Thursday, November 16, 2017

शहर की सुध लेगा कौन?

टिप्पणी 
श्रीगंगानगर के लोग इन दिनों दोहरे संकट से गुजर रहे हैं। पहला संकट यह है कि शहर की अधिकतर सड़कों का सीना छलनी हो चुका है। पिछले दिनों आई सामान्य सी बारिश ने ही इन सड़कों की गुणवत्ता की पोल खोल दी थी। अब हालत यह है कि शहर की कई सड़कों पर बड़े गड्ढ़े हो चुके हैं। इस वजह से लोग आसानी से आवागमन नहीं कर पा रहे हैं। वैसे श्रीगंगानगर में सड़क निर्माण में घटिया निर्माण सामग्री के आरोप भी अक्सर लगते रहते हैं। इसके बावजूद सड़कों का टूटना बदस्तूर जारी है। आरोपों को अनसुना करने में अधिकतर पार्षद ही आगे रहे हैं। गारंटी पीरियड में सड़कें टूट जाती हैं, इसके बावजूद किसी ठेकेदार को ब्लेक लिस्टेड नहीं करना यह साबित करता है कि कमीशन का खेल कितना कारगर है, जो पार्षदों को बोलने से रोक रहा है। अब टूटी सड़कों को बनाने की मांग मुखर हो रही है तो इसमें भी जनहित की बजाय स्वहित ज्यादा नजर आता है, क्योंकि कमीशन जो आना है। कमीशन की कीमत पर बनी सड़कों का टूटना तो फिर तय है लेकिन इसकी वजह बारिश को मान लिया जाएगा। यह खेल हर साल इसी तरह चलता है।
दूसरा संकट यह है कि शहर में सीवरेज लाइन बिछाने के लिए हाल-फिलहाल बनी सड़कों को भी बेरहमी से तोड़ा जा रहा है। सीवरेज का काम देख रही कंपनी के तौर तरीकों को देखकर लगता है कि यह या तो अपनी मनमर्जी से काम कर रही है या फिर जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों ने इस कंपनी को अभयदान दे रखा है। यह कंपनी कहां काम कर रही है, किस तरह का काम कर रही है तथा इससे जनता को क्या-क्या तकलीफें हो रही है, यह सब जानने की फुरसत किसी को नहीं है। कंपनी के कर्मचारियों के काम करने का भी कोई मापदंड या पैमाना नहीं है। जहां इनकी मर्जी होती है, वहीं काम करते हैं। एक काम में कभी दस श्रमिक जुट जाते हैं तो कभी एक दो ही इसको करते नजर आते हैं। कभी यह काम बिल्कुल थम जाता है। कभी एक गली में होता है तो कभी दूसरी में। कहीं सड़कें खोद कर छोड़ दी हैं तो कहीं पर सड़क पर मिट्टी इस तरह से डाल दी गई है कि वाहन तक गुजर नहीं सकते। खोदी गई मिट्टी हवा के साथ उड़ती है, जो कोढ़ में खाज का काम कर रही है। इतना ही नहीं, जहां पाइप लाइन बिछा दी गई है, वहां भी सड़क पर मिट्टी के ढेर पड़े हैं। बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि इस दोहरे संकट से निजात कैसे मिले, इस काम को करवाने में पहल कौन करे तथा बदहाल शहर की सुध कौन ले। कमीशन के आगे शहर हित को गौण करने वालों से उम्मीद करना बेमानी है। राज्य सरकार को शहर के हालात से अवगत कराने का दावा करवाने वालों की बातों में भी दम कम ही दिखाई देता है। ऐसे हालात में शहर के वरिष्ठ अधिकारियों को ही पहल करनी होगी। वे शहर का भ्रमण करें। तमाम समस्याओं को नजदीक से देखें तथा जनता को होने वाली परेशानियों को महसूस करें। स्थानीय स्तर पर जिनका समाधान संभव है तो यहां करवाएं और जो राज्य सरकार के स्तर की है, उसके लिए प्रस्ताव भेजकर उस पर गंभीरता से काम करने के प्रयास होने चाहिए। ऐसा इसीलिए भी जरूरी है कि अब तक चुप्प्पी साध कर बैठी जनता जिस दिन सड़क पर आ गई तो फिर सबकी मुश्किलें बढ़ेंगी।

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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 9 सितंबर 17 के अंक में प्रकाशित

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