Friday, April 21, 2017

साठ किलोमीटर तक एकदम सीधी व सपाट सड़क, नहीं है एक भी मोड़

श्रीगंगानगर. भला आपने कभी ऐसी सड़क देखी है जिसमें किसी तरह का कोई मोड़ या घुमाव नहीं हो। राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय मार्गों से गुजरते समय नजर अक्सर नसीहत भरे सूचना पट्ट पर पड़ ही जाती है। उन पर लिखा होता है कि 'आगे घुमावदार मोड़ है गाड़ी धीरे चलाएं' या 'आगे खतरनाक मोड़ है गाड़ी की रफ्तार कम रखें'आदि-आदि। कहने का मतलब यह कि ऐसे रास्ते कम ही देखने को मिलते हैं जिनमें कोई मोड़ या घुमाव नहीं हो। इसके बावजूद एक ऐसी सड़क भी है जिसमें साठ किलोमीटर तक कोई मोड़ या घुमाव ही नहीं है। एकदम सीधी सड़क है यह और चालकों के लिए सबसे मुफीद है। तभी तो लोग अक्सर चुटकी लेते हैं कि वाहन चालकों को इस स्थान पर स्टीयरिंग को ज्यादा घुमाना नहीं पड़ता। जी हां, श्रीगंगानगर जिले में इस तरह की अनूठी सड़क है। नेशनल हाइवे 15/62 का करीब साठ किलोमीटर का हिस्सा ऐसा है, जहां सड़क एकदम सीधी है। बिलकुल नब्बे डिग्री कोण पर। इसको सूरतगढ़-श्रीगंगानगर मार्ग भी कहा जाता है। सूरतगढ़ से निकलते ही भगवानसर गांव के पास जहां एयरफोर्स स्टेशन की तरफ रोड जाती है वहां से श्रीगंगानगर तक एकदम सीधा रास्ता है।
नहीं तो सूरतगढ़ तक सीधी होती
बुजुर्ग बताते हैं कि सड़क निर्माण के समय काफी दित हो रही थी। किसी न किसी बात को लेकर अड़चन आ ही जाती थी। इस कारण सड़क के लिए जमीन अधिग्रहण का काम भी अधूरा था। ग्रामीण बताते हैं कि मामला तत्कालीन मंत्री कुंभाराम आर्य के पास पहुंचा तो उन्होंने अधिकारियों से नक्शा मांगा। बताते हैं कि आर्य ने श्रीगंगानगर और सूरतगढ़ के बीच फीट रखी और कहा कि यहां से बनेगी सड़क। सड़क वैसी ही बनी बिलकुल सीधी। यह तो घग्घर नदी आ जाने के कारण भगवानसर के पास थोड़ा घुमाव देना पड़ा अन्यथा यह सड़क सूरतगढ़ तक बिना घुमाव के ही बनती। ग्रामीण इस सड़क को एशिया में सबसे लंबी सीधी सड़क का दर्जा भी देते हैं।
इस मार्ग पर बने दोनों ओवरब्रिज भी सीधे
श्रीगंगानगर-सूरतगढ़ मार्ग पर हाल ही दो ओवरब्रिज भी बने हैं। एक कैंचिया के पास तो दूसरा बारहमासी (गंगनहर) पर बनकर तैयार हो रहा है। दोनों ही ओवरब्रिज भी सड़क के हिसाब से ही बने हैं। रास्ते में कई जगह मोघे भी हैं लेकिन सड़क के आकार में कोई परिवर्तन नहीं आया।
आस्ट्रेलिया में 145 किमी सीधी सड़क
ऑस्ट्रेलिया का इयरे हाइवे वैसे तो 1675 किलोमीटर लंबा है लेकिन इस सड़क का 145.6 किलोमीटर हिस्सा बिल्कुल सीधा है। इस कारण यह सड़क ऑस्ट्रेलिया की सबसे सीधी सड़क भी है। यह हाइवे सीधा, सपाट और शानदार है, लेकिन उतना ही ज्यादा खतरनाक भी है। सड़क ऑस्ट्रेलिया के उजाड़ और दूरदराज वाले इलाकों से गुजरती है। ऐसे में इन सड़कों पर जंगली जानवर आ जाते हैं। इस वजह से हादसे हो जाते हैं। इस कारण इस सड़क को स्लॉटर वैली के नाम से भी जाना जाता है। 

सवाल मांगते जवाब

 टिप्पणी 

मासूम सचिन हत्याकांड के आरोपित की गिरफ्तारी को लेकर अब तक जो सवाल जिम्मेदार लोगों में मन में खदबदा रहे थे वह अब होठों पर आने लगे हैं। पुलिस कार्रवाई पर दबे स्वर में सवाल उठाने वाले अब रफ्ता-रफ्ता मुखर हो रहे हैं और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। वैसे सवाल तो इस प्रकरण में पहले दिन से उठने शुरू हो गए थे, जब एक मनोरोगी को बालक की हत्या के आरोप में पकड़ा गया था। इस गिरफ्तारी से पहले सोशल मीडिया में एक ऑडियो भी वायरल हुआ था। इस ऑडियो को लेकर कहा गया था कि यह आरोपित का ही है और वह वॉइस चेंजर से नंबर बदल-बदलकर फोन करता था। खैर, जिस तरह से इस प्रकरण में नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी हुई और आरोपित को बीकानेर से पकड़कर लाया गया तो शक की सुई घूमी व संदेह के बादल और गहरा गए। जेहन में एक ही सवाल था कि कहीं तात्कालिक आक्रोश के लिए तो यह सब नहीं किया गया? खैर, मंगलवार को शहर के प्रबुद्ध लोगों की बैठक में भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े किए गए हैं। कम से दस अहम सवाल बैठक के दौरान आए तथा इनसे संबंधित शंकाओं के समाधान के लिए पुलिस अधीक्षक से मिलने का निर्णय किया गया।
सवाल तो पुलिस ने जो कहानी बताई है उससे भी खड़े हो जाते हैं। अगर वाकई आरोपित ही मासूम का हत्यारा है तो पुलिस को बताना चाहिए कि आरोपित इतनी सिम कहां से लाया? उनको वह कहां से रिचार्ज करवाता था? आरोपित मनोरोगी है यह साबित कैसे हुआ? क्या इस संबंध में मनोरोगी का कोई मेडिकल हुआ है? आरोपित की सचिन के परिवार से क्या जान-पहचान थी और वह जहां रहता था वहां से इतनी दूर कैसे व क्यों गया? अगर वह सचिन के घर की रैकी करता था उसका चश्मदीद कौन है? आरोपित श्रीगंगानगर में क्या काम करता था? वह बीकानेर छोड़कर यहां क्यों आया? कहानी में जिस पदमपुर की महिला का जिक्र आया है वह कौन है और क्या करती है? इस तरह के कई सवाल हैं जो लोगों को तसल्ली नहीं देकर उनकी जिज्ञासा और ज्यादा जगाते हैं। भला यह कैसे संभव हो सकता है कि आरोपित खुद ही फोन करके सब कुछ उगल दे? क्या इस तरह की बातें करने का कोई उसका कोई रिकार्ड रहा है? वह वाकई मनारोगी है तो इस बात के प्रमाण क्या हैं?
बहरहाल, पुलिस ने रहस्यमयी बनते जा रहे हैं इस प्रकरण का जिस तरह से आनन-फानन में खुलासा किया और जो कहानी बताई यह सवाल उसी कहानी से निकले हैं। पुलिस को इन सवालों का तसलीबख्श जवाब भी बताना चाहिए ताकि जो कहानी बताई जा रही है वह आसानी से लोगों के गले उतरे। लोगों का फिर से लामबद्ध होना यही दर्शाता है कि वे सही जवाब सुनना चाहते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए पुलिस सवालों का जवाब जरूर देगी।


राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 8 फरवरी 17 के अंक में प्रकाशित 

यह जातिवाद मत फैलाओ भाई!


बस यूं ही

फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली थप्पड़ प्रकरण के बाद कई तरह की बहस गरम है। इस बहाने कई बुद्धिजीवी भी बहस में कूद पड़े हैं। कहीं इतिहास पर सवाल उठ रहे हैं तो कहीं इतिहास लिखने वालों पर। कहीं इतिहास के पात्रों को आड़े हाथों लिया जा रहा है तो कहीं इतिहास को जातिवाद से जोड़ा जा रहा है। सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म पर जहां कुछ भी लिखो, कैसा भी लिखो की अवधारणा है, वहां इस तरह का अधकचरा ज्ञान ज्यादा बांटा जा रहा है। इनका लेखन एकदम चिकोटी काटने वाले अंदाज में होता है। वैसे आजकल बुद्धिजीवी बजाय कोई अच्छी बात करने के या कुछ सकारात्मक संदेश देने वाला लेखन करने के इस तरह की चिकोटियां काटने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। समाज को दिशा देने वाला एक खास तबका फेसबुक पर इस तरह की भावनाएं भड़काने वाली तथा मनों में भेद पैदा करने वाली बातें लिखने में मशगूल है। प्रत्युत्तर में आई टिप्पणियों को पढ़ पढ़कर आत्ममुग्धता के चरम को लांघा जा रहा है। खैर, जिसकी जैसी भावना होती है वह वैसा ही सोचेगा और कहेगा। ठीक उस मक्खी की तरह जो पूरा स्वस्थ शरीर छोड़कर केवल फोड़े पर जाकर बैठती है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस तरह की जातीय वैमनस्यता बढ़ाने वाली टिप्पणियों से बेहद दुखी हूं और व्यथित भी। वैसे आजादी के बाद देश व समाज में जातिवाद का जहर सर्वाधिक राजनीति के जरिये ही फैला है। सियासी दलों ने हमेशा वोट बैंक का गणित देखते हुए टिकट बांटे और प्रत्याशियों ने भी जातिवाद के नारे को जीत का सबसे मुफीद और आसान फार्मूला माना। हकीकत में यह फार्मूला कारगर भी हुआ। जातिवाद की सीढिय़ां चढ़कर देश में कइयों ने मंजिल पाई है। 
वैसे मैंने सामाजिक समरसता का पाठ अपने गांव से ही सीखा है। जातिवाद की आग से हालांकि मौजूदा दौर में कोई अछूता नहीं है। फिर भी मेरे गांव में कुछ बातें ऐसी हैं, जो जातिवाद के जहर को कम करती हैं। झुंझुनं जिले की चिड़ावा तहसील में है मेरा गांव केहरपुरा कलां। गांव में जाट, राजपूत व अनुसूचित जाति के लोगों की आबादी कमोबेश समान सी ही है। इसके अलावा नाई, ब्राह्मण, खाती, मीणा व कुम्हार भी हैं लेकिन बहुत कम संख्या में। मेरे गांव के लोग हर जाति के दुख-दर्द और खुशी में शरीक होते हैं। अब कुछ खास बातें। ऐसा माना जाता है कि कोई भी गांव जब बसता है और बसने के बाद गांव में जिस भी जाति के व्यक्ति की सबसे पहले मृत्यु होती है, उसको भोमिया कहा जाता है। बतौर स्मृति भोमिया जी महाराज का गांव में मंदिर भी बनाया जाता है। हमारे गांव में भी ऐसा मंदिर हैं। बताते हैं हमारे गांव के भोमियाजी महाराज ब्राह्मण जाति से थे। अब इससे आगे की बात सुन लीजिए। इस मंदिर में पूजा-पाठ से लेकर झाडू लगाने तक के तमाम काम अनुसूचित जाति का युवक करता था। फिलहाल उसका निधन हो गया लेकिन उसने यह काम लंबे समय तक किया।
इसके अलावा राजपूतों के मकान निर्माण के दौरान जब नींव रखी जाती है तो पहला पत्थर जाट जाति के व्यक्ति से रखवाया जाता है। इस मांगलिक व पुनीत कार्य के बाद गुड़ भी वितरित किया जाता है। गांव के राजपूत मोहल्ले में माताजी का मंदिर है। समाज के लोगों के द्वारा साल भर यहां जागरण होते रहते हैं। जागरण में मां की ज्योत का जिम्मा अनुसूचित जाति के युवक के पास होता है। वह रात भर दीपक में घी डालता है और ज्योत को प्रज्वलित रखता है। एक तरह से वह युवक इस दिन पुजारी की भूमिका में होता है। इससे भी बड़ी बात जागरण करने वाली भजन मंडली के लोग धाणक जाति से होते हैं, जो डमरू के माध्यम से मां की महिमा गाते हैं। भजन मंडली व श्रोता सभी एक ही जाजम पर बैठते हैं। मेरे गांव में राधा-कृष्ण का मंदिर भी है। बुजुर्ग इसको ठाकुरजी का मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर के जीर्णोद्धार में गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से चंदा किया। एक करोड़ रूपए से ज्यादा इस काम पर खर्च हुए हैं। धूलंडी के दिन मंदिर में अनुसूचित जाति के युवकों के साथ जाट व राजपूत जाति के युवक गले में बांहे डालकर झूमते हैं। मस्ती में गाते हैं। जातिवाद की बातें यहां गौण हो जाती हैं। 
खैर, यह सब बताने का आशय यह है कि गांवों में इस तरह की सामाजिक समरसता आज भी है। रिश्तों का तो कहना ही क्या। जब इस तरह की अवधारणा को लेकर लोग जी रहे हैं तो यह जातिवाद की आग किसलिए? यह तानाबाना छिन्न भिन्न मत करो भाई। यह जातिवाद मत फैलाओ! भाई को भाई से आपस में मत लड़वाओं। इनको प्रेम करना सिखाओ भाई।

चांद-5


दरअसल चांद पर गीत व शेर ही नहीं काफी कुछ लिखा गया है। चांद से जुड़ी और भी कई रोचक बातें एवं जानकारियां हैं। चूंकि गीत व शेर मेरी पंसद का हिस्सा हैं, लिहाजा शुरुआत इनसे ही की। खैर, गीतकार हो, शायर हो या फिर कवि। इनके लिए भी चांद हमेशा खास ही रहा है। क्योंकि गीतों में, शेरों में एवं कविताओं में महबूब और इश्क का उल्लेख खूब होता रहा है। जहां यह देानों हैं वहां चांद भी है। महबूब और इश्क की शेरो शायरी में तोचांद की बड़ी भूमिका रही है। चांद की खूबसूरती के साथ महबूब की खूबसूरती को जोड़ा गया है। कई गुमनाम शायरियां भी हैं, जिनमें चांद का जिक्र आया है। अब यह रुबाई देखिए, इसमें याद को चांद से जोड़ दिया गया है। गौर फरमाइए...
आज भीगी हैं पलकें तुम्हारी याद में,
आकाश भी सिमट गया है अपने आप में।
ओस की बूंदें ऐसे गिरी हैं जमीन पर,
मानो चांद भी रोया हो तेरी याद में।
महबूब की तड़प व याद को चांद व आकाश के साथ जोड़कर तथा ओस की बूंदों को चांदके आसूं बनाकर खूबसूरत अंदाज में यह रुबाई लिखी गई है। अब यह शेर देखिए। यहां मोहब्बत की पाकीजगी की इंतहा हो गई है। मात्र महबूब की तस्वीर से चांद यहां बेदाग हो रहा है। देखिए जरा...
तस्वीर बना कर तेरी आसमां पर टांग आया हूं,
और लोग पूछते हैं आज चांद इतना बेदाग क्यों है।
वाकई शायरी एवं कवियों की कल्पनाशक्ति गजब की होती है। कल्पनाओं को शब्दों के मोतियों में गूंथकर इस तरह पेश किया जाता है कि बार-बार पढऩे को जी करता है। वाकई शब्दों का यह शिल्प शानदार होता है। अब इस शेर में तो चांद को बिलकुल बेसहारा तक कह दिया गया लेकिन इशारों ही इशारो में...
न जाने किस रैन बसेरों की तलाश है इस चांद को,
रात भर बिना कम्बल भटकता रहता है इन सर्द रातों में।
चांद को बिना कहे आवारा बना दिया और सर्द रातों से भी जोड़ दिया गया। ....

चांद-4


छह दिन बड़ी व्यस्तता भरे बीते। इतनी व्यस्तता की चांद की चर्चा भी कहीं गुम हो गई। देर रात थोड़ा सा वक्त मिला तो, सोचा क्यों ना चांद की अधूरी बात को आगे बढाया जाए। हां चर्चा के इस विराम के बीच चांद से जुड़ा समाचार जरूर सुर्खियों में छाया रहा। समाचार था, चांद पर कदम रखने वाले आखिरी अंतरिक्ष यात्री यूजिन कर्नेन का निधन। वे 1972 में नासा के अपोलो17 मिशन के तहत चांद पर गए थे। वैसे चांद पर कदम रखने वाले पहले शख्स नील आर्मस्ट्रांग थे। जानकारी जुटाई तो सामने आया कि चांद पर अब तक कुल 12 लोगों ने कदम रखा है। नील आर्म स्ट्रांग, बज एल्ड्रिन, चाल्र्स पीट कोन रैड, एलन बीन, एलन शेफर्ड, एडगर मिशेल, डेविड स्कॉट, जेम्स इरविन, जन डब्ल्यू यंग, चाल्र्स ड्यूक, यूजिन कर्नेन, व हैरिसन जैक श्मिट हैं। यह सभी यात्रा 21 जुलाई 1969 से 11 दिसम्बर 1972 के बीच चांद पर गए।
खैर, चांद की इस चर्चा में गीतों का सिलसिला छूट गया। चांद वैसे धर्म एवं आस्था से भी जुड़ा है। विशेषकर करवा चौथ का चांद देखने का इंतजार बड़ी बेसब्री से किया जाता है। करवा चौथ से जुड़ा एक गीत है, ऐ काश देखूं मैं आज की रात, चांद और पिया दोनों साथ-साथ..। वैसे ईद के कई गीत भी चांद के साथ जोड़कर लिखे गए हैं। कैसी खुशी लेकर आया चांद ईद का...मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का...। चांद व ईद का एक गीत सनम बेवफा फिल्म में भी था। मुझे अल्लाह की कसम, तुझसे प्यार हो गया... बिना ईद के चांदका दीदार हो गया..। हीरो हिन्दुस्तानी फिल्म का, चांद नजर आ गया गीत कुछ इसी तरह के ही हैं। वैसे गीतकारों की कलम चांद पर ज्यादा ही चली है। न केवल हिन्दी गीत बल्कि राजस्थानी में भी कई गीत ऐसे हैं, जिनमें चांद का उल्लेख होता है। चांद से जुड़े यह सभी गीत जनमानस में लंबे समय से छाए हुए हैं। मसलन, चांद चढ्यो गिगनार.... चंदा थारै चांदणै ...चांदण रात चमक रहयो चंदा.....। इसके अलावा फागुन माह में चंग पर गाए जाने वाली धमाल, छुप जाई रै चंदा बादळ में, पिया की नजर में म्हारै काजळ मं.. तो इतना कर्णप्रिय है कि फागुन की मस्ती को दुगुना कर देता है। राजस्थानी में एक वीडियो आया है, बोल हैं, म्हारा चांद-सूरज नंदोई सा..। एक और गीत चांद पूनम को उगयो है मिलन रात आज आई है... सुनकर भी मन मयूरा नाच उठता है। चांद गीत संगीत के साथ कविता व शेरो शायरी से भी जुड़ा है। चांद पर न जाने कितने ही शेर कहे गए हैं। ....क्रमश:

चांद-3


इस तरह के गीतों से साबित होता है कि चांद की हर किसी ने अपने हिसाब से व्याख्या की है। कई बार तो चांद की तुलना ऐसी-ऐसी चीजों से कर दी जाती है कि सुनकर चेहर पर डेढ़ इंची मुस्कान दौड़ जाती है। शाहरूख खान अभिनीत एक फिल्म का गीत, समझकर चांदजिसको आसमां ने दिल में रखा है, मेरे मेहबूब की टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा है...। अब देखिए यहां चांद का दर्जा टूटी हुई चूड़ी के समकक्ष रखा गया है। कहां तो चांद प्रेम का प्रतीक बना था और कहां उसकी अहमियत टूटी चूड़ी के बराबर कर दी गई। यह सब कल्पना का ही तो कमाल है।
पचास के दशक में आई फिल्म दाग का गीत भी कमोबेश ऐसा ही था, इस गीत में चांद की तुलना बेवा की टूटी हुई चूडी से की गई है। देखिए, चांद एक बेवा की चूड़ी की तरह टूटा हुआ, हर सितारा बेसहारा...। दरअसल यह गीतकार पर निर्भर करता है, क्योंकि वह परिस्थितियों के हिसाब से ही गीत की रचना करता है। ऐसे में चांद पर इस तरह के प्रयोग होते रहते हैं। चांद सिफारिश जो करता हमारी....., चांद मेरा दिल, चांदनी हो तुम.... मैं तेरा चांद तू मेरी चांदनी...चांद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर....उस चांद से प्यारे चांद हो तुम...वो चांद जैसी लड़की इस दिल पर छा रही है... रात की हथेली पर चांदजगमगाता है...ये रात ये चांदनी फिर कहां...ये वादा करो चांद के सामने...आदि गीत अलग-अलग फिल्मों के हैं लेकिन इनके मूल में प्रेम है। इन गीतों को सुनने से प्रेम की अनुभूति होती है। इन गीतों में नायक चांद है और नायिका उसकी चांदनी, मतलब देानों एक दूसरे के पूरक और एक दूजे की पहचान भी। अब देखिए इस गीत में कल्पना की ऊंची उड़ान है तो हुस्न का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन। फिर भी यह गीत अपने दौर के हर नायक को लुभाता रहा है। गौर फरमाइए, चांद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे, हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे। साठ के दशक में आई फिल्म फूल बने अंगारे का यह गीत मुकेश की आवाज में बेहद दिलकश बन पड़ा है। कुछ इसी तरह का गीत मैं चुप रहूंगी फिल्म का है। गीत के बोल हैं, चांद जाने कहां खो गया, तुमको चेहरे से पर्दा हटाना न था...। लब्बोलुआब यह है कि सारा खेल कल्पना का ही है, तभी तो इस गीत में चांद की तुलना एक आवारा व निराश प्रेमी से कर दी गई है। आवारगी फिल्म का गीत, चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला, मेरी आवारगी ने मुझे आवारा बना डाला... यह चरितार्थ भी करता है। ....क्रमश:

चांद-2


अब देखिए ना हिमालय की गोद फिल्म के गीत, चांद सी महबूबा होगी मेरी कब मैंने ऐसा सोचा था...यहां महबूबा के चांद सी होने की कल्पना की जाती है लेकिन नब्बे के दशक में आई फिल्म आओ प्यार करें में नायक कहता है, चांद से पर्दा कीजिए कहीं चुरा ना ले चेहरे का नूर। मतलब वहां चांद सी महबूबा की कल्पना तो यहां चांद से पर्दा करने की नसीहत दी जाती है। कभी-कभी चांद इतना खूबसूरत हो उठता है कि महबूबा की तुलना ही उसी कर दी जाती है। तभी तो चौहदवीं का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो..जैसे गीत की रचना होती है। इसी तरह सावन को आने दो फिल्म का चांद जैसे मुखड़े पे बिन्दिया सितारा भी.. इसी से मिलता-जुलता गीत है। इतना ही नहीं चांद कभी मामा बनता है। चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा... चंदा मामा दूर के.. जैसे गीतों में चांद को मामा बताया गया है। वैसे बहुत पहले चंदामामा नाम से बच्चों की पुस्तक भी आती थी।
खैर, चांद को हमने क्या-क्या नहीं बना दिया। कहीं बेटे को चांद जैसा समझा जाता है, मेरा चंदा है तू सूरज है तू... कहीं वो संदेशवाहक बन जाता है, चंदा रे मेरे भैया से कहना.. मेरे भैया को संदेश पहुंचना रे चंदा...। चांद भाई की भूमिका भी निभाता है, तभी तो बहन कह उठती है, मेरे भैया, मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन...। चांद महबूब भी है तभी तो तुम आए तो आया मुझे याद गली में आज चांद निकला.. की कल्पना की जाती है। चांद प्रियतम से मिलने का सहारा भी है। तभी तो नायक कहता है, तुझे चांद के बहाने देखूं, तू छत पर आजा गौरी ए..। चांद की चांदनी युगल को कितना सुकून देती है तभी तो, धीरे-धीरे चल चांद गगन में.. की गुहार लगाई जाती है। इसी तरह आधा है चंद्रमा है रात आधी.. गीत भी कुछ इसी मिजाज का है। इतना ही नहीं कई बार तो चांद से आगे भी जाने की कल्पना कर ली जाती है, बिलकुल सितारों से आगे एक जहां और भी है की तर्ज पर। पाकीजा फिल्म का चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो गीत से तो यही साबित होता है। वैसे चांद की तुलना चेहरे से भी की जाती रही है। इसके अलावा चांद दीवाना भी है। आशिक भी है। यह शमा भी है और यही परवाना है। छुपा रूस्तम फिल्म के इस गीत के बोल तो यही साबित करते हैं। देखिए, यह चांद कोई दीवाना है, कोई आशिक बड़ा पुराना है। पीछे किसके ये भागे, यह शमा है या परवाना है, दीवाना है। ....क्रमश:

चांद-1


किसी वस्तु या व्यक्ति की आरजू या हसरत उस वक्त और अधिक बढ़ जाती है जब वह पहुंच से दूर हो जाए। कल यह बात फिर प्रासंगिक हो उठी, जब चांद बादलों की ओट में ऐसा छिपा कि निकलने का नाम तक नहीं लिया।। चांद के इंतजार में कई महिलाओं की रात तो आंखों में ही कट गई लेकिन बेरहम चांद का दिल जरा सा भी नहीं पसीजा। अगर कहीं थोड़ा बहुत पसीजा भी तो बादलों ने दाल भात में मूसलचंद की भूमिका निभाई। सर्द हवा एवं हल्की बूंदाबांदी के बीच दिन भर से भूखी प्यासी महिलाएं चांद के दीदार के लिए न जाने कितनी ही बार छत की सीढियां चढ़ी व उतरी। इंतजार की इंतहा होते देख कई तो भूखी ही सो गई। चांद का यह इंतजार संकटचतुर्थी यानि तिलकुट्टा चौथ के उपलक्ष्य में था। इस व्रत में चांद के दर्शन करने के बाद उपवास खोलने का विधान है, लेकिन प्रतिकूल मौसम ने सुहाहिनों की कड़ी अग्नि परीक्षा ले ली। वैसे चांद की बात चली है तो दूर तलक तो जाएगी ही। चांद कहां पर नहीं है। यह उम्र की सीमा नहीं देखता। हर किसी के जीवन से जुड़ा है चांद। बालक हो, जवान हो, महिला हो। सबके लिए अहमियत रखता है चांद। और तो और गंगा-जमुनी संस्कृति का जीता जागता उदाहरण है चांद। इसकी प्रशंसा में कई गीत लिखे गए हैं लेकिन कल तो चांद को लेकर शिकवा-शिकायतों का दौर हावी था। कह रही थी यह मुआ चांद है ही ऐसा। इसकी फितरत ही ऐसी है। न जाने यह कितनों को तडफ़ाता है। तरसाता है। वाकई कल तो चांद ने इतना तरसाया कि कई चांद से चेहरे मुरझाए हुए नजर आए। चांद जैसे रोशन चेहरे बुझे-बुझे से दिखाए दिए।
वैसे चांद का जिक्र आते ही जेहन में अनगिनत गाने व शेरो-शायरी का ख्याल जिंदा हो उठता है। चांद की शान में क्या-क्या नहीं कहा गया। यह अब गाना देखिए- 'खोया- खोया चांद, खुला आसमान, आंखों में सारी रात जाएगी, तुमको भी कैसी नींद आएगी... ' यह गीत बड़ा कर्णप्रिय है लेकिन देखिए ना गाने के बोल कल बेमानी थे। चांद खोया (गुमशुदा) था, क्योंकि आसमान खुला ( साफ) नहीं था, लेकिन फिर भी रात आंखों में गुजर गई। हां, हम दिल दे चुके सनम फिल्म के गीत 'चांद छिपा बादल में शरमा के मेरी जाना..' गीत जरूर मौजूं लगा। कल तो शायद चांद शरमा ही गया वरना वह इतना निष्ठुर कहां है। वैसे चांद से बावस्ता गीतों की फेहरिस्त बेहद लंबी है। ...क्रमश:

जवानों में जोश भर देते हैं भारत माता के जयकारे


श्रीगंगानगर. 
वाकई यह पल जोश जगाने वाले होते हैं। देशभक्ति का जज्बा इस कदर हिलोरें मारता है कि भारत माता के जयकारे के साथ भींची हुई मुट्ठियां हवा में लहराती है। यह जयकारे जवानों में जोश भरने का काम करते हैं। भारत-पाक सीमा पर सादकी पोस्ट के पास यह नजारा रोज शाम को होता है। सैन्य भाषा में इसे रिट्रीट सेरेमनी कहा जाता है। पंजाब के फाजिल्का से मात्र 15 किमी की दूरी पर स्थित सादकी बॉर्डर पर जवानों की यह अनूठी परेड देखना बेहद रोमांचक होता है। जीरो लाइन के बीच भारत-पाक के जवान मार्च करते हैं।
मार्च के दौरान जवान पैरों को अपने सिर के ऊपर तक ले जाते हैं। दोनों देशों के जवानों की इस अनूठी परेड देखने आए लोग भी खूब हौसला बढ़ाते हैं। हुटिंग करते हैं और अपने-अपने देश के समर्थन में नारेबाजी करते हैं। पड़ोसी मुल्क के लोग अपने देश के समर्थन में नारे लगाते हैं तो इधर, भारतीय जवानों के समर्थन में 'भारत माता की जय '  'वंदेमातरम' व 'हिन्दुस्तान जिंदाबाद' के नारे लगते हैं। जवानों की पदचाप इतनी तेज होती है कि इसे आसानी से सुना जा सकता है। परेड के दौरान जवानों के चेहरे की भाव भंगिमाओं से इनका गुस्सा साफ जाहिर होता है। इससे माहौल एकबारगी तनावपूर्ण हो जाता है। परेड के बाद बैंड की कर्णप्रिय धुन के बीच दोनों देशों के जवान अपने राष्ट्रीय ध्वज को बड़े ही रोचक एवं नाटकीय अंदाज में उतारते हैं। इस दौरान दोनों देशों के दो-दो घुड़सवार जवान दोनों तरफ खड़े रहते हैं। ध्वज उतारने के बाद ही दोनों तरफ से तेज धुन में देशभक्ति गीत गूंजते हैं। दोनों तरफ से गीतों की आवाज बेहद तेज होती है।
सेल्फी लेने की होड़
रिट्रीट सेरेमनी के दौरान और इसके बाद फोटो लेने वालों की बाढ़ सी आ जाती है। यह सिलसिला दोनों तरफ है। बिलकुल जीरो लाइन के पास दर्शक सेल्फी लेते हैं। दोनों तरफ खास बात यह देखने को मिलती है कि लोग अपने देश के सैनिकों के साथ सेल्फी लेने में खासी दिलचस्पी दिखाते हैं।

जानिए एक ऐसे युवक के बारे में जिसकी पीठ पर लिखा 'इश्तहार' ही है उसकी पहचान

श्रीगंगानगर.

 न तो उसका नाम गुम है और न ही चेहरा बदला है। और तो और आवाज भी उसकी पहचान नहीं है। बस पीठ पर चस्पा एक छोटा सा 'इश्तहार' ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है। यह अजीब सी दास्तां हैं ताराचंद वाटिका के पास रहने वाले दिव्यांग चमकौरसिंह की। परिजन वैसे तो उस पर नजर रखते हैं लेकिन कई बार वह चुपचाप घर से निकल जाता है। एेसे में उसको तलाशने के लिए परिजनों ने एक अजीब सा तरीका अपना रखा है। चमकौर की पीठ पर कमीज पर एक सूचना लगा दी गई है। इस पर लिखा है ' यह बच्चा मानसिक रूप से बीमार है, अगर कहीं मिले तो फोन करने की कृपा करें।' इस सूचना के नीचे दो मोबाइल नंबर लिखे हुए हैं। 

दरअसल, इस तरह का आइडिया चमकौर के परिजनों को किसी शुभचिंतक ने ही दिया था। कुछ दिन पहले चमकौर जलालाबाद चला गया था। बाद में फेसबुक के माध्यम से वह मिल गया। इसके बाद उसकी पीठ पर यह सूचना लगा दी गई है। वह घर से बाहर जाता है तो लोग उसकी पीठ पर लिखे नंबर देखकर फोन कर देते हैं। इससे परिजन चमकौर को आसानी से तलाश लेते हैं।

मंदिर जहां भगवान नहीं, पूजे जाते हैं उनके वस्त्र


फोन करके परिजनों को बुलाया
चमकौर पदमपुर रोड स्थित कल्याण भूमि में सोमवार को किसी के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ। पीठ पर चस्पा सूचना देखकर वहां मौजूद लोगों ने फोन लगाया तो परिजन वहां आए और चमकौर को लेकर गए। चमकौर के बड़े भाई गुरप्रीत ने बताया कि वे तीन भाई हैं। उन्होंने बताया कि चमकौर ने दस साल तक तपोवन मनोविकास विद्यालय में अध्ययन किया है। वह दिव्यांग है। घर के सब लोग उस पर ध्यान रखते हैं लेकिन कई बार वह घर से निकल जाता है। घर का रास्ता भूल जाता है इसीलिए पीठ पर नंबर लिखे हैं ताकि सूचना पर वहां पहुंचा जा सके।  

सुरक्षा बलों के खाने पर पहले भी उठते रहे हैं सवाल

 खाने की गुणवत्ता को लेकर सीमा सुरक्षा बल के एक जवान द्वारा वायरल किए गए वीडियो की हकीकत भले ही अभी जांच के दायरे में हो लेकिन कड़वी हकीकत यह भी है सेना व सुरक्षा बलों के खाने पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं। 
 नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की पिछले साल जारी रिपोर्ट में तो कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए थे। मसलन, जम्मू कश्मीर तथा पूर्वोतर क्षेत्र में तैनात जवानों को ताजा खाना नहीं मिलता है और जो मिलता है वह भी भरपेट नहीं मिलता। 
इतना ही नहीं कैग रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि सेना के जवानों को एक्सपायरी डेट गुजरने के बाद भोजन के पैकेट भेजे जा रहे हैं। कैग रिपोर्ट एव हालिया सीमा सुरक्षा बल के जवान के आरोप से आखिररकार यह तो जाहिर होता ही है कि खाने को लेकर किसी न किसी स्तर पर गड़बड़ तो है। 
सेना में भोजन को लेकर हो हल्ला पहले भी होता रहा है, लेकिन अंदरूनी स्तर पर ही इनको निबटा लिए जाने के कारण बाहर बवाल कम हुआ। 
भारतीय सेना की नौकरी को जोश-जुनून व जज्बे वाली कहा जाता है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि सेना में अनुशासन सर्वोपरि है। यहां अनुशासन भंग करने पर सैन्य नियमों/ कानूनों के तहत कड़ी सजा का प्रावधान है। इतना कुछ होने के बावजूद भोजन की गुणवत्ता पर सवाल उठना ही अपने आप में अनुशासन को खंडित करने जैसा है। सुरक्षा बलों की अंदर की बात बाहर आना ही अनुशासनहीनता की श्रेणी में माना जाता है। उस पर बवाल मचना व बहस छिड़ना भी लाजिमी है। वैसे भी थल, नभ व जल सेना तीनों में ही भोजन की व्यवस्था तीन स्तर पर होती है। उच्च स्तर के अधिकारी, मध्यम स्तर के अधिकारी तथा जवान। तीन स्तर पर खाने/पकाने की व्यवस्था भी अलग-अलग होती है। इन सबके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि जवानों के भोजन पर ही अक्सर बवाल क्यों मचता है? इससे भी गंभीर बात यह है भोजन कि गुणवत्ता पर सवाल भी अक्सर जवानों ने ही उठाए हैं। अफसरों के द्वारा गुणवत्ता पर सवाल उठाने के उदाहरण कम ही सामने आते हैं। जानकारों की मानें तो गुणवत्ता पर सवाल तभी उठते हैं जब निर्धारित कोटे में कटौती कर दी जाती है या गुणवत्ता में गिरावट कर राशन बचाने का उपक्रम होता है। इस तरह की बातों का समर्थन सेना में रह चुके पूर्व जवान भी करते हैं। वितरण व्यवस्था सही नहीं होने से भी अक्सर विवाद खड़ा हो जाता है। कुछ उदाहरण इस तरह के भी सामने आए हैं, जब जवानों को भरपेट भोजन की बजाय गिनती के हिसाब से रोटियां दी गई। अनुशासन की बुनियाद पर खड़े सेना या अर्द्धसैनिक बलों के अंदरूनी हालात अगर हकीकत में इस तरह के हैं तो यह हम सब के लिए चिंताजनक हैं। यह सही है कि वेत्तन, भते व सुविधाओं के हिसाब से तो अफसर व जवान की कोई तुलना नहीं हो सकती है लेकिन बात जब भोजन की आती है तो उसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। 
 सीमा सुरक्षा बल के जवान के वीडियो की हकीकत भले ही सामने आए या न आए लेकिन इस बहाने सेना एवं अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को दिए जा रहे भोजन की गुणवत्ता तो ही जांची जा ही सकती है और जांचनी भी चाहिए। मामला संवेदनशील है और सीधा-सीधा देश की सुरक्षा से भी जुड़ा है। 
भरपेट भोजन न मिलने या गुणवत्ताहीन भोजन करने वाले जवान सीमा पर कितनी मुस्तैदी से ड्यूटी कर पाएंगे सहज ही कल्पना की जा सकती है? विपरीत परिस्थतियों में काम करने वालों के लिए तो गुणवत्ता से परिपूर्ण भोजन बेहद जरूरी है।

राशन पर हो हल्ले का है पुराना इतिहास


बस यूं ही 
सीमा सुरक्षा बल के जवान द्वारा खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाने की बात कोई नर्ई नहीं है। सेना व अद्र्धसैनिक बलों में खाने को लेकर हो हल्ला पहले भी मचता रहा है। आज सुबह चाय के दौरान पापाजी से सेना के खाने को लेकर चर्चा चल पड़ी। बातों-बातों में वो अतीत में चले गए। कहने लगे राशन की गुणवत्ता को लेकर सेना में इस तरह के हो हल्ले पहले होते रहे हैं। पापाजी ने सन 1965 के युद्ध के बाद का वाकया बताया कि उस दौरान नासिक थे. उनको लंगर कंमाडर बनाया गया था। यह जिम्मेदारी अस्थायी रूप से होती थी और दो माह के लिए दी जाती थी। स्टोर से राशन संबंधित रेजीमेंट में आता था और वहां से कंपनीज में। हर कंपनीज में लंगर कंमाडर होते थे जिनकी निगरानी में भोजन तैयार होता था। पापा जी ने बताया कि उस वक्त ज्यादा मारामारी रोटियों को लेकर होती थी, जबकि एक जवान के लिए छह सौ ग्राम आटा निर्धारित था। इसके बावजूद उनको रोटियां गिन-गिन कर दी जाती थी। पापाजी ने बताया कि उन्होंने पहला काम यह किया है जवान को रोटी गिन के नहीं बल्कि वो जितनी खाता है उतनी दी जाए। पापाजी ने बताया कि एक दिन उन्होंने देखा कि लांगरी मतलब भोजन बनाने वाला कुक अपने एप्रीन में बहुत सारी रोटियां छिपा रहा था। पापाजी ने उसका टोका तो वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसके बाद पापाजी ने वहां नियम बना दिया कि जो लांगरी भोजन करना चाहता है वह वहीं करे लेकिन जाते समय एप्रीन को झाड़ कर ही जाएगा। बस फिर क्या था। हो हल्ला बंद हो गया। न केवल रोटियां बचने लगी बल्कि राशन भी बचने लगा। दो माह के बचे राशन को स्टोर में जमा करवा दिया गया।
खैर, इस वृतांत से मैं यह समझा कि राशन पर विवाद की कहानी पुरानी है। इसमें सबसे पहले तो लंगर कमांडर की भूमिका की महत्वूपर्ण होती है। उसकी मर्जी के बिना कुछ भी संभव नहीं है। पापाजी की बात से यह भी साबित होता है राशन की कोई कमी नहीं है बशर्ते उसका वितरण हिसाब से हो। हां राशन को बाजार में बेचने के जो आरोप लगते हैं, उनके पीछे भी प्रमुख रूप से दो कारण हो सकते हैं। ईमानदारी से बचे राशन को स्टोर में जमा न करवाकर सीधे बेच देना या फिर मात्रा में कटौती कर राशन बचाना और फिर उसे बेच देना, लेकिन सैन्य नियमों के तहत ऐसा करना अपराध है। कोई अगर ऐसा करता है तो इसमें गिने-चुने लोगों की भूमिका हो सकती है। समूची सेना इसके लिए न तो जिम्मेदार है और न ही उसको बदनाम करना चाहिए। वैसे यह सेना का अंदरूनी मामला है और जब इस तरह की शिकायतें होती हैं तो उन पर अमल भी होता है।

हंगामा क्यों है.बरपा ..


बस यूं ही 
सीमा सुरक्षा बल के जवान के समर्थन में समूची सेना/ सुरक्षा बलों को कठघरे में खड़े करने वालों से मेरा पहला सवाल यही है कि वो जिस भी क्षेत्र में काम कर रहे हैं कि क्या वहां शत-प्रतिशत पारदर्शिता है? मतलब सारे काम ईमानदारी से ही होते हैं या सारे लोग ही दूध के धुले हैं? यकीनन सभी का उत्तर नहीं ही आएगा। फिर भी अगर कोई हां कहता है तो शर्तिया वह झूठ बोलता है। इस अजीब व अटपटे सवाल से अपनी बात शुरू करने का मतलब यही है कि हम जिस भी क्षेत्र से आते हैं, (भले ही व्यक्तिगत रूप से आप कैसे भी हो यह मायने नहीं रखता है) वहीं अगर गड़बड़ है तो हमको दूसरों पर अंगुली उठाने का या आइना दिखाने का कोई अधिकार नहीं है। और उठाते हैं तो यह उन लोगों का अपमान है जो ईमानदारी के पथ पर चल रहे हैं। हां एक मछली द्वारा सारे तालाब को गंदा करने वाली बात से जरूर सहमत हुआ जा सकता है। खैर, सोशल मीडिया में आज बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं। कई तरह की उपमाएं दी जा रही हैं। सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कई तरह के तर्क व अनुभव बताए जा रहे हैं। सैन्य अनुशासन को तार-तार करने वाले एक सीमा सुरक्षा बल के जवान को बतौर हीरो बनाया जा रहा है। बात यहीं तक सीमित नहीं है जवान के समर्थन में उतरे लोग तो बीएसएफ की तरफ से दिए गए जवाबों पर ही सवाल उठा रहे हैं। याद दिला देता चलूं कि यह वही लोग हैं जो कुछ रोज पहले सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सेना व जवानों के सम्मान में बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थें। 
इन सब के बीच मान भी लें कि सीमा सुरक्षा बल के जवान के साथ अन्याय हुआ लेकिन इंसाफ पाने के लिए जवान ने जो रास्ता अपनाया क्या वह सही है? क्या जवान को ऑन ड्यूटी मोबाइल रखने की इजाजत है? क्या घर की शिकायत घर के मुखिया के बजाय छत्त पर खड़े होकर चिल्ला चिल्लाकर बतानी चाहिए? आज कमोबेश हर दूसरा या तीसरा आदमी उस जवान के साहस को सलाम करता नजर आ रहा है। सोशल मीडिया पर जवान के समर्थन में जबरदस्त बहस छिड़ी है। यह तो भी सभी जानते हैं कि सेना हो या अद्र्धसैनिक बल। इनके लिए अनुशासन बड़ी चीज होती है। अनुशासन भंग करके कोई अपनी पीड़ा बता रहा है तो वह सैन्य कानून के हिसाब से गुनाहगार है। अनुशासन जहां भंग होता है, वहां कुछ भी हो सकता है। बिना अनुशासन के तो अराजकता ही फैलेगी। कल्पना कीजिए अगर हर जवान ही इस तरह अनुशासन भंग करने लगा तो फिर तो सेना के औचित्य पर ही बड़ा सवाल खड़ा हो जाएगा। सीमा सुरक्षित कैसे रहेगी। इधर, जवान की अनुशासनहीनता को साहस भरा कदम बताने वाले कल फिर प्रलाप कर सकते हैं जब इस जवान पर कोई गाज गिरेगी। 
खैर, एक बात और इस जवान के नाम से फेसबुक अकाउंट भी है। यह सही है या गलत है इसकी कोई पुष्टि मैं नहीं करता लेकिन इस अकाउंट को चमत्कारित रूप से फालो करने वालो की बाढ़ सी आ गई है। यह आंकड़ा एक लाख के करीब पहुंच चुका है। इसी अकाउंट पर वह वीडियो अपलोड किए हुए हैं जिन पर देश भर में बवाल मचा हुआ है। अब जरा अपलोड वीडियो, मैसेज एवं उनके समय की बात कर ली जाए। जवान का वीडियो फेसबुक अकांउट पर 8 जनवरी को शाम 5.35 बजे अपलोड किया गया है। इससे पहले दोपहर 2.30 बजे दाल वाला वीडियो अपलोड किया हुआ है। इसके बाद 9 जनवरी को सुबह 7.28 पर दाल का एक और वीडियो अपलोड किया गया है। इसके बाद सुबह 8.12 बजे जली हुई रोटी का वीडियो तथा 8.13 मिनट पर कथित जवान का वर्दी में फोटो अपलोड किया गया है। और अब मंगलवार शाम आठ बजे से 18 घंटे पहले ओके गुड नाइट नया वीडियो देखो का मैसेज पोस्ट किया गया है। 17 घंटे पहले मोबाइल नंबर तथा 16 घंटे पहले टूटी फूटी हिन्दी में एक और मैसेज पोस्ट किया गया है जिसमें कहा है कि वह सभी धर्मो का सम्मान करता है। 
इसके बाद रोमन में एक पोस्ट लिखी गई थी, जो अब डिलीट कर दी गई है। इसमें एक महिला की फोटो के साथ लिखा गया था कि वह जवान की पत्नी है उसका कल शाम से ही पति से संपर्क नहीं हो पा रहा है। यह पोस्ट अब अकाउंट से हटा दी गई है। इसके बाद एक नई पोस्ट भी अंग्रेजी में लिखी है कि सम पीपल आर ट्राइंग टू से देट इट इज फेक आईडी सो आई वान्ट टू से देट आईएम वाइफ ऑफ ( जवान का नाम) हू इज यूजिंग दिस आईडी। इन तमाम वीडियो एवं पोस्ट को बड़ी संख्या में शेयर किया जा रहा है। कमेंट्स की तो जबरदस्त भरमार है। बहरहाल, जवान के नाम पर संचालित अकाउंट पर अचानक पत्नी के नाम से मैसेज आना, फिर उसका डिलीट होजाना। पहले टूटी फूटी हिन्दी में लिखना। फिर अंग्रेजी में बात कहना। आखिर में यह कहना कि पत्नी ही पति का अकाउंट चला रही है। इन तमाम बातों से यह जाहिर जरूर हो रहा है कुछ गड़बड़ है। विरोधाभासी मैसेज संदिग्ध प्रतीत होते हैं। बहरहाल, मैं व्यक्तिगत रूप से सेना एवं अध्यापकों का हमेशा से ही सम्मान करता रहा हूं। फिर भी जो आरोप लगे हैं उनकी गहनता व ईमानदारी से जांच होनी चाहिए। आरोपों की भी और संबंधित जवान की भी। और साथ में उस फेसबुक अकाउंट की भी। 
 और हां फेसबुक के माध्यम से सेना पर अनर्गल टिप्पणी करने वालों यह मत भूलो कि देश सेना के हाथों ही महफूज है। कभी अपने किसी परिजन को फौज में भेजकर देखो फिर बताना सेना कैसी है। हमेशा यह बात याद रखो कि सेना में अगर दो चार जयचंद हैं भी तो उसके लिए पूरी सेना जिम्मेदार नहीं है। 
जय हिन्द। जय भारत की सेना।

यह जीवन है....


बस यूं ही
कल शुक्रवार रात सवा नौ बजे के करीब फेसबुक पर मैसेज रिक्वेस्ट आई। स्वीकार करने के बाद देखा तो ग्वालियर के कोई राम उपाध्याय थे। उनका पहला संदेश था 'हैलो'। बाद में लिखा 'क्या आप स्वर्गीय प्रभुसिंह शेखावत जो कि 30-35 साल पहले ग्वालियर (एमपी) में निवास करते थे, उनके दो पुत्र विजेन्द्र व महेन्द्र हैं आप जानते हैं प्लीज।' संदेश पढ़कर मैं पहले तो हल्का सा मुस्कुराया। फिर उनके संदेश का जवाब दिया 'माफी चाहूंगा श्रीमान जी, शेखावत सरनेम के लोग बड़ी संख्या में हैं। मूगलकाल के दौरान शेखावतों का आविर्भाव हुआ तथा यह राजस्थान के झुंझुनूं व सीकर में ही ज्यादा होते थे लेकिन बाद में यह समूचे देश में फैलते चले गए। वैसे शेखावत मूल रूप से कुशवाहा राजपूत हैं जो ग्वालियर से ही राजस्थान आए थे। अगर आप गांव वगैरह का नाम बता पाएं तो शायद मैं आपकी कुछ मदद कर पाऊं।' रात को संभवत: उन्होंने मेरा संदेश नहीं देखा। शनिवार सुबह उनका जवाब आया 'बड़ागांव, झुंझुनूं' इस पर मैंने जवाब दिया ' मेरे गांव के पास ही है, शाम तक आपको पता करके बताता हूं।' उन्होंने पलटकर धन्यवाद दिया तथा मेरे मोबाइल नंबर मांगे। मैंने उनको मोबाइल नंबर दिए तो उनका फोन आ गया। कहने लगे भाईसाहब मैं ग्वालियर मध्यप्रदेश से राम उपाध्याय बोल रहा हूं। प्रभुसिंह शेखावत व उनका परिवार यहीं रहता था। हमारी माताजी उनको धर्म का भाई मानती थी। प्रभुसिंह की तो मृत्यु हो चुकी है लेकिन दोनों बेटे अभी जिंदा हैं। मैंने उनकी तलाश के लिए बहुत प्रयास किए। फेसबुक पर महेन्द्र शेखावत की कई आईडी सर्च की। आखिरकार आपका सरनेम देखा तो उम्मीद जगी कि शायद आप बता देंगे। इसलिए आप को मैसेज किया। आप अगर उनका पता बता देंगे तो मेहरबानी होगी। मैंने उनको भरोसा दिलाया कि अभी पता करके बताता हूं। 
इसके बाद मैंने बड़ागांव में परिचित अशोकसिंह जी बड़ागांव का फोन लगाया तो उन्होंने नामों की पुष्टि कर दी और मोबाइल नंबर थोड़ी देर में देने की बात कही। आधा घंटे बाद उनका दुबारा फोन आया और मोबाइल नंबर दे दिए। इसके बाद मैंने राम उपाध्याय को फोन लगाया और नंबर बताए तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने कम से दस बार धन्यवाद दिया। इसके बाद मैं आफिस चला आया। इसके बाद फिर फोन आया। कहने लगे भाईसाहब हमारी बात हो गई। आज तीस साल बाद उनसे संपर्क हुआ है। हमारी माताजी भी आपको आशीर्वाद दे रही हैं। बात-बात पर उनकी जुबान पर धन्यवाद था। बरसों पुरानी मुराद पूरी होने की खुशी राम उपाध्याय जी की बातों में झलक रही थी, जिसे मैं महसूस भी कर रहा था। इधर, मेरे को भी खुशी थी कि मेरे प्रयास रंग लाए।

वाकई दुनिया गोल है....

बस यूं ही
सरकारी स्कूलों में इन दिनों शीतकालीन अवकाश चल रहे हैं। यह सात जनवरी तक चलेंगे। दो जनवरी को श्रीगंगानगर के जिला शिक्षा अधिकारी ने एक निर्देश जारी किया, जिसमें बताया गया था कि विभाग को शिकायत मिली है कि कुछ गैर राजकीय विद्यालय शीतकालीन अवकाश में भी कक्षाएं लगा रहे हैं। इस तरह कक्षाएं लगाने वाले स्कूलों पर विभागीय कार्रवाई की जाएगी। यह तो हुई निर्देशों की बात। संयोग से मैं दो जनवरी को सुबह नोहर से श्रीगंगानगर लौट रहा था, मैंने रास्ते में कई जगह स्कूल बसें भी देखी तो कुछ जगह विद्यार्थियों को स्कूल बस के इंतजार में खड़े भी देखा। दोपहर को हनुमानगढ़ से किसी विकास शर्मा का फोन आया। उनका कहना था कि हनुमानगढ़ में शीतकालीन अवकाश के बावजूद स्कूल लग रहे हैं। हमने इन स्कूलों की सूची प्रशासन को दी है, आप खबर लगाए ताकि मासूमों को सर्दी के मौसम में परेशानी न हो। खैर, शाम को जिला शिक्षा अधिकारी के निर्देशों को आधार बनाते हुए खबर बनाई। हनुमानगढ़ से भी इनपुट मंगवाया। साथ में टिप्पणी भी लिखी। दूसरे दिन जिला शिक्षा अधिकारी के निर्देशों की खबर अन्य समाचार पत्रों में भी थीं। संयोग देखिए अगले दिन तीन जनवरी को सुबह ही एक महिला का फोन आया। उन्होंने मेरे से पूछा कि आपने तो सात जनवरी तक का अवकाश बताया है लेकिन मेरे बच्चे की स्कूल लग रही है। इतनी सर्दी में बच्चे को स्कूल भेजना किसी सजा से कम नहीं है। मैंने उनको कहा कि हमने भी यही लिखा है कि सात तक अवकाश हैं लेकिन कुछ स्कूल लग रहे हैं, लेकिन वो तो तत्काल राहत पाने के मूड में थी। किसी तरह उनको जवाब देकर मैंने बात समाप्त की। दोपहर को फिर घर के बाहर खड़ा था तो कुछ बच्चों को बस्ता पीठ पर लटकाए हुए गुजरते देखा तो माथा फिर ठनका। अब मेरे पास दो प्रमाण थे कि स्कूल लग रहे हैं। इस आधार पर शाम को फिर खबर बनवाई गई कि आदेशों की पालना नहीं हो रही है। अगले दिन चार जनवरी को एक मेल मिलता है। प्रेषक ने अपने नाम की जगह संगठन का नाम लिखा और साथ में इस तरह की खबर न छापने व अखबार के बहिष्कार की चेतावनी तक दे डाली। प्रेषक ने अपनी पीड़ा काफी विस्तार से लिखी। मसलन, हम तो शिक्षित बेरोजगार युवाओं को नौकरी देते हैं, वरना वो अपराध की दुनिया में जाते या आत्महत्या कर लेते। हम गरीब एवं कमजोर बच्चों को अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर पढ़ाते हैं तो कौनसा गुनाह करते हैं। और न जाने कितने की सुझाव, सलाहें व शिकायतें, लेकिन सारी की सारी पूर्वाग्रह से लिपटी हुई। प्रेषक ने न तो नाम दिया न ही सम्पर्क करने के लिए कोई नंबर। मैंने उसकी मेल आईडी को गूगल प्लस पर सर्च किया लेकिन उसमें भी मुझे हकीकत कम फर्जीवाड़ा ज्यादा नजर आया।
इन तमाम घटनाक्रमों के बाद हद तो तब हो गई जब दोपहर बाद एक फोन आया। खुद को पुरानी आबादी निवासी बताने वाले शख्स ने पहले मेरा परिचय पूछा और कहा कि आपसे एक बात कहनी है कृपया इसको अन्यथा ना लें। मैंने प्रत्युत्तर में हामी भरी तो बोले, आप अवकाश में स्कूल खुलने का जो समाचार लगा रहे हैं वो छोटे बच्चों के लिए तो ठीक है लेकिन बड़ों के स्कूल जाने में क्या हर्ज है। बड़े बच्चे घर पर शैतानी करते हैं, इससे अच्छा तो है वो स्कूल ही जाएं। हम बच्चे को स्कूल जाने की कहते हैं तो वो उलटा हमको को टोकता है कि अखबार में आया है। कृपया आप इस तरह के समाचार प्रकाशित न करें। बहरहाल दो तीन दिन के इस घटनाक्रम के बाद मैंने अपना माथा पकड़ लिया। मतलब शिकायत हर तरफ से है। वाकई यह दुनिया गोल है। यहां कुछ भी कर लो शिकायत फिर भी रहती है।

 

गणतंत्र दिवस के ध्वजारोहण से पहले इस शौर्य मंदिर में चढ़ाते हैं फूल


मान्यता : दिल से मांगी गई हर मुराद होती है पूरी...

श्रीगंगानगर. यह शौर्य का मंदिर है। इस मंदिर में प्रवेश करते ही सिर श्रद्धा से अपने आप झुक जाता है तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। इस मंदिर का दर्जा प्रथम पूज्य देव गणपति के समकक्ष ही है, तभी तो यहां स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस समारोह के झंडारोहण से पहले श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते हैं। किसी भी तरह का चुनाव हो तो नामांकन से पहले प्रत्याशी यहां मत्था टेकते हैं। और तो और अधिकारी भी इस मंदिर में शीश झुकाने के बाद ही पदभार ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में दिल से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। यह अनूठा मंदिर पड़ोसी प्रदेश पंजाब के फाजिल्का जिले में है। फाजिल्का से मात्र सात किलोमीटर की दूरी पर भारत-पाक सीमा के नजदीक आसफ वाला नामक स्थान पर बना है यह शौर्य मंदिर। दरअसल, यह मंदिर उन सैनिकों की समाधि है, जो 1971 में भारत-पाक के मध्य हुए युद्ध में शहीद हो गए थे। इन सैनिकों के समाधि के गर्भगृह में शहीदों की अस्थियों के अंश भी हैं। इसके साथ ही समाधि स्थल के साथ ही एक संग्रहालय भी है। इसमें शहीद सैनिकों के नाम एवं चित्र लगाए गए हैं।
पंजाब के युद्ध स्मारकों में सर्वश्रेष्ठ
आसफ वाला के स्मारक को पंजाब में स्थापित लगभग 50 युद्ध स्मारकों में से सबसे सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। शहीद स्मारक को प्रारंभ में लगभग आधा एकड़ भूमि के लघु श्रेत्र में बनाया गया था। बाद में इसका विस्तार किया गया। अब यह साढ़े पांच एकड़ भूमि के बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें एक युद्ध स्मारक, संग्रहालय, कम्प्यूनिटी सेंटर में कम्प्यूटर सेंटर, शहीद दृगपाल सिंह स्मृति पार्क, एक सरकारी हाई एवं प्राइमरी स्कूल व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बने हुए हैं। स्मारक के प्रांगण में हरे-भरे पेड़ व आकर्षक फूल भी लगे हुए 
90 फीट चौड़ी और 18 फीट लंबी बननी थी चिता
समाधि स्थल के बगल में एक सूचना पट्ट लगा है। इसमें बताया गया है कि 17 दिसम्बर 1971 को रात आठ बजे भारत-पाक युद्ध समाप्ति की घोषणा की गई। इसके अगले दिन 18 दिसम्बर को सुबह सात से लेकर दोपहर बाद तीन बजे तक शहीदों की पार्थिव देह को एकत्रित किया गया। इसके बाद 90 फीट चौड़ी और 18 फीट लंबी चिता तैयार कर शाम चार बजे सभी शहीदों की सामूहिक अन्त्येष्टि की गई। इसके बाद शहीदों की याद में फाजिल्का के निवासियों ने 1972 में यादगार के रूप में इस समाधि व स्मारक का निर्माण करवाया। समाधि में सभी शहीदों की अस्थियां शामिल हैं।
सभी के चित्र तो चार सैनिकों की प्रतिमाएं
स्मारक परिसर में एक संग्रहालय भी बनाया हुआ है। इसमें सभी शहीद सैनिकों के चित्र लगाए गए हैं। यहां 15 राजपूत रेजीमेंट के शहीद लांस नायक दृगपाल सिंह महावीर चक्र और मेजर ललित मोहन भाटिया वीर चक्र, 4 चार जाट रेजीमेंट के मेजर नारायण सिंह वीर चक्र व लांस हवलदार गंगाधर वीर चक्र की प्रतिमा लगी है। इन सभी को मरणोपरांत भारत सरकार की ओर से अंलकृत किया गया था। इन सभी की प्रतिमाएं संग्रहालय के प्रवेश एवं निकास द्वार पर लगाई हुई है। साथ ही युद्ध का संक्षिप्त विवरण व आकर्षक चित्र भी संग्रहालय में लगाए गए हैं।
सभी के हैं स्मृति स्तम्भ
आसफ वाला में स्मारक में शुरुआत में 4 जाट रेजीमेंट के 82 शहीद जवानों की स्मृति में निर्माण किया गया था। इसके बाद 1991 में स्मारक का दायरा विस्तृत करने का निर्णय किया गया। इसी के तहत 15 राजपूत व आसाम रेजीमेंट के जवानों के स्मृति स्तम्भ स्मारक परिसर में स्थापित किए गए। युद्ध में शहादत देने वाले सीमा सुरक्षा बल तथा होमगाडज़् के जवानों के स्मृति स्तम्भ यहां बनाए गए हैं। विदित रहे कि इस जगह पर 4 जाट रेजीमेंट, 3 आसाम रेजीमेंट, 15 राजपूत रेजीमेंट, 67 इनफेन्टरी ब्रिगेड, अश्वरोही सेना, सीमा सुरक्षा बल व होमगार्ड के कुल 225 सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की थी जबकि 450 सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इनमें से कुछ तो स्थायी रूप से अपंग भी हो गए थे।

Thursday, February 16, 2017

प्रेमी युगलों की मुराद पूरी करती है यह मजार

साल भर आते हैं प्रेम की दुआ मांगने वाले
श्रीगंगानगर. यहां प्रेम फलता-फूलता है। यहां प्रेम की सलामती की दुआएं मांगी जाती हैं। खास बात यह है कि  यहां आने वाले प्रेमी जोड़ों को नफरत भरी नजरों से नहीं देखा जाता। तभी तो यहां प्रेमी साल भर आते हैं। मत्था टेकते हैं और प्रेम की खुशहाली की मन्नते मांगते हैं। मान्यता है कि सच्चे दिल से मांगी गई मुराद यहां पूरी होती है। यह जगह भारत-पाक सरहद से बिलकुल सटी है। श्रीगंगानगर जिले की अनूपगढ़ तहसील का छोटा सा गांव बिंजौर प्रेेम की भाषा समझने वालों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। हो भी कैसे नहीं आखिर, अमर प्रेम के प्रतीक एेतिहासिक प्रेमी युगल लैला-मजनूं की मजार जो यहां हैं। हालांकि इस मजार के कोई एेतिहासिक दस्तावेज तो नहीं मिलते हैं लेकिन कई तरह की किवदंतियों में इस बात का दावा किया जाता है कि यह हकीकत वाले लैला मजनूं ही हैं। इस मजार पर वैसे तो साल भर ही आने जाने वालों का क्रम लगता रहता है लेकिन प्रत्येक वर्ष 10 से 15 जून तक लगने वाले मेले में सैकड़ों श्रद्धालु उमड़ते हैं। इनमें प्रेमी युगल व नवविवाहित जोड़ों की संख्या ही अधिक होती है। मान्यता यह भी है कि जिनके संतान नहीं होती है वे भी इस मजार पर आकर मन्नतें मांगते हैं तो वह पूरी होती है।

हिन्दू ही करते हैं मजार की देखरेख
बिंजौर गांव के पास घग्घर नदी के मुहाने पर बनी लैला-मजनूं की मजार की देखरेख हिन्दू करते हैं। बिंजौर गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है। खास बात यह है कि मजार के रखरखाव तथा वार्षिक मेले के लिए गठित कमेटी में भी कोई मुस्लिम नहीं है। मजार पर सभी धर्मों के लोग आते हैं। कमेटी के मुखिया भागसिंह बताते हैं कि गांव में कोई मुस्लिम परिवार नहीं है लेकिन मजार की देखरेख हिन्दू ही करते हैं। मजार पहले खुले में थी, अब इसके ऊपर गुम्बद बना दिया गया है। प्रवेश द्वार पर घंटी लगी है। अमूनन इस तरह की घंटियां मंदिरों के प्रवेश द्वार पर होती हैं। गुम्बद की छत में भी चार रोशनदान बनाए गए हैं। बताया जाता है कि रोशनदान छोडने के बाद ही गुम्बद तैयार हुआ अन्यथा इसके बनाने में दिक्कत आ रही थी।
अलग-अलग कहानियां
लैला-मजनूं की मजार को लेकर कई तरह के किस्से व कहानियां प्रचलन में हैं। लोग बताते हैं लैला-मजनूं पाकिस्तान के सिंध प्रांत के रहने वाले थे और दोनों की इसी जगह पर मौत हुई थी। लैला-मजनूं की मौत को लेकर भी लोग एकमत नहीं है। किसी का कहना है कि दोनों के प्रेम की जानकारी होने पर लैला के भाई ने मजनूं की हत्या करवा दी। बाद में मजनूं की तलाश में भटकती लैला उसके शव के पास पहुंंची और खुदकुशी कर ली। कुछ लोगों का कहना है कि दोनों घर से भाग थे। बाद में दर-दर की खाक छानते हुए दोनों ने भूख व प्यास के कारण साथ-साथ ही प्राण त्याग दिए। इधर लैला-मजनूं कमेटी के मुखिया भागसिंह का कहना है कि लैला-मजनूं यहां आए थे और उम्र पूरी होने के बाद सामान्य तरीके से इनकी मौत हुई। उनकी याद में ही यह मजार बनी है। मजार किसने बनवाई तथा कब बनवाई इस बात का जवाब भागसिंह के पास नहीं है लेकिन उनका कहना है कि मजार चार सौ साल पुरानी है।

पहले खुले में थी मजार
लैला मजनूं की मजार पहले घग्घर नदी के बीच में खुले में ही थी। कालांतर में इसके चार दीवारी बनी और अब गुम्बद बन चुका है। चारदिवारी के दरवाजे से मजार तक शैड भी बनाया गया है ताकि दर्शनों के लिए कतार में खड़े श्रद्धालुओं को धूप न लगे। मजार के बारे में कहा जाता है कि जब-जब घग्घर नदी में पानी आता था तो मजार को छूता नहीं था। यह मजार के दोनों तरफ से निकल जाता था। इस बात पर भी भागसिंह कहते हैं कि नदी काफी चौड़ी होती थी। पानी तीन-तीन फुट तक आता लेकिन मजार नहीं डूबी। वैसे अब तो घग्घर में पानी आना भी कम हो गया है और मजार के चारदिवारी बनने से उसके पास पानी आ भी नहीं सकता। भागसिंह ने बताया कि पहले रात को यहां अंधेरे में दिया जलता दिखाई देता था। सबसे पहले इस बात की जानकारी सेना को हुई और उसके बाद लोगों को पता चला।