Wednesday, January 31, 2018

पदमावत के बहाने

बस यूं ही
पदमावत फिल्म को लेकर जो शोर था वह रफ्ता-रफ्ता कम हो रहा है। हालांकि कुछ लोग अभी भी मुखर हैं जबकि कुछ दबे स्वर में स्वीकारने लगे हैं कि फिल्म में कुछ गलत नहीं हैं। मैंने अभी तक फिल्म नहीं देखी है। लेकिन दो सजातीय बंधुओं से मैसेंजर व व्हाट्सएप पर हुआ वार्तालाप मौजूं लगा। देखिए क्या है माजरा....।
पहला वार्तालाप
बात बीते शनिवार-रविवार की दरम्यिानी रात करीब सवा बारह बजे की है। मोबाइल पर मैसेंजर में एक मैसेज डिस्प्ले हुए। देखा तो यह सजातीय बंधु का था। (नाम जानबूझकर नहीं लिख रहा हूं )
मैसेज था 'फालतू का बवाल मचा दिया पदमावत पर'
मैं आशय समझ चुका था लिहाजा मैंने वापस सवाल किया। ' देख ली क्या आपने? कैसी लगी आपको?'
जवाब आया 'शानदार। कहीं भी राजपूती मान के साथ छेड़छाड़ नहीं'
मैंने कहा ' फिर एेसा क्या है जो सेनाएं विरोध कर रही हैं'
जवाब आया ' फिल्म पदमावती के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म में कोई गलत सीन नहीं है। सेनाओं का विरोध समझ से परे है।'
मैंने कहा कि ' पदमावती के नाम पर कहीं लोकप्रिय होना तो नहीं?'
जवाब आया 'पदमावती के सौन्दर्य के साथ-साथ उसके बुद्धिमानी का अनूठा संगम दिखाया गया है।'
मैंने फिर सवाल दागा ' बात बनी नहीं, शायद विरोध इसीलिए तो नहीं कहीं?'
अब थोड़ा विस्तार से जवाब आया ' गोरा बादल के साहस को दिखाया गया है। पर वो कुछ ही देर के लिए है जब दिल्ली से रतन सिंह को छुड़ा कर लाते हैं।' 'बात बनी ही नहीं या फिर हो सकता है फिल्म की पब्लिसिटी के लिए ड्रामा हो।' 'फिल्म में अलाउद्दीन की सोच और रणनीति पर पदमावती भारी है।'
मैंने दूसरे वाक्य के जवाब में कहा ' हां यह हो सकता है।'
फिर मैसेज आया ' फिल्म में राजपूती शौर्य मर्यादा और युद्ध में उसूलों के साथ लड़ाई को प्रदर्शित किया गया है।' ' बात बनी नहीं यह तो पता नहीं पर फिल्म में राजपूती मान पर कहीं कोई आंच नहीं है।' ' हां फिल्म को बाहुबली की तरह टच देने की कोशिश की गई है। तकनीक का शानदार प्रयोग किया गया है।' 'आप भी देखें।'
मैंने जवाब लिखा ' देखता हूं।'
इसके बाद फिर मैसेज आया ' और एक रिक्वेस्ट छोटे भाई की।' ' सेनाओं पर जरूर टिप्पणी कीजिएगा, ताकि इनको कुछ आइना दिखाया जा सके।'
इसके बाद मेरे को फिल्म का लिंक भेजा गया और साथ में मैसेज आया ' इस लिंक पर आप मूवी देख सकते हैं।'
मैंने ' ठीक है' लिखा और हमारा वार्तालाप समाप्त हो गया।
दूसरा वार्तालाप
यह वार्तालाप व्हाट्सएप का है । पदमावत के समर्थन में यह बंधु भी मेरे को काफी कुछ मैसेज कर चुके है। यह घटनाक्रम लंबा है। आज की ही बात करते हैं।
मैसेज आया ' कुछ पन्ने इतिहास के मेरे मुल्क के सीने में शमशीर हो गए, जो लड़े, जो मरे वो शहीद हो गए जो डरे जो झुके वो वजीर हो गए।' इसके साथ दो ब्लेक एंड व्हाइट फोटो भी आए। एक फोटो में कुछ लोग बैठे हैं, जिनके पैरों में बेडि़या हैं। दूसरा फोटो देश के पुराने नेताओं का था। 
इसके बाद एक लिंक आया और लिखा कि इस लिंक पर साइन करें। इसके नीचे ही एक और मैसेज आया ' सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का लाइव टेलीकास्ट हो इसके लिए चेंज ओआरजी पर पिटीशन है। जितने ज्यादा साइन होंगे उतना ही ये मुद्दा मजबूत होगा और मजबूरन सरकार को लाइव दिखाना पड़ेगा। हर कार्यवाही को संसद की तरह।' जवाब में मैंने ईटीवी का एक लिंक भेज दिया। दरअसल यह लिंक ईटीवी के एक कार्यक्रम की फुटेज थी। इसमें राजस्थान व गुजरात के दो इतिहासकारों राजेन्द्रसिंह खंगारोत व बीएल गुप्ता के हवाले से बताया गया है कि उन्होंने श्री श्री रविशंकर के कहने पर यह फिल्म बैंगलुरू में देखी है। दोनों इतिहासकारों ने फिल्म को हरी झंडी देते हुए कहा कि फिल्म में आपत्तिजनक कुछ नहीं है। परम्परा के नाम पर इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए। खैर, यह लिंक जैसे ही मैंने भेजा। तत्काल जवाब आया ' बकवास' आगे लिखा ' सबसे बड़ी रकम मिली है इनको।' ' मैं नहीं मानता' तीसरा मैसेज आया ' लगता है फिल्म देखनी पड़ेगी' इसके बाद हंसी का इमोजी आया। अगला मैसेज था ' अनचाहे मन से केवल समीक्षक के तौर पर।' मैंने फिर कहा 'आपको सब बिके हुए लगते हैं, फिल्म देखो।' उनका कहना था ' जरूर, आज ही डाउनलोड करता हूं।' मैंने कहा ' मैं भी देखता हूं टाइम निकाल कर।' अगला मैसेज आया ' जरूर। देखने के बाद ही कुछ कहूंगा। तब तक इस मुद्दे पर मौन।' ' लेकिन टाकीज में मत जाना। हाथ जोडऩे का इमोजी के साथ आगे लिखा निवेदन है।' मैंने कहा श्रीगंगानगर में यह फिल्म नहीं लगी है। हालांकि इसका लिंक मेरे पास है पर मैं देख नहीं पाया। उस पर उन्होंने कहा ' आज देखना। लिंक मुझे भी भेजें।' मैंने लिंक भेज दिया तो उनका अगला मैसेज आया ' कृपया इस चैनल को एक भी स्टार के साथ रेंटिंग कराने में महत्वपूर्ण योगदान दें।' इसके बाद दो टीवी चैनल से संबंधित लिंक थे। फिर मैसेज आया ' लिंक पर जाकर रिव्यू ऑप्शन में पांच स्टार में से पहले वाले स्टार पर क्लिक कर दो और ऊपर पोस्ट का ऑप्शन आएगा, पोस्ट कर दो। रिव्यू के लिए मोर में जाना पड़ेगा।' मैंने कहा ' मैं टीवी देख नहीं पाता' वो बोले ' पर इतना काम तो करना चाहिए।' मैंने कहा ' फुर्सत ही नहीं मिलती।' सामने से एक हंसने का तथा हाथ जोड़े का इमोजी आया और वार्तालाप खत्म हो गया।
बहरहाल, पदमावत जब तक प्रदर्शित नहीं हुई थी तब कुछ और कहा जा रहा है लेकिन अब कुछ और कहा जा रहा है। मतलब विरोध जारी रखना है। चाहे वह किसी भी बहाने से हो। ठीक उस भेडि़ये की तरह जो एक मेमने पर पहले तो गाली देने का आरोप लगता है। फिर पानी गंदा करने का। लेकिन जब दोनों ही आरोप खारिज हो जाते हैं तो वह कह उठता है, मेरे को तो तेरा शिकार करना है। इतना समझ ले। मुझे पदमावत राग भी कुछ-कुछ नहीं बहुत कुछ एेसा ही प्रतीत हो रहा है।

पाक ने जीरो लाइन के पास लगाया डेढ़ सौ फीट ऊंचा टावर

बीते रविवार को सपरिवार पंजाब के फाजिल्का जिले से लगता बॉर्डर देखने गया। सादकी पोस्ट पर यह टावर देखा तो चौंक गया। पिछले साल तो ऐसा कुछ नहीं था यहां। पता किया तो बताया कि पड़ोसी मुल्क इस टावर पर अपना राष्ट्रीय ध्वज लगाएगा। चर्चा इस बात की भी थी कि यह सब अटारी बॉर्डर पर लगाए गए विशालकाय तिरंगे की नकल है। खैर जीरो लाइन के उस पार टावर पर झंडा लगाने की तैयारी चल रही है। संभवत: पांच फरवरी को झंडा लगाने का कार्यक्रम है। बस फिर क्या था यह सूचना अपने लिए खबर थी....झट से टावर का फोटो खींचा और कल सोमवार को खबर लिख दी। यह खबर आज 30 जनवरी 18 के अंक में राजस्थान पत्रिका के विभिन्न संस्करणों में प्रकाशित हुई है। श्रीगंगानगर संस्करण में भी..।
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श्रीगंगानगर. पड़ोसी प्रदेश पंजाब के फाजिल्का जिले से लगती भारत-पाक अंतराष्ट्रीय सीमा स्थित सादकी पोस्ट के पास जीरो लाइन के एकदम नजदीक पाकिस्तान की ओर से आनन-फानन में एक बड़ा टावर लगाया गया है। जीरो लाइन के उस पार इन दिनों हलचल भी बढ़ गई है। पाक चौकी व दर्शक दीर्घा के रंग-रोगन किया गया है। विदित रहे कि इस पोस्ट पर बीएसएफ व पाक रेंजर के मध्य रोजाना रिट्रीट सेरेमनी होती है। इस टावर के लिए पिछले माह दर्शक दीर्घा के पास गड्ढा खोदा गया था, तब भी अच्छी-खासी चर्चा हुई थी। इसके बाद क्रेन की मदद से यह टावर खड़ा किया गया और अब यह तैयार है। करीब डेढ़ माह में लगाया यह टावर वहां जाने वालों के मन में ताज्जुब पैदा करता है। हालांकि, इसको लेकर कोई आधिकारिक रूप से बोलने को तैयार नहीं। लेकिन, इस बात की चर्चा जोरों पर है कि पाक यहां अपना राष्ट्रीय झंडा लगाएगा। इसके लिए बाकायदा पांच फरवरी का दिन प्रस्तावित है।
श्रीगंगानगर से 90 किमी दूर है सादकी
सादकी सीमा पोस्ट पंजाब के फाजिल्का जिले में है। यह श्रीगंगानगर से सड़क मार्ग से 90 किलोमीटर दूर है। रिट्रीट सेरेमनी के कारण यह सादकी पोस्ट धीरे-धीरे चर्चा में आ रही है। अटारी बॉर्डर के बाद यहां भी अब काफी लोग आने लगे हैं। विशेषकर, पंजाब के अबोहर व फाजिल्का क्षेत्र के अलावा श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ के लोग यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। अटारी बॉर्डर से नजदीक होने के कारण भी लोग यहां जाना ज्यादा पसंद करते हैं।
कहीं नकल तो नहीं ?
चर्चा इस बात की भी है पड़ोसी मुल्क अंतराष्ट्रीय सीमा पर इतना ऊंचा झंडा लगाकर भारत की नकल करना चाहता है। दरअसल, भारत ने पिछले साल पंजाब में ही अटारी बॉर्डर पर विशालकाय झंडा फहराया था, तब पाकिस्तान रेंजर्स ने इसका विरोध भी किया था। बताया जा रहा है कि सादकी पोस्ट पर इतना बड़ा टावर लगाने के पीछे एक तरह की नकल ही है। विदित रहे कि भारत का झंडा 350 फीट की ऊंचाई पर फहराया जा रहा है। इस झंडे की लंबाई 120 फीट है और चौड़ाई 80 फीट है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में  30 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित।

सत्रह साल बाद

यह कहानी सत्रह साल पहले की है। तब मैं ठीक से हिन्दी भी नहीं बोल पाता था। इसका बड़ा कारण था ग्रामीण जीवन में रहना और शिक्षा ग्रहण करना। पहली बार न केवल जिले से बाहर निकला बल्कि राज्य से बाहर भोपाल गया था। वहां लगभग साथी शहरी माहौल से थे। कुल सत्रह जनों का ग्रुप था। सभी देश के विभिन्न हिस्सों से थे। कोई भोपाल से तो कोई इंदौर से। कोई रायपुर से तो कोई सागर से। कोई भरतपुर से तो कोई जयपुर से। संयोग से इस ग्रुप में तीन जने मेरे जैसे ही थे। यह तीन साथी झुंझुनूं, चूरू व बीकानेर के थे और तीनों ही मेरी तरह ग्रामीण परिवेश में पले पढ़े। इस कारण मन थोड़ा बहुत लग गया। सभी के सभी पत्रकारिता का ककहरा सीखने के उद्देश्य से आए थे। इन सत्रह साथियों में तीन युवतियां भी थीं। भोपाल से लीना वर्मा, रायपुर से दिव्या तिवारी और इंदौर से श्रुति अग्रवाल।
लीना व दिव्या सामान्य परिवार से थी लेकिन श्रुति के पिता सेल्स टेक्स अधिकारी थे। पापा की प्यारी थी और बेटे जैसा ही लाड प्यार मिला लिहाजा, उसकी लाइफ स्टाइल और तौर तरीके शेष दोनों युवतियों से इतर थे। आत्मविश्वास तो गजब का। पत्रकारिता के प्रशिक्षण काल के दौरान ही श्रुति का जन्मदिन आया। हम सभी साथी तो इस बर्थ डे पार्टी के गवाह बने ही। विशेष रूप से श्रुति के पिता भी इस खुशी के मौके पर वहां पर पहुंचे थे। चूंकि भोपाल से इंदौर की दूरी ज्यादा नहीं है लेकिन यह प्रशिक्षण आवासीय था, लिहाजा हम सब वहीं रहते थे। संयोग से मेरा जन्मदिन भी उसी दौरान आया। मुझे याद है सभी साथियों की ओर से बतौर गिफ्ट मुझे एक शर्ट उपहार दिया गया था। गिफ्ट पंसद करने वालों में श्रुति भी थी। (सत्रह साल पहले की फोटो में जो शर्ट पहन रखी है, वही शर्ट मिला था गिफ्ट में) खैर, प्रशिक्षण के बाद हम सभी अलग-अलग हो गए। लेकिन पहले फोन से तथा बाद में सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े रहे। आज भी हम सभी साथियों का फेसबुक पेज पर ग्रुप है जबकि व्हाट्स एप पर भी सभी जुड़े है। हम भले ही अलग अलग संस्थानों में काम करते रहे लेकिन हम सभी का एक दूसरे से संपर्क है। श्रुति प्रिंट के बाद टीवी पत्रकारिता में आ गई लेकिन शादी के कुछ समय बाद पत्रकारिता को छोड़कर डॉक्टर पति के साथ न्यूजीलैंड शिफ्ट हो गई। अपरिहार्य कारणों से पूरे परिवार को कुछ समय बाद वापस भारत लौटना पड़ा। चूंकि पत्रकारिता श्रुति के लिए जुनून है, लिहाजा उसने फिर से पत्रकारिता शुरू की लेकिन यहां भी ज्यादा समय नहीं दे पाई। अपने किसी ड्रीम प्रोजेक्ट के कारण श्रुति को सक्रिय पत्रकारिता से फिर हटना पड़ा। इस बीच उसकी एक लघु फिल्म भी आई। श्रुति विशेषकर संवेदनशील, समसामयिक व महिला सशक्तीकरण जैसे विषयों पर अच्छी पकड़ रखती है। वह अपनी टीम के साथ इन दिनों जयपुर लिट्रेचर फेस्ट में आई थी। जयपुर के साथियों से मिलने के बाद श्रुति का घुमंतू मिजाज तथा बॅार्डर देखने की चाह उसे जयपुर से श्रीगंगानगर ले आया। हां हमारी श्रीमती निर्मल भी श्रुति से काफी समय से फेसबुक पर जुड़ी हैं, लिहाजा दोनों के बीच भी मधुर रिश्ते बन गए हैं। दो दिन के लिए श्रुति हमारी मेजबानी में श्रीगंगानगर में हैं। फिलहाल वह श्रीगंगानगर की सर्दी इस कदर परेशान है कि सुबह से ब्लोअर के आगे बैठी हैं। खैर, सत्रह साल बाद की मुलाकात में मुझे श्रुति में कोई भी बदलाव नजर नहीं आया लेकिन सुबह रेलवे स्टेशन पर गाड़ी से उतरते समय उसकी पहली टिप्पणी थी। 'आप तो बिलकुल बदल गए। अंकल जी लगने लगे हो।' और मैं जवाब सुनकर मुस्कुरा भर दिया।
नोट : दोनों के सत्रह साल पहले और अब के फोटो।

इक बंजारा गाए-18


🔺हींग लगे न फिटकरी
अपने काम का प्रचार करना नेताओं का पुराना शगल रहा है। जगह-जगह लगे शिलान्यास व उद्घाटन के शिलापट्ट इस बात की गवाही भी देते हैं। श्रीगंगानगर शहर की सरकार के एक नेताजी को तो नाम का इतना जबरदस्त शौक है कि कार्यक्रम में जाने की पहली शर्त ही यह रखते हैं कि उनके नाम का शिलापट्ट जरूर होना चाहिए। आयोजक जब कार्यक्रम पर इतनी राशि खर्च करते हैं तो लगे हाथ शिलापट्किा भी बनवा रहे हैं। शिलापट्टिका भी कोई कामचलाऊ न होकर बाकायदा गुणवत्ता वाले मार्बल की बनवाई जा रही है। कोई कुछ भी कहे या सोचे लेकिन आयोजकों की मजबूरी का फायदा नेताजी जमकर उठा रहे हैं। जेब से एक कौड़ी भी खर्च नहीं हो रही है जबकि प्रचार पूरा हो रहा है। इसी को कहते हैं हींग लगे फिटकरी रंग चोखा ही चोखा।
🔺खुद का प्रचार
नाम की भूख भला किसको नहीं होती। इस भूख के चक्कर में लोग तरह-तरह के जतन करने से गुरेज नहीं करते। बस किसी तरह का रास्ता या माध्यम मिलना चाहिए, फिर देखो। अगर रास्ता या माध्यम फ्री का हो तो फिर कहना ही क्या। श्रीगंगानगर में इन दिनों एक धार्मिक कार्यक्रम है। वैसे शहर में इस तरह के कार्यक्रम कई होते हैं लेकिन इस कार्यक्रम की बात ही निराली है। इस कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार में समूचे शहर को रंग दिया गया है। खास बात यह है कि प्रचार-प्रसार की इस होड़ में लोग अपने प्रतिष्ठानों का प्रचार करने से भी नहीं चूक रहे हैं। परिषद के अधिकारी भी अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। उन्होंने निशुल्क अनुमति धार्मिक कार्यक्रम के प्रचार को लेकर दी थी लेकिन होर्डिंग्स के नीचे व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बड़े-बड़े नाम देखकर उनकी भौंहें टेढ़ी हो रही हैं।
🔺सपनों के सौदागर
श्रीगंगानगर में एक सेठजी को आजकल सपनों का सौदागर कहा जाता है। इसका कारण है कि सेठजी सपने-सपने बड़े बड़े दिखाते हैं। सपने पूरे नहीं होते यह अलग बात है, लेकिन सपने दिखाने का काम बदस्तूर जारी है। उनका चार-पांच साल पहले दिखाए गए सपनों पर फिलहाल संकट के बादल हैं। भले ही उन्होंने अपने स्तर पर यह प्रचारित करने का प्रयास किया कि वह सपना साकार करने के लिए प्रयासरत है लेकिन जनता के अब सब समझ आने लगा है। सेठजी ने पिछले सप्ताह एक शिगूफा फिर छोड़ा है। शिगूफा भी एक तरह का बड़ा सपना ही है। इसमें इकलौता श्रीगंगानगर ही नहीं बल्कि तीन जिले और भी हैं। अब इस बड़े सपने की सफलता पर शक इसलिए होता है कि सपने का राजदार सेठजी ने केवल एक समाचार पत्र को ही बनाया। बाकियों को क्यों नहीं? फिर उसी दिन, उसी समय सेठ जी ने पत्रकारों को चाय-पकोड़ों के लिए भी बुला रखा था। ऐसे में यह सवाल बड़ा हो गया है!
🔺साहब का पीआरओ
वैसे तो सरकार के कामकाज के प्रचार-प्रसार के लिए बाकायदा एक पीआरओ होता है जो पत्रकारों व सरकार के बीच समन्वयक या यूं कहें कि सेतु का काम करता है। इसके अलावा निजी क्षेत्र में भी बहुत से संगठन व संस्थाएं भी अपने यहां पीआरओ रखते हैं। अब कुछ अधिकारी अपने स्तर पर भी पीआरओ रखने लगे हैं। उनके काम की, कार्रवाई की या कहीं पर कार्यक्रम की सूचना के आदार-प्रदान का यह काम पीआरओ ही करता है। श्रीगंगानगर शहर में खाकी के अधिकारी को भी पीआरओ रखने का जबरदस्त शौक है। इन अधिकारी महोदय से कोई खबर या कार्यक्रम के बारे में जानकारी मांगें तो झट से पीआरओ का नाम ले देते हैं। और तो और सभी तरह की सूचनाएं भी इस पीआरओ को पहले होती हैं। अब पीआरओ बाकी खबरनवीसों की आंखों में खटक रहा है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 25 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित..।

मुर्दे भी सुरक्षित नहीं!

टिप्पणी
श्रीगंगानगर के पदमपुर रोड स्थित श्मशान (कल्याण भूमि) में दर्जनों कब्र खुदने तथा शव गायब होने का हैरतअंगेज मामला सामने आने के बावजूद अभी तक पहेली ही बना हुआ है।रहस्य से अभी पर्दा उठाना बाकी है, लेकिन इतना तय है कि इस अमानवीय कृत्य के पीछे बड़ा कारण मानवीय लापरवाही भी रही है। कल्याण भूमि की अधिकतर कब्रें कोई एक रात में तो खुदी नहीं। मौकास्थल के हालात से यह जाहिर भी होता है कि यह शर्मनाक व कुत्सित कृत्य लंबे समय से हो रहा था। शर्मसारकरने वाले इस कृत्य को लेकर अब कई तरह की शंकाएं व चर्चाएं हैं। मसलन, कोई इसे श्वानों से जोड़ रहा है तो कोई तांत्रिक विद्या की तरफ इशारा कर रहा है। कोई इसका संबंध मानव तस्करी से बता रहा है तो कोई किसी नरभक्षी की आशंका जता रहा है। कोई इसे नशेडिय़ों की कारस्तानी भी प्रचारित कर रहा है। जितने मुंह, उतनी बातें और उतनी ही शंकाएं व चर्चाएं हैं लेकिन यह सब क्यों व कैसे हुआ, यह अभी राज ही है। कल्याण भूमि में मिले कपड़े, शराब की खाली बोतलें, बर्तन, हड्डियां आदि इस प्रकरण को गंभीर बनाते हैं। इस समूचे घटनाक्रम को श्वानों से जोड़कर ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है लेकिन क्या श्वान कब्र पर रखे भारी पत्थर को उठा सकता है? कब्र पर रखे जाने वाले नमक के कट्टे को खिसका सकता है? यह कैसे संभव है कि श्वान कब्र खोदकर शव खा जाए लेकिन जिस कपड़े में शव को लपेटा जाता है, वह बिल्कुल भी कटे-फटे नहीं? शराब की खाली बोतलों एवं जले हुए बर्तनों से श्वानों का क्या वास्ता? खैर, इन सभी सवालों से पर्दा कारगर व मुकम्मल जांच के बाद ही उठेगा। सवाल तो कल्याण भूमि की देखरेख करने वाली कमेटी पर भी उठ रहे हैं। इस तरह का घिनौना खेल लंबे समय तक चलता रहा लेकिन कमेटी व उसके पदाधिकारी अनजान ही रहे। बहरहाल, अब वह सब होगा जो इस बड़ी लापरवाही की वजह बना। हो सकता है अब कल्याण भूमि में सुरक्षाकर्मी तैनात हो जाएं। आसपास की दीवारों को ऊंचा कर दिया जाए। सीसीटीवी कैमरों का दायरा तक बढ़ा दिया जाए। रात को रोशनी की व्यवस्था हो जाए, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद होना ही पर्याप्त नहीं है। इससे भी कहीं ज्यादा जरूरी है इस प्रकरण में रही खामियों का खुलासा होना। कल्याण भूमि की व्यवस्था देखने वालों के कामकाज व भूमिका की भी बिना किसी दबाव व गहनता से जांच होना। भविष्य में इस तरह का अमानवीय कृत्य न हो इसलिए जरूरी यह भी है कि लापरवाहियों से सबक लिया जाए। इस कल्याण भूमि के साथ-साथ शहर के अन्य श्मशानों व कब्रगाहों की सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त तो हर हाल में तत्काल प्रभाव से जरूरी हैं। क्योंकि जहां मुर्दे ही सुरक्षित नहीं हैं, वहां जान माल किसके भरोसे महफूज है, यह सवाल बड़ा है!

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 25 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित

हे सेनापतियों, यह खेल अब बंद कीजिए...

हे सेनाओं के सेनापतियों बहुत हो चुका अब बंद कीजिए। देश ने आपकी हुंकार सुन ली। गर्जना व चेतावनी सुन ली। तर्क-दलीलें व बड़े बड़े बयान तक सुन लिए लेकिन आप न्यायालय से बड़े नहीं हैं। देश में न्यायालय से आगे कुछ नहीं है। वहां जाकर सब रास्ते बंद हो जाते हैं। सारे विकल्प खत्म हो जाते हैं। फिर भी आपको लगता है कि आपके साथ न्याय नहीं हुआ तो क्या आप वह रास्ता अपनाएंगे, जो कानून की दृष्टि में अनुचित हैं। आप तोडफ़ोड़ करेंगे। आप आगजनी करेंगे। आप रास्ता रोकेंगे। बसों पर पथराव करेंगे। क्या एेसा करने से फिल्म का प्रदर्शन रुक जाएगा या सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला पलट देगा। तोडफ़ोड़ कोई भी करे। आप करें, आपके सैनिक करें या आपके नाम पर कोई और कर जाए लेकिन एेसा करना कानून सम्मत नहीं है। पता है इस तरह के हथकंडे से बदनाम आपकी सेनाएं नहीं कौम हो रही है। वह कौम जिसके आधे से ज्यादा तबके को तो इतिहास की ठीक से समझ तक नहीं है । उनके लिए रोजगार और दो जून की रोटी का जुगाड़ पहली प्राथमिकता है। हे सेनापतियों कौम की इतनी बदनामी तो शायद फिल्म बिना किसी विरोध के चुपचाप प्रदर्शित हो जाती तो भी नहीं होती। मान, सम्मान, स्वाभिमान, बलिदान, वीरता और भी न जाने क्या-क्या हवाला देकर आपने भावनाओं की चासनी मिलाकर इस मसले को सेनाओं के साथ-साथ कौम का सवाल बना दिया। जिस तरह आज एक गौरवशाली कौम की चैनल, चौक, चौराहों व चर्चाओं में आलोचना हो रही है, कौम को जलील किया जा रहा है, उसका जिम्मेदार कौन? हे सेनापतियों फिल्म को अस्मिता का सवाल बनाने से पहले क्या आपने समाज की स्वीकृति ली? क्या समाज ने आपको इस तरह की लड़ाई लडऩे की जिम्मेदारी सौंपी? क्या आपने सेनाओं का गठन समाज की स्वीकृति से किया? क्या आप सभी सेनापतियों का चयन लोकतांत्रिक तरीके से हुआ? आपने खुद ने अपना चुनाव कर लिया। मनमर्जी से सेनाएं बना ली तो फिर समाज के सर्वेसर्वा आप किस हैसियत से बन गए? बहुत हो गया अब बंद कीजिए। भावनाओं में बहा युवा जोश-जोश में कुछ गैरकानूनी काम कर बैठा तो मुकदमा झेलने या जेल में सडऩे आप नहीं जाआेगे। आप सेनापतियों की जिद के आगे त्याग, तपस्या, बलिदान व पुरुषार्थ की पैरोकार रही कौम बदनाम हो रही है, यह बर्दाश्त के काबिल नहीं है। कृपया इस खेल को, इस अध्याय को अब बंद कर दीजिए। इससे खेल से अब सिवाय अपमान, बेइज्जती व छीछालेदर के कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। और इस बहाने आपको सियासत ही करनी है तो करिए, बेशक कीजिए, बेझिझक कीजिए लेकिन कौम को सीढ़ी बनाकर सियासत करना बंद कीजिए। और हां सेनाओं के नाम पर समूचे समाज को गरियाने वालों आप भी यह सब बंद कीजिए। सहन करने की भी कोई सीमा होती है। ये सेनाएं तो एक कौम का हिस्साभर हैं। यह पूरी कौम नहीं हैं। समूची कौम को बदनाम करने का खेल बेहद खतरनाक है। इससे खेलना किसी के भी हित में नहीं है। देश हित में तो बिलकुल भी नहीं।

रामभरोसे श्रीगंगानगर

टिप्पणी
श्रीगंगानगर शहर सुंदर रहे, साफ रहे, स्वच्छ रहे, यह विकास के पथ पर अग्रसर हो, यहां की तमाम तरह की व्यवस्था चाक चौबंद रहे, वे सुचारू रूप से चलती रहें, इसके लिए प्रमुख रूप से नगर परिषद व यूआईटी तो जिम्मेदार हैं ही, व्यवस्थाओं में सहयोग बनाए रखने तथा नियमों व निर्देशों की पालना के लिए आम आदमी की भागीदारी भी जरूरी है। खैर, श्रीगंगानगर के ये दोनों ही विभाग अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन उस प्रकार से नहीं कर रहे हैं, जैसा करना चाहिए। नतीजतन दोनों विभाग की उदासीनता या शह का फायदा हर कोई उठाने को आतुर है। शहर न सुंदर है, साफ है और न ही स्वच्छ दिखाई देता है। पिछले दस दिन से नालियों का पानी सड़कों पर आकर फैल रहा है, लेकिन इस समस्या का कारगर समाधान दिखाई नहीं दे रहा। निराश्रित गोवंश की समस्या तो नासूर बन ही चुकी है। पालतू जानवर भैंस-खच्चर भी रात को शहर की सड़कों पर स्वछंद दौड़ते हैं। बिलकुल बेरोक-टोक। आवारा श्वानों की फौज दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बदस्तूर बढ़ रही है। शहर में जिधर देखो वहां अतिक्रमण की भरमार है। यहां तक कि प्रमुख सड़कें भी अतिक्रमण से अछूती नहीं रही हैं। शिव चौक से जिला अस्पताल तक तो सड़कों पर व्यापार हो रहा है। यातायात भले ही बाधित होता रहे, लेकिन जिम्मेदार आंखें खोलने के लिए तैयार नहीं हैं।
सबसे खराब हालात तो शहर के चौक-चौराहों की हैं। सौन्दर्य को पलीता लगाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहा है। नगर परिषद व यूआईटी के नुमाइंदे खुद शहर को बदरंग करने में आगे हैं, तभी तो वे खुले हाथ शहर को बदरंग करने की छूट भी दे रहे हैं। वर्तमान में नगर परिषद सभापति ने एक धार्मिक संस्था को शहर बदरंग करने की खुली छूट दे दी, वह भी निशुल्क। चूंकि भगवान किसी प्रचार के भूखे नहीं होते हैं, लेकिन संस्था पदाधिकारियों को भगवान से खुद के प्रचार की चिंता ज्यादा है। शहर के अंदर और शहर से भी बाहर हाइवे पर बड़ी संख्या में लगाए गए इन होर्डिंग्स में धार्मिक कार्यक्रम के साथ लगाने वाले अपना व अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान का भी प्रचार भी जम कर रहे हैं। शहर में इस तरह की कई धार्मिक संस्थाएं हैं। क्या नगर परिषद प्रशासन व सभापति भविष्य में उनको भी यह सब निशुल्क करने देंगे? उपकृत करने की यह ' परंपरा' क्या शहर हित में है? शहर के मुख्य चौक-सर्किल्स के अंदर होर्डिंस तो लगाना ही गलत है, फिर भी एक अंधी होड़ की दौड़ मची है। बड़ी मुश्किल से होर्डिंग्स मुक्त हुए चहल चौक व सुखाडि़या सर्किल के हालात फिर से बदत्तर हो गए हैं। जो नियम विरुद्ध है, गलत है, उस पर कार्रवाई करने का साहस यूआईटी व परिषद प्रशासन क्यों नहीं दिखा पाते? यह दोनों विभागों की उदासीनता है, अकर्मण्यता है। मनमर्जी है, शह है या कोई दबाव, लेकिन कुछ तो है जरूर।
बरहाल, इस तरह के हालात से यह प्रतीत होता है कि शहर में व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। नियम कायदों को जेब में रखने वालों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। दोनों जिम्मेदार विभागों ने आंखें मूंद रखी हैं और कानून-नियमों को तोडऩे वाले इस हालात का जमकर फायदा उठा रहे हैं। पूरे प्रशासनिक सिस्टम के मुखिया की खामोशी भी शहरवासियों को अखर रही है। शहर का कोई धणी धोरी दिखाई नहीं दे रहा। राजनीतिक शून्यता व कमजोर नेतृत्व के कारण हालात दिन प्रतिदिन बद से बदत्तर ही हो रहे हैं। वैसे भी शहर में सरकार सर्वदलीय है। सभी के समर्थन चल रही है। यहां विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं है। नियमों के मखौल उड़ाने के इस खेल में सब साथ-साथ हैं। जनप्रतिनिधि, अधिकारी व प्रभावशाली व पहुंच वाले लोग मनमर्जी कर रहे हैं और इधर आमजन इस तरह के हालात से त्रस्त है। परेशान लोग धरना-प्रदर्शन या ज्ञापन देने के सिवाय कुछ करने में सक्षम या समर्थ भी नहीं है। एेसे में बड़ा सवाल यही है कि शहर की सुध लेगा कौन?

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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 21 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित

इक बंजारा गाए-17

मेरे साप्ताहिक कॉलम  में हमेशा की तरह इस बार भी चार.रंग। राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 18 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित....
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सट्टे पर हलचल
श्रीगंगानगर में खाकी की कार्यशैली आजकल ऐसी हो गई है कि कोई शिकायत मिले तो ही र्कारवाई की कुछ उम्मीद बंधती है, अन्यथा कुछ होता नहीं। अब सट्टे का मामला ही ले लीजिए। श्रीगंगानगर में सट्टा पर्ची की बहुत सी दुकानें खुली हुई हैं, लेकिन खाकी को यह सब दिखाई नहीं देती। देती नहीं या जानबूझकर आंखें मंंूद रखी हैं, यह अलग विषय है। बहरहाल, शहर में एक संगठन ने सट्टे के खिलाफ धरना-प्रदर्शन शुरू किया, लेकिन खाकी में कोई हलचल नहीं हुई। खलबली तो तब शुरू हुई, जब सट्टे के खिलाफ अनशन पर बैठे युवकों में से एक की तबीयत बिगड़ गई। आनन-फानन में खाकी ने कुछ दुकानों पर कार्रवाई भी। मतलब दबाव बढ़ा तो सट्टे की दुकानें भी मिल गई। लेकिन अनशन पर बैठने वालों का कहना है कि यह कार्रवाई तो बेहद छिटपुट लोगों पर हुई है। मोटी मुर्गी पर खाकी ने अभी तक हाथ नहीं डाला। देखने की बात यह है कि खाकी का उस ओर ध्यान कब जाता है।
जिम्मेदार कर रहे गड़बड़
कानून व नियम सबके लिए बराबर होते हैं। इनमें छोटे-बड़े, अमीर-गरीब किसी तरह का कोई भेद नहीं होता। लेकिन श्रीगंगानगर के कतिपय जनप्रतिनिधि न केवल खुद नियमों व कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं, बल्कि ऐसा करने की खुले हाथ से छूट भी रहे हैं। मामला शहर के चौक-चौराहों पर होर्डिंग्स लगाने से जुड़ा है। हालात यह है कि शहर के प्रमुख चौक-चौराहों की सुंदरता को बदरंग करने में इन जनप्रतिनिधियों के अलावा सरकारी विभाग खुद भी पीछे नहीं हैं। ऐसी-ऐसी जगह होर्डिंग्स टांग दिए जाते हैं, जो जगह अधिकृत ही नहीं हैं। अब शहर की एक धार्मिक संस्था को होर्डिंग्स लगाने के लिए खुली छूट दे दी गई। इधर, संस्था ने छूट का फायदा यह उठाया कि उसने निर्धारित तिथि से पहले ही शहर के चौक-चौराहों पर सब जगह होर्डिंग्स टांग दिए। सुंदर शहर सभी को अच्छा लगता है लेकिन अपने हित के लिए सुंदरता पर बट्टा लगाने वालों को समझाए कौन ?
अपने-अपने हित
अपने हित देखने वाले तो सभी होते हैं लेकिन परहित देखने वाला लाखों में एक होता है। बात कड़वी जरूर है लेकिन मौजूदा समय में अपना हित देखने वालों का बोलबाला ज्यादा है। हित कई प्रकार के होते हैं। इसलिए जरूरी नहीं कि हित आर्थिक फायदे के लिए ही हो। यह फायदा एक दिन के अवकाश का है। जिला प्रशासन की तरफ से साल में दो अवकाश घोषित किए जाते हैं। इनमें एक अवकाश लोहड़ी पर्व का भी होता है। ऐसा लंबे समय से होता आ रहा है लेकिन इस बार लोहड़ी पर्व पर अवकाश घोषित नहीं किया गया। लोहड़ी पर अवकाश घोषित न करने की वजह जुटाई गई तो चर्चा यह सामने आई कि लोहड़ी के दिन सैकंड शनिवार था। इस दिन सरकारी कार्यालयों में वैसे ही अवकाश होता है। इस दिन अवकाश घोषित किया जाता तो एक दिन का अवकाश मारा जाता है। इस चर्चा में दम है लेकिन उनको पर्व मनाने वालों को यह जिला प्रशासन का यह निर्णय अखरा जरूर।
उधार की आदत
उधार को लेकर न जाने कितने ही किस्से व कहानियां बने हुए हैं। मसलन, उधार मांग कर शर्मिंदा न करें... उधार प्रेम की कैंची हैं... नकदी बड़े शौक से, उधार अगले चौक से आदि-आदि। वैसे किसी धंधे में उधार लेनदेन का काम ज्यादा होता है लेकिन व्यक्तिगत रूप से उधार लेने के उदाहरण भी सब जगह मिल जाएंगे। श्रीगंगानगर भी इससे अछूता नहीं हैं। यहां भी उधार का काम चलता है लेकिन खास बात यह है कि यहां कतिपय कथित खबरनवीस भी उधार लेने में पीछे नहीं हैं। वो यह काम नि:संकोच करते हैं, और देने वाला कैसे भी हो मना करता भी नहीं है। हालांकि, उधार की राशि अंगुलियों पर गिनने लायक होती है, बोले तो पांच सौ से भी कम। इससे भी बड़ी बात उधार देने वालों के नाम सुनकर हो सकती है। उधारी भी खाकी या शराब ठेकेदारों से से ली जाती है। राशि बड़ी नहीं होती, लिहाजा देने वाला यह सोचकर खुश कि चलो सस्ते में निबट गया और लेने वाला इसीलिए कि इतनी छोटी राशि को कौन याद रखता है।

मलाल : न तब मिला न अब

स्मृति शेष
यह कितनी विचित्र समानता है। मैं तब भी श्रीगंगानगर था, जब उनकी किस्मत का सितारा उदय हुआ। और आज भी श्रीगंगानगर हूं जब उनके जीवन का सूर्य अस्त हो गया। मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं मिला। बस किस्सों के आधार पर ही मैंने उस शख्स की छवि बनाई। कल मकर संक्रांति के दिन वह शख्स दुनिया को अलविदा कह गया। आज उस शख्स की पार्थिव देह पंचतत्व में विलीन हो गई लेकिन वह शख्स आज किस्सों में जिंदा है। किसी के संस्मरणों में जिंदा है तो किसी की यादों में। करीब एक दशक से गुमनाम सा जीवन जी रहे इस शख्स की अंतिम यात्रा में उमड़े लोग व उनकी भीगी पलकें इस बात की गवाही दे रही थी कि वाकई वह दिलों में बसा था। विडम्बना देखिए जिस राजनीति ने इस शख्स को अर्श तक पहुंचाया, उसी राजनीति के कारण वह पुन: फर्श पर आया। मूलत: विद्रोही स्वभाव के इस शख्स का नाम था सुरेन्द्रसिंह राठौड़। डेढ़ दशक पूर्व जब मैं श्रीगंगानगर आया तब राठौड़ के नाम डंका बजता था। विशेषकर कर्मचारी-अधिकारी उनके नाम से खौफ खाते थे। कमजोर तबके की मुखर आवाज का नाम था सुरेन्द्र सिंह राठौड़। किसी जरूरतमंद ने उनके दर पर दस्तक दी या देर रात दरवाजा खटखटाया वह फिर निराश नहीं लौटा। राठौड़ उसके साथ हो लेते। उनके इसी स्वभाव ने उनको कमजोर, दबे-पिछड़े वर्ग के बीच लोकप्रिय बनाया लेकिन संभ्रांत लोगों व कानून के नजरों में यह सब सही नहीं था। दरअसल, ऑन द स्पॉट फैसला लेने की उनकी शैली ही विवादों को जन्म देती थी। वैसे विवादों से उनका नाता कभी छूटा भी नहीं। मुझे डेढ दशक पूर्व की कई बातें याद हैं। एक बार प्रेस वार्ता में उन्होंने कह दिया था कि आजकल अखबारों में पत्रकार न होकर नेताओं के मुखबिर बैठे हैं। उनका यह बयान तब बेहद चर्चित रहा था, लेकिन उसमें काफी कुछ सच्चाई थी। वह विधायक बने तब भी मैं श्रीगंगानगर ही था। उनकी रिकॉर्डतोड़ मतों से वह जीत आज भी लोगों के जेहन में है। हालांकि कुछ लोग आज भी राठौड़ की जीत को अपनी भूल मानते हैं और साथ में आरोप लगाते हैं कि जिस उम्मीद से उनको विधायक बनाया गया वे उस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे और उनकी राजनीतिक उदासीनता के कारण श्रीगंगानगर दस साल पीछे चला गया। आरोप तो उनकी विवादित छवि पर भी लगे। इस छवि के कारण उनको कई एेसे नाम भी मिले जो संभ्रात लोगों में सही नहीं माने जाते। 
यह भी निर्विवाद रूप से सत्य है कि 1993 में राठौड़ का राजनीति कॅरियर उठान पर था लेकिन दिग्गज भाजपा नेता भैरोसिंह शेखावत ने जब श्रीगंगानगर से चुनाव लडऩे का मानस बनाया। तब राठौड़ समझाने के बावजूद मैदान में डटे रहे। इसका नुकसान यह हुआ कि उनको बाद में विधायक बनने के लिए दस साल और लग गए। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि राठौड़ तब मैदान से हट जाते तो शायद उनका राजनीतिक कद और बढ़ जाता लेकिन जुबान के धनी तथा कथनी व करनी में अंतर न करने वाले राठौड़ को यह गवारा न हुआ। उसी चुनाव से जुड़ा एक किस्सा भी काफी चर्चित है कि शेखावत की सभा के लिए लोग एकत्रित थे। राठौड़ वहां से गुजरे उन्होंने भीड़ को घंटे भर संबोधित भी कर दिया। जब उनको हकीकत बताई गई तो उन्होंने कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है, पांडाल में बैठे लोग तो श्रीगंगानगर के ही है। जानकार बताते हैं कि शेखावत की सरकार में तीन निर्दलीय का समर्थन जुटाने में भी राठौड़ का ही हाथ था। यहां तक कि तब निर्दलीय जीते सरदार गुरजंटसिंह बराड़ को भाजपा से जोडऩे में भी राठौड़ का ही योगदान माना जाता है।
राजस्थान जैसे अति जातिवादी राज्य में जहां कदम-कदम पर जाति पूछी जाती है, एेसे दौर में राठौड़ जातिवाद की छाया से अछूते रहे। राजस्थान में जिस तरह दो प्रमुख जातियां विशेषकर चुनाव के दौरान आमने-सामने हो जाती हैं, वैसा राठौड़ के मामले में नहीं था। उनके नजदीकी लोगों में हर वर्ग व संप्रदाय के लोग थे। वैसे जातिवाद की आग का असर श्रीगंगानगर जिले में बाकी स्थानों के मुकाबले कम भी है। अगर जातिवाद होता तो राठौड़ श्रीगंगानगर से कभी नहीं जीत पाते। उनकी सब वर्गों में पकड़ थी। छात्र राजनीति के बाद वे गांव के निर्विरोध सरपंच बने। बाद में श्रीगंगानगर पंचायत समिति के प्रधान बने। उनको पहचान भी इस पद से ज्यादा मिली। वे विधायक भी बने लेकिन लोग उनको प्रधानजी ही कहते रहे।
यह सही है राठौड़ हमेशा पत्रकारों के पसंदीदा रहे लेकिन राजनीतिक मतभेद कराने में भी कहीं न कहीं पत्रकारों की भी भूमिका रही। बताते हैं उनकी ऑफ द रिकॉर्ड बात अखबारों में ऑन द रिकॉर्ड छप गई और वहीं से उनके राजनीतिक कैरियर का ग्राफ गिरना शुरू हो गया। बताते हैं कि 1993 के चुनाव में हार के बाद उन्होंने एक प्रेस वार्ता के बहाने पत्रकारों को एक होटल में बुलाया तथा एक कमरे में उनको जमकर धमकाया। पत्रकारों से ही जुड़ा एक मामला और है। विधायक बनने के बाद उन्होंने गाड़ी पर लालबत्ती लगाकर रखी थी। इस संबंध में खबर प्रकाशित हुई तो उन्होंने संबंधित पत्रकार व फोटोग्राफर को बुलाकर लालबत्ती उनके हाथ में थमा दी थी।
खैर, राठौड़ अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं, लेकिन जिस तरह उनकी अंतिम यात्रा में जन सैलाब उमड़ा, उससे साबित होता है कि लोग राठौड़ को दिल से चाहते थे। दस साल राजनीति से दूर निर्वासित सा जीवन जीने के बावजूद राठौड़ को चाहने वालों की संख्या आज भी कम नहीं थी। घर से मुक्तिधाम तक करीब चार- पांच किलोमीटर तक उनकी पार्थिव देह समर्थकों के कंधे पर ही गई। अंतिम यात्रा के आगे शव वाहन खाली ही चला। राठौड़ के लिए घर से शुरू हुआ नारों का सिलसिला उनको मुखाग्नि देते समय तक अनवरत जारी रहा। सच में नेता राठौड़ जैसा ही होना चाहिए। इतने चर्चे व किस्सों के बावजूद कभी व्यक्तिश: न मिल पाने के मलाल के साथ प्रधानजी को मेरा सलाम।

तो फिर कौन जाएगा देश सेवा करने?

टिप्पणी 
शहीद का नाम आते ही मन में श्रद्धा का भाव आता है और सिर सम्मान में स्वत: ही झुक जाता है। शहीद मतलब जिसने देश की खातिर अपने प्राणों की आहुति दे दी। जिसने अपने बच्चों, परिवार की बजाय देश को सबसे पहले रखा। हम चैन से जी सके, इसके लिए उसने शहादत दे दी। देश के लिए मर मिटने वाले ऐसे शहीदों के प्रति श्रीगंगानगर का प्रशासन कैसा व्यवहार करता है, इसका ज्वलंत उदाहरण देखना है तो चहल चौक चलें आएं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में देश के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले मेजर हरबंससिंह चहल की याद में बनाया गया चौक व शहीद प्रतिमा बदहाल है। पूरा चौक क्षतिग्रस्त हो चुका है। शहीद की प्रतिमा मिट्टी व पक्षियों की बीटों से अटी पड़ी है। शहीद प्रतिमा के चौक से पीतल से बनी नेम प्लेट भी कोई चुरा ले गया। इतना ही नहीं, जिस मार्ग का नामकरण मेजर चहल के नाम पर हुआ है, उसका शिलापट्ट ही गायब हो चुका है। इससे भी बड़ी बात है कि शहीद की वीरांगना जिला प्रशासन से चौक की बदहाली की दशा सुधारने तथा मार्ग का नामकरण का शिलापट्ट लगाने की गुहार करीब चाह माह पूर्व कर चुकी हैं, लेकिन उनकी गुहार सरकारी फाइलों में ही दफन हो गई। 
अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़ा होने के कारण श्रीगंगानगर के लोगों का सैन्य गतिविधियों से रोज ही वास्ता पड़ता है। देशभक्ति के जज्बे को जगाने के लिए भी यहां कई तरह के कार्यक्रम होते हैं। शहीदों की वीरांगनाओं का सम्मान होता है, शहीदों को याद किया जाता है, उनकी शहादत से प्रेरणा लेने के संकल्प लिए जाते हैं। इस तरह के माहौल के बीच यदि किसी शहीद की उपेक्षा होती है तो फिर इससे शर्मनाक बात और क्या होगी? शहीद की प्रतिमा लगाई ही इस उद्देश्य से जाती हैं ताकि आने वाली पीढिय़ों को प्रेरणा मिलें, उनमें देशभक्ति का जज्बा पैदा हो, लेकिन श्रीगंगानगर में चहल चौक व चहल मार्ग की हालत देख कर ऐसा रत्तीभर भी प्रतीत नहीं हो रहा। इतना ही नहीं है, सरकारें भी शहीद परिवारों के प्रति सहानुभूति दिखाने और बताने में कोई कसर नहीं छोड़ती, लेकिन शहीद मेजर चहल सर्किल को देखकर सरकार व उनके नुमाइंदों की मानसिकता पर सवाल खड़े होते हैं।
बहरहाल, जिला प्रशासन को, शहर के जनप्रतिनिधियों को एवं जागरूक लोगों को इस मामले में पहलकरनी चाहिए। क्यों न इस चौक की साफ सफाई की जाए, क्यों न इसके सौन्दर्यीकरण का संकल्प लिया जाए। शहर में पार्कों व चौकों को गोद लेने वाले इस चौक की भी सुध लें। हमारे लिए शहीद सर्वोपरि हैं। उनका सम्मान सबसे पहले होना चाहिए। शहीद का सम्मान मतलब श्रीगंगानगर का सम्मान है, तभी आने वाले पीढिय़ां उनसे प्रेरणा लेंगी। वरना हर साल कार्यक्रम मनाने या वीरांगनाओं का सम्मान करने का कोई औचित्य नहीं है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 13 जनवरी 18 में अंक में प्रकाशित 

सात समुन्दर पार से आया धन्यवाद

बस यूं ही
सरकारी अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की खाल किस कदर मोटी हो गई,इसका इससे ज्वलंत उदाहरण और क्या हो सकता है। मैं तो इसको ढीठता की पराकाष्ठा कहूंगा। चिकना घड़ा जैसा विशेषण भी इनके लिए छोटा पड़ता है। मामला श्रीगंगानगर के एक चौक का है। यह चौक शहीद के नाम से है और चौक पर शहीद प्रतिमा भी लगी है। 1971 में शहीद हुए मेजर हरबंससिंह चहल के नाम पर यह चौक है। प्रशासन ने यहां उनकी प्रतिमा लगाई लेकिन बस इस काम से आगे कुछ नहीं हुआ। सुध न लेने से पार्क बदहाल हुआ। प्रतिमा गिरने की कगार तक पहुंच गई। शहीद वीरांगना ने बीते साल सितंबर माह में जिला प्रशासन को पत्र लिखकर शहीद प्रतिमा व चौक की सुध लेने का आग्रह भी किया था। पत्र में बताया गया था कि पार्क बदहाल हो चुका है। प्रतिमा गिरने की कगार पर है। और तो और चौक पर होर्डिग्स आदि भी लगाए जा रहे हैं। पत्र में आशंका भी जताई गई थी कि हो सकता है कि होर्डिग्स लगाने के पैसे भी वसूले जा रहे हो? खैर, इस पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। होती तो दिखाई देती लेकिन वीरांगना की यह गुहार सरकारी फाइलों में ही दब कर रह गई।
वैसे मैं हमेशा चहल चौक से ही गुजरता हूं और रोज ही वहां पर नए-नए होर्डिंग्स लगे देखता हूं। पिछले सप्ताह अचानक आइडिया आया कि यह तो शहीद प्रतिमा के आगे होर्डिंग्स लगाकर प्रतिमा को ढंक दिया गया है। यह तो शहीद का अपमान है। बस वहीं से फोटोग्राफर को फोन किया कि प्रतिमा के आगे लगे होर्डिंग्स का फोटो कर लेना। वह सामने से फोटो ले आया, जिसमें केवल होर्डिंग्स दिखाई दे रहा था। मैंने फोटो देखकर उसको दुबारा भेजा और कहा कि वह पीछे से भी लेकर आओ ताकि आसानी से समझ में आ जाए किस तरह से होर्डिग्स शहीद प्रतिमा के आगे आ रहा है। फोटो के बाद कैप्शन लिखने बैठा तो फिर विचार आया कि क्यों न इसको खबर ही बनाया जाए। फिर क्या था, खबर लिखी जो बीते रविवार को राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में सात जनवरी के अंक में पेज दो पर प्रमुखता से लगी। रविवार को मैं फिर चौक के आगे से गुजरा लेकिन होर्डिंग्स वैसे ही टंगा था। मन में ख्याल आया आज अवकाश का दिन है, सरकारी अमला इतनी तत्परता नहीं दिखाएगा। अगले दिन सोमवार आठ जनवरी को देखा कि होर्डिंग्स वैसे ही लगा है जबकि जिनका होर्डिंग्स था उन्होंने इसे हटवाने का बाकायदा बयान दिया था, जो सात जनवरी को लगी खबर के साथ लगा था। फिर फालोअप छापा गया, जो नौ जनवरी के अंक में लगा। हैरानी की बात थी कि अगले दिन मंगलवार नौ जनवरी को सुबह तक होर्डिंग्स नहीं हटा। मन में ख्याल आया कितने बेशर्म लोग हैं, अपनी बात पर भी कायम नहीं रहते हैं। खैर, शाम को आफिस आते देखा तो होर्डिंग्स हट चुका है। मन ही मन सुखद अनुभूति तथा विजय की अनुभूति वाली हल्की सी मुस्कान भी आई। वहीं से फोटोग्राफर को फोन किया। वह जब तक फोटो लेने गया अंधेरा हो चुका था। अंतत: फोटो आई। फिर खबर बनाई गई और शीर्षक लिखा हटा होर्डिंग्स निकला हीरो। यह असर दस जनवरी के अंक में प्रकाशित हुआ। असर की प्रतिक्रिया स्वरूप कहीं से कोई हलचल दिखाई नहीं दी। आज गुरुवार को सुबह शाखा प्रभारी के मोबाइल पर विदेश के नंबर से कॉल आई। वो मेरे पास आए और कहने लगे आपके लिए कॉल है। मैंने हैलो किया तो सामने से जो आवाज आई उसमें बेहद आत्मीयता और खुशी झलक रही थी। कहने लगे भाईसाहब आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने शहीद प्रतिमा की सुध ली। हम प्रशासन के सामने गुहार लगा चुके लेकिन सुनवाई नहीं हुई। पत्रिका की खबर ने यह काम कर दिया। बधाई देने वाले शख्स रजवंतसिंह चहल थे, जो अपनी माता वीरांगना बलजीत कौर चहल के साथ केलीफोर्निया अमरीका में रहते हैं। उन्होंने बताया कि किसी परिचित के माध्यम से पता चला कि राजस्थान पत्रिका ने शहीद के सम्मान में खबर लिखी और उसका असर हुआ। इसके बाद उन्होंने व्हाट्सएप पर वह पत्र भी भेजे जो सितंबर माह में वो प्रशासन को दे चुके थे। साथ शहीद प्रतिमा के साथ वीरांगना की एक तस्वीर भी भेजी। उन्होंने एक बार फिर से धन्यवाद दिया । मैंने उनको कहा कि मैं भी पूर्व सैनिक का बेटा हूं तो उनका कहना था कि यह जानकर बेहद खुशी हुई कि आप आर्मी पर्सन के परिवार से हो। मैं आपका पूरा रिगार्ड करता हूं। साथ ही लिखा कि पोलिटिशियन हैव नो रिस्पेक्ट फॉर आवर एक्स आर्मी फैमिली। दिस मैक्स रियली सैड। मैं शहीद पुत्र की व्यथा को समझ चुका था। अब रहस्य से पर्दा उठा देता हूं कि जो होर्डिग्स था वह श्रीगंगानगर यूआईटी के चेयरमैन संजय महिपाल का था। खैर, मन को इस बात से सुकुन मिला कि मेरी खबर के कारण सात समुंदर पार बैठे परिवार को खुशी मिली।

इक बंजारा गाए-16

सबकी बोलती बंद
सुराज में सुरा-पान आठ बजे के बाद बंद का नियम कायदे है लेकिन शहर में यह सुरापान न केवल सारी रात मिलता बल्कि मय्यखाने में महफिल का सिलसिला सरकार के चार साल के बाद भी चल रहा है, इस सुरापान की देखदेख के लिए खाकी और मय्यखाने वाले अफसरो की फौज है लेकिन सुरा के साथ पान में चांदी के सिक्कों की खनक के कारण चुप्पी साध गए है। हद तो तब हो गई जब दवा की दुकान के साथ सुरापान वाला भी आधी रात तक सरेआम यह धंधा करने लगा। शिकायतों का अम्बार लगा तो सुर्खियों में वे सब आ गए जो खाकी और मय्यखाने के अफसरों को मंथली भिजवाते है, औपचारिकता की नौटंकी भी चली फिर सब चुप्प। मंथली के चक्कर में मय्यखाने वाले महकमे के चार अफसर तो यहां से नप चुके है तो वहीं एक थानेदार को अपना पद गंवाना पड़ा। लेकिन मंथली में ऐसा नशा है कि एसीबी की कार्रवाई का भय भी नहीं लगता। खाकी के पंडितजी ने तो आनन फानन में शहर में नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान तक चलाया लेकिन उनके समकक्ष खाकी वालों के पास सुरापान से मंथली के रूप में आ रही लार टपकने को रोक नहीं पा रहे है। इधर, मयखाने की देखरेख में अब चौधरी को लगाया है, वे भी बापू के तीन बंदरों की तरह न सुनना, न बोलना और न देखने की बात करने लगे है, जैसे सुरापान का असर दिख रहा हो।
प्रचार की भूख
शहर के कई जनप्रतिनिधियों को चौराहों पर टंगने का शौक हद से ज्यादा है। इस शौक में वो नियमों की धज्जियां उड़ाने से भी गुरेज नहीं करतेे। यहां तक जो जगह होर्डिंग्स आदि लगाने के लिए चिन्हित ही नहीं है वहां भी जोर जबरिया टांग देते हैं। इधर, प्रशासनिक अधिकारियों की इतनी हिम्मत नहीं होती है ,उनसे पंगा ले। फिर भी मीडिया की लगातार मुहिम के बाद श्रीगंगागनर शहर के अधिकतर प्रमुख चौक चौराहे अब मूल स्वरूप में दिखाई देने लगे हैं। फिर भी कुछेक जनप्रतिनिधि ऐसेभी हैं जिनके कानों पर जंू तक नहीं रेंग रही है। पता नहीं उनको यह बात समझ क्यों नहीं आ रही कि लोकप्रियता चौराहों पर टंगने से नहीं बल्कि काम करने से आती है। इसके बावजूद इस काम से वो तौबा करते दिखाई नहीं देते। हद तो शहर के चहल चौक पर हो गई है, जहां शहीद की प्रतिमा के आगे नियमों को मखौल उड़ाते हुए पहले तो एक छुटभैये ने होर्डिंग्स लगाया और उसको हटाए बिना उसके आगे नेताजी का होर्डिंग्स भी लगा दिया गया। फिलहाल नेताजी को किसी तरह बात समझ आ गई और शहीद प्रतिमा के आगे से होर्डिंग्स हट गया।
निजी हित सर्वोपरि
एक चर्चित कहावत है 'विष दे विश्वास न दे।' मतलब विश्वासघात जो होता है वह जहर से भी खतरनाक है। लेकिन श्रीगंगानगर में आजकल यह कहावत बखूबी चरितार्थ होने लगी हैं। बड़ी बात है कि यह धोखा भी मीडिया के लोगों से ही किया जाने लगा है। हिमाकत देखिए अदालती फैसले में कांट-छांट कर अपने हिसाब से प्रेस नोट तैयार किए जाने लगे हैं। एक स्थानीय अखबार ने तो कांट-छांट कर प्रेस नोट जारी करने वालों को बेनकाब भी किया लेकिन बाकी खबरनवीसों ने आंख मूंद कर जो विश्वास दिखाया उसका खामियाजा भुगतने की आशंका अब बलवती हो गई है। निजी हितों के लिए विश्वास को ताक पर रखकर खबरनवीसों को धोखे में रखने वालों को यह बात अ'छी तरह से पता है, क्योंकि उन्होंने तो यह सब इरादत्तन किया लेकिन खबरनवीसों ने भी रेडीमेड खबर देखकर क्रॉस चैक करने तक भी जहमत नहीं उठाई। बहरहाल, निजी हित देखने वालों की मंशा पर सवाल अब और भी ज्यादा हैं, क्योंकि अब उस प्रेस नोट के गुम होने का बहाना जो बनाया जा रहा है।
उल्टा पड़ा दांव
खेल कोई भी दांव अगर उल्टा पड़ जाता है तो जीत की उम्मीद फिर क्षीण पड़ जाती है। मामला अतिक्रमण का है और जिले के एक प्रमुख शहर से जुड़ा है। इस शहर के व्यापारियों ने पहले तो जनहित को ध्यान में रखते हुए बाजार में खड़ी होने वाली रेहडिय़ों का विरोध किया। उनको पता नहीं था रेहडिय़ा हटते ही वो भी लपटे में आ जाएंगे। क्योंकि जांच सर्वे में उनकी अधिकतर दुकानें अतिक्रमण की जद में आ गई। दुकान टूटने के भय ने व्यापारियों के दिन का चैन व रातों की नींद गायब कर दी। मामले को रफा-दफा करने के लिए काफी दौड़ धूप की गई। जनप्रतिनिधियों के यहां भी गुहार लगाई गई लेकिन गलत काम की सावर्जनिक रूप से वकालत करता भी कौन? व्यापारियों की हालत सांप छछूंदर वाली हो गई। ख्यामखाह बैठे बिठाए पंगा जो ले लिया। बहरहाल, कहीं पर भी बात नहीं बनी, अंततोगत्वा पालिका प्रशासन अतिक्रमण हटवा रहा है। इधर, व्यापारी उस घड़ी को कोस रहे हैं, जब उन्होंने रेहड़ी वालों का विरोध किया था।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 11 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित 

पीआरओ बनते पत्रकार

बस यूं ही
करीब अठारह साल पहले की बात है। पत्रकारिता का ककहरा सीखते वक्त यह भी बताया गया था, यह पत्रकारिता की डगर है। यह आसान नहीं होती है। इसमें घर परिवार सबको छोडऩा पड़ता है। इस दुनिया मे प्रवेश के बाद आपकी सामाजिक लाइफ व फे्रंड सर्किल भी खत्म समझो। इस क्षेत्र में एक बार आ गए तो फिर यही सब कुछ है। अगर इतनी चुनौती स्वीकार करने का जज्बा है, हौसला है, माद्दा है तो बेशक पत्रकारिता करिए। इतनी नसीहत के बाद आखिरी और खतरनाक बात बताई गई कि यह दौर ऐसा है कि किसी के खिलाफ लिखोगे तो वह आपका दुश्मन बन जाएगा। कब राह चलते कौन आपको रौंद जाए पता ही नहीं चलेगा। फिर आपका परिवार, आपके बच्चों की परवरिश किसके जिम्मे होगी? सोच लो। पत्रकारिता की राह पर चलने वाले तब मेरे सोलह साथी और भी थे, लेकिन सभी अपने निर्णय पर अडिग रहे कि पत्रकार तो बनना ही है। इतना ही नहीं इस सीखने के दौरान एक नसीहत यह भी दी गई थी कि आप पत्रकार हो। पत्रकारिता धर्म निभाते वक्त एक बात जेहन में हमेशा याद रखना। पत्रकार होने के नाते 'चार पी' को हमेशा नजरअंदाज करना। पहला पी से पैसा। दूसरा पी से पद। तीसरा पी से प्रशंसा और चौथा पी से पुष्प। इन चार पी को नजरअंदाज करने के पीछे सोच यही थी कि इनमें किसी भी पी के संपर्क में आने वाला कहीं न कहीं निष्पक्ष नहीं रह पाता। लेकिन मौजूदा दौर में अधिकतर पत्रकार किसी न किसी पी के संपर्क में आने से खुद को रोक नहीं पाते। किसी भी पी के संपर्क में आने का मतलब है उसके प्रभाव में आ जाना। जहां प्रभाव शुरू हो जाता है, वहां फिर पत्रकारिता गौण होने लगती है और पीआरशिप हावी हो जाती है। बाजार में कई तरह के संगठन व कंपनियां भी इस खेल में शामिल हैं। वो बेहतर मीडिया मैनेजमेंट करने वालों पत्रकारों को ही बतौर पीआरओ रखने लगे हैं। इसके अलावा बहुत से ऐसे भी हैं, जो पीआरओ बनाने की बजाय सीधे ही पत्रकारों को साधने में विश्वास करते हैं। और जो सध जाता है वह भी एक तरह से पीआरओ का काम ही करता है। इस तरह से मीडिया दफ्तरों व बाहर दोनों जगह ही पीआरओ हो गए हैं। एक अंदरूनी पीआरओ तो दूसरा बाहरी पीआरओ। दरअसल, यह संकट किसी एक जगह का नहीं है। हर जगह ऐसी तस्वीर मिल जाएगी। हां कहीं ज्यादा या कम का अनुपात जरूर हो सकता है लेकिन पीआरओ रहित शहर शायद ही कोई हो। यह पीआरशिप पत्रकारिता के लिए दीमक का काम करती है। यह पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों व उसूलों पर चोट करती है। कई लोग तो पत्रकारिता में आते ही इसी उद्देश्य से हैं। पत्रकारिता की सीढिय़ों के माध्यम से वो पीआरओ बनने का मुकाम आसानी से हल कर लेते हैं। इस दौर में खुद के दामन को बचाना किसी चुनौती से कम नहीं है। यहां कदम-कदम पर फिसलन है। इस पर भी जबरन फिसलाने के उपक्रम और किए जाते हैं। और किसी तरह कोई इस फिसलन से खुद को बचा लेता है तो फिर दूसरे हथकंडे आजमाए जाते हैं। धमकी, झूठी शिकायतें, दबाव आदि इसी के तहत आते हैं। और इनमें प्रमुख योगदान भी पत्रकार से पीआरओ बने साथियों का ज्यादा होता है।
पत्रकार से पीआरओ बनने में मैं मीडिया घरानों का दोष कहीं नहीं मानता। पत्रकारिता में आदमी अपने शौक से आता है और पीआरओ बनने की राह भी खुद ही चुनता है। वर्तमान दौर ऐसा है कि समूचा बाजार ही पत्रकारों को पीआरओ के नजरिये से देखना लगा है। उनको संदिग्ध मानने लगा है। ऐसा बहुतायत में होने लगा है। किसी न किसी वाद से प्रभावित पत्रकारिता भी पीआरशिप की श्रेणी में ही गिनी जाएगी। यह दौर वाकई संकट का है। चुनौती का है। एक मूल व ईमानदार पत्रकार के लिए अब तो संकट इस बात का खड़ा हो गया है कि वो अपना जमीर बचाए या जान? क्योंकि जमीर बचाने के लिए कुछ लोग जान भी गंवा बैठते हैं, खुद्दार जो होते हैं। और समझौता ही करे तो फिर वह पत्रकारिता भी कैसी।

गूंगे के गुड़ पर भारी सरकारी 'छूट'

टिप्पणी
शराब दुकानों को बंद करने का समय रात आठ बजे इसीलिए निर्धारित किया गया था ताकि लोग देर रात तक शराब न पीएं, क्योंकि जब शराब मिलेगी ही नहीं तो पीएंगे कहां से। समय सीमा तय करते समय यह भी सोचा गया था कि शराब के कारण देर रात किसी तरह की शांति भंग भी नहीं होगी। सड़कों पर हादसे भी कम होंगे। लेकिन सरकार की 'छूट' के चलते न केवल समय सीमा तार-तार हो रही है बल्कि रात आठ बजे बाद निर्धारित मूल्य से ज्यादा कीमत भी वसूली जा रही है। शराब उपभोक्ताओं के लिए यह मनमर्जी की कीमत 'गूंगे के गुड़' की तरह है। शराब पीने वाले को ज्यादा कीमत देने की पीड़ा तो है लेकिन देर तक शराब मिलने की सुविधा के चलते चाहकर भी वह इस बात का कहीं विरोध नहीं कर सकता। 
यह बात दीगर है कि देर रात शराब उपलब्ध होने के कारण सुराप्रेमियों के लिए कीमत कोई मायने भी नहीं रखती है, लेकिन जो नहीं पीते हैं, उनके लिए शराब दुकानों का देर तक खुलना बड़ी सिरदर्दी है। शराब ठेकों के आसपास का माहौल न पीने वालों के लिए कितना पीड़ादायक होता है, सहज ही कल्पना की जा सकती है। खैर, सवाल शराब देर रात बिकना व निर्धारित मूल्य से ज्यादा पर बिकना तो गैरकानूनी तो है ही, इससे भी बड़ी पोलपट्टी तो यह दिखाई देती है कि इस मनमर्जी पर अंकुश लगाने वाले पता नहीं इतने लाचार, बेबस व मजबूर क्यों हैं। पुलिस व आबकारी विभाग क्षेत्राधिकार की बात कहकर न केवल जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं बल्कि इस बहाने अवैध काम करने वालों के मददगार भी बन रहे हैं। दोनों ही विभागों में एक बात जरूर समान है। दोनों शिकायत मिलने पर कार्रवाई करने की बात जरूर कहते हैं। पर यहां शिकायत करेगा कौन? और क्यों करेगा? और कोई पीडि़त हिम्मत जुटाकर करता भी है तो उसकी कोई सुनवाई होती भी कहां है?
बड़ा व यक्ष सवाल तो यही है कि देर रात बिक्री होते क्या पुलिस व आबकारी विभाग के अधिकारियों को दिखाई नहीं देता? क्योंकि इस मामले में राजस्थान पत्रिका में विशेष संपादकीय प्रकाशित होने के बाद शराब ठेकों के बाहर देर रात तक खड़ी रहने वाले रेहडिय़ों की संख्या जरूर कम हो गई है लेकिन शटर के नीचे से या बगल में बनाए गए बड़े सुराखों (मोखो) से बिक्री बेखौफ जारी है। पुलिस व आबकारी विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के बयानों से इतना तय है कि दोनों ही विभाग इस गैरकानूनी काम को कानून सम्मत बनाने के प्रति गंभीर नहीं हैं। और जब इस तरह से गैरकानूनी काम होंगे तो फिर कानून व्यवस्था चाक चौबंद होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 6 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित 

ऐसी बातों से ही तो हौसला मिलता है..

बस यूं ही
शुक्रवार शाम ही बात है। अचानक मोबाइल की घंटी बजी। ट्रूकॉलर पर पान पान दिखा रहा था...। मैंने फोन उठाया तो आवाज आई महेन्द्र जी भाईसाहब नमस्कार। मैं बाबा पान भंडार से प्रकाश बोल रहा हूं। आप से मिलना है। मैं एक बार तो चौंका कि इस तरह आत्मीयता से बोलने वाला और वह भी नाम से आखिर है कौन भला। मैंने प्रत्युत्तर में कहा कि मैं आफिस ही हूं। सामने से आवाज आई भाईसाहब मैं आपके आफिस ही आ रहा हूं। करीब आधा घंटे बाद मजबूत कद काठी का आकर्षक नयन नक्श वाला युवक हाथ में एक पॉलिथीन की थैली लिए मेरे केबिन में आया। मु्स्कुराते हुए हाथ मिलाकर कहने लगा भाईसाहब मैं प्रकाश शर्मा। बाबा पान भंडार से। मैंने युवक को सवालिया नजरों से देखा पर वह मंद मंद मुस्कुरा रहा था। मेरी आंखों में देखते हुए उसने वह थैली मेरी तरफ बढा दी। मैं सकपकाया और टोकते हुए कहा..यह क्या है और किसलिए है। इस पर बोला भाईसाहब मैं आपको नहीं जानता....आपसे कभी मिला भी नहीं बस नाम सुना है। कल राजस्थान पत्रिका में शराब दुकानों पर खबर पढी तो बेहद खुशी हुई। बस यह पान उसी खुशी के हैं। शराब की दुकानों का पान वाले से क्या संबंध ? यकायक यह सवाल फिर जेहन में आया और मैंने अस्वीकृति में फिर सिर हिलाया। वह कहने लगा भाईसाहब मूलत: बीकानेर जिले से हूं। दादाजी श्रीगंगानगर आ गए थे। यहां हमारी 1927 से पान की दुकान है। बीकानेर का नाम आते ही और युवक की आत्मीयता देखकर खुशी हुई कि तीसरी पीढी में भी बीकानेर के संस्कार मौजूद है। वह कहे जा रहा था भाईसाहब मेरी दुकान के पास शराब का ठेका देर रात तक खुला रहता है। इस कारण मेरे ग्राहक इस तरह के माहौल से कतराने लगे हैं। व्यक्तिगत रूप से मेरे को भी इस तरह का माहौल अच्छा नहीं लगता। मैंने पुलिस व आबकारी के सभी अधिकारियों को ज्ञापन दिए...वीडियो दिए पर कहीं सुनवाई नहीं हुई...। शराब ठेकेदारों से मेरी तो आंख मिलाने तक की हिम्मत नहीं। कल पत्रिका में शराब दुकानों की खबर देखी तो मन को सुकून मिला। इससे भी बड़ा सुकून आज मिला जब शराब ठेके के बाहर लगी रेहड़ी हट गई।.बस इसी खुशी और बिना कहे ही मेरी पीड़ा अखबार में प्रकाशित करने पर आपको मीठा पान खिलाने का निर्णय किया। प्लीज भाईसाहब इसे स्वीकार करो....यह कोई प्रलोभन नहीं हैं। मैं प्रकाश शर्मा के आग्रह को नकार न सका। हालांकि मैं पान नहीं खाता। मैंने कार्यालय के साथियों से कहा कि कोई पान का शौकीन है तो बताओ मेरे पास पान है। पर कोई तैयार नहीं हुआ। ऐसे में दोनों पान घर ले आया। एक दोनों बच्चों को खिलाया तो एक श्रीमती को। सच में प्रकाश का मेरे से नहीं अखबार से एक रिश्ता था। उसकी पीड़ा जब उजागर हुई तो उसने अपनी खुशी का इजहार इस तरह से किया। आखिर प्रकाश जैसे शख्स ही तो सच व साहस के साथ लिखने का हौसला देते हैं। पान से भी मीठी प्रकाश की भावनाओं को मैं सलाम करता हूं...।

'सुराज' में आधी रात तक 'सुरा-राज'

यह सर्वविदित है कि श्रीगंगानगर शहर व जिले में शराब निर्धारित कीमत से ज्यादा पर बिकती है और देर रात तक बिकती है। बिलकुल बेरोक-टोक। यह बात दीगर है कि कोई चोरी छिपे बेचता है तो कोई बिलकुल बेधड़क होकर, लेकिन बिकती जरूर है। कार्रवाई के नाम पर शुरू में दो चार छोटी मोटी कार्रवाई भी हुई, लेकिन साथ ही मंथली लेने के आरोप में खाकी भी दागदार हुई। पुलिसकर्मी मंथली लेकर निर्धारित कीमत से ज्यादा कीमत पर शराब बेचने तथा देर तक बिक्री करने की एवज में शराब ठेकेदारों से घूस लेने के आरोप में रंगे हाथों पकड़े गए। बावजूद इसके शराब आज भी उसी अंदाज में बिक रही है। ऐसे में आशंका बलवती है कि बिना शह या मिलीभगत के यह सब कैसे हो सकता है? अब तो हर ठेके के पास एक रेहड़ी भी तैयार मिलती है। मतलब सुरा प्रेमियों को शराब के साथ नमकीन आदि की व्यवस्था भी मौके पर ही उपलब्ध होती है। रात आठ बजे बाद दिखावे के नाम पर दुकानों के शटर जरूर गिरते हैं, लेकिन देर रात ठेकों के सामने खड़ी रेहडिय़ां उनके खुले होने की चुगली करती हैं। पुलिस व आबकारी की 'गुप्त छूट' का लाभ शराब ठेकेदार जमकर उठा रहे हैं। उनमें किसी तरह भय या खौफ भी दिखाई नहीं देता। बड़ी बात तो यह है कि इस खेल में कोई एक दो नहीं बल्कि सभी थाना क्षेत्र की शराब दुकानें शामिल हैं। 'पत्रिका' टीम ने रात आठ बजे बाद सर्द मौसम में शहर के विभिन्न थानों क्षेत्रों का जायजा लिया तो वाकई पुलिस व आबकारी विभाग की 'गुप्त छूट' का लाभ उठाने में कोई पीछे नहीं था। देर रात तक शराब बेचने वालों पर पिछले साल तक कार्रवाई करने वाली पुलिस भी इस बार नियमों के फेर में उलझी है। आबकारी व पुलिस के क्षेत्राधिकार का मामला बताकर हमेशा इस मामले में बचने की कोशिश की जाती रही है। आबकारी विभाग ने लक्ष्य के चक्कर में आंखें मूंद रखी हैं और पुलिस ने क्षेत्राधिकार के नाम पर। ऐसे में बड़ा सवाल यह भी इस इस मनमर्जी पर अंकुश कौन सा विभाग लगाएगा?
तो जिम्मेदारी किसकी?
पत्रिका ने इस मामले में जिला आबकारी अधिकारी सहित शहर के पांचों थानाधिकारियों और सीओ सिटी को टटोला। सभी के जवाब हैरत करने वाले थे। सबसे गैर जिम्मेदाराना बयान आबकारी अधिकारी का रहा। शहर में गश्त करवाने या चैकिंग करवाने की बजाय 'शिकायत मिलने पर कार्रवाई' की बात कहकर उन्होंने पल्ला झाड़ लिया, वहीं कोतवाली और जवाहरनगर थाना प्रभारी ने ठेके बंद करवाने का जिम्मा आबकारी विभाग का बताया। सीओ सिटी ने भी यहीं पासा फेंका। इनके इतर पुरानी आबादी थाना प्रभारी का दावा था कि उनके इलाके में 8 बजे के बाद कोई ठेका नहीं खुला रहता। दोनों महकमों की क्षेत्राधिकार की सरहद देखिए ठेके बंद करवाने की जिम्मेदारी आबकारी की और ठेके के बाहर ठेलों पर शराबियों की धरपकड़ करने की पुलिस की। कुल मिलाकर क्षेत्राधिकार के जाल में उलझे इस खेल पर कौन अंकुश लगाएगा, यह बड़ा सवाल है।
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 राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 4 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित।

इक बंजारा गाए-15


🔺धरने का राज
लोकतंत्र में अपनी मांगें मनवाने के कई तरीके हैं। इनमें धरना प्रमुख है। वैसे धरने भी कई प्रकार के होते हैं। आंशिक धरना, स्थायी धरना, क्रमिक धरना आदि। कुछ धरने ऐसे भी होते हैं, जो दिन में लगते हैं, लेकिन रात को उठ जाते हैं। जिला मुख्यालय पर भी इन दिनों एक धरना चल रहा है, जो दिन-रात अनवरत जारी है। वैसे, यह मामला चुनाव के नजदीक ही याद आता है। चार साल तक शांत रहा यह मामला अब फिर से बोतल में बंद जिन्न की तरह बाहर आ गया है। खैर, बात धरना देने वालों को लेकर है। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो रात को धरने का एक अलग ही अंदाज होता है। दिन में आगे का पर्दा उठ जाता है, लेकिन रात होने पर किसी रंगमंच के पर्दे की तरह इसे गिरा दिया जाता है। हां, इतना जरूर है कि पर्दे के पीछे जो हो रहा है वह कम से कम श्रीगंगानगर की 'संस्कृति' के विपरीत नहीं है।
🔺सफाई की चिंता
श्रीगंगानगर में सफाई का मामला हमेशा सिरदर्दी वाला ही रहा है। शहर में सफाई के नाम पर प्रयोग भी बहुत हुए, लेकिन आशातीत परिणाम सामने नहीं आए। अब स्वच्छता टीम आने वाली है। यह टीम शहर की सफाई व्यवस्था के हाल जानेगी और फिर रैंकिंग जारी करेगी। सफाई के मामले में श्रीगंगानगर का पिछले साल कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं रहा, इस कारण इस बार अच्छी खासी दौड़ धूप की जा रही है। यहां तक की शहर को चमकाने में अधिकारियों व सफाई ने दिन- रात एक कर रखा है। जिन रास्तों पर कभी झाड़ू नहीं लगी, वहां पर पानी से सफाई हो रही है। सब कुछ आनन-फानन में हो रहा है। इतनी मशक्कत अगर समय रहते नियमित रूप से की जाती तो आज इस तरह भागना नहीं पड़ता। और वैसे भी इस दौड़ धूप से पूरा शहर तो स्वच्छ होने से रहा। इतना कुछ करने के बाद अगर स्वच्छता टीम ने सद्भावना नगर जैसे इलाकों का निरीक्षण किया तो फिर परिणाम क्या होगा, सोचा जा सकता है।
🔺पब्लिसिटी का तरीका
श्रीगंगानगर में बेटियों को पढ़ाने तथा उनको छात्रवृत्ति देने का काम सामाजिक संगठनों की ओर से लंबे समय से किया जा रहा है। अब तो इस काम में भी प्रतिस्पर्धा होने लगी है। ज्यादा से ज्यादा बेटियों को छात्रवृत्ति बांटने की होड़ रहती है। यह बात दीगर है कि लाभान्वित होने वाली बेटियों की नाम सहित संख्या तथा वितरित की गई राशि का विवरण सार्वजनिक करने की मांग लगातार उठती रही है, लेकिन यह मांग अभी अधूरी ही है। यह पूरी होगी या नहीं, अभी तय नहीं है, लेकिन इस काम का प्रचार इतना जोर-शोर से किया जाता है कि चारों तरफ कार्यक्रमों के ही चर्चे रहते हैं। इन दिनों शहर में होर्डिंस व पेम्फलेट्स के माध्यम से भी इसी तरह के कार्यक्रम के बारे में प्रचार किया जा रहा है। प्रचार-प्रसार के इस काम में आयोजक अपना व अपने संस्थान का नाम भी चमका रहे हैं। दोनों काम एक साथ हो रहे हैं, मतलब आम के आम गुठलियों के दाम।
🔺..तो बाराती क्या करें?
राजस्थानी में एक कहावत है। जब बींद (दूल्हे) के मुंह से ही लार टपके तो बाराती क्या करे? कहने का तात्पर्य है कि जब जिम्मेदार आदमी की कोई कानून तोड़े तो फिर नीचे वाले को क्या दोष? वे भी उनकी देखादेखी तो करेंगे। यह कहावत शहर के उन जनप्रतिनिधियों व छुटभैयों के लिए सटीक बैठती है जो गाहे-बगाहे बधाई लिखे संदेश चौराहों पर टांग देते हैं या टंगवा देते हैं। हालांकि पूछने पर जनप्रतिनिधि इसे समर्थकों का काम बताकर खुद की खाल बचाने का प्रयास करते हैं, लेकिन सच यह है कि प्रचार की भूख के चलते वो ऐसा करवाते हैं। नहीं तो किसकी मजाल कि बिना अनुमति किसी के बैनर टांग दे। इन जनप्रतिनिधियों के आगे प्रशासनिक अमला अपने को इतना लाचार, बेबस, निरीह व मजबूर समझता है कि कार्रवाई करने की हिम्मत तक नहीं दिखा पाता। इधर जनप्रतिनिधि भी इतने 'सयाने' हैं कि प्रशासन की बेबसी का जमकर फायदा उठाते हैं।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 4 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित। 

Sunday, December 31, 2017

यह अभयदान क्यों?

टिप्पणी
अवैध होर्डिंग्स के संबंध में राजस्थान पत्रिका के शनिवार के अंक में खबर तथा विशेष संपादकीय प्रकाशित होने के बाद नगर परिषद का अमला हरकत में जरूर आया, लेकिन आधी अधूरी कार्रवाई से कई सवाल फिर भी खड़े कर गए। हां, इतना जरूर है कि शनिवार को शहर के प्रमुख चौक चौराहों व बिजली के खंभों पर टंगे होर्डिंग्स कहीं नगर परिषद ने उतारे तो कहीं लगाने वाले से ही उतरवाए। खैर, जिस अंदाज में होर्डिंस/ बैनर हटे हैं, उससे कम से कम यह उम्मीद तो बंधी है कि परिषद प्रशासन कार्रवाई तो कर सकता है। फिर भी यक्ष प्रश्न बना रहा कि इतनी बड़ी संख्या में होर्डिंग्स व बैनर लगे थे, लेकिन किसी पर भी जुर्माना क्यों नहीं हुआ? नगर परिषद ने जुर्माना लगाने में रहम बरता तो आखिरकार किसलिए? खैर, इस दरियादिली की वजह तो परिषद प्रशासन को पता है, लेकिन यह दरियादिली संदिग्ध लगती है और कहीं न कहीं संदेह पैदा करती है।
वैसे श्रीगंगानगर में पिछले दो साल में संपत्ति विरुपण के डेढ़ दर्जन मामले भी दर्ज नहीं हुए हैं। और जो दर्ज हुए हैं, उन्हें नगर परिषद के जिम्मेदारों ने एक तरह से 'लावारिस' छोड़ दिया है। आज कोई भी अधिकारी उन मामलों की प्रगति रिपोर्ट बताने की स्थिति में नहीं है। यह सब आधी-अधूरी कार्रवाई का ही नतीजा है। तभी तो हर कोई, कहीं पर भी अपना होर्डिंग या बैनर टांगने की हिमाकत कर बैठता है। बहरहाल, नगर परिषद ने जिस तरह की दरियादिली दिखाई है, उससे लगता नहीं कि अवैध होर्डिंग्स लगाने वालों में किसी तरह का डर पैदा हुआ है। हालात यही रहे तो शहर का फिर से बदरंग होना तय मानिए, क्योंकि भय के बिना प्रीत नहीं होती।
खानापूर्ति वाली कार्रवाई कर परिषद अमला तात्कालिक रूप से भले ही वाहवाही बटोर ले, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं। कानून तोडऩे वालों को, नियमों का मखौल उड़ाने वालों पर जुर्माना होता तो कड़ा संदेश जाता। जब तक संपत्ति विरुपण अधिनियम की कड़ाई से पालना नहीं होगी, अधिनियम के तहत किसी को जुर्माना व सजा नहीं होगी तो मनमर्जी और दरियादिली का यह खेल इसी तरह चलता रहेगा।
बड़ा सवाल तो यह भी कि परिषद प्रशासन कानून तोडऩे वालों के खिलाफ सजा व जुर्माने लगाने की हिम्मत क्यों नहीं करता? परिषद प्रशासन की इस लुंजपुंज भूमिका से संदेह पैदा होना लाजमी है, और जब तक यह संदेह रहेगा, तब तक ईमानदार कार्रवाई, जुर्माने तथा सजा की बात करना ही बेमानी है। बिना कार्रवाई किए छोडऩा तो एक तरह का अभयदान देने जैसा ही है और कसूरवारों को अभयदान देना भी अपने आप में एक बड़ा संदेह है। चाहे वो मजबूरी का हो, मिलीभगत का हो या फिर किसी दबाव
 का।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 31 दिसंबर 17 के अंक में प्रकाशित

मिलीभगत या मजबूरी?

टिप्पणी
शहर फिर बदरंग हो चला है। चुनावी साल होने के कारण जगह-जगह पोस्टरों व बैनरों से अटा पड़ा है। बधाई देने वालों में जबरस्त होड़ मची है। कई तो नए साल, लोहड़ी, संक्राति व गणतंत्र दिवस की बधाई भी एक साथ ही दे रहे हैं ताकि पोस्टर/ बैनर लंबे समय तक लगे रहे। पूर्व मंत्री के जन्मदिन की बधाई लिखे होर्डिंग्स से तो पूरा शहर ही पाट दिया गया है। शायद ही कोई चौक या खंभा छोड़ा होगा, जिस पर बधाई संदेश न टंगे हों। समूचे शहर को बेरहमी के साथ बदरंग कर दिया गया है। चौक -चौराहों पर टंगने की इस होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। यहां तक कि कई संगठन भी प्रचार की इस सस्ती भूख के आगे नतमस्तक दिखाई देते हैं। अन्य जगह तो परिषद प्रशासन अपनी साइट का हवाला भी दे देता है, लेकिन शहर के प्रमुख चौकों के बीचो-बीच बांस की बल्लियां लगाकर बधाई संदेश टांगना तो सरासर 'दादागिरी' है, मनमर्जी है। चाहे चहल चौक हो या सुखाडिय़ा सर्किल सब के सब बदरंग हैं। शहर के चौक-चौराहों की सुंदरता को बदहाल करने में नियम कायदों को सरेआम ताक पर रखा जाता है। यह खेल हर साल बदस्तूर चलता है। बड़ी बात तो यह है कि शहर को बदरंग होने से बचाने वालों की कोई हलचल दिखाई नहीं देती। इस खेल में जरूर या तो कोई मिलीभगत है या मजबूरी? वरना इस तरह हिमाकत कौन कर सकता है? कार्रवाई के नाम पर नगर परिषद के हाथ बंधे हुए हैं, क्यों बंधे हैं? क्या कारण हैं? यह भी अपने आप में राज हैं। परिषद की भूमिका लगातार उदासीन ही रही है। शर्मनाक बात तो यह है कि जनप्रतिनिधि ही जब इस तरह कानून का मखौल उड़ा रहे हैं तो फिर ऐरे- गैरे, नत्थू खैरों व छुटभैयों का हौसला तो बढ़ेगा ही। शहर में जिस तरह के हालात हैं, उससे लगता नहीं हैं कि शहर के बदरंग करने वालों में किसी तरह का भय है। जिस अंदाज में पोस्टर/ बैनर लग रहे हैं, इससे यह भी लगने लगा है कि शहर में व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाले हालत हो गए हैं। यही कारण था कि पिछले दिनों शहर के एक जागरूक अधिवक्ता ने शहर को बदरंग करने वालों व जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। इसके बावजूद बदलाव या कोई हलचल दिखाई नहीं दी। ऐसी परिस्थितियों में अब अधिवक्ता की तर्ज जैसा ही करने की जरूरत है। यह खेल बहुत हो चुका है। अब यह शहर मुकम्मल कार्रवाई चाहता है। नासूर बनती यह समस्या अब स्थायी हल चाहती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 30 दिसंबर 17 के अंक में प्रकाशित