Tuesday, November 14, 2017

कुछ तो तरस खाओ...

टिप्पणी 
सुबह सुहानी है ना यहां की शाम सिंदूरी है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त के मनोरम एवं आकर्षक प्राकृतिक नजारे को देखे हुए तो मुद्दत हो गई है। आसमान का रंग तक बदल गया है। पेड़ों से हरितिमा गायब हो चली है। सब जगह कालिमा का ही साम्राज्य दिखाई देता है। न शुद्ध हवा बची है ना शुद्ध पानी। जमीन अंदर से खोखली हो गई है। जल, जंगल एवं जमीन लगातार कम हो रहे हैं। हर तरफ राखड़ के ढेर लगे हैं। प्रदूषण की मार से तो शहर कोई कोना अछूता नहीं बचा है। जी हां, ऊर्जानगरी के नाम से विख्यात कोरबा जिले के साथ यह दर्दनाक सच जुड़ा हुआ है। वैसे भी कोरबा का नाम देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में पांचवें स्थान पर है। प्रतिदिन 55 हजार टन कोयले की राख अकेले कोरबा से निकल रही है। यही रफ्तार रही तो आने वाले समय में प्रदूषण के मामले में कोरबा पहले पायदान पर आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रदूषण से त्रस्त कोरबा के लोगों की चिंता न राज्य को है ना केन्द्र को। यहां की औद्योगिक इकाइयों को भी इससे कोई सरोकार नहीं है। सब यहीं से कमा रहे हैं लेकिन देने के नाम पर सभी के माथे पर बल पड़ते हैं। प्रदूषण को कम करने के लिए बने एक्शन प्लान का उदाहरण सबके सामने है। एक्शन प्लान को लागू करने के लिए जो राशि चाहिए, उसके लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। गेंद एक दूसरे के पाले में डालकर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा जा रहा है।
कोयला निकालने तथा बिजली पैदा करने की इस अंधी दौड़ में विकास के मुद्दे तो सिरे से ही गौण हो गए हैं। विडम्बना देखिए छत्तीसगढ़ के अलावा देश के सात राज्यों में बिजली निर्यात करने वाले कोरबा जिले के ही चालीस गांवों के लोग आज भी चिमनी एवं लालटेन के भरोसे हैं। पावर हब के नाम से विख्यात छत्तीसगढ़ एवं कोरबा जिले के लिए इससे शर्मनाक बात भला और क्या होगी। कोरबा में सरकारी दफ्तरों के लिए जमीन भले ही ना मिले लेकिन पावर प्लांट स्थापित करने में कोई दिक्कत नहीं है। आलम देखिए कि जिले का किसान पानी के लिए तरस रहा है जबकि पड़ोसी जिले रायगढ़ एवं जांजगीर चाम्पा में कोरबा के पानी से खेती लहलहा रही है। सरकार चाहे तो क्या नहीं हो सकता लेकिन यहां की खेती को भी सुनियोजित तरीके से उजाड़ा जा रहा है, ताकि औद्योगिक इकाई स्थापित करने के लिए जमीन आसानी से सुलभ हो जाए।
कोरबा में स्थापित सरकारी एवं निजी उपक्रमों पर नजर डालें तो उनकी नियत में खोट साफ नजर आता है। यह एक तरह से यहां के लोगों के साथ सरासर नाइंसाफी ही तो है। एसईसीएल यहां से खूब कमा रहा है लेकिन बदले में क्या दिया? अपोलो अस्पताल बिलासपुर में तो मेडिकल कॉलेज मनेन्द्रगढ़ चला गया। यहां के लोग बस सपने ही देखते रह गए। यही हाल बालको के हैं। यहां के लोगों के स्वास्थ्य को दरकिनार एवं नजरदअंदाज करते हुए बालको की ओर से रायपुर में तीन सौ करोड़ रुपए का केन्सर अस्पताल खोला जा रहा है। एनटीपीसी की हालत भी कुछ ऐसी ही है। भले ही उसने आईटीआई एवं इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना में सहयोग किया हो लेकिन एनटीपीसी के सहयोग से ही ट्रिपल आईटी की स्थापना राजनांदगांव में की जा रही है। कोरबा की बहुत सी प्रतिभाएं उच्च अध्ययन के लिए पलायन करने का मजबूर है लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया गया। छत्तीसगढ़ पावर जनरेशन कंपनी के अकेले कोरबा में चार प्लांट हैं लेकिन कंपनी अपना मुख्यालय तक यहां नहीं खोल पाई। कंपनी का मुख्यालय कोरबा में ही प्रस्तावित था, इसके लिए आंदोलन भी हुए लेकिन वह चुपचाप रायपुर में स्थापित कर दिया गया। कमोबेश यही हाल रेलवे का है। कोयले के लदान के लिए कोरबा से प्रतिदिन 34 से 38 के बीच मालगाडिय़ों का संचालन होता है लेकिन सवारी गाडिय़ों की संख्या इनके मुकाबले बेहद कम है। रेलवे स्टेशन को आदर्श स्टेशन बनाने का काम भी बेहद धीमा है। शहर को दो भागों में बांटने वाली लाइन पर बने फाटकों पर वाहन चालक घंटों परेशान होते हैं लेकिन रेलवे उनके लिए ओवरब्रिज तक नहीं बना पाया है। किसी प्लांट में कोयले के लदान का मामला होता तो रेलवे लाइन बिछाने में एक पल की भी देरी नहीं करता।
शहर के वर्तमान हालात के लिए औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ नगर निगम भी कम जिम्मेदार नहीं है। वह औद्योगिक इकाइयों से टैक्स तो वसूल रहा है लेकिन शहरवासियों के हित पर खर्च करने का अनुपात बेहद कम है। शहर की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यह करीब 30 किलोमीटर में फैला है लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर कोई सुविधा नहीं है। ऑटोचालक मनमर्जी का किराया वसूलते हैं। पेयजल समस्या का कोई स्थायी हल नहीं है। डे्रनेज एवं सीवरेज सिस्टम की तो कल्पना ही नहीं की गई है। आधुनिक सब्जी मंडी का मामला अधरझूल में है। एल्यूमिनियम पार्क, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी व सरकारी दफ्तरों के लिए जमीन उपलब्ध कराने तक के मामले लम्बित चल रहे हैं। इतना ही नहीं प्रदूषण की मार से बीमार हो रहे कोरबा के लोगों के लिए सभी सुविधाओं से परिपूर्ण अस्पताल तक भी नहीं है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी भी लगातार बनी हुई है। जरूरतों को देखते हुए मेडिकल एवं माइनिंग कॉलेज की मांग यहां से लगातार उठती रही है। इतना ही नहीं बेरोजगारों की लम्बी चौड़ी फौज के लिए रोजगार के साधन खोजने के कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं।
बहरहाल, उत्पादन के नाम पर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कतई उचित नहीं है। राज्य, केन्द्र एवं औद्योगिक इकाइयों के लिए स्वास्थ्य का मामला पहली प्राथमिकता शामिल होना चाहिए। यहां के जनप्रतिनिधियों को भी इस मामले में पहल करनी चाहिए। वैसे देखा गया है कि जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान ही जनता के साथ होते हैं। वादे करते हैं आश्वासनों की रेवडिय़ां बांटते हैं लेकिन बाद में वे भी औद्योगिक इकाइयों के सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं। लम्बे समय तक कोरबा की यह उपेक्षा उचित नहीं है। ऐसा न हो कि लोगों की शराफत की इंतहा हो जाए, उससे पहले सभी को कोरबा की हालात पर तरस खाना चाहिए। देरी किसी भी कीमत पर उचित नहीं है।

धोखे की बुनियाद पर धंधा

टिप्पणी 
यह विशुद्ध रूप से धंधा है, जो केवल और केवल धोखे की बुनियाद पर टिका है। यह धंधानिहायत ही दोयम दर्जे का है, जो विश्वास व रिश्तों का कत्ल भी करता है। यह धंधा बेहद घृणित व निम्नस्तर का है, जो झूठ व फरेब के सहारे चलता है। यह धंधा एक तरह का व्यापार है, जो मानवीय मूल्यों व रिश्तों की भाषा नहीं समझता। यह धंधा कुत्सित सोच का परिणाम है, जो केवल पैसों की भाषा ही जानता है। यह धंधा लालच की नींव पर बने गठजोड़ से चलता है। इस धंध में पैसे की भूख वाले दलाल तथा'धरती का भगवान कहे जाने वाले कुछ कुछ लालची किस्म के चिकित्सक शामिल हैं जो इस कुकृत्य को अंजाम दे रहे हैं। सभ्य समाज को शर्मसार करने वाले इस धंधे में वो माता-पिता भी शामिल हैं, जो बेटे-बेटियों में भेद करते हैं और कोख में कत्ल के पाप के भागीदार बनते हैं। दरअसल, यह धंधा कोख में कत्ल करने का है। यह धंधा पैसों के बदले अजन्मे बच्चों की हत्या का है। चिंताजनक व हैरत वाली बात यह है इस धंधे में कत्ल बेटियों के साथ-बेटों का भी हो रहा है। यह बात एक बार नहीं कई बार सामने आ चुकी है। फिर भी पाप का यह खेल बदस्तूर जारी है। विशेषकर हनुमानगढ़-श्रीगंगानगर जिलों में हाल में हुए डिकॉय आपरेशन में यह बात विशेष तौर पर सामने आई कि गर्भ में बेटी बताकर भी गर्भपात करवाया जा रहा है। महज इसीलिए कि कोख में बेटा बता दिया तो फिर गर्भपात कौन करवाएगा?
बड़ा सवाल यह भी है कि कानूनी धरपकड़, तमाम सरकारी अभियानों तथा जागरुकता विषयक कार्यक्रमों के बावजूद इस धंधे पर रोक क्यों नहीं लग रही? बेटी बचाओ व समानता के नारों के बीच मानसिकता में बदलाव आ क्यों नहीं रहा है? इन सवालों से जाहिर होता है कि कहीं न कहीं कमी जरूर है। भले ही वह सरकारी स्तर पर हो या सामाजिक रूप से स्वीकार्यता की। इस कमी को चिन्हित कर उसको दूर करने की सबसे पहले जरूरत है। समाज व सरकारी प्रयासों में बिना तालमेल के समानता की बात करना बेमानी है। एकसूत्री मंथन इस बात पर हो आखिर मानसिकता में बदलाव कैसे व किस तरह आ सकता है। बदलाव के प्रयासों पर सर्वाधिक जोर दिया जाना चाहिए। समानता में बाधक सामाजिक वर्जनाओं पर चोट हो। समानता के समर्थकों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जिलों में जरूरतमंद कन्याओं को शिक्षित करने तथा उनके हाथ पीले करवाने वाली सेवाभावी संस्थाओं की कमी नहीं है। सरकार के साथ-साथ इन संस्थाओं को भी इस दिशा में सोचना चाहिए। वैसे बेटा-बेटी में समानता में सबसे बड़ी बाधा दहेज भी है। दहेज के कारण समाज में लड़कियों को बोझ माना जाता है। दहेज का लेन-देन किस तरह से बंद हो, समाज की इसमें क्या भूमिका हो सकती है तथा सरकारी स्तर पर इसकी रोकथाम के लिए कानून में क्या संशोधन हो सकते हैं, इन सब बातों पर बड़े स्तर पर मंथन व चिंतन की जरूरत है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 8 अप्रेल 17 के अंक में प्रकाशित 

हे मां! एेसा रोज क्यों नहीं होता

टिप्पणी 
हे मां दुर्गा! यह मान मनुहार का दिन साल में एक-दो बार ही क्यों आता है? हे आदिशक्ति! यह खुले हाथ से उपहारों की बारिश एक दो दिन होकर थम क्यों जाती है? हे महाकाली! यह पूछ परख का सिलसिला अवसर विशेष का मोहताज क्यों बना हुआ है? हे शैलपुत्री! यह स्वागत सत्कार का दौर एक दो दिन तक ही सीमित क्यों है? हे ब्रह्मचारिणी! यह आदर व मान-सम्मान देने का मौका रोज क्यों नहीं आता है? हे चंद्रघटा! मां व बहन का स्वरूप आप में सिर्फ आज की क्यों दिखाई देता है? हे कुष्माण्डा! यह मेहमानों जैसी आवभगत साल भर में कभी-कभार ही क्यों होती है? हे कालरात्रि ! यह अपने-पराये का भेद सिर्फ दो दिन के लिए ही क्यों भुलाया जाता है? हे महागौरी! साल भर दूरी रखने वाले के दिलों में प्रेम व स्नेह की धारा अचानक ही कैसे बहने लगती है? हे सिद्धिदात्री! महज दो दिन के लिए धर्म-सम्प्रदाय की बातें गौण कैसे हो जाती हैं? हे स्कंदमाता! पुरुष प्रधान समाज की सोच चमत्कारिक रूप से यकायक कैसे बदल जाती है? हे कात्यायनी! यह कथनी एवं करनी में भेद क्यों है? हे महिषासुर मर्दिनी! एक साथ इतने सवाल पूछने की गुस्ताखी माफ करना। सवाल पूछने का इससे मुफीद मौका और हो भी नहीं सकता। नवरात्र पर आज दिन भर बेटियों की खूब आवभगत हुई। शक्ति स्वरूपा मानकर बेटियों की पूजा की गई। घोर आश्चर्य एवं खुशी तो उन बहनों को देखकर हुई जो समाज की मुख्य धारा से कटी हुई है और खेलने खाने की उम्र में सुबह से शाम तक दर-दर भटक कर भरपेट भोजन जुटाती है। हिकारत से देखी जाती हैं। याचक की भूमिका में दुत्कार एवं फटकार पाती हैं। आज इन बहनों की दीवाली और होली सब एक साथ थी। साफ-सुथरे कपड़ों में सजी-धजी बहनों को कभी मोटरसाइकिल पर ले जाया जा रहा था तो कभी किसी लग्जरी गाड़ी में। इतना ही नहीं आज इन बहनों के प्रति इतना प्रेम उमड़ रहा था कि जैसे वो ही सब कुछ हैं।
हे मां! छोटा मुंह बड़ी बात का आरोप भले ही लगे लेकिन मेरे को यह सब दिखावा लगता है। महज दिखावा। बेटियों के प्रति इतना ही स्नेह एवं प्रेम है तो वह रोज दिखाई क्यों नहीं देता? बेटियां शक्ति स्वरूपा है तो क्यों उनका कोख में ही कत्ल किया जा रहा है? आज पूजन के लिए बेटियों की तलाश करनी पड़ी इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है। वाकई बेटियों के प्रति इतनी हमदर्दी व श्रद्धा भाव है तो फिर लिंगानुपात में इतना अंतर क्यों व किसलिए है? देश में प्रति हजार पुरुषों के पीछे 943 महिलाएं हैं। यही आंकड़ा राजस्थान में आकर और भी कम हो जाता है। श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ में प्रति हजार पुरुषों के पीछे भी महिलाओं का अनुपात कम है। सोचिए, यह मान-सम्मान, यह आवभगत, यह पूछ परख अगर वाकई दिल से होती तो क्या यह आंकड़ा बराबरी पर नहीं होता?
हे मां! आपके नाम से बेटियों की पूजा करना मेरे को तो औपचारिक हीं नजर आता है। एक तरह का दस्तूर, जिसको निभाने की सब में होड़ लगी है। एक रस्म जिसको पूरी करने में सब लगे हैं। यह देखादेखी व एक दूसरे का अनुसरण करने से ज्यादा कुछ नहीं। बराबरी का दर्जा देने की बात तथा सशक्तिकरण के दावे इस औपचारिकता के आगे बेहद बौने नजर आते हैं। हे मां! सबको सदबुद्धि दो और उनकी सोच को बदलो ताकि बेटियांे के प्रति ऐसा समभाव हमेशा दिखाई दे।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ संस्करण के 5 अप्रेल 17 के अंक में प्रकाशित 

पुलिस कार्रवाई पर सवाल

टिप्पणी 
हनुमानगढ़ में एक बालिका से जबरन जिस्मफरोशी कराने का मामला सामने आने के तीन दिन बाद सक्रिय हुई पुलिस ने नौ जगह दबिश देकर देह व्यापार में संलिप्त 27 आरोपितों को पकड़कर अपनी साख बचाने की भरपूर कोशिश की है। पकड़े गए आरोपितों में सात दलाल/ ग्राहक एवं 20 महिलाएं शामिल हैं। इस कार्रवाई से यह तो साबित हुआ है कि पुलिस चाहे तो कुछ भी संभव है, लेकिन साथ में बड़ा सवाल यह भी है कि हालात यहां तक पहुंचे ही क्यों? आखिर एेसी कौनसी चूक या शह रही, जिससे देह व्यापार करने वालों के हौसले इतने बढ़ते गए कि वह पुलिस के ठीक नाक के नीचे यह धंधा बेखौफ संचालित करने लगे। कहीं न कहीं इन सवालों के जवाब तलाशेंगे तो कठघरे में पुलिस ही होगी। एक साथ कार्रवाई करने और उसमें सफलता हासिल करने से भी यही साबित होता है कि पुलिस को देह व्यापार के इन ठिकानों की जानकारी पहले से थी। और अगर जानकारी थी तो जिम्मेदार क्यों आंखें मंूदे रहे? पुलिस पर सवाल दोनों तरफ से हैं। कार्रवाई न करने पर भी और कार्रवाई करने के बाद भी। एेसा इसलिए क्योंकि जिस सुरेशिया चौकी से कुछ ही दूरी पर मासूम बालिका के सपनों व अरमानों को जबरन रौंदा जाता रहा है वह पुलिस को दिखाई नहीं दिया। लेकिन आनन-फानन में नौ ठिकाने खोज निकाले गए। अपनी खाल बचाने को पुलिस यह दलील जरूर दे सकती है कि देह व्यापार के अड्डों पर कार्रवाई से पहले ही आरोपित भूमिगत हो जाते हैं, इसलिए सफलता नहीं मिलती। खैर, किसी कार्रवाई को कितनी गोपनीयता से अंजाम दिया जाता है यह भी पुलिस से बेहतर कोई नहीं जान सकता।
हनुमागढ़ के नौरंगदेसर के पास ओवरलोड जीप का हादसा शेरगढ़ चौकी के पास हुआ। देह व्यापार का मामला भी पुलिस चौकी के पास ही हुआ। सुरेशिया में शांतिप्रिय एवं इज्जतदार लोग भी रहते हैं। लेकिन आज उस बस्ती की पहचान देह व्यापार के लिए कुख्यात बस्ती के रूप में है। जो इज्जतदार हैं वह इसलिए नहीं बोलते कि देह व्यापार का धंधा पुलिस चौकी की नाक के नीचे चल रहा है। पुलिस अधीक्षक अगर चाहें तो सुरेशिया के दस इज्जतदार लोगों को अपने दफ्तर में बुलाकर पुष्टि कर सकते हैं। खोजने पर इस तरह के उदाहरण और भी मिल जाएंगे। खास बात यह है कि इन हादसों/प्रकरणों से कोई सबक नहीं लिया जाता है। यह बात दीगर है कि तात्कालिक आक्रोश को शांत करने के उपाय जरूर खोज लिए जाते हैं। इसके बाद व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। 
बहरहाल, हनुमानगढ़ में देह व्यापार की शिकायतों को देखते हुए अभी और कार्रवाई की दरकार है। विशेष रूप से उन होटलों की गहनता से पड़ताल होनी चाहिए जिनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं। जंक्शन में बस अड्डे के आसपास ही एेसे कई होटल हैं जहां दिनदहाड़े जिस्मफरोशी की गतिविधियां संचालित होती है। आसपास के दुकानदार इन होटलों में चल रही गतिविधियों से परेशान हैं। शिकायत इसलिए नहीं करते कि पुलिस के साथ सांठगांठ का दावा होटल वाले करते रहते हैं। फिलहाल तो पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती मासूम से देह व्यापार करवाने की आरोपित महिला को पकडऩा है। संभव है उसके पकड़े जाने के बाद और कई चौंकाने वाले खुलासे हों। जरूरत ईमानदार व कारगर तथा लगातार कार्रवाई की है। सवालों से घिरी पुलिस के पास इससे बेहतर मौका और होगा भी क्या? आखिर जिस जनता की नजरों में आज वह खटक रही है, वही जनता उसको आंखों पर बैठाती है। यह पुलिस पर निर्भर करता है वह कौनसी राह चुनती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ संस्करण में 2 अप्रेल 17 को प्रकाशित

ईमानदार तहकीकत की दरकार

टिप्पणी
श्रीगंगानगर में राशन फर्जीवाड़े का मामला भले ही जयपुर पहुंच गया हो। विधानसभा में भी उठ गया हो। और तो और मंत्री ने कार्रवाई का भरोसा भी दे दिया हो लेकिन इस प्रकरण की पड़ताल ईमानदारी से होगी, इसमें संशय नजर आता है। प्रशासनिक एवं सरकार के स्तर पर अब तक हुई कार्रवाई तो कुछ इसी तरह के संकेत दे रही है। प्रकरण के खुलासे के तीन-चार दिन बाद महज दस राशन डीलरों के लाइसेंस निलंबित करने की कार्रवाई से समझा जा सकता है कि हुक्मरान इस गंभीर मसले को कितने हल्के में ले रहे हैं। सरकार की देर से की गई तथा औपचारिक व मजबूरी से भरी इस कार्रवाई से यह प्रकरण और भी संदिग्ध हो जाता है। संभव नहीं कि फर्जीवाड़े के खेल में अकेले राशन डीलर ही यह सब कर रहे थे, वह भी इतने बड़े पैमाने पर। वैसे इसकी टोपी उसके सिर रखने की होड़ ने इस फर्जीवाडे़ के सूत्रधारों, जिम्मेदारों और भागीदारों की भूमिका को भी संदेह के दायरे में ला दिया है। इसकी बानगी देखिए। राशन डीलर कहते हैं गड़बड़ी उन्होंने नहीं की, पोस मशीन खराब है या फिर ई मित्र वालों ने गड़बड़ की है। जबकि विभाग कह रहा है कि राशन उठाना आसान काम है। जिनके नाम से राशन उठाया गया है, उन्होंने राशनकार्ड आधार, भामाशाह व गैस कनेक्शन नंबर लिंक नहीं करवाए हैं। उन उपभोक्ताओं के साथ एेसा हो सकता है। विभाग की इसमें कोई गलती नहीं है। 
विभाग की दलील तो यह भी है कि ऑनलाइन काम में कंट्रोल नहीं रहता। मतलब जो कुछ हुआ उसके लिए केवल उपभोक्ता ही जिम्मेदार है। इधर, इस मामले में फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ करने वाले पार्षद तो डिपो धारक व अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं। आरोप सच्चाई के नजदीक नजर इसलिए भी आते हैं कि इस तरह का घपला जब बड़े स्तर पर होता है और कार्रवाई ऊंट के मुंह में जीरे के समान होती है। अक्सर देखा भी गया है कि फर्जीवाड़े के खेल में तालमेल से ही घालमेल होता है।
खैर, रसद विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल तो उस वक्त भी उठते रहे हैं जब राशन वितरण का काम ऑफलाइन होता रहा है। अब केवल निलंबन की कार्रवाई से भी सवाल उठते हैं। भले ही विभाग ने तात्कालिक कार्रवाई कर अपनी खाल बचाने का भरपूर प्रयास किया हो लेकिन निलंबन करना यह तो दर्शाता ही है कि गड़बड़ी हुई है। और गड़बड़ी हुई है तो फिर इसकी पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं? महज निलंबन करके रसद विभाग क्या किसी जांच से बचना चाहता है? क्या विभाग के अधिकारियों को डर है कि जांच हुई तो कहीं उसकी जद में वो न आ जाए? कहीं विभाग की भूमिका से पर्दा न उठ जाए?
बहरहाल, इस मसले में कुछ तो एेसा है ही जो अधिकारियों को इस प्रकरण को पुलिस तक ले जाने से रोक रहा है। वैसे इस प्रकरण का पर्दाफाश करने वालों को अब चुपचाप नहीं बैठना चाहिए। भ्रष्टाचार और घपले के इस खेल में शामिल सभी सूत्रधारों व भागीदारों के नाम सार्वजनिक तभी हो पाएंगे जब इसकी जांच ईमानदारी से होगी। क्योंकि सरकारी संरक्षण व शह पाकर मजबूत होने वाले गठजोड़ों की गांठ तोडऩा आसान काम नहीं होता। जांच भी स्वतंत्र एजेंसी से हो तभी दूध का दूध व पानी का पानी होने की उम्मीद है, वरना यह खेल जैसे चलता आया है वैसे ही चलता रहेगा। अनवरत... बदस्तूर...।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 30 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

...तो क्या हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं?

टिप्पणी,
श्री गंगानगर शहर के अंदर से गुजरने वाले नेशनल/स्टेट हाइवे पर अब शराब की दुकानें खुलेंगी। यह इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि राज्य सरकार ने नियमों की आड़ में पतली गली ढूंढ ली है। नए नियमों के बहाने दलील दी जा रही है कि नगर पालिका या परिषद क्षेत्र से गुजरने वाले नेशनल/स्टेट हाइवे जिनके बाइपास हैं, उन पर शराब की दुकानें खुल सकेंगी। आदेशों के तहत श्रीगंगानगर के लक्कड़ मंडी टी पाइंट से लेकर सूरतगढ़ बाइपास तक, शिव चौक से नाथांवाला बाइपास तक तथा कोडा चौक से पदमपुर बाइपास तक शराब की दुकानें खोली जा सकेंगी। नए आदेश एक अप्रेल से लागू हो जाएंगे। इन आदेशों से यह तो साफ जाहिर होता है कि कमाई के लिए राज्य सरकार कुछ भी कर सकती है और किसी भी हद तक जा सकती है। एेसा इसलिए है क्योंकि नियमों को ठेंगा दिखाने, उनमें संशोधन करने या उनको घुमा फिराकर नए सिरे से परिभाषित करने की कलाकारी सरकार व उसके हुक्मरानों को बखूबी आती है। खैर, शराब दुकानों के मामले में राज्य सरकार द्वारा इस तरह और इतने समय बाद नियमों का तोड़ निकालने से एक नई बहस जरूर खड़ी हो गई है। साथ ही कई तरह के सवाल भी हैं, जो सरकार व हुक्मरानों को कठघरे में खड़ा करते हैं। नियम बनाने वाले यह क्यों समझते हैं कि शराब का सेवन करने से हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं। शराब पीकर शहरी क्षेत्र में गाड़ी चलाने वालों से तो हादसे होते ही नहीं या फिर नगरपालिका या नगर परिषद क्षेत्र से गुजरने वाले एेसे नेशनल और स्टेट हाइवे जिनके बाइपास बने हुए हैं उन पर ही वाहन चलते हैं, वो शहर के अंदर आते ही नहीं। नियमों की आड़ में निकाले गए इस तरह के आदेशों से तो यही जाहिर होता है कि हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं और जान का खतरा भी केवल और केवल हाइवे पर ही होता है। बाकी जगह शराब पीकर किसी भी तरह गाड़ी चलाओ, जानमाल का कोई खतरा नहीं है।
राजस्व के लिए सरकार किस हद पर तक जा सकती है। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि जिस बाइपास का हवाला दिया जा रहा है वह अभी तक पूर्ण ही नहीं है। मुख्यमंत्री के उद्घाटन के बावजूद हाइवे का काम अभी तक अधूरा पड़ा है। अधिग्रहित की गई जमीन के बदले किसानों को मुआवजा वितरण अभी तक नहीं किया जा सका है। मुआवजा हुक्मरानों के बीच लंबे समय तक फुटबाल बना हुआ है। इस काम को पूर्ण करने के लिए शराब की दुकानों जैसी तत्परता दिखाई नहीं देती। हाइवे का अधूरा काम अगर तत्काल प्रभाव से भी शुरू होता है तो कम से कम छह माह पहले वह पूर्ण नहीं हो पाएगा।
बहरहाल, समूचे प्रदेश में शराब बंदी के लिए अनशन करने तथा जान की बाजी लगाने वाले शख्स के जिले में इस तरह नियमों की आड़ में दुकानें खोलना दिखाता है कि सरकार शराब के माध्यम से राजस्व प्राप्ति के लिए किस हद तक जा सकती है। यह फैसला शराबबंदी की मांग को मुखर करने वालों को ठेंगा भी दिखाता है और चिढ़ाता भी है। खैर, प्रतिबंध के बावजूद रात आठ बजे बाद शराब बेचने की अघोषित छूट की बात से इसको समझा जा सकता है कि सरकार को सिर्फ और राजस्व पसंद है, भले ही वह कैसे भी आए। जान जाती है तो चली जाए, अमन-चैन भंग होता है तो हो। सरकार को इससे सरोकार नहीं।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 25 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

धैर्य की परीक्षा कब तक?

टिप्पणी
यह सवाल है न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद का। केन्द्र की ओर से समर्थन मूल्य का निर्धारण होने तथा मंडी में सरसों की आवक शुरू होने के बावजूद अभी तक इसकी सरकारी खरीद शुरू नहीं हो पाई है। यह सवाल बहुत बड़ा है और लंबे समय से अनुतरित है। तभी तो यह कमोबेश हर साल उठता है और हर बार इसी तरह का विरोध होता है। व्यवस्थाओं में दोष के खिलाफ आक्रोश भड़कना लाजिमी है। इस कड़ी में आंदोलन होते हैं। वार्ताओं के दौर चलते है। ज्ञापन लेने की औपचारिकताएं निभाई जाती हैं तो आश्वासन की रेवडि़यां भी खूब बंटती हैं। अंततोगत्वा सियासी लाभ-हानि का गणित देखने तथा तात्कालिक परिस्थितियों के आधार पर विरोध को शांत करने के वैकल्पिक उपाय तलाशे जाते हैं। 
विडम्बना यह है कि इस तरह की प्रक्रिया हर साल दोहराई जाती है। इससे भी अफसोसजनक बात तो यह है कि हक हकूक से जुड़े मसले का कभी स्थायी समाधान नहीं खोजा जाता। जिम्मेदारों और हुक्मरानों ने रोजी-रोटी से जुड़े इस अहम सवाल को कभी गंभीरता से नहीं लिया। यह सवाल धरतीपुत्रों के हक से जुड़ा है। यह सवाल उनके कठोर परिश्रम के प्रतिफल से वाबस्ता है। यह सवाल उनके जीवन से इतना घुला-मिला और रचा बसा है कि इसके समाधान होने से ही उनके घर में खुशी आती है। 
यह सवाल है न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद का। केन्द्र की ओर से समर्थन मूल्य का निर्धारण होने तथा मंडी में सरसों की आवक शुरू होने के बावजूद अभी तक इसकी सरकारी खरीद शुरू नहीं हो पाई है। इसी मांग को लेकर श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले के धरतीपुत्र आंदोलन की राह पर हैं। उनमें आक्रोश उबल रहा है लेकिन जिम्मेदारों व हुक्मरानों के पास अभी कोई ठोस समाधान या आश्वासन नहीं है। सरकारी प्रयासों की बानगी देखिए कि श्रीगंगानगर जिले में अभी तक चने की सरकारी खरीद के लिए केवल एक केन्द्र बनाया गया है तथा गेहूं के लिए 34 केन्द्रों की स्थापना की गई है, लेकिन सरसों के लिए खरीद केन्द्र तक बनाने की जरूरत नहीं समझी गई। इससे समझा जा सकता है कि सरकार खरीद मामले में कितनी गंभीर है और किसानों की कितनी हमदर्द है। 
प्रदेश को धन-धान्य से परिपूर्ण करने वाले जिलों में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ का योगदान किसी से छिपा हुआ नहीं है, लेकिन यह सब करने के लिए किसान को पग-पग पर परीक्षा देनी पड़ती है। सड़कों पर आना पड़ता है। कभी पानी के लिए, कभी बारी के लिए। वह जैसे-तैसे इन समस्याओं से निबटता है तो फिर खरीद के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। दिन-रात एक कर कठोर परिश्रम दम पर रिकॉर्डतोड़ पैदावार लेने वाले धरतीपुत्र को उसकी मेहनत का वाजिब हक आखिरकार क्यों नहीं मिलता? 
बहरहाल, यह तो जगजाहिर है कि श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के किसानों ने अपनी मेहनत व लगन के दम पर दोनों ही जिलों को कृषि के मामले में अव्वल बनाया है। सरकारी स्तर पर पानी से लेकर जिंसों की खरीद तक उन्हें सहुलियत मिले तो नि:संदेह दोनों जिलों के खाते में उपलब्धियों के और भी रिकॉर्ड होंगे। पर यह सब सरकार व उनके हुक्मरानों की इच्छाशक्ति एवं संवदेनशीलता पर निर्भर करता है। धरतीपुत्रों की धैर्य की परीक्षा अब खत्म होनी चाहिए। उनके साथ सरकारी स्तर की यह संवेदनहीनता व नाइंसाफी किसी भी कीमत पर उचित नहीं है।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 22 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

लखटकिया प्रेम विवाह

लघुकथा
वो बिंदास अंदाज में कहे जा रहा था। बिलकुल बेझिझक व निसंकोच।दुनियादारी से अनजान व बेखबर वह अपने मित्रों से मुखातिब था। अचानक उसके शब्दों ने मेरा ध्यान खींचा। वह कहे जा रहा था, अंतरजातीय विवाह करने के बहुत फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि पांच लाख रुपए मिलते हैं। इतने में दूसरे मित्र ने उसकी हां में हां मिलाते हुए इसे नाम दिया लखटकिया प्रेम विवाह। फिर जोर से हंसी का ठहाका गूंजा। सभी ने ताली बजाने वाले अंदाज में एक दूसरे के हाथ पर हाथ मारा। फिर एक बोला, बेरोजगारी के दौर में यह आइडिया भी बुरा नहीं है। मैं चुपचाप यह सब देख व सुन रहा था। अचानक जेहन में विचारों का द्वंद्व शुरू हो गया। प्रेम दिलों से पैसों तक आ पहुंचा है। न चाहते हुए भी रह-रहकर मेरे कानों में प्रेम विवाह का नया नामकरण लखटकिया प्रेम विवाह गूंज रहा था।

बीकानेर के लोग और होली

मेरा दावा है कि राजस्थान में बीकानेर जैसी होली शायद ही कहीं देखने को मिले। पिछले साल बीकानेर की तणी तोड़ होली देखी थी। इस बार की होली श्रीगंगानगर में मनाई। रंग लगवाने व लगाने की परम्परा तो कमोबेश सभी जगह एक जैसी ही है लेकिन जिस मस्ती में जी कर तथा आनंद से सराबोर होकर बीकानेर के लोग होली मनाते हैं, उसका तो कहना ही क्या। हालांकि बीकानेर की होली के गीत व रसियों की गतिविधियां मर्यादाओं की परिधियां लांघ जाती हैं। फिर भी वहां के स्थानीय लोगों के यह सब आदत में आ चुका है। लिहाजा, उनको यह सब करना और देखना बिलकुल भी अजीब या अटपटा नहीं लगता। मस्ती व मनोरंजन के साथ जीना, साफगोई तथा आरामतलबी जैसी न जाने कितनी ही विशिष्टताएं बीकानेर के लोगों के खून में हैं। तभी तो बीकानेर के लोग कहीं पर भी हो अपनी छाप छोड़ते जरूर हैं। इतना सब कहने और भूमिका बांधने का सबब यही है कि श्रीगंगानगर में भी एक शख्स एेसा है जो बीकानेर की संस्कृति को जिंदा रखे हुए हैं। उम्र के सात दशक पार करने के बावजूद होली को शिद्दत से मनाने तथा उसको मस्ती एवं आनंद के उल्लास में जीने का अंदाज देखकर अच्छे खासे नौजवानों को भी इस 'युवा' से रस्क होता है।
बेहद हंसोड़ व जिंदादिल यह शख्स फरीद खान हैं । जी हां सेवानिवृत जनसंपर्क अधिकारी फरीद खान। मूलत: बीकानेर के रहने वाले हैं लेकिन घर श्रीगंगानगर में बना लिया है, लिहाजा संपर्क दोनों जगह ही है। पारिवारिक परेशानियों के चलते पिछले कुछ समय से इन्होंने खुद को खुद तक सीमित कर लिया था। हाल ही में राजस्थान पत्रिका में होली पर पुराने संस्मरण पर आधारित उनका साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था। बस फिर क्या था उनके अंदर का कलाकार फिर से जाग उठा। शाम को फोन करके बाकायदा निमंत्रण दिया। उनके आग्रह को मैं टाल नहीं सका और सुबह कार लेकर पत्रकार कॉलोनी की तरफ चल पड़ा। यह कॉलोनी अभी भी विकसित नहीं हुई है। मुझे बताया गया पार्क तलाशने में थोड़ा वक्त लगा। मैं रस्ते में था कि फोन आया। सामने से मर्दाना आवाज थी लेकिन कोई महिला बनकर बोल रहा था। आवाज आई शेखावत जी मैं बबीता हूं बीकानेर से आपसे मिलने आई हूं। आप कहां मिलेंगे। चूंकि होली के दिन इस तरह के मजाक से मैं वाकिफ था लिहाजा मैंने भी मजाकिया अंदाज में ही जवाब दिया और कहा कि बबीता जी बीकानेर में भी बहुत शेखावत हैं, आपने श्रीगंगानगर आने का कष्ट क्यों किया। इतना कहते ही फोन कट गया। थोड़ी देर बाद फिर फोन आया। वो ही बात, अरे शेखावत जी, मैं बबीता बोल रही हूं आपने मेरा फोन कैसे काटा। मैंने हंसते हुए जी मैंने फोन नहीं काटा, आपकी आवाज आना बंद हो गई थी। खैर, फोन फिर कट गया। आखिरकार मैं कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने में सफल रहा। वहां सारे ही अपरिचित चेहरे से एकबारगी तो मैं चौंका कि कहीं दूसरी जगह तो नहीं आ गया लेकिन बाद में फरीद खान जी के बेटे अमित से मुलाकात हुई। थोड़ी देर बात फरीद खान जी बड़ा सा पर्स लटकाए। टी शर्ट व स्कर्ट पहने पार्क में आए तो मेरी हंसी छूट पड़ी। आते ही उन्होंने आव देखा न ताव मुझे बांहों में भर लिया और कहने लगे देखो, आप बबीता से मिलने आ ही गए। पार्क में डेक पर होली के गीत बज रहे थे। फरीद खान जी के दो तीन रिटायर साथी भी वहां पूरे जोश व जुनून के साथ मैदान में डटे थे। दो तीन बार मुझे हाथ पकड़कर ले जाया गया लेकिन मैं केवल उनको प्रोत्साहित कर वापस आ जाता। करीब दो घंटे वहां रुकने के बाद मैं घर लौट आया, लेकिन फरीद खान की जिंदादिली व संजीदगी का कायल हो गया। उन्होंने पूरी कॉलोनी में जा जाकर महिलाओं को पार्क आने का निमंत्रण दिया। उनकी धर्मपत्नी व दोनों पुत्रों की पत्नियां भी वहां मौजूद थीं। वे बार-बार उनके पास जाकर नाचने को कहते लेकिन धर्मपत्नी तैयार नहीं हुई हालांकि मेरे के आने के बाद महिलाएं नाची थी लेकिन जब वे नाच नहीं रही थीं तो फरीद खान कहने लगे शेखावत जी, यह महिला सशक्तीकरण कागजों में ही है। सत्तर साल बाद भी इस तरह का शर्म संकोच किस काम का।
आज फेसबुक पर कल के कार्यक्रम के वीडियो देख रहा था तो सोचा क्यों न इस संस्मरण को शब्द दिए जाएं। वाकई फरीद खान जैसे शख्स ही हैं जिनके दम पर त्योहारों की अहमियत बढ़ जाती है। सच्चा हिन्दुस्तान एेसे ही लोगों के दिलों में बसता है। अल्लाह ताला फरीद खान साहब को लंबी उम्र दें। वे स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों।

कुएं में ही भांग!

टिप्पणी 
तय समय से भी देर तक अगर शराब की दुकानें खुली हुई दिखाई दे जाए तो बिना किसी शक सुबहा के यह मान लेना चाहिए कि यह सब गैरकानूनी रूप से बने गठजोड़ का कमाल है। ठेकों पर ठरके के साथ दिन दहाड़े निर्धारित से ज्यादा कीमत वसूली जाए तो यह जान लेना चाहिए कि यह सब जिम्मेदारों की जुगलबंदी के जादू का धमाल है। बार-बार शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो तो यह आसानी समझ जाना चाहिए कि दाल में काला नहीं अपितु दाल ही काली है। श्रीगंगानगर में बुधवार को पकड़े गए तीन सरकारी नुमाइंदों की कहानी से तो यही जाहिर होता है। 
आरोप है कि शराब ठेकेदारों से बंधी लेकर यह तीनों (एक पुलिस थानाधिकारी, एक आबकारी सहायक एवं सिपाही) उनको मनमर्जी से शराब बेचने की छूट देते थे। वैसे इस घटनाक्रम को एक बानगी के रूप में भी देखा जा सकता है, क्योंकि समूचे राजस्थान में कहीं पर भी चले जाओ। कमोबेश हर ठेके पर शराब ठेकेदारों के कारिंदों के रंग ढंग व मनमर्जी का खेल इसी अंदाज में चलता दिखाई देता है। तभी तो यह खेल बड़ा लगता है। श्रीगंगानगर जैसे ही हालात बाकी जगह नजर आते हैं। एेसे में यह मामला बेहद गंभीर हो जाता है। साथ ही इन आरोपों को भी बल मिलता है कि बंधी के बहाने मनमर्जी करने की छूट देने का खेल कहीं समूचे प्रदेश में तो नहीं खेला जा रहा? क्योंकि सभी जगह एक जैसी समानता समूचे सिस्टम को न केवल संदिग्ध बनाती है बल्कि उस पर सवाल भी उठाती है। सरकारी संरक्षण में ही इस तरह का अवैध काम फल फूल रहा है तो कैसे यकीन किया जाए कि बाड़ खेत की रखवाली भली भांति से कर रही है? इस तरह के हालात से तो भांग पूरे कुएं में ही घुली हुई नजर आती है। 
वैसे इस तरह के मामलों में अक्सर बंधी का हिस्सा ऊपर तक जाने की चर्चा भी सुनने को मिल जाती है। कहा जाता है कि नीचे से ऊपर तक एक चेन सिस्टम है, जिनमें यह हिस्सा बंटता है। लेकिन बात कभी चर्चाओं से आगे नहीं बढ़ती। बंधी ऊपर जाती है या नहीं? और जाती है तो इसमें किस-किस की भागीदारी और भूमिका है और किसकी नहीं ? जैसे सवाल अनुत्तरित ही रहते हैं। अब यह कैसे संभव है कि सिर्फ तीन सरकारी नुमाइंदों को बंधी देकर शराब ठेकेदार इतने बेफिक्र होकर बेखौफ शराब बेच रहे थे तथा अन्य किसी को कानोकान खबर तक नहीं थी? दरअसल यह कानोकान खबर न होने की बात ही बंधी के ऊपर जाने की चर्चा को बल देती है। 
यह तो जगजाहिर ही है कि गैरकानूनी काम जब सरेआम संचालित होते हैं तो सवाल उठते हैं और जिम्मेदारों को कठघरे में खड़ा भी करते हैं। क्या जिम्मेदार यह बताने की स्थिति में हैं कि शराब ठेकेदारों को ज्यादा कीमत वसूलने की हिम्मत कौन दे रहा है? कौन है जो इनको देर रात दुकान खोलने का साहस दे रहा है? कौन है जो इनके डर व शंका को खत्म कर रहा है? कौन है जो इनके खिलाफ आने वाली शिकायतों पर गौर नहीं करने दे रहा? सवालों की यह फेहरिस्त बताती है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। कोई कमजोर कड़ी है वरना अवैध कारोबार का संचालन इतनी आसानी से कैसे संभव है। बहरहाल, बड़ा सवाल यह भी है कि यह गठजोड़ तोड़ेगा कौन? इसलिए जिम्मेदारों की यह जुगलबंदी तोडऩे में जनता की जागरुकता ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 9 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

कारगर कदम की दरकार

  टिप्पणी

हादसे कहीं पर भी हों और किसी भी तरह के हों वे तात्कालिक रूप से हड़कंप तो मचाते ही हैं। नतीजतन कुछ दिन के लिए हलचल भी होती है। लेकिन ऐसे मौके बहुत कम आते हैं, जब हादसे के पीछे की हकीकत उजागर हुई और दोषियों को दंड मिला हो। कुछ इसी तरह का हश्र शुक्रवार को हुए हादसे का हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। इतिहास गवाह है और आशंका इसी बात की है कि जीप व ट्रक चालकों की गलती के पीछे वह गठजोड़ दब जाएगा, जिसके दम पर इस तरह ओवरलोड जीपों का संचालन होता है। इस तरह के उदाहरण भी कई हैं जब जिम्मेदारों की जीप चालकों साथ जुगलबंदी हो जाती है, तब इस तरह के हादसे सामने आते हैं। रस्मी तौर पर हादसों के बाद हरकत तो जरूर होती है लेकिन वह मुकाम तक नहीं पहुंच जाती है। कार्रवाई के नाम पर तात्कालिक रूप से हाथ-पैर चलाने के बाद व्यवस्था फिर उसी पटरी पर लौट आती है। लेकिन हादसों के कारणों पर कभी कारगर काम नहीं होता। हनुमानगढ़ के हादसे के बाद कोई बड़ी बात नहीं कि पुलिस व प्रशासन के नुमाइंदे और ज्यादा चाक चौबंद हो जाएं। कानून की शत-प्रतिशत पालना करते दिखाई दें। यातायात नियमों का पाठ पढ़ाते हुए नजर आएं। अवैध व ओवरलोडेड वाहनों के खिलाफ कार्रवाई करें। लेकिन यह सब क्या रोज नहीं होना चाहिए? पुलिस व प्रशासन के पास लंबी चौड़ी सूची होती है। इस सूची में कार्रवाई व राजस्व वसूलने के लंबे चौड़े आंकड़े दर्ज होते हैं। लेकिन इन सबके साथ एक समानांतर व्यवस्था इस तरह की बना दी गई है, जिसमें जिम्मेदारों को कानून का उल्लंघन करने वाले दिखाई नहीं देते। ब्रह्मास्त्र रूपी सुविधा शुल्क के आगे जानबूझकर आंखों पर पट्टी बांधकर कानून व नियमों की धज्जियां उड़ाने की छूट देने के उदाहरण कई हैं। ये अपने आसपास भी दिखाई दे जाएंगे। यह सुविधा शुल्क ही है जो कर्तव्य व फर्ज के मार्ग से विमुख करता है। जिम्मेदारों की जुबान पर ताला लगा देता है तो कार्रवाई करने की जगह हाथ तक बांध देता है। सुविधा शुल्क पाकर धृतराष्ट्र बनी व्यवस्था ही इस तरह के हादसों की जनक है।
बहरहाल, चालकों की चूक बताकर मामले को चलता कर दिया जाएगा लेकिन सवाल वहीं के वहीं हैं। दरसअल यह चूक जिम्मेदारों के धृतराष्ट्र बनने की वजह से हुई है। यह ऐसी चूक है जो चक्कों के नीचे चकनाचूर हुई जिंदगियों को वापस नहीं ला सकती। जब तक चूक के मूल कारणों चोट नहीं होगी तब तक इस तरह के गठजोड़ वाले हाथ हादसों को जन्म देते रहेंगे। नियमों को ठेंगा दिखाकर बनने वाली जुगलबंदी व उसका हिस्सा बनने वाले जिम्मेदार जब तक जांच के नाम पर बचाव के बहाने खोजते रहेंगे तब तक हादसे हमको डराते एवं चौंकाते रहेंगे।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर के 04 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

कागजी आदेशों से नहीं बनेगी बात

 टिप्पणी 
बोर्ड व विश्वविद्यालय की परीक्षाआें को देखते हुए श्रीगंगानगर जिला प्रशासन ने मंगलवार को डीजे पर प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी किए। आदेशों के अनुसार सुबह छह से रात दस बजे तक डीजे नहीं बजाया जा सकेगा जबकि रात दस से सुबह छह बजे तक डीजे के उपयोग पर पहले से ही प्रतिबंध चल रहा है। यह आदेश 31 मई तक प्रभावी रहेंगे। स्वाभाविक सी बात है कि इस तरह के आदेश इसलिए जारी करने पड़ते हैं क्योंकि डीेजे बजता है। बेरोकटोक, बेखटके, बेखौफ व बदस्तूर बजता है। तभी तो इस तरह के आदेश हर साल जारी करने की औपचारिता निभानी पड़ती है। औपचारिकता इसलिए क्योंकि आदेशों की पालना कभी कड़ाई से नहीं होती। केवल कागजी आदेश जारी होते हैं जिनको कोई गंभीरता से नहीं लेता। प्रतिबंध की पालना इसलिए नहीं होती क्योंकि इसकी अवहेलना करने वालों में किसी प्रकार का भय नहीं है। डर कैसा है इसकी बानगी तो श्रीगंगानगर में प्रतिबंध लागू होने वाले दिन ही पदमपुर-सूरतगढ़ रोड पर एक मैरिज भवन में देर रात तक बजते रहे डीजे से देखी और समझी जा सकती है।
दरअसल, डीजे आजकल एक तरह का शगल बन गया है। बिना डीजे के तो कोई मांगलिक काम संपन्न ही नहीं होता। डीजे ऊंची आवाज में बजता है, शोर प्रदूषण करता है यह तो जगजाहिर है लेकिन एक गंभीर बात यह भी है इन पर बज क्या रहा है? पंजाबी, हरियाणा व राजस्थानी में जो गीत बज रहे हैं क्या वे सेंसर हैं? कई गानों के बोल तो इतने आपत्तिजनक है कि वे सामाजिक समरसता के ताने-बाने पर चोट करते हैं। गानों के द्विअर्थी, अश्लील बोल समाज में जहर घोल रहे हैं लेकिन प्रशासन इन सब से अनजान हैं। कुछ स्थानों पर जागरूक लोगों ने पहल करके डीजे पर प्रतिबंध भी लगाया है। यह सब करने की जरूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि डीजे पर बजने वाले विवादास्पद गीत ही झगड़ों का कारण बनते हैं। डीजे की वजह से गोलियां चल जाती हैं, मर्डर तक हो जाते हैं।
बहरहाल, प्रशासन को आदेश जारी करने तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। कठोर कदम उठाते हुए कुछ कार्रवाई होनी चाहिए ताकि कानून का उल्लंघन करने वालों में कुछ डर पैदा हो। दूसरी बात डीजे पर बजने वाले गीतों की भी जांच होनी चाहिए कि उनमें क्या बज रहा है। उनके बोल कैसे हैं? सामाजिक सौहाद्र्र्र को प्रदूषित करने वाले तथा मान-मर्यादाओं की सरेआम चिंदी-चिंदी करने वाले गीतों पर भी डीजे के साथ रोक लगनी चाहिए। वरना आदेश जारी करने की रस्म निभाने से तो इस तरह के मामलों पर प्रतिबंध लगने से रहा।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 2 दो मार्च के अंक में प्रकाशित

गांव जाना सार्थक

गांव जाना तभी सार्थक होता है जब वहां कोई मिले। कई बार तो एेसा भी हुआ है कि सिर्फ दीवारों से बातें कर लौट आया। कोई मिलता ही नहीं पूरा गांव जो सूना हो चला है। लेकिन मुद्दतों के बाद इस बार एेसा मौका आया कि गांव जाना सार्थक हो गया। संयोग से गांव में इस बार वे तमाम मित्र मिले, जिनके साथ बचपन बीता। जिनके साथ अतीत की गहरी यादें जुड़ी हैं। जिनके साथ बैठकर पाठशाला में ककहरा सीखा। जिनके साथ मौज मस्ती की तो झगड़े भी भी खूब किए। जिनके साथ खेलकूद कर बड़े हुए। वाकई हम सब बड़े हो गए। यह मित्र कोई एक दो नहीं बल्कि दर्जनभर से ज्यादा थे। बचपन की शरारतें याद कर-करके हम खूब हंसे। इतना हंसे कि पेट में बल पड़ गए तो आंखों से आंसू निकल आए। यह खुशी के आंसू थे। हम सब एक दूसरे से मिलकर इतने प्रसन्न थे कि वर्तमान भूल गए। अरे तू तो यह करता था। हां यार तू भी तो एेसा था। देख तू कितना तेज दौड़ता था। अरे तू तो जोहड़ में खूब नहाता था। न जाने कितने ही तरह के संस्मरण फिर ताजा हो उठे। सब की आंखों के सामने अतीत के सुनहरे दिन किसी चलचित्र की मानिंद घूमने लगे।
आखिर कितने दिन बाद यह मौका आया। बचपन के सब साथी अब 35 से 40 के बीच हो चले हैं लेकिन हमारी मुलाकात एवं वार्तालाप अगर कोई देखता तो यकीनन यही कहता कि बच्चों के बाप हो फिर भी बच्चों जैसे हरकतें कर रहे हो। सचमुच हम सब अतीत की यादों में इतना गहरा खोए थे कि कुछ पल तो यह अहसास भी नहीं था कि हम कितना चीख रहे हैं, गा रहे हैं। वाकई बच्चे बन गए थे हम सब।

Friday, April 21, 2017

साठ किलोमीटर तक एकदम सीधी व सपाट सड़क, नहीं है एक भी मोड़

श्रीगंगानगर. भला आपने कभी ऐसी सड़क देखी है जिसमें किसी तरह का कोई मोड़ या घुमाव नहीं हो। राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय मार्गों से गुजरते समय नजर अक्सर नसीहत भरे सूचना पट्ट पर पड़ ही जाती है। उन पर लिखा होता है कि 'आगे घुमावदार मोड़ है गाड़ी धीरे चलाएं' या 'आगे खतरनाक मोड़ है गाड़ी की रफ्तार कम रखें'आदि-आदि। कहने का मतलब यह कि ऐसे रास्ते कम ही देखने को मिलते हैं जिनमें कोई मोड़ या घुमाव नहीं हो। इसके बावजूद एक ऐसी सड़क भी है जिसमें साठ किलोमीटर तक कोई मोड़ या घुमाव ही नहीं है। एकदम सीधी सड़क है यह और चालकों के लिए सबसे मुफीद है। तभी तो लोग अक्सर चुटकी लेते हैं कि वाहन चालकों को इस स्थान पर स्टीयरिंग को ज्यादा घुमाना नहीं पड़ता। जी हां, श्रीगंगानगर जिले में इस तरह की अनूठी सड़क है। नेशनल हाइवे 15/62 का करीब साठ किलोमीटर का हिस्सा ऐसा है, जहां सड़क एकदम सीधी है। बिलकुल नब्बे डिग्री कोण पर। इसको सूरतगढ़-श्रीगंगानगर मार्ग भी कहा जाता है। सूरतगढ़ से निकलते ही भगवानसर गांव के पास जहां एयरफोर्स स्टेशन की तरफ रोड जाती है वहां से श्रीगंगानगर तक एकदम सीधा रास्ता है।
नहीं तो सूरतगढ़ तक सीधी होती
बुजुर्ग बताते हैं कि सड़क निर्माण के समय काफी दित हो रही थी। किसी न किसी बात को लेकर अड़चन आ ही जाती थी। इस कारण सड़क के लिए जमीन अधिग्रहण का काम भी अधूरा था। ग्रामीण बताते हैं कि मामला तत्कालीन मंत्री कुंभाराम आर्य के पास पहुंचा तो उन्होंने अधिकारियों से नक्शा मांगा। बताते हैं कि आर्य ने श्रीगंगानगर और सूरतगढ़ के बीच फीट रखी और कहा कि यहां से बनेगी सड़क। सड़क वैसी ही बनी बिलकुल सीधी। यह तो घग्घर नदी आ जाने के कारण भगवानसर के पास थोड़ा घुमाव देना पड़ा अन्यथा यह सड़क सूरतगढ़ तक बिना घुमाव के ही बनती। ग्रामीण इस सड़क को एशिया में सबसे लंबी सीधी सड़क का दर्जा भी देते हैं।
इस मार्ग पर बने दोनों ओवरब्रिज भी सीधे
श्रीगंगानगर-सूरतगढ़ मार्ग पर हाल ही दो ओवरब्रिज भी बने हैं। एक कैंचिया के पास तो दूसरा बारहमासी (गंगनहर) पर बनकर तैयार हो रहा है। दोनों ही ओवरब्रिज भी सड़क के हिसाब से ही बने हैं। रास्ते में कई जगह मोघे भी हैं लेकिन सड़क के आकार में कोई परिवर्तन नहीं आया।
आस्ट्रेलिया में 145 किमी सीधी सड़क
ऑस्ट्रेलिया का इयरे हाइवे वैसे तो 1675 किलोमीटर लंबा है लेकिन इस सड़क का 145.6 किलोमीटर हिस्सा बिल्कुल सीधा है। इस कारण यह सड़क ऑस्ट्रेलिया की सबसे सीधी सड़क भी है। यह हाइवे सीधा, सपाट और शानदार है, लेकिन उतना ही ज्यादा खतरनाक भी है। सड़क ऑस्ट्रेलिया के उजाड़ और दूरदराज वाले इलाकों से गुजरती है। ऐसे में इन सड़कों पर जंगली जानवर आ जाते हैं। इस वजह से हादसे हो जाते हैं। इस कारण इस सड़क को स्लॉटर वैली के नाम से भी जाना जाता है। 

सवाल मांगते जवाब

 टिप्पणी 

मासूम सचिन हत्याकांड के आरोपित की गिरफ्तारी को लेकर अब तक जो सवाल जिम्मेदार लोगों में मन में खदबदा रहे थे वह अब होठों पर आने लगे हैं। पुलिस कार्रवाई पर दबे स्वर में सवाल उठाने वाले अब रफ्ता-रफ्ता मुखर हो रहे हैं और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। वैसे सवाल तो इस प्रकरण में पहले दिन से उठने शुरू हो गए थे, जब एक मनोरोगी को बालक की हत्या के आरोप में पकड़ा गया था। इस गिरफ्तारी से पहले सोशल मीडिया में एक ऑडियो भी वायरल हुआ था। इस ऑडियो को लेकर कहा गया था कि यह आरोपित का ही है और वह वॉइस चेंजर से नंबर बदल-बदलकर फोन करता था। खैर, जिस तरह से इस प्रकरण में नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी हुई और आरोपित को बीकानेर से पकड़कर लाया गया तो शक की सुई घूमी व संदेह के बादल और गहरा गए। जेहन में एक ही सवाल था कि कहीं तात्कालिक आक्रोश के लिए तो यह सब नहीं किया गया? खैर, मंगलवार को शहर के प्रबुद्ध लोगों की बैठक में भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े किए गए हैं। कम से दस अहम सवाल बैठक के दौरान आए तथा इनसे संबंधित शंकाओं के समाधान के लिए पुलिस अधीक्षक से मिलने का निर्णय किया गया।
सवाल तो पुलिस ने जो कहानी बताई है उससे भी खड़े हो जाते हैं। अगर वाकई आरोपित ही मासूम का हत्यारा है तो पुलिस को बताना चाहिए कि आरोपित इतनी सिम कहां से लाया? उनको वह कहां से रिचार्ज करवाता था? आरोपित मनोरोगी है यह साबित कैसे हुआ? क्या इस संबंध में मनोरोगी का कोई मेडिकल हुआ है? आरोपित की सचिन के परिवार से क्या जान-पहचान थी और वह जहां रहता था वहां से इतनी दूर कैसे व क्यों गया? अगर वह सचिन के घर की रैकी करता था उसका चश्मदीद कौन है? आरोपित श्रीगंगानगर में क्या काम करता था? वह बीकानेर छोड़कर यहां क्यों आया? कहानी में जिस पदमपुर की महिला का जिक्र आया है वह कौन है और क्या करती है? इस तरह के कई सवाल हैं जो लोगों को तसल्ली नहीं देकर उनकी जिज्ञासा और ज्यादा जगाते हैं। भला यह कैसे संभव हो सकता है कि आरोपित खुद ही फोन करके सब कुछ उगल दे? क्या इस तरह की बातें करने का कोई उसका कोई रिकार्ड रहा है? वह वाकई मनारोगी है तो इस बात के प्रमाण क्या हैं?
बहरहाल, पुलिस ने रहस्यमयी बनते जा रहे हैं इस प्रकरण का जिस तरह से आनन-फानन में खुलासा किया और जो कहानी बताई यह सवाल उसी कहानी से निकले हैं। पुलिस को इन सवालों का तसलीबख्श जवाब भी बताना चाहिए ताकि जो कहानी बताई जा रही है वह आसानी से लोगों के गले उतरे। लोगों का फिर से लामबद्ध होना यही दर्शाता है कि वे सही जवाब सुनना चाहते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए पुलिस सवालों का जवाब जरूर देगी।


राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 8 फरवरी 17 के अंक में प्रकाशित 

यह जातिवाद मत फैलाओ भाई!


बस यूं ही

फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली थप्पड़ प्रकरण के बाद कई तरह की बहस गरम है। इस बहाने कई बुद्धिजीवी भी बहस में कूद पड़े हैं। कहीं इतिहास पर सवाल उठ रहे हैं तो कहीं इतिहास लिखने वालों पर। कहीं इतिहास के पात्रों को आड़े हाथों लिया जा रहा है तो कहीं इतिहास को जातिवाद से जोड़ा जा रहा है। सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म पर जहां कुछ भी लिखो, कैसा भी लिखो की अवधारणा है, वहां इस तरह का अधकचरा ज्ञान ज्यादा बांटा जा रहा है। इनका लेखन एकदम चिकोटी काटने वाले अंदाज में होता है। वैसे आजकल बुद्धिजीवी बजाय कोई अच्छी बात करने के या कुछ सकारात्मक संदेश देने वाला लेखन करने के इस तरह की चिकोटियां काटने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। समाज को दिशा देने वाला एक खास तबका फेसबुक पर इस तरह की भावनाएं भड़काने वाली तथा मनों में भेद पैदा करने वाली बातें लिखने में मशगूल है। प्रत्युत्तर में आई टिप्पणियों को पढ़ पढ़कर आत्ममुग्धता के चरम को लांघा जा रहा है। खैर, जिसकी जैसी भावना होती है वह वैसा ही सोचेगा और कहेगा। ठीक उस मक्खी की तरह जो पूरा स्वस्थ शरीर छोड़कर केवल फोड़े पर जाकर बैठती है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस तरह की जातीय वैमनस्यता बढ़ाने वाली टिप्पणियों से बेहद दुखी हूं और व्यथित भी। वैसे आजादी के बाद देश व समाज में जातिवाद का जहर सर्वाधिक राजनीति के जरिये ही फैला है। सियासी दलों ने हमेशा वोट बैंक का गणित देखते हुए टिकट बांटे और प्रत्याशियों ने भी जातिवाद के नारे को जीत का सबसे मुफीद और आसान फार्मूला माना। हकीकत में यह फार्मूला कारगर भी हुआ। जातिवाद की सीढिय़ां चढ़कर देश में कइयों ने मंजिल पाई है। 
वैसे मैंने सामाजिक समरसता का पाठ अपने गांव से ही सीखा है। जातिवाद की आग से हालांकि मौजूदा दौर में कोई अछूता नहीं है। फिर भी मेरे गांव में कुछ बातें ऐसी हैं, जो जातिवाद के जहर को कम करती हैं। झुंझुनं जिले की चिड़ावा तहसील में है मेरा गांव केहरपुरा कलां। गांव में जाट, राजपूत व अनुसूचित जाति के लोगों की आबादी कमोबेश समान सी ही है। इसके अलावा नाई, ब्राह्मण, खाती, मीणा व कुम्हार भी हैं लेकिन बहुत कम संख्या में। मेरे गांव के लोग हर जाति के दुख-दर्द और खुशी में शरीक होते हैं। अब कुछ खास बातें। ऐसा माना जाता है कि कोई भी गांव जब बसता है और बसने के बाद गांव में जिस भी जाति के व्यक्ति की सबसे पहले मृत्यु होती है, उसको भोमिया कहा जाता है। बतौर स्मृति भोमिया जी महाराज का गांव में मंदिर भी बनाया जाता है। हमारे गांव में भी ऐसा मंदिर हैं। बताते हैं हमारे गांव के भोमियाजी महाराज ब्राह्मण जाति से थे। अब इससे आगे की बात सुन लीजिए। इस मंदिर में पूजा-पाठ से लेकर झाडू लगाने तक के तमाम काम अनुसूचित जाति का युवक करता था। फिलहाल उसका निधन हो गया लेकिन उसने यह काम लंबे समय तक किया।
इसके अलावा राजपूतों के मकान निर्माण के दौरान जब नींव रखी जाती है तो पहला पत्थर जाट जाति के व्यक्ति से रखवाया जाता है। इस मांगलिक व पुनीत कार्य के बाद गुड़ भी वितरित किया जाता है। गांव के राजपूत मोहल्ले में माताजी का मंदिर है। समाज के लोगों के द्वारा साल भर यहां जागरण होते रहते हैं। जागरण में मां की ज्योत का जिम्मा अनुसूचित जाति के युवक के पास होता है। वह रात भर दीपक में घी डालता है और ज्योत को प्रज्वलित रखता है। एक तरह से वह युवक इस दिन पुजारी की भूमिका में होता है। इससे भी बड़ी बात जागरण करने वाली भजन मंडली के लोग धाणक जाति से होते हैं, जो डमरू के माध्यम से मां की महिमा गाते हैं। भजन मंडली व श्रोता सभी एक ही जाजम पर बैठते हैं। मेरे गांव में राधा-कृष्ण का मंदिर भी है। बुजुर्ग इसको ठाकुरजी का मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर के जीर्णोद्धार में गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से चंदा किया। एक करोड़ रूपए से ज्यादा इस काम पर खर्च हुए हैं। धूलंडी के दिन मंदिर में अनुसूचित जाति के युवकों के साथ जाट व राजपूत जाति के युवक गले में बांहे डालकर झूमते हैं। मस्ती में गाते हैं। जातिवाद की बातें यहां गौण हो जाती हैं। 
खैर, यह सब बताने का आशय यह है कि गांवों में इस तरह की सामाजिक समरसता आज भी है। रिश्तों का तो कहना ही क्या। जब इस तरह की अवधारणा को लेकर लोग जी रहे हैं तो यह जातिवाद की आग किसलिए? यह तानाबाना छिन्न भिन्न मत करो भाई। यह जातिवाद मत फैलाओ! भाई को भाई से आपस में मत लड़वाओं। इनको प्रेम करना सिखाओ भाई।

चांद-5


दरअसल चांद पर गीत व शेर ही नहीं काफी कुछ लिखा गया है। चांद से जुड़ी और भी कई रोचक बातें एवं जानकारियां हैं। चूंकि गीत व शेर मेरी पंसद का हिस्सा हैं, लिहाजा शुरुआत इनसे ही की। खैर, गीतकार हो, शायर हो या फिर कवि। इनके लिए भी चांद हमेशा खास ही रहा है। क्योंकि गीतों में, शेरों में एवं कविताओं में महबूब और इश्क का उल्लेख खूब होता रहा है। जहां यह देानों हैं वहां चांद भी है। महबूब और इश्क की शेरो शायरी में तोचांद की बड़ी भूमिका रही है। चांद की खूबसूरती के साथ महबूब की खूबसूरती को जोड़ा गया है। कई गुमनाम शायरियां भी हैं, जिनमें चांद का जिक्र आया है। अब यह रुबाई देखिए, इसमें याद को चांद से जोड़ दिया गया है। गौर फरमाइए...
आज भीगी हैं पलकें तुम्हारी याद में,
आकाश भी सिमट गया है अपने आप में।
ओस की बूंदें ऐसे गिरी हैं जमीन पर,
मानो चांद भी रोया हो तेरी याद में।
महबूब की तड़प व याद को चांद व आकाश के साथ जोड़कर तथा ओस की बूंदों को चांदके आसूं बनाकर खूबसूरत अंदाज में यह रुबाई लिखी गई है। अब यह शेर देखिए। यहां मोहब्बत की पाकीजगी की इंतहा हो गई है। मात्र महबूब की तस्वीर से चांद यहां बेदाग हो रहा है। देखिए जरा...
तस्वीर बना कर तेरी आसमां पर टांग आया हूं,
और लोग पूछते हैं आज चांद इतना बेदाग क्यों है।
वाकई शायरी एवं कवियों की कल्पनाशक्ति गजब की होती है। कल्पनाओं को शब्दों के मोतियों में गूंथकर इस तरह पेश किया जाता है कि बार-बार पढऩे को जी करता है। वाकई शब्दों का यह शिल्प शानदार होता है। अब इस शेर में तो चांद को बिलकुल बेसहारा तक कह दिया गया लेकिन इशारों ही इशारो में...
न जाने किस रैन बसेरों की तलाश है इस चांद को,
रात भर बिना कम्बल भटकता रहता है इन सर्द रातों में।
चांद को बिना कहे आवारा बना दिया और सर्द रातों से भी जोड़ दिया गया। ....

चांद-4


छह दिन बड़ी व्यस्तता भरे बीते। इतनी व्यस्तता की चांद की चर्चा भी कहीं गुम हो गई। देर रात थोड़ा सा वक्त मिला तो, सोचा क्यों ना चांद की अधूरी बात को आगे बढाया जाए। हां चर्चा के इस विराम के बीच चांद से जुड़ा समाचार जरूर सुर्खियों में छाया रहा। समाचार था, चांद पर कदम रखने वाले आखिरी अंतरिक्ष यात्री यूजिन कर्नेन का निधन। वे 1972 में नासा के अपोलो17 मिशन के तहत चांद पर गए थे। वैसे चांद पर कदम रखने वाले पहले शख्स नील आर्मस्ट्रांग थे। जानकारी जुटाई तो सामने आया कि चांद पर अब तक कुल 12 लोगों ने कदम रखा है। नील आर्म स्ट्रांग, बज एल्ड्रिन, चाल्र्स पीट कोन रैड, एलन बीन, एलन शेफर्ड, एडगर मिशेल, डेविड स्कॉट, जेम्स इरविन, जन डब्ल्यू यंग, चाल्र्स ड्यूक, यूजिन कर्नेन, व हैरिसन जैक श्मिट हैं। यह सभी यात्रा 21 जुलाई 1969 से 11 दिसम्बर 1972 के बीच चांद पर गए।
खैर, चांद की इस चर्चा में गीतों का सिलसिला छूट गया। चांद वैसे धर्म एवं आस्था से भी जुड़ा है। विशेषकर करवा चौथ का चांद देखने का इंतजार बड़ी बेसब्री से किया जाता है। करवा चौथ से जुड़ा एक गीत है, ऐ काश देखूं मैं आज की रात, चांद और पिया दोनों साथ-साथ..। वैसे ईद के कई गीत भी चांद के साथ जोड़कर लिखे गए हैं। कैसी खुशी लेकर आया चांद ईद का...मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का...। चांद व ईद का एक गीत सनम बेवफा फिल्म में भी था। मुझे अल्लाह की कसम, तुझसे प्यार हो गया... बिना ईद के चांदका दीदार हो गया..। हीरो हिन्दुस्तानी फिल्म का, चांद नजर आ गया गीत कुछ इसी तरह के ही हैं। वैसे गीतकारों की कलम चांद पर ज्यादा ही चली है। न केवल हिन्दी गीत बल्कि राजस्थानी में भी कई गीत ऐसे हैं, जिनमें चांद का उल्लेख होता है। चांद से जुड़े यह सभी गीत जनमानस में लंबे समय से छाए हुए हैं। मसलन, चांद चढ्यो गिगनार.... चंदा थारै चांदणै ...चांदण रात चमक रहयो चंदा.....। इसके अलावा फागुन माह में चंग पर गाए जाने वाली धमाल, छुप जाई रै चंदा बादळ में, पिया की नजर में म्हारै काजळ मं.. तो इतना कर्णप्रिय है कि फागुन की मस्ती को दुगुना कर देता है। राजस्थानी में एक वीडियो आया है, बोल हैं, म्हारा चांद-सूरज नंदोई सा..। एक और गीत चांद पूनम को उगयो है मिलन रात आज आई है... सुनकर भी मन मयूरा नाच उठता है। चांद गीत संगीत के साथ कविता व शेरो शायरी से भी जुड़ा है। चांद पर न जाने कितने ही शेर कहे गए हैं। ....क्रमश:

चांद-3


इस तरह के गीतों से साबित होता है कि चांद की हर किसी ने अपने हिसाब से व्याख्या की है। कई बार तो चांद की तुलना ऐसी-ऐसी चीजों से कर दी जाती है कि सुनकर चेहर पर डेढ़ इंची मुस्कान दौड़ जाती है। शाहरूख खान अभिनीत एक फिल्म का गीत, समझकर चांदजिसको आसमां ने दिल में रखा है, मेरे मेहबूब की टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा है...। अब देखिए यहां चांद का दर्जा टूटी हुई चूड़ी के समकक्ष रखा गया है। कहां तो चांद प्रेम का प्रतीक बना था और कहां उसकी अहमियत टूटी चूड़ी के बराबर कर दी गई। यह सब कल्पना का ही तो कमाल है।
पचास के दशक में आई फिल्म दाग का गीत भी कमोबेश ऐसा ही था, इस गीत में चांद की तुलना बेवा की टूटी हुई चूडी से की गई है। देखिए, चांद एक बेवा की चूड़ी की तरह टूटा हुआ, हर सितारा बेसहारा...। दरअसल यह गीतकार पर निर्भर करता है, क्योंकि वह परिस्थितियों के हिसाब से ही गीत की रचना करता है। ऐसे में चांद पर इस तरह के प्रयोग होते रहते हैं। चांद सिफारिश जो करता हमारी....., चांद मेरा दिल, चांदनी हो तुम.... मैं तेरा चांद तू मेरी चांदनी...चांद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर....उस चांद से प्यारे चांद हो तुम...वो चांद जैसी लड़की इस दिल पर छा रही है... रात की हथेली पर चांदजगमगाता है...ये रात ये चांदनी फिर कहां...ये वादा करो चांद के सामने...आदि गीत अलग-अलग फिल्मों के हैं लेकिन इनके मूल में प्रेम है। इन गीतों को सुनने से प्रेम की अनुभूति होती है। इन गीतों में नायक चांद है और नायिका उसकी चांदनी, मतलब देानों एक दूसरे के पूरक और एक दूजे की पहचान भी। अब देखिए इस गीत में कल्पना की ऊंची उड़ान है तो हुस्न का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन। फिर भी यह गीत अपने दौर के हर नायक को लुभाता रहा है। गौर फरमाइए, चांद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे, हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे। साठ के दशक में आई फिल्म फूल बने अंगारे का यह गीत मुकेश की आवाज में बेहद दिलकश बन पड़ा है। कुछ इसी तरह का गीत मैं चुप रहूंगी फिल्म का है। गीत के बोल हैं, चांद जाने कहां खो गया, तुमको चेहरे से पर्दा हटाना न था...। लब्बोलुआब यह है कि सारा खेल कल्पना का ही है, तभी तो इस गीत में चांद की तुलना एक आवारा व निराश प्रेमी से कर दी गई है। आवारगी फिल्म का गीत, चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला, मेरी आवारगी ने मुझे आवारा बना डाला... यह चरितार्थ भी करता है। ....क्रमश:

चांद-2


अब देखिए ना हिमालय की गोद फिल्म के गीत, चांद सी महबूबा होगी मेरी कब मैंने ऐसा सोचा था...यहां महबूबा के चांद सी होने की कल्पना की जाती है लेकिन नब्बे के दशक में आई फिल्म आओ प्यार करें में नायक कहता है, चांद से पर्दा कीजिए कहीं चुरा ना ले चेहरे का नूर। मतलब वहां चांद सी महबूबा की कल्पना तो यहां चांद से पर्दा करने की नसीहत दी जाती है। कभी-कभी चांद इतना खूबसूरत हो उठता है कि महबूबा की तुलना ही उसी कर दी जाती है। तभी तो चौहदवीं का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो..जैसे गीत की रचना होती है। इसी तरह सावन को आने दो फिल्म का चांद जैसे मुखड़े पे बिन्दिया सितारा भी.. इसी से मिलता-जुलता गीत है। इतना ही नहीं चांद कभी मामा बनता है। चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा... चंदा मामा दूर के.. जैसे गीतों में चांद को मामा बताया गया है। वैसे बहुत पहले चंदामामा नाम से बच्चों की पुस्तक भी आती थी।
खैर, चांद को हमने क्या-क्या नहीं बना दिया। कहीं बेटे को चांद जैसा समझा जाता है, मेरा चंदा है तू सूरज है तू... कहीं वो संदेशवाहक बन जाता है, चंदा रे मेरे भैया से कहना.. मेरे भैया को संदेश पहुंचना रे चंदा...। चांद भाई की भूमिका भी निभाता है, तभी तो बहन कह उठती है, मेरे भैया, मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन...। चांद महबूब भी है तभी तो तुम आए तो आया मुझे याद गली में आज चांद निकला.. की कल्पना की जाती है। चांद प्रियतम से मिलने का सहारा भी है। तभी तो नायक कहता है, तुझे चांद के बहाने देखूं, तू छत पर आजा गौरी ए..। चांद की चांदनी युगल को कितना सुकून देती है तभी तो, धीरे-धीरे चल चांद गगन में.. की गुहार लगाई जाती है। इसी तरह आधा है चंद्रमा है रात आधी.. गीत भी कुछ इसी मिजाज का है। इतना ही नहीं कई बार तो चांद से आगे भी जाने की कल्पना कर ली जाती है, बिलकुल सितारों से आगे एक जहां और भी है की तर्ज पर। पाकीजा फिल्म का चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो गीत से तो यही साबित होता है। वैसे चांद की तुलना चेहरे से भी की जाती रही है। इसके अलावा चांद दीवाना भी है। आशिक भी है। यह शमा भी है और यही परवाना है। छुपा रूस्तम फिल्म के इस गीत के बोल तो यही साबित करते हैं। देखिए, यह चांद कोई दीवाना है, कोई आशिक बड़ा पुराना है। पीछे किसके ये भागे, यह शमा है या परवाना है, दीवाना है। ....क्रमश: