाडिय़ों में विस्तार कर दिया जाए तो यात्रियों की बहुत बड़ी मुश्किल हल हो जाएगी। कुछ समय पहले तक जरूरत एवं अवसर विशेषों पर स्पेशल गाडिय़ों का संचालन होता था लेकिन अब उनकी संख्या भी घट गई है। बीकानेर रेलवे प्लेटफार्म पर पूरा शैड, ऐस्केलटर निर्माण, विश्रामालय विस्तार, पर्यटन सूचना केन्द्र निर्माण, स्टेशन पर पुख्ता सुरक्षा इंतजाम तथा अक्सर खराब रहने वाले स्केनर आदि पर भी सोचने की जरूरत है। बहरहाल, नाम बदलने पर संबंधित जनप्रतिनिधियों को बधाइयां मिलना जारी है। इसे बाकायदा प्रचारित भी करवाया जा रहा है, लेकिन इस बात का आंनद तो तभी है जब जनप्रतिनिधि नाम के साथ-साथ रेल सुविधाओं व यात्री हित का भी ख्याल रखें। सिर्फ हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा की तर्ज पर काम करने के बजाय वास्तविक, ठोस एवं कारगर काम हो। आज भी बीकानेर से संचालित लम्बी दूरी की गाडिय़ों में पेंट्री कार की सुविधा नहीं है। भविष्य की जरूरतों को देखते हुए अभी से सोचने एवं काम करने की जरूरत है। भटिण्डा-बीकानेर-फलौदी व बीकानेर-हिसार-रेवाड़ी मार्ग पर विद्युतीकरण शुरू हो गया है। बीकानेर और लालगढ़ में तीन ही वांशिग लाइन है। भविष्य में इनके विस्तार की जरूरत भी पड़ेगी। रेलवे की काफी जमीन खाली है। बड़े संस्थान रेलवे विवि या रेलवे मेडिकल कॉलेज की संभावनाओं पर विचार हो सकता है। जनप्रतिनिधि चाहें तो काम बहुत हैं। उम्मीद है वे सोचेंगे भी और दायरा भी बड़ा करेंगे। भले ही जनप्रतिनिधि अपने किए का श्रेय लें लेकिन उनको बुनियादी एवं प्रमुख समस्याओं पर भी ध्यान देना चाहिए और उनके समाधान के लिए प्रयास भी करने चाहिए।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 26 जून 15 के अंक में प्रकाशित ...

जान है तो जहान है

टिप्पणी
जा न है तो जहान है। इसके पीछे जिंदगी का बहुत बड़ा फलसफा छिपा है। विशेषकर सड़क पर बिना नियमों और बगैर हेलमेट चलने वालों के लिए तो यह किसी कारगर नसीहत से कम नहीं है। फिर भी लोग इसे नजरअंदाज कर जान जोखिम में डालने से बाज नहीं आते। विशेषकर बीकानेर में यातायात नियमों की धज्जियां उड़ाने के उदाहरण ज्यादा हैं। हालांकि कई बार सवाल पुलिस कार्रवाई पर भी उठे हैं। वाहन चालकों ने पुलिस कार्रवाई के तौर-तरीकों पर कड़ा एतराज भी जताया। इसी के चलते दो तीन पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर भी किया जा चुका है। वाहन चालकों की पीड़ा इस बात को लेकर है कि पुलिस के जवान बीच रास्ते में दोनों हाथ फैलाकर वाहन रुकवाते हैं और चाबी निकाल लेते हैं। नहीं रुकने पर पीछे दौड़ते हैं या डंडा तक फटकार देते हैं। वाहन चालकों की पीड़ा अपनी जगह सही है लेकिन पुलिस यह सब नहीं करेगी तो क्या हेलमेट की या नियमों की पालना संभव हैं? जब पुलिस की मौजूदगी में ही लोग यू टर्न लेने से गुरेज नहीं करते हैं तो फिर बिना भय के वो यातायात नियमों की पालना करने लगेंगे, संभव नहीं लगता। वाहन चालकों को भी समझना होगा कि यह सब उनकी सुरक्षा के लिए ही तो किया जा रहा है और हेलमेट पहनेंगे तो सबसे ज्यादा फायदा और हित उनका ही होगा। वाहन चालक पुलिस के समक्ष ईमानदारी से पेश आएं तो शायद बीच सड़क पर वाहन रुकवाने, चाबी निकालने या डंडा फटकारने की नौबत ही नहीं आए। सर्वविदित है कि बीकानेर में दुपहिया वाहन पर पीछे बैठने वाली सवारी के लिए भी हेलमेट लगाना अनिवार्य है, लेकिन यहां तो चालक ही हेलमेट नहीं पहनता है। ऐसे में पुलिस को आदेश की पालना करवाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। हां, इतना जरूर है कि हेलमेट के चक्कर में यातायात व्यवस्था से जुड़े अन्य पहलू उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। शहर में बिना नंबरी वाहन हर कहीं दिखाई दे जाएंगे। शीशों पर काली फिल्म लगे वाहन बड़ी संख्या में दौड़ रहे हैं। सीट बेल्ट के उपयोग करने के उदाहरण तो बेहद कम हैं। गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल का उपयोग खूब हो रहा है। प्रतिबंधित क्षेत्रों में भारी वाहन बेखौफ आ जा रहे हैं। क्षमता से ज्यादा सवारियांं न केवल दुपहिया वाहनों बल्कि चौपहिया वाहनों में सरेआम बिठाई जा रही हैं। जिला मुख्यालय पर ही बसों की छतों पर यात्रा हो रही है। ओवरलोड वाहन शहर से गुजर रहे हैं। कई जगह अघोषित बस स्टैंड बन चुके हैं। मनमर्जी की पार्किंग से तो समूचा शहर परेशान है। शहर में कई जगह लगने वाले जाम में फंसे लोग अपने-अपने हिसाब से ही निकल रहे हैं।
बहरहाल, पुलिस हेलमेट अभियान को प्राथमिकता में रखे, लेकिन यातायात संबंधी बाकी पहलुओं पर भी विचार करे। जिन तौर-तरीकों पर आपत्ति है, उनमें सुधार हो, ताकि वाहन चालकों को भी समझ में आ जाए कि जो किया जा रहा है वह उनके भले के लिए ही है। हेलमेट की सार्थकता तभी है जब यह आदत में शुमार हो जाए। इसके लिए जरूरी यह भी है कि समझाइश भी हो। सामाजिक, धार्मिक, व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ सामूहिक बैठक रखी जा सकती है। सरकारी कार्यालयों में सभी विभागाध्यक्ष अपने मातहतों को हेलमेट के लिए न केवल प्रेरित करें बल्कि गंभीरता के साथ अनिवार्य भी कर दें तो लगता नहीं कि पुलिस को हेलमेट के लिए डंडा फटकारने की जरूरत पड़ेगी। वैसे भी कानून और यातायात नियमों की पालना करवाने की जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस की ही नहीं है। आम नागरिक होने के नाते उनकी पालना करना हम सब का भी नैतिक दायित्व है।


राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 24 जून 15 के अंक में प्रकाशित ...

एक तेरा साथ हमको....



वो यादगार लम्हा था और आज भी जेहन में है। बड़ी बात यह है कि यह अब तक राज ही था। ठीक 11 साल बाद उस लम्हे की पुनरावृत्ति हुई तो सोचा क्यों ना अब सबसे साझा कर लूं। चार नवम्बर 2003 को मेरी मगनी हुई थी। सगाई के करीब 15 दिन बाद मंगेतर का लैंडलाइन से फोन आया था, क्योंकि उस वक्त मोबाइल इतना ज्यादा प्रचलन में नहीं था। पहली बार फोन पर बात कर सचमुच मेरा गला सूख गया था। मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था। धड़कन भी बढ़ गई थी। मैं कुछ असामान्य व असहज सा था। उस वक्त श्रीगंगानगर में कार्यरत था। बगल में बैठे साथी ने तत्कालीन सम्पादक जी के समक्ष मेरी दशा का वर्णन बिलकुल रिपोर्टिंग वाले अंदाज में लाइव कर दिया। बस फिर क्या था। सम्पादक जी रोज मेरे को कहते कि एक मोबाइल खरीद लो, बातचीत में आसानी होगी। कई दिन तक तैयार ही नहीं हुआ। नया साल आने को था, उन्होंने कहा शेखावत मौका अच्छा है। आखिरकार उनकी सलाह पर मैं मोबाइल खरीदने को तैयार हो गया। उस वक्त नोकिया 3310 के बाद नोकिया 3315 मार्केट में नया-नया आया था। कीमत थी 41 सौ रुपए। यह अलग बात है कि खरीदने के दूसरे ही दिन कीमत 37 सौ रुपए पर आ गई थी। खैर, मोबाइल को पैक करके उस पर दवा लिखकर जोधपुर भिजवा दिया गया। सचमुच मोबाइल बड़ा कारगर रहा। सप्ताह में एक बार बात करने का सिलसिला अब दैनिक हो गया था। यह क्रम शादी होने तक 22 जून 2004 तक अनवरत चला। इसके बाद कई मोबाइल खरीदे, लेकिन इस बार शादी की वर्षगांठ के मौके पर धर्मपत्नी को नवीनतम तकनीक से लैस एक मोबाइल दिया तो वह खुशी से चहक उठी। पता नहीं उसने भी दो टी-शर्ट चुपके से कब खरीद लिए थे। अब तक छिपाकर कर रखे थे। रात को उसने दोनों टी-शर्ट मेरे को भी बतौर गिफ्ट भेंट किए।
खैर, 11 साल के इस हसीन सफर में अद्र्धांगिनी निर्मल ने मेरा हर काम में सहयोग किया है। पढ़ी लिखी होने के बावजूद परम्पराओं एवं संस्कारों का उसमें गजब का समावेश है। संयुक्त परिवार की अवधारणा में विश्वास करने की तथा उसको शिद्दत से निभाने की कला के उदाहरण आजकल कम ही मिलते हैं, लेकिन निर्मल इस काम में भी पारंगत है। सचमुच निर्मल के बिना मैं अधूरा हूं। सामान्य जीवन में भी और जॉब में भी। वो हर काम में न केवल मेरी मदद करती है बल्कि समय-समय पर सलाह भी देती है।

योग का संयोग


बस यूं ही 
वाह। आज तो कमोबेश समूचा देश ही अनुलोम-विलोम एवं कपालभाति करता नजर आया। विदेशों में भी हमारे योग की धूम रही। वैश्विक पहचान मिलने का यह पहला अवसर था, लिहाजा जोश चरम पर था। काफी दिनों से तैयारियां चल रही थी। पूर्वाभ्यास करवाया जा रहा था। अलसुबह शहर के कई पार्क गुलजार हो गए। मुख्य कार्यक्रम वाले स्थानों के बाहर गाडिय़ों एवं बसों की कतारें इस बात की चुगली कर रही थी कि कितने लोग स्वयं स्फूर्त आए और कितनों को टारगेट के चक्कर में लाया गया। कई जगह तो बड़े मैदानों को नजरअंदाज कर छोटों का इसलिए प्राथमिकता दी गई ताकि उपस्थिति सम्मानजनक दिखाई दे। खैर, योग को लेकर इतना उत्साह था कि बस पूछो मत। कई तो ऐसे सज-धज के आए गोया किसी की बारात में आए हैं। बाकायदा गले में पट्टका डालकर। परिधान देखकर आभास ही नहीं हुआ लोग योग करने आए हैं या देखने। कई जगह तो मातृशक्ति साड़ी में ही व्यायाम करने में तल्लीन थी तो पुरुष साफा, पैंट, शर्ट आदि में भी योगा करते नजर आए। सचमुच क्या नजारा था।
वैसे यह योग बड़ा ही करामाती है। इसके करने से केवल तन-मन ही स्वस्थ नहीं रहता बल्कि इसके नाममात्र से ही कइयों के दिन भी फिर गए। रातोरात सितारे बुलंदी पर पहुंच गए। इस चमत्कारी एवं करामाती शब्द से भला सियासत कैसे अछूती रहती। तभी तो किसी ने इसे गले से लगाया तो किसी को किनारा करने में ही फायदा नजर आया। वैसे भी सियासत में योग की दखल पहले से ही है। यह बात अलग है कि इसके आगे कुछ और शब्द जुड़े हुए हैं। मसलन राजयोग, सहयोग, हठयोग, सर्प योग, कर्मयोग, प्रयोग, ज्ञान योग, जांच आयोग जैसे न जाने कितने ही ऐसे शब्द हैं, जिनका सियासत के गलियारों में बहुतायत में उपयोग होता है। और अब तो योग एवं सियासत का रिश्ता इतना प्रगाढ़ हो गया है कि फेविकोल का जोड़ भी पानी भरने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
बहरहाल, योग के प्रति इतना लगाव देखकर कहा जा सकता है कि देश का भविष्य उज्ज्वल है। वैसे भी पहला सुख निरोगी काया को माना गया है। और काया निरोगी तभी रहेगी जब योग करेंगे। योग को लेकर कई तरह के जुमले भी तो हैं, जैसे कि योग भगाए रोग, करो योग रहो निरोग... आदि आदि। वाकई वो सब बधाई के पात्र हैं जो कीमती समय में कुछ समय निकालकर योग करने पहुंचे। चाहे कैसे भी पहुंचे। पहली बार योग से रूबरू होने वालों ने आज जोश में कसरत की खूब जोर आजमाइश की। ऐसे लोगों से सलाह है कि वे या तो अब नियमित योग करें अन्यथा कोई दर्द निवारक दवा जरूर खरीद कर रख लें क्योंकि कसरत करने से हरकत में आई मांसपेशियां कब बगावत कर अकड़ जाए इसकी कोई गारंटी नहीं है। अब आप भी आंख बंद करके धीरे-धीरे सांस अंदर खींचिए। थोड़ी देर रुके और वापस सांस को बाहर छोडि़ए। यह प्रक्रिया तब तक दोहराते रहे जब तक योग जन-जन तक ना पहुंच पाए। क्योंकि चाहे राष्ट्रीय दिवस हो या विश्व दिवस। उनका जोश केवल एक दिन ही रहता है। योग के साथ तो कम से कम ऐसा न हो। सियासत करने वाले भले ही करें अपने लिए तो योग काया को निरोगी रखने का कारगर नुस्खा भी है। सभी को योग दिवस की खूब सारी बधाई।

मजबूरी

मेरी आठवीं कहानी

लम्बे समय के बाद भाई का फोन आने पर बादामी बेहद खुश थी। भाई-बहन ने एक दूसरे के हाल-पूछे। बातों का सिलसिला आगे बढ़ा तो भाई ने भानजे की रिश्ते के बारे में पूछ लिया। बड़ी उत्सुकता से चहकती हुई बादामी बोली, बस आठ माह बाद शादी करने का विचार है। बहन की खुशी देख भाई ने सवाल दागा, कहीं शादी जल्द तो नहीं? बस फिर क्या था। बादामी कहने लगी। भाई तेरे को क्या पता। दुनियादारी क्या होती है। आस-पडा़ेस की महिलाओं ने ताने मार-मारकर शर्मिन्दा कर रखा है। जितने मुंह उतनी ही बात। कोई कहती है लड़का सुंदर नहीं है, इसलिए रिश्ता नहीं आ रहा है? कोई कहती है सगाई ही नहीं आ रही है, बेचारा कुंवारा ही रहेगा शायद? तो कोई कहती है कोई मोटा मुर्गा नहीं फंसा होगा, दहेज में कार चाहिए ना इसलिए। और भी ना जाने क्या-क्या? बहन एक ही सांस में काफी कुछ गई थी। वैसे भाई उम्र के लिहाज से काफी छोटा था लेकिन बहन कीमजबूरी उसको समझ में आ गई थी। बहन की बातें इस तरह गूंज रही थी जैसे किसी ने गर्म शीशा कानों में डाल दिया हो। उसे रह-रहकर बहन की बातों का ख्याल आ रहा था। वह मन ही मन बुदबुदाया वाह री दुनिया।

सरकारी दौरा

मेरी सातवीं कहानी
मंत्री का पीए बदहवाश सा दौड़ता हुआ आया और मीटिंग के बीच में ही चिल्लाया सर अनहोनी हो गई। मंत्री के माथे पर चिंता की सलवटें उभरी। चश्मे को नीचे खिसका कर नाक पर टिकाते हुए पीए की आंखों में आंखें डाल कर बोले, हुआ क्या है। पीए थोड़ा और करीब आया और कान में फुसफुसाया। इसके बाद तो मंत्रीजी के चेहरे पर दूसरा ही रंग था। उनकी उत्सुकता अब नैराश्य में तब्दील हो चुकी थी। मीटिंग में मौजूद अधिकारीगण मंत्री का मूड भांप कर चुपचाप हाथ जोड़ते हुए वहां से जाने लगे। पलक झपकते ही समूचा रूम खाली था। मन की पीड़ा को बाहर लाते हुए मंत्रीजी बुदबुदाए छेदीलाल मेरा समर्पित कार्यकर्ता था। चुनाव में मेरी बहुत मदद करता था, हमेशा ही। भगवान उसकी आत्मा को शांति दे। पीए ने मौके की नजाकत को ताड़ते हुए कहा सर सांत्वना देने का कार्यक्रम बना लेते हैं। मंत्री ने पीए को अपनी तरफ खींचते हुए कहा, दीवारों के भी कान होते हैं जरा धीरे बोला करो। ऐसा करो कोई सरकारी काम या बैठक की तैयारी के लिए संबंधित जिले के आला अधिकारियों को फोन कर दो। सब कुछ आनन-फानन में और गुपचुप तरीके से तय हो गया। इस तरह मंत्री का निहायत निजी कार्यक्रम सरकारी दौरे में तब्दील हो चुका था।

लाइलाज होता मर्ज


टिप्पणी.
संभाग का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल पीबीएम किसी न किसी मसले को लेकर वैसे तो हमेशा ही सुर्खियों में रहता है, लेकिन किसी मंत्री और अधिकारी के दौरे के समय यह और अधिक चर्चा में आ जाता है। प्रदेश के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मंत्री शुक्रवार को एक कार्यक्रम के सिलसिले में बीकानेर आए। हो सकता है वे शनिवार को बीकानेर से रवाना होने से पूर्व पीबीएम का निरीक्षण भी कर लें। मंत्री होने के नाते उनको ऐसा करना भी चाहिए। विशेषकर इसीलिए भी क्योंकि पीबीएम को लेकर वे कई तरह की घोषणाएं कर चुके हैं। कुछ घोषणाएं तो ठीक एक साल पहले सरकार आपके द्वार के दौरान की गई थी। उस वक्त पीबीएम को लेकर प्रमुख रूप से तीन बातें कही गई थी। चिकित्सा मंत्री ने कहा था कि पीबीएम में सुपर स्पेशलिटी सुविधाएं शीघ्र चालू होंगी, टर्शरी कैंसर सेंटर शीघ्र बनेगा और सफाई का बजट दुगुना होगा। हर माह सचिव स्तर के दो अधिकारी पीबीएम का दौरा करेंगे। यह दौरा तब तक होगा जब तक व्यवस्थाओं में सुधार नहीं होता।
तीनों ही घोषणाओं की क्रियान्विति कैसी हुई खुद चिकित्सा मंत्री से भी नहीं छिपा होगा। न तो सुपर स्पेशलिटी चालू हुई और न ही टर्शरी कैंसर सेंटर। सचिव स्तर के अधिकारी का दौरा बदस्तूर जारी है लेकिन सुधार अभी भी सपने से कम नहीं है। यह तो हुई घोषणाओं की बात। अब मंत्री के बयानों-निर्देशों की बानगी भी देख लें। एक साल पहले पीबीएम के निरीक्षण के दौरान मंत्री ने कहा था कि पीबीएम बीमार है और सर्जरी की जरूरत है। एक साल बाद भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं। यह बात तो सामान्य से आदमी को भी पता है कि किसी मर्ज का समय रहते इलाज ना किया तो उसे लाइलाज होते देर नहीं लगती। न केवल बीकानेर बल्कि श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, नागौर एवं पड़ोसी राज्य हरियाणा एवं पंजाब से बड़ी संख्या में लोग पीबीएम बड़ी उम्मीद लेकर आते हैं। पीडि़त मानवता की सेवा का जज्बा रखने वाले दानदाताओं ने भी दिल खोल कर पीबीएम में काम करवाए हैं। लेकिन अस्पताल की दशा देखकर यहां आने वालों को यकीनन दुख होता है तो दानदाताओं को अपने किए पर पछतावा। 
पीबीएम में बात सिर्फ चिकित्सकों व नर्सिंग स्टाफ के पद खाली होने तक ही सीमित नहीं है। सर्वाधिक पीड़ादायक यह है कि करीब तेरह करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी सरकार ट्रोमा सेंटर शुरू नहीं कर पाई है। और जिस अंदाज में इसे शुरू करने की कार्ययोजना बनाई जा रही है वह कोढ़ में खाज जैसी है। पीबीएम के आधे-अधूरे स्टाफ में से कुछ स्टाफ ट्रोमा सेंटर में लगाने की तैयारी है। ट्रोमा सेंटर एक अलग इकाई है, इसके लिए पीबीएम का स्टाफ क्यों? इस सवाल का जवाब अभी नहीं खोजा रहा है, लेकिन इससे समस्या बढऩे के बारे में दोराय नहीं है। मौजूदा व्यवस्था में ही लापरवाही सामने आती रहती है। तो फिर आधे अधूरे स्टाफ में ऐसे मामले बढऩे की आशंका ज्यादा है। 
बहरहाल, पीबीएम में जहां हाथ रखो वहीं दर्द है। हृदय रोग विशेषज्ञ ( सर्जन) की सेवाएं लम्बे समय नहीं मिल रही हैं। इसी अस्पताल का चिलिंग प्लांट ढाई साल से ठप है। नि:शुल्क दवा वितरण योजना बेपटरी है। मांग के हिसाब से दवा की आपूर्ति नहीं हो रही है। दवा वितरण काउंटर मंत्री के आदेश के बाद भी नहीं बढ़े। वार्डों में सफाई व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। पेयजल संकट के साथ-साथ दूषित पानी की समस्या का भी कोई समाधान नहीं खोजा गया है। कैंसर मशीन ब्रेकी थैरेपी शुरू नहीं हो पाई। इस तरह के उदाहरण कई हैं। बेहतर हो अब बात निरीक्षणों, फटकारों, निर्देशों से ऊपर उठकर हो, क्योंकि यह सारे नुस्खे पीबीएम के मर्ज को देखते हुए कारगर नहीं रहे।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 13 जून 15 के अंक में प्रकाशित...

आजादी के मायने



बस यूं ही
पति की आजादी क्या पत्नी मायके जाती है तभी शुरू होती है? यह सवाल तो काफी दिनों से दिमाग को मथ रहा था लेकिन कल व्हाट्स एप पर आए एक मैसेज ने मजबूर कर दिया गया कि इस विषय का भी पोस्टमार्टम किया जाए। मैसेज था, 'जिन भाइयों की पत्नी मायके चली गई है, वो कुछ दिनों के लिए छत पर तिरंगा लगा कर अपनी आजादी का ऐलान कर सकते हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इस आजादी के मायने क्या हैं? सीधा सा व सबसे पहले जो मतलब समझ में आया वो तो यही था कि पत्नी जब पास होती है तो आदमी गुलाम होता है। उसकी आजादी छिन जाती है। अब सवाल आजादी पर। भला ऐसे कौन से काम हैं, जो पत्नी की उपस्थिति में न करने योग्य होते हैं और पत्नी के जाते ही उनके सारे अवरोध हट जाते हैं। मतलब करने योग्य हो जाते हैं। अगर अवरोध स्वत: ही हट जाते हैं तो फिर आजादी का ऐलान करने की जरूरत ही कहां पर है। जाहिर सी बात है कि कुछ ऐसे काम जो पत्नी को अंधेरे में रख कर किए जाते हैं या फिर पत्नी के डर से नहीं किए जाते वे सब पत्नी की अनुपस्थिति में पूर्ण कर लिए जाते हैं। बिना डर के। बेखौफ, बेझिझक।
खैर, यही आजादी वाला जुमला अगर महिलाएं भी दोहराने लगे, तो अंदाजा लगाएं उन पतियों की हालात कैसी होगी? सोचने वाली बात है, जब पत्नी की अनुपस्थिति को आजादी की संज्ञा दी जा सकती है तो पति की गैरमौजूदगी को भी तो दी जा सकती है। लेकिन यह बात शायद ही किसी को गवारा होगी।
खैर, कुछ समय पहले तक एक जुमला सुना करते थे 'जिनके पिया घर नहीं, उनको किसी का डर नहीं। भले ही यह महिलाओं के संदर्भ में कहा गया हो लेकिन यह भी शायद इसी आजादी और गुलामी की बात से कहीं न कहीं प्रभावित नजर आता है। वैसे भी शादी को अक्सर दासता का प्रतीक बताया जाता है। शादी होते ही पता नहीं कितने ही तमगे अपने आप जुड़ जाते हैं। शहीद हो गया, फंस हो गया। बेचारा आदि-आदि। जाहिर सी बात है इस कथित दासता मतलब गुलामी की वजह कई जिम्मेदारियोंं को माना जाता है। गृहस्थी की, बच्चों की, परिवार की। और भी कई तरह की सामाजिक जिम्मेदारी। अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या वाकई यह जिम्मेदारियों गुलामी की प्रतीक हैं? जवाब को लेकर मतभेद हो सकते हैं।
एक बात और क्या पति बेचारा इतना दब्बू हो जाता है कि उसको ऐलान भी पत्नी की अनुपस्थिति में करना पड़ता है। क्या सामने बोलने का तो साहस ही नहीं होता। बिलकुल बोलती बंद हो जाती है। शायद ऐसे हालात या उदाहरण सामने आए हैं तभी तो जोरू का गुलाम जैसे विशेषण प्रचलन में आए हैं। अगर यह आजादी एवं गुलामी वाली बात वाकई में सही है, गंभीर है तो फिर मान लेना चाहिए कि महिलाओं का दर्जा एवं महत्व बराबरी का नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा है। महिला सशक्तिकरण की बात भी बेमानी है।

सक्रिय और वरिष्ठ


बस यूं ही 
कल से दो शब्दों को लेकर जेहन मे बड़ी उधेड़बुन चल रही है। वैसे तो दोनों शब्दों के अर्थ सामान्य और जल्द ही समझ में आने वाले हैं लेकिन किसी जमात विशेष के साथ जोड़ कर देखा तो दिमाग की बत्ती जल गई। दोनों शब्दों को सोच-सोचकर कभी गंभीर हुआ तो कभी खुद-ब-खुद मुस्कुरा लिया। बार-बार सोचा। सोच-सोच के सोचा। इतना इसलिए सोचा क्योंकि दोनों शब्दों की कल्पना अपनी ही जमात के साथ कर ली। अरे भई पत्रकारों की जमात। अब रहस्य से पर्दा उठा दूं, वे दोनों शब्द हैं सक्रिय और वरिष्ठ। हमारी जमात में यह दोनों ही पद पता नहीं कब नाम के आगे आ जुड़ते हैं। यह ऐसी पदवी है, जो जमात की, जमात के लिए एवं जमात के द्वारा की अवधारणा पर दी जाती है। अब जमात कह रही है तो जनता भी हां में हां मिलाती है और उसी का अनुसरण भी करती है। क्या मजाल जो इस पदवी में किसी तरह की छेड़छाड़ की जाए। भला, पत्रकारों से पंगा कौन ले। चूंकि यह स्वजातीय व हमपेशा लोगों द्वारा प्रदत्त पदवी है लिहाजा, इसके लिए योग्यता एवं अनुभव कोई मायने नहीं रखते। सक्रिय शब्द से तो मैं हंस-हंस के लोटपोट हूं। पत्रकार वो भी सक्रिय। गोया कोई निष्क्रिय पत्रकारों की भी श्रेणी होती है। अब सवाल उठना लाजिमी है कि भला जो निष्क्रिय है तो वह पत्रकार कैसा? अब मैं इस सवाल का जवाब ना कहकर गुस्ताखी कैसे कर सकता हूं। हर क्रिया की प्रतिक्रिया है। बिलकुल सिक्के के दो पहलुओं की तरह। मसलन, दिन है तो रात है। सुबह है तो शाम है आदि-आदि। इसलिए संभव है यह श्रेणी भी अस्तित्व में हो। मानना या ना मानना अपने-अपने विवेक पर निर्भर करता है। अब जमात के भाईलोगो के साथ दिक्कत यह भी कि उनका ईगो सातवें आसमान पर होता है। ऐसे में कोई किसी को निष्क्रिय कहकर, आ बैल मुझे मार की कहावत को भला क्यों चरितार्थ करे? खैर, यह तो हुई बात सक्रिय शब्द की। अब अपने बगल वाले बुजुर्ग बोस अंकल के बारे में बता दूं। उनके आगे वरिष्ठ जुड़ा हुआ है। लम्बे समय तक ग्रामीण क्षेत्र में पत्रकारिता करने के बाद शहर में आ आ गए। लिखने की आदत अब भी गई नहीं है। कई धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों की निशुल्क सेवा करते हैं। उनके प्रेस नोट बना देते हैं। अंदर के पत्रकार को जिंदा रखना है और वरिष्ठता की पदवी को भी। यह बात दीगर है कि वो आज भी बाकी को बाकि, सूची को सुची ही लिखते हैं। ऐसे शब्दों की फेहरिस्त लम्बी है। लेकिन उनकी वरिष्ठता को दरकिनार कैसे किया जा सकता है। अब यह सब कहकर मेरा किसी पर अंगुली उठाने या आलोचना करने का मकसद कतई नहीं है। वैसे भी सक्रिय और वरिष्ठ शब्द जमात ने ही ईजाद किए हैं, इसलिए जमात का ख्याल तो रखना ही पड़ता है।

सब्र का इम्तिहान कब तक?


टिप्पणी.
तो क्या यह मान लेना चाहिए कि सहनशीलता के अब कोई मायने नहीं रह गए हैं। तो क्या अब मूलभूत सुविधाओं के लिए भी प्रदर्शन ही करना पड़ेगा। रास्ता रोकना पड़ेगा, मटकियां फोडऩी पड़ेंगी। और शासन-प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करनी पड़ेगी। बीकानेर शहर के हालात से तो ऐसा ही लगता है। सप्ताह भर पूर्व आए अंधड़ से हुए नुकसान का खामियाजा शहरवासी अभी भी भोग रहे हैं। लेकिन अंधड़ से आहत लोगों का इंतजार अब आक्रोश में तब्दील होने लगा है। सात दिन से बिजली एवं पेयजल आपूर्ति दोनों ही पटरी से उतरी हुई हैं। 
ग्रामीण इलाकों के हालात तो और भी बुरे हैं। वैसे, इसके लिए तर्क एवं दलीलें भी दी जा रही हैं। मसलन, अंधड़ खतरनाक था। उससे बहुत भारी नुकसान हुआ है। इतने भारी नुकसान से उबरने में समय तो लगता ही है। बिजली ही नहीं है तो पानी कहां से आएगा? आदि, आदि। मान भी लें कि तर्क एवं दलीलें सही हैं लेकिन कब तक? पिछले सात दिन से यही जवाब सुन-सुन कर लोगों के कान पक गए हैं। आखिर कोई तो समय सीमा होगी। 44 डिग्री तापमान की तपती दुपहरी में पानी के लिए मशक्कत करने में कितनी पीड़ा होती है? यह वातानुकूलित कक्षों में बैठने वाले अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि क्या जानें। अफसोसजनक तो यह भी है कि अंधड़ के सात दिन बाद प्रशासनिक अधिकारी एवं स्थानीय जनप्रतिनिधि हालात पर चर्चा कर रहे हैं। वैकल्पिक व्यवस्था के रास्ते बताए जा रहे हैं। सुझाव दिए जा रहे हैं। इससे तो यही जाहिर होता है कि मानो इस तरह के हालात पैदा होने का इंतजार किया जा रहा था। जो चर्चा या चिंता उसी दिन हो जानी चाहिए थी, वह सात दिन बाद क्यों? शासन-प्रशासन से नाउम्मीद लोग मुंहमांगी कीमतों पर जब टैंकर गिरवा रहे थे। अपनी सामथ्र्य के हिसाब से व्यवस्था कर रहे थे। तब अधिकारी व जनप्रतिनिधि कहां थे? कुछ जगह वैकल्पिक व्यवस्था भी की गई, लेकिन ऊंट के मुंह में जीरे के समान भी नहीं थी। कुछ स्थानों पर तात्कालिक आक्रोश शांत कर वैकल्पिक व्यवस्था बंद कर दी गई है जबकि समस्या यथावत रही। वैसे भी नहरबंदी के चलते शहर में पानी की किल्लत थी। यह भी सही है कि अंधड़ के दूसरे दिन ही प्रभारी मंत्री बीकानेर आए। उन्होंने पीबीएम में घायलों से कुशलक्षेम पूछी। हादसे में मारी गई बालिका के परिजनों को सहायता राशि का चैक, जो कि नियमानुसार देय है सौंपा। शाम को अधिकारियों के साथ बैठक की और दिशा-निर्देश की औपचारिकता निभा कर अपने शहर रतनगढ़ के लिए रवाना हो गए।
कितना अच्छा होता अगर वे नुकसान का जायजा लेते। प्रभावित क्षेत्रों में जाकर लोगों से मिलते, बचाव व राहत कार्य किस अंदाज में हो रहे हैं अपनी आंखों से देखते, लेकिन यह हो न सका। शायद उनका रतनगढ़ पहुंचना इससे ज्यादा जरूरी था। माना मौसम पर जोर किसी का नहीं है लेकिन बाद में हालात से निबटना तो बस में हैं। पीडि़तों को समय पर राहत देना भी बस में है। उम्मीद की जानी चाहिए इस प्रकार के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति दोबारा ना हो। समयसीमा में काम हों तो न तो लोग रास्ता रोकेंगे और ना ही कानून हाथ में लेंगे। शासन-प्रशासन भले ही आक्रोशितों को प्राथमिकता दे, लेकिन उनके बारे में भी सोचें जो गांधीवादी बने चुपचाप व्यवस्था सुचारू होने का इंतजार कर रहे हैं। लोकहित तभी है जब सरकार के संवदेनशीलता के नारे की स्थानीय प्रशासन एवं जनप्रतिनिधि भी अक्षरश: पालना करे। जितना जल्दी हो सके राहत कार्यों में तेजी लाने की जरूरत है। अन्यथा गर्मी से परेशान लोगों का व्यवस्था के खिलाफ पारा कब चढ़ जाए कहना मुश्किल है।
राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 26 मई 15 के अंक में प्रकाशित ...

....फेसबुकी की अभिलाषा....


कालजयी कवि माखनलाल जी चतुर्वेदी तो हम सभी को याद ही होंगे। और उनकी पुष्प की अभिलाषा कविता का तो कहना ही क्या। आज अचानक फेसबुक पर कॉपी पेस्ट की हुई सामग्री देखकर मुझे चतुर्वेदी जी की कविता का स्मरण हो आया। और उनकी कविता की तर्ज पर मैंने भी यह छोटी सी कविता लिखने का प्रयास कर ही डाला।
....फेसबुकी की अभिलाषा....
चाह नहीं मैं कुछ लिखकर
कोई नाम कमाऊं,
चाह नहीं मैं घंटों बैठकर
यूं ही मगज खपाऊं।
रचना किसी की चुराकर
अपने वाल पर लगाऊं,
केवल कॉपी और पेस्ट कर
मैं झूठी वाह-वाह पाऊं।
फेसबुक का मोह है ऐसा,
और कहीं ना जाऊं,
कोई कहे कुछ भी मुझको,
चाहे फेक कहाऊं।
मुझे पढ़ लेना हे साथी,
कमेंट एक तू कर देना,
इतना भी समय नहीं तो
लाइक एक तो दे देना।