Tuesday, December 17, 2019

जनहित में व्यवस्था है जरूरी



टिप्पणी
न वरात्र शुरू होने के साथ ही बाजारों में चहल-पहल शुरू हो गई है। दीपोत्सव के उपलक्ष्य में खरीदारी का दौर भी शुरू होकर रफ्ता-रफ्ता रफ्तार पकड़ रहा है। लब्बोलुआब यह है कि हर वर्ग त्योहारों की तैयारी में जुटा हुआ दिखाई दे रहा है। जाहिर सी बात है, एेसे माहौल में सडक़ों पर यातायात भी बढ़ गया है। दीपोत्सव पर इस तरह के हालात कमोबेश हर शहर या कस्बे में दिखाई दे जाते हैं। व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे, लोगों को आवागमन में किसी तरह की दिक्कत नहीं हो, इसके लिए प्रशासन और पुलिस विशेष प्रबंध करते हैं। कहीं यातायात को डायवर्ट किया जाता है तो कहीं उसको वन वे किया जाता है। इन सबके अलावा दुकानदारों को विशेष हिदायत दी जाती है कि वे दुकान का दायरा इतना न बढ़ाएं कि सडक़ संकरी हो जाए। कई शहरों में तो इसके लिए बकायदा एक सफेद लाइन बना दी जाती है कि ताकि सभी उससे बाहर न आएं। जो यह दायरा तोडऩे का प्रयास करता है, उस पर कार्रवाई भी होती है।
श्रीगंगानगर में भी दीपोत्सव के उपलक्ष्य में बाजार सजने शुरू हो गए हैं। दुकानदारों ने अपनी दुकान का दायरा सडक़ों तक बढ़ा लिया है, लिहाजा सडक़ें संकरी होने लगी हैं। कई जगह तो सडक़ पर ही टैंट लगा दिए गए हैं। शहर में किसी भी दिशा से प्रवेश करो, यह अस्थायी अतिक्रमण आपको दिखाई दे जाएंगे। लेकिन यहां अभी व्यवस्था के नाम पर सब कुछ रामभरोसे ही चल रहा है। यातायात व्यवस्था तो बुरी तरह चरमराई हुई है। नगर परिषद हो चाहे यूआइटी तो इस तरह के अतिक्रमण नहीं होने चाहिए। वैसे परिषद व यूआइटी अतिक्रमण हटाने में गंभीरता नहीं बरत रहे। इधर यातायात पुलिस भी कमोबेश इनके नक्शेकदम पर है। उसे व्यवस्था बनाने के नाम पर चालान काटने से ज्यादा कुछ दिखाई नहीं देता। एेसे में फिर यह व्यवस्था ठीक करेगा कौन? अतिक्रमण करके सडक़ों पर कारोबार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा? पुलिस व प्रशासन का काम व्यवस्था बनाना होता है ताकि आमजन को आवागमन में तकलीफ न हो। उनको अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और सडक़ों पर टैंट लगाकर कारोबार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। सुधार एक दूसरे का मुंह ताकने से या हाथ पर हाथ धरने से नहीं होगा। इसके लिए पहल करनी होगी। बाकी जगह हो सकता है तो श्रीगंगानगर में क्यों नहीं?
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में चार अक्टूबर 19 के अंक में प्रकाशित।

प्रभावी नाकेबंदी की दरकार

टिप्पणी
विडम्बना देखिए मंगलवार दोपहर जब जिले के प्रभारी सचिव जिले के पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को बैठक ले रहे थे तथा अपराधियों पर कार्रवाई के निर्देश दे रहे थे, ठीक उसी वक्त पुरानी आबादी के उदाराम चौक स्थित ग्रीन पार्क के पास हुई लूट की वारदात ने शहर की कानून व्यवस्था की चुगली जरूर कर दी। वारदात के बाद हडक़ंप मचना स्वाभाविक था। अधिकारी बैठक छोडक़र वारदात स्थल पहुंचे और लुटेरों की तलाश में कई जगह नाकेबंदी भी करवाई। सीसीटीवी कैमरों की मदद भी ली गई लेकिन पुलिस अभी खाली हाथ है। जिस तरह से इस वारदात को अंजाम दिया गया है, उससे लगता है लुटेरे इलाके के जानकार हैं तथा रास्तों से परिचित हैं, तभी तो वे नाकेबंदी के बावजूद निकल गए। कुछ दिन पहले एक साइकिल सवार से हुई लूट की एक वारदात का खुलासा भी अभी तक नहीं हुआ है। लूट की इन दोनों घटनाओं में महज अंतर इतना रहा कि एक रात को हुई तो दूसरी दिनदहाड़े। इन दोनों घटनाक्रमों से यह भी समझा जा सकता है कि अपराधी जब चाहें, जहां चाहे वारदात को अंजाम देने की हिमाकत करने लगे हैं। कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाने लगे हैं। उनमें भय या खौफ नहीं रहा। सघन नाकेबंदी के बावजूद लुटेरों का निकल जाना नाकेबंदी के तौर तरीकों पर सवालिया निशान जरूर लगाता है।
दरअसल, श्रीगंगानगर जिला अंतराष्ट्रीय व अंतरराज्यीय सीमाओं से सटा होने के कारण वैसे ही संवेदनशील है। अपराधी अक्सर यहां वारदातों को अंजाम देकर पड़ोसी प्रदेश चले जाते हैं। यहां की परिस्थितियों को देखते हुए जैसी सतर्कता, सजगता व संवेदनशीलता बरतनी चाहिए वो वारदात के बाद की ज्यादा दिखाई देती है। देश या प्रदेश में किसी आतंकी अलर्ट पर जरूर सुरक्षा व्यवस्था को चाक चौबंद किया जाता है। पीजी, हॉस्टल व होटल खंगाले जाते हैं। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सार्वजनिक स्थानों पर जांच अभियान चलता है। यही सारी कवायद समय-समय पर नियमित रूप से बिना किसी अलर्ट के होने लगे तो अपराधियों में भय पैदा होगा। संदिग्ध गतिविधियों पर काफी हद तक अंकुश लगेगा। वैसे भी त्योहारी सीजन है। बाजार व सडक़ों पर चहल-पहल ज्यादा है। एेसे में सुरक्षा को चुस्त-दुरुस्त करना बहुत जरूरी है।
बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए पुलिस लूट का खुलासा जल्द करेगी। आरोपी सलाखों के पीछे होंगे। लेकिन इन सब के साथ जरूरी यह भी है कि सुरक्षा व्यवस्था व नाकेबंदी के जो परम्परागत तरीके हैं, उनमें और सुधार कैसे हो सकते हैं। क्योंकि नाकेबंदी के बावजूद अपराधियों का चोर रास्ते तलाश लेना किसी चुनौती से कम नहीं है। पुलिस को नाकेबंदी के साथ-साथ उन चोर रास्तों का भी प्रभावी व स्थायी समाधान खोजना होगा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में तीन अक्टूबर 19 के अंक में प्रकाशित।

भक्ति बनाम देशभक्ति

बस यूं ही
वो जमाना हवा हुआ जब आदमी अपनी भावना अपने तक ही सीमित रखता था। भावना का इजहार नहीं करता था। वो भावना चाहे प्रेम से सबंधित हो या भक्ति से ओतप्रोत हो या फिर देशभक्ति से सराबोर। अब भावनाएं अंदर तक नहीं रहती है और ना ही कोई रखना चाहता। भावनाएं अब बाहर आने को बेताब व बेचैन रहती हैं। क्योंकि जमाना अब भावनाओं को प्रचारित करने व भुनाने का है। जो अपनी भावना का प्रदर्शन जितना ज्यादा करता है, वो उतना ही बड़ा भक्त या देशभक्त कहलाने लगा है, लिहाजा होड़ लगी है। इस भेड़चाल में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। भक्ति व देशभक्ति का जिक्र इसीलिए, क्योंकि इन दिनों दोनों से ही वास्ता पड़ रहा है। दरअसल, जहां मैं रहता हूं, वहां बगल में एक मंदिर है और सामने नगर विकास न्यास का कार्यालय है। इन दोनों ही स्थानों पर आजकल भावनाओं का जबरदस्त प्रदर्शन हो रहा है। दरअसल, नगर विकास न्यास कार्यालय के आगे कर्मचारियों का धरना चल रहा है। कार्यालय के प्रवेश द्वार पर बाकायदा शामियाना लगा है। वहां सुबह से लेकर शाम तक आंदोलनकारी ताशपत्ती खेलते हैं। सुबह कार्यालय खुलने के समय उनकी सभा होती है। अपनी मांगों के समर्थन में वो नारेबाजी करते है, व्यवस्था को कोसते हैं। इसके बाद लाउडस्पीकर पर ऊंची आवाज में देशभक्ति के तराने गूंजते हैं। कभी ' कर चले हम फिदा जानो तन साथियो' तो कभी ' एे मेरे वतन के लोगों' बजता है। यह तमाम घटनाक्रम देखने के बाद मुझे एेसा लगने लगा कि कार्यालय आने वाले लोग शायद आंखों पर पट्टी बांधकर आते हैं या फिर आंखें मूंदकर आते है, इसलिए उनको धरने पर बैठे लोग दिखाई नहीं देते। या फिर इन लोगों को थोड़ा ऊंचा सुनता है, और इनको सुनाने के लिए आंदोलनकारियों ने लाउडस्पीकर लगा रखा है। खैर, अंदर बैठे लोग काम करना चाहते या आंदोलन करने वालों की मांगें ही एेसी हैं यह अलग विषय है लेकिन आंदोलन जारी है। यहां थोड़ी सी राहत वाली बात यह है कि लाइडस्पीकर वाला काम थोड़ी देर के लिए ही होता हे। अनवरत नहीं चलता। हालांकि भावनाओं या पीड़ाओं का इजहार या समाधन आंदोलनकारियों व कार्यालय के बीच ही होना है। लेकिन आंदोलनकारियों को लगता है कि काम शायद लाउडस्पीकर लगाने से जल्दी होगा।
कमोबेश यही हाल मंदिर का है। वहां तो एक किलोमीटर तक सड़क पर स्पीकर लगा दिए गए हैं। सामने सरकारी अस्पताल व आसपास कई निजी नर्सिंग होम है, इसके बावजूद ऊंची आवाज में लाइडस्पीकर बजते हैं। एक ही तरह का जाप होता है। गाने वाले शिफ्ट के हिसाब से बदल जाते हैं लेकिन जाप अनवरत जारी है। वैसे मामला भक्त व भगवान से जुड़ा है। कहा जाता है कि भक्ति एकांत में होती है। भक्त शांत मन से भी याद कर ले भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। फिर भी लाउड स्पीकर बजता है। शायद इसलिए क्योंकि लाइडस्पीकर के बिना भावनाओं का इजहार बेहतर तरीक से नहीं होता। फिलहाल भक्तों व देशभक्तों को मेरा सलाम। लाउड स्पीकर बजने पर दो चार लाइन पांच दिन पहले एफबी पर क्या लगाई, कई भक्तों का तो जैसे पारा ही चढ़ गया। फलां धर्म में यह, फलां धर्म में वो, आप उनको तो कुछ कहते नहीं और हिन्दू धर्म पर चोट करते हो। वाकई लोगों के विचार व उनके प्रकट करने के तरीके से मैं हैरान था। अरे भई मैं जिस चीज से प्रभावित हूं, पहले उसी की ही तो बात करूंगा। मैं जमाने को बदलने की कैसे सोच सकता हूं जब तक खुद ही ना बदलूं। और खुद बदलने के लिए मेरे जैसा भूल से भी कोई पहल करता है तो लोग टूट के पड़ते हैं गोया मौके की तलाश में ही थे। अजब जमाने की गजब तस्वीर इससे अलग क्या होगी भला। खैर, बात भावनाओं के इजहार की थी। किसी ने लाउड स्पीकर लगाकर प्रदर्शित की तो मैंने लिख कर कर दी। वैसे भी देश में इन दिनों बोलबाला भी भक्तों और देशभक्तों का ही है। फिलहाल तो दोनों की तूती जमकर बोल रही है। एेसे में मेरी यह हल्की सी गुस्ताखी माफ हो। अब सब मिलकर मिलकर भक्तों व देशभक्तों के लिए एक जयकारा लगाते हैं। भक्त और भगवान की जय। देशभक्त और देश की जय।

संकट में कपास किसान

प्रसंगवश
न रमा कपास के बजाय श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जिलों में बीटी कपास का रकबा तो बढऩे के बावजूद बीटी कपास की खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित नहीं हो रही। बीटी कपास का रकबा बढऩे का प्रमुख कारण यही था क्योंकि इसमें रोग कम लगते हैं और कीटनाशकों का छिड़काव भी कम करना पड़ता है। नरमा कपास में काश्तकार को आठ से दस बार कीटनाशक का छिड़काव करना पड़ता था। बीटी कपास का बीज भले की महंगा हो लेकिन छिड़काव की मशक्कत से मिली राहत ने काश्तकारों ने बीटी कपास की खेती को अपनाया। भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्ष 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने का भरोसा दे रहे हों लेकिन मौजूदा हालात से लगता नहीं कि किसानों को दिखाया गया यह सपना पूरा हो पाएगा। कृषि आदानों में बीज, खाद और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ डीजल व चुगाई आदि का खर्चा भी बढ़ता जा रहा है।
पिछले साल भारतीय कपास निगम ने मीडियम स्टेपल कपास का समर्थन मूल्य 5150 रुपए तथा लोंग स्टेपल कपास का मूल्य 5450 रुपए प्रति क्विंटल तय किया था। इस बार यह मूल्य दोनों ही श्रेणियों में 105-105 रुपए बढ़ाया गया है। फिर भी यह ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। दूसरी विसंगति यह है कि कई बार बाजार मूल्य अधिक होने पर भारतीय कपास निगम कपास की व्यावसायिक खरीद ही नहीं करता। सफेद सोने के नाम से पहचान रखने वाली कपास का अन्य कृषि जिंसों की तरह से भंडारण नहीं हो सकता। ऐसे में इसे निकालते ही मंडी में लाना मजबूरी होती है। मंडियों में नरमा-कपास की आवक शुरू हो चुकी है, अक्टूबर-नवंबर में यह काम जोर पकड़ेगा। किसान मांग कर रहे हैं कि भारतीय कपास निगम को बाजार दर पर व्यावसायिक खरीद करनी चाहिए। ऐसा करने से बाजार व निगम के बीच भावों की प्रतिस्पर्धा होगी, जिसका फायदा किसानों को होगा। ऐसा संभव हुआ तभी किसानों को अपनी जिंस का लागत मूल्य सही मुनाफे के साथ मिल पाएगा।
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राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पेज पर समस्त राजस्थान में 28 सितंबर के अंक में प्रकाशित मेरा प्रसंगवश...

उच्च शिक्षा की उपेक्षा क्यों

प्रसंगवश
प्रदेश में सरकार बदले भले ही नौ माह हो गए हैं लेकिन उच्च शिक्षा की सरकार ने अभी तक सुध नहीं ली है। समूचे प्रदेश का आलम यह है कि अधिकतर कॉलेज कार्यवाहक प्राचार्यों के सहारे चल रहे हैं। अगर आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो हकीकत चौंकाने वाली है। प्रदेश के 244 सरकारी कॉलेजों में से महज 76 कॉलेजों में ही प्राचार्य हैं, शेष 168 कॉलेज में प्राचार्य ही नहीं हैं। वहां कार्यवाहक प्राचार्यों के सहारे काम चलाया जा रहा है। सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र के जिलों के सरकारी कॉलेजों में ही प्राचार्यों के सभी पद रिक्त हैं। जोधपुर के 12, तो झालावाड़ जिले के आठ सरकारी कॉलेज कार्यवाहक प्राचार्यों के भरोसे ही चल रहे हैं।
इस प्रकार के हालात कहीं न कहीं अध्ययन में बाधक बनते हैं। व्याख्याताओं की ही मानें तो कार्यवाहक या कामचलाऊ व्यवस्था थोड़े समय के लिए तो कारगर हो सकती है, लेकिन पूरे शिक्षा सत्र में इस तरह के हालात किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराए जा सकते हैं। दूसरी बड़ी दिक्कत कार्यवाहक प्राचार्यों के समक्ष आती है। उनके लिए सहकर्मियों से काम करवाना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता है। कॉलेजों में आए दिन होने वाले आयोजनों के लिए जिम्मेदारी तय करना कार्यवाहक प्राचार्यों के लिए टेढ़ी खीर साबित होता है। मौजूदा सरकार ने स्कूलों में अध्यापकों के रिक्त पद भरने में तो काफी हद तक सफलता पाई है, लेकिन उच्च शिक्षा में अभी तक सरकार के असरदार कदम का सभी को बेसब्री से इंतजार है। वैसे पद केवल प्राचार्यों के ही नहीं, व्याख्याताओं के भी खाली हैं। सरकार को जितना जल्दी हो सके, इस तरफ ध्यान देना चाहिए ताकि अध्ययन कार्य प्रभावित न हो। साथ ही उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को किसी प्रकार की तकलीफ न हो। देखना होगा कि इस दिशा में सरकार कितनी जल्दी कोई कदम उठा पाती है।

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राजस्थान पत्रिका के राजस्थान के तमाम संस्करणों में 21 सितंबर को संपादकीय पेज पर प्रकाशित प्रसंगवश..।

ग्रेटा इज ग्रेट -खेलने की उम्र में छेड़ी पर्यावरण बचाने की मुहिम



फेस ऑफ द वीक: ग्रेटा थनबर्ग
‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’। इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग ने। ग्रेटा अभी मात्र सोलह साल की है । यह वह उम्र होती है जब बच्चे के खेलने-कूदने और पढ़ाई-लिखाई के दिन होते हैं। साथ ही अपने बेहतर भविष्य के सपने भी देखता है। इन तीनों के उलट ग्रेटा ने जो काम किया है उसने समूचे विश्व का ध्यान खींचा है। उसने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने की मुहिम की मशाल थाम रखी है। इसीलिए ग्रेटा को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए हाल ही एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 'एम्बेसडर ऑफ कांशंस अवार्ड 2019 से नवाजा है। उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया है। अगर उनको नोबेल पुरस्कार मिलता है तो वे सबसे कम उम्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाली शख्सियत बन जाएंगी। इसके पहले मलाला युसुफजई ने सिर्फ 17 वर्ष की उम्र में नोबेल पुरस्कार जीता था।
ग्रेटा थनबर्ग का जन्म 2003 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुआ। ग्रेटा के पिता अभिनेता और लेखक है जबकि मां आपेरा गायिका हैं। ग्रेटा ने एक बार फ्लोरिडा के स्कूल के बच्चों को हथियारों पर नियंत्रण के लिए मार्च करते देखा था। ग्रेटा को वहीं से प्रेरणा मिली और तभी से उसने पर्यावरण को बचाने की मुहिम शुरू करने का ठान लिया। ग्रेटा ने सिर्फ नौ साल की उम्र में क्लाइमेट एक्टिविजम में हिस्सा लिया था, जब वे तीसरी कक्षा में पढ़ रही थीं।
अपनी पढ़ाई की फिक्रछोड़ पर्यावरण की चिंता करने वाली ग्रेटा विश्व के नेताओं से धरती बचाने की अपील कर रही है। ग्रेटा ने 9 सितंबर 2018 को आम चुनाव होने तक स्कूल न जाने का फैसला किया। इतना ही नहीं जलवायु परिवर्तन के लिए उसने संसद के सामने अकेले ही हड़ताल शुरू कर दी। ग्रेटा ने अपने दोस्तों व सहपाठियों से इस हड़ताल में शामिल होने की अपील की, लेकिन उसे किसी का साथ नहीं मिला। यहां तक कि ग्रेटा के माता-पिता ने भी उसको ऐसा करने से रोकने की कोशिश की, लेकिन साहसी व जज्बे की धनी ग्रेटा रुकी नहीं। उसने ‘स्कूल स्ट्राइक फॉर क्लाइमेट मूवमेंट’ की स्थापना की।
इसके बाद उसने अपने से हाथ बैनर पेंट किया और स्वीडन की सडक़ों पर निकल पड़ी। वह सडक़ों पर घूमने लगी। जब लोगों ने इस बालिका को इस तरह घूमते देखा तो वे पर्यावरण के सचेत हुए। जल्द ही हालात बदलने लगे। जो लोग कल तक ग्रेटा के साथ देने से मना रहे थे वो खुलकर उसके साथ हो लिए। ग्रेटा ही यह मुहिम चूंकि समूची दुनिया के लिए है, लिहाजा अन्य देशों के बच्चे भी उसके समर्थन में आ गए। तभी तो दिसंबर 2018 तक विश्व के 270 शहरों के बीस हजार बच्चों ने ग्रेटा की हड़ताल का समर्थन किया। वर्तमान में करीब एक लाख बच्चे ग्रेटा की इस मुहिम से जुड़े हुए हैं। ग्रेटा पर्यावरण की वजह से हवाई यात्रा नहीं करती है, वो ट्रेन से ही सफर करती हैं। अपने अभियान से ग्रेटा अपने माता-पिता का मानस बदलने में भी सफल हो गई। ग्रेटा की मां ने भी बेटी से प्रेरित होकर विमान में सफर करना छोड़ दिया है। ग्रेटा के माता-पिता ने मांसाहार को भी त्याग दिया है।
पीएम मोदी को भेजा संदेश
ग्रेटा ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी एक वीडियो के जरिए संदेश भेजा था। स्वीडन की इस छात्रा ने जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर कदम उठाने की मांग की थी। पर्यावरण प्रदूषण की भयावहता यूएन की एक रिपोर्ट से साफ होती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया भर के 10 लोगों में से 9 लोग जहरीली हवा लेने को मजबूर हैं। हर साल 70 लाख मौतें वायु प्रदूषण की वजह से होती है। इन 70 लाख लोगों में 40 लाख का आंकड़ा एशिया से आता है। ग्रेटा का मानना है कि जहरीली हवा को पूरी तरह से साफ नहीं किया जा सकता लेकिन उसे सांस लेने लायक तो बनाया ही जा सकता है। ग्रेटा मंचों पर जाकर भाषण देती हैं और लोगों को जागरूक करती हैं। वह सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपनी बात लोगों तक पहुंचाती हैं, इसके लिए उन्होंने ट्विटर को चुना।
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राजस्थान पत्रिका/ पत्रिका के तमाम संस्करणों में 21 सितंबर के अंक में संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख। 

पैसे की बर्बादी!

टिप्पणी
सौन्दर्यीकरण के नाम पर नगर विकास न्यास एक बार फिर शिव चौक से जिला अस्पताल की सडक़ पर प्रयोग कर रहा है। यहां सडक़ के डिवाइडर पर रैलिंग लगाई जा रही है। रैलिंग लगाने का आइडिया किसका है तथा यह क्यों जरूरी समझा गया यह तो न्यास के अधिकारी बेहतर जानते हैं लेकिन सौन्दर्यीकरण के नाम पर सरकारी पैसों की जितनी बर्बादी इस जगह पर हुई है, शहर में शायद ही दूसरी जगह पर हुई हो। यह एक तरह से पैसे का दुरुपयोग ही है। इससे पहले टाइल लगाने के नाम पर इसी मार्ग पर पैसे बर्बाद किए गए थे। टाइल लगाने तथा सडक़ के एक तरफ छोटी सी दीवार बनाकर बड़ा ही हास्यास्पद काम किया गया था। सडक़ के एक तरफ डिवाइडरनुमा दीवार बनाना बड़ा ही बेतुका व अव्यावहारिक काम था। इसकी वजह से न केवल सडक़ संकरी हुई बल्कि वर्तमान में यह डिवाइडरनुमा दीवार अवैध पार्किंग की बड़ी वजह बन चुकी है। शिव चौक से जिला अस्पताल तक बजरी रेते का काम सडक़ पर खुलेआम हो रहा है। रात को सडक़ पर ट्रकों की पार्किंग की लंबी कतार लगती है। रविवार को इसी सडक़ पर दुपहिया वाहनों का बाजार सजता है। सोचिए इस तरह के हालात में यहां से गुजरने वाले वाहन चालकों की मनोस्थिति कैसी होगी।
नगर विकास न्यास को यकीनन शहर में सौन्दर्यीकरण के काम करने चाहिए लेकिन उसका जनता का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ भी तो मिले। रैलिंग लगाने से यह सडक़ चौड़ी नहीं होगी। वैसे भी रैलिंग ठीक तरह से लगेगी भी नहीं, क्योंकि इस डिवाइइर पर बीच-बीच में ट्री गार्ड भी लगाए हुए हैं, जिनमें कइयों में पौधे सूख चुके हैं तो कई जगह मरणासन्न स्थिति में हैं। अभी तक थोड़ी सी दूरी में यह रैलिंग लगाई गई है उसमें ट्री गार्डों की जगह को छोड़ा गया है। डिवाइडर पर पोल भी लगे हैं। रैलिंग की जद में यह भी आएंगे। इन तमाम हालात से लगता नहीं है कि रैलिंग लगने की बाद इस मार्ग का सौन्दर्य बढ़ जाएगा। बेहतर होता नगर विकास न्यास के अधिकारी इस मार्ग की अन्य परेशानियों को देखते, महसूस करते और उनके समाधान का रास्ता खोजते। सरकारी पैसा खर्च करने की सार्थकता भी तभी है जब उसका इस्तेमाल जनहित के लिए किया जाए। काम जनोपयोगी हो। अगर जन ही गायब है या जन की उपेक्षा कर मनमर्जी से फैसला थोपा जाता है तो यह एक तरह से पैसे की बर्बादी ही है। कितना बेहतर होता नगर विकास न्यास अपनी नाक के नीचे बने पार्क को ठीक करने का बीड़ा ही उठा लेता।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 20 सितंबर 19 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी।

स्वतंत्र एजेंसी करे जांच

प्रसंगवश
श्रीगंगानगर जिले में शिक्षा विभाग में प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त पीटीआइ द्वारा किए गए ३८ करोड़ के गबन के मामले में सरकार व विभाग दोनों ही गंभीर नहीं लगते। अब तक हुई जांच से तो यही जाहिर हो रहा है। हां, पुलिस ने कुछ गिरफ्तारियां की हैं तो शिक्षा विभाग ने दो चार बाबूओं को इधर उधर जरूर किया लेकिन गबन के तार कहां-कहां जुड़े हैं? पीटीआइ ने इतना बड़ा दुस्साहस किसके दम पर किया? इस खेल में मुख्य सूत्रधार पीटीआई ही है या कोई और है? जैसे सवाल अभी भी मुंह बाए खड़े हैं। यहां तक कि इस मामले में शिक्षामंत्री जो कहा उस पर भी अभी तक अमल नहीं हुआ। शिक्षा मंत्री ने इस मामले की जांच एसीबी करवाने की बात कही थी लेकिन अभी तक एेसा नहीं हुआ है। उल्टे इस मामले को शुरू से देख रहे पुलिस अधिकारी का ही तबादला कर दिया गया। खैर, शिक्षा मंत्री के अब तक के रुख से तो यही जाहिर हो रहा है कि सरकार उतनी गंभीर दिखाई नहीं देती जितनी होनी चाहिए। जब तक सरकार इस मामले में गंभीर नहीं होगी, तब तक इस गबन की जड़ों को खोजना आसान नहीं होगा। वैसे भी जिस तरीके से यह गबन हुआ है, उस तरफ से सरकार व शिक्षा विभाग ने लंबे समय से आंखें मूंद रखी हैं। शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के बाद उपार्जित अवकाश के भुगतान के मामले में सोलह साल से ऑडिट ही नहीं हुई है। श्रीगंगानगर में तो यह गबन किसी तरह उजागर हो गया लेकिन इससे आशंका जरूर पैदा हो गई है। एेसे में सरकार को न केवल श्रीगंगानगर बल्कि समूचे प्रदेश में शिक्षकों के उपार्जित अवकाश के बदले किए जाने वाले भुगतानों की गंभीरता से पड़ताल करनी चाहिए कि कहीं ऑडिट न होने की आड़ में कोई और गबन तो नहीं हो रहा। इस मामले की गंभीरता को समझना होगा। अब तक की जांच में कोई खास सफलता नहीं मिली है। जिस अंदाज में चल रही है उससे लगता भी नहीं है यह मुकाम तक पहुंचेगी, लिहाजा इसकी सीआईडी सीबी या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से जांच करवाई जानी चाहिए, तभी कुछ सामने आने की उम्मीद बंधेगी।
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राजस्थान पत्रिका के 07 सितंबर.19 के अंक में.संपादकीय पेज पर प्रकाशित...

फिर लगाया ही क्यों था?

टिप्पणी 
सुखाडि़या र्सिर्कल स्थित भारत माता चौक पर लगा सौ फीट ऊं चा तिरंगा फिर ‘गायब’ है। ‘गायब’ शब्द इसलिए कि यह क्यों उतरा? किसने उतारा? किसलिए उतारा? अब तक कितनी बार उतरा? इन सब सवालों के जवाब यूआईटी के पास नहीं है। जाहिर सी बात है कि जब जिम्मेदारी ही तय नहीं है तो रखरखाव कौन व कैसे करेगा। औपचारिकता की हद देखिए यूआईटी में इस ध्वज के लिए नोडल अधिकारी तो नियुक्त है लेकिन किसी तरह का रजिस्टर संधारित नहीं है। बिना रजिस्टर के ध्वज लगाने या उतारने से संबंधित जानकारी भी नहीं है। भले ही यूआईटी ने ध्वज के रखरखाव का जिम्मा किसी फर्म को सौंप दिया हो लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि वो एकदम से ही आंख मूंद ले। ध्वज उतरने या बिजली गुल रहने की बात जब तब अधिकारियों के संज्ञान में लाई जाती है तो उनका एक जवाब होता है ‘पता करवाते हैं। ’ पता नहीं यह ‘पता करवाते हैं।’ का जुमला अधिकारियों को इतना मुफीद क्यों लगता है? क्या वो शहर में नहीं रहते? या वो सुखाडि़या सर्किल से होकर नहीं गुजरते? राष्ट्र के आन, बान व शान के प्रतीक तिरंगे को यूआइटी के उदासीन रवैये ने मजाक बनाकर रख दिया है और इस उदासीनता से यह भी जाहिर होता है कि इसको सस्ती लोकप्रियता व तात्कालिक वाहवाही बटोरने के लिए ही लगाया गया था। जिम्मेदारों को तिरंगे के मान-सम्मान की वाकई चिंता होती तो इसका सरेआम इस तरह मजाक नहीं उड़ता। बिना किसी वजह के इसको मनमर्जी से उतारना एक तरह का अपमान ही है। इस उदासीनता से सबके जेहन में एक सवाल जरूर उठता है कि जब उसकी सार-संभाल ही नहीं हो पा रही है तो इसको लगाया ही क्यों था? क्यों इतने रुपए खर्च किए गए थे? लगाते वक्त यह क्यों नहीं सोचा गया था कि भविष्य में किस तरह की चुनौतियां व खर्चे आ सकते हैं? और उनसे कैसे व किस तरह पार पाना है। खैर, ध्वज लगाने का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया हो, अव्यवहारिक हो, अदूरदर्शी हो लेकिन जब लगा ही दिया तो इसका सम्मान होना चाहिए। मनमर्जी या किसी बहाने से उसको गुपचुप उतारने या लगाने का क्रम भी बंद होना चाहिए। हां कोई वजह हो या तकनीकी कारण हो तो बात अलग है वरना ध्वज नियमित रूप से फहरे तथा रात को रोशनी नियमित रूप से हो इसकी पालना भी सुनिश्चित हो।

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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में छह सितम्बर 19 के अंक में प्रकाशित

एहसास

37वीं लघु कथा
छावनी क्षेत्र के मुख्य दरवाजे पर शहर के प्रतिष्ठित व वरिष्ठ डाक्टर याचक की भूमिका में थे। वो बार-बार अपनी मजबूरी भी बता रहे थे लेकिन सेना पुलिस के जवानों पर कुछ असर नहीं था। जवानों ने साफ कहा, हमारे लिए सब बराबर हैं, आपको लाइन में लगना ही होगा। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार डाक्टर का नंबर आया और वो अंदर बच्चे की स्कूल तक जाने में सफल हो गए। समय बीतता गया। एक दिन डाक्टर चिकित्सालय में अपने कैबिन में बैठे थे। अचानक सेना का जवान आया और बोला, डाक्टर साहब हमारे अधिकारी आए हैं, कृपया थोड़ा जल्दी चैक करवा दो। अचानक डाक्टर को पुराना वाकया याद आया, उन्होंने अपने मातहत को फोन लगाया और कहा जो आदमी लाइन में लगे हैं, उनको लाइन के हिसाब से ही चैक करना है। ध्यान रहे कोई लाइन न तोड़े। दो घंटे बाद सैन्य अधिकारी का नंबर आया। अब डाक्टर साहब के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। वो सोच रहे थे, इंतजार की पीड़ा कैसी होती है, आज इस सैन्य अधिकारी को कुछ तो एहसास हुआ होगा।

अंतर

36वीं लघु कथा
पत्नी की आह सुनकर बगल में लेटे पति की नींद अचानक टूटी। आंखें मलते हुए वह बैठा और पत्नी से आह की वजह पूछी। पत्नी बोली, जोर से पेट दर्द हो रहा है, प्लीज थोड़ा सा मसल दीजिए। पति ने लेटे लेटे ही पेट पर हाथ फेरना शुरू किया। पांच मिनट बीत गए लेकिन पत्नी की तरफ से किसी तरह का जवाब नहीं आया। पति ने थोड़ा इंतजार और किया लेकिन फिर धैर्य जवाब दे गया, कहने लगा, मेरी मां कभी पैर दबवाती थी, तो एक दो मिनट से ज्यादा होने ही नहीं देती थी। कह देती बेटा बस कर अब। और एक तुम हो सात-आठ मिनट से लगा हूं, कोई रिस्पॉन्स ही नहीं? पति की इस झुंझलाहट पर पत्नी मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। इधर पति, मां व पत्नी के इस अंतर के द्वंद्व में उलझा था

सहरा में जैसे बहार आ जाए,

सहरा में जैसे बहार आ जाए,
बैचेन मन को करार आ जाए।
ख्वाबों-ख्यालों में गुम हों किसी के,
और सामने से जैसे यार आ जाए।
तूफां में थाम ले गर हाथ कोई,
हसंते हसंते दरिया पार हो जाए।
बेताबियों का तब आलम न पूछिए,
बेवजह-बेसबब जब प्यार हो जाए।
बेखुदी में पुकारें कभी खुदा को,
बेताब निगाहों को तेरा दीदार हो जाए।
जमाने की रुसवाइयों से डरता है 'माही',
कभी कहीं किसी से इजहार ना हो जाए।

परिंदों के आशियाने!

कितना खौफ होता है शाम के अंधेरे में,
पूछो उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते।
जी हां किसी शायर का यह शेर आज भी कितना मौजूं हैं। वाकई परिंदों के घर नहीं होते। वैसे परिंदों का कोई स्थायी ठिकाना भी नहीं होता। उनके लिए न तो मजहब की कोई दीवार खड़ी होती है और ना ही कोई सरहद आड़े आती है। याद होगा, नब्बे के दशक में एक फिल्म आई थी, रिफ्यूजी। इसमें अभिषेक बच्चन व करीना कपूर मुख्य भूमिका में थे। इसी फिल्म का एक गाना बेहद चर्चित हुआ था। इसके बोल थे, पंछी नदिया पवन के झौंके, कोई सरहद ना इनको रोके.. दरअसल, यह इसलिए कहा था कि परिंदों, नदियों व हवा के झौकों की कोई सरहद नहीं होती और ना ही कोई स्थायी ठिकाना। लगते हाथ इस शेर पर भी गौर फरमाइए, ये हम क्या बना बैठे, कहीं मंदिर तो कहीं मस्जिद बना बैठे, हमसे तो जात अच्छी है परिंदों की, कभी मंदिर पर जा बैठे तो कभी मस्जिद पर जा बैठे। लब्बोलुआब यही है कि परिंदों का कोई स्थायी घर नहीं होता। वो अपनी मर्जी के मालिक हैं। परिंदों का कोई धर्म व जात भी नहीं होती है। तभी तो यह शेर कहा गया है, परिंदों के यहां फिरकापरती क्यूं नहीं होती, कभी मजिस्द पे जा बैठे कभी मंदिर पे जा सब बैठे। खैर, परिंदों के ठिकाने मतलब आशियाने से याद आया कि परिंदों के लिए भी अब स्थायी आशियाने भी बनने लगे। देश में इस तरह के प्रयोग कई जगह हो चुके हैं। अब श्रीगंगानगर में भी इसी तरह का एक आशियाना बना है, जो सोमवार को शुरू हुआ। कल्याण भूमि में बनाए गए परिंदों के इस आशियाने को नाम दिया गया है पक्षी विहार। आधुनिक भाषा में इसे परिंदों का फ्लैट भी कह सकते हैं। विविध रंगों से सजे इस पक्षी विहार में कुल 312 घर हैं। यह 32 फुट ऊंचा है और इसमें 13 मंजिलें हैं। इसमें एक साथ 642 परिंदे रह सकते हैं। यह पक्षी विहार परिंदों को कितना रास आएगा यह तो आने वाला समय बताएगा। फिलहाल यह चर्चा का विषय जरूर बना हुआ है। साथ में एक सवाल भी जेहन में है कि आखिर इस तरह के आशियानों की जरूरत ही क्यों पड़ीं? जगह-जगह कंकरीट के जंगल खड़े हो गए शायद इसलिए। हरियाली और पेड़ गायब होते गए। एेसे में परिंदे कहां जाएं, कहां ठिकाना बनाएं। घरों से चिड़िया की चहचहाट गायब हो चली है। किसी कवि ने कहा भी है,
एक पंछी के दर्द का फसाना था,
टूटे थे पंख और उड़ते हुए जाना था
तूफान तो झेल गया
पर अफसोस वो डाल टूट गई, जिस पर उसका आशियाना था...
बहरहाल, अब चिंतन व मनन इस बात का भी होना चाहिए कि परिंदों की डाल टूटती क्यों हैं? उनका आशियाना उजड़ता क्यों हैं?

Saturday, July 27, 2019

उम्मीद की किरण!


प्रसंगवश
पड़ोसी प्रदेश पंजाब से राजस्थान आने वाले नहरी पानी को लेकर कमोबेश हर साल बवाल मचता है। अक्सर तो पानी की मात्रा में उतार-चढ़ाव ही प्रमुख मुद्दा बनता रहा है लेकिन इस बार जल प्रदूषण का मामला भी चर्चा में है। लोकसभा-विधानसभा में भी इसकी गूंज सुनाई दी है। गुरुवार को राजस्थान व पंजाब के मुख्यमंत्रियों की चंडीगढ़ में बैठक हुई। इसमें न केवल पानी में प्रदूषण को लेकर चिंता जताई गई, समाधान की तरफ कदम बढ़ाने का भरोसा मिला, बल्कि राजस्थान के हिस्से के पानी और इसकी मात्रा बढ़ाने की राह भी खुलती नजर आई। हालांकि जिन मसलों पर बात हुई व सहमति बनी, उनके लिए अभी इंतजार करना होगा। इतना ही नहीं, उन पर क्रियान्वयन भी आसान काम नहीं है।
हरिके हैडवक्र्स से निकलने वाले फिरोजपुर फीडर की लाइनिंग कई जगह से क्षतिग्रस्त है। इससे पानी निर्धारित क्षमता के हिसाब से नहीं मिल पाता। इस फीडर की रिलाइनिंग की डीपीआर तैयार कर केन्द्रीय जल आयोग को भिजवाई जाएगी। सरहिन्द व राजस्थान फीडर का काम भी होना है। इसके लिए 2022 तक की समय सीमा तय हुई। इसके अलावा इंदिरा गांधी फीडर के हैड रेगुलेटर की क्षमता बढ़ाने पर सहमति बनी है। खास बात यह भी थी कि इस बैठक में राजस्थान की तय हिस्सेदारी का मामला भी प्रमुखता से उठा। अतीत में दोनों प्रदेशों में सरकारें तो बदलीं लेकिन जल समझौते के तहत पंजाब से राजस्थान को उसके हिस्से का पानी अभी तक नहीं मिल सका है। बावजूद इसके दोनों मुख्यमंत्रियों की आला अधिकारियों की मौजूदगी में हुई यह बैठक उम्मीद की किरण जगाती है। दोनों प्रदेशों में एक ही दल की सरकार है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों मुख्यमंत्रियों की बीच हुई वार्ता के सार्थक परिणाम सामने आएंगे। यदि ईमानदारी से और निर्धारित समयावधि में काम होंगे तो यकीनन इंदिरा गांधी नहर के अंतिम छोर के जिलों को लाभ होगा। यह लाभ भी दो तरह का होगा। एक तो पानी की कमी भी दूर होगी, दूसरा पानी में प्रदूषण भी कम होगा। मतलब कृषि व स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभदायक।

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राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पेज पर आज 27 जुलाई 19 के अंक में प्रकाशित । 

हे काटली! रौद्र रूप दिखाओ



हे शेखावाटी की गंगा। हे जीवनदायिनी काटली, तुम बरसों बाद आई। तुम्हारा स्वागत है। तुम्हे देखने को आंखें तरस गई थीं। बचपन में तुम्हारे बहाव में मैं खूब खेला हूं। हमारे गांव की सरहद के नजदीक ही तुम्हारा बहाव क्षेत्र है। आठवीं के बाद मेरा स्कूल जाने का रास्ता तुम्हारे बीच से ही होकर गुजरा। अब भी जयपुर जाना हो या जिला मुख्यालय तुम्हारे बीच से ही गुजरना होता है। मुझे ठीक से याद है, आज से सत्ताइस साल पहले 1992 का वह दिन जब ट्रैक्टर पर सवार होकर हम गांव के बच्चे दसवीं की परीक्षा देने इस्लामपुर गए थे। इसके बाद मैंने तुम्हारा पानी कभी इस्लामपुर तक आते नहीं देखा। बड़े बुजुर्गों से सुना है कि काटली नदी का पानी चूरू जिले के सुलखणिया ताल तक जाते-जाते सूख जाता था। मतलब तुम कभी चूरू की सीमा तक जाती थी। बुजुर्ग यह भी बताते थे कि बरसात में जब काटली आती थी, तो उसकी तेज आवाज तीन चार किलोमीटर दूर गांव तक सुनाई देती है। एक दो बार तो नदी का आवेग इतना तेज था कि वह अपने बहाव क्षेत्र को तोड़ते हुई एक मोटे नाले के रूप में हमारे गांव केहरपुरा कलां व सुलताना तक पहुंच गई थी। उस नाले के निशां आज भी देखे जा सकते हैं। आज भी गांव में बालाजी का मंदिर नले अर्थात नाले वाले बालाजी के नाम से चर्चित है। इतना ही नहीं नदी में ककड़ी, मतीरे आदि भी बड़ी संख्या में बहकर आते थे। काटली की विशेषता यह है कि इसके बहाव में आदमी ज्यादा देर तक खड़ा नहीं रह सकता। पानी के बहाव से पैरों के नीचे की मिट्टी निकलती जाती है और पैर नीचे धंसते चले जाते हैं। फिर खड़ा रहना मुश्किल होता और नदी अपने साथ बहा ले जाती। बलुई मिट्टी में पानी के वेग के कारण कटाव ज्यादा होता है। यही कारण कि काटली जब आती तो छोटी नाले के रूप में लेकिन दो तीन दिन बहते-बहते वह अपना दायरा आधा पौन किलोमीटर तक कर लेती थी। नदी से पैदल भी न जाने कितनी बार निकला हूं। मुझे याद है नदी क्षेत्र को पैदल पार करने में ही दस से पंद्रह मिनट तक लग जाते थे। बुजुर्गों से यह भी सुना है कि काटली जब आती थी तो कुओं का जलस्तर आश्चर्यजनक रूप से दस- दस फुट तक बढ़ जाता था। ग्रामीण बताते हैं कि वो तो यह सोचते थे कहीं कुएं की मोटर तो चोरी नहीं हो गई। एक चर्चा और जो ग्रामीणों से सुनी है कि एक कुएं की नाल भी काटली के बहाव में बहकर आई थी। खैर, मैंने कभी इस नाल को देखा नहीं। हां, बीते सताइस साल में मैंने काटली को तिल-तिल मरते जरूर देखा है। झुृंझुनूं के किसी नेता, प्रशासन जागरूक संगठन ने कभी इसकी सुध नहीं ली। बड़ी संख्या में नदी के बहाव क्षेत्र में अवैध खनन होने लगा। ईंट भट्ठे तक बन गए। नदी के दोनों किनारे लगातार दबते गए। मेरे गांव से इस्लामपुर आने वाले रास्ते पर नदी की चौड़ाई बामुश्किल दस-बीस फुट बची होगी, बाकी पूरी दब गई। लोग मजे से बेखौफ होकर खेती कर रहे हैं, मिट्टी निकाल रहे हैं। ईंट भट्ठे बनाकर कारोबार कर रहे हैं। सब के सब चुप हैं। कोई माई का लाल बोलता ही नहीं है। हे काटली, जिले में लगातार बढ़ते जलदोहन के चलते तुम्हारी प्रासंगिकता आज भी है। तुम साल में एक बार भी आओ तो हर साल कुओं को बोरिंग ही नहीं करवाना पड़े लेकिन यह कुल्हाड़ी लोगों ने खुद अपने पैरों पर मारी है। इसके लिए जिम्मेदार भी वहीं हैं। आज समूचा इलाका डार्क जोन में तब्दील हो रहा है तो इसका बड़ा कारण काटली का बंद होना भी है। सीकर जिले की पहाड़ियों से निकलकर झुंझुनूं के उदयपुरवाटी, गुढागौडज़ी, बड़ागांव, चिंचडौली, भडौंदा खुर्द, इस्लामपुर, केहरपुरा कलां, केहरपुरा खुर्द, माखर, खुडाना आदि गांवों व कस्बों की सरहदों से गुजरते हुए तुम चूरू जिले में प्रवेश करती थी। इस बार बारिश तेज हुई तो तुम फिर बह निकली लेकिन तुम्हारा पानी अभी मेरे गांव जाने वाले रास्ते तक नहीं पहुंच पाया है। फिर भी जमाना सूचना व तकनीक का है, लिहाजा आज तुम्हारे न जाने कितने ही वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। युवा तुम्हारे बहते पानी को कैमरे में कैद कर एफबी पर अपलोड करने को आतुर हैं। तुमको बहते प्रत्यक्ष नहीं देख पाने का मलाल तो मुझे भी है लेकिन वीडियोज देखकर अतीत जिंदा हो गया। बहुत सी यादें स्मृतियों में चली आईं। तुम्हारी इस हालत पर मुझे तरस आता है और गुस्सा भी। वैसे कहा गया है कि प्रकृति अपना बदला खुद ले लेती है। हे काटली तुम भी अपना रौद्र रूप दिखाओ, ताकि तुम्हारी छाती को छलनी करने वालों व तुम्हारे पर कब्जा करने वालों की अक्ल ठिकाने आ जाए। अपना हिसाब तुम खुद लो। क्योंकि तुम्हारी हत्या का बदला लेने या तुम्हे इंसाफ दिलाने में यहां का न तो कोई नेता आगे आएगा न ही शासन-प्रशासन का कोई नुमाइंदा। जागरूक संगठन भी केवल बयानों या अपने लाभ-हानि के गणित में ज्यादा उलझे हैं। वो तुम्हारे नाम पर सियासत कर सकते हैं लेकिन तुमको न्याय नहीं दिलवा सकते। इसलिए हे काटली तुम पूर्ण वेग से आओ। तोड़ दो वो सारे अतिक्रमण जो तुम्हारी छाते पर बने हैं। ध्वस्त कर दो वो सारे ईंट भट्ठे तो तुम्हारे कलेजे का चीर-चीर कर मिट्टी निकाल रहे हैं। हे काटली तुम्हारा आना और बदला लेना बेहद जरूरी है। तुम्हारी दुर्दशा करने वाले लोग किसी दया या सहानुभूति के पात्र नहीं है। तुम अपना बदला खुद लो। तुम अपने वास्तविक रूप में आओगी तभी युवा पीढी भी जान पाएगी। वरना काटली की कहानी किताबों या किस्सों में ही कैद होकर रह जाएगी।

अंधा पीसे...!

टिप्पणी
बढ़ते यातायात दबाव को कम करने के लिए हाल ही झुंझुनूं जिला मुख्यालय पर बरसों पुराने प्राइवेट बस स्टैंड को स्थानांतरित किया गया। यह काम काफी समय से लंबित था परन्तु इसे करने की हिम्मत न तो किसी जिला कलक्टर ने दिखाई और न ही जनप्रतिनिधि ने। लेकिन नए जिला कलक्टर ने यह काम कर दिखाया।
जिला कलक्टर के फैसले का कतिपय दुकानदारों और बस ऑपरेटर्स ने विरोध भी किया था लेकिन उन्होंने न केवल विरोध को दरकिनार किया बल्कि जनहित से जुड़े काम को ‘सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे’ की तर्ज पर मुकाम तक पहुंचा दिया। इस फैसले से आज झुंझुनूं शहर की अंदरूनी यातायात व्यवस्था में सुधार हुआ है। झुंझुनूं का उदाहरण इसलिए, क्योंकि इस तरह के कामों और फैसलों की जरूरत श्रीगंगानगर को भी है। लेकिन दुर्भाग्य है कि यहां इतनी हिम्मत न तो जिला प्रशासन दिखा पाता है और न ही जनप्रतिनिधि।
शहर की यातायात और पार्किंग व्यवस्था किसी से छुपी हुई नहीं है लेकिन जिम्मेदारों ने आंखें मूंद रखी है। परेशान तो जनता को होना है और वह हो रही है, होती रहे, अपनी बला से। लोकसेवकों व जनप्रतिनिधियों की सेहत पर इसका क्या फर्क पड़ता है। हाल-फिलहाल तो जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने एेसा कोई काम भी नहीं करके दिखाया, जिससे जनता को किसी तरह की राहत मिली हो। अफसोस की बात तो यह है कि यहां आने वाले लोकसेवक शुरू-शुरू में तो हरकत दिखाते हैं, इसके बाद उनके दर्शन ही दुर्लभ हो जाते हैं। हां इन जिम्मेदारों के कुछ काम इस तरह के होते हैं, जिनका जनहित से कोई सरोकार नहीं होता। बिलकुल ‘अंधा पीसे कुत्ता खाए’ कहावत की तरह। ताजा मामला वेडिंग जोन का है। शहर में पार्किं ग के लिए छोड़ी गई नाममात्र की जगह भी अब वेंडिंग जोन में जाने वाली है। मतलब पार्किं ग के लिए शहर में कोई जगह ही नहीं है। नगर परिषद का इस फैसले को लेकर बड़ा ही हास्यास्पद बयान आया है। परिषद की दलील है कि पार्किंग के लिए जिला कलक्टर से बात की जाएगी। मतलब आग लगने के बाद कुआं खोदा जाएगा। अगर वेंडिंग जोन का निर्णय छह माह पहले का है तो उसी वक्त पार्कि ंग पर भी चर्चा हो जानी चाहिए थी। खैर, एेसा नहीं है कि शहर में पार्किंग के लिए जगह नहीं है। जगह है लेकिन जिला प्रशासन और नगर परिषद के अधिकारियों में चुनौती स्वीकार कर काम करवाने का माद्दा चाहिए। पूर्व के बने प्रस्तावों को टटोला जा सकता है। उन प्रस्तावों को लेकर आई अड़चनों पर चर्चा कर दूर किया जा सकता है। करने को श्रीगंगानगर में बहुत कुछ है लेकिन कोई करे तब ना। आज झुंझुनूं जिला कलक्टर को जनता ने पलकों पर इसलिए बैठाया कि उन्होंने एक बड़ी समस्या का समाधान सूझबूझ से कर दिखाया। पलकों पर बैठाने का काम श्रीगंगानगर की जनता भी कर सकती है लेकिन यहां के अधिकारी पहले वैसी सूझबूझ तो दिखाएं।

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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 24 जुलाई 19 के अंक में प्रकाशित। 

इच्छाशक्ति की जरूरत

जनहित से जुड़ा कोई भी काम हो, वह उम्मीदों पर खरा उतरे तथा मुकाम तक पहुंचे, इसके लिए उसका क्रियान्वयन बेहतर तरीके से होना जरूरी होता है। विडम्बना यह है कि श्रीगंगानगर के कई सरकारी विभागों की कार्यशैली इस तरह की है कि जनहित से जुड़े कामों का क्रियान्वयन होना तो दूर उल्टे वह जनता के गले की फांस बन जाते हैं। शहर को कैटल फ्री करने का काम भी कुछ इसी तरह का है। शहर के किसी भी हिस्से में चले जाओ आपको निराश्रित पशु घूमते-फिरते मिल जाएंगे। इनसे लगातार जान-माल की हानि हो रही है। फिर भी जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। यूं भी कह सकते हैं कि जिम्मेदारों ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ कर इस समस्या को लाइलाज बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। निराश्रित पशुओं की धरपकड़ के प्रयास तो न के बराबर हैं। निराश्रित पशुओं की समस्या दिन प्रतिदिन इतनी विकराल होती जा रही है कि श्रीगंगानगर के दो विधायक विधानसभा में इस मामले को उठा चुके हैं। 
इधर, शहर में निराश्रित पशुओं को पकडऩे का काम लगभग बंद ही पड़ा है। बात निराश्रित पशुओं तक ही सीमित नहीं है। शहर में कई जगह खुलेआम तबेले चल रहे हैं। जगह-जगह हरे चारे की टाल खुली हुई हैं। इन पर कोई रोक टोक या पाबंदी नहीं है।
वैसे किसी भी काम के लिए सबसे पहले जरूरत इच्छा शक्ति की होती है। शहर को कैटल फ्री बनाने की दिशा में इच्छाशक्ति का अभाव सबसे बड़ी वजह है। जिला कलक्टर ने एक बार जरूर पहल करते हुए मिर्जेवाला रोड गोशाला के पशु अन्य गोशालाओं में भिजवाए, लेकिन उसके बाद मामला ठंडा है। वहां करीब पांच-सौ साढ़े पांच गोवंश की क्षमता बताई गई है जबकि वर्तमान में वहां सौ-सवा के करीब ही गोवंश है। फिर भी निराश्रित पशु नहीं पकड़े जा रहे। जितना मोटा बजट इन निराश्रित पशुओं व गोशालाओं के नाम पर खर्च हो रहा है, उसका लाभ शहर को मिलता दिखाई नहीं दे रहा। रोटांवाली में परिषद की 22 बीघा जमीन थी, वहां बड़ी गोशाला बन सकती थी। ज्यादा पशुओं को वहां रखा जा सकता था लेकिन उसकी बजाय मिर्जवाला रोड पर चार बीघा में नंदीशाला खोली गई। इतना ही नहीं सूरतगढ़ विधायक ने भी पिछले दिनों एक सुझाव दिया था कि सूरतगढ़ के बारानी क्षेत्र में काफी जगह है। वहां बड़ी गोशाला खोली जा सकती है। उनका सुझाव भी काबिलेगौर है। क्योंकि सरकारी अनुदान के अलावा चारे व पैसे की मदद यहां के दानदाताओं से हो सकती है। शहर की तमाम टालें एेसे ही दानदाताओं के दम पर ही तो चल रही हैं। पंजाब की तर्ज पर गोशालाओं के रोटी/चारा आदि के वाहन रखे जा सकते हैं लेकिन बात इच्छाशक्ति पर ही आकर ठहरती है।
रहाल, आंख बंद करके और हाथ पर हाथ धरकर बैठने से समस्या का समाधान नहीं होगा। समस्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है, इसका समय रहते समाधान खोजना जरूरी, वरना सडक़ पर सुगमता से चलना किसी सपने की तरह हो सकता है। देखने की बात तो यह है कि जिम्मेदार कब जागते हैं और इच्छाशक्ति दिखाते हैं।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 20 जुलाई के अंक में प्रकाशित ।

कर्ज के जाल में किसान

प्रसंगवश
किसानों का कर्ज माफ करने के वादे के साथ प्रदेश में सत्ता में आई कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में किसानों का कितना भला हो रहा है, इस बात की चुगली गाहे-बगाहे होने वाली किसानों से संबंधित अप्रिय घटनाएं करती रहती हैं। श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के किसानों से संबंधित मामलों से इसको बखूबी समझा जा सकता है। कृषि बाहुल्य जिले श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ को वैसे तो सरसब्ज व धान का कटोरा कहा जाता है लेकिन बीते पांच माह में इन दोनों जिलों में चार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इन चारों किसानों की आत्महत्या के पीछे प्रमुख कारण कर्ज ही बताया गया है। ताजा मामला श्रीगंगानगर जिले के रघुनाथपुरा गांव का है, जहां 4 जुलाई को किसान नेतराम ने कीटनाशक दवा पीकर आत्महत्या कर ली। परिजनों व ग्रामीणों का आरोप है कि नेतराम बैंक कर्ज से परेशान था। बैंक से लगातार कुर्की के फोन आ रहे थे। दो साल से वह मूल रकम का ब्याज तक नहीं चुका पा रहा था। कुछ इसी तरह का मामला श्रीगंगानगर जिले के रायसिंहनगर उपखंड में ठाकरी गांव का है, जहां इस घटना से 12 दिन पहले किसान सोहनलाल ने बैंक कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। उसने आत्महत्या से पहले न केवल खुद का वीडियो बनाया था बल्कि एक पत्र भी लिखा था, जिसमें अपनी मौत का जिम्मेदार प्रदेश के मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री को बताया था। यह मामला प्रदेश व देश की संसद तक गूंजा। इससे पहले हनुमानगढ़ जिले में भी दो किसान फरवरी व मई माह में आत्महत्या कर चुके हैं। पांच माह में चार किसानों के आत्महत्या करने से कर्ज माफी के दावों पर सवाल उठना लाजिमी है। ऐसी घटनाओं के न थमने पर मान लेना चाहिए कि कहीं न कहीं व्यवस्था में दोष जरूर है, चाहे सरकार के स्तर पर हो या बैंक के स्तर पर। केवल कर्ज माफी ही किसानों की समस्या का स्थायी हल नहीं है। जब तक जिंस खरीद की प्रक्रिया सरल नहीं होगी, किसानों को जिंसों का वाजिब दाम नहीं मिलेगा, तब तक वह बचत नहीं कर पाएगा। और जब बचत ही नहीं होगी तो कर्ज चुकाने की बात तो दूर, कर्ज बढ़ता ही जाएगा।
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राजस्थान पत्रिका के 13 जुलाई 19 के अंक में संपादकीय पेज पर प्रकाशित। 

इस बार नया विजेता होगा

बस यूं ही
दूसरे सेमीफाइनल में इंग्लैंड की धमाकेदार जीत के साथ ही बारहवें विश्व के फाइनल में खेलने वाली देानों टीम तय हो गई। न्यूजीलैंड व इंग्लैंड के बीच फाइनल होगा, हालांकि दोनों टीमें फाइनल में पहले भी पहुंच चुकी है। इंग्लैंड टीम का यह चौथा फाइनल होगा जबकि न्यूजीलैंड का यह दूसरा फाइनल होगा लेकिन दोनों ही टीमें अभी विश्व विजेता का खिताब नहीं जीत पाई हैं। एेसा इसलिए हुआ क्योंकि दोनों टीमें फाइनल मुकाबलों में अलग-अलग टीमों से भिड़ी। यह पहला मौका है जब इंग्लैंड व न्यूजीलैंड की टीमें पहली बार आमने-सामने होंगी तथा यह भी पहली बार ही होगा जब इनमें से कोई विजेता होगा। और यह मौका क्रिकेट विश्व कप के इतिहास में 44 साल बाद आएगा। लब्बोलुआब यह है कि आखिरकार बारहवें क्रिकेट विश्व कप में एक और नया विजेता मिलेगा। अब तक केवल पांच टीमें ही फाइनल जीत पाई हैं। न्यूजीलैंड व इंग्लैँड में जीतने वाली टीम छठी टीम होगी। विश्व कप के 11 फाइलन मुकाबलों में आस्टे्रलिया पांच, भारत व वेस्टइंडीज दो-दो बार तथा श्रीलंका व पाकिस्तान एक-एक बार जीत चुके हैं। इसी तरह 11 उपविजेताओं का विवरण देखें तो सर्वाधिक बार उपविजेता इंग्लैंड रहा है। वह फाइनल में तीन बार हारा है। 1992 में पाकिस्तान से हार के बाद इंग्लैंड टीम को सेमीफाइनल पहुंचने के लिए 27 साल इंतजार करना पड़ा है। वह न केवल सेमीफाइनल में पहुंची बल्कि गुरुवार को आस्ट्रेलिया को हराकर फाइनल में पहुंची है। बात उपविजेताओं की हो रही थी तो इसके बाद श्रीलंका व आस्टे्रलिया दो-दो बार उपविजेता रहे हैं। इसके अलावा भारत, वेस्टइंडीज, पाकिस्तान व न्यूजीलैंड भी एक-एक बार उपविजेता रहे हैं।
बात अगर सेमीफाइनल की चार टीमों की करें तो आस्ट्रेलिया सर्वाधिक आठ बार सेमीफाइनल में पहुंची है। आस्ट्रेलिया इस विश्व कप में पहली बार सेमीफाइनल में हारा है। अन्यथा वह जब भी सेमीफाइनल में पहुंचा है तो फाइनल जरूर खेला। इसी तरह भारत ने सात सेमीफाइनल मुकाबले खेले लेकिन वह तीन में ही जीत पाया। चार में हार मिली। 2015 के विश्व कप में भी भारत सेमीफाइनल में हारा था। वेस्टइंडीज चार बार ही सेमीफाइनल पहुंचा है। इनमें वह तीन में जीता। इस तरह श्रीलंका चार में से तीन, पाकिस्तान छह में से दो, इंग्लैंड छह में तीन, तथा न्यूजीलैंड आठ में से एक सेमीफाइनल मुकाबला जीता। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका की टीम भी चार बार सेमीफाइनल खेली है लेकिन कभी फाइनल में नहीं पहुंच पाई।
खैर, फैसले की घड़ी आ चुकी है। एक एक कर सारी टीमें हारकर बाहर होती गई। अब इंग्लैंड व न्यूजीलैंड दो से एक का फैसला होना है। लीग मैच में इंग्लैंड की टीम ने न्यूजीलैंड को हराया, इसलिए इंग्लैंड का पलड़ा भारी माना जा रहा है। इसके अलावा इंग्लैंड को एक फायदा घरेलू दर्शकों का भी मिलेगा। एक संयोग भी जुड़ा है। भारत इस विश्व में सिर्फ दो ही मैच हारा, वो भी फाइनल पहुंची इन दोनों टीमों से। बहरहाल, क्रिकेट अनिश्चितताओं को खेल है। देखते हैं ऊंट किस करवट बैठता है। फिर भी जिस करवट बैठेगा उसके लिए यह पहला ही मौका होगा। तो इंतजार कीजिए फाइनल मुकाबले का।

सपना टूटा

बस यूं ही
सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हार के साथ ही भारत का फाइनल खेलने का सपना टूट गया है। लीग मैचों में चमकदार प्रदर्शन व टॉप क्रम की जबरदस्त के फॉर्म के चलते भारत का दावा मजबूत माना जा रहा था, लेकिन सेमीफाइनल में एेसा नहीं हुआ। भारत का टॉप क्रम ताश के पत्तों के तरह धराशायी हो गया। शुरू के चार खिलाड़ी तो तू चल मैं आया की तर्ज पर आउट होते गए। स्कोर बोर्ड पर जब भारत के 24 रन बने थे तब तक चार धुरंधर पैवेलियन का रास्ता पकड़ चुके थे। वैसे कीवियों ने जब 50 ओवर में 239 रन बनाए तो लगा भारतीय टीम यह लक्ष्य आसानी से पा लेगी, क्योंकि लीग मैचों का इतिहास ही एेसा रहा था। बरसात के कारण एक से दो दिन के हुए इस वनडे के परिणाम को लेकर क्रिकेट प्रेमियों में काफी उत्सुकता थी। एेसा लग रहा था भारत का फाइनल में खेलने का सपना पूरा होने जा रहा है लेकिन एेसा हो न सका। न्यूजीलैंड के गेंदबाजों ने भारतीय खिलाडि़यों का सस्ते में समेटना शुरू किया तो दर्शक एक तरह से सहम गए। रोहित, विराट व राहुल लगातार आउट हुए। पांच रन पर तीन आउट। दिनेश कार्तिक व ऋषभ पंत ने जमने का प्रयास किया लेकिन कार्तिक का एक मुश्किल कैच पकड़ उनको भी पैवेलियन की राह दिखा दी। कार्तिक की जगह आए पांडया ने
जरूर कुछ शॉट्स खेले लेकिन वो कई बार आउट होते होते भी बचे। पंत व पांडया के बीच जब साझेदारी 47रन की हुई तो पंत आउट हो गए। इसके बाद धोनी व पांडया के बीच 21 की पार्टनरशिप हुए लेकिन 92 रन पर पांडया भी आउट हो गए। इस तरह 30.3 ओवर में छह विकेट पर स्कोर 92 रन था तो भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के मन के किसी कोने में हार की आशंका प्रबल होने लगी थी। धोनी को कार्तिक व पांडया के बाद उतारने की हालांकि आलोचना भी हुई। क्योंकि दिनेश कार्तिक 25 गेंदों पर 6 बनाकर आउट हुए। इसी तरह लोकेश राहुत ने सात गंेदों पर एक, रोहित ने चार गेंदों पर एक तथा विराट ने छह गंेदों पर एक रन बनाया। इस तरह से शुरू के चार बल्लेबाजों ने नौ रन बनाने के लिए 42 गेंद मतलब सात ओवर खेले। इतना ही नहीं पांडया व पंत जैसे स्ट्रॉक प्लेयर भी शुरूआती विकेट गिरने से इतने दबाव में आए कि वो भी काफी धीमा खेले। पंत ने 32 रन बनाने के लिए 56 गेंद खेली जबकि पांडया ने इतने ही रनों के लिए 62 गेंदों का सामना किया। इस तरह से इन दोनों बल्लेबाजों ने 64 रन बनाने के लिए 118 गेंद मतलब 19.4 ओवर खेल लिए। यानी की चार की औसत से भी रन नहीं बनाए। पुछल्लों से वैसे भी बल्लेबाजी की उम्मीद नहीं की जा सकती। लिहाजा, भुवनेश्वर एक गेंद पर शून्य, चहल पांच पर पांच तथा बुमराह बिना कोई रन बनाए जीरो पर नाबाद रहे। इस तरह से भारत के सात बल्लेबाजों ने 14 रन ही बनाए।
मैच का दूसरा पक्ष धोनी व जड़ेजा से जुुड़ा है। यह दोनों भारतीय टीम को जीत तो नहीं दिला पाए लेकिन इन दोनों बल्लेबाजों ने मैच में न केवल रोमांच पैदा किया बल्कि एक बार जीत की उम्मीद भी जगा दी। जडेजा ने मैच के तीनों फोरमेट गेंदबाजी, क्षेत्ररक्षण व बल्लेबाजी में सबसे शानदार प्रदर्शन कर न केवल चयनकर्ताओं को सोचने पर मजबूर किया बल्कि आलोचकों का मुंह भी बंद कर दिया। इन दोनों बल्लेबाजों ने 17.2 आेवर में 116 रन की साझेदारी कर भारत को एक बार जीत की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया था लेकिन बदकिस्मत रहे कि टीम को जीत नहीं दिला सके। एक ऊंचा शॉट खेलने के चक्कर में जड़ेजा 48वें ओवर में शॉर्ट लॉन्ग ऑन पर लपके गए। जड़ेजा ने 59 गेंदों पर 77 रन की धमाकेदार पारी खेली। इस पारी में उनके चार छक्के भी शामिल रहे। जड़ेजा के बाद सारी जिम्मेदारी पूर्व भारतीय कप्तान धोनी के कंधों पर थी। उन्होंने 49वें ओवर की पहली गेंद पर जिस अंदाज में छक्का मारा उसने विरोधी खेमें हलचल मचा दी। इसी ओवर की तीसरी गेंद पर दूसरा रन लेने के प्रयास में गुप्टिल के सीधे थ्रो पर धोनी रन आउट हो गए। इसी के साथ भारत की हार तय हो गई । आखिरकर 49.3 ओवर में 221 रन भारतीय टीम ऑलआउट हो गई। इस तरह सात खिलाडि़योंने जहां 14 रन बनाए वहीं पांचवें से लेकर आठवें क्रम पर उतरे चार बल्लेबाजों ने 191 रन बनाए। पांचवां बड़ा स्कोर अतिरिक्त रनों का रहा। भारतीय में 16 रन अतिरिक्त बने।
बहरहाल, खेल में हार जीत चलती रहती है लेकिन कम स्कोर के मुकाबले में शुरुआती झटके खाने के बाद इस तरह करीब आकर काफी सालता है। यह हार भारतीय टीम व क्रिकेट प्रेमियों को कई दिनों तक तकलीफ देगी। भारत के पास विश्व कप जीत की हैट्रिक बनाने की मौका था, जो छूट गया। क्रिकेट वैसे भी किस्मत का खेल है। और किस्मत कीवियों के साथ थी। भारत की हार पर कई तरह के जुमले बनेंगे, बन भी गए। हार की समीक्षा भी होगी। कई तरह की बातें होंगी, एेसा होता तो यह हो जाता। वैसा होता तो वो हो जाता। खैर, होता कुछ नहीं क्योंकि क्रिकेट होता का नहीं, है का खेल है।

‘घर’ की सुध भी जरूरी

नहरों में दूषित पानी अकेले पंजाब से ही नहीं आता, यह राजस्थान.आकर.भी गंदा.होता है।.इसी विषय पर संवाददाओं की ग्राउंड रिपोर्ट और साथ में मेरी टिप्पणी भी।
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यह सही है कि नदियों का पानी जितना पंजाब में प्रदूषित होता है, उसके मुकाबले राजस्थान में नहरों का पानी प्रदूषित नहीं होता, लेकिन इस खुशफहमी में हम हकीकत को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। पंजाब से राजस्थान आने वाली नहरों का दूषित पानी राजस्थान आकर भी दूषित होता है। दूषित जल स्वास्थ्य व जनजीवन के लिए हानिकारक है। तभी तो शुद्ध जल हर आदमी का सपना है। नदियों में दूषित पानी न मिले, इसके लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। उससे भी बात न बनें तो जनांदोलन भी जरूरी है। कुछ जागरूक संगठन इस दिशा में जुटे हुए भी हैं, लेकिन इस काम के साथ-साथ ‘घर’ की सुध लेना भी जरूरी है।
यह सर्वविदित सत्य है कि आसानी से या नि:शुल्क मिलने वाली चीज को हमेशा हल्के में लिया जाता है। नहरी पानी की भी यही कहानी है। पानी की कीमत व मोल को वो लोग ज्यादा बेहतर समझते हैं, जहां पेयजल की किल्लत है। श्रीगंगानगर जिले में तो नहरों का जाल बिछा है। यह पानी की कोई कमी नहीं है, लिहाजा पानी की बेकद्री भी खूब होती है। हम नहरों को प्रदूषित करने से नहीं चूकते। एक तरह से नहरों को कचरा पात्र बना दिया है। पता नहीं क्या-क्या फेंक देते हैं। नहरों के प्रति यह बर्ताव, पानी की यह बेकद्री खतरनाक व जानलेवा भी हो सकती है। यह एक तरह से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही है। सोचिए पानी के साथ क्या हम तब भी वैसा ही बर्ताव करेंगे, जब यह मुश्किल से मिले और पैसे खर्च करने के बाद हासिल हो। इसलिए कुदरत के इस तोहफे को सहेज कर रखना चाहिए। जल है तो ही जीवन है। जीवन की कल्पना पानी के बिना संभव नहीं है। पानी को साफ व शुद्ध रखना सिर्फ सरकारों का काम नहीं है। हम सब की जिम्मेदारी भी बनती हैं कि हम पानी को गंदा न तो करें और न होने दें। पडोसी प्रदेश से दूषित पानी के लिए लड़ाई अपनी जगह है। यह लड़ाई लंबी भी चल सकती है लेकिन ‘घर ’ वाला काम तो आसान है। उसके लिए तो किसी लड़ाई की जरूरत भी नहीं है। बस जरूरत है तो खुद से पहल करने की। ना खुद कुछ गलत करें और कोई गलत करे तो उसको बेझिझक टोकें भी। यह मुहिम गांव-गांव तक चलनी चाहिए। ऐसी जनजागृति व मुहिमें ही समय की जरूरत हैं, क्योंकि तभी नहरें साफ रह पाएंगी, अन्यथा देखा देखी का यह खेल यूं ही चलता रहेगा और नहरें गंदी व दूषित होती रहेंगी। अभी भी देर नहीं हुई है। जागो तभी सवेरा है। आज से हमारा संकल्प जल को संरक्षित व सुरक्षित रखने का होना चाहिए। एक सोच यह भी है कि सरकार हो तो फिर हमको कोई परवाह नहीं है। चिंता करे तो सरकार करे हमें क्या ? लेकिन यह पानी हम ही पीते हैं। यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। पंजाब में नदियों में दूषित पानी मिलने से रुकवाने से पहले श्रीगंगानगर की नहरों को साफ सुथरा रखना भी जरूरी है।
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राजस्थान.पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 8 जुलाई 19 के अंक में प्रकाशित । 

नहरों में दूषित पानी

-प्रसंगवश
पंजाब से राजस्थान आने वाली नहरों में दूषित पानी आने का सिलसिला पुराना है। पंजाब के प्रमुख शहरों का बायोवेस्ट, सीवरेज का पानी तथा कारखानों का अपशिष्ट नदियों में मिलता है और इन्हीं नदियों का पानी नहरों के माध्यम से राजस्थान आता है। इस पानी का उपयोग श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ सहित प्रदेश के दस जिलों के लोग करते हैं। इस दूषित पानी को लेकर समय-समय पर विरोध के स्वर मुखरित होते रहे हैं लेकिन जिम्मेदारों पर इसका कभी कोई असर नहीं पड़ा और दूषित पानी नहरों में बदस्तूर आता रहा। एक बार फिर श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले में इस दूषित पानी के खिलाफ लोग लामबंद होने लगे हैं। जागरूक लोग और संगठन, केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तक अपनी गुहार लगा चुके हैं। बैठकों का दौर जारी है। बड़े आंदोलनों की रूपरेखा तय हो रही है। मतलब साफ है स्वास्थ्य से जुड़े इस मसले पर लोग समझौता करने के पक्ष में नहीं हैं। आंदोलन की इसी कड़ी में श्रीगंगानगर के पंजाब के पटियाला गए प्रतिनिधिमंडल के सामने पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नुमाइंदे स्वीकार कर चुके हैं कि राजस्थान जा रहा पानी पीने योग्य नहीं है। पन्द्रह मिनट तक इस पानी से नहाने पर एलर्जी हो जाती है, तो पीने से होने वाले नुकसान का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। इधर, राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का बीकानेर क्षेत्रीय कार्यालय इसी नहरी पानी के नमूने लेने के बावजूद कभी यह बताने की स्थिति में नहीं होता है कि पानी में प्रदूषण की मात्रा कितनी है। नमूने जयपुर और वहां से कोटा स्थित प्रयोगशाला में भी भिजवाए जाते हैं, पर शायद ही कभी नमूनों को सार्वजनकि किया गया हो। बल्कि हमेशा यही बताया जाता रहा है कि पानी सही है। खैर, पंजाब में नदियों में मिलते गंदे नालों के चलते फैल रहे प्रदूषण ने जो जन विरोध खड़ा किया है, वह किसी बड़े संकट की आहट है।
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6 जुलाई 19 को राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पेज पर प्रकाशित। 

कब तक लगेंगे कट



इन दिनों सोशल मीडिया पर बिजली को लेकर एक जुमला जबरदस्त तरीके से वायरल हो रहा है। मजमून कुछ इस तरह से है। कर्मचारी कहता है, सर बाहर नीम के पत्ते हिल रहे हैं। इस पर अधिकारी कहता है लाइट काट, आंधी आ गई। खैर, श्रीगंगानगर में न नीम के पत्ते हिल रहे हैं और न ही आंधी आ रही है। लेकिन बिजली फिर भी कट रही है। बिजली कटने का कोई समय निर्धारित नहीं है। यह रात को भी गुल हो जाती है और और दिन में भी। ये कट उस घोषित कटौती से अलग हैं जो विद्युत निगम शहर के किसी न किसी कोने में रखरखाव के नाम पर रोज करता है। रखरखाव कितना हुआ, कैसा हुआ यह अलग विषय है लेकिन आंधी आने पर बिजली गुल होना तो तय है। भले ही एहतियातन कटे या आंधी से नुकसान की आशंका के चलते लेकिन बिजली जाती जरूर है। खैर, बीते चौबीस घंटे में श्रीगंगानगर में आंधी, तूफान या बारिश जैसा कुछ नहीं लेकिन बिजली के असंख्य कट बदस्तूर लग रहे हैं।
निगम की ओर से बताया जा रहा है कि मौसम अनुकूल न होने के कारण बिजली की खपत लगातार हो रही है। इसी कारण लाइन ट्रिप हो रही है। जंपर उड़ रहे हैं। अब यह बिजली की खपत कैसे बढ़ती है? क्यों बढ़ती है? यह निगम के अधिकारी बखूबी जानते हैं। यकीनन वो इसका संतोषजनक जवाब भी बता देंगे लेकिन शायद यह नहीं बता पाएंगे कि खपत बढऩे में ईमानदार उपभोक्ताओं का योगदान या दोष क्या है? और अगर कोई दोष या योगदान नहीं है तो यह सिलसिला कब तक चलेगा और ईमानदार उपभोक्ता अपनी ईमानदारी की कीमत कब तक चुकाएगा। विद्युत निगम रखररखाव के नाम पर विद्युत चोरी क्यों नहीं पकड़ता? निर्धारित लोड से ज्यादा बिजली खर्च करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं करता? निगम यह सब करने लग जाए तो ईमानदार उपभोक्ताओं को अपनी ईमानदारी की कीमत नहीं चुकानी पडेग़ी। ईमानदार उपभोक्ता उसकी सजा भोगे ही क्यों जो गलती उसने की ही नहीं। विद्युत निगम से कुछ छिपा नहीं है। एेसा संभव ही नहीं है कि ज्यादा लोड या बिजली चोरी का निगम को पता नहीं हो।
बहरहाल, प्रतिकूल मौसम या तकनीकी कारणों से बिजली गुल होना आम है लेकिन कट लगना व बार-बार लगना तथा गर्मी के मौसम में लगना कहीं न कहीं निगम की कार्यकुशलता को कठघरे में खड़ा करता है। उम्मीद की जानी चाहिए निगम के अधिकारी व कर्मचारी लाइन के रखरखाव के नाम पर पेड़ों की छंगाई या तार कसने तक ही सीमित नहीं रहेंगे बल्कि विद्युत चोरी करने वालों को भी चिन्हित करेंगे। विद्युत चोरी सिर्फ कुंडी डालना ही नहीं है। निर्धारित लोड से ज्यादा बिजली उपभोग करना भी तो एक तरह की चोरी ही है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 30 जून 19 के अंक में  प्रकाशित 

घर में नहीं दाने...!

श्रीगंगानगर नगर परिषद हो या नगर विकास न्यास। दोनों ही निकायों में बैठे जिम्मेदारों को पता नहीं यह बात समझ नहीं आती या फिर वो जानबूझकर ऐसा करते हैं। क्या उनको पता नहीं कि शहर के लिए कौनसा काम जरूरी है तथा किस काम को प्राथमिकता से करवाया जाना चाहिए। अलबत्ता, इन दोनों ही निकायों की भूमिका भूखे आदमी को पेट भरने के लिए रोटी देने के बजाय मिठाई के सपने दिखाने जैसी रही है। श्रीगंगानगर शहर की हालत कमोबेश उस भूखे आदमी जैसी ही है। शहर के लिए जो काम सबसे पहले होना चाहिए, वह होता नहीं है और जो जरूरी नहीं है, उसके लिए प्रस्ताव बनते हैं।
अब नगर परिषद ने श्रीगंगानगर में गुजरात के सूरत शहर की तर्ज पर पार्कों में ओपन जिम लगवाने के लिए डेढ़ करोड़ रुपए खर्च करने का निर्णय किया है। इसी तरह पार्कों में पक्षी विहार बनाने पर 1.40 करोड़ रुपए का बजट है। इधर, पदमपुर रोड स्थित कल्याण भूमि व पुरानी आबादी स्थित कब्रिस्तान में सौन्दर्यीकरण के नाम पर भी पचास लाख रुपए खर्च किए जाने हैं। यह ठीक है, समय के साथ चलना चाहिए। सुविधाओं में विस्तार हो, लेकिन मूलभूत सुविधाओं में सुधार के बिना यह काम किस तरह उचित ठहराए जा सकते हैं। क्या श्रीगंगानगर के अधिकतर पार्क हरे-भरे हैं? क्या वहां लगे पेड़-पौधे सुरक्षित हैं? क्या पार्कों की देखरेख, रखरखाव व सुरक्षा की कोई स्थायी व्यवस्था है? हकीकत तो यह है कि चाहे नगर विकास न्यास के पार्क हो या फिर नगर परिषद के, अधिकतर पार्क बदहाल हैं। सुबह-शाम चैन व सुकून तलाशने के लिए इन पार्कों में आने वालों को निराशा ही हाथ लगती है। क्या ओपन जिम से ज्यादा जरूरी वहां हरियाली नहीं है? क्या पक्षी विहार से ज्यादा वहां सुविधाएं व उनके रखरखाव की व्यवस्था आवश्यक नहीं है?
खैर, क्या जरूरी है और क्या जरूरी नहीं है, यह जिम्मेदारों को अच्छी तरह से पता है। फिर भी इस तरह के बेवजह पैसे खर्च करने के प्रस्ताव तैयार किए जाते हैं। शिव चौक से जिला अस्पताल तक सडक़ किनारे टाइल्स लगाने का काम इसकी जीती-जागती नजीर है। टाइल्स लगाने के बाद इस रास्ते का स्वरूप कैसा रहा तथा यह आम आदमी के लिए कितना मुफीद रहा, किसी से छिपा नहीं है। कोई बड़ी बात नहीं कि टाइल्स लगाने जैसी ही कहानी ओपन जिम, पक्षी विहार तथा कब्रिस्तान व कल्याण भूमि के सौन्दयीज़्करण की हो। बात नवाचार की नहीं बल्कि नवाचार से आम आदमी को होने वाले फायदे की होनी चाहिए। विडम्बना देखिए बदहाल पार्कों की दशा सुधारने के लिए भले ही बजट न हो लेकिन सूरत शहर की तर्ज पर ओपन जिम व पक्षी विहार के लिए पैसा है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पार्कों को बदहाल करने में नगर परिषद की भूमिका ही सबसे ज्यादा रही है। बरसात के समय गलियों में भरने वाले पानी को जब पम्पों व मोटरों के माध्यम से पार्कों में डाला जाता है, तब जिम्मेदारों को इन पार्कों पर तरस नहीं आता। ड्रेनेज व सीवरेज मिश्रित पानी की दुर्गन्ध पार्कों को दूषित करती है, तब जिम्मेदारों को यह सब दिखाई नहीं देता। कितना बेहतर होता शहर की पानी निकासी के लिए कोई ठोस, कारगर व दूरदर्शी प्रस्ताव तैयार होता। पर ऐसा करने के लिए इच्छा शक्ति चाहिए और यह कोई मुश्किल काम भी नहीं।
ईमानदारी से इस दिशा में काम किया जाए तो समाधान संभव है लेकिन जिनको हर साल पानी निकासी के नाम पर बजट खर्च करने की आदत पड़ी हो वो भला इसका स्थायी समाधान खोजकर इस खर्च पर पूर्ण विराम कैसे लगवा सकते हैं?
बहरहाल, शहर के हालात अच्छे नहीं हैं। बात पार्कों की नहीं है। सडक़ हो, नाली हो, सफाई हो या निराश्रित पशु हो। बदंरग चौक-चौराहे हो या फिर बेपटरी सफाई व्यवस्था। इनके सुधार के लिए भी तो कोई प्रस्ताव बने। माना बरसाती पानी की शहर से निकासी नगर परिषद के जिम्मेदारों के लिए बड़ा काम है लेकिन छिटपुट समस्याओं का समाधान न खोज पाना भी उनकी कार्यकुशलता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। इतना ही नहीं, जैसा कि कुछ पार्षदों ने कहा है कि परिषद का खजाना खाली है। अगर यह बात सच है तो फिर इस तरह के प्रस्ताव बनाना भी तो 'घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने' जैसा ही है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 26 जून 19 के अंक में प्रकाशित ।

विकास के लिए बदलाव जरूरी

पिछले चार दिन से झुंझुनूं के प्राइवेट बस स्टैंड (ताल) से चलने वाली बसों का आवागमन बंद है। बसें बंद होने की प्रमुख वजह प्राइवेट बस स्टैंड को ताल से खेमी शक्ति मंदिर के पास शिफ्ट करने का निर्णय है। पिछले सात साल से ज्यादा समय से खेमीशक्ति के पास बस स्टैंड बनकर तैयार है लेकिन राजनीतिक इच्छा शक्ति और वोट बैंक के नफे नुकसान के चक्कर में यह मामला सिरे नहीं चढ़ा। दिन प्रतिदिन बढ़ते यातायात व शहर के अंदरूनी इलाकों में लगने वाले जाम से पार पाने के लिए करीब दशक भर पहले एक प्रयोग किया गया था। प्रयोग काफी कारगर रहा था। दरअसल गांधी चौक से मल्टीपर्पज स्कूल जो अब शहीद जेपी जानू के नाम से जानी जाती है तक सुबह-शाम दो घंटे वन वे किया गया था। इसका भी एक बार दबे स्वर में विरोध हुआ था लेकिन जब लोगों के समझ में आया कि यह फैसला उनकी सहुलियत है लिए तो फिर यह सबकी आदत में आ गया। सुबह-शाम दो-दो घंटे के वन वे से आवागमन काफी सुगम हो चला है। चूंकि वाहनों की संख्या दिनोदिन बढ़ रही है, इस कारण पंचदेव से लेकर ताल तक दिन भर जाम बना रहता है। इसी जाम को खत्म करने व आवागमन सुचारू करने के मकसद से झुंझुनूं जिला कलक्टर ने बस स्टैंड खेमी शक्ति के पास शिफ्ट करने के लिए हरी झंडी दे दी। तब से ही इसका विरोध होना शुरू हो गया। ताल के रेहड़ी वाले व दुकानदार ग्राहकी पिटने का हवाला देकर आंदोलन कर रहे हैं लेकिन बस ऑपरेटर्स का आंदोलन में शामिल होकर बसों का संचालन रोकना समझ से बाहर है। बस स्टैंड शिफ्ट करने के फैसले से पता नहीं उनको क्या भय सता रहा है। वैसे भी बस स्टैंड शिफ्ट होने से उनको प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से किसी प्रकार का नुकसान नहीं है। और भविष्य में नुकसान होगा ऐसा भी नहीं लगता, क्योंकि ग्रामीण बसें उस रुट पर चलती हैं, जहां रोडवेज बसें न के बराबर हैं। एेसे में जिसको गांव से शहर आना जाना है पहले की तरह इन्हीं बसों में आएगा जाएगा।इसलिए बस आपरेटर्स की मांग बेतूकी है। अपने गांव से झुंझुनूं आने वाला ताल उतरे या खेमी शक्ति उससे बस आपरेटर्स को कोई फायदा या नुकसान नहीं है। जब ऐसा है तो फिर बस ऑपरेटर्स खुद का हित देखने के बजाय दूसरों के दुख में क्यों दुबले हुए जा रहे हैं। वो खुद का नुकसान करके तथा जनता को परेशान करके जबरन हितैषी क्यों बन रहे हैं। रेहड़ी वालों को एक स्थायी जगह आवंटित की जा सकती है। रहा मामला दुकानदारों का तो उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि ताल में बस से उतर कर लोग गांधी चौक, नेहरू बाजार, और आगे जेपी जानू स्कूल तक आबाद दुकानों पर भी तो बिना बस के ही जाते हैं। वह वहां जाया सकता है तो ताल में भी आया जा सकता है।.ताल.तो खेमी शक्ति बस स्टेंड के सबसे करीब भी रहेगा। 
खैर, बस स्टैंड के विरोध के साथ अब समर्थन में भी लोग सामने आने लगे हैं। यह होना भी चाहिए। यह फैसला शहर हित में है। यह बढ़ते शहर के यातायात दबाव को कम करने के लिए जरूरी है। अगर आज किसी अच्छे फैसले का समर्थन नहीं किया गया तो एक गलत परंपरा शुरू होने का खतरा हमेशा बना रहेगा। फिर तो कोई भी भीड़ एकत्रित कर दवाब बनाकर अपनी बातें मनवाता रहेगा। आज सारे के सारे जनप्रतिनिधि भी वोटों की राजनीति के चक्कर में चुप्पी साधे बैठे हैं। मतलब सही को सही कहने का साहस उनमें भी नहीं रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि, विकास के लिए बदलाव जरूरी है। यह बात आंदोलन करने वालों को समझनी चाहिए। उनको तात्कालिक नुकसान के बजाय दूरगामी फायदे को देखना चाहिए। धन्यवाद के काबिल हैं वो लोग जो इस बस स्टैंड को शिफ्ट करने के समर्थन में रैली निकाल रहे हैं।
बहरहाल, बस की हड़ताल से आम लोगों को रही है तकलीफ को भी जिला कलक्टर ने शिद्दत से महसूस किया है। उन्होंने रोडवेज प्रबंधन से बात करके ग्रामीण रुटों पर रोडवेज बसें संचालित करने को कहा है। यह सही भी है। आजकल हड़ताल किसी की होती है लेकिन कंधा किसी दूसरे का इस्तेमाल करके अपना उल्लू सीधा करने की परिपाटी सी चल पड़ी है। ग्रामीण रुटों पर रोडवेज बसों के संचालन से यह परिपाटी भी टूटेगी। जिला कलक्टर का निर्णय शहर हित में है। इस फैसले से प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से लाभान्वित होने वालों की संख्या विरोध करने वालों से कहीं ज्यादा है, बहुत ज्यादा है, लिहाजा बहुमत जिला कलक्टर के फैसले के साथ है। फिर भी जरूरी है उनके फैसले के समर्थन में ज्यादा से ज्यादा लोग उठ खड़े हों ताकि आमजन को तकलीफ में डालकर दबाव की रणनीति से अपनी मांगें मनवाने वाले अपने मंसूबों में कभी भी कामयाब न हो। चूंकि मैं भी इस जिले का जन्मा जाया हूं तथा पांच साल झुंझुनूं प्रवास के दौरान इस समस्या को न केवल नजदीक से देखा है बल्कि भोगा भी है। इसलिए मैं जिला कलक्टर के फैसले स्वागत करता हूं। मैं भी चाहता हूं कि प्राइवेट बस स्टैंड खेमी शक्ति मंदिर के पास शिफ्ट हो।
आखिर में एक बात और मेरे गांव से झुंझुनूं जाने वाली प्राइवेट बसें भी बंद हैं। बसों की हड़ताल से तकलीफ मेरे गांव के भाई-बंधुओं तथा इस रुट के अन्य लोगों को भी हो रही है। इतना ही नहीं मेरे गांव वाले रूट पर रोडवेज बसों की भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हुई लेकिन इसके बावजूद मैं बस स्टैंड को शिफ्ट करने के फैसले के साथ हूं। क्योंकि मैं.सही को सही कहने का हिमायती तथा सच का सारथी हमेशा रहा हूं।

सीनाजोरी

35वीं लघु कथा
'अरे सात नहीं दस रुपए निकाल, पूरे दस ही लगेंगे।' रोडवेज बस परिचालक तैश में आकर बोला तो सवारी को भी गुस्सा आ गया। उसने झट से दस रुपए का नोट निकाला और परिचालक को थमाते हुए कहा, 'यह लीजिए दस रुपए, अब आप टिकट दे दीजिए।' 'अरे टिकट किस बात की। टिकट लेगा तो फिर बीस रुपए लगेंगे। तेरे को इतनी रात को बीच से बैठाया है। यहां कोई स्टैंड नहीं है। शुक्र मना तेरे दस कम लग रहे हैं। वरना टिकट पिछले स्टैंड से बनेगा। ' परिचालक कड़क आवाज में बोला। सवारी को अब कोई बात नहीं सूझ रही थी। उसने पलट कर इतना भी नहीं पूछा कि जब निर्धारित स्टैंड ही नहीं था तो आपने बस रोकी ही क्यों? लेकिन ज्यादा पैसे ना लगे इस डर व लालच के चलते वह परिचालक की सरेआम चोरी और सीनाजोरी को न चाहते हुए भी बर्दाश्त करता रहा।

यादगार दिन...

कल यानी 22 जून का दिन मेरे लिए खास होता है। इस बार गांव में मकानों की मरम्मत के सिलसिले में 18 जून को गांव गया था। 21 जून शाम को वहां से चलकर 22 जून सुबह श्रीगंगानगर पहुंचना तय था। लेकिन एन वक्त पर प्लान बदला और फिर तय किया कि 22 को सुबह जल्दी चलकर शाम चार बजे तक श्रीगंगानगर पहुंच जाऊंगा। हर बार इसी बस से जाता हूं। खैर, सुबह छह बजे उठ भी गया लेकिन...थोडी सी देर और सोने के लालच में आंख ऐसी लगी कि जागा तब घड़ी 9.58 बजा रही थी। मेरे होश फाख्ता हो गए थे। फटाफट घर का सारा सामान जमाया। कमरों के ताले लगाए....फिर तैयार हुआ तब तक 11.30 हो गए थे। घर की चाबी काकीसा को देने गया तो उन्होंने खाना खाने को कहा लेकिन मुझे और लेट नहीं करनी थी। मैंने छाछ एक कप पीया और फटाफट बस स्टैंड आया। वहां आकर पता चला कि बसों की हड़ताल है। अब संकट यही था अगले शहर के स्टेंड तक कैसे पहुंचा जाए। खैर,एक बाइक सवार से लिफ्ट मांगी और सुलताना आया...तेज धूप व उमस से मैं पसीना पसीना था...। तभी वहां जूस की रेहड़ी पर बिल्व का जूस पीया...और बस का इंतजार करने लगा। साढे बारह हो चुके थे तभी बस आई....और उससे चिड़ावा पहुंचा। वहां भी आधा घंटे के इंतजार के बाद बस आई और पिलानी पहुंचा। तब तक दो बज चुके थे। पिलानी में प्यास लगी तो पानी की बोतल ली लेकिन पानी पीते ही गले में तेज दर्द होने लगा...पानी की एक बूंद गटकना भी बड़ा पीडादायक लगा। गले में अचानक तकलीफ मेरी समझ से बाहर थी। राजगढ पहुंचा तब तक 3.50 हो गए थे। वहां भादरा के लिए बस खड़ी थी लेकिन ठसाठस भरी थी, लिहाजा मैं उससे नीचे उतर गया और दूसरी बस का इंतजार करने लगा। इस बीच सेव का ज्यूस लाया। बोतल एकदम ठंडी थी...जैसे ही पहला घूंट लिया गले में तेज जलन और चिरमिराहट होने लगी। दर्द से पसीना पसीना हो गया था। बोतल को बैग में रखकर में बस में आकर बैठ गया। साढे चार बजे चुके थे। बस की रवानगी का टाइम पांच बजे था। मतलब घर से राजगढ तक की 75 किमी की दूरी में साढे पांच घंटे बीत गए थे। पांच बजे चलकर बस साढे छह बजे भादरा पहुंची...यहां चाय पी तो कुछ आराम सा मिला...फिर तय किया कि ठंडे पानी से ही तकलीफ है। इसके बाद ठंडे पानी की बजाय सामान्य पानी ही पीया।
भादरा से बस सवा सात बजे रवाना हुई। हनुमानगढ पहुंचा तब सवा दस हो चुके थे। मुझे हार हाल में बारह बजे से पहले श्रीगंगानगर पहुंचना था लेकिन तब श्रीगंगानगर के लिए कोई साधन नहीं था..। पूछा तो बताया कि बस तो है लेकिन साढे ग्यारह बजे आएगी....मेरे माथे पर शिकन थी...पता था साढे ग्यारह चलकर बारह बजे तक श्रीगंगानगर नहीं.पहुंचा जाएगा। ऐसे में तय किया कि हनुमानगढ से गाड़ी किराये पर ली जाए। गाड़ी फोन पर बुक करवाकर मैं उसका इंतजार करने लगा। तभी एक कार आकर रुकी, मैं उम्मीद भरी नजरों से उसकी ओर गया...और यकीनन जैसा सोचा वैसा ही हुआ...कार श्रीगंगानगर ही आ रही थी। मैं फटाफट उसमें बैठा। रात 11.29 पर उसने मुझे श्रीगंगानगर के चहल चौक उतारा। उस वक्त वहां कोई ऑटो रिक्शा नहीं था, लिहाजा करीब डेढ किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय की....घर पहुंचा तब तक पौने बारह हो गए थे। उस वक्त बच्चे व निर्मल मेरा ही इंतजार कर रहे थे। पसीने से शरीर कचपचा रहा था, सो सबसे पहले बाथरूक घुसा। नहाकर बाहर निकला तो तीनों ने कमरे का गेट बंद कर दिया...लाइट आफ की और कहा अब बाहर आओ....बाहर गया तो मेज पर केक सजा था....सरप्राइज था यह मेरे लिए...इसके अलावा दो टी शर्ट भी बतौर उपहार मेरे लिए लाई गई थी....फिर हम सबने मिलकर केक काटा....एक दूसरे को विश किया....रात का एक बजने को था....तेज धूप व उमस में बारह घंटे की यात्रा वह भी सात अलग अलग साधनों से तय करने के बाद थकान से बदन दोहरा होना तय था लेकिन वर्षगांठ के जश्न में यह सारी थकावट दूर हो गई थी...एक यादगार दिन.....।

अब तो जागो सरकार!

निर्विवाद सत्य है कि राजस्थान में सरकार चाहे किसी भी दल की रहे, वह पंजाब से अपने हिस्से का निर्धारित पानी लेने में कभी सफल नहीं हुई। चाहे दोनों प्रदेशों में सरकार एक दल की हो, फिर समान विचारधारा या गठबंधन में सहयोगी दल की हो, लेकिन पानी की समस्या का हल कभी नहीं हुआ। निर्धारित पानी नहीं लेने के साथ-साथ राज्य सरकार के समक्ष दूसरी बड़ी चुनौती शुद्ध जल की भी है। शुद्ध जल पीने का सपना भी कमोबेश निर्धारित पानी न लेने जैसा ही है। यह सर्वविदित है कि पंजाब से जुडऩे वाली राजस्थान की सभी नहरों में दूषित पानी लंबे समय से आ रहा है। पंजाब में नदियों किनारे आबाद शहरों में संचालित कारखानों, उद्योगों का अपशिष्ट, अस्पतालों का बायो मेडिकल वेस्ट व सीवरेज का पानी इनमें बहाया जाता है । इन्हीं नदियों का पानी इंदिरा गांधी नहर व गंगनहर के माध्यम से राजस्थान आता है। इंदिरागांधी नहर के पानी का उपयोग श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ सहित प्रदेश के आठ जिलों मंे होता है जबकि गंगनहर के पानी का उपयोग श्रीगंगानगर जिले के करीब आधे हिस्से में होता है।
खैर, पानी की कमी की तरह ही पानी को प्रदूषण मुक्त करवाने के लिए भी राजस्थान व पंजाब में समय-समय पर आवाज उठती रही है। एक बार फिर उठी है। इस बार खास बात यह है कि राजस्थान व पंजाब के संगठनों ने जनजागरण की मुहिम सामूहिक रूप से चलाने का निर्णय किया है। इसी मुहिम के तहत शुक्रवार को पंजाब के पटियाला में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) के अध्यक्ष व सदस्य सचिव को ज्ञापन भी दिया गया। दोनों प्रदेशों के सामूहिक प्रतिनिधिमंडल के समक्ष पीपीसीबी के अधिकारियों ने कबूला कि राजस्थान जा रहा पानी पीने के लायक नहीं है। इस पानी से पंद्रह मिनट तक नहा लिया जाए तो पीने के पानी से भी ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है। पीपीसीबी अधिकारियों ने न केवल वस्तुस्थिति से अवगत करवाया बल्कि गेंद सरकार के पाले में डालकर अपनी मजबूरी भी बता दी।
यह सही भी है कि इस गंभीर समस्या का निराकरण दोनों प्रदेशों की राज्य सरकारों की दृढ़ इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। चूंकि यह मामला न केवल स्वास्थ्य बल्कि सीधा-सीधा आमजन की जिंदगी से खिलवाड़ का है। नहरी पानी का उपयोग करने वाले जिलों मंे होने वाली गंभीर बीमारियों को साइड इफेक्टस के रूप में देखा जा सकता है। जानलेवा बन रहे इस पानी को अब रोकना होगा। परिणाम भयावह हो चुके हैं, लिहाजा सरकार को अब चेत जाना चाहिए। आखिरकार इससे भयावह हालात और होंगे भी क्या?
बहरहाल, शनिवार को श्रीगंगानगर आए जिले के प्रभारी मंत्री को भी इस गंभीर विषय से अवगत कराया गया। लोकसभा चुनाव से पहले यहां हुई जनसभाओं में स्वयं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी पानी के मुद्दे पर पंजाब सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह से व्यक्तिगत रूप से बात करने का आश्वासन भी दिया था। अब पहल सरकार को करनी है। सरकार को अब इस मसले में कोई सियासत या स्वार्थ खोजे बिना समाधान की दिशा में काम शुरू करना होगा। वरना अंतिम व आखिरी विकल्प कानून तो है ही। कानून आत्महत्या को अपराध मानता है, किसी को मरने की इजाजत नहीं देता, तो वही कानून हमारे लिए शुद्ध हवा व जल आदि में बाधक बने कारणों को दूर भी तो करवा सकता है। फिलहाल बिना वक्त गंवाए पहल राज्य सरकारों को करनी है, समय की मांग भी यही है। अब और देर ठीक नहीं है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 16 जून 19 के अंक में प्रकाशित