Wednesday, January 15, 2014

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-27

 
तभी तो सड़क पर जगह-जगह पान की पीक थूकी हुई थी। एक तरह सड़क लाल हो रखी थी। ऐसे में हमको कदम बचा-बचाकर रखने पड़ रहे थे। मंदिर के आगे पहुंचकर जूते जमा करवाए और पानी के बीच से होकर मंदिर में प्रवेश किया। मोबाइल इस बार पर्स में रखे लेकिन सुरक्षाकर्मी ने जांच के नाम पर पकड़ लिया। पहले बच्चों की जेब में डाल रहे थे। ऐसा कर लेते तो शायद कोई चैक नहीं करता है। खैर, दुकान पर फिर वापस आए और मोबाइल जमा करवाने के बाद प्रवेश किया। इस बार भी हम लोगों ने मंदिर के बायीं ओर से प्रवेश किया। मंदिर परिसर के अंदर मुख्य मंदिर के अलावा छोटे-छोटे कई मंदिर हैं और उन सब में पण्डे बैठे थे। इन छोटे मंदिरों के बाहर भी पण्डे मंडरा रहे थे। जिज्ञासावश कोई इन छोटे मंदिरों को देखने के लिए रुका तो झट से पण्डा दौड़ कर आपके पास आएगा, कहेगा दर्शन करो.. दर्शन करो..। हम तो सब को अनसुना करते हुए आगे बढ़ रहे थे। एक पूरा चक्कर लगाने के बाद हम मंदिर के दाहिनी तरफ आए। लम्बी लाइन लगी थी। लोग इतने सट के खड़े थे कि तिल भी डालो तो नीचे नहीं गिरे। लाइन के लिए वर्गीकरण नहीं किया गया था। मतलब महिला, पुरुष, बच्चे-बुजुर्ग सभी एक लाइन में लगे थे। इनके लिए अलग लाइन के लिए व्यवस्था करे भी तो कौन? सभी निशुल्क प्रवेश वाले जो होते हैं। इसलिए भीड़ में धक्के खाने की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी। भीड़ को देखकर धर्मपत्नी का धैर्य जवाब दे गया था। बोली मैं तो बच्चों को लेकर बाहर ही बैठी हूं, आप दर्शन कर आओ। खैर, हम लाइन में लगे। करीब बीस मिनट तक धकमपेल चलती रही और हम आगे बढ़ते रहे। आखिरकार हम मंदिर में प्रवेश कर गए। मैं और गोपाल जी एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे, मानों हमने कोई तीर मार लिया हो। अंदर फिर एक लाइन थी। जगन्नाथ प्रभु को थोड़ा और नजदीक से देखने की। हमको तो वहीं से दर्शन हो गए। वहां भी एक पण्डे ने आकर आग्रह किया। बोला, एकदम नजदीक से दर्शन करा दूंगा, केवल बीस रुपए लूंगा। हम चुप्प थे। हमारा मूड भांपकर वह मुंह बनाता हुआ वहां से चला गया। दर्शन कर हम वापस लौटे तो मंदिर के दीवार पर पान की पीक थूकी हुई दिखाई दी।
बहुत बुरा लगा यह देखकर. मन ही मन बुदबुदाया, हे प्रभु तेरे ये भक्त कितने नासमझ हैं, जो ऐसा करते हैं। हम बाहर निकले तो एक पण्डा मोबाइल पर बतियाता हुआ दिखाई दिया। मन में फिर वही भाव आया.। भक्तों में भेदभाव का। आम आदमी के लिए मोबाइल की अनुमति नहीं है, लेकिन पण्डे ऐसा कर सकते हैं। मन में फिर सवालों का सैलाब उडऩा स्वाभाविक था। मन ही मन कहने लगा, प्रभु यह सब करने के लिए आपने तो नहीं होगा। यह व्यवस्था, यह छूट का प्रावधान किसने बनाया। ऐसा करो, ऐसा मत करो.. ऐसा तो आप नहीं कह सकते प्रभु। सवालों का मेरे पास कोई हल नहीं था। वे अबूझ पहेली हैं। मेरी लिए नहीं, उन सबके लिए जिनको यह व्यवस्था अखरती है। वैसे मंदिर की शिल्पकला कमाल की है। ऐसे में कोणार्क मंदिर की याद फिर याद गई। ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-26

 
मौसम वाकई सर्द था, ऐसे में मेरी हिम्मत पानी में घुसने की नहीं हो रही थी। वैसे मेरे को फोटोग्राफी करने में ही आनंद आ रहा था। सूर्योदय होने ही वाला था, लेकिन इससे पहले ही बीच पर चहल-पहल बढ़ गई थी। हल्की सी कंपकंपी छूटने लगी थी। कभी कैमरे को जेब में डालकर दोनों हाथों को परस्पर रगडऩे का उपक्रम करता तो कभी तेजी से चहलकदमी। वैसे इतनी भी सर्दी नहीं थी कि सहन नहीं की जाए चूंकि मैं पानी में नहीं था, नहीं तो सर्दी नहीं लगती। बच्चे मस्ती करने में मशगूल थे। बादलों के बीच सूर्यदेव हल्के से झांके तो मैंने नजारा कैमरे में कैद कर लिया। वाकई समुद्र के किनारे सूर्योदय का नजारा बड़ा ही मनोहारी होता है। बच्चे और खेलना चाह रहे थे लेकिन वक्त इजाजत नहीं दे रहा था। मैंने जोर से आवाज लगाई तो छोटा बेटा एकलव्य बाहर आया। बाहर आते ही वह कांपने लगा था। वैसे नहाते-नहाते उसके होठ नीले हो चुके थे लेकिन वह लोभ संवरण नहीं कर पा रहा था और सर्दी को बर्दाश्त करते हुए नहा रहा था। खैर, बाहर आते ही उसको गर्म कपड़ा ओढ़ाया और एक कप चाय पिलाई तो वह थोड़ा सामान्य हुआ। इसके बाद एक-एक करके सब बाहर आ गए और तत्काल होटल की तरफ दौड़े। होटल में सभी ने बारी-बारी से स्नान किया। तैयार होकर नीचे आए। होटल वाले का हिसाब किया और इसके बाद राजू से रेलवे स्टेशन छोडऩे के लिए कहा। वैसे तय कर लिया गया था कि सामान रेलवे के लैगेज रूम में जमा करवाकर दिन भर पुरी के शेष रहे मंदिरों के दर्शन करेंगे। स्टेशन पहुंचे तो राजू ने कहा कि उसका एक किराया आ गया है, सामान जमा करवा दो और फोन कर देना, वह लौट आएगा। हमने स्टेशन के लैगेज रूम में सामान जमा करवाया। वहां बताया गया कि सभी सामान के ताला होना चाहिए, तभी सामान जमा होगा। मैं तत्काल स्टेशन से एक दुकान से छोटे तीन ताले खरीद लाया। इसके बाद सामान की तरफ से निश्चिंत होकर हम केन्टीन पहुंचे। भर पेट नाश्ता करने के बाद स्टेशन से बाहर निकले।
अब हमने राजू को फोन करने के बजाय वहीं स्टेशन के आगे खड़े ऑटो वाले से जगन्नाथ मंदिर के पास छोडऩे के लिए कहा। उसने किराया पचास रुपए बताया तो हम चौंक गए। हमें राजू की शराफत पर संदेह होने लगा था। भोली सी सूरत बनाकर करीब दिन तीन वह हमारे साथ रहा था और उसने जैसा किराया मांगा वह दिया.. उसके बातचीत के अंदाज पर। खैर, यहां सबक यही मिला कि किसी की सूरत या बातचीत से प्रभावित हुए बिना दो तीन जगह और मोलभाव करने में कोई हर्ज नहीं है। हमने उसी ऑटो से पुरी शहर के सभी मंदिर दिखाने का किराया पूछा तो उसने 450 रुपए बताए। हमने उससे ज्यादा मोलभाव नहीं किया और मंदिर आ गए। वास्तव में किसी जगह की हकीकत देखनी हो तो दिन में ही जाना चाहिए। मंदिर के बाहर तो जो चौड़ा मार्ग है, इस पर कतार से दीन-हीन व निशक्त भिखारी बैठे थे। यह आलम सड़क के दोनों तरफ था। पुरी के पण्डे ही नहीं आम लोग भी पान खाने के शौकीन कुछ ज्यादा ही हैं। .... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-25

 
राजू को कह दिया था कि किसी भोजन की दुकान के पास ऑटो को रोक दे। शहर के बीचोबीच राजू ने ऑटो रोक दिया। इसके बाद हमने भोजन पैक करवाया और होटल के लिए रवाना हो गए। होटल पहुंचने के बाद राजू को अगले दिन सुबह रेलवे स्टेशन छोडऩे की कहकर हम अपने कमरों की तरफ बढ़ गए।
जेहन में अब भी चिलका ही घूम रही थी। वैसे चिलका भारत की सबसे बड़ी एवं विश्व की दूसरी बड़ी झील है। यह 70 किलोमीटर लम्बी और 30 किलोमीटर चौड़ी है। यह कुल 11 सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। दरअसल चिलका समुद्र का ही हिस्सा है लेकिन महानदी के द्वारा लाई मिट्टी के कारण यह समुद्र से अलग हो गई है। चिलका में अनेक छोटे-छोटे द्वीप हैं, जो बेहद खूबसूरत है। चिलका मछली पकडऩे का भी बड़ा केन्द्र है। यहां मछलियों की करीब 225 प्रजातियां पाई जाती हैं। सर्दी के मौसम में यहां विदेशी पक्षी लाखों की संख्या में प्रवास करने आते हैं। थोड़ी सी जानकारी जुटाई तो पता चला कि चिलका के तट पर मछुआरों के करीब 145 गांव हैं। इन गांवों में लगभग ढाई लाख मछुआरे निवासरत हैं। सूर्योदय होने के साथ ही यहां हजारों की संख्या में मछुआरे चिलका में प्रवेश करते हैं। वैसे चिलका में हर साल रिकार्डतोड़ मछली उत्पादन होता है। बताया गया है कि चिलका
झील छोटी-बड़ी करीब 52 नदियों का जल अपने में समेटे हुए हैं। खास बात यह है कि चिलका मीठे पानी की झील है। समुद्र की तरफ वाला पानी जरूर नमकीन है।
इधर, होटल में भोजन करने के बाद सोने का उपक्रम करने लगे, चूंकि क्रिसमिस का दिन था, इसलिए बड़ी संख्या में पहुंचे पर्यटक न केवल हो हल्ला कर रहे थे बल्कि पटाखों एवं आतिशबाजी का लुत्फ भी उठा रहे थे। देर रात पटाखों का शोरगुल होता रहा लेकिन हम लोग थकान से इतने चूर थे कि कब आंख लगी पता ही नहीं चला। होटल वाले को रात को ही बोल दिया था कि चेक आउट सुबह आठ की बजाय साढ़े नौ बजे तक करेंगे। बड़ी मुश्किल से वह तैयार हुआ था। खैर, सुबह फिर जल्दी उठकर पहले तो सारे बिखरे सामान व कपड़ों को व्यवस्थित किया। सिर्फ जरूरत वाले कपड़े ही ऊपर रखे, बाकी सामान व्यवस्थित करके जमा दिया ताकि लौटने पर होटल जल्दी से खाली किया जा सके। सामान जमाने के बाद हम होटल से निकले। बच्चे तो जैसे इंतजार में ही थे। दौड़ते हुए समुद्र तक पहुंचे और घुस गए पानी में। बादलवाही होने एवं हल्की हवा चलने के कारण पिछले दो दिनों के मुकाबले इस दिन कुछ ज्यादा सर्दी थे, लेकिन बच्चों के हौसले के आगे वह हार गई थी। धर्मपत्नी भी तैयारी के साथ गई थी लिहाजा वह भी लहरों से अठखेलियां करने लगी, हालांकि वह ज्यादा अंदर तक नहीं गई। इधर गोपाल जी, आज पूरे रंग में थे। अपनी धर्मपत्नी के साथ वे करीब तीस-फीट अंदर तक चले गए थे। मैं बाहर खड़ा उनको कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रहा था कि लेकिन दूरी ज्यादा थी, लिहाजा जूम करके फोटो खींचने पड़े। ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-24

 
पछतावा था लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता है। उस काजू वाले को पता नहीं क्या-क्या उपमाए दी जा रही थी। कुछ बोलकर तो कुछ अंदर ही अंदर। वैसे अंदर ही अंदर कोसने वाली उपमाएं ज्यादा थीं, क्योंकि मामला ही ऐसा ही था कि हर किसी के साथ साझा भी नहीं किया जा सकता था। बच्चे और हम सब काजू खा रहे थे। इस दौरान बीच-बीच में चेहरों पर आती मुस्कान से समझा जा सकता था कि इसमें वास्तविकता ना होकर बनावटीपन ज्यादा है। खैर, नाव एक अन्य द्वीप की तरफ तेजी से बढ़ी जा रही थी। सूरज अस्त होने की तैयारी में था। मैंने दो चार नाव में बैठे-बैठे ही खींचे। किसी ने बताया कि चिलका के द्वीपों पर सूर्योदय एवं सूर्यास्त का नजारा बड़ा मनोहारी व रमणीक होता है। नाविक ने नाव द्वीप के किनारे पर रोकते कहा कि चाय-पानी पी लीजिए.. यहां आधा घंटा रुकेंगे। हम नाव से उतरकर पास में बनी एक चाय की दुकान पर आए। बड़ों ने चाय पी तो बच्चों ने दूध के लिए स्वीकृति दी। आखिरकार उनको दूध दिलाया गया। चारों बच्चों ने दूध की बोतलों को चीयर्स वाले अंदाज में टकराया और लगे पीने। शायद बच्चों ने वहीं बगल में बैठे युवाओं के उस समूह को देख लिया था, जो बीयर पीने के साथ झींगा खा रहे थे। बताया गया कि चिलका में पाए जाने वाले झींगा बड़े स्वादिष्ट होते हैं। यह मैं दूसरे से सुनी हुई बता रहा हूं.. क्योंकि मैं शाहाकारी हूं, पिछले 14 साल से। खैर, चाय-पानी होने के बाद हम नाव की तरफ बढऩे लगे। सूरज लगभग अस्त हो चुका था। उसका रंग सुनहरे से अब सुर्ख गुलाबी हो चुका था। तट पर पहुंचते-पहुंचते शाम हो गई थी। ऑटो वाला राजू वहीं खड़ा हमारा इंतजार कर रहा था। हम तेजी से ऑटो की तरफ बढ़े और तत्काल पुरी के लिए रवाना हो गए। वापसी में ग्रामीण क्षेत्रों में एक बात देखी.. बड़ी संख्या में लोग स्नान करने में व्यस्त थे। इनमें महिलाएं भी शामिल थी। शाम के समय स्नान को लेकर विचार आया शायद कृषक परिवार रहे होंगे...। दिन भर काम करने के बाद घर लौटे होंगे, इसलिए नहा रहे हैं। अपने तर्क से संतुष्ट न होकर फिर दुबारा सोचा शायद शाम को ग्रामीण क्षेत्रों में नहाने की कोई परम्परा होगी। लेकिन वास्तविक कारण क्या है नहीं जान पाया। वैसे छत्तीसगढ़ और ओडिशा में तालाबों पर महिलाओं एवं पुरुषों का सामूहिक स्नान आम बात है। इतना जरूर है कि महिलाओं एवं पुरुषों के लिए अलग-अलग स्थान तय हैं लेकिन नहाने व कपड़े धोने का काम तालाबों में ही होता है। तालाबों का यही पानी निस्तारी के लिए भी उपयोग किया जाता है। कहने का आशय है कि एक ही तालाब कई तरह की जरूरतों को पूरा कर देता है। चलते-चलते अंधेरा हो चुका था। वाहनों की रोशनी से आंखें चुंधिया रही थी। मेरी नजर किलोमीटर दर्शाने वाले पत्थरों पर लगी थी। हम जल्दी से जल्दी से पुरी पहुंचना चाह रहे थे। सुबह जल्दी निकले थे और दिन भर के सफर के कारण थककर हालत
खराब हो चली थी। आखिरकार रात के पौने नौ बजे हमने पुरी की सरहद में प्रवेश किया। ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ

पुरी से लौटकर-23
 
झील में तैर रहे जरीकेन, कचरे आदि को मजाक में हम डॉलफिन कह कहकर आपस में एक दूसरे का मजा लेने में जुटे थे। आखिरकार हमारी नाव भी उन नावों के पास पहुंच गई। बताया गया कि यहां तो डॉलफिन शर्तिया दिखाई देगी। हम और सतर्क और एकाग्र होकर झील की तरफ आंखें फाडऩे लगे। अचानक पानी में थोड़ी सी हलचल हुई और डॉलफिन का मामूली सा हिस्सा नजर आया। हम सब चिल्लाए, दिख गई, वो रही। यह सब पलक झपकते ही हुआ। ऐसे में फोटो लेने की तो आप सोच ही नहीं सकते। हां वीडियो फिल्म बना रहे हैं तो जरूर कुछ हिस्सा दिख सकता है। हम फिर भी रुके रहे शायद डॉलफिन उछले लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डॉलफिन की बेरुखी से यहां आने वाली की उम्मीद एवं उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। नाव वाले ने तीन चार गोल घेरे में चक्कर लगाए लेकिन बात नहीं बनी। बच्चों के चेहरों से उत्साह गायब हो गया। वे उदास, हताश व निराश हो चुके थे। दरअसल, यहां नौका विहार का आनंद वो लोग ही ले पाते हैं जो खाने-पीने का सारा कार्यक्रम नाव के अंदर ही करते हैं। मैंने बगल से गुजरती से कई नावों में यह नजारा देखा। कई तो ऐसे भी जो दुनिया से बेखबर होकर बेसुध सोए थे। कुछ लोगों के हाव-भाव एवं चेहरे यह चुगली कर रहे थे, कि जरूर वे, दूसरे पहलू या दूसरी दुनिया के सैर पर जाने का पूरा प्रबंध करके निकले हैं।
डॉलफिन की उम्मीदानुसार झलक ना पाकर सभी निराश थे। सूर्यदेव भी बड़ी तेजी के साथ छिपने को आतुर थे। अचानक खामोश टूटी और पछतावे से मिश्रित हंसी गूंजी। मैंने झील से ध्यान हटाकर देखा तो, गोपाल जी, एक काजू की थैली खोल रहे थे। कहने लगे, बन्ना जी, काफी देर हो गई कुछ टाइम पास ही कर लें। काजू देखकर मैं चौंका अरे.. आपने यह कब ले लिए..। कहने लगे जब हम कोर्णाक मंदिर से ऑटो की तरफ आ रहे थे तब आप आगे आ आए और हमने काजू खरीद लिए। मैंने सवालिया दृष्टि से धर्मपत्नी की तरफ देखा. शायद वह मेरा इशारा समझ गई थी। बिना कुछ कहे ही उसने सिर हिला दिया, जैसे उसने मेरी और मैंने उसकी भाषा समझ ली हो। अचानक एक साथ एक शब्द गूंजा.. धोखा.. मैंने कहा होना ही था। गोपाल जी, बोले बन्ना जी आज तो खरीददारी महंगी पड़ गई। काजू वाले ने धोखाधड़ी कर ली। अच्छे काजू दिखाकर खराब काजू दे दिए। उनका जवाब सुनकर मैं सिर्फ इतना ही कह पाया कि मैंने तो पहले ही मना किया था। खैर, काजू वाकई खराब थे। एक किलो के पैकेट में मुश्किल से कोई पावभर काजू ठीक होंगे, बाकी काले एवं छोटे-छोटे टुकड़ों में थे। हमारी धर्मपत्नी ने डेढ़ किलो ही लिए थे, लेकिन गोपाल जी ने तो बड़ी मात्रा में खरीद लिए थे। इसी चक्कर में खरीदे कि ओडिशा में काजू खूब होता है, इसलिए सस्ता मिलता है। इधर भिलाई में काजू पांच सौ रुपए प्रति किलो से ऊपर मिलता है लेकिन वहां उन्होंने इसको आधी कीमत पर खरीदा, नतीजा सबके सामने था। सब के मन में व लबों पर ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-22

 
वही प्रक्रिया दोहराई, लेकिन इस बार भी कुछ नहीं निकला। वह लगातार सीप के बारे में बताता जा रहा था। यही कि स्वाति नक्षत्र में बूंद जब सीप के अंदर जाती है तो वह मोती बन जाती है,लेकिन हर सीप में मोती मिलना संभव नहीं है। यह बहुत दुर्लभ चीज होती है। मोती दो तरह के होते हैं। एक चमकीला तो दूसरा काला। वह लगातार बोले ही जा रहा था, इस बीच उसका करतब भी जारी था। अचानक एक सीप को उसने तोड़ा और सीप के अंदर निकले गाढ़े पानी से मोती चमक उठा। उसने मोती दिखाया और इसके बाद नाव के लकड़ी के फट्टे पर रखकर एक दूसरा फट्टा उठाया और तीन-चार बार जोर से मारा। मोती का कुछ नहीं बिगड़ा, अलबत्ता लकड़ी के फट्टे पर निशान बन गया। वैसे फट्टे पर काफी निशान थे, जो यह बता रहे थे कि मोती का खेल यहां कई बार दिखाया जा चुका है। फट्टे से मोती उठाकर वह बोला.. जो मोती ओरिजनल होता है, वह टूटता नहीं है। यही उसकी पहचान होती है। इतना कुछ करने के बाद वह मुख्य मुद्दे पर आया.. कहने लगा कि बाहर शोरूम से यही मोती खरीदेंगे तो काफी महंगा पड़ेगा। यहां पर आपको काफी सस्ता पड़ जाएगा। दरअसल, पहले दो सीपों को तोड़कर उनको खाली दिखाना और इसके बाद यकायक एक सीप से मोती निकाल कर दिखा देना, उसकी कलाकारी थी। दिन में पांच-सात ग्राहक भी फंस गए तो मान लो उसने बड़ा मैदान मार लिया। करीब पन्द्रह मिनट के इस घटनाक्रम के बाद नाविक ने दुबारा जनेरटर स्टार्ट किया और नाव पूरी गति के साथ दौड़ा दी..।
इस बार हम डॉलफिन वाले क्षेत्र के लिए रवाना हुए थे। वैसे चिलका में विरल प्रजाति की इरावाड़ी डॉलफिन पाई जाती हैं। नाव तेजी से दौड़े जा रही थी। इतनी रफ्तार से कि हमारी नाव ने रास्ते में कई दूसरी नावों को ओवरटेक भी किया। करीब डेढ़ घंटे का सफर हो चुका था। हर तरफ पानी ही पानी और नाव ही नाव। सभी की उत्सुकता डॉलफिन देखने में ही थी। पुरी के होटलों में भी चिलका झील का प्रचार डॉलफिन के नाम से ही ज्यादा है। वैसे भी यहां आने वाले अधिकतर पर्यटक नौकाविहार करने कम बल्कि डॉलफिन देखने ज्यादा आते हैं। यह बात दीगर है कि डॉलफिन के लिए नौकाविहार करना पड़ता है। आखिर दूर हमको कुछ नाव पानी के बीच रुकी हुई दिखाई दी। बच्चे खुशी से चहक उठे। हम सब की टकटकी अब पानी पर ही लगी थी। पता नहीं कब कहां डॉलफिन दिखाई दे जाए। मेरे मन में अमिताभ बच्चन की अजूबा फिल्म की डॉलफिन की हल्की सी याद थी। मैं भी वैसी ही कल्पना लगाए बैठा था। वैसे चिलका झील की डॉलफिन कोई प्रशिक्षत नहीं है। यह उन डॉलफिन जैसे भी नहीं है, जैसी हम टीवी या फिल्मों में देखते हैं। यह डॉलफिन पालतू भी नहीं है, लिहाजा मानवीय दखल उसको पसंद नहीं है। वह न तो प्रशिक्षित डॉलफिन की तरह ऊपर उठती है और ना ही पास आती है। बच्चों को धैर्य जवाब दे रहा था कि लेकिन डॉलफिन का कहीं नामोनिशान तक नहीं था।...... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-21

 
उसके फूले हुए नथूने इस बात की गवाही दे रहे थे। होटल से हम सीधे नारियल वाले के पास पहुंचे और नारियल पानी पीया। मैंने भी यहां इस यात्रा में पहली बार नारियल लेकर पानी पीया था। इतने में राजू हमारे पास आया बोला.. साहब चलो कुछ रियायत करवा देता हूं। हमने कहा कि नहीं अब रियायत नहीं करवानी..ढाई बज गए हैं। लौटते-लौटते ही पांच बज जाएंगे, इसलिए आप तो ऐसा करो कि अब यहां से चलो, लेकिन राजू जिद पर अड़ा रहा। उस वक्त मैं यही सोच रहा था कि 1850 रुपए प्रत्येक परिवार के हैं और नियम भी है लेकिन काउंटर वाला हम सब को एक ही परिवार नहीं मान रहा। मुश्किल से दो घंटे के नौकाविहार के लिए 1850 रुपए देना मेरा दिल गवारा नहीं कर रहा था। अचानक गोपाल जी ने बताया कि बन्ना जी, 1850 तो हम सभी के हैं। खैर, मोलभाव अपने चरम पर था। काउंटर वाला नियमों का हवाला देकर तथा ठेकेदार के डर से मोलभाव से डर रहा था। आखिरकार राजू ने मध्यस्थता करते हुए अप्रत्याशित रूप से मामला 13 सौ रुपए में तय करवा दिया। हमने भी नौकाविहार के तय रूट में कुछ कटौती कर दी थी। दरअसल राजू का गांव भी चिलका झील के पास ही था। इसलिए वहां अधिकतर लोग उसकी जान-पहचान के थे। यहां से टिकट लेने के बाद हम नाव रवानगी वाले स्थान पर पहुंचे। वहां दो चरणों में टिकट को चैक करवाने के बाद हमको नाव का नम्बर दिया गया। संतुलन बनाए रखने के लिए नाव वाले ने अपने हिसाब से हमको बिठाया। जनरेटर में एक जरीकेन तेल डालने के बाद उसने उसे स्टार्ट किया। बच्चे रोमांच से चिल्ला रहे थे। धीरे-धीरे में हम उस जगह पहुंच गए जहां सिर्फ पानी ही पानी था। धरती का कहीं पर कोई छोर दिखाई नही दे रहा था। गोपाल जी ने तत्काल कैमरा निकाला और लगे क्लिक पर क्लिक करने। बीच-बीच में मैंने भी कुछ फोटोग्राफ्स खींचे। अचानक एक द्वीप दिखाई दिया..। मांझी ने नाव की दिशा उस तरफ मोड़ दी है और द्वीप के किनारे पर ले जाकर रोक दी। मैं जैसे ही नीचे उतरने के लिए आगे बढ़ा नाव वाले टोक दिया, बोला.. आप यहीं बैठिए.। सामने वाला नाव में ही आ जाएगा। इसके बाद एक व्यक्ति नाव में चढ़ा। उसके पास चाय के भगोने जैसा पात्र था, उसके ऊपर जाल लगा था। अंदर देखा तो लाल रंग का केकड़ा था। उसके छोटे-छोटे बच्चे भी थे। केकड़े को देख बच्चे बेहद उत्साहित हो रहे थे।
इसके बाद एक दूसरा युवक आया। पूछने लगा आप किस भाषा में जानने चाहेंगे। हमने जब हिन्दी के लिए अपनी सहमति दी तो वह टूटी-फूटी हिन्दी में हमको समझाने लगा। वह युवक सीप से भरा एक पात्र लेकर आया। वह हमको सीप से मोती निकालने की प्रक्रिया समझा रहा था। उसने भी पात्र हम सब के बीच में रखा और एक सीप उठाई, उसको तोड़ा तो अंदर से गाढ़ा पानी निकला। उसने सीप को दो भागों में विभक्त कर दिया लेकिन अंदर कुछ नहीं था। इसके बाद दूसरी सीप उठाई और फिर ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-20

 
बिलकुल ऊबड़-खाबड़ जगह। एक बार तो सोचा कि जब इतनी चर्चित जगह है तो सड़क इतनी खराब एवं गुमनाम सी क्यों है। सड़क भी सीधी नहीं थी बिलकुल सर्पिली हो गई टेढ़ी-मेढ़ी। अचानक पेड़ों से आच्छादित एक द्वीप आया। राजू ने ऑटो के ब्रेक लगाए..चिलका झील आ गई थी। दोपहर के दो बजने वाले थे। पहले सबसे पहले टिकट खिड़की की तरफ बढ़े। नौकाविहार का किराया पूछा। काउंटर पर बैठे शख्स ने तत्काल सूची निकालकर आगे कर दी। पूरे दिन नौका विहार करने के 3850 और चार घंटे के 1850 रुपए। हमारे पास न तो पूरा दिन था और ना ही चार घंटे, क्योंकि हम सूर्यास्त से पहले वापस पुरी पहुंचना चाह रहे थे। खैर, मारवाडिय़ों की तरफ हम भी मोलभाव करने लगे और काउंटर पर बैठे व्यक्ति से कहने लगे कि हमको तो सिर्फ दो घंटे ही नौका विहार करना है.. आप तो उसकी रेट बता दो, लेकिन उसने कह दिया कि यह आपकी मर्जी पर निर्भर नहीं है। किराया तो जितना है उतना ही लगेगा।
खैर, काउंटर वाले को पसीजता ना देख हमने तय किया कि पहले भोजन किया जाए। द्वीप पर आसपास नजर दौड़ाई लेकिन कहीं पर भी कोई उचित जगह दिखाई नहीं दी। आखिर हम लोग एक होटल की तरफ बढ़े और उसके बाहर लगी टेबल की तरफ बैठने ही वाले थे कि होटल वाला दौड़ता आया और बड़े से आदर-सत्कार से न केवल अंदर हॉल में ले गया बल्कि एक अलग से कमरे में हमको बैठा दिया। मैं गोपाल जी की तरफ देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। शायद वो मेरे मुस्कुराने की वजह का राज समझ गए थे, फिर भी पूछ बैठे, बन्ना जी.. क्या हो गया। मैंने कहा कि यह जो आदर सत्कार है ना उसके पीछे बड़ी उम्मीद छिपी हुई है, लेकिन जब उसकी उम्मीदों पर तुषारापात होगा तो उसके बाद का नजारा देखना..। जवाब सुनकर वो भी मुस्कुरा दिए।
हम ठीक से बैठे ही नहीं थी कि होटल वाला आ गया और बोला.. हां बताइए.. आप क्या लेंगे। हम एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। बड़े विचित्र हालात हो गए थे। आखिरकार उसको दो थाली लगाने के लिए कह दिया। दो का नाम सुनते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए। उम्मीद की मुस्कुराहट अब गौण हो गई थी। उसकी भौंहे टेढ़ी हो चुकी थी। अपना गुस्सा जाहिर ना करता हुआ वह तमतमाकर बाहर निकल गया। थोड़ा इंतजार करवाने के बाद वह दो थाली ले आया, लेकिन न तो चम्मच लाया और ना ही पानी। हमको भी उसकी मनोस्थिति का अंदाजा हो गया था। हमने एक थाली ऑटो चालक राजू के पास भिजवा दी जबकि एक को सभी के बीच में रख लिया। जब उससे चम्मच और पानी के लिए गिलास मांगा तो वह फट पड़ा, बोला एक गिलास व एक चम्मच ही दूंगा। हमने कहा जो देना है वह दे तो सही। आखिरकार भोजन करने के बाद हम एक बार फिर उसके काउंटर पर गए और उसे समझाया कि यह आपकी व्यवहार कुशलता नहीं है। इस तरह का व्यवहार करने से ग्राहक जुड़ते नहीं बल्कि बिदकते हैं। वह अब भी गुस्से में था। .... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-19

 
इसके बाद हम चिलका झील के लिए रवाना हो गए। रास्ते में कई गांव आए। हाल ही बस्तर जाकर आया था। वैसे भी ओडिशा और छत्तीसगढ़ पड़ोसी राज्य हैं, इसलिए दोनों की संस्कृति और पहनावे में समानता होना स्भाविक भी है। पुरुष केवल धोती (लूंगी) ही पहने हुए थे। अर्धनग्न। महिलाएं भी यहां अकेली साड़ी ही पहनती हैं, लेकिन उनका पहनावा इस प्रकार का होता है कि पूरा शरीर ढक जाता है। सबसे खास बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाएं पर साइकिलों घूमती हैं। शायद स्कूलों में बालिकाओं को साइकिल देने वाली योजना का कमाल है। बहुतायत में मकान कच्चे ही दिखाई दे रहे थे। रास्ते में एक दुकान दिखाई दी तो हमने ऑटो सड़क के बगल में रुकवाकर दोपहर का भोजन पैक करवा लिया। तय किया इसको चिलका पहुंचने के बाद ही ग्रहण किया जाएगा। इस रास्ते पर वाहनों की चहल-पहल ज्यादा थी। यह कोणार्क मार्ग के तरह सूना-सूना नहीं था।
बड़े वाहनों की आवाजाही भी खूब थी। ऑटो में 50 किलोमीटर की दूरी के सफर में बच्चों को परेशान होना लाजिमी था। बार-बार पूछ बैठते अब कितनी दूर और है, और हम उनको सिवाय यह कहने कि बस आने ही वाला है, दिलासा देते रहे। ऑटो अपनी रफ्तार से दौड़ा जा रहा था। अचानक सड़क के दोनों तरफ खेतों में पानी ही पानी दिखाई देने लगा। बीच-बीच में कहीं जमीन दिखाई दे रही थी। अचानक राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के रावतसर कस्बे व श्रीगंगानगर जिले के श्रीबिजयनगर की तस्वीर जेहन में आई। इन दोनों स्थानों को मैंने प्रत्यक्ष एवं कई बार देखा है। यहां का जलस्तर इतना ऊपर हो गया है कि पानी जमीन से भी ऊपर आ गया है। इसको वहां की स्थानीय भाषा में सेम कहते हैं। यह पानी इतना खराब व दूषित होता है कि पेड़ों पौधों का दुश्मन होता है। इस पानी की जद में आने से अधिकतर पेड़ सूख जाते हैं। आदमी भी अगर भूल से इसका सेवन कर ले तो हैपटाइटिस बी होने की आशंका रहती है। मैंने सोचा हो न हो यह सेम जैसी ही कोई समस्या है, लेकिन थोड़ा सा आगे चलने पर मैंने देखा कि पानी में कई हरे-भरे पेड़ खड़े हैं। खेतों में मछलियों के एक-दूसरे के खेत में जाने से रोकने के लिए जाल लगाए गए हैं। यह देखकर यकीन हुआ कि यह पानी दूषित नहीं हो सकता। होता तो पेड़ सुरक्षित नहीं बचते।
इतना ही मैंने यहां की भैंसों में एक अजीब ही तरह की खासियत देखी। ऐसी बात जो राजस्थान, हरियाणा या पंजाब में नहीं देखी। यहां की भैंस पानी के अंदर मुंह डालकर अंदर उगी वनस्पति खा रही थी। ठीक सूअर की तर्ज पर। मैं हतप्रभ था। सोच रहा था कि किस प्रकार प्रकृति के हिसाब जानवर भी अपने आप को ढाल लेते हैं। हालांकि भैंस पानी में ज्यादा देर तक मुंह नहीं रख पा रही थी लेकिन जितनी भी देर वे ऐसा कर रही थी हमारे लिए बिलकुल नया एवं अनोखा था। हम चिलका की तरफ बढ़े जा रहे थे। अचानक राजू ने मुख्य सड़क को छोड़कर एक टूटी-फूटी सड़क पर ऑटो को दौड़ा दिया। ...जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-18

 
चूंकि मैंने उनसे वापसी में कुछ दिलाने का वादा किया था, इसलिए सभी को एक-एक आईसक्रीम खिला दी। मैंने इसलिए नहीं खाई क्योंकि गले में संक्रमण था। अचानक बच्चों का ध्यान आइसक्रीम के रैपर पर गया, उस पर एक खरीदने पर एक मुफ्त लिखा था। गोपाल जी ने आइसक्रीम वाले का ध्यान दिलाया तो उसने आवाज देकर अपने दूसरे साथी को बुलाया। वह आते ही कहने लगा साब, यह स्कीम तो काफी पहले थी, अब बंद हो गई। हमने कहा कि स्कीम तो बंद हो गई, लेकिन आप आइसक्रीम तो स्कीम वाली ही बेच रहे हो। हमारे कहने का उस पर कोई असर नहीं हुआ। हम धीरे-धीरे ऑटो की तरफ लौटने लगे। मेरी हमेशा से ही तेज चलने की आदत रही है लेकिन बच्चे एवं धर्मपत्नी आराम से चहलकदमी और दुकान पर मोल-भाव करते हुए चल रहे थे। थकान से बदन दोहरा हो रहा था। सबसे बड़ा कारण तो रात को देर से सोना और सुबह उठना ही था। नींद जब तक पर्याप्त ना ले लूं.. कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। दोनों बच्चे व धर्मपत्नी के साथ गोपाल जी, उनकी धर्मपत्नी व बच्चे थे, लिहाजा मैं निश्चिंत था और तेजी से ऑटो तक पहुंचकर कुछ देर सुस्ता लेना चाहता था। ऑटो के पास पहुंचकर मैं करीब आधे घंटे तक खड़ा रहा लेकिन यह लोग पता नहीं कहां व्यस्त हो गए थे। आखिरकार, मैं बगल में ही एक चाय की दुकान पर गया। बिना वजह बैठने पर चायवाला टोक ना दे, इसलिए लगे हाथ उसको एक चाय का ऑर्डर भी दे दिया था। चाय खत्म ही होने वाली थी कि बड़ा बेटा योगराज आता दिखाई दिया। इसके बाद सभी एक लोग एक-एक करके आते गए। इसके बाद हम लोग ऑटो में सवार हुए। अगला पड़ाव चिलका झील था। कोणार्क से चिलका का सीधा रास्ता नहीं है वापस पुरी होकर ही जाना पड़ता है। ऐसे में हमारे को करीब 80-85 किलोमीटर की यात्रा करनी थी। अलसुबह अंधेरे की वजह से जो देख नहीं पाए थे वह अब स्पष्ट दिखाई दे रहा था। सड़क और समुद्र के बीच कई जगह टेंट लगे थे। पार्टियां एवं पिकनिक मनाने के लिए इधर आने वाले पूरे साजो-सामान के साथ ही आते हैं। खाने, पकाने के सामान के साथ। यही वजह है कि डिपोस्जल गिलास, थाली एवं पोलिथीन की थैलियां यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरी पड़ी थी। बड़ा अजीब सा लगा यह सब देखकर.। इसके लिए दोषी कोई एक-दो लोग नहीं बल्कि वे सभी हैं जो ऐसा करते हैं। आखिरकार लोगों ने शांत, सौम्य एवं शुद्ध जगह को भी प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रकृति से जमकर खिलवाड़ वाकई बहुत अखरा लेकिन सिवाय मन मसोसने के कोई चारा भी नहीं था। मैं प्राकृतिक नजारों को निहारने में इतना खोया था कि पुरी कब आ गया पता ही नहीं चला। जिस रास्ते से ऑटो वाले ने निकालने का प्रयास किया वहां जाम लगा था। समय यही कोई दोपहर के साढ़े बारह बज चुके थे। कुछ देर के लिए हम एक साइबर कैफे पर रुके। रेल के तत्काल कोटे से टिकट बुक कराने के लिए..। संयोग से अगले दिन के टिकट बुक हो गए थे। .. जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-17


वाकई पत्थरों की नक्काशी को शब्दों में बांधना बड़ा मुश्किल काम है। मंदिर को मध्यकाल के स्थापत्य की अद्वितीय वास्तुकला का केन्द्र माना जाता है। दुनिया भर में विख्यात इस सूर्य मंदिर का नक्शा एक रथ को केन्द्र में रखकर बनाया गया है। मंदिर के पत्थरों पर कई तरह की मिथुन मुद्राएं बनाई गई हैं। इसके अलावा युगल रति दृश्य भी उकेरे गए हैं। पत्थरों की नक्काशी में कला पक्ष का भी खासा ध्यान रखा गया है। यहां की दीवारों पर कई नर्तकियों एवं वाद्यवादकों को दिखाया गया है। मनुष्य जाति के अलावा हाथियों, वनस्पतियों, प्राकृतिक दृश्यों व जीव जंतुओं आदि को भी सुंदर तरीके से उकेरा गया है। इसके अलावा कोणार्क मंदिर का नाट्यमंडप भी अपने आप में अनूठा है। इस नृत्य मंडप में नृत्य करते हुए फोटो खिंचवाना हर नृतक/नृतकी का सपना रहता है। वैसे कोणार्क सूर्य उपासना का प्रधान पीठहै। पुरी से यहां पर समुद्र के किनारे होकर जाना पड़ता है। यहां से पुरी करीब 36 किमी है तो कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण उत्कल नरेश लांगुला नरसिंह देव ने कियाथा। 12 सौ शिल्पियों की कड़ी मेहनत से 12 साल के राजस्व खर्च से इस मंदिर का निर्माण कार्य सम्पन्न हुआ था। कोणार्क मंदिर में तीन आकृति के सूर्यदेवता है। मंदिर के दक्षिण की ओर सूर्य देवता को उदित सूर्य देव जिसकी ऊंचाई 8.3 फीट, पश्चिम की ओर को मध्यान्ह सूर्यजिसकी ऊंचाई 9.6 फीट और उत्तर की ओर सूर्य देव को अस्त सूर्य करते हैं। इसकी ऊंचाई 3.49 मीटर है। कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण एक रथ समान सूर्यदेव के लिए बनाया गया है। इसमें 24 पहिये (चक्र) हैं। हर पहिये में आठ आरा हैं और इनका व्यास 9.9 फीट है। सभी पहिये उत्कृट शिल्प कला से भरपूर हैं। मंदिर के दक्षिण की ओर अलंकार से भूषित दो भडकिला योद्धा घोड़े हैं। हर घोड़े की लम्बाई 10 फीट और चौड़ाई सात फीट है। इन घोड़ों को ओडिशा सरकार ने अपनी सरकारी मोहर के रूप में भी स्वीकार किया है। मंदिर की पूर्व दिशा में दो ऐश्वर्यपूर्ण सिंहों ने दो हाथियों को दबा रहा है। यह मुख्यद्वार है। इसकी लम्बाई 8.4 फीट, चौड़ाई 4.9 फीट, ऊंचाई 9.2 फीट और वजन 27.48 टन है। गौर करने लायक बात यह है कि यह कलाकृतियां एक पत्थर से बनाई गई है। बताया जाता है कि मंदिर में प्रयुक्त कोणार्क में नहीं मिलते, इनको बाहर से मंगवाया गया था। मंदिर की मूर्तियां लेहराइट, क्लोराइट व खोण्डोलाइट नामक पत्थरों से बनाई गई है। खैर, हम घूम फिर कर मुख्य मंदिर के सामने खड़े थे, तभी एक फोटोग्राफर फिर से आया और कहने लगा कि वह आपके कैमरे से मात्र पांच रुपए में फोटो खींच लेगा। दरअसल वह एंगल बनाने के नाम पर ही पैसे ले रहा था। हमारे कैमरे से हमारे फोटो खींचे और पैसे भी ले लिए। मंदिर की बगल में नवग्रह मंदिर बनाया गया है लेकिन मेरे को वह मंदिर प्राचीन नहीं लगा लिहाजा उसमें जाना उचित नहीं समझा। नवग्रह मंदिर के ठीक सामने एक आईसक्रीम वाला बच्चों को दिखाई दे दिया.। बस बच्चे तो लगे फिर मचलने... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-16

 
खिलौनों को देख कर बच्चों को मचलना स्वाभाविक था, लेकिन समझाने पर वे मान गए। लेकिन धर्मपत्नी, गोपाल जी एवं उनकी धर्मपत्नी एक काजू की दुकान पर रुक गए। ओडिशा में काजू उपेक्षाकृत सस्ता है। बस इसी सस्ते की मानसिकता ने उनको मोलभाव करने पर मजबूर कर दिया। दाल भात में मूसलचंद बनते हुए मैंने धर्मपत्नी को टोक दिया.. कि मैं काजू खाता ही नहीं हूं तो फिर क्यों ख्वामखाह ही खरीददारी की जा रही है, लेकिन वो मानने को तैयार ही नहीं.. बोली.. आप नहीं खाते तो क्या बच्चे तो खाते हैं। जवाब सुनकर मैं निरूतर था। अचानक सभी को पता नहीं क्या सूझी और सब बिना खरीददारी किए हुए आगे बढ़ गए। मैं मन ही मन अपनी पीठ थपथपा रहा था कि आखिर मेरे टोकने का असर हो गया। करीब आधा किलोमीटर दूर ही उतार दिया था ऑटो वाले, क्योंकि भीड़ भाड़ न हो इस लिहाज से पार्किंग की व्यवस्था वहीं कर दी गई थी। आगे बढ़े तो एक फोटोग्राफर बहुत सारी फाइल फोटो लिए हमारे साथ हो लिया.. और फोटो खिंचवाने का आग्रह करने लगा। हम उसको मना करते रहे लेकिन वह पीछा छोडऩे को तैयार ही नहीं। आखिरकार टिकट खिड़की आ गई। वहां से टिकट लेने के बाद हम आगे बढ़ गए।
जबरदस्त जन सैलाब उमड़ा हुआ था। भीड़ ज्यादा होने की प्रमुख वजह शीतकालीन अवकाश और साल का अंतिम सप्ताह भी था। अधिकतर लोग तो नए साल का जश्न मनाने के मकसद से ही पहुंचे थे। लाइन में लगकर हमने मंदिर परिसर में प्रवेश किया। पत्थरों पर गजब की नक्काशी। विशालयकाय पत्थरों को उकेरी गई कलाकृतियों को देख मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। तय नहीं कर पा रहा था कि क्या देखूं और क्या छोडूं। अंदर घुसते ही बच्चों का फोटो सेशन शुरू हो गया था। वह फोटोग्राफर अब भी हमारे साथ ही था। आखिरकार साथी गोपाल शर्मा ने उसको कह दिया। इसके बाद उसने बच्चों से कई तरह के एंगल बनवाए फिर ग्रुप फोटो भी खींचे। वैसे कोणार्क के फोटोग्राफरों का एक एंगल सर्वाधिक लोकप्रिय है। चाहे छोटे हों या बड़े,वे एक स्थान विशेष से हाथ की मुद्रा इस प्रकार से बनवाते हैं, जिससे आभास होता है कि मंदिर की शिखर को आपने अपने हाथ से पकड़ रखा है। दोनों बच्चों ने भी उसी अंदाज में फोटो खिंचवाया। इसके बाद बाकी सभी को नीचे छोड़ मैं मंदिर की सीढिय़ों से ऊपर चढ़ गया। चारों तरफ घूमकर बारिकी से हर जगह का अवलोकन किया। वैसे मंदिर बहुत ही भव्य एवं विशाल है लेकिन इसको बाहर से ही घूमकर देखा जाता है। अंदर जाने का रास्ता मुझे तो कोई दिखाई नहीं दिया। एक तरफ जीर्णोद्धार काम भी चल रहा था। उस तरफ पर्यटकों का जाना प्रतिबंधित था। सूर्य मंदिर के चारों तरफ हरियाली खूब है जो एक बड़े पार्क का आभास देती है और थके मांदे पर्यटकों को सुस्ताने के लिए सुकून भी। वैसे मंदिर शिल्प कला का बेजोड़ नमूना है। कोणार्क मंदिर में पत्थरों पर अद्भुत नक्काशी के बारे में रविन्द्रनाथ टेगौर ने भी कहा है कि कोणार्क में पत्थरों की भाषा मनुष्यों की भाषा से श्रेष्ठतर है। ... जारी है।

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पुरी से लौटकर-15

 
और कीमत केवल पांच रुपए कैसे..? चाय वाला बोला साहब.. मैं इसके आपसे सात या आठ रुपए भी वसूल सकता हूं लेकिन अगर ऐसा किया तो आप चाय की मात्रा में कटौती कर देंगे। मतलब छह की आठ में करवा लेंगे या दो की पांच में। पांच रुपए वाजिब कीमत है, इसलिए परिवार के सभी सदस्य कटौती न करवाकर पूरी चाय ही पीना चाहते हैं। वाकई चाय वाले का दर्शन भी गजब का था। उसकी इस शैली में हम खासे प्रभावित हुए। पकोड़े वगैरह भी उसी से पैक करवा लिए। झोपड़ी में बाकायदा बिजली वाला इनडेक्स चूल्हा भी लगाकर रखा था उसने। पकोड़े बनाने का काम स्टोव पर और चाय आदि को गरम करने में चूल्हे की मदद ली जा रही थी। करीब नौ बजने को आए थे। सूर्यदेव बादलों के बीच चुपके से झांके। अनायास ही नजर आसमान की तरफ गई और मोबाइल से नजारा कैद किया। चाय पीने के बाद बच्चे एक बार फिर बीच की तरफ दौडऩे लगे। बड़ी मुश्किल से उनको डांट-डपट कर ऑटो तक लाया। इस बीच तय हुआ कि सभी लोग नारियल का पानी पीएंगे। नारियल वालों की समझ भी गजब की होती है। वे नारियल देखकर ही बता देते हैं कि किस में केवल पानी है। किसमें मलाई में है और किस में अंदर से पकना शुरू हो गया है। हम में से किसी ने मलाई वाला नारियल लिया तो किसी ने केवल पानी वाला। सुबह-सुबह नारियल पानी पीने की मेरी इच्छा नहीं हुई, इसलिए मैंने पीने वालों को देखकर ही संतोष कर लिया।
इसके बाद हम लोग कोणार्क मंदिर की तरफ बढ़ गए। चंद्रभागा से कोणार्क मंदिर की दूरी यही कोई दो या तीन किलोमीटर ही होगी। सपाट एवं चिकनी सड़क के दोनों तरफ नारियल के पेड़ तथा वहां छाई हरितिमा एक अलग ही प्रकार की सुकून दे रही थी। कुछ लोग तो चंद्रभागा से कोणार्क तक पैदल ही चले जा रहे थे। नैसर्गिक सौन्दर्य को देखकर मैं बेहद रोमांचित था। आखिर प्रकृति प्रेमी जो ठहरा। बचपन में खूब पेड़ लगाए हैं। आस पड़ोस एवं जान-पहचान वाले भी पौधारोपण के लिए मेरे को ही बुलाते थे। कहते थे आपके हाथ से लगा पौधा जलता नहीं है, जल्दी पनप जाता है। यकीन मानिए प्रकृति की गोद में अलग प्रकार की आनंद की अनुभूति होती है।
राजू ने फिर ऑटो के ब्रेक लगाए..। बोला.. सर, कोणार्क आ गया है। आगे ऑटो नहीं जाएगा। यहां से आपको पैदल ही जाना पड़ेगा। हम उतर कर सूर्य मंदिर की तरफ बढऩे लगे। बचपन से जिस मंदिर की ख्याति किताबों में पढ़ी, आज उसको साक्षात देखने का अवसर जो मिला था। मन बेहद रोमांचित था। बस जल्द से जल्द हम मंदिर तक पहुंचना चाह रहे थे। मंदिर जाने वाले रास्ते पर कई तरह की दुकानें सजी थी। छोटे से लेकर बड़ों तक का हर सामान था। किसी दुकान पर तो नाना प्रकार की टोपियों व हैट आदि रखे थे। चश्मों की भी कई दुकानें सजी थी। इसके अलावा बच्चों के खिलौने, कोर्णाक मंदिर की मूर्तियां, बैग, सौन्दर्य प्रसाधन संबंधित साजोसामान तो कमोबेश हर दुकान पर उपलब्ध था। ... जारी है।

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पुरी से लौटकर-14

 
मुख्यमंत्री बीजू पटनायक की आदमकद प्रतिमा के ठीक के सामने रुककर बोला.. लीजिए.. चंद्रभागा आ गया है। आप सूर्योदय का नजारा देखिए..। करीब साढ़े पांच बजे थे, उस वक्त। ऑटो से उतर कर हम जैसे ही समुद्र की तरफ बढ़े तो वहां अपार जन सैलाब देखकर आश्चर्य हुआ। सब समुद्र के उस पार टकटकी लगाए पौ फटने का इंतजार कर रहे थे। अलसुबह का मौसम था और समुद्र से आती हवा से सर्दी का आभास हो रहा था। हालांकि अधिकतर लोग गर्म कपड़ों से लकदक थे। फिर भी कुछ उत्साही लोग सर्दी को दरकिनार कर लहरों के साथ अठखेलियां करने में जुटे थे। बच्चों का तो अलग ही संसार था। रंगीन रोशनी वाली गेंद को हवा में उछालकर उसको पकडऩे के खेल में दर्जनों बच्चों लगे थे। इसके अलावा वॉलीबाल भी खेला जा रहा था। घड़ी की सुईयां तेजी से आगे बढ़ रही थी लेकिन सूर्यदेव के दर्शन नहीं हो पा रहे थे। थोड़ा सा उजास हुआ तो यकीन हो गया था कि सूर्योदय हो चुका है। बादलवाही के कारण हम लोग इस प्राकृतिक नजारें को नहीं देख पाए। बहुत निराशा थी लेकिन प्रकृति तो अपनी मर्जी से ही चलती है। उस पर किसी का जोर नहीं चलता। जैसे-जैसे दिन चढ़ रहा था, समुद्र में नहाने वालों की संख्या में भी इजाफा हो रहा था। हम किनारे पर खड़े अपलक पूर्व दिशा को ही देखे जा रहे थे, लेकिन सूरज ने तो जैसे कोई कसम ही खाली थी, दर्शन ना देने की। दरअसल, चद्रभागा कोणार्क के पास एक छोटी नदी है, जो समुद्र में समाहित हो जाती है। माघ सप्तमी को यहां मेला लगता है। उस दौरान लाखों श्रद्धालु नदी में डूबकी लगाते हैं और इसके बाद सूर्य की आराधना करते हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस नदी में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शम्बा ने स्नान किया था। इससे उनको कुष्ठ रोग से मुक्ति मिल गई थी। इसके बाद उन्होंने 12 साल तक यहां भगवान शिव की पूजा की। मान्यता है कि चंद्रभागा नदी में स्नान करने से रोगों एवं पापों से छुटकारा मिलता है।
इधर, बच्चे हमारी मनोदशा से बेखबर अपनी ही दुनिया में मस्त थे। समुद्र के किनारे पर एक ऊंचा सा टीला था। बस उसके ऊपर चढऩा और उतरना उनके लिए खेल बन गया था। वे मस्ती में मशगूल थे और हम चहलकदमी करते हुए एक चाय की दुकान पर आ गए। नारियल के पेड़ों की टहनियों से तैयार करके झोपड़ी बनाई थी। हम सब उस झोपड़ी में जिसको जहां जगह मिली बैठ गए। समुद्री हवा के विपरीत कई देर खड़े रहने के कारण वैसे भी शरीर में हल्की सी सिहरन थी, जैसे ही गरमा गरम चाय की पहली चुस्की हलक से नीचे उतरी राहत सी मिली। वाकई जोरदार चाय बनाई थी उसने। चाय की कीमत सुनकर तो यकीन ही नही हुआ कि इतनी टेस्टी चाय और कीमत केवल पांच रुपए। अचानक फ्लेश बैक में चला गया.. रेल की चाय याद आ गई। ठण्डी सी, एकदम बेस्वाद चाय और कीमत कहीं सात तो कहीं आठ रुपए। चिल्लर नहीं तो पूरे दस लगने का अंदेशा भी रहता है। हल्का से झटका देकर वर्तमान में लौटा। साथी गोपाल शर्मा पूछ ही बैठे.. इतनी जोरदार चाय....जारी है।

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पुरी से लौटकर-13

 
बाहर प्रवेश द्वार पर हम उस वक्त तक आने-जाने वालों को देखते रहे जब तक गोपाल जी बाहर नहीं आए। उनके बाहर आने के बाद हमने अपने जूते वगैरह वापस लिए। रात के करीब साढ़े नौ बजे का वक्त हो चुका था। अब हमको किसी भोजनालय की तलाश थी। वैसे पुरी में जगह-जगह भोजनालय खुले हुए हैं। यह सब हमने मंदिर जाते वक्त ही देख लिए थे। दो-तीन जगह तो मारवाड़ी भोजनालय लिखा था। उनके आगे कोष्ठक में (बासा) लिखा था। बासा का मतलब ठहरने की व्यवस्था से ही है। बासा शब्द वैसे राजस्थानी या मारवाडिय़ों के लिए नया नहीं है। मैं भी बचपन से सुनता आया हूं। खैर, जाते वक्त ही तय कर चुके थे कि भोजन मारवाड़ी भोजनालय में ही करना है। आखिर हम लक्ष्मी मारवाड़ी भोजनालय पहुंचे। वहां जाकर पूछा तो पता चला कि इसके संचालक श्री मघाराम उपाध्याय बीकानेर के हैं। उन्होंने बताया कि आदमी नहीं होने के कारण ठहरने वाला काम बंद कर रखा है। सिर्फ भोजनालय का काम ही है। उपाध्याय जी वैसे बिलकुल ठेठ राजस्थानी में ही बात कर रहे थे। अंदर भोजनालय फुल था। हमको कुछ इंतजार करना पड़ा। वहां भोजन करने वाले लगभग लोग राजस्थान से ही थे। उनके हाव-भाव, बोली एवं पहनावे से यह सब परिलक्षित भी हो रहा था।
भोजन करने के बाद बाजार में बच्चों ने जहां खिलौने खरीदने में दिलचस्पी दिखाई वहीं धर्मपत्नी भी कुछ कम नहीं थी। कहीं से चूडिय़ां खरीदी तो कहीं से पर्स। लम्बा चौड़ा बाजार सजा था, जिसमें बच्चों को ललचाने के कई विकल्प मौजूद थे। बच्चे ही क्या बड़े भी खरीददारी से खुद को रोक नहीं पा रहे थे। लेकिन मैं सिर्फ दर्शक की भूमिका में ही था। आखिरकार ऑटो वाले राजू को फिर फोन किया। हमने उसको एक सरनेम भी दे दिया था। इसलिए उसको राजू की बजाय राजू पुरी ही कहकर पुकार रहे थे। होटल आते-आते साढ़े दस बज चुके थे। सुबह जल्दी उठने का फैसला ही हम पहले की कर चुके थे। सूर्योदय का नजारा जो देखना था। आखिर ऑटो वाले को अलसुबह साढ़े चार बजे का समय दे दिया गया। सूर्योदय वाला स्थान पुरी से करीब 35 किमी की दूरी पर है और उसका नाम है चंद्रभागा। मोबाइल पर अलार्म भरकर हम सो गए। अलसुबह उठे। हालांकि भरपूर नींद ले पाने के कारण आंखें उनींदी थी, लेकिन देखने की चाह में नींद से समझौता कर लिया। करीब साढ़े चार बजे हम ऑटो में बैठ कर चंद्रभागा की तरफ चल पड़े। सूनसान सड़क थी। लेकिन एकदम समतल। पूरी रफ्तार के साथ ऑटो चंद्रभागा की तरफ बढ़ा जा रहा था। चंद्रभागा से पहुंचने से पहले थोड़ा सा उजाला हुआ तो देखा कि हम तो समुद्र के साथ-साथ ही आगे बढ़ रहे हैं। चंद्रभागा जाने वाली सड़क बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर ही बनी है। सघन वन है। जगह-जगह नसीहत भरे बोर्ड टंगे थे,जिन पर लिखा था कि वन क्षेत्र है, कृपया गाड़ी धीरे चलाएं। आखिरकार राजू ने ऑटो को ब्रेक लगाए और ओडिशा के पूर्व .... जारी है।

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पुरी से लौटकर-12

 
मैं विचारों के भंवर में इस कदर खोया हुआ था कि धर्मपत्नी दर्शन करके कब पास आकर खड़ी हो गई पता ही नहीं चला। उसने कहा 'कहां खोए हुए हो..चलना नहीं है क्या..?' उसकी आवाज से मैं चौंका..और खुद का सामान्य दिखाने का प्रयास करते हुए कहा, नहीं.. नहीं..ऐसा कुछ नहीं है, बस भीड़ में तुमको ही देख रहा था। इसके बाद हम तत्काल मंदिर परिसर से बाहर आए और रास्ते में धर्मपत्नी ने फिर टोका.. आपने तिलक नहीं लगवाया क्या? मैंने ना की मुद्रा में सिर हिलाया तो बगल में बैठे एक पण्डे के यहां से अंगुली पर चंदन/सिंदूर मिश्रित घोल लगाकर ले आई और चलते-चलते ही मेरे ललाट पर तिलक कर दिया। हम मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुंच चुके थे। बाहर साथी गोपाल जी हमारा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने अपने मोबाइल हमको थमाए और परिवार सहित वो दर्शन करने मंदिर में प्रवेश कर गए। बाहर खड़े-खड़े फिर कई तरह के विचार फिर उमडऩे लगे। पुरी आने से पहले पढ़े पुरी से संबंधित उन आठ आश्चर्यों की पुष्टि करने की जिज्ञासा प्रबल हो गई। इन आठ आश्चर्यों का विवरण इस प्रकार से है..।
1. मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हमेशा हवा के विपरीत लहराता है।
2. पुरी में किसी भी जगह से मंदिर के ऊपर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सामने लगा हुआ ही दिखाई देगा।
3. सामान्य दिन के समय हवा समुद्र से जमीन के तरफ आती है और शाम को इसके विपरीत लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है।
5. मंदिर के मुख्य गुबंद की छाया दिन में अदृश्य रहती है.. दिखाई नहीं देती है.चाहे सूर्योदय हो या सूर्यास्त। मंदिर के गुम्बद की परछाई दिखाई नहीं देती।
6. मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक मात्रा भी व्यर्थ नहीं जाती है। चाहे कुछ हजार लोगों से 20 लाख लोगों तक खिला सकते हैं।
7. मंदिर में रसोई (प्रसाद) पकाने के लिए सात बर्तन एक दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। लकड़ी से रसोई से बनाई जाती है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले शीर्ष बर्तन में सामग्री पकती है। फिर क्रम से एक के बाद एक नीचे तक पकती जाती है।
8. मंदिर के सिंहद्वार में प्रवेश पहला कदम प्रवेश करने पर (मंदिर के अंदर से) आप सागर निर्मित किसी भी प्रकार की ध्वनि नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर )एक कदम ही रखें तो आप इसको सुन सकते हैं। इसको शाम के वक्त स्पष्ट सुना जा सकता है।
खैर, हम शाम के वक्त मंदिर में गए थे, इस कारण इन आश्चर्यों की ठीक से पुष्टि नहीं कर पाए। रसोई एवं प्रसाद बनने का तरीका भी नहीं देख पाए..। दर्शन करने के उतावलेपन में न तो हवा का रुख पता चला और ना ही समुद्र की आवाज अंदर या बाहर से सुनाई दी। ... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-11

 
'हे प्रभु, इन मध्यस्थों को तो वर्तमान स्थिति ही मुफीद लगती है। क्यों कि दुनिया में पता नहीं कितने ही लोग हैं, जो कई तरीकों से आपके नाम से कमा के खा रहे हैं। और आप का आशीर्वाद सभी पर रहता है। कौन सही तरीके से कमा रहा है या गलत यह अलग बात है लेकिन आपसे कुछ छिपा हुआ नहीं है। आपके यहां देर हो सकती है अंधेर नहीं। आप सभी को उनके किए की सजा जरूर देते हो लेकिन आप की लाठी में आवाज नहीं होती है प्रभु। आपका न्याय खामोश होता है। लेकिन यहां तो अति हो गई है प्रभु। दर्शन कराने के लिए भी मोल भाव होने लगा है। एक व्यवसाय सा बन गया है प्रभु। अब भला कौन होगा जो व्यवस्था में सुधार करके अपने व्यवसाय को प्रभावित करना चाहेगा.। इसलिए जिम्मेदारी आप पर ही है प्रभु। अपने भक्तों को होने वाली इस असुविधा से मुक्ति आप ही दिला सकते हो। आपके दर्शन सभी को आसानी से हो.. इसके लिए व्यवस्था बनाना तो जरूरी है लेकिन ऐसी व्यवस्था किस काम की जो कदम-कदम पर कीमत वसूलती है। हां एक बात और.. जो बचपन से सुनता आया हूं.. यही कि भगवान तो भाव के भूखे हैं, जो सच्चे मन से जो याद कर लेते हैं भगवान तो उसी के है। वैसे आप को कलयुग का भगवान कहा जाता है, इसलिए आपके मध्यस्थों द्वारा धर्म के नाम पर डराना, धमकाना या चमकाना आदि होना तो स्वाभाविक है। कलयुग जो है। लेकिन हे प्रभु आप इंसाफ तो कर सकते हो.। भक्त और आपके बीच कई तरह की अजीबोगरीब एवं हास्यास्पद औपचारिकताओं की जरूरत ही क्या है प्रभु। आप तो जग के दाता हैं, पालनहार हैं। गुस्ताखी माफ हो प्रभु, यह सब करके मैं एक तरह से सूरज को दीपक दिखाने की एक अदनी सी कोशिश कर रहा हूं। क्या करूं प्रभु आदत से मजबूर हूं। और फिर अपनी पीड़ा आपको न कहूं तो किससे कहूं..। और किसी से उम्मीद भी तो नहीं है..। अच्छा या बुरा जो भी करना है, सब आपके ही हाथ है। हम तो कठपुतली मात्र हैं प्रभु। इस जग रूपी मंच पर आदमी रूपी कठपुतलियां, आपके इशारों से ही तो चलती हैं, संचालित होती हैं। सभी की डोर आपके हाथ में है प्रभु। हकीकत कड़वी होती है लेकिन आप तो सर्वज्ञ हो सब जानते हो..।
मैं नादान हूं. प्रभु। आपसे केवल करबद्ध निवेदन ही कर सकता हूं और कह सकता हूं कि आपने सभी को समान बनाया है लेकिन दोष हमारा ही है, जो हमने यह व्यवस्था बना ली है। भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारे पास इतना भी समय नहीं है कि हम आपकी भक्ति में समय लगाएं। सब फटाफट करना चाहते हैं। और इसी फटाफट की संस्कृति ने दो वर्ग खड़े कर दिए हैं। एक आम और दूसरा खास। जो खास है वह पहुंच और पैसे के दम पर आपके दरबार में जहां चाहे आ जा सकता है। समय की भी कोई पालना नहीं है। उस पर किसी तरह की कोई पाबंदी या नियम लागू नहीं होता, लेकिन जो आम हैं उनके लिए तो सारे नियम है। कदम-कदम पर कई तरह की शर्तों की पालन करना पड़ता है। '.... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-10

 
धर्मपत्नी के सामने भी यही धर्मसंकट था, भीड़ की वजह से वह भी स्पष्ट देख नहीं पा रही थी। मैंने आग्रह किया कि बच्चों की तर्ज पर दर्शन करा दूं लेकिन वह शर्म शंका के वशीभूत होकर तैयार नहीं हुई। आखिरकार वह खुद ही अवरोधक के पास पहुंच गई। वहां खड़े पण्डे ने उसके सिर पर चार बार छड़ी को लगाया। इतना ही नहीं माथे पर तिलक भी लगाया। मैं हैरान था, पण्डे ने यह सब निशुल्क कर दिया। शायद महिलाओं को रियायत देते हैं। मैं वहीं बगल में खड़ा था। दोनों बच्चों को लिए..। अचानक सोचने लगा.. और पता नहीं क्या-क्या ख्याल जेहन में आने लगे।
सोचने लगा 'हे जगन्नाथ, हे दीनानाथ। तेरी माया भी अजब है प्रभु। तू दुखियों के दुख हरता है। मन्नतें पूरी करता हैं। हे प्रभु सुना है तू भक्तों में भेदभाव नहीं करता। तेरे दर पर सभी समान हैं। चाहे राजा हो रंक, तुम्हारी नजर में सब बराबर हैं। फिर यह दूरी क्यों प्रभु। और इस दूरी को पाटने का माध्यम पैसे क्यों प्रभु? जब सारी कायनात ही तुम्हारी है प्रभु तो आपको पैसे का क्या काम? और हां, भक्तों और आपके बीच में यह मध्यस्थ क्यों प्रभु? जिनके पास पैसे हैं, उनके लिए तो कोई नियम कायदा नहीं है.. ये नाइंसाफी क्यों प्रभु? सामान्य आदमी क्यों लाइन में लगे? क्यों धक्के खाए? क्यों पण्डों के कोप का भाजन बने? क्या यह नियम आपने बनाया है प्रभु? अगर ऐसा है तो फिर यह तो भेदभाव ही हुआ ना। इन मध्यस्थों ने, बिचालियों ने, ठेकेदारों ने भक्तों और आपके बीच एक दीवार खड़ी कर दी है। पैसों की दीवार। जो जितनी ज्यादा बोली लगाएगा, मतलब ज्यादा पैसे खर्च करेगा, उसको आपका सानिध्य और अधिक मिल जाएगा। और कोई गरीब बेचारा, जो दूर से आपके दर्शनों की हसरत लेकर आता है। उसको क्या मिलता है प्रभु, आप सब जानते हो। आप अन्तर्यामी है। बेचारा न जाने कितनी ही जगह अपमानित होता है। आपके यह बिचौलिए उनको हिकारत से देखते हैं। बात-बात पर डांटना तो आम बात है। आप के दर पर यह सब हो रहा है। और एकदम सीधे और सरल आदमी को तो यह आपके बिचौलिये पता नहीं क्या-क्या डर दिखाते हैं। धर्म के नाम..पर, अनिष्ट के नाम पर। और मरता क्या ना करता..। बेचारा, जेब खाली करके ही जाता है। हे प्रभु? यह कैसा खेल है। यह सब आपके दरबार में होता है.. आपकी आंखों के सामने होता है। हे प्रभु कुछ तो तरस खाओ। कुछ तो रहम करो अपने भक्तों पर। कुछ तो नजरें इनायत करो। हे प्रभु मैं भी दर्शनों की हसरत लिए सपरिवार आपके दर पर हाजिर हुआ लेकिन यहां की इस अजीब प्रकार की व्यवस्था ने आपको जगन्नाथ नहीं.. 'पैसों' का नाथ बना दिया है। माफ करना प्रभु मैं छोटे मुंह से बड़ी बात कर रहा हूं.. क्या करूं..अपनी बात कहने से खुद को रोक नहीं पाया. हे प्रभु, आप तो बड़े हैं और बड़ों का काम तो माफ करना है। हे प्रभु मुझ नादान को भी माफ कर देना लेकिन, यहां की व्यवस्था एवं माहौल से मैं बेहद व्यथित हूं। मैं भी यही सोच रहा हूं कि इसमें अब सुधार कैसे होगा? '..जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-9

 
प्रसाद भी लेना पड़ता है, वरना आप की मर्जी। मैं काउंटर से जैसे ही मुड़ा वह खतरनाक पण्डा ठीक मेरे पीछे ही खड़ा था। संयोग से उसी वक्त कोई दूसरा श्रद्धालु आ गया था, पण्डा उससे बातचीत में मशगूल था और मैं चुपके से उससे नजर बचाकर काउंटरनुमा उस गुमटी से बाहर आ गया। हम आगे बढ़े लगभग हर दरवाजे पर नो इंट्री का बोर्ड टंगे थे। समझ में नहीं आ रहा था कि मंदिर में प्रवेश किधर से करना है। फिर भी हम लोग बढ़ते रहे। एक दरवाजे पर कुछ चहल-पहल ज्यादा दिखी। पास गए तो देखा श्रद्धालु लाइन में लगकर उस दरवाजे तक आ रहे हैं। हम भी लाइन में लगकर दरवाजे तक पहुंचे। इतने में एक पण्डा आया..बोला आपका टोकन कहां है। मैंने पूछा वो क्या होता है तो बोला.. इधर से मंदिर में प्रवेश करने पर टोकन लेना पड़ता है। आप जहां से लाइन में लगे थे, वहीं पर एक काउंटर है। वहां आपको टोकन मिलेगा। निराश कदमों से वापस काउंटर की तरफ लौटे लेकिन वह भी बंद था। वहां भी एक पण्डा खड़ा था। उससे पूछा तो बोला.. काउंटर अब बंद हो चुका है। एक घंटे बाद दुबारा खुलेगा। उसका जवाब सुनकर मैं हैरान हो गया। मन में यकायक ख्याल आया कि एक घंटे क्या करेंगे। बाहर गोपाल जी भी इंतजार कर रहे हैं,क्यों ना बाहर ही चला जाए। मैं इसी उधेड़बुन में डूबा था।
आखिरकार मन ही मन फैसला किया कि एक घंटा बहुत ज्यादा होता है, इसलिए बाहर जाकर फिर से अंदर आ जाएंगे। मंदिर के पीछे से घूमकर हम दांयी भाग की तरफ बढ़े तो बड़ी संख्या में श्रद्धालु करबद्ध आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हुए दिखाई दिए। ऊपर देखा तो मंदिर के शिखर पर ध्वज बदलने की तैयारी चल रही थी। ऐसे में फिर से प्रगतिशील किसानों की बात याद आ गई। उन्होंने भी ध्वज बदलने की प्रक्रिया को देखने के लिए कहा था। हम भी रुक गए और वह नजारा देखने लगे। वाकई अद्भुत एवं अलौकिक नजारा था। मंदिर बहुत ही भव्य एवं विशाल है। चूंकि हम मंदिर के बिलकुल बगल में ही थे, इसलिए ऊपर देखने में मुंह को बिलकुल नब्बे डिग्री पर करना पड़ रहा था। फिर भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। क्योंकि मन में पहले दर्शन करने की उत्सुकता थी। हम ऊपर देखते हुए ही आगे बढ़ रहे थे। अचानक फिर एक दरवाजा दिखाई दिया। उस पर किसी तरह का कोई बोर्ड नहीं लगा था। ना ही वहां कोई पण्डा दिखाई दिया। हम चुपके से उसके अंदर घुस गए। अंदर जाकर देखा तो वहां भी लम्बी लाइन लगी थी। अंदर भी जगह-जगह अवरोधक लगाए पण्डे खड़े थे। उनको देखकर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन मन को मसोस कर रह गया। एक चौड़े से गलियारे में दूर तलक श्रद्धालु खड़े थे। यूं समझ लीजिए.. हम सबसे पीछे थे। करीब तीस फीट के दूरी पर थे हम। वहीं से ऐडिय़ां उचका कर दर्शन करने की कवायद में जुट गया। दो तीन बार ऐसा करने पर आखिरकार मेरे को दर्शन हो गए। इसके बाद दोनों बच्चों को गोद में लेकर ऊपर उठाकर दर्शन करवाए। ----जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-8


कमोबेश यही कहानी हिन्दी में लिखे निर्देश की थी। बानगी देखिए... 'जुता, चपल, बाहर की खाना, चमड़े की सामग्रियों, मादक द्रव्य, क्यामेरा, छत्री, मोबाइल फोन और विस्फोटक सामग्री इत्यादि श्री मंदिर के अंदर लेना मना है।' इस निर्देश से अर्थ का अनर्थ हो रहा था। कहने का आशय है कि उक्त सभी चीजें मंदिर के अंदर ले जाना मना है। लेकिन निर्देश के हिसाब से तो यह जाहिर हो रहा है कि उक्त चीजें आप बाहर से खरीद सकते हैं लेकिन मंदिर में लेने पर मनाही है। क्यामेरा का मतलब यहां कैमरे से है और छत्री से तात्पर्य छतरी/ छाता से है। अब बात मुख्य दरवाजे पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की। यह लोग तलाशी लेने में केवल औपचारिकता ही बरतते हैं। हां, किसी के हाथ में मोबाइल दिखाई देता है तो रोक लेते हैं और कोई जेब में रखकर चला गया तो कोई पूछने वाला नहीं है। चूंकि फोन मेरे हाथ में था इसलिए सुरक्षाकर्मी को दिखाई दे गया। वह बोला, मोबाइल बाहर छोड़ दीजिए। ऐसे में धर्मसंकट खड़ा हो गया क्या किया जाए। साथ में गए गोपाल जी शर्मा ने रास्ता सुझाया बोले, आप लोग पहले दर्शन करके आ जाइए। हम बाद में चले जाएंगे। मेरा एवं धर्मपत्नी का फोन उनको देकर हमने मंदिर में प्रवेश किया। इस दौरान बहुत सी महिलाएं पर्स लटकाए हुए दिखाई दी तो कई महानुभव ऐसे भी थे जो बाकायदा बेल्ट लगाए हुए थे। लेकिन इनको कोई रोकने या टोकने वाला नहीं था। बेल्ट तो मैंने भी लगा रखा था लेकिन किसी ने कुछ कहा ही नहीं। अंदर प्रवेश करने के साथ सीढिय़ों पर चिपचिपाहट सी महसूस हो रही थी। मुख्य मंदिर तक पहुंचने तक आजू-बाजू में कई छोटे-छोटे मंदिर थे। कहीं कोई तिलक लगाकर आशीर्वाद दे रहा था तो कहीं कोई छड़ी हाथ में लिए खड़ा था। श्रद्धालु बड़े आराम से उनके सामने सिर झुका रहे थे। और वो छड़ी को सिर पर धीरे से छुआ भर देते जैसे आशीर्वाद दे रहे हों। लोग ऐसा करवाकर खुद को धन्य समझ रहे थे। चूंकि हम बिना किसी गाइड और पण्डे के अंदर पहुंचे थे, इस कारण हर तरफ के नजारे को किसी जिज्ञासु की तरह देख रहे थे और साथ में समझने का प्रयास भी कर रहे थे। हम मंदिर के बांयी तरफ से आगे बढ़ रहे थे कि पान चबाता हुआ हट्टा-कट्टा एक पण्डा हमारी तरफ लपका। आंखों में काजल और हल्की दाढ़ी में सचमुच वह खतरनाक किस्म का लग रहा था। मुंह में पान की पीक को अंदर रखे-रखे ही वह बड़बड़ाया। प्रसाद ले लो, प्रसाद। मंदिर में अगर आपको प्रसाद चढ़ाना है तो आप बाहर से लेकर नहीं जा सकते। मंदिर परिसर के अंदर ही आपको प्रसाद खरीदना पड़ता है। प्रसाद से पहले रसीद कटवानी पड़ती है। वह पण्डा हम को रसीद काटने वाले कक्ष तक लेकर चला गया। अंदर काउंटर पर बैठे शख्स को उसने इशारा किया तो उसने झट से एक प्रिण्टेड सूची मेरे सामने रख दी। प्रसाद की सूची और उसकी कीमत देखकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। अलग वैरायटी और सभी की उसी अनुपात में कीमत..। मैंने बिलकुल अनजान बनते हुए काउंटर वाले शख्स से पूछा.. प्रसाद लेना जरूरी है क्या? तो वह पलटकर बोला दर्शन करना है तो... जारी है।

Tuesday, December 31, 2013

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ

पुरी से लौटकर-7

चार किलोमीटर चलने के बाद ऑटो वाले ने हमको मंदिर से करीब आधा किलोमीटर दूर उतार दिया। यहां से आगे भीड़ ज्यादा रहती है, इस कारण चौपहिया वाहनों का प्रवेश बंद है, हालांकि मंदिर के आगे से रास्ता है, जिस पर दुपहिया वाहन निकलते रहते हैं। ऑटो से उतरने के बाद हम दस कदम ही चले होंगे कि सफेद धोती बनने एक युवा पण्डा साथ-साथ चलने लगा। हम चुपचाप मंदिर की और बढ़ रहे थे। सड़क के दोनों तरफ दुकानें सजी थी। अधिकतर पर तो शंख, पूजा सामग्री, फोटोज आदि ही रखे थे। महिलाओं के सौन्दर्य प्रसाधन की दुकानों की भी भरमार थी। चूंकि हमारी पहली प्राथमिकता मंदिर में जाकर दर्शन करना था, लिहाजा हम दुकानों पर बस सरसरी नजर भर मारते हुए ही चल रहे थे। रोशनी की चकाचौन्ध में ऐसा महसूस हो रहा था मानो दिन ही हो। पान की जुगाली करते-करते अचानक खामोशी तोड़ते हुए पण्डे ने पूछा.. पूजा करोगे..। पांच सौ रुपए में सभी पूजा करवा दूंगा। हम उसकी बात को अनसुना करते हुए बढ़े जा रहे थे। वह पांच सौ से पचास रुपए तक आ गया लेकिन हम चुप ही रहे। वह फिर भी पूछने से बाज नहीं आ रहा था।
आखिरकार कहना ही पड़ा कि हमको पूजा वूजा नहीं केवल दर्शन करने हैं और वो हम अकेले ही कर लेंगे। चलते-चलते हम मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुंच चुके थे। मंदिर के आजू-बाजू में कई दुकानें खुली हैं, जूते व अन्य सामान रखने के लिए। पॉलिथीन की थैली में जूते डाल कर दुकान वाले को जमा करवाए। यह थैली दुकान वाला ही देता है। बदले में उसने एक टोकन थमा दिया। दुकान पर लिखी हिन्दी पढ़कर मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सका..। उस पर लिखा था 'जोता ष्टाण्ड'। वैसे पुरी में मैंने एक दो जगह और लिखा देखा तो यकीन हुआ कि यहां 'स' को 'ष' लिखा जाता है। रेलवे स्टेशन को भी ष्टेशन लिखा था।
खैर, जूते को जमा कराने के काम से फारिग होने के बाद प्रवेश द्वार की तरफ बढ़े। मुख्य दरवाजे के बार्इं और चार नल हैं, जो निरंतर बहते रहते हैं। श्रद्धालु यहां हाथ मुंह धोते हैं। कुछ कुल्ला वगैरह करने से भी नहीं चूकते। हाथ धोने एवं कुल्ले करने का यही पानी बगल में बहता है। श्रद्धालु इसी पानी से होकर ही मंदिर की तरफ बढ़ते हैं। इस बहाने पैर भी धुल जाते हैं। श्रद्धा और आस्था का सवाल है, वरना हाथों के धोने और कुल्ले के पानी में पैर कौन देना चाहेगा। प्रवेश द्वार पर सुरक्षाकर्मियों का मजमा सा लगा था। प्रवेश द्वार के ऊपर सूचना पट्ट टंगा है। जिस पर तीन भाषाओं में निर्देश लिखे हुए हैं। उडिय़ा, हिन्दी और अंग्रेजी में। सूचना पट्ट पर निर्देशों के साथ मोटे अक्षरों में लिखा है 'हिन्दु श्री जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश कर सकते हें।' यह पढ़ते ही मुझे रेल में मिले प्रगतिशील किसानों की बातें फिर याद आ गई। उन्होंने कहा था कि मंदिर में विदेशी लोग नहीं जा सकते हैं। किसानों ने बताया था कि एक बार तो इंदिरा गांधी को भी मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया था। मुझे यहां भी हिन्दी की अहिन्दी होते देख तरस आया.. हिन्दू को हिन्दु व हैं को हें जो लिखा था..। .......................जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-6

 
वैसे पुरी का बीच साफ सुथरा है। दूर तलक देखने पर पानी नीले की बजाय हरे रंग का आभास देता है। लहरें उठती है तो पानी एकदम दूधिया नजर आता है, एकदम सफेद। अद्भुत नजारा होता है। जी करता है कि बस देखते ही रहो.. अपलक, बिना थके, बिना रुके, लेकिन इस बीच बच्चे कपड़े बदल कर आ चुके थे। इसके बाद हम सब टीले पर बनी एक चाय की दुकान पर जाकर बैठ गए..। चाय की चुस्कियों के साथ बंगाल की खाड़ी और उसमें उठने वाली लहरों को निहारने का आनंद ही कुछ और है। हां, एक बात और सागर में न केवल लहरों की आवाज का शोर है, बल्कि मछुआरों की नाव भी खूब आवाज करती हैं। बहुत पहले भोपाल के ताल में नौका विहार किया था, तब ऐसी नाव नहीं देखी थी। मतलब जनरेटर से चलने वाली। उस वक्त तो लगभग नावें चप्पू से ही चलती थी, लेकिन आजकल नाव के एक तरफ जनरेटर लगा दिया जाता है। उसके पीछे एक अगजेस्ट फेन लगाया जाता है, जो पानी के अंदर डूबा रहता है। पंखें के तेजी से घूमने से नाव अपने आप ही चलती है। वैसे यह एक तरह का जुगाड़ है। नाव जैसे ही किनारे पर आती है, जरनेटर के पंखें को घुमाकर अंदर कर लिया जाता है,क्योंकि उसके रेत में लगकर टूटने या खराब होने का भय रहता है। इस बीच चाय खत्म हो चुकी थी। लेकिन दोनों पैर गड्ढ़ा बनाने में लगे थे। ऊपर से सूखी दिखाई देने वाली मिट्टी हटाने के बाद नीचे गीली मिट्टी दिखाई देने लगी। एक जुनून सा सवार था कि जल्दी से पानी निकले। इस बीच एक सीप के घर्षण के पैर के अंगुली पर खरोंच भी आई लेकिन उसको नजरअंदाज करते हुए लगा रहा, इसी उम्मीद के साथ शायद पानी आ जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बच्चे एवं धर्मपत्नी जिद करने लगे थे, शाम को मंदिर जाना था। आखिरकार उनके आग्रह को स्वीकार कर गड्ढे से पानी निकालने के प्रयास पर विराम लगा दिया। शरीर पर चिपकी मिट्टी जैसे-जैसे सूख रही थी, वैसे-वैसे अपने आप झाड़ भी रही थी। होटल लौटने तक हल्का सा अंधेरा हो चुका था। होटल आने के बाद धर्मपत्नी बाथरूप में घुस गई थी लेकिन मैं यह सोच कर और यह देखने के लिए नहीं नहाया कि सागर के पानी से त्वचा फटती है या नहीं? मेरा सोचना सही साबित हुआ। ना तो किसी तरह की खुजली हुई और ना ही त्वचा फटी। खैर, देर शाम होटल से बाहर खड़े ऑटो वाले मंदिर तक जाने के लिए मोलभाव तय करने में जुट गया। होटल से मंदिर की यही कोई चार या पांच किलोमीटर की दूरी थी, ऑटोवाले ने 70 रुपए सिर्फ ले जाने के मांगे। राजू नाम था ऑटो वाले का। कह रहा था, साहब आते वक्त भी मैं भी आपको ले आऊंगा। आप दर्शन करने के बाद फोन कर देना। देखने में बिलकुल सीधा एवं भोला सा था राजू। उसकी सूरत भी कुछ ऐसी थी कि ना चाहते हुए भी उस पर यकीन करना पड़ा। इतना ही नहीं राजू से अगले दिन के बुकिंग भी फाइनल कर दी। यह शायद उसके व्यवहार का ही नतीजा था। खैर, हम सब ऑटो में बैठकर जगन्नाथ मंदिर के दर्शन के लिए रवाना हुए। ..... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-5

 
वैसे लहरों के बीच नहाना किसी खतरे से खाली नहीं है। समुद्र से लहर जैसे ही किनारे से टकराकर वापस लौटती है तो पैरों के नीचे से मिट्टी निकल जाती है और संतुलन बिगड़ जाता है। लहर आते वक्त भी एक धक्का सा लगता है लेकिन वापसी ज्यादा खतरनाक होती है। पैरों के नीचे से मिट्टी खिसकने से मुझे गांव के पास बहने वाली काटली नदी की याद आ गई। काटली अब तो इतिहास बन गई है। मुद्दत हो गई उसे आए हुए और शायद अब आएगी भी नहीं। काटली नदी में भी पानी के बहाव के कारण पैरों के नीचे से मिट्टी खिसक जाती थी और संतुलन बिगड़ जाता था। इसके बाद आदमी ठीक से खड़ा नहीं रह पाता और गिर जाता। यकायक गिरने से खुद से नियंत्रण हट जाता और आदमी नदी में बहने लगता। बंगाल की खाड़ी का नजारा भी कुछ इसी तरह का था। बड़ा मुश्किल होता है तेज लहरों के बीच संतुलन साधना। बताया गया कि बंगाल की खाड़ी की लहरें ज्यादा तेज होती हैं और काफी ऊंचाई तक उठती हैं। बच्चों को गोद में लेकर करीब बीस फीट अंदर तक गया। इसके बाद धर्मपत्नी को भी लेकर गया। बच्चे तो बीच के किनारे पर नाम लिखने और मस्ती करने में ज्यादा रुचि दिखा रहे थे। वैसे इस नहाने के दौरान अगर आपने जेब वाली टी-शर्ट या निकर पहन रखा है तो उसका वजन दुगुना या तिगुना होना तय है। ऐसा भीगने से नहीं बल्कि समुद्र की मिट्टी उसमें भरने से होता है। इस मिट्टी की खासियत यह है कि यह गीली रहने तक ही चिपकी रहती है। सूखने के बाद झड़ जाती है। मिट्टी में शंख एवं सीप आदि भी बहकर खूब आते हैं। बच्चे और बड़े बीच के किनारे पर मिट्टी के घरोन्दे बनाने में जुटे थे। बड़ी संख्या में लोग यहां पर घरोन्दे बनाते हैं। इसके अलावा गड्ढ़ा भी खोदते हैं। थोड़ा सा गड्ढा खोदते ही अंदर पानी आ जाता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि पुरी का मौसम इन दिनों सम सा है। ज्यादा सर्दी नहीं है। सुबह-सुबह जरूर हल्की सी सर्दी महसूस होती है। कमरे के अंदर तो चद्दर तक ओढऩे की जरूरत नहीं पड़ती। सर्दी ना होने के कारण समुद्र में नहाने का आनंद दुगुना हो जाता है। सूर्यास्त होने को था लेकिन बच्चे नहाने और खेलने में इतने मगन थे कि बाहर निकलने का नाम तक नहीं ले रहे थे। कई बार आवाज लगाई लेकिन वे बाहर नहीं निकले। वैसे भी समुन्द्र की लहरों की आवाज भी बड़ी तेज होती है। लहरों के साथ ऊपर उठा पानी जब नीचे गिरता तो बड़ी तेज आवाज आती है। मानो कोई सांप गुस्से में फुंकार रहा हो। आखिरकार, बच्चों को हाथ पकड़ कर बाहर लाया। इसके बाद धर्मपत्नी उनको पास ही के एक हैडपम्प पर लेकर गई और उनको नहलाकर कपड़े बदले। बताया गया कि समुन्द्र के पानी में नहाने से त्वचा के फटने और खुजली होने की आशंका रहती है। कपड़ों के बारे में यही कहा जाता है कि समुन्द्र के पानी में भीगने के बाद उनको सामान्य पानी से जल्दी से निकाल लेना चाहिए, अन्यथा उनके कटने का अंदेशा रहता है।...............जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ

पुरी से लौटकर-4
 
नहाऊं या नहीं मैं इसी ऊहापोह में ही था कि धर्मपत्नी खुद को रोक नहीं पाई और चुपके से बच्चों के साथ जाकर नहाने लगी। मैंने कैमरा थामा और लगा फोटो खींचने। वैसे बीच पर बड़ी संख्या में फोटोग्राफर भी थे, जो आपको आकर्षक फोटो दिखाकर वैसी ही फोटो खींच देने का भरोसा दिलाते हैं। मेरे पास भी कई बार फोटोग्राफर आए लेकिन मैंने उनकी बात पर गौर नहीं किया। उन्होंने कोशिश भी बहुत की। कहने लगे, अरे सर, हमको लेने दीजिए ना.. देखिएगा कैसा मस्त एंगल आता है। आप हमारे जैसी फोटो नहीं खींच पाओगे। मैंने उनको साफ-साफ कह दिया कि जैसे भी आए मैं ही खींच लूंगा। वैसे बीच पर दो तरह के फोटोग्राफर मौजूद रहते हैं। एक वे जो खुद के कैमरे से फोटो खींच कर उसको डवलप करवा कर आपको देते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो केवल एंगल व लोकेशन के नाम पर बेवकूफ बनाते हैं। उन फोटोग्राफर के पास खुद कैमरा तो होता ही है लेकिन सस्ते के चक्कर में उन्होंने एक रास्ता निकाल रखा है, वे आपके कैमरे से ही आपकी फोटो खींच देंगे, लेकिन एक क्लिक करने के नाम पर ही पांच रुपए ले लेते हैं। बीच पर ऊंट वालों का धंधा भी जबरदस्त चलता है। सजे-धजे ऊंटो पर पर्यटकों को बैठाकर बीच के चक्कर लगवाए जाते हैं। ऊंट पर बैठाने और नीचे उतारने का तरीका परम्परागत नहीं है, क्योंकि उसमें समय लगता है। इस कारण ऊंट वाले एक सीढ़ी अपने साथ रखते हैं। उसी के माध्यम से पर्यटकों की ऊंट की पीठ पर बैठाया जाता है और नीचे उतारा जाता है। एक दो बार ऊंट वाला मेरे पास भी आया लेकिन मैंने उसको मना कर दिया। अकेला करता भी क्या..। ऊंट पर बैठकर.। बच्चे एवं धर्मपत्नी तो नहाने में और मस्ती करने में ही तल्लीन थे। बंगाल की खाड़ी की किनारे पर मछुआरों की सैकड़ों की संख्या में नाव खड़ी थी। लगभग इतनी ही नाव समुन्द्र के अंदर थी। पुरी में मछलियां पकडऩे का काम बड़े पैमाने पर होता है। टीले पर लगी चाय की दुकानों पर भी काफी भीड़ रहती है। विदेशी पर्यटक तो धूप में लेटे हुए थे। वहीं कुछ छतरी के नीचे कुर्सी लगाकर नजारा देख रहे थे। बीच-बीच में जाकर डूबकी लगा आते और फिर बैठ जाते। समुद्र की किनारे ही मोतियों एवं सीप की मालाएं बेचने वाले भी बड़ी संख्या में घूमते हैं। मोती-मूंगा आदि की अंगुठिया भी दिखाते हैं। मेरे पास भी कई आए लेकिन मैं माला, बाली, अंगूठी आदि पहनता ही नहीं हूं। शादी में ससुर जी ने जो सोने की अंगूठी और चेन दी थी तो वो भी धर्मपत्नी को दे चुका, शौक ही नहीं हैं। खैर, बीच का नजारा आपको बोर नहीं करता है। एक बार आप वहां गए तो फिर हटने को मन ही नहीं करता। ऐसा लगता है कि बस यहीं के होकर रह जाएं लेकिन वक्त ऐसा करने की इजाजत नहीं देता। खैर, सूर्यास्त होने को था। मैं भी ज्यादा देर तक खुद को रोक नहीं पाया और बच्चों के साथ नहाने लगा। खूब देर तक नहाते रहे। डूबकी लगाते वक्त पानी कई बार मुंह में गया। इतना कड़ा और खारा पानी है कि मुंह का जायका तक बिगाड़ देता है।..... जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-3

 
वह ऑटो वाला वहीं खड़ा रहा। जैसे ही हम लोग होटल के कमरे की तरफ बढ़े तो रिशेप्सन काउंटर पर बैठे युवक एवं ऑटो वाले के बीच बातचीत का दौर शुरू हो गया। यकीनन ऑटो वाला अपना कमीशन मांग रहा होगा। खैर, स्टेशन से होटल तक आने की कहानी साधारण सी है लेकिन यह सब बताने का मकसद इतना है कि पुरी में अगर होटल लेना है तो फिर मंदिर के आसपास ही ठीक रहता है। समुन्द्र किनारे जितने भी होटल हैं लगभग महंगे हैं। दूसरी बात ऑटो वालों से मोलभाव किया जाए और एक के भरोसे ना होकर दो तीन से पूछताछ की जाए तो संभव है जेब कम ढीली होगी। करीब 19 घंटे का ट्रेन का सफर और फिर एक-डेढ़ घंटे ऑटो में घूमने के बाद शरीर थकान से दोहरा हो रहा रहा था। सफर में वैसे भी नींद कम आती है, लिहाजा सोने की इच्छा हो रही थी। नहाने एवं शेव करने के बाद फटाफट खाना खाया और बेड पर पसर गया। बच्चे समुन्द्र जाने के लिए बेहद लालायित थे, इस कारण शोरगुल ज्यादा था। ऐसे में गहरी नींद तो नहीं आई लेकिन एक हल्की सी झपकी जरूर लग गई जो कि तरोताजा करने के लिए पर्याप्त थी। सामान्य दिनों में भी इसी प्रकार की झपकी ले ही लेता हूं। पांच-दस मिनट के लिए। व्यस्तता के बीच इतना ही तो वक्त मिल पाता है।
झपकी जैसे ही टूटी बच्चे एवं धर्मपत्नी भी तैयार हो चुके थे। बीच जाने के लिए बच्चे बेहद उत्साहित थे। खुशी से चहक रहे थे। होटल से बीच की दूरी से मुश्किल से चंद कदमों पर ही थी। होटल से बाहर निकलने की देर थी, बच्चे हाथ छुड़ा कर दौड़ पड़े। बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर पुरी में हजारों की संख्या में होटल बने हुए हैं। कुछ पर्यटक तो होटल के कमरों से ही बंगाल की खाड़ी का नजारा देखते हैं तो कुछ छत पर चढ़कर। वैसे समुन्द्र के बीच पर जाकर लहरों के बीच नहाने का आनंद तो सभी लेते ही हैं। बीच तक पहुंचने से पहले रेगिस्तान जैसी बालुई मिट्टी का टीला बना था। हालांकि इस मिट्टी के कण थोड़े मोटे होते हैं। बजरी की तरह। सूखी मिट्टी में पैर धंस रहे थे। ऐसे में चलने में अतिरक्त ऊर्जा खर्च करनी पड़ रही थी। टीले पर जैसे ही चढ़े सामने का विहंगम नजारा देख आंखें फटी की फटी रह गई। टीले ऊंचाई पर एक अलग ही दुनिया बसी थी और ढलान पर तो जैसे मेला लगा था। बच्चों से लेकर बड़ों तक सब एक ही रंग में रंगे थे। या यूं कहूं कि बड़े भी बच्चे बनकर लहरों के बीच अठखेलियां करने में मस्त थे। शर्म शंका से बिलकुल दूर.. जिसको जैसे अच्छा लग रहा था वह अपने अंदाज में वैसे ही नहा रहा था। बच्चे तो कपड़े उतारकर पानी में छलांग लगा चुके थे। इधर, मैं और धर्मपत्नी किनारे पर खड़े बच्चों की मस्ती को देखकर ही खुश हो रहे थे। वैसे जोहड़, नदी में बचपन में खूब नहाया हूं लेकिन बंगाल की खाड़ी को देखकर मन में हल्का सा डर लग रहा था। करीब दस-दस फीट तक ऊंची उठती लहरें मन में रोमांच भर रही थी लेकिन मैं पानी में घुसने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। ........ जारी है।

जग के नहीं, 'पैसों' के नाथ


पुरी से लौटकर-2

 
वैसे पुरी में आने वालों को ललचाने एवं प्रलोभन देने वालों में टूर एंड टे्रवल्स वाले भी कम नहीं हैं। पुरी रेलवे स्टेशन ऐसा है, जहां रेलवे लाइन का आखिरी छोर है। जितनी भी ट्रेन यहां आती हैं, वे यहीं से दुबारा चलती है। यूं समझिए कि पुरी एक ऐसा स्टेशन है, जहां रेल लाइन का द एंड हो जाता है। खैर, स्टेशन पर जैसे ही कोई गाड़ी पहुंचती है, वहां कुलियों के अलावा और बहुत सारे लोग, यात्रियों पर एक तरह से टूट पड़ते हैं। रुट चार्ट लिखा एक पर्चा पुरी पहुंचने वालों को थमा दिया जाता है। तरह-तरह की छूट का प्रलोभन देकर यात्रियों/ पर्यटकों को ललचाने की कवायद शुरू हो जाती है। हमारी पास भी एक युवा आया और तत्काल ऑटो में बैठने का आग्रह करने लगा। बोला, श्रीमान जी, ऑटो आपके लिए निशुल्क है। इसका कोई चार्ज नहीं लगेगा। आप ऑटो में बैठिए। हमने उससे कहा कि आपने अपने नम्बर दे दिए हैं, हम शाम को आपको फोन पर अपना रुट प्लान बता देंगे, अब आप जाओ। लेकिन वह युवक मानने को तैयार ही नहीं हो रहा था। करीब एक घंटे तक वह आग्रह करता रहा। आखिरकार हम उसके कहेनुसार ऑटो में बैठ गए। युवक ऑटो को सीधे ट्रेवल्स एजेंसी ले गया और बोला आप अपनी यात्रा का टिकट बुक करा लीजिए..। हमारा बॉस बहुत ही अच्छा आदमी है। आप एक बार उससे मिल लीजिए। हमने कहा कि पहले हमको होटल छोड़ दो, हम शाम को फोन करके आपको जो भी प्लान अच्छा लगेगा, बता देंगे। लेकिन वह युवक बार-बार एक ही रट लगाए हुए था। हमने ऑटो वाले से कहा कि.. यह फ्री-व्री का चक्कर छोड़ और हमको जगन्नाथ मंदिर एवं समुन्द्र के मध्य में कोई रियायती दर वाले होटल में छोड़ दे, लेकिन वह जबरन गलियों में इधर-उधर घूमाता रहा। कहने लगा कि यहां के पुलिस वाले सख्त हैं; कार्रवाई कर सकते हैं, इसलिए वह मुख्य रास्ते से न जाकर दूसरे रास्ते से होटल जा रहा है। उसने हमको तीन-चार होटल दिखाए, लेकिन कोई लोकेशन के हिसाब से नहीं जमा तो कोई व्यवस्था के हिसाब से। यहां बताता चलूं कि पुरी में ऑटो और होटल वालों के बीच भी कमीशन का खेल चलता है। कई होटल वालों ने तो अपने यहां ऑटो वालों को स्थायी रूप से रखा हुआ है, जो स्टेशन से सीधे उनको होटल तक ले आते हैं। होटल से अनुबंध रखने वाले ऑटो का किराया भी अलग है। सामान्य ऑटो से करीब 30 से 50 रुपए ज्यादा। हमारे ऑटो वाला भी लगभग उन्ही होटल में लेकर गया, जहां उसकी जान-पहचान थी। आखिरकार करीब एक घंटे पुरी की गलियों में इधर-उधर घूमाने के बाद वह एक होटल में लेकर गया। किराया 12 सौ रुपए प्रतिदिन। सामान्य कमरा..। डबल बैड। ऑटो वाले से किराया पूछा तो बोला, दो सौ रुपए दे दीजिए। बाद में उसको 150 रुपए दिए लेकिन... जारी है।

जग के नहीं 'पैसों' के नाथ

पुरी से लौटकर-1

नवम्बर माह में पुरी धाम की यात्रा का कार्यक्रम तय करने से लेकर 23 दिसम्बर को पुरी धाम रवाना होने और वहां पहुंचने तक बस इतनी ही जानकारी थी कि पुरी में जगन्नाथ जी का प्राचीन, ऐतिहासिक व भव्य मंदिर है और वह देश के चार धामों में से एक है। इसके अलावा वहां बंगाल की खाड़ी के किनारे बीच का विहंगम नजारा है, जहां पर्यटक मौज मस्ती एवं सैर सपाट के लिए आते हैं। वैसे भी रेल मार्ग से भिलाई से पुरी की दूरी करीब आठ सौ किलोमीटर है। पुरी रवाना होने से पहले वहां जा चुके कुछ साथियों ने अपने अनुभव के साथ-साथ वहां के प्रमुख स्थलों के बारे में बताया, लेकिन वहां की सबसे अहम बात बताना भूल गए। यह तो भला हो उन चार प्रगतिशील किसानों को जो पुरी जाते समय संयोग से मेरे ही डिब्बे में आकर बैठ गए थे। किसी प्रशिक्षण के चलते ये किसान कटक जा रहे थे। उनसे बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर देर तक चलता रहा। पुरी के बारे में कई बातें विस्तार से बताई, जो बाद में वाकई मददगार साबित हुई। मंदिर में दर्शन कैसे करने हैं? कहां ठहरना हैं? समुद्र कैसे जाना है? किस से बात करनी है और किससे नहीं. आदि-आदि..। खैर, प्रगतिशील किसानों का फीडबैक बहुत काम आया लेकिन किसी ने कहा है ना कि अक्ल बादाम खाने से नहीं भचीड़ (धक्के) खाने से आती है। अब तो मैं भी पुरी के बारे में काफी कुछ जान गया। होटल किराया, ऑटो किराया, भोजनालय, मंदिर दर्शन, रुट चार्ट आदि..। दो दिन के सफर और दो दिन वहां रुकने के बाद शुक्रवार दोपहर को मैं भिलाई लौट आया लेकिन पुरी की सूरत एवं सीरत से जुड़े कई संस्मरण ऐसे हैं, जो न केवल मेरे लिए बल्कि पुरी जाने वाले प्रत्येक पर्यटक/ यात्री के लिए न केवल रोचक बल्कि सच्चाई से पर्दा हटाकर वास्तविकता से रूबरू करवाने और आंख खोलने में बेहद कारगार साबित होंगे। वैसे तो संस्मरण का शीर्षक पढ़कर चौंकना लाजिमी है लेकिन यकीन मानिए पुरी से लौटने वाले कमोबेश हर पर्यटक/ यात्री के जेहन में यह बात जरूर रहती है कि पुरी के जगन्नाथ, जग के नाथ ना होकर पैसों के नाथ हैं। नगद नारायण भी कहें तो भी चलेगा। यहां पर भगवान और भक्त के बीच में पुजारी मतलब पण्डा नामक एक ऐसा शख्स है जो कथित रूप से सेतु का काम करता है लेकिन कदम-कदम पर इसकी कीमत वसूलता है। धर्म के नाम पर, अनहोनी के नाम पर.. कुछ अनिष्ट का भय दिखाकर..। और भी कई तरह की औपचारिकताएं...साथ में यह चेतावनी भी कि अगर ऐसा नहीं किया तो यात्रा का प्रयोजन सफल नहीं होगा..। और धर्मभीरु लोग.. चुपचाप किसी अनुशासित बच्चे की तरह पण्डों की हां में हां मिलाते हुए अपनी जेबें ढीली करके खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।.... जारी है।

Monday, December 16, 2013

सादगी और रणनीतिक कौशल के धनी ओला


स्मृति शेष

 
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झुंझुनू रेलवे स्टेशन पर ब्रॉडगेज रेलवे लाइन के कार्य की धीमी गति पर नाराजगी जताते हुए जब केन्द्रीय श्रम मंत्री शीशराम ओला ने कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए थे तो राजनीति हलकों में यह कयास लगाए जाने लगे थे कि ओला फिर से चुनाव लडेंग़े। ऐसा मानने एवं सोचने वाले गलत भी नहीं थे, क्योंकि ओला ने नब्बे के दशक से अब तक लोकसभा के लिए कुल पांच चुनाव लड़े और जीते भी..। हर बार इसी अपील पर कि 'यह उनका आखिरी चुनाव है।' तभी तो चुनाव के दौरान ओला के संसदीय क्षेत्र झुंझुनू में यह जुमला जन-जन की जुबान पर रहता कि 'ओला जी को जिंदा रखना है तो चुनाव जीताओ..।' खैर, उनकी यह मार्मिक अपील हमेशा ही इतनी कारगर रही कि विपक्ष को कोई तोड़ ही नहीं मिला। ओला इस बार भी जीते लेकिन मंत्री नहीं बने तब भी यह जुमला खूब जोर-शोर से उछला था। आखिरकार उनको लालबत्ती फिर नसीब हुई और वे मंत्री बनने में कामयाब रहे लेकिन इस बार की जीत और मंत्री पद ओला की उम्र बढ़ाने में सहायक साबित नहीं हुए। उम्र के 86 बसंत देखने के बाद लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए ओला ने रविवार अलसुबह आखिरी सांस ली।
गांव से लेकर जिले और फिर प्रदेश में लम्बी राजनीतिक पारी खेलने के बाद ओला ने केन्द्र में अपनी ताकत का एहसास करवाया। कांग्रेस में रहते हुए भी और कांग्रेस के बाहर रहकर भी। हालिया विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में हस्तक्षेप के चलते ओला चर्चाओं के केन्द्र में रहे लेकिन बीमारी की वजह से वे चुनाव प्रचार नहीं कर पाए। उनकी बीमारी को भी उनके प्रतिद्वंद्वी एक राजनीतिक स्टंट मान रहे थे। दबी जुबान में यह कहा जा रहा था कि ओला की बीमारी एक बहाना है और वे सहानुभूति बटोरकर वोट पाने के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन ओला इस बार सचमुच बीमार थे। वैसे ओला का चुनाव प्रचार गजब का ही रहता था। वे घर-घर या गांव-गांव जाकर प्रचार करने में विश्वास नहीं करते थे। खुद के चुनाव में तो बिलकुल भी नहीं। लोगों के प्रति उनका विश्वास इतना प्रबल था कि वे झुंझुनू में एक होटल में बैठे-बैठे ही चुनावी गतिविधियों पर नजर रखते थे। पिछले लोकसभा चुनाव में ओला मुश्किल से दो-तीन जगह गए थे। ओला दिन में ही खुद को होटल के कमरे में बंद कर लेते और उनका सहायक कमरे के बाहर ताला लगा देता। बाहर से जब कोई ओला से मिलने आता तो कह दिया जाता कि 'नेताजी तो बाहर गए हुए हैं।' और मिलने वाले विश्वास कर लौट भी जाते..।
यह सच है कि ओला ने जिले की राजनीति में अपने समकक्ष किसी को नहीं आने दिया..। ओला पर अक्सर चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों की खिलाफत कर अपने समर्थकों के लिए काम करने के आरोप लगते रहे लेकिन ओला इन सब आरोपों से बेफ्रिक ही रहे। तमाम विरोधों और आरोपों के बावजूद ओला ने हमेशा अपना वजूद कायम रखा। जिले में नहर लाने की ओला की घोषणा पर तो पता नहीं कितने ही चुटकुले बने लेकिन ओला इन सबसे आहत हुए बिना भी लगातार नहर लाने की टेर लगाए रहे। आखिरी वक्त तक।
उनकी सादगी और रणनीतिक कौशल के कायल तो उनके विरोधी भी रहे हैं। उनके सभी दलों से संबंध थे। झुंझुनू विधानसभा में हर बार यही चर्चा रहती आई है कि कांग्रेस के साथ-साथ दूसरे दलों के प्रत्याशियों का चयन भी ओला ही करवाते हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में भी यही चर्चा थी। खैर, ओला की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि उनका हर गांव से सीधा सम्पर्क रहता था। उनकी याददाश्त भी गजब की थी। भरी भीड़ में जब कोई खड़ा होकर अपना परिचय देता तो ओला झट से उसके गांव और पिता या दादा का नाम तक बता देते। उनकी यही अदा ग्रामीणों को लुभाती थी और उनके लोकप्रिय होने का राज भी थी। आम जनप्रतिनिधियों की तरह ओला ने कभी थाना स्तर की या तबादला करवाने की राजनीति नहीं की। उनकी छवि भी आक्रामक न होकर शांत एवं सादगी पसंद नेता ही रही।
बहरहाल, शिक्षा के मामले में अग्रणी झुंझुनू जिले के लोगों में राजनीतिक जागरुकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि झुंझुनू जिले में शायद ही ऐसा गांव हो जहां दो चार 'शीशराम' ना हो..। उस दौर में पैदा हुए बच्चों के नाम ग्रामीणों ने शीशराम रख दिए थे। यह सब इसीलिए हुआ कि ओला ने साबित कर दिखाया कि एक साधारण परिवार का आदमी भी काफी कुछ कर सकता है। ओला ने ग्रामीणों में उम्मीद जगाई और उनका विश्वास भी जीता.। एक छोटे से गांव के एक साधारण से कृषक परिवार में पैदा होकर राजनीतिक के अर्श तक पहुंचने वाले लोग विरले ही होते हैं। ओला भी उनमें एक थे। जिले में ओला की रिक्तता को भरना मुश्किल भी है।

Saturday, December 7, 2013

दिल है कि मानता नहीं...


पोल अकाउंट

 
सब्र का सैलाब सीमाएं तोडऩे को आतुर हैं..। धैर्य भी धमाल मचाने पर आमादा है। चुनावी चौपालें तो अब चरम पर हैं। संशय व संदेह के बादल छंटने तथा विश्वास को यकीन में बदलने की इच्छाएं अब बलवती हो उठी है। आशंकाओं, अनुमानों, अटकलों एवं आकलनों की असलियत आखिरकार अब सामने आने ही वाली है। फैसला आने का फासला अब सिकुड़कर कुछ घंटों का ही रह गया है। धड़कनों की बढ़ती धक-धक भी किसी लोहार की धौकनी का आभास देने लगी है। निर्णायक घड़ी नजदीक देख आंखों में नींद का दूर तलक कोई नामोनिशान तक नहीं है, जैसे दिन व रात एक हो गए हों। बेचैनी और बेताबी का आलम इस कदर है कि दिलासाएं तक बेअसर हैं। हालात यह हो गए हैं कि अब हकीकत जानने के अलावा कुछ नहीं दिख रहा है। नजर अब केवल नतीजों पर हैं। परिणाम की प्रतीक्षा में पेशानी पर बल सबके हैं। उत्सुकता और इंतजार का आलम खेत से लेकर दफ्तर तक और हर आम से लेकर खास में दिख रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि ईवीएम में लम्बे समय से कैद किस्मत का ताला अब खुलने ही वाला है।
आठ दिसम्बर का दिन..। मेहनत के परिणाम का दिन.. पांच साल की तपस्या का प्रतिफल, जो बोया, उसको पाने का दिन..। किसी को फर्श से अर्श तक पहुंचा देगा तो किसी के सुनहरे सपनों का गला घोंट देगा। पता नहीं कितने ही दावों का दम निकलेगा और कितने ही अरमान दफन होंगे। न जाने कितने दिल टूटेंगे और जुड़ेंगे इस दिन..। किस्मत का सितारा जितनों का चमकेगा.. उससे कहीं ज्यादा का अस्त भी होगा। कहीं खुशियों की बारातें निकलेंगी तो कहीं गम के फसाने होंगे। कहीं जीत के जश्न मनेंगे तो कहीं हार के बहाने होंगे।
खैर, राजनीतिक महारथियों ने किसी न किसी तरीके से संभावित परिणाम की थाह जरूर ले ली है। सभी के पास जीत के दावे हैं। हार की बात तो न कोई करता और ना ही सुनना चाहता है। कई तो ऐसे भी हैं, जिनको वस्तुस्थिति का अंदाजा है, फिर भी झूठ पर झूम रहे हैं, गा रहे हैं। सभी का विश्वास, सच में तभी बदलेगा जब परिणाम सामने आएंगे। आखिर परिणाम ही तो वह चीज है, जो किसी को गुमनामी की गर्त में धकेलेंगे तो किसी को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाएंगे। जनता जर्नादन तो अपना फैसला कर ही चुकी है, बस अंतिम मुहर लगनी है, लेकिन दिल है कि मानता ही नहीं..। तभी तो दिमाग में विचारों का द्वंद्व है। आशंकाओं का आवेग भी उफन रहा है

शुक्रिया अदा करूं या..


बस यूं ही 

 
माताश्री लम्बे से उच्च रक्तचाप से पीडि़त हैं। इस रोग की पुष्टि झुंझुनूं के एक ख्यात चिकित्सक ने काफी पहले की थी। चिकित्सक की सलाह पर तथा रोग पर काबू पाने के लिए उस दिन के बाद माताश्री प्रतिदिन टेबलेट खाने लगीं। यह क्रम करीब सात साल से चल रहा है। पहले वे जो टेबलेट खाती थीं, वह ब्रांड बाजार में आना बंद हो गया तो चिकित्सकों की सलाह पर उसी सॉल्ट की दूसरी टेबलेट बता दी गई। पिछले सप्ताह माताश्री की तबीयत अचानक खराब हो गई तो गांव में हाल ही में खुले प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में पदस्थ चिकित्सक को दिखाया तो उन्होंने कहा कि आप का रक्तचाप तो बेहद हाई है। चिकित्सक के ऐसा कहने पर माताश्री घबरा गईं। ऐसे में पिताजी उसको सुलताना के एक दूसरे चिकित्सक के पास लेकर गए तो उसने कहा कि सब ठीक है। ब्लड प्रेशर भी उतना ज्यादा नहीं है जितना बताया गया है। सुलताना के चिकित्सक के इस दिलासे के बाद माताश्री कुछ सामान्य हुई। आज दोपहर बाद पापा का फोन आया, हालांकि सुबह बात हो चुकी थी। मैंने फोन अटेंड किया तो बोले अपने गांव के डाक्टर की एक शिकायत है। मैंने पूछा क्या हो गया.. तो बोले, आज तेरी मां, गांव वाले डाक्टर के पास चेकअप कराने गई थी..तो डाक्टर ने बताया कि उसको ब्लेड प्रेशर नहीं है। पापाजी चकित थे कि सप्ताह भर पहले जो चिकित्सक ब्लड प्रेशर बेहद हाई बता रहा था वह सप्ताह भर बाद उसके खत्म होने की बात कैसे कह रहा है। पापाजी की बात सुनकर मैं भी आश्चर्य में डूब गया। आखिर सात साल की बीमारी खत्म कैसे हो गई जबकि झुंझुनूं के चिकित्सक ने तो यह कहा था कि यह टेबलेट आपको जिंदगी भर खानी पड़ेगी। समझ नहीं आ रहा है किस पर यकीन किया जाए..। गांव वाले चिकित्सक पर या झुंझुनूं वाले पर। झुंझुनू वाले चिकित्सक को कोसूं या गांव वाले चिकित्सक का शुक्रिया अदा करुं। जानकारी तो यह भी मिली है कि हाल ही में राज्य सरकार ने करीब 20 प्रकार के सॉल्ट की दवा ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए निशुल्क कर दी है। गांव वाले डाक्टर साहब माताश्री को दवा नहीं दे पा रहे हैं या दवा देने से डर रहे हैं यह तो वो ही जाने, फिलहाल तो मैं उनके नम्बर तलाश रहा हूं। जैसे ही मिलेंगे। बात जरूर करूंगा।

डरता हूं तो सिर्फ भगवान से..।


बस यूं ही

 
हाल ही में फेसबुक पर स्लोगन पढ़ा था, उसका मजमून कुछ तरह से था 'जो आपको जानते हैं, उनको बताने की जरूरत नहीं है और जो नहीं जानते उनको बताने से भी कोई फायदा नहीं है। खैर, क्या पता था यह स्लोगन मेरे पर ही चरितार्थ हो जाएगा। आज दोपहर बाद फेसबुक पर मैंने एक फोटो लगाई। मैं हमेशा फोटो का विवरण लिखता हूं लेकिन इस बार यह सोचकर कुछ नहीं लिखा कि देखते हैं फेसबुक के दोस्त क्या अनुमान लगाते हैं। और ऐसा हुआ भी। कई साथियों ने तो बिलकुल सटीक कमेंट लिखे लेकिन कई कमेंट ऐसे भी आए हैं, जिनको पढऩे के बाद इतनी हंसी आ रही है कि पेट में बल पड़ रहे हैं। वैसे तो फोटो पर लाइक एवं कमेंट करने वाले यह सब पढ़ ही चुके होंगे और हो सकता है मुस्कुराए भी हों, लेकिन सब का बारी-बारी से जवाब देना ही उचित रहेगा। संशय किसी भी सूरत में नहीं रहना चाहिए। पहले बात कमेंट्स की। सबसे पहले तौफिक डाबडी झुंझुनूं ने लिखा. डियर सर, वेरी फाइन विद..। उन्होंने सवाल छोड़ दिया। दूसरे नम्बर पर साथी मधुसूदन शर्मा ने लिखा जोड़ी नम्बर वन। ऐसा इसलिए लिखा क्योंकि वो हकीकत से वाकिफ हैं। तीसरे नम्बर पर साथी वीरप्रकाश झाझडिय़ा ने संतुलित कमेंट लिखकर किसी प्रकार की गुंजाइश नहीं छोड़ी.. उन्होंने लिखा नाइस। साथी अशोक शर्मा ने सर... सर... सर.. लिखा। उनके इस तरीके से ऐसा लगा मानो.. उनको यह फोटो अप्रत्याशित लगा हो। खैर, इसके बाद भिलाई के पत्रकार साथी शिवनाथ शुक्ला लिखते हैं.. सीताराम...निर्भर आकाश के पास में पूनम का चांद..। साहित्यिक भाषा में उन्होंने भी साबित कर दिया कि फोटो के ये दो किरदार कौन हैं। बीच में एक कमेंट साथी बलजीत पायल का भी आया था लेकिन वो बेहद मजाकिया था, उन्होंने उसको हटा लिया है। हालांकि लिखते समय उन्होंने लिख दिया था कि गुस्ताखी माफ हो। इसके बाद कैलाश राव ने लिखा .. आदर्श हसबैन्ड बल्कि आदर्श जोड़ी..। पत्रकार हैं, फोटो का मिजाज भांप गए। हकीकत से वाकिफ साथी भगवान सहाय यादव ने लिखा. भाईसाहब परफेक्ट जोड़ी..जियो हजारों साल..। प्यारेलाल चावला के लिए भी इस फोटो में नया कुछ नहीं था तभी तो लिखा.. वाह गुड, रब ने बना दी जोड़ी। कमोबेश ऐसा ही कमेंट्स नीरज शेखावत का रहा है.. रब ने बना दी जोड़ी.. क्योंकि उनके लिए भी कुछ अनजाना नहीं है। हंसमुख और मजाकिया स्वभाव के साथी संदीप शर्मा यहां भी नहीं चूके.. वे लिखते हैं.. राम लक्ष्मण सी जोड़ी बनी रहे..। अरे सॉरी राम-सीता सी। साथी गोपाल शर्मा से तो कुछ छिपा ही नहीं है। वे लिखते हैं.. भगवान इस जोड़ी को जमाने की सारी खुशियां दें। बड़े भाई हैं, इसलिए छोटा होने के नाते मेरा आशीर्वाद का हक तो बनता ही है। और उन्होंने दिया भी। चौंकाने वाला कमेंट्स आया.. झाला सर का। उन्होंने शायद फेसबुक पर मुझे देखा और कमेंट्स लिखा.. महेन्द्र जी, कहां हो.खैर बाद में मैंने फोन पर उनको सारी जानकारी दी। करीब पांच साल बाद उनसे आज फेसबुक के माध्यम से सम्पर्क हुआ। भिलाई के ही साथी अनूप कुमार ने लिखा मैड फोर इच अदर.. । साथी संजय प्रताप ने एक कमेंटस क्या लिखा इसके बाद तो इन्क्वायरी करने वालों में होड़ सी लग गई। सबसे पहले तो संजय प्रताप ने ही लिखा.. सर, हू इज सी, इफ सी इज यूवर लाइफ पार्टनर देन यू आर लकी, एंड नोट देन यू आर नो वेरी वैल..। इसी तरह का सवाल मटाना गांव के साथी महेन्द्र ने पूछा..। वे कहते हैं.. भाईसाहब यह कौन है। कु़छ ऐसा ही सवाल भाईसाहब राजेन्द्रसिंह ने किया। उन्होंने लिखा.. यू नोट गिव डिटेल, हू इज सी, भाई प्लीज गिव इंट्रोडेक्शन..। साथी सतीश अग्रवाल तो कमेंट़स के रूप में किसी पेज का ही प्रचार कर गए। पेज का नाम है, दोस्तों की दुनिया में हम हैं आपके साथ तो फिर करो लाइक..। साथी सुलेमान खान शायद उक्त कमेंट्स से असंतुष्ट नजर आए। वे कोफ्त में कहते हैं.. बड़े अजीब लोग हैं, इतना भी नहीं समझते..। उनका दर्द मैं समझ गया। इसके बाद भाई लक्ष्मीकांत ने लिखा .. रब ने बना दी जोडी..। भाई पत्रकार है अनुमान लगा लिया। और अभी-अभी साथी संजय सोनी ने लिखा है। वे कहते हैं, सदा खुश रहो.. हर खुशी हो तुम्हारे लिए..। बड़े भाई हैं.. ऐसा तो कहेंगे ही। खैर इन सबके अलावा पांच दर्जन लाइक भी आए हैं। सबसे पहले तो सभी का आभार। इस प्रकार स्नेह बनाए रखने के लिए। दूसरी बात यह है कि जो इतना कहने पर भी नहीं समझे तो बता देता हूं फोटो में मेरे साथ खड़ी महिला मेरी अद्र्धांगिनी निर्मल राठौड़ है। यहां किसी दूसरी की गुंजाइश ही नहीं है। कतई नहीं, बिलकुल नहीं..। सपने में भी नहीं। यकीन करो, यह मैं डर कर नहीं.. हकीकत बता रहा हूं। डरता हूं तो सिर्फ भगवान से।

Friday, November 29, 2013

इस बार रोचक होगा दुर्ग का दंगल


दुर्ग विधानसभा

दुर्ग शहर के दंगल में इस बार भी भाजपा व कांग्रेस के परम्परागत दिग्गज ही दिखाई देंगे। इस विधानसभा क्षेत्र में अब तक हुए 13 मुकाबलों में नौ में जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस को पिछले तीन चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। यह भी संयोग है कि 1993 से हेमचंद यादव व अरुण वोरा चुनाव लड़ते आ रहे हैं। इस चुनाव में वोरा के पक्ष में माहौल है। इस क्षेत्र से कांग्रेस कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा पांच बार विधायक रहे हैं। इसके बाद उनकी विरासत उनके पुत्र अरुण वोरा ने सम्भाली, लेकिन वे केवल एक बार ही जीत दर्ज कर पाए।
भाजपा के हेमचंद यादव यहां से तीन बार जीत चुके हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भिलाई में चुनावी सभा को संबोधित कर माहौल पक्ष करने में प्रयास तो भाजपा के नरेन्द्र मोदी भी दुर्ग सभा कर मतदाताओं को रिझाने की कोशिश की। राजबब्बर भी अरुण वोरा के समर्थन में सभा कर चुके हैं। इसके अलावा घर-घर दस्तक देने व जनसम्पर्क करने का काम भी गति पकड़ चुका है।
नाम वापसी के बाद मैदान में कुल 18 प्रत्याशी डटे हुए हैं। यहां से बसपा, सपा, एनपीपी एवं शिवसेना ने भी प्रत्याशी खड़े किए हैं, लेकिन इनमें कोई मुकाबले में दिखाई नहीं दे रहा है। इधर, महापौर के चुनाव में करीबी मुकाबले में हारे छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के राजेन्द्र साहू भी मैदान में हैं। ऐसे में मुकाबला रोचक एवं त्रिकोणीय होने के आसार बन गए हैं। हार-जीत को लेकर सभी के अपने-अपने दावे हैं, लेकिन फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। पिछली बार हार-जीत का अंतर करीबी होने के कारण मुकाबला दिलचस्प होना तय माना जा रहा है। क्षेत्र में साहू, कुर्मी, अल्पसंख्यक एवं मारवाड़ी मतदाताओं की बहुलता है।
विकास बनाम भ्रष्टाचार
चुनाव में फिलहाल विकास बनाम भ्रष्टाचार की प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। भाजपा प्रत्याशी जहां विकास के नाम पर वोट मांग रहे हैं और कांग्रेस व भाजपा शासन की तुलना कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं। वे शहर की कानून व्यवस्था व भ्रष्टाचार को ही अपना हथियार बनाए हुए हैं। वैसे कांग्रेस प्रत्याशी सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे हैं। इधर मंच प्रत्याशी भी कई जन आंदोलनों से जुड़े रहे हैं।
मुद्दे दिखाएंगे असर
भाजपा प्रत्याशी भले की विकास का दावा करें, लेकिन हकीकत इससे उलट ही दिखाई देती है। निगम में भी भाजपा के महापौर होने के बावजूद कई जगह तो दुर्ग शहर की हालात ग्रामीण क्षेत्रों से भी बदतर है। बदहाल सड़कों की हालत में सुधार नहीं हुआ। पेयजल आपूर्ति हर दूसरे तीसरे दिन प्रभावित होती रही। कभी पाइपलाइन फूटने के नाम पर तो कभी लाइन बदलने के नाम पर। शहर में बढ़ते अपराधों पर कारगर अंकुश नहीं लग पाया। नशे का कारोबार भी बेखौफ चलता रहा।
थाह लेना मुश्किल
दुर्ग में मतदान का प्रतिशत 60-65 के बीच ही रहता आया है, लेकिन दुर्ग का चुनाव जरूर चर्चा में रहता है। इस बार भी परम्परागत चेहरे मैदान में हैं, लिहाजा मतदाताओं में वैसा उत्साह नहीं दिख रहा है। हालांकि मंच की उपस्थिति से मुकाबला रोचक होना तय है और इसी वजह से लोग खुलकर कुछ नहीं बोल पा रहे हैं। ऐसे में उनकी थाह लेना या मानस टटोलना टेढ़ी खीर है। अपनी पसंद व नापंसद को वे सीधे तौर पर जाहिर भी नहीं कर रहे हैं। मतदाताओं की यह खामोशी क्या गुल खिलाएगी यह तो समय के गर्भ में है, लेकिन दुर्ग के दंगल में इस बार घमासान जोरदार होगा।

 साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ में 18 नवम्बर 13 के अंक में प्रकाशित।

पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच कांटे की टक्कर

साजा विधानसभा


कृ षि प्रधान क्षेत्र साजा में इस बार भी मुकाबला उन्हीं प्रतिद्वंद्वियों के बीच है, जो पिछले चुनाव में आमने-सामने थे। पिछले चुनाव में हार का अंतर कम होने के कारण भाजपा ने बजाय कोई नया प्रयोग करने की उसी प्रत्याशी को मैदान में उतार दिया है। भाजपा प्रत्याशी लाभचंद बाफना को मुख्यमंत्री का नजदीकी होने के कारण चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई से जोड़ कर देखा जा रहा है। तभी तो इस क्षेत्र में मुख्यमंत्री सहित भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वेकैंया नायडू, फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी, मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती आदि चुनावी सभाएं कर चुके हैं, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी फिलहाल अकेले की प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। उनके समर्थन में पार्टी का कोई बड़़ा नेता नही आया है।
चुनाव प्रचार में इस प्रकार का अंतर इसलिए भी है, क्योंकि कांग्रेस प्रत्याशी रविन्द्र चौबे यहां से लगातार छह बार जीत दर्ज कर चुके हैं, जबकि भाजपा को यहां खाता खुलने का इंतजार है। यह बात दीगर है कि 1977 में साजा विधानसभा क्षेत्र जब अस्तित्व में आया, उस वक्त पहले विधायक जनता पार्टी के बने थे। इसके बाद से इस सीट पर लगातार कांग्रेस ही जीतती आई है। यह भी संयोग है कि अब तक जितने भी प्रत्याशी यहां से जीते हैं, सभी एक ही परिवार से संबंधित हैं। कांग्रेस के रविन्द्र चौबे ने सबसे बड़ी जीत 1998 में दर्ज की थी, जब वे 24 हजार 318 मतों से विजयी रहे थे। सबसे कम अंतर की जीत पिछले चुनाव में थी, जब वे महज 5055 मतों से जीत पाए।
भाजपा के बढ़े वोट
भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि पिछले दो चुनाव में उसके प्रत्याशी हारे जरूर हैं, लेकिन कुल वोट हासिल करने का ग्राफ बढ़ा है। 2003 में भाजपा प्रत्याशी को 40 हजार 831, जबकि 2008 में 58 हजार 720 मत मिले। इधर कांग्रेस प्रत्याशी ने 2003 में 58 हजार 573 तथा 2008 में 63 हजार 775 मत मिले। इस प्रकार भाजपा ने जहां अपने कुल मतों में 17 हजार 889 मतों की वृद्धि की, जबकि कांग्रेस ने 5 हजार 202 वोट बढ़ाए। साजा से इस बार आठ प्रत्याशी मैदान में हैं। छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच ने रामकुमार साहू को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस के पूर्व विधायक किशनलाल कुर्रे भी इस बार बतौर निर्दलीय साजा से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। फिर भी मुख्य मुकाबला भाजपा एवं कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है। साजा में लोधी एवं साहू समाज की बाहुल्यता है। इनके मत ही हमेशा निर्णायक रहते आए हैं।
वास्तविक मुद्दे गौण
साजा कृषि प्रधान क्षेत्र है। धान, सोयाबीन, चना, अरहर, टमाटर एवं हरी सब्जियों के उत्पादन में यह क्षेत्र अग्रणी है। यहां कृषि रकबा भी प्रदेश में अव्वल है। इतना कुछ होने के बाद भी दोनों दलों की ओर से कृषि आधारित शिक्षा एवं उद्योग के लिए कोई पहल नहीं की गई है। सिंचाई का पानी भी इस क्षेत्र में बड़ा संकट है। सूतियापाट-नरोधा डेम का पानी इस इलाके में लाने के लिए बनी योजना भी समय के साथ दफन हो गई। इसके अलावा क्षेत्र में कई जगह पेयजल संकट भी है। सूरही नदी का पानी रोकने के लिए कई जगह स्टॉप डेम बनाए गए, लेकिन यहां पानी रुकता नहीं है, इस कारण किसानों को उतना लाभ नहीं मिल पाता। हालांकि पानी को रोकने के लिए दर्जनभर स्टॉप डेम बनाए गए हैं, लेकिन वे ऐसी जगह बने हैं जहां पानी रुकता नहीं है। क्षेत्र में चिकित्सा एवं उच्च शिक्षा की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं है। इतने सारे मुद्दे होने के बावजूद इस संबंध में दोनों दलों की तरफ से कोई ठोस घोषणा नहींं की गई है।
आरोप-प्रत्यारोप का दौर
साजा विधानसभा में फिलहाल मुद्दे गौण हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर जरूर चल रहा है। एक-दूसरे को जनता का हितैषी एवं सच्चा सेवक बताकर मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किया जा रहा है। भाजपा प्रत्याशी लाभचंद बाफना मतदाताओं के समक्ष खुद को जनता का सेवक होने तथा पांच साल के लिए सेवा का मौका देने के नाम पर वोट मांग रहे हैं, जबकि चौबे इसको पंूजीपति बनाम किसान की लड़ाई करार देते हुए मैदान में डटे हैं। चौबे कह रहे हैं कि वे स्वयं किसान हैं, इस कारण किसानों के दुख-दर्द बेहतर तरीके से समझते हैं।

 साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ में 16 नवम्बर 13 के अंक में प्रकाशित।

प्रचार से अब तक मुद्दे गायब

पाटन विधानसभा

दुर्ग जिले की पाटन विधानसभा में एक बार फिर मुख्य मुकाबला दोनों रिश्तेदारों एवं परम्परागत प्रतिद्वंद्वियों के बीच ही माना जा रहा है। कहने को यहां बसपा एवं स्वाभिमान मंच ने भी प्रत्याशी उतारे हैं, लेकिन वे अभी तक मुकाबले में दिखाई नहीं देते हैं। नामांकन वापसी के बाद यहां से कुल 11 प्रत्याशी मैदान में हैं। भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल यहां से तीसरी बार, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी भूपेश बघेल पांचवीं बार मैदान में हैं। विजय बघेल यहां से एक बार जबकि भूपेश बघेल तीन जीत चुके हैं। सन 1977 में अस्तित्व में आए इस विधानसभा क्षेत्र में अब तक आठ मुकाबलों में छह में बाजी कांग्रेस के हाथ लगी है, जबकि दो बार भाजपा ने जीत हासिल की है। पाटन विधानसभा क्षेत्र में मुकाबले हमेशा रोचक ही रहे हैं और हार-जीत का अंतर हमेशा आठ हजार मतों से कम ही रहता है। मजे की बात तो यह है कि यहां सबसे बड़ी जीत 1980 में 7983 मतों से कांग्रेस प्रत्याशी के नाम दर्ज है, तो सबसे कम अंतर 1985 में 2934 मत की जीत का सेहरा भी कांग्रेस के सिर पर ही बंधा है।
कुर्मी एवं साहू समाज निर्णायक
पाटन विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी एवं साहू समाज की भूमिका हर बार निर्णायक रहती हैं, क्योंकि क्षेत्र में दोनों समाज की बहुलता है। इसके अलावा अनुसूचित जाति के रूप में सतनामी समाज की भी यहां अच्छी खासी दखल है। पिछले चुनाव में भाजपा का समर्थन करने वाले साहू समाज ने इस बार टिकट वितरण के दौरान भाजपा प्रत्याशी के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए टिकट मांगा था। अगर यह नाराजगी मतदान तक कायम रही तो फिर विजय बघेल के लिए खतरा हो सकता है। भाजपा एवं कांग्रेस दोनों के प्रत्याशी कुर्मी जाति से हैं, ऐसे में छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच ने यहां दीनू साहू को टिकट थमाया है, लेकिन उससे नुकसान कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को ज्यादा होने के आसार हैं।
लगातार बढ़ रहा है जीत का अंतर
एक रोचक तथ्य यह भी जुड़ा है कि 1985 के बाद से लगातार जीत का अंतर बढ़ रहा है, जो पिछले चुनाव में 7842 था। बुनियादी सुविधाओं में पिछड़ा होने के बावजूद पाटन विधानसभा क्षेत्र के लोग मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। पिछले विधानसभा में यहां 79 प्रतिशत मतदान हुआ था। बहरहाल, चुनावी शतरंज पर पुराने खिलाड़ी होने की वजह से मतदाताओं में खास उत्साह दिखाई नहीं देता है। भाजपा प्रत्याशी के जहां अपने कार्यकाल की 'उपलब्धियों एवं 'विकास के नाम पर मतदाताओं के बीच वोट मांग रहे हैं, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी अपने कार्यकाल की तुलना करते हुए जनता के बीच हैं, लेकिन 'विकास के शोर में क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे गौण हो गए हैं।
अधूरी घोषणाएं पड़ सकती हैं भारी
पाटन विधानसभा क्षेत्र के लोग प्रत्याशियों के मुंह से विकास के दावे सुनकर हैरान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर विकास कहां हुआ है। देखा जाए तो मतदाताओं की यह हैरानी जायज भी है। क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं भी लोगों को ठीक से मयस्सर नहीं हैं। क्षेत्र में कई प्रमुख मुद्दे हैं, जो इस बार चुनाव में रंग दिखा सकते हैं। उपकोषालय के यहां के लोगों को दुर्ग जाना पड़ता है। ग्रामीणों की मानें तो मुख्यमंत्री ने यहां छह माह में उपकोषालय की घोषणा की थी, लेकिन वह घोषणा अमल में नहीं आई। आईटीआई भी पाटन में न खुलकर दरबारमुखली में खुल गई, लेकिन वहां भी उसमें संसाधनों का अभाव है। पाटन में महिला महाविद्यालय की मांग भी अधूरी ही रह गई। इसके अलावा नल योजना व वृहद पेयजल योजना भी यहां के प्रमुख मु्द्दे हैं। क्षेत्र की टूटी-फूटी सड़कें भी इस बार चुनाव में प्रभावी भूमिका निभाएंगी। इतना ही नहीं हाल में करोड़ों रुपए के बजट से बनाई गई सड़कें तो दो माह भी नहीं चल पाई। सड़क निर्माण में हुई अनियमितता के चलते लोगों में आक्रोश है।

2008 में मतदाता  155806
2013 में मतदाता 170581
मतदाता बढ़े 14775
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 साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ में 15 नवम्बर 13 के अंक में प्रकाशित।

नई बिसात, पुराने मोहरे

भिलाईनगर विधानसभा

प्रदेश के सर्वाधिक साक्षर एवं जागरूक विधानसभा क्षेत्र भिलाईनगर के साथ यह विडम्बना जुड़ी है कि इस बार चुनावी बिसात में भी वो ही चेहरे आमने-सामने हैं, जो न केवल पिछले चुनाव बल्कि बीस साल से एक-दूसरे के खिलाफ जोर आजमाइश करते आए हैं। आचार संहिता की सख्ती एवं मतदाताओं की चुप्पी ने प्रत्याशियों के समक्ष दुविधा खड़ी कर दी है। तभी तो राजनीति के खांटी खिलाड़ी एवं परम्परागत प्रतिद्वंद्वियों को इस बार जीत के लिए खूब पसीना बहाना पड़ रहा है। मतदान में मात्र सप्ताहभर का समय शेष होने के बाद भी कोई भी जीत के प्रति आश्वत दिखाई नहीं दे रहा है। इतना ही नहीं प्रत्याशियों के समर्थकों में भी बेचैनी कुछ कम नहीं। वे भी कुछ भी हो सकता है, मान कर चल रहे हैं। इन सब को देखते हुए भिलाईनगर का चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प एवं कांटे की टक्कर वाला होने की उम्मीद लगाई जा रही है। भाजपा के प्रेमप्रकाश पाण्डेय लगातार छठी बार भाग्य आजमा रहे हैं तो कांग्रेस के बदरुद्दीन कुरैशी भी लगातार पांचवीं बार मैदान में हैं। पाण्डेय तीन बार जीत चुके हैं, जबकि कुरैशी दो बार। नामांकन वापसी के बाद भिलाईनगर से कुल १८ प्रत्याशी मैदान में हैं। पिछले चुनाव में यहां से 12 प्रत्याशी मैदान में हैं। निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या में वृद्धि होने के भी राजनीतिक गलियारों में कई तरह के अर्थ लगाए जा रहे हैं। सांसद सरोज पाण्डेय की भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में सभाओं को लेकर भी लोग कई तरह के कयास लगा रहे हैं।
कोई नया मुद्दा नहीं
जागरूक विधानसभा क्षेत्र के लिए प्रत्याशियों के पास कोई नया मुद्दा नहीं है। भाजपा के प्रेमप्रकाश पाण्डेय अपने पुराने कार्यकाल में किए गए कार्यों के सहारे की चुनावी वैतरणी पार करवाने के प्रयास में जुटे हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी कुरैशी भी श्रमिकों के सम्मान और गांधी जयंती पर प्रतिभावान विद्यार्थियों को पुरस्कृत करने को ही अपनी उपलब्धि मानते हुए इससे भुनाने का उपक्रम कर रहे हैं।
जमने लगी है चुनावी रंगत
नामांकन वापसी तथा दीपोत्सव व छठ पर्व के बाद भिलाईनगर विधानसभा क्षेत्र में चुनावी रंगत रफ्ता-रफ्ता जमने लगी है। मतदान की तिथि नजदीक आने के साथ ही प्रत्याशियों के जनसम्पर्क अभियान में यकायक गति आ गई है। नुक्कड़ नाटकों एवं गली-गली में जनसम्पर्क का सिलसिला भी परवान पर है। प्रत्याशियों के परिजनों ने भी मोर्चा संभाल लिया है। वैसे चुनाव का ज्यादा असर पटरीपार के खुर्सीपार इलाके में ज्यादा देखने को मिल रहा है। घर-घर भाजपा-कांग्रेस के झंडे टंगे हुए हैं। टाउनशिप में इस प्रकार का माहौल नहीं है, लेकिन प्रमुख रास्तों पर लगाए गए होर्डिंग्स आने-जाने वालों का ध्यान जरूर खींचते हैं। भाजपा प्रत्याशी की कार्ययोजना में भिलाई को विकास की दौड़ में सबसे आगे खड़ा करना और टाउनशिप को फिर से पुराना स्वरूप देने का की है, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी भिलाई को शांति और अमन की राह पर ले जाने तथा गुण्डागर्दी खत्म कर लोगों में एकता स्थापित करने का सपना लिए चुनावी समर में डटे हैं।
मंच ने उतारा प्रत्याशी
चुनावों की घोषणा होने तक चुप्पी साधने के बाद छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच ने यहां से अपना प्रत्याशी मैदान में उतार दिया है। भाजपा प्रत्याशी के खेमे में इस बात को लेकर खुशी व्यक्त की जा रही है। दरअसल ऐसा इसलिए हो रहा है कि पिछले चुनाव में मंच ने भाजपा के प्रत्याशी के खिलाफ प्रचार कर अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस प्रत्याशी की मदद की थी। भाजपा समर्थक मानते हैं कि इस बार मंच का उम्मीदवार खड़ा होने से नुकसान कांग्रेस को होगा। भाजपा प्रत्याशी के समर्थक इस बात को गाहे-बगाहे भुना भी रहे हैं। इधर, कांग्रेस समर्थकों का मानना है कि मंच ने भले ही उम्मीदवार खड़ा कर दिया, लेकिन वह कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगा इस बात के आसार कम हैं।
बदरुद्दीन कुरैशी 52848
प्रेमप्रकाश पाण्डे 43985
जीत का अंतर 8863

 साभार : पत्रिका छत्तीसगढ़ में 12 नवम्बर 13 के अंक में प्रकाशित।