Sunday, December 31, 2017

यह अभयदान क्यों?

टिप्पणी
अवैध होर्डिंग्स के संबंध में राजस्थान पत्रिका के शनिवार के अंक में खबर तथा विशेष संपादकीय प्रकाशित होने के बाद नगर परिषद का अमला हरकत में जरूर आया, लेकिन आधी अधूरी कार्रवाई से कई सवाल फिर भी खड़े कर गए। हां, इतना जरूर है कि शनिवार को शहर के प्रमुख चौक चौराहों व बिजली के खंभों पर टंगे होर्डिंग्स कहीं नगर परिषद ने उतारे तो कहीं लगाने वाले से ही उतरवाए। खैर, जिस अंदाज में होर्डिंस/ बैनर हटे हैं, उससे कम से कम यह उम्मीद तो बंधी है कि परिषद प्रशासन कार्रवाई तो कर सकता है। फिर भी यक्ष प्रश्न बना रहा कि इतनी बड़ी संख्या में होर्डिंग्स व बैनर लगे थे, लेकिन किसी पर भी जुर्माना क्यों नहीं हुआ? नगर परिषद ने जुर्माना लगाने में रहम बरता तो आखिरकार किसलिए? खैर, इस दरियादिली की वजह तो परिषद प्रशासन को पता है, लेकिन यह दरियादिली संदिग्ध लगती है और कहीं न कहीं संदेह पैदा करती है।
वैसे श्रीगंगानगर में पिछले दो साल में संपत्ति विरुपण के डेढ़ दर्जन मामले भी दर्ज नहीं हुए हैं। और जो दर्ज हुए हैं, उन्हें नगर परिषद के जिम्मेदारों ने एक तरह से 'लावारिस' छोड़ दिया है। आज कोई भी अधिकारी उन मामलों की प्रगति रिपोर्ट बताने की स्थिति में नहीं है। यह सब आधी-अधूरी कार्रवाई का ही नतीजा है। तभी तो हर कोई, कहीं पर भी अपना होर्डिंग या बैनर टांगने की हिमाकत कर बैठता है। बहरहाल, नगर परिषद ने जिस तरह की दरियादिली दिखाई है, उससे लगता नहीं कि अवैध होर्डिंग्स लगाने वालों में किसी तरह का डर पैदा हुआ है। हालात यही रहे तो शहर का फिर से बदरंग होना तय मानिए, क्योंकि भय के बिना प्रीत नहीं होती।
खानापूर्ति वाली कार्रवाई कर परिषद अमला तात्कालिक रूप से भले ही वाहवाही बटोर ले, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं। कानून तोडऩे वालों को, नियमों का मखौल उड़ाने वालों पर जुर्माना होता तो कड़ा संदेश जाता। जब तक संपत्ति विरुपण अधिनियम की कड़ाई से पालना नहीं होगी, अधिनियम के तहत किसी को जुर्माना व सजा नहीं होगी तो मनमर्जी और दरियादिली का यह खेल इसी तरह चलता रहेगा।
बड़ा सवाल तो यह भी कि परिषद प्रशासन कानून तोडऩे वालों के खिलाफ सजा व जुर्माने लगाने की हिम्मत क्यों नहीं करता? परिषद प्रशासन की इस लुंजपुंज भूमिका से संदेह पैदा होना लाजमी है, और जब तक यह संदेह रहेगा, तब तक ईमानदार कार्रवाई, जुर्माने तथा सजा की बात करना ही बेमानी है। बिना कार्रवाई किए छोडऩा तो एक तरह का अभयदान देने जैसा ही है और कसूरवारों को अभयदान देना भी अपने आप में एक बड़ा संदेह है। चाहे वो मजबूरी का हो, मिलीभगत का हो या फिर किसी दबाव
 का।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 31 दिसंबर 17 के अंक में प्रकाशित

मिलीभगत या मजबूरी?

टिप्पणी
शहर फिर बदरंग हो चला है। चुनावी साल होने के कारण जगह-जगह पोस्टरों व बैनरों से अटा पड़ा है। बधाई देने वालों में जबरस्त होड़ मची है। कई तो नए साल, लोहड़ी, संक्राति व गणतंत्र दिवस की बधाई भी एक साथ ही दे रहे हैं ताकि पोस्टर/ बैनर लंबे समय तक लगे रहे। पूर्व मंत्री के जन्मदिन की बधाई लिखे होर्डिंग्स से तो पूरा शहर ही पाट दिया गया है। शायद ही कोई चौक या खंभा छोड़ा होगा, जिस पर बधाई संदेश न टंगे हों। समूचे शहर को बेरहमी के साथ बदरंग कर दिया गया है। चौक -चौराहों पर टंगने की इस होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। यहां तक कि कई संगठन भी प्रचार की इस सस्ती भूख के आगे नतमस्तक दिखाई देते हैं। अन्य जगह तो परिषद प्रशासन अपनी साइट का हवाला भी दे देता है, लेकिन शहर के प्रमुख चौकों के बीचो-बीच बांस की बल्लियां लगाकर बधाई संदेश टांगना तो सरासर 'दादागिरी' है, मनमर्जी है। चाहे चहल चौक हो या सुखाडिय़ा सर्किल सब के सब बदरंग हैं। शहर के चौक-चौराहों की सुंदरता को बदहाल करने में नियम कायदों को सरेआम ताक पर रखा जाता है। यह खेल हर साल बदस्तूर चलता है। बड़ी बात तो यह है कि शहर को बदरंग होने से बचाने वालों की कोई हलचल दिखाई नहीं देती। इस खेल में जरूर या तो कोई मिलीभगत है या मजबूरी? वरना इस तरह हिमाकत कौन कर सकता है? कार्रवाई के नाम पर नगर परिषद के हाथ बंधे हुए हैं, क्यों बंधे हैं? क्या कारण हैं? यह भी अपने आप में राज हैं। परिषद की भूमिका लगातार उदासीन ही रही है। शर्मनाक बात तो यह है कि जनप्रतिनिधि ही जब इस तरह कानून का मखौल उड़ा रहे हैं तो फिर ऐरे- गैरे, नत्थू खैरों व छुटभैयों का हौसला तो बढ़ेगा ही। शहर में जिस तरह के हालात हैं, उससे लगता नहीं हैं कि शहर के बदरंग करने वालों में किसी तरह का भय है। जिस अंदाज में पोस्टर/ बैनर लग रहे हैं, इससे यह भी लगने लगा है कि शहर में व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाले हालत हो गए हैं। यही कारण था कि पिछले दिनों शहर के एक जागरूक अधिवक्ता ने शहर को बदरंग करने वालों व जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। इसके बावजूद बदलाव या कोई हलचल दिखाई नहीं दी। ऐसी परिस्थितियों में अब अधिवक्ता की तर्ज जैसा ही करने की जरूरत है। यह खेल बहुत हो चुका है। अब यह शहर मुकम्मल कार्रवाई चाहता है। नासूर बनती यह समस्या अब स्थायी हल चाहती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 30 दिसंबर 17 के अंक में प्रकाशित 

Friday, December 29, 2017

हॉल्कर स्टेडियम में बरसे रिकॉर्ड

 यूं ही
इंदौर के हॉल्कर स्टेडियम पर शुक्रवार को भारत व श्रीलंका के बीच खेले गए टी टवेंटी क्रिकेट मैच की याद क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में ताउम्र रहेगी। इस मैच में चौकों व छक्कों के साथ-साथ रिकॉडर्स की मूसलाधार बारिश ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। भारतीय पारी की बात करें तो मात्र 120 गेंद पर 260 रन बन गए। इनमें 21 चौके और इतने ही छक्के। मतलब 210 रन केवल चौकों व छक्कों से ही बने। इसी तरह श्रीलंका की पारी देखी जाए तो उसने 17.2 ओवर में 172 रन बनाए। उसके बल्लेबाज एंजेलो मैथ्यूज बल्लेबाजी के लिए नहीं आए। श्रीलकां के बल्लेबाजों ने भी दस छक्के तथा 11 चौके लगाए। वैसे इनसे ज्यादा तो हमारे रोहित ने ही लगा दिए थे। इस तरह श्रीलंका की पारी के भी सौ से ऊपर रन चौकों व छक्कों से आए। दोनों टीमों के ओवर मिलाएं तो 37.2 ओवर में 432 रन बने। सोचिए किस अंदाज से धुनाई या कुटाई हुई होगी गेंदबाजों की। रोहित शर्मा ने तो धुंधाधार बल्लेबाजी की। उन्होंने मात्र 43 गेंदों पर 118 रन ठोक दिए। इनमें 12 चौके व दस छक्के शामिल रहे। रोहित का शतक भी टी टवेंटी में सबसे तेज शतक के विश्व रिकॉर्ड की बराबरी कर गया। दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज डेविड मिलर 35 गेंदों पर बांग्लोदश के खिलाफ शतक बना चुके हैं। के राहुल भी आज पूरी फॉर्म में थे लेकिन बदकिस्मती से शतक नहीं बना पाए। उनके पास शतक पूरा करने को भरपूर मौका था लेकिन श्रीलंका के विकेटकीपर डिकवेला ने शानदार कैच लपकते हुए उनके सपनों पर पानी फेर दिया। राहुल की 89 रन की आतिशी पारी में पांच चौके व आठ छक्के शामिल थे। श्रीलंका के उपल थरंगा व कुशाल परेरा ने जरूर संघर्ष किया। उनके बल्लेबाजी ने मैच में थोड़ा सा रोमांच भी पैदा किया लेकिन दोनों के आउट होने के बाद सब आया राम गया राम हो गए। विकेटों के पतझड़ को कोई नहीं रोक सका और अंतत: श्रीलंका की टीम 88 रन से पराजित हो गई। मैच में वैसे तो रिकॉर्ड कई बने लेकिन टी टवेंटी मैच में सर्वाधिक छक्के दोनों पारियों में 32 लगे हुए हैं। इस मैच में कुल 31 लगे। इस तरह से इस रिकॉर्ड की न तो बराबरी हो पाई और न ही यह रिकॉर्ड टूटा। खैर टीम इंडिया को बधाई। रोहित शर्मा को बधाई। और साथ में समस्त क्रिकेट प्रेमियों को इस शानदार जीत की बधाई।
यह बने रिकॉर्ड
-35 गेंदों पर शतक के विश्व रिकॉर्ड की बराबरी।
- एक पारी में सर्वाधिक 21 छक्कों का रिकॉर्ड।
-भारतीय टीम का एक साल में सभी फोरमेट में 14 सीरिज जीतने का रिकॉर्ड।

इटली, शादी और चर्चे

बस यूं ही
इटली इन दिनों फिर चर्चा में है। वैसे तो इटली को चुनाव के दौरान खूब भुनाया जाता है। इटली बाकायदा मुद्दा भी बनता है। विदेशी और देशी का नारा देकर मतदाताओं को रिझाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। खैर, इन दिनों चर्चा इस बात की है कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली व सिनेतारिका अनुष्का शर्मा ने शादी के लिए इटली को चुना। उनको भारत में एेसी कोई जगह पसंद नहीं जहां यह सात फेरे ले सकें। वैसे यह बड़ा मामला है भी नहीं। बड़ी बात यह है कि गाहे-बगाहे इटली को चुनावी मुद्दा बनाने वाली पार्टी के एक विधायक ने विराट अनुष्का की देशभक्ति पर सवाल उठा दिया। पार्टी अध्यक्ष ने भी स्पष्टीकरण जारी किया कि पार्टी का कोई व्यक्ति विधायक के बयान से इतफाक नहीं रखता है। इधर विधायक ने भी अपनी पार्टी से इस बात के लिए माफी मांगकर कहा कि उनका आशय यह नहीं था। वैसे राजनीति में यह विडंबना है कि किसी का बयान हिट हो जाए तो वह दौड़ जाता है और अगर थोड़ा सा ही विवादित हुआ तो व्यक्तिगत राय बताकर झट से किनारा कर लिया जाता है।
सच तो यह है कि इस हाइटेक शादी के साथ इटली का नाम जुडऩे पर मेरे जेहन में जरूर यह बात थी कि इस मसले पर किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया आई क्यों नहीं? मैं भी इस पर कुछ लिखने का मानस बना रहा था कि लेकिन अति व्यस्तता के चलते विचारों को शब्दों का जामा नहीं पहना पाया। आज इस विषय पर एक कार्टून देखा तो फिर तय किया कि चलो लिखा ही जाए। खैर, मेरा मानना है कि इटली राजनीतिक दलों के लिए मुद्दा इसीलिए है क्योंकि एक राजनीतिक दल की चेयरपर्सन रही महिला इटली की है। अब भी यह मामला उछलता है। चूंकि विरुष्का मामले में इटली में कोई राजनीतिक लाभ दिखाई नहीं देता। इसीलिए चुप्पी साधने तथा जो बोला उसको मुंह बंद रखने की नसीहत दे दी गई। इटली प्रकरण से इतना तो तय है कि राजनीतिक दल एक ही शब्द को अपने हित के लिए इस्तेमाल भी करते हैं और जहां हित नहीं वहां उसे रद्दी की टोकरी के हवाले कर देते हैं। शायद अवसरवादिता इसी का नाम है। और हां कार्टूनिस्ट ने भी बात जोरदार कही कि किसी ने इटली को एक पार्टी अध्यक्ष का ननिहाल नहीं बताया वरना नवदंपती पर पार्टी विशेष की विचारधारा का पौषक होने का ठपा चस्पा जरूर कर देता...।

इक बंजारा गाए -14


🔺राजनीतिक नौटंकी
श्रीगंगानगर में इन दिनों राजनीतिक नौटंकी का तो कहना ही क्या? विशेषकर नगर परिषद के संदर्भ में तो इतना घालमेल है कि तय कर पाना ही मुश्किल है कि कौन किस पार्टी में है तथा कौन किसका समर्थन कर रहा है? मामला राज्य सरकार के चार साल पूर्ण होने पर आयोजित जलसे का है। इसमें नगर परिषद सभापति भी मौजूद रहे। भाजपा के कार्यक्रम में सभापति की उपस्थिति इसीलिए चौंकाती है कि दो दिन पहले ही भाजपा परिषद में अपनी पार्टी का नेता प्रतिपक्ष चुनती है और फिर सभापति से भी नजदीकियां बढ़ाती हैं। भाजपा की इस भूमिका से तो राजस्थानी कहावत 'जिसको देखने से ही बुखार चढ़े और वो ही ब्याहने (शादी) आ जाए' चरितार्थ हो रही है। खैर, ये जो पब्लिक है, वह इस तालमेल से हो रहे घालमेल को जानती है और समझती भी है।
🔺'सम्मान' के मायने
श्रीगंगानगर के युवाओं की सेना में भागीदारी कम है, लेकिन सेना के प्रति भावना जरूर जुड़ी है। यही कारण है कि सेना से जुड़े कार्यक्रम यहां शिद्दत से मनाए जाते हैं। चाहे कारगिल दिवस हो या विजय दिवस। हर साल कार्यक्रम होते हैं। स्कूली बच्चे जुड़ते हैं। सेना के अफसर व जवान भी आते हैं। पूर्व सैनिकों व वीरांगनाओं का सम्मान होता है। युवाओं का सेना के प्रति रुझान हो, इसके लिए कई तरह की घोषणाएं भी की जाती हैं। इस बार विजय दिवस पर एक नई बात यह हुई कि खबरनवीसों का भी बाकायदा सम्मान किया गया। अब सम्मान क्यों व किसलिए किया गया, यह तो आयोजक ही बेहतर जानते हैं, क्योंकि सम्मानित होने वाले खबरनवीस भी समझ नहीं पा रहे हैं कि उनको यह सम्मान किस योगदान के लिए दिया गया? वैसे इस फ्री के सम्मान के मायने तो हैं।
🔺नया साल और बधाई
नया साल श्रीगंगानगर के लिए कुछ अलग होता है। नया साल आते-आते प्रमुख चौक व चौराहे बदरंग हो जाते हैं। हर कोई बड़े-बड़े पोस्टर व होर्डिंग बनाकर नए साल के बधाई संदेश देने में लगा रहता है। सबमें एक तरह से होड़ सी लग जाती है। यह हाल जिला मुख्यालय से लेकर छोटे कस्बों व गांवों तक दिखाई देता है। शहर कस्बों को बदरंग करने का यह काम बेरोक-टोक होता है। मनमर्जी से लगाए गए इन पोस्टर व होर्डिंग्स पर शायद ही कार्रवाई होती है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि यह सब शह और मिलीभगत का खेल है। चर्चाएं तो यहां तक होती हैं कि राजकोष में जाने वाली राशि जेबों में जाती है, इसलिए शहरों को बदरंग होने से बचाए कौन? जो भी है, हालात देखते हुए चर्चाओं में दम तो नजर आता है।
🔺विपक्ष गायब
हो सकता है यह सब सुनकर आप या तो हंसें या फिर अचंभा करें। बात यह है कि श्रीगंगानगर शहर की सरकार में विपक्ष ही नहीं है। यहां की सरकार सभी के रहमो-करम पर चल रही है। मौजूदा सभापति भाजपा के बागी हैं और भाजपा से बगावत कर सभापति बने, लेकिन पार्टी उनको गाहे-बगाहे गले लगाती रही है। इतना नहीं, इधर कांग्रेसी भी सभापति को अपना ही मानते हैं। वे दलील देते हैं कि उनके पार्षदों के समर्थन के दम पर ही तो सभापति काबिज हैं। अब आम आदमी यह सियासी समीकरण समझ नहीं पा रहा है कि सत्ता में कौन है और विपक्ष में कौन? ऐसे हालात में कौन किसका विरोध करेगा, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसी घालमेल का खमियाजा ही शहर भुगत रहा है, तभी तो बदहाली व बदइंतजामी के भंवर में फंसा है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 21 दिसंबर 17 के अंक में प्रकाशित..।

विचारों का द्वंद्व

बस यूं ही
जीना तो है उसी का जिसने यह राज जाना, है काम आदमी का औरों के काम आना.. अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी एे दिल जमाने के लिए...परहित सरस धर्म नहीं भाई...पुरुषार्थ को बयां करते इन दो गीतों के बोल व तुलसीदासजी का यह दोहा रह रह कर मेरे मन को कचोट रहा है। पुरुषार्थ, परोपकार, मदद, सहायता, हमदर्दी, रहनुमा, दरियादिल जैसे शब्द भी इन दिनों बेमानी नजर आते हैं। पता नहीं क्यों आजकल सोचता हूं तो फिर सोचता ही चला जाता हूं। बहुत देर तक और बहुत गहरे तक। इस उम्मीद के साथ कि शायद इस सोचने में कोई राह निकल जाए लेकिन सिवाय निराशा के कुछ हाथ नहीं लगता है। हां इस सोच व निराशा के द्वंद्व के बीच पिसता जरूर रहता हूं। घुटता रहता हूं। अपनी इस मनोदशा पर कूढता भी हूं। यह एेसी मनोदशा है जिसे कोई अपना या पराया समझ भी नहीं सकता। यह एेसी मनोदशा है जो खुद ब खुद बयां भी नहीं होती। और बयां हो भी हो गई तो हासिल क्या? दुख, तकलीफ, संकट, विपदा जैसे शब्द सुनने में बड़ी पीड़ा देते हैं। अक्सर इनको साझा करने की बातें भी होती है ताकि पीड़ा बंट जाए और महसूस भी कम हो लेकिन हकीकत इससे अलग होती है। इस पीड़ा का कोई साझीदार नहीं होता। एक अकेले को ही भोगनी होती है। बिलकुल चुपचाप। खामोशी के साथ। क्योंकि मदद पर मजबूरी भारी पड़ जाती है। यह मजबूरी ही है जो हकीकत पर पर्दा डाल देती है। अक्ल पर ताला लगा देती है।

दो राज्यों के चुनाव की बीस प्रमुख बातें

पहली : नरेन्द्र मोदी के गृहनगर वाले उंझा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी की हार हुई है।
दूसरी : हिमाचल में भाजपा के प्रस्तावित मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की भी हार हुई है।
तीसरी : रुपाणी मंत्रिमंडल के कई मंत्री चुनाव हार गए।
चौथी : भाजपा का 150 से अधिक सीट पाने का दावा फेल हो गया।
पांचवीं : किसी राज्य में प्रधानमंत्री द्वारा सत्रह दिन तक प्रचार करना संभवत: रिकॉर्ड है।
छठी : पिछले 22 साल में पहली बार भाजपा को सौ से कम सीटें प्राप्त हुई हैं।
सातवींं : पिछले 22 साल में पहली बार दोनों पार्टियों के वोट शेयर में सबसे कम अंतर रहा है।
आठवीं : पिछले 22 साल में कांगे्रस का वोट शेयर पहली बार चालीस प्रतिशत को पार किया है।
नवमीं : पिछले 22 साल में इस बार कांग्रेस ने पहली बार सबसे ज्यादा सीट जीती हैं।
दसवींं: पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस को सोलह सीटों का फायदा हुआ है जबकि भाजपा को सोलह सीटों का नुकसान हुआ है।
ग्याहरवीं : भाजपा ने गुजरात में लगातार छठी बार बहुमत प्राप्त किया है।
बारहवीं : गुजरात में 2002 से कांग्रेस की सीटें बढ़ती गई हैं जबकि भाजपा की सीटें घटती गई हैं।
तेरहवीं : गुजरात में 2002 में भाजपा को 127 सीट थी जबकि कांग्रेस के पास 51 सीटें थीं।
चौदहवीं : हिमाचल में भाजपा का वोट शेयर दस फीसदी बढ़ा है जबकि कांग्रेस का एक फीसदी कम हुआ है।
पंन्द्रहवीं : लोकसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा को हिमाचल में वोट शेयर चार प्रतिशत घटा है।
सोलहवीं : पिछले 24 सालों में भाजपा को पहली बार हिमाचल में सर्वाधिक सीटें मिली हैं।
सतहरवीं : गुजरात लोकसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा का इस बार 12 प्रतिशत शेयर घटा है।
अठाहरवीं : हिमाचल में कांग्रेस का 24 सालों में सर्वाधिक खराब प्रदर्शन रहा है।
उन्नीसवीं : हिमाचल में कांगे्रस को 1990 में नौ जबकि भाजपा 1993 में आठ सीटें मिली थी। यह दोनों पार्टियों का सबसे खराब प्रदर्शन रहा है।
बीसवां : पिछले 27 साल में हिमाचल में किसी भी दल को साठ से अधिक सीट नहीं मिली है।