Monday, April 16, 2018

इंसानी फितरत

बस यूं ही
किसी ने सच ही कहा है कि दुनिया में भले इंसानों के लिए जगह नहीं है। देखिए ना सांप अगर काटना छोड़ दे तो उसका क्या हश्र हो। लोग उसकी रस्सी न बना लें। इसी तरह सांड अगर मारना या मारने के लिए किसी को डराए नहीं तो लोग उसकी सवार न करने न लग जाएं। यह इंसानी फितरत है कि कमजोर को हमेशा दबाया जाता रहा है। सीधे पेड़ पर भी आरा सबसे पहले चलता है। कबीर जी भी कह कर गए कि दुनिया में जय जयकार हमेशा दुर्जन लोगों की होती है। यकीन नहीं है तो बताइए कि जो ग्रह नक्षत्र सही चल रहे होते हैं उनकी कभी आप पूजा करते हैं। नहीं करते ना। हां, जो ग्रह नक्षत्र उलटे चल रहे होते हैं, उनको सही करवाने के लिए कई तरह के जतन करने पड़ते हैं। पूजा हवन तक होते हैं। दान दक्षिणा तक दी जाती है। इसी तरह सीधा आदमी बगल से निकल जाए दुआ सलाम करने वाले बहुत कम होंगे लेकिन यही कोई प्रभावशाली आदमी हो तो फिर देखिए नजारा। किस तरह लोग उसके आगे पीछे दुम हिलाकर घूमते हैं। आजकल तो अपराधियों की मौत के बाद उनके समर्थन में हुजूम उमड़ता है। और कोई गरीब मर जाए तो जनाजे को कंधा देने वाले चार लोग तक नहीं आते। वाकई यह दुनिया गजब की है। इस दुनिया को समझना आसान नहीं है।
वैसे आदमी के बारे में काफी कुछ कहा भी गया है। यही कि आदमी आश्रय देने पर सिर पर चढ़ता है। उपदेश देने पर मुड़कर बैठता है। आदर करने पर खुशामद समझता है। उपकार करने पर अस्वीकार करता है। विश्वास करने पर हानि पहुंचता है। क्षमा करने पर दुर्बल समझता है और प्यार करने पर आघात करता है। इस तरह के चरित्र को उत्तम नहीं कहा जा सकता है। अगर इंसानियत व भाईचारे का दर्शन समझ में आ जाए तो सारे लफड़े ही खत्म मानो। होना यह चाहिए कि आश्रय देने पर उसका हमेशा एहसानमन्द होना चाहिए। कोई अच्छे कार्य के लिए कुछ उपदेश दे तो उसका पालन करना चाहिए। कोई सच्चे मन से आदर सत्कार करे तो उसकी प्रतिष्ठा बनाए रखनी चाहिए। कोई हृदय से उपकार करे तो उसे सच्चे मन से ग्रहण करना चाहिए। विश्वास करने पर उसे कभी ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए। अपनी गलती पर कोई हमें क्षमा करता है उसे दुर्बल नहीं समझना चाहिए बल्कि उसका एहसानमंद होना चाहिए। यदि कोई हमसे प्यार करे तो उसके प्यार एवं विश्वास को हमेशा बनाए रखना चाहिए।
मेरे को भी आज शुक्रवार को कुछ इसी तरह का अनुभव हुआ। रुका नहीं गया तो जज्बातों को शब्द देने बैठ गया। क्या लिखा, कैसा लिखा यह सब आपके सामने हैं। यह सबक जिंदगी भर याद रहेगा। वाकई सीधा होना व किसी का निस्वार्थ भाव से सहयोग करना मौजूदा परिदृश्य में जोखिम भरा काम है। धन्यवाद तो दूर की बात है लोग पागल का तमगा जरूर चस्पा कर जाते हैं। बहरहाल देखने की बात यह है कि सीधे लोगों के दिन फिरते हैं या फिर यह दुर्लभ प्रजाति लुप्त हो जाएगी।

इस तरह जलते हैं हाथ

बस यूं ही
होम करते हाथ जले, यह कहावत लगभग हम सभी ने सुनी होगी। और जब सुनी होगी तो इस कहावत का अर्थ भी मालूम होगा। चलो किसी को मालूम नहीं है तो बता देता हूं। इसका अर्थ होता है भला करते हुए नुकसान हो जाना। कल मेरे साथ कुछ एेसा ही हुआ। दोपहर बाद की बात है। फेसबुक पर स्नेहीजन रतनसिंह जी चांपावत का एक मैसेज आया। मैसेज का मजमून कुछ इस तरह से था कि आजकल एफबी पर हैकर्स सक्रिय हैं। वो आपकी आईडी को हैक करके आपके नाम से आपके एफबी दोस्तों को कुछ आपत्तिजनक व अश्लील वीडियो भेज सकते हैं। अगर किसी के पास मेरे नाम से इस तरह का वीडियो आता है, तो यह वीडियो मेरे द्वारा भेजा हुआ नहीं होगा। इसके आगे लिखा था कि कृपया इस मैसेज को आप अपने तमाम एफबी दोस्तों को भेजिए। चूंकि रतनसिंहजी चांपावत एक सम्मानित नाम हैं और व्याख्याता हैं, लिहाजा उनकी बात का अनुसरण करते हुए मैंने मैसेंजर से अधिकतर एफबी फ्रेंड्स को भेज दिया। हालांकि मैसेंजर में फोन बुक वालों के नाम भी शो होते हैं, लिहाजा बहुत से एेसे लोगों के पास भी यह मैसेज सेंड हो गया जो एफबी फ्रेंड नहीं हैं।
इस मैसेज के बाद कई जनों ने मैसेंजर के माध्यम से ही इस मैसेज को लेकर कई तरह की पूछ परख की। कइयों ने अपनी शंकाएं व जिज्ञासाएं शांत की है। दोपहर से लेकर शाम तक तो मैं जिज्ञासाएं शांत करने में ही जुटा रहा। खैर, शाम होते होते- मैंने कुछ मित्रों को मैसेंजर से मैसेज भेजे लेकिन बार-बार अस्थायी रूप से ब्लॉक का मैसेज आ रहा था। मैंने यही सोचा कि मित्र लोग शायद बुरा मान गए ,क्षइसीलिए ब्लॉक कर दिया गया। हालांकि इस तरह की समस्या सभी के साथ नहीं थी, इसलिए शक और भी गहरा रहा था ऐसा हो क्यों रहा है। आज सुबह भी एक एफबी मित्र को मैसेज किया लेकिन जल्द ही नोट सेंट का मैसेज आ गया। दो तीन बार किया लेकिन बात बनी नहीं। आखिर उनके कमेंट के नीचे वो बात पूछनी जो मैं मैसेंजर में पूछना चाह रहा था। खैर, समस्या यथावत थी। शाम को आफिस के साथियों से चर्चा की तो सलाह दी गई कि लोगआउट कर लो। यह भी किया। पासवर्ड भी बदला लेकिन समस्या बनी रही। इसी बीच एफबी फ्रेंड लिस्ट में पहले से शामिल एक जने की और रिक्वेस्ट आई। मैं सोच रहा था कि यह तो पहले से मित्रता सूची में हैं, लिहाजा उनको मैसेंजर पर मैसेज किया कि दूसरी आईडी कैसे बनाई, लेकिन यहां भी मैसेज नोट सेंट आ रहा था। आखिर यह मर्ज समझ नहीं आ रहा था कि कुछ कुछ मित्रों के साथ ही एेसा क्यों हो रहा है। काफी पड़ताल के बाद सार यह निकला कि कल एक साथ हजारों मैसेज भेजे यह उसी का नतीजा है। मतलब सलाह देना भारी पड़ गया। यानि कि होम करते हाथ जला लिए। खैर, एक दो दिन में यह हालात सामान्य होंगे पर एक नया अनुभव जरूर हो गया। कहा भी कहा गया है कि अक्ल बादाम खाने से नहीं भचीड़ खाने से आती है। और यह मामला भी तो किसी भचीड़ से कम नहीं है।

इक बंजारा गाए 26

 मेरा साप्ताहिक कॉलम......
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संत की पीड़ा
माना जाता है कि संत तो सबके भले की ही सोचते हैं। वे तो लोक कल्याण की बातें करते हैं। पिछले कुछ समय से उल्टा परिदृश्य सामने आ रहा है। संत के आगमन से लेकर ठहरने तक तमाम इंतजामात इतने लग्जरियस किए जाते हैं कि सुनकर व देखकर हैरानी होती है। संतों के स्वागत व उनके आयोजन पर हजारों-लाखों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। पिछले दिनों श्रीगंगानगर आए एक संत के स्वागत में भी खूब पलक पावड़े बिछाए गए लेकिन संत का मूड उखड़ा-उखड़ा सा नजर आया। यहां तक कि उनके कार्यक्रम का संचालन कर रहे हैं। शख्स को उन्होंने चुप करवा दिया। बताया गया है कि संत यहां तक बोल गए कि आज यहां दलाई लामा आते तो उनके स्वागत में कलक्टर, एसपी और मंत्री तक सब आते। संभवत: संत की पीड़ा कार्यक्रम में कम आई भीड़ और किसी प्रशासनिक अधिकारी के न पहुंचने को लेकर थी। इसके लिए दोषी किसको ठहराया जाए, लिहाजा गुस्सा बेचारे मंच संचालक पर उतरा। कार्यक्रम में मौजूद श्रोता संत का यह आचरण व अखड़ा मूड देखकर एक बार सोचने को मजबूर जरूर हुए कि आखिर यह माजरा क्या है। 
उलटफेर का किस्सा
उलटफेर कहां नहीं होता। फिल्मों से लेकर खेल मैदान तक। सियासत से लेकर आम आदमी के जीवन तक उलटफेर हो जाता है। कुछ ऐसा ही उलटफेर एक शख्स व उसकी संस्था के साथ हुआ बताते हैं। कला प्रेमी इस शख्स ने मुख्यमंत्री के जनसंवाद कार्यक्रम में प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह की याद में स्मारक बनाने की बात कही। बताते हैं कि यह मामला सीएम ने जिला प्रशासन को रेफर कर दिया। सीएम के निर्देशों की अनुपालना में प्रशासन ने बैठक भी बुलाई। उलटफेर का किस्सा यहीं से शुरू होता है। जनसंवाद में स्मारक की बात कहने वाले शख्स या उसकी संस्था के किसी सदस्य को इस बैठक में बुलाया तक नहीं गया। बैठक में भी कुछ खास लोगों को ही बुलाया गया। अब यह बात तो उस शख्स के भी समझ नहीं आ रही है कि प्रशासन ने यह उलटफेर क्यों व किसलिए किया। दबे स्वर में चर्चा इस बात की जरूर है कि प्रशासन की स्मारक बनाने में दिलचस्पी कम है। बताया जा रहा है कि प्रशासन की इच्छा तो यह है कि किसी तरह से इस मामले का पटाक्षेप हो जाए। स्मारक की जगह कोई स्टेच्यू ही लग जाए। देखते हैं आगे क्या होता है। 
स्वागत के बहाने
श्रीगंगानगर व बीकानेर दोनों पड़ोसी जिले हैं, लिहाजा दोनों में काफी समानताएं हैं। स्वागत करने की परम्परा भी इसी का ही हिस्सा है। सम्मान के मामले में श्रीगंगानगर दो कदम इसीलिए आगे हैं, क्योंकि यहां सम्मान की बाकायदा मार्केटि ंग भी होती है। खूब प्रचार-प्रसार होता है। इस बात का गली-गली डंका पीटा जाता है। वैसे स्वागत की इस परम्परा के पीछे मुख्य कारण खुद का प्रचार भी होता है। स्वागत के बहाने के कई लोग अपना नाम चमका लेते हैं। अखबारों की सुर्खियां बन जाते हैं। मतलब यह है जितना पसीना स्वागत वाले दिन नहीं बहाया जाता है, उससे कहीं ज्यादा दौड़ धूप तो पहले की जाती है ताकि नाम चर्चा में बना रहे। इस स्वागत में आर्थिक सहयोग करने वाले भी कम नहीं होते हैं। स्वागत के बहाने मोटा खर्चा करने तथा उससे पहले चंदा एकत्रित करने के भी कई उदाहरण सामने आते हैं। सहयोग करने वालों के नाम भी खूब प्रचारित किए जाते हैं। 
नेताजी का दर्द
नेताओं का मीडिया वालों से रिश्ता कुछ अलग व गहरा होता है। लेकिन रिश्ते में खटास उस वक्त पैदा होने लगती है कि जब मीडिया खरी-खरी पर उतर जाए। नेताओं की मनमाफिक कवरेज न हो। कुछ ऐसा ही हाल शहर के एक नेताजी का है। उनका दर्द है कि मीडिया हमेशा उनको लेकर नकारात्मक ही रहता है। कभी सकारात्मक खबर नहीं दिखाता। यह बात अलग है कि वह नकारात्मक खबरें नेताजी की न होकर उनसे संबंधित संस्था से होती है। पर नेताजी को कौन समझाए कि यह खबरें व्यवस्थागत खामियों पर केन्द्रित हैं जबकि वे उनको व्यक्तिगत ले रहे हैं। नेताजी के मन के किसी कोने में यह डर जरूर बैठा कि विभाग की नकारात्मक खबरें उनके सपने को पूरा करने में बाधक बन सकती हैं। बस यह सोच-सोच कर वे परेशान हैं। यह बात अलग है कि इन नेताजी ने जो-जो कथित काम करवाए हैं, उनका लाभ कम परेशानी ज्यादा हुई है। बात चाहे सीवरेज व पाइप लाइन बिछाने की हो, सड़कें टूटने की हो। नाले जाम होने की हो या फिर इंटरलॉकिंग के काम की हो। कुछ भी हो लेकिन नेताजी का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 12 अप्रेल 18 के अंक में प्रकाशित

इस काम का लाभ किसे

टिप्पणी
शिव चौक से जिला अस्पताल तक इंटरलॉकिंग काम चल रहा है। कथित रूप से यह सौन्दर्यीकरण का हिस्सा है। निर्माण कार्य शुरू होने पर दावे किए गए थे कि यह पूरा हो जाएगा तो जयपुर व चंडीगढ़ की तरह दिखाई देगा, लेकिन दावों की हवा 'सौन्दर्यीकरण' पूरा होने से पहले ही निकल रही है। इस काम को देख कर मन में सहज ही एक सवाल उठता है कि यह काम किसके लिए हो रहा है? क्यों हो रहा है? तथा इसका लाभ किसे मिलेगा? क्या सोचकर इस छोटे से टुकड़े का चयन किया गया? इससे अच्छा तो इस मार्ग को अतिक्रमण मुक्त करवा दिया जाता। इससे यहां से गुजरने वालों के लिए बहुत बड़ी राहत होती, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस काम से जिम्मेदारों को हासिल क्या होता? विकास पर स्वार्थ हावी है। खैर, कछुआ गति से काम जारी है। इंटरलॉकिंग के नाम पर सड़क चौड़ी हो रही है, लेकिन हकीकत में हो उलटा रहा है। वर्तमान में इस छोटे से टुकड़े की बड़ी समस्या अतिक्रमण है। सड़क पर खुलेआम रेता बजरी का कारोबार होता है। दिन भर रेता बजरी के ट्रक और टै्रक्टर से रास्ता बाधित होता है। कई बार तो लंबा जाम तक लग जाता है। यह काम क्यों हो रहा है? किसका संरक्षण है इस काम के पीछे? क्यों जिम्मेदार यहां आंख मूंद लेते हैं? क्यों चंद लोगों के कारोबार के आगे लाखों लोगों को परेशान किया जा रहा है? अतिक्रमण करने वाले इन चंद लोगों से इतने स्नेह की आखिर वजह क्या है? इन सब सवालों को दरकिनार कर फिलहाल सौन्दर्यीकरण के नाम पर जमकर पैसा बहाया जा रहा है। एक ऐसे काम के लिए जिसका संभावित अंजाम शीशे की तरह साफ दिखाई दे रहा है। अतिक्रमण करने वालों को जिस विभाग ने शह दे रखी है वह कल इंटरलॉकिंग होने के बाद उनको हटा देगा, यह किसी भी सूरत में संभव नहीं लगता। खास बात देखिए, जहां इंटरलॉकिंग हो गई है, वहां फिर से वाहन खड़े होने लगे हैं। कई पेड़ व खंभे भी इस इंटरलॉकिंग की जद में आ रहे हैं लेकिन उनको हटाया नहीं जा रहा है। यही पेड़ व पोल तो अतिक्रमण का प्रमुख आधार बनते हैं। जहां इंटरलॉकिंग हो गई है वहां बेरोकटोक वाहन खड़े होने लगे हैं। इससे जाहिर हो रहा है कि इस सड़क पर जो कारोबार चल रहा है, वह उसी अंदाज में चलता रहेगा। बिना अतिक्रमण हटाए इंटरलॉकिंग करना एक तरह से पैसे की बर्बादी है। कथित रूप से इंटरलॉकिंग की गई जगह फुटपाथ के काम आएगी। दुपहिया वाहन चालक व पैदल राहगीर इस फुटपाथ का उपयोग करेंगे, लेकिन कब्जे काबिज रहने की सूरत में फुटपाथ का उपयोगी होना संदेहास्पद है। सड़क और फुटपाथ के बीच में एक छोटी सी दीवार खड़ी करके क्षेत्राधिकार तय किया जा रहा है, इससे हाइवे और भी सिकुड़ गया है। बड़ा सवाल यह भी है कि फुटपाथ पर जब वाहन खड़े होंगे, रेता व बजरी का कारोबार होगा तो दुपहिया वाहन व पैदल राहगीर कहां से निकलेंगे? जाहिर सी बात है वो वहीं से गुजरेंगे, जहां से अब गुजर रहे हैं। तो फिर यह इंटरलॉकिंग किसके लिए है और क्यों है? इतना ही नहीं अमानक सामग्री से बिना अभियंता की देखरेख में हो रहे काम की गति भी बेहद धीमी है। निर्माण कार्य के चलते यहां रोज जाम लगने लगा है। इधर पैदल राहगीर सिवाय धूल फांकने और व्यवस्था को कोसने के अलावा कुछ कर नहीं पा रहा है। जिम्मेदारों को इस तरह के काम तो कतई नहीं करने चाहिए जहां आमजन को लाभ भी न मिले और सरकारी राशि भी खर्च हो जाए। उन्हें यह बात हमेशा जेहन में रखनी चाहिए कि चंद लोगों के लाभ के लिए इस तरह आमजन की अनदेखी करना कभी-कभी भारी भी पड़ जाता है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 7 अप्रेल 18 के अंक में प्रकाशित 

इक बंजारा गाए..25


कमाल की कार्रवाई
वैसे तो सभी विभाग समय-समय पर अपने हिसाब से कार्रवाई करते रहते हैं। यह कार्रवाइयां उनकी ड्यूटी का हिस्सा जो होती हैं। फिर भी पुलिस की कार्रवाई अक्सर सुर्खियों में रहती है। भले ही वह पुलिस करे या यातायात पुलिस, पर चर्चा जरूर होती है। अब श्रीगंगानगर यातायात पुलिस को ही ले लीजिए। शहर में पार्र्किंग की जगह तो आपको शायद ही कहीं दिखाई दे। यहां तक दुपहिया व चौपहिया भी सड़कों पर ही खड़े होते हैं। यह तो गनीमत है कि श्रीगंगानगर के रास्ते चौड़े व सीधे हैं, इस कारण यातायात बाधित नहीं होता। पार्र्किंग की जगह के अभाव में वाहनों को हर कहीं खड़ा कर दिया जाता है। जाहिर सी बात है कि जगह ही नहीं है तो फिर वाहन कहीं तो खड़ा करना ही पड़ेगा लेकिन यातायात पुलिस को इससे कोई मतलब नहीं। उसकी क्रेन निकलती है तो ज्यादा गाज चौपहिया वाहनों पर गिरती है। बाजार में कोई परिवार के साथ आया शख्स दुकान में खरीदारी कर रहा होता है, पीछे से यातायात पुलिस की क्रेन उसकी गाड़ी को वहां से उठा लेती है। यह अलग बात है कि इतनी कार्रवाई करने, इतना राजस्व वसूलने के बावजूद यातायात पुलिस किराये की क्रेन पर निर्भर है। सुना है इससे क्रेन वालों वालों का धंधा भी अच्छा खासा चल रहा है।
किसको क्या मिला
राजनीति के रंग निराले हैं। न तो यह हर किसी के जल्दी से समझ में आती है न ही यह सभी को रास आती है। यह बात दीगर है कि राजनीति को लेकर मन में लड्डू सबके फूटते हैं। राजनीति की एबीसीडी सीखने वाले तो मौकों की तलाश में रहते हैं कि कब मौका मिले और कब हाथ दिखाएं। राजनीति की राह पर प्रवेश करने वालों की नजर सामाजिक आंदोलन या प्रदर्शन पर ज्यादा टिकी होती है। उनका प्रयास रहता है येन-केन-प्रकारेण इन संगठनों के हमदर्द बनकर सहानुभूति कैसी बटोरी जाए। हालांकि इन नवेले नेताओं में कुछ ऐसे भी हैं जिनकी कार्यप्रणाली देखकर बड़े नेता भी दंग रह जाएं। यह अंदर से कुछ और बाहर से कुछ नजर आते हैं। पिछले दिनों एक बड़े में प्रदर्शन में शहर के एक युवा नेताजी सार्वजनिक रूप से तो चुप थे लेकिन अंदरखाने सोशल मीडिया पर मैसेज वायरल कर वाहवाही बटोरने से गुरेज नहीं कर रहे थे। इतना ही नहीं एक नए-नए नेताजी तो बाकायदा सार्वजनिक रूप से मंच पर दिखाई दिए जबकि उनके मिलते-जुलते संगठन प्रदेश में इस आंदोलन में कहीं चुप तो कहीं विरोध में नजर आए। अब राजनीति का यह गिरगिटिया रंग हर किसी के जल्दी से समझ नहीं आया और न ही कोई इसे तत्काल भांप पाता है।
दोनों हाथ में लड्डू
एक बहुत चर्चित शेर है, बनाने वाले तूने कमी न की, किसको क्या मिला मुद्दर की बात है। बाजार में जैसी चर्चाएं हैं, उन पर यकीन कर लिया जाए तो यह शेर आजकल उन किसान नेताओं पर सटीक बैठ रहा है जिन्होंने पिछले दिनों सीएम के आगमन के दौरान समझौता कर लिया। सीएम के दौरे के समय के विभिन्न विचारधाराओं के किसान नेता एकजुट नजर आए। या यूं कहे कि सतारूढ़ दल को छोड़कर बाकी सभी दलों से जुड़े किसान नेता एक मंच पर थे। इस एकता को देखकर लगा कि वाकई श्रीगंगानगर के किसानों के लिए संघर्ष करने वाले एक नहीं कई हैं। सीएम के दौरे के कारण शासन-प्रशासन वैसे ही बैकफुट पर था। इनका एकसूत्री उद्देश्य यही थी कि किसी तरह किसान नेताओं को शांत कर लिया जाए ताकि सीएम का दौरा शांतिपूर्वक निबट जाए। कई दौर की वार्ताएं हुई आखिर कथित रूप से समझौता हो गया। यह बात किसान नेताओं व सरकार के नेताओं के बीच की थी। अब आम किसान को तो यह भी नहीं पता कि समझौता किन मांगों को लेकर हुआ और समझौते में क्या है। सीएम चली गई लेकिन समझौते को लेकर किसान खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। वह बताने की स्थिति में नहीं है कि उसको क्या मिला।
धर्म का सहारा
श्रीगंगानगर में धर्म के प्रचार-प्रसार का काम कुछ ज्यादा ही है। यहां तक कि गाहे-बगाहे बड़े-बड़े आयोजन होते ही रहते हैं। कार्यकम इतने बड़े व तड़क-भड़क वाले होते हैं कि पैसा भी खुलकर खर्च किया जाता है। यहां तक कि कई संगठनों में तो इस बात की होड़ सी लग जाती है कि वह अपने कार्यक्रम को इक्कीस साबित कैसे करें। धर्म के प्रचार की इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में अक्सर नियमों की अवहेलना होती रहती है। धर्म का मामला समझ शासन-प्रशासन भी आंख मूंद लेता है। आयोजन के प्रचार-प्रचार के लिए शहर के गले, चौराहे व नुक्कड आदि को पोस्टर व होर्डिंग्स से रंग दिया जाता है। शायद ही ऐसा कोई सप्ताह बीतता होगा जब शहर के प्रमुख चौक बदरंग न होते हों। आजकल इन संगठनों ने बिना किसी रोक टोक व आपत्ति के प्रचार का एक और रास्ता और खोज लिया है। वो इन कार्यक्रमों में जानबूझकर खबरनवीसों को जोडऩे लगे हैं। उनको जिम्मेदारी देने लगे हैं। इससे संगठनों को दोहरा फायदा होने लगा है। प्रचार का प्रचार ऊपर से शहर बदरंग करने की बात कहने वालों का मुंह भी चुप। वाकई धर्म के साथ खुद का प्रचार करना कोई इन संगठनों से सीखे।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 5 अप्रेल 18 के अंक में प्रकाशित 

राष्ट्रपिता बदहाली के भंवर में

पीड़ा
अभी कुछ दिन पहले गांव गया था तो जिला मुख्यालय से होकर गुजरा। शहर के हृदय स्थल गांधी चौक में एक बड़ा सा बधाई संदेश देख कर चौंका। बड़े से साइनबोर्ड पर झुंझुनूं के सभापति को बड़ा सा फोटो लगा था। साथ में गणतंत्र दिवस पर सम्मानित होने के उपलक्ष्य में बधाईसंदेश था। बड़ा ही आकर्षक होर्डिंग्स। जगह एेसी कि अनायास ही सबकी नजर उस पर पड़ जाए। विडम्बना देखिए इसी होर्डिंग्स के ठीक बगल में गांधी चौक में लगी राष्ट्रपिता की प्रतिमा अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। इस पार्क में स्वच्छ भारत मिशन की धज्जियां तो सरेआम उड़ रही हैं। इससे भी बड़ी बात है कि गांधीजी की लाठी टूटी हुई है। इस लाठी का बजट इतना सा है कि किसी वार्ड का सामान्य पार्षद भी इसकी मरम्मत करवा सकता है लेकिन धन्ना सेठों के नगर झुंझुनूं में गांधी जी एक अदद लाठी को तरस रहे हैं। इससे भी बड़ी खेदजनक बात यह है कि इनकी इस लाठी को जुगाड़ के सहारे जोड़ दिया गया है। कुछ जागरूक लोगों ने इस टूटी लाठी की तरफ से ध्यान दिलाने का प्रयास भी किया लेकिन जनप्रतिनिधियों को खुद के प्रचार से फुरसत मिले तब गांधीजी को संभाले। झुंझुनूं का गांधी पार्क वैसे कई एेतिहासिक सभाओं का साक्षी रहा है। शहर के बीचोबीच होने के कारण झुंझुनूं आने वाले लोग इस पार्क में सुस्ता लेते हैं लेकिन पार्क का रखरखाव भी उस स्तर का नहीं है कि यहां बैठकर सुकून महसूस हो या खुशी का एहसास हो। वैसे गांधी पार्क पचास साल से भी अधिक पुराना है। पार्क का शिलान्यास हुए भी पचास साल से ज्यादा समय बीत गया लेकिन कभी किसी ने न तो पार्क की सुध ली और न ही गांधी जी की। बहरहाल, देखने की बात यह है कि दोनों ही राजनीतिक दलों के प्रिय गांधीजी की इस दशा तथा उनकी टूटी लाठी पर किसको तरस आता है। मेरी दिली ख्वाहिश तो यह है कि यह काम कोई भामाशाह ही कर दे ताकि जनप्रतिनिधियों को बेहतर ढंग से आइना दिखाया जा सके क्योंकि यह पार्क भी एक भामाशाह की ही बदौलत है। देखते हैं, इस सार्थक पहल के लिए कौन आगे आता है।

Thursday, March 29, 2018

इक बंजारा गाए-24

पत्रकार वार्ताओं की हकीकत
श्रीगंगानगर में पत्रकार वार्ताओं का प्रचलन अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा ही है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इनकी तिथि कभी भी तय हो सकती है। देर रात समाचार पत्रों में फोन या मैसेज के माध्यम से पत्रकार वार्ता की सूचना तक दे जाती है। इतना ही नहीं, इससे बड़ी बात तो यह है कि आजकल पत्रकार वार्ताओं के लिए बाकायदा प्रायोजक मिलने लगे हैं। यह संबंधित पक्ष व पत्रकारों के बीच बिचौलिये की भूमिका निभाते हैं। पत्रकारों को सूचना देने से लेकर कवरेज तक की गारंटी इन बिचौलियों द्वारा कथित रूप से दी जाती है। इस काम में हिसाब-किताब क्या रहता है, यह तो संबंधित पक्ष व प्रायोजक ही जानें लेकिन यह काम आजकल चरम पर है। खास बात यह है कि हर दूसरी या तीसरी पत्रकार वार्ता का प्रायोजक एक ही चेहरा मिलता है। हद तो कल परसों हो गई जबकि एक पुलिस एनकाउंटर में मारे गए एक गैंगस्टर के परिजनों की प्रेस वार्ता तक करवा दी गई। यह बात अलग है कि एनकाउंटर करने वाली पुलिस भी पंजाब की और गैंगस्टर भी पंजाब का। यहां पत्रकार वार्ता करने का सबब समझ ही नहीं आया। पता नहीं पत्रकार वार्ता करवाने वाले प्रायोजक ने गैंगस्टर के परिजनों को क्या सब्जबाग दिखाए।
भावनाओं का तड़का
किसी तरह का काम करवाना हो तो भावनाएं सबसे कारगर माध्यम मानी जाती हैं। जहां भावनाओं का तड़का लग जाता है, वहां कुछ होने की उम्मीद बंध जाती है। कुछ इसी तरह की सोच श्रीगंगानगर में भाजपा के लोगों की है। मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर आमजन में जो संदेश प्रचारित किए जा रहे हैं, इनमें भावनाओं को शामिल किया जा रहा है। सोशल मीडिया के माध्यम से जो मैसेज भेजे जा रहे हैं, उनमें एक भावनात्मक अपील है। गुरुवार को मिनी सचिवालय का शिलान्यास कार्यक्रम प्रस्तावित है। इसी संदर्भ में यह मैसेज वायरल किए जा रहे हैं। मैसेज है, जिस प्रकार हमारे संस्कारों में सुबह का भूला शाम को घर आ जाए उसको भूला नहीं कहते। वही काम श्रीगंगानगर की जनता के लिए प्रदेश की मुख्यमंत्री का है। चलो चार साल बाद ही सही, उन्होंने श्रीगंगानगर की जनता को याद तो किया। अब हमें सब भुलाकर एकता का परिचय देते हुए कार्यक्रम में शामिल होना है। अब यह भावनात्मक अपील कितनी कारगर साबित होगी। कितने लोग इस अपील का मानकर कार्यक्रम में आएंगे यह तो कल पता चलेगा। फिलहाल भावनाओं का यह तड़का राजनीतिक गलियारों में जबरदस्त चर्चा का विषय बना हुआ है।
दूरी का सबब
कहते हैं कि चुनाव के समय दूरियां अक्सर नजदीकियों में तब्दील हो जाती हैं। विशेषकर राजनीतिक दल समाचार पत्रों के दफ्तरों व जनता के बीच अपने मुखबिर छोड़कर वास्तविक फीडबैक लेते रहते हैं। ऐसा लंबे समय से हो रहा है लेकिन इस बार इस परंपरागत तरीके में बदलाव देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री के श्रीगंगानगर दौरे से पहले जनता की नब्ज भांपने के लिए जो तरीका अपनाया गया, वह तो यही कहता है। फीडबैक लेने में इतनी सावधानी बरती गई कि मीडिया को कानोकान खबर तक न हो। पहले दिन शहर के पार्षदों से जब फीडबैक लिया गया तो मीडिया का प्रवेश वर्जित रखा गया। इसी तरह दूसरे दिन जब किसानों से बात हुई तब भी खबरनवीसों को बाहर भेज दिया गया। मीडिया से इस तरह की दूरी से साफ जाहिर होता है कि कहीं न कहीं कुछ ऐसा अनुभव रहा है, जिसने इस तरह की दूरी बनाने को मजबूर किया है। शायद राजनीतिक नुमाइंदों को ऐसा लगता होगा कि मीडिया की मौजदूगी में वे सब नहीं कह सकते हैं जो ऑफ द रिकॉर्ड होता है। फिर भी कोई न कोई डर तो है ही जो ऐसा करने को मजबूर कर रहा है।
धर्म का सहारा
राजनीति में धर्म की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। धर्म ने कइयों की डूबती नैया पार लगाई है। वैसे भी जब सियासत में जब सारे तौर तरीकों कारगर नहीं रहते तब धर्म ही ऐसा मसला है जो कुछ सफलता दिला सकता है। कुछ ऐसा ही शहर के एक नेताजी के साथ हो रहा है। लंबे समय से राजनीतिक हाशिये पर चल रहे इन नेताजी की कुछ दिन पहले ही अपने पुराने दल में वापसी हुई है। वापसी तो हो गई लेकिन तात्कालिक रूप से नेताजी ऐसा कोई काम नहीं कर पाए जो जनता की नजरों में उनको छवि को चमका सके। हालांकि उनका मीडिया मैनेजमेंट गजब का है लेकिन वह भी क्या करे जब करने को कुछ हो नहीं। खैर, लंबे समय से किसी मौके की ताक में बैठे नेताजी को राम का सहारा मिल गया। इस बहाने उन्होंने अपना शक्ति प्रदर्शन भी कर लिया। कहने वाले भले ही रामनवमी के परंपरागत कार्यक्रम को हाइजैक करने का आरोप लगाएं लेकिन नेताजी ने अपना काम बखूबी कर लिया। वैसे इन नेताजी के बारे में कहा तो यह भी जाता है कि यह खुद तो नहीं जीत सकते लेकिन जिसके साथ लग जाते हैं, उसकी राह जरूर आसान कर देते हैं। देखने की बात है नेताजी का आशीर्वाद इस बार किसके साथ रहता है और किसकी राह आसान होती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 29 मार्च 18 के अंक में प्रकाशित 

जर्जर होती पुरखों की शान

पीड़ा
मैंने पड़ दादाजी तो क्या दादाजी को भी नहीं देखा। जब पैदा हुआ उससे चार पांच साल पहले ही दादाजी का निधन हो चुका था। पड़दाजाजी तो उससे पहले ही स्वर्गवासी हो गए थे। लेकिन पड़दादाजी का नाम व उनकी ख्याति मैंने खूब सुनी है। सूरसिंह नाम था पड़ दादोसा का। उस वक्त अंग्रेजों की फौज में थे। पैसे वाले थे। चांदी के काफी सिक्के थे उनके पास। दादीजी बताती थी कि दिवाली पर पूजन के दौरान एक पूरी परात चांदी के सिक्कों से भर जाती थी। एक सोने का मोटा डोरा भी था जो शादी के समय दूल्हे को पहनाया जाता है। चर्चा तो यहां तक भी सुनी है कि पड़दादाजी की बही में आसपास के कई गांवों के लोगों के नाम लिखे थे, जो उनसे उधार लेते थे। पड़दादाजी के दो पुत्र हुए। बड़े अर्जुन सिंह व छोटे किशनसिंह। दोनों ही पुत्र स्वाभिमानी थे, लिहाजा पिता के विचारों से तालमेल कम ही बैठा। बड़े भाई व मेरे दादोसा अर्जुन सिंह ने जीवन भर खेती की जबकि किशनसिंह डूंडलोद ठिकाने में तहसीलदार थे। बताते हैं कि उन्होंने लोगों को खूब जमीनें बांटी लेकिन खुद के लिए कुछ नहीं रखा। पड़दादाजी ने आज से करीब सौ साल पहले एक हवेली बनाई थी। इस तरह की हवेलियां गांव में गिनी-चुनी ही हैं। इसी हवेली में मेरा जन्म हुआ। लेकिन इसके बाद हम नोहरे में आकर रहने लगे। हवेली का भाइयों में बंटवारा हुआ तो पिताजी के हिस्से में एक चौबारा आया जबकि एक कमरा दादीजी के नाम का रखा गया। चूंकि दादीजी हमारे पास थी, लिहाजा वह कमरा भी एक तरह से हमारे ही हिस्से में आ गया। धीरे-धीरे सभी भाइयों ने अपने-अपने नोहरों में पक्के मकान बना लिए तो हवेली सूनी हो गई। वैसे गांव की अधिकतर हवेलियों का हश्र एेसा ही है। मेरे बचपन की बहुत सी यादें इस हवेली से जुड़ी हैं। गर्मियों की छुट्टियों में हम बच्चे लोग हवेली में खूब खेलते। धमाल मचाते। दरवाजे के गेट खोल देते ताकि हवा लगती रहे। तब गांव में बिजली आने का समय व घंटे निर्धारित थे। तब हवेली एकदम साफ सुथरी और चकाचक थी।
धीरे-धीरे इसकी सारसंभाल कम होती गई। नौकरी के चक्कर में जो गांव से निकला फिर उसने घर की तरफ रुख नहीं किया। हमारे परिवार के अधिकतर लोग बाहर ही बस गए। दादाजी के पांच बेटों में चार का निधन हो चुका है। उन चारों बेटों के लगभग सभी पुत्र बाहर बस चुके हैं। उनके नए घरों पर भी ताला लटका है। देख रेख व बिना आदमियों के हवेली वीरान हो गई। अब यह पशुओं के लिए चारा डालने, आवारा पशु व कुत्तों की शरणगाह बन गई। देखरेख के अभाव में जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है। अभी गांव गया तो उसकी दुर्दशा देखकर सच में रोना आ गया। आंखों के सामने पुरखों की शान को जमींदोज होता देख रहा हूं।

इस बदलाव का लाभ किसे?

टिप्पणी
लंबे समय बाद श्रीगंगानगर की कायापलट हो रही है। यह है तो 'क्षणिक', लेकिन एकबारगी तो सुकून देने वाली है। कहीं रास्तों से मलबा हट रहा है तो कहीं कूड़ा-कचरा भी साफ किया जा रहा है। सड़कों पर धूल न दिखे न उड़े, इसके लिए भी पूरी कवायद की जा रही है। कहीं डिवाइडरों पर रंग रोगन हो रहा है तो कहीं प्लास्टर किया जा रहा है। कुछ चौक चौराहों पर भी सजावट की गई है। यहां तक कि बदहाल कई सड़कों के दिन भी बदल गए हैं। लंबे समय से टूटी-फूटी सड़कें यकायक सुधर गई हैं। शहर को साफ दिखाने व सजाने में किसी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है। यह सारी दौड़ धूप इसीलिए हो रही है, क्योंकि आज लंबे समय बाद प्रदेश की मुख्यमंत्री श्रीगंगानगर शहर में आ रही हैं। इस कारण प्रशासनिक अमले ने पूरी ताकत झौंक रखी है। दिन रात एक कर दिया है। पूरा जोर इसी बात पर है मुख्यमंत्री शहर को जैसा देखना चाहती हैं, सब कुछ वैसा ही दिखाई दे। कहीं किसी तरह की कमी नजर न आए। इस तरह की दौड़ धूप अक्सर किसी अधिकारी या बड़े मंत्री के आगमन पर होती रहती है। इस बार ज्यादा इसीलिए है, क्योंकि प्रदेश की मुखिया खुद आ रही हैं, लिहाजा साफ-सफाई व सजावट के तौर तरीकों में भी अंतर साफ देखा जा सकता है। लेकिन यह अस्थायी बदलाव कुछ स्थान विशेष तक ही सीमित है। सारा जोर केवल उन्हीं स्थानों पर है, जहां से मुख्यमंत्री का कारवां गुजरना प्रस्तावित है। जहां-जहां से वो गुजरेंगी, वहां सब कुछ चकाचक किया जा रहा है। इन कामों की गुणवत्ता की दो दिन बाद भले ही खिल्ली उड़े, लेकिन फौरी तौर पर तो यह कारगर ही है, साथ ही काम निकालने का नायाब नुस्खा भी है। 'जंगल में मंगल' करने की इस पूरी कवायद में निर्माण अधिकारियों सहित ठेकेदारों की भी पौ-बारह पच्चीस हो गई है। पानी की तरह सरकारी धन बहाया जा रहा है। अधिकतर निर्माण/मरम्मत कार्य बिना टेंडर जारी किए यानि पेट्टी वर्क के जरिए करवाएं जा रहे हैं, लिहाजा गुणवत्ता की परवाह ना करते हुए निकायों के मुखियाओं ने अपने खासमखास ठेकेदारों को काम बांट दिए हैं। विडम्बना देखिए जिन चौक चौराहों को सजाया गया है, उनको ही बधाई संदेश लगे होर्डिंग्स, बैनर व झंडों आदि से बदरंग कर दिया गया है। बाकी शहर उसी अंदाज में जी रहा है। इन स्थानों पर मुख्यमंत्री के पगफेरे का कोई असर दिखाई नहीं देता। 
बहरहाल, इस तरह की कवायद अगर महीने में एक बार भी हो जाए तो शहर की सूरत बदलते देर नहीं लगेगी। वैसे भी आनन-फानन में तात्कालिक रूप से किया जाने वाला बदलाव व काम स्थायी व दीर्घकाल तक कहां रह पाता है? कितना अच्छा होता यही काम गुणवत्ता के साथ स्थायी होता तो आमजन लाभान्वित तो होता ही, लगे हाथ सरकारी धन का सदुपयोग भी हो जाता। काश, ऐसा हो पाता।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 28 मार्च 18 के अंक में प्रकाशित  

इस सोच व प्रबंधन को सलाम

बस यूं ही
शेयर की गई पोस्ट मैंने सितम्बर 2016 में लिखी थी। तब से लेकर आज तक दो मोटे बदलाव हुए हैं। पहला तो यह है कि स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर जो कि अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया हो गई की झुंझुनूं शाखा में बतौर मुख्य प्रबंधक कार्यरत बड़े भाईसाहब श्री विद्याधरजी झाझड़िया अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। दूसरा बदलाव यह है कि कल 25 मार्च को उनके लाडले डा. जोगेन्द्र झाझड़िया की शादी थी। शादी का कार्ड जरिये व्हाटसएप मेरे पास नौ मार्च को ही पहुंच गया था। कार्ड मिलते ही मैंने बहुत-बहुत बधाई लिखकर भेजा तो उनका मैसेज आया कि भाईसाहब आपको शादी समारोह में जरूर पहुंचना है। यह मेरा विनम्र निवेदन है। मैंने शादी में आने का वादा किया। इस बीच जयपुर की आफिस की मीटिंग होने के कारण मैं 23 मार्च को प्रीतिभोज जिसको गांव में मेळ कहते हैं, में शामिल नहीं हो पाया। अगले दिन 24 मार्च को भाईसाहब के कुएं पर बालाजी के छोटे से मंदिर में मृूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम था। हालांकि गांव में बुलावे के माध्यम से सबको निमंत्रण सुबह ही दे दिया गया था लेकिन मैं दोपहर पौने एक बजे के करीब गांव पहुंचा। मुझे किसी दूसरे माध्यम से सूचना मिली तो मैं भी भाईसाहब के घर धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने रवाना हो गया। वहां गांव के मौजिज लोग बैठे थे। महिलाएं भजन कीर्तन में तल्लीन थी। सबसे खास बात इस उपलक्ष्य में आयोजित हवन में सभी ग्रामीणों की ओर से आहूति डालना। यहां सभी समाजों के लोग समान रूप से अपनी भागीदारी निभा रहे थे। सच में यह नजारा देखकर दिल को सुकून मिला। जिस जातिवाद को लेकर समूचे देश में हाय तौबा मची है। लोग एक दूसरे की जान की दुश्मन बने हैं, वहां इस तरह का माहौल सच में खुशी देता है। इसके साथ परिवार के हर सदस्य का प्रत्येक ग्रामीण से मुलाकात व अटेंड करना। यह प्रबंधन भी वाकई काबिलेगौर था। प्रसाद के रूप में गुड़ लेकर वहां से रवाना हो ही रहा था कि शाम के भोजन के लिए बाकायदा प्यार भरी मनुहार कर दी गई थी। शाम को मैं घर पर ही था कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई, देखा तो विद्याधर जी भाईसाहब ही थे। खास बात देखिए भाईसाहब मेरे से कम से 20 साल बड़े हैं, इसके बावजूद मेरे को महेन्द्रजी भाईसाहब ही कहते हैं। कहने लगे चलो कार लेकर आया हूं, शाम का भोजन वहीं करना है। मैंने कहा भाईसाहब आप चलो मैं आ ही रहा हूं। करीब साढ़े आठ बजे जब उनके घर की तरफ रवाना हुए तो भाईसाहब फिर कार लेकर रास्ते में मिल गए, कहने लगे आपको लेने आया हूं। तब मैं भतीजे के साथ बाइक पर था। हम उनके आगे और वो पीछे-पीछे। हम घर तक पहुंचे तब तक सारे लोग भोजन कर चुके थे जबकि अभी पौने नौ ही बजे थे। गांव में भोजन का काम शाम होते ही शुरू हो जाता है, इसलिए यह एक तरह से लेट ही था। सिर्फ चार पांच लोग रिश्तेदार व मित्र आदि बचे थे जो भोजन कर रहे थे। हम सब भोजन के बाद हथाई करने बैठे। विद्याधरजी भाईसाहब के बड़े भाई साहब हनुमानसिंह जी के जानकार भी मिले। जोधपुर में डाक्टर। बेटा भी डाक्टर। पूरा परिवार ही शादी में आया। करीब दस बजे वहां से मैंने घर आने की अनुमति मांगी। तब परिवार के सभी सदस्य मौजूद थे। मैं इस सम्मान से बेहद अभिभूत था। सुबह दस बजे के करीब बारात का बुलावा आ गया था। समय दिया गया दोपहर बाद तीन बजे। मैं निर्धारित समय पर तय स्थान पर पहुंच गया लेकिन अभी वक्त था। मैं वापस भाईसाहब के घर की तरफ आने लगा तो रास्ते में निकासी मिल गई। आगे डीजे पर झूमने वाले, फिर महिलाएं और आखिर में बग्घी पर सवार दूल्हा। दो सफेद घोड़े इस बग्घी में जुटे थे। यह बग्घी भी संभवत: गांव में पहली बार ही आई थी। पीछे- पीछे गाड़ियों का सिलसिला। आखिरी कार में हनुमानसिंह जी भाईसाहब उतरे और एक साफा मेरे सिर पर रख दिया। कहने लगे गांव में कोई बांधने वाला नहीं है। जोधपुर से 21 साफे बंधवाकर लाए। गाड़ी में एक साथ इतने ही आए। मैंने साफा सिर्फ खुद की शादी में ही पहना था, यह दूसरा मौका था। गुलाबी गोल साफा पहनकर सबसे पहले खुद की सेल्फी ली और तत्काल एफबी पर अपलोड कर दी। वृतांत लंबा हो रहा है लेकिन यहां मकसद किसी तरह की बड़ाई का न होकर इतना बताना है कि बड़ी बारात होने के बावजूद एक-एक आदमी को आत्मीयता से इस तरह अटेंड करने तथा नम्रता के साथ सम्मान देने की कला मौजूदा दौर में बहुत कम या न के बराबर ही दिखाई देती है। विद्याधर जी भाईसाहब को कई बार देखा है। वो मेरा हाथ पकड़कर परिचय करवाकर बहुत खुश होते हैं। यह उनकी अच्छी आदत है। यहां भी अपने रिश्तेदारों व मित्रों से उन्होंने मेरा परिचय करवाया। परिचय के लिए संबोधन वो ही चिर परिचित अंदाज में कि यह महेन्द्र जी भाईसाहब हैं। फलां, फलां हैं। खैर, गाड़ी में भी जब पीछे बैठने लगा तो हाथ पकड़कर बोले नहीं आगे बैठो। मैंने कहा आज तो हम आपके नेतृत्व में हैं, आप आगे बैठो, लेकिन कहां माने, बोले दोनों ही बैठ जाते हैं और फिर दोनों ही बैठे। 
गांव से बारात रवाना हुई। रास्ते में घोड़ीवारा गांव में बालाजी के धोक लगाने के मकसद से रुके तो वहां विदेशियों के एक दल ने दूल्हे को घेर लिया। खूब फोटो लिए। संभवत: राजस्थानी शादी और दूल्हे के परिधान इन विदेशियों को पसंद आ गए थे। आखिरकार बारात बलारां गांव पहुंची। यहां भी नाच गान- खूब हुआ। विद्याधर जी भाईसाहब यहां भी परिचय करवाकर खुश थे। पहले अपने समधी जी से करवाया। फिर सुपुत्र के साढू जी से करवाया। आशीर्वाद समारोह में परिवार के सदस्यों के साथ हाथ पकड़कर स्टेज पर लेकर गए। बीच में रामकरण जी भाईसाहब हालचाल पूछ जाते तो कभी रामनिवास जी भाईसाहब आकर संभाल जाते....। यही बात रोहिताश्व भाईसाहब की थी। सच में प्रेम से रची पगी मनुहार देखकर मैं कायल हो गया। खास बात यह है कि दुल्हन भी डॉक्टर ही है। और सबसे अच्छी अनुकरणीय बात बिना दहेज की शादी। बिलकुल दुल्हन ही दहेज है कि तर्ज पर। सच में सीखना हो तो इस परिवार की सोच, प्रबंधन व लगाव से काफी कुछ सीखा जा सकता है। विशेषकर संबंधों को निभाने की कला का कोई जवाब नहीं। इस खूबी को मेरा सलाम। इस उम्मीद के साथ कि भलाई की हमेशा मार्केटिंग करनी चाहिए ताकि दूसरे लोग भी इससे प्रेरणा लें। कुछ सीख सकें।

यह चहचहाट बड़ा सुकून देती है..

यह मेरा घर है। कभी यहां दिनभर इंसानी आवाजें आती थी लेकिन अब यहां पर सन्नाटा पसरा है..। करीब चार साल से घर का यही हाल है। बीच बीच में कभी कभार यह सन्नाटा टूटता रहता है लेकिन अधिकांश समय ताला ही लगा रहता है। हां इस सन्नाटे को तोड़ता है परिंदों का कलरव। घर के बगल में नोहरे में दर्जनों पेड़ अपने आप ही लग चुके हैं कि यह सघन वन का छोटा सा रूप लगता है। शीशम, शहतूत, खेजड़ी, पीपल, झाड़ी, रोहिड़ा, आम और भी न जाने कितनी ही तरह की वनस्पतियां। यह सब अपने आप ही उगे हैं। वैसे इनको लगाने में सबसे बड़ा योगदान इन परिंदों का ही रहा है। इनकी बीटों में आए बीजों से ही यह संभव हुआ। अब यह पौधे बडे़ पेड़ों में तब्दील हो रहे हैं, लिहाजा मोर, तोते, कबूतर, चिडिया, मैना आदि न जाने कितने ही परिंदों ने यहा स्थायी डेरा बना लिया है। घर में सर्वाधिक शोर तो चिड़िया कि चहचहाहट का है। सुबह से शाम तक यह चहचहाहट बदस्तूर जारी रहती है। चिड़िया को गौरैया भी कहते हैं लेकिन इस नाम से मैं बहुत दिनों बाद परिचित हुआ। गांव में आज भी गौरैया के बारे में पूछ लिया जाए तो शायद ही कोई बता पाए लेकिन चिड़िया के नाम से सब जान जाएंगे। ग्रामीण परिवेश में नर को चिड़ा तथा मादा को च़िडी कहते हैं। वैसे सामान्य नाम चिड़िया ही बोलते हैं।  घर में हर तरफ चिड़िया ही चिड़िया है। घर को अभी चिड़ियाघर का नाम दे दूं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। जहां जहां तक इन चिड़ियाओं की पहुंच है, वहां इनका ही दखल है। हां इंसानी उपस्थिति इनको बेहद अखरती है। इनके एकाधिकार को चुनौती लगती है। घर में चिड़िया का एक घौसला तो गार्डर के ऊपर बना रखा है। पता नहीं कैसे व.किसके सहारे अटका है, क्योंकि गार्डर पर घौसला टिक नहीं पाता है फिर भी चिड़ियाएं हिम्मत नहीं हारती। गार्डर के दूसरी तरफ दीवार होने के कारण संभवत: यह घौसला अटका हुआ रह गया और चिड़िया ने इसमें अंडे दे दिए। अब इस घौसले में चिड़िया के बच्चों की चहचहाट भी खूब शोर मचाती है। दिन भर चिड़िया चुग्गा लाती है और अपने बच्चों की चोंच में डालती है। शीशम की नवकोंपल व बर्गर आदि को तोड़ कर वह अपने बच्चों का निवाला बनाती है। भले ही समूचे विश्व में गौरैया की घटती संख्या एक चिंता का विषय बनी हुई है लेकिन मेरे घर व नोहरे में चिड़ियाओं की संख्या व इनका कलरव सुनकर सुकून मिलता है। मोबाइल के की-पैड पर लिखना मेरे लिए बड़ा मुश्किल काम है क्योंकि जो काम लैबटॉप पर मात्र दस मिनट का होता है उसे मोबाइल पर करने में आधा घंटे से ज्यादा समय लगता है। कंपोज करते करते बड़ी कोफ्त होती है। खैर, मामला सुकून का हो और खुद के आंगन का हो तो फिर हर तरह की तकलीफ झेलना स्वीकार है। आज इन चिड़ियाओं की चहचहाहट व इनकी मस्ती को मैंने मोबाइल के कैमरे में भी कैद किया..। आप भी देखें चिड़ियाएं किस तरह धमाल मचाती है। खेलती हैं, फूदकती हैं और मस्ती करती हैं।

इक बंजारा गाए-23

काम में फर्क का राज
'बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जब चीरा तो क़तरा-ए-खूं न निकला', यह चर्चित शेर शिव चौक से जिला अस्पताल तक बन रही इंटरलॉकिंग पर सटीक बैठ रहा है। इस मार्ग को लेकर पता नहीं क्या-क्या प्रचारित किया गया था। चंडीचढ़-जयपुर तक से तुलना कर दी गई। सौन्दर्यीकरण के नाम पर और भी पता नहीं क्या-क्या प्रचारित किया गया। इसी प्रचार के बहाने के इस काम का शिलान्यास भी हो गया। दो दिन तो युद्धस्तर के बाद काम शुरू हुआ, इसके बाद अचानक से काम बंद होकर शुरू हुआ तो लोग खुद को ठगा सा महसूस करने लगे। इंटरलॉकिंग के काम को जयपुर-चंडीगढ़ की तर्ज पर प्रचारित करने की बात लोगों को हजम नहीं हो रही है। इससे बड़ी चर्चा तो एक की काम के लागत मूल्य में अंतर को लेकर हो रही है। कुछ दिनों पहले शहर में टी प्वाइंट से लेकर बीरबल चौक तक भी इंटरलॉकिंग का ही काम हुआ था, लेकिन उसकी लागत और इसकी लागत में कथित अंतर से जानकारों के कान खड़े कर दिए हैं। खैर, दूध का दूध पानी का पानी होना ही चाहिए। 
नैतिकता ताक पर 
जनप्रतिनिधियों से उम्मीद की जाती है कि वो ऐसा उदाहरण पेश करें कि जनता उनकी वाहवाही करे। जनता उनसे कुछ सीखें। लेकिन श्रीगंगानगर के कई जनप्रतिनिधि उदाहरण पेश करने की बजाय कानून की अवहेलना करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। बार-बार कहने व अखबार में समाचार प्रकाशित होने के बाद बावजूद इन जनप्रतिनिधियों की सेहत पर कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं देता। विशेषकर शहर को बदरंग करने में शहर के कई जनप्रतिनिधियों में होड़ सी मची है। शहर के सौन्दर्य को पलीता लगाने में यह जनप्रतिनिधि कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। विशेषकर विक्रम नवसंवत्सर के उपलक्ष्य में शहर के चौक-चौराहों को होर्र्डिग्स व बैनर से पाट दिया गया है। यह तो जनप्रतिनिधियों के विवेक पर निर्भर करता हैं कि वह गलत का अनुसरण न करे लेकिन बार-बार उसी काम की पुनरावृत्ति से लगता है उन्होंने नैतिकता को ताक पर रख दिया है। विभाग में जनप्रतिनिधियों की इस कारस्तानी के आगे खुद को असहाय महसूस पाते हैं। देखना है जनप्रतिनियों को नैतिकता की याद कब आती है। 
पहुंच का फायदा
बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो पहुंच का फायदा नहीं उठाते। विशेषकर राजनीति में तो लाभ लेने और देने का काम खूब होता है। कई बार तो यह भी नहीं देखा जाता है कि पहुंच के दम पर फायदा पहुंचाने के खेल में कुछ अनर्थ तो नहीं हो रहा है। यहां तो पात्र लोगों को अपात्र तक बनाने में भी गुरेज नहींं किया जाता। ऐसा ही मामला एक सीमावर्ती कस्बे का है, जहां एक साधन संपन्न परिवार के मुखिया ने अपात्र होते हुए भी सरकारी सहायता लेने से परहेज नहीं किया। मामला उठा तो थाने तक पहुंचा। अब तो इस परिवार के संपन्नता की सारी कहानियां ही सामने आ रही हैं। मसलन, जमीन भी है। गाड़ी वगैरह भी है। बड़ी हैरान की बात है कि सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों को मिलता नहीं है लेकिन अपात्र लोग पहुंच के दम पर इस तरह आंखों में धूल झोंकने का काम सरेआम कर लेते हैं। दबे स्वर में बात तो यह भी उठ रही है कि सरकारी योजनाओं में चर्चित यह परिवार कथित रूप से एक मंत्रीजी के खासमखास हैं। बहरहाल, पुलिस की मामले की जांच कर रही है, देखने की बात है कि आगे क्या होता है। 
अपने ही खोल रहे पोल
हिन्दी में कहावत है, खग जाने खग की भाषा। इसको यूं भी कह सकते हैं कि नजदीकी लोग सारे भेद जानते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हमपेशा लोग एक दूसरे की खूबी और खामी जानते हैं। यह अलग बात है कि कोई खूबी की चर्चा करता है तो कोई खामी गिना देता है। समय-समय की बात है और समय-समय का फेर भी। अक्सर चर्चाओं में रहने वाले एक वकील साहब ने इस बार कुछ खास करने का बीड़ा उठाया है। यह बात दीगर है कि सोशल मीडिया पर वो कुछ न कुछ लिखकर वायरल करते रहते हैं। काफी दिनों से वो अपनी जमात के खिलाफ भी लिख रहे हैं। अब सोशल मीडिया तक सीमित रहे वकील साहब अचानक से मुखर हो गए और उन्होंने विशेष उन साथियों के बारे में लिखना शुरू किया जिनका बाकायदा रजिस्ट्रेशन तो है लेकिन वो नियमित प्रेेक्टिस नहीं करते। इस बीच उन्होंने एक पूर्व मंत्री के पुत्र के खिलाफ तो पत्र लिखकर उनकी नियमित प्रेक्टिस न करने की तक की शिकायत कर डाली। इस तरह के खतरों से खेलना वकील साहब की आदत रही है भले ही अंजाम कुछ भी हो। देखते हैं, यहां क्या होता है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 22 मार्च 18 के अंक में प्रकाशित

सपने तो सपने होते हैं

बस यूं ही
प्यार और युद्ध में सब जायज है, इस जुमले में अब अगर सियासत शब्द भी जोड़ दिया जाए तो किसी को आपत्ति नहीं होगी। आजकल सियासत मतलब चुनाव भी किसी युद्ध से कम नहीं होते और इस चुनावी युद्ध में फतह के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं। राजस्थान विधानसभा चुनाव की घोषणा होने में अभी वक्त है, लेकिन राजनीतिक धरातल पर जाजम बिछाने का काम शुरू हो चुका है। राजनीति के संभावित खिलाड़ी पूरे दम-खम के साथ मैदान में कूदे हुए हैं। टिकट किसको मिलेगी, किसकी कटेगी, कौन बागी होगा। कौन किसके समर्थन में बैठेगा तो कौन केवल वोट काटने के लिए खड़ा होगा यह सभी भविष्य की बातें हैं लेकिन इन सब से दूर चुनावी चेहरे अभी से हार जीत की संभावना टटोलने में लग गए हैं। इसी कड़ी में बुधवार को एक ऑनलाइन सर्वे बड़ी तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। यह सर्वे झुंझुनूं विधानसभा से संबंधित हैं और इसमें बारह प्रत्याशी हैं जबकि एक विकल्प नोटा का छोड़ा हुआ है। सर्वे के बारह प्रत्याशियों में ज्यादा लोग भाजपा के ही हैं। इससे जाहिर होता है यह सर्वे करवाने वालों में जरूर कोई सतारुढ़ दल का ही आदमी है। यह सर्वे को देखकर दिल तो बहलाया जा सकता है, खुशफहमी पाली जा सकती है लेकिन यह हकीकत से कोसों दूर हैं। दूर इसीलिए क्योंकि यह सर्वे ऑनलाइन है और इसमें एेसी कोई शर्त नहीं है कि इसमें केवल झुंझुनूं विधानसभा के ही मतदाता भाग ले सकते हैं। दूसरी बात यह है कि ऑनलाइन सर्वे हो या फेसबुक पेज के लाइक्स, यह काम भी आजकल प्रायोजित तरीके से खूब होने लगे हैं। पैस फेंककर लाइक्स पाने के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। इन दो बातों से इतर सबसे बड़ी बात यह है कि इस विधानसभा के सभी मतदाता क्या सोशल मीडिया से जुड़े हैं? क्या सभी के पास एंड्रोयड फोन हैं? खैर, यह बात सही है कि मोबाइल आज हर घर में दस्तक दे चुका है लेकिन सभी के पास आज भी नहीं है। हां आज का युवा जरूर मोबाइल फ्रेंडली है। देखते हैं सोशल मीडिया का सर्वे हकीकत में कितना खरा उतरता है। बहरहाल, यह चुनावी सर्वे सोशल मीडिया यूजर के लिए किसी खेल से कम नहीं हैं। हां कुछ अति उत्साही इसको हकीकत मानकर फूले नहीं समा रहे हैं। जैसे-जैसे समय बीतेगा कोई बड़ी बात नहीं इस तरह के सर्वे और विधानसभाओं में भी होने लगे। खैर सपने तो सपने ही होते हैं। यह हसीन भी होते हैं और डरावने भी।

सीकर-चूरू मार्ग की सुध भी जरूरी

टिप्पणी
रेलवे ने श्रीगंगानगर से सादुलपुर जाने वाले रेलगाड़ी का संचालन रविवार से बंद कर दिया है। श्रीगंगानगर से सादुलपुर जाने वाले यात्रियों को अब यह ट्रेन हनुमानगढ़ से पकडऩी होगी। यह ट्रेन श्रीगंगानगर से शाम पौने सात बजे रवाना होती थी, जो अब हनुमानगढ़ से शाम सात बजे चलेगी। श्रीगंगानगर से हनुमानगढ़ के बीच इस ट्रेन का संचालन बंद करने का मकसद यह है कि इस मार्ग पर एक घंटे के अंतराल में दो ट्रेन थीं। अब श्रीगंगानगर से सादुलपुर जाने वाले यात्रियों को हनुमानगढ़ तक कोटा एक्सप्रेस में यात्रा करनी होगी। इसके बाद हनुमानगढ़ से वो सादुलपुर के लिए ट्रेन पकड़ सकते हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा समय का होगा। श्रीगंगानगर से चलकर यह ट्रेन सादुलपुर रात डेढ पहुंचती थी। अब हनुमानगढ़ से चलकर यह सवा ग्यारह बजे सादुलपुर पहुंच जाएगी। इसी तरह, सादुलपुर से हनुमानगढ़ आने के समय में बदलाव का फायदा भी नि:संदेह दैनिक यात्रियों को भी मिलेगा। यह रेल पहले भी चलती थी लेकिन इस बदलाव से लोगों को फायदा ज्यादा होगा।
इस बदलाव के बाद रेलवे को अब चूरू व सीकर मार्ग की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। सादुलपुर से चूरू तक का ट्रेक कभी का ही चालू है। इसके अलावा चूरू व सीकर के बीच में भी रेल का संचालन काफी समय से शुरू हो चुका है। जयपुर से श्रीगंगानगर तक पहले यह ट्रैक मीटर गेज था। अब सीकर-जयपुर के बीच गेज परिवर्तन का काम जारी है। इसके बाद श्रीगंगानगर से जयपुर तक ब्रॉडग्रेज ट्रेक बन जाएगा। गेज परिवर्तन के कारण श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच चलने वाली ट्रेन लंबे समय से बंद है। इस ट्रेन के अभाव में श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ के यात्रियों को मजबूरी में या तो बसों में यात्रा करनी पड़ती है या फिर वाया बीकानेर होकर जाने वाली ट्रेन पकडऩी पड़ती है। बस में किराया ज्यादा लगता है तो वाया बीकानेर में समय की बर्बादी होती है। पर मजबूरी में यह दोनों बातें सहन की जा रही हैं। श्रीगंगानगर से चूरू-सीकर तक रेल संचालन में देरी को लेकर आरोप तक लगते रहे हैं कि बस ऑपरेटर्स के दवाब में रेलवे जानबूझ इस मार्ग पर रेल संचालन में विलंब कर रहा है।
बहरहाल, रेलवे को श्रीगंगानगर से सीकर वाया चूरू-सादुलपुर बिना देरी किए रेल का संचालन शुरू करना चाहिए। इस मार्ग पर रेल संबंधी प्रस्ताव भेजा हुआ भी है। यह प्रस्ताव जितना जल्दी स्वीकृति हो जाए और इस मार्ग के लिए रैक मिल जाए तो शेखावाटी क्षेत्र के साथ-साथ हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर के लोग लाभान्वित होंगे। रेलवे को जनहित को ध्यान में रखते हुए इस काम को प्राथमिकता के साथ करना चाहिए। श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच रेल संचालन में अभी वक्त है लेकिन सीकर तक जुडऩे से भी बड़ी राहत मिलेगी।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 19 मार्च 18 के अंक में प्रकाशित

आप न जावै सासरे

बस यूं ही
कल नई दिल्ली में विधायकों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने चालीस से ज्यादा उम्र के कलक्टर को पिछड़े जिलों के विकास में बाधक बताया। प्रधानमंत्री का बयान आज कई समाचार पत्रों की सुर्खी भी बना है। यह बात क्यों कही गई? इसके मायने क्या हैं? यह तो प्रधानमंत्री ही जानें लेकिन इससे एक नई बहस जरूर खड़ी हो गई है। यही फार्मूला अगर नेताओं के संदर्भ में हो तो आधी से ज्यादा संसद खाली हो जाएगी। आईएएस/ आईपीएस तो फिर भी सेवानिवृत्त होते हैं लेकिन नेताआंे के रिटायरमेंट की कोई उम्र ही नहीं होती। विडम्बना देखिए प्रधानमंत्री चालीस पार के अफसरों को विकास में बाधा मान रहे हैं लेकिन सियासत में चालीस की उम्र कच्ची मानी जाती है। यहां तक कि राजनीति में चालीस साल का नेता युवा कहलाता है। राजनीति में साठ साल की आयु तो नेताओं की युवावस्था मानी जाती रही है।
बात जब युवाओं को मौका देने की, उनको आगे बढ़ाने की हो तो फिर राजनीति इससे अछूती क्यों? यह बहस राजनीति पर भी होनी चाहिए। नेताओं की उम्र भी तो तय हो। लेकिन इस विषय पर कोई बात नहीं करता। विशेषकर नेता नामक प्रजाति तो इस आयु वाले फैक्टर को भूल से भी जुबान तक नहीं लाती। ताउम्र तक सांसद या विधायक बने ही हसरत जिंदा रहती है। भले ही हाथ -पैर काम न करें। ठीक से बोल भी न पाएं लेकिन यह इच्छा सदाबहार रहती है।
आंकड़ों पर गौर करें तो आजादी से लेकर आज तक सांसदों की औसत आयु बढ़ ही रही है। पहली लोकसभा 1952 में सांसदों की औसत आयु 46.5 साल थी जो कि सोलहवीं लोकसभा (2014) में 56 साल हो गई। यह बात दीगर है कि 1952 में सांसदों की संख्या 489 थी जबकि वर्तमान में इनकी संख्या 545 है। यह भी एक तथ्य है कि बुजुर्गोँ के मामले में सोलहवीं लोकसभा दूसरी सबसे बुजुर्ग लोकसभा है। पहले नंबर पर पन्द्रहवीं लोकसभा आती है।
यह भी विडम्बना है कि युवाओं को देश की ताकत और देश का भविष्य बताया जाता है, इसके बावजूद युवाओं को नेता बनाने के प्रयास कम होते हैं। सोलहवीं लोकसभा में 543 सांसदों में से 253 सांसद ऐसे हैं, जिनकी उम्र 55 साल से ज्यादा है. प्रतिशत के हिसाब से यह कऱीब 47 फीसदी के आसपास है. इसी तरह 15वीं लोकसभा में 55 साल से अधिक उम्र के सांसदों की संख्या 43 प्रतिशत थी। इससे यह साबित होता है कि आम कर्मचारी व अफसर के सेवानिवृत्त होने की उम्र में नेताओं का कॅरियर परवान पर होता है। पचास फीसदी के करीब 55 साल से ऊपर होना यह दर्शाता है।
खैर, प्रधानमंत्री को कलक्टर की उम्र विकास में बाधक लगी तो लगे हाथ नेताओं की उम्र का फैसला भी हो ही जाना चाहिए। नहीं तो यह आप न जावै सासरै औरन की सीख देत.. वाली कहावत से ज्यादा कुछ नहीं है।