Friday, May 25, 2018

दोहरा मापदण्ड

टिप्पणी
आबकारी विभाग व पुलिस ने बुधवार को संयुक्त कार्रवाई करते हुए रावला क्षेत्र में हथकढ़ शराब का कारोबार करने वालों के ठिकानों पर छापे मारे। इस दौरान हथकढ़ शराब व लाहन भी नष्ट किया गया। इसी तरह की कार्रवाई पिछले हिन्दुमलकोट क्षेत्र में भी की गई थी। अवैध काम के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई होनी भी चाहिए बल्कि लगातार होनी चाहिए ताकि अवैध कारोबार पर अंकुश लगे। साथ ही इस कारोबार से जुड़े लोगों में भय व्याप्त हो, लेकिन ऐसा होता नहीं है। समय-समय पर कार्रवाई होती ही नहीं है और जो कार्रवाई होती है, उसके पीछे भी कुछ निहितार्थ छिपे हुए होते हैं। शराब मामले से जुड़ा एक दूसरा पहलू हैं, लेकिन यहां आबकारी विभाग व पुलिस दोनों ही खामोश हैं। दोनों के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं हैं हां, इस बात से बचने के खूबसूरत बहाने जरूर हैं। दोनों विभागों में से कौन यह बताएगा कि रात आठ बजे बाद शहर व जिले के लगभग तमाम ठेकों पर बिकने वाली शराब अवैध नहीं है? निर्धारित से ज्यादा कीमत वसूलना अवैध नहीं है? ठेके के बाहर रेट लिस्ट चस्पा न करना अवैध नहीं है? यह ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब दोनों विभागों के पास हैं, लेकिन आबकारी विभाग ने तो टारगेट पूरा करने के चक्कर में ठेकेदारों को मनमर्जी करने की अघोषित छूट दे रखी है तो पुलिस भी कानून व्यवस्था भंग नहीं होने तक कार्रवाई नहीं करती। इस तरह के हालात से कभी-कभी यह भी
शक भी होता है कि इस मसले पर दोनों विभागों के बीच अंदरखाने कोई गुप्त समझौता है, क्योंकि हथकढ़ व लाहन के खिलाफ कार्रवाई के दौरान जो सहयोग व सामंजस्य दोनों विभागों के बीच होता है, वैसा अंग्रेजी शराब को लेकर क्यों नहीं हैं? क्या यह दोहरा रवैया नहीं? क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है? आबकारी विभाग की पिछले दिनों ओवररेट मामले में कुछ दुकानों पर गई कथित कार्रवाई भी चर्चा का विषय बनी है। इस मामले में किस दुकानदारों को सजा मिली, कितना जुर्माना लगा, यह आज भी अपने आप में राज ही है, अलबत्ता आबकारी ने इस कार्रवाई को प्रचारित कर तात्कालिक रूप से वाहवाही जरूर बटोर ली।
बहरहाल, वैसे दोनों ही विभागों को इस मामले में इस कदर आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। अवैध काम अवैध ही होता है। अवैध के मामले में कोई भेद नहीं होता है। वह चाहे हथकढ़ शराब हो या शराब की देर रात तक या निर्धारित मूल्य से बिक्री हो। दोनों विभागों का तालमेल व सामंजस्य भी वैसा ही दिखना चाहिए जैसा हथकढ़ के मामले में दिखाई देता है।  हथकढ़ के खिलाफ कार्रवाई भी प्रायोजित किसी खास प्रयोजन के लिए ही की जाती है। यहां भी मूल बात ठेकेदारों को हथकढ़ से हो रहे नुकसान से बचाना ही है। मतलब दोनों ही विभाग दोनों की जगह केवल ठेकेदारों का ही ख्याल रख रहे हैं। उपभोक्ताओं व कानून व्यवस्था से भी इनको सरोकार होना चाहिए।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 25 मई 18 के अंक में प्रकाशित 

इक बंजारा गाए-32

अंदर की बात
कई बार जो वास्तव में होता है वह दिखाई नहीं देता। और जो दिखाई देता है वह पूरा सच नहीं होता। ऐसा सभी मामलों में नहीं होता है लेकिन कभी-कभार हो जाता है। श्रीगंगानगर के गोलबाजार स्थित एक होटल का मामला जिस तेजी से उछला उसी गति से शांत भी हो गया। लोगों के समझ नहीं आ रहा है कि आखिर बिना कोई कार्रवाई हुए यह मामला यकायक ठंडा कैसे पड़ गया। आखिर इसके पीछे का राज क्या है। दबे स्वर में चर्चा हो रही है कि इस मामले में शिकायत करने वाले ही बैकफुट पर आ गए। इतना ही नहीं कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि दोनों ही पक्षों में अंदरखाने समझौता हो गया। लिहाजा अब होटल के टूटने या हटने का खतरा फिलहाल तो टल गया बताते हैं। वैसे बताया जा रहा है कि गोलबाजार में ही एक अन्य मल्टी स्टोरी बिल्डिंग को लेकर भी शिकायतें खूब हो रही हैं लेकिन प्रशासन इस पर कार्रवाई करने से हिचकिचा रहा है। इस बिल्डिंग के बेनामी मालिक शहर के प्रभावशाली लोग बताए जा रहे हैं।
राजनीति का चस्का
राजनीति का चस्का जिसको लग जाए फिर उसका तो फिर भगवान ही मालिक है। इन दोनों श्रीगंगानगर के सूरतगढ़ की दो महिलाओं पर राजनीति का जबरदस्त चस्का लगा है। शराब बंदी के बहाने दोनों सियासत में आना चाहती हैं। दोनों रिश्ते में देवरानी-जेठानी लगती हैं लेकिन दोनों में प्रतिद्वंद्विता इस कदर है कि एक ने तो दूसरी को पहचाने से ही इनकार कर दिया। भला यह कैसे संभव हो सकता कि देवरानी अपनी जेठानी को ही न जाने, लेकिन राजनीति पता नहीं क्या-क्या करवा देती है। दोनों ही महिलाओं का खुद का कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है लेकिन फिर भी दोनों जुटी हुई हैं। दबे स्वर में चर्चा है कि इन दोनों महिलाओं के पीछे कोई दूसरी ताकत काम कर रही है। जेठानी के तामझाम देखकर तो लोग माथा पकड़ लेते हैं। लग्जरी गाड़ी, सुरक्षाकर्मी और पीआरओ की टीम। इस तरह के जलवे देखकर कहा जा रहा है कि जरूर पर्दे के पीछे कोई है जो इनका समर्थन कर रहा है।
सीएम का सपना
सपने दिखाने और बड़े-बड़े वादे करने वाले सेठजी का एक बयान इन दिनों अच्छी खासी चर्चा में है। हुआ यूं कि कभी सेठजी की पार्टी से चुनाव जीतकर विधानसभा में जाने वाले एक महिला नेत्री का अचानक सेठजी की पार्टी से मोह भंग हो गया। इतना ही नहीं महिला नेत्री ने उस पार्टी का दामन थाम लिया, जिससे इन दिनों सेठजी का वास्ता कम ही पड़ा है। खैर, चर्चा व चटखारे की बात तो यह है कि महिला नेत्री के जाने के बाद सेठजी प्रचारित कर रहे हैं कि वो तो उसको सीएम तक बनाना चाह रहे थे। अब सीएम का सपना उन्होंने दिखाया या नहीं यह तो सेठजी या महिला नेत्री ही जाने लेकिन इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हंसी के फव्वारे छूट रहे हैं। हंस-हंस के लोगों के पेट में बल पड़ रहे हैं। महिला नेत्री ने तो पुराने पार्टी को छोटा कह कर अपनी बात पूरी कर दी अब तो सेठजी ही बता पाएंगे कि वो महिला नेत्री को सीएम बनाने का सपना आखिरकार कैसे पूरा करके दिखाते।
पानी की कहानी
श्रीगंगानगर में इन दिनों प्रदूषित पानी का मामला गहराया हुआ है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से पानी को लेकर धरना प्रदर्शन आदि कर रहे हैं। कई संगठन भी इस मामले में सक्रिय है। सभी अपने अपने स्तर पर पानी को दूषित बता रहे हैं। इसके लिए आरोप-प्रत्यारोप तक भी लग रहे हैं। एक दल दूसरे दल को जिम्मेदार बता रहा है, जबकि हकीकत में यह मसला पुराना है। कोई भी दल इस मसले से अछूता नहीं है। सभी ने इस मसले को देखा और जाना है लेकिन समाधान के मामले में आंख मूंद ली है। वैसे भी सरकारें आमजन को स्वच्छ व शुद्ध पानी पिलाने का दावा तो जरूर करती हैं लेकिन दावा शायद ही कभी पूरा हो पाता है। कल केन्द्रीय मंत्री के घेराव में भी उनकी पार्टी के कम और दूसरे दल के लोग ज्यादा थे, जबकि दूषित पानी की समस्या सबकी है। इस मसले को तो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए लेकिन फिर भी सब अपनी-अपनी ढपली अलग-अलग तरीके से बजाने से बाज नहीं आ रहे।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 24 मई 18 के अंक में प्रकाशित 

पड़ोसी धर्म निभाए पंजाब

टिप्पणी
एक अच्छे पड़ोसी का दायित्व होता है कि वह दुख-दर्द में काम आए, लेकिन राजस्थान के पड़ोसी प्रदेश पंजाब ने पड़ोसी धर्म शायद ही निभाया हो। बात चाहे नहरों में प्रदू्िरषत पानी की हो या फिर गाहे-बगाहे पानी रोकने या कम करने की। पंजाब ने हमेशा मनमानी कर अपनी बात ही ऊपर रखी है। ताजा मामला नहरों में काला व बदबूदार पाने आने का है। यह पानी इतना जहरीला है कि जलदाय विभाग ने इसके डिग्गियों मंे भंडारण तक रोक लगा रखी है। वैसे पंजाब से राजस्थान आने वाली नहरों में प्रदूषित पानी आने का यह कोई पहला मामला नहीं है। पंजाब की औद्योगिक इकाइयों व शहरों का रासायनिक अपशिष्ट सतलुज और व्यास नदियों में डाला जाता रहा है। नहरों में दूषित पानी आने का यह सिलसिला सदियों से चल रहा है लेकिन आज तक न तो किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई और न ही इस समस्या का समाधान हुआ। इस नहरी का पानी का उपयोग खेती के साथ-साथ पीने के लिए भी किया जाता है। इस नहरी पर पानी श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ सहित प्रदेश के दस जिले निर्भर हैं। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि श्रीगंगानगर में दूषित पानी की जांच करने वाली प्रयोगशाला में पूरी एवं सघन जांच नहीं हो पाती। क्षेत्र के लोग लंबे समय से यहां विशेष प्रयोगशाला की मांग करते आ रहे हैं लेकिन सरकार ध्यान नहीं दे रही। नहरों की मरम्मत के नाम पर अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं लेकिन पानी शुद्ध व स्वच्छ मिले इसके लिए गंभीरता से प्रयास नहीं हो रहे हैं। श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जिलों में कैंसर रोगियों के बढ़ते आंकड़ों के बावजूद सरकार जाग नहीं रही है। जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं खोजा गया तो प्रदेश के दस जिलों के करीब तीन करोड़ लोगों की नस्ल विकृत हो सकती है। इसलिए स्वास्थ्य से सरेआम हो रहा यह खिलवाड़ अब स्थायी समाधान चाहता है। वरना परिणाम भयावह हो सकते हैं।
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 राजस्थान पत्रिका के जयपुर संस्करण में 23 मई 18 के अंक में प्रकाशित

Tuesday, May 22, 2018

सोशल मीडिया पर था सक्रिय, फेसबुक पर हैं कई अकाउंट

जॉर्डन क्लब मोहरसिंह चौक के नाम से है एक पेज
श्रीगंगानगर। मंगलवार सुबह जिम में मारा गया हिस्ट्रीशीटर जॉर्डन सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय था। आलम यह है कि जॉर्डन चौधरी के नाम से फेसबुक पर कोई आधा दर्जन अकाउंट हैं। फिर भी तीन अकाउंट में जॉर्डन की फोटो लगी है, इससे जाहिर है यह पेज उसी के हैं। इसके लिए जॉर्डन क्लब मोहर सिहं चौक के नाम से भी फेसबुक पर एक पेज बनाया गया है।
जॉर्डन के फेसबुक अकाउंट व फेसबुक पेज पर फालोअर व मित्रों की संख्या भी अच्छी खासी है। उसके एक अकाउंट में मित्रों की संख्या चार हजार से ऊपर हैं तथा फालोवर 28 सौ के करीब हैं। उसके दूसरे अकाउंट में मित्र 713 हैं। तीसरे अकाउंट में उसके मित्रों की संख्या दिखाई नहीं देती है लेकिन इस अकाउंट के साढ़े छह हजार से ज्यादा फालोअर हैं। इसी तरह से जॉर्डन क्लब मोहरसिंह चौक नामक पेज को छह हजार से ज्यादा लोग फॉलो करते हैं तथा इतने ही लोगों ने लाइक किया हुआ है। इस पेज पर शहर की राजनीति व शहर के नेताओं को लेकर चर्चा की हुई है। मसलन, शहर का संभावित व बेहतरीन उम्मीदवार कौन हो सकता है। इसके लिए बाकायदा नाम देकर सर्वे टाइप भी किया हुआ है।
वो सब देख रहा है
जॉर्डन के एक फेसबुक अकाउंट का कवर फोटो पर शिव जी की फोटो लगी है। इस पर लिखा है वो सब देख रहा है। इसी फोटो के साथ जॉर्डन का कमेंट भी लगा है जिसमें उसने कहा है 'हे महाकाल तुझे पता है, मैं सही हूं, बस सिर पर हाथ रखना, यह दुनिया का टेम और वहम मैं आपे काढ देऊं।' हालांकि यह पोस्ट पिछले साल की है। हिन्दी भी ठीक से नहीं लिखी हुई है।
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www.patrika.com  पर 22 मई 18 को प्रकाशित........................https://goo.gl/ijDbjF

स्टाइलिस्ट अंदाज में रहता था हिस्ट्रीशीटर जॉर्डन

उल्टी टोपी एवं पठानी कुर्ता पायजामा थे पसंदीदा
श्रीगंगानगर। जिम में मारा गया हिस्ट्रीशीटर विनोद चौधरी उर्फ जॉर्डन को स्टाइलिस्ट अंदाज में रहना पसंद था। विशेषकर उल्टी टोपी उसकी पहचान थी। उसकी फेसबुक प्रोफाइल से जाहिर होता है कि जॉर्डन को हुलिया बदलना भी अच्छा लगता था। कभी उसने दाढ़ी रखी तो कभी क्लीन शेव हुआ। कभी सिर पर बाल रखे तो कभी साफ करवा लिए। इतना ही नहीं जॉर्डन सुंदर दिखना चाहता था तथा खुद को फ रखने रखने के लिए जिम जाकर कसरत करना उसका आदत में शुमार था। जॉर्डन विशेषकर स्पोट्र्स जूते तथा टोपी लगाना भी पसंद करता था। इसके टोपी लगाने का अंदाज भी कुछ अलग ही था। अधिकतर बार वह टोपी उल्टी ही लगाता था। इसके अलावा टोपी वाली टीर्शट पहनना भी उसे पसंद था। जॉर्डन को कपड़ों में कुर्ता पायजामा को ज्यादा तरजीह देता था। विशेषकर पठानी शूट से अच्छा खासा लगाव था। जॉर्डन का फ्रेंड सर्किल भी काफी बड़ा था। विशेषकर छात्रसंघ चुनाव में वह बढ ़चढ़कर हिस्सा लेता तथा अपने पक्ष के उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार भी करता है। जॉर्डन के फेसबुक पेज पर उसकी व्यक्तिगत फोटो के बजाय ग्रुप फोटो ज्यादा हैं, इससे जाहिर होता है कि उसका युवाओं से अच्छा सपंर्क था।
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www.patrika.com  पर 22 मई 18 को प्रकाशित....https://goo.gl/6sYkEK

दो साल पहले भी जिम में इसी तरह हुआ था मर्डर

तब भी गोली मारकर की थी युवक की हत्या
श्रीगंगानगर। जिम एक एेसी जगह है, जहां लोग खुद को तरोताजा एवं फिट रखने के लिए जाते हैं, लेकिन श्रीगंगानगर की जिमों में झगड़े आदि की खबरें भी आने लगी हैं। इतना ही नहीं शहर की दो जिम तो खून से लाल तक हो गईं। जिम में सरेआम गोली मारकर हत्या करने की यह दूसरी वारदात है। दो साल पहले कमोबेश इसी तरह एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तब पांच हमलावरों ने वारदात को अंजाम दिया था जबकि मंगलवार की घटना में तीन हमलावर होने की जानकारी सामने आई है। दोनों मामलों में समानता यह है कि दोनों मृतक श्रीगंगानगर की पुरानी आबादी के वाशिंदे थे। तब हत्या की वजह पुरानी रंजिश सामने आई थी। यहां भी प्रथम दृष्टया रंजिश का मामला ही सामने आया है। पहला मर्डर हुआ वह जिम पुरानी आबादी में थी जबकि ताजा मर्डर वाली जिम इंदिरा वाटिका के पास है। मतलब शहर के पुराने व नए दोनों ही इलाकों की जिम में गोलियां चली हैं। तब भी कसरत करते हुए युवक को गोली मारी गई थी और मंगलवार को भी कुछ एेसा ही हुआ।
दो साल पहले 17 अगस्त 2016 को सुबह पुरानी आबादी में टावर रोड स्थित जिम में कसरत रहे युवक बिट्टू शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यहां पर हमलावरों की संख्या पांच थी, वारदात को अंजाम देने के बाद हमलावर दो बाइक पर सवार होकर फरार हो गए थे। बिट्टू की मां की रिपोर्ट पर नामजद मामला दर्ज हुआ था। मंगलवार को इंदिरा वाटिका के पास स्थित जिम की घटना सुबह साढ़े छह बजे के करीब है। यहां भी तीन युवक थे जो वारदात को अंजाम देकर फरार हो गए। युवक किस साधन से आए तथा गए, इसकी अभी जानकारी नहीं मिल पाई है।
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 www.patrika.com  पर 22 मई 18 को प्रकाशित  ....https://goo.gl/thFZCy

तीन हमलावर के हाथ में थे पांच पिस्तौल

मात्र एक मिनट में दिया वारदात को अंजाम
श्रीगंगानगर। शहर की इंदिरा वाटिका के पास स्थित जिम में हिस्ट्रीशीटर जॉर्डन की हत्या करने वाले तीन हमलावर थे। तीनों के पास पांच पिस्तौल थे। हत्या की वारदात को मात्र एक मिनट से भी कम समय में अंजाम दिया गया। सीसीटीवी कैमरे की जो फुटेज जारी हुए इसमें यह सब कैद हैं। फुटेज के अनुसार तीन युवक जिम के काउंटर पर आते हैं। इनमें से एक युवक जिम का दरवाजा खोलने का प्रयास करता है। अंगूठे से इंट्री का सिस्टम होने के कारण वह जिम में प्रवेश नहीं कर पाता है। तभी तीनों हमलावरों की नजर बगल में सोए एक युवक पर पड़ती है। वे उस युवक को खड़ा करते हैं और जिम का दरवाजा खुलवाते हैं। इसके बाद दो युवक जिनके दोनों हाथों में पिस्तौल दिखाई दे रही है जिम के अंदर प्रवेश करते हैं। एक हमलावर जिम के काउंटर पर जिम वाले युवक के सामने पिस्तौल तानकर खड़ा रहता है। अचानक ही हमलावर जिम वाले युवक के हाथ से मोबाइल लेता है और उसे जमीन पर पटकर तोड़ देता है। इसी बीच सीसी कैमरे की स्क्रीन काली होती है। संभवत: हमलावरों ने गोली सीसीटीवी कैमरे पर भी मारी। इसके बाद बाहर वाला युवक भी अंदर जाता है। इसके बाद तीनों बाहर आ जाते हैं। यह घटनाक्रम एक मिनट से भी कम समय का है।
तीनों हमलावर जीन्स में
पहनावे से तीनों हमलावर संभ्रांत परिवार से नजर आते हैं। तीनों हमलावर जीन्स पहले हुए हैं। जूते भी ब्रांडेड नजर आते हैं। दो युवक टी शर्ट में है जबकि एक शर्ट में है। एक युवक ने टोपी पहन रखी है। तीनों ही युवक कद काठी में मजबूत नजर आते हैं।

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www.patrika.com  पर 22 मई 18 को प्रकाशित ...https://goo.gl/bctk9v

स्वास्थ्य से खिलवाड़ कब तक?

टिप्पणी
पड़ोसी प्रदेश पंजाब की व्यास नदी में शुगर मिल का लाखों टन शीरा तथा अन्य अपशिष्ट मिलने के कारण राजस्थान आने वाली तीनों नहरों इंदिरा गांधी नहर, गंगनहर एवं भाखड़ा नहर का पानी प्रदूषित हो गया है। प्रदूषित पानी के कारण नहरों में बड़ी संख्या में मछलियां व जलीय जीव काल का ग्रास बन गए। इस पानी का रंग काला व बदबूदार है। पंजाब में हरिके बैराज से दो बड़ी नहरें फिरोजपुर फीडर और राजस्थान फीडर निकलती हैं। फिरोजपुर फीडर से गंगनहर को पानी की आपूर्ति होती है जबकि राजस्थान फीडर का पानी इंदिरागाधी नहर और भाखड़ा नहर को मिलता है गंगनहर व भाखड़ा नहर का पानी श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ तक सीमित है जबकि इंदिरा गांधी नहर के पानी का उपयोग प्रदेश के दस जिलों में होता है। इस प्रदूषित पानी के सेवन से महामारी फैलने की आशंका है, लिहाजा जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग ने श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले की सभी जलदाय योजनाओं की डिग्गियों में पानी की आपूर्ति रोक दी है। पानी में प्रदूषण का स्तर जांचने के लिए दोनों जिलों में नमूने भी लिए गए हैं। इनकी जांच रिपोर्ट आने के बाद ही डिग्गियों में पानी आपूर्ति का निर्णय लिया जाएगा। प्रदूषित पानी की खपत में कम से कम दस दिन लगेंगे। इंदिरा गाधी नहर में अभी 35 दिन की बंदी के बाद पानी छोड़ा गया है जबकि गंगनहर व भाखड़ा नहर की पेजयल डिग्गियां भी सूखने की कगार पर हैं। ऐसी स्थिति में अगर दस दिन तक नहरों में प्रदूषित पानी आया तो प्रदेश के दस जिलों में पेयजल का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
वैसे भी नहरों में प्रदूषित पानी आने का यह कोई पहला मामला नहीं हैं। राजस्थान आने वाली सभी नहरों में पंजाब से कभी सीवरेज का पानी का छोड़ दिया जाता है तो कभी फेक्ट्रियों का अपशिष्ट बहा दिया जाता है। बड़ी बात है कि ऐसा करने वालों पर आज तक किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई। कई जांच रिपोर्टों में यह साबित भी हो चुका है कि पानी घरेलू उपयोग के लिए भी खतरनाक है। वैसे भी वर्तमान में पानी का सेंपल लेने का जो तरीका है उससे पूरी तरह से पता नहीं चल पाता है कि स्वास्थ्य के लिहाज से खतरनाक अवयव कौन कौन से हैं। श्रीगंगानगर में पेयजल की जांच के लिए विशेष प्रयोगशाला की मांग लंबे समय की जा रही है। विडम्बना देखिए नहरों की मरम्मत के नाम पर करोड़ों अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन पानी शुद्ध व स्वच्छ मिले इसके लिए गंभीरता से प्रयास नहीं हो रहे हैं। बड़ा सवाल तो यह भी है कि श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों में कैंसर रोगियों के बढ़ते आंकड़ों को देखकर भी सरकार जाग नहीं रही है। अगर जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं खोजा गया तो प्रदेश के दस जिलों के करीब तीन करोड़ लोगों की नस्ल विकृत होने का खतरा भी सिर पर मंडरा रहा है। स्वास्थ्य से सरेआम हो रहा यह खिलवाड़ अब स्थायी समाधान चाहता है। सहन करने की भी आखिर कोई सीमा होती है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 22 मई 18 अंक में प्रकाशित 

लंपट या लंपटगिरी का अर्थ

बस यूं ही
झुंझुनूं से संचालित होने वाले बगड़ के एक प्रतिष्ठित स्कूल के संस्था प्रधान ने कल मेरी एक पोस्ट पर कमेंट किया था। उनके कमेंट में एक जगह लंपटगिरी शब्द का प्रयोग आया था, जो उन्होंने मेरे लिए प्रयुक्त किया। हालांकि उनके कमेंट पर आपत्ति जताते हुए मैंने जवाब दे दिया। साथ में उन गुरुजी से लंपट या लंपटगिरी का अर्थ भी पूछ लिया। हालांकि अर्थ मुझे तब भी मालूम था और अब भी है। मैं इंतजार कर रहा था कि शायद गुरुजी जवाब देंगे या अपना कमेंट हटा लेंगे, लेकिन दोनों ही बातें नहीं हुई। न तो कमेंट हटा, न संशोधित हुआ और न ही लंपट या लंपटगिरी का अर्थ बताया गया। इसके पीछे भी दो कारण हो सकते हैं या तो गुरुजी बताना नहीं चाह रहे हों। न बताने की भी कई वजह हो सकती हैं। और दूसरा यह है कि गुरुजी को इसका अर्थ ही न मालूम हो। खैर, मैं कैसा हूं.. मेरा चरित्र कैसा है.. मेरा स्वभाव कैसा है... मेरी आदतें कैसी हैं.. मेरा व्यवहार कैसा है। मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जो मुझे जानते हैं उनको पता है और जो नहीं जानते उनको बताने का कोई फायदा नहीं है। बगड़ वाले गुरुजी से भी परिचय चंद मुलाकातों का हैं, लिहाजा उनको बताने का कोई फायदा नहीं है।
हां लंपट/ लंपटगिरी का अर्थ आप सब से जरूर साझा कर रहा हूं ताकि आप जान सकें कि एक प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़े शख्स के विचार कैसे हैं। इस शब्द के अर्थ क्या-क्या हैं आप भी जानें। लंपट का मतलब होता है कामुक, निरर्थक समय बर्बाद करने वाला, नैतिक सत्य से भटकने वाला, ठरकी, बांका, अनियंत्रित, चंचल, विलासी रूप से लिप्त, शोहदा, छिछोरा, अनुशासनहीन, अनियंत्रित आदि आदि।
इसी तरह आजकल गिरी शब्द भी प्रचलन खूब है। जैसे दादा से दादागिरी, गांधी से गांधीगिरी टाइप। इस तरह से लंपट को भी लंपटगिरी बना दिया गया है। इस शब्द का अर्थ तलाशन केे मैंने बहुत प्रयास किए तब जाकर एक जगह नया जमाना नामक ब्लॉग मिला। इस ब्लॉग के लेखक कोलकात्ता विवि में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर हैं। उन्होंने फेसबुक पर लंपटगिरी की व्याख्या की है। थोड़े से संशोधन के साथ साझा कर रहा हूं।
कुंठा और छद्म में जीनेवाला व्यक्ति बेहद कमजोर और आत्मपीड़क होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो फेसबुक लंपट आत्मपीड़ा से भी गुजरते हैं। ऐसे आत्मपीडकों के लिए इंटरनेट विष की तरह है। फेसबुक लंपट की विशेषता है कि वह छद्म में जीता है, छद्मभाषा लिखता है, पहचान छिपाता है। फेसबुक पर लंपटगिरी करने वाले लोग वस्तुत: बीमार मन के कुण्ठित लोग हैं। स्त्री के साथ अपमान या हेय या उसे कम करके देखने वाली भाषा वस्तुत:कुण्ठा की उपज है। इन लोगों को किसी मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए। फेसबुक लंपटों में एक लक्षण यह भी देखा गया है कि जो लड़की मित्रता के प्रस्ताव का जबाव नहीं देती तो उसके मैसेज बॉक्स को अश्लील तस्वीरों, गालियों और सेक्सुअल भाषा से भर देते हैं।
फेसबुक लंपट बेहद डरपोक होता है। वह गलती करता है और फिर दुम दबाकर भागता है।
बहरहाल, मैंने हमेशा अपने गुरुजनों का सम्मान किया है। आज भी मेरे मन में जीवन में मिले तमाम गुरुजनों के प्रति अगाध श्रद्धा व सम्मान है। इसके बावजूद एक शिक्षक के मेरे प्रति एेसे विचार हो सकते हैं, मैं यह सोच सोच कर हैरान हूं। एक शिक्षक को भविष्य का निर्माता कहा जाता है। मेरे प्रति सार्वजनिक रूप से इस तरह की सोच प्रदर्शित करने वाले तथा लंपटगिरी से नवाजने वाले शिक्षक भावी पीढ़ी को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं यह चिंतन व मनन करने का विषय है। सोचिएगा जरूर ।
नोट - मेरा उद्देश्य शिक्षक व संस्था को बदनाम करना नहीं बल्कि उस शिक्षक को एहसास करवाना है ताकि वह भविष्य में किसी के प्रति इस तरह के अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने से पहले दो बार सोचे जरूर।

हार के बहाने

बस यूं ही
जैसा कि मैंने कहा था कि शाम होते-होते सन्नाटा टूटेगा। पस्त पार्टी की आईटी विंग हार को सम्मानजनक व खूबसूरत मोड़ देने के लिए कोई न कोई जुमले जरूर लाएगी। शाम होते-होते एेसा हो भी गया। पोस्ट आई कि 'यह कनार्टक का दुर्भाग्य है। फस्र्ट डिवीजन विपक्ष में बैठेगा जबकि थर्ड डिवीजन सरकार चलाएगा। इसके नीचे लिखा है , कांग्रेस को अब लोकतंत्र खतरे में नजर नहीं आएगा।' खैर यह तो बानगी भर है। अभी तो हार के गम को कम करने को कई जुमले ईजाद होंगे। कई उदाहरण दिए जाएंगे तो कई तुलनाएं भी होने लगेंगी। कुछ अति उत्साही भक्तों ने तो येदियुरप्पा की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से करने में भी गुरेज नहीं किया। फ्लोर टेस्ट में संभावित हार देखते हुए येदि को वाजपेयी की तरह प्रचारित करना भी संभवत: पहले से तय हो चुका था। तभी तो वैसा ही भावुकता भरा भाषण और सहानुभूति की लहर पर सवार.होकर त्यागपत्र। प्रयास पूरा था कि दो दिन की नौटंकी की इतिश्री पर भरपूर सहानुभूति बटोरी जाए। हालांकि येद्दि व वाजपेयी में तुलना या समानता केवल इस की बात की जरूर हो सकती है कि दोनों भाजपा के हैं, बाकी किसी भी स्तर पर येदि, वाजपेयी के समकक्ष नहीं हैं। कद, पद, योग्यता, व्यक्तित्व, खासियत के मामले में येद्दि ही क्या वर्तमान दौर के किसी भी नेता में अटल जी का अक्स नजर नहीं आता। अटल जी के साथ तुलना करना एक तरह से हार के गम को कम करने का नायाब तरीका ही है।
खैर, कर्नाटक के सियासी ड्रामे पर समूचे देश की नजर लगी थी। उत्सुकता इस बात की थी कि इस राजनीतिक नौटंकी का समापन कैसे होगा। भक्तों को इस बात का अंदेशा कतई नहीं था कि येद्दि की विदाई इस अंदाज में होगी। वैसे राज्यपाल के भाजपा को मौका देने के फैसले को लेकर कांग्रेस ने आपत्ति भी जताई। इतना ही नहीं कांग्रेस ने कर्नाटक फार्मूले की तर्ज पर बिहार, गोवा, मणिपुर व मेघालय में सरकार बनाने का मौका भी मांगा। कांग्रेस का एेसा करना गलत भी नहीं था, क्योंकि बिहार को छोड़कर तीन राज्यों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन भाजपा ने दूसरे दलों से गठबंधन कर कांग्रेस को सत्ता से पदच्युत कर दिया। तीन चार बार भाजपा की रणनीति से पिटी कांग्रेस ने भी इस बार भाजपा को भाजपा के ही अंदाज में जवाब दिया। उसने जेडीएस को आगे कर दिया। लेकिन इस बार राज्यपाल ने पूर्व के फैसलों से इतर सबसे बड़े दल को न्यौतने की परंपरा निभाते हुए भाजपा को मौका दे दिया। यही विरोधाभास कांग्रेस को अखरा और वह कोर्ट चली गई। देर रात कोर्ट बैठा। साढ़े तीन घंटे तक सुनवाई हुई लेकिन फैसला मिला जुला आया। कांग्रेस दरअसल शपथ ग्रहण को ही रुकवाना चाह रही थी लेकिन कोर्ट ने शपथ ग्रहण समारेाह पर रोक नहीं लगाई। इतना ही नहीं बहुमत का फैसला जब कोर्ट ने विधानसभा में करने को कहा तो इसे प्रचारित किया गया कि कोर्ट में मुंह की खाने वाले विधानसभा में भी मात खाएंगे, लेकिन एेसा हुआ नहीं। वैसे सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया मौटे तौर.पर वही भाजपा सरकार की विदाई का कारण बना। यह सही है कि कोर्ट के फैसले ने पहले भाजपा को खुशी दी जब उसने राज्यपाल के शपथ ग्रहण के निर्णय को यथावत रखा। दूसरा निर्णय जरूर खिलाफ जाता दिखाई दिया। कोर्ट ने दो दिन में फ्लोर टेस्ट करने तथा इसका प्रसारण लाइव करने को कहा जबकि राज्यपाल ने बहुमत सिद्ध करने के लिए पन्द्रह दिन का समय दिया था। प्रसारण लाइव तथा बहुमत का समय कम होने के कारण भाजपा खेमे में हलचल जरूर दिखाई दी। फिर भी जोड़तोड़ व खरीद फरोख्त की चर्चाओं के चलते इस बात की उत्सुकता जरूर थी कि आखिर कर्नाटक में होगा क्या?
कांग्रेस के दो विधायक शुरूआती सत्र में अनुपस्थित रहे तो लगा भी कि शायद जोड़तोड़ का गणित कारगर बैठ जाए लेकिन जब खबरें आने लगी कि वाजपेयी की तर्ज पर कुछ होगा तो यह लगने लगा था कि भाजपा अब बैकफुट पर है। हुआ भी वही येदि ने अपना भाषण पढऩे के बाद फ्लोर टेस्ट होने से पहले ही इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। उनको संभावित हार का एहसास हो चुका था। जैसे ही समीकरण बदले कांग्रेसी खेमी में खुशी की लहर दौड़ गई। गोवा, मणिपुर, मेघालय में ज्यादा सीटें हासिल करने के बाद सरकार न बना पाने के कारण कांग्रेस में जो निराशा का माहौल था, उसको भी इस फैसले ने निसंदेह कम किया है। गठजोड़ की सरकार कैसे चलेगी, यह अभी देखना बाकी है। चर्चा इस बात की है कि जिस तरह से जेडीएस व कांग्रेस ने दो दिन के लिए विधायकों की मजबूत किलेबंदी की वैसी कब तक रखेंगे। मतलब साफ जाहिर है कि बाजार खुला है। भाव लगने व बिकने के विकल्प बरकरार है। गठबंधन अगर मजबूती के साथ डटा रहा तो बात अलग है वरना खरीद फरोख्त की आशंकाएं व चर्चाएं थोड़ी बहुत भी सही साबित हुई तो गठबंधन सरकार का कार्यकाल पूरा करना मुश्किल होगा। मतलब तय है कर्नाटक में सियासी कमशकश खत्म नहीं होने वाली...। चुनौती दोनों तरफ है। देखना है शह व मात के इस खेल में बाजी किसके हाथ लगेगी। हार से तमतमाई भाजपा चुप नहीं बैठने वाली...वह पलटवार जरूर करेगी इतना तय है।

इक बंजारा गाए-31

मेरे साप्ताहिक कॉलम  की अगली कड़ी....।
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जनसंपर्क का मौका
नेता हो या नेता बनने की हसरत देखने वाला हो। दोनों में एक बात की समानता विशेष रूप से देखने को मिल जाती है। भीड़ देखते ही यह लोग हाल चाल पूछने और मेल मिलाप करने जरूर लग जाते हैं। मौका चाहे खुशी का हो या गम का इससे इनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई कैसा भी सोचे, यह लोग तो अपना जनसंपर्क अभियान जारी रखते हैं। अब नगर परिषद सभापति की माताजी के निधन की ही बात करें। अंतिम संस्कार पर मुक्ति धाम ठसाठस भरा था। इतनी भीड़ अमूनन अंतिम संस्कारों में जुटती नहीं है। इतने भीड़ देखकर छुटभैयों को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। इधर, लोग सभापति व उनके परिजनों को सांत्वना दे रहे थे, वहीं यह छुटभैये नेता मुक्तिधाम में घूम-घूमकर लोगों से मिल रहे थे। हंस-हंस के बतिया रहे थे। यहां तक कि गर्मजोशी से हाथ भी मिला रहे थे। इतने सारे लोग एक जगह कभी मिल नहीं सकते, इसलिए मौके का फायदा उठाने से छुटभैये चूके नहीं। खैर, फायदा कितना मिला या मिलेगा यह तो समय बताएगा।
चुनावी मौसम
चुनावी मौसम का अपना ही आनंद है। यह मौसम आते ही न जाने कितने ही नेता चुनाव लडऩे का सपना पाल बैठते हैं। हार-जीत अलग विषय है। टिकट मिलना न मिलना भी कोई मायने नहीं रखता। हां यह बात दीगर है कि चुनाव आते-आते सपना देखने वालों की संख्या कम हो जाती है। श्रीगंगानगर में एक पार्टी के नेताजी ने तो बकायदा चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। परिणाम चाहे कुछ भी कैसा भी हो, टिकट मिले न मिले लेकिन उन्होंने कह दिया है चुनाव लड़ेंगे। खैर, इसी तरह पार्षद का चुनाव न जीतने वाले शख्स भी विधानसभा चुनाव के नाम पर जीभ लपलपा रहे हैं। हैरत की बात तो है कि यह शख्स हर किसी से पूछते फिर रहे हैं कि उनको लेकर मतदाताओं की क्या राय है? यह बात सुनकर सलाह देने वाले अपना माथा पीटने के अलावा करें भी तो क्या। लोग इस छुटभैये को कैसे बताएं कि मतदाताओं की राय क्या है। वैसे कोई राय हो तब तो बने भी। जानने वाले जानते हैं यह छुटभैया समय-समय पर शहर में अपने होर्डिंग्स टांग कर खुद को विधानसभा का दावेदार बताता रहता है।
घेराव की कहानी
श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज खुलने का सपना फिलहाल तो सपना ही बना हुआ है। हां इस सपने को साकार करने के लिए प्रयास कई बार हुए हैं। अब भी हो रहे हैं लेकिन सपना अभी सच हुआ नहीं है। इधर, इस सपने को सच करने के लिए कई तरह के आंदोलन भी हुए हैं। पिछले दिनों इसी विषय को लेकर विधायक का घेराव करने तक घोषणा की कर दी गई। सोशल मीडिया पर पोस्टें वायरल की गई। समाचार पत्रों तक में भी प्रेस नोट भिजवाए गए। इतना होने के बावजूद घेराव स्थगित हो गया। दानदाता ने घेराव करने वालों से चर्चा की और उनको वस्तुस्थिति से अवगत कराया। अब जो बातें सामने आई उनमें ऐसी कोई नई नहीं थी। अब लोगों के समझ में यह नहीं आ रहा कि यह घेराव की रणनीति बनी ही क्यों थी। और बनी भी थी तो ऐसा क्या मिल गया तो टाल दी गई। वैसे यह सवाल कइयों के जेहन में घूम रहा है और जवाब न मिलने के कारण परेशान कर रहा है सो अलग। वैसे घेराव की घोषणा व स्थगित होने की कहानी शायद ही सामने आए।
दावे हैं दावों का क्या
कसमें, वादे, प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या.. यह चर्चित फिल्मी गाना तो कमोबेश हर किसी ने सुना ही होगा। श्रीगंगानगर पुलिस के संदर्भ हो याद रखते हुए अगर गीत के बोल में बातों की जगह दावा जोड़ दिया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। विशेषकर सरकारी विभागों की तरफ से किसी बात को लेकर दावे तो खूब होते हैं लेकिन कुछ समय बाद दावों की हवा निकल जाती है। लोक परिवहन बसों से जुड़े दावे का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक हादसे के बाद पुलिस ने आनन-फानन में लोक परिवहन बसों के खिलाफ खूब कार्रवाई की। और साथ में यह दावा भी किया कि इन बसों की लगातार चैकिंग की जाएगी। खैर, जैसे-जैसे हादसे की खबर शांत हुई पुलिस का चैकिंग का अभियान भी सुस्ती पकड़ गया। कई बसें फिर से परंपरागत तरीके से संचालित होने लगी है। शायद फिर कोई हादसा ही खाकी की इस सुस्ती को तोड़ेगा। वैसे भी सुस्ती हादसे के बाद ही टूटती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 17 मई 18 के अंक में प्रकाशित 

कलक्टर साहब! यह सड़क ठीक करवाओ

श्रीमान, जिला कलक्टर
श्रीगंगानगर।
इन दिनों आप शिव चौक होते हुए जिला अस्पताल गए हैं तो यकीनन आपको हालात की जानकारी होगी। अगर नहीं गए हैं तो आप एक बार इस सड़क से जरूर गुजरें। पखवाड़े भर से ज्यादा समय से इस सड़क पर इंटरलॉकिंग का काम बंद पड़ा है। एक तरफ तो सड़क के किनारे कहीं पर खोद कर तो कहीं पर कंकरीट डाल कर छोड़ दिया गया है, जबकि दूसरी तरफ इंटरलॉकिंग का काम भी आधा अधूरा ही हुआ है। यूआईटी ने पता नहीं क्या सोच कर इस बीच के टुकड़े की इंटरलॉकिंग करवाने का तय किया? जबकि इस जगह पर जबरदस्त अतिक्रमण हैं। वैसे तो अतिक्रमण की मार से समूचा श्रीगंगानगर शहर ही प्रभावित है, लेकिन इस मार्ग पर तो रेत व बजरी का कारोबार खुलेआम सड़क पर होता है। रेत व बजरी से भरे ट्रकों के कारण इस मार्ग पर रोज जाम लगता है। वैसे भी यह अति व्यस्त मार्ग है जो श्रीगंगानगर को सूरतगढ़ और बीकानेर से जोड़ता है। हिसाब से तो यूआईटी को इस मार्ग से अतिक्रमण हटाने तथा तमाम औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही यह काम शुरू करवाना था, लेकिन पता नहीं न्यास का क्या मकसद रहा कि आनन-फानन में यह काम शुरू करवा दिया गया। इस जल्दबाजी का अंजाम यह हुआ कि वन विभाग की आपत्ति के बाद यह काम रुक गया। अब यूआईटी के अधिकारी बीकानेर व जयपुर के बीच एनओसी लेने के लिए चक्कर लगा रहे हैं। नियमानुसार इंटरलॉकिंग करवाने का काम यूआईटी का है ही नहीं। फिर भी उसने करवाना तय किया तो पूरी तैयारी करनी चाहिए थी। खैर, यूआईटी की इस नासमझी का खमियाजा आमजन व वाहन चालकों को भुगतना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं इंटरलॉकिंग और सड़क के बीच जो डिवाइडर बनाया जा रहा है, जानकारों के अनुसार वह किसी का काम नहीं है। इससे सड़क और संकरी हो गई है तथा इंटरलॉकिंग की जगह अतिक्रमण फिर पसरने लगा है। यह डिवाइडर अतिक्रमण करने वालों के लिए एक तरह से सुरक्षा दीवार बन गया है। इसने सड़क व अतिक्रमण प्रभावित क्षेत्र को दो भागों में बांटने का काम किया है। इस डिवाइडर के कारण सड़क सिकुड़ गई है, जिससे राहत की बजाय यह काम और ज्यादा बिगड़ गया है। यदि डिवाइडर नहीं बनाया जाता तो सड़क और इंटरलोकिंग टाइल्स का मिलान हो जाता, जिससे सड़क की चौड़ाई बढ़ जाती और वाहन चालकों को सुविधा होती। अभी पिछले दिनों आई मामूली बरसात से डिवाइडर की वजह से सड़क पर पानी भी भरा। वैसे देखा जाए तो इस मार्ग पर इंटरलॉकिंग के काम व डिवाइडर की जरूरत ही नहंी थी। इस मार्ग पर अतिक्रमण हटाना सबसे जरूरी काम था, लेकिन यूआईटी ने इस मामले में आंखें क्यों मूंद रखी हैं, यह सवाल भी खड़ा हो रहा है। यह बिना जरूरत का काम करवाकर यूआईटी ने आमजन को तकलीफ में डाला है। एक तरह से यह राजकीय राशि का दुरुपयोग भी है।
आप इस मार्ग का न केवल निरीक्षण करें, बल्कि विशेषज्ञों से रिपोर्ट भी बनवाएं ताकि पता चले कि यह अनुपयोगी डिवाइडर भविष्य में कितना परेशानी भरा होगा? यह हादसों का वाहक बनेगा। बरसाती पानी की निकासी कैसे व कहां से होगी? लगता नहीं कि यूआईटी ने इन परेशानियों के बारे में सोचा भी होगा। जो विभाग निर्माण कार्य संबंधी औपचारिकता पूरी नहीं कर रहा है, लगता नहीं है कि उसने आगे की बात सोची होगी। आपसे आग्रह है कि इस सड़क को अतिक्रमण मुक्त कर बंद पड़े काम को शुरू करवाएं। रोजाना इस मार्ग से गुजरने वाले तथा व्यवस्था को कोसने वाले लोग यकीनन आपको दुआ देंगे। आप संजीदा शख्स हैं तथा समस्या का समाधान करवाने शिद्दत से करवाने की सोच रखते हैं। उम्मीद है इस मामले में भी आपका संजीदापन दिखाई देगा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 14 मई 18 के अंक में प्रकाशित