Monday, December 16, 2013

सादगी और रणनीतिक कौशल के धनी ओला


स्मृति शेष

 
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झुंझुनू रेलवे स्टेशन पर ब्रॉडगेज रेलवे लाइन के कार्य की धीमी गति पर नाराजगी जताते हुए जब केन्द्रीय श्रम मंत्री शीशराम ओला ने कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए थे तो राजनीति हलकों में यह कयास लगाए जाने लगे थे कि ओला फिर से चुनाव लडेंग़े। ऐसा मानने एवं सोचने वाले गलत भी नहीं थे, क्योंकि ओला ने नब्बे के दशक से अब तक लोकसभा के लिए कुल पांच चुनाव लड़े और जीते भी..। हर बार इसी अपील पर कि 'यह उनका आखिरी चुनाव है।' तभी तो चुनाव के दौरान ओला के संसदीय क्षेत्र झुंझुनू में यह जुमला जन-जन की जुबान पर रहता कि 'ओला जी को जिंदा रखना है तो चुनाव जीताओ..।' खैर, उनकी यह मार्मिक अपील हमेशा ही इतनी कारगर रही कि विपक्ष को कोई तोड़ ही नहीं मिला। ओला इस बार भी जीते लेकिन मंत्री नहीं बने तब भी यह जुमला खूब जोर-शोर से उछला था। आखिरकार उनको लालबत्ती फिर नसीब हुई और वे मंत्री बनने में कामयाब रहे लेकिन इस बार की जीत और मंत्री पद ओला की उम्र बढ़ाने में सहायक साबित नहीं हुए। उम्र के 86 बसंत देखने के बाद लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए ओला ने रविवार अलसुबह आखिरी सांस ली।
गांव से लेकर जिले और फिर प्रदेश में लम्बी राजनीतिक पारी खेलने के बाद ओला ने केन्द्र में अपनी ताकत का एहसास करवाया। कांग्रेस में रहते हुए भी और कांग्रेस के बाहर रहकर भी। हालिया विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में हस्तक्षेप के चलते ओला चर्चाओं के केन्द्र में रहे लेकिन बीमारी की वजह से वे चुनाव प्रचार नहीं कर पाए। उनकी बीमारी को भी उनके प्रतिद्वंद्वी एक राजनीतिक स्टंट मान रहे थे। दबी जुबान में यह कहा जा रहा था कि ओला की बीमारी एक बहाना है और वे सहानुभूति बटोरकर वोट पाने के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन ओला इस बार सचमुच बीमार थे। वैसे ओला का चुनाव प्रचार गजब का ही रहता था। वे घर-घर या गांव-गांव जाकर प्रचार करने में विश्वास नहीं करते थे। खुद के चुनाव में तो बिलकुल भी नहीं। लोगों के प्रति उनका विश्वास इतना प्रबल था कि वे झुंझुनू में एक होटल में बैठे-बैठे ही चुनावी गतिविधियों पर नजर रखते थे। पिछले लोकसभा चुनाव में ओला मुश्किल से दो-तीन जगह गए थे। ओला दिन में ही खुद को होटल के कमरे में बंद कर लेते और उनका सहायक कमरे के बाहर ताला लगा देता। बाहर से जब कोई ओला से मिलने आता तो कह दिया जाता कि 'नेताजी तो बाहर गए हुए हैं।' और मिलने वाले विश्वास कर लौट भी जाते..।
यह सच है कि ओला ने जिले की राजनीति में अपने समकक्ष किसी को नहीं आने दिया..। ओला पर अक्सर चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों की खिलाफत कर अपने समर्थकों के लिए काम करने के आरोप लगते रहे लेकिन ओला इन सब आरोपों से बेफ्रिक ही रहे। तमाम विरोधों और आरोपों के बावजूद ओला ने हमेशा अपना वजूद कायम रखा। जिले में नहर लाने की ओला की घोषणा पर तो पता नहीं कितने ही चुटकुले बने लेकिन ओला इन सबसे आहत हुए बिना भी लगातार नहर लाने की टेर लगाए रहे। आखिरी वक्त तक।
उनकी सादगी और रणनीतिक कौशल के कायल तो उनके विरोधी भी रहे हैं। उनके सभी दलों से संबंध थे। झुंझुनू विधानसभा में हर बार यही चर्चा रहती आई है कि कांग्रेस के साथ-साथ दूसरे दलों के प्रत्याशियों का चयन भी ओला ही करवाते हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में भी यही चर्चा थी। खैर, ओला की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि उनका हर गांव से सीधा सम्पर्क रहता था। उनकी याददाश्त भी गजब की थी। भरी भीड़ में जब कोई खड़ा होकर अपना परिचय देता तो ओला झट से उसके गांव और पिता या दादा का नाम तक बता देते। उनकी यही अदा ग्रामीणों को लुभाती थी और उनके लोकप्रिय होने का राज भी थी। आम जनप्रतिनिधियों की तरह ओला ने कभी थाना स्तर की या तबादला करवाने की राजनीति नहीं की। उनकी छवि भी आक्रामक न होकर शांत एवं सादगी पसंद नेता ही रही।
बहरहाल, शिक्षा के मामले में अग्रणी झुंझुनू जिले के लोगों में राजनीतिक जागरुकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि झुंझुनू जिले में शायद ही ऐसा गांव हो जहां दो चार 'शीशराम' ना हो..। उस दौर में पैदा हुए बच्चों के नाम ग्रामीणों ने शीशराम रख दिए थे। यह सब इसीलिए हुआ कि ओला ने साबित कर दिखाया कि एक साधारण परिवार का आदमी भी काफी कुछ कर सकता है। ओला ने ग्रामीणों में उम्मीद जगाई और उनका विश्वास भी जीता.। एक छोटे से गांव के एक साधारण से कृषक परिवार में पैदा होकर राजनीतिक के अर्श तक पहुंचने वाले लोग विरले ही होते हैं। ओला भी उनमें एक थे। जिले में ओला की रिक्तता को भरना मुश्किल भी है।

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