Wednesday, February 28, 2018

गुरुजी चले गए

स्मृति शेष
मेरे स्कूली जीवन के पहले गुरु श्री रामजीलाल जी नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद दो रोज पूर्व मंगलवार को उनका निधन हो गया। गांव के ही राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में पहली व दूसरी क्लास में वो मेरे कक्षा अध्यापक रहे। छात्रों के प्रति उनका लगाव, जुड़ाव व प्रभाव साफ तौर पर देखा जा सकता था। मैंने उनको कड़क मास्टर के रूप में कभी नहीं देखा। मैंने उनके हाथ में डंडा जरूर देखा लेकिन इसका उपयोग उन्होंने शायद ही कभी किया हो। वो गुरु होने के साथ-साथ अभिभावक भी थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वो विद्यार्थियों के अभिभावकों के सतत संपर्क में रहते थे तथा उनसे फीडबैक लेने व देने का काम बखूबी करते थे। कोई विद्यार्थी अगर पढ़ाई में ध्यान नहीं देता था गुरुजी चलकर उसके घर जाते थे और अभिभावकों को उलाहना देकर आते थे। आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मैं दूसरे स्कूल में चला गया लेकिन गुरुजी से मेरा संपर्क बना रहा। मुझे याद है गुरुजी कई बार कुर्सी पर बैठे-बैठे ही झपकी ले लेते थे। यह काम वो इतना बखूबी करते थे हमको कानोंकान खबर तक नहीं होती। स्कूल में तब रामजीलाल जी व गुमानसिंह जी मास्टरजी की जोड़ी खासी चर्चित थी। इन दोनों गुरुओं को मैंने स्कूल में खाली वक्त के दौरान तथा स्कूल से बाहर भी अक्सर साथ-साथ ही देखा। खैर, उनका नश्वर शरीर इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनसे शिक्षित-दीक्षित उनके शिष्य देश व प्रदेश के विभिन्न कोनों में किसी न किसी क्षेत्र में परचम फहरा रहे हैं। एक अध्यापक के लिए यही तो जमा पूंजी होती है। गुरुजी को मेरा प्रणाम। भगवान उनको अपने श्री चरणों में स्थान दे तथा परिजनों व हम सब शिष्यों को यह अपार दुख सहन करने का संबल प्रदान करे।

अतीत जिंदा हो गया...

बस यूं ही
शादी समारोह में शामिल होने का सबसे बड़ा फायदा मेरी नजर में जो है वह यह है कि आपको एक साथ कई परिचित मिल जाते हैं। सामान्य दिनों में जाओ तो इतने मित्र एक साथ मिलना संभव नहीं हो पाता। परिचितों व दोस्तों से मुलाकात न केवल अतीत की यादें जिंदा कर देती हैं बल्कि सफर की थकान को भी भुला देती हैं। अति व्यस्त शेड्यूल होने के बावजूद मैं परिचित या दोस्तों के यहां होने वाले शादी समारोह में शिरकत करने को हमेशा उत्सुक रहता हूं। 17 फरवरी को दोपहर दो बजे शुरू हुआ सफर आज शाम पांच बजे पूर्ण हुआ। पहले दिन करीब 260 किलोमीटर की यात्रा कर श्रीगंगानगर से बीकानेर पहुंचा। रात्रि विश्राम बीकानेर में करने के बाद 18 फरवरी को अगला पड़ाव बगड़ था। यह भी 250 किलोमीटर की यात्रा हो गई। रात्रि विश्राम कालीपहाड़ी में करने के बाद फिर श्रीगंगानगर वापसी के लिए यात्रा। यह भी करीब 350 किलोमीटर का सफर है। इस तरह तीन दिन में 860 किलोमीटर की यात्रा कर ली। इस यात्रा के साथ बीकानेर व बगड़ में शादियों में भी शामिल हुआ। इससे भी बड़ी बात तो आत्मिक लगाव वालों से आत्मिक मुलाकातें रही। बीकानेर में श्री राजेन्द्र जी भार्गव की बिटिया की शादी में जब भार्गव जी से मुलाकात हुई तो उनकी चेहरे की खुशी से जाहिर हो रहा था कि मेरे शादी में जाने से वो बेहद प्रफुल्लित थे। अपने रिश्तेदारों से परिचय कराते हुए उन्होंने कह भी दिया कि यह होता है आना। यह हुई ना कोई बात। सच में बहुत खुश नजर आए वो।
इससे कहीं अधिक खुशी तो बगड़ में मिली। कॉलेज लाइफ में साथी रहे हिम्मतसिंह जी की बिटिया की शादी में हर दूसरा चेहरा जाना-पहचाना लगा। मुद्दतों बाद इतने लोगों से मुलाकात हुई। समय कम पड़ रहा था लेकिन परिचितों की सूची और मुलाकात के दौर का कोई छोर नहीं था। यहां हाथ मिलाने वाली औपचारिकता नहीं थी, बल्कि दोस्तों से गले मिलने वक्त वही कॉलेज टाइम वाली फीलिंग हो रही थी। सोते-सोते रात का एक बज चुका था लेकिन हथाई/ मुलाकातों का दौर थमा नहीं था। किसी से कॉलेज के समय की बातें तो किसी से क्रिकेट के किस्से। किसी से झुंझुनूं कार्यकाल का जिक्र तो किसी से कुछ। कॉलेज व क्रिकेट के समय युवा दिखाने वाले चेहरों पर अब झुर्रियां थी तो उस दौर के बच्चे नवयुवक बन चुके हैं। 18 से 24 साल पहले का दौर/ मजाक/ किस्से अब फिर ताजा हो गए। बगड़ तो वैसे भी गांव के जैसा ही है। आठ नौ साल तो लगातार बगड़ को दिए हैं। पढ़ाई व क्रिकेट के नाम रहा था यह समय। बाद में झुंझुनूं में पत्रकारिता के दौरान भी कई बार बगड़ आया। वैसे जिला मुख्यालय से गांव को जोडने वाला रास्ता भी बगड़ से होकर ही गुजरता है, इसलिए बगड़ आगमन होना तय ही है। सच में यह लगाव, यह स्नेह ही तो सभी को जोड़े रखता है। यह साथ इसी तरह से कायम रहे। आमीन।

इक बंजारा गाए-20


गरीब की जोरू
एक कहावत है गरीब की जोरू, सबकी भौजाई। इस कहावत का आशय है कि कमजोर आदमी से कोई डरता नहीं है। अपने यहां यह कहावत नगर विकास न्यास व नगर परिषद पर एकदम सटीक बैठती है। शहर में अवैध होर्डिंस लगाने वाले के प्रति यूआईटी व परिषद की भूमिका गरीब की जोरू जैसी है। यह विभाग न तो होर्डिंग्स हटाते हैं और न ही लगाने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई करते हैं। शहर में चौक चौराहों पर होर्डिंग्स टांगने का शगल ऐसा है कि हर कोई ऐरा-गैरा-नत्थू खैरा जहां मर्जी को वहां होर्डिंग्स टांग देता हैं। अब यह तो यूआईटी व परिषद के अधिकारियों को तय करना है कि वे इसी तरह की छवि को बरकरार रखना चाहते हैं या फिर कोई कारगर कार्रवाई कर पहल करेंगे?
वाह री पुलिस
खाकी चाहे तो क्या नहीं हो सकता। अपराधियों की धरपकड़ के लिए परिजनों को उठाने का तरीका तो काफी समय से प्रचलन से है। इधर परिजन को हिरासत में लिया और उधर आरोपित सरेंडर कर देता है। लेकिन कई बार खाकी मुंह देखकर टीका निकालने लग जाती है तो खुद ही सवालों के घेरे में आ जाती है। अब एक कार की टक्कर से छह जनों की मौत के बाद भी आरोपित पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। जब खाकी को कार के मालिक का पता है तो गिरफ्तारी में इतनी ढील की कुछ तो वजह है। प्रशासन ने तो पीडि़त परिवारों को पचास-पचास हजार दे दिए हैं लेकिन पुलिस अभी तक यह कहने की स्थिति में नहीं है कि कार चला कौन रहा था? कार में कितने लोग सवार थे? थानाधिकारी का बिना नाम पते जल्द गिरफ्तारी का कहना तो और भी बचकाना बयान है।
इतिहास बनेगा या दोहराया जाएगा!
श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज को लेकर और कुछ हो या न हो लेकिन राजनीति जमकर हो रही है। और इस राजनीति में जनता चक्करघिन्नी बनी है। वह तय नहीं कर पा रही है कि किसकी बात पर यकीन किया जाए। कौन सच्चा है और कौन सियासी चालें चल रहा है। खास बात तो यह है कि इस मामले में हर पक्ष के पास अपनी-अपनी दलीलें हैं। और सब यह साबित करना चाहते हैं कि उनके स्तर पर कोई गड़बड़ नहीं है। सोचा जा सकता है जब गड़बड़ ही नहीं है तो फिर काम क्यों रुका हुआ है। जैसे जैसे चुनाव व एमओयू की तिथि नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे सभी के सुर बदले-बदले नजर आ रहे हैं। कल सुबह मंत्री जी कुछ बोले और शाम होते-होते धरातल पर कुछ और दिखाया दिया। इस समूचे घटनाक्रम से यह तो साबित हो रहा है कि कुछ तो है? भले ही सकारात्मक हो या नकारात्मक। आज शाम को जयपुर से खबर आ गई कि मेडिकल कॉलेज बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अब सरकार और दानदाता दोनों ही एकमत हैं लेकिन चुनावी साल में मेडिकल कॉलेज बनकर इतिहास बनाएगा या पिछले चार साल के इतिहास को दोहराएगा, यह समय ही बताएगा!
पांच सौ में प्रचार
चुनाव नजदीक आने के साथ कई मौसमी नेता भी पैदा हो जाते हैं और इसी के साथ शुरू हो जाता है प्रचार-प्रसार का काम। भले ही चुनावी वैतरणी पार लगे या न लगे, यह अलग बात है परंतु नाम चर्चा में जरूर आ जाता है। यह एक तरह से होर्डिंग्स का तोड़ है। इसमें किसी तरह की कार्रवाई का खतरा भी नहीं है। श्रीगंगानगर में अपना पद व कद बड़ा करने के लिए प्रयासरत नेताजी इन दिनों इसी तरह के प्रचार को प्रमुखता दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह गाड़ी के पीछे नेताजी का नाम लिखने पर एक माह के पांच सौ रुपए मिल रहे हैं। पांच सौ में प्रचार के इस तरीके को कई लोग अपना रहे हैं। इस प्रचार में कार वालों को फायदा है। एक तो पैसे मिल रहे हैं। दूसरा फायदा यह है कि नेताजी का नाम लिखा देखकर पुलिस/ प्रशासन संबंधी कार्रवाई का भय भी खत्म हो जाता है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 15 फरवरी 18 के अंक में प्रकाशित।

चम्मच/ चमचा पुराण-2

बस यूं ही
तीन दिन लैपटाप से दूर रहा, इस कारण लेखन का काम नहीं हो पाया। आज लैपटाप पर हूं तो लिखना तो बनता ही है। हां तो चार रोज पूर्व चम्मच/चमचा पुराण की बात हो रही थी। इसी दौरान इस विषय पर और लिखने की भी बात हुई। चमचा वैसे तो चम्मच की प्रजाति का ही है लेकिन यह उपमाओं में कब शामिल हुआ यह जांच का विषय है। गूगल विकिपीडिया के अनुसार चमचा भारतीय खाना बनाने में इस्तेमाल होनेवाला बर्तन है। इसमें एक लंबी छड़ के अंत में एक कटोरीनुमा भाग होता है, जो कि तरल खाद्य को प्रयोग में लाने के लिए होता है। यह धातु, लकड़ी आदि का होता है। विकिपीडिया में यह भी बताया गया है कि, बड़े चमचे को चमचा ही कहा जाता है। यह खाना बनाने के काम आता है जबकि छोटे चमचे को चम्मच कहा जाता है। यह खाना खाने के काम आता है। अब इस परिभाषा में एक बात देा तय हो गई कि चमचा दो प्रकार का होता है। छोटा और बडा। खैर, चमचा शब्द विशेष प्रजाति के आदमी से कैसे जुड़ा। यह शब्द प्रचलन में आया कैसा। खोजबीन शुरू की तो वरिष्ठ पत्रकार अजित वेडनेरकर के ब्लॉग में काफी मैटर मिला। लेख जानकारीपरक लगा लिहाजा बिना कांट छांट के मूल स्वरूप में साभार साझा कर रहा हूं।
(चमचा शब्द का इस्तेमाल हिन्दी में दो तरह से होता है। एक तो चापलूस, चाटूखोर के अर्थ में और दूसरा चम्मच के अर्थ में। भोजन परोसने या ग्रहण करने की क्रिया को सुविधाजनक बनानेवाला एक उपकरण जो कलछी से छोटा होता है, चम्मच कहलाता है। पतले मुंह वाले बर्तन में भरी वस्तु निकालने में इसका प्रयोग होता है। इसके अलावा भोज्य सामग्री को हाथ न लगाते हुए भोजन ग्रहण करने की सुविधा भी यह उपकरण देता है। एक पतली सींख के सिरे पर छोटी कटोरी जैसा आकार होता है जिसमें आमतौर पर द्रव या गाढ़ा पदार्थ भर कर उसे चुसका जाता है। चम्मच या चमचा शब्द इंडो-ईरानी भाषा परिवार का है। इसकी हिन्दी में आमद आमतौर पर तुर्की से मानी जाती है मगर लगता है यह मूल रूप से संस्कृत की पृष्ठभूमि से निकलकर अपभ्रंश से होते हुए हिन्दी में विकसित हुआ, अलबत्ता चम्मच में चापलूस या खुशामदी व्यक्ति का भाव मुस्लिमदौर की देन हो सकती है। चम्मच के तुर्की मूल का होने के ठोस प्रमाण भाषाशास्त्री भी नहीं देते हैं। विभिन्न कोश भी इसकी व्युत्पत्ति के बारे में अलग अलग जानकारी देते हैं मगर हिन्दी के कोश निश्चयात्मक तौर पर इसे संस्कृत मूल का नहीं बताते हुए फारसी या तुर्की का बताते हैं। इसके विपरीत कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्तिकोश में इस शब्द का मूल संस्कृत ही बताया गया है। संभव है किन्हीं संदर्भो और च-म-च जैसे ध्वनियों की वजह से इसे तुर्की का माना गया हो क्योंकि तुर्की शब्दावली में इन ध्वनियों की अधिकता है। संसकृत धातु चम् से चम्मच की व्युत्पत्ति तार्किक लगती है।
संस्कृत धातु चम् से चम्मच की व्युत्पत्ति ज्यादा तार्किक लगती है, क्योंकि अन्य कोई आधार इतने मज़बूत हैं नहीं। चम् धातु में पीना, कण्ठ में उतारना, गटकना, एक सांस में चढ़ाना, चाटना, पी जाना, सोखना जैसे भाव हैं। चम् धातु में अदृष्य तौर पर पीने के पात्र का भाव भी छुपा है जिसकी वजह से इससे चम्मच की व्युत्पत्ति हुई। चम् धातु से बने कुछ अन्य शब्दों पर गौर करें जो हिन्दी में प्रचलित हैं। चमत्कार का अर्थ बतौर आश्चर्यजनक खेल तमाशा खूब होता है। इसे जादू भी कहते हैं और विस्मयकारी घटना भी। गौर करें कि जादू के तौर पर सर्वाधिक जो क्रिया मनुष्य को प्रभावित करती है वह है लुप्त होना, गायब होना। किसी वस्तु की निकट वर्तमान तक सिद्ध अस्तित्व का अचानक लोप होना। चम् धातु में निहित गटागट पीने, निगलने, कण्ठ में उतारने के भाव पर गौर करें। इसमें पदार्थ के अन्तर्धान होने का ही भाव है। चम् से ही बना है चमत्कार। बच्चों को दवा पीने के लिए यही कहा जाता है कि इसे फटाफट खत्म कर दो। जाहिर है, खत्म करने में पदाथज़् के लोप का ही भाव है। यही भाव चम् से बने चमत्कार ने ग्रहण किया। पूजाविधियों में शुद्धजल को ग्रहण करने की क्रिया आचमन कहलाती है, जिसका अर्थ भी पीना या ग्रहण करना है। गौर करें, यह इसी चम् धातु से बनी है। आजकल आचमन का अर्थ मदिरा के संदर्भ में भी होने लगा है।
चम् से बना संस्कृत का चमस् जिसका प्राचीन अर्थ हुआ सोमपान करने के काम आनेवाला चम्मच के आकार का एक चषक। याद रहे, प्राचीनकाल में श्रेष्ठिवर्ग में सार्वजनिक रूप में मद्यपान करने का एक ढंग यह भी था। आज के दौर की तरह सबके हाथों में मद्यपात्र न होकर एक बड़े पात्र में मदिरा होती थी और एक निर्धारित मात्रा या मानक वाले चम्मच से उसे सभी लोग ग्रहण करते थे। प्राचीन यूनान और ग्रीस में भी यह तरीका कुलीन घरानों में प्रचलित था। संभव है यह तरीका भारत में ग्रीक या यूनानियों के जरिये आया हो क्योंकि दो हजार साल पहले तक गांधार क्षेत्र में यूनानी उपनिवेश कायम थे। चमस् का अगला रूप हुआ चमस्य। प्राकृत में यह हुआ चमस्स। संभव है चमस्स से ही किन्हीं अपभ्रंशों में यह चमच, चम्मच या चमचा का रूप ले चुका हो, मगर अभी स्पष्ट नहीं है। फारसी में चमस् का रूप चम्च: हुआ और फिर हिन्दी में यह चम्मच या चमचा के रूप में दाखिल हुआ। भारत में इतिहास को दर्ज करने की वैसी परम्परा नहीं रही जैसी पश्चिमी सभ्यता में रही है इसलिए सभ्यता, संस्कृति, भाषा के क्षेत्र में कई बार अनुमानों से काम चलाना पड़ता है क्योंकि बीच की कडय़िां गायब होती हैं। चमस् का फारसी रूप चम्च: हुआ। पर यह पता नहीं चलता कि चम्मचनुमा एक उपकरण जब भारत में मौजूद था तब उसे चमचा बनने में फारसी संस्कार की ज़रूरत क्यों पड़ी। जाहिर है चमस् का लोकभाषा में भी कुछ न कुछ रूप रहा होगा, मगर वह दर्ज नहीं हो सका। फिर भी बरास्ता फारसी चम्च: की आमद हिन्दी में हुई यह मान लेने से भी हमारे निष्कर्षों पर कोई अंतर नहीं पड़ता है।
चम्मच शब्द का प्रयोग खुशामदी के अर्थ में कब कैसे शुरू हुआ यह कहना कुछ कठिन है, पर अनुमान लगाया जा सकता है। चाटुकार शब्द का प्रयोग संस्कृत से लेकर अपभ्रंश में भी होता आया है। संस्कृत शब्द चटु: में कृपा तथा झूठी प्रशंसा का भाव है। चटु: बना है चट् धातु से। है। मूलत: यह ध्वनि-अनुकरण पर बनी धातु है। टहनी, लकड़ी के चटकने, फटने की ध्वनि के आधार पर प्राचीनकाल में चट् धातु का जन्म हुआ होगा। कालांतर में इसमें तोडऩा, छिटकना, हटाना, मिटाना आदि अर्थ भी स्थापित हुए। हिन्दी में सब कुछ खा-पीकर साफ करने के अर्थ में भी चट् या चट्ट जैसा शब्द बना और चट् कर जाना मुहावरा भी सामने आया। समझा जा सकता है कि तड़कने, टूटने के बाद वस्तु अपने मूल स्वरूप में नहीं रहती। इसी लिए इससे बने शब्दों में चाटना, साफ कर जाना जैसे भाव आए। इसमें मूल स्वरूप के लुप्त होने का ही अभिप्राय है। इसी मूल से उपजा है चाटु: या चाटु शब्द जिसका अर्थविस्तार हुआ और इसमें प्रिय तथा मधुर वचन, ठकुरसुहाती, मीठी बातें, लल्लो-चप्पो जैसे भाव शामिल हुए। समझा जा सकता है कि किसी को खिलाने-पिलाने की क्रिया के तौर पर जब चट् धातु से चटाने, चाटने जैसे शब्द बने वही भाव प्रक्रिया प्राचीनकाल में प्राकृत-संस्कृत में भी रही होगी। किसी को जबरदस्ती नहीं खिलाया जा सकता। जाहिर है इसके लिए प्रेमप्रदर्शन या मीठा बोलना ज़रूरी है। जाहिर है चाटु: शब्द में दिखावे की बोली का भाव स्थिर हुआ। चाटु: में कार प्रत्यय लगने से बना चाटुकार जिसका अर्थ हुआ खुशामदी, चापलूस अथवा झूठी प्रशंसा करनेवाला।
चट् धातु से चाटुकार जैसी अर्थवत्ता वाला शब्द बनने जैसी ही यात्रा चमस से चम्च: से गुजरते हुए चम्मच के दूसरे अर्थ यानी चमचा में हुई। चम्च: से बने चम्मच ने पहले चमचा का रूप लिया और फिर इसमें फारसी का मशहूर गीरी प्रत्यय लगने से बना चमचागीरी यानी चटाना, खिलाना, गले से उतारना। भाव हुआ खुशामद करना, चापलूसी करना, मीठी बोली बोलना या आगे-पीछे डोलना। एक बच्चे को कुछ खिलाने के लिए जिस तरह से मां उसके आगे पीछे डोलती है, मनुहार करती है, ठीक वही भाव अगर वरिष्ठ व्यक्ति के लिए उसके कनिष्ठ करें तो इसे भी चम्च:गीरी कहा गया अर्थात खुशामद करना। आज लोहे-पीतल-स्टील के चम्मचों की बजाय हाड़-मांस के चमचों की चर्चा ज्यादा होती है। चम्मच बनाने वाली किसी बहुराष्ट्रीय या राष्ट्रीय कम्पनी का नाम आप नहीं बता सकते। पर असली चमचे समाज में अपने आप बन जाते हैं। बिना ब्रांडवाले, खाने-खिलाने की क्रिया से जुड़े चम्मच हमेशा टिकाऊ होते हैं इसी तरह चमचे भी हमेशा टिकाऊ होते हैं, पर खुद के लिए। आज जिसे खिलाते हैं, कल वो उल्टी करता नजऱ आता है।)
क्रमश:

चम्मच/चमचा पुराण

बस यूं ही
इसमें कोई दोराय नहीं फेसबुक विविधताओं का भंडार हैं। यहां सब रंग हैं। इन को लेकर पूर्व में एक लंबी चौड़ी पोस्ट भी लिख चुका हूं। ताजा मामला भी एक पोस्ट से ही जुड़ा है। यह पोस्ट सिर्फ एक लाइन की थी। इसे एक लाइन का सामान्य सा सवाल कहूं तो ज्यादा उचित प्रतीत होगा। मामला चम्मच और चमचा पुराण से जुड़ा होने के कारण इस पोस्ट में रोचकता इसके नीचे आए कमेंट्स से और ज्यादा पैदा हुई। रोचकता के साथ इसमें हास्य रस भी जुड़ गया। तभी ख्याल आया कि इस विषय पर लिखा जाना चाहिए। दरअसल, पिछले दिनों एक साहित्यिक कार्यक्रम में जोधपुर जाना हुआ। वहां मंच संचालन करने वाले शख्स की शैली से बेहद प्रभावित हुआ। व्यस्तता कहिए या शर्म शंका लेकिन तब मेरा उनसे व्यक्तिश: परिचय नहीं हो पाया। श्रीगंगानगर लौटने के बाद जब मैंने इन महाशय को एफबी पर सर्च किया और फिर तत्काल मित्रता आग्रह भेजा। स्वीकार भी हुआ। फिर मैसेंजर के माध्यम से परिचय हुआ और जब यह कहा कि आपको उस दिन सुना था, तो ठेठ जोधपुरी अंदाज में जवाब आया। इसे उलाहना भी कह सकते हैं, जो अभी तक चढ़ा हुआ है। उलाहना यही है कि अब भविष्य में कभी जोधपुर आओ तो चुपचाप मत निकल जाना। मिलकर ही जाना। इसके बाद दोनों का एफबी व व्हाट्सएप के माध्यम कमोबेशे रोज ही संवाद हो जाता है। फिर भी आमने-सामने की मुलाकात अभी बाकी है। खैर, इतनी भूमिका बांधने के बाद अब बता ही देता हूं यह शख्स हैं जोधपुर के श्री रतनसिंह जी चांपावत। रणसी गांव के हैं। शिक्षा विभाग में अंग्रेजी के व्याख्याता हैं लेकिन हिन्दी, मारवाड़ी भी गजब की है। कवि हृदय हैं, लिहाजा सृजन के काम से भी जुड़े हैं। अब मूल बात पर आता हूं। रतनसिंहजी ने कल रात अपने वाल पर एक पोस्ट (सवाल लिखा ) 'एक चम्मच और चमचे में क्या अंतर है?; 
पोस्ट के जवाब में पहला कमेंट आया, चम्मच- भोजन ग्रहण करने का सहायक उपकरण। चम्मचे-राजनीतिकरण के सहायक उपकरण। दोनों युग्म शब्द है लेकिन भावार्थ भिन्न भिन्न। इसके बाद कमेंट्स का सिलसिला शुरू हो गया। 
दूसरा आया, चम्मच खिलाता है, चमचा बजाता है।
तीसरा कमेंट्स- चम्मच हर घर मे मिलता है और चमचा हर कार्यालय मे मिलता है।
चौथा कमेंट्स- एक चम्मच खाना सुधारता है। और ज्यादा चमच यानी चमचे बरतनों की दुकान पर होते हैं जो कुछ पैसो मे बिकते हैं या बेचे जाते हैं।
पांचवां कमेंट्स- चम्मच - खाना खाने खिलाने में मददगार। चमचे-चापलूस चाटूकार इंसान
छठा कमेंट्स- चम्मच निर्जीव होता है और चमचे सजीव।
सातवां कमेंट्स- वही ...जो सुविधा और समस्या में है।
आठवां कमेंट्स- चम्मच सुधारने की प्रकिया में उपयोगी होता है। और चम्मचे तो हर काम को चापलूसी के द्वारा अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं। इनका इस्तेमाल हानिकारक होता है।
नौवां कमेंट्स- आदमी अपने उपयोग अनुसार चम्मच का लाभ लेता है....। चम्मचे-अपने स्वार्थ अनुसार आदमी का लाभ उठा सकते हैं.।
दसवां कमेंट्स- एक स्त्रीलिंग व एक पुलिंग।
ग्याहरवां कमेंट्स- दोनो इधर की ऊधर करते हैं।
बारहवां कमेंट्स- कुछ चम्मच चांदी के होते हैं। कुछ चमचों की चांदी होती है।
तेरहवां कमेंट्स- चमचा
च से चुगली जो करे, चतुर वही कहलाय।
म से मख्खन, जो मिले, दे वो उसे लगाय।
चा से चालू जो मिले, चापलूस बन जाय,
लक्षण जो ये सभी रखे, चमचा वही कहाय।
चौदहवां कमेंट्स-चम्मच घर में होवे, चम्मचे घर से बाहर।
इसके बाद कमेंट्स आने का दौर थमा हुआ है। लेकिन जो आया वो सब एक से बढ़कर एक हैं। सभी हंसाते गुदगुदाते हैं और सोचने पर मजबूर भी करते हैं। इस हास्य में व्यंग्य भी छिपा है। इतना सब पढ़ कर किसी के चेहरे पर मुस्कान लौटती है तो समझता हूं मैं अपने मकसद में सफल रहा। हां चम्मच/ चमचा पुराण पर और व रोचक लिखने के वादे के साथ।

इक बंजारा गाए-19

दूध का जला
कहावत है दूध का जला छाछ को फूंक-फूंक कर पीता है। कहने का आशय है यह है कि एक बार कोई सीख मिल जाती है या अनुभव हो जाता है तो फिर दुबारा वैसे होने के चांस खत्म या कम हो जाते हैं। ऐसा ही धार्मिक संगठन के साथ हुआ। चूंकि इस संगठन ने कार्यक्रम के बहाने इस बार चार संकल्प भी ले लिए थे। इनमें एक संकल्प स्वच्छता का भी था। शुरुआत में तो इस संकल्प का पालना होती दिखाई नहीं दी, जब कार्यक्रम के बहाने सभी ने अपने-अपने प्रतिष्ठान के नाम के साथ होर्डिंग्स लगाकर शहर को बदरंग कर दिया। इतना ही नहीं कार्यक्रम के पहले दिन निकली यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं ने ठंडा पेय पीकर रैपर व खाली पैकेट सड़कों पर फेंक दिए थे। खैर, कार्यक्रम के समापन के बाद जरूर स्वच्छता का संकल्प साकार होता दिखाई दिया जब शहर से सभी होर्डिंग्स रातोंरात ही उतर गए।
राजनीति तो नहीं
शहर का स्वच्छता सर्वे होने के बाद कई जगह नाले अचानक से उफान मारने लगे हैं। नाले बंद हो रहे हैं और पानी सड़कों पर फैल रहा है। एक ही क्षेत्र में इस तरह की समस्या होना न केवल गंभीर बात है बल्कि जांच का विषय भी है। सफाई के नाम पर मोटा बजट खर्च करने तथा नए ठेके में बजट बढ़ाने के बावजूद नालियां जाम क्यों हो रही हैं। उनमें कचरा अटक रहा है या उनको जानबूझकर अवरुद्ध किया जा रहा है, यह भी बड़ा सवाल है। पिछले दिनों तो एक नाला ऐसा भी मिला जिस पर सड़क तक बना दी गई। अब सड़क किसने बनाई, क्यों बनाई, इससे क्या फायदा था, यह तो नगर परिषद ही जाने। क्यों न नाला बनाने वाले अधिकारी या जनप्रतिनिधि से यह राशि वसूली जाए। यह भी एक तरह का राजकोष को नुकसान ही तो था। लगता नहीं परिषद प्रशासन इतनी हिम्मत दिखा पाएगा। 
नया शगल
चुनाव का मौसम नजदीक आने के साथ-साथ ही सभी लोग अपने कद व पद के हिसाब से काम पर लग जाते हैं। यही कारण है कि सभी की अपने-अपने हिसाब से सक्रियता भी बढ़ जाती है। इन दिनों ऐसे लोग कार्यक्रमों में देखे जा सकते हैं। कहीं बाकायदा प्रायोजित तरीके से कार्यक्रम हो रहे हैं तो कहीं यह बिन बुलाए मेहमान ऐसे ही पहुंच जाते हैं। विशेषकर शादी व गमी में तो बिन बुलाए मेहमानों की भीड़ लगातार बढ़ रही है। यह क्रम चुनाव तक बदस्तूर चले तो कोई बड़ी बात नहीं। किसी न किसी बहाने से खुद को चर्चा मेंं रखने का नया शगल भी पनप रहा है। हर जगह सहभागिता दिखाना भी इसी का हिस्सा है। पिछले दिनों जिला मुख्यालय पर निकली रैली में भी कुछ इसी तरह का नजारा देखने को मिला था। एक नेताजी बाइक पर खड़े होकर फोटो सेशन तक करवाने लगे।
गले की हड्डी
कई बार सुना है कि अक्सर अनाज के साथ घुण भी पिस जाता है। अब ऐसा होता साक्षात देखा भी जा रहा है। पिछले दिनों पड़ोसी प्रदेश की खाकी ने जोश-जोश में एनकाउंटर तो कर दिया लेकिन यह एनकाउंटर अब खाकी के गले की हड्डी बन गया है। हालात यह है कि न उगलते बन रहा है न निगलते। दरअसल, एनकाउंटर में दो गैंगस्टर के साथ एक जना और मारा गया। पहले तो इसकी शिनाख्त ही नहीं हुई। बाद में पता चला है कि यह तो ऐसे ही लपेटे में आ गया है। बचाव के लिए दोनों प्रदेशों का पुलिस रिकॉर्ड भी इस उम्मीद से खंगाला गया कि शायद तीसरे युवक के खिलाफ कहीं कोई आपराधिक मामला मिल जाए लेकिन खाकी को निराशा ही हाथ लगी। फिलहाल तो पड़ोसी प्रदेश की खाकी के पैरों के नीचे की जमीन खिसकी हुई है।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 01 फरवरी 18 के अंक में प्रकाशित 

Wednesday, January 31, 2018

पदमावत के बहाने

बस यूं ही
पदमावत फिल्म को लेकर जो शोर था वह रफ्ता-रफ्ता कम हो रहा है। हालांकि कुछ लोग अभी भी मुखर हैं जबकि कुछ दबे स्वर में स्वीकारने लगे हैं कि फिल्म में कुछ गलत नहीं हैं। मैंने अभी तक फिल्म नहीं देखी है। लेकिन दो सजातीय बंधुओं से मैसेंजर व व्हाट्सएप पर हुआ वार्तालाप मौजूं लगा। देखिए क्या है माजरा....।
पहला वार्तालाप
बात बीते शनिवार-रविवार की दरम्यिानी रात करीब सवा बारह बजे की है। मोबाइल पर मैसेंजर में एक मैसेज डिस्प्ले हुए। देखा तो यह सजातीय बंधु का था। (नाम जानबूझकर नहीं लिख रहा हूं )
मैसेज था 'फालतू का बवाल मचा दिया पदमावत पर'
मैं आशय समझ चुका था लिहाजा मैंने वापस सवाल किया। ' देख ली क्या आपने? कैसी लगी आपको?'
जवाब आया 'शानदार। कहीं भी राजपूती मान के साथ छेड़छाड़ नहीं'
मैंने कहा ' फिर एेसा क्या है जो सेनाएं विरोध कर रही हैं'
जवाब आया ' फिल्म पदमावती के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म में कोई गलत सीन नहीं है। सेनाओं का विरोध समझ से परे है।'
मैंने कहा कि ' पदमावती के नाम पर कहीं लोकप्रिय होना तो नहीं?'
जवाब आया 'पदमावती के सौन्दर्य के साथ-साथ उसके बुद्धिमानी का अनूठा संगम दिखाया गया है।'
मैंने फिर सवाल दागा ' बात बनी नहीं, शायद विरोध इसीलिए तो नहीं कहीं?'
अब थोड़ा विस्तार से जवाब आया ' गोरा बादल के साहस को दिखाया गया है। पर वो कुछ ही देर के लिए है जब दिल्ली से रतन सिंह को छुड़ा कर लाते हैं।' 'बात बनी ही नहीं या फिर हो सकता है फिल्म की पब्लिसिटी के लिए ड्रामा हो।' 'फिल्म में अलाउद्दीन की सोच और रणनीति पर पदमावती भारी है।'
मैंने दूसरे वाक्य के जवाब में कहा ' हां यह हो सकता है।'
फिर मैसेज आया ' फिल्म में राजपूती शौर्य मर्यादा और युद्ध में उसूलों के साथ लड़ाई को प्रदर्शित किया गया है।' ' बात बनी नहीं यह तो पता नहीं पर फिल्म में राजपूती मान पर कहीं कोई आंच नहीं है।' ' हां फिल्म को बाहुबली की तरह टच देने की कोशिश की गई है। तकनीक का शानदार प्रयोग किया गया है।' 'आप भी देखें।'
मैंने जवाब लिखा ' देखता हूं।'
इसके बाद फिर मैसेज आया ' और एक रिक्वेस्ट छोटे भाई की।' ' सेनाओं पर जरूर टिप्पणी कीजिएगा, ताकि इनको कुछ आइना दिखाया जा सके।'
इसके बाद मेरे को फिल्म का लिंक भेजा गया और साथ में मैसेज आया ' इस लिंक पर आप मूवी देख सकते हैं।'
मैंने ' ठीक है' लिखा और हमारा वार्तालाप समाप्त हो गया।
दूसरा वार्तालाप
यह वार्तालाप व्हाट्सएप का है । पदमावत के समर्थन में यह बंधु भी मेरे को काफी कुछ मैसेज कर चुके है। यह घटनाक्रम लंबा है। आज की ही बात करते हैं।
मैसेज आया ' कुछ पन्ने इतिहास के मेरे मुल्क के सीने में शमशीर हो गए, जो लड़े, जो मरे वो शहीद हो गए जो डरे जो झुके वो वजीर हो गए।' इसके साथ दो ब्लेक एंड व्हाइट फोटो भी आए। एक फोटो में कुछ लोग बैठे हैं, जिनके पैरों में बेडि़या हैं। दूसरा फोटो देश के पुराने नेताओं का था। 
इसके बाद एक लिंक आया और लिखा कि इस लिंक पर साइन करें। इसके नीचे ही एक और मैसेज आया ' सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का लाइव टेलीकास्ट हो इसके लिए चेंज ओआरजी पर पिटीशन है। जितने ज्यादा साइन होंगे उतना ही ये मुद्दा मजबूत होगा और मजबूरन सरकार को लाइव दिखाना पड़ेगा। हर कार्यवाही को संसद की तरह।' जवाब में मैंने ईटीवी का एक लिंक भेज दिया। दरअसल यह लिंक ईटीवी के एक कार्यक्रम की फुटेज थी। इसमें राजस्थान व गुजरात के दो इतिहासकारों राजेन्द्रसिंह खंगारोत व बीएल गुप्ता के हवाले से बताया गया है कि उन्होंने श्री श्री रविशंकर के कहने पर यह फिल्म बैंगलुरू में देखी है। दोनों इतिहासकारों ने फिल्म को हरी झंडी देते हुए कहा कि फिल्म में आपत्तिजनक कुछ नहीं है। परम्परा के नाम पर इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए। खैर, यह लिंक जैसे ही मैंने भेजा। तत्काल जवाब आया ' बकवास' आगे लिखा ' सबसे बड़ी रकम मिली है इनको।' ' मैं नहीं मानता' तीसरा मैसेज आया ' लगता है फिल्म देखनी पड़ेगी' इसके बाद हंसी का इमोजी आया। अगला मैसेज था ' अनचाहे मन से केवल समीक्षक के तौर पर।' मैंने फिर कहा 'आपको सब बिके हुए लगते हैं, फिल्म देखो।' उनका कहना था ' जरूर, आज ही डाउनलोड करता हूं।' मैंने कहा ' मैं भी देखता हूं टाइम निकाल कर।' अगला मैसेज आया ' जरूर। देखने के बाद ही कुछ कहूंगा। तब तक इस मुद्दे पर मौन।' ' लेकिन टाकीज में मत जाना। हाथ जोडऩे का इमोजी के साथ आगे लिखा निवेदन है।' मैंने कहा श्रीगंगानगर में यह फिल्म नहीं लगी है। हालांकि इसका लिंक मेरे पास है पर मैं देख नहीं पाया। उस पर उन्होंने कहा ' आज देखना। लिंक मुझे भी भेजें।' मैंने लिंक भेज दिया तो उनका अगला मैसेज आया ' कृपया इस चैनल को एक भी स्टार के साथ रेंटिंग कराने में महत्वपूर्ण योगदान दें।' इसके बाद दो टीवी चैनल से संबंधित लिंक थे। फिर मैसेज आया ' लिंक पर जाकर रिव्यू ऑप्शन में पांच स्टार में से पहले वाले स्टार पर क्लिक कर दो और ऊपर पोस्ट का ऑप्शन आएगा, पोस्ट कर दो। रिव्यू के लिए मोर में जाना पड़ेगा।' मैंने कहा ' मैं टीवी देख नहीं पाता' वो बोले ' पर इतना काम तो करना चाहिए।' मैंने कहा ' फुर्सत ही नहीं मिलती।' सामने से एक हंसने का तथा हाथ जोड़े का इमोजी आया और वार्तालाप खत्म हो गया।
बहरहाल, पदमावत जब तक प्रदर्शित नहीं हुई थी तब कुछ और कहा जा रहा है लेकिन अब कुछ और कहा जा रहा है। मतलब विरोध जारी रखना है। चाहे वह किसी भी बहाने से हो। ठीक उस भेडि़ये की तरह जो एक मेमने पर पहले तो गाली देने का आरोप लगता है। फिर पानी गंदा करने का। लेकिन जब दोनों ही आरोप खारिज हो जाते हैं तो वह कह उठता है, मेरे को तो तेरा शिकार करना है। इतना समझ ले। मुझे पदमावत राग भी कुछ-कुछ नहीं बहुत कुछ एेसा ही प्रतीत हो रहा है।

पाक ने जीरो लाइन के पास लगाया डेढ़ सौ फीट ऊंचा टावर

बीते रविवार को सपरिवार पंजाब के फाजिल्का जिले से लगता बॉर्डर देखने गया। सादकी पोस्ट पर यह टावर देखा तो चौंक गया। पिछले साल तो ऐसा कुछ नहीं था यहां। पता किया तो बताया कि पड़ोसी मुल्क इस टावर पर अपना राष्ट्रीय ध्वज लगाएगा। चर्चा इस बात की भी थी कि यह सब अटारी बॉर्डर पर लगाए गए विशालकाय तिरंगे की नकल है। खैर जीरो लाइन के उस पार टावर पर झंडा लगाने की तैयारी चल रही है। संभवत: पांच फरवरी को झंडा लगाने का कार्यक्रम है। बस फिर क्या था यह सूचना अपने लिए खबर थी....झट से टावर का फोटो खींचा और कल सोमवार को खबर लिख दी। यह खबर आज 30 जनवरी 18 के अंक में राजस्थान पत्रिका के विभिन्न संस्करणों में प्रकाशित हुई है। श्रीगंगानगर संस्करण में भी..।
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श्रीगंगानगर. पड़ोसी प्रदेश पंजाब के फाजिल्का जिले से लगती भारत-पाक अंतराष्ट्रीय सीमा स्थित सादकी पोस्ट के पास जीरो लाइन के एकदम नजदीक पाकिस्तान की ओर से आनन-फानन में एक बड़ा टावर लगाया गया है। जीरो लाइन के उस पार इन दिनों हलचल भी बढ़ गई है। पाक चौकी व दर्शक दीर्घा के रंग-रोगन किया गया है। विदित रहे कि इस पोस्ट पर बीएसएफ व पाक रेंजर के मध्य रोजाना रिट्रीट सेरेमनी होती है। इस टावर के लिए पिछले माह दर्शक दीर्घा के पास गड्ढा खोदा गया था, तब भी अच्छी-खासी चर्चा हुई थी। इसके बाद क्रेन की मदद से यह टावर खड़ा किया गया और अब यह तैयार है। करीब डेढ़ माह में लगाया यह टावर वहां जाने वालों के मन में ताज्जुब पैदा करता है। हालांकि, इसको लेकर कोई आधिकारिक रूप से बोलने को तैयार नहीं। लेकिन, इस बात की चर्चा जोरों पर है कि पाक यहां अपना राष्ट्रीय झंडा लगाएगा। इसके लिए बाकायदा पांच फरवरी का दिन प्रस्तावित है।
श्रीगंगानगर से 90 किमी दूर है सादकी
सादकी सीमा पोस्ट पंजाब के फाजिल्का जिले में है। यह श्रीगंगानगर से सड़क मार्ग से 90 किलोमीटर दूर है। रिट्रीट सेरेमनी के कारण यह सादकी पोस्ट धीरे-धीरे चर्चा में आ रही है। अटारी बॉर्डर के बाद यहां भी अब काफी लोग आने लगे हैं। विशेषकर, पंजाब के अबोहर व फाजिल्का क्षेत्र के अलावा श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ के लोग यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। अटारी बॉर्डर से नजदीक होने के कारण भी लोग यहां जाना ज्यादा पसंद करते हैं।
कहीं नकल तो नहीं ?
चर्चा इस बात की भी है पड़ोसी मुल्क अंतराष्ट्रीय सीमा पर इतना ऊंचा झंडा लगाकर भारत की नकल करना चाहता है। दरअसल, भारत ने पिछले साल पंजाब में ही अटारी बॉर्डर पर विशालकाय झंडा फहराया था, तब पाकिस्तान रेंजर्स ने इसका विरोध भी किया था। बताया जा रहा है कि सादकी पोस्ट पर इतना बड़ा टावर लगाने के पीछे एक तरह की नकल ही है। विदित रहे कि भारत का झंडा 350 फीट की ऊंचाई पर फहराया जा रहा है। इस झंडे की लंबाई 120 फीट है और चौड़ाई 80 फीट है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में  30 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित।

सत्रह साल बाद

यह कहानी सत्रह साल पहले की है। तब मैं ठीक से हिन्दी भी नहीं बोल पाता था। इसका बड़ा कारण था ग्रामीण जीवन में रहना और शिक्षा ग्रहण करना। पहली बार न केवल जिले से बाहर निकला बल्कि राज्य से बाहर भोपाल गया था। वहां लगभग साथी शहरी माहौल से थे। कुल सत्रह जनों का ग्रुप था। सभी देश के विभिन्न हिस्सों से थे। कोई भोपाल से तो कोई इंदौर से। कोई रायपुर से तो कोई सागर से। कोई भरतपुर से तो कोई जयपुर से। संयोग से इस ग्रुप में तीन जने मेरे जैसे ही थे। यह तीन साथी झुंझुनूं, चूरू व बीकानेर के थे और तीनों ही मेरी तरह ग्रामीण परिवेश में पले पढ़े। इस कारण मन थोड़ा बहुत लग गया। सभी के सभी पत्रकारिता का ककहरा सीखने के उद्देश्य से आए थे। इन सत्रह साथियों में तीन युवतियां भी थीं। भोपाल से लीना वर्मा, रायपुर से दिव्या तिवारी और इंदौर से श्रुति अग्रवाल।
लीना व दिव्या सामान्य परिवार से थी लेकिन श्रुति के पिता सेल्स टेक्स अधिकारी थे। पापा की प्यारी थी और बेटे जैसा ही लाड प्यार मिला लिहाजा, उसकी लाइफ स्टाइल और तौर तरीके शेष दोनों युवतियों से इतर थे। आत्मविश्वास तो गजब का। पत्रकारिता के प्रशिक्षण काल के दौरान ही श्रुति का जन्मदिन आया। हम सभी साथी तो इस बर्थ डे पार्टी के गवाह बने ही। विशेष रूप से श्रुति के पिता भी इस खुशी के मौके पर वहां पर पहुंचे थे। चूंकि भोपाल से इंदौर की दूरी ज्यादा नहीं है लेकिन यह प्रशिक्षण आवासीय था, लिहाजा हम सब वहीं रहते थे। संयोग से मेरा जन्मदिन भी उसी दौरान आया। मुझे याद है सभी साथियों की ओर से बतौर गिफ्ट मुझे एक शर्ट उपहार दिया गया था। गिफ्ट पंसद करने वालों में श्रुति भी थी। (सत्रह साल पहले की फोटो में जो शर्ट पहन रखी है, वही शर्ट मिला था गिफ्ट में) खैर, प्रशिक्षण के बाद हम सभी अलग-अलग हो गए। लेकिन पहले फोन से तथा बाद में सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े रहे। आज भी हम सभी साथियों का फेसबुक पेज पर ग्रुप है जबकि व्हाट्स एप पर भी सभी जुड़े है। हम भले ही अलग अलग संस्थानों में काम करते रहे लेकिन हम सभी का एक दूसरे से संपर्क है। श्रुति प्रिंट के बाद टीवी पत्रकारिता में आ गई लेकिन शादी के कुछ समय बाद पत्रकारिता को छोड़कर डॉक्टर पति के साथ न्यूजीलैंड शिफ्ट हो गई। अपरिहार्य कारणों से पूरे परिवार को कुछ समय बाद वापस भारत लौटना पड़ा। चूंकि पत्रकारिता श्रुति के लिए जुनून है, लिहाजा उसने फिर से पत्रकारिता शुरू की लेकिन यहां भी ज्यादा समय नहीं दे पाई। अपने किसी ड्रीम प्रोजेक्ट के कारण श्रुति को सक्रिय पत्रकारिता से फिर हटना पड़ा। इस बीच उसकी एक लघु फिल्म भी आई। श्रुति विशेषकर संवेदनशील, समसामयिक व महिला सशक्तीकरण जैसे विषयों पर अच्छी पकड़ रखती है। वह अपनी टीम के साथ इन दिनों जयपुर लिट्रेचर फेस्ट में आई थी। जयपुर के साथियों से मिलने के बाद श्रुति का घुमंतू मिजाज तथा बॅार्डर देखने की चाह उसे जयपुर से श्रीगंगानगर ले आया। हां हमारी श्रीमती निर्मल भी श्रुति से काफी समय से फेसबुक पर जुड़ी हैं, लिहाजा दोनों के बीच भी मधुर रिश्ते बन गए हैं। दो दिन के लिए श्रुति हमारी मेजबानी में श्रीगंगानगर में हैं। फिलहाल वह श्रीगंगानगर की सर्दी इस कदर परेशान है कि सुबह से ब्लोअर के आगे बैठी हैं। खैर, सत्रह साल बाद की मुलाकात में मुझे श्रुति में कोई भी बदलाव नजर नहीं आया लेकिन सुबह रेलवे स्टेशन पर गाड़ी से उतरते समय उसकी पहली टिप्पणी थी। 'आप तो बिलकुल बदल गए। अंकल जी लगने लगे हो।' और मैं जवाब सुनकर मुस्कुरा भर दिया।
नोट : दोनों के सत्रह साल पहले और अब के फोटो।

इक बंजारा गाए-18


🔺हींग लगे न फिटकरी
अपने काम का प्रचार करना नेताओं का पुराना शगल रहा है। जगह-जगह लगे शिलान्यास व उद्घाटन के शिलापट्ट इस बात की गवाही भी देते हैं। श्रीगंगानगर शहर की सरकार के एक नेताजी को तो नाम का इतना जबरदस्त शौक है कि कार्यक्रम में जाने की पहली शर्त ही यह रखते हैं कि उनके नाम का शिलापट्ट जरूर होना चाहिए। आयोजक जब कार्यक्रम पर इतनी राशि खर्च करते हैं तो लगे हाथ शिलापट्किा भी बनवा रहे हैं। शिलापट्टिका भी कोई कामचलाऊ न होकर बाकायदा गुणवत्ता वाले मार्बल की बनवाई जा रही है। कोई कुछ भी कहे या सोचे लेकिन आयोजकों की मजबूरी का फायदा नेताजी जमकर उठा रहे हैं। जेब से एक कौड़ी भी खर्च नहीं हो रही है जबकि प्रचार पूरा हो रहा है। इसी को कहते हैं हींग लगे फिटकरी रंग चोखा ही चोखा।
🔺खुद का प्रचार
नाम की भूख भला किसको नहीं होती। इस भूख के चक्कर में लोग तरह-तरह के जतन करने से गुरेज नहीं करते। बस किसी तरह का रास्ता या माध्यम मिलना चाहिए, फिर देखो। अगर रास्ता या माध्यम फ्री का हो तो फिर कहना ही क्या। श्रीगंगानगर में इन दिनों एक धार्मिक कार्यक्रम है। वैसे शहर में इस तरह के कार्यक्रम कई होते हैं लेकिन इस कार्यक्रम की बात ही निराली है। इस कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार में समूचे शहर को रंग दिया गया है। खास बात यह है कि प्रचार-प्रसार की इस होड़ में लोग अपने प्रतिष्ठानों का प्रचार करने से भी नहीं चूक रहे हैं। परिषद के अधिकारी भी अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। उन्होंने निशुल्क अनुमति धार्मिक कार्यक्रम के प्रचार को लेकर दी थी लेकिन होर्डिंग्स के नीचे व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बड़े-बड़े नाम देखकर उनकी भौंहें टेढ़ी हो रही हैं।
🔺सपनों के सौदागर
श्रीगंगानगर में एक सेठजी को आजकल सपनों का सौदागर कहा जाता है। इसका कारण है कि सेठजी सपने-सपने बड़े बड़े दिखाते हैं। सपने पूरे नहीं होते यह अलग बात है, लेकिन सपने दिखाने का काम बदस्तूर जारी है। उनका चार-पांच साल पहले दिखाए गए सपनों पर फिलहाल संकट के बादल हैं। भले ही उन्होंने अपने स्तर पर यह प्रचारित करने का प्रयास किया कि वह सपना साकार करने के लिए प्रयासरत है लेकिन जनता के अब सब समझ आने लगा है। सेठजी ने पिछले सप्ताह एक शिगूफा फिर छोड़ा है। शिगूफा भी एक तरह का बड़ा सपना ही है। इसमें इकलौता श्रीगंगानगर ही नहीं बल्कि तीन जिले और भी हैं। अब इस बड़े सपने की सफलता पर शक इसलिए होता है कि सपने का राजदार सेठजी ने केवल एक समाचार पत्र को ही बनाया। बाकियों को क्यों नहीं? फिर उसी दिन, उसी समय सेठ जी ने पत्रकारों को चाय-पकोड़ों के लिए भी बुला रखा था। ऐसे में यह सवाल बड़ा हो गया है!
🔺साहब का पीआरओ
वैसे तो सरकार के कामकाज के प्रचार-प्रसार के लिए बाकायदा एक पीआरओ होता है जो पत्रकारों व सरकार के बीच समन्वयक या यूं कहें कि सेतु का काम करता है। इसके अलावा निजी क्षेत्र में भी बहुत से संगठन व संस्थाएं भी अपने यहां पीआरओ रखते हैं। अब कुछ अधिकारी अपने स्तर पर भी पीआरओ रखने लगे हैं। उनके काम की, कार्रवाई की या कहीं पर कार्यक्रम की सूचना के आदार-प्रदान का यह काम पीआरओ ही करता है। श्रीगंगानगर शहर में खाकी के अधिकारी को भी पीआरओ रखने का जबरदस्त शौक है। इन अधिकारी महोदय से कोई खबर या कार्यक्रम के बारे में जानकारी मांगें तो झट से पीआरओ का नाम ले देते हैं। और तो और सभी तरह की सूचनाएं भी इस पीआरओ को पहले होती हैं। अब पीआरओ बाकी खबरनवीसों की आंखों में खटक रहा है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 25 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित..।

मुर्दे भी सुरक्षित नहीं!

टिप्पणी
श्रीगंगानगर के पदमपुर रोड स्थित श्मशान (कल्याण भूमि) में दर्जनों कब्र खुदने तथा शव गायब होने का हैरतअंगेज मामला सामने आने के बावजूद अभी तक पहेली ही बना हुआ है।रहस्य से अभी पर्दा उठाना बाकी है, लेकिन इतना तय है कि इस अमानवीय कृत्य के पीछे बड़ा कारण मानवीय लापरवाही भी रही है। कल्याण भूमि की अधिकतर कब्रें कोई एक रात में तो खुदी नहीं। मौकास्थल के हालात से यह जाहिर भी होता है कि यह शर्मनाक व कुत्सित कृत्य लंबे समय से हो रहा था। शर्मसारकरने वाले इस कृत्य को लेकर अब कई तरह की शंकाएं व चर्चाएं हैं। मसलन, कोई इसे श्वानों से जोड़ रहा है तो कोई तांत्रिक विद्या की तरफ इशारा कर रहा है। कोई इसका संबंध मानव तस्करी से बता रहा है तो कोई किसी नरभक्षी की आशंका जता रहा है। कोई इसे नशेडिय़ों की कारस्तानी भी प्रचारित कर रहा है। जितने मुंह, उतनी बातें और उतनी ही शंकाएं व चर्चाएं हैं लेकिन यह सब क्यों व कैसे हुआ, यह अभी राज ही है। कल्याण भूमि में मिले कपड़े, शराब की खाली बोतलें, बर्तन, हड्डियां आदि इस प्रकरण को गंभीर बनाते हैं। इस समूचे घटनाक्रम को श्वानों से जोड़कर ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है लेकिन क्या श्वान कब्र पर रखे भारी पत्थर को उठा सकता है? कब्र पर रखे जाने वाले नमक के कट्टे को खिसका सकता है? यह कैसे संभव है कि श्वान कब्र खोदकर शव खा जाए लेकिन जिस कपड़े में शव को लपेटा जाता है, वह बिल्कुल भी कटे-फटे नहीं? शराब की खाली बोतलों एवं जले हुए बर्तनों से श्वानों का क्या वास्ता? खैर, इन सभी सवालों से पर्दा कारगर व मुकम्मल जांच के बाद ही उठेगा। सवाल तो कल्याण भूमि की देखरेख करने वाली कमेटी पर भी उठ रहे हैं। इस तरह का घिनौना खेल लंबे समय तक चलता रहा लेकिन कमेटी व उसके पदाधिकारी अनजान ही रहे। बहरहाल, अब वह सब होगा जो इस बड़ी लापरवाही की वजह बना। हो सकता है अब कल्याण भूमि में सुरक्षाकर्मी तैनात हो जाएं। आसपास की दीवारों को ऊंचा कर दिया जाए। सीसीटीवी कैमरों का दायरा तक बढ़ा दिया जाए। रात को रोशनी की व्यवस्था हो जाए, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद होना ही पर्याप्त नहीं है। इससे भी कहीं ज्यादा जरूरी है इस प्रकरण में रही खामियों का खुलासा होना। कल्याण भूमि की व्यवस्था देखने वालों के कामकाज व भूमिका की भी बिना किसी दबाव व गहनता से जांच होना। भविष्य में इस तरह का अमानवीय कृत्य न हो इसलिए जरूरी यह भी है कि लापरवाहियों से सबक लिया जाए। इस कल्याण भूमि के साथ-साथ शहर के अन्य श्मशानों व कब्रगाहों की सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त तो हर हाल में तत्काल प्रभाव से जरूरी हैं। क्योंकि जहां मुर्दे ही सुरक्षित नहीं हैं, वहां जान माल किसके भरोसे महफूज है, यह सवाल बड़ा है!

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 25 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित

हे सेनापतियों, यह खेल अब बंद कीजिए...

हे सेनाओं के सेनापतियों बहुत हो चुका अब बंद कीजिए। देश ने आपकी हुंकार सुन ली। गर्जना व चेतावनी सुन ली। तर्क-दलीलें व बड़े बड़े बयान तक सुन लिए लेकिन आप न्यायालय से बड़े नहीं हैं। देश में न्यायालय से आगे कुछ नहीं है। वहां जाकर सब रास्ते बंद हो जाते हैं। सारे विकल्प खत्म हो जाते हैं। फिर भी आपको लगता है कि आपके साथ न्याय नहीं हुआ तो क्या आप वह रास्ता अपनाएंगे, जो कानून की दृष्टि में अनुचित हैं। आप तोडफ़ोड़ करेंगे। आप आगजनी करेंगे। आप रास्ता रोकेंगे। बसों पर पथराव करेंगे। क्या एेसा करने से फिल्म का प्रदर्शन रुक जाएगा या सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला पलट देगा। तोडफ़ोड़ कोई भी करे। आप करें, आपके सैनिक करें या आपके नाम पर कोई और कर जाए लेकिन एेसा करना कानून सम्मत नहीं है। पता है इस तरह के हथकंडे से बदनाम आपकी सेनाएं नहीं कौम हो रही है। वह कौम जिसके आधे से ज्यादा तबके को तो इतिहास की ठीक से समझ तक नहीं है । उनके लिए रोजगार और दो जून की रोटी का जुगाड़ पहली प्राथमिकता है। हे सेनापतियों कौम की इतनी बदनामी तो शायद फिल्म बिना किसी विरोध के चुपचाप प्रदर्शित हो जाती तो भी नहीं होती। मान, सम्मान, स्वाभिमान, बलिदान, वीरता और भी न जाने क्या-क्या हवाला देकर आपने भावनाओं की चासनी मिलाकर इस मसले को सेनाओं के साथ-साथ कौम का सवाल बना दिया। जिस तरह आज एक गौरवशाली कौम की चैनल, चौक, चौराहों व चर्चाओं में आलोचना हो रही है, कौम को जलील किया जा रहा है, उसका जिम्मेदार कौन? हे सेनापतियों फिल्म को अस्मिता का सवाल बनाने से पहले क्या आपने समाज की स्वीकृति ली? क्या समाज ने आपको इस तरह की लड़ाई लडऩे की जिम्मेदारी सौंपी? क्या आपने सेनाओं का गठन समाज की स्वीकृति से किया? क्या आप सभी सेनापतियों का चयन लोकतांत्रिक तरीके से हुआ? आपने खुद ने अपना चुनाव कर लिया। मनमर्जी से सेनाएं बना ली तो फिर समाज के सर्वेसर्वा आप किस हैसियत से बन गए? बहुत हो गया अब बंद कीजिए। भावनाओं में बहा युवा जोश-जोश में कुछ गैरकानूनी काम कर बैठा तो मुकदमा झेलने या जेल में सडऩे आप नहीं जाआेगे। आप सेनापतियों की जिद के आगे त्याग, तपस्या, बलिदान व पुरुषार्थ की पैरोकार रही कौम बदनाम हो रही है, यह बर्दाश्त के काबिल नहीं है। कृपया इस खेल को, इस अध्याय को अब बंद कर दीजिए। इससे खेल से अब सिवाय अपमान, बेइज्जती व छीछालेदर के कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। और इस बहाने आपको सियासत ही करनी है तो करिए, बेशक कीजिए, बेझिझक कीजिए लेकिन कौम को सीढ़ी बनाकर सियासत करना बंद कीजिए। और हां सेनाओं के नाम पर समूचे समाज को गरियाने वालों आप भी यह सब बंद कीजिए। सहन करने की भी कोई सीमा होती है। ये सेनाएं तो एक कौम का हिस्साभर हैं। यह पूरी कौम नहीं हैं। समूची कौम को बदनाम करने का खेल बेहद खतरनाक है। इससे खेलना किसी के भी हित में नहीं है। देश हित में तो बिलकुल भी नहीं।

रामभरोसे श्रीगंगानगर

टिप्पणी
श्रीगंगानगर शहर सुंदर रहे, साफ रहे, स्वच्छ रहे, यह विकास के पथ पर अग्रसर हो, यहां की तमाम तरह की व्यवस्था चाक चौबंद रहे, वे सुचारू रूप से चलती रहें, इसके लिए प्रमुख रूप से नगर परिषद व यूआईटी तो जिम्मेदार हैं ही, व्यवस्थाओं में सहयोग बनाए रखने तथा नियमों व निर्देशों की पालना के लिए आम आदमी की भागीदारी भी जरूरी है। खैर, श्रीगंगानगर के ये दोनों ही विभाग अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन उस प्रकार से नहीं कर रहे हैं, जैसा करना चाहिए। नतीजतन दोनों विभाग की उदासीनता या शह का फायदा हर कोई उठाने को आतुर है। शहर न सुंदर है, साफ है और न ही स्वच्छ दिखाई देता है। पिछले दस दिन से नालियों का पानी सड़कों पर आकर फैल रहा है, लेकिन इस समस्या का कारगर समाधान दिखाई नहीं दे रहा। निराश्रित गोवंश की समस्या तो नासूर बन ही चुकी है। पालतू जानवर भैंस-खच्चर भी रात को शहर की सड़कों पर स्वछंद दौड़ते हैं। बिलकुल बेरोक-टोक। आवारा श्वानों की फौज दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बदस्तूर बढ़ रही है। शहर में जिधर देखो वहां अतिक्रमण की भरमार है। यहां तक कि प्रमुख सड़कें भी अतिक्रमण से अछूती नहीं रही हैं। शिव चौक से जिला अस्पताल तक तो सड़कों पर व्यापार हो रहा है। यातायात भले ही बाधित होता रहे, लेकिन जिम्मेदार आंखें खोलने के लिए तैयार नहीं हैं।
सबसे खराब हालात तो शहर के चौक-चौराहों की हैं। सौन्दर्य को पलीता लगाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहा है। नगर परिषद व यूआईटी के नुमाइंदे खुद शहर को बदरंग करने में आगे हैं, तभी तो वे खुले हाथ शहर को बदरंग करने की छूट भी दे रहे हैं। वर्तमान में नगर परिषद सभापति ने एक धार्मिक संस्था को शहर बदरंग करने की खुली छूट दे दी, वह भी निशुल्क। चूंकि भगवान किसी प्रचार के भूखे नहीं होते हैं, लेकिन संस्था पदाधिकारियों को भगवान से खुद के प्रचार की चिंता ज्यादा है। शहर के अंदर और शहर से भी बाहर हाइवे पर बड़ी संख्या में लगाए गए इन होर्डिंग्स में धार्मिक कार्यक्रम के साथ लगाने वाले अपना व अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान का भी प्रचार भी जम कर रहे हैं। शहर में इस तरह की कई धार्मिक संस्थाएं हैं। क्या नगर परिषद प्रशासन व सभापति भविष्य में उनको भी यह सब निशुल्क करने देंगे? उपकृत करने की यह ' परंपरा' क्या शहर हित में है? शहर के मुख्य चौक-सर्किल्स के अंदर होर्डिंस तो लगाना ही गलत है, फिर भी एक अंधी होड़ की दौड़ मची है। बड़ी मुश्किल से होर्डिंग्स मुक्त हुए चहल चौक व सुखाडि़या सर्किल के हालात फिर से बदत्तर हो गए हैं। जो नियम विरुद्ध है, गलत है, उस पर कार्रवाई करने का साहस यूआईटी व परिषद प्रशासन क्यों नहीं दिखा पाते? यह दोनों विभागों की उदासीनता है, अकर्मण्यता है। मनमर्जी है, शह है या कोई दबाव, लेकिन कुछ तो है जरूर।
बरहाल, इस तरह के हालात से यह प्रतीत होता है कि शहर में व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। नियम कायदों को जेब में रखने वालों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। दोनों जिम्मेदार विभागों ने आंखें मूंद रखी हैं और कानून-नियमों को तोडऩे वाले इस हालात का जमकर फायदा उठा रहे हैं। पूरे प्रशासनिक सिस्टम के मुखिया की खामोशी भी शहरवासियों को अखर रही है। शहर का कोई धणी धोरी दिखाई नहीं दे रहा। राजनीतिक शून्यता व कमजोर नेतृत्व के कारण हालात दिन प्रतिदिन बद से बदत्तर ही हो रहे हैं। वैसे भी शहर में सरकार सर्वदलीय है। सभी के समर्थन चल रही है। यहां विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं है। नियमों के मखौल उड़ाने के इस खेल में सब साथ-साथ हैं। जनप्रतिनिधि, अधिकारी व प्रभावशाली व पहुंच वाले लोग मनमर्जी कर रहे हैं और इधर आमजन इस तरह के हालात से त्रस्त है। परेशान लोग धरना-प्रदर्शन या ज्ञापन देने के सिवाय कुछ करने में सक्षम या समर्थ भी नहीं है। एेसे में बड़ा सवाल यही है कि शहर की सुध लेगा कौन?

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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 21 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित

इक बंजारा गाए-17

मेरे साप्ताहिक कॉलम  में हमेशा की तरह इस बार भी चार.रंग। राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 18 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित....
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सट्टे पर हलचल
श्रीगंगानगर में खाकी की कार्यशैली आजकल ऐसी हो गई है कि कोई शिकायत मिले तो ही र्कारवाई की कुछ उम्मीद बंधती है, अन्यथा कुछ होता नहीं। अब सट्टे का मामला ही ले लीजिए। श्रीगंगानगर में सट्टा पर्ची की बहुत सी दुकानें खुली हुई हैं, लेकिन खाकी को यह सब दिखाई नहीं देती। देती नहीं या जानबूझकर आंखें मंंूद रखी हैं, यह अलग विषय है। बहरहाल, शहर में एक संगठन ने सट्टे के खिलाफ धरना-प्रदर्शन शुरू किया, लेकिन खाकी में कोई हलचल नहीं हुई। खलबली तो तब शुरू हुई, जब सट्टे के खिलाफ अनशन पर बैठे युवकों में से एक की तबीयत बिगड़ गई। आनन-फानन में खाकी ने कुछ दुकानों पर कार्रवाई भी। मतलब दबाव बढ़ा तो सट्टे की दुकानें भी मिल गई। लेकिन अनशन पर बैठने वालों का कहना है कि यह कार्रवाई तो बेहद छिटपुट लोगों पर हुई है। मोटी मुर्गी पर खाकी ने अभी तक हाथ नहीं डाला। देखने की बात यह है कि खाकी का उस ओर ध्यान कब जाता है।
जिम्मेदार कर रहे गड़बड़
कानून व नियम सबके लिए बराबर होते हैं। इनमें छोटे-बड़े, अमीर-गरीब किसी तरह का कोई भेद नहीं होता। लेकिन श्रीगंगानगर के कतिपय जनप्रतिनिधि न केवल खुद नियमों व कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं, बल्कि ऐसा करने की खुले हाथ से छूट भी रहे हैं। मामला शहर के चौक-चौराहों पर होर्डिंग्स लगाने से जुड़ा है। हालात यह है कि शहर के प्रमुख चौक-चौराहों की सुंदरता को बदरंग करने में इन जनप्रतिनिधियों के अलावा सरकारी विभाग खुद भी पीछे नहीं हैं। ऐसी-ऐसी जगह होर्डिंग्स टांग दिए जाते हैं, जो जगह अधिकृत ही नहीं हैं। अब शहर की एक धार्मिक संस्था को होर्डिंग्स लगाने के लिए खुली छूट दे दी गई। इधर, संस्था ने छूट का फायदा यह उठाया कि उसने निर्धारित तिथि से पहले ही शहर के चौक-चौराहों पर सब जगह होर्डिंग्स टांग दिए। सुंदर शहर सभी को अच्छा लगता है लेकिन अपने हित के लिए सुंदरता पर बट्टा लगाने वालों को समझाए कौन ?
अपने-अपने हित
अपने हित देखने वाले तो सभी होते हैं लेकिन परहित देखने वाला लाखों में एक होता है। बात कड़वी जरूर है लेकिन मौजूदा समय में अपना हित देखने वालों का बोलबाला ज्यादा है। हित कई प्रकार के होते हैं। इसलिए जरूरी नहीं कि हित आर्थिक फायदे के लिए ही हो। यह फायदा एक दिन के अवकाश का है। जिला प्रशासन की तरफ से साल में दो अवकाश घोषित किए जाते हैं। इनमें एक अवकाश लोहड़ी पर्व का भी होता है। ऐसा लंबे समय से होता आ रहा है लेकिन इस बार लोहड़ी पर्व पर अवकाश घोषित नहीं किया गया। लोहड़ी पर अवकाश घोषित न करने की वजह जुटाई गई तो चर्चा यह सामने आई कि लोहड़ी के दिन सैकंड शनिवार था। इस दिन सरकारी कार्यालयों में वैसे ही अवकाश होता है। इस दिन अवकाश घोषित किया जाता तो एक दिन का अवकाश मारा जाता है। इस चर्चा में दम है लेकिन उनको पर्व मनाने वालों को यह जिला प्रशासन का यह निर्णय अखरा जरूर।
उधार की आदत
उधार को लेकर न जाने कितने ही किस्से व कहानियां बने हुए हैं। मसलन, उधार मांग कर शर्मिंदा न करें... उधार प्रेम की कैंची हैं... नकदी बड़े शौक से, उधार अगले चौक से आदि-आदि। वैसे किसी धंधे में उधार लेनदेन का काम ज्यादा होता है लेकिन व्यक्तिगत रूप से उधार लेने के उदाहरण भी सब जगह मिल जाएंगे। श्रीगंगानगर भी इससे अछूता नहीं हैं। यहां भी उधार का काम चलता है लेकिन खास बात यह है कि यहां कतिपय कथित खबरनवीस भी उधार लेने में पीछे नहीं हैं। वो यह काम नि:संकोच करते हैं, और देने वाला कैसे भी हो मना करता भी नहीं है। हालांकि, उधार की राशि अंगुलियों पर गिनने लायक होती है, बोले तो पांच सौ से भी कम। इससे भी बड़ी बात उधार देने वालों के नाम सुनकर हो सकती है। उधारी भी खाकी या शराब ठेकेदारों से से ली जाती है। राशि बड़ी नहीं होती, लिहाजा देने वाला यह सोचकर खुश कि चलो सस्ते में निबट गया और लेने वाला इसीलिए कि इतनी छोटी राशि को कौन याद रखता है।

मलाल : न तब मिला न अब

स्मृति शेष
यह कितनी विचित्र समानता है। मैं तब भी श्रीगंगानगर था, जब उनकी किस्मत का सितारा उदय हुआ। और आज भी श्रीगंगानगर हूं जब उनके जीवन का सूर्य अस्त हो गया। मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं मिला। बस किस्सों के आधार पर ही मैंने उस शख्स की छवि बनाई। कल मकर संक्रांति के दिन वह शख्स दुनिया को अलविदा कह गया। आज उस शख्स की पार्थिव देह पंचतत्व में विलीन हो गई लेकिन वह शख्स आज किस्सों में जिंदा है। किसी के संस्मरणों में जिंदा है तो किसी की यादों में। करीब एक दशक से गुमनाम सा जीवन जी रहे इस शख्स की अंतिम यात्रा में उमड़े लोग व उनकी भीगी पलकें इस बात की गवाही दे रही थी कि वाकई वह दिलों में बसा था। विडम्बना देखिए जिस राजनीति ने इस शख्स को अर्श तक पहुंचाया, उसी राजनीति के कारण वह पुन: फर्श पर आया। मूलत: विद्रोही स्वभाव के इस शख्स का नाम था सुरेन्द्रसिंह राठौड़। डेढ़ दशक पूर्व जब मैं श्रीगंगानगर आया तब राठौड़ के नाम डंका बजता था। विशेषकर कर्मचारी-अधिकारी उनके नाम से खौफ खाते थे। कमजोर तबके की मुखर आवाज का नाम था सुरेन्द्र सिंह राठौड़। किसी जरूरतमंद ने उनके दर पर दस्तक दी या देर रात दरवाजा खटखटाया वह फिर निराश नहीं लौटा। राठौड़ उसके साथ हो लेते। उनके इसी स्वभाव ने उनको कमजोर, दबे-पिछड़े वर्ग के बीच लोकप्रिय बनाया लेकिन संभ्रांत लोगों व कानून के नजरों में यह सब सही नहीं था। दरअसल, ऑन द स्पॉट फैसला लेने की उनकी शैली ही विवादों को जन्म देती थी। वैसे विवादों से उनका नाता कभी छूटा भी नहीं। मुझे डेढ दशक पूर्व की कई बातें याद हैं। एक बार प्रेस वार्ता में उन्होंने कह दिया था कि आजकल अखबारों में पत्रकार न होकर नेताओं के मुखबिर बैठे हैं। उनका यह बयान तब बेहद चर्चित रहा था, लेकिन उसमें काफी कुछ सच्चाई थी। वह विधायक बने तब भी मैं श्रीगंगानगर ही था। उनकी रिकॉर्डतोड़ मतों से वह जीत आज भी लोगों के जेहन में है। हालांकि कुछ लोग आज भी राठौड़ की जीत को अपनी भूल मानते हैं और साथ में आरोप लगाते हैं कि जिस उम्मीद से उनको विधायक बनाया गया वे उस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे और उनकी राजनीतिक उदासीनता के कारण श्रीगंगानगर दस साल पीछे चला गया। आरोप तो उनकी विवादित छवि पर भी लगे। इस छवि के कारण उनको कई एेसे नाम भी मिले जो संभ्रात लोगों में सही नहीं माने जाते। 
यह भी निर्विवाद रूप से सत्य है कि 1993 में राठौड़ का राजनीति कॅरियर उठान पर था लेकिन दिग्गज भाजपा नेता भैरोसिंह शेखावत ने जब श्रीगंगानगर से चुनाव लडऩे का मानस बनाया। तब राठौड़ समझाने के बावजूद मैदान में डटे रहे। इसका नुकसान यह हुआ कि उनको बाद में विधायक बनने के लिए दस साल और लग गए। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि राठौड़ तब मैदान से हट जाते तो शायद उनका राजनीतिक कद और बढ़ जाता लेकिन जुबान के धनी तथा कथनी व करनी में अंतर न करने वाले राठौड़ को यह गवारा न हुआ। उसी चुनाव से जुड़ा एक किस्सा भी काफी चर्चित है कि शेखावत की सभा के लिए लोग एकत्रित थे। राठौड़ वहां से गुजरे उन्होंने भीड़ को घंटे भर संबोधित भी कर दिया। जब उनको हकीकत बताई गई तो उन्होंने कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है, पांडाल में बैठे लोग तो श्रीगंगानगर के ही है। जानकार बताते हैं कि शेखावत की सरकार में तीन निर्दलीय का समर्थन जुटाने में भी राठौड़ का ही हाथ था। यहां तक कि तब निर्दलीय जीते सरदार गुरजंटसिंह बराड़ को भाजपा से जोडऩे में भी राठौड़ का ही योगदान माना जाता है।
राजस्थान जैसे अति जातिवादी राज्य में जहां कदम-कदम पर जाति पूछी जाती है, एेसे दौर में राठौड़ जातिवाद की छाया से अछूते रहे। राजस्थान में जिस तरह दो प्रमुख जातियां विशेषकर चुनाव के दौरान आमने-सामने हो जाती हैं, वैसा राठौड़ के मामले में नहीं था। उनके नजदीकी लोगों में हर वर्ग व संप्रदाय के लोग थे। वैसे जातिवाद की आग का असर श्रीगंगानगर जिले में बाकी स्थानों के मुकाबले कम भी है। अगर जातिवाद होता तो राठौड़ श्रीगंगानगर से कभी नहीं जीत पाते। उनकी सब वर्गों में पकड़ थी। छात्र राजनीति के बाद वे गांव के निर्विरोध सरपंच बने। बाद में श्रीगंगानगर पंचायत समिति के प्रधान बने। उनको पहचान भी इस पद से ज्यादा मिली। वे विधायक भी बने लेकिन लोग उनको प्रधानजी ही कहते रहे।
यह सही है राठौड़ हमेशा पत्रकारों के पसंदीदा रहे लेकिन राजनीतिक मतभेद कराने में भी कहीं न कहीं पत्रकारों की भी भूमिका रही। बताते हैं उनकी ऑफ द रिकॉर्ड बात अखबारों में ऑन द रिकॉर्ड छप गई और वहीं से उनके राजनीतिक कैरियर का ग्राफ गिरना शुरू हो गया। बताते हैं कि 1993 के चुनाव में हार के बाद उन्होंने एक प्रेस वार्ता के बहाने पत्रकारों को एक होटल में बुलाया तथा एक कमरे में उनको जमकर धमकाया। पत्रकारों से ही जुड़ा एक मामला और है। विधायक बनने के बाद उन्होंने गाड़ी पर लालबत्ती लगाकर रखी थी। इस संबंध में खबर प्रकाशित हुई तो उन्होंने संबंधित पत्रकार व फोटोग्राफर को बुलाकर लालबत्ती उनके हाथ में थमा दी थी।
खैर, राठौड़ अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं, लेकिन जिस तरह उनकी अंतिम यात्रा में जन सैलाब उमड़ा, उससे साबित होता है कि लोग राठौड़ को दिल से चाहते थे। दस साल राजनीति से दूर निर्वासित सा जीवन जीने के बावजूद राठौड़ को चाहने वालों की संख्या आज भी कम नहीं थी। घर से मुक्तिधाम तक करीब चार- पांच किलोमीटर तक उनकी पार्थिव देह समर्थकों के कंधे पर ही गई। अंतिम यात्रा के आगे शव वाहन खाली ही चला। राठौड़ के लिए घर से शुरू हुआ नारों का सिलसिला उनको मुखाग्नि देते समय तक अनवरत जारी रहा। सच में नेता राठौड़ जैसा ही होना चाहिए। इतने चर्चे व किस्सों के बावजूद कभी व्यक्तिश: न मिल पाने के मलाल के साथ प्रधानजी को मेरा सलाम।

तो फिर कौन जाएगा देश सेवा करने?

टिप्पणी 
शहीद का नाम आते ही मन में श्रद्धा का भाव आता है और सिर सम्मान में स्वत: ही झुक जाता है। शहीद मतलब जिसने देश की खातिर अपने प्राणों की आहुति दे दी। जिसने अपने बच्चों, परिवार की बजाय देश को सबसे पहले रखा। हम चैन से जी सके, इसके लिए उसने शहादत दे दी। देश के लिए मर मिटने वाले ऐसे शहीदों के प्रति श्रीगंगानगर का प्रशासन कैसा व्यवहार करता है, इसका ज्वलंत उदाहरण देखना है तो चहल चौक चलें आएं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में देश के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले मेजर हरबंससिंह चहल की याद में बनाया गया चौक व शहीद प्रतिमा बदहाल है। पूरा चौक क्षतिग्रस्त हो चुका है। शहीद की प्रतिमा मिट्टी व पक्षियों की बीटों से अटी पड़ी है। शहीद प्रतिमा के चौक से पीतल से बनी नेम प्लेट भी कोई चुरा ले गया। इतना ही नहीं, जिस मार्ग का नामकरण मेजर चहल के नाम पर हुआ है, उसका शिलापट्ट ही गायब हो चुका है। इससे भी बड़ी बात है कि शहीद की वीरांगना जिला प्रशासन से चौक की बदहाली की दशा सुधारने तथा मार्ग का नामकरण का शिलापट्ट लगाने की गुहार करीब चाह माह पूर्व कर चुकी हैं, लेकिन उनकी गुहार सरकारी फाइलों में ही दफन हो गई। 
अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़ा होने के कारण श्रीगंगानगर के लोगों का सैन्य गतिविधियों से रोज ही वास्ता पड़ता है। देशभक्ति के जज्बे को जगाने के लिए भी यहां कई तरह के कार्यक्रम होते हैं। शहीदों की वीरांगनाओं का सम्मान होता है, शहीदों को याद किया जाता है, उनकी शहादत से प्रेरणा लेने के संकल्प लिए जाते हैं। इस तरह के माहौल के बीच यदि किसी शहीद की उपेक्षा होती है तो फिर इससे शर्मनाक बात और क्या होगी? शहीद की प्रतिमा लगाई ही इस उद्देश्य से जाती हैं ताकि आने वाली पीढिय़ों को प्रेरणा मिलें, उनमें देशभक्ति का जज्बा पैदा हो, लेकिन श्रीगंगानगर में चहल चौक व चहल मार्ग की हालत देख कर ऐसा रत्तीभर भी प्रतीत नहीं हो रहा। इतना ही नहीं है, सरकारें भी शहीद परिवारों के प्रति सहानुभूति दिखाने और बताने में कोई कसर नहीं छोड़ती, लेकिन शहीद मेजर चहल सर्किल को देखकर सरकार व उनके नुमाइंदों की मानसिकता पर सवाल खड़े होते हैं।
बहरहाल, जिला प्रशासन को, शहर के जनप्रतिनिधियों को एवं जागरूक लोगों को इस मामले में पहलकरनी चाहिए। क्यों न इस चौक की साफ सफाई की जाए, क्यों न इसके सौन्दर्यीकरण का संकल्प लिया जाए। शहर में पार्कों व चौकों को गोद लेने वाले इस चौक की भी सुध लें। हमारे लिए शहीद सर्वोपरि हैं। उनका सम्मान सबसे पहले होना चाहिए। शहीद का सम्मान मतलब श्रीगंगानगर का सम्मान है, तभी आने वाले पीढिय़ां उनसे प्रेरणा लेंगी। वरना हर साल कार्यक्रम मनाने या वीरांगनाओं का सम्मान करने का कोई औचित्य नहीं है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 13 जनवरी 18 में अंक में प्रकाशित 

सात समुन्दर पार से आया धन्यवाद

बस यूं ही
सरकारी अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की खाल किस कदर मोटी हो गई,इसका इससे ज्वलंत उदाहरण और क्या हो सकता है। मैं तो इसको ढीठता की पराकाष्ठा कहूंगा। चिकना घड़ा जैसा विशेषण भी इनके लिए छोटा पड़ता है। मामला श्रीगंगानगर के एक चौक का है। यह चौक शहीद के नाम से है और चौक पर शहीद प्रतिमा भी लगी है। 1971 में शहीद हुए मेजर हरबंससिंह चहल के नाम पर यह चौक है। प्रशासन ने यहां उनकी प्रतिमा लगाई लेकिन बस इस काम से आगे कुछ नहीं हुआ। सुध न लेने से पार्क बदहाल हुआ। प्रतिमा गिरने की कगार तक पहुंच गई। शहीद वीरांगना ने बीते साल सितंबर माह में जिला प्रशासन को पत्र लिखकर शहीद प्रतिमा व चौक की सुध लेने का आग्रह भी किया था। पत्र में बताया गया था कि पार्क बदहाल हो चुका है। प्रतिमा गिरने की कगार पर है। और तो और चौक पर होर्डिग्स आदि भी लगाए जा रहे हैं। पत्र में आशंका भी जताई गई थी कि हो सकता है कि होर्डिग्स लगाने के पैसे भी वसूले जा रहे हो? खैर, इस पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। होती तो दिखाई देती लेकिन वीरांगना की यह गुहार सरकारी फाइलों में ही दब कर रह गई।
वैसे मैं हमेशा चहल चौक से ही गुजरता हूं और रोज ही वहां पर नए-नए होर्डिंग्स लगे देखता हूं। पिछले सप्ताह अचानक आइडिया आया कि यह तो शहीद प्रतिमा के आगे होर्डिंग्स लगाकर प्रतिमा को ढंक दिया गया है। यह तो शहीद का अपमान है। बस वहीं से फोटोग्राफर को फोन किया कि प्रतिमा के आगे लगे होर्डिंग्स का फोटो कर लेना। वह सामने से फोटो ले आया, जिसमें केवल होर्डिंग्स दिखाई दे रहा था। मैंने फोटो देखकर उसको दुबारा भेजा और कहा कि वह पीछे से भी लेकर आओ ताकि आसानी से समझ में आ जाए किस तरह से होर्डिग्स शहीद प्रतिमा के आगे आ रहा है। फोटो के बाद कैप्शन लिखने बैठा तो फिर विचार आया कि क्यों न इसको खबर ही बनाया जाए। फिर क्या था, खबर लिखी जो बीते रविवार को राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में सात जनवरी के अंक में पेज दो पर प्रमुखता से लगी। रविवार को मैं फिर चौक के आगे से गुजरा लेकिन होर्डिंग्स वैसे ही टंगा था। मन में ख्याल आया आज अवकाश का दिन है, सरकारी अमला इतनी तत्परता नहीं दिखाएगा। अगले दिन सोमवार आठ जनवरी को देखा कि होर्डिंग्स वैसे ही लगा है जबकि जिनका होर्डिंग्स था उन्होंने इसे हटवाने का बाकायदा बयान दिया था, जो सात जनवरी को लगी खबर के साथ लगा था। फिर फालोअप छापा गया, जो नौ जनवरी के अंक में लगा। हैरानी की बात थी कि अगले दिन मंगलवार नौ जनवरी को सुबह तक होर्डिंग्स नहीं हटा। मन में ख्याल आया कितने बेशर्म लोग हैं, अपनी बात पर भी कायम नहीं रहते हैं। खैर, शाम को आफिस आते देखा तो होर्डिंग्स हट चुका है। मन ही मन सुखद अनुभूति तथा विजय की अनुभूति वाली हल्की सी मुस्कान भी आई। वहीं से फोटोग्राफर को फोन किया। वह जब तक फोटो लेने गया अंधेरा हो चुका था। अंतत: फोटो आई। फिर खबर बनाई गई और शीर्षक लिखा हटा होर्डिंग्स निकला हीरो। यह असर दस जनवरी के अंक में प्रकाशित हुआ। असर की प्रतिक्रिया स्वरूप कहीं से कोई हलचल दिखाई नहीं दी। आज गुरुवार को सुबह शाखा प्रभारी के मोबाइल पर विदेश के नंबर से कॉल आई। वो मेरे पास आए और कहने लगे आपके लिए कॉल है। मैंने हैलो किया तो सामने से जो आवाज आई उसमें बेहद आत्मीयता और खुशी झलक रही थी। कहने लगे भाईसाहब आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने शहीद प्रतिमा की सुध ली। हम प्रशासन के सामने गुहार लगा चुके लेकिन सुनवाई नहीं हुई। पत्रिका की खबर ने यह काम कर दिया। बधाई देने वाले शख्स रजवंतसिंह चहल थे, जो अपनी माता वीरांगना बलजीत कौर चहल के साथ केलीफोर्निया अमरीका में रहते हैं। उन्होंने बताया कि किसी परिचित के माध्यम से पता चला कि राजस्थान पत्रिका ने शहीद के सम्मान में खबर लिखी और उसका असर हुआ। इसके बाद उन्होंने व्हाट्सएप पर वह पत्र भी भेजे जो सितंबर माह में वो प्रशासन को दे चुके थे। साथ शहीद प्रतिमा के साथ वीरांगना की एक तस्वीर भी भेजी। उन्होंने एक बार फिर से धन्यवाद दिया । मैंने उनको कहा कि मैं भी पूर्व सैनिक का बेटा हूं तो उनका कहना था कि यह जानकर बेहद खुशी हुई कि आप आर्मी पर्सन के परिवार से हो। मैं आपका पूरा रिगार्ड करता हूं। साथ ही लिखा कि पोलिटिशियन हैव नो रिस्पेक्ट फॉर आवर एक्स आर्मी फैमिली। दिस मैक्स रियली सैड। मैं शहीद पुत्र की व्यथा को समझ चुका था। अब रहस्य से पर्दा उठा देता हूं कि जो होर्डिग्स था वह श्रीगंगानगर यूआईटी के चेयरमैन संजय महिपाल का था। खैर, मन को इस बात से सुकुन मिला कि मेरी खबर के कारण सात समुंदर पार बैठे परिवार को खुशी मिली।

इक बंजारा गाए-16

सबकी बोलती बंद
सुराज में सुरा-पान आठ बजे के बाद बंद का नियम कायदे है लेकिन शहर में यह सुरापान न केवल सारी रात मिलता बल्कि मय्यखाने में महफिल का सिलसिला सरकार के चार साल के बाद भी चल रहा है, इस सुरापान की देखदेख के लिए खाकी और मय्यखाने वाले अफसरो की फौज है लेकिन सुरा के साथ पान में चांदी के सिक्कों की खनक के कारण चुप्पी साध गए है। हद तो तब हो गई जब दवा की दुकान के साथ सुरापान वाला भी आधी रात तक सरेआम यह धंधा करने लगा। शिकायतों का अम्बार लगा तो सुर्खियों में वे सब आ गए जो खाकी और मय्यखाने के अफसरों को मंथली भिजवाते है, औपचारिकता की नौटंकी भी चली फिर सब चुप्प। मंथली के चक्कर में मय्यखाने वाले महकमे के चार अफसर तो यहां से नप चुके है तो वहीं एक थानेदार को अपना पद गंवाना पड़ा। लेकिन मंथली में ऐसा नशा है कि एसीबी की कार्रवाई का भय भी नहीं लगता। खाकी के पंडितजी ने तो आनन फानन में शहर में नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान तक चलाया लेकिन उनके समकक्ष खाकी वालों के पास सुरापान से मंथली के रूप में आ रही लार टपकने को रोक नहीं पा रहे है। इधर, मयखाने की देखरेख में अब चौधरी को लगाया है, वे भी बापू के तीन बंदरों की तरह न सुनना, न बोलना और न देखने की बात करने लगे है, जैसे सुरापान का असर दिख रहा हो।
प्रचार की भूख
शहर के कई जनप्रतिनिधियों को चौराहों पर टंगने का शौक हद से ज्यादा है। इस शौक में वो नियमों की धज्जियां उड़ाने से भी गुरेज नहीं करतेे। यहां तक जो जगह होर्डिंग्स आदि लगाने के लिए चिन्हित ही नहीं है वहां भी जोर जबरिया टांग देते हैं। इधर, प्रशासनिक अधिकारियों की इतनी हिम्मत नहीं होती है ,उनसे पंगा ले। फिर भी मीडिया की लगातार मुहिम के बाद श्रीगंगागनर शहर के अधिकतर प्रमुख चौक चौराहे अब मूल स्वरूप में दिखाई देने लगे हैं। फिर भी कुछेक जनप्रतिनिधि ऐसेभी हैं जिनके कानों पर जंू तक नहीं रेंग रही है। पता नहीं उनको यह बात समझ क्यों नहीं आ रही कि लोकप्रियता चौराहों पर टंगने से नहीं बल्कि काम करने से आती है। इसके बावजूद इस काम से वो तौबा करते दिखाई नहीं देते। हद तो शहर के चहल चौक पर हो गई है, जहां शहीद की प्रतिमा के आगे नियमों को मखौल उड़ाते हुए पहले तो एक छुटभैये ने होर्डिंग्स लगाया और उसको हटाए बिना उसके आगे नेताजी का होर्डिंग्स भी लगा दिया गया। फिलहाल नेताजी को किसी तरह बात समझ आ गई और शहीद प्रतिमा के आगे से होर्डिंग्स हट गया।
निजी हित सर्वोपरि
एक चर्चित कहावत है 'विष दे विश्वास न दे।' मतलब विश्वासघात जो होता है वह जहर से भी खतरनाक है। लेकिन श्रीगंगानगर में आजकल यह कहावत बखूबी चरितार्थ होने लगी हैं। बड़ी बात है कि यह धोखा भी मीडिया के लोगों से ही किया जाने लगा है। हिमाकत देखिए अदालती फैसले में कांट-छांट कर अपने हिसाब से प्रेस नोट तैयार किए जाने लगे हैं। एक स्थानीय अखबार ने तो कांट-छांट कर प्रेस नोट जारी करने वालों को बेनकाब भी किया लेकिन बाकी खबरनवीसों ने आंख मूंद कर जो विश्वास दिखाया उसका खामियाजा भुगतने की आशंका अब बलवती हो गई है। निजी हितों के लिए विश्वास को ताक पर रखकर खबरनवीसों को धोखे में रखने वालों को यह बात अ'छी तरह से पता है, क्योंकि उन्होंने तो यह सब इरादत्तन किया लेकिन खबरनवीसों ने भी रेडीमेड खबर देखकर क्रॉस चैक करने तक भी जहमत नहीं उठाई। बहरहाल, निजी हित देखने वालों की मंशा पर सवाल अब और भी ज्यादा हैं, क्योंकि अब उस प्रेस नोट के गुम होने का बहाना जो बनाया जा रहा है।
उल्टा पड़ा दांव
खेल कोई भी दांव अगर उल्टा पड़ जाता है तो जीत की उम्मीद फिर क्षीण पड़ जाती है। मामला अतिक्रमण का है और जिले के एक प्रमुख शहर से जुड़ा है। इस शहर के व्यापारियों ने पहले तो जनहित को ध्यान में रखते हुए बाजार में खड़ी होने वाली रेहडिय़ों का विरोध किया। उनको पता नहीं था रेहडिय़ा हटते ही वो भी लपटे में आ जाएंगे। क्योंकि जांच सर्वे में उनकी अधिकतर दुकानें अतिक्रमण की जद में आ गई। दुकान टूटने के भय ने व्यापारियों के दिन का चैन व रातों की नींद गायब कर दी। मामले को रफा-दफा करने के लिए काफी दौड़ धूप की गई। जनप्रतिनिधियों के यहां भी गुहार लगाई गई लेकिन गलत काम की सावर्जनिक रूप से वकालत करता भी कौन? व्यापारियों की हालत सांप छछूंदर वाली हो गई। ख्यामखाह बैठे बिठाए पंगा जो ले लिया। बहरहाल, कहीं पर भी बात नहीं बनी, अंततोगत्वा पालिका प्रशासन अतिक्रमण हटवा रहा है। इधर, व्यापारी उस घड़ी को कोस रहे हैं, जब उन्होंने रेहड़ी वालों का विरोध किया था।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 11 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित 

पीआरओ बनते पत्रकार

बस यूं ही
करीब अठारह साल पहले की बात है। पत्रकारिता का ककहरा सीखते वक्त यह भी बताया गया था, यह पत्रकारिता की डगर है। यह आसान नहीं होती है। इसमें घर परिवार सबको छोडऩा पड़ता है। इस दुनिया मे प्रवेश के बाद आपकी सामाजिक लाइफ व फे्रंड सर्किल भी खत्म समझो। इस क्षेत्र में एक बार आ गए तो फिर यही सब कुछ है। अगर इतनी चुनौती स्वीकार करने का जज्बा है, हौसला है, माद्दा है तो बेशक पत्रकारिता करिए। इतनी नसीहत के बाद आखिरी और खतरनाक बात बताई गई कि यह दौर ऐसा है कि किसी के खिलाफ लिखोगे तो वह आपका दुश्मन बन जाएगा। कब राह चलते कौन आपको रौंद जाए पता ही नहीं चलेगा। फिर आपका परिवार, आपके बच्चों की परवरिश किसके जिम्मे होगी? सोच लो। पत्रकारिता की राह पर चलने वाले तब मेरे सोलह साथी और भी थे, लेकिन सभी अपने निर्णय पर अडिग रहे कि पत्रकार तो बनना ही है। इतना ही नहीं इस सीखने के दौरान एक नसीहत यह भी दी गई थी कि आप पत्रकार हो। पत्रकारिता धर्म निभाते वक्त एक बात जेहन में हमेशा याद रखना। पत्रकार होने के नाते 'चार पी' को हमेशा नजरअंदाज करना। पहला पी से पैसा। दूसरा पी से पद। तीसरा पी से प्रशंसा और चौथा पी से पुष्प। इन चार पी को नजरअंदाज करने के पीछे सोच यही थी कि इनमें किसी भी पी के संपर्क में आने वाला कहीं न कहीं निष्पक्ष नहीं रह पाता। लेकिन मौजूदा दौर में अधिकतर पत्रकार किसी न किसी पी के संपर्क में आने से खुद को रोक नहीं पाते। किसी भी पी के संपर्क में आने का मतलब है उसके प्रभाव में आ जाना। जहां प्रभाव शुरू हो जाता है, वहां फिर पत्रकारिता गौण होने लगती है और पीआरशिप हावी हो जाती है। बाजार में कई तरह के संगठन व कंपनियां भी इस खेल में शामिल हैं। वो बेहतर मीडिया मैनेजमेंट करने वालों पत्रकारों को ही बतौर पीआरओ रखने लगे हैं। इसके अलावा बहुत से ऐसे भी हैं, जो पीआरओ बनाने की बजाय सीधे ही पत्रकारों को साधने में विश्वास करते हैं। और जो सध जाता है वह भी एक तरह से पीआरओ का काम ही करता है। इस तरह से मीडिया दफ्तरों व बाहर दोनों जगह ही पीआरओ हो गए हैं। एक अंदरूनी पीआरओ तो दूसरा बाहरी पीआरओ। दरअसल, यह संकट किसी एक जगह का नहीं है। हर जगह ऐसी तस्वीर मिल जाएगी। हां कहीं ज्यादा या कम का अनुपात जरूर हो सकता है लेकिन पीआरओ रहित शहर शायद ही कोई हो। यह पीआरशिप पत्रकारिता के लिए दीमक का काम करती है। यह पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों व उसूलों पर चोट करती है। कई लोग तो पत्रकारिता में आते ही इसी उद्देश्य से हैं। पत्रकारिता की सीढिय़ों के माध्यम से वो पीआरओ बनने का मुकाम आसानी से हल कर लेते हैं। इस दौर में खुद के दामन को बचाना किसी चुनौती से कम नहीं है। यहां कदम-कदम पर फिसलन है। इस पर भी जबरन फिसलाने के उपक्रम और किए जाते हैं। और किसी तरह कोई इस फिसलन से खुद को बचा लेता है तो फिर दूसरे हथकंडे आजमाए जाते हैं। धमकी, झूठी शिकायतें, दबाव आदि इसी के तहत आते हैं। और इनमें प्रमुख योगदान भी पत्रकार से पीआरओ बने साथियों का ज्यादा होता है।
पत्रकार से पीआरओ बनने में मैं मीडिया घरानों का दोष कहीं नहीं मानता। पत्रकारिता में आदमी अपने शौक से आता है और पीआरओ बनने की राह भी खुद ही चुनता है। वर्तमान दौर ऐसा है कि समूचा बाजार ही पत्रकारों को पीआरओ के नजरिये से देखना लगा है। उनको संदिग्ध मानने लगा है। ऐसा बहुतायत में होने लगा है। किसी न किसी वाद से प्रभावित पत्रकारिता भी पीआरशिप की श्रेणी में ही गिनी जाएगी। यह दौर वाकई संकट का है। चुनौती का है। एक मूल व ईमानदार पत्रकार के लिए अब तो संकट इस बात का खड़ा हो गया है कि वो अपना जमीर बचाए या जान? क्योंकि जमीर बचाने के लिए कुछ लोग जान भी गंवा बैठते हैं, खुद्दार जो होते हैं। और समझौता ही करे तो फिर वह पत्रकारिता भी कैसी।

गूंगे के गुड़ पर भारी सरकारी 'छूट'

टिप्पणी
शराब दुकानों को बंद करने का समय रात आठ बजे इसीलिए निर्धारित किया गया था ताकि लोग देर रात तक शराब न पीएं, क्योंकि जब शराब मिलेगी ही नहीं तो पीएंगे कहां से। समय सीमा तय करते समय यह भी सोचा गया था कि शराब के कारण देर रात किसी तरह की शांति भंग भी नहीं होगी। सड़कों पर हादसे भी कम होंगे। लेकिन सरकार की 'छूट' के चलते न केवल समय सीमा तार-तार हो रही है बल्कि रात आठ बजे बाद निर्धारित मूल्य से ज्यादा कीमत भी वसूली जा रही है। शराब उपभोक्ताओं के लिए यह मनमर्जी की कीमत 'गूंगे के गुड़' की तरह है। शराब पीने वाले को ज्यादा कीमत देने की पीड़ा तो है लेकिन देर तक शराब मिलने की सुविधा के चलते चाहकर भी वह इस बात का कहीं विरोध नहीं कर सकता। 
यह बात दीगर है कि देर रात शराब उपलब्ध होने के कारण सुराप्रेमियों के लिए कीमत कोई मायने भी नहीं रखती है, लेकिन जो नहीं पीते हैं, उनके लिए शराब दुकानों का देर तक खुलना बड़ी सिरदर्दी है। शराब ठेकों के आसपास का माहौल न पीने वालों के लिए कितना पीड़ादायक होता है, सहज ही कल्पना की जा सकती है। खैर, सवाल शराब देर रात बिकना व निर्धारित मूल्य से ज्यादा पर बिकना तो गैरकानूनी तो है ही, इससे भी बड़ी पोलपट्टी तो यह दिखाई देती है कि इस मनमर्जी पर अंकुश लगाने वाले पता नहीं इतने लाचार, बेबस व मजबूर क्यों हैं। पुलिस व आबकारी विभाग क्षेत्राधिकार की बात कहकर न केवल जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं बल्कि इस बहाने अवैध काम करने वालों के मददगार भी बन रहे हैं। दोनों ही विभागों में एक बात जरूर समान है। दोनों शिकायत मिलने पर कार्रवाई करने की बात जरूर कहते हैं। पर यहां शिकायत करेगा कौन? और क्यों करेगा? और कोई पीडि़त हिम्मत जुटाकर करता भी है तो उसकी कोई सुनवाई होती भी कहां है?
बड़ा व यक्ष सवाल तो यही है कि देर रात बिक्री होते क्या पुलिस व आबकारी विभाग के अधिकारियों को दिखाई नहीं देता? क्योंकि इस मामले में राजस्थान पत्रिका में विशेष संपादकीय प्रकाशित होने के बाद शराब ठेकों के बाहर देर रात तक खड़ी रहने वाले रेहडिय़ों की संख्या जरूर कम हो गई है लेकिन शटर के नीचे से या बगल में बनाए गए बड़े सुराखों (मोखो) से बिक्री बेखौफ जारी है। पुलिस व आबकारी विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के बयानों से इतना तय है कि दोनों ही विभाग इस गैरकानूनी काम को कानून सम्मत बनाने के प्रति गंभीर नहीं हैं। और जब इस तरह से गैरकानूनी काम होंगे तो फिर कानून व्यवस्था चाक चौबंद होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 6 जनवरी 18 के अंक में प्रकाशित