Sunday, February 12, 2012

भाषण

सर्वप्रथम एक अच्छे एवं प्रासंगिक विषय का चयन करने के लिए डा. सीवी रमन विश्वविद्यालय को धन्यवाद। इस सेमीनार की परिकल्पना करने वालों को धन्यवाद और इस आयोजन में मुझे आमंत्रित करने के लिए भी धन्यवाद। 
अपनी बात शुरू करने से पहले एक रोचक जानकारी से आपको अवगत कराना चाहता हूं, हालांकि यह जानकारी भी सेमीनार की विषय वस्तु से ही संबंधित है, लेकिन बात शुरू वहीं से करता हूं। आपने बिट्‌स पिलानी का नाम तो सुना ही होगा। बताइए कितने लोग इसके बारे में जानते हैं.........? अब यह बताइए कि झुंझुनूं कहां पर है...? आप में से कम लोग ही यह जानते होंगे कि पिलानी एक छोटा सा कस्बा है और झुंझुनूं जिले के अधीन आता है। पिलानी इसलिए प्रसिद्ध हो गया क्योंकि उसने तकनीकी आधारित शिक्षा देने काम किया है। हालात यह है कि इस संस्थान में प्रवेश पाना कई युवाओं के लिए तो सपना ही रह जाता है। खैर, पिलानी और झुंझुनूं का जिक्र इसलिए किया है क्योंकि मैं स्वयं झुंझुनूं का रहने वाला हूं।  झुंझुनूं राजस्थान बेहद जागरुक जिला है। इसी जिले में मेरा गांव है। मेरा जिला साक्षरता के मामले में राजस्थान में अव्वल है। कमोबेश यही तस्वीर महिला शिक्षा की भी है।
जाहिर सी बात है कि लोग शिक्षित होंगे तो जागरुक होना भी लाजिमी है, लेकिन मेरा मानना है कि सिर्फ शिक्षित होने से ही जागरुकता नहीं आ सकती है। इसके लिए मानसिकता को भी बदलना होगा। इसके लिए भी मैं मेरे जिले का ही उदाहरण दूंगा क्योंकि यह सब मैंने न केवल प्रत्यक्ष देखा है बल्कि महसूस भी किया है। बात लम्बी एवं बड़ी जरूर है लेकिन मौका मिला है तो मैं कहने से नहीं चूकूंगा। स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद हमारे यहां बीएड करना एक परम्परा सी बन गई है। इसके अलावा युवाओं को दूसरा कोई रास्ता न दिखता है और न सूझता है। आलम देखिए, बड़े भाई ने अगर बीएड की तो छोटा भी बीएड ही कर रहा है। तभी तो अकेले झुंझुनूं जिले से जितने शिक्षक हैं, उतने राजस्थान के किसी भी जिले में नहीं हैं। आपको घर-घर में शिक्षक तथा बीएडधारी मिल जाएंगे। पति-पत्नी दोनों के शिक्षक होने या बीएडधारी होने के उदाहरण तो हजारों में हैं। आपको बता दूं कि मेरी धर्मपत्नी भी एमए बीएड है। मैंने भी बीए करने के बाद बीएड के लिए एक बार कोशिश की लेकिन भाग्य में कुछ और ही लिखा था। मेरे बड़े भाई भी शिक्षक हैं। एक भाभीजी ने भी बीएड की डिग्री हासिल कर रखी है। मतलब बीएड का जितना क्रेज युवाओं में है, उतना ही युवतियों में भी है। साथ में यह भी बता दूं कि बेरोजगार शिक्षकों के मामले में भी झुंझुनूं का पहला स्थान है। दरअसल बीएड करने के पीछे यह धारणा है कि सभी ऐसा कर रहे हैं मैं भी ऐसा कर लूं। इस भेड़चाल में शामिल मेरे जिले के युवाओं को कॅरियर के प्रति जागरुक एवं मार्गदर्शन देने वाला पथप्रदर्शक कोई नहीं है। यह एक छोटी सी तस्वीर है, जो बताती है कि मार्गदर्शन के अभाव में युवाओं के पास कॅरियर बनाने के विकल्प किस प्रकार से सीमित हो जाते हैं।
मेरे जिले से ही एक दूसरा उदाहरण है सेना में जाने का। दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद युवा सेना में भर्ती होने के लिए लालायित रहते हैं और दौड़ धूप शुरू कर देते हैं। इसका प्रमुख कारण मेरे जिले में खेती फायदा का सौदा न होना है। आजीविका का मुख्य आधार नौकरी पेशा ही है। यही कारण की दसवीं के बाद सेना में जाने की परम्परा आजादी से पहले से ही चल रही है। तभी तो अकेले झुंझुनूं जिले से करीब 60 हजार युवा भारतीय सेना में कार्यरत हैं जबकि इतने ही सेनानिवृत्त्त हैं। मेरे पिताजी एवं उनके चारों भाइयों ने न केवल सेना में नौकरी की बल्कि 1962, 1965 व 1971 के युद्धों में भी भाग लिया है। मेरे बड़े भाई भी भारतीय वायुसेना में कार्यरत हैं। मैं स्वयं भी दो बार सेना में भर्ती होने के लिए कोशिश कर चुका हूं लेकिन वहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया।
माफ कीजिएगा, मैं अपनी बात को लम्बी खींच रहा हूं लेकिन सेना और शिक्षक का उदाहरण देने की पीछे ही आज के सेमीनार की विषय वस्तु छिपी हुई है। लब्बोलुआब यह है कि  शिक्षित होने के बाद भी मानसिकता सरकारी नौकरी हासिल करने की रहती है। यही कारण है कि अधिकतर शैक्षणिक संस्थान अकादमिक शिक्षा देने तक ही सीमित हैं।  इसी वजह से अधिकतर गांवों में शिक्षित बेरोजगारों की लम्बी फौज मिल जाएगी। बेरोजगारी के पीछे प्रमुख कारण यही है कि उन्होंने रोजगार विषयक शिक्षा ग्रहण नहीं की।
मैंने आपको जो तस्वीर दिखाई है वह आज से पांच साल पहले तक ही है, हालांकि इसमे आमूलचूल परिवर्तन तो अभी भी नहीं हुआ लेकिन बदलाव की बयार बहनी शुरू हो गई है। आरक्षण की मार तथा कड़ी प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सरकारी नौकरियां अब सीमित हो गई हैं। ऐसे में रोजगारपरक शिक्षा की महत्ता काफी बढ़ गई है।
तभी तो अकेले मेरे जिले में ही तीन निजी विश्वविद्यालय पिछले पांच साल में खुले हैं जबकि दो निकट भविष्य में खुलने वाले हैं। इन सभी विवि का ध्यान अकादमिक शिक्षा के बजाय रोजगारपरक पढ़ाई एवं कोर्सेज पर ही केन्द्रित है।  पिछले पांच साल से मैंने देखा है कि आईआईटी में अकेले झुंझुनूं से 15 से 20  छात्रों का चयन प्रति वर्ष हो रहा है। ऐसे परम्परागत जिले में इस प्रकार लीक से हटकर काम कर उसमें सफलता पाना अपने आप में बड़ी बात है।
खैर, मौजूदा समय में व्यवसायिक शिक्षा निहायत जरूरी है लेकिन इसके लिए कुछ चुनौतियां भी हैं, मसलन, जागरुकता का अभाव, परम्परागत ढर्रे का असर, सरकारी नौकरी के प्रति मोह, सरकारी प्राइवेट में भेद, प्रचार-प्रसार का अभाव, विवाह में सरकारी नौकरी वालों को प्राथमिकता, अकादमिक शिक्षा का अंधानुकरण, सस्ती शिक्षा का लालच, मार्गदर्शन का अभाव आदि प्रमुख है।
सरकारी नौकरी तथा उसके रुआब से इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन प्राइवेट क्षेत्र में आज ने केवल काफी संभावनाएं हैं,बल्कि पैसा एवं प्रतिष्ठा दोनों हैं। सरकारी नौकरी का मोह छोड़कर व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण करने वालों के लिए मैं राजस्थान में बेहद प्रचलित दोहे का उल्लेख जरूर करना चाहूंगा,  जिसमें कहा गया है कि, लीक लीक घोड़ा चले, लीक ही चले कपूत, लीक छोड़ तीन चले, शायर, सिंह, सपूत। कहने का तात्पर्य है जो लीक से हटकर चलते हैं, वे इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाते हैं।
व्यावसायिक एवं रोजगारपरक शिक्षा आज जरूरी है और समय की मांग भी है लेकिन भारत में इस दिशा में देरी से सोचा गया वरना आज तस्वीर ही दूसरी होती है। जितना गंभीरता अब दिखाई जा रही है उतनी पहले बरती जाती तो शायद हमारे देश की प्रतिभाएं दूसरे देशों में पलायन करने की बजाय यहीं रुकती। इससे देश को फायदा भी मिलता। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 15 से 25 आयु समूह के युवाओं में आज भी भारतीय सामान्य विवि के कार्यक्रमों में दाखिल लेते हैं जबकि यूरोप में 80 फीसदी तथा मलेशिया, कोरिया व ताइवान जैसी पूर्वी एशियाई देशों में 60 प्रतिशत युवा व्यवसायिक शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं। तभी तो बाजार में दिखाई देने वाले लगभग हर उत्पाद में चीन के सामान की धमक दिखाई देती है।
चीन का भारतीय बाजार पर कब्जे करने के अंकगणित को भी हमें समझना होगा।  भारत में जहां 51 सौ औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान तथा 1745 पोलिटेक्नीक कॉलेज हैं, वहीं चीन में इनकी संख्या लाखों में है। भले ही व्यावसायिक प्रशिक्षण में फिल्म, टेलीविजन, सूचना प्रौद्योगिकी के मामले भारत आगे है लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 18 से 25 आयु वर्ग के तीन सौ लाख युवा बेरोजगार हैं जबकि46 लाख रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत हैं।
सरकारी सेवाओं में घटते अवसरों तथा निजी क्षेत्र में व्यापक संभावनाओं को देखते हुए भारत सरकार की ओर से  2008-09 में एनएसडीएल.... नेशनल  स्कील डवलपमेंट कोरपोरेशन की स्थापना की गई। इसका उद्‌देश्य 2022 तक करीब 50  करोड़ लोगों को विभिन्न प्रकार के कौशलों से अवगत श्रमिकों की श्रेणी में लाने तथा जो कुशल वर्ग में आते हैं, उनकी कुशलता में और इजाफा करने के लक्ष्य में करीब 30 प्रतिशत तक का महत्वपूर्ण योगदान करने का है जो कि मुख्यतया निजी क्षेत्र से आएगा। एनएसडीएल वित्त मंत्रालय के अधीन है तथा  यह बगैर लाभ के काम करती है। इसकी मूल पूंजी 10 करोड़ हैं। इसमें 49 प्रतिशत शेयर सरकार के पास जबकि 51  फीसदी निजी क्षेत्र के हाथों में है। इस संस्था से देश में कौशलता को सुधारने में काफी मदद मिलेगी। प्राइवेट सेक्टर में भरपूर संभावनाओं के वाले बीस क्षेत्र हैं। इनमें दस औद्योगिक तथा दस सेवा क्षेत्र हैं। औद्योगिक क्षेत्र में वाहन तथा उनके पुर्जों से जुड़े उद्योग, इलेक्ट्रोनिक्स, कपड़ा तथा वस्त्र उद्योग, चमड़ा तथा चमड़े की सामग्र से जुड़े उद्योग, रसायन तथा औषधि उद्योग, जवाहरात तथा कीमती पत्थर उद्योग, गृह तथा ढांचागत निर्माण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, हस्तकरघा तथा हस्तशिल्प उद्योग और गृह निर्माण व गृह सज्जा की वस्तुओं का उद्योग शामिल है। इसी प्रकार सेवा क्षेत्र में सूचना तकनीक व साफ्टवेयर सेवा, सूचना तकनीक पर आधारित सेवा जैसी बीपीओ, पर्यटन तथा होटल उद्योग, यातायात, सामान का वहन व पैकेजिंग, सुनियोजित खुदा व्यापार, रियल इस्टेट सेवा, मीडिया, मनोरंजन, ब्रोडकास्टिंग, एनिमेशन तथा लेखन से जुड़ी सेवा, स्वास्थ सेवा, बैंकिंग बीमा तथा वित्तीय सेवा और शिक्षण-कौशल विकास के क्षेत्र शामिल हैं।
बहरहाल, आपको पता दूं कि मैं खुद भी उस क्षेत्र में हूं जो सेवा क्षेत्र में आता है। मीडिया में भी वर्तमान में रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। यहां सिर्फ लेखन ही नहीं बल्कि कई सेक्टर हैं जहां कॅरियर बनाया जा सकता है। आखिर में फिर पुरानी बात पर लौटता हूं कि आज से १२ साल पहले मैं जब इस क्षेत्र में आया  था तो मेरे गांव के लोगों को पता ही नहीं था कि मीडिया क्या है। मैं जब भी गांव जाता वे जिज्ञासावश पूछ लेते, अखबार में आप क्या करते हो? कहीं आप अखबार बांटने का काम तो नहीं करते? आदि-आदि।  यह सब बातें मैँ इसलिए शेयर कर रहा हूं क्योंकि लोगों का इस क्षेत्र की जानकारी ही नहीं थी। आज भी हालात बदलते नहीं है, लेकिन मैंने सरकारी का मोह को त्यागा तथा शिक्षक या सैनिक बनने की किवदंती को न केवल तोड़ा बल्कि यह भी साबित कर दिखाया है देश सेवा सिर्फ सेना में जाने से ही नहीं बल्कि पत्रकारिता के माध्यय से भी की जा सकती है। मैंने लीक को छोड़ा,  परम्परा को तोड़ा तो उसका फायदा भी मिला। मैं मेरे युवाओं साथियों की तरह बीएड कर भी लेता तो उनकी तरह आज बेरोजगारों की भीड़ में ही शामिल होता या फिर किसी निजी शिक्षण संस्थान में डेढ़-दो हजार की मासिक पगार पर नौकरी कर रहा होता। मैंने परम्परा तोड़ने का साहस दिखाया। मैंने कुछ नया करने का खतरा मोल लिया तो उसका प्रतिफल भी मुझे मिला। आज आलम यह है कि गांव जाता हूं तो कई युवा पत्रकारिता के क्षेत्र में आने को उत्सुक दिखाई देते हैं तथा मुझसे इस फील्ड में आने के तरीकों के बारे में चर्चा करते हैं।
्रसेमीनार में भाग लेने वाले युवा साथियों से इतना ही कहना चाहूंगा कि वे जिस भी क्षेत्र में जाएं पूर्ण लगन एवं निष्ठा के साथ कार्यकर महारत हासिल करें। खुद को किसी भी मामले में कमत्तर नहीं आंके। आत्मविश्वास को किसी भी सूरत में कम नहीं होने दें। मन में यह हीन भावना भी कभी न आने दें कि मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि का हूं और यह शहरी है। ऐसा कुछ नहीं है, यह केवल वहम है। सोच का फर्क है। दूसरी बात यह है कि प्राइवेट क्षेत्र में कौशल विकास करने के मौके लगातार मिलते रहते हैं, इसके लिए खुद को कभी विशेषज्ञ न मानें और निरंतर सीखते रहे। सीखने में छोटे-बड़े का भेद न हो बल्कि प्रयास यही रहे कि हम उसके अनुभवों का लाभ उठाएं। मैं स्वयं हमेशा सीखने को लालायित रहता हूं। जहां भी मौका मिलता हूं सीखता हूं, क्योंकि मैं जब से चला मेरी मंजिल पर नजर है, मेरी आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा, जैसे फलसफे में विश्वास रखता हूं।  मतलब साफ है कि अपने लक्ष्य को अपने जेहन में रखता हूं तथा उसे पाने के लिए के लिए प्रयास व मेहनत भी करता रहता हूं। आखिर में आयोजकों को अच्छे विषय पर सेमीनार करवाने तथा मुझे इसमें आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद देते हुए अपनी वाणी को विराम देना चाहूंगा।
जय हिन्द, जय भारत।

दिनांक 10 फरवरी 12  को डा. सीवीरमन विश्वविद्यालय में कौशल विकास एवं व्यावसायिक शिक्षा में विश्वविद्यालयों की भूमिका विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में बतौर विशिष्ट अतिथि दिया गया भाषण।







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