Sunday, December 17, 2017

आज चिंतित हूं...

बस यूं ही
चार दिन से जयपुर से लौटा तो श्रीमती बीमार मिली। बीमारी की सूचना तो फोन पर मिल गई लेकिन आकर देखा तो वाकई में हालत गड़बड़ थी। सूखे होंठ, लटका चेहरा, उनींदी आंखें और थकी-थकी सी चाल। लब्बोलुआब यह कि एकदम निढाल सी। दो दिन से यही हालत थी। चौदह दिसम्बर को देर रात फोन किया था लेकिन तब जयपुर में होने तथा डीजे पर तेज आवाज होने के कारण फोन अटेंड नहीं कर पाया। मुझे क्या मालूम था, फोन तबीयत को लेकर किया जा रहा है। उसने व्हाटसएप पर मैसेज भी किया लेकिन रात को समारोह के वीडियो बनाते-बनाते मोबाइल की बैटरी जवाब दे चुकी थी। लिहाजा पन्द्रह दिसंबर को सुबह जयपुर से रवाना होते वक्त मैसेज देखा। फोन पर बात हुई तो मामला गंभीर लगा। मैंने स्टाफ के एक साथी को मैसेज किया। वो डाक्टर को लेकर घर भी गए लेकिन डाक्टर की दवा श्रीमती को जमी नहीं है।
पन्द्रह को देर शाम घर पहुंचा तो उसकी हालत देखकर तय किया कि अगले दिन सुबह चिकित्सक को दिखाना है। अलसुबह साढ़े चार बजे अचानक आंख खुली तो वह बुखार से तप रही थी। मैंने जैसे ही माथे पर हाथ रखा तो उसने पानी मांगा। उसको पानी देकर मैं रजाई में घुस गया। बुखार में उसके मुंह से आवाज निकलती रही। पांच बजे उसने फिर पानी मांगा। पिलाकर फिर रजाई में घुस गया। श्रीगंगानगर में इन दिनों सर्दी ज्यादा है। पारा तीन डिग्री के आसपास चल रहा है। निर्मल को सर्दी ज्यादा भी लगती है। खैर, छह बजते बजते मोबाइल का अलार्म बज उठा। मौके की नजाकत भांपते हुए मैं उठा और पानी को गर्म करने रख दिया। अब संकट बच्चों को दूध पिलाने तथा माताजी-पिताजी की चाय बनाने का था। बुखार में तपने के बावजूद वह उठी। चाय बनाकर दी। और इन सब के अलावा आज निर्मल की भूमिका मैंने संभाली और मां को चाय पिलाने के बाद फिर रजाई में आ घुसा। इसके बाद मां से संबंधित वह तमाम काम जो निर्मल रोजाना करती है किए। आफिस के लिए कुछ लेट हो गया था। सवा ग्यारह बजे घर से निकला। आते ही सुबह के काम निबटाए। मेल इत्यादि चैक किए। दोपहर के दो बज गए। इसके बाद डाक्टर के पास गए। डाक्टर ने खून की जांच व सोनाग्राफी लिख दी। सोनोग्राफी करवाई तो दोनों किडनी में पथरी बताई। इसके अलावा पित्ताशय (गॉल ब्लेडर) में भी पथरी की रिपोर्ट आई। खून की जांच आई तो बताया गया कि शरीर में खून की कमी है। ब्लड प्रेशर लॉ पहले से ही है।
हिमोग्लोबिन भी सामान्य से कम आया। इतनी सारी गड़बड़ निकल जाना किसी भी भले चंगे आदमी को यकायक डिस्टर्ब कर सकती है। कल एक जांच और है। समझ नहीं पा रहा हूं क्या करूं। मैं घर के काम से अब तक बिलकुल फ्री था। मुझे पता ही नहीं चलता कि घर का काम होता कैसे है। भगवान से प्रार्थना है कि वह निर्मल को जल्द दुरुस्त करें। स्वस्थ्य करें, क्योंकि वह स्वस्थ हैं तो हम सब स्वस्थ हैं।

भैया ये दिवार टूटती क्यों नहीं

बस यूं ही
सरकारी कामों के बारे में कहा जाता है वो कि अक्सर देर से ही पूर्ण होते हैं। इस तरह के उदाहरण कई हैं। एक मामला तो मेरे गांव केहरपुरा कलां से भी जुड़ा हैं। मामला अतिक्रमण से संबंधित हैं। गांव के राजकीय औषधालय से चानणा जोहड़ तक के रास्ते पर हो रखे अतिक्रमण के संबंध में स्व. जयपालसिंह शेखावत के सुपुत्र देवेन्द्रसिंह ने पिछले माह राजस्थान संपर्क पोर्टल पर शिकायत दर्ज करवाई थी। देवेन्द्र ने अभी 14 दिसम्बर को पोर्टल से इस मामले की अपडेट जानकारी ली तो मामला अपने आप में दिलचस्प निकला। इसमें बताया गया है कि 'प्रकरण में उपखंड अधिकारी चिड़ावा की रिपोर्ट के अनुसार उक्त प्रकरण में तहसीलदार चिड़ावा से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार उक्त रास्ता राजस्व रिकार्ड में कटानी रास्ते के रूप में दर्ज है। ग्राम से निकलने के बाद लगभग सौ फीट तक दोनों तरफ के काश्तकारों ने पक्की दीवार बना रखी है एवं मौके पर रास्ता 10-11 फीट चौड़ा है। पूर्व में सीमा ज्ञान करवाकर रास्ता खोल दिया गया था। वर्तमान में लगभग 16-17 फीट चौड़ा रास्ता चालू अवस्था में है तथा अतिक्रमियों के विरुद्ध धारा 91 की रिपोर्ट की जा चुकी है।'
यह रिपोर्ट या तो निहायत ही बेवकूफ कर्मचारी ने बनाई है। या फिर इसकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया है। या या फिर किसी डेढ़ स्याणे ने दिमाग लगाकर यह जवाब लिखा है। बहरहाल,चंद सवाल चिड़ावा के उपखंड अधिकारी व तहसीलदार दोनों से है। यही सवाल मैं इन दोनों अधिकारियों से करने की कोशिश करूंगा। मसलन,
1 .क्या उपखंड अधिकारी व तहसीलदार ने कभी मौका देखा है?
2. क्या इन दोनों अधिकारियों को पूर्व की तथा बाद की स्थिति की वास्तविक जानकारी है?
3. कहीं नीचे का कोई कर्मचारी इन दोनों अधिकारियों को अंधेरे में तो नहीं रख रहा?
4. इस मामले में अधिकारियों पर किसी तरह का कोई दवाब तो नहीं है?
5. इस तरह की रिपोर्ट पोर्टल पर दर्ज कौन करता है? तथा किसके निर्देश पर दर्ज करता है?
6. रास्ता पहले 10-11फीट था तो अब 16-17 फीट चौड़ा कैसे हो गया वह भी बिना दिवार तोड़े?
7. रास्ता बंद ही कब हुआ था तो रिपोर्ट में रास्ता चालू होने पर जोर क्यों व किसलिए?
8. रिपोर्ट का जवाब बेहद गोलमाल है। इसमें समस्या का समाधान होगा या नहीं यह नहीं बताया गया?
9. सीमाज्ञान करवाया गया तो कितने फीट पर करवाया गया?
10. इस मामले में पंचायत की भूमिका क्या रही है और क्या होगी?
गांव के युवाओं को भी इस तरह के मामलों में पहल करनी चाहिए क्योंकि यह भी एक तरह की सेवा ही है।

Saturday, December 16, 2017

इक बंजारा गाए-13

भलाई की भी मार्केटिंग !
दान और भलाई, कोई गुपचुप करता है तो कोई ढोल के साथ इनका प्रचार करता है। कम करके ज्यादा प्रचारित करने वालों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। श्रीगंगानगर में भी प्रचार के भूखे कई लोग हैं। फिलवक्त एक संस्था भलाई कार्यों में जुटी है। इसे प्रचारित करने के लिए बाकायदा मीडिया मैनेजमेंट भी किया गया है। माह में बीस दिन से ज्यादा दिन तक भलाई की मार्केटिंग की जाती है। हाल ही में हुई 'घर' वापसी के बाद मुखिया जी के भलाई कार्यों का ढोल और बुलंद हो गया है। वैसे इस मार्केटिंग के पर्दे के पीछे का सच जानकारों की नजर में हैं। भलाई कार्यों में पैसा पल्ले से लग रहा है या सरकारी योजनाओं के चलते लिया जा रहा है, यह तो अप्रचारित विषय है, लेकिन सच यह भी है कि भलाई की मार्केटिंग में प्रचार करने तथा करवाने वाले दोनों ही पक्षों के हित जुड़े हैं, तभी तो गठजोड़ जारी है।
समय-समय की बात
खाकी में इन दिनों कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। शहर व जिले में लगातार हुई आपराधिक वारदातों ने सर्द मौसम में खाकी के अंदर गर्माहट पैदा कर रखी है। दूसरी गर्माहट एक थानाधिकारी के बदलने की भी। बड़ी मुद्दत के बाद इनको शहर में लाया गया था, लेकिन पता नहीं अंदरखाने क्या उठक पटक हुई कि थानेदार जी का न केवल थाना बदला बल्कि जिला ही बदल गया। महकमे में यह तबादला इन दिनों अच्छी खासी चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग 'एक दिन के थानेदार जी' कह कर मजे ले रहे हैं। मामला किस्मत व पहुंच का भी है। शहर में ही एक ऐसे थानेदार जी भी हैं, जिनको हटाने का हिम्मत जिले के आला अधिकारी ही नहीं, रेंज के अधिकारी भी नहीं जुटा पा रहे हैं। खैर, सेटिंग बनने व बिगडऩे के ये दो जीते जागते उदाहरण हैं।
कौन सच्चा, कौन झूठा?
पिछले दिनों पड़ोसी प्रदेश पंजाब में श्रीगंगानगर इसे लगते इलाके में पुलिस चौकी का उद्घाटन हुआ। इस दौरान ग्रामीणों ने खुलेआम कहा कि नशा राजस्थान से आ रहा है। ग्रामीणों ने बाकायदा नशे के कारोबार के लिए साधुवाली व सादुलशहर का नाम भी बताया। यह भी संयोग है कि जिस दिन इस चौकी का उद्घाटन हुआ, उसी दिन श्रीगंगानगर में राजस्थान व पंजाब पुलिस के अधिकारी कानून की समीक्षा कर रहे थे और सब कुछ ठीक बता रहे थे। ऐसे में सवाल यह खदबदा रहा है कि पुलिस सच्ची है या वो ग्रामीण? यकीनन इस मामले में एक पक्ष तो झूठा है। नशे के कारोबार के रंग-ढंग देखने से तो यही प्रतीत होता है कि ग्रामीणों की बातों में दम ज्यादा है। पुलिस का क्या, उसने तो जब सब कुछ ठीक बताया था, उसी दिन एक युवक की गोली मारकर हत्या तक कर दी गई थी।
प्रधान जी को ग्रुप का खौफ
सोशल मीडिया के जितने फायदे हैं, उससे कम नुकसान भी नहीं हैं। वह भी तब जब सोशल मीडिया से जुडऩे वाले को तकनीक रूप से ज्यादा जानकारी नहीं हो। जानकारी का अभाव कभी-कभी मुसीबत भी खड़ी कर देता है। दरअसल, यहां जो भूमिका है वह एक शिक्षक संस्थान के प्रधान से संबंधित है। मामला थोड़ा पुराना जरूर है, लेकिन रोचक है। प्रधानजी विभाग के ही एक व्हाट्सएप गु्रप से जुड़े थे। एक दिन ग्रुप में उनसे कथित आपत्तिजनक वीडियो पोस्ट हो गया। हालांकि यह जांच का विषय है कि यह सब जानबूझकर हुआ या भूलवश, लेकिन मामला ऊपर तक पहुंच गया और आनन-फानन में प्रधान जी की सजा मुकर्रर कर दी गई। गाहे-बगाहे अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले प्रधान जी सोशल मीडिया के फेर में ऐसे फंसे कि अब तो ग्रुप का नाम ही उनको डराने लगा है।
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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 14 दिसंबर 17 के अंक में.प्रकाशित

लाइलाज खिलवाड़!

टिप्पणी
बंदर के हाथ अगर उस्तरा लग जाए तो फिर क्या होगा, सहज ही अंदाजा लगाया सकता है। कुछ इसी तरह का अनुभव सीवरेज लाइन बिछाने के दौरान हो रहा है। हालात यह हैं कि लाइन बिछाने के नाम पर रोजाना नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। एक तरह से शहर को प्रयोगशाला बना रखा है। ठेका कंपनी की ब्रांडिंग करती पीली टोपी और हाफ जैकेट पहने कंपनी के नुमाइंदों में कौन मजदूर है और कौन इंजीनियर, शहरवासी आज तक इस पहेली को नहीं सुलझा सके। 'नौसिखिए' कभी गली को दायीं तरफ से खोद देते हैं तो कभी बायीं तरफ से। कहीं किसी गली में गड्ढे लंबे समय से खुदे ही पड़े हैं तो कहीं मिट्टी के गुबार लोगों का जीना हराम कर रहे हैं। कहीं चैंबर नालियों के बीच आ गए हैं तो कहीं अचानक ही खुदाई शुरू कर दी जाती है। इन तमाम हालात को देखकर लगता है कि ये महत्वपूर्ण काम न तो किसी कार्य योजना के तहत हो रहा है और न ही कोई प्रशासनिक अधिकारी इसे देखने वाला है। कुछ दिन पहले प्रशासन ने खुद स्वीकार किया कि सीवरेज लाइन बिछा रही कंपनी के इंजीनियरों का अनुभव कम है। वे जानते हैं कि जोड़-तोड़ के काम का खामियाजा भविष्य में शहरवासी भुगतेंगे, इसके बावजूद प्रयोगों के नाम पर लोगों को हो रही परेशानी का स्थायी हल नहीं खोजा जा रहा। सीवरेज काम में जुटे अमले की बेतरतीब कार्यशैली को देखकर लगता है जैसे शहर में 'अनाडिय़ों का कुनबा' इकट्ठा हो गया हो।
अकेले मॉडल टाउन में काम काज की बानगी देखिए। जिस सड़क को सबसे पहले तोड़ा गया, वहां आज तक सड़क नहीं बनी, जबकि जिनको बाद में तोड़ा गया वहां सभी काम हो गए और सड़क भी बन गई। खुदाई की गई कई जगहों पर हाथो-हाथ कंकरीट बिछा दी गई, तो कहीं पर मिट्टी डाल दी गई। यह मिट्टी तीन माह से वाहनों की आवाजाही से उड़ती रही। कंपनी की मर्जी हुई तब पानी छिड़कवा दिया अन्यथा लोग धूल फांकते रहे। काम में अनाड़ीपन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मॉडल टाउन की एक गली में पहले चैंबर बना दिए गए। बाद में नाली बनाई तो चैंबर नाली के बीच में आ गए। ऐसे में नाली निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया है। अब चैंबर्स को उखाड़कर फिर से लगाया जाएगा तभी नाली का काम पूरा होगा। समूचे कामकाज में एक बात यह भी है कि इसे चरणबद्ध तरीके से होना बताया जा रहा है, लेकिन काम का प्रबंधन सही नहीं है। एक जगह काम पूरा होता नहीं है उससे पहले अगली गली में शुरू कर दिया जाता है।
बहरहाल, सीवरेज लाइन बिछाने वाली कंपनी मनमर्जी से काम कर रही है। मौजूदा हालात व परिस्थितियां देखते हुए उसकी मनमर्जी पर अंकुश लगाने की हिम्मत प्रशासन में भी दिखाई नहीं देती। प्रशासन के हाथ क्यों बंधे हैं, इसकी वजह जानने की भी जरूरत है। लोग परेशान हैं। धूल फांक रहे हैं। जन सेवकों ने जनता को उसके हाल पर छोड़ रखा है। 'अंधेर नगरी चौपट राजा' के हालात बने हुए हैं। व्यवस्था में लग रहा जंग समय रहते हटाना बेहद जरूरी है। काम कैसा भी हो, पूरा होते ही कंपनी को भुगतान कर दिया जाएगा। सरकारी टेंडरों में परम्परागत तय हिस्सा पाने के लिए स्थानीय कार्यकारी एजेंसी के अधिकारी भी चुप्पी साधे काम पूरा होने की राह देख रहे हैं। शांति बनाए रखने के लिए शुभचिंतकों को भी कंपनी की ओर से 'धन्यवाद' किया जाएगा, लेकिन इस 'खिलवाड़' के खिलाफ शहरवासियों को तो जागना चाहिए। समय रहते जख्म का इलाज हो जाए तो अच्छा, अन्यथा वह नासूर बन जाता है। काम व्यवस्था के हिसाब से हो और प्रबंधन प्रभावी तरीके से हो। प्रशासन को भी समय-समय पर निरीक्षण कर कंपनी की कार्यकुशलता को जांच लेना चाहिए।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 10 दिसंबर 17 के अंक में प्रकाशित

अपने तो यह समझ नहीं आया

बस यूं ही
जीएसटी को लेकर समूचे देश में बवाल मचा था। अब भी गाहे-बगाहे कोई कोई न कोई मामला सामने आ ही जाता है। वैसे हकीकत यह है कि संबंधित विभाग भी इसके नियम-कायदों को समझ नहीं पाया है। सही बात तो यह है कि अपने को भी समझ नहीं आया है। दरअसल कल बाजार से वेटिंग मशीन (वजन तौलने की मशीन) खरीदने गया। पहली दुकान पर माथापच्ची करने के बाद दूसरी दुकान से आखिरकार मशीन खरीद ली। अब विस्तार से बताता हूं। श्रीगंगानगर के गोलबाजार पब्लिक पार्क स्थित खेल के सामान की दुकान है। सिल्वर स्पोटर्स। यहां भाव ताव कम ही होता है। मतलब फीक्स रेट है। लेना है तो लेओ अन्यथा दूसरी दुकान देखो वाला मामला है। मैंने यहा वेटिंग मशीन दिखाने को कहा। सेल्समैन मशीन लाया। प्रिंट रेट 25 सौ रुपए से अधिक थी। मैंने कीमत पूछी तो बताया कि 790 की पड़ेगी। मैंने कहा कोई गारंटी-वारंटी है क्या तो दुकानदार ने साफ तौर पर मना कर दिया। इस के बाद पैकेट से मशीन निकालकर देखी तो उसमें वारंटी कार्ड निकला। मैंने दुकानदार को कहा कि आप तो मना रहे थे, यह क्या है? तो उसने कहा कि सर्विस श्रीगंगानगर में तो होती नहीं है। मशीन को जालंधर भेजना होता है। भेजने का खर्चा ही इतना हो जाता है कि इससे अच्छा तो नई खरीद लो। मैंने फिर सवाल दागा फिर एेसी मशीन बेचते ही क्यों हो? बिना वारंटी वाली ही बेचा करो। इस पर उसने दलील दी कि हम प्रिंट रेट से कम ले रहे हैं, यह क्या कम है। आप दूसरे बाजार में जाआेगे तो आपको प्रिंट रेट ही देनी पड़ेगी। यहां मामला जमा नहीं तो मैं पड़ोस की दूसरी दुकान पर आ गया। इसका नाम है न्यू सिल्वर स्पोटर्स। यहां मशीन देखी तो उसने 550 रुपए बताए। प्रिंट रेट 1370 रुपए लिखे थे। आखिरकार मशीन ले ली गई। उसने बाकायदा कम्प्यूटर में डाटा फीड करके प्रिंटर से प्रिंट निकाला। उसने अपने हस्ताक्षर किए और बिल दे दिया। मैंने बिल पर देखा तो मशीन का मूल्य 466 रुपए दस पैसे लिखा था। इसके बाद नौ प्रतिशत सीजीएसटी के 41 रुपए 95 पैसे तथा नौ प्रतिशत ही एसजीएसटी के 41 रुपए 95 पैसे काटे गए थे। दोनों को मिलाकर 83 रुपए 90 पैसे हो गए। बस बिल देखने के बाद सवालों का सिलसिला शुरू हो गया। मैं समझ नहीं पाया कि यह कटौती कैसे व कौनसे मूल्य को आधार मानकर की गई? जीएसटी का नाम तो सुना पर यह सीजीएसटी व एसजीएसटी क्या हैं? प्रिंट रेट व वास्तविक मूल्य में अंतर क्यों व कैसे आ रहा है। टैक्स कितना कटता है? कैसे कटता है? प्रिंट रेट पर कटता है? या दुकानदार अपनी मर्जी से मूल्य मानकर अंदाजे से काटता है? क्या वाकई उसने एक नंबर में सामान बेचा? क्या कोई कर चोरी नहीं की? सवाल जेहन में आए तो फिर आते ही चले गए लेकिन जवाब नहीं मिला। यह सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि कोई जानकार यह बताए कि यह कैसे होता है। इसका तरीका क्या है।

इक बंजारा गाए-12

दिल है कि मानता नहीं
राजनीति में उम्र मायने नहीं रखती और इसमें आदमी कभी रिटायर भी नहीं होता। जैसे ही कोई चुनाव आने को होते हैं, लोग पिछला 'दर्दÓ भुलाकर नए सिरे से जुट जाते हैं। इस काम में बड़ा योगदान होता है शक्ति प्रदर्शन का, ताकि पार्टी के आकाओं को यह पता चल सके है कि अमुक आदमी का कितना बड़ा जनाधार है। खैर, कौन कितने पानी में है यह तो सबको पता ही होता है, फिर भी जोर आजमाइश जरूरी है। यह भी सभी जानते हैं कि शक्ति प्रदर्शन स्वयं स्फूर्त कितना होता है और कितना प्रायोजित? फिर भी टिकट के जुगाड़ के लिए यह सब करना पड़ता है। श्रीगंगानगर में भी राजनीति के पुराने खिलाड़ी चुनाव नजदीक देख फिर सक्रिय हो गए हैं। अब चुनाव लडऩे की इच्छा खुद की है, लेकिन यह बात सीधे न कहकर कार्यकताओं का आग्रह बताकर प्रचारित करवाई जा रही है। वाकई राजनीति में भी कई तरह के पापड़ बेलने होते हैं।
निर्दलीय का ही सहारा
नगर परिषद में सियासी घालमेल इस कदर है कि पार्टी का टिकट भी मायने नहीं रखता। मामला परिषद के एक वार्ड में हो रहे उप चुनाव का है। यहां कांग्रेस ने प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा। योग्य प्रत्याशी मिला नहीं है या यह चुनावी रणनीति का हिस्सा है, ये तो पार्टी पदाधिकारी ही बेहतर जानते हैं, लेकिन इसके कई कयास लगाए जा रहे हैं। उधर, भाजपा ने अपना प्रत्याशी जरूर घोषित किया है। विधानसभा चुनाव नजदीक होने के बावजूद कांग्रेस का बैकफुट पर आना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीतिक जानकार इस उप चुनाव को सभापति से जोड़कर भी देख रहे हैं, जो कि सर्वदलीय सभापति बने हुए हैं। वार्ड में एक जाति समुदाय के वोट ज्यादा होने तथा भाजपा द्वारा उसी समुदाय की महिला को टिकट देने के कारण कांग्रेस की रणनीति असफल हो गई। पार्टी अब निर्दलीय को समर्थन कर रही है। निर्दलीय भी उसी समुदाय से है। अब देखना है कि ऊंट किस करवट बैठता है?
केवल खानापूर्ति
श्रीगंगानगर में सफाई व्यवस्था संतोषजनक क्यों नहीं है? इसकी बड़ी वजह यह भी है कि जिम्मेदार लोग जो व्यवस्था बनाते हैं उसकी गंभीरता से पालना तो कतई नहीं होती। दिखावे के तौर पर हलचल जरूर होती है। ऐसा ही इन दिनों नगर परिषद कर रही है। परिषद के अधिकारी व जन प्रतिनिधि स्वच्छता को लेकर कार्यक्रम कर रहे हैं। अब मामला स्वच्छता से जुड़ा है तो उसके लिए धरातल पर काम भी करना होगा। सिर्फ जागरुकता विषयक कार्यक्रम से ही शहर साफ होता तो कब का हो चुका होता। हास्यास्पद हालात तो तब पैदा होते हैं जब स्वच्छता पर जोर दिया जाता है, लेकिन हकीकत को नजर अंदाज किया जाता है। मंगलवार को जहां स्वच्छता विषयक कार्यक्रम हुआ, उसी पार्क के आसपास नालियां ओवरफ्लो थीं, जबकि कचरा पात्र कचरे से अटे थे। ऐसे में यह कार्यक्रम महज औपचारिक ही नजर आते हैं।
प्रयोगशाला बना शहर
अक्सर प्रयोग वहां किए जाते हैं जहां परिणाम को लेकर कोई आश्वस्त नहीं होता। इसलिए बार-बार प्रयोग करके चैक किया जाता है ताकि बाद में कोई दिक्कत न आए। शहर में इन दिनों सीवरेज व पेयजल पाइप लाइन बिछाने का काम चल रहा है। इस काम की आड़ में शहर को प्रयोगशाला बना दिया गया है। एक ही रास्ते को कभी आड़ा तो कभी तिरछा खोद दिया जाता है। कभी एक तरफ से तो कभी दूसरी तरफ से। आमजन परेशान होता है तो होता रहे हैं, लेकिन प्रयोग लगातार जारी है। यह सब जानते हुए भी कि काम करने वाले योग्यता तो रखते हैं, लेकिन अनुभवहीन हैं। अब इन नौसिखियों ने हालात इस कदर खराब कर दिए हैं कि एक भी रास्ता पैदल चलने लायक नहीं बचा। इनके कामकाज एवं तौर-तरीकों से साफ लगता है कि इनको मनमर्जी से काम करने की छूट मिली हुई है। लगता नहीं कि कोई उनके काम को चैक करता है या समीक्षा करता है। इस चुप्पी के पीछे कोई रहस्य तो जरूर है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 8 दिसम्बर 17 के अंक में प्रकाशित 

भाई से बात करवाओ

बस यूं ही
समय यही कोई सवा एक बजे के करीब होगा। मेरे मोबाइल पर दिल्ली के लैंडलाइन नंबर से कॉल आई। थोड़ी देर में ट्रयू कॉलर पर नाम आया कोटक। मैंने कॉल उठाया तो सामने वाला पूछता है आप महेन्द्र शेखावत बोल रहे हैं । मैंने हां कह दिया इसके बाद का वार्तालाप सुनिए।
सही में महेन्द्र शेखावत ही बोल रहे हैं ना?
हां भई हां महेन्द्र शेखावत ही बोल रहा हूं।
क्या नरेन्द्र शेखावत आपका भाई है?
कौन नरेन्द्र शेखावत। इस नाम का मेरा कोई भाई नहंी है।
अरे नरेन्द्र शेखावत आपका भाई है ना।
अरे भाई हम तीन भाई हैं। बड़े का केशरसिंह, बीच वाले का सत्यवीरसिंह और मेरा महेन्द्र नाम है।
नहीं-नहीं आप झूठ बोले रहे हैं। आप नरेन्द्र शेखावत से बात करवाओ।
मैंने थोड़ी तल्ख आवाज में कहा, आप कहां से बोल रहे हैं?
कोटक से बोल रहे हैं।
अरे कहां से पूछ रहा हूं।
बताया ना कोटक से।
कोई शहर का नाम भी होगा?
हम नोएडा दिल्ली से बोल रहे हैं।
हां तो बताएं क्या काम है?
आपका नंबर रेफरेंन्स में लिखा हुआ है। नरेन्द्र शेखावत आपकी जान पहचान का है।
अरे भई कहा ना मैं किसी नरेन्द्र शेखावत को नहीं जानता।
तो फिर आपके नंबर क्यों दिए?
यह मुझे क्या पता। आपने फार्म लिया तब मुझसे कन्फर्म किया था क्या?
अरे आप झूठ बोल रहे हैं। बात कराओ ना नरेन्द्र शेखावत से।
भाई आपके समझ क्यों नहीं आता है। मैं मेरे आफिस से बोल रहा हूं।
मैं उसको बार-बार समझाता रहा लेकिन वो मानने को तैयार ही नहीं। मैंने थोड़े से तल्ख लहजे में उसको कहा कि भाईसाहब आप ख्वामखाह क्यों परेशान कर रहे हैं। मैं सच कह रहा हूं नरेन्द्र शेखावत नाम का शख्स कोई मेरा भाई नहंी है। आखिरकार झुंझलाते हुए उसने फोन रख दिया। करीब दो मिनट तेरह सेकंड का यह वार्तालाप हुआ। उसने अपना परिचय शायद महेन्द्रा बैंक या फायनेंस दिया था। यकीनन किसी ने कोई लोन उठाया होगा। मैं सोच में डूबा था कि कोई इस तरह भी नंबर का इस्तेमाल कर सकता है। करने वाले ने लाभ उठा लिया लेकिन उसका खामियाजा मेरे को नाहक ही भुगतना पड़ा। सच में मैं दिनभर यही सोचता रहा कि लोग क्या-क्या करने लगे हैं। मेरे से भूल यह हो गई कि मैं उससे नरेन्द्र शेखावत के पिता का नाम व एड्रेस नहीं पूछ पाया। वरना मैं भी मेरी तफ्तीश के घोड़े तो दौड़ाता। हां जिस नंबर से फोन आया था वह नंबर 01147035415 थे।

इस तरह बच गई जिंदगी

बस यूं ही
सोमवार सुबह जयपुर से रवाना हुआ। दोपहर बाद सरदारशहर पहुंचा तो श्रीमती का फोन आ गया। कहने लगी आज तो घर के सामने एक बड़ा मामला हो गया। बडे़ मामले का नाम सुनकर मैं थोड़ा सकपकाया और पूछा क्या हुआ? इसके बाद उसने जो बताया उसे सुनकर खुशी भी हुई और मन में कई तरह के ख्याल भी आए। दरअसल, सुबह 11 बजे तेज आवाज आई। बाहर जाकर देखा तो एक युवक घायलावस्था में कराह रहा था। पूरा शरीर लहूलुहान हो गया था। उसको टक्कर मारने वाला दूसरा मोटरसाइकिल सवार वहां से जा चुका था। इसके बाद हमारे मकान मालिक श्री अंबालाल भाटी ने तत्काल उस युवक को संभाला। हमारी श्रीमती निर्मल कंवर ने अपनी ओढ़णी (लूगड़ी ) दी ताकि युवक के सिर से बहते खून को रोका जा सके। तत्काल ओढ़णी को सिर पर लपेटा। अब युवक इस हालत में था कि उसको बाइक पर ले जाना संभव नहीं था। भाटी अंकल ने तत्काल श्रीमती से मेरी कार की चाबी मांगी। श्रीमती ने मौके की नजाकत देखते हुए तत्काल कार की चॉबी अंकल को सौंप दी। बिना वक्त गंवाए अंकल उसको तत्काल अस्पताल लेकर चले गए। बताया कि हादसे में युवक के सिर में फ्रेक्चर हुआ बताया। परिजन बाद में उसको निजी अस्पताल ले गए बताए, जहां उसकी हालत खतरे से बाहर बताई गई है। युवक श्रीगंगानगर जिले के रत्तेवाला गांव का बताया गया है तथा श्रीगंगानगर में किसी मेडिकल दुकान पर काम करता है।
कौन करता है एेसे मदद
शाम को दो युवक घर आए, जो उस युवक के परिजन थे। दोनों ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि मतलब व स्वार्थ के इस दौर में कौन इस तरह मदद करता है। लोग तो पुलिस के चक्कर में इस तरह के मामलों में मदद ही नहीं करना चाहते।। युवक मदद के लिए बार-बार धन्यवाद ज्ञापित कर रहे थे। इसके बाद श्रीमती ने घायल युवक का हेलमेट, रुपए व पैन इन युवकों को सौंप दिया। सच में इस तरह के काम से जो आत्मिक सुख मिलता है, उसको शब्दों में बयां करना मुश्किल हो जाता है। यह नेक व पुनीत काम है इसका कोई मोल नहीं होता है। काश, इस तरह की सेवा का जज्बा सबके मन में हो।

मनमर्जी का निर्णय

टिप्पणी
श्रीगंगानगर से अंबाला के बीच चलने वाली अंबाला इंटरसिटी ट्रेन को शुक्रवार को बंद कर दिया गया। इस ट्रेन का आगामी ढाई माह तक संचालन नहीं होगा। इसी तरह श्रीगंगानगर से हावड़ा के बीच चलने वाली उद्यान आभा तूफान एक्सप्रेस को तीन दिसम्बर से बंद कर दिया जाएगा। यह ट्रेन 18 फरवरी तक रद्द रहेगी। इस अवधि में उद्यान आभा का संचालन आगरा से हावड़ा के बीच होता रहेगा। श्रीगंगानगर से आगरा के बीच इस ट्रेन का संचालन नहीं होगा। बीकानेर मंडल की इन दोनों ट्रेन को रेलवे बोर्ड की ओर से रद्द किया गया है। इसके पीछे कारण कोहरा व ठंड को बताया गया है। कोहरे व ठंड के कारण इन रेलों को हर साल इसी तरह से रद्द किया जा रहा है। ऐसा करते हुए दस साल से अधिक समय हो गया है। बीच में एक बार जनाक्रोश को देखते हुए रेलवे ने संचालन शुरू कर दिया था, बाकी हर साल रेलों का संचालन इसी समय रद्द किया जाता है। फिलहाल श्रीगंगानगर और आसपास के क्षेत्र में न कोहरा है न ही ठंड, फिर भी ट्रेन का संचालन बंद कर दिया गया है। अजीब बात यह है कि इसी मार्ग पर बीकानेर-से दिल्ली वाया श्रीगंगानगर चलने वाली बीकानेर-सरायरोहिल्ला एक्सप्रेस का संचालन यथावत है।
इस तरह कहा जा सकता है कि तूफान एक्सप्रेस को बंद करना रेलवे का मनमर्जी का फैसला है। सर्दी और कोहरा हो तब हादसे की आशंका रहती है। ट्रेन समय पर भी नहीं पहुंचती है। तब इस तरह का फैसला लिया भी जाना चाहिए लेकिन वर्तमान में मौसम एकदम साफ है। ट्रेन का संचालन शुरू हो इसके लिए स्थानीय सांसद ने रेलवे बोर्ड के चैयरमैन से मुलाकात की बताई लेकिन वहां बात नहीं बनी। इस बात को सांसद ने खुद स्वीकार किया है। सांसद का कहना है कि अब वे इस बाबत रेल मंत्री से मिलेंगे। खैर, सांसद की बात पर रेल मंत्री कितना गौर करेंगे यह अभी भविष्य की बात है लेकिन रेलों का संचालन बंद होने से यात्रियों को यकीनन परेशानी होगी। अकेली उद्यान आभा से पांच सौ से अधिक यात्री प्रतिदिन यात्रा करते हैं। सेना के जवान भी बड़ी संख्या में इस गाड़ी में आवाजाही करते हैं। अब हावड़ा या उत्तरप्रदेश, बिहार जाने वालों को यह ट्रेन आगरा से पकडऩी होगी। ऐसे में सोचा जा सकता है कि इन यात्रियों को आगरा पहुंचने में कितने पापड़ बेलने होंगे। जेब पर अतिरिक्त खर्चा बढ़ेगा सो अलग।
विडम्बना देखिए गाहे-बगाहे रेलवे संवेदनशील होने के उदाहरण पेश करता हैं। कभी किसी को एक फोन पर ही मदद मिल जाती है तो कभी कोई ट्वीट करके रेल मंत्री से सहायता पा लेता है लेकिन श्रीगंगानगर में लोगों की पुरजोर मांग व सांसद के कहने के बावजूद रेल बोर्ड सुनवाई नहीं कर रहा है। इस मामले में रेलवे की संवदेनशीलता कहां चली जाती है। रेलवे एक फैसले को लेकर लकीर का फकीर क्यों बना हुआ है। मौसम साफ हो तथा रेल संचालन किसी तरह से प्रभावित न हो तो फिर क्या पुराने फैसलों की नए सिरे से समीक्षा नहीं की जानी चाहिए? बिना कोहरे के ही रेलों का संचालन रद्द करना एक तरह की मनमर्जी ही है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी इस मामले में और अधिक गंभीरता के साथ प्रयास करने चाहिए।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 03 दिसंबर 17 के अंक में.प्रकाशित

इक बंजारा गाए-11

🔺रेहडिय़ों का राज
शहर में वैसे तो रेहडिय़ां (हाथ ठेले) कई जगह खड़े होते हैं। दिन ढलने के साथ ही रेहड़ीवाले अपनी दुकानदारी समेटकर घर चले जाते हैं लेकिन इन दिनों शिव चौक व अग्रसेन चौक के पास तथा चहल चौक से आगे हनुमानगढ़ रोड पर देर रात कई रेहडिय़ां खड़ी रहती हैं। अधिकतर रेहडिय़ों पर आमलेट व नमकीन आदि की बिक्री होती है। कई बार तो पुलिस की गाड़ी भी इन रेहडिय़ों के पास से गुजर जाती है, लेकिन इतनी देर रात को बिक्री करने तथा उन पर आने वाले ग्राहकों के बारे में पड़ताल नहीं होती है। वैसे रेहड़ी खड़ी होने की मूल वजह वालों पर ही जब कोई कार्रवाई नहंी होती है तो इन पर कार्रवाई कैसे हो भला। देखा जाए तो श्रीगंगानगर जिले में हर जगह मंथली का शोर सुनाई देता है। देर रात रेहड़ी खड़े होने के पीछे भी कहीं कोई मंथली का चक्कर तो नहीं?
🔺सम्मान की चिंता
इसे मानवीय कमजोरी भी कहा जा सकता है, क्योंकि सम्मान की भूख पात्र व अपात्र सभी लोगों में होती है। कुछ करके सम्मान पाने की बात तो समझ में आती है, लेकिन बिना कोई काम किए या मुकाम हासिल किए ही सम्मान की घोषणा कर दी जाए तो कैसा लगेगा। जिले में कन्या भू्रण हत्या की रोकथाम व जनजागृति विषयक कार्यक्रमों के लिए हाल में नियुक्त किए लोगों ने अभी ठीक से प्रशिक्षण भी नहीं लिया था लेकिन विभाग प्रमुख ने बाकायदा प्रेस नोट भी जारी कर दिया कि सभी का सम्मान किया जाएगा। बाकायदा सम्मानित होने वालों की सूची भी जारी कर दी। लाडो बचेगी या नहीं, परिणाम आशानुकूल आएंगे या नहीं, यह तय नहीं है लेकिन सम्मान होगा, यह तय हो गया। सम्मान के लिए जुगाड़ करने या सिफारिश करवाने के उदाहरण तो कई मिल जाएंगे लेकिन बिना कुछ किए ही सम्मान की घोषणा अपने आप में अनूठी है।
🔺इनकार की वजह
श्रीगंगानगर जिले में डेंगू फैला हुआ है। यह बात जगजाहिर है। बाकायदा इसके आंकड़े भी दर्ज हैं। रोगियों के नाम भी नोट किए जा रहे हैं। रोज नए रोगी भी आ रहे हैं। जहां डेंगू के रोगी मिलते हैं, वहां फोगिंग, स्प्रे आदि का काम भी किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग डेंगू होने की बात को मान रहा है लेकिन डेंगू से कथित मौतों पर साफ इनकार कर रहा है। जिला प्रशासन व ऊपर जो रिपोर्ट भेजी जा रही है, इसमें बाकायदा हर स्तर पर यह साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है कि एक भी मौत डेंगू से नहीं हुई। अब विभाग को कौन समझाए कि क्या रोग फैलना शर्मनाक नहीं है। वह भी हर साल। जितनी कवायद इन कथित मौतों से इनकार करने में की जा रही है, जितनी ऊर्जा यह आंकड़े जुटाने में खर्च हो रही है, उतनी अगर रोकथाम के लिए कर ली जाए तो इस तरह के रोग फैले ही नहीं।
🔺वाह रे इंजीनियरों
बड़े बुजुर्ग अक्सर यह कहते मिल जाएंगे कि आप पढ़े हो अभी गुणे नहीं हो। मतलब अभी केवल पढ़ाई की है, अनुभव की कमी है। वैसे हकीकत में पढ़ाई और अनुभव हैं भी तो अलग-अलग बातें। कई बार अनुभव के आगे पढ़ाई भी फैल हो जाती है। श्रीगंगानगर शहर के कई हिस्सों में इन दिनों नई पेजयल पाइप लाइन बिछाई जा रही है। संबंधित निर्माण कंपनी ने इसमें पानी के प्रेशर को चैक करने के लिए बाकायदा इंजीनियर नियुक्त किए हैं। यह नए नवेले इंजीनियर पाइप लाइन देखने तो आ गए लेकिन मर्ज का इलाज ठीक से नहीं कर पाए हैं। यूआईटी की बगल वाली गली में बिछाई गई पाइप लाइन का लीकेज इन इंजीनियरों को छठी का दूध याद दिला रहा है। वह एक लीकेज ठीक करते नहीं हैं, उससे पहले नया लीकेज हो जाता है। बहरहाल, अनुभवहीन इंजीनियरों की इस कार्यप्रणाली का खमियाजा आमजन भुगत रहे हैं।

राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 30 नवंबर 17 के अंक में प्रकाशित

Wednesday, November 29, 2017

तीन साल बाद भी खाली हाथ

टिप्पणी
शहर की सरकार को तीन साल पूरे हो गए हैं। बिलकुल चुपचाप। कुछ कहने को होता तो बाकायदा जलसा होता, जश्न भी मनता, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वैसे देखा जाए तो इन तीन सालों में उपलब्धियों का खजाना खाली ही है। नगर परिषद व सभापति के खाते में बीते तीन साल में एक भी ऐसी उपलब्धि नहीं है, जिसने शहरवासियों को सुकून पहुंचाया हो। शहर के हालात देखते हुए कई मौकों पर तो ऐसा लगा कि यहां सब कुछ रामभरोसे ही है। व्यवस्था देखने और संभालने वाला कोई नहीं है। अहं ऐसा हावी रहा कि तीन सालों में सभापति नगर परिषद के आला प्रशासनिक अधिकारियों से भी तालमेल नहीं बैठा सके, लिहाजा विकास कार्यों की फाइलें धूल फांकती रहीं। खास व बड़ी बात तो यह है कि सभापति कांग्रेसियों के लिए कांग्रेसी सभापति हैं तो भाजपाइयों के लिए भाजपा के। उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं। उन पर कथित रूप से 'सर्वदलीय' सभापति का ठप्पा लगने से दोनों पार्टियां नगर परिषद में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति ही भूल गई है। विरोध करना हो या समर्थन, दोनों की भूमिका पार्षद ही निभा रहे हैं। इस 'एकल' राज से सभापति भी खुश और पार्षदों की भी मौजां की मौजां है। एक विरोधी धड़ा उप सभापति का जरूर है, लेकिन सभापति के पास 'बहुमत' होने और पार्षदों की शतरंजी चालों के कारण उनका विरोध कभी प्रभावी नहीं बन पाया। इस सर्वदलीय सरकार के चक्कर में शहर के जो हालात हैं उसके लिए पक्ष व विपक्ष समान रूप से जिम्मेदार हैं। शहरहित व जनहित के नाम पर न तो विपक्ष की तरफ से कभी कोई बड़ा आंदोलन दिखाई दिया न पक्ष की तरफ से कोई विशेष काम। सभापति के खिलाफ गाहे-बगाहे विरोध के स्वर जरूर सुनाई दिए, लेकिन उनको हटाने की मुहिम भी समाचार पत्रों की सुर्खियों से आगे नहंीं बढ़ पाई। इसकी बड़ी वजह सभापति का विरोध हकीकत में कम बल्कि दिखावा ज्यादा था। सभी जानते हैं कि विरोध करने वालों के दम पर ही तो सभापति की कुर्सी टिकी है। खैर, कुर्सी के किस्सों के शोर में शहर हित व जनहित के मुद्दे हमेशा से ही गौण रहे हैं। बात बरसाती पानी की निकासी हो या कैटल फ्री शहर की, अतिक्रमण का मुद्दा हो या साफ सफाई की, मन मुताबिक सीवरेज कार्य हो या शहर में गुणवत्ताहीन निर्माण कार्य, बंद रोडलाइट हों या पार्कों का सौन्दर्यीकरण, अवैध पार्र्किंग का हो या गंदे पानी की निकासी, एक दो अपवाद छोड़कर सब मामलों में सभी चुप हैं, पक्ष भी और विपक्ष भी। शहर के जन प्रतिनिधियों को यह समस्याएं दिखाई क्यों नहीं देती हैं या वे देखने का प्रयास ही नहीं करते? क्या यह मुद्दे व्यक्तिगत हैं? क्या इनमें जनहित नहीं जुड़ा? क्या यह काम किसी दल विशेष के हैं? बहरहाल, मौजूदा परिषद के कार्यकाल का आधे से ज्यादा समय बीत चुका है, दो साल शेष हैं। तीन साल की कार्यप्रणाली व रंग-ढंग से लगता नहीं कि बाकी रहे कार्यकाल में शहर की तस्वीर बदलेगी। चुनावी साल होने के नाते सरकारी स्तर पर कोई काम हो जाए तो बात अलग है। मौजूदा बोर्ड के कामकाज से तो ऐसा लगता है सब के सब शहर के विकास को प्राथमिकता देने की बजाय समय गुजारने में लगे हैं। फिर भी सभापति व जन प्रतिनिधि शहर हित या जन हित को लेकर गंभीर हैं या होते हैं तो उनको काम करने के मौजूदा तौर तरीकों में आमूलचूल बदलाव करना होगा। इस बात को याद रखते हुए कि जो जनता सिर आंखों पर बिठाती है, मौका आने पर वह नजरों से गिरा भी देती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 29 नवंबर 17 के अंक में प्रकाशित

ऑनलाइन बुकिंग के खतरे

बस यू हीं
बीते शुक्रवार को रात सवा दस बजे के करीब जोधपुर से बीकानेर के लिए ऑनलाइन तीन टिकट बुक करवाए। दरअसल, यह टिकट रविवार रात 11.15 बजे की बस के थे। सीट, रवानगी समय, पहुंच समय, किराया आदि सब अच्छी तरह से देख लिया गया लेकिन बुकिंग कौनसी तारीख में हो रही है यह ध्यान नहीं दिया। तमाम औपचारिकता पूरी कर ली गई। खाते से पैसे भी कट गए। आखिरकार मोबाइल पर मैसेज आया तो पहली ही लाइन देखकर चौंक गया। उस पर तिथि 24 नवम्बर लिखी थी। इसका मतलब था कि बस छूटने में मात्र एक घंटे से भी कम समय बचा था। तत्काल बस ऑपरेटर को फोन लगाया गया। बड़ी मुश्किल से उसका फोन लगा तो उसने तत्काल ऑनलाइन बुकिंग करने वाली कंपनी से बात करने का कहकर फोन काट दिया। प्राइवेट टूर ऑपरेटर्स की बसें बुक करवाने के लिए आजकल रेडबस नामक एजेंसी काम कर रही है। इंटरनेट पर कंपनी के नंबर सर्च करने के बाद कस्टूमर केयर पर फोन लगाया गया तो वहां फोन उठाने वाले ने सारी शिकायत सुनने के बाद मेल अपने उच्च अधिकारियों को फारवर्ड तो कर दिया, उसका सीसी मेरे पास भी आ गया लेकिन उसने किसी भी तरह की मदद करने से साफ इनकार कर दिया। तमाम तरह के निवेदन, आग्रह व बार-बार प्लीज-प्लीज का उस पर कोई असर नहीं हुआ। करीब दस मिनट तक उससे वार्तालाप हुआ लेकिन वह न तो टिकट को आगे की तिथि को करने को तैयार हो रहा था ना ही उसको रद्द कर रहा था। मतलब साफ था कि इन तीन व्यक्तियों का किराया नाहक में लग रहा था। आखिरकार जोधपुर स्थित अपने सहयोगियों की मदद ली गई और आखिरकार समस्या का समाधान हो गया। टिकट 24 नवम्बर की बजाय 26 नवम्बर को कर दिए गए थे। इस तरह जरा सी लापरवाही का खामियाजा करीब घंटे भर की मशक्कत करके भुगतना पड़ा। 
वैसे ऑनलाइन बुकिंग के फायदा तो हैं, इससे समय बचता है लेकिन इस तरह के अनुभव से ऑनलाइन बुकिेंग के प्रति गुस्सा भी आता है। कुछ इस तरह का अनुभव इसी साल मार्च में दिल्ली में हो चुका है। टैक्सी प्रदाता कंपनी उबर से एक कार प्रेस भवन से नजफगढ़ के लिए बुक करवाई। गूगल मैप में मेरे को कार की मौजूदा स्थिति बताई जा रही थी। मैं जहां खड़ा था, वहां से कुछ दूर पर ही वह कार आगे पीछे घूम रही थी। करीब पांच मिनट तक यह सब चलता रहा। इसके बाद चालक की कॉल आई, कहने लगा भाईसाहब आपका एड्रेस ट्रेस नहीं हो रहा है, इसलिए आपकी ट्रिप कैंसिल की जा रही है। इसके बाद मैंने उसी कंपनी की दूसरी टैक्सी बुक की, जो निर्धारित स्थान पर आ गई। किराया चूंकि इसमें पहले ही बता दिया जाता है, इसलिए मैं अवगत व आश्वस्त था। गंतव्य स्थान जो मैंने गूगल पर सर्च करके भरा वह नजफगढ़ का निहायत ही देहाती व अनदेखा इलाका निकला। कार वाले ने कहा भाईसाहब आपका स्थान आ गया है। मेरे पास उसका मुंह ताकने के अलावा कोई चारा न था। दुखी मन से मैंने उससे कहा भाई कम से कम कोई मार्केट या चहल-पहल वाली जगह तो छोड़ ताकि किसी तरह गंतव्य तक पहुंचा जाए। वह मुश्किल एक किलोमीटर ही और चला होगा कि निर्धारित राशि से ज्यादा का मैसेज मेरे मोबाइल पर आ चुका था। हैरानी तब हुई जब कैंसिल की गई कार का बतौर जुर्माना शुल्क भी इस बिल में जुड़ कर आया जबकि कार रद्द का फैसला उनका था। 
बहरहाल, ऑनलाइन के ये दो अनुभव बताते हैं कि इस बुकिंग में जितनी सुविधा है उतने खतरे भी हैं। जरा सी भूल हुई नहीं कि यह ऑनलाइन वाले अंगुली के बहाने आपका पोहंचा पकडऩे को तैयार बैठे हैं। इसीलिए जब भी ऑनलाइन बुकिंग करें तो थोड़ी सावधानी जरूर बरतें अन्यथा बैठे बिठाए आर्थिक नुकसान का फटका भुगतना पड़ सकता है। मानसिक परेशानी व समय की बर्बादी होगी सो अलग।

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

बस यूं ही
'हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी. जिसको भी देखना हो. कई बार देखना' मशहूर शायर निदा फाजली की गजल का यह चर्चित शेर इन दिनों मौजूं हैं। इसको सीधे अर्थों में समझें तो दोहरे चरित्र वाले या दो तरह के जीवन वाले या फिर स्पष्ट रूप से कहें तो दोगला आदमी। दोगला वह जिसकी कथनी और करनी में अंतर होता है। सियासत में यह दोगलापन ज्यादा दिखाई देता है। आजकल इस दोगलेपन को नए तरीके से परिभाषित किया जाने लगा है। एक तो सार्वजनिक जीवन और दूसरा व्यक्तिगत जीवन। जाहिर सी बात है सार्वजनिक जीवन में सार्वजनिक बयान और व्यक्तिगत जीवन में व्यक्तिगत बयान। यह नई परिभाषा इसीलिए ईजाद की गई है क्योंकि सियासत में आजकल बेतुके बयान जारी करने का प्रचलन सा चल पड़ा है। बयान हिट तो सभी राजी और बयान विवादास्पद तो व्यक्तिगत बयान देकर पल्ला छाड़ लिया जाता है। यह व्यक्तिगत बयान की बात बेहद बचकानी लगती है। विडम्बना देखिए बंद कमरे में किसी के निहायत ही निजी पल पलक झपकते ही सार्वजनिक हो जाते हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से दिया गया बयान व्यक्तिगत हो जाता है। एक बार मान भी लें कि नेता लोग दो तरह की जिंदगी जीते हैं लेकिन फिर उसमें विरोधाभास क्यों? सार्वजनिक व व्यक्तिगत बयानों का कोई मापदंड तो तय हो, अन्यथा नेता लोग उलूल जलूल बयान जारी करते रहेंगे और विरोध होने पर उसे व्यक्तिगत बता देंगे। इसलिए यह तय करना जरूरी हो जाता है कि बयान व्यक्तिगत है या सार्वजनिक। इतना ही नहीं है, हालात तो तब और भी अजीब हो जाते हैं जब बयान देने वाले कुछ नहीं कहे और उनकी पार्टी के लोग चलकर बचाव में बयान जारी करें दें। इस तरह की कलाकारी बयान जारी करने वाले को क्यों नहीं सूझती? कल को कोई नेता बंद कमरे में पैसे का लेनदेने शुरू कर दे और मामले का भंडाफोड़ हो जाए तो बचाव करने वाले क्या उसको भी व्यक्तिगत मामला ही करार देंगे?
बहरहाल, गुजरात में एक सामाजिक नेता की एक युवती के साथ की सीडी तो सार्वजनिक करार दे जाती है और चुनावी मुद्दा बन जाती है, वहीं राजस्थान में एक पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का अतिक्रमण करने की छूट देने तथा खुद के आंख मूंद लेने का बयान व्यक्तिगत बन जाता है, एेसा क्यों होता है?

व्यवस्था की थोथ में धंसते टायर

श्रीगंगानगर. इस फोटो को आप गौर से देखेंगे तो हो सकता है आप ज्यादा से ज्यादा यह सोच पाए कि यह कोई स्कूल का वाहन है तथा गाड़ी में कोई गडबड़ी है, इस कारण बच्चों को नीचे उतार कर गाड़ी को ठीक किया जा रहा है। लेकिन आपका यह सोचना गलत है। यह फोटो जिला अस्पताल के सामने स्थित श्रीराम अन्न क्षेत्र मंदिर की बगल वाली गली का है। यहां अभी हाल में ही पेयजल लाइन व सीवरेज डाली गई है। लेकिन, पाइप डालने के बाद खाई को ठीक से नहीं पाटा गया। इस कारण कोई भी वाहन गुजरता है तो टायर धंस जाते हैं। बुधवार दोपहर ढाई बजे स्कूल का यह वाहन गुजरा तो चालक की तरफ की दोनों टायर नीचे थोथ में बैठ गए। गाड़ी एक तरफ टेढ़ी हुई तो बच्चों में हडंकप मच गया और वो चिल्लाने लगे। आखिरकार चालक ने सभी बच्चों को नीचे उतारा और काफी मशक्कत के बाद गाड़ी को निकाला। गनीमत रही कि बड़ा हादसा नहीं हुआ।
मनमर्जी का काम
लगातार शिकायतों के बावजूद सीवरेज व पाइप लाइन बिछाने वाले कंपनी के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। आमजन को होने वाली तकलीफों को दरकिनार कर कंपनी मनमर्जी से काम कर रही है। यूआईटी की बगल वाली सड़क पर दिनभर वाहनों की रेलमपेल रहती है। इसके बावजूद यह मार्ग तकरीबन छह बार बंद हो चुका है। सड़क को तोड़ा जा चुका है। खाई पाटने के बाद सड़क को समतल तक नहीं किया गया। सूखी धूल दिनभर उड़ती है लेकिन पानी का छिड़काव नियमित नहीं है। जहां प्रभावशाली लोग है, वहां कंपनी का काम करने का तरीका दूसरा है। यह भेदभावपूर्ण व्यवहार भी आमजन की तकलीफ बढ़ा रहा है।
ऐसा इसलिए हुआ
दरअसल, जहां स्कूल वाहन फंसा वह कोई अति व्यस्त रास्ता नहीं है। लेकिन उधर से गुजरना गाड़ी चालक की मजबूरी थी। क्योंकि मोतीराम के ढाबे के पास जेसीबी से खुदाई के दौरान पेयजल लाइन टूट गई। इसे ठीक तो कर दिया लेकिन खाई को पाटा नहीं गया। इस कारण पूरे दिन यह रास्ता बाधित रहा। रास्ता बाधित होने के कारण चालक ने बगल की गली से गाड़ी निकालने का प्रयास किया लेकिन थोथ के कारण टायर धंस गए।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 23 नवंबर 17 के अंक में प्रकाशित 

इक बंजारा गाए-10


🔺वापसी के मायने
राजनीतिक दलों में नेताओं का आना-जाना लगा ही रहता है। सब अपनी सहुलियत व अवसर के हिसाब से पाला बदलते हैं। अदला-बदली का यह इतिहास पुराना है। अब श्रीगंगानगर में भी एक नेताजी की अपनी पार्टी में वापसी हुई है। अब इनकी वापसी से जहां कई खुश हैं, वहीं कइयों के माथे पर बल अभी से पडऩे लगे हैं। घर वापसी करने वाले नेताजी की भूमिका क्या रहेगी, यह तो अभी समय बताएगा लेकिन राजनीतिक जानकारों ने अभी से अपने-अपने हिसाब से कयास लगाने शुरू कर दिए हैं। वैसे श्रीगंगानगर के साथ एक सच यह भी जुड़ा है जिसने भी दल बदला है, उसको एक बार तो फायदा जरूर हुआ है लेकिन बाद में सफलता उनसे इस कदर रूठी कि फिर कभी भाग्य उदय हुआ ही नहीं। इस फेहरिस्त में कई नाम हैं।
🔺पानी पर सियासत
सियासत करने वालों को बस मौका चाहिए। अब श्रीगंगानगर जिले में पानी ऐसा विषय है जिस पर लंबे समय से सियासत होती रही है, इसके बावजूद यह समस्या आज भी यथावत है। विशेषकर चुनावी मौसम में यह सियासत चरम पर पहुंच जाती हैं। विडम्बना देखिए कि मामला किसानों से जुड़ा है लेकिन उनके रहनुमा अलग-अलग बन रहे हैं। मतलब उनकी मांग टुकड़ों में बंटी हुई है। वैसे कहा गया है कि एकजुटता में ही शक्ति है, लेकिन सियासी फेर में किसान चकररघिन्नी बने हुए हैं। किसान भी इस लालच में सभी के साथ हो रहा है कि उसकी समस्या का समाधान होना चाहिए भले ही वह किसी भी तरह से हो। देखने की बात यह है कि समाधान का श्रेय कौनसा सियासी दल लेता है और जनता किसका समर्थन करती है।
🔺आम और खास
श्रीगंगानगर में सीवरेज खुदाई के काम ने लोगों को किस कदर परेशानी में डाल रखा है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है लेकिन सीवरेज खुदाई वाली कंपनी इस काम में भेदभाव जरूर कर रही है। विशेषकर जहां वीआईपी लोगों का मोहल्ला है, वहां काम न केवल तुरत-फुरत होता है बल्कि रास्ते समतल करने का काम भी प्राथमिकता से होता है। मॉडल टाउन कॉलोनी में आम और खास के भेद को आसानी से देखा जा सकता है। विशेषकर चिकित्सकों वाली गली में सीवरेज कंपनी का विशेष ध्यान है जबकि जहां आम आदमी हैं, वहां के लोग आज भी ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर चलने तथा धूल फांकने को मजबूर हैं। अब यह तो सीवरेज कंपनी भी जानती है कि आम लोगों की कहीं पहुंच नहीं होती है, लिहाजा मनमर्जी खुलेआम चलाई जा रही है।
🔺फिर भी मुक्ति नहीं
जयपुर में हाल में ही एक विदेशी पर्यटक की सांड के सींग मारने से मौत के बाद प्रशासनिक अमला हरकत में आया हुआ है। श्रीगंगानगर में भी प्रशासनिक अमला इसी तरह हरकत में आया था। हालांकि मौत किसी विदेशी की तो नहीं हुई लेकिन वह श्रीगंगानगर के वरिष्ठ नागरिक जरूर थे। उस मौत के बाद प्रशासन ने कार्रवाई के नाम पर हाथ-पैर जरूर मारे लेकिन धीरे-धीरे बात आई गई हो गई। आवारा मवेशी फिर उसी अंदाज में सड़कों पर स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं। यह तो गनीमत है कि इन दिनों कोई हादसा नहीं हुआ है। वरना फिर वही आग लगने पर कुआं खोदने के अंदाज में कार्रवाई होती। अगर इस समस्या का स्थायी समाधान हो जाए तो मौत न तो जयपुर में हो और न ही श्रीगंगानगर में। देखने की बात है कि वह दिन कब आएगा।

राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 23 नवंबर 17 के अंक में प्रकाशित 

काश यह सब पहले हो जाता


आज सुबह से ही घर व कॉलोनी में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों का आना जाना लगा है। इसकी प्रमुख वजह मेरे अलावा कॉलोनी में एक अन्य व्यक्ति के डेंगू होना।जहां जहां डेंगू रोगी चिन्हित होते हैं वहां.वहां स्वास्थ्य विभाग वह सब करता है जो उसको समय समय पर करते रहना चाहिए। लेकिन तब ऐसा नहीं होता। पहले बीमारी फैलने का भरपूर इंतजार किया जाता है। और जब फैल जाए तब इस तरह से प्रदर्शित किया जाता गोया इनसे ज्यादा संवेदनशील तो कोई है ही नहीं। खैर, कल रोग की पहचान होते के साथ ही फोन आ गया था और मुझसे पूरा पता पूछा गया। आज दोपहर करीब एक बजे दो युवक आए। कहने लगे दवा का छिड़काव करना है। दरअसल यह लिक्विड था जिसकी बूंदें पानी की टंकी, गमले व फ्रीज की पीछे लगी ट्रे आदि में डाली गई। मेरा नाम पता नोट किया , हस्ताक्षर करवाए। इसके बाद यही क्रम पूरी कॉलोनी में दोहराया गया। साफ पानी एकत्रित न होने देने की नसीहत देकर यह चले गए।
शाम होने से ठीक पहले दिन जने और कहने लगे स्प्रे करना है। एक जने ने मशीन निकाली और हर कमरे, स्टोर। बाथरूम आदि के कोने कोने में स्प्रे किया। इसके बाद कॉलोनी के कई घरों में यह क्रम दोहराया गया। तीसरे चरण के तहत सबसे आखिर में फोगिंग मशीन चलाकर पूरे मोहल्ले में घुमाई गई। मशीन घर के आगे से गुजरी ही थी कि बड़ी संख्या में मच्छरों का झुण्ड मेरे सिर पर मंडराने लगा। मैंने आवाज लगाकर फोगिंग वाले को बुलाया और मच्छर दिखाए तो कहने लगा यह लाइट वाले हैं। मैंने कहा लाइट के हैं तो लाइट के पास जाए. इधर क्यों आए हैं? और क्या यह काटते नहीं? सामने वाला थोडा सा सकुचाया कहने लगा फोगिंग से मच्छर मरते नहीं है भागते हैं। उसका जवाब सुनकर मेरे पास हंसने के अलावा कोई चारा न था। खैर , दिन भर की कवायद देखकर मैं सोच में डूबा था। सोचने लगा ऐसी नौबत आती ही क्यों है?

सेनाओं का शक्ति प्रदर्शन

पता नहीं राजस्थान में कितनी सेनाएं बनेंगी। पहले एक सेना बनी। फिर उससे अलग होकर दूसरी बनी। अब श्रीगंगानगर में भी एक सेना बनी है। इसका नाम पहली व दूसरी से अलग है। फिलहाल तीनों ही सेनाएं अलग-अलग तरीकों से पदमावती फिल्म को लेकर जबरदस्त व्यस्त हैं। विशेषकर दो सेनाओं में तो मुकाबला सा चल रहा है। किस सेना के पास कितना सामान है और उसके कितने समर्थक हैं, यह बताने व जताने की होड़ सी लगी है। बैनर के नीचे जय-जयकार करने वाले कहां कम हैं और कहां ज्यादा है। यह सब दिखाने के भरपूर प्रयास हो रहे हैं।
दरअसल, इन सेनाओं के पास मुद्दा कोई भी रहा हो लेकिन इसके मूल में खुद को इक्कीस साबित करने की प्रतिस्पर्धा ज्यादा रही है। याद होगा पिछले दिनों एक गैंगस्टर एनकाउंटर में भी इन सेनाओं ने अलग-अलग बंद का आह्वान किया था। पर हासिल क्या हुआ? सिवाय अपने-अपने नाम चमकाने के।
अब पदमावती को लेकर भी बंद का आह्वान किया गया है। एक सेना ने तीस नवम्बर को बंद का एेलान किया है तो दूसरी ने एक दिसम्बर को। मुद्दा एक ही है लेकिन बंद दो दिन होगा। बंद कैसा होगा यह अलग बात है लेकिन दो दिन का बंद मतलब साफ है, शक्ति प्रदर्शन करना। आखिर समाज व सरकार को दिखाना भी तो है कि बड़ा कौन है। समाज का ज्यादा हितैषी कौन है। यहां मूल लड़ाई संख्या बल की है। अब इन संगठनों के मुखियाओं को कौन समझाए कि जोर जबरदस्ती करके आप फिल्म वालों को जरूर डरा सकते हो लेकिन जनता के दिलों में एेसे प्रदर्शनों या बंद से जगह नहीं बनने वाली। फिल्मों को लेकर प्रदर्शन पहले भी हुए हैं। क्या किसी सेना ने किसी फिल्म को बैन करवाया? क्या किसी फिल्म पर रोक लगी? इसीलिए भावनाओं में बहकर इन संगठनों से जुडऩे वाले पहले तो खुद से ही सवाल करे कि एक ही मसले पर यह सेनाएं अलग-अलग क्यों लड़ रही हैं। अलग-अलग दिन बंद का आह्वान क्यों कर रही हैं। एक तरफ तो यह जागरुकता व एकजुटता का नारा देते हैं दूसरी तरफ खुद अपनी अपनी ढपली अलग-अलग तरीके से बजा रहे हैं। कहने की आवश्यकता नहीं, पदमावती हम सब के लिए गौरव व आत्म सम्मान का विषय है। लेकिन यह तो जरूरी नहीं है कि किसी बैनर के नीचे जाकर ही हिंसात्मक तरीके से विरोध जताया जाए। लोकतंत्र में विरोध के तरीके बहुत हैं। कितना अच्छा होता है आप सिर्फ बंद का आह्वान करते और बाकी जनता पर छोड़ देते। जनता की सहानुभूति अगर आपके साथ है तो यकीनन वह बंद में दिखाई भी देगी। लेकिन जोर जबरिया बंद से सहानुभूति मिलने से रही। क्योंकि आग रूपी भावनाओं में फिलहाल बयान रूपी घी डाला जा रहा है। तय मानिए भावनाओं में जितना ज्यादा उबाल होगा तो अनिष्ट की आशंका भी उतनी ही रहेगी। भगवान न करे फिर भी अगर कोई अनिष्ट हुआ तो तय मानिए मुकदमे भी होंगे। कोई बड़ी बात नहीं मुकदमों में फंसे लोगों के लिए मौके की नजाकत भांपते हुए सरकार की ओर से फिर कोई पासा भी फेंक दिया जाए।
बहरहाल, केन्द्र व राज्य सरकार की भूमिका इस मामले में वेट एंड वाच वाली है। हां इतना जरूर है कि गुजरात व यूपी में चुनाव है, लिहाजा केन्द्र की तरफ से वहां के लिए कोई घोषणा हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। फिलहाल जो केन्द्र या राज्य के मंत्री फिल्म के विरोध करने वालों के समर्थन में बयान जारी कर रहे हैं वो केवल और केवल कागजी बयान हैं। अगर वाकई उनके बयानों में दर्द है तो फिर वो सरकार पर दवाब क्यों नहीं बनाते। सरकार न माने तो अपने पद से इस्तीफा क्यों नहीं देते। यह महज घडि़याली आंसू हैं। खैर, यह कमबख्त राजनीति है ना। सबको परेशान करती है। लड़वाती भी यही है और समझौता भी यही करवाती है, क्योंकि राजनीति में इन सब के अलग-अलग मायने हैं। आगे-आगे देखिए इस सियासत के रंग।
*किसको फिक्र है कि "कबीले"का क्या होगा..!
*सब लड़ते इस पर हैं कि "सरदार" कौन होगा..!!

Thursday, November 16, 2017

लंबी खामोशी का परिणाम है यह

बस यूं ही
संजय लीला भंसाली की अगले माह प्रदर्शित होने वाली फिल्म पदमावती पर जबरदस्त बवाल मचा है। वैसे तो फिल्म शूटिंग के समय से ही चर्चा में रही है। कभी फिल्म यूनिट से मारपीट करने तथा निर्माता को चांटा मारने को लेकर तो कभी फिल्म के लिए कथित रूप से पैसे लेने के आरोपों को लेकर। इन तमाम चर्चाओं व बाधाओं के बीच फिल्म अब बनकर तैयार है। पहले इसका पोस्टर जारी हुआ। फिर ट्रेलर। इसके बाद इसका एक गीत भी आया। इन सब पर मिश्रित प्रतिक्रिया रही। फिलहाल, इस फिल्म पर पर रोक के लिए कोर्ट में लगाई गई याचिका भी निरस्त हो गई है।
खैर, राजस्थान के तमाम पूर्व राजघराने इस फिल्म के विरोध में सामने आ गए हैं। कुछ सामाजिक संगठन तो शुरू से ही इसका विरोध करते आए हैं। इसके अलावा राज्य व केन्द्र के भाजपा नेता भी इस फिल्म पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष का भी फिल्म को लेकर बयान आया है। इन सब के बीच फिल्म बनाने वाले संजय लीला भंसाली का वीडियो भी वायरल हुआ है, जिसमें वह फिल्म को लेकर अपनी सफाई देते दिखाई दे रहे हैं।
बहरहाल, देश में आजादी के बाद से ही फिल्मों में एक जाति विशेष के खिलाफ जो चरित्र-चित्रण होता रहा है, यह उसी की पराकाष्ठा है। हर दूसरी फिल्म का खलनायक कौन और क्यों? इस पर कभी सवाल नहीं उठाए गए। तभी तो फिल्मकारों ने एक जाति विशेष को खलनायक व दुष्ट बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी किसी संगठन या पूर्व राजघराने ने इन फिल्मकारों से पूछा कि आपको खलनायक के लिए सिर्फ एक जाति के पात्र ही क्यों मिलते हैं? पदमावती पर प्रतिक्रिया देने वाले नेताओं ने कभी एेसी फिल्मों पर सवाल उठाए, जिनमें जाति विशेष को टारगेट किया गया? तो अब पदमावती में एेसा क्या हो गया? आजादी के बाद से फिल्मों में एक जाति विशेष को गरियाने का सुनियोजित षडयंत्र चलता रहा और कोई बोला तक नहीं, क्यों? आजादी के बाद से देश में संस्कृति से जो खिलवाड़ हुआ। जो सांस्कृतिक प्रदूषण फैला है, उस पर सबने चुप्पी क्यों साध ली? इतिहास से छेड़छाड़ लगातार होती रही है और अब भी हो रही है। हर कोई एेरा गैरा नत्थू खैरा कपोल कल्पित पात्र गढ़कर इतिहास में परिवर्तन करने पर आमादा है। तब यह सामाजिक संगठन खामोश क्यों रहते हैं? सोशल मीडिया पर रोज नए इतिहासकार पैदा हो रहे हैं और वे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर अपने हिसाब से इतिहास को परिभाषित कर रहे हैं, उनके खिलाफ तो कोई कुछ नहीं कहता, क्यों?
दरअसल, आजादी के बाद जातिवाद ज्यादा भड़का है तो इसके पीछे राजनीति तो रही है। हमारे सिनेमा ने भी इसको भुनाया है। यह सत्तर साल की खामोशी और चुपचाप सहने का ही परिणाम है कि आज हर कोई इतिहास को अपने हिसाब से परिभाषित करने की हिमाकत कर बैठता है। आजादी से पूर्व दबी कुचली जातियों का पूर्वाग्रह एक जाति विशेष के कल्पना पर आधारित चरित्र चित्रण को देखकर और अधिक प्रबल हुआ। पूर्वाग्रह प्रबल होने में सबको अपने-अपने हित नजर आए। फिल्मकारों को दर्शक मिले तो नेताओं को थोक में वोट बैंक हासिल हुआ। अब भी अगर राजनीतिक दल अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं तो यकीन मानिए इसमें भी उनके हित छिपे हैं। इसमें भी सियासत है। भावनाएं जितनी उबाल पर होंगी सियासत को अपना सिक्का जमाने में आसानी होगी। आगे-आगे देखिए होता है क्या?

इक बंजारा गाए-9

राहत की सांस
पुलिस व आबकारी से अब तक परहेज करती आई स्थानीय एसीबी टीम के चेहरे पर इन दिनों कुछ राहत की सांस देखी जा सकती है। इसकी प्रमुख दो वजह हैं। एक यह तो यह है कि सूरतगढ़ में आबकारी अधिकारी पर कार्रवाई करने के साथ ही परहेज का सिलसिला अब टूट गया है। टीम ने सूरतगढ़ में आबकारी निरीक्षक को पकड़ कर यह सिद्ध किया है कि यह काम सिर्फ बीकानेर की टीम ही नहीं वरन वह भी कर सकती है। दूसरी खुशी की वजह थोड़ी अलग है। दरअसल, बीकानेर की एसीबी टीम लगातार श्रीगंगानगर में पुलिस व आबकारी पर कार्रवाई कर रही थी तो स्थानीय टीम की भूमिका को लेकर चर्चा जोरों पर चल पड़ी थी। बीकानेर जिले में भी एक कार्रवाई हुई थी, जिसे चूरू टीम ने अंजाम दिया बताया। ऐसे में चर्चा बीकानेर की टीम की भी होने लगी। साथ में यह संदेश भी चला गया कि बीकानेर की टीम जब श्रीगंगानगर में आकर कार्रवाई कर सकती है तो बीकानेर में चूरू की क्यों नहीं कर सकती। बहरहाल, श्रीगंगानगर की टीम इस दोहरी खुशी में फूले नहीं समा रही है।
वाह जी वाह
कहावत है कि सांप निकलने पर लाठी पीटने से कोई फायदा नहीं होता है, लेकिन हास्यापस्द स्थिति तो तब होती है तब सांप है या नहीं, वह निकल गया या आएगा यह पता होने से पहले ही लाठी पीट दी जाए तो? खैर, श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय पर एक वाकया ऐसा ही हुआ है। सरकार के कामों के प्रचार-प्रसार वाले विभाग के मुखिया ने एक प्रेस विज्ञप्ति पर आंख मूंदकर इतना विश्वास किया कि पुराना समाचार ही अखबार के कार्यालयों में प्रेषित कर दिया। यह समाचार किसी पुरस्कार से संबंधित था और इसमें आवेदन करना था, लेकिन इसमें वस्तुस्थिति यह थी कि आवेदन की अंतिम तिथि निकल चुकी फिर भी समाचार बना दिया गया। अधिकारी के मामला जब संज्ञान में आया तो हालत काटो तो खून नहीं वाली हो गई। अधिकारी ने अपनी झेंप यह कहते हुए मिटाने की कोशिश की कि विज्ञप्ति महिला अधिकारियों से संबंधित थी, लिहाजा पुष्टि करना उचित नहीं समझा।
प्रदर्शनों से परहेज
एक राजनीतिक दल के प्रदर्शनों में इन दिनों यकायक कमी सी आई है। भले ही चुनाव में एक साल बचा हो लेकिन अभी तक प्रदर्शनों से परहेज ही किया जा रहा है। वैसे बताया जा रहा है कि इस संगठन के चुनाव होने हैं। अब पुराने पदाधिकारी प्रदर्शनों से इसीलिए बच रहे हैं कि अब उनको तो जिम्मेदारी मिलनी नहीं है, जबकि नया कौन बनेगा यह अभी तय नहीं है, इसलिए प्रदर्शन का काम धीमी गति से चल रहा है। वैसे अंदरखाने की बात यह है कि प्रदर्शनों के लिए सबसे बड़ा संकट आर्थिक है। प्रदर्शनों पर होने वाला खर्चा कौन वहन करे, यही सबसे बड़ा धर्मसंकट है। पुराने वाला दुबारा बनेगा नहीं तथा नये वाला तय नहीं है। वैसे राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि जिस दिन संगठन के चुनाव हो जाएंगे, उसके बाद प्रदर्शन भी ज्यादा होने लग जाएंगे। अब तो आने वाला समय ही बताएगा कि चर्चा कितनी सही साबित होती है।
टिकट की तैयारी 
टिकट किसको मिलेगी, किसकी कटेगी अभी तक यह तय नहीं है लेकिन चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। संभावित उम्मीदवारों ने भी मेल मिलाप शुरू कर दिया है। खास बात तो यह है कि एक-एक विधानसभा से एक ही दल के कई नाम सामने आ रहे हैं। खास बात यह है कि सभी अपने समर्थकों को यह भी कह रहे हैं कि उनकी टिकट पक्की है। इधर नेताओं के समर्थक चक्करघिन्नी हैं कि वह किसकी बात पर कितना यकीन करें। हालांकि मतदाता रूपी समर्थक जरूरत से ज्यादा समझदार भी हैं। श्रीगंगानगर जिले के एक दो विधानसभा ऐसे हैं जहां उम्मीदवारों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। अब इस तरह के माहौल में चटखारे लेने वालों की संख्या भी कम नहीं है। विशेषकर दूसरे दल वाले कितने विधायक कह-कह कर भी मजे ले रहे हैं। चुनावी समय नजदीक आने के साथ-साथ यह काम और गति पकड़ेगा और रोचक होगा इतना तो तय ही मानिए।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 09 नवंबर 17 को प्रकाशित

इक बंजारा गाए -8

सोशियल इंजीनियरिंग
चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों के साथ-साथ चुनावी मैदान में कूदने वालों को सोशियल इंजीनियरिंग का सहारा लेना ही पड़ता है। इस बहाने समाज के नेताओं से संपर्क करने या उनको किसी कार्यक्रम में बुलाकर यह दिखाने का प्रयास किया जाता है कि इस नेता का समर्थन तो उसी के साथ ही है। अभी श्रीगंगानगर में एक कार्यक्रम में समाज के बड़े नेता को बुलाने के भी अलग-अलग अर्थ निकाले जा रहे हैं। सबसे बड़ी हैरानी तो यह है कि बुलाने वाले दूसरे समाज के हैं और नेताजी दूसरे के। अब भले ही नेताजी के समाज से चुनाव की तैयारी करने वालों की पेशानी पर बल पड़ें लेकिन नेताजी के दौरे ने समाज की राजनीति में हलचल जरूर शुरू कर दी है। वैसे बताते चलें कि इन नेताजी के समाज का श्रीगंगानगर में अच्छा खासा वोट बैंक है। देखने की बात यह है कि नेताजी का दौरा कितना कारगर होता है तथा कितने वोट दिलाने में सफल होता है। खैर, नेताजी को बुलाने वाले महाशय को टिकट मिलती है या नहीं, फिलहाल तो यह भी दूर की बात है।
चुनावी जुनून
अक्सर चौक चौराहों या नुक्कड़ पर राजनीति की चर्चा सुनने को मिल ही जाएगी। लोग भले ही राजनीतिज्ञों को कितना ही कोसें लेकिन बात जब खुद की आती है तो लड्डू फूटने लगते हैं क्योंकि राजनीति का चस्का ही ऐसा है। समर्थकों की भूमिका भी इसमें बड़ा स्थान रखती है। वे समर्थक ही होते हैं जो सपना दिखाते हैं, उम्मीद जगाते हैं। श्रीगंगानगर में भी एक महाशय ऐसे हैं जिन पर चुनाव लडऩे का जुनून सवार है। वैसे तो वे सतारूढ़ दल से हैं और टिकट मिलेगी या नहीं यह भी तय नहीं है लेकिन तैयारी देखकर लग रहा है कि उन्होंने मानस पूरा बना लिया है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इन महाशय की सक्रियता बढ़ती जा रही है। छोटे से छोटे कार्यक्रम में इनकी सहभागिता देखी जा सकती है। महाशय का कहना है कि इस बहाने जमीनी स्तर पर सभी से मिलना हो जाता है। फिलहाल समाचार पत्रों में भी महाशय छाए हुए हैं। इनका मीडिया मैनेजमेंट भी गजब का है। बताते चले यह वही महाशय हैं जिन्होंने एक बड़े होटल में पिछले दिनों प्रेस वार्ता कर कैम्पर बांटे थे।
शक्ति प्रदर्शन
त्योहार तो हर साल ही आते हैं और स्नेह मिलन भी कमोबेश हर वर्ष ही होते हैं लेकिन चुनाव के आसपास आने वाले त्योहारों की रंगत की कुछ और नजर आती है। चुनावी साल के चक्कर में स्नेह मिलनों में न केवल भीड़ बढ़ती है बल्कि इस बहाने एकजुटता के साथ शक्ति प्रदर्शन भी किया जाता है। चुनावों के दौरान समाजों का कितना भला होता है यह बात दीगर है लेकिन इस बहाने राजनीतिक दलों या चुनाव लडऩे वालों की नजर तो पड़ ही जाती है। वैसे इन शक्ति प्रदर्शनों के भी अलग-अलग मायने हैं। कोई समाज के सहारे सियासत की सीढ़ी चढऩे के लिए यह सब करता है तो कोई राजनीतिक दलों में अपनी पहुंच बनाता है। एक बात और है समाजों से दूरी बनाकर रखने वाले नेता भी चुनावी मौसम को देखकर नजदीकियां बढ़ाने लगते हैं। समाजों के द़ुख-दर्द भी इनको याद आने लगते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि नेता लोग समाजों को हर साल ही साथ लेकर चलें तो इस तरह नजदीकियां बढ़ाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
अपनों की खातिर
श्रीगंगानगर की एसीबी टीम बाकी सब पर तो कार्रवाई करती है लेकिन पुलिस व आबकारी के मामले में पता नहीं क्यों इसके हाथ कांप जाते हैं। घमूड़वाली, घड़साना के बाद अब रायसिंहनगर में ऐसी ही कार्रवाई हुई है, जिसे बीकानेर की टीम ने अंजाम दिया है। कार्रवाई न करने के वैसे तो कोई भी कारण हो सकते हैं। लगातार तीन मामले और वे भी आबकारी या पुलिस से संबंधित तो सवाल उठना लाजिमी है। वैसे कार्रवाई न करने के मोटे तौर पर तीन-चार कारण ही गिनाए जाते हैं। या तो शिकायतकर्ताओं के पास श्रीगंगानगर टीम का सपंर्क या पता ठिकाना नहीं है। या श्रीगंगानगर टीम उनकी शिकायतों पर गौर नहीं करती है। या फिर श्रीगंगानगर टीम अपने ही लोगों का मामला समझ कर रियायत करती है। खैर, यह आरोप तब तक चस्पा रहेंगे जब तक एसीबी कोई पुलिस या आबकारी का मामला पकड़ नहीं लेती। आबकारी व पुलिस पर लगातार होती कार्रवाई यह भी साबित करती है कि प्रिंट रेट से ज्यादा कीमत तथा देर रात बिकने के पीछे भी दोनों विभागों की शह का ही कमाल है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 2 नवम्बर 17 के अंक में प्रकाशित

रसोई व चौबारे का वो साक्षात्कार


बस यूं ही
यह बात आज से करीब साढ़े तेरह साल पहले की है। उस वक्त मैंने जो लिखी थी उस खबर की कटिंग तो नहीं है लेकिन यह राजस्थान के तमाम सिटी संस्करणों में खेल पेज पर प्रकाशित हुई थी। वह साल 2004 का था। माह संभवत: अप्रेल या मई का रहा होगा। भारतीय क्रिकेट टीम तबपाकिस्तान में जोरदार प्रदर्शन कर लौटी थी। टीम के प्रदर्शन के साथ एक और खिलाड़ी था जिसके खेल की प्रशंसा कमोबेश सभी जगह थी। छरहरे बदन का बेहद शर्मीला सा वह बांका जवान था आशीष नेहरा।
खैर, उस वक्त मैं अलवर में कार्यरत था। अलवर जिले में तिजारा के पास एक छोटा सा कस्बा है किशनगढ़बास। इस कस्बे में आशीष नेहरा की चचेरी बहन का ससुराल है। नेहरा के जीजाजी का इस कस्बे में स्कूल भी है। स्कूल का वार्षिकोत्सव था, लिहाजा आशीष नेहरा को बतौर अतिथि आमंत्रित किया गया था। किशनगढ़बास संवाददाता ने जब समाचार भेजा तो उसको पढ़कर मैंने मानस बना लिया कि नेहरा का साक्षात्कार करना ही है। मैं अपना प्रस्ताव लेकर संपादक जी के पास गया तो उन्होंने स्वीकृति दे दी। अगले दिन मैं और फोटोग्राफर बाइक पर किशनगढ़बास के लिए रवाना हो गए। सबसे पहले हम स्थानीय संवाददाता के पास पहुंचे और उनको साथ लेकर स्कूल की तरफ चल पड़े। स्कूल से लेकर कस्बे की सीमा तक प्रशंसकों की भीड़ एकत्रित होने शुरू हो गई थी। सब नेहरा को करीब से देखने को लालायित थे। हम एक चक्कर लगाकर नेहरा की बहन के घर आ गए। थोड़ी देर बाद सूचना मिली कि नेहरा आने वाले हैं तो हम फिर कस्बे की सीमा पर पहुंच गए। तब तक भीड़ और बढ़ गई थी। जोरदार स्वागत हुआ था नेहरा का। आलम यह था कि स्वागत करने के बाद प्रशंसक नेहरा के काफिले के साथ हो लिए। जब तक नेहरा घर पहुंचते तब तक तो जबरदस्त मजमा लग चुका था। चूंकि नेहरा के जीजाजी के कस्बे में सभी से संपर्क अच्छे थे, लिहाजा उन्होंने किसी को मना भी नहीं किया। पूरा घर भर गया था प्रशंसकों। कोई हाथ मिलाने को उत्सुक था तो कोई फोटो खिंचवाने को। इतनी भीड़ को काबू करना या समझाना बड़ा मुश्किल काम था। नेहरा जहां भी जाते प्रशंसक उनके पीछे-पीछे। बात करने का कोई मौका या माहौल मिल नहीं पा रहा था। आखिरकार रसोईघर में नेहरा पहुंचे और पीछे-पीछे हम भी घुस गए। रसोईघर को अंदर से बंद कर बात करना शुरू किया तो तय हुआ कि बातचीत ऊपर चौबारे मंे की जाएगी।
रसोई से चुपचाप निकल कर हम चौबारे में पहुंचे। वहां डबल बैड पर हम नेहरा के आजूबाजू बैठ गए। सवाल क्रिकेट से संबंधित किए तो नेहरा ने असमर्थता जताते हुए कहा कि बीसीसीआई से संबंधित मजबूरियां के कारण कुछ नहीं बोल सकते। एेसे में हमारे पास हल्की-फुल्की पारिवारिक बातें तथा पाकिस्तान दौरे की प्रमुख यादें ही अंतिम विकल्प थी। नेहरा के साथ उनके ताऊजी भी आए थे। बड़ी बड़ी मूंछे थी उनकी। कहने लगे छोरे को इस मुकाम तक पहुंचाने में बहुत मेहनत की है, हम लोगों ने। बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज झुंझुनूं जिले में पिलानी के आसपास के रहने वाले थे। वहां से पलायन करके हरियाणा आए और वहां से दिल्ली के पास आकर रहने लगे। बहरहाल, नेहरा के संन्यास लेने के बाद से ही मेरे जेहन में किशनगढ़बास का वह वाकया घूम रहा था। नेहरा को वैसे हंसमुख व मिलनसार माना जाता है लेकिन क्रिकेट के मैदान पर उनके चेहरे से गंभीरता झलकती थी। कल जब उन्होंने भारतीय पारी की शुरुआत की और अंतिम ओवर डाला तो माहौल जरूर भावपूर्ण हुआ। 64 नंबर की टी शर्ट पहने यह खब्बू गेंदबाज जब हाथ को ऊपर उठाकर हल्की मुस्कुराहट से अभिवादन स्वीकार रहा था तो चेहरे के पीछे छिपे राज न चाहते हुए भी बयां हो रहे थे। इतना लंबा कैरियर किसी को किसी को ही मिलता है। लगातार ऑपरेशन ने इस खिलाड़ी के नियमित खेल में व्यवधान डाला अन्यथा आंकड़े कुछ और ही नजर आते।

दर्शक बनती पुलिस

टिप्पणी
कानून की पालना करना तथा व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। अपराधों पर अंकुश तथा जान माल की हिफाजत की सुरक्षा करना भी पुलिस की जिम्मेदारी में शामिल माना गया है। श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय पर हाल ही दो घटनाएं ऐसी हुई हैं, जिनको देखकर यह कहा जा सकता है कि पुलिस अपनी जिम्मेदारी निभाने में कहीं न कहीं चूक कर रही है। पहला मामला रामलीला मैदान में दशहरे पर रावण परिवार के दहन का है। वहां उमड़ी भीड़ दहन के वक्त बेकाबू हो गई। गनीमत रही कि कोई हादसा नहीं हुआ। जब तक पुलिस को अपनी जिम्मेदारी का भान होता हालात नियंत्रण से बाहर हो गए। भीड़ पुतलों के पास पहुंच गई। कुर्सियों पर बैठकर कार्यक्रम देखने की हसरत लेकर जाने वालों को निराशा हाथ लगी। दहन के बाद तो स्थिति एक तरह से नियंत्रण से बाहर ही हो गई। धक्की-मुक्की और छेडख़ानी तक घटनाएं हुईं। अच्छा कार्यक्रम देखने की उम्मीद में गए लोग व्यवस्था से इतने परेशान हुए कि दुबारा आने की तौबा तक कर ली।
दूसरा मामला दो दिन पहले का है। आदर्श पार्क में जागो कार्यक्रम के चलते काफी लोग जमा हुए। इनमें महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा थी। व्यवस्था बनाने के लिए यहां महिला पुलिसकर्मी भी बड़ी संख्या में तैनात की गई थी, लेकिन यहां भी अधिकतर महिला व पुलिसकर्मी बजाय व्यवस्था बनाने के कार्यक्रम देखेन में मशगूल थे। उनको यह खबर ही नहीं थी कि कार्यक्रम में आने वालों को किस तरह के अनुभव व असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। धक्का-मुक्की व अव्यवस्थाएं भी लगातार इसीलिए बढ़ती गई क्योंकि जिनके जिम्मे व्यवस्था थी वो भीड़ का हिस्स हो गए। कहने का आशय यही है कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी खुद की जिम्मेदारी भूल दर्शक बन गए। पुलिस का दर्शक बनना किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। पुलिस का जिम्मेदारी भूल दर्शक बनने की यह प्रवृत्ति कतई उचित नहीं है। क्योंकि आज की छिटपुट घटनाएं कालांतर में किसी बड़े हादसे या विवाद की वजह बन सकती हैं। सीमावर्ती जिला होने के कारण श्रीगंगानगर वैसे भी संवेदनशील माना जाता है। इसलिए पुलिस जिस काम के लिए बनी है, उसी को शिद्दत व ईमानदारी के साथ निभाए। वह भीड़ का हिस्सा या दर्शक बनने के लिए तो कतई नहीं है। उसकी जिम्मेदारी बड़ी है। वह अपनी जिम्मेदारी का एहसास करें तथा उसे निभाए। वैसे भी भीड़ का हिस्सा व दर्शक बनने के लिए लोगों की कमी नहीं है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 31 अक्टूबर के अंक में प्रकाशि

मरता क्या न करता

टिप्पणी
मौसम में आए यकायक बदलाव के चलते श्रीगंगानगर में मौसमी बीमारियों के मरीज तो अचानक बढ़े ही हैं, डेंगू मरीजों के बढ़ते आंकड़ों ने आमजन को चिंता में डाल दिया है। हालत यह है कि श्रीगंगानगर में बीते दो दिन के भीतर 22 मरीजों में डेंगू की पहचान हुई है। यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता था लेकिन डेंगू जांचने की किट समाप्त हो गई। करीब 60 मरीजों की जांच किट के अभाव में अटकी हुई है। बुधवार को ही जिला कलक्टर ने स्वास्थ सेवाओं में कमी पर विभाग के अधिकारियों को कड़ी नसीहत दी। इधर, सरकारी स्तर पर समय पर जांच न होने या जांच के अभाव के कारण मरीज व उनके परिजन निजी अस्पतालों या लैब में जाने को मजबूर हैं। इनमें ज्यादातर तो ऐसे भी हैं, जो इस आशंका के चलते जांच करवा रहे हैं कि कहीं उनके डेंगू तो नहीं? डेंगू के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए इस तरह की आशंका गलत भी नहीं है। इस तरह की आशंका का समाधान जांच से ही संभव है। मरीजों को झूठा डर दिखाकर उनको भयभीत कर जांच के लिए मजबूर करने की शिकायतें भी जिला प्रशासन के पास पहुंची हैं। जाहिर सी बात है कि आशंकाओं से घिरे मरीज को सरकारी स्तर पर कोई सुविधा या जांच नहीं मिलेगी तो वह निजी में नहीं जाएगा तो क्या करेगा। 
खैर, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी बजाय ज्यादा मशक्कत करने के इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कब मौसम बदले और कब डेंगू का प्रकोप कम हो। उनकी दलील है दीपावली के बाद डेंगू का प्रकोप कम हो जाता है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की दलील सही है या गलत या फिर हास्यास्पद, एक बार इसको भूल भी जाएं लेकिन बड़ा सवाल यह है कि वे किट मंगवाने के प्रति गंभीर क्यों नहीं हैं। वे इतनी ही किट क्यों मंगवा रहे हैं, जो आते ही खत्म हो रही हैं। जरूरत के हिसाब से यह व्यवस्था पहले से क्यों नहीं कर ली जाती! बड़ी बात तो यह भी है कि यह जांच सरकारी स्तर पर निशुल्क है लेकिन इसी जांच के निजी चिकित्सालय या लैब में एक हजार से बारह सौ रुपए तक लगते हैं। अधिकारियों के छह सौ से अधिक राशि नहीं लेने के आदेश के बावजूद निजी लैब और चिकित्सालयों की मनमानी चल रही है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों के निजी अस्पतालों व लैब संचालकों से मिलीभगत के आरोप भी लग रहे हैं। जिला प्रशासन को इस मामले में फटकार या नसीहतों से आगे बढ़कर दखल देनी चाहिए। साथ ही न केवल तत्काल किट की व्यवस्था करवानी चाहिए बल्कि मिलीभगत के आरोप की जांच कर सत्यता भी पता करवानी चाहिए। किट की किल्लत कृत्रिम है या वास्तव में है, इसकी पड़ताल भी होनी चाहिए। किट के अभाव में कोई निजी अस्पताल की तरफ जा रहा है तो यह कहीं न कहीं विभाग की उदासीनता का ही परिणाम है। बहरहाल, स्वास्थ्य विभाग सुविधाओं में विस्तार करे। जिस चीज की कमी है, उसका समय रहते प्रबंध करे ताकि उपचार के अभाव में न तो किसी मरीज की मौत हो और न ही कोई इलाज के लिए इधर-उधर भटके।
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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 27 अक्टूबर 17 के अंक में प्रकाशित

इक बंजारा गाए-7


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🔺दिखावे का बहिष्कार 
गुड़ खाए गुलगुलों से परहेज करना। मतलब दिखावा करना। यह बात चाइनीज सामान का बहिष्कार करने वालों के लिए उपयोग की जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय सहित समूचे जिले में चाइनीज सामान का बहिष्कार किया। समाचार पत्रों में बड़े समाचार व फोटो भी प्रकाशित हुए लेकिन दिवाली के दिन चाइनीज सामान के बहिष्कार का कुछ खास असर नजर नहीं आया। अधिकतर घरों पर दीपों की जगह बिजली की चाइनीज लडिय़ां जगमगा रही थीं। आतिशबाजी व पटाखे बेचने वालों के यहां भी चाइनीज सामान खूब बिका। खैर, इस मुहिम से किसको कितना व कैसा लाभ मिला, यह तो शहर जानता ही है। वैसे जिस दिन यह मुहिम शुरू हुई और चाइनीज सामान को जलाकर अभियान का शुभारंभ किया गया था, उस दिन कई जनों के हाथ में मोबाइल थे और अधिकतर सेल्फी खींचने में तल्लीन थे। कहने वालों ने तो तब भी कह दिया था कि मोबाइल भी तो चाइनीज ही हैं। समझने वाले तो बहिष्कार की मुहिम की गंभीरता को उसी दिन समझ गए थे।
🔺घर का पता
चुनावी सीजन नजदीक हो और ऐसे में कोई त्योहार आ जाए या नए साल का आगाज हो तो फिर पत्रकारों के घर के पते तलाशने का काम जोर पकड़ लेता है। दफ्तर की बजाय घर पर मिलने का कारण तो चुनाव चाशनी पर जीभ लपलपाने वाले ही अच्छी तरह से बता सकते हैं लेकिन घर पर मिलने का कुछ तो राज जरूर है। मोटे रूप से एक कारण तो यही हो सकता है कि घर पर देने पर राज राज ही रहता है जबकि कार्यालय में देने पर राजफाश हो सकता है। दूसरा कारण यह भी हो सकता है। आफिस में तो सबको समान रखने की मजबूरी भी आड़े आ सकती है लेकिन घर पर योग्यता व अनुभव के आधार पर श्रेणी भी तो बताई जा सकती है। सबसे बड़ी व आखिरी वजह यह भी हो सकती है। इसमें देने व लेने वाले दोनों का नाम कोई तीसरा नहीं जानता। यह राज रहता है। यानी सांप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती । पत्रकार माफ करें लेकिन राज की बात यही है कि श्रीगंगानगर में घर का पता पूछने व घर पर मिलने का प्रचलन कुछ ज्यादा ही है।
🔺राम-रमी के बहाने
होली-दिवाली पर राम-रमी की परंपरा वर्षों पुरानी है। इस दिन घर पर आने वालों की मनुहार की जाती है। मनुहार के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। मनुहार में प्रयुक्त सामग्री भी अलग-अलग हो सकती है लेकिन इसका प्रमुख कारण घर पर आने वाले का स्वागत ही होता है। कुछ जगह नीचे तबके के लोगों को कपड़े व नकद राशि देने का रिवाज भी है। वैसे गांवों में सभी एक दूसरे के घर जाते हैं लेकिन शहरों में मामला कुछ अलग है। इतनी बड़े शहर में घर-घर तो वैसे भी घूमा नहीं जा सकता है तो सभी अपने परिचित व रिश्तेदार के यहां जाते हैं। हां, राजनीतिज्ञों के घर पर राम रमी के बहाने भीड़ जुटती है। चुनावी तैयारी में जुटे एक महानुभाव के घर पहुंचे कुछ छायाकार भी रामरमी के बहाने के नकदी पाने में सफल हो गए। हां, यह बात अलग है कि नेताजी ने हैसियत व योग्यता देखकर छायाकारों में राशि कम-ज्यादा जरूर की। गनीमत रही कि यह राज खुला नहीं और राज ही रहा। खुल जाता तो सबका फिर बराबर मान रखना जो पड़ता।
🔺सूची छोटी पड़ गई
शहर में इन दिनों एक नेताजी बेहद सक्रिय है। टिकट मिलेगी या नहीं फिलहाल यह तय नहीं है लेकिन नेताजी चर्चा में बने रहने का कोई मौका नहीं छोडऩा चाहते। कोई भी मामला हो नेताजी की दखल कमोबेश हर जगह मिलेगी। अब शहर की साफ-सफाई को ले लीजिए। नेताजी को इस मामले में भी वोट बैंक नजर आया। काम का प्रचार-प्रसार ठीक से हो जाए, इसके लिए प्रेस कान्फ्रेस का आयोजन तक कर डाला। एक छोटी सी सूचना साझा करने के लिए बाकायदा शहर के बड़े होटल का चुनाव किया गया। शहर से थोड़ा बाहर स्थित इस होटल में पहुंचने वालों ने दूरी को दरकिनार कर दिया। बताते हैं कि नेताजी ने बतौर गिफ्ट पानी के कैम्पर की व्यवस्था कर रखी थी लेकिन कान्फ्रेस में उमड़े लोगों के कारण सूची छोटी पड़ गई। करीब सात दर्जन को तो मौके पर ही गिफ्ट दिए गए। वंचित रहने वालों के लिए और ऑर्डर करना पड़ा।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 26 अक्टूबर 17 के अंक में प्रकाशित 

मेरे हमदम, मेरे दोस्त


यह रिश्ता स्नेह का है। प्यार का है। यह रिश्ता विश्वास का है। इस रिश्ते की बुनियाद बेहद नाजुक डोर पर टिकी होती है। इस नाजुक डोर की न केवल हिफाजत करना बल्कि इसको मजबूत करने की जिम्मेदारी किसी चुनौती से कम नहीं होती। यह रिश्ता सात जन्म का होता है। यह रिश्ता जन्म जन्मांतर का है। जी हां यह रिश्ता पति-पत्नी का है। इस रिश्ते में नोकझोंक भी हैं। रुठना-मनाना भी है। हार व जीत भी है। इस रिश्ते में शिकवा-शिकायतें हैं तो इस रिश्ते में कभी खुशी कभी गम भी आते हैं। यह रिश्ता सदा सरपट भी नहीं दौड़ता, क्योंकि उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इस रिश्ते में कभी जिद कर ली जाती है तो कभी समझौता भी करना पड़ता है। यह रिश्ता बिना किसी व्यवधान के चले तो इससे बड़ा कोई सुकून नहीं होता है लेकिन इसमें कहीं कोई व्यवधान आया तो इससे ज्यादा तकलीफदेह भी कोई नहीं होता। तभी तो यह रिश्ता अजीब है। अनूठा है और रोचक भी। यह रिश्ता गुदगुदाता है तो कभी आंखें नम भी करता है। प्यार भरे इस रिश्ते में गलतफहमियां घुसपैठ कर जाएं तो यह तकलीफ भी देता है। अविश्वास नामक वायरस इस रिश्ते का सबसे बड़ा दुश्मन है। गलतफहमी व अविश्वास से जो रिश्ता अछूता है तो वह संसार की सभी बाधाएं पार कर सकता है।
अद्र्धांगिनी निर्मल का आज जन्मदिन है। उसने भी जीवन के चार दशक पूरे कर लिए। जीवन का यह पड़ाव सबसे महत्पपूर्ण होता है। चार दशक का आनंद लेने के बाद एक नए पड़ाव में प्रवेश करना भी बड़ा चुनौती वाला होता है। बड़े होते बच्चों की परवरिश व उनको संस्कार देने का वक्त। 
खैर, बीते साढ़े तेरह साल में ज्यादातर समय मेरा निर्मल के साथ ही बीता है। मैं आज इस मुकाम पर इसीलिए हूं कि घर के तमाम कामों को निर्मल बखूबी संभाल लेती है। वृद्ध माता पिता को साथ रखने का फैसला मेरा था लेकिन मेरे इस फैसले से निर्मल के चेहरे पर कभी शिकन नहीं आई। हकीकत यह है कि मेरे काम से भी ज्यादा कठिन, महत्वपूर्ण काम व जिम्मेदारी निर्मल की है। वह बच्चों से भी मासूम है और बेहद संवदेनशील भी। थोड़ा सा प्रोत्साहन उसको काम करने को प्रेरित करता है। कई बार कार्यालयीन दवाब या तनाव की झलक हमारी दैनिक बातचीत में आ जाती है तो वह किसी समझदार की तरह मुझे गाइड करती है। संबल प्रदान करती है। हौसला देती है। वह कभी दोस्त की भूमिका में होती है तो कभी अभिभावक बन जाती है। कभी वह टीचर की तरह पेश आकर प्यार डांट भी देती है। इतना होने के बावजूद कई बार नोकझोंक मर्यादा लांघ जाती है लेकिन हम दोनों में से कोई एक पहल कर लेता है। हां थोड़ी देर के लिए दोनों का अहम जरूर जागता है, टकराता भी है लेकिन फिर यह पछतावे पर ही जाकर खत्म होता है। पछतावा भी ऐसा कि फिर दोनों ही आंसू बहाते हैं। 
सचमुच निर्मल बेहद समझदार, संस्कारित, सुशिक्षित, सुशील, सहज, सादगी पसंद, हंसोड़, मिलनसार व व्यवहार कुशल महिला है। वह समर्पण भाव से सहयोग करने को तत्पर रहती है। पाक कला में उसका कोई जवाब नहीं है। सच में कई बार खाना खाते खाते पेट भर जाता है लेकिन मन नहीं भरता। उसको भी खाना बनाने व नित नए प्रयोग करने में बेहद खुशी मिलती है। और हां मेरे को 50 से 75 किलो तक ले जाने में उसके लजीज खाने का ही योगदान है। 
मौजूदा दौर की चकाचौंध से निर्मल थोड़ी अलग जरूर है। जीवनसंगिनी के जन्मदिन पर परमपिता परमेश्वर से यही कामना करता हूं। वह स्वस्थ रहे। विवेकशील रहे। ऊर्जा व उमंग से परिपूर्ण रहे। उसके जीवन में हमेशा खुशियों के रंग यूं ही कायम रहें। हमारे दाम्पत्य जीवन की गाड़ी बिना हिचकोले खाए चलती रहे, दौड़ती रहे। वाकई निर्मल तुम ग्रेट हो। तुम्हारा काम मेरे काम से बड़ा है। सच में काफी बडा..। हैप्पी बर्थ डे टू यू....निर्मल..हंसती रहो खिलखिलाती रहो, खुशियों की रंग बिखराती रहो.

तालमेल के खेल से घालमेल !


बस यूं ही
सांच को आंच नहीं। यह कहावत जन्म से सुनते आ रहे हैं, लेकिन राज्य की भाजपा सरकार को कहीं न कहीं यह लगने लगा है कि सांच को आंच आ रही है। तभी तो एक अध्यादेश लाया जा रहा है। प्रदेश के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया भी कह रहे हैं कि अध्यादेश का मतलब ईमानदार लोकसेवकांे की छवि को बदनाम होने से बचाना है। यह दलील अकेले कटारिया की ही नहीं अपितु सरकार के सभी मंत्रियों की है। सभी का सुर भी कमोबेश एक जैसा है। इसे यस बॉस (यस मैम) वाली संस्कृति कहें या पार्टी प्रोटोकॉल लेकिन इतना तय मानिए भाजपा के विधायक वो नहीं कह पा रहे हैं, जो कहना चाहिए। वो अपने विवेक का प्रयोग ही नहीं पा रहे हैं। इस तरह के हालात यह साबित करते हैं कि पार्टी के अंदर का लोकतंत्र कितना खोखला होकर सिर्फ और सिर्फ एक जगह केन्द्रित हो गया है। खैर, मौजूदा राज्य सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार किस कदर चरम पर जा पहुंचा है इसका आलम एक-एक दिन में पांच-पांच छह-छह घूसखोर रंगे हाथों पकडऩे जाने से लगाया जा सकता है। घूस लेते धरे गए लोकसेवक थे और विभिन्न विभागों में सेवा दे रहे थे। आंकडे निकलेंगे तो यकीनन आंखें फटी की फटी रह जाएंगी। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में शायद ही कोई एेसा दिन बीता होगा जिस दिन घूसखोरों से संबंधित समाचारों से अखबार न रंगे हो। यह भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है? कहीं इस अध्यादेश के बहाने इस तरह के घूसखोरों को अभयदान की तैयारी तो नहीं? सरकार बताए, आंकड़े उपलब्ध कराए कि कितने ईमानदार लोकसेवकों की छवि को धूमिल किया गया? मेरी नजर में यह अध्यादेश ईमानदारों की छवि बचाने की बजाय बेईमानों को संरक्षण देने जैसा है। सबसे पहले सरकार को अध्यादेश लागू करने की जिद छोड़कर यह बताना चाहिए कि यह अध्यादेश किसकी सलाह पर बना? क्यों बना? क्यों लाया जा रहा है? इसको लाने का असली अंकगणित क्या है? सरकार इस अध्यादेश को लाने के लिए इतनी लालायित क्यों हैं? लोकसेवकों की छवि का ख्याल आजादी के इतने समय बाद किसी भी सरकार को न आना और अचानक मौजूदा राज्य सरकार को आ जाना भी अपने आप में बड़ा सवाल है। क्या इस मामले में केन्द्र को इस्तक्षेप नहीं करना चाहिए? अगर केन्द्र का हस्तक्षेप नहंी है तो यह भी तय मानिए कि इस मामले में कहीं न कहीं केन्द्र का भी समर्थन है। भले ही पर्दे के पीछे हो। नहीं तो किसी की क्या मजाल कि राज्य सरकार, केन्द्र को अंधेरे में रखकर यह अध्यादेश ले आए। वह भी इतने विरोध के बावजूद। इस मामले में केन्द्र राज्य के बीच जरूर कोई तालमेल है। भला बिना तालमेल या खेल के कोई घालमेल हुआ है? क्यों बात जमी के नहीं?