Wednesday, April 4, 2012

जांबाज मरावी को नमन


स्मृति शेष

आखिरकार जिसका अंदेशा था, वही हुआ। उम्मीद की किरण बुझ गई। दिल का दौरा पड़ने के बाद दो दिन से जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहे आईजी बीएस मरावी के निधन की घोषणा मंगलवार को कर दी गई। वे हर बार मौत को छकाते आए, लेकिन सेहत को दरकिनार कर काम को तरजीह देने का शगल, इस बार भारी पड़ गया। यह काम के प्रति जुनून का ही नतीजा था कि शुगर के मरीज होने के बाद भी उन्होंने शासन के आदेश को सिर-आंखों पर लिया और तत्काल बिलासपुर रेंज के आईजी का चुनौतीपूर्णपद संकट और संक्रमण के दौर में ग्रहण किया। चाहते तो वे बीमारी का हवाला देकर इसे नकार भी सकते थे लेकिन काम के प्रति उनके जोश, जज्बे और जुनून ने ऐसा करने नहीं दिया। एसपी राहुल शर्मा की मौत के बाद बिगड़े हालात सुधरते, आमजन में पुलिस का विश्वास बहाल हो पाता, सदमे से सहमे आमजन व पुलिसकर्मी सामान्य होते, खाकी पर लगे धब्बे धुलते, उससे पहले ही काल ने एक योग्य, मेहनती, जांबाज, कर्मठ और जुझारू अफसर छीन लिया। यह भी एक संयोग है कि अनियमित दिनचर्या तथा काम के प्रति दीवानगी के चलते मरावी को शुगर जैसे रोग ने चपेट में ले लिया और आखिरी समय में भी काम की अधिकता ही उनके दिल के दौरे की वजह बनी।
दरअसल, आरामतलबी न तो उनके व्यवहार में थी और न ही खून में। वे वातानुकूलित कक्षों में बैठकर दिशा-निर्देश जारी करने के बजाय मौके पर पहुंचने में ज्यादा विश्वास करते थे। काम के प्रति समर्पण ऐसा था कि न दिन देखते थे न रात। तभी तो छत्तीसगढ़ जैसे विषम परिस्थितियों वाले राज्य में अपनी दबंग छवि एवं व्यवहार कुशलता के बलबूते उन्होंने आमजन में गहरी पैठ बनाई। पुलिस विभाग में रहते हुए भी लोगों का विश्वास जीता। जमीन से जुड़े होने के कारण वे व्यवहार कुशल थे और जनता के दर्द को बखूबी समझते थे। तभी तो उनका असमय इस तरह चले जाना सबको अखर रहा है। पुलिस लाइन में इस बहादुर असफर को श्रद्धा सुमन अर्पित करने वालों की भीगी पलकें इस बात की गवाही दे रही थी कि वाकई आज छत्तीसगढ़ ने एक दिलेर, दबंग, मदृभाषी एवं मिलनसार अफसर खो दिया है। फर्श से अर्श तक पहुंचने में उनकी मेहनत एवं काबिलियत का ही प्रमुख योगदान रहा। स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर काम करने के उनके तौर-तरीकों से भले ही कोर्इ उचित न ठहराए लेकिन पुलिस जैसे अनुशासन एवं चुनौतीपूर्ण काम वाले विभाग में मरावी एकदम फिट बैठते थे। ऐसा लगता था वे पुलिस के लिए ही बन थे। पुलिस की परिभाषा में एकदम खरे उतरने के मरावी जैसे उदाहरण कम ही हैं। उनके निधन से आमजन अवाक जरूर है, लेकिन जाते-जाते वे एक ऐसी सीख जरूर दे गए जो कालान्तर में किसी प्रेरणा से कम नहीं होगी। एक ऐसी प्रेरणा, जिसकी मौजूदा पुलिस महकमे को महत्ती आवश्यकता है। पुलिस के इस अनुशासित एवं जांबाज अफसर को नमन।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 04 अप्रैल 12 के अंक में प्रकाशित

Tuesday, March 20, 2012

सबको सन्मति दे भगवान

बोले बापू

 मैं हैरान हूं, परेशान हूं। उदास, निराश और व्यथित भी। जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और आमजन के दोहरे चरित्र पर। इनकी कथनी-करनी में कितना अंतर है, यह तो मुझे भली-भांति पता है। आज इसे प्रत्यक्ष देख भी लिया। मेरी जयंती और पुण्यतिथि पर सत्य, अहिंसा व नैतिकता का पाठ पढ़ाने वालों की आज मेरे सामने आने तक की हिम्मत नहीं हुई। मन के किसी कोने में हल्का सा डर या संकोच रहा होगा, तभी तो मेरी प्रतिमा के चारों ओर पर्दा  खींच दिया गया। मैं बात कर रहा हूं कलेक्टोरेट परिसर की, जहां सोमवार को आबकारी ठेकों की लॉटरी निकाली गई। बरगद के नीचे लगी मेरी शांत चित मुद्रा की प्रतिमा को पर्दे में ढंक दिया गया। प्रतिमा के पिछवाडे़ यानि मेरी पीठ के पीछे 'मंथन सभा कक्ष' में शराब ठेकेदारों के भाग्य का फैसला होता रहा। आमतौर पर कलेक्टोरेट परिसर में आने वाले फरियादियों को मेरी प्रतिमा देखकर सुकून मिलता है, संबल मिलता है। न्याय की उम्मीद बंधती है लेकिन आज मेरी जरूरत नहीं थी। सरकार और उसके नुमाइंदे भी नोटों में मेरी फोटो देखने लगे हैं, तभी तो उन्हें मेरे विचारों से ज्यादा कागजों (नोटों) पर भरोसा है। यह नोटों का ही तो कमाल है कि बीते दस साल में छत्तीसगढ़ शराब बिक्री के मामले में दसवें से तीसरे पायदान पर आ गया है। आलम यह है कि शराब, दवा से भी सस्ती हो गई है। यही रफ्तार रही, तो नंबर वन का खिताब हासिल करने में देर नहीं लगेगी। लोग नशे के आदी हो गए हैं। शराब से नोट किस तरह बरस रहे हैं, इसके लिए बिलासपुर का उदाहरण ले लीजिए। गत वर्ष के मुकाबले इस बार 50  करोड़ से भी ज्यादा के शराब ठेके छूटे हैं। आवेदन पत्रों में भी पिछले साल की तुलना में सात करोड़ ज्यादा कमा लिए। यह तस्वीर कमोबेश पूरे प्रदेश की है। विडंबना देखिए, इन सबके बाद भी प्रदेश सरकार शराबबंदी का राग अलापती है। कारण क्या है पता नहीं, फिर भी जोर-शोर से प्रचारित करवाया जा रहा है कि ढाई हजार तक आबादी वाले गांवों में शराबबंदी कर दी गई है। सोचनीय विषय है कि एक तरफ शराब ठेकों की नीलामी के दौरान मेरी प्रतिमा को पर्दे से ढंक दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ शराबबंदी के पोस्टरों में मुख्यमंत्री के साथ मेरी तस्वीर लगाई जा रही है। यह दोहरा चरित्र नहीं तो क्या है। अगर मेरे विचारों को मानते हैं तो फिर खुलकर स्वीकार करने या छिपाने में हर्ज क्या है।
शराब ठेकों की लॉटरी से ही जुड़ा एक हास्यास्पद पहलू भी मैंने आज देखा। बहुत से आवेदन महिलाओं के नाम से आए, लेकिन लॉटरी के दौरान कोई आवेदिका मौजूद नहीं थी। मैंने देखा है कि शराब से पीड़ित अगर कोई है, तो उनमें सर्वाधिक संख्या महिलाओं की है। इसके बावजूद उनके नाम से आवेदन करना कहां तक न्यायसंगत है। सरकार और उनके नुमाइंदों को सिर्फ कमाने से मतलब है। अगर वह लॉटरी के दौरान यह शर्त रख देते कि आवेदक का लॉटरी के दौरान हाजिर रहना जरूरी है तो शायद महिलाओं के नाम का इस तरह दुरुपयोग नहीं होता।यह महिलाओं के लिए सोचने का विषय है कि जब वे शराब से पीड़ित हैं, तो फिर क्यों अपने नाम का इस्तेमाल ठेकों की लॉटरी के लिए होने दिया?
बहरहाल, मैं चकित हूं। सरकार व उनके नुमाइंदों से। यही तो वे लोग हैं, जो योजनाओं के नाम,  मेरे विचारों एवं सिद्धांतों को मानने का दंभ भरते हैं। गाहे-बगाहे यह साबित करते हैं उनकी विचाराधारा गांधीजी के ज्यादा निकट हैं। यह सब ख्याली पुलाव हैं, जो चुनाव के वक्त ही पकाया जाता है। बाद में पांच साल के लिए मुझे कोई पूछता भी नहीं। अवसर विशेष पर श्रद्धा के सुमन चढ़ा दिए तो गनीमत है, वरना साल भर मेरी प्रतिमाओं को धूल फांकने के अलावा कोई चारा नहीं है। मेरे नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ही मेरी वैचारिक हत्या कर रहे हैं। जिस प्रकार की व्यवस्था की गई और सुरक्षा के लिए जवानों को  तैनात किया गया, उतना अमला किसी मैदान में भी जुटाया जा सकता है। व्यस्त सड़क पर बार-बार जाम लगता रहा वह अलग। खैर, बड़ों का काम हमेशा माफ करना रहा है। यह सब नासमझ हैं। पैसे की चाह में मुझे नजरअंदाज कर दिया। भगवान इनको सद्‌बुद्धि दे, सन्मति दे, ताकि अगले साल कम से कम मेरा लिहाज तो रखें और लॉटरी के लिए किसी दूसरी मुफीद जगह की तलाश करें।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 20  मार्च 12  के अंक में प्रकाशित



Friday, February 24, 2012

चेतावनी से नहीं बनेगी बात

टिप्पणी

बिलासपुर की बदहाल यातायात व्यवस्था पर माननीय हाईकोर्टकी ओर से लगाई गई फटकार के बाद यातायात पुलिस एवं जिला परिवाहन अधिकारी इन दिनों हरकत में आए हुए हैं। यातायात पुलिस का जोर जहां वाहनों की जब्ती पर है, वहीं जिला परिवहन अधिकारी अभी भी कागजी घोड़े ही दौड़ा रहे हैं। कार्रवाई के नाम पर रोजाना प्रेस विज्ञप्ति जारी कर वाहन चालकों को चेतावनी पर चेतावनी दी जा रही है। चेतावनी का असर वाहन चालकों पर कितना हो रहा है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। अगर चेतावनी के माध्यम से ही बदहाल यातायात व्यवस्था पटरी पर आ जाती तो बार-बार माननीय हाईकोर्ट से फटकार नहीं लगती। हालत यह हैकि  करीब तीन माह से ज्यादा समय से लगातार फटकार लग रही हैलेकिन यातायात व्यवस्था में सुधार दिखाईनहीं दे रहा है। तभी तो माननीय हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और आरटीओ एवं यातायात डीएसपी को अवमानना नोटिस जारी करते हुए कहा हैकि दो हफ्ते में व्यवस्था सुधरनी चाहिए नहीं तो दोनों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाईहोगी।
आलम देखिए कल तक हाथ पर हाथ धरे बैठे अधिकारियों को अब वह सब याद आ रहा है, जो रोजमर्रा की कार्रवाई की हिस्सा है। एक ही नम्बर की कईगाड़ियां शहर में दौड़ रही हैं। अधिकतर ऑटो रिक्शा का बिना परमिट के संचालन हो रहा है। कृषि कार्य में उपयोग किए जाने वाली ट्रैक्टर-ट्रालियां भी बेखौफ चल रही हैं। टाटा मैजिक वाहन शहर के अंदर न केवल आसानी से आ जा रहे हैं बल्कि सवारियां भी ढो रहे हैं। एक ही नम्बर के वाहन मिलने के मामले में कार्रवाई के नाम पर आरटीओ ने वाहन डीलरों को चेतावनी जारी कर औपचारिकता निभा दी। इतना ही नहीं बसों में किराया सूची लगाने की बात भी जागरूक लोग समय-समय पर उठाते रहे हैं लेकिन कार्रवाईनहीं हुई। अब परमिट क्रमांक, वैधता, मार्ग का नाम, समय सारिणी, फिटनेस प्रमाण पत्र की वैधता के लिए दिशा-निर्देश जारी हो रहे हैं। बसों में  किराया सूची चस्पा करने, शिकायत पुस्तिका रखने, बस स्टैण्ड पर अनावश्यक रूप से बसें खड़े ना करने, परमिट में दर्जसमय से आधे घंटे से पूर्व ही स्टैण्ड पर खड़ी करने तथा नो पार्किंग में बसें न खडी करने जैसी बातें भी अब याद आ रही हैं।
बहरहाल, यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाने में जोर इसलिए भी आ रहा हैक्योंकि इस प्रकार के हालात पैदा होने के पीछे वाहन चालकों के साथ-साथ दोनों विभाग भी जिम्मेदार हैं। जितनी तत्परता अब दिखाईजा रही है, उतनी शुरू से दिखाई जाती तो यह हालात ही नहीं बनते। कानून तोड़ने वालों पर चेतावनी का असर इसलिए भी नहीं हो रहा है, क्योंकि बचाव के रास्ते भी इन विभागों के द्वारा ही तैयार किए गए हैं। इसीलिए तो विभागों की सरपरस्ती पाए लोग चेतावनी को महज गीदड़ भभकी ही मान रहे हैं। ऐसे लोग तभी लाइन पर आएंगे जब कार्रवाई का डंडा समान रूप से सख्ती के साथ चलेगा। चेतावनी देने तथा दिशा-निर्देश जारी करने का खेल बहुत हो चुका है। इनका हश्र भी सबने देखा है। अब चेतावनी से बात नहीं बनने वाली। मानननीय हाईकोर्टका आशय भी शायद यही है कि दोनों विभाग कार्रवाई के परम्परागत ढर्रे को तोड़ते हुए कुछ ऐतिहासिक काम करें, तभी कुछ हो सकता है। देखा यह गया हैकि शहर में समस्या के समाधान के लिए बैठकें तो खूब होती हैं। सुझाव लिए जाते हैं। कार्रवाई के नाम पर दिशा-निर्देश भी जारी हो जाते हैं लेकिन बात इससे आगे नहीं बढती। ऐसे कईउदाहरण हैं। मौजूदा हालात में यह जरूरी हो गया हैकि बात चेतावनी से आगे बढ़े। दोनों विभाग ऐसा कुछ कर पाए तो ही व्यवस्था में सुधार होगा।

साभार : पत्रिका बिलासपुर के 24 फरवरी 12  के अंक में प्रकाशित




Monday, February 20, 2012

आमजन की भी सुनिए...

हमारी पीड़ा

हम बिलासपुर के लोग इन दिनों संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। एक ऐसा अजीब सा दौर जहां हमारी पीड़ा सुनने वाला, हमारे आंसू पोंछने वाला दूर तलक कोई नजर नहीं आता। आम लोगों के लिए किसी के पास फुर्सत ही नहीं है। सांप छछूंदर जैसी हालत हो गई हमारी। ना खाते बन रहा है, ना निगलते। ना कहीं रो सकते हैं और ना ही खुलकर हंस सकते हैं। दोष किसको दें। हम अपने कर्मों की सजा ही तो भोग रहे हैं। हमने जो बोया उसका फल पा रहे हैं। यह हमारा और इस शहर का दुर्भाग्य हैकि यहां जनप्रतिनिधि और अधिकारी दोनों एक जैसे हैं। कोई काम करना ही नहीं चाहता। जनप्रतिनिधियों को तो हमसे कोई वास्ता ही नहीं रह गया। जरूरत के समय तो पता नहीं कैसे-कैसे वादे कर रहे थे। सपने दिखा रहे थे। विकास की गंगा बहा रहे थे। और भी न जाने क्या-क्या सब्ज बाग दिखाए। हम सीधे एवं सहज लोग उनकी चिकनी चुपड़ी बातों में आ गए।  ऐसा हम हर बार करते हैं। लगातार परेशान होते रहते हैं। मन ही मन में व्यवस्था बदलने की सोचते हैं, लेकिन फैसले की घड़ी में हम गलती कर बैठते हैं। ऐसा हम लम्बे समय से करते आ रहे हैं। तभी तो हमारे जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली का असर हमारे अधिकारियों पर भी पड़ रहा है। या यूं कहे कि जनप्रतिनिधियों की आदतें अधिकारियों में भी घर कर गई हैं।
बिलासपुर आने वाले अधिकारियों को पता नहीं क्या हो जाता है। आमजन के काम, उनकी दिक्कतें उनको नजर ही नहीं आती हैं। पद का इतना गरुर है कि आंख खुलती ही नहीं है। एक अजीब सी नींद में गाफिल नजर आते हैं। खुद से कोई काम कभी सूझता ही नहीं है। हां, एक काम करना इनको बखूबी आता है, जिसमें इनको महारत हासिल हो गई है। जनप्रतिनिधियों के इशारे पर इधर-उधर करना या जोड़-तोड़ का समीकरण बैठाने का काम हंसते-हंसते करना यह लोग परम कर्तव्य समझते हैं। जनप्रतिनिधियों की जी हजूरी करना वे अपना परम सौभाग्य मानते हैं। ऐसा लगता है सेवक जनता के न होकर जनप्रतिनिधियों के हैं। जनप्रतिनिधि जो कहते हैं, अधिकारी वैसा ही करते  हैं। कठपुतली की तरह उनके इशारों पर नाचते हैं। अधिकारियों के भाग्य विधाता आजकल जनप्रतिनिधि ही बने हुए हैं लिहाजा, आम आदमी से उनको कोई सरोकार नहीं है। जनप्रतिनिधियों को खुश कैसे रखा जाए, अधिकारियों का दिन इसी उधेड़बुन में ही बीतता है।
बहरहाल, बिलासपुर के अधिकारी कैसे हैं तथा उनके काम करने का तरीका कैसा है, यह बात वे लोग बेहतर जानते हैं जिनका अधिकारियों से वास्ता पड़ चुका है। नर्मदानगर एवं गुरुनानक चौक का उदाहरण ही देख लें। नर्मदानगर में हमारे साथी कई दिनों से सामुदायिक भवन में देर रात बजने वाले डीजे, लाउडस्पीकरों एवं पटाखों से परेशान हैं। अपनी पीड़ा को लेकर यह लोग कहां-कहां तक नहीं गए, लेकिन अधिकारियों के कानों पर जूं तक नही रेंग रही। कमोबेश ऐसा ही मामला गुरुनानक चौक का है। यातायात को व्यवस्थित करने के लिए सिख समाज ने गुरुनानक देव के प्रतीक चिन्ह को चौराहे से हटाकर सडक़ किनारे स्थापित करने करने के लिए सहमति प्रदान की। चार साल पूर्व चौक को तोडक़र प्रतीक चिन्ह को सडक़ किनारे समारोहपूर्वक स्थापित किया गया। सहर्ष एवं शहर के हित में निर्णय लेने वाले सिख समाज के लोग इन दिनों अधिकारियों की उदासीनता से काफी आक्रोशित हैं। चौक बदहाल हो गया है। ऑटो स्टैण्ड में तब्दील हो चुका है। नर्मदानगर एवं गुरुनानक चौक जैसे मामले शहर में दर्जनों हैं। समस्याओं से त्रस्त लोग पुकार रहे हैं लेकिन जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उनको अनसुना कर रहे हैं। आलम यह हो गया है कि छोटी-छोटी बातों तक के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। बदहाल यातायात व्यवस्था हो, चाहे शहर की टूटी फूटी सडक़ें। अधिकारी तभी हरकत में आते हैं जब न्यायालय का डंडा चलता है। अंततः घूम फिर कर सवाल वही उठता है कि आम आदमी को बुनियादी सुविधाओं में सुधार के लिए न्यायालय की शरण में जाना पड़े तो फिर अधिकारियों को जनसेवक कहना कहां तक उचित है। हां इतना जरूर हैकि हमारे जनप्रतिनिधियों की तरह अधिकारी एक काम तो आसानी कर लेते हैं, वह है बयान देने का। जनप्रतिनिधि भाषणों के माध्यम  विकास की गंगा बहाते हैं तो अधिकारी बैठकों में दिशा-निर्देश जारी कर ऐसा समझते हैं मानो काम हो ही गया।
बहरहाल, बयानों के इस शोर में जनता की पुकार दब रही है। एक बार हाथ आया मौका गंवा देने की सजा उसे पांच साल भोगनी पड़ती है, क्योंकि बाद में उसके हाथ में कुछ बचता नहीं है। फिर भी इस प्रकार की उदासीनता लम्बे समय तक उचित नहीं है। जनता जनार्दन सिर-आंखों पर बैठाना जानती है तो नीचे उतारने में भी देर नहीं लगाती। देर है तो बस एकजुट होने की। अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों को समय रहते चेत जाना चाहिए। समय की नजाकत को भांप लेना चाहिए। 

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 20 फरवरी 12 के अंक में प्रकाशित।


Tuesday, February 14, 2012

इन धमाकों को सुनिए!

टिप्पणी 

श्रीमान, राहुल शर्मा
पुलिस अधीक्षक, बिलासपुर।

आपको बिलासपुर जिले का कार्यभार संभाले हुए एक माह से ज्यादा समय हो गया है। इस अवधि में आपको शहर की सूरत एवं सीरत का अंदाजा तो भली भांति हो गया होगा। वैसे भी किसी अधिकारी के लिए शहर को समझने के लिए एक माह का समय कम नहीं होता है। चूंकि आप नए हैं, सभी की नजरें भी आप पर ही हैं, इसलिए शहर को आपसे अपेक्षाएं भी ज्यादा हैं। अपेक्षा ज्यादा होने का मतलब यह तो कतई नहीं है कि आपसे पहले वाले अधिकारी काम के नहीं थे या उन्होंने काम नहीं किया। दरअसल यह आम धारणा बन गई है कि जब भी कोई नया अधिकारी आता है तो उससे उम्मीदें एवं अपेक्षाएं बढ़ जाती है। इसकी एक प्रमुख वजह नए व पुराने के बीच तुलना होना भी है। जब व्यवस्था एक  ही ढर्रे पर चलती है और उसमें रत्तीभर भी बदलाव दिखाई देता है तो उम्मीदें बढ़ना लाजिमी है। आपने पदभार संभालने के बाद जिस तरह कबाड़ियों के खिलाफ कार्रवाई की उससे लगा कि वाकई आप पटरी से उतरी व्यवस्था को सही करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। लेकिन जिस अंदाज में कार्रवाई का आगाज हुआ, वह अंजाम तक पहुंचने से पहले ही विवादों में घिर गई। खैर, इस प्रकार की कार्रवाई अक्सर नवागत अधिकारी करते आए हैं ताकि गलत काम करने वालों में कानून के प्रति खौफ हो। यह बात दीगर है कि आपने कार्रवाई का केन्द्र कबाड़ियों को बनाया।
आपको अवगत कराने की जरूरत नहीं है, फिर भी बता दें कि बिलासपुर शहर में मुख्य रूप से दो विचारधाराओं के लोग ही ज्यादा हैं। या यूं कहें कि दो विचारधाराओं के लोग दो वर्गों में बंटे हुए हैं। इनकी जीवनशैली में जमीन आसमान का अंतर है। तभी तो दोनों वर्गों के बीच लम्बी-चौड़ी खाई है। एक वर्ग सामान्य व आम लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जबकि दूसरा रसूखदारों एवं धनाढ्‌य लोगों से बावस्ता है। सारी कहानी इन दोनों वर्गों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। रसूखदार जहां पैसे एवं पहुंच के दम पर कुछ भी करा सकने का दावा करते हैं जबकि आम आदमी के पास सिवाय व्यवस्था को कोसने के दूसरा कोई चारा नहीं है। रसूखदारों से नजदीकियां बढ़ाने, उनके दुख-दर्द में शामिल होने तथा उनको कुछ भी करने की छूट देने जैसे आरोपों से आपका विभाग भी अछूता नहीं है। कई मौके तो ऐसे आए हैं जब आपके मातहतों ने मुंह देखकर कार्रवाई की है।
पुलिस में भर्ती होने के बाद प्रशिक्षण के दौरान संविधान के प्रति पूरी ईमानदारी एवं मेहनत से सेवा देने, कर्तव्य का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी के साथ करने, सभी धर्मा के प्रति समान भावना रखने, अपराध के लिए कोई भी रिश्तेदारी या जाति भावना दिल में न आने देने तथा मेहनत एवं लगन के दम पर देश एवं राष्ट्र धवज का नाम ऊंचा करने की शपथ लेने वाले आपके मातहत पता नहीं क्यों समय के साथ बदल जाते हैं। आम आदमी का दर्द उनको दर्द ही नजर नहीं आता है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। बीते एक माह में आप भी इससे वाकिफ हो गए होंगे। शहर में देर रात तक डीजे बजाना, तेज धमाकों के साथ आतिशबाजी करना और पटाखे फोड़ना आम हो गया है।  मौजूदा समय में रसूखदारों का यह शगल आम आदमी को इसलिए अखर रहा है, क्योंकि यह परीक्षा का समय है। प्राइमरी से लेकर माध्यमिक, उच्च माध्यमिक एवं कॉलेज स्तर की परीक्षा सिर पर हैं। परीक्षाओं को देखते हुए जिला प्रशासन ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनुपालना में तेज ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक लगाने के आदेश जारी कर रखे हैं। ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक के आदेशों के बावजूद रात बारह-एक बजे तक शहर में तकरीबन रोजाना तेज आवाज में डीजे बजता है। पटाखे फूटते हैं, लेकिन आपके मातहतों को यह सुनाई नहीं देता है।
ऐसा लगता है, उन्होंने कानों में रुई डाल रखी है। डीजे एवं पटाखों के धमाके आपको सुनाई न देना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। ऐसा लगता है आपके बंगले एवं कार्यालय की दीवारें आवाज रोधी हैं। आप ही बताइए, अपनी खुशी के लिए दूसरों को परेशानी में डालना कहां तक उचित है। परीक्षा की तैयारी में व्यस्त कोई नौनिहाल हिम्मत जुटाकर आपको सूचना देता भी है तो उसकी बात को अनसुना नहीं करना चाहिए। वह एक उम्मीद के साथ  सूचना देता है लेकिन जब उसे निराशा  हाथ लगती है तो वह दुबारा क्यों फोन करेगा। इससे तो यह जाहिर होता है कि रसूखदारों को खुलेआम अपने रुतबे का प्रदर्शन करने की अघोषित छूट भी आपके विभाग ने ही दे रखी है।  वे कभी भी, कहीं भी कुछ भी करें। उनको रोकने या टोकने कोई नहीं जाता है।  तभी तो आम आदमी पुलिस के पास जाने में भी डरता है। व्यवस्था से त्रस्त बिलासपुर के आम आदमी को जब इन ध्वनि विस्तारक यंत्रों व देर रात होने वाले तेज धमाकों से ही मुक्ति नहीं मिल रही है तो फिर अपराधों पर नियंत्रण की बात करना बेमानी है। आप कुछ नया कर पाए तो बिलासपुर के लोग आपको लम्बे समय तक याद रखेंगे। भले ही वह आम जन में विश्वास कायम करना ही क्यों न हो।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 14 फरवरी 12 के अंक में प्रकाशित

Sunday, February 12, 2012

भाषण

सर्वप्रथम एक अच्छे एवं प्रासंगिक विषय का चयन करने के लिए डा. सीवी रमन विश्वविद्यालय को धन्यवाद। इस सेमीनार की परिकल्पना करने वालों को धन्यवाद और इस आयोजन में मुझे आमंत्रित करने के लिए भी धन्यवाद। 
अपनी बात शुरू करने से पहले एक रोचक जानकारी से आपको अवगत कराना चाहता हूं, हालांकि यह जानकारी भी सेमीनार की विषय वस्तु से ही संबंधित है, लेकिन बात शुरू वहीं से करता हूं। आपने बिट्‌स पिलानी का नाम तो सुना ही होगा। बताइए कितने लोग इसके बारे में जानते हैं.........? अब यह बताइए कि झुंझुनूं कहां पर है...? आप में से कम लोग ही यह जानते होंगे कि पिलानी एक छोटा सा कस्बा है और झुंझुनूं जिले के अधीन आता है। पिलानी इसलिए प्रसिद्ध हो गया क्योंकि उसने तकनीकी आधारित शिक्षा देने काम किया है। हालात यह है कि इस संस्थान में प्रवेश पाना कई युवाओं के लिए तो सपना ही रह जाता है। खैर, पिलानी और झुंझुनूं का जिक्र इसलिए किया है क्योंकि मैं स्वयं झुंझुनूं का रहने वाला हूं।  झुंझुनूं राजस्थान बेहद जागरुक जिला है। इसी जिले में मेरा गांव है। मेरा जिला साक्षरता के मामले में राजस्थान में अव्वल है। कमोबेश यही तस्वीर महिला शिक्षा की भी है।
जाहिर सी बात है कि लोग शिक्षित होंगे तो जागरुक होना भी लाजिमी है, लेकिन मेरा मानना है कि सिर्फ शिक्षित होने से ही जागरुकता नहीं आ सकती है। इसके लिए मानसिकता को भी बदलना होगा। इसके लिए भी मैं मेरे जिले का ही उदाहरण दूंगा क्योंकि यह सब मैंने न केवल प्रत्यक्ष देखा है बल्कि महसूस भी किया है। बात लम्बी एवं बड़ी जरूर है लेकिन मौका मिला है तो मैं कहने से नहीं चूकूंगा। स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद हमारे यहां बीएड करना एक परम्परा सी बन गई है। इसके अलावा युवाओं को दूसरा कोई रास्ता न दिखता है और न सूझता है। आलम देखिए, बड़े भाई ने अगर बीएड की तो छोटा भी बीएड ही कर रहा है। तभी तो अकेले झुंझुनूं जिले से जितने शिक्षक हैं, उतने राजस्थान के किसी भी जिले में नहीं हैं। आपको घर-घर में शिक्षक तथा बीएडधारी मिल जाएंगे। पति-पत्नी दोनों के शिक्षक होने या बीएडधारी होने के उदाहरण तो हजारों में हैं। आपको बता दूं कि मेरी धर्मपत्नी भी एमए बीएड है। मैंने भी बीए करने के बाद बीएड के लिए एक बार कोशिश की लेकिन भाग्य में कुछ और ही लिखा था। मेरे बड़े भाई भी शिक्षक हैं। एक भाभीजी ने भी बीएड की डिग्री हासिल कर रखी है। मतलब बीएड का जितना क्रेज युवाओं में है, उतना ही युवतियों में भी है। साथ में यह भी बता दूं कि बेरोजगार शिक्षकों के मामले में भी झुंझुनूं का पहला स्थान है। दरअसल बीएड करने के पीछे यह धारणा है कि सभी ऐसा कर रहे हैं मैं भी ऐसा कर लूं। इस भेड़चाल में शामिल मेरे जिले के युवाओं को कॅरियर के प्रति जागरुक एवं मार्गदर्शन देने वाला पथप्रदर्शक कोई नहीं है। यह एक छोटी सी तस्वीर है, जो बताती है कि मार्गदर्शन के अभाव में युवाओं के पास कॅरियर बनाने के विकल्प किस प्रकार से सीमित हो जाते हैं।
मेरे जिले से ही एक दूसरा उदाहरण है सेना में जाने का। दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद युवा सेना में भर्ती होने के लिए लालायित रहते हैं और दौड़ धूप शुरू कर देते हैं। इसका प्रमुख कारण मेरे जिले में खेती फायदा का सौदा न होना है। आजीविका का मुख्य आधार नौकरी पेशा ही है। यही कारण की दसवीं के बाद सेना में जाने की परम्परा आजादी से पहले से ही चल रही है। तभी तो अकेले झुंझुनूं जिले से करीब 60 हजार युवा भारतीय सेना में कार्यरत हैं जबकि इतने ही सेनानिवृत्त्त हैं। मेरे पिताजी एवं उनके चारों भाइयों ने न केवल सेना में नौकरी की बल्कि 1962, 1965 व 1971 के युद्धों में भी भाग लिया है। मेरे बड़े भाई भी भारतीय वायुसेना में कार्यरत हैं। मैं स्वयं भी दो बार सेना में भर्ती होने के लिए कोशिश कर चुका हूं लेकिन वहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया।
माफ कीजिएगा, मैं अपनी बात को लम्बी खींच रहा हूं लेकिन सेना और शिक्षक का उदाहरण देने की पीछे ही आज के सेमीनार की विषय वस्तु छिपी हुई है। लब्बोलुआब यह है कि  शिक्षित होने के बाद भी मानसिकता सरकारी नौकरी हासिल करने की रहती है। यही कारण है कि अधिकतर शैक्षणिक संस्थान अकादमिक शिक्षा देने तक ही सीमित हैं।  इसी वजह से अधिकतर गांवों में शिक्षित बेरोजगारों की लम्बी फौज मिल जाएगी। बेरोजगारी के पीछे प्रमुख कारण यही है कि उन्होंने रोजगार विषयक शिक्षा ग्रहण नहीं की।
मैंने आपको जो तस्वीर दिखाई है वह आज से पांच साल पहले तक ही है, हालांकि इसमे आमूलचूल परिवर्तन तो अभी भी नहीं हुआ लेकिन बदलाव की बयार बहनी शुरू हो गई है। आरक्षण की मार तथा कड़ी प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सरकारी नौकरियां अब सीमित हो गई हैं। ऐसे में रोजगारपरक शिक्षा की महत्ता काफी बढ़ गई है।
तभी तो अकेले मेरे जिले में ही तीन निजी विश्वविद्यालय पिछले पांच साल में खुले हैं जबकि दो निकट भविष्य में खुलने वाले हैं। इन सभी विवि का ध्यान अकादमिक शिक्षा के बजाय रोजगारपरक पढ़ाई एवं कोर्सेज पर ही केन्द्रित है।  पिछले पांच साल से मैंने देखा है कि आईआईटी में अकेले झुंझुनूं से 15 से 20  छात्रों का चयन प्रति वर्ष हो रहा है। ऐसे परम्परागत जिले में इस प्रकार लीक से हटकर काम कर उसमें सफलता पाना अपने आप में बड़ी बात है।
खैर, मौजूदा समय में व्यवसायिक शिक्षा निहायत जरूरी है लेकिन इसके लिए कुछ चुनौतियां भी हैं, मसलन, जागरुकता का अभाव, परम्परागत ढर्रे का असर, सरकारी नौकरी के प्रति मोह, सरकारी प्राइवेट में भेद, प्रचार-प्रसार का अभाव, विवाह में सरकारी नौकरी वालों को प्राथमिकता, अकादमिक शिक्षा का अंधानुकरण, सस्ती शिक्षा का लालच, मार्गदर्शन का अभाव आदि प्रमुख है।
सरकारी नौकरी तथा उसके रुआब से इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन प्राइवेट क्षेत्र में आज ने केवल काफी संभावनाएं हैं,बल्कि पैसा एवं प्रतिष्ठा दोनों हैं। सरकारी नौकरी का मोह छोड़कर व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण करने वालों के लिए मैं राजस्थान में बेहद प्रचलित दोहे का उल्लेख जरूर करना चाहूंगा,  जिसमें कहा गया है कि, लीक लीक घोड़ा चले, लीक ही चले कपूत, लीक छोड़ तीन चले, शायर, सिंह, सपूत। कहने का तात्पर्य है जो लीक से हटकर चलते हैं, वे इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाते हैं।
व्यावसायिक एवं रोजगारपरक शिक्षा आज जरूरी है और समय की मांग भी है लेकिन भारत में इस दिशा में देरी से सोचा गया वरना आज तस्वीर ही दूसरी होती है। जितना गंभीरता अब दिखाई जा रही है उतनी पहले बरती जाती तो शायद हमारे देश की प्रतिभाएं दूसरे देशों में पलायन करने की बजाय यहीं रुकती। इससे देश को फायदा भी मिलता। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 15 से 25 आयु समूह के युवाओं में आज भी भारतीय सामान्य विवि के कार्यक्रमों में दाखिल लेते हैं जबकि यूरोप में 80 फीसदी तथा मलेशिया, कोरिया व ताइवान जैसी पूर्वी एशियाई देशों में 60 प्रतिशत युवा व्यवसायिक शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं। तभी तो बाजार में दिखाई देने वाले लगभग हर उत्पाद में चीन के सामान की धमक दिखाई देती है।
चीन का भारतीय बाजार पर कब्जे करने के अंकगणित को भी हमें समझना होगा।  भारत में जहां 51 सौ औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान तथा 1745 पोलिटेक्नीक कॉलेज हैं, वहीं चीन में इनकी संख्या लाखों में है। भले ही व्यावसायिक प्रशिक्षण में फिल्म, टेलीविजन, सूचना प्रौद्योगिकी के मामले भारत आगे है लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 18 से 25 आयु वर्ग के तीन सौ लाख युवा बेरोजगार हैं जबकि46 लाख रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत हैं।
सरकारी सेवाओं में घटते अवसरों तथा निजी क्षेत्र में व्यापक संभावनाओं को देखते हुए भारत सरकार की ओर से  2008-09 में एनएसडीएल.... नेशनल  स्कील डवलपमेंट कोरपोरेशन की स्थापना की गई। इसका उद्‌देश्य 2022 तक करीब 50  करोड़ लोगों को विभिन्न प्रकार के कौशलों से अवगत श्रमिकों की श्रेणी में लाने तथा जो कुशल वर्ग में आते हैं, उनकी कुशलता में और इजाफा करने के लक्ष्य में करीब 30 प्रतिशत तक का महत्वपूर्ण योगदान करने का है जो कि मुख्यतया निजी क्षेत्र से आएगा। एनएसडीएल वित्त मंत्रालय के अधीन है तथा  यह बगैर लाभ के काम करती है। इसकी मूल पूंजी 10 करोड़ हैं। इसमें 49 प्रतिशत शेयर सरकार के पास जबकि 51  फीसदी निजी क्षेत्र के हाथों में है। इस संस्था से देश में कौशलता को सुधारने में काफी मदद मिलेगी। प्राइवेट सेक्टर में भरपूर संभावनाओं के वाले बीस क्षेत्र हैं। इनमें दस औद्योगिक तथा दस सेवा क्षेत्र हैं। औद्योगिक क्षेत्र में वाहन तथा उनके पुर्जों से जुड़े उद्योग, इलेक्ट्रोनिक्स, कपड़ा तथा वस्त्र उद्योग, चमड़ा तथा चमड़े की सामग्र से जुड़े उद्योग, रसायन तथा औषधि उद्योग, जवाहरात तथा कीमती पत्थर उद्योग, गृह तथा ढांचागत निर्माण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, हस्तकरघा तथा हस्तशिल्प उद्योग और गृह निर्माण व गृह सज्जा की वस्तुओं का उद्योग शामिल है। इसी प्रकार सेवा क्षेत्र में सूचना तकनीक व साफ्टवेयर सेवा, सूचना तकनीक पर आधारित सेवा जैसी बीपीओ, पर्यटन तथा होटल उद्योग, यातायात, सामान का वहन व पैकेजिंग, सुनियोजित खुदा व्यापार, रियल इस्टेट सेवा, मीडिया, मनोरंजन, ब्रोडकास्टिंग, एनिमेशन तथा लेखन से जुड़ी सेवा, स्वास्थ सेवा, बैंकिंग बीमा तथा वित्तीय सेवा और शिक्षण-कौशल विकास के क्षेत्र शामिल हैं।
बहरहाल, आपको पता दूं कि मैं खुद भी उस क्षेत्र में हूं जो सेवा क्षेत्र में आता है। मीडिया में भी वर्तमान में रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। यहां सिर्फ लेखन ही नहीं बल्कि कई सेक्टर हैं जहां कॅरियर बनाया जा सकता है। आखिर में फिर पुरानी बात पर लौटता हूं कि आज से १२ साल पहले मैं जब इस क्षेत्र में आया  था तो मेरे गांव के लोगों को पता ही नहीं था कि मीडिया क्या है। मैं जब भी गांव जाता वे जिज्ञासावश पूछ लेते, अखबार में आप क्या करते हो? कहीं आप अखबार बांटने का काम तो नहीं करते? आदि-आदि।  यह सब बातें मैँ इसलिए शेयर कर रहा हूं क्योंकि लोगों का इस क्षेत्र की जानकारी ही नहीं थी। आज भी हालात बदलते नहीं है, लेकिन मैंने सरकारी का मोह को त्यागा तथा शिक्षक या सैनिक बनने की किवदंती को न केवल तोड़ा बल्कि यह भी साबित कर दिखाया है देश सेवा सिर्फ सेना में जाने से ही नहीं बल्कि पत्रकारिता के माध्यय से भी की जा सकती है। मैंने लीक को छोड़ा,  परम्परा को तोड़ा तो उसका फायदा भी मिला। मैं मेरे युवाओं साथियों की तरह बीएड कर भी लेता तो उनकी तरह आज बेरोजगारों की भीड़ में ही शामिल होता या फिर किसी निजी शिक्षण संस्थान में डेढ़-दो हजार की मासिक पगार पर नौकरी कर रहा होता। मैंने परम्परा तोड़ने का साहस दिखाया। मैंने कुछ नया करने का खतरा मोल लिया तो उसका प्रतिफल भी मुझे मिला। आज आलम यह है कि गांव जाता हूं तो कई युवा पत्रकारिता के क्षेत्र में आने को उत्सुक दिखाई देते हैं तथा मुझसे इस फील्ड में आने के तरीकों के बारे में चर्चा करते हैं।
्रसेमीनार में भाग लेने वाले युवा साथियों से इतना ही कहना चाहूंगा कि वे जिस भी क्षेत्र में जाएं पूर्ण लगन एवं निष्ठा के साथ कार्यकर महारत हासिल करें। खुद को किसी भी मामले में कमत्तर नहीं आंके। आत्मविश्वास को किसी भी सूरत में कम नहीं होने दें। मन में यह हीन भावना भी कभी न आने दें कि मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि का हूं और यह शहरी है। ऐसा कुछ नहीं है, यह केवल वहम है। सोच का फर्क है। दूसरी बात यह है कि प्राइवेट क्षेत्र में कौशल विकास करने के मौके लगातार मिलते रहते हैं, इसके लिए खुद को कभी विशेषज्ञ न मानें और निरंतर सीखते रहे। सीखने में छोटे-बड़े का भेद न हो बल्कि प्रयास यही रहे कि हम उसके अनुभवों का लाभ उठाएं। मैं स्वयं हमेशा सीखने को लालायित रहता हूं। जहां भी मौका मिलता हूं सीखता हूं, क्योंकि मैं जब से चला मेरी मंजिल पर नजर है, मेरी आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा, जैसे फलसफे में विश्वास रखता हूं।  मतलब साफ है कि अपने लक्ष्य को अपने जेहन में रखता हूं तथा उसे पाने के लिए के लिए प्रयास व मेहनत भी करता रहता हूं। आखिर में आयोजकों को अच्छे विषय पर सेमीनार करवाने तथा मुझे इसमें आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद देते हुए अपनी वाणी को विराम देना चाहूंगा।
जय हिन्द, जय भारत।

दिनांक 10 फरवरी 12  को डा. सीवीरमन विश्वविद्यालय में कौशल विकास एवं व्यावसायिक शिक्षा में विश्वविद्यालयों की भूमिका विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में बतौर विशिष्ट अतिथि दिया गया भाषण।







Saturday, January 28, 2012

बात दिशा-निर्देशों से आगे तो बढ़े


पत्रिका व्यू
सड़क सुरक्षा सुरक्षा समिति की शुक्रवार को हुई बैठक जो निर्णय लिए गए , वे सब करीब ढाई माह पूर्व हुए खुला मंच कार्यक्रम में भी लिए जा चुके हैं। मंथन में जुटे अधिकारियों, कर्मचारियों तथा  निजी ट्रक, बस, आटो, चालक संघों के पदाधिकारियों को शायद याद न हो, लेकिन जिन मुद्‌दों पर इन लोगों की चर्चा की उन पर पहले भी काफी विचार-विमर्श हो चुका है। मसलन, शहर के विभिन्न स्थानों से अनुचित पार्किंग एवं अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। टाटा मैजिक वाहनों का शहर के अंदर प्रवेश प्रतिबंधित किया गया है। रास्तों पर अतिक्रमण कर ठेला लगाने वालों को हटाने, ऑटो संचालन के लिए परमिट अनिवार्य करने तथा ट्रांसपोर्ट नगर में सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात कही गई।
ऑटो के परमिट न होने तथा मैजिक के अवैध संचालन की बात तो खुला मंच कार्यक्रम में यातायात विभाग के डीएसपी ने ही कही थी। इसी कार्यक्रम में  ट्रांसपोर्ट नगर का मामला तो बहुत जोर-शोर से उठा था। शहर में भारी वाहनों के रात में प्रवेश का मामला भी इसी बात से जुड़ा है। सवाल उठता है कि जिन सुविधाओं की उपलब्धता की बात अब की जा रही है, वह पहले क्यों नहीं जुटाई गई। सुविधाएं थी ही नहीं तो वाहनों का प्रवेश बंद करने में जल्दबाजी क्यों दिखाई गई। सुविधाएं जुटाई गए तो उनमें कमी की गुंजाइश क्यों छोड़ दी गई। बात फिर वहीं आकर रुकती है कि केवल हर बार दिशा-निर्देश ही जारी होकर रह जाते हैं।
बहरहाल, ऐसी बैठकों की सार्थकता तभी है, जब उनमें लिए गए निर्णयों पर काम हो। बैठकें बुलाने तथा उनमें दिशा-निर्देश जारी करना एक तरह से वक्त बर्बाद करना ही तो है, क्योंकि इनसे हासिल तो कुछ होता नहीं है। सिर्फ कागजी कार्रवाई करने, शासन-प्रशासन के दवाब या माननीय न्यायालय के आदेशों की अनुपालना में सिर्फ बैठकें बुलाने से ही बात नहीं बनेगी। जरूरत दिशा-निर्देशों को हकीकत में बदलने की है। उम्मीद की जानी चाहिए शुक्रवार को हुई बैठक में जारी किए गए दिशा-निर्देशों पर न केवल अमल होगा बल्कि कार्रवाई भी होगी।

साभार- पत्रिका बिलासपुर के  28 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित


Friday, January 27, 2012

चुप्पी तोड़िए...कुछ तो बोलिए...


खरी-खरी
हम बिलासपुर के लोग बेहद अजीब हैं। हमारा स्वभाव, हमारी प्रकृति और व्यवहार, सब कुछ अजूबा है। अनूठा है। हर कोई हमें सीधा समझता है। वैसे हम हैं भी सीधे। इतने सीधे कि चाहे इधर का उधर हो जाए। कुछ बोलते ही नहीं है। सहनशीलता देखिए... सड़कों पर बने गड्‌ढ़ों में गिरेंगे। पैदल चलते भी हिचकोले खाएंगे। धूल फांकेंगे। बीमार हो जाएंगे। अस्पताल चले जाएंगे, लेकिन बोलेंगे नहीं। हमारी खासियतों एवं खूबियों की बानगी के तो कहने ही क्या...हम सरल हैं। सहज हैं। सहनशील हैं। धैर्यवान हैं। आशावान हैं। सपने देखते हैं। उम्मीदें पालते हैं। बाद में भूल जाते हैं। मगर बोलेंगे नहीं।
धार्मिकता ऐसी कि...चंदा उगाहेंगे। न देने वालों को चमकाएंगे। पंडाल लगाएंगे। सड़कें घेरेंगे। रास्ते रोकेंगे। अतिक्रमण करेंगे। रोज झांकी सजाएंगे। फिल्मी गीत बजाएंगे। शोरगुल करेंगे। देर रात तक सड़कों पर नाचेंगे। जाम लगाएंगे। गुस्सा भी ऐसा कि....हादसों से हिलेंगे नहीं। सबक इनसे लेंगे नहीं। कुछ देर चिल्लाएंगे। कानून तोड़ेंगे। वाहनों को फोडे़ंगे। पत्थर फेंकेंगे। आगजनी करेंगे। खुद पर मुकदमे दर्ज करवाएंगे। फिर चुप बैठ जाएंगे। एकदम खामोश। बाद में कुछ बोलेंगे ही नहीं। हाथ इतना खुला है कि...जन्मदिन मनाएंगे, झूमेंगे। नाचेंगे। पानी की तरह पैसा बहाएंगे। फिजूलखर्च करेंगे। पटाखे फोड़ेंगे। पोस्टर लगाएंगे। बैनर टांगेंगे। दीवारें रंगेंगे। शहर बदरंग करेंगे।
जागरुकता की तो मिसाल ही क्या दें, क्योंकि...नियमों को तोड़ेंगे, वाहनों पर  फर्राटे से दौडेंगे।  हेलमेट लगाएंगे नहीं। तेज हार्न बजाएंगे। मनमर्जी की नम्बर प्लेट लगवाएंगे। पार्किंग व्यवस्था को मानेंगे नहीं। नियमों की बात जानेंगे नहीं। बेवजह बिजली जलाएंगे। पानी सड़कों पर बहाएंगे।
हमारे प्रतिनिधि तो.... दावे करते हैं। आश्वासन देते हैं। वादों में भरमाते हैं। हमें बहलाते हैं। मना कभी करते नहीं। काम कुछ करते नहीं। शहर से ज्यादा खुद की चिंता है। दिन इसी उधेड़बुन में बीतता है। देखेंगे सब पर बताएंगे नहीं।  सच जानकार भी जुबां हिलाएंगे नहीं। जनता से दूर हैं। मुद्‌दों से बेखबर है।
और हमारे सेवक... दिशा-निर्देश जारी करेंगे। कागजी आंकड़ों में खेलेंगे। घोटालों का घालमेल है। भ्रष्टों से तालमेल है। बंधी आंखों पर पट्‌टी है। पी इसी बात की घुट्‌टी है। नियम रोज बनाएंगे। काम नहीं कराएंगे। ईमानदारी से काम बनता नहीं। सुविधा शुल्क से काम रुकता नहीं। लगती रोज फटकार है। फिर भी आदत से लाचार हैं। वसूली थमती नहीं है। राहत मिलती नहीं है। शहर परेशान है। हर आमोखास हलकान है। रास्ते तंगहाल है। सफाई बदहाल है।
तभी तो यहां...सियासत का खेल है। पक्ष-विपक्ष में मेल है। फर्जीवाड़े की भरमार है। सर्जरी की दरकार है। कदम-कदम पर भ्रष्टाचार है। नींद में सरकार है। अपराधियों से प्यार है। कुछ भी करो आजादी है। ना नियम है ना पाबंदी है। पैसे की बर्बादी है। बात-बात पर चंदा है। मोटी कमाई का जो धंधा है। बदरंग शहर है। हादसों की डगर है। बातें और बयान हैं। समस्याओं का नहीं समाधान हैं। बयानों का शोर है। बदहाली का दौर है। आदमी परेशान चहुंओर है। उम्मीद का दिखता नहीं छोर है। बदइंतजामियों का जोर है। फिर भी हम कुछ बोलते नहीं...।  क्योंकि सहन कर लेंगे, उम्मीद रखेंगे। भरोसा कर लेंगे। दूसरों के भरोसे रहेंगे। खुद कुछ नहीं करेंगे। बात हमारी कोई मानता नहीं। गांधीगिरी की भाषा यहां कोई जानता नहीं। दूरगामी असर को हम नहीं आंकते। जनप्रतिनिधियों को भी नहीं जांचते। उनके बहकावे में आ जाएंगे। वादों से बहल जाएंगे। सब सह लेंगे।  सोए रहेंगे। मगर बोलेंगे कुछ नहीं...। 
बहुत हो चुका।  अब तो इस चुप्पी को तोड़िए। कुछ तो बोलिए... कुछ तो बोलिए...। भाग्य का साथ छोड़िए। कर्म से नाता जोडि़ए।  शुरुआत आज से कीजिए। मजा आएगा कितना फिर देखिए। कुछ तो बोलिए... कुछ तो बोलिए...।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 26 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।


Sunday, January 15, 2012

सिम्स की सर्जरी जरूरी


खुला पत्र

माननीय अमर अग्रवाल जी,
स्वास्थ्य मंत्री,
छत्तीसगढ़, सरकार।

आपने पीड़ित लोगों की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए हाल में बिलासपुर में जन शिकायत केन्द्र शुरू किया था। यह इतना हाईटेक सिस्टम है कि न केवल बिलासपुर बल्कि समूचे छत्तीसगढ़ में एक अभिनव प्रयोग  माना जा सकता है। इस शिकायत केन्द्र के माध्यम से समूचे प्रदेश के लोग फोन पर अपनी समस्याओं से आपको अवगत कराते हैं और  यथासंभव उनका हल भी हो रहा है। इस शिकायत केन्द्र का दूसरा पहलू यह भी है कि यह चिराग तले अंधेरा वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है। आपके साथ भी इन दिनों लगभग वैसा ही हो रहा है। आप समूचे प्रदेश की समस्याएं तो सुन रहे हैं, लेकिन बिलासपुर का हाल-बेहाल हैं। यहां समस्याओं की फेहरिस्त बेहद लम्बी हो गई है। या यूं कहें कि समूचा शहर ही बीमार है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं।
बाकी बातों को तो छोड़िए केवल आपके मंत्रालय के अधीन स्वास्थ्य विभाग की ही बात करें तो हालात बड़े विकट हैं। विशेषकर शहर की चिकित्सा व्यवस्था तो पटरी से लगभग उतर चुकी है। सिम्स पर तो ऐसा लगता है कि किसी का नियंत्रण ही नहीं है। विवादों का सिम्स से चोली-दामन का साथ हो गया। एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब सिम्स से जुड़ी खबरें न आती हों। कभी रैंगिंग तो कभी हॉस्टल में शराबबाजी। कभी मरीजों की उपेक्षा तो कभी इलाज के लिए पैसे मांगने जैसी बातें तो यहां आम हो चली हैं। हॉस्टल में एक छात्रा द्वारा फांसी लगाने के मामले में भी सिम्स प्रबंधन की भूमिका संदेह के घेरे में है। यह सब आपके गृह नगर में हो रहा है। समूचे प्रदेश की हालात क्या होगी, सहज ही समझा जा सकता है। वैसे भी सिम्स की स्थापना जिस मकसद को लेकर की गई थी, मौजूदा हाल में उन पर काम कतई नहीं हो रहा है। करोड़ों-लाखों रुपए की मशीनें धूल फांक रही हैं जबकि मरीज बाहर महंगे दामों पर जांच करवाने को मजबूर हैं। सिम्स परिसर से सटकर खुले करीब तीन दर्जन निजी जांच केन्द्रों के मामले में सिम्स की मिलीभगत से इनकार नहीं किया सकता। इन जांच केन्द्रों के मामले में आपने भी पता नहीं क्यों आंखें मूंद रखी हैं। सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, एक्सरे व पैथालॉजी जैसी जांच के लिए मरीजों को भटकना पड़ रहा है। कमीशन के खेल तथा 'ऊपर की कमाई' के चक्कर में चिकित्सक एवं नर्सिंग स्टाफ द्वारा मरीजों से दुर्व्यवहार करने की शिकायतें तो यहां आम हैं। सिम्स के अधिकतर चिकित्सक नॉन प्रेक्टिस एलाउंस इसलिए नहीं लेते क्योंकि वे ऐसा करेंगे तो फिर सिम्स के समानांतर न तो अपने घर में क्लीनिक खोल पाएंगे और न ही वहां मरीजों को पाएंगे। मामला ज्यादा कमाने का है, लिहाजा, एलाउंस की छोटी राशि ठुकरा कर क्लीनिक को ज्यादा तरजीह दी जा रहा है। यह बात मरीजों के इलाज में भी झलकती है। डाक्टरों को 'भगवान' के समकक्ष माना जाता है, लेकिन सिम्स के 'भगवान' की नजर मरीज के मर्ज की बजाय उसकी जेब पर ज्यादा है। प्रयास यही रहता है कि मरीज उनके घर वाले क्लीनिक पर आए।
 सिम्स के ऐसे हालात बनने के पीछे दो ही मुख्य कारण माने जा सकते हैं। या तो सिम्स प्रबंधन आपको नजरअंदाज करता है। आपकी बात मानता नहीं है। आपके आदेशों की अवहेलना करता है।  दूसरा यह है कि आप इसमें दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं। दिलचस्पी न लेने की बात समझ में इसीलिए नहीं आती, क्योंकि अगर ऐसा होता तो फिर आप शिकायत केन्द्र खोलते ही क्यों? जाहिर है सिम्स प्रबंधन आपको गंभीरता से कतई नहीं ले रहा है। शनिवार को एक मरीज की मौत के कारण हुए हंगामे के बाद सिम्स में तैनात एक नर्स द्वारा की गई टिप्पणी 'आपने मंत्री को फोन किया तो उनसे ही ठीक करवाएं' से समझा जा सकता है।
बहरहाल, सिम्स प्रबंधन द्वारा मनमर्जी से काम करना मामले का एक पक्ष हो सकता है लेकिन विभाग आपके ही अधीन है। अगर सिम्स के मौजूदा ढर्रे में बदलाव नहीं आता है तो यह आपका उत्तरदायित्व बनता है कि आप उनको जिम्मेदारी का एहसास कराएं। जन शिकायत केन्द्र खोलने का मकसद लोगों को 'राहत'   देना हो सकता है लेकिन स्वास्थ्य मंत्री होने के साथ-साथ स्थानीय विधायक होने के नाते बीमार शहर के इलाज की जिम्मेदारी भी तो आपकी ही बनती है। सिम्स में रोजाना हंगामे और विवाद की वजह बनने वाले कारणों को ढूंढने और दोषियों को बाहर का रास्ता दिखाने में अब देरी नहीं होनी चाहिए। मामले में थोड़ी सी भी देरी अब किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। आखिर सब्र की भी एक सीमा होती है। ऐसा न हो उसकी इंतहा हो जाए।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 15 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।



Thursday, January 12, 2012

दुआओं और प्रार्थनाओं का दौर

शहंशाहे गजल के नाम से विख्यात मेहदी हसन की हालत नाजुक है और वे आईसीयू में भर्ती है। हसन पिछले 12 साल से फेफड़ों में संक्रमण से जूझ रहे हैं लेकिन उनके समाचार कभी-कभार ही आते हैं। करीब साढ़े तीन साल पहले जुलाई 2008 में भी उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर समाचार-पत्रों की सुर्खियां बनी थी। हसन इलाज के लिए भारत आना चाहते हैं, लेकिन सफर में उनका स्वास्थ्य बिगड़ने का खतरा है, लिहाजा, चिकित्सकों ने उनको कहीं आने-जाने पर रोक लगा रखी है। पिछले ढाई साल से तो हसन ट्‌यूब की जरिये ही खा पी रहे हैं। एक माह से तो वे बोल भी नहीं पा रहे हैं।
दरअसल, हसन के भारत आने  का मकसद अकेला इलाज ही नहीं है बल्कि मातृभूमि का प्रेम भी है। जैसा कि अक्सर होता है व्यक्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव में मातृभूमि की याद जरूर आती है। यह मातृभूमि से लगाव का ही परिणाम है कि हसन  विभाजन के बाद भारत के बाद पाकिस्तान चले गए लेकिन वे अपनी जड़ों से दूर नहीं हुए। वे करीब तीन-चार बार अपने पुश्तैनी गांव आए। राजस्थान के झुंझुनूं जिले के लूणा गांव में 18 जुलाई 1927 को जन्मे मेहदी हसन के परिवार को गाने-बजाने का शौक विरासत में मिला। झुंझुनूं जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हसन का गांव आजादी से पहले मंडावा ठिकाने के अधीन था। विभाजन के दौरान हसन के परिजन एवं रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए। उनके साथ हसन ने भी भारत छोड़ दिया। दूसरे देश जाने के बाद भी हसन अपनों से दूर नहीं हुए।
लूणा में हसन के परिवार का अब कोई नहीं रहता है। पुश्तैनी मकान का भी कोई अता-पता नहीं है। गांव के स्कूल के बगल में बनी हसन के परिजनों की दो मजार उनकी यादगार के रूप में जरूर मौजूद है। इन मजारों के साथ हसन की याद, इसलिए जुड़ी है क्योंकि इनका  निर्माण स्वयं हसन ने  ही करवाया था।  गांव में मजारों की सार-संभाल करने वाला अब कोई नहीं है। रखरखाव के अभाव में इनके चारों तरफ घास उग आया है। गांव तक पक्की सड़क बनने का श्रेय भी हसन को ही जाता है। वे जब लूणा आए तो उनके सम्मान में गांव तक पक्की सड़क बनी थी। यह भी विडम्बना है कि लूणा के लोग इस शख्सियत पर फक्र तो करते हैं, लेकिन हसन के बारे में उनको ज्यादा जानकारी नहीं है। एक-दो बुजुर्गों की बात छोड़ दें तो वर्तमान में हसन के बारे में विस्तार से बताने वाला भी लूणा में कोई नहीं है।
बहरहाल, मेहदी हसन की बीमारी के साथ एक संयोग भी जुड़ा है। हसन के जब-जब भी बीमार हुए तब-तब उनके कद्रदानों ने उनकी सलामती के लिए दुआ की। उनके हजारों-लाखों दीवाने आज भी उनके स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं। हसन की गजलों का मुरीद हर कोई है। तभी तो उनके स्वस्थ जीवन की कामना के लिए एक तरफ प्रार्थनाओं का दौर है तो दुआ मांगने वालों की संख्या भी लाखों में है। छोटे से गांव से निकलकर इस फनकार ने प्रसिद्धि के उस फलक को छुआ जिस पर मादरे वतन के साथ जन्मभूमि के लोगों को गर्व की अनुभूति होती है।

Monday, January 9, 2012

परहित सरिस धर्म नहीं भाई...


टिप्पणी

सीमित संसाधनों में बेहतर व्यवस्था बनाने और आशातीत परिणाम हासिल करने के उदाहरण कम ही मिलते हैं। अमूनन देखा गया है कि पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद न तो परिणाम आशानुकूल आते हैं और न ही व्यवस्था ठीक प्रकार से हो पाती है। रविवार को हुई शिक्षक पात्रता परीक्षा को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। बिलासपुर जिला मुख्यालय पर सभी तरह की सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन परीक्षार्थियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। प्रशासनिक स्तर पर की गई तमाम व्यवस्थाएं ऊंट के मुंह में जीरे के समान साबित हुई। दूरदराज इलाकों से आए परीक्षार्थी शनिवार शाम को ही बिलासपुर पहुंच गए थे, लेकिन ठहरने के लिए माकूल बंदोबस्त न होने के कारण वे इधर-उधर भटकते रहे। कइयों की रात तो आंखों में गुजरी। सर्दी में ठिठुरते परीक्षार्थियों पर न तो प्रशासनिक अधिकारियों का दिल पसीजा और न ही समाज सेवा का दंभ भरने वाले तथाकथित संगठन दिखाई दिए। वैसे भी बिलासपुर में परीक्षा को प्रशासनिक अधिकारियों ने गंभीरता से लिया ही नहीं वरना ऐसे हालात पैदा ही नहीं होते। राज्य के दूसरे जिलों में बिलासपुर के मुकाबले बेहतर व्यवस्था कैसे हो गई। जाहिर है वहां सुनियोजित तरीके से कार्ययोजना बनाकर काम किया गया, जिसके परिणाम भी सकारात्मक आए। बिलासपुर की प्रशासनिक व्यवस्था एवं तथाकथित स्वयंसेवी संगठनों से लाख गुना बेहतर तो पेण्ड्रा-बिल्हा जैसे छोटे-छोटे कस्बों का प्रशासन, वहां की स्वयंसेवी संस्थाएं हैं तथा वहां पुरुषार्थी लोग हैं, जिन्होंने पराये दर्द को अपना समझा।
हाल में बने नए जिले मुंगेली के लोगों ने भी परीक्षार्थियों की पीड़ा कम करने का प्रयास किया। सेवाभावी लोगों ने परीक्षार्थियों की अपने सामर्थ्य के अनुसार खुले दिल से मदद की। किसी ने भटकते परीक्षार्थी को सेंटर बताने का काम किया तो किसी ने सर्दी में ठिठुरतों के लिए रात को अलाव के लिए लकड़ियों की व्यवस्था की। इतना ही नहीं कइयों ने परीक्षार्थियों को अपने घर में भोजन कराया तो कुछ ऐसे भी जिन्होंने सामूहिक भोजन की व्यवस्था की।
भौतिकवादी युग की भागदौड़ एवं तनावभरी जिंदगी में जब रिश्ते नाते तार-तार हो रहे हैं। अपने ही अपनों के दुश्मन हो रहे हैं। दिलों से अपनापन गायब हो रहा है। लोग खुद तक सीमित हो गए हैं। ऐसे हालात में पेण्ड्रा, बिल्हा एवं मुंगेली के लोगों ने वाकई सराहनीय एवं अनुकरणीय काम कर दिखाया है। ऐसे समाजसेवी-सेवाभावी संगठन एवं लोग वाकई बधाई के पात्र हैं। इन सेवाभावी लोगों ने साबित कर दिखाया हैकि आदमी ठान ले तो मुश्किल कुछ भी नहीं, बस सोच बड़ी होनी चाहिए। निसंदेह इन लोगों ने समाजसेवा एवं इंसानियत की नई इबारत लिखी है, जो लम्बे समय तक आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा देने का काम करेगी। बहरहाल, पिछली बार भी हुई शिक्षाकर्मी भर्ती परीक्षा में बिलासपुर पहुंचे परीक्षार्थियों को कुछ इसी की तरह परेशानी का सामना करना पड़ा लेकिन प्रशासन ने उससे सबक नहीं लिया। छोटे कस्बों के लोगों ने जिस तरह जिंदादिली दिखाते हुए पुरुषार्थ एवं परोपकार का काम किया उससे न केवल बिलासपुर के प्रशासनिक अधिकारियों बल्कि तथाकथित संगठनों को भी सीख लेनी चाहिए।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 09जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।


Friday, January 6, 2012

शहर हित में निर्णय लेना जरूरी


खुला पत्र


यशवंत कुमार,
आयुक्त,नगर निगम,
बिलासपुर।

सड़क निर्माण के मामले में आखिरकार माननीय हाईकोर्ट की फटकार के बाद आपको भी इस बात का अहसास तो हो ही गया कि शहरवासी लम्बे समय से यूं ही शिकायत नहीं कर रहे थे।  बावजूद इसके सिम्पलेक्स कंपनी के नुमाइंदों तथा आपके मातहतों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। पता नहीं किस नींद में गाफिल थे। अब गड़बड़ी करने पर एफआईआर दर्ज होने लगी है तथा माननीय हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए निर्देश दिए हैं तो होश ठिकाने आ रहे हैं। सीवरेज मामले में आप भले ही नए सिरे से फटकार लगाएं, जुर्माना करें या नोटिस दें, लेकिन सिम्पलेक्स कंपनी ने पता नहीं क्यों, आपको कभी गंभीरता से नहीं लिया। नोटिस एवं जुर्माना तो आप पहले भी लगा चुके हैं, लेकिन उनका परिणाम क्या हुआ, आप भी जानते हैं। मौजूदा हालत से तो यही लगता है कि सिम्पलेक्स कंपनी के नुमाइंदों के साथ-साथ आपके मातहतों ने भी अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीके से नहीं किया। जिस निरीक्षण की बात आप अब कर रहे हैं, क्या वह पहले नहीं हुआ? अगर हुआ तो फिर गड़बड़ क्यों हुई? और निरीक्षण नहीं हुआ तो आपके मातहत किस काम में मशगूल थे। उनको अभयदान क्यों दे दिया गया। यह आपके मातहतों की उदासीनता का ही परिणाम है कि सीवरेज परियोजना का काम किसी भी स्तर पर व्यवस्थित दिखाई नहीं देता है। सारा काम बिखरा पड़ा है। निर्धारित के बाद अतिरिक्त समय भी गुजर गया लेकिन कंपनी के पास ठोस कार्ययोजना दिखाई नहीं देती। आलम यह है कि कहीं जरूरत से ज्यादा तत्परता दिखाई जा रही है तो कहीं पर सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
इस मामले में यह अच्छी बात है कि आपने माननीय हाईकोर्ट की फटकार के बाद संबंधित कंपनी एवं अपने मातहतों को सड़कों की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान देने को कहा है। वैसे यह काम भी शुरू से ही हो जाना चाहिए था, लेकिन आपके मातहत शहरवासियों की पीड़ा सुनने की जगह सिम्पलेक्स की हां में हां मिलाते ज्यादा दिखाई दिए। कई बार तो आपके मातहतों की भूमिका से ऐसा लगा जैसे वे जनसेवक न होकर सिम्पलेक्स के लिए काम कर रहे हैं। सड़कों में घटिया निर्माण सामग्री की जांच करवाई गई लेकिन जांच रिपोर्ट आने तक सड़कें बनने का काम बदस्तूर जारी रहा। जांच रिपोर्ट में गड़बड़ी की आशंका थी (जो बाद में उजागर भी हुई) लेकिन आपके मातहतों ने काम बंद होने नहीं दिया।  सिम्पलेक्स कंपनी के प्रति आपके मातहतों का यही विशेष लगाव तो मामले को संदिग्ध बनाता है। दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए जरूरी है आप इसकी अपने स्तर पर जांच करवाएं।
सड़कों की गुणवत्ता के बाद सबसे गंभीर एवं बड़ी समस्या काम धीमी गति से होना भी है। शहर में कई जगह ऐसी हैं, जहां गड्‌ढे खोदने के बाद उनकी खैर-खबर नहीं ली गई। ज्यादा नहीं तो आप लम्बे समय से खुदे गड्‌ढों को बिना किसी राजनीति व हस्तक्षेप के प्राथमिकता के साथ तत्काल भरवाने का काम करवा दीजिए। यकीन मानिए शहरवासी आपके  आभारी रहेंगे।  काम की निगरानी भी आप स्वयं करें ताकि संबंधित कंपनी के साथ-साथ आपके मातहतों में भी भय रहे। आप अगर वातानुकूलित कक्ष में बैठकर मातहतों के भरोसे रहे तो फिर अनुकूल परिणामों की आशा भी  न करें। क्योंकि  भविष्य में कुछ गड़बड़ होती है तो अधिकारी होने के नाते जिम्मेदारी भी आप पर आएगी। उम्मीद की जानी चाहिए आप सीवरेज मामले के 'घालमेल'  और 'तालमेल' को समझते हुए अपने विवेक से शहर हित में निर्णय लेंगे।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 06  जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।








Wednesday, January 4, 2012

सब गोलमाल


टिप्पणी

सीवरेज परियोजना भले ही पूर्ण होने के बाद (जैसा कि दावा किया जा रहा है) राहत दे, लेकिन वर्तमान में बिलासपुर के लिए इससे बड़ी समस्या और कोई नहीं है। दावों पर भी यकीन इसलिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि योजना की सफलता एवं परिणामों पर अभी से सवाल उठाए जा रहे हैं। स्वयं महापौर तक यह कह चुकी हैं कि परियोजना के बेहतर परिणाम नहीं आएंगे। खैर, परिणाम एवं सफलता तो भविष्य के गर्भ में हैं लेकिन मौजूदा समय में शहर का हाल गांव से भी बदतर है। जिधर देखो उधर रास्ते खुदे हुए हैं। सड़कों का तो नामोनिशान तक मिट चुका है। प्रमुख मागोर्ं पर पसरे कीचड़ एवं दलदल ने तो शहर की तस्वीर बिगाड़ रखी है। वाहनों की छोड़िए पैदल निकलना भी टेढी खीर है। कई जगह तो आवाजाही तक बंद हो गई है। घटिया निर्माण सामग्री से बनी सड़कें बारिश के बाद 'सच' बयान कर रही हैं। आलम देखिए हफ्तेभर पहले बनी हुई सड़कें भी धंस रही हैं। घटिया निर्माण सामग्री को लेकर बीच-बीच में हो हल्ला भी मचा लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। हल्ला मचाने वाले पता नहीं किस दवाब या प्रलोभन के चलते लम्बे समय तक 'रहस्यमयी चुप्पी' साध लेते हैं या फिर यकायक'अज्ञातवास' पर चले जाते हैं। तभी तो घटिया निर्माण सामग्री लगाकर सड़कें बनाने वाले, जगह-जगह गड्‌ढ़े खोदकर लोगों की जान से खेलने वालों के हौसले बुलंद हैं। उनको किसी का डर या भय तक नहीं है। यही कारण है कि उनका काम बदस्तूर जारी है।
शहरवासियों के लिए तोहफे के रूप में प्रचारित यह परियोजना देखा जाए तो किसी धोखे से कम नहीं है। जन के साथ माल की हानि हो रही है लेकिन जिम्मेदार अफसर एवं जनप्रतिनिधि गलत को गलत कहने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे हैं। खुले में जिनको डांटा जा रहा है, पर्दे के पीछे उनको गले लगाया जा रहा है। सियासी दांवपेच एवं वोट बैंक बनाने-बिगाड़ने के चक्कर में विकास की रफ्तार थम गई है। हिन्दी साहित्य के श्लेष अलंकार 'नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है...' की तर्ज पर पक्ष-विपक्ष और निगम-सिम्पलेक्स (सीवरेज परियोजना पर काम रही कंपनी) के बीच इतना घालमेल और तालमेल है कि आम आदमी के समझ से बाहर है।
हालात यह हैं कि आम आदमी के दुख-दर्द के बजाय कहां, कब, कैसे  व क्यों  विरोध करना है, इसका खाका पहले से तैयार हो जाता है। विरोध प्रदर्शन से होने वाले नफा-नुकसान का आकलन भी कर लिया जाता है। तभी तो कई बार विरोध प्रदर्शन भी प्रायोजित नजर आता है।  इसी खेल के चलते शहरवासियों की पीड़ा पर्वत सी बनी हुई है।  खैर, सीवरेज परियोजना का काम पूर्ण होने की न केवल निर्धारित अवधि पूर्ण हो चुकी है बल्कि अतिरिक्त समय भी गुजर गया है। परियोजना की लागत भी 250 करोड़ से बढ़कर तीन सौ करोड़ रुपए तक पहुंच गई है जबकि इस परियोजना का अभी तक 40 फीसदी ही काम हुआ है।
बहरहाल, लागत मूल्य बढ़ने तथा अतिरिक्त समय निकलने के बाद इतना तो तय है कि सीवरेज परियोजना के काम में तेजी आएगी। ऐसे में शहरवासियों की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण होगी। वे दूसरों के भरोसे न बैठें तथा सीवरेज के काम पर कड़ी नजर रखें। अगर आज शहरवासियों ने चुप्पी साध ली तो कालांतर में उनको इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। जागो तभी सवेरा की तर्ज पर सीवरेज परियोजना के कामों पर कड़ी नजर रखी जा सकती है, ताकि कोई आपकी आंखों में धूल ना झोंक सके। देखा गया है कि जल्दबाजी के चलते अक्सर गुणवत्ता से समझौता कर लिया जाता है।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 04 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।


Monday, January 2, 2012

दूसरों से सीख लेने की जरूरत


टिप्पणी
हाईकोर्ट की फटकार के बाद बिलासपुर की यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने की कवायद में जुटी पुलिस के लिए सड़क सुरक्षा सप्ताह किसी चुनौती से कम नहीं हैं। वैसे तो यातायात नियमों की पालना करवाने तथा नियमों की जानकारी देने का काम हर साल होता है। इसके बावजूद व्यवस्था पटरी पर दिखाई नहीं देती। पुलिस पर तो अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि उनका ध्यान व्यवस्था बनाने की बजाय वसूली पर ज्यादा रहता है। यह बात दीगर है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण सड़कों पर यातायात बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन हर राज्य में यातायात व्यवस्था को लेकर गंभीरता बरती जा रही है। कई राज्यों में तो यातायात संबंधी कानून व नियमों की पालना इतनी कड़ाई से करवाई जा रही है कि उसके सकारात्मक परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं।
कर्नाटक जाने वाला वहां की यातायात व्यवस्था की बड़ाई करने से नहीं चूकता।  कर्नाटक की राजधानी बैंगलुरु में इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लागू है। इसके तहत यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों के घर पर ई-चालान पहुंचता है। इससे न तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश रहती है और न ही बीच सड़क पर यातायात पुलिसकर्मी व वाहन चालकों के बीच नोकझोंक होती है। कुछ इसी प्रकार का सिस्टम मध्यप्रदेश के भोपाल एवं इंदौर में लागू करने की कवायद चल रही है। इतना ही नहीं  मध्यप्रदेश सरकार तो स्कूलों में बच्चों को ट्रैफिक नियमों की शिक्षा देने जा रही है। यातायात विशेषज्ञों की ओर से दिए गए सुझावों को पाठ्‌यपुस्तक में शामिल किया गया है। इसको अच्छी पहल के रूप में देखा जा सकता है।
राजस्थान की राजधानी जयपुर में भी यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में अभूतपूर्व काम हुआ। वहां दु़पहिया वाहन के पीछे बैठने वालों को भी हेलमेट लगाना अनिवार्य है। कमोबेश ऐसा ही फैसला भोपाल में लागू किया गया। वहां पम्पों से दुपहिया वाहन चालकों को पेट्रोल या डीजल तभी मिलता है जब उनके पास हेलमेट हो। इसी कड़ी में हरियाणा राज्य का नाम भी आता है। दिल्ली से सटे गुड़गांव शहर की बदहाल यातायात व्यवस्था को ठीक करने के लिए वहां की पुलिस ने अनूठा तरीका अपनाया है। वहां यातायात नियमों की पालना न करने वाले वाहन चालकों का पहले तो चालान काटा जाता है। इसके बाद भविष्य में ऐसी गलती न करने के लिए गीता या कुरान की शपथ दिलाई जाती है। हरियाणा के ही दूसरे शहर फरीदाबाद में भी यातायात नियमों की पालना के लिए  रोचक तरीका अपनाया गया। पिछले दिनों वहां यातायात की पालना करने वाले वाहन चालकों को बीच सड़क पर रोककर बाकायदा गुलदस्ता भेंट कर उनका स्वागत किया गया।
उक्त सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि हर समस्या का हल है। साथ ही इस बात की सीख भी मिलती है कि बढ़ते यातायात को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ में यातायात नियमों को लेकर किसी भी स्तर पर गंभीरता नहीं बरती जा रही है। दुपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट अनिवार्य करवाना तो पुलिस के लिए दिवास्वप्न बना हुआ है।
बहरहाल, यातायात व्यवस्था दुरुस्त करने तथा हादसों में कमी लाने के लिए दूसरे राज्यों में लागू किए गए कानून एवं नियम छत्तीसगढ़ और विशेषकर बिलासपुर के लिए बेहतर उदाहरण साबित हो सकते हैं, बशर्ते शासन-प्रशासन इनके प्रति गंभीर हो। सड़क सुरक्षा सप्ताह में हर साल लकीर ही पीटी जाती रही है।  इस बार कुछ नया काम हो तो न केवल आमजन की समस्या कम होगी बल्कि यातायात पुलिस का काम भी कुछ हल्का हो जाएगा।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 02 जनवरी 12  के अंक में प्रकाशित।


Friday, December 23, 2011

आज के युवा और अभिभावक

ब्लॉग लिखने से पहले मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं तकनीक एवं संचार क्रांति का विरोधी कतई नहीं हूं बशर्ते उसका उपयोग देशहित में हो, लेकिन मौजूदा दौर में ऐसा बहुत कम हो रहा है।  सूचना एवं तकनीक ने जितनी तरक्की है उसके उतने ही साइड इफेक्ट्‌स भी देखने को मिल रहे हैं। विशेषकर आजकल की युवा पीढ़ी तो सूचना तकनीक के मामले में इतनी एडवांस और उसमें इतनी खो चुकी है उसे न अभिभावकों की खबर है और न ही खुद का होश रहता है। विशेषकर देश में जब से मोबाइल क्रांति का सूत्रपात हुआ है तब से समाज में कई तरह की विकृतियां भी आ गई हैं। यह सही है कि संचार क्रांति से दुनिया बेहद छोटी हो गई है और आम आदमी, भले ही वह खेत में बैठा हो, सात समुन्दर पार बतिया सकता है।  लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में संचार क्रांति के सूत्रपात से समाज का तानाबुना प्रभावित होना लगा है। कई जगह तो इस संचार क्रांति की अति इतनी हो गई कि इस छोटे से खिलौने पर प्रतिबंध लगाने जैसी बात भी उठनी लगी है। देश के कई हिस्सों में विभिन्न समाजों में मोबाइल का प्रचलन बिलकुल प्रतिबंधित कर दिया गया है। कई अन्य समाजों में भी इस प्रकार प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है। इसके अलावा पाश्चात्य संस्कृति में रचे-बसे परिधानों पर प्रतिबंध लगाने का बातें भी गाहे-बगाहे उठती रही हैं। एक दो ऐसी ही सामाजिक बैठकों का मैं साक्षी रहा हूं जब वक्ताओं ने सार्वजनिक मंच से इस बात को बड़ी बेबाकी के साथ कहा कि समाजोत्थान के लिए जरूरी है कि बच्चो को मोबाइल नहीं दिया जाए। लाड-प्यार के चलते अभिभावक उनको यह छोटा सा खिलौना थमा तो देते हैं लेकिन उसके दूरगामी परिणामों से अनजान होते है। अभिभावकों की आंख भी उस वक्त खुलती है जब पानी काफी बह चुका होता है।
खैर, इस विषय ही इतनी लम्बी चौड़ी भूमिका बांधने से पहले यह भी बताता चलूं कि मैं यह ब्लॉग अपने अति प्रिय भतीजे के कहने पर ही लिख रहा हूं जो कि स्वयं इस मोबाइल क्रांति के मोहपाश में बंधा हुआ है। मजे की बात यह है कि वह हाल ही में 18  साल का हुआ है लेकिन मोबाइल का उपयोग पिछले दो-तीन साल से कर रहा है। मतलब साफ है कि इस दौरान वह मोबाइल से संबंधित कमोबेश हर प्रकार की तकनीक में महारत हासिल कर चुका है। विशेषकर मोबाइल पर इंटरनेट चलाने या कुछ डाउनलोड करने का काम तो वह पलक झपकते ही कर लेता है। पेशेगत मजबूरियों के चलते मैं पिछले नौ साल से मोबाइल रख रहा हूं लेकिन यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि भतीजे के मुकाबले मैं मोबाइल पर अन्य तकनीकों का लाभ उठाने में बीस ही हूं। मोबाइल पर  इंटरनेट कैसे चलता है, गीतों या फिल्मों को डाउनलोड कैसे किया जाता है, सच मानिए मुझे अभी तक इसकी जानकारी नहीं है। इंटरनेट पर सर्च करके मौजूदा युवा पीढ़ी ऐसे-ऐसे अनछुए एवं अनजाने विषयों को भी छू रही है, जिनके बारे में उनके अभिभावकों ने देखना तो दूर सपने में भी कल्पना नहीं होगी। फिर अपनी बात पर लौटता हूं लेकिन यह आभास निरंतर हो रहा है कि मोबाइल की चकाचौंध में चुंधियाए युवा मेरे बारे में गलत धारणा ही बनाएंगे। खैर, सत्य हमेशा कड़वा होता है और उसे सहन करने की क्षमता भी बहुत कम लोगों में होती है।
मैं शुरुआत में ही कह चुका हूं कि मैं तकनीक एवं संचार क्रांति का विरोधी नहीं लेकिन  जो तकनीक हमें नैतिकता से, संस्कारों से, रिश्ते-नातों एवं अपनों से दूर करे, वह किस काम की। हो सकता है कोई मेरे विचारों से सहमत नहीं हो लेकिन मेरा मानना है और मैंने इसे महसूस भी किया है कि संचार क्रांति जितना जोड़ने का काम करती है उससे कहीं ज्यादा तोड़ने काम भी करती है। आज की युवा पीढ़ी मोबाइल पर इतनी मशगूल दिखाई देती है गोया इसके अलावा कोई दूसरा काम ही नहीं है। विशेषकर मोबाइल पर एसएमएस भेजने का सिलसिला तो इतना आम हो चला है कि इससे सांप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती है। एकांतवादी होकर आज की युवा पीढ़ी मोबाइल के माध्यम से ऐसे-ऐसे गुल खिला देती है जिनके चलते उनके अभिभावकों को बाद में शर्मसार होना पड़ता था। देखा जाए तो हमारे देश में संचार क्रांति अचानक आ गई और लोगों ने इस कदर प्रेम दिया कि यह अब गले की फांस बनती नजर आती है। संस्कारों में बंधे हमारे देश ने इस तकनीक को आत्मसात तो कर लिया लेकिन गलती यह हुई कि इसका उपयोग करने में उसने अति कर दी। और जैसा कि सर्वविदित है कि अति सभी जगह वर्जित है।
सूचना एवं तकनीक के इस दौर में अभिभावक दो राहे पर खड़े हैं। बच्चों की जरूरतों को पूरा न करें तो मुश्किल और करें तो भी दिक्कत। मेरी मां मुझे बाल्यकाल एवं किशोरावस्था में अक्सर बाहर जाने से टोकती थी। वह कहती थी कि बेटा काली हांडी के पास बैठोगे तो कालस, मतलब काला रंग लगेगा। मां के कहने का आशय यही था कि बदनाम लोगों के साथ संगत करोगे या उठोगे-बैठोगे तो तुम पर भी बदनामी का ठपा लगेगा। लिहाजा घर में ही रहते, लेकिन अब बदनाम अर्थात बिगड़ने के लिए बाहर जाने की जरूरत ही कहां रह गई है। बच्चा घर पर बैठे-बैठे भी वह सब जान रहा है जो कि वह बाहर जाने पर नहीं जान पाता।
बहरहाल, मोबाइल से प्रेम करने वाली या यूं कहूं कि मोबाइल बुखार की गिरफ्त में आ चुकी युवा पीढ़ी संस्कार भूल चुकी है। संस्कारों के अभाव के कारण सहनशक्ति भी नहीं है। अभिभावकों द्वारा टोकने पर आने वाला गुस्सा इसी का नतीजा है। चूंकि मैं यह लेख भतीजे के आग्रह पर लिख रहा हूं इसलिए उसके साथ-साथ उसके दोस्तों एवं तमाम युवा पीढ़ी से यह निवेदन जरूर है कि नैतिकता का पालन करें तथा अभिभावकों के साथ संवादहीनता जैसी परिस्थितियां कतई पैदा न होने दें। अक्सर देखा गया है कि अभिभावकों के व्यस्तता के चलते बच्चा उनसे निरंतर संवाद स्थापित नहीं कर पाता और रफ्ता-रफ्ता एकांतवादी हो जाता है। और इसी एकांतवाद में उसे आनंद की अनुभूति होने लगती है। इसी आनंद के चक्कर में वह अपनों से दूर हो जाता है और फिर मोबाइल पर ही निर्भर होकर रह जाता है। जब तक अभिभावक उसको संभालते है, तब तक वह उनसे काफी दूर जा चुका होता है। बस अपनी ही धुन में मगन। ऐसे हालात अभिभावकों के लिए बड़े ही विकट होते हैं। चूंकि बच्चा नासमझ होता है लिहाजा इस प्रकार की परिस्थितियों के लिए अभिभावक ज्यादा जिम्मेदार होते हैं। मोबाइल दिलाकर वे अपने आप को जिम्मेदारी से मुक्त मानते लेते हैं जबकि मेरा मानना है कि अगर मोबाइल देना ज्यादा ही जरूरी है तो उस पर निगरानी रखना उससे कहीं जरूरी है।
आखिर में भतीजे के साथ उन सभी जान-पहचान के युवाओं से यह छोटी सी अपील की इस छोटे से खिलौने का  सदुपयोग ही करें। अगर इसके कारण आज समाज से कट रहे हैं, अपनों से दूर हो रहे हैं, संस्कार भूल रहे हैं, तो यह बेहद खतरनाक है। मेरी बात पर एक बार सोचिएगा जरूर।


Friday, December 16, 2011

मुश्किल तो कुछ भी नहीं बशर्ते...

टिप्पणी
बिलासपुर की बदहाल यातायात व्यवस्था पर माननीय हाईकोर्ट ने गुरुवार को फिर से फटकार लगाई है और व्यवस्था में सुधार के लिए यातायात पुलिस एवं आरटीओ को करीब डेढ़ माह का समय दिया है। दोनों विभागों को इससे पहले भी करीब एक माह की समय-सीमा दी गई थी, लेकिन व्यवस्था में सुधार दिखाई नहीं दिया। दोनों विभागों ने माननीय हाईकोर्ट की फटकार के बाद चार-पांच दिन जरूर तत्परता दिखाई लेकिन इसके बाद कार्रवाई का तरीका फिर पुराने ढर्रे पर लौट आया। इस बार वैसी गफलत न हो तथा दोनों विभाग बिना औपचारिकता निभाए ईमानदारी से अपना काम करे, इसके लिए माननीय हाईकोर्ट ने वकीलों की पांच सदस्यीय कमेटी भी गठित की है। यह कमेटी न केवल दोनों विभागों की गतिविधियों पर निगरानी रखेगी बल्कि यातायात व्यवस्था में सुधार के लिए अपने सुझाव भी देगी।
कहने को पुलिस एवं आरटीओ ने अपने पक्ष में  समाचार पत्रों की कतरन एवं चालानों के आंकड़ों की फेहरिस्त को पेश किया, लेकिन माननीय हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए फिर कहा कि अफसरों का ध्यान अब भी समस्या से निपटने के उपाय खोजने की बजाय वसूली पर ही ज्यादा है। देखा जाए तो यह बात सही भी है, कार्रवाई के नाम पर वसूला गया जुर्माना इसका प्रमाण है। वैसे भी माननीय हाईकोर्ट की फटकार के बाद पुलिस एवं आरटीओ विभाग ने जिस अंदाज में कार्रवाई को अंजाम दिया, उसमें बड़े वाहनों के मुकाबले दुपहिया वाहनों पर कार्रवाई ज्यादा की गई। नतीजा यह रहा है कि शहर की यातायात व्यवस्था में कोई खास सुधार दिखाई नहीं दिया।
दरअसल, शहर की यातायात व्यवस्था सुधार में बाधक जो कारण बताएं जाते हैं, उनमें कई तो व्यवस्थागत व मानवजनित ही हैं। अक्सर देखा गया है कि वीआईपी आगमन के दौरान न केवल यातायात पुलिसकर्मी चाक चौबंद नजर आते हैं बल्कि व्यवस्था में सुधार दिखाई देता है। वाहनों की गति भी निर्धारित हो जाती है। सड़कों से आवारा पशु गायब हो जाते हैं। अक्सर एक दूसरे के क्षेत्राधिकार का मामला बताकर जिम्मेदारी टालने वाले यातायात पुलिस एवं आरटीओ विभाग में बेहतर तालमेल दिखाई देने लगता है। शहर में जगह-जगह होने वाली पार्किंग दिखाई नहीं देती। यातायात नियमों की कड़ाई से पालना होने लगती है। उस दिन कोई सिफारिश या राजनीति हस्तक्षेप भी काम नहीं करता है। इतना ही नहीं बिना भेदभाव के लगभग सभी पर समान रूप से कार्रवाई को अंजाम दिया जाता है।
बहरहाल, यातायात पुलिस एवं आरटीओ के लिए व्यवस्था बनाना तथा बदहाल व्यवस्था को पटरी पर लाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। किसी वीआईपी के आगमन पर जब शहर में व्यवस्था सुधर सकती है तो सामान्य दिनों भी इसमें सुधार हो सकता है। इसके लिए कहीं बाहर जाने आवश्यकता नहीं है। जरूरत बस दृढ इच्छा शक्ति के साथ दवाबमुक्त होकर ईमानदारी से काम करने की है। दोनों विभाग अगर तालमेल एवं समन्वय रखकर ऐसा कर पाए तो व्यवस्था में काफी कुछ सुधार संभव है।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 16  दिसम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।


Sunday, November 27, 2011

मैं और मेरी तन्हाई.....4


छब्बीस नवम्बर
राहत में है दिल, मौसम जुदाई का गुजार के,
आने ही वाले हैं फिर से दिन अब बहार के।
खुशी मनाओ, झूमो, नाचो, गाओ जोर से,
कट गए हैं देखो 'निर्मल', दिन सभी इंतजार के।

सत्ताईस नवम्बर
मायके पहुंच गई तुम 'निर्मल', छोड़ आज ससुराल,
उस घर से इस घर आने में देखो, बदल गई है चाल।
तुम सब से थी रौनक जहां, वहां आज उदासी छाई,
बच्चों के बिन पूछे कौन अब, दादा-दादी के हाल।

अठाईस नवम्बर
दोनों में है खुलापन खूब, नहीं है कोई राज,
पर तुम बिन सूना है, इस दिल का हर साज।
पता नहीं क्यों मूड मेरा, कर ना रहा शायरी,
सूझ नहीं रहा मुझे 'निर्मल',  लिखूं तुझे क्या आज।

उनतीस नवम्बर
तन्हाई की सब बातें देखो, अब पुरानी हो जाएगी,
दिन कटेंगे मस्ती में, हर शाम सुहानी हो जाएगी।
क्या खूब नजारा होगा, दो दिन के बाद 'निर्मल',
अपने मिलन की जब, एक नई कहानी बन जाएगी।

तीस नवम्बर
बातों-बातों में गुजरे, देखो दिन तन्हाई के,
यादों में खो जाएंगे, किस्से सभी जुदाई के।
अपने मिलन की खुशियों में तो निर्मल,
दिल झूम झूम के गाएगा, गीत अब पुरवाई के।


24 नवम्बर को  धर्मपत्नी ने भी  काउंटर मार दिया और मुझे लिखा कि....
अपना ही अंदाज लिए हम चले जमाने में,
अपने को बांध लिया पैमाने में
कट रही जिंदगी, हंसने-रो जाने में,
सुख-दुख बांट लिया हमने जाने-अनजाने में।

इसके जवाब में मैंने उसे लिखा....

गमों की बात ना करो फसाने में,
मस्त रहने के भी हैं रास्ते जमाने में।
हंसने से ही तो संवरती है जिंदगी 'निर्मल'
आजाद पंछी बनो, ना बांधों खुद को पैमाने में।

26 नवम्बर को धर्मपत्नी को भेजा गया मैसेज मैंने फेसबुक पर लगाया तो  पत्रकार साथी कुंअर अंकुर ने उस पर कमेंट किया कि...
दूर रहने से कोई दूर नहीं हुआ करते हैं,
दूर तो वो रहते हैं जो मजबूर हुआ करते हैं।

इसके जवाब में मैंने लिखा कि....

यह सच है जो मजबूर है, वो नजरों से दूर है,
जालिम जमाने का मगर यही तो दस्तूर है।
यह दुनिया बहुत छोटी है कुंअर साहब लेकिन
यहां फासले दिलों के नहीं, जगहों के जरूर है।

क्रमशः........

मैं और मेरी तन्हाई-3

अठारह नवम्बर
दिलासाओं के सहारे आजकल बहल रहा यह दिल,
इंतजार में तो एक पल गुजारना भी है मुश्किल।
पर किसी ने सच ही तो कहा है 'निर्मल'
हौसला रखने वालों को ही तो मिलती है मंजिल।

उन्नीस नवम्बर
ज्यादा बीत गए, दिन कम रहे अब शेष,
मिलन का वो दिन, होगा कितना विशेष।
सोच-सोच के मन में मेरे फूट रहे हैं लड्‌डू,
तन्हाई के दिन छोड़ जाएंगे अब अपने अवशेष।

बीस नवम्बर
मिलने को दिल अब हो चहा है बेकरार,
पर दस दिन बाद ही आएगा इसको करार।
क्या खूबसूरत वो दिन होगा 'निर्मल' जब
आंखों से आंखों की बातें होंगी हजार।

इक्कीस नवम्बर
कभी तो आंखों में कोई सपना आता ही होगा,
कभी तो सपने में कोई अपना आता ही होगा।
माना थक कर सौ जाती हो तुम अक्सर 'निर्मल',
पर सांसों को मेरा नाम जपना आता ही होगा।

बाइस नवम्बर
सपनों की बात, उम्मीदों से संवरती है,
जैसे काली रात, चांदनी से निखरती है।
गुजर जाता है दिन तो जैसे-तैसे 'निर्मल'
पर तन्हाई की रात मुश्किल से गुजरती है।

तेईस नवम्बर
मिलन की रात बेहद रंगीन होती है,
पर यादों की बारात भी हसीन होती है।
बिन तुम्हारे इस सर्द मौसम में 'निर्मल'
प्यार की बात भी कितनी संगीन होती है।

चौबीस नवम्बर
दुनिया की महफिल में, क्या अपने क्या बेगाने,
सब रिश्तों के किरदार जो हमको हैं निभाने।
दो दिन की जिंदगी में लगता है प्यार थोड़ा,
गाओ खुशी के नगमे 'निर्मल' देखो सपने सुहाने।

पच्चीस नवम्बर
मिलने को दिल जब बेकरार होता है,
तब लम्हा प्यार का यादगार होता है।
गिले शिकवे करना है फितरत है सभी की,
कटे प्यार से 'निर्मल', सफर वो शानदार होता है।

क्रमशः........

मैं और मेरी तन्हाई...2

दस नवम्बर
दिल में मोहब्बत लेकिन दिमाग में तनाव है,
दोनों का मुझसे आजकल अजीब सा जुड़ाव है।
तालमेल बैठाने की तो आदत सी हो गई है 'निर्मल'
क्योंकि मुझे तुम दोनों से ही गहरा लगाव है।

ग्यारह नवम्बर
बड़ी मुश्किल से कटते हैं दिन इंतजार के,
रह-रह के याद आते हैं लम्हे वो प्यार के।
गिन-गिन के कट रहे हैं दिन जुदाई के,
मेरे नैना भी प्यासे हैं तुम्हारे दीदार के।

बारह नवम्बर
काम की फिक्र में आई ना तेरी याद,
इसलिए तो देरी से कर रहा फरियाद। 
दिवस दस बीते, बाकी हैं अब बीस,
फिर मेरी तन्हाई भी हो जाएगी आबाद।

तेरह नवम्बर
ना रहो उदास ना उदास करो मन को,
रो-रोकर ना कमजोर किया करो तन को।
खुशियों की बारात जल्द लौटेगी 'निर्मल'
हंसी की खिलखिलाहठ से महकाया करो आंगन को।

चौदह नवम्बर
करो सेवा बड़ों की, भले हो कोई त्रस्त,
कोई बोले कुछ करे, तुम रहो हमेशा मस्त।
जैसे बीते आधे दिन बाकी भी गुजर जाएंगे,
जीतो दन सभी का, मत करो हौसले पस्त।

पन्द्रह नवम्बर
छोटी बात पर ही देखो मचा है यह बवाल,
कैसे बताऊं तुमको 'निर्मल' कैसा है मेरा हाल।
पता नहीं क्या होगा आगे, रस्ता भी मालूम नहीं,
काम के बोझ और तन्हाई ने कर दिया बदहाल।

सोलह नवम्बर
मिली खुशी अपार मुझे, दूर हुआ तनाव,
प्रबंधन की नजरों में बढ़ा गया मेरा भाव।
सोच-सोचकर जिसको था, मन मेरा व्याकुल,
उसी काम के प्रति दिखा उनका गहरा लगाव।

सत्रह नवम्बर
यह जन्म-जन्म का नाता है,
कोई किस्मत वाल ही पाता है।
तुम जैसा साथी पाकर तो,
दिल प्यार के नगमे के गाता है।




क्रमशः........

मैं और मेरी तन्हाई....1

दो नवम्बर
तुम बिन यह रात अधूरी है,
नहीं हो दिल से दूर फिर भी दूरी है।
नहीं रह सकते हम जुदा होकर,
पर क्या करूं 'निर्मल' मजबूरी है।

तीन नवम्बर
मैं हूं और जालिम यह तन्हाई है,
होगा मिलन पर अभी तो जुदाई है।
नहीं हो दिल से कभी दूर लेकिन
इस बार याद कुछ ज्यादा आई है।

चार नवम्बर
कभी-कभी जुदाई में भी बढ़ता है प्यार,
सजा ही नहीं मजा भी देता है इंतजार।
दो दिन बीते बाकी भी यूं ही गुजर जाएंगे,
सुख-दुख ही तो हैं 'निर्मल' जीवन के आधार।

पांच नवम्बर
बिन पीए चढ़े वो सुरुर तुम हो,
हमदम मेरी आंखों का नूर तुम हो।
हर पल महसूस करता हूं पांस अपने,
आजकल दिल के करीब मगर नजरों से दूर तुम हो।

छह नवम्बर
जिंदगी से कोई शिकायत नहीं रही,
तुम जब से हमसफर बनकर आई हो।
अकेले ही कट रही थी उम्र बेमजा,
तुम ही हो जो बहार बनकर छाई हो।

सात नवम्बर
यूं ही कट जाएगा यह यादों का सफर,
मिलेगी मंजिल चलते चलो इसी डगर।
बातें तो फोन रोज हो रही हैं आजकल,
चैन तब आएगा जब तुमको देखेगी नजर।

आठ नवम्बर
बच्चों को मत डांटा करो, यह तो हैं नादान,
माना तुमको करते हैं, बात-बात पर परेशान।
जीतो दिल सभी का बने अलग पहचान,
हंसते-हंसते हो जाएगी, हर मुश्किल आसान।

नौ नवम्बर
ख्याबों में तुम, विचारों में भी तुम ही हो,
नजर में तुम नजारों में भी तुम ही हो।
आंखों में तुम, इशारों में भी तुम ही हो,
एक दो ही नहीं, हजारों में भी तुम ही हो।


क्रमशः........

फिर जिंदा हुआ शौक...


कॉलेज लाइफ में मुझे शेरो-शायरी का शौक खूब रहा है। हालत यह थी कि बाहर कहीं पर भी जाता तो रास्ते में पढ़ने के लिए बुक स्टॉल से शेरो-शायरी की किताबें ही खरीदता। इसके अलावा समाचार-पत्रों में प्रकाशित गजलों एवं रुबाइयों की कतरन काट कर सहेज कर रख लेता। इन्हीं कतरनों को याद कर अपने सहपाठियों को सुना दिया करता और बदले में उनकी वाहवाही बटोर लेता। मेरे इसी शौक के चलते मुझे कॉलेज में सभी शायर कहने लगे थे। बीए फाइनल ईयर के छात्रों को जब विदाई दी जा रही थी तो प्रत्येक छात्र को एक टाइटल दिया गया था। मुझे भी कभी-कभी फिल्म के चर्चित गीत, मैं पल दो पल का शायर हूं... का टाइटल दिया गया। कॉलेज छूटने के साथ ही शेरो-शायरी का शौक धीरे-धीरे कम होता है। क्योंकि डिग्री हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया। करीब तीन साल मशक्कत करने के बाद भी जब कहीं सफलता नहीं मिली तो पत्रकारिता में भाग्य आजमाया। किस्मत से पत्रकारिता में प्रवेश की परीक्षा में पास हो गया। इतना ही नहीं परीक्षा के बाद लिए गए दोनों साक्षात्कार में सफलता हाथ लग गई। इसके बाद मेरा पत्रकारिता के क्षेत्र में आना तय हो गया। नया-नया काम था, इसलिए सीखने का जुनून कुछ ज्यादा ही था। रोजाना 15-16 घंटे तो काम करता ही। कभी-कभी तो 18-18, 20-20 घंटे भी काम किया। इस प्रकार पत्रकारिता में आने के बाद शेरो-शायरी का शौक लगभग छूट गया। करीब पांच साल बाद होली पर पत्रकाार साथियों को टाइटल देने का ख्याल आया, फिर क्या था, सभी पर तुकबंदी कर चार-चार लाइन लिख डाली। इसके बाद तो यह एक तरह की परम्परा सी बन गई। हर होली पर यही कहानी दोहराई जाने लगी। बाद में स्थानांतरण दूसरी जगह होने के कारण इस काम पर फिर विराम लग गया।
अभी दीपावली पर पत्नी एवं बच्चों के साथ गांव गया था। मां एवं पापा ने बताया कि आंखों से धुंधला दिखाई देता है। इस पर मैंने दोनों का नेत्र विशेषज्ञ के यहां चैकअप कराया। चिकित्सक ने बताया कि दोनों की आंखों का ऑपरेशन करना जरूरी है। अब धर्मसंकट खड़ा हो गया क्या किया जाए। आखिरकार धर्मपत्नी ने हिम्मत करके कहा कि वह एक माह के लिए गांव ही रुक जाएगी। मैंने भी उसके निर्णय पर हां भरकर मोहर लगा दी। अब मामला बच्चों की पढ़ाई पर अटका था कि आखिर एक माह तक बच्चे क्या करेंगे। इस पर धर्मपत्नी ने ही सुझाव दिया कि बच्चे अभी छोटी कक्षाओं में हैं, एक माह में कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा। मैं धर्मपत्नी की बात मानकर ड्‌यूटी पर अकेला ही चला आया। एक नवम्बर को घर से रवाना हुआ तथा दो नवम्बर को गंतव्य पर पहुंच गया। पहले ही दिन मैंने धर्मपत्नी को तुकबंदी करके चार लाइन की रुबाई लिखी। दूसरे दिन उसने रुबाई की प्रशंसा कर दी। फिर क्या था, बड़ाई सुनकर अंदर का शायर फिर जाग उठा और निर्णय किया कि हर रात को एक रुबाई बनाकर मोबाइल पर कम्पोज कर धर्मपत्नी को मैसेज करूंगा। यह सिलसिला चल पड़ा। दिन-प्रतिदिन तुकबंदी में सुधार आने लगा। पति-पत्नी के बीच बातें बेहद गोपनीय होती हैं लेकिन मैं इतनी अंतरंगता से भी बातें नहीं करता कि किसी को बताने में संकोच हो। तभी तो धर्मपत्नी को लिखी गई वे तमाम रुबाइयां मैं ब्लॉग के माध्यम से आप सभी से साझा कर रहा हूं। मेरा यह प्रयास आपको कैसा लगा, मुझे आपके कीमती सुझावों एवं प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।  हालांकि मेरा गांव पहुंचना दो दिसम्बर को प्रस्तावित है। मैं यहां से एक दिसम्बर को रवाना होऊंगा। मतलब साफ है दो नवम्बर से शुरू हुए सिलसिले पर एक दिसम्बर को विराम लग जाएगा, हालांकि धर्मपत्नी ने यह काम जारी रखने का सुझाव दिया है। खैर, अब तक लिखी गई सारी रुबाइयां सार्वजनिक कर रहा हूं।

क्रमश.........

Friday, November 25, 2011

स्टेशन ही नहीं रेल में भी हो कार्रवाई

टिप्पणी
अधिकारियों के सामने कर्मचारियों का काम करने का तरीका व रवैया कैसे बदलता है, इसका ताजा उदाहरण बिलासपुर रेलवे स्टेशन है। बीते तीन दिन में यहां दो घटनाएं हुईं हैं, जिनको आरपीएफ के जवानों ने रेलवे अधिकारियों की मौजूदगी में अंजाम दिया। मंगलवार को रेलवे स्टेशन पर दूध बिखेरा गया, वहीं गुरुवार को लोकल ट्रेन में गुटखा बेचने के आरोप में एक युवक को पिटाई कर दी गई। दोनों ही  घटनाओं के बाद रेलवे का स्पष्टीकरण भी आया। ऐसे में सवाल उठता है कि जब कार्रवाई वैध है तो फिर सफाई देने की जरूरत ही क्या है। दरअसल, जिन कर्मचारियों ने 'दबंगई' दिखाते हुए इन कार्रवाइयों को अंजाम दिया वे अधिकारियों को दिखाना चाह रहे थे कि वाकई वे काम करते हैं और जरा सी गफलत भी उनको बर्दाश्त नहीं होती। वे अपना काम ईमानदारी से साथ अंजाम देते हैं, जबकि हकीकत इससे विपरीत है। अगर आरपीएफ के जवान तत्परता एवं ईमानदारी से काम करते तो न तो इस प्रकार के निर्णय लेने की जरूरत पड़ती और ना ही व्यवस्था में खलल डालने वाली घटनाएं दरपेश आती। युवक से मारपीट के बाद आरपीएफ थाना प्रभारी की ओर से दिया गया बयान ही सारी कहानी बयां कर देता है। आरपीएफ थाना प्रभारी को कौन बताए कि प्रतिबंधित चीजें विक्रय करना न केवल रेलवे परिसर बल्कि रेल के डिब्बों में  भी प्रतिबंधित है। बिलासपुर से किसी भी दिशा में जाने वाली ट्रेन में बैठ जाएं आपको डिब्बों में गुटखे बेचने वाले मिल ही जाएंगे। भिखारियों एवं खाद्य सामग्री बेचने वालों की तो बात ही छोड़िए। एक के बाद एक की लाइन लगी रहती है। बेचारे यात्रियों के इनकी आवाज सुन-सुनकर कान पक जाते हैं।
क्या यह सब वैध है? लेकिन आरपीएफ के जवान उनको पकड़ना तो दूर रोकते या टोकते भी नहीं है। डिब्बों के अंदर ऊंची आवाज लगाकर गुटखा बेचना या भीख मांगना क्या व्यवस्था में व्यवधान नहीं है? लेकिन इनकी आवाज आरपीएफ के जवानों को सुनाई नहीं देती है। सुनता सब है, कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं होता। वे केवल अधिकारियों के सामने ही इस प्रकार की कार्रवाई कर यह साबित करना चाहते हैं कि वास्तव में वे अपनी ड्‌यूटी के प्रति सजग हैं। आरोप तो यहां तक लगते हैं कि यह काम आरपीएफ जवानों के संरक्षण में ही होता है। सुविधा शुल्क लेकर वे अपनी आंखें मूंद लेते हैं। 
बहरहाल, किसी का दूध बिखरने से या गुटखे बेचने से रोकने से व्यवस्था नहीं सुधरने वाली। जब तक आरपीएफ के जवान मुस्तैदी एवं ईमानदारी के साथ अपनी ड्‌यूटी नहीं करेंगे तब तक यात्रियों का रेलवे में आरामदायक एवं सुरक्षित सफर का सपना  बेमानी है। आजकल तो रेल में रात को सोते हुए यात्रियों का सामान भी गायब होने लगा है। आरपीएफ के जवानों की कार्यप्रणाली जानने के लिए अचानक किसी ट्रेन का निरीक्षण किया जा सकता है। दिन या रात में किन्ही दो स्टेशनों के बीच यात्रा भी की जा सकती है। सच सामने आते देर नहीं लगेगी। उम्मीद की जानी चाहिए रेलवे अधिकारी इस दिशा में कोई कदम उठाएंगे ताकि यात्री आरामदायक सफर निश्चिंत होकर कर सकें।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 25 नवम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Friday, November 18, 2011

सड़क निर्माण में गुणवत्ता का हो ख्याल

टिप्पणी

माननीय हाईकोर्ट की फटकार के बाद शहर में बन रही सड़कों में गुणवत्ता की अनदेखी की जा रही है। यह बात निगम के अधिकारी ही कह रहे हैं। इतना ही नहीं स्वयं महापौर भी गुणवत्ता की बात को लेकर विरोध जता चुकी हैं। इन सबके बावजूद सड़कें बनने का काम बदस्तूर जारी है। दिन तो दिन रात में भी सड़कें बन रही हैं। आलम देखिए कि निगम की ओर से सड़क बनाने में प्रयुक्त सामग्री का सैम्पल जांच के लिए भिजवाया गया है। निगम अधिकारियों का कहना है कि अगर जांच रिपोर्ट में अगर गड़बडी पाई गई तो संबंधित कंपनी को नोटिस जारी किया जाएगा। मतलब साफ है जब तक रिपोर्ट नहीं आती तब तक कंपनी सड़क बनाने का काम निर्बाध गति से जारी रखेगी। ऐसे में कई तरह के सवाल उठना लाजिमी है। मसलन, अगर जांच रिपोर्ट में गड़बड़ी पाई गई तो सैंपल लेने के बाद से लेकर जांच रिपोर्ट आने के बीच में जिन सड़कों का निर्माण किया जा रहा है, उनका क्या होगा। गुणवत्ता को लेकर जब विरोध हो रहा है तो क्यों न पहले ही गुणवत्ता के मापदण्ड तय कर दिए जाते। आखिरकार सड़क निर्माण के लिए कोई तो पैमाना तो तय होगा ही। सड़कें निर्धारित पैमाने के अनुसार बन रही हैं या नहीं, क्या यह देखने की फुर्सत भी निगम अधिकारियों को नहीं है। जांच रिपोर्ट आने के इंतजार में हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाना  एक तरह से छूट देने के समान ही है।
इस मामले का दूसरा पहलू यह भी है कि निगम के ऊपर निर्धारित समय सीमा में सड़कें पूरी करवाने का न्यायालय का डंडा है, लिहाजा उसका भी एकसूत्री कार्यक्रम आनन-फानन में सड़कें तैयार करवाना ही है। निगम की जल्दबाजी को देखते हुए सड़कें संभवतः निर्धारित समय-सीमा बन जाएंगी लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि वे कितना चलेंगी।
बहरहाल, सड़कें आमजन के लिए ही हैं। अगर उनका निर्माण तय मापदण्डों से नहीं हो रहा है तो लोगों को विरोध करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को भी अपने क्षेत्रों में बनने वाली सड़कों पर नजर रखनी चाहिए। सिर्फ न्यायालय के आदेश के बाद आनन-फानन में सडक़ें बनवानें से आमजन को राहत मिलने वाली नहीं है। यह एक तरह से रस्म अदायगी ही है। ऐसा न हो कि जब तक सभी सड़कें बनकर तैयार हों, तब तब उनके टूटने का दौर भी शुरू हो जाए। सड़कें जल्दी बने यह सब चाहते हैं लेकिन गुणवत्ता की कीमत पर तो कतई नहीं है।


साभार : बिलासपुर पत्रिका के 18 नवम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

...तो यह हालात नहीं होते

टिप्पणी

माननीय हाईकोर्ट ने जनहित से जुड़े एक मामले में गुरुवार को पुलिस अधीक्षक एवं जिला परिवहन अधिकारी को फटकार लगाई तथा कहा कि उनके विभाग का ध्यान जनहित पर न होकर सिर्फ वसूली पर है। दोनों अधिकारियों को शहर की बदहाल यातायात व्यवस्था के मामले में हाईकोर्ट ने तलब किया गया था। देखा जाए तो लोकसेवकों को फटकार का यह नया मामला नहीं है। इससे पहले बिलासपुर की बदहाल सड़कों पर भी न्यायालय ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उसके बाद निगम अधिकारियों को शहर में सड़कों को दुरुस्त करने की समय सीमा तय कर  शपथ पत्र देना पड़ा। बदहाल यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के मामले में भी हाईकोर्ट ने समय सीमा बताने एवं शपथ पत्र पेश करने के आदेश दिए हैं।
उक्त दोनों मामलों से इतना तो तय है कि लोकसेवक अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक प्रकार से नहीं कर रहे हैं। इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि जो काम इनको करना चाहिए थे, समय रहते उन पर ध्यान नहीं दिया गया। मजबूरन लोगों को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इन सबके पीछे जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी कम जिम्मेदार नहीं है। शहर में टूटी सड़कों से संबंधित मामला ही देख लीजिए। 'बयानवीर' जनप्रतिनिधि दनादन आश्वासन का लॉलीपॉप ही देते रहे, लेकिन राहत का रास्ता न्यायालय की शरण में जाने के बाद ही नजर आया। इसी तरह शहर की यातायात व्यवस्था को बदहाल करने वाले कारणों में जनप्रतिनिधि भी शामिल हैं। उनके किसी 'अपने' या  'नजदीकी' ने बेजा कब्जा कर रास्ता रोकने या नियम विरुद्ध कोई काम किया तो उनको संरक्षण देने का काम भी यही लोग करते हैं। अंततः लोकसेवकों एवं जनप्रतिनिधियों के इस गठजोड़ की परणिति बदहाल यातायात व्यवस्था व अधूरे कामों के रूप में ही सामने आती है।
बहरहाल 'बेलगाम' लोकसेवक एवं 'बयानवीर' जनप्रतिनिधि अपना काम ईमानदारी से करते, अपनी जिम्मेदारी समझते तो ऐसे हालात ही नहीं बनते। आमजन की समस्याओं से मुंह मोड़ने वाले इन दोनों वर्गों से पूछा जाना चाहिए कि वे किस मुंह से खुद को जनप्रतिनिधि एवं लोकसेवक कहलाना पसंद करते हैं। आलम देखिए जनप्रतिनिधि हैं, लेकिन प्रतिनिधिनित्व किसका और किसके लिए कर रहे हैं, किसी से कुछ छिपा नहीं है। इसी तरह  लोकसेवक हैं  लेकिन सेवक किसके हैं और किसकी सेवा में जुटे हैं, सब जगजाहिर है।  विडम्बना देखिए दोनों वर्गों के पद के आगे जन/लोक जुड़ा है। इसके बावजूद दोनों वर्ग जन की बजाय आपस में एक दूसरे के इर्द-गिर्द ही दिखाई देते हैं।  आजादी के छह दशक बाद भी आमजन को मूलभूत सुविधाएं मयस्सर नहीं होना बेहद शर्मनाक है।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 18  नवम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Saturday, November 12, 2011

काश! आप बिलासपुर घूम लेते...

खुली पाती

आदरणीय, मुख्यमंत्री जी,
करीब छह माह के लम्बे समय के बाद आपका बिलासपुर आगमन का कार्यक्रम बना है। आप तखतपुर के अलावा बिलासपुर में भी दो कार्यक्रमों में भाग लेंगे। इस दौरान करीब 35 मिनट आपका छत्तीगसढ़ भवन में रुकना भी प्रस्तावित है। कितना अच्छा होता आप इस अवधि में शहर का भ्रमण कर लेते। इस बहाने आप 'बीमार' शहर की नब्ज भी पहचान लेते। क्योंकि जिस रास्ते से आप गुजरेंगे तथा जो आपको दिखाया जाएगा, आप उसी को सच मान लेंगे, जबकि हकीकत इससे अलग है। आपकी राह में आने वाली रुकावटें मसलन, सडक़ें चकाचक हो रही हैं। धूल हटा कर सफाई की जा रही है। गड्‌ढे ठीक किए जा रहे हैं। आवारा मवेशियों का तो कहीं नामोनिशान तक दिखाई नहीं दे रहा है। इनके अलावा उन तमाम समस्याओं का 'निराकरण' भी युद्धस्तर पर हो रहा है, जो आपकी राह में परेशानी पैदा कर सकती हैं। बिलासपुर में ऐसा अक्सर होता आया है। विशिष्ट लोगों की आवभगत कैसे होती है तथा सड़कों की दशा 'चमत्कारिक रूप से' रातोरात कैसे सुधरती है, इस बात का साक्षी यह शहर रहा है। आमजन की तो बिसात ही क्या? वह बेचारा रोता रहे, बिलखता रहे या आंदोलन करे, गांधीगिरी दिखाए, लेकिन उसकी पीड़ा पर गौर करना न तो आपके नुमाइंदों की फितरत में है और ना ही उनके पास फुर्सत है। पता नहीं किस काम में व्यस्त हैं। आपके मंत्री और अफसर तो माशाअल्लाह इतना बढ़-चढ़कर बोलते हैं कि उनको 'बयानवीर' की उपाधि से नवाजा जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। शहर में सड़कों की दशा सुधारने के लिए क्या-क्या बयान नहीं दिए। ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा। लेकिन हुआ कुछ नहीं। यह तो माननीय हाईकोर्ट की फटकार काम आई वरना आपके 'बयानवीर' तो यूं ही सब्जबाग दिखाते रहते।
सबसे हैरत की बात तो यह है कि आप जिस ओवरब्रिज का लोकार्पण करने आ रहे हैं, वह भी अपने आप में ऐतिहासिक है। एक दशक से ज्यादा समय से इस ब्रिज के बनने एवं बिगड़ने की कहानी चल रही है। हालात यह हैं कि ब्रिज अभी भी पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाया है। आनन-फानन में कमियों को रंगरोगन करके छिपाया जा रहा है। अगर इतनी जल्दी पहले दिखाई जाती तो लोगों को राहत मिलने में देर नहीं होती। जब दस साल से ज्यादा समय इसको बनने में लग गए  तो फिर इसे पूरी तरह से पूर्ण करवाकर ही लोकार्पण करवाना चाहिए था। इस प्रकार के कामों में भी प्रमुख भूमिका आपके 'बयानवीरों' की ही है। वैसे भी इस प्रकार कामों को पूर्ण करवाने से पहले उनका लोकार्पण करवाने या बीच में अधूरा छोड़ने की बिलासपुर में परंपरा रही है। खैर, सभी कार्यक्रमों में शिरकत करने के बाद जहां से आपका हेलीकॉप्टर रायपुर के लिए उड़ेगा, वह वही बस स्टैण्ड है, जिसका लोकार्पण आप इसी साल जनवरी माह  में कर चुके हैं। हाइटेक सुविधाओं से सुसज्जित यह बस स्टैण्ड भी शुरू होने के इंतजार में बदहाल हो रहा है। यह तो आपको भी पता ही है कि आधी-अधूरी तैयारियों  तथा  तमाम औपचारिकताओं को पूर्ण किए बिना लोकार्पित किए जाने वाले काम सस्ती लोकप्रियता हासिल करने से ज्यादा कुछ भी नहीं। इससे आमजन आहत ही ज्यादा होता है।
आप निजाम के मुखिया हैं। इस कारण आपकी व्यस्तता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है लेकिन अवाम की खैर-खबर लेना भी आपकी नैतिक जिम्मेदारी में आता है। आपका दौरा इतना भी थकाऊ या उबाऊ नहीं है कि बदहाल शहर की हकीकत जानने के लिए आपके पास समय ही न हो। चुनावों के समय भी तो आप दिन-रात एक कर देते हो, नहाने-धोने  तक की सुध नहीं रहती। ऐसे में इस बात की गुंजाइश तो लेशमात्र भी नहीं है कि आप इस प्रकार के कामों के अभ्यस्त नहीं हैं।  यकीन मानिए, आपके छोटे से फैसले से तथा केवल आधा एक-घंटा खर्च करने से इस शहर की तस्वीर बदल सकती है। लगे हाथ आपको पता भी चल जाएगा कि बेमिसाल एवं बेनजीर बिलासपुर को बदहाली के कगार पर पहुंचाने वाले कारण कौन से हैं। 'दूध का दूध' और 'पानी का पानी' होते देर नहीं लगेगी। पानी बहुत गुजर चुका है।आम आदमी हताश एवं निराश है। आपके  'बयानवीरों'  से उसने उम्मीद करना लगभग छोड़ दिया है। आप राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ डाक्टर भी हैं लिहाजा, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर लाइलाज मर्ज की ओर बढ़ रहे शहर की सुध लीजिए। यकीन मानिए इलाज में अब जरा सी देरी या लापरवाही किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। अगर आपने 'आज' बिलासपुर से मुंह फेरा तो त्रस्त लोग 'कल' आपसे भी मुंह मोड़ सकते हैं।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 12 नवम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Thursday, November 10, 2011

औपचारिकता नहीं, कार्रवाई की जरूरत

टिप्पणी
बेशक यातायात नियमों की पालना करवाना  यातायात पुलिस के रोजमर्रा के कामों में शामिल है, लेकिन बिलासपुर में यातायात पुलिस का अभियान कब शुरू होता है तथा कब खत्म होता है,  पता ही नहीं चलता। तभी तो यातायात नियमों की जितनी धज्जियां बिलासपुर में उड़ती दिखाई देती हैं, शायद की कहीं दूसरी जगह दिखाई दे। शहर के किसी भी हिस्से में चले जाएं, सभी जगह कमोबेश एक जैसे ही हालात मिलेंगे। जो जैसे जी में आया वाहन चला रहा है लेकिन किसी प्रकार की पाबंदी नहीं है। मतलब साफ है किसी में भी कानून का भय नहीं है। हो भी कैसे? यातायात पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करने या यातायात नियमों की पालना करवाने की बजाय जबरिया वसूली करने के आरोप ज्यादा लगते हैं। लगातार होने वाली बड़ी दुर्घटनाओं से इन आरोपों को बल भी मिलता है। बुधवार सुबह हुआ हादसा भी इसी का नतीजा है। प्रतिबंधित इलाकों में भारी वाहनों का प्रवेश अब भी बिना किसी रोक टोक के बदस्तूर हो रहा है, जबकि पिछले माह 21 अक्टूबर को हुए सडक़ हादसे के बाद जिला प्रशासन ने सुरक्षा समिति की बैठक ब़ुलाई थी। इस बैठक में  भारी वाहनों के शहर से आवाजाही पर पूर्णतः प्रतिबंधित लगाकर इनको बार्इपास से बाहर निकालने का निर्णय लिया गया था। इस निर्णय की एक दिन भी पालना नहीं हुई। भले ही बचाव के लिए यातायात पुलिस के पास अपनी दलीलें हों, लेकिन शहर में जो कुछ हो रहा है,  वह यातायात पुलिस की उदासीनता का ही नतीजा है।
अगर यातायात पुलिस गंभीर होती तो शहर की सड़कों पर नाबालिग बच्चे बेखौफ दुपहिया दौड़ाते नजर नहीं आते। दुपहिया वाहनों पर तीन-तीन, चार-चार लोग बैठे दिखाई नहीं देते। यह पुलिस की उदासीनता एवं कर्तव्यविमुखता का ही परिणाम है कि वाहन चालक यातायात नियमों का सरेआम मखौल उड़ा रहे हैं। गति पर कोई नियंत्रण नहीं है। हेलमेट अनिवार्य करने की बात तो यातायात पुलिस के लिए दूर की कौड़ी है। यह  सही है कि यातायात नियमों की पालना करवाने से संबंधी अभियान की शुरुआत में जागरुकता विषयक कार्यक्रम करवाए जाते हैं। इसके बाद समझाइश दी जाती है और इन सब के बाद नियमों की कड़ाई से पालना करवाई जाती है। बिलासपुर की यातायात पुलिस  जागरुकता एवं समझाइश का काम तो जैसे-तैसे कर लेती है लेकिन कार्रवाई के नाम पर उसके हाथ हिचकिचा जाते हैं, जबकि मुख्य काम तो कार्रवाई का ही है। कार्रवाई में कड़ाई नहीं होगी तो फिर परिणाम भी आशा के अनुकूल नहीं आएंगे।
 बहरहाल, शहर में कई हादसे हो चुके हैं। इनकी फेहरिस्त लम्बी न हो तथा इन पर प्रभावी नियंत्रण हो, इसके लिए जरूरी है कि यातायात पुलिस अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ निभाएं। यातायात जागरुकता अभियान बाकायदा सुनियोजित एवं कारगर तरीके से चले। बिना किसी भेदभाव एवं राजनीतिक हस्तक्षेप के सभी दोषियों पर समान रूप से कार्रवाई हो। महज कागजी आंकड़ों को दुरुस्त करने के लिए चलाए जाने वाले अभियानों से किसी प्रकार की राहत की उम्मीद करना बेमानी है। क्योंकि इस प्रकार के कागजी अभियानों में कार्रवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता ही निभाई जाती है।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 10 नवम्बर 11 के अंक में प्रकाशित।

Thursday, October 20, 2011

काहे के लोकसेवक


टिप्पणी
प्रशासन के निर्देशों के बावजूद बाजार फिर अतिक्रमण की चपेट में है। दीपोत्सव के चलते शहर की सड़कें और ज्यादा संकरी हो गई हैं। बीच सड़क पर पार्किंग हो रही है। सजावट के नाम सडक़ों पर टेंट लगाने का काम बेखौफ, बेधड़क और सरेआम हो रहा है। न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला। कुछ जगह तो हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि वाहन तो दूर पैदल निकलने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। दरअसल, यहां  तासीर ही ऐसी है।  प्रशासन तो बस बयान जारी करने तक ही सीमित हो गया है। कार्रवाई के नाम पर अफसरों के माथे पर बल पड़ जाते हैं।  पता नहीं किस बात की नौकरी कर रहे हैं और किसके लिए कर रहे हैं। काहे के लोकसेवक हैं। वातानुकूलित कक्षों में बैठकर दिशा-निर्देश जारी हो जाते हैं। अधिकारी कभी बाजार में निकल कर देखें तो पता चलेगा कि आमजन को बाजार में सड़क पार करने में किस प्रकार की दुविधाओं एवं दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अमूमन देखा गया है कि कुछ वर्ग विशेष के लोगों तथा वीआईपी को फायदा पहुंचाने के लिए आमजन के हितों की सरेआम बलि चढ़ा दी जाती है। कभी धर्म के नाम पर तो कभी किसी के जन्मदिन के नाम पर। कभी किसी वीआईपी के आगमन के नाम पर तो कभी किसी बड़े आयोजन के बहाने, शहर में कुछ भी करो। किसी प्रकार की मनाही नहीं है। कोई रास्ता रोक रहा है तो कोई चंदे के नाम पर उगाही कर लेता है। मनमर्जी का खेल यहां खुलेआम चलता है।
भूल से कोई कानून की पालना करवाने की हिम्मत करता भी है तो ऐन-केन-प्रकारेण उसे चुप करवा दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि जिस जोश एवं उत्साह के साथ अभियान का आगाज होता है वह उसी अंदाज में अंजाम तक पहुंच ही नहीं पाता। मिलावटी मिठाई के खिलाफ चले अभियान का उदाहरण सबके सामने है। व्यापारियों के विरोध के बाद अभियान को रोक दिया गया। यहां सवाल उठाना लाजिमी है कि सिर्फ एक दिन में क्या अभियान का मकसद हल हो गया। प्रशासन के इस प्रकार के रवैये के कारण ही तो  अवैध कामों को बढ़ावा मिलता है। तभी तो बाजार में मिलावटी मिठाइयां बिकती हैं। कम तौल पर पेट्रोल मिलता है। घरेलू सिलेण्डरों का व्यावसायिक दुरुपयोग होता है। बिना बिल के बाजार में सोना बिकने आ जाता है। नकली मावे की खेप लगातार पहुंच जाती है। नेताओं के नाम के लेटरपैड से लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। यह चंद उदाहरण ही ऐसे हैं, जो यह बताने के लिए .पर्याप्त हैं कि प्रशासन कैसे व किस प्रकार की भूमिका निभा रहा है। यह सब क्यों व कैसे हो रहा है इस पर विचार करने का समय किसी के पास नहीं है। जनप्रतिनिधि तो इस प्रकार के मामले में कुछ बोलने की बजाय पर्दे के पीछे बैठकर तमाशा देखना ही ज्यादा पसंद करते हैं। उनको वोट बैंक खिसक जाने का खतरा जो रहता है।
बहरहाल, प्रशासन को अपनी भूमिका ईमानदारी से निभानी चाहिए। किसी प्रकार के दबाव या दखल को दरकिनार कर आम जन के हित से संबधित निर्णय तत्काल लेना चाहिए। प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों के रोज-रोज के बयानों से लोग अब तंग आ चुके हैं। बात काम की हो, विकास हो या किसी तरह की व्यवस्था बनाने की हो, ऐसे मामलों में अब तक शहरवासियों के हिस्से बयानबाजी ज्यादा आई है। उन पर अमल होता दिखाई नहीं देता। पानी बहुत गुजर चुका है। जरूरी है अब काम को, विकास को प्राथमिकता दी जाए। बदहाल व्यवस्था को सुधारने के लिए कोई निर्णायक पहल होनी चाहिए। बिना किसी लाग लपेट व राजनीति के। ईमानदारी के साथ।

साभार : बिलासपुर पत्रिका के 20 अक्टूबर 11  के अंक में प्रकाशित।

Saturday, October 15, 2011

ये मोबाइल फोन कम्पनी वाले....

बात इसी सोमवार यानी दस अक्टूबर की है। मैं अपने कार्यालय की सुबह की मीटिंग की निवृत्त होकर घर पहुंचा ही था कि अचानक मैंने मेरे दूसरे मोबाइल पर एक अजनबी नम्बर से आई मिस्सड काल को देखा। जैसी कि मेरी आदत है, मैं जो भी मिस्सड कॉल देखता हूं, उस पर कॉल कर लेता हूं। उस दिन भी मैंने वैसा ही किया। मैंने फोन दूसरे नम्बर से लगाया था, इसलिए पहले मुझे परिचय देना पड़ा और बताना पड़ा कि मेरे दूसरे नम्बरों पर आपने कॉल किया था। मामला समझ में आने के बाद सामने वाले शख्स ने कहा कि मैं दिल्ली पुलिस का इंस्पेक्टर बोल रहा हूं। आपके खिलाफ दिल्ली तीस हजारी कोर्ट में याचिका लगी हुई है। फोन पर उस कथित इंस्पेक्टर की बात सुनकर मुझे यकायक करंट सा लगा और मेरे हाथ से मोबाइल छूटते-छूटते बचा। जैसे-तैसे खुद को संभालते हुए मैंने घबराहट में  पूछा आखिरकार मेरा कसूर क्या है। तो वह बोला कसूर की बात करते हो। एक तो नोटिस का जवाब नहीं देते हा्रे ऊपर से सवाल भी करते हो। आप को कल 11 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट में उपस्थित होना है। इतना सुनते ही मेरी धड़कनें लुहार की धौकनी की मानिंद जोर-जोर से चलने लगी। चेहरा एकदम से पीला पड़ गया। समझ में नहीं आ रहा था कि आखिरकार अब क्या करूं। थोड़ी हिम्मत से जुटाकर फिर पूछा तो वह कथित इंस्पेक्टर बोला भाईसाहब आपके नाम कोई वोडाफोन का बिल लम्बित है। आपने उसे लम्बे समय से जमा नहीं कराया है, इसलिए वोडाफोन वालों ने आपके खिलाफ यह कार्रवाई की है।
कथित इंस्पेक्टर ने आगे कहा कि बिल जमा कराने के लिए तीन माह पूर्व आपको नोटिस भेजा था लेकिन आपने उसका जवाब ही नहीं दिया। इस पर मैंने कहा कि जिस स्थान की आप बात कर रहे हैं, मैं उस स्थान पर छह माह से नहीं रह रहा हूं। रही बात बिल जमा कराने की तो मैंने बिल जमा कराने से इनकार ही कब किया, जो नोटिस देने या अदालत में हाजिर होने की नौबत आ गई। मेरी दलीलों का उस कथित इंस्पेक्टर पर कोई असर नहीं हुआ। उसने कहा कि आप इस मामले को देख रहे वकील के नम्बर ले लो। हो सकता है वह आपकी कुछ मदद कर दें। वकील के नम्बर देते हुए उस इंस्पेक्टर ने मुझे बताया कि इनका नाम आरके चौधरी हैं। आप अपना पूरा मामला इनको बता दो। हो सकता है आपकी कोई मदद हो जाए।
मैंने हिम्मत जुटाकर तत्काल वकील साहब को फोन लगाया तो सामने से धीमे से आवाज आई। मैंने अपना परिचय देते हुए मामले की जानकारी लेनी चाही तो उन्होंने कुछ देर के लिए मुझे फोन पर होल्ड रखा। इसके बाद बोले आपने वोडाफोन का बिल जमा नहीं करवाया है और कनेक्शन भी विच्छेद करवा लिया है। आपको कल 11 अक्टूबर को तीस हजारी कोर्ट में हाजिर होना है। मैंने उनको बताया कि  एक दिन में मेरा दिल्ली पहुंचना संभव नहीं है। क्या इस समस्या का किसी तरह से कोई समाधान हो सकता है? वकील साहब ने कहा कि आप एक घंटे के भीतर 2307 रुपए जमा करवाके मुझे रसीद नम्बर बताओ तो मामले का निपटारा हो सकता है अन्यथा आपको कल हाजिर होना पड़ेगा। इसके बाद मैंने उस कथित इंस्पेक्टर को फोन लगाया और वकील साहब से हुए वार्तालाप के बारे में बताया। उस कथित इंस्पेक्टर ने भी वकील साहब की तर्ज पर मुझे एक घंटे के भीतर बिल जमा करवाने की सलाह दी।
दरसअल यह वोडाफोन की कहानी भी करीब छह माह पुरानी है। वोडाफोन के नम्बर वाला फोन मेरी धर्मपत्नी के पास था। पोस्टपैड होने के कारण वह बिल भी मैं ही जमा करवाता था। अचानक मेरा तबादला राजस्थान से बाहर हो गया। ऐसे में  बिल समय पर जमा नहीं हो पाया। जिस एजेंसी से यह फोन नम्बर लिया गया था, वहां से  मेरे पास फोन आया तो मैंने अपनी धर्मपत्नी जो कि उस वक्त अपने मायके में थी, से कहा कि किसी परिचित को बोलकर बिल जमा करवा दो।  तब उसने अपने बुआ के बेटे  जो कि वोडाफोन में किसी सीनियर पोस्ट पर काम करते बताए, उनसे कहा तो उन्होंने कहा कि आप चिंता मत करो काम हो जाएगा। यह बात सुनकर मैं निश्चिंत हो गया। कुछ समय बाद श्रीमती ने भी राजस्थान छोड़ दिया और मेरे पास आ गई, लेकिन बिल जमा नहीं हो पाया। हम तो बुआ के बेटे के भरोसे पर बैठे थे, इसलिए नहीं करवाया। मन में कोई पूर्वाग्रह या बिल जमा न कराने की भावना भी नहीं थी। सोचा राजस्थान चलेंगे तो बिल की राशि लौटा देंगे।
करीब दस दिन ही शांति से बीते होंगे कि एजेंसी वाले का फोन फिर आ गया, बोला भाईसाहब बिल जमा नहीं कराओगे क्या? मैं उसके बात करने के तरीके पर कुछ चौंका फिर उससे पूछा कि भईया उसमें जमा कराने या न कराने की कोई बात ही नहीं है। मेरे रिश्तेदार हैं, जो कि वोडाफोन में ही है। उन्होंने कहा कि बिल जमा हो जाएगा, इसलिए मैं तो शांत हूं। आप एक बार उनसे बात कर लो। इसके बाद मेरे पास एजेंसी से फोन आना बंद हो गए। करीब दो माह बाद फिर एजेंसी से फोन आया। वह बोला आपका बिल अभी पेंडिंग ही चल रहा है। आपके वोडाफोन वाले रिश्तेदार ने कोई बिल जमा नहीं कराया है। इस पर मैंने एजेंसी वाले को कहा कि यार तू मेरे गांव के पास का है। मैं तेरे को जानता हूं और तू मेरे को जानता है। ऐसा कर अगर रिश्तेदार ने नहीं कराया है तो तू करा दे। मैं अगले माह दीवाली पर गांव आ रहा हूं तब तुम्हारा पैसा लौटा दूंगा। मेरी बात पर सहमति जताते हुए उसने फोन काट दिया। मैं भी आश्वस्त हो गया कि अब फोन नहीं आएगा। मुझे नहीं पता था कि इस बार फोन नहीं बल्कि इस तरह का बवाल आएगा।
खैर, कहानी बताने का मतलब यही था कि मेरे मन में कहीं भी फोन की राशि हड़पने की बात भी नहीं थी। मैं एक प्रतिष्ठित परिवार से जुड़ा हूं और बेहद संवेदनशील इंसान हूं। मेरा जॉब भी सार्वजनिक उपक्रम का है, लिहाजा वैसे भी फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ता है। वकील से बात खत्म होते ही मैंने अपने पुराने साथी को फोन लगाया और वकील के नम्बर दे दिए। उसने पूछा क्या बात हो गई तो मैंने कहा पूरी कहानी बाद में बताऊंगा पहले 2307 रुपए का बिल वोडाफोन की एजेंसी पर जाकर जमा कराओ और वहां से जो रसीद मिले उसके नम्बर वकील को बताओ। राशि जमा होने के होने के बाद उसका मेरे पास फोन आ गया कि बिल जमा हो चुका है। उसने कहा कि वकील को आप ही बता दो, यह कहकर उसने रसीद नम्बर भी मुझे नोट  करा दिए। राहत की सांस लेते हुए मैंने वकील को इस समूचे घटनाक्रम से अवगत कराया। मैंने वकील से वोडाफोन के किसी अधिकारी के नम्बर जानना चाहे तो उन्होंने कहा कि उनके पास तो कम्पनी से ई मेल से शिकायत आती है उसी के आधार पर वे केस लड़ते हैं चूंकि आपने बिल जमा करवा दिया है इसलिए आपके समझौते का मेल वोडाफोन के अधिकारियों को भेज देता हूं।
इधर, फोन पर लम्बे समय तक मुझे बात करते देख मेरी धर्मपत्नी  भी सारा माजरा समझ चुकी थी। उसने तत्काल अपने पिताश्री को फोन लगाया और कहा कि भैया (बुआ के बेटे) को उलहाना दो कि उनके भरोसे के कारण आज क्या-क्या सुनने को मिल गया। इसके बाद श्रीमती ने ही अपने भैया को फोन लगाया। भैया ने मुझे बताया कि बिल की रिकवरी करने के लिए वोडाफोन वाले ऐसा ही करते हैं। आपको बिल जमा कराने से पहले एक बार मेरे से बात कर लेनी चाहिए थी। अब तो आपने बिल जमा करवा दिया है, इसलिए कुछ नहीं हो सकता है। चूंकि इस समूचे घटनाक्रम से मैं बेहद गुस्सा था। मैंने कहा कि आप वोडाफोन के किसी बड़े अधिकारी के नम्बर या मेल आईडी दीजिए ताकि मैं अपनी बात कह सकूं। मैं चोर नहीं हूं फिर भी मेरा साथ जो बर्ताव हुआ, उससे मुझे काफी दुख पहुंचा है। इसके बाद उन्होंने मामला दिखवाने का आश्वासन देते हुए दुबारा फोन करने का आश्वासन दिया।
इसके बाद मेरे एक दोस्त जो कि पहले वोडाफोन में कार्यरत थे और आजकल दूसरी मोबाइल कम्पनी में गुजरात चले गए, मैंने उनको फोन लगाया। मैंने उनसे भी वोडाफोन के किसी अधिकारी का नम्बर या ईमेल आइडी की जानकारी चाही, तो उन्होंने कहा कि बकाया बिल की रिकवरी के लिए इसी प्रकार के तरीके अपनाए जाते हैं ताकि उपभोक्ता डर के मारे राशि जमा करवा दें। उन्होंने कहा कि इस तरीके पर पहले भी काफी बवाल मच चुका है और समाचार-पत्रों में काफी छपा है। इसके बावजूद इन फोन कम्पनियों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। दोस्त से बात अभी खत्म ही हुई थी कि श्रीमती के बुआ के बेटे का फोन दुबारा आ गया और उन्होंने कहा कि आपका मूल बकाया तो 12 सौ ही है, उसने 2307 रुपए कैसे जमा करवाए। इसके बाद उन्होंने कहा कि रसीद लेकर आपके बंदे को एजेंसी तक भिजवा दीजिए। मैंने दुबारा फोन करके अपने साथी को एजेंसी तक भिजवा दिया। वहां पर 12 सौ रुपए जमा करके बाकी राशि वापस कर दी गई। इस प्रकार से यह समूचा घटनाक्रम करीब तीन घंटे तक चला।
चूंकि घटनाक्रम मेरे लिए एकदम नया और चौंकाने वाला था इस कारण इसको लिखने का मन कर गया। उस कथित इंस्पेक्टर तथा वकील साहब के नम्बर भी लिखना चाह रहा था, जो कि उस दिन एक किताब पर लिखे थे। जल्दबाजी में आज वह किताब मिली नहीं। मिली तो दोनों के नम्बरों का उल्लेख जरूर करूंगा। इस सारे घटनाक्रम से एक बात तो साबित हो गई कि खुद के  मरे बिना स्वर्ग नहंी मिलता। आज उस घटना को पांच दिन हो गए हैं लेकिन उसको याद करके कभी गुस्सा आता है तो कभी खुद पर ही हंसता हूं।  किसी बात को हल्के से लेना बाद में कितना गंभीर बन जाता है यह मैंने अभी तक सुना ही था अब जान भी गया हूं। मन में एक तरह की टीस जरूर है कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ। अपनी इस पीड़ा को मैंने सार्वजनिक जरूर किया है लेकिन सुकून तभी मिलेगा जब वोडाफोन के किसी बड़े अधिकारी से मुलाकात होगी। ज्यादा नहीं तो इतना तो कह ही दूंगा कि रिकवरी करवाने का यह तरीका कृपया बंद करवा दीजिए, क्योंकि आपका यह तरीका किसी हंसते-खेलते परिवार में कोहराम मचवा सकता है। पैसे वसूलने के तरीके और भी हो सकते हैं। किसी की जान पर बन आए, यह तो सरासर नाइंसाफी है। सवाल यह भी है कि जितनी नम्रता के साथ यह फोन वाले कनेक्शन देते वक्त या उपभोक्ताओं को अपनी तरफ मोड़ते समय पेश आते हैं, लेकिन बाद में इनका व्यवहार बदल जाता है। इसी घटनाक्रम को एक परिचित को बताया तो वे हंस पड़े और बोले, आप उनकी बातों से डर गए। बड़े-बड़े अपराधियों का कुछ नहीं होता फिर आपने ऐसा कौनसा गुनाह किया था जो डर गए। अब परिचित को यह कौन समझाए कि इज्जजदार के लिए तो तू कहना ही गाली के समान है।
और अंत में आखिरकार नम्बर मिल गए। कथित पुलिस इंस्पेक्टर के नम्बर 9250213864 हैं जबकि वकील साहब के नम्बर 92137 11928  हैं। इन दोनों नम्बरों पर मैंने बात की थी।









Friday, October 14, 2011

पूंछ तो गीली हो गई...

मेरा छोटा बेटा चीकू (एकलव्य) जितना चंचल है, उतना ही हाजिर जवाब भी। अभी वह पांच साल का भी नहीं हुआ है कि अपनी बातों से बड़े-बड़ों को भी आसानी से बेवकूफ बना देता है। अभी दशहरे की बात है। मोहल्ले में रावण का पुतला देखकर मचल गया और अपनी मम्मी से कहने लगा कि उसे रावण देखने जाना है। उसकी मम्मी उससे दो कदम आगे निकली। तत्काल बाजार गई और प्लास्टिक की गदा खरीद लाई वह भी दो। दो इसलिए क्योंकि मेरा बड़ा बेटा योगराज भी जब किसी चीज के लिए मचल जाए तो फिर जिद पूरी करके ही मानता है। दोनों चुप और संतुष्ट रहे इसलिए दो गदा खरीदी गई। इसके बाद चीकू की जिद देखते उसकी मम्मी ने उसे बाल हनुमान के रूप में सजा दिया। बाकायदा धोती पहनाई गई। कानों में बिन्दी चिपका दी गई। हाथों में पट्‌का और गालों पर सिंदूर लगा दिया गया। चीकू छोटा है इस कारण सहज ही हनुमान के रूप में उसने सभी को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया। भूल यह हो गई कि  बाल हनुमान के पूंछ नहीं लगाई है। वह भूल से रह गई थी। वैसे भी पूंछ के लायक कोई वस्तु थी नहीं जिसे पूंछ बनाकर लगाया जा सके, लिहाजा बिना पूंछ का ही हनुमान बना दिया गया। हाथ में गदा लिए वह रावण के पास पहुंच गया और जोर जोर से जय सियाराम, जय सियाराम के जयकारे लगाने लगा।
छोटे से बालक को जयकारे लगाते देख वहां मौजूद लोग आश्चर्य जताने लगे। इतने में चीकू ने अपनी गदा से रावण के पुतले पर प्रहार किया। फिर क्या था मोहल्ले वाले कहने लगे कि आज तो रावण का दहन बाल हनुमान ही करेंगे। इसके बाद चीकू ने रावण का दहन किया। रावण की अंदर आतिशबाजी एवं पटाखों का शोर सुनकर वह बहुत उत्साहित हो गया। रावण दहन के बाद  जब चीकू अपनी मम्मी व योगराज के साथ घर लौट रहा था पड़ोस की आंटी जो चीकू से बेहद प्यार करती है उसने चीकू को अपने पास बुलाया। वैसे चीकू मूडी है जब मूड होता है तभी किसी के पास जाता है वरना वह टस से मस नहीं होता है। चाहे कोई कितनी भी मन्नत कर ले। चूंकि हनुमान बनने की खुशी में वह इतना उत्साहित था कि बिना किसी ना नुकर के वह आंटी के पास चला गया। आंटी देखते ही बोली, अरे वाह चीकू तुम तो आज बाल हनुमान के रूप में बहुत जम रहे हो। चलो यह तो बताओ की तुम्हारी पूंछ कहां है। इतना सुनते ही चीकू ने जवाब दिया कि पूंछ तो गीली हो गई थी, इसलिए मम्मी ने सूखा दी। चीकू का जवाब सुनकर वहां मौजूद अन्य महिलाएं भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी। मेरी धर्मपत्नी भी चीकू के जवाब से काफी प्रसन्न नजर आई। इसकी वजह यह थी कि  पूंछ न लगाने की उसकी भूल को चीकू ने बड़ी ही चतुराई के साथ नया मोड़ दे दिया था।