Friday, August 31, 2018

सावन सूखा बीत रहा

सावन सूखा बीत रहा
उमस रही सताय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन नहींं मनभावन
दो बर रहयो नहाय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन की इस गर्मी में
कछु नही सुहाय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन सूखा देखकर
मन नहीं हरषाय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन भी जेठ का
एहसास रहा दिलाय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय
सावन की सुहानी यादें
मन रहा बिसराय
चैन किस दिन आएगा
कोई तो दियो बताय

बदहाल सौर ऊर्जा संयंत्र

प्रसंगवश
सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने तथा बिजली की बचत करने के मकसद से प्रदेश के ग्राम पंचायत मुख्यालयों व पंचायत समितियों के अटल सेवा केन्द्रों पर लगाए गए सौर ऊर्जा संयंत्र दम तोडऩे लगे हैं। अकेले श्रीगंगानगर जिले में ही पचास फीसदी के करीब संयंत्र उपयोग में नहीं आ रहे हैं। कमोबेश प्रदेश के दूसरे स्थानों पर भी हालात कोई खास संतोष-जनक नहीं कहे जा सकते।
उल्लेखनीय है कि ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर संयंत्र लगाने में करीब दो लाख रुपए जबकि अटल सेवा केन्द्रों पर दस लाख रुपए खर्च हुए थे। इस तरह श्रीगंगानगर जिले के 336 ग्राम पंचायत मुख्यालयों व नौ अटल सेवा केन्द्रों पर साढ़े सात करोड़ से भी ज्यादा की राशि खर्च की गई थी। श्रीगंगानगर जैसे हालात कमोबेश प्रदेश के सभी जिलों में हैं। पूरे प्रदेश के परिपे्रक्ष्य में देखें तो मामला और चौंकाता है। प्रदेश में करीब तीन सौ पंचायत समितियां व दस हजार के करीब ग्राम पंचायतें हैं। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि सभी जगह संयंत्र लगाने में कितनी राशि खर्च हुई। विडम्बना यह है कि जिस मकसद से संयंत्र स्थापित किए गए थे, वह पूरा ही नहीं हो रहा है। संयंत्रों को ठीक करने की उम्मीद की कोई किरण भी नजर नहीं आती है। इन संयंत्रों का भविष्य क्या होगा? इनका रखरखाव कैसे किया जाएगा तथा खराब होने की स्थिति में इनको ठीक कौन करेगा व कैसे करेगा, इसको लेकर भी कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश दिखाई नहीं देते। इन संयंत्रों का रखरखाव करने वाली कंपनी का अनुबंध भी पांच साल तक ही था। वह भी पूरा हो चुका है। सौर ऊर्जा संयंत्रों की सुध न लेना एक तरह से सरकारी राशि का दुरुपयोग जैसा ही है। जिम्मेदारों के अव्यावहारिक व अदूरदर्शिता भरे फैसले के कारण न तो सरकारी राशि का सदुपयोग हुआ और ना ही सौर ऊर्जा से ग्राम पंचायत मुख्यालय रोशन हुए। ऐसे हालात में बिजली बचत की बात तो बिल्कुल ही बेमानी ही हो गई। ऐसे में सौर ऊर्जा संयंत्रों की कहानी एक तरह से 'माया मिली न राम' वाले मुहावरे को ही चरितार्थ कर रही है। सरकार को इस समूचे प्रकरण की न केवल जांच करवानी चाहिए बल्कि इससे सबक भी लेना चाहिए ताकि भविष्य में तात्कालिक वाहवाही के बजाय ठोस काम हों और सरकारी राशि का सदुपयोग हो। तभी आमजन सरकारी योजनाओं से लाभान्वित हो सकेगा।
एक तरफ सरकार वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सौर ऊर्जा संयंत्रों की यह बदहाली है। बहरहाल, सरकार को खराब संयंत्रों को ठीक करने का कोई रास्ता खोजना चाहिए। इनका रखरखाव किस तरह से किया जाए ताकि इनका लाभ लंबे समय तक मिल सके। अन्यथा ये संयंत्र केवल अतीत की कहानी बन कर रह जाएंगे
 
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18 अगस्त 18 को राजस्थान पत्रिका के राजस्थान के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित 

एकजुटता का पाठ पढ़ा गए वाजपेयी

अलविदा अटल : स्मृति शेष 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भले ही पंचतत्व में विलीन हो गए हों, देशवासियों को भावनात्मक रूप से वे एकसूत्र पिरो गए। उनके विचार, उनके सिद्धांत तथा राजनीति में दिए गए उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। उनके निधन पर शायद ही एेसा कोई होगा जिसने राजनीति के इस पुरोधा को श्रद्धांजलि न दी हो। पक्ष- विपक्ष सभी ने इस चिंतक-विचारक को दिल से श्रद्धा सुमन अर्पित किए। समूचे देश में वाजपेयी के लिए संवेदनाओं का जो सैलाब उमड़ा वह साबित करता है कि देशवासियों के मन में उनके प्रति कितनी श्रद्धा थी। एेसा होना भी था, क्योंकि वाजपेयी के लिए भी देश सर्वोपरि था। सक्रिय राजनीति में वह जब तक रहे देश की उन्नति व उत्थान के लिए कार्य करते रहे। वाजपेयी न केवल भाजपा का उदारवादी चेहरा थे बल्कि वे करिश्माई नेता भी थे। उनमें श्रोताओं को बांधने की अद्भुत कला थी। यही कारण था, उनको सुनने जन सैलाब उमड़ता था। उनके बोलने का अंदाज श्रोताओं को प्रभावित करता था। उनके चेहरे की भाव भंगिमाएं तथा रुक-रुक कर बोलने की शैली लुभाती थी। वे अपने भाषणों में श्रोताओं को हंसाते थे, गुदगुदाते थे तथा सोचने पर मजबूर भी करते थे। तेरह दिन की उनकी पहली सरकार जब गिरी थी, तो संसद में दिया गया उनका भाषण कालजयी हो गया। आज भी सोशल मीडिया पर वाजपेयी के उसी भाषण को न केवल सुना जा रहा है बल्कि पसंद भी किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर वाजपेयी को जिस अंदाज में श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है, वह अपने आप में अनूठी है। कोई उनको उन्हीं की कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि दे रहा था तो कोई अपने संस्मरण में उनको याद कर रहा है। वाजपेयी प्रखर वक्ता होने के साथ-साथ कवि भी थे। उनकी कालजयी कविताएं आज जन-जन की जुबान पर है। वाजपेयी रिश्ते निभाने के लिए जाने जाते हैं, विशेषकर अपने दोस्तों के लिए वो हमेशा तैयार रहते थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा भैरोंसिंह शेखावत तीनों में गहरी दोस्ती रही। इनकी दोस्ती मिसाल मानी जाती रही है। परहित अर्पित तीन-मन के दर्शन में विश्वास करने वाले वाजपेयी ने पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नारे जय जवान, जय किसान को आगे बढ़ाते हुए इसमें जय विज्ञान भी जोड़ा। इतना ही नहीं पोकरण में परमाणु बम परीक्षण कर समूचे विश्व को हतप्रभ कर दिया। वाजपेयी पड़ोसी मुल्कों से रिश्ते मधुर रखने के हिमायती थे। इसके लिए उन्होंने कई बार प्रयास किए। उन्होंने पाकिस्तान की बस से यात्रा भी की। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को शिखर सम्मलेन के लिए आमंत्रित किया। इतना ही नहीं वाजपेयी की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना तथा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना सभी की जुबां पर है। राजस्थान से उनका गहरा नाता रहा। शायद ही एेसा कोई बड़ा शहर रहा होगा जहां वाजपेयी न आए हों। राजस्थान के कमोबेश हर शहर से वाजपेयी की यादें जुड़ी हैं। यही हाल देश के अन्य स्थानों का है। यही कारण है उनके निधन के बाद देश के कोने कोने से जन सैलाब उमड़ा। हर कोई अपने प्रिय नेता के अंतिम दर्शन करने तथा श्रद्धांजलि अर्पित करने को उत्सुक था। अंतिम यात्रा के दौरान सड़क के दोनों तरफ खड़ा हुजूम यह साबित कर रहा था कि वाजपेयी सच्चे अर्थों में जननेता थे। राजनीति के मौजूदा दौर में वाजपेयी जैसा चेहरा नजर नहीं आता। उदारवादी होने के साथ-साथ वे सर्वधर्म में विश्वास करने वाले नेता थे। वे एेसे नेता थे जिनके विपक्षी दलों से भी मधुर संबंध रहे। वाजपेयी की लोकप्रियता इसी से साबित होती है कि उन्होंने देश के विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा और जीता। भारतीय संसद को दिया गया उनका 52 साल का एेतिहासिक योगदान आने वाली पीढि़यों का मार्गदर्शन करता रहेगा।

हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर में 18 अगस्त के 18 के अंक में विज्ञापन परिशिष्ट में प्रकाशित

अटल जी : न भूतो न भविष्यति

स्मृति शेष 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे। उनके निधन के बाद संवेदनाओं का सैलाब, भावनाओं का भूचाल तथा श्रद्धांजलि का सिलसिला इस कदर है कि शायद ही पहले कभी ऐसा देखा गया हो। नेताओं को जी भर के गरियाने वाले इस दौर में शायद ही कोई नेता एेसा लोकप्रिय हुआ होगा, जिसके लिए आज समूचा देश गमगीन है। अपने दिवंगत नेता को सारा देश दल विशेष की राजनीति से ऊपर उठकर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दे रहा है। सोशल मीडिया पर कमोबेश आज हर पोस्ट अटलजी के नाम है। सचमुच देश ने आज एक प्रखर वक्ता व करिश्माई नेता खो दिया। उदारवादी चेहरा, चिंतक, राजनीति का चमकता चेहरा हमारे बीच से हमेशा हमेशा के लिए चला गया है। यह बात दीगर है कि राजनीतिक परिदृश्य से गायब होने बाद अटलजी सुर्खियों में रहे तो मौत की अफवाहों के कारण। साल में तीन चार बार तो उनकी मौत की खबर वायरल हो ही जाती लेकिन अपनी ही कविता मौत से ठन गई की तरह अटल मौत की अफवाहों के सामने अटल रहे, लेकिन इस बार इस जंग में जिंदगी हार गई और मौत जीत गई। 
उनके निधन की खबर से मन विचलित है। राजनीतिक पत्र-पत्रिकाओं को शुरू से पढऩे के कारण राजनीतिक समझ जल्द विकसित हो गई थी। यही कारण था राजनीति में रुचि बढऩे लगी। वाजपेयी की विद्वता, आंखें मूंदकर व सिर हिलाकर बोलने का अंदाज इतना लुभाता था कि मैं कब उनका फैन बना पता ही नहीं चला। टीवी रेडि़यों पर उनके कई भाषण सुने हैं लेकिन दो बार उनको साक्षात सुनने का मौका भी मिला है। सीकर के आईटीआई मैदान में अटलजी की सभा थी। तारीख व सन को लेकर थोड़ा असमंजस है, कि यह 1989 की बात है या फिर 1993 की। खैर, अटल जी को सुनने की उत्सुकता कई दिनों से थी। सभा की जानकारी तो मिल गई थी पर सुनने कैसे जाऊं, यही दुविधा में मन में घर किए हुए थी। आखिर पता चला कि पड़ोसी कस्बे सुलताना से सीकर के लिए बस जाएगी। मैं गांव से सुलताना चला गया और बस में बैठ गया। सीकर में जहां अटलजी की सभा थी, उससे काफी दूर ही वाहनों की पार्किंग दी गई थी, लिहाजा बस से उतर कर पैदल ही सभास्थल की ओर रवाना हुआ। इतनी भीड़ पहली बार देखी थी। भीड़ में धक्के खाता हुआ आखिर मैं भी सभा स्थल पहुंच गया। मैं जिनके साथ गया था, उनको किसी को नहीं जानता था। घर वालों को भी बिना बताए ही निकला था। सभा खत्म हुई तब तक शाम को चुकी थी। मैं भीड़ में धक्के खाता सुलताना की बस को तलाश रहा था। संयोग से बस मिल गई लेकिन तब तक वह अंदर से फुल हो गई थी। अकेला बस की छत पर बैठा। सीकर से उदयपुरवाटी होते हुए रात को बस सुलताना पहुंची। वहां से पैदल गांव आया तब तक रात के दो बज चुके थे। इस बात को लेकर जितनी डांट पड़ी उसका तो कहना क्या लेकिन अटल जी को साक्षात सुनने की हसरत जरूर पूरी कर ली। इसके बाद अटलजी, झुंझुनूं के सेठ मोतीलाल कॉलेज स्टेडियम में विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित करने आए थे, तब उनको सुना। यह शायद 1998 की बात है और तब भाजपा की टिकट पर चुनाव मोहम्मद गुल ने लड़ा था।
बहरहाल, लंबे समय से बीमारी से जूझते हुए अटल आज अनंत में समा गए, लेकिन देश के प्रति उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। वो सबको साथ लेकर चलने वाले नेता थे। दलगत विचारधारों के अलावा व्यक्तिगत जीवन में शायद ही कोई अटल जी का विरोधी होगा। पड़ोसी देश पाक से रिश्ते मधुर बनाने के लिए अटल जी ने हमेशा प्रयास किए। खैर, अटल जी जैसा नेता मुझे अतीत या वर्तमान दौर में कोई नजर नहीं आता है। राजनीति के पुरोधा अटल जी को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि। वो एक राजनेता के साथ साथ कवि और पत्रकार.भी थे। उनके विराट व्यक्तित्व के लिए इतना ही कहा जा सकता है कि ...
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा...

सेहत से खिलवाड़

प्रसंगवश 
श्रीगंगानगर के राजकीय जिला चिकित्सालय में 'भामाशाह स्वास्थ्य योजना' में अनियमितता का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य व चिकित्सा विभाग में प्रदेश स्तर तक हड़कंप मचा हुआ है। मामले की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने इसकी जांच भी शुरू कर दी है। यह मामला पिछले डेढ़ साल में 'भामाशाह स्वास्थ्य योजना' के तहत राजकीय जिला चिकित्सालय में आने वाले मरीजों से संबंधित है। अभी तक की जांच में सामने आया है कि जिला अस्पताल में भर्ती तो 42 सौ मरीज हुए, लेकिन 28 सौ रोगियों को प्राइवेट अस्पताल या नर्सिंग होम भेज दिया गया। इन मरीजों को यह कहते हुए निजी अस्पतालों में भेजा गया कि आपको ऑपरेशन के लिए तीन माह का इंतजार करना पड़ेगा। इस प्रकरण में अभी पांच चिकित्सकों की भूमिका संदिग्ध मानी गई है। अब मरीजों से जाकर पूछा जाएगा कि उनको प्राइवेट अस्पतालों में भेजने के पीछे इन चिकित्सकों की मंशा क्या थी?
खैर, बात अकेली भामाशाह स्वास्थ्य योजना में वेटिंग की ही नहीं है। वेटिंग का यह 'खेल' अधिकतर जांच व ऑपरेशन में बदस्तूर चल रहा है। दो-दो, तीन-तीन माह की आगामी तारीख देकर मरीजों को टरकाया जा रहा है। वेटिंग लंबी होने की प्रमुख वजह स्टाफ की कमी या मरीजों की अधिकता को बनाया जाता है, लेकिन सच कुछ और ही है। वेटिंग का यह 'खेल दरअसल, कमीशन से जुड़ा है। यह तो सभी जानते हैं कि ऑपरेशन या जांच करवाकर तत्काल राहत पाने की उम्मीद रखने वाला मरीज किसी भी सूरत में लंबा इंतजार नहीं कर सकता। एेसे में वह प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करता है। गंभीर बात यह है कि वेटिंग का सुनियोजित 'खेल' प्रदेश के कमोबेश हर सरकारी अस्पताल में देखने को मिल जाएगा। सस्ते व सहज-सुलभ इलाज की उम्मीद में सरकारी अस्पताल आने वाले मरीजों के साथ यह धोखा नहीं तो और क्या है? भामाशाह स्वास्थ्य योजना के तहत मरीजों को मुफ्त इलाज का ढिंढेरा पीटने वाली सरकार को यह सब नजर क्यों नहीं आता? ऐसे हालात कोरे भामाशाह कार्ड धारकों के लिए ही बन रहे हों ऐसा नहीं है। सरकारी अस्पतलों में मरीज इसीलिए जाने से घबराता है कि उसका ऑपरेशन हुआ तो समय पर नंबर आ पाएगा या नहीं। समय-समय पर मरीजों के परिजनों और डॉक्टरों के बीच कहासुनी व मारपीट की घटनाओं का बड़ा कारण मरीजों की अनदेखी के रूप में भी सामने आता है। सरकार को को तत्काल इस वेटिंग रूपी 'खेल' को बंद कर जिम्मेदारों पर नकेल कसनी चाहिए। वरना कमीशनखोरी की दीमक सरकार की 'भामाशाह' जैसी अहम योजना को दिन-ब-दिन खोखली करती जाएगी।

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राजस्थान पत्रिका के 11 अगस्त 18 को राजस्थान के तमाम संस्करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित

जल्दबाजी का नतीजा

टिप्पणी
सुरक्षा व सुविधाओं पर सवाल तब भी उठे थे, और आज भी यथावत हैं। व्यवस्थाओं में खामियों के जुमले तब भी बने जो अब चरम पर पहुंच गए हैं। अनिष्ट की आशंकाओं के बादल तो पहले दिन ही मंडरा गए थे, जब एक सांड अचानक हवाई पट्टी पर आ गया था। हवाई सेवा शुरू करने में बरती गई जल्दबाजी पर तंज तब भी कसे गए थे, जो अब मजाक में तब्दील हो चुके हैं। यह सब इतना आनन-फानन व जल्दबाजी में हुआ कि एक माह के भीतर इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच शुरू हुई हवाई सेवा ने लोगों को खुशी तो दी लेकिन लालगढ़ हवाई पट्टी के हालात देखकर ऐसा कोई नहीं था, जिसने प्रसन्नता जताई। पहले दिन जयपुर से उडकऱ विमान जब लालगढ़ की हवाई पट्टी पर उतरा तो उसे देखने जनसैलाब उमड़ा लेकिन सुविधाओं व सुरक्षा के नाम जो थोड़ा बहुत पहले दिन दिखाई दिया वह दूसरे दिन सिरे से गायब था। खैर, हवाई सेवा चालू तो हुई लेकिन हवाई पट्टी जाने व आने वाले यात्रियों के लिए या बिजली या पानी तक की व्यवस्था नहीं है। हवाई पट्टी के चारों तरफ चारदीवारी भी नहीं है। हवाई सेवा की बुकिंग वैसे तो ऑनलाइन होती है फिर भी सीट खाली रहने की स्थिति में एक युवक टिकट काटता है। यह सब ठीक उसी तर्ज पर होता है जैसे किसी देहाती इलाके में खुले में खड़े होकर बस परिचालक यात्रियों को टिकट थमाता है। गंभीर विषय तो यह है कि हवाई पट्टी के नजदीक सैनिक छावनी होने के बावजूद यात्रियों की जांच-पड़ताल तक की कोई व्यवस्था नहीं है। स्थायी एंबुलेंस व चिकित्सकों की टीम जैसा भी यहां कुछ नहीं है। बड़े विमान उतरने के लिए यह हवाई पट्टी वैसे भी अनुकूल नहीं है। इसके विस्तार के लिए भूमि अधिग्रहण का मामला भी राज्य सरकार के पास विचाराधीन है।
बहरहाल, संतोष करने की बात यह है कि इस हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई लेकिन इसकी वजह से कितनों की सांसें एकबारगी के लिए थमी, उसका कोई अंदाजा नहीं है। माना हवाई सेवा मौजूदा समय की जरूरत है लेकिन सुविधाओं और सुरक्षा को दरकिनार कर मानव जीवन को खतरे में डालने वाली सेवा किस काम की। हवाई पट्टी के हालात देखते हुए यह कहना उचित होगा कि हवाई सेवा आधी अधूरी तैयारियों के साथ जल्दबाजी में शुरू की गई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस मामले में गंभीरता से विचार करेगी तथा जो खामियां व कमियां हैं, उनका तुरंत निराकरण करवाएगी ताकि हवाई यात्रा करने वालों के जेहन में किसी तरह की आशंका पैदा ही न हो।


राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 09 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित । 

इक बंजारा गाए-42


सडक़ में भेद
यूआईटी के हाल ही करवाए गए कई कामों पर अंगुली उठी है। चाहे वो सूरतगढ़ मार्ग पर सर्विस रोड का मामला हो या फिर सदर थाने के पास बीच सडक़ में चौक बनाने की बात हो। कुछ इसी तरह की चर्चाएं शक्ति मार्ग पर बनी नई रोड को लेकर भी हो रही हैं। एक तो सडक़ बनाने का काम बहुत देरी से हुआ। दूसरा यह है कि इस सडक़ को कहीं पर तो वाल-टू-वाल बना दिया गया तो कहीं दोनों साइड में एक-एक, दो-दो फीट जगह छोड़ दी गई है। सडक़ बनाने में किस तरह के मापदंड अपनाए गए यह लोगों की समझ से बाहर हो रहा है।
सडक़ की लड़ाई
परिषद व यूआईटी प्रमुखों के बीच खुद को इक्कीस साबित करने की अंदरखाने की होड़ तो कभी की चल रही है। कभी कभार यह बाहर भी आ जाती है। बात यहां तक पहुंच जाती है तो दोनों एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने से भी नहीं चूकते। बड़ी और गंभीर बात तो यह है कि दोनों ही एक दूसरे पर शहर का विकास न करवाने का आरोप चस्पा करते हैं। वैसे शहर के हालात देखते हुए दोनों की बातों में ही दम नजर आता है। इस अहम की लड़ाई में जनता बेचारी उसी तरह पिस रही है, जैसे अनाज के साथ अक्सर घुन पिस जाता है। देखते हैं इस नूराकुश्ती का अंजाम क्या होता है।
कॉलेज का सपना
प्रदेश में नए मेडिकल कॉलेज भले ही शुरू हो गए हों लेकिन श्रीगंगानगर में यह मामला अभी लटका हुआ ही है। इतने लंबे इंतजार के बाद अब लोग न केवल सवाल उठाने लगे हैं बल्कि सोशल मीडिया पर भी अपनी पीड़ा व्यक्त करने लगे हैं। कोई दानदाता को कठघरे में खड़ा करता है तो कोई सरकार को। वैसे सोशल मीडिया में श्रीगंगानगर मेडिकल कॉलेज के नाम एक पेज भी बन गया है। खैर, श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज भले ही अस्तित्व में न आए लेकिन सोशल मीडिया का यह पेज, दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है, वाले शेर को चरितार्थ जरूर कर रहा है।
चुनाव की तैयारी
विधानसभा चुनाव के अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। चुनाव लडऩे के इच्छुकों में कोई समर्थकों से चर्चा कर रणनीति बना रहा है तो कोई कम समय का बहाना बनाकर सहानुभूति की लहर पर सवार होना चाहता है। विधायकी का सपना पालने वाले एक नेताजी का हाल भी इन दिनों ऐसा ही है। आजकल उनके कार्यालय में भीड़ भी जुटने लगी हैं। मंत्रणाएं होती हैं। कोई काम की आस में जाता है तो नेताजी मना नहीं कर रहे हैं, बस अफसोस जता रहे हैं कि कार्यकाल छोटा रहा, वरना पता नहीं क्या-क्या करता। खैर, जो किया जैसा किया वह भी किसी से छिपा नहीं है।
दुकानें बंद
कहते हैं खूंटा मजबूत हो तो बछड़ा उछल सकता है। मतलब पीठ पर हाथ होता है तो कोई कुछ भी कर सकता है। सट्टे की दुकान चलाने वालों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। इनका खूंटा इतना मजबूत था कि सब कुछ बेरोकेटोक खुलेआम चलता था। लेकिन पिछले एक सप्ताह से खूंटा कमजोर हुआ तो दुकानें के शटर भी गिर गए। खाकी में बदलाव के बाद सट्टे के खूंटे को हवालात की हवा खिलाई गई तो कइयों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। लोगों की दिलचस्पी अब इसमें है कि खूंटा उखाड़ा ही जाएगा या उखाडऩे की धमकी से ही काम चलाया जाएगा।
हवाई सेवा
श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच पिछले माह शुरू हुई हवाई सेवा पहले दिन से मजाक बनी हुई है। शुरुआत में इस सुरक्षा व सुविधाओं को लेकर खूब जुमले बने। किसी को और न सूझा तो विमान के एक इंजन पर ही चुटकी ले ली। मंगलवार को विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद तो चुटकुलों की बाढ़ सी आई हुई है। यहां तक एक एप के माध्यम से पंजाबी व मारवाड़ी में वीडियो तक बन गए हैं, जिसमें हवाई सेवा के बजाय बस में जाने का जिक्र है। दीवार व पेड़ के तने पर अटके विमान के फोटो के साथ चुटकुले सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं।

राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 09 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित
 

Saturday, August 4, 2018

चिराग तले अंधेरा

टिप्पणी 
श्रीगंगानगर से कोच्चुवेली के लिए सुपर फास्ट ट्रेन का उद्घाटन मंगलवार को हुआ। दरअसल, यह ट्रेन पहले बीकानेर से चलती थी, अब इसका फेरा बढ़ाकर श्रीगंगानगर से कर दिया गया है। इसी माह 11 अगस्त को श्रीगंगानगर से नांदेड़ के लिए भी नई ट्रेन का उद्घाटन होगा। कुछ दिन पहले बीकानेर-बिलासपुर ट्रेन की शुरूआत हो चुकी है। इससे पहले श्रीगंगानगर से तिरुचिरपल्ली के बीच भी हमसफर ट्रेन चली थी। इस तरह से कुछ समय के अंतराल में लंबी दूरी की चार ट्रेन श्रीगंगानगर को मिल चुकी हैं और सभी साप्ताहिक हैं। इसके अलावा श्रीगंगानगर से कुछ पैंसेजर ट्रेनों का संचालन भी शुरू हुआ। इतना कुछ करने के बावजूद रेलवे चिराग तले अंधेरा वाली कहावत चरितार्थ कर रहा है।
आज भी श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ के लोग एक ऐसी ट्रेन की इच्छा रखते हैं जो रोजाना जयपुर कम समय में पहुंचा सके। वर्तमान में इन दोनों जिलों के यात्रियों के लिए कोटा-श्रीगंगानगर इंटरसिटी एक्सप्रेस है, जो बीकानेर, नागौर आदि स्थानों से होकर जयपुर पहुंचती है। इस ट्रेन की सबसे बड़ी समस्या समय की है। हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच चलने वाली निजी बसों के मुकाबले इस ट्रेन में चार-पांच घंटे ज्यादा लगते हैं। समय की बचत मानिए या मजबूरी कि यात्री ज्यादा किराया देकर प्राइवेट बसों में सफर करते हैं। रेलवे चाहे तो इन यात्रियों की परेशानी का काफी हद तक समाधान कर सकता है। श्रीगंगानगर से सीकर तक रेलवे ट्रेक बन चुका है और वहां रेलों का संचालन भी होता है। अगर रेलवे सीकर तक सीधी रेल सेवा शुरू करता है तो दोनों जिले के यात्रियों को बड़ा फायदा होगा। इस संबंध में प्रस्ताव भी पारित है लेकिन पता नहीं है, ऐसी क्या वजह है कि रेलवे ने इस तरफ आंखें मूंद रखी हैं। सीकर से जयपुर के बीच आमान परिवर्तन का काम भी बेहद धीमा है। यह भी अपने आप में जांच का विषय है। यह भी सही है कि श्रीगंगानगर जिले में जो रेल सेवाएं नई शुरू हुई हैं, उनमें जनहित के बजाय रेलवे का हित ज्यादा जुड़ा है। वाशिंग लाइन इसकी बड़ी वजह है। समय के साथ लंबी दूरी की रेल सेवा भी जरूरी है लेकिन इसका यह मतलब तो कतई नहीं कि राज्य के भीतर सफर करने वालों को कुछ नहीं मिले। कम दूरी के यात्रियों की परेशानी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए रेलवे व जनप्रतिनितिधि इस ओर भी ध्यान देंगे, क्योंकि इंतजार बहुत लंबा हो चला है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 02 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित.

इक बंजारा गाए-41


जनप्रतिनिधियों में हडक़ंप
इन दिनों गांवों की सरकारों में जोरदार हलचल मची हुई है। कहीं बिना अनुमति के रंगीन कुर्सियां खरीदने का मामला चर्चा में तो है कहीं पर स्ट्रीट लाइट खरीद में गड़बड़ी की बातें चर्चा में हैं। यह मामले सामने आने के बाद इस तरह का काम करने वाले जनप्रतिनिधियों में हडक़म्प मचना लाजिमी है। वैसे इस तरह की अनियमिताएं जिला परिषद में नेतृत्व परिवर्तन के बाद ज्यादा दिखाई दे रही हैं। इतना ही नहीं है, अब तो बकायदा पुराने वाले नेतृत्व व मौजूदा नेतृत्व के बीच तुलना भी होने लगी है। फिर भी कुछ तो है जो नए नेतृत्व को अलग खड़ा करता है। देखने की बात यह है कि पंचायत राज में आगे और क्या उजागर होता है।
भूमिका पर सवाल
इन दिनों लालगढ़ पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि मामला एक दुर्घटना कारित करने वाली कार में शराब मिलने से जुड़ा है। चर्चा यहां तक है कि जिस कार में शराब मिली, उसका आबकारी के तरफ से कोई परमिट नहीं था। शराब की बोतलें आजकल आ नहीं रही, लेकिन उसमें बोतलें मिली। इसके अलावा शराब निकालकर दूसरे गाड़ी में डालने संबंधी बातें भी सुनने में आ रही हैं। वैसे बताया जा रहा है कि इस दिन थाने के मुखिया अपने ही एक अधीनस्थ के खिलाफ थाने से बाहर किसी कार्रवाई में जुटे थे। मान भी लें कि अगर उनको इस कार्रवाई में कहीं कोई चूक नजर आई या आएगी तो फिर सवाल यह उठता है कि वह शराब कहां से आई ?
जल्दबाजी का नतीजा
कहते हैं कि जल्दबाजी में अक्सर नुकसान का अंदेशा बना रहा है। तभी तो ठंडी करके खाने की सलाह दी जाती है। पदमपुर टिन शैड हादसे की सूचना देने में भी कुछ खबरनवीसों ने जरूरत से ज्यादा ही जल्दबाजी दिखाई। उससे कहीं ज्यादा जल्दबाजी जनप्रतिनिधियों ने संवेदना व्यक्त करने में दिखा दी। यह बात अलग है कि बाद में किसी ने अपने संवेदना संदेश डिलीट किए तो किसी ने संशोधित संदेश प्रसारित करवा दिए। बहरहाल, खबरनवीसों की इस जल्दबाजी ने पुलिस व प्रशासन की अच्छी खासी मशक्कत करवा दी। अब जल्दबाजी दिखाने वाले को पहचान की जा रही हैं। देखते हैं गाज कहां व किस पर गिरती है।
बदलाव का असर
खाकी में नेतृत्व परिवर्तन आ असर बाकी जगह भले ही दिखाई न दे लेकिन कहीं कहीं पर इसकी आंशिक झलक दिखाई देने लगी है। विशेषकर ज्ञापन देने/ लेने के फोटो में यकायक कमी आई है। वैसे ज्ञापन देने वालों की यह दिली इच्छा होती है कि अधिकारी को ज्ञापन देते समय की उनकी फोटो समाचार पत्रों में प्रकाशित हो लेकिन अब नई व्यवस्था के तहत फोटो पर एक तरह से पाबंदी लगा दी गई है। कार्यालय में फोटोग्राफरों का प्रवेश वर्जित कर दिया बताया। इतना ही नहीं थाने के मुखिया भी आजकल कप्तान का हवाला देकर खबरनवीसों को बाइट व या बयान देने से कतराने लगे हैं। वैसे खाकी के लिए सख्ती व अनुशासन बेहद जरूरी हैं। देखते हैं खाकी बदलाव को कितने दिन बरकरार रखती है।
तबादलों का राज
चुनावी मौसम में अधिकारियों के तबादले होना आम बात हो चली है। इन दिनों खूब अधिकारी इधर से उधर हो रहे हैं। इस बदलाव से श्रीगंगानगर जिला भी अछूता नहीं रहा। यहां के कई अधिकारी भी इस बदलाव की जद में आए हैं। वैसे इन तबादले के पीछे दबे स्वर में और भी कारण गिनाए जा रहे हैं। कोई अधिकारी लंबे समय से यहां कुंडली मारे बैठा था तो किसी को अपने से सीनियर अधिकारी से तालमेल नहीं बैठा पाने का खमियाजा भुगतना पड़ा। कुछ को किसी हादसे की सजा मिली तो किसी को बेहतर काम न करने के कारण बदल दिया गया। फिर भी तबादलों के पीछे के राज चुनावी मौसम के आगे गौण हो गए।
समर्थकों की मौज
नेताओं के पास समर्थकों की फौज तो होती ही है। नेता समर्थकों का ख्याल रखता है तो समर्थक अपने नेता के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। ऐसा की कुछ नजारा मंगलवार को नई टे्रन के उद्घाटन के समय का है। उद्घाटन समारोह में नेताओं के साथ बड़ी संख्या में उनके समर्थक भी आए। जैसे ही ट्रेन रवाना हुई, समर्थक भी उसमें सवार हो गए। अब नेताजी के समर्थक हैं, लिहाजा कौन पूछ परख करे। बताते हैं कि अधिकतर समर्थकों ने बिना टिकट के ही सुपर फास्ट ट्रेन में बैठने का आनंद लिया। अपना काम धंधा छोडकऱ, इतनी गर्मी में आने वाले कुछ तो हासिल करते ही। सो उन्होंने भरपाई रेल यात्रा से कर ली।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 02 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित..

जोर आजमाइश के इस खेल में लगती है जान की बाजी

श्रीगंगानगर. यह खेल जोर आजमाइश का है। इसमें जान भी दांव पर लगानी पड़ती है। रोमांच व खतरों से भरे इस खेल का नाम भी अजीब सा है। जी, हां इसका नाम है टोचन प्रतियोगिता। श्रीगंगानगर जिले के पदमपुर कस्बे में टिन शैड हादसे के बाद टोचन प्रतियोगिता अचानक से चर्चा में आ गई है। इसको जानने व समझने के लिए लोग बड़ी संख्या में गूगल तक की मदद ले रहे हैं। दरअसल, स्टील, जूट या प्लास्टिक की रस्सी की मदद से एक खराब वाहन को दूसरे वाहन से बांध कर खींचकर ले जाया जाता है, उसे टोचन कहते हैं। वैसे सही शब्द टो-चेन या टोइंग चेन है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है। टो यानी खींचना चेन यानी धातु की रस्सी। यह शब्द आदत में इतना आया कि टो-चेन को कब टोचन कहा जाने लगा पता ही नहीं चला। इस प्रक्रिया में खराब व सही दोनों ही गाड़ी एक ही दिशा में चलती हैं लेकिन टोचन प्रतियोगिता का फंडा अलग है। इसका नाम भले ही टोचन है लेकिन इसमें वाहन एक दूसरे को विपरीत दिशा में खींचते हैं और यह केवल ट्रैक्टरों के बीच होती हैं। यह एक तरह से रस्साकशी प्रतियोगिता का ही परिष्कृत रूप है। ट्रैक्टर के पीछे ट्रॉली के लिए जो हुक होता है, उसमें एक रॉड के माध्यम से दो ट्रैक्टरों को आपस में जोड़ दिया जाता है। दोनों को सेंट्रल प्वाइंट पर खड़ा किया जाता है। इसके बाद दोनों विपरीत दिशा में एक दूसरे को खींचते हैं। यह एक तरह से चालक की दक्षता की परीक्षा होती है, जो इसमें सफल होता है, बाजी उसी की होती है। 
हो सकता है हादसा
ट्रैक्टरों की जोर आजमाइश के दौरान कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। ट्रैक्टर जब एक आपस में एक दूसरे को विपरीत दिशा में खींचते हैं तो उनके आगे का हिस्सा हवा में उठ जाता है। कई बार टै्रक्टर इतना ऊंचा उठ जाता है कि औंधा पलट भी जाता है। पंजाब में तो इकलौते ट्रैक्टरों की स्टंट प्रतियोगिता भी होती है, जिसमें आगे के दो टायर हवा में उठ जाते हैं और पीछे के दोनों पहियों पर ही ट्रैक्टर को गोल चक्कर कटाया जाता है। पंजाब में टोचन पर गाने तक भी लिखे गए हैं। इन दिनों वहां मोटरसाइकिल की टोचन प्रतियोगिता भी खूब प्रचलन में है।
इनाम का लालच
पंजाब व हरियाणा के देहाती इलाकों में इस तरह की टोचन प्रतियोगिता खूब होती हैं। टोचन प्रतियोगिता में आकर्षक इनाम रखे जाते हैं। इसी इनाम के लालच में ट्रैक्टर मालिक अपनी जान की बाजी लगाने से नहीं हिचकिचाता। ट्रैक्टर का नुकसान होने का अंदेशा भी रहता है। प्रतियोगिता अगर सडक़ पर है तो टायर का घिसना तय है। वैसे मैदानी इलाकों में भी यह भी प्रतियोगिता होती है। आयोजक ट्रैक्टर चालकों से प्रतियोगिता का प्रवेश शुल्क लेते हैं। साथ ही कुछ शर्तें भी रखते हैं। पंजाब व हरियाणा से सटे होने के कारण श्रीगंगानगर जिले में भी इस तरह के स्टंट वाले खेल पसंद किए जाते हैं।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 01 अगस्त 18 के अंक में प्रकाशित

सबक लेने की जरूरत

टिप्पणी
रसूखदारों का साथ व सान्निध्य हो तो फिर कानून किस तरह कठपुतली बनता है, यह पदमपुर हादसे ने साबित कर दिया। जोखिम भरी और सशुल्क प्रतियोगिता, वह भी बिना किसी अनुमति के करवाने के पीछे भी कहीं न कहीं यही कारण रहे हैं। यह तो गनीमत रही कि हादसे में कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही एवं उदासीनता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा? हां, इस हादसे से जुड़े कई सवाल जरूर हैं, जो पुलिस व प्रशासन को कठघरे में खड़ा करते हैं। ट्रैक्टरों की रस्साकशी प्रतियोगिता का नाम ही अपने आप में अजूबा है। इस तरह की प्रतियोगिता का नाम सुनकर चौंकना लाजिमी है।
संभवत: यही कारण रहा कि इस स्टंट प्रतियोगिता को देखने हजारों लोग जुटे। इतना बड़ा आयोजन गुपचुप तरीके से हो जाना तथा पुलिस व प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं हो, यह बात किसी के गले नहीं उतरती। दरअसल, आजकल एक परिपाटी बन गई है कि किसी कार्यक्रम के लिए अगर पुलिस व प्रशासन की अनुमति नहीं मिलती है तो उसके लिए गली तलाश ली गई है। बचाव के लिए या बेरोक-टोक आयोजन करवाने के लिए रसूखदारों को इसमें शामिल कर लिया जाता है। इसके बाद कुछ करने की जरूरत भी नहीं रह जाती। कड़वी हकीकत यह भी है कि रसूखदारों की सिफारिश पर लगाए गए अधिकारियों में इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह उनको ही चुनौती दे या उनके किसी गैरकानूनी काम में जानबूझकर टांग अड़ाए। पदमपुर में भी ऐसा ही हुआ। प्रतियोगिता तय हो गई। पंफलेट्स तक बंट गए। अतिथि व आयोजकों के फोटो लगे पोस्टर आदि छप गए। इसलिए ‘यह सब गुपचुप हुआ’ कहना कतई संभव नहीं है। आयोजकों को भी पैसे बटोरने की ही चिंता ज्यादा रही। प्रत्येक प्रतिभागी से एक हजार रुपए लिए गए, लेकिन प्रतियोगिता देखने उमड़े लोगों के बैठने की माकूल व्यवस्था नहीं की गई। चूंकि यह एक तरह की स्टंट प्रतियोगिता थी, फिर भी सुरक्षा तक के कोई प्रबंध नहीं थे। बैठने के स्थान के अभाव में ही दर्शक टिन शेड पर चढ़ गए। मौके पर मौजूद इक्का-दुक्का पुलिसकर्मी भी मूकदर्शक बनकर औपचारिकता निभाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सके।
बहरहाल, मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं, लेकिन इस हादसे के जिम्मेदार कई हैं। जांच केवल जांच तक सीमित नहीं रहे। जांच का परिणाम निकले और प्रतियोगिता के आयोजकों व हादसे के जिम्मेदारों के खिलाफ उचित कार्रवाई हो ताकि नियम-कायदों को ताक पर रख कर इस तरह का काम करने वाले कुछ सबक ले सके। पुलिस व प्रशासन को भी किसी रसूखदार का नाम सुनकर आंख मूंदने की बजाय कानून के हिसाब से काम करना चाहिए। अगर पुलिस व प्रशासन रसूखदारों के दबाव या प्रभाव में आकर इसी तरह काम करते रहे तो फिर जान जोखिम में डालने वालों को रोकेगा कौन?
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 राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 30 जुलाई 18 के अंक में प्रकाशित

चंडीगढ़ यात्रा-15


संस्मरण
हम पार्क का भ्रमण पूरा कर चुके थे। बस पार्क से निकलने ही वाले थे। खैर, एक बात जो छूट गई है, उसका जिक्र नहीं करूंगा तो यह संस्मरण बेमानी होगा। हो सकता मेरी बात सुनकर आप आश्चचर्य से उछल पड़ें या दांतों तले अंगुली दबा लें। बात यह है कि रोज गार्डन में एक दिल का पेड़ भी है। इतना ही नहीं उसकी टहनियों पर असंख्य दिल लटके हुए हैं और जब हवा चलती है तो यह पेड़ बड़ी ही कर्णप्रिय आवाज निकालता है। जितनी तेज हवा, उतनी ही तेज आवाज। लाल रंग के कई दिल देखकर मैं चौंक गया और झट से इस पेड़ के नीचे चला गया। सरसरी नजर से देखने पर तो मैं तय नहीं कर पाया कि यह किसका पेड़ है। नजदीक जाकर गौर से देखा तो यह कृत्रिम पेड़ था। पुष्टि के लिए भतीजे और भानजे से हां भी भरवाई। फिर इस पेड़ के दो चार फोटो भी लिए। सरियों को मोड़कर पेड़ की शाखाएं बना दी गई और उनमें असंख्य विंड चाइम लटके हुए थे। इनके साथ ही लोहे की चपटे आकार में दिलनुमा पत्तियां बनाकर उन पर लाल रंग किया हुआ था। यह सब इतनी कलाकारी के साथ किया हुआ है देखने वाला एकबारगी तो धोखा खा ही जाता है। बड़ी बात यह भी कि इस कृत्रिम पेड़.पर परिंदों ने घोसला भी बना लिया था। वैसे बताता चलूं कि कि विंड चाइम का फेंगसुई व वास्तु में खासा महत्व है। माना जाता है कि विंड चाइम में बहुत सकारात्मक ऊर्जा होती है, जो घर में उन्नति और समृद्धि लाती है, हालांकि पार्क में विंड चाइम लगाने के पीछे क्या मकसद रहा यह तो मुझे पता नहीं चला। हो सकता है यहां भी सकारात्मक ऊर्जा वाले फंडे को अपनाकर ही इसको लगाया गया हो। विंड चाइम का इन दिनों प्रचलन वैसे भी कुछ ज्यादा ही है। लोग घरों के अलावा दुकानों में भी इसको लगाने लगे हैं। विंड चाइम की भी एक अलग दुनिया है, मलसन, गुडलक के लिए अलग, समृद्धि व स्वास्थ्य के लिए अलग। विंड चाइम में कितनी राड लगाएं, कौन सी धातु की लगाएं तथा इसकी दिशा क्या हो, यह भी पूरा ध्यान रखा जाता है। खैर, यह अलग विषय है। हम पार्क से बाहर निकले, फिर नीबू पानी पीया लेकिन उसने नमक कुछ ज्यादा ही डाल दिया, लिहाजा स्वाद बेमजा हो गया। इसके बाद हम कार की तरफ बढे।
क्रमश:

चंडीगढ़ यात्रा-14

संस्मरण
वैसे मुझे एक बात खटकी। पार्क का नाम है, जाहिर हुसैन रोज गार्डन लेकिन बोर्ड आदि में भी पूर्व राष्ट्रपति के नाम का कहीं पर भी उल्लेख दिखाई नहीं देता। सब लोग शोर्ट नाम रोज गार्डन की कहते हैं। इस पार्क की स्थापना 1967 में हुई थी तथा इसका नामकरण चंडीगढ़ के पहले कमिश्नर डा. एमएस रंधावा ने किया था। पार्क में लगे फूलों को लेकर वैसे जगह जगह सूचना पट्ट पर चेतावनी दी गई है कि फूल ना तोड़ें। फूल तोडऩे पर पांच सौ रुपए जुर्माना की चेतावनी लिखे बोर्ड भी जहां तहां टंगे हैं। पार्क में कई जगह कचरा पात्र भी रखे हुए हैं। और भी कई तरह की नसीहतें हैं, जो बोर्ड पर लिखी गई हैं। पार्क वैसे तो साल.भर.खुलता है लेकिन सर्दी गर्मी के दौरान.मामूली सा परिवर्तन किया जाता है। एक अप्रेल से 30 सितम्बर तक पार्क का समय सुबह पांच से रात दस बजे तक रहता है जबकि सर्दियों में मतलब एक अक्टूबर से 31 मार्च तक सुबह छह से रात दस बजे तक रहता है। घूमते घूमते एक बात और पता चली कि आप फुटपाथ पर जूते पहन कर चल सकते हो लेकिन पार्क के अंदर किसी गुलाब के पास जाना है तो नंगे पांव जाना पड़ेगा, हालांकि मैं जूतों में ही एक दो गुलाब के पौधों के पास गया लेकिन भानजे के अलावा किसी ने नहीं टोका। हो सकता है, उस वक्त मुझ पर किसी की नजर न हो। बच्चों के लिए पार्क के एक कोने में झूले आदि भी लगे हैं लेकिन उस वक्त वहां सन्नाटा पसरा था। वैसे गर्मियों में भी चहल-पहल शाम के वक्त ज्यादा होती है। पार्क में लगे रंगीन फव्वारे तो यहां के खास आकर्षण हैं। पार्क में घूमने वाला इनके पास जाकर फोटो जरूर खिंचवाता है। एक तरह से फव्वारे सेल्फी प्वाइंट बने हुए हैं। हमने दूर से ही इनको देखो पास नहीं गए। बहुत दूर थे। चलते-चलते हम थक गए थे, ऊपर से मौसम भी एेसा ही था। बताया गया कि पार्क के रखरखाव के लिए यहां पचास के करीब माली कार्यरत हैं। फरवरी माह के आखिर में यहां तीन दिवसीय रोग फेस्टिवल आयोजित होता है, इसमें देश-विदेश के सैलानी शामिल होते हैं। चंडीगढ़ का रोज फेस्टिवल अच्छा खासा लोकप्रिय है।
क्रमश:

चंडीगढ़ यात्रा-13

संस्मरण
रॉक गार्डन से अब हम रोज गार्डन के लिए रवाना हो लिए थे। रोज गार्डन भी रॉक गार्डन से दूर नहीं है। कार की एसी में थोड़ी सी राहत मिली। बाहर धूप और उमस अपने चरम पर थी। करीब पांच-सात मिनट ही चले होंगे कि रोज गार्डन आ गया। यहां पार्किंग कोई शुल्क नहीं है। सुखना झील की तरह यहां भी कोई ज्यादा चहल पहल नहीं थी। भीड़ का पता पार्किंग में लगी गाड़ियों से हो जाता है। खैर, हम तीनों पार्क की तरफ बढ़े। प्रवेश द्वार पर दो तीन बोर्ड व संकेतांक दिखाई दिए तो मैंने तत्काल मोबाइल से क्लिक कर लिए। मुझे पक्का यकीन था, जरूर इसमें पार्क से संबंधित जानकारी है, जो बाद में लिखने के दौरान संदर्भ के रूप में भी काम आएगी। पार्क में प्रवेश करते ही दोनों तरफ काफी लंबे पेड़ों की कतार श है। एेसे पेड़ पहाड़ी क्षेत्रों में ज्यादा होते हैं। यहां भी मेरे मोबाइल का कैमरा चालू था। थोड़ा आगे बढ़े तो हरियाली से आच्छादित एक स्टैंड मिला। यहां बैंच लगी हैं, और यहां आने वाले ठंडी छांव में बैठकर सुस्ताते हैं। हम यहां बिना रुके ही सीधे आगे बढ़ते गए। रास्ते में रंग-बिरंगे गुलाब दिखाई देते तो उनको भी मोबाइल में कैद कर रहा था। वैसे रोज गार्डन आने का यह समय उपयुक्त नहीं है, क्योंकि गुलाब के फूलों पर शबाब सर्दियों में ही आता है, इसलिए सर्दियों में रोज गार्डन की रंगत देखने लायक होती है। हां इस बात से जरूर दिल को तसल्ली दी जा सकती है कि रोज गार्डन देख लिया लेकिन इसमें सर्दी के आनंद वाली बात नहीं है। गर्मी में तो औपचारिकता सी ही पूरी होती है। चलते-चलते गला फिर सूख गया था। पास ही एक वाटर कूलर लगा था। वहां से बोतल भर हमने प्यास बुझाई और फिर चल पड़े। यह पार्क कोई छोटा मोटा पार्क नहीं है। यह न केवल भारत बल्कि एशिया का सबसे बड़ा पार्क है। बोर्ड पर लिखी जानकारी के अनुसार यह पार्क 40.25 एकड़ में फैला है। इसमें गुलाबों की 825 प्रजातियां हैं। इस पार्क में कुल 32 हजार पांच सौ के करीब पौधे हैं। पार्क में घूमने के लिए फुटपाथ बना हुआ है। हम चले जा रहे थे। पेड़ कुछ कम हैं लेकिन उनकी छांव में युगल बैठे थे। कोई दुनिया से बेखबर तो कोई अठखेलियों में मगन ...।
क्रमश:

चंडीगढ़ यात्रा-12

संस्मरण
हम लोग रॉक गार्डन काफी कुछ घूम चुके थे लेकिन अब भी जो बचा था वो वह भी अजूबा संसार था। टाइल्स, चूडियों व कंचों से न जाने कितनी तरह की कलाकृतियां बनाई गई है यहां। कितना समय लगा होगा इन सबको बनाने में। कहीं महिलाएं तो कहीं पुरुष। कहीं जंगली जानवर तो कहीं परिंदे। वह भी कोई एक दो दिन नहीं बल्कि काफी संख्या में। मैं समझ नहीं पा रहा था किसको कैमरे में कैद करूं और किसको छोडूं। धूप व उसम के बावजूद मैं लगातार फोटो खिंचने में लगा था। घूमावदार रास्तों के बीच हम आगे से आगे बढ़े जा रहे थे। पता नहीं था कि कितना देख चुके और कितना बाकी है। भानजा कुलदीप व भतीजा सिद्धार्थ यहां पूर्व में आ चुके, लिहाजा उनको रास्ता मालूम था, वरना मैं तो इस भूल भुलैया में दिनभर भटकता ही रहता। चूंकि हम जल्दी में थे इसलिए तमाम फोटो जल्दबाजी में ही खींचे। कोई एंगल वगैरह नहीं देखा गया। बिलकुल फ्लैट फोटो। हालांकि फोटोग्राफी का शौक भी है। मैं अक्सर फोटो व खबरों में हमेशा नया करने या अलग एंगल तलाशता रहता हूं लेकिन यहां मुझे समझौता करना पड़ा। तेज कदमों से चलना भी जारी था और क्लिक दर क्लिक भी किए जा रहा था। पसीने से टोपी, टीर्शट व जींस भीग चुके थे। मुझे मोबाइल की बैटरी की चिंता थी, हालांकि पावर बैंक था लेकिन वह घर रह गया था। इन कलाकृतियों के बीच एक यकायक नजर एक आदमी की कलाकृति पर पड़ी, जिसके एक हाथ में बीयर की बोतल व दूसरे में कप पकड़ाया गया था। चूंकि चंडीगढ़ खाने-पीने के शौकीनों का शहर है, इसलिए नेकचंद के जेहन में भी कहीं न कहीं यह बात जरूर रही होगी। खैर, इस नजारे को भी मैंने क्लिक किया। अब हम अंतिम चरण में थे। रॉक गार्डन की सैर पूर्ण होने को थी। करीब डेढ़ से दो घंटे में लगभग भागते हुए हमने रॉक गार्डन को देखा। तसल्ली से देखते तो शायद एक दिन भी कम पड़ता।
क्रमश:

चंडीगढ़ यात्रा-11

संस्मरण
थोड़ी सी ओर जानकारी जुटाई तो पता चला कि उस वक्त चीफ़ एडमिनिस्ट्रेटर डॉ. एमएस रंधावा ने नेकचंद की इस कल्पना को रॉक गार्डन का नाम दिया था। करीब 40 एकड़ में बने इस गार्डन का उदघाटन 1976 में किया गया। यह गार्डन तीन चरणों में बनकर तैयार हुआ बताते हैं। पहले चरण में वह काम हुआ जो नेकचंद से गुपचुप तरीके से किया था। दूसरा चरण 1983 में खत्म हुआ। इसके तहत गार्डन में झरना, छोटा सा थियेटर, बगीचा जैसी कई चीज़ें शामिल थीं। इनके साथ ही कंक्रीट पर मिट्टी का लेप चढ़ाकर पांच हजार के करीब छोटी-बड़ी कलाकृतियां बनाई गई थी। तीसरे चरण के तहत भी कई बड़े काम हुए। इनमें मेहराबों की सूची शामिल थी। इन मेहराबों पर झूले लगाए गए हैं। इन सब के साथ-साथ मूर्तियों प्रदर्शन के लिए एक मंडप, मछलीघर और ओपन सिंच थियेटर भी बनाया गया। एक मोटे अनुमान के अनुसार यहां रोजाना पांच हजार के करीब पर्यटक आते हैं। गार्डन में झरनों, रंग बिरंगी मछलियों और जलकुंड के अलावा ओपन एयर थियेटर भी है.
बिना किसी प्रशिक्षण और अकेले दम पर एक पूरा गार्डन बनाकर नेकचंद ने आउट साइडर आर्ट नाम के कॉन्सेप्ट को ख्याति दिलाई। इसका अर्थ होता है खुद से सीखी गई कला, जहां इंसान के पास किसी तरह की ट्रेनिंग नहीं होती और न ही मेनस्ट्रीम आर्ट की दुनिया से कोई वास्ता होता है। टूटे-फूटे सामान और मलबे से एकत्रित की गई सामग्री से रॉक गार्डन जैसी अदभुत व हैरतअंगेज़ रचना के लिए केंद्र सरकार ने 1984 में नेकचंद को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। 11 जून, 2015 कैंसर की बीमारी चलते नेकचंद ने आखिरी सांसें ली। इस गार्डन में एक फोटो दीर्घा भी है , जिसमें रॉक गार्डन के ही फोटो लगाए गए हैं। इस दीर्घा में आप समूचे गार्डन के फोटो देख सकते हैँ। अलग-अलग एंगल से लिए गए फोटो पर्यटकों का ध्यान खीचंते हैं। इस दीर्घा में नेकचंद के फोटो तथा उनसे संबंधित इतिहास लगा है। इसी दीर्घा के सामने आेपन थियेटर है, जहां कला संस्कृति से ओतप्रोत कार्यक्रम होते रहते हैं। रंग बिरंगी मछलियां भी पर्यटकों को लुभाती हैं। कई तरह के शीशे तथा उनमें बनने वाली उल्टी, सीधी, चपटी आकृति देखने वालों को स्वयं गुदगुदाती हैं। इसके अलावा मेहराबों पर लटकते झूले तो दिन भर आबाद रहते हैं। विशेषकर युगलों को इन झूलों पर बैठे या झूलते हुए देखा जा सकता था। रॉक गार्डन के झरने तो एक तरह से सेल्फी स्पॉट बने गए हैं। वैसे फोटो के मामले में महिलाएं कोई कंजूसी नहीं करती हैं। शायद यही कारण है कि रॉक गार्डन में अधिकतर जगह मैंने पुरुष को ही मोबाइल से फोटो खींचते देखा, वह भी महिलाओं की। खैर, सेल्फी का लोभ संवरण मैं भी नहीं कर पाया। एक सेल्फी लेता तो एक फोटो किसी कलाकृति की।
- क्रमश:

चंडीगढ़ यात्रा-10

संस्मरण
कला दीर्घा से निकलने हम एक दुकान पर गए। भतीजे ने पूछा कोल्ड ड्रिंक लेंगे या सादा पानी। मैंने सादे पानी के लिए बोल दिया। गला तर करने के बाद एक पेड़ की छांव में सुस्ताने लगे। गर्मी से हलकान काफी लोग वहां पेड़ों की छांव में बैठे थे। इसी दौरान मैं सोचने लगा कि आदमी की मेहनत और कल्पना सब साकार होती है तो क्या से क्या बना देती है। सच में यकीन नहीं होता यह सब देखकर। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता वाली लोकोक्ति मुझे यहां बेमानी नजर आ रही थी। बताते हैं कि जब चंडीगढ़ का नक्शा बना था, उसमें रॉक गार्डन नहीं था। मैंने कहीं पढ़ा कि चंडीगढ़ बसाने के लिए जो जगह अधिग्रहित की गई तब उसकी जद में कुछ गांव व ढाणियां भी आ गए। उनको अन्यत्र शिफ्ट किया गया था, लेकिन उनके मकानों के अवशेष व मलबा वहीं रह गए। तब समस्या यह खड़ी हो गई कि इतने मलबे और कचरे का निस्तारण कहां किया जाए। एेसे में इसको कैपिटोल काम्प्लेक्स स्थित स्टोर में जमा किया जाने लगा। उस वक्त पीडब्ल्यूडी में कार्यरत श्री नेकचंद सैनी के पास इस स्टोर की जिम्मेदारी थी। बताते हैं कि मलबा ज्यादा होने लगा तो टेकचंद ने इसका निस्तारण कैसे व कहां हो इसकी कल्पना की। वो टाइल्स व वाशबेसिन के टुकड़ों को देखकर कल्पना के घोड़े दौडऩे लगते। कहते हैं कि धीरे-धीरे नेकचंद की कल्पना ने मूर्तरूप में लेना शुरू किया। वो दिन में स्टोर में काम करते और रात को कल्पनाओं में रंग भरते। इनका यह काम अनवरत जारी रहा। बताता चलूं कि नेकचंद सैनी का जन्म 15 दिसंबर 1924 को शिकारगढ तहसील के एक गांव में हुआ था। यह गांव अब पाकिस्तान में है। उनका परिवार सब्जियां उगाकर घर का खर्च चलाता था. भारत-पाक विभाजन के बाद नेकचंद भारतीय पंजाब के एक छोटे शहर में रहने लगे। यहां उनको रोड इंस्पेक्टर की नौकरी मिल गई। इसके बाद उनका तबादला चंडीगढ़ हो गया। चंडीगढ़ के निर्माण के वक्त 1951 में नेकचंद को सड़क निरीक्षक के पद पर रखा गया। नेकचंद ड्यूटी के बाद अपनी साइकिल उठाते और खाली कराए गए गांवों या कबाड़ स्टोर से टूटा फूटा सामान उठा लाते। वो अपने काम को इतनी सावधानी से निपटा रहे थे कि सरकारी अधिकारियों को इस बात की भनक 1975 में लगी। तब तक नेकचंद चार एकड़ जगह पर कलाकृतियां बना चुके थे। सरकार ने इस अवैध निर्माण को तोड़ने या हटाने की कोशिश तो लोग नेक चंद के समर्थन में खड़े हो गए। आखिरकार लेंडस्केप एडवायजऱी कमेटी ने इस गार्डन को बनाने की अनुमति दे दी। इस तरह रॉक गार्डन चंडीगढ़ की न केवल पहचान बना बल्कि देश के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में भी शुमार हो गया।
क्रमश:

Thursday, July 26, 2018

चंडीगढ़ यात्रा-9

संस्मरण 
इस ऊहापोह के बीच आखिर एक दीर्घा दिखाई दी। अंदर गए तो वह वातानुकूलित थी, इालांकि इस गैलरी के अंदर अंधेरा था। यहां कपड़ों के माध्यम से बनाई गई कलाकृतियों से भारत के ग्रामीण जीवन को दर्शाया गया है। यह दीर्घा एक गुफा जैसी है। इसमें घूमते जाओ, आगे से आगे आड़ा तिरछ़ा रास्ता निकल ही आता है। हालांकि कलाकृतियों के पास लाइट लगी है लिहाजा वो ही हाइलाइट होती है, बाकी जगह हल्का सा प्रकाश रहता है। यह पूरी दीर्घा वातानुकूलित है लिहाजा, यहां आकर गर्मी से कुछ राहत मिली। इस गैलरी के प्रवेश द्वार पर जरूर एक महिला केयर टेकर के रूप में बैठी मिली बाकी कहीं एेसा दिखाई नहीं दिखाई नहीं। अंदर का नजारा वाकई अदभुत व रोमांचकारी था। दीर्घा में ग्रामीण परिवेश का सजीव चित्रण है । रंग बिरंगे पतंग, चरखा, पशुपालन, चक्की, चूल्हा, शादी, विदाई, हथाई, डोली, चौपाल, झूले आदि सब कुछ दिखाई देता है। कुछ जगह टाइल्स भी लगी हैं बाकी जगह दीवार पर गोबर से पुताई की गई है। ठीक वैसी ही जैसी गांवों में कच्ची दीवारों पर की जाती है। एक जगह तो गोबर के उपले ( कंडे) थापते हुए एक महिला दिखाई गई है। कपड़े से बनाए गए दीर्घा के महिला पुरुष रोशनी में हकीकत के नजदीक लगते हैं। इस समूची दीर्घा में राजस्थान, हरियाणा व पंजाब की संस्कृति के जीवंत दर्शन होते हैं। एक जगह प्रवेश द्वार पर खड़ा साधु तथा उसको देखती महिला तो सच देखने जैसा ही लगता है। मेरी भतीजे सिद्धार्थ से इस पर बात भी हो रही थी कि आखिर यह है क्या? और इनके माध्यम से क्या संदेश दिया जा रहा है। वैसे बाकी जगह तो पर्यटक अपने आप देख लेता है लेकिन यहां बनाए गए चित्रों के पीछे कहानी को बताने के लिए यह गाइड जरूर होना चाहिए। विशेषकर शहरी या बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए यह नई बात है। दीवारों पर मांडणे, कच्चे मकान, छप्पर, कुएं से पानी भरती महिलाएं, साधु महात्माओं की बैठक, भैंस, बकरियां इन सबको देखकर एक जीता जागता गांव आंखों के सामने होता है। अधिकतर कलाकृतियां कपड़े से बनाई गई हैं। चूंकि यहां वातावतरण में ठंडक थी, इसलिए दीर्घा को बड़ी तल्लीनता व धैर्य के साथ देखा। मैंने भी यहां मोबाइल से फोटो लेने की बजाय वीडियो बनाना ही बेहतर समझा और इस पोस्ट के साथ वीडियो ही पोस्ट कर रहा हूं ताकि दीर्घा के नजारे को आप स्वयं अपनी आंखों से साक्षात निहार सकें।
क्रमश:

सब कुछ राम भरोसे

टिप्पणी
सीवरेज के लिए सडक़ें तोड़ी रही हैं। बारिश का मौसम है, फिर भी खुदाई हो रही है। यह जानते हुए भी कि बारिश में जमीन धंसेगी, फिर भी काम बदस्तूर जारी है। तोड़ी गई सडक़ें भी दो-दो माह से जस की तस पड़ी हैं। प्रयोग के नाम पर उन्हें बार-बार तोड़ा जरूर जा रहा है। इधर, सामान्य बारिश से ही सडक़ें छलनी हो गई हैं। उनमें बड़े-बड़े गड्ढे हैं। उनको ठीक करने के नाम पर मकानों का मलबा डाला जा रहा है, जो गड्ढों से भी ज्यादा परेशानी पैदा कर रहा है, क्योंकि इसको जमाया नहीं जा रहा है। बारिश के पानी की निकासी नहीं होती, इसलिए वह पानी शहर के पार्कों व मैदानों में छोड़ा जाता है। पार्क तालाब बन चुके हैं। मैदान भी लबालब हैं। जिम्मेदारों को यही कारगर व सस्ता समाधान नजर आता है। सफाई व्यवस्था चौपट है। शहर का कोई भी कोना चकाचक नजर नहीं आता। कहीं-कहीं तो गंदगी से उठती दुर्गन्ध वातावरण को प्रदूषित कर रही है। अधूरे काम कछुआ गति से हो रहे हैं। कहीं शिलान्यास हो गया तो कहीं उद्घाटन, लेकिन जनता को काम पूर्ण होने का इंतजार है।
कमोबेश यही हाल कानून व्यवस्था का है। दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों की बात छोडि़ए, जिला मुख्यालय पर सरेआम वाहन उठ रहे हैं। राह चलते लोगों से मारपीट हो रही है। अवैध शराब देर रात या यूं कहिए सारी रात बिकती है। सट्टे की दुकानें गली-गली में खुली हैं। वाहन सडक़ों पर बेतरतीब खड़े हैं। प्राइवेट बसें पुलिस अधिकारियों के आवास के सामने सडक़ घेरकर सवारियां बैठाती हैं। पार्र्किंग की व्यवस्था कहीं नहीं हैं, फिर भी पार्र्किंग के नाम पर चालान जरूर कटते हैं।
नेताओं व नेतृत्व की तो पूछो ही मत। गिनाने के लिए सब के पास अपनी-अपनी मजबूरियां जरूर हैं, लेकिन जनहित या विकास के लिए कोई एजेंडा दिखाई नहीं देता। नासूर होती समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। दूरदर्शिता का तो नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। इन सबको को देखकर सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह शहर किसके भरोसे चल रहा है? कामों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं हैं। सब कुछ मनमर्जी से हो रहा है। सब जगह जन गौण है, उपेक्षित है, तो फिर शहर कौन चला रहा है? कैसे चला रहा है और किसके लिए चला रहा है? व्यवस्था नाम की कोई चिडिय़ा कहीं नजर नहीं आ रही है। आखिर कब तक यह शहर रामभरोसे चलता रहेगा? जिम्मेदार जाग नहीं रहे हैं, लेकिन अब जनता को चेत जाना चाहिए। यह शहर जनता का है, जनता से ही बना है। जनता को नजरअंदाज करने वाला चाहे शासन हो.. प्रशासन हो... नेता हो या फिर नेतृत्व, इनके समझ में तभी आएगी जब जनता जागेगी और शहर हित की बात करेगी

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 26 जुलाई 18 के अंक में प्रकाशित 

इक बंजारा गाए-40

आशीर्वाद की होड़
श्रीगंगानगर में चल रहे किन्नरों के सम्मेलन में मंगलवार को सामूहिक प्रीतिभोज का आयोजन किया गया था। इस बहाने राजनीति में रुचि रखने वाले आशीर्वाद पाने के लिए इस सम्मेलन में पहुंचे। चुनावी माहौल है, लिहाजा भीड़ ज्यादा होना लाजिमी था। बात यहीं तक सीमित नहीं रही, समारोह में सिर्फ एक दल विशेष के लोगों की भागीदारी ही ज्यादा रही। अन्य दल का कोई नामलेवा ही नहीं था। अब ऐसा क्यों हुआ? यह तो इस सम्मेलन की मध्यस्थता या बुलावे की जिम्मेदारी संभालने वाला ही बता सकता है। खैर, देखने की बात यह है कि किन्नरों का आशीर्वाद कालांतर में क्या रंग दिखाता है? 
ऐसे उखड़ा मिजाज
यह मामला भी किन्नरों के सामूहिक भोज व आशीर्वाद से ही जुड़ा है। इस सम्मेलन में छुटभैये नेता तो पहुंचे ही, राजनीति में रुचि रखने वाली सतारूढ़ दल की इक्का दुक्का महिलाएं भी इस बहाने पहुंची कि क्या पता किन्नरों के आशीर्वाद से किस्मत का ताला खुल जाए। खैर, यहां तक सब ठीक रहा है, लेकिन जो सुनने में आ रहा है वह बेहद हास्यास्पद है। बताते हैं कि एक व्यापारी ने आशीर्वाद लेने के लिए सम्मेलन में पहुंची एक महिला के ही पैर पकड़ लिए। जब व्यापारी को हकीकत बताई तो उसने माफी भी मांगी बताई, लेकिन मैडम का मूड ऐसा उखड़ा कि वह बिना प्रीतिभोज किए ही लौट आई। इधर, इस वाकये को सुनने वालों के हंस-हंस कर पेट में बल पड़ रहे हैं। 
पानी की गुहार
जिले के पुलिस कप्तान ने मंगलवार को ही कमान संभाली है। इस उपलक्ष्य में वे शाम को शहर के खबरनवीसों से मुखातिब थे। उनसे कई तरह के सवालात किए गए। मसलन, शहर की कानून व्यवस्था, निर्धारित समय के बाद भी अवैध शराब की बिक्री, सट्टे की दुकानों का खुलेआम संचालन, तस्करी, नशा आदि आदि। इसके अलावा भी अन्य कई मसलों पर चर्चा हुई। खैर, यहां तलक तो सब ठीक था, लेकिन अजीब स्थिति तो तब पैदा हो गई जब पुलिस कप्तान से शहर में पानी निकासी के बारे में ही सवाल कर लिया गया। हद तो तब हो गई जब पुलिस कप्तान से पाकिस्तान में चुनाव पर श्रीगंगानगर पुलिस की तैयारी का ही प्रश्न दाग दिया गया। 
खबरनवीसों का जमावड़ा
पुलिस कप्तान प्रेस से रूबरू हो तो भला कौन मिलना नहीं चाहेगा? वह भी तब जब मामला नया-नया हो। इस बहाने परिचय भी तो हो जाता है। इसी कारण मंगलवार शाम को पुलिस कप्तान की पीसी (प्रेस कान्फ्रेस) में छह दर्जन से ज्यादा खबरनवीसों का जमावड़ा हो गया। इनमें कई तो ऐसे भी पहुंच गए जिनका किसी समाचार पत्र से कोई वास्ता ही नहीं है। इन कथित खबरनवीसों को देखकर बाकी खबरनवीस हैरान थे, लेकिन मौके की नजाकत देखकर मन मसोस कर रह गए। वैसे यह कथित खबरनवीस मौसमी ही हैं, इनका मकसद खबर लिखने की बजाय मेल मिलाप व परिचय बढ़ाना ही ज्यादा होता है। 
स्वागत के बहाने
श्रीगंगानगर के कतिपय संगठन व उनके पदाधिकारी को जिले में आने वाले अधिकारियों का स्वागत करने की आदत लगी हुई है। दरअसल, स्वागत या अभिनंदन तो किसी उपलब्धि पर किया जाना अच्छा लगता है, लेकिन इन लोगों का असली मकसद स्वागत के बहाने मेल मिलाप व परिचय करना ही ज्यादा होता है। बताते हैं नए कप्तान का स्वागत करने भी कुछ कतिपय सगंठनों के लोग पहुंचे। काफी इंतजार के बाद भी जब मुलाकात का अवसर नहीं मिला तो इन लोगों के अरमानों पर पानी फिरना लाजिमी था। लिहाजा स्वागत के लिए लेकर गए बुके, मालाएं आदि किसी काम नहीं आई। देखना है मुलाकात का मौका फिर कभी नसीब हो पाता है या नहीं? 
सफाई की हकीकत
शहर की बदहाल सफाई व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जिले के हाकिम ने पांच अफसरों का एक पैनल बनाया था। इन अफसरों को शहर के अलग-अलग हिस्सों की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके बाद इन अफसरों को रोजाना अपने-अपने इलाकों की प्रगति रिपोर्ट देनी थी। अब अफसर अपने इलाके में कितनी बार गए? तथा प्रतिदिन की रिपोर्ट बनी या नहीं, यह अलग बात है, लेकिन शहर की सफाई व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं आया। अब यह समझ से परे है कि जब हकीकत में काम नहीं होता है तो फिर इस तरह के पैनल बनाने की जरूरत ही क्या है?
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 26 जुलाई 18 के अंक में प्रकाशित।

चंडीगढ़ यात्रा-8

संस्मरण
बीच में व्यस्तता के कारण संस्मरण का क्रम टूट गया। एक बार संस्मरण टूटने के बाद फिर वैसे बात नहीं रहती है। खैर, बात चंडीगढ़ के रॉक गार्डन की हो रही थी। यहां भी पार्किंग के लिए व्यवस्था है। प्रवेश टिकट के माध्यम से है। हम तीनों ने टिकट ली और प्रवेश कर गए एक एेसी दुनिया में जिसको जितनी बार भी देखो कम ही लगती है। यहां सचमुच पत्थर गीत गाते हुए प्रतीत होते हैं। कबाड़, रॉ मैटेरीयल, सीमेंट, टाइल्स, चूडि़यां और भी न जाने क्या-क्या। इनको देखकर कभी आह तो कभी वाह बरबस मुंह से निकलती रहती है। हमने एक नसीहत को नजरअंदाज करने का खमियाजा जरूर भोगा। कहा गया है रॉक गार्डन को देखना है तो सर्दी के मौसम में आना चाहिए। गर्मी का मौसम इसको देखने के लिए कतई सही नहीं है। नसीहत नहीं मानने का असर यह होता है पसीने से आपके कपड़े पानी-पानी हो जाते हैं। इतनी गर्मी और जबरदस्त उमस है इस गार्डन के पत्थरों व तंग रास्तों में। हालांकि यहां पानी की नहर है तो दो तीन जगह झरने भी बनाए गए जो किसी प्राकृतिक नजारे का आभास देते हैं, लेकिन गर्मी के मौसम में वह उमस बढ़ाता है। पत्थरों से गर्म भाप निकलती प्रतीत होती है। चूंकि इस कला को देखने का एक अलग ही आनंद है, लिहाजा गर्मी व उमस अपने आप ही गौण हो जाती है। रॉक गार्डन किसी भूल भूलैया की तरह ही है। पता ही नहीं कौनसा रास्ता किधर मुड़कर किधर खुल जाता है। हां जगह-जगह दरवाजे जरूर बने हैं, जो आपको समय-समय पर सतर्क करते हैं, मतलब दरवाजों से निकलना है तो सिर को नीचे करना ही पड़ेगा। अगर आप अपनी ही धुन में चलते गए तो सिर फूटना तय मानिए। हालांकि भतीजा व भानजा दोनों मेरे से आगे थे और दरवाजा आने पर ध्यान रखना, ध्यान रखना कहकर मुझे सतर्क कर रहे थे। वैसे कहीं सिर टकराया भी नहीं। करीब एक से डेढ़ घंटे तक इधर से उधर सांप सीढ़ी तरह घूमते रहने के बावजूद ईमानदारी से कहूं तो दिल भरा नहीं था लेकिन हिम्मत जवाब दे रही थी। गर्मी ने बुरी तरह से बेचैन कर दिया था। अब तो बस एक ही इच्छा हो रही थी कि किसी ठंडी छांव में बैठकर सुस्ता लिया जाए।
क्रमश :

चंडीगढ़ यात्रा- 7

संस्मरण
भानजे ने सुखना झील के ठीक विपरीत दिशा में सड़क किनारे पार्र्किंग में गाड़ी खड़ी करके रसीद कटाई और हम तीनों सड़क पार सुखना की तरफ बढ़े। उस वक्त तेज धूप व उमस जबरदस्त थी। इस कारण झील के किनारे पर चहल-पहल बेहद कम थी। पेड़ों के नीचे बैठे लोग जरूर सुस्ता रहे थे। सन्नाटा सा छाया था। पेड़ों के झुरमुटों में दुबके कोवों की कांव कांव जरूर इस सन्नाटे में खलल डाल रही थी। फुड जोन व झूलों पर जरूर बच्चे व महिलाएं कुछ खाने व खेलने में मगन थे। हम झील की तरफ बढ़े। इसके किनारे दो साइड में लम्बा फुटपाथ बना है, जहां सुबह-शाम लोग घूमने भी आते हैं। दोपहर की वजह से यह पूरा फुटपाथ सूना पड़ा था। दरअसल, यह झील प्राकृतिक न होकर कृत्रिम है। यह हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बनी हुई है। झील का क्षेत्र करीब तीन किलोमीटर है। इसकी औसत गहराई आठ व अधिकतम सोलह फुट के करीब है। इस झील का निर्माण 1958 में किया गया था। वर्तमान में यह चंडीगढ़ का प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है। पहले इस झील में एशियन रोइंग चैंपियनशिप भी होती थी। एशिया के सबसे लंबे रोइंग और याटिंग चैनल के रूप में भी यह झील प्रसिद्ध है। यह झील स्कीइंग, सर्फिंग और स्कलिंग जैसी अन्य वाटर स्पोट्र्स गतिविधियों के लिए भी लोकप्रिय है। ठंड के दौरान यहां विदेशी प्रवासी पक्षियां भी बड़ी संख्या में आते हैं।
हम तीनों झील के किनारे चहलकदमी कर थे लेकिन धूप में हमारा बुरा हाल कर रखा था। इधर झील में मात्र दो या तीन नाव ही चल रही थी, बाकी किनारे पर टायरों से बंधी पर्यटकों के इंतजार में थी। इतनी तेज धूप में भला कौन बोटिंग करे। बोटिंग भी अधिकतर पैडल वाली ही दिखाई दी, लिहाजा गर्मी में श्रम का पसीना बहाना हर किसी के बस की बात नहीं। झील का पानी भी मेरे को उतना साफ नहीं लगा, जितना बाकी झीलों का होता है। यह बिलकुल बरसाती पानी की तरह मटमैला ही नजर आया। घूमते-घूमते हम नावों की तरफ आए। लगभग सारी एक जैसी पैडल वाली ही थी। एक बड़ी नाव थी, जिस पर करीब बीस लोग बैठने की क्षमता थी। इसको ऊपर छत भी थी। शायद इसका नाम शिकारा था, यहां एक व्यक्ति का किराया चार सौ रुपए लिखा था। बोटिंग करने की इच्छा तेज धूप व गर्मी की वजह से वैसे ही नहीं थी, ऊपर से इतना किराया देखकर माथा ठनका। हमने यहां यादगार के लिए दो चार फोटो जरूर खींची और वापस मुड़ लिए। वैसे भी मूड बहुत कुछ मौसम पर निर्भर करता है। मौसम अनुकूल हो तो सब अच्छा और सुकूनदायक लगता है लेकिन मौसम की तल्खी मिजाज को गर्म कर देती है। यह सुखना पर प्रत्यक्ष महसूस हुआ। खैर, यहां से हमारा अगला स्थान रॉक गार्डन था। रॉक गार्डन का काफी नाम सुना था..। चंडीगढ के साथ रॉक गार्डन नाम इस तरह जुड़ गया है दोनों एक दूसरे की पहचान बन गए हैं।
क्रमश:

इक बंजारा गाए-39

मेरे साप्ताहिक कॉलम की अगली कड़ी। इस बार भी छह रंग।
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इंजन का खौफ
श्रीगंगानगर से जयपुर के बीच हवाई सेवा तो शुरू हो गई लेकिन इसके साथ हवाई पट्टी पर सुविधाओं का अभाव भी प्रमुख रूप से समाचार पत्रों की सुर्खियां बना। अब और नहीं तो कुछ लोग हवाई जहाज को लेकर ही टीका टिप्पणी व चटखारे लेने लगे हैं। कई तो इस बात से चुटकी लेने से नहीं चूक रहे कि हवाई जहाज में इंजन एक ही है। अब कमजोर दिल वाले इस बात से ही खौफजदा हैं। खुदा न खास्ता कल को इंजन में कोई दिक्कत आ जाए तो फिर विकल्प क्या है। भगवान न करे कभी एेसा हो लेकिन मानव स्वभाव है, एक बार डर बैठ जाता है, वह जल्दी से निकलता भी तो नहीं है।
टिकट मिल गई
कहते हैं जीवन में जो काम पहली बार होता है, उसकी खुशी कुछ अलग ही होती है और लंबे समय तक याद रहता है। अब हवाई सेवा में पहली बार यात्रा करने वालों के अनुभव भी कुछ एेसे ही हैं। हो सकता है इन लोगों ने पहले हवाई यात्रा की हो लेकिन यहां बात जयपुर से श्रीगंगानगर के लिए पहली बार हवाई यात्रा करने वालों की भी हो रही है। यात्रा करने वालों में जिला भाजपा के एक पदाधिकारी का पुत्र भी शामिल था, अब कहने वाले हवाई टिकट को चुनावी टिकट से जोड़ रहे हैं और यहां तक कह रहे हैं कि यह टिकट तो सीएम ने दी है। अब यह सब चर्चा और कयास हैं, कयासों का क्या?
जुमलों का दौर
हवाई सेवा शुरू होने के बाद बधाई देने वालों के साथ चुटकले व जुमले बनाने वाले भी कम नहीं है। जुमले भी कोई सीधे नहीं बल्कि व्यंग्यात्मक शैली में बनाए जा रहे हैं। कई एेसे भी जो हवाई जहाज के साथ अपनी सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं। अब जुमलों में हवाई पट्टी की सुरक्षा की जमकर खिल्ली उड़ाई जा रही है कि यहां कोई रोकटोक नहीं है। एेसी सुविधा भला और कहां मिलेगी। इतना नहीं हवाई पट्टी को किसी बस स्टैंड जैसा ही बताया जा रहा है। वैसे हकीकत है भी एेसी ही। देखते हैं सुविधाओं का विस्तार कब होता है।
समय की कीमत
समय को लेकर पता नहीं क्या-क्या कहा गया है। समय बड़ा बलवान, समय को खराब किया तो समय आपको खराब कर देगा। समय किसी का सगा नहीं होता आदि-आदि। इनके सबसे बावजूद सरकारी विभागों में समय की पालना कितनी होती है तथा यहां बैठने वालों के लिए समय कितना मायने रखता है, यह सब जगजाहिर है। वाहनों वाले विभाग में बैठने वालों को भी इसी श्रेणी में गिना जा सकता है। समय की पालना न करने वालों की शिकायत करने पर यहां उल्टे नसीहत मिलती है और कहा जाता है कि समय की पालना करने से कौनसा देश सुधर जाएगा। अब एेसे नासमझों को कौन समझाए।
शिलान्यास के बाद
शक्ति मार्ग पर इन दिनों यूआईटी सड़क बनवा रही है। वैसे शिलान्यास तो चार जुलाई को होना था लेकिन बारिश ने कार्यक्रम पर पानी फेर दिया। दुबारा कार्यक्रम तय होने में भी कम से दस दिन लग गए। तब तक यहां से आवागमन करने वाले ठोकरें खाते रहे और जिम्मेदारों को कोसते रहे। शिलान्यास के बाद भी पत्थर वैसे ही पड़े हैं। दो दिन से मजूदर यहां काम पर लगे हैं। एक तरफ नाली निर्माण भी चल रहा है। विकास वाले विभाग को अब कौन समझाए कि नाली पहले बननी चाहिए या सड़क। नाली बननी थी तो सड़क का काम पहले आधा अधूरा क्यों छोड़ा। खैर, विभाग की इस दूरदर्शिता के चर्चे आम है, क्योंकि जनहित को दुविधा में काम करवाने का यूआईटी का इतिहास पुराना है।
बीच का रास्ता
चाहे कैसी भी परिस्थिति हो या विवाद अक्सर बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया जाता है। अब सरकारी की प्रमुख योजनाओं की ही बात कर लें। इनमें श्रीगंगानगर का स्थान न तो ऊपर में है और न ही सबसे नीचे। मतलब बीच में है। एेसी स्थिति न तो खराब कही जा सकती है और न ही अच्छी लेकिन यह बचाव का बड़ा माध्यम जरूर है। प्रथम आने वाले को सफलता बरकरार रखना चुनौतीपूर्ण काम होता है तो नीचे वाले को ऊपर आने में जोर आता है। हां इतना जरूर है कि बीच के रास्ते वालों को नुकसान नहीं है तो कोई फायदा भी नहीं होता
। 
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 19 जुलाई 18 के अंक में प्रकाशित। 

चंडीगढ़ यात्रा- 6

संस्मरण
हम गूगल रूट के माध्यम से सुखना की तरफ बढ़े जा रहे थे। मोबाइल कार में पीछे बैठे सिद्धार्थ के पास था। वह बताता जा रहा था , उसी हिसाब से कुलदीप कार चलाता जा रहा था। एक घूमचक्कर पर कुलदीप सीधे जाने लगा तो सिद्धार्थ अचानक से चिल्लाया अरे इधर नहीं लेफ्ट चलो। एेसे में कुलदीप ने गाड़ी मोड़ दी और पीछे आ रही एक कार टकराते-टकराते बची। इसके बाद वह कार वाला हमें आेवरटेक करके आगे बढ़ा अपनी कार हमारी कार के आगे आड़ी लगा दी। हमने भी कार रोक दी। देखा तो वह पुलिस का जवान था। उसके चेहरे से गुस्सा साफ जाहिर हो रहा था। चूंकि हम गलती में थी, इसीलिए चुपचाप बैठे थे। वह तमतमाता हुआ आया और बोला, इसको भींत में दे मार....चलाणी नहीं आती क्या? इतना कहकर आंखें तरेरता हुआ वह अपनी कार की तरफ चला गया। हम तीनों की फिर हंसी फूट पड़ी। बार- बार भींत में दे मार का डॉयलोग कानों में गूंज रहा था। अभी सुखना झील के आसपास थे। अचानक एक सजा संवरा ऊंट दिखाई दिया। मैंने कार में बैठे-बैठे ही मैंने उसे क्लिक कर लिया। वैसे चंडीगढ़ जैसे आधुनिक शहर में रेगिस्तान के जहाज का मिलना किसी अजूबे से कम नहीं था। वैसे मैंने ऊंट को जगन्नाथ पुरी में भी देखा था, जहां समुद्र के किनारे पर्यटक ऊंट की सवारी करते हैं। जिस अंदाज में ऊंट को सजाया गया था, उससे साफ जाहिर था कि वह यहां आने वालों पर्यटकों के लिए ही किया गया था। खैर, मैं चंडीगढ़ के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी करने में जुटा था। दरअसल, मोहाली पंजाब का हिस्सा है और पंचकूला हरियाणा का लेकिन दोनों चंडीगढ़ में ही मिल चुके हैं। इसलिए कब मोहाली शुरू होता है और कब चंडीगढ़ आसानी से पता भी नहीं चल पाता है। इस कारण इसको ट्राइसिटी भी कहा जाता है। एक खास बात और जो चंडीगढ़ को बाकी शहरों से अलग करती है। यहां किसी भी गोलचक्कर या पार्क में आपको किसी महापुरुष या नेता की मूर्ति दिखाई नहीं देगी। इतना ही नहीं होर्डिंग्स व बैनर आदि भी न के बराबर हैं। आधुनिक शहर होने के बावजूद इस शहर के साथ एक अंधविश्वास भी जुड़ा हुआ है। आपको चंडीगढ़ व पंचकूलों के सेक्टरों में सेक्टर 13 नहीं मिलेगा। माना जाता है कि तेरह का अंक शुभ नहीं होता है। वैसे तेरह के अंक को लेकर पांच साल मैंने एक बड़ा सा लेख भी लिखा था, खैर, कथित अपशकुनी तेरह में अब चंडीगढ़ का नाम भी जुड़ गया है। चंडीगढ़ का नामकरण एक चंडी मंदिर से हुआ है। इतना ही नहीं चंडीगढ़ के साथ एक उपलब्धि यह भी जुड़ी है। इसको भारत का प्रथम स्मोकिंग फ्री शहर घोषित किया गया था। यह घोषणा 15 जुलाई 2007 में हुई थी, हालांकि अब हालात एेसे नहीं हैं। मैं अभी चंडीगढ़ में खोया हुआ था कि भानजे ने अचानक कार को ब्रेक लगाए। शायद हमारा पहला स्थान मतलब सुखना झील आ चुकी थी।
क्रमश: .....

चंडीगढ़ यात्रा-5

संस्मरण
भतीजे व भानजे के साथ कार में बैठते ही तय हो गया था पहले सुखना झील, फिर रॉक गार्डन तथा बाद में रोज गार्डन देखा जाएगा। घर से निकले तब बादल छंट चुके थे और तीखी धूप निकली हुई थी। चंडीगढ़ को नजदीक से देखने की उत्सुकता बढती जा रही थी। वैसे सन 2000 में भोपाल में पत्रकारिता के प्रशिक्षण के बाद मुझे चंडीगढ़ भेजा जा रहा था लेकिन तब मैंने मना कर दिया था। आखिरकार 18 साल बाद चंडीगढ़ जाने का मौका आ ही गया। चंडीगढ़ इतना खूबसूरत शहर है कि इसको लेकर खूब गीत भी लिखे गए हैं। बताते हैं पंजाबी में चंडीगढ़ में खूब गाने हैं। वैसे पंजाब का शायद ही कोई शहर होगा जिस पर गीत न लिखे गए हों। गानों की बात चली तो सबसे पहले एक हरियाणवी गीत याद आता है। तेरी कोठी मैं बणवा दूं, चंडीगढ़ शहर में छोरी... इसी गीत के बाद दूसरा गीत आया, बदली-बदली लागै, इब के खावण लागी, तेरे चढग्या रंग कसूता के चंडीगढ़ जावण लागी.. इन दोनों गीतों ने जबरदस्त धूप मचा रखी है। शायद ही कोई शादी समारोह होगा जहां डीजे पर इन गीतों को न सुना जाता हो। एक पंजाबी गीत भी इन दिनों खूब प्रचलन में हैं। इसमें भी चंडीगढ़ का जिक्र होता है। गाने के बोल हैं तैनू काला चश्मा जचता एे..। खैर, अब बात थोड़ी चंडीगढ़ शहर की कर ली जाए। वास्तुकला व डिजाइन के लिए चंडीगढ़ को समूची दुनिया में जाना जाता है। चंडीगढ़ योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया भारत का पहला शहर है। यह भारत का सबसे आधुनिक व सफाई वाला शहर माना जाता है। अपनी सुंदरता व हरियाला के कारण चड़ीगढ़ को सिटी ब्यूटीफल भी कहा जाता है। चंडीगढ़ केन्द्र शासित प्रदेश भी है तथा पंजाब व हरियाणा की राजधानी है। इस कारण यहां नौकरीपेशा लोग खूब रहते हैं। यही कारण है कि चंडीगढ़ को पेंशनधारियों का घर या पेंशनभोगियों का स्वर्ग भी कहा जाता है। चंडीगढ़ के बारे में मैंने जितनी भी जानकारी जुटाई वह अपने आप में रोचक व रुचिकर लगी। मसलन, चंडीगढ़ को प्रसिद्ध फ्रांसीसी वास्तुकार ली कोर्बुजिए ने डिजाइन किया था। कोर्बुजिए ने चंडीगढ़ की अवधारणा मानव शहीर की तरह की है। इसमें सेक्टर कैपिटल काम्प्लेक्स एक हैड की तरह है तो सिटी सेंटर, सेक्टर 17 दिल। फेफड़ों के लिए खुले स्थान और हरियाली के लिए 7v तो मस्तिष्क के लिए शैक्षणिक संस्थानों के लिए जगह दी।
क्रमश: .....

चंडीगढ़ यात्रा-4

संस्मरण
जैसे ही बस ने लुधियाना को पार किया मैं फिर लेट गया लेकिन नींद नहीं आ रही थी। बस अपनी रफ्तार से दौड़े जा रही थी। मैं बीच-बीच में उठकर बाहर देख रहा था। पांच बजे के करीब भानजे का फोन आ गया लेकिन मैं उसको बताने की स्थिति में नहीं था कि कहां पहुंचा। बस का पर्दा हटाकर देखा तो बाहर बारिश हो रही थी। बादलों से आच्छादित आसमान और मनोहरी हरियाली देखकर मैं खुद को रोक नहीं पाया और मोबाइल निकालकर एफबी लाइव कर दिया। लंबे पेड़, हरियाली तो कभी ऊंची-ऊंची इमारतें। चावलों की खेत में भरा पानी। यह सब नजारे एफबी पर कैद होते गए। ऊंची इमारतों से आभास तो गया था कि बस चंडीगढ़ के आसपास उसकी सीमा में प्रवेश कर चुकी है। आखिरकार साढ़े पांच बजे के करीब बस मोहाली के एक पेट्रोल पंप पर रुकी और परिचालक ने संभवत: पहली बार आवाज लगाई। उसने कहां आखिरी स्टॉपेज आ चुका है सभी सवारियां उतर जाएं। दरअसल यह पेट्रोल पंप मोहाली के 43 नंबर बस स्टैंड के ठीक बगल में है। बस से उतरते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। सब मुझे उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे लेकिन मैं सबको चीरता हुआ सड़क किनारे आकर खड़ा हो गया। भानजे का फोन आ गया लेकिन वह बस स्टैंड के आसपास ही घूम रहा था। आखिर एक स्थानीय आदमी से बात करवाकर सही लोकेशन बताई तब वह वहां पहुंचा। आखिरकर बस स्टैंड से हम घर के लिए रवाना हुए। सुबह के छह बजने को थे, लिहाजा सड़कों पर यातायात बेहद कम था। एकदम चौड़ी और खाली सड़कें तथा उनके किनारों पर लगे कतारबद्ध पेड़ वाकई यह साबित कर रहे थे चंडीगढ़ को नियोजित शहर क्यों कहा जाता है। सड़कें भी एकदम चकाचक। बिलकुल साफ। कहीं कोई गंदगी नहीं। चौराहों पर कोई होर्डिंग्स या बैनर आदि का नामोनिशान तक नहीं। प्रत्येक चौराहे पर बड़े-बड़े सूचना पट्ट जरूर लगे हैं, जिन पर सेक्टर के नंबर और उनकी लोकेशन बताई गई है। चंडीगढ़ एक तरह से सेक्टरों का ही शहर है। यहां संकेतांकों पर किसी मोहल्ले या बस्ती का नाम दिखाई नहीं देता। दूसरी बात यह कि सड़कों के आसपास कोई मकान, बस्ती या दुकान आदि दिखाई नहीं देती। एेसा लगता है किसी सघन जंगल से गुजर रहे हों। हरियाली मुझे सदा ही लुभाती रही है, लिहाजा यह सब देखकर मैं बेहद उत्साहित था। साथ-साथ यह सब नजारे मैं एफबी लाइव के माध्यम से कैद भी कर रहा था। करीब पन्द्रह मिनट के सफर के बाद मैं भानजे के क्वार्टर पर था। नित्य कर्म से निवृत हुआ तब तक भतीजा सिद्धार्थ भी आ चुका था। हम तीनों ने नाश्ता किया और फिर निकल पड़े नियोजित शहर चंडीगढ़ को साक्षात देखने।
क्रमश:

चंडीगढ़ यात्रा-3

संस्मरण
बस स्टैंड से रवाना हो गई लेकिन मुझे चैन नहीं था। अपनी पीड़ा किसके समक्ष जाहिर करूं, बस बार-बार यही सोचता रहा। ट्रेवल्स एजेंसी के मालिक का पता किया। नाम तो बता दिया गया लेकिन मोबाइल नंबर नहीं मिले। बहुत प्रयास किया तो यह जानकारी में आया कि मालिक ट्रेवल्स एजेंसी खुद नहीं देखते। कोई तीसरी या चौथी पार्टी है जो यह काम देखती है। जानकारी यह भी सुनने में आई कि ट्रेवल्स एजेंसी के मालिक की जमीन पर आरटीओ कार्यालय बना हुआ है। खैर, मुझे जब और कोई रास्ता नहीं सूझा तो पुलिस के एक अधिकारी को फोन लगाया। चूंकि मैं गुस्से में था और आवेश में एजेंसी व आरटीओ के बारे में बोलता गया। मैंने कहा कि मैं कोई फ्री यात्रा नहीं करता, लेकिन सरकारी विभागों को यह एजेंसी वाले हर तरह से ऑब्लाइज्ड करते हैं। न केवल यात्रा फ्री करवाते हैं, बिलकुल सीट भी वीआईपी और रास्ते में बाराती जैसी आवभगत और करते हैं। मैं कहे जा रहा था और पुलिस अधिकारी सुने जा रहे थे। मैंने यहां तक कहा कि शाम को कमोबेश हर ट्रेवल्स एजेंसी की बसें बीच सड़क पर खड़ी रहती हैं। यातायात जाम रहता है। सड़कें संकरी हो जाती हैं, लेकिन न पुलिस बोलती है न कोई और। क्योंकि सबके मुंह बंद हैं। सब एहसानों से दबे हैं। कोई पैसे से तो कोई सेवा से। खैर, अपनी भड़ास मैं निकाल चुका था, पुलिस अधिकारी सिर्फ चैक करवाते हैं, दिखवाते हैं, समझा देंगे के अलावा और कुछ नहीं कह पा रहे थे। इस बातचीत में बस श्रीगंगानगर की सरहद से पार निकलकर लालगढ़ जाटान तक पहुंच चुकी थी।
खैर, इसके बाद दोस्तों से भी इसी घटनाक्रम को शेयर किया तो सभी ने मूड सही रखने और आराम से यात्रा करने की सलाह दी। रास्ते में बस एक जगह रोकी गई, वह कोई पेट्रोल पंप था। वैसे पता नहीं बस किस रुट से होकर जा रही थी लेकिन रास्ता खराब था। मैं अंदर स्लीपर में लेटा लेटा अपने आप ही इधर-इधर हो रहा था। बस में रात का सफर अक्सर किया है लेकिन इस तरह के असुविधा पहली बार हुई। संभवत: रास्ता सही नहीं होने के कारण एेसा हो रहा था। बाहर अंधेरा होने के कारण पता नहीं चल पा रहा था कि आखिर कौनसी जगह है। आखिरकार कई देर ताकने के बाद रोशनी दिखाई दी तो लगा कि कोई शहर आया है। संकेतांक व दुकानों के बाहर के बोर्ड पंजाबी में लिखे होने के कारण मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह शहर कौनसा है। आखिरकार एक जगह अंग्रेजी में लुधियाना लिखा देखा। लुधियाना से चंडीगढ़ करीब एक सौ पांच किलोमीटर पड़ता है।
क्रमश :

चंडीगढ़ यात्रा-2

संस्मरण
काउंटर पर बैठे युवक का रुखा सा जवाब सुनकर मेरा माथा ठनका। ऑनलाइन टिकट और उसके बताए अनुसार में पूरे पौन घंटे का अंतर था। मैं थोड़ा तल्ख होते हुए उससे फिर रूबरू हुआ और कहा कि यह आप लोगों का कोई तरीका नहीं है। बस जब रवाना हो तभी का टाइम देना चाहिए। यह तो समय पर पहुंचने वालों के साथ सरासर नाइंसाफी है। मेरी बात सुनकर वह युवक मंद-मंद मुस्कुराया और बोला, सवारियां समय पर नहीं आती हैं, उनके इंतजार में बस रोकनी पड़ती हैं क्या करें? लेकिन उसके जवाब से मुझे संतुष्टि नहीं मिली है। मैंने फिर पूछा और जो समय पर आ गया, उसके लिए यह सजा क्यों? आपको जब बस पौने दस ही चलानी है तो ऑनलाइन में टाइम भी पौने दस का ही दो ताकि किसी को असुविधा न हो। और कम से कम मेरे जैसे समय के पाबंद लोगों को परेशानी न हो। लेकिन मेरी बातों का उस पर कोई असर नहीं हुआ। कहने लगा यह तो ऑनलाइन वालों की गलती है। हमने थोड़े ही आपको टिकट दी है। इस बार जवाब सुनकर मुझे भी गुस्सा आ गया, मैंने कहा ऑनलाइन वाले क्या अपनी मर्जी से समय डालते हैं। आप लोगों ने उनसे करार किया होगा, तभी समय बताया होगा। अब उसके पास कोई जवाब नहीं था, मुझे यह बात बेहद नागवार गुजरी। मैंने प्राइवेट बस एसोसिएशन के एक पदाधिकारी से बात की। उसका भी यही कहना था कि वो उनको समझा देगा,क्ष आप नाराज न हो। मुझे लगा यह भी कोई संतोषप्रद जवाब नहीं है। इसके बाद मैंने जिला परिवहन कार्यालय के किसी हेतराम से बात की। यह सज्जन तो और भी बड़े वाले निकले। मैंने जब उनको सारा वृतांत सुनाया तो उल्टे मेरे हो ही नसीहत देने लगे। कहने लगे इंडिया में क्या सारे लोग समय के पाबंद हैं और आपके अकेले के सुधरने के कौनसा इंडिया सुधर जाएगा। सच में मुझे अधिकारी के इस तरह के जवाब से बेहद गुस्सा आया। इसके बाद अधिकारी ने कहा कि आप काउंटर पर बैठे युवक से बात करवाओ, तो मैंने कहा कि आपको सब पता है। बात करनी है तो आप कीजिए, मैं अपने फोन से न आज करवाऊं न कल करवाऊं। खैर, इस सारे घटनाक्रम के बीच 9.20 हो चुके थे। कतार में खड़ी तीन मेें से दो बसें रवाना हो चुकी थी। मैं भी सीट पर जाकर बैठ गया। सीट पर बैठे -बैठे 9.25 पर खुद का एक वीडियो भी बनाया। मैं वीडियो बनाकर रुका ही था कि एक युवक मेरे पास आया और कहने लगा महेन्द्र शेखावत आप ही हैं क्या? कृपया आप डबल स्लीपर में आ जाइए। मैंने कहा क्यों, मेरा टिकट सिंगल स्लीपर का है, डबल में क्यों आ जाऊं? मेरे को यहां कोई परेशानी नहीं है? और मेरा स्लीपर भी यही है। दूसरी बात मेरी बहस सीट को लेकर नहीं है समय को लेकर है। मेरी बात सुनकर युवक ने अपनी बात पलटी और कहने लगा भाईसाहब हमारी बस का समय सवा नौ बजे का है। इतना तो ऊपर नीचे हो ही जाता है। इतना कहकर वह नीचे चला गया। बगल में डबल स्लीपर में अधेड़ दंपती सोया था। वहां से पुरुष की आवाज आई भाईसाहब हमने भी ऑनलाइन बुकिंग करवाई थी। हम भी नौ बजे के बैठे हैं। खैर, ठीक 9.34 पर बस रवाना हुई।
क्रमश: .....