Thursday, February 27, 2014

काश, बयान का समर्थन होता...!!!


बस यूं ही 

गरीब की कोई जाति नहीं होती है। और हमारे देश में शायद ही ऐसी कोई जाति होगी, जिसमें गरीब नहीं हैं। कहने का आशय यह है कि हर जाति में गरीब व अमीर मिल जाएंगे। हां, इतना जरूर है कि गरीब-अमीर का प्रतिशत कुछ ऊपर-नीचे जरूर हो सकता है, लेकिन मिलेंगे सब जातियों में। इसके बावजूद हमारे देश की सियासत आजादी के समय से ही गरीबी का आधार जाति को मानती रही है, ताकि वोट बैंक सुरक्षित रहे। समय-समय पर आरक्षण विधेयकों में बहुत संशोधन किए गए। प्रतिशत घटाने-बढ़ाने का अंकगणित भी खूब चला लेकिन केन्द्र बिन्दु में जाति ही रही। जिस जाति का ज्यादा वोट बैंक उसको आरक्षण देने में या उनका कोटा बढ़ाने में प्राथमिकता बरती गई। और इसी आधार पर आरक्षण का लाभ भी दे दिया। वोट बैंक खिसकने एवं जनाधार कम होने के डर से किसी ने भी सच जानने के बावजूद आरक्षण के खिलाफ बोलने का साहस नहीं किया। विशेषकर, चुनाव के आसपास आरक्षण को लेकर राजनीतिक शिगूफे प्रायोजित तरीके से छोड़े जाते हैं, ताकि मतदाताओं की भावनाओं का भरपूर दोहन कर लाभ उठाया जा सके। कुछ इसी तरह का शिगूफा हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने छेड़ा है। जाति आधारित आरक्षण खत्म करने की वकालत करते हुए द्विवेदी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से आग्रह किया है कि वे इस मामले में पहल करें। द्विवेदी यहीं नहीं रुके, साहसिक अंदाज में उन्होंने यह तक कह दिया कि .. सामाजिक न्याय की अवधारणा आजकल जातिवाद में बदल गई है। इसे खत्म करने की जरूरत है।
कांग्रेस नेता द्विवेदी के इस ऐतिहासिक बयान के कई मायने हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि साठ के दशक से राजनीति करते आ रहे द्विवेदी का यह नया बयान राजनीति से प्रेरित नहीं है। लेकिन सबसे यक्ष सवाल यही है कि आजादी से लेकर अब सर्वाधिक सत्ता में रही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता को यह नेक और सद्विचार इतने लम्बे समय के बाद क्यों आया? दरअसल, मौजूदा दौर में चुनावी रण में इतने दल हो गए हैं कि अब चुनाव जीतना आसान काम नहीं है। जिस आरक्षण के नाम पर राजनीतिक दल और उनके नुमाइंदे चुनावी वैतरणी पार करते थे, उस पर अब कई दल सवार हैं। जातियों के भी कई पैरोकार पैदा हो गए हैं। ऐसे में आरक्षण देने का श्रेय कई दलों में बंट गया है। आरक्षण का अब उम्मीदानुसार फायदा किसी दल को नहीं मिल पा रहा है। इसलिए आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित करना कांग्रेस नेता की एक तरह से देखा जाए तो मजबूरी भी है। द्विवेदी को उम्मीद है कि अगर कांग्रेस ऐसा करने में कामयाब रही तो आरक्षण से वंचित तबका उसके खेमे आ सकता है। और इसी मसले के सहारे के कांग्रेस फिर सत्ता में वापसी कर सकती है।
बहरहाल, देश में जाति आधारित आरक्षण की बुनियाद रखने में कांग्रेस का ही प्रमुख योगदान था। उस वक्त आरक्षण का मुख्य उद्देश्य दबे, कुचले एवं पिछड़े लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोडऩा था। यह बात राजनीतिज्ञों को बहुत जल्दी समझ में आ गई थी कि जिन उद्देश्यों से आरक्षण की परिकल्पना कर इसे लागू किया गया था, वह उन उद्देश्यों पर खरा नहीं उतर रहा है। चंद लोग ही इसका फायदा उठा रहे हैं। दबा कुचला वर्ग मुख्यधारा से नहीं जुड़ पा रहा, आदि-आदि। यह कड़वा सच जानने के बाद कमोबेश सभी राजनीतिक दल इसको नजरअंदाज करते रहे, क्योंकि यह ऐसा मसला था, जिसका विरोध करने का मतलब सीधे-सीधे आरक्षण से लाभान्वित तबके को नाराज करना था। ऐसे में गरीबी के आधार पर आरक्षण के बात दरकिनार की जाती रही। आजादी के 67 साल बाद अब कांग्रेस नेता द्विवेदी को लग रहा है कि आरक्षण का आधार जाति ना होकर गरीबी ही होना चाहिए था। वैसे द्विवेदी भले ही गरीबी के आधार पर आरक्षण की पैरवी कर इसमें अपना नफा-नुकसान तलाशे लेकिन यह सुझाव बुरा नहीं है। सभी दलों को राजनीतिक चश्मे से इतर इस मसले पर गंभीरता दिखानी चाहिए ताकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को सही मायनों में जिंदा रखा जा सके। वैसे इस मसले पर अगर सभी राजनीतिक दल सहमत होते हैं तो यह देर से ही लेकिन एक कालजयी फैसला होगा, जिसके कई तरह के दूरगामी फायदे होंगे।
वैसे बयान को लेकर कांग्रेस ने खंडन जारी कर दिया है। पार्टी का कहना है कि यह जनार्दन द्विवेदी के निजी विचार हैं, पार्टी का इससे कोई सरोकार नहीं है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी द्विवेदी के बयान से खुद को अलग करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा से ही आरक्षण का समर्थन करती आई है और इसे लेकर उसकी नीतियां जगजाहिर हैं। काश, द्विवेदी के बयान का पार्टी समर्थन करती। सुझाव पर अमलकरने का साहस दिखाती लेकिन ऐसा हो न सका। इस सारे घटनाक्रम से यह बात तो सामने आती है कि नेताओं को हकीकत तो पता है लेकिन जानबूझकर वो अपने लब सीलकर रखते हैं। द्विवेदी ने लब खोलने की हिम्मत दिखाई लेकिन पार्टी ने पल्ला झाड़ लिया।

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