Thursday, July 2, 2020

एेसा गांव है मेरा-2

बस यूं ही
मदद व सेवा जज्बा यहीं तक सीमित नहीं है। गांव के ही रामकरणसिंह झाझडि़या व उनके छोटे भाई विद्याधर झाझडि़या ने तो मास्क बनवाकर पूरी पंचायत में बंटवाने का बीड़ा उठाया है। राजपूत महिलाओं के अलावा मेघवाल समाज की महिलाएं भी मास्क तैयार करने में युद्ध स्तर पर जुटी हुई हैं। जैसे-जैसे मास्क बन रहे हैं, वैसे-वैसे गांव में इनका वितरण किया जा रहा है। खुशी तो इस बात की हुई कि बचपन के साथी नरेन्द्र झाझडि़या की बुजुर्ग मां व बिटिया भी इस काम में पूरे मनोयोग से जुटी हुई हैं। वाकई सहयोग व सेवा का एेसा जज्बा अपने आप में अनुकरणीय है, अनूठा है। मदद की यह भावना गांव तक ही सीमित नहीं है। गांव के लोगों में सेवा और सहायता के संस्कार बाहर भी दिखाई दे रहे हैं। सभी पर जैसे एक ही धुन सवार है कि कैसे भी हो, प्रभावितों की मदद की जाए। कोई भूखा न रहे। जयपुर में भी गांव के लोग इस काम में जुटे हुए हैं। सुबेसिंह झाझडि़या के सुपुत्र कुलदीप तो 29 मार्च से रोजाना तीन सौ.से पांच सौ लोगों को खाना खिला रहे हैं। इस काम में उनकी बुआजी शंकुतला, बुआ का बेटा रवीन बुडानिया, झंझुनूं के नरेन्द्र स्वामी व जयपुर वैशालीनगर के अरुण जी जान.से जुटे हुए हैं। कुलदीप ने बताया कि वो वैशालीनगर की कच्ची बस्तियों व बाइपास के आसपास रोजाना भोजन का वितरण कर रहे हैं। पहले यह लोग बाहर ही खाना तैयार करवा रहे थे। लेकिन अब दो हलवाई स्थायी रूप से रख लिए हैं। इसी तरह स्वतंत्रता सेनानी रामकुमारसिंह शेखावत के पौत्र तथा खेमसिंह शेखावत के सुपुत्र हितेश भी अपने साथियों के साथ जयपुर में जरूरतमंदों को भोजन करवाने में जुटे हैं। इनकी तिरुपति मित्र मंडली के नाम से पंद्रह युवाओं की टीम है। इनमें नौकरीपेशा युवा भी शामिल हैं। यह लोग एक अप्रेल से रोजाना तीन सौ से चार सौ लोगों का भोजन खुद की तैयार करते हैं और इसके बाद इसका वितरण करते हैं। यह लोग हरमाड़ा कच्ची बस्ती, तोड़़ी मोड़, बिडपिपली, कचरा डिपो, ग्रीननगर, बालाजी विहार, आसपास की कुछ फैक्ट्रियों में खाना वितरित करते हैं। यह लोग में दिन में भोजन वितरित करते हैं, वहीं शाम को सेनेटाइजर भी बांट रहे हैं।
इसी तरह सुबेदार मोहरसिंह झाझडि़या की पुत्रवधु तथा भाई धर्मेन्द्र झाझडि़या की धर्मपत्नी स्नेहलता चौधरी जो कि आदर्श जाट महासभा राजस्थान की संगठन महामंत्री हैं, वो भी सेवा के इस काम में अपना योगदान दे चुकी हैं। उन्होंने भी जयपुर की कच्ची बस्ती में जाकर करीब दो सौ जरूरतमंदों परिवारों को भोजन के पैकेट वितरित किए।
खैर,मदद करने वाले हो सकता है और भी हों लेकिन इन.सब का काम मेरी नजर में था, इसलिए आप सब से साझा किया। वाकई यह संकट का समय है। लिहाजा, जो मदद करने में सक्षम है, उसको मदद करनी चाहिए। मुझे गर्व है कि मेरे गांव के लोगों में सेवा, सहयोग व सहायता का जज्बा है। भगवान करे ग्रामीणों की यह नेक भावना हमेशा पुष्पित पल्लवित होती रहे तथा बाकी लोग भी इस काम से प्रेरित होते रहें।

एेसा गांव है मेरा-1

बस यूं ही
बचपन से एक कहानी न जाने कितनी ही बार पढ़ी है। यह कहानी सीख देती है। इसमें एक तरह की प्रेरणा छिपी है। कहानी कुछ इस तरह है कि 'एक बार जंगल में भीषण आग लगी थी। समूचे जंगल में अफरा-तफरा मची थी। वन्य जीव जान बचाने को इधर से उधर भाग रहे थे। हर तरफ भगदड़ मची थी। सबको अपनी-अपनी जान की पड़ी थी। इतने विकट समय में एक छोटी से चिडि़या अलग ही काम में जुटी थी। वह उड़ती और सागर से पानी की बूंद अपने चोंच में भरकर लाती और आग में डालती। वह एेसा लगातार कर रही थी। पेड़ पर बैठा एक बंदर काफी देर से यह सब देख रहा था। आखिरकार उससे रहा नहीं गया और वह चिडि़या के पास आकर हंसते हुए बोला, तू पागल है क्या? इतनी भीषण आग क्या तेरी चोंच के पानी से बुझ जाएगा? क्यों परेशान हो रही है? बंदर की बात पर पलटवार करते हुए चिडि़या न कहा, हां पता है मेरे से आग नहीं बुझेगी लेकिन जब इतिहास लिखा जाएगा तो कालांतर में मेरे प्रयास को तो याद किया जाएगा। कहा जाएगा कि जब सब जानवर अपनी जान की परवाह कर रहे थे, तब चिडि़या इकलौती एेसी थी जो आग बुझाने का प्रयास कर रही थी।' खैर, यह कहानी एक बार फिर प्रासंगिक है। कोरोना वायरस के चलते जहां समूचा जनजीवन ठहरा है, एेसे में चिडि़या की यह कहानी हौसला देती है। उम्मीद जगाती है। जरूरतमंदों की मदद करने को प्रोत्साहित करती है। जरूरतमंदों की सेवा करने वाले भले ही कोरोना पर काबू पाने में सफल न हो लेकिन कोरोना से प्रभावितों की सहायता कर वो एक तरह से चिडि़या जैसा प्रेरणादायी काम ही तो कर रहे हैं। वैसे मददगारों की देश में कमी नहीं है। कोई किसी तरह से तो कोई किसी माध्यम से सेवा में जुटा है। कमोबेश सभी लोग अपने सामर्थ्यनुसार सेवा कार्य में जुटे हैं। मुझे खुशी इस बात है कि इस काम में एक तरह से मेरा पूरा गांव ही जुटा है। कोई सामूहिक प्रयास में अपना योगदान दे रहा है तो कोई व्यक्तिगत रूप से लगा हुआ है। गांव के ही युवा तथा हाल में विधानसभा का निर्दलीय चुनाव लडऩे वाले भाई बबलू चौधरी ने जयपुर में जिला कलक्टर को दो लाख रुपए का चैक दिया। इनमें एक लाख प्रधानमंत्री सहायता कोष तथा एक लाख रुपए मुख्यमंत्री सहायता कोष में जमा करवाए गए। इसी कड़ी में दिवंगत समाज सेवी श्री मंगलचंद जी झाझडि़या के पौत्र तथा विद्याधर झाझडि़या के सुपुत्र मनीष ने समूचे गांव में दवा का छिड़काव करवाकर गांव को सेनेटाइज करने का प्रयास किया गया। मनीष की ओर से गांव वासियों के लिए मास्क भी उपलब्ध करवाए गए।
-क्रमश:

शुक्र है वह लौट आई

बस यूं ही
शाम चार बजे का समय। योगू चीकू दौड़ते हुए आए और बोले, पापा मिन्नी आ गई। सच में मेरी खुशी का ठिकाना न था। सुबह से ही कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मैं चारपाई से सीधा गैलरी की तरफ दौड़ा। वह बिलकुल घबराई एवं डरी सहमी सी नजर आई। पता नहीं एेसा क्या हुआ, हम सब से बिलकुल न डरने वाली मिन्नी एक अनजाने भय से घिरी अजनबी की तरह देख रही थी। पता नहीं उसमें क्या डर बैठा। मैंने उसे छूने का प्रयास किया। प्यार पास से भी बुलाया था लेकिन वो बेसुध सी थी। यकीनन रात के घटनाक्रम से वह सहज नहीं हो पा रही थी। निर्मल ने उसको दूध पिलाया। उसने दूध तो पीया इसके बाद वह इधर-उधर घूमी। उसने सभी जगह को देखा और सूंघा। मैं उसके पास गया। उसको छूने का प्रयास भी किया, पास भी बुलाया लेकिन उसका व्यवहार एकदम से बदला-बदला था। मैंने उसको पुचकारने का भरपूर प्रयास किया लेकिन वह सामान्य नहीं हो पाई। थोड़ी देर बाद वह फिर आंखों से ओझल हो गई। मैंने बार-बार उसको इधर उधर देखा पर वह नहीं मिली। शाम तक वह गायब ही थी। शायद उसका डर दूर नहीं हुआ। खैर, उसका व्यवहार फिर से बदलने का यकीन तो मुझे है लेकिन सबसे बड़ा संतोष यह है कि वह जिंदा है और उसने लौटकर शायद यही बताया भी कि आप चिंता न करें मैं जिंदा हूं। भगवान का शुक्र है सुबह का तनाव शाम-शाम होते दूर हो गया था। मिन्नी लौट आई .

काश, मिन्नी लौट आए!

बस यूं ही
देर रात बिल्लियों की झगडऩे की आवाज को अनसुना करने का अपराध बोध मुझे अब कचोट रहा है। बार-बार बस एक ही ख्याल पछतावे का एहसास करा जाता है। काश, रात को मैं उठकर बाहर आकर गैलरी में देख लेता तो शायद वो नहीं होता जो मंगलवार सुबह आखों ने देखा। निर्मल भी आज रसोई की खिड़की को बार-बार देख रही है। रोज की तरह कटोरी में दूध रखा हुआ है लेकिन खिड़की में बैठकर दूध पिलाने के लिए वह मासूम सी म्याऊं-म्याउं वाली पुकार गायब है। जी हां पिछले दस दिन में वह हम सबसे कितनी घुलमिल गई थी। हम सब की चहेती बन गई थी। यूं समझिए कि परिवार का हिस्सा बन चुकी थी। क्या बच्चे और क्या बड़े, वह किसी से भी नहीं डरती थी। वह मस्ती करती, खूब खेलती और प्यार से गुर्राती भी। सच में हम सब के लिए एक खिलौना थी। लॉकडाउन की बंदिशों के चलते हम सब के लिए वह मनोरंजन का हिस्सा बन चुकी थी। वह देखकर पास आती है और फिर इस उम्मीद से कदमों में लेट जाती है कि उसके शरीर पर हाथ फिराए। इसको हाथ फिराना सुकून देता था। बच्चों के साथ तो वह जमकर मस्ती करती थी। गेंद के साथ उनसे घंटों खेलती। सुबह निर्मल को झाडू लगाते वक्त वह बार-बार आगे आ जाती, गोया कह रही हो यह बंद कर दो और उसको पुचकार दो। वह गुस्से में झाडूू को मुंह में दबा भी लेती थी। उसकी अठखेलियां भी गजब की थी। कार्टन के ऊपर रखी दरी के ऊपर चढऩा, उसके अंदर जाकर छिपना, फिर एक पैर बाहर निकालना कितना सुकून देता था। उसकी उपस्थिति भर से ही घर में रौनक थी। मैं तो दिन में न जाने कितनी बार बाहर आकर उसके पास बैठकर उसको सहलाता रहता।
वैसे जीवों से लगाव शुरू से ही है। बचपन में गाय, बकरी व भैंस सभी से वास्ता पड़ा। गाय का बछड़ा हो या बकरी का बच्चा, या भैंस का बच्चा। जब भी उनको बेचा जाता मैं दिन भर रोता। बचपन में एक दर्जन के करीब कुत्ते भी पाले। उनके मरने पर भी जार-जार रोया। श्रीगंगानगर में तो चार-पांच कुत्ते इतने घुलमिल गए थे कि रात को दो बजे भी आता तो दौड़ कर पैरो में लौट जाते। जीवों के प्रति इसी प्रेम ने मुझे बेहद संवेदनशील और अंदर से बेहद कमजोर बना दिया है। तभी तो बिल्ली के इस मासूम बच्चे के लिए सुबह से रोए जा रहा हूं। सुबह जैसे ही निर्मल ने बाहर बुलाया और गैलरी का नजारा दिखाया तो मैं अनिष्ट की आशंका से सहम गया। जगह-जगह बिखरे बाल तथा फर्श व दिवारों पर लगा मल मूत्र उस मासूम के संघर्ष की कहानी को बयां को कर रहा था। मैं कभी कूलर के पीछे तो कभी दरी के पीछे, कभी उस कार्टन के अंदर तो कभी जूतों के स्टेंड के पीछे बदहवास से उसका तलाशता रहा कि काश वो कहीं पर बैठी हुई दिखाई दे जाए लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी। फिर भी दिल यह मानने को तैयार नहीं है, कुछ गलत हुआ है। उम्मीद है वह मासूम डर के मारे कहीं दुबकी हो। काश यह उम्मीद सही हो जाए। मैंने उसे प्यार से नाम दिया था मिन्नी। काश मिन्नी लौट आए। सच में सुबह से घर के सभी लोग बहुत उदास है। लौट आओ मेरी बिल्लो रानी।

लॉकडाउन कथा-1

बस यूं ही
जीवन में जब कुछ अलग हट कर होता है, अनूठा होता है, अजूबा होता है या फिर उल्लेखनीय होता है तो उसका उल्लेख करना तो बनता ही है। कोरोना वायरस भी एक तरह का अजूबा ही है। अचंभा है। मुआ जब से देश में आया है इससे बावस्ता न जाने कितने ही किस्से, कहानियां, परेशानियां आदि शुरू हो गए। कोई इससे अछूता नहीं है। कल तक जो कहते फिरते थे, मेरे बिना तो काम ही नहीं चलता। वो भी आज लॉकडाउन के चलते घर में कैद होकर काम चलता हुआ देख रहे हैं। खैर, लगातार पन्द्रह दिन घर में बिताने के बाद आज सहसा मुझे भी यह ख्याल आया कि क्यों न इस पखवाड़े भर के अनुभव को कलमबद्ध कर सबसे साझा किया जाएगा। इसमें वो सब बातें शामिल होंगी जो प्रत्यक्ष महसूस की या अप्रत्यक्ष रूप से जानी या सुनी । जीवन की सबसे बड़ी सीख तो यही मिली कि चाहे कुछ भी हो जाए, जिदंगी कभी रुकती नहीं। कल तक सड़कों पर दौड़ रही थी, आज बंद कमरों में रेंग रही है, मगर चल रही है। जीवन चलने का नाम है, लिहाजा रुक या थम सकता भी नहीं। उदरपूर्ति के लिए हाथ-पैर तो हिलाने ही पड़ेंगे। हमको भी 20 मार्च तक तो पता नहीं था कि आगे यह होने वाला है, वरना हम भी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए कुछ अग्रिम तैयारी कर लेते लेकिन आम भारतीय की जैसी धारणा है, वैसी ही हमारी रही और तनिक भी गंभीरता से न लिया न सोचा। लेते भी कैसे, सोचा भी न था एेसा होगा। पहली चिंता तो यही थी कि बीस साल से जो काम आफिस जाकर कर रहे थे, वह घर से कैसे होगा। बस इसी उधेड़बुन में फंस कर रह गए। वैसे बीस मार्च को मामले की गंभीरता को समझ जाते तो काफी परेशानियों से बच सकते हैं, लेकिन एेसा हो न सका और चपेट में आ गए। खैर, पन्द्रह दिन का अनुभव ज्यादा तो नहीं फिर भी कुल मिलाकर सबक देने वाला, कुछ सीखने वाला ही रहा है। कहा भी कहा गया है आवश्यकता आविष्कार ही जननी है। इसी बात को दूसरे शब्दों में समझा जाए तो मरता क्या न करता। जब खुद पर पड़ती है तो रास्ता खुद ब खुद बनाना ही पड़ता है।

मैं पत्थर हूं

मैं पत्थर हूं मेरे सिर पे यह इल्जाम आता है।
कभी भी आइना टूटे, मेरा ही नाम आता है।
दो जून की रोटी के वास्ते, जूझता है जो रोज
उसकी किस्मत में यारों, कब आराम आता है।
चर्चाओं में सदा शामिल रहे खास ही यारो
किसकी जुबां पर भला कब आम आता है।
पैसे की कदर उस गरीब से पूछिए कभी
हाड़तोड़ मेहनत से जब घर में दाम आता है।
ख्वाहिश, हकीकत में जब बदली है 'माही'
जैसे रिन्द के हिस्से में कोई जाम आता है।

इंसानियत

कथा
कोरोना महामारी के चलते लगे कर्फ्यू का आज दसवां दिन था। रसोई घर में सब्जी खत्म हो चुकी थी। श्रीमती जोशी ने रसोई से ही पति को आवाज दी, अजी सुनते हो, जरा बाजार तक हो आना, आज सब्जी बनाने के लिए कुछ नहीं है। श्रीमती की आवाज सुनकर टीवी पर नजर गड़ाए बैठे पुरुषोत्तम जोशी झट से खड़े हो गए। जल्दी में कुर्ता पहना, खूंटी पर टंगा थैला उठाया और चलते-चलते ही चप्पल पहनी और अपने स्कूटर की तरफ लपके। करीब तीन दशक से साथ निभा रहा स्कूटर आज भी पहली किक में ही स्टार्ट हो गया। जोशी जी ने हेलमेट पहना और निकल पड़े सब्जी मंडी की ओर। अभी घर से दो किमी ही चले होंगे कि एक पुलिसवाले ने रोक दिया। कहने लगा कर्फ्यू लगा है आप आगे नहीं जा सकते। जोशी जी ने उससे बहुत मिन्नतें की लेकिन पुलिसवाला टस से मस नहीं हुआ। बुझे मन से पुरुषोत्तम जोशी जी ने अपना स्कूटर वापस मोड़ लिया। वो बामुश्किल आधा किलोमीटर ही चले होंगे कि सड़क किनारे हरी सब्जियों से भरा मिनी ट्रक खड़ा दिखाई दिया। उसे देख जोशी जी की आंखों में चमक आई और वो बड़ी उम्मीद से मिनी ट्रक की तरफ बढ़े। मिनी ट्रक की केबिन में दाढी वाले व कुर्ता सलवार पहने दो अधेड़ सुस्ता रहे थे। जोशी जी ने उनको आवाज लगाई।
भाईसाहब सब्जी है क्या?
अंदर से आवाज आई, सब्जी तो है लेकिन यह किसी की अमानत है।
जोशी जी- अमानत से मतलब?
ट्रक वाला- अरे भाईसाहब यह ट्रक सब्जी मंडी जाएगा। यह सारी सब्जी बिकी हुई है।
जोशी जी- भाई कुछ तो तरस खाओ। दस दिन से घर में कैद हैं। मुझे मोहल्ले की नहीं अपने घर के लिए सब्जी चाहिए।
ट्रक वाला- भाईसाहब, माफ करें हम आपको सब्जी नहीं दे सकते। हमारे पास तौलने को न बाट है ना ही कोई कांटा। और हमने आपको सब्जी दे भी दी तो यह अमानत में खयानत होगी।
जोशी जी- अरे भाई यह अमानत में खयानत कैसी? यह तो सेवा है। संकट के समय में सेवा करना तो एक तरह का पुण्य ही है।
ट्रक वाला जोशी जी की बात पर थोड़ा गंभीर हुआ। वह केबिन से बाहर आया और ट्रक में रखी सब्जी में दो घीया, मुट्ठी पर भिंडी, मुटठी पर हरी मिर्च व पालक की एक पुली जोशी जी के थैली में रख दी। यकायक यह सब देख जोशी जी चौंके। फिर जेब टटोल कर पर्स निकाला। उसमें सौ रुपए का नोट निकालते हुए ट्रक वाले की तरफ बढ़ाया। यह सब देख ट्रक वाले ने हाथ जोड़ दिए। बोला, भाईसाहब पैसे देकर आप मुझे पाप का भागीदार बना रहे हैं। पैसे लेने का मतलब तो अमानत में खयानत ही हुई ना।
काफी देर तक जोशी जी सोच में डूबे ट्रक वाले का मुंह ताकते रहे। फिर सिर को झटका देकर सामान्य होते हुए ट्रक वाले को धन्यवाद देकर चल पड़े। जोशी जी के जेहन में सवाल जरूर आ रहे थे ना जान, ना पहचान...अजनबी होते भी उसने दर्द को.समझा। ऐसे ही लोगों के दम पर तो इंसानियत जिंदा है। यही तो होती है सच्ची इंसानियत।

बस सुरक्षित होने का संतोष ही दे रहा है राहत

जोधपुर। 'हम सब घरों में कैद हैं। सड़कों पर सन्नाटा पसरा है। बाजार व दुकानें सब बंद हैं। बसों एवं रेलों का संचालन भी प्रभावित है। हर तरफ कफ्र्यू सा लगा है। इस कारण हम काम पर भी नहीं जा पा रहे हैं। रोजी रोटी का संकट बढ़ गया है। वाकई हालत खराब है। डर भी है लेकिन संतोष केवल इस बात का है कि हम सुरक्षित हैं। हमारी चिंता परिजनों को भी है लेकिन एेसे में किया भी क्या जा सकता है। तीन अप्रेल तक तो ऐसे ही रहना होगा।' यह दर्द अकेले कमल बुंदेला का नहीं वरन उन सैकड़ों राजस्थानियों का है, जो अपने वतन से दूर इटली में रोजी रोटी के लिए गए हुए हैं। झुंझुनूं जिले में बगड़ कस्बे के कमल बुंदेला इटली के नेपल्स के पास नापोली में रहते हैं। इटली में अभी कोरोना वायरस ने तांडव मचा रखा है। एतियातन लिए गए फैसलों के चलते वहां काम धंधे बुरी तरह से प्रभावित हैं। विशेषकर होटल व रेस्टोरेंट व्यवसाय लगभग बंद होने से अधिकतर भारतीय वहां बेरोजगार हो गए हैं। अभी यह लोग आपस में एक दूसरे से मांग कर या उधारी से काम चला रहे हैं। झुंझुनूं जिले के सुलताना कस्बे के प्रभुसिंह भी इटली में लंबे समय से काम कर रहे हैं। वो अभी छुट्टियां बीता कर फरवरी में इटली गए। उन्होंने बताया कि उनके यहां कोरोना वायरस का असर कम है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। केहरपुरा कलां गांव के सतपालसिंह भी इटली में ही हैं। उनका कहना था कि यहां मार्केट, पार्क व स्कूल सब बंद हैं। मास्क एवं दस्ताने पहनना जरूरी है।
अब फोन ही सहारा
नापोली में भारत के करीब 125 लोग कार्यरत हैं। इनमें अधिकतर झुंझुनूं के हैं। यह लोग छुट्टी के दिन पार्क में एकत्रित होते और एक दूसरे का हाल जानते हैं। कोरोना वायरस के चलते अब सबका मिलना जुलना बंद है। केवल फोन पर ही एक दूसरे का हाल जानते हैं। एक मोटे अनुमान के तौर पर इटली में अकेले झुंझुनूं जिले से एक हजार से ऊपर लोग काम करते हैं। इनमें झुंझुनूं, बगड़, चिड़ावा, सूरजगढ़, सिंघाना, इक्तावरपुरा आदि के काफी युवा वहां काम करते हैं। हरियाणा के लोहारू, चूरू के राजगढ़ व सुजानगढ़ व नागौर जिले के भी काफी युवा इटली में हैं।
सुरक्षा के कड़े प्रबंध
कोरोना से बचाव के लिए इटली में कड़े प्रबंध किए गए हैं। लोगों की आवाजाही रोक दी गई है। कोरोना के मरीज उत्तरी इटली में ज्यादा है। दक्षिणी इटली मंे इसका प्रभाव कम है। एहतियात शुरू में नहीं बरती गई, इस कारण इसका फैलाव ज्यादा हुआ। अब तो कदम-कदम पर सुरक्षा बरती जा रही है। जरूरी सामान की दुकानें कुछ समय के लिए खुलती हैं। व्यवस्था के लिए यहां पुलिस तैनात है जो कि दुकानों पर सबको कतार से खड़ा करवाती है। किसी को बाहर जाना होता है एक फार्म भरना होता है, जिसमें घर से बाहर जाने की वजह लिखनी होती है। गलत जानकारी भरने पर जुर्माने व जेल का प्रावधान है।
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राजस्थान पत्रिका के बीस मार्च के अंक में जयपुर, जोधपुर सहित प्रदेश के अधिकतर सिटी संस्करणों में प्रमुखता से प्रकाशित 

कोरोना से भी घातक भ्रांतियां-अफवाहें!

कोरोना वायरस की भयावहता को दरकिनार कर जिस तरह सोशल मीडिया पर इसका मजाक उड़ाया जा रहा है वह बेहद चिंताजनक है। इन दिनों सोशल मीडिया के हर प्लेटफार्म पर कोरोना से संबंधित पोस्ट पलक झपकते ही जबरदस्त तरीके से वायरल हो रही है। इन पोस्टों में क्या सही है और क्या गलत है, इसका नापने या जांचने का कोई पैमाना नहीं है। फिर भी लोग इनको आंख मूंद कर वायरल करने में जुटे हैं। जिस के पास जो आ रहा है, वह आगे से आगे फारवर्ड हो रहा है। कोरोना वायरस की गंभीरता को नजरअंदाज कर हजारों तरह के चुटकले बन चुके हैं। बचाव के तरह-तरह के तरीके बताए जा रहे हैं। सुझाव व सावधानी बताने वालों का तो कहना ही क्या। लब्बोलुआब है कि यह सोशल मीडिया पर कोरोना को लेकर मुफ्त का कथित ज्ञान भरपूर बंट रहा है। इन पोस्टों में अधिकतर भ्रांतियों एवं अफवाहों से जुड़ी हैं। सर्वविदित है कि अफवाहें और भ्रांतियां बहुत तेजी से फैलती हैं। फिलवक्त यह अफवाहें एवं भ्रांतियां अपने चरम पर हैं। कोरोना को लेकर वायरल इन अफवाहों व भ्रांतियों से एक अनजाना भय भी फैल रहा है, जो लोगों को डरा रहा है। माना कोरोना वायरस खतरनाक है लेकिन इसको लेकर सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा डर तो और भी खतरनाक है। कई तरह के डरों व आशंकाओं से घिरे लोग फिलहाल असमंजस में हैं। उनको क्या करना है और क्या नहीं, यह भी ठीक से सोचते नहीं बन रहा है। यह सही है कि सरकारी स्तर पर कोरोना के प्रति सावधान रहने व जागरूकता बरतने का प्रचार-प्रसार व्यापक स्तर पर किया जा रहा है लेकिन सोशल मीडिया का यह मुफ्त ज्ञान, सरकारी प्रचार-प्रसार पर भारी पड़ रहा है। हालांकि कुछ स्थानों पर अफवाह फैलाने वालों पर कार्रवाई हुई है लेकिन सोशल मीडिया के बेलगाम घोड़े के आगे यह कार्रवाई ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। कोरोना को लेकर सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही इन भ्रांतियों व अफवाहों पर तत्काल अंकुश लगाने की आवश्यकता है ताकि देश में बना भय का वातावरण कम हो और लोग भयभीत न हो। सोशल मीडिया यूजर को भी इस तरह की भ्रामक व फेक पोस्टों को आगे से आगे फारवर्ड करने से बचना चाहिए। उनको इस तरह की पोस्टों को बढ़ावा कतई नहीं देना चाहिए। हम सब अगर अधिकृत संस्थान या सरकारी स्तर पर दी जाने वाली जानकारी पर ही विश्वास करेंगे तो यकीनन डर काफी हद तक खत्म होगा।
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राजस्थान पत्रिका के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ संस्करण में बीस मार्च के अंक में प्रकाशित ..

सरकारी धन का दुरुपयोग!

शहर में सौन्दर्यीकरण के काम करवाने का फैसला लगता है कि नगर विकास न्यास के अधिकारी अपने स्तर पर और मनमर्जी से तय करते हैं। इन कामों का शहर व जनता को फायदा होगा या नहीं, इसका भी ख्याल नहीं रखा जाता।
न्यास की ओर से हाल ही करवाए गए कई कामों को देखकर तो ऐसा ही लगता है। बात चाहे शिव चौक से जिला अस्पताल तक सर्विस रोड बनाने की हो या इसी मार्ग पर बने डिवाइडर पर रेलिंग लगाने की। इन दोनों कामों में सिवाय सरकारी पैसे के दुरुपयोग के अलावा कुछ नहीं हुआ और पैसे लगाने का मकसद भी सफल नहीं हो पाया। सरकारी पैसे का ऐसा ही दुरुपयोग अब सूरतगढ़ रोड से वृद्धाश्रम रोड पर हो रहा है। वहां पिछले साल बनाए गए डिवाइडर को तोडक़र रेलिंग लगाई जा रही है। न्यास के अधिकारियों को डिवाइडर बनाते वक्त रेलिंग लगाने का ख्याल नहीं आया। इससे समझा जा सकता है कि न्यास में ऐसे अधिकारी बैठे हैं, जो एक साल आगे तक की सोच भी नहीं रखते। इस काम से सौन्दर्यीकरण कैसा होगा मतलब वह कैसा दिखाई देगा, इसका भी कोई दावा नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि शिव चौक पर लगी आधी अधूरी रेलिंग आज भी न्यास की कार्यकुशलता पर सवाल उठा रही है।
भले ही इस मामले में जिला कलक्टर फीडबैक लेने या जांच करवाने की बात कहें लेकिन नगर परिषद व नगर विकास न्यास की कारगुजारियों से वो अनजान हों, ऐसा संभव नहीं है। शिव चौक से जिला अस्पताल के मार्ग पर हर साल सडक़ पर लगने वाला तिब्बती मार्केट, प्रत्येक संडे को वाहनों की बिक्री, सडक़ पर रेत और बजरी का खुलेआम कारोबार तथा इसी मार्ग पर ट्रक व ट्रैक्टरों की अवैध पार्र्किंग उनको दिखाई नहीं देती। जांच करवाना है या फीडबैक लेना है तो इस काम में गंभीरता बरती जानी चाहिए। अगर औपचारिकता के लिए ही जांच करनी है तो फिर उसका कोई मतलब नहीं। जिला कलक्टर की तरफ से संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों के बीच कड़ा संदेश जाना चाहिए, उन पर कड़ी कार्रवाई हो ताकि इस तरह के अव्यवहारिक व अदूरर्शिता से भरे काम न हों।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में तीन मार्च के अंक में प्रकाशित....

संभावनाओं पर टिका है सरहद के मुनाबाव व हिंदुमलकोट रेलवे स्टेशन का भविष्य

भारत-पाक विभाजन के साक्षी रहे दो रेलवे स्टेशनों एक श्रीगंगानगर जिले का हिंदुमलकोट है तो दूसरा बाड़मेर का मुनाबाव। दोनों आजादी से पहले के हैं और विभाजन के बाद 18 साल तक आबाद रहे। इनमें मुनाबाव फिर आबाद हुआ लेकिन हिंदुमलकोट वीरान ही रहा। हालांकि, सात माह से मुनाबाव स्टेशन बंद है। सुखद बात यह है कि मुनाबाव के फिर शुरू होने व हिंदुमलकोट के पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने की संभावना है। इन रेलवे स्टेशनों को लेकर पत्रिका की विशेष रिपोर्ट।
फिर छा सकता है हिंदुमलकोट
श्रीगंगानगर. हिंदुमलकोट रेलवे स्टेशन का अतीत समृद्ध रहा है। विभाजन से पहले हिंदुमलकोट बीकानेर रियासत की महत्वपूर्ण मंडी थी। यहां के व्यापारिक रिश्ते बहावलपुर, कराची, लाहौर व क्वेटा से लेकर अफगान, काबुल व कंधार तक थे। ब्रिटिश काल में बम्बई-दिल्ली को कराची से जोडऩे वाले 3 रेल मार्गों में से एक रेलमार्ग दिल्ली से बहावलपुर जाता था, जो बठिंडा और हिंदुमलकोट होकर गुजरता था। भारत-पाक के बीच 1965 के युद्ध के बाद पाकिस्तान क्षेत्र में रेल पटरियां उखाड़ ली गई। इसके बावजूद बठिंडा-दिल्ली रेल 1969 तक भारतीय सीमा तक आवागमन करती रही। 1970 में रेलवे स्टेशन को सीमा से 3 किमी दूर स्थानांतरित कर दिया।
हो चुके कई प्रयास
चौकी को पर्यटन स्थल बनाने के लिहाज से वर्ष 2008 से 2012 तक काम हुआ। तत्कालीन बीएसएफ कार्यवाहक समादेष्टा आरके अरोड़ा व कलक्टर आशुतोष एटी पेडणेकर ने बीएडीपी में काम करवाए। वाघा-हुसैनीवाला की तर्ज पर भारत-पाकिस्तान की झंडा उताने की रस्म शुरू करने का प्रस्ताव सिरे चढ़ता नहीं लगा तो इसे इकतरफा शुरू करने पर भी विचार हुआ, लेकिन योजना सिरे नहीं चढ़ी।
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श्रीगंगानगर, बीकानेर व बाडमेर संस्करण में 17 फरवरी के अंक में प्रकाशित....

बातों से नहीं बनेगी बात




टिप्पणी
पुरानी कहावत है कि लातों के भूत बातों से बात नहीं मानते। श्रीगंगानगर के सदंर्भ में यह कहावत सटीक बैठती है। मामला चाहे प्रशासनिक स्तर का हो चाहे जनप्रतिनिधियों का, वो बयानों की बारिश ज्यादा करते हैं और बात कोई मानता नहीं। ऐसा इसलिए, क्योंकि काम में कोताही करने वालों पर कार्रवाई के बजाय निर्देश देकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है। प्रशासनिक अधिकारियों के निर्देश भी तो एक तरह की बात ही है। बात इसीलिए क्योंकि न तो मातहत इनको गंभीरता से लेते हैं और न ही अव्यवस्था में कोई सुधार नजर आता है। वैसे भी अधिकारी अपने मातहतों को अक्सर निर्देश ही जारी करते हैं। ज्यादा हुआ तो मौका-मुआयना। जनप्रतिनिधि थोड़ा आगे बढ़कर धरना प्रदर्शन कर देते हैं। मंगलवार को जिला कलक्टर ने शहर की सड़कों की मरम्मत तथा नालों की सफाई के निर्देश दिए। मतलब, उन्होंने औपचारिकता निभा दी। इधर, नगर परिषद आयुक्त ने शहर में जहां गंदा पानी सड़कों पर फैला है, वहां निरीक्षण किया और अधीनस्थों को नाले की सफाई करने की हिदायत दी। इतना ही नहीं सतारुढ़ बोर्ड के पार्षद ने तो धरना देकर अपनी जिम्मेदारी निभा दी।
खैर, इस तरह के निर्देशों, निरीक्षणों एवं प्रदर्शनों के बावजूद समस्या यथावत रहती है तो समझा जा सकता है, समस्या कहां है और क्यों हैं। लंबे समय से वहीं अधिकारी, मातहत भी वो ही हैं तो फिर निर्देशों व निरीक्षणों की औपचारिकता किसलिए? इन निर्देशों से शहर का भला नहीं होने वाला। अब तो जो जिस अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार है, उस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। जब तक कार्रवाई नहीं होगी, व्यवस्था में बदलाव नहीं होगा, जिम्मेदारों के चेहरों में फेरबदल नहीं होगा, तब तक शहर का भला नहीं होगा। वैसे भी जिम्मेदारों को भली-भांति पता है कि बातों से शहर का भला नहीं होने वाला, क्योंकि उनको सबसे मुफीद यही बातें (निर्देश-निरीक्षण ) ही तो लगती हैं। बात सोचने की है क्योंकि बातों से अब बात नहीं बनने वाली। जिम्मेदार अब तक शहरवासियों को 'बातों' की चाश्नी में डूबे दिलासे देते रहे हैं। उम्मीद है यह सिलसिला अब थमेगा।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर के 13 फरवरी 20 के अंक में प्रकाशित ....

धैर्य की परीक्षा न ले सरकार!

पीड़ा
रतनशहर। जी हां रतनशहर। मेरा सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन। मेरे गांव से इसकी दूरी बामुश्किल आठ या नौ किलोमीटर ही होगी। इस स्टेशन से मेरी बचपन की यादें जुड़ी हैं। मां के साथ ननिहाल जाता तो रतनशहर से लोहारू की ट्रेन पकड़ते। जयपुर जाना हो या दिल्ली, रतनशहर से आकर ही ट्रेन पकड़ी। नवलगढ़ कॉलेज में दाखिला लिया तो रोजाना अपडाउन भी ट्रेन से ही हुआ। आज रतनशहर ही याद इसलिए आई क्योंकि यहां एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव खत्म कर दिया गया है। आमान परिवर्तन से पहले जब यहां मीटर गेज लाइन थी तब यहां सभी ट्रेन रुकती थी। लोकल हो चाहे एक्सप्रेस। सभी का ठहराव इस स्टेशन पर होता था। इसकी प्रमुख वजह यह भी है कि आसपास के काफी गांवों व ढाणियों का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन यही है। बगड़ साइड के लोग हो या इस्लामपुर की तरफ से। दोनों ही क्षेत्रों के काफी लोग रतनशहर आकर ही ट्रेन पकड़ते रहे हैं। लंबे इंतजार के बाद आमान परिवर्तन हुआ। मीटर गेज से ब्रॉडगेज बनी। लोगों ने मेह (बारिश ) की तरह इस काम के पूरा होने का इंतजार किया। सभी का सपना था कि छोटी से बड़ी ट्रेन में बैठा जाए। साथ ही जयपुर व दिल्ली की यात्रा कम समय व कम पैसे में हो। इंतजार खत्म हुआ लेकिन ट्रेन नहीं चली। जो चली वह तीन दिन के लिए। हालिया दिनों में दो एक्सप्रेस भी चली लेकिन उसका ठहराव रतनशहर नहीं है। यह क्षेत्र के लोगों के साथ धोखा है। इतने इंतजार के बाद ठहराव खत्म की खबर निसंदेह झटका देने वाली है। ब्रॉडगेज बनने के बाद भी रेल की रफ्तार में ज्यादा सुधार नहीं है। फिर भी ठहराव खत्म कर दिया है। शायद रेलवे को ध्यान नहीं है, सवारियों के मामले में रतनशहर स्टेशन, झुंझुनूं के समकक्ष है। बगड़ के पाबू धाम की मान्यता बढऩे के बाद तो रतनशहर पर इतनी सवारियां आने लगी कि एक पूरी ट्रेन इसी स्टेशन से भर जाए। लब्बोलुआब यह है कि राजस्व के मामले में रतनशहर स्टेशन झुंझुनूं जिले के किसी भी स्टेशन से कम नहीं है।
बहरहाल, इस स्टेशन पर एक्सप्रेस ट्रेनों के ठहराव की मांग को लेकर जागरूक लोग पांच फरवरी से क्रमिक अनशन पर बैठे हैं। धीरे-धीरे इस आंदोलन से जुडऩे वाली की संख्या बढ़ रही है। चूंकि मैं भी इसी क्षेत्र का हूं, इसलिए मेरा भी इस आंदोलन को पूरा समर्थन है। प्रदर्शन करने वालो की प्रमुख मांग यहां से गुजरने वाली कोटा-हिसार व जयपुर- सराय रोहिल्ला एक्सप्रेस ट्रेनों के ठहराव की है। आंदोलनकारियों ने वैसे पांच मार्च तक क्रमिक अनशन की घोषणा कर रखी है। इसके बाद उनकी मांगों को नहीं सुना गया तो यह लोग आमरण अनशन करेंगे। चूंकि रेल केन्द्र का मामला है। इसलिए स्थानीय सांसद को इस मामले में प्राथमिकता से दिलचस्पी दिखानी चाहिए। वो सत्तारुढ़ दल के हैं। हो सकता है, कहीं उनको इस बात की आशंका हो कि रतनशहर का समर्थन करने से कहीं वो लोग भी आवाज न उठाने लग जाएं, जिनके स्टेशनों पर ठहराव खत्म हो गया। सांसद की आशंका गलत भी नहीं है। एक्सप्रेस एवं लोकल का अंतर होता है, होना भी चाहिए लेकिन रतनशहर का मामला अलग है। वह अपवाद भी हो सकता है। क्योंकि जहां ठहराव खत्म किया गया है वो स्टेशन, रतनशहर के समकक्ष नहीं है। न सवारियों के मामले में, न इतने गांव-ढाणियों से जुड़ाव के कारण। और रतनशहर का राजस्व भी कम नहीं है। इतना सब कुछ है तो फिर लोगों के धैर्य के परीक्षा क्यों ली जा रही है। यह सरासर नाइंसाफी है। अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे लोगों की बात को न केवल सुनना होगा बल्कि उन पर गौर भी करना होगा। यह जनहित से जुड़ा मामला है। इसको राजनीतिक चश्मे से भी बिलकुल नहीं देखना चाहिए। सभी दलों.को दलगत भावना से ऊपर उठकर इस मांग का समर्थन करना चाहिज। यह जायज मांग है। इसका जितना जल्दी हो, समाधान होना चाहिए। मैं तो इतना कहूंगा कि न केवल इन दो एक्सप्रेस ट्रेनों बल्कि भविष्य में जितनी भी एक्सप्रेस ट्रेन यहां से चले उन सबका ठहराव रतनशहर होना चाहिए। आखिर में एक बार और। लोकतंत्र में सरकार अगर सिर गिनकर ही काम करती है तो कोई बड़ी बात नहीं यहां भी सिर जुट जाएं। भले आंदोलन में.जुटें या चुनाव में। उनकी उचित मांग को लंबे समय तक लंबित रखना एक तरह का अन्याय ही है।.साथ ही सहनशील व जागरूक लोगों के धैर्य की परीक्षा भी। सरकार से गुजारिश है कि वो अब और परीक्षा न ले।

यह रिश्ता क्या कहलाता है

बस यूं ही
कॉलेज के जमाने में फिल्म देखी थी तेरी मेहरबानिया। फिल्म में कुत्ते के मालिक की हत्या कर दी जाती है और बाद में कुत्ता अपने मालिक की हत्या का बदला लेता है। सच में इस फिल्म के सीन देखकर कई बार भावुक हुआ था। कुत्ते की प्रति पूरी सहानुभूति थी। वैसे भी जीवों से मुझे बेहद प्यार है। इनमें कुत्ता भी शामिल है। बचपन में कम से कम दस कुत्ते पाले लेकिन कोई जिंदा नहीं बचा। उनके मरने पर खूब रोता था। तब मां दिलासा देती थी, बेटा तू पाला मत कर, आवारा कुत्तों को ही अपना समझाकर। बस फिर कुत्ते पालना छोड़ दिए लेकिन कुत्तों को पुचकारने का क्रम कभी नहीं टूटा। श्रीगंगानगर में तीन कुत्तों से एेसा रिश्ता बना कि रात को दूर से ही गाड़ी की लाइट से वह जान जाते और अपनी जगह से खड़े होकर मेरी अगवानी करते। जैसी ही कार रुकती कोई शीशे पर पैर लगाकर खड़ा हो जाता तो कोई बोनट पर पंजे रख देता। जैसे ही मैं कार से बाहर निकलता वो पैरों मंे लोट जाते। वैसे कुत्ता वफादार होता है, उसके कई किस्से व कहानियां आपने भी पढ़ी व सुनी होंगी लेकिन मैंने तो कुत्तों की स्वामीभक्ति एवं वफादारी को साक्षात देखा व महसूस किया है। यह कुत्तों से प्रेम की नतीजा है कि जब कोई कुत्तों को मारता है या उन पर पत्थर फेंकता है तो मुझे बड़ा गुस्सा आता है। कई बार दोस्तों के हाथ से पत्थर गिरवाया भी है, यह कहते कि आप का क्या लेता है। क्यों मार रहे हो। जीवों के प्रति दया का यह भाव मां से ही संस्कार में मिला। मां कहती थी, कुत्ता तो बिना झोली का फकीर है। यह तो अपने कान के बराबर रोटी का टुकड़ा खाकर भी संतोष कर लेता है। यह बात दीगर है कि मुझे कुत्तों से डर भी लगता है, क्योंकि बारहवीं में था तब एक कुत्तिया ने काट लिया था। भले ही डरता रहूं लेकिन कुत्तों को मैंने शायद ही कभी मारा हो।
दरअसल, यह सारी भूमिका बांधने की जरूरत इसलिए पडी कि पिछले डेढ़ माह से जो देखा, वो भी जीव प्रेम की जीती जागती नजीर ही था। एक आवारा कुत्त्ता ससुर जी चहेता कब बना पता नहीं। वह उनके घर आकर बैठने लगा। कुत्ता दमदार था। रात को उसके रहते गली से गुजरना किसी के लिए आसान नहीं था। कोई दूसरा कुत्ता वहां से गुजरे यह तो उसको किसी भी सूरत में गंवारा नहीं था। मैं जब श्रीगंगानगर से जोधपुर आया तब ससुराल ही ठहरा। तब यह कुत्ता बीमार था। घर से बाहर दिन भर लेटा रहता। ससुर जी रात को उसको कपड़ा ओढ़ाते। इसको गोद में लेकर दूसरी करवट लिटाते। सुबह उसको दूध पिलाते। यह क्रम रोज का हिस्सा था। दो युवतियों का दिल भी कुत्ते की इस हालात पर पसीजा। वो भी बीच-बीच में आकर कुत्ते के जख्मों पर दवा लगाकर जाती। लगातार लेटे रहने से कुत्ते के शरीर पर कई जगह जख्म हो गए थे। कुत्ते की हालात में सुधार न देख ससुरजी चिंतित थे, हालांकि उनको एहसास हो गया था कि कुत्ता अब चंद दिनों का मेहमान है। बीच में एक शादी के सिलसिले में वो जोधपुर से बाहर गए तो चिंतित थे, कहने लगे मेरे जाते ही यह मर जाएगा। इसको कौन संभालेगा। खैर, वो वापस लौटे लेकिन कुत्ता जिंदा था। एक दिन कुत्ते को करवट बदलवाते वक्त वो गिर भी गए। हाथों पर खरोंच भी आई लेकिन उनकी सेवा में कोई कमी नहीं आई।
इन सब के बीच रविवार की एक घटना ने मुझे चौंका दिया। मरणासन्न कुत्ते के पास एक बुजुर्ग महिला बैठी थी। धर्मपत्नी ने बताया कि वह कुत्ते को गीता सुना रही है। मैं कई देर तक घर की बालकॉनी से उस महिला को देखता रहा। पहले वह जमीन पर बैठी थी। इसके बाद मैं पास जाकर भी उसको देखकर आया। महिला के हाथ में गीता थी थी और वह जोर-जोर से उच्चारण कर रही थी। आप यकीन नहीं करेंगे, करीब पांच घंटे तक वह महिला गीता पाठ करती रही। पहले वो जमीन पर बैठी थी। बाद में उनको पड़ोसी घर वालों ने कुर्सी दे दी। खैर, ससुर जी कल शाम को शादी के सिलसिले में फिर जोधपुर से बाहर चले गए लेकिन उनका प्यारा डॉगी उनकी अनुपस्थिति में मरणासन्न है।पता नहीं उसके प्राण कहां अटके हैं। वैसे जोधपुर में कुत्तों से प्रेम ज्यादा ही है। इस बात की गवाही गलियों में विचरण करती कुत्तों की लंबी चौड़ी फौज से लगाया जा सकता है। और हां जोधपुर को अपणायत का शहर कहा जाता है, पिछले डेढ़ माह में यह अपणायत मैंने आदमियों के प्रति तो नहीं लेकिन जीवों के प्रति जरूर देखी।

बच्चों की गांधीगिरी....

शुक्रवार शाम को आफिस था तो बच्चों ने फोन किया और बोले पापा हम शनिवार को स्कूल नहीं जाएंगे। घर पर कम्प्यूटर से खेलेंगे भी नहीं। खूब सारी पढाई करेंगे। मैंने कहा जब पढाई ही करनी है तो स्कूल क्यों नहीं चले जाते। बच्चों ने फिर पैंतरा बदला, कहने लगे पापा बैग में वजन है, पैदल चलने और बैग के वजन से कंधे दर्द कर रहे हैं। थोड़ा रेस्ट कर लेंगे तो सही हो जाएगा। मैंने फिर कहा, पैदल जाओगे, दर्द तभी ठीक होगा, बैठने या आराम करने से नहीं। मैं भी जब क्रिकेट खेलता था तो पहले दिन शरीर खूब दर्द करता था, फिर रोज खेलने से धीरे धीरे ठीक होता था। और तुम पैदल की बात करते हो। तुम्हारा तो आना जाना बामुश्किल चार किलोमीटर होगा। मैं तो पंद्रह किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाता था। मेरी बातें सुनकर बुझे मन से बच्चों ने फोन काट दिया। रात डेढ बजे घर आया तब दोनों बच्चे सो चुके थे लेकिन खिड़की पर एक लिखा हुआ मैसेज रखा था। गुस्से वाले इमोजी भी बनाए हुए थे। मैसेज था हमारी मांगें पूरी करो, पापा एंड मॉम। मैं बच्चों की इस गांधीगिरी पर मुस्करा दिया..झट से मोबाइल निकाला और मैसेज क्लिक कर लिया। खैर, मैसेज अभी वहीं खिड़की में रखा हुआ है और दोनों बच्चे स्कूल गए हैं। यह बात दीगर है कि वो सुबह बड़े तल्खिया अंदाज में बड़बड़ाते हुए स्कूल निकले थे।

जूते

लघु कथा
अरे बच्चों! तुमको पता नहीं है क्या ? यह कम्प्यूटर लैब है। आपको यहां किस तरह से आना चाहिए। क्या क्या सावधानी बरतनी चाहिए। जाओ वापस जाओ और जूते बाहर निकाल कर.आओ। देखो तुम्हारे जूतों से यहां कितनी धूल आ गई है। एक ही सांस में मैडम यह सब बोल गई थी। मैडम की घुड़की का असर यह हुआ कि बच्चे जितनी फुर्ती से लैब में घुसे थे उससे कहीं तेज गति से वापस घूमे और लैब के प्रवेश द्वार पर जाकर जूते निकालने लगे। मैं यह समूचा घटनाक्रम देखकर हतप्रभ था। बच्चों को डांटने व नसीहत देने वाली मैडम खुद अपनी सीट पर जूते पहने बैठी थी।

तुमने कलेजे पर पत्थर क्यों रख लिया!

टिप्पणी
मंगलवार अलसुबह मुझे अंडे की रेहड़ी पर फेंक कर चले जाने वाला/ वाली कौन था/थी मैं नहीं जानती। मैंने तो अभी ठीक से आंखें भी नहीं खोली थी। मैं तो इस दुनिया से वाकिफ भी न थी। मुझे नहीं पता किसी ने यह कृत्य क्या सोचकर और क्यों किया। हां इतना तो तय है कि यह घिनौना और शर्मनाक काम करते समय यकीनन उसने अपने कलेजे पर पत्थर रख लिया होगा। ऐसा करते समय उसकी आत्मा ने भी जरूर कचोटा होगा। पर उसने अपने भीतर की पुकार नहीं सुनी और अपनी आत्मा की भी हत्या कर डाली। नौ माह मुझे पेट में पालने के बाद दुनिया में आते ही खुद से रुखसत करने की जरूर कोई न कोई बड़ी वजह रही होगी। ऐसा करते समय उस मां का दिल भी रोया होगा। मैं सोच में डूबी हूं कि आखिर एक मां ऐसा कदम उठा क्यों लेती है। उसके आगे आखिर ऐसी क्या मजबूरी आ जाती है। मुझ मासूम को यह सब नहीं पता। मुझे तो मेरा कोई कसूर भी नजर नहीं आता। फिर यह सजा क्यों? मैं तो निर्दोष हूं। बिलकुल मासूम सी। रुई के फोहे जैसी मुलायम। अभी तो दुनिया को ठीक से न जाना और न समझा। यह तो गनीमत रही कि सूचना पाकर पुलिस समय पर पहुंच गई। वरना मुझे मारने की कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी। कपड़े में लपेटने के कारण मेरा दम घुट रहा था। आवारा कुत्ते ललचाई नजरों से मुझे खा जाने को आतुर थे। सुबह मौसम में ठंडक भी थी। खैर, इसे मैं मेरी खुशनसीबी कहूं या बदनसीबी लेकिन मेरे नसीब में जीवन लिखा था, सांसें लिखी थी, सो मैं बच गई। पुलिस मुझे जिला अस्पताल ले आई। यहां समय पर इलाज मिला तो मैं ठीक हो गई। अभी तीन चिकित्साकर्मी मेरी सेवा में जुटे हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अस्पताल में आकर मुझे नया नाम भी मिला है,अंजनी। कितना प्यारा नाम है, है ना। अभी चिकित्सक व स्टाफ की बातें मेरे कानों में पड़ी। वो कह रहे थे, लोग ऐसा कदम क्यों उठाते हैं। नवजातों को ऐसे फेंकते क्यों हैं। यह तो एक तरह की हत्या ही है। कोई अपना ही अपने के खून का प्यासा क्यों हो जाता है। मारने से तो अच्छा है, उसे अस्पताल के पालनाघर में ही छोड़ दिया जाए। जब नौ माह तक गर्भ में पाला। तो उसे पैदा होते ही क्यों मारना। सच में चिकित्सक व स्टाफ कर्मियों की बातें मुझे बेहद अच्छी लगी। आखिर रख नहीं सकते तो मत रखो मारते भी क्यों हो?। पालनाघर में ही छोड़ जाओ।
माना पिछले एक दशक में श्रीगंगानगर का लिंगानुपात सुधरा जरूर है, लेकिन लोगों की सोच में अभी ज्यादा बदलाव नहीं आया है। गाहे-बगाहे इस तरह के मामले उजागर होते ही रहते हैं। मैंने यह सब भी अभी-अभी ही सुना है। और यह भी सुना कि श्रीगंगानगर में तो बेटियों को बचाने, पढ़ाने और आगे बढ़ाने को लेकर बहुत सारे कार्यक्रम होते हैं। बेटी बोझ नहीं है, जैसी बातें भी यहां खूब की जाती हैं। उस शहर में इस तरह का कृत्य, उस शहर में इस तरह की मानसिकता वाले लोग हैं, यह सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है। मुझे समझ नहीं आता कि आखिर लोगों की सोच बदल क्यों नहीं रही। बेटियों को कभी कोख में, कभी पैदा होने के बाद, कभी दहेज तो कभी किसी और नाम पर क्यों मार दिया जाता है। बेटियों ने किसी क्या बिगाड़ा है। आखिर बेटियां हैं तो ही कल है।
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19 फरवरी 20 के राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में प्रकाशित...

सिंगल और कट चाय

बस यूं ही
मौजूदा दौर में चाय की चर्चा आते ही कयासों के दौर शुरू हो जाते हैं। विशेषकर चाय और प्रधानमंत्री का स्मरण बरबस ही हो उठता है। वैसे चाय व चाय वाले चर्चित भी प्रधानमंत्री के कारण ही ज्यादा हुए। खैर, मैं भी आज चाय की चर्चा ही करने वाला हूं लेकिन उस चर्चा का प्रधानमंत्री से दूर-दूर तलक कोई वास्ता नहीं है। दरअसल, चाय विषय बड़ा व्यापक है, इस पर कितना भी लिखो कम है। सौतन फिल्म का गाना, इसलिए मम्मी ने मेरी तुझे चाय पर बुलाया है, तो उस दौर में संगीत प्रेमियों की जुबां पर चढ़ गया था। गीत कालजयी हो गया। कहने का सार यही है कि चाय की चर्चा और महत्ता कभी कम नहीं हुई और ना होगी। अभी पांच दिन पहले की ही बात है। चाय की तलब जगी तो आफिस के सामने एक थड़ी पर चला गया। वहां बोर्ड लगा था और साथ में फोटो भी लगी थी। नाम लिखे थे सिकोरा तंदूरी चाय पन्द्रह रुपए, सिकोरा तंदूरी कॉफी बीस रुपए, सिंगल चाय दस रुपए और कट चाय पांच रुपए। चाय की चार वैरायटी देख मैं चौंका। मेरे लिए चारों ही नाम नए थे। पहले तो सिकोरा में चाय व कॉफी की विधि जानी। चायवाले ने बताया कि सिकोरे को तेज गर्म कर रखते हैं। फिर चाय बनाकर उसमें डाल देते हैं। गर्म सिकोरे के छमके से चाय का स्वाद अलग हो जाता है। उसमें सिकारे की मिट्टी की खुशबू का एहसास होता है और पीने में अलग तरह का टेस्ट महसूस होता है। इतना जानने के बाद मेरी दिलचस्पी अब सिंगल और कट चाय में थी। चाय वाले ने मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। मैं उसके मनोभाव जान चुका था। उसका देखने का आशय यही था कि मेरे को लेकर वह.यही सोच रहा था कि इस शख्स को सिंगल और कट का पता क्यों नहीं है। फिर उसने दो डिपोस्जल गिलास निकाले। एक बड़ा और दूसरा उससे छोटा। बोला यह सिंगल चाय है। मतलब पूरी। और यह छोटा गिलास है, मतलब पूरी चाय की हाफ यानी की कट चाय। मेरे चेहरे पर मुस्कान देख वह फिर बोला, भाईसाहब जोधपुर पहली बार आए हो क्या? मैंने कहा आ तो कई बार चुका परंतु इस कट चाय से वास्ता पहली बार पड़ा है। अभी तक जहां जहां गया वहां सिंगल मतलब पूरी चाय ही पी है। हालांकि कई जगह डिस्पोजल गिलास जोधपुर की कट चाय वाले जितने छोटे भी मिले लेकिन कीमत पूरी चाय की अदा की। खैर, मैंने सिंगल मतलब पूरी चाय पी और दस रुपए अदा कर लौट आया। साथ में चाय की थड़ी पर लगे बोर्ड की फोटो भी क्लिक कर ली। तो ससुराल में चाय की इन चार वैरायटी से वाकिफ पहली बार हुआ। अब बारी सिकोरे की चाय व कॉफी की है। मौका मिला तो उनका स्वाद भी चख लूंगा। वैसे हमारे इलाके में दो की तीन.में चार की छह में.करवाने का रिवाज तो है लेकिन.कट वाला.देखा नहीं।

सिस्टम में सडांध!

कड़वा अनुभव-1
व्यवस्था में दोष मुझे बचपन से ही कचोटता रहा है। अव्यवस्था किसी भी स्तर पर हो, मुझे अखरती है। और इसका विरोध करने के लिए मैं हमेशा ही तत्पर रहा हूं। पत्रकारिता में आकर अव्यवस्था पर चोट करने का मौका मिला। और यह सब करके मुझे बेहद सुकून मिलता रहा है। लेकिन कुछ बातें एेसी भी होती हैं, जहां आप मन मसोस कर रह जाते हैं। कुछ बोल नहीं पाते। कुछ मजबूरियां आपका मुंह बंद कर देती है। सिस्टम की खामी को कहने से पिछले तीन चार साल से खुद को रोके रखा। लेकिन अब लगता है चुप रहा तो अंदर ही अंदर घुट जाऊंगा। मुझे नहीं पता इस सच को लिखने से मुझे कोई कीमत चुकानी पड़ेगी या नहीं। कुछ भी हो सकता है वाली स्थिति है। फिर भी मेरा जमीर कहता है लिखूं। ना लिखूं तो यह मेरी फितरत व जमीर के साथ नाइंसाफी होगी। भले ही कामकाज के हिसाब से वर्तमान दौर व्यस्तता भरा है लेकिन फिर भी इतना समय तो निकालूंगा कि इस अव्यवस्था को खिलाफ लिखूं। शिद्दत से लिखूं। मुखर होकर लिखूं। संयोग से यह अव्यवस्था जिन दो विषय से जुड़ी हैं वो दोनों ही मुझे प्रिय रहे हैं। जी हां शिक्षक और सेना। फिर भी पिछले चार साल का अनुभव इतना कड़ा रहा है कि अति प्रिय इन दोनों विषयों से अब कोफ्त सी होने लगी है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सेना व शिक्षा में यह अव्यवस्था और अराजकता सब जगह है लेकिन मेरा जो अनुभव रहा है, उसने मुझे नए सिरे से सोचने पर विवश जरूर किया है। मैं अपने इन कड़े अनुभवों को शब्द दूंगा। लगातार दूंगा। बेझिझक और बेपरवाह होकर दूंगा। साथ में मेरी उस मजबूरी का जिक्र भी होगा, जो मुझे यह सब लिखने से रोक रही थी और अब भी रोकने को आतुर है।

सवाल फिर भी कायम

टिप्पणी
पूर्व पार्षद पर हमले और जलाने की कोशिश वाले मामले का आखिर नाटकीय रूप से पटाक्षेप हो गया। इसी के साथ इस हमले के पीछे की कहानी भी समझौते में दफन हो गई। मान लेना चाहिए पर्दे के पीछे का राज अब राज ही रहेगा। एक पक्ष ने गलती मान ली और दूसरे ने उसे माफ कर दिया। गलती क्यों हुई थी? क्यों की गई थी? गलती प्रायोजित थी? या इस हमले का सूत्रधार कोई और था? जैसे तमाम सवालों पर भी विराम लग गया है। खैर, कुछ सवालों पर विराम लगने के साथ ही नए सवाल भी पैदा हो गए हैं। दोनों पक्षों के बीच ऐसा क्या था, जो मारपीट और जलाने की कोशिश तक पहुंच गया। और ऐसा क्या चमत्कार हुआ कि जान का दुश्मन बनने वाला ठेकेदार यकायक गलती मानने को भी तैयार हो गया। इस समूचे घटनाक्रम से इतना तो तय है कि पार्षद और ठेकेदार के बीच कुछ न कुछ तो जरूर था। और इस कहानी के राजदार और भी हैं। कोई बड़ी बात नहीं उन्हीं राजदारों ने यह समझौता करवाने में भूमिका निभाई हो। फिर भी जनता के सामने माफी के मायने भी तो साफ होने चाहिए। गलती मानने से क्या वो सब कथित मामले अब ठंडे बस्ते में चले जाएंगे, जिनको लेकर पार्षद मुखर थे। सफाई व्यवस्था को लेकर जो बातें कही जा रही थी, उनका अब क्या होगा? इस समझौते से तो यही जाहिर होता है कि सफाई व्यवस्था को भी अब सही मान लिया गया या मान लिया जाएगा। दरअसल नगर परिषद की कहानी और पार्षदों की राजनीति हमेशा से चर्चा में रही है।
बहरहाल, यह घटनाक्रम भी अपने आप में अजूबा था और इसका पटाक्षेप इससे कहीं ज्यादा आश्चर्यजनक तरीके से हुआ। लेकिन सब काम अंदरखाने होने के कारण सवाल जिनके जवाब आने चाहिए थे वो बाहर नहीं आए। न पीडि़त कुछ बोले न आरोपी। और अब तो दोनों के बोलने का सवाल ही नहीं उठता। दोनों के बीच गिले-शिकवे दूर जो हो गए हैं। सवालों के शोर में सवाल यह भी है कि ठेकेदार के पीछे कौन और पूर्व पार्षद के पीछे कौन है। और आखिर ऐसी क्या मजबूरी व लाचारी रही कि दोनों एक हो गए।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 08 फरवरी 20 के अंक में.प्रकाशित...

शर्मनाक... निंदनीय...

टिप्पणी
पूर्व पार्षद तथा मौजूदा पार्षद पति पर हमला व उन्हें जलाने की कोशिश करने की घटना न केवल शर्मनाक बल्कि निदंनीय भी है। यह बदलते श्रीगंगानगर की ओर संकेत भी कर रही है। इस तरह सरेआम किसी को जलाने व खुद जलने की कोशिश करने की यह घटना संभवत: श्रीगंगानगर में पहली है। लिहाजा यह चौंकाती भी है, डराती भी है, भयभीत भी करती है और सोचने पर मजबूर भी करती है। हमले के पीछे क्या कारण रहे? यह क्यों हुआ? किसने करवाया? क्यों करवाया? इन तमाम सवालों के जवाब भी जनता के जेहन में है। स्वाभाविक सी बात है कि इन सभी सवालों के जवाब जनता को चाहिए भी। बिलकुल दूध का दूध और पानी का पानी की तर्ज पर। जब तक इन सवालों का खुलासा नहीं हो जाता तब तक कई तरह के सवाल, कई तरह की शंकाए, दावे-प्रतिदावे तथा आरोप-प्रत्यारोप आदि होते रहेंगे। जितने मुंह उतनी बातें होंगी। फिर भी प्रथम दृष्टया आरोपी वो ही होता है जो कानून हाथ में लेता है। हमला करने वाले मान लिया जाए किसी वजह से भी पीडि़त भी थे (हालांकि लग नहीं रहा है। ) तो कानून वो हाथ में लेने की हिमाकत कैसे कर गए। उनको तो फिर कानून के रास्ते ही आना चाहिए, यह जानते हुए कि कानून हाथ में लेना गुनाह है। खैर, हमले के पीछे जो कारण बताए जा रहे हैं, अगर वाकई वो सच हैं तो यह बेहद गंभीर विषय है। सफाई व भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। यह सभी के लिए चिंतनीय और विचारणीय मसला भी है। वैसे भी सफाई व्यवस्था और भ्रष्टाचार दोनों के लिए नगर परिषद हमेशा चर्चा में रही है। पूर्व पार्षद भी तो इन्हीं मामलों को लगातार उठा रहे बताए। सफाई और भ्रष्टाचार की उनके बातें ठेकेदारों को कैसे चुभी? इस रहस्य से पर्दा उठना बेहद जरूरी है। आरोपों में दम है और सच्चाई है तो परिषद के जिम्मेदारों को सोचना चाहिए।
बहरहाल, इस घटना को सामान्य मानना एक तरह की भूल ही होगी। इसको बिना किसी राजनीतिक चश्मे से देखकर ही चिंतन-मनन करना चाहिए। अगर राजनीति घुसी तो तय मानिए कहीं न कहीं जांच का काम भी प्रभावित हो सकता है। इस घटना की सच्चाई की तह तक जाने के लिए सभी जनप्रतिनिधियों को एकजुट होना होगा। हो सकता है स्वहित को तवज्जो देने वाले जनप्रतिनिधि इस मामले से खुद को अलग कर लें या तटस्थ हो जाए। लेकिन उन्होंने आज अगर ऐसा किया तो वो एक बड़ी गलती करने जा रहे हैं। उन्हें दलगत व व्यक्तिगत सब कुछ भुलाकर सही जांच की मांग पुरजोर व मुखर शब्दों में करनी चाहिए। शहर के जागरूक लोगों को भी इस मामले में पहल करनी चाहिए। सभी ने एकजुटता के साथ इस घटना की सच्चाई का पता लगा लिया तो यकीन मानिए, इस तरह की घटनाएं होने या करवाने का दुस्साहस कोई शायद ही करे। साथ ही शहर के लोगों को इस घटना के पीछे की वास्तविक कहानी जानने और समझने में भी आसानी होगी। भले ही वह राजनीति से प्रेरित हो, प्रायोजित हो या फिर हकीकत।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 28 जनवरी 20 के अंक में प्रकाशित...

लापरवाही का आलम

टिप्पणी
नगर परिषद की ओर से एक नाले के प्रति लंबे से की गई उपेक्षा का दंश अब शहर का वो हर वाहन चालक व राहगीर भोग रहा है, जो मटका चौक से गोल बाजार तक की रोड से गुजरता है। लोगों की माने तो लंबे समय से इस नाले की सफाई ही नहीं हुई या कभी हुई तो सफाई के नाम पर महज औपचारिकता। नाले में ठहरा हुआ पानी जब सड़ांध मारने लगा तो दुकानदारों का धैर्य जवाब देना ही था। अपनी पीड़ा के लिए उनको सड़कों पर उतरना पड़ा। आखिकार उनके विरोध के आगे नगर परिषद अमले को झुकना पड़ा और आनन-फानन में नाले की सफाई का काम शुरू करवाया।
रविवार को नाले की सफाई के काम की वजह से यातायात कुछ दूरी पर डायवर्ट किया गया। सोमवार व मंगलवार को भी यातायात डायवर्ट रहा लेकिन काम बंद है। तीन दिन से यातायात प्रभावित है लेकिन नाले की सुध लेने में उदासीनता बरती जा रही है। वैसे भी रवीन्द्र पथ शहर का सबसे व्यस्तम मार्ग है। खासकर इस मार्ग पर बने सभी चौराहों पर वाहनों की रेलमपेल इतनी है कि दिनभर जाम लगता ही रहता है। यातायात पुलिसकर्मियासें की लाख मशक्कत के बावजूद व्यवस्था पटरी पर नहीं आती। अब नाले का मलबा होने के कारण जाम ज्यादा लग रहा है। वाहन चालक दिनभर जाम में फंस रहे हैं। नाले का काम जहां अटकाया गया था, अभी भी वह उसी स्थिति में है।
परिषद के जिम्मेदारों की अक्सर यह आदत रही है कि वे हरकत में तभी आते हैं जब कोई विरोध या प्रदर्शन करता है। क्या उसे तीन दिन से जाम में फंसे वाहन चालकों की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं? क्या जाम में फंसे वाहनों की लंबी कतार जिम्मेदारों को दिखाई नहीं देती? क्यों तीन दिन से आवागमन प्रभावित है? इन तमाम बातों को लेकर कोई गंभीरता नहीं बरती जा रही। जाम में फंसने का दर्द वो ही जानता है जिसने भोगा है। या फिर इन जिम्मेदारों की आंख तभी खुलेगी जब इस काम के लिए भी लोग सड़क पर प्रदर्शन के लिए उतरेंगे? आवागमन सुगम हो। वाहन आसानी से आए-जाएं। किसी तरह का कोई जाम न लगे। इसके लिए नगर परिषद को यह काम तत्काल शुरू करवाना चाहिए। जनता से जुड़े इस मामले में ज्यादा उदासीनता अब उचित नहीं।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण में 22 जनवरी 20 के अंक में प्रकाशित 

मैं चौंका, फिर हंसा

बस यूं
शाम को कार्यालय में बैठे बैठे ही मैंने ओला की बाइक बुक करवाई। करीब दस मिनट बाद बाइक वाला आफिस के बाहर आ गया और मुझे कॉल किया। बाहर आकर मैं उसके साथ चल पड़ा अपने ठिकाने की ओर। श्रीगंगानगर से जोधपुर आने के बाद अभी अस्थायी ठिकाना ससुराल में है, हालांकि मकान देख लिया है लेकिन सपरिवार शिफ्ट जनवरी के आखिर सप्ताह तक होना है। खैर, बाइक सवार मुझे पावटा बी रोड की बजाय सी रोड से लेकर आया। बी और सी दोनों रोड पर ही अंडर ब्रिज बने हैं। ऊपर से रेलवे ट्रेक गुजरता है। मैं जब उधर से गुजर रहा था तो देखा बहुत सारे दुपहिया व चौपहिया वाहन वहां रुके थे। हालांकि कुछ वाहन निकल भी रहे थे। मै यह नजारा देख कर चौंका। यह सब पहली बार देखकर चौंकना.लाजिमी भी था। समझ नहीं आया कि यह वाहन चालक रुके हुए क्यों हैं। कई तरह के सवाल भी जेहन में आए। खुद ही जवाब खोजने में लगा रहा लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाया। अक्सर फाटक पर वाहन चालक, रेल गुजरने का इंतजार इसलिए करते ह़ै ताकि फाटक खुले और वो वहां से निकले, लेकिन यहां न तो कोई फाटक था और न ही रास्ता बंद, फिर वाहन चालक रुके थे। मैं इसी सोच में डूबा था और ट्रेन.के डिब्बे एक एक करके आंखों के आगे से निकल रहे थे। ट्रेन गुजरने के बाद रुके हुए सभी वाहन चालक अंडरब्रिज के नीचे से गुजरे।
चूंकि मेरी जिज्ञासा अब चरम पर पहुंच चुकी थी, तो मैंने बाइक सवार से ही वजह पूछ ली। मैंने सवाल में ही सवाल दागा कि चलती ट्रेन के नीचे से न निकलने के पीछे कोई धार्मिक कारण है क्या? बाइक सवार थोड़ा हंसा और फिर बोला, सर ऐसी बात नहीं.है , दरअसल ट्रेन में लोग पानी, टॉयलेट शौच आदि करते हैं। वह नीचे से गुजरने वाले वाहनों पर गिरता है। इससे उनके कपड़े आदि खराब हो जाते हैं। मुझे कारण समझ आ गया था। मैं मंद ही मंद मुस्कुराया। तब तक मेरा स्टेंड भी आ गया था लेकिन बाइक सवार मेरी बातों से इतना प्रभावित हुआ और बोला सर आपको तो घर तक ही छोड़ कर आता हूं...वह फिर बोला, अक्सर इस तरह की मदद करता रहता हूं। मैंने कहा, यह अच्छी आदत है, इसे बनाए रखो। बातें जारी थी लेकिन ससुरजी का घर आ गया था, मैंने उसे 32 रुपए दिए...वह.मुस्कुराया और.बोला सर रेटिंग में फाइव स्टार दे देना। मैंने उसको फाइव स्टार दिए और गेट की तरफ बढ गया।

बाय-बाय श्रीगंगानगर....

26 मार्च 2016 के दिन श्रीगंगानगर में पत्रकारिता की एक तरह से दूसरी पारी की शुरुआत थी। पहली पारी 28 दिसम्बर 2000 से 25 जनवरी 2004 तक खेल चुका था। मतलब तीन साल और करीब एक माह। दूसरी पारी का भी आज आखिरी दिन है। 6 जनवरी 2020। दूसरी पारी तीन साल नौ माह दस दिन के करीब चली। पत्रकारिता के कुल 19 साल के कॅरियर में सात साल से ज्यादा समय श्रीगंगानगर में ही बीता है। पहली पारी में चूंकि प्रशिक्षु था लेकिन दूसरी पारी में बड़ी जिम्मेदारी के साथ आया। कहा गया है कि जिम्मेदारी निभाने वाले के साथ कई तरह की उम्मीदें, अपेक्षाएं व आशंकाएं भी जुड़ जाती हैं। मुझे याद है कि करीब ढाई साल पहले एक व्हाटसएप ग्रुप में कड़ा कमेंट करने के प्रत्युत्तर में एक कड़ा ही जवाब मिला था। मुझे कहा गया था, यह श्रीगंगानगर है, अभी आए हो, देखना यहां की चकाचौंध में आप खो जाओगे। तब मेरा जवाब था, जी मैं पहले भी यहां तीन साल से ज्यादा रहकर गया हूं तब भी बिना चकाचौंध में खोए गया था और इस बार भी यह चकाचौंध मुझे प्रभावित नहीं कर पाएगी। खैर, अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने वाली बात नहीं। श्रीगंगानगर में दूसरी पारी भी पहली पारी की तरह निर्विवाद रही। जान-पहचान वालों से यह बात छुपी भी नहीं है। कहा भी गया है कि जो आपको जानते हैं, उनको बताना क्या? और जो नहीं जानते उनको बताने से कोई फायदा भी नहीं।
खैर, श्रीगंगानगर की संस्कृति और मारवाड़ी बोली से मुझे एक पल भी यह एहसास नहीं हुआ कि मैं गांव से दूर हूं। शायद मन लगने और रुचि से काम करने की एक बड़ी वजह यह भी थी। दूसरी पारी का कार्यकाल चूंकि जिम्मेदारी भरा रहा, लिहाजा कई तरह के अवरोध, दवाब, धमकी आदि भी झेलने पड़े। एक शख्स तो बाकायदा मेरे केबिन तक आ गए थे। बिलकुल धमकी वाले अंदाज में। इतने आग-बबूला थे कि किसी भी तरह की बात सुनने को तैयार नहीं थे। समूचा स्टाफ यह वाकया देखकर चकित था। मेरे लिए भी यह अलग तरह का अनुभव था। छत्तीसगढ़ के धुर नक्सली क्षेत्र में तीन साल पत्रकारिता के दौरान भी एेसा कोई वाकया नहीं आया था। इस तरह के घटनाक्रम से विचलन स्वाभाविक था। रात भर बैचेनी में बीती। उसी दिन एफबी पर भी लिखा था कि ' किसी दिन आपका एेसे महानुभावों से वास्ता पड़ जाता है कि दिमाग का दही हो जाता है।' एफबी की यही पोस्ट पढ़कर एक दो मित्रों ने फोन किए। बार-बार जिद करने पर आखिरकार उनको वह घटनाक्रम बताना पड़ा। दूसरे दिन तो चमत्कार हो गया। मुझे धमकाने वाले शख्स मेरे केबिन से दस फिट दूर दोनों हाथ कोहनी तक जोड़े हुए मुझसे मिलने की इजाजत मांग रहे थे। इस यू टर्न से मैं तो चकित था ही स्टाफ सदस्यों के आश्चर्य का भी कोई ठिकाना न था। उन शख्स के साथ आया एक जना तो बाकायदा पैरों में गिर गया जबकि धमकी देने वालों ने माफी मांग ली। शायद रात को हालचाल जानने वाले मित्रों का ही कुछ कमाल था। हालांकि उस शख्स के प्रति दिल में किसी तरह की दुर्भावना न तो पहले थी और न अब है लेकिन उनका यकायक बदला वो अंदाज एक बार जरूर अखरा था।
बहरहाल, कामकाज के दौरान कई तरह के उतार चढ़ाव भी आते हैं। कई बार आपका व्यवहार सहज होता है तो कई बार असहज भी हो जाता है। खैर, इस कार्यकाल में श्रीगंगानगर के सुधि पाठकों का भरपूर स्नेह मिला। अच्छे लेखन पर जहां पीठ थपथपाई वहीं किसी तरह की त्रुटि पर कान मरोडऩे से भी नहीं चूके। फिर भी मेरी इस दूसरी पारी के दौरान मन, वचन या कर्म से किसी की भावना को ठेस पहुंची हो। जाने-अनजाने में किसी तरह की कोई भूल या गलती हुई तो क्षमा करें। आपका यह स्नेह, यह अपनत्व ही मेरी थाती है। इसको हमेशा संजोकर रखूंगा। श्रीगंगानगर से भले ही भौगोलिक दूरियां ज्यादा हो रही हैं लेकिन श्रीगंगानगर हमेशा दिल के करीब रहा है... करीब है... और करीब ही रहेगा...।
अब नई जिम्मेदारी जोधपुर से। बाय-बाय श्रीगंगानगर।

Tuesday, December 31, 2019

सब गोलमाल!

टिप्पणी
पड़ोसी जिले बीकानेर के सरे नथानिया स्थित नंदी गोशाला में हाल ही डेढ़ दर्जन गोवंश की मौत हो गई। गोवंश की मौत के बाद बीकानेर जिला कलक्टर ने गोशाला का निरीक्षण किया और गोवंश को ठंड से बचाव की पूरी व्यवस्था तत्काल करने की हिदायत दी। इतना ही नहीं पशुपालन विभाग के दल ने मौके पर जाकर गोवंश के मूत्र व रक्त के सैंपल लिए। इतना ही नहीं मृत गोवंश का पोस्टमार्टम भी किया गया और गोशाला में एक वेटरनरी डॉक्टर भी नियुक्त किया गया। इससे ठीक उल्टी तस्वीर श्रीगंगानगर की है। सुखाडि़या सर्किल स्थित श्री गोशाला में १७ गोवंश की मौत हो जाती है। इतना ही नहीं गोशाला संचालक इन सभी मृत गोवंश को चुपचाप ठिकाने लगा देते हैं। इन्हें दफनाया गया या नहर में बहाया गया यह जांच का विषय है। खैर, गोवंश की मौत पर किसी भी स्तर पर कोई हलचल नहीं होती। पशुपालन विभाग के अधिकारी तो गोशाला संचालकों की हां में हां मिलाने से आगे कुछ नहीं बोल रहे। मजबूरी में सो तरह के बहाने गिनाते हैं। गोवंश की मौत का कारण पशुपालन विभाग भी वो ही बताता है जो गोशाला संचालक बताते हैं। बिना पोस्टमार्टम के ही जांच हो गई। कारण बताया गया कि गोशाला में बीमार गोवंश को लाया गया था, जिसकी सर्दी की वजह से मौत हो गई। क्या वाकई गोशाला में बाहर घूमने वाली बीमार व निराश्रित गायों को लाया जाता है? यह जांच का विषय है। और गायें बीमार थी तो उन्हें गोशाला इलाज के लिए लाए या उनको अपने हाल पर छोडक़र मरने के लिए लाया गया। माना सर्दी बहुत तेज है लेकिन कमाल की बात तो यह भी है कि बाहर खुले में घूमने वाला गोवंश बदस्तूर घूम रहा है लेकिन गोशाला की गायों को सर्दी लग जाती है। गोवंश को सर्दी से बचाने के लिए क्या यहां कोई प्रबंध नहीं? खैर, गोवंश की मौत पर इतना तो तय है कि पशुपालन विभाग अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है। उसका गोशाला संचालकों की में हां में हां मिलाने से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह किस अंदाज में काम कर रहा है। इतना ही नहीं, जिला कलक्टर भी तो इस मामले में पूछने पर बताते हैं। बीकानेर कलक्टर की तरह खुद के स्वविवेक से क्या उन्हें कुछ नहीं सूझता? पशुपालन विभाग तो पहले से ही गोशाला को क्लीन चिट दे रहा है तो उसके खिलाफ कैसे जांच करेगा, समझा जा सकता है। मतलब सब कुछ ही गोलमाल नजर आता है। बहरहाल, गोवंश की मौत पर प्रशासनिक भूमिका सही नहीं रही, लेकिन एेसा भविष्य में न हो इसके लिए सबक जरूर लिया जा सकता है। देश में अक्सर धर्म, राजनीति, व वोटबैंक के केन्द्र में रहने वाला गोवंश श्रीगंगानगर में चुपचाप दम तोड़ रहा है तो दोष उन सबका भी है जो गाहे-बगाहे गायों के नाम पर प्रदर्शन करते हैं, गोवंश का हितैषी होने का दंभ भरते हैं। शहर की अवैध टॉलों से हरा चारा खरीदकर गायों को खिलाने वाले भी पता नहीं इन मौतों पर क्यों चुप हैं? यह चुप्पी वाकई खतरनाक है, न केवल गोवंश के लिए बल्कि शहर के लिए भी।
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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 29 दिबंबर के अंक में प्रकाशित...

यह भेदभाव ही तो है!



टिप्पणी
कडक़ड़ाती सर्दी के बीच जब स्कूलों का समय बदल दिया गया है। असहाय लोगों के लिए रैन बसेरे शुरू कर दिए गए हैं। जगह-जगह स्वयंसेवी संगठनों की ओर से जरूरतमंदों को कंबल और ऊनी कपड़े वितरित किए जा रहे हैं। अलाव के लिए सूखी लकडि़यों की व्यवस्था की जा रही है। एेसे सर्द मौसम में नगर विकास न्यास अमले को अचानक अतिक्रमण हटाने की याद आ गई। घने कोहरे व शीतलहर के बीच खुले आसमान के तले जीवन-यापन करने वाले परिवारों को मंगलवार सुबह बेदखल कर दिया गया।
यह लोग मॉडल टाउन स्थित नगर विकास न्यास कार्यालय के आसपास खाली भूखंडों में लंबे समय से कब्जा करके रह रहे थे। एेसे प्रतिकूल मौसम में कार्रवाई के लिए यूआईटी प्रशासन निसंदेह बधाई का पात्र तो है ही। बड़ी बात तो यह है कि सुबह-सुबह बिना किसी रुकावट के पुलिस बल भी मिल गया। लंबे समय से स्थानीय लोगों की ओर से यह अतिक्रमण हटाने की मांग की जा रही थी। यूआईटी प्रशासन ने स्थानीय लोगों की बात को माना या अंदरखाने कोई दूसरी वजह या फिर कोई ऊपर दवाब था, यह अलग विषय है लेकिन कब्जा हटवाकर भूखंड खाली करवा लिए। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। फिर भी मानवीय संवेदना से परिपूर्ण लोगों को यह कार्रवाई अखर सकती है। मासूम बच्चों को सर्दी में बेदखल करने से उनका दिल पसीज सकता है। हो सकता है इन झुग्गी झौपडि़यों वाले के समर्थन में कोई रहनुमा ही खड़ा हो जाए। धरना-प्रदर्शन तक करवा दे। वैसे भी शहर में गरीबों के समर्थन में खड़े होने वाले व सहानुभूति जताने वालों की कमी नहीं है। यूआईटी के आसपास वैसे भी कब्जा कर बैठे लोगों की कहानी भी तो कुछ एेसी ही है। हैरानी की बात है कि यूआईटी ने अपने बगल के कब्जे और ठीक पीछे बंद की गई गली को भुलाकर या इनकी तरफ आंख मंूदकर यह अतिक्रमण हटाया। क्या यूआईटी के जिम्मेदार अफसर यह बता सकते हैं कि वो अपने आसपास काबिज लोगों का समाधान कब तक खोजेंगे?
जनहित में अतिक्रमण हटने चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन अतिक्रमण हटाने के तौर-तरीके सही न हो तो उनको विवादास्पद होते देर नहीं लगती। यूआईटी अधिकारियों को गरीब झुग्गी झौपड़ी वाले तो अखर गए लेकिन शिव चौक से अस्पताल तक सडक़ किनारे ट्रक खड़े करने वाले दिखाई क्यों नहीं देते? दिन भर सडक़ों पर सीमेंट, रेता व बजरी का कारोबार करने वाले नजर क्यों नहीं आते? अस्थायी बाजार को यूआईटी के अफसर क्यों नजरअंदाज कर देते हैं? सडक़ पर टेम्पो-ट्रैक्टर खड़े करने की इजाजत किसने दी? इतना ही नहीं यूआईटी के अधीन कॉलोनी आज भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रही है। खुद यूआईटी कार्यालय के नाक के नीचे बना पार्क बदहाल है।
बहरहाल, यूआईटी के अधिकारी अतिक्रमण हटाने के प्रति समभाव रखते हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही शिव चौक से जिला अस्पताल तक सडक़ भी अतिक्रमण मुक्त होगी। सर्दी के मौसम में शुरू हुए अभियान में अब मौसम या पुलिस संबंधी कोई बाधा नहीं आएगी। यूआईटी कार्यालय के आसपास का इलाका भी अतिक्रमण मुक्त होगा। पीछे बंद की गई गली भी खुल जाएगी। और यह सब नहीं हुआ तो यह एक तरह का भेदभाव ही हुआ। साथ में यह भी तय मानिए कि अतिक्रमण करने वालों के सामने यूआईटी प्रशासन किसी न किसी तरह से नतमस्तक है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 25 दिसंबर के अंक में प्रकाशित  टिप्पणी..।

हादसों पर अंकुश कब

टिप्पणी.
शहर में एक हादसा फिर हो गया। सोमवार सुबह एक मोटरसाइकिल सवार युवक स्कूल बस की चपेट में आकर जान गंवा बैठा। वहीं 16 दिसम्बर की रात को पशु से टकराकर एक स्कूटी सवार युवती जान गंवा बैठी। हादसे रोज होते हैं लेकिन सप्ताहभर में हुए इन दो हादसों में कहीं न कहीं व्यवस्था का दोष है।
बेलगाम यातायात और आवारा पशु। इन दो समस्याओं के प्रति पता नहीं क्यों यहां के नेताओं और अफसरों ने आंखें मंूद रखी हैं। लगातार हादसों के बावजूद शासन-प्रशासन के पास इन दो समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं है। हादसों के प्रति उनकी भूमिका से लगता नहीं कि हादसे उनको डराते या चौंकाते भी हैं। हां कागजी निर्देश और औपचारिकता वाले अभियान गाहे-बगाहे जरूर चलते हैं लेकिन गंभीरता से समस्याओं का समाधान नहीं खोजा जाता। निराश्रित पशुओं की समस्या को तो एक तरह से भुला ही दिया गया है। कार्यभार ग्रहण करते समय जिला कलक्टर ने जरूर थोड़ी बहुत गंभीरता दिखाई लेकिन अब मामला पूरी तरह से ठंडे बस्ते में हैं। जनप्रतिनिधि हादसों पर तात्कालिक प्रतिक्रियास्वरूप सहानुभूति जरूर जता आते हैं लेकिन वो भी ऐसे मामलों में अक्सर चुप ही रहते हैं। निराश्रित पशु तो शहर में घूम ही रहे हैं, रात में तो पालतू भैंसें भी विचरण करती दिखाई दे जाती हैं। कौन रोकेगा इनको? इनके मालिकों में किसी तरह का डर क्यों नहीं हैं? डर इसलिए नहीं है कि शासन-प्रशासन कोई हरकत ही नहीं करते। वरना किसी की क्या मजाल जो अपने मवेशियों को खुला छोडऩे की हिमाकत दिखाए। यह प्रशासनिक कमजोरी का ही परिणाम है कि पालतू पशु भी शहर में खुले घूमते हैं।
यातायात व्यवस्था तो दिन प्रतिदिन बिगड़ती ही जा रही है। नासूर के रूप में तब्दील हो रही है। जिम्मेदार इस बदहाली को दूर करने के बजाय इसको बिगाडऩे में लगे हैं। चौक-चौराहों पर पसरे अतिक्रमणों को पता नहीं क्यों अभयदान दे रखा है। सडक़ रोककर कारोबार करने वालों का प्र्रशासन से पता नहीं कौनसा व कैसा रिश्ता है या गुप्त समझौता है जो इनको हटाया नहीं जा रहा। शिव चौक के पास तो सडक़ किनारे ही बाजार लगाने की अनुमति दे दी गई। यहां आधा बाजार तो सडक़ पर सजा है। हर रविवार को भी यहां सडक़ रोककर बाजार सजता है। क्यों नहीं रोका जा रहा इनको? क्यों नहीं होती इन पर कार्रवाई?
बहरहाल, अगर शहर के मौजूदा हालात में सुधार नहीं होता तो तय मानिए हादसे कम नहीं होंगे। जिम्मदारों, शासन-प्रशासन को अपनी भूमिका का निर्वहन ईमानदारी से करना चाहिए ताकि व्यवस्था में सुधार हो। आमतौर पर जनहित से जुड़े मामलों में चुप्पी साधने वाले शहर के जागरूक लोगों को भी जागना होगा। अगर सभी इस तरह नींद में गाफिल रहे तो सुधार नहीं होने वाला। जिस गति से शहर बढ़ रहा है। वाहनों की संख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए अब कमर कसने का वक्त आ गया है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 24 दिसंबर के अंक में प्रकाशित

आयो राज लुगायां को

बस यूं ही
पंचायत चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। आरक्षण लॉटरी निकलने के बाद भावी प्रत्याशी सामने आने लगे हैं। रुठने-मनाने का दौर भी अंदरखाने चल रहा है। शह और मात की रणनीतियां बन रही है। हार-जीत के समीकरण तय हो रहे हैं। महिला उम्मीदवारों को लेकर तो कई तरह के चुटकुले और जुमले बन चुके हैं। सोशल मीडिया पर कविताओं व किस्सागोई की भरमार है। वैसे राज और वोट को लेकर महिलाओं पर राजस्थानी में फिल्में भी बनती रही हैं। बानगी के रूप में घर मं राज लुगायां को, बीनणी वोट देबा चाली आदि को गिना जा सकता है। पंचायत चुनाव को देखते हुए यह नाम फिर मौजूं हो चले हैं। पंचायत चुनाव के साथ महिलाओं का जिक्र इसीलिए भी क्योंकि कई पुरुषों ने पांच साल मैदान तैयार किया लेकिन आरक्षण ने उनकी उम्मीद पर पानी फेर दिया। उनके हसीन सपनों को दिनदहाडे तोड़ दिया। यह समस्या विशेषकर कुंवारे लोगों को ज्यादा भोगनी पड़ी है। क्योंकि जो शादीशुदा थे उन्होंने तो खुद का नंबर नहीं आया तो पत्नी का नाम चला दिया लेकिन कुंवारे तो कुंवारे ही ठहरे, आखिर किसका नाम चलाएं।
खैर, इन सबके बीच मेरी पंचायत केहरपुरा कलां में इस बार मुकाबला रोचक होने जा रहा है। रोचक इसलिए कि ग्राम पंचायत की कमान भी इस बार महिला के हाथ में होगी। मतलब सरपंच महिला होगी। इतना ही नहीं देश की राजनीति में भले ही महिलाओं की भागदारी 33 फीसदी भी न हो लेकिन मेरी पंचायत में यह आंकड़ा पचास फीसदी से भी ज्यादा जाएगा। मतलब सही मायनों में गांव की सरकार महिलाओं के हाथ होगी। अब घर मं राज लुगायां को की जगह पंचायत मं राज लुगाया को कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा। मतलब साफ है कि पंचायत में दो तिहाई के करीब महिला जनप्रतिनिधि बैठेंगी। केहरपुरा कलां ग्राम पंचायत में सरपंच के साथ 11 पंच भी निर्वाचित होंगे। अगर पंचों के आरक्षण पर नजर डाली जाए तो इनमें सात महिलाएं पंच बनेंगी। इनमें चार पंच सामान्य महिला, दो एससी महिला एवं एक ओबीसी महिला के लिए आरक्षित है। इस तरह से 11 से में सात महिलाएं पंच चुनी जाएंगी। इस तरह से पूरी पंचायत के 12 जनप्रतिनिधियों में आठ महिलाएं होगी। संभवत: ग्राम पंचायत के इतिहास में एेसा पहली बार होगा जब आठ महिलाओं के हाथ गांव के विकास की बागडोर होगी। और आयो राज लुगायां को, वाला जुमला भी चरितार्थ होगा। देखना यह भी रोचक होगा कि आखिर 12 महिलाओं के बीच चार पुरुषों की आवाज किस तरह से सुनी जाएगी।

मौसम जरा ठंड का है

मौसम जरा ठंड का है
झार के खंड-खंड का है
जनादेश की प्रतिक्रिया पर जैसे
रुख किसी उदंड का है।
हारे लगातार छठा प्रदेश 'माही'
फिर भी रंग घमंड का है।
जैसा भी है स्वीकार करो
फल जनता के दंड का है।

Wednesday, December 18, 2019

सवा दो सौ शहीदों का हुआ था एक साथ अंतिम संस्कार

श्रीगंगानगर. भारत-पाक के बीच 1971 के युद्ध में भारतीय सेना की शानदार जीत के उपलक्ष्य हर साल 16 दिसम्बर को विजय दिवस मनाया जाता है लेकिन ऐतिहासिक जीत के पीछे सैकड़ों जवानों की शहादत भी छिपी है। राजस्थान की सीमा से नब्बे किमी दूर पंजाब के फाजिल्का सेक्टर में भारत-पाक सेना के मध्य जबरदस्त टक्कर हुई थी। भारतीय जवानों ने पाक के फाजिल्का पर कब्जा करने के मंसूबों पर पानी फेर दिया था। इस युद्ध मेंं भारतीय सेना के 225 जवान शहीद हुए थे। आसफवाला व फाजिल्का के लोगों ने सामूहिक रूप से शहीदों के शवों को एकत्रित किया था।इन सभी 225 शहीदों का अंतिम संस्कार सामूहिक रूप से तैयार की गई 90 फीट लंबी तथा 55 चौड़ी चिता पर किया गया था। इन सभी शहीदों को फाजिल्का के रक्षक के रूप में मान्यता दी गई। यहां पर साढ़े चार सौ के करीब जवान घायल हो गए हुए थे। यहां शहीदों की याद में स्मारक बनाया गया। वर्तमान में आसफवाला के युद्ध स्मारक की गिनती पंजाब के सर्वश्रेष्ठ युद्ध स्मारकों में होती है। यहां हर साल विजय दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय सेना व आम लोगों के सहयोग से मेला लगता है।
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विजय दिवस के उपलक्ष्य में आज 16 दिसंबर 19 को राजस्थान पत्रिका के राज्य के तमाम संस्करणों में प्रकाशित 

पहले पुराने काम तो हो जाएं

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राज्य सरकार के निर्देश पर बुधवार को श्रीगंगानगर के नवीन मास्टर प्लान 2017-2035 का प्रारूप प्रकाशन कर दिया गया। अब शहरवासियों को इस पर आपत्तियां और सुझाव देने होंगे। इसके लिए एक माह का समय दिया गया है। इसके बाद यह मास्टर प्लान लागू कर दिया जाएगा। नए मास्टर प्लान में यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने, ट्रक टर्मिनल बनाने और रीको में बड़ा पार्क बनाने का निर्णय किया गया है। साथ ही श्रीगंगानगर से लगते 52 गांवों को यूआइटी में शामिल किया गया है।
सुनने में यह बातें अच्छी लगती हैं लेकिन यह तय सीमा में धरातल पर उतर पाएंगी इसमें संशय है। यह इसलिए क्योंकि 2001-2023 के मास्टर प्लान जो योजनाएं और काम शामिल थे उन पर 18 साल बाद भी विचार नहीं हुआ। पुराने मास्टर प्लान में भी श्रीगंगानगर शहर से लगते 29 राजस्व गांवों को शामिल किया गया था। उन गांवों की तस्वीर आज तक नहीं बदली। विडम्बना यह है कि यूआइटी के क्षेत्राधिकार में आने के बाद संबंधित गांवों में हाउस टैक्स लगा दिया जाता है। बिजली बिलों में उपकर जोड़ दिया जाता है। बिजली व पानी सभी का बिल शहरी दर से वसूला जाता है।
सबसे बड़ी बात ग्राम पंचायत जमीन के पट्टे नि:शुल्क जारी करती है लेकिन यूआइटी के क्षेत्राधिकार में आने के बाद पट्टे बनाने का सशुल्क होता है। कुछ इसी तरह का दंश पुराने मास्टर प्लान में आए गांवों के लोग भोग रहे हैं। वहां न तो सडक़ें बनी हैं और न ही रोडलाइट लगी हैं। उन गांवों के लोगों की पीड़ा भी यही है कि जब सुविधाएं ही नहीं तो टैक्स किस बात का। एेसे शहरीकरण से तो उनका गांव ही अच्छा है। गांवों वालों का तर्क यह भी है कि गांवों को शहर से जोडऩा ही है तो क्यों न नगर परिषद का दायरा बढ़ाया जाए। खैर, मास्टर प्लान की योजनाएं धरातल पर उतरें तभी उसका फायदा है वरना यह किसी सब्जबाग से कम नहीं हैं। जिला प्रशासन ने भले ही नए मास्टर प्लान के लिए आपत्तियां व सुझाव मांगें हो लेकिन जब हाथ में है पहले वहां तो काम हों। नए की चिंता करनी भी चाहिए लेकिन उसकी सार्थकता तभी है जब पुराने मास्टर प्लान से संबंधित कोई योजनाएं अधूरी नहीं रहे। बेपटरी और बदहाल यातायात व्यवस्था को व्यवस्थित करने की बात 18 साल पहले भी की गई थी। इन 18 साल में हालात बद से बदतर होते गए। कई अधिकारी आए और गए लेकिन यह काम पटरी पर नहीं आया। नए मास्टर प्लान में तो आवश्यकता के हिसाब से फुटओवर ब्रिज व अंडर ब्रिज बनाने का जिक्र भी है। इतना ही नहीं बस स्टैंड को सूरतगढ़ रोड पर ले जाने का काम भी नहीं हो पाया। बहरहाल, पुराने अनुभव इतने कड़वे हैं कि नए मास्टर प्लान की योजनाओं के लिए निर्धारित की गई समय सीमा में क्रियान्वयन होने पर सहसा यकीन होता भी नहीं। कार्ययोजना बनाने का फायदा भी तभी है जब उसका क्रियान्वयन तय समय सीमा में हो। उम्मीद की जानी चाहिए पहले पुराने मास्टर प्लान के लंबित कामों पर प्राथमिकता से विचार हो। अन्यथा यही लंबित काम बार-बार नए स्वरूप में नए मास्टर प्लान में जगह पाते रहेंगे।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण में 13 दिसंबर 19 के अंक में प्रकाशित

कथनी और करनी!



टिप्पणी
नगर परिषद में सोमवार को नवनिर्वाचित सभापति व उपसभापति ने कार्यभार ग्रहण किया। इस दौरान एक सम्मान समारोह भी रखा गया था। इसी समारोह में नवनिर्वाचित सभापति व उपसभापति ने साफ-सफाई व स्वच्छता रखने का संकल्प लिया। साथ ही विधायक राजकुमार गौड़ व नवनिर्वाचित सभापति सहित सभी वक्ताओं ने शहर की सुंदरता को बढ़ाने तथा साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने की बात कही। खैर, सम्मान समारोह में जब सफाई व स्वच्छता की बातें की जा रही थी, संकल्प लिए जा रहे थे, ठीक उसी वक्त नगर परिषद प्रांगण सहित शहर के कमोबेश सभी चौक चौराहे बदरंग हो चले थे। हर जगह पोस्टर व होर्डिंग्स ही नजर आ रहे थे। शहर विधायक को जन्मदिन की बधाई तथा सभापति को निर्वाचित होने पर बधाई दी गई थी। शहर में इस तरह चौक चौराहों को बदरंग करने की परिपाटी बन गई है। कोई भी आयोजन हो, हर कोई मनमर्जी से पोस्टर टांग देता है। इस काम में नगर परिषद व नगर विकास न्यास व उनके नुमाइंदे भी समान रूप से दोषी हैं, क्योंकि इनकी तरफ से शहर के सौन्दर्य को बिगाडऩे वालों के खिलाफ कभी कार्रवाई नहीं की जाती। वैसे भी जनप्रतिनिधियों की ओर से साफ-सफाई व स्वच्छता की दुहाई देना तथा चौक चौराहों की बदरंगता की तरफ आंख मूंद लेना कथनी और करनी के भेद को साफ-साफ उजागर करता है।
एक खास बात और जो सम्मान समारोह में नजर आई। लगभग सभी वक्ताओं ने शहर की बदहाली के लिए नगर परिषद के प्रबंधन की बजाय राज्य की भाजपा सरकार की कथित उपेक्षा को दोषी माना। वक्ताओं की बात पर कुछ देर के लिए यकीन कर भी लिया जाए लेकिन शहर की बदरंगता को दूर करने में भी क्या भाजपा सरकार की उपेक्षा आड़े आई? चौक चौराहों पर टंगे पोस्टर व होर्डिंग्स हटाने के लिए भी क्या राज्य सरकार ने मना किया? दरअसल, इस तरह की पोलपट्टी, इस तरह की अव्यवस्था, इस तरह की मनमर्जी स्थानीय स्तर पर ही होती है। और इन सबके के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधि व अधिकारी ही जिम्मेदार हैं।
बहरहाल, विधायक व नवनिर्वाचित सभापित दोनों से यह अपेक्षा की जाती है कि वो सबसे पहले चौक चौराहों का सौन्दर्य बहाल करवाएं। इस काम के लिए किसी बजट की आवश्यकता नहीं होती। इस काम के लिए राज्य सरकार से किसी सहयोग की भी आवश्यकता नहीं होती। जरूरत है तो केवल जनप्रतिनिधियों को इच्छा शक्ति दिखलाने की। अगर जनप्रतिनिधियों की ही इस काम में कहीं न कहीं हां तो फिर तो किसी से भी उम्मीद करना भी बेमानी है। देखने की बात है कि विधायक व सभापति पुरानी परिपाटी को तोड़ते हैं या वे भी उसी का हिस्सा बने रहेंगे 
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 03 दिसंबर के अंक में प्रकाशित

Tuesday, December 17, 2019

राजनीति में.शुचिता !

टिप्पणी..
हिन्दी में एक शब्द है शुचिता। निष्कटपता, निर्मलता, पवित्रता, शुद्धता आदि शब्द शुचिता के ही पर्यायवाची शब्द हैं। शुचिता शब्द का प्रयोग वैसे तो गाहे-बगाहे होता रहता है लेकिन राजनीति में यह शब्द बहुतायत में प्रयुक्त होता है। श्रीगंगानगर नगर परिषद चुनाव में भी इस शब्द का जिक्र आया। चुनाव में भाजपा के पर्यवेक्षक व समन्वय रहे प्रहलाद गुंजल को भी सभापति व उपसभापति के चुनाव के कड़े अनुभव के बाद आखिरकार कहना पड़ा कि श्रीगंगानगर की राजनीति में शुचिता जरूरी है। इतना ही नहीं, उनका कहना था कि पार्टी के कुछ पदाधिकारियों को चिन्हित किया गया है, जिनकी पृष्ठभूमि दागदार रही है। जनता एेसे दागदार पदाधिकारियों का सामाजिक बहिष्कार कर ठीक कर सकती है। गुंजल की बात कुछ हद तक सही हो सकती है लेकिन बड़ा सवाल तो यह है कि पार्टी एेसे दागदारों को प्राथमिकता देती ही क्यों है ? जनता का नंबर तो बाद में आता है। शुरुआत तो पार्टी को ही करनी होगी। हां गुंजल का ‘श्रीगंगानगर में विश्वास बिकता है’ कहना वाकई गंभीर बात है।
यह बात शायद उनको इसलिए कहनी पड़ी कि जितनी किरकिरी उपसभापति चुनाव में हुई उतनी तो सभापति के चुनाव में भी नहीं हुई। उपसभापति चुनाव में पार्टी के आठ पार्षदों ने कांग्रेस समर्थित निर्दलीय के पक्ष में मतदान कर दिया। भले ही पार्षदों की बाड़ेबंदी को दूसरे शब्दों में प्रचारित किया जाए लेकिन सच यही है कि भाजपा की रणनीति सभापति पर ज्यादा केन्द्रित रही। यही कारण रहा है कि उपसभापति के चुनाव में कई दावेदार पैदा हो गए। यह लोग किसी तरह मैदान से हट तो गए लेकिन पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में मतदान नहीं किया। नतीजा सबके सामने रहा। सभापति में जीत का अंतर तीन मतों का था वह उपसभापति में ३३ तक जा पहुंचा। मतलब साफ है कि पार्टी के आठ पार्षदों ने तो बगावत की ही, सभापति चुनाव में साथ रहने वाले निर्दलीय पार्षद भी भाजपा से छिटक गए। एेसे हालात में बड़ा सवाल यह भी है कि निकाय चुनावों में पार्षद छिटक क्यों जाते हैं? क्यों वो पार्टी अनुशासन को आखिरी समय तक कायम नहीं रख पाते? क्यों पार्टी हित से बड़ा स्वहित हो जाता है? जीतने के बाद बाड़ेबंदी की आवश्यकता क्यों पड़ जाती है? सोचने की बात तो यह भी है कि कई तरह की कसौटियों पर परखे जाने के बाद जिनको टिकट के लिए पात्र समझा जाता है, जीतने के बाद वो विरोधी खेमे में क्यों चले जाते हैं। पाला बदलने की बात को भले ही गुंजल श्रीगंगानगर तक सीमित करें लेकिन यह कहानी कमोबेश सभी जगह की हो चली है। और सभी दलों की हो गई। मौजूदा दौर में राजनीति में शुचिता की उम्मीद बेमानी सी लगती है। और अगर उम्मीद की भी जाए तो वह केवल श्रीगंगानगर ही नहीं बल्कि सभी जगह के लिए जरूरी है। वरना पाला बदलने व बदलवाने के हथकंडे दिनोदिन आधुनिक व परिष्कृत रूप में सामने आते रहेंगे।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 28 नवंबर के अंक में.प्रकाशित।