Friday, April 21, 2017

राशन पर हो हल्ले का है पुराना इतिहास


बस यूं ही 
सीमा सुरक्षा बल के जवान द्वारा खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाने की बात कोई नर्ई नहीं है। सेना व अद्र्धसैनिक बलों में खाने को लेकर हो हल्ला पहले भी मचता रहा है। आज सुबह चाय के दौरान पापाजी से सेना के खाने को लेकर चर्चा चल पड़ी। बातों-बातों में वो अतीत में चले गए। कहने लगे राशन की गुणवत्ता को लेकर सेना में इस तरह के हो हल्ले पहले होते रहे हैं। पापाजी ने सन 1965 के युद्ध के बाद का वाकया बताया कि उस दौरान नासिक थे. उनको लंगर कंमाडर बनाया गया था। यह जिम्मेदारी अस्थायी रूप से होती थी और दो माह के लिए दी जाती थी। स्टोर से राशन संबंधित रेजीमेंट में आता था और वहां से कंपनीज में। हर कंपनीज में लंगर कंमाडर होते थे जिनकी निगरानी में भोजन तैयार होता था। पापा जी ने बताया कि उस वक्त ज्यादा मारामारी रोटियों को लेकर होती थी, जबकि एक जवान के लिए छह सौ ग्राम आटा निर्धारित था। इसके बावजूद उनको रोटियां गिन-गिन कर दी जाती थी। पापाजी ने बताया कि उन्होंने पहला काम यह किया है जवान को रोटी गिन के नहीं बल्कि वो जितनी खाता है उतनी दी जाए। पापाजी ने बताया कि एक दिन उन्होंने देखा कि लांगरी मतलब भोजन बनाने वाला कुक अपने एप्रीन में बहुत सारी रोटियां छिपा रहा था। पापाजी ने उसका टोका तो वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसके बाद पापाजी ने वहां नियम बना दिया कि जो लांगरी भोजन करना चाहता है वह वहीं करे लेकिन जाते समय एप्रीन को झाड़ कर ही जाएगा। बस फिर क्या था। हो हल्ला बंद हो गया। न केवल रोटियां बचने लगी बल्कि राशन भी बचने लगा। दो माह के बचे राशन को स्टोर में जमा करवा दिया गया।
खैर, इस वृतांत से मैं यह समझा कि राशन पर विवाद की कहानी पुरानी है। इसमें सबसे पहले तो लंगर कमांडर की भूमिका की महत्वूपर्ण होती है। उसकी मर्जी के बिना कुछ भी संभव नहीं है। पापाजी की बात से यह भी साबित होता है राशन की कोई कमी नहीं है बशर्ते उसका वितरण हिसाब से हो। हां राशन को बाजार में बेचने के जो आरोप लगते हैं, उनके पीछे भी प्रमुख रूप से दो कारण हो सकते हैं। ईमानदारी से बचे राशन को स्टोर में जमा न करवाकर सीधे बेच देना या फिर मात्रा में कटौती कर राशन बचाना और फिर उसे बेच देना, लेकिन सैन्य नियमों के तहत ऐसा करना अपराध है। कोई अगर ऐसा करता है तो इसमें गिने-चुने लोगों की भूमिका हो सकती है। समूची सेना इसके लिए न तो जिम्मेदार है और न ही उसको बदनाम करना चाहिए। वैसे यह सेना का अंदरूनी मामला है और जब इस तरह की शिकायतें होती हैं तो उन पर अमल भी होता है।

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