Tuesday, November 14, 2017

कोढ़ में खाज

टिप्पणी
पार्क किसी भी शहर की खूबसूरती और विकास का आईना माना जाता है। पार्क से शहर की पहचान भी होती है। पार्कों की दशा ही उस शहर के जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों की विकास के प्रति सोच के साथ-साथ यह भी बताती है कि वहां के लोग कितने जागरूक हैं। वैसे महज चारदीवारी के अंदर का भूखंड ही पार्क नहीं होता है। जहां हरी-भरी दूब, छायादार पेड़ व झूले आदि ही न हों, वह कैसा पार्क होगा समझा जा सकता है। पार्क वह, जहां पहुंचकर या बैठकर मन को सुकून मिलता है। जहां का स्वच्छ वातावरण और शुद्ध-ताजी हवा तन-मन में स्फूर्ति भरते हैं। जहां घर के समकक्ष आनंद की अनुभूति होती है। जहां बच्चे भरपूर मनोरंजन करें, मस्ती में खेलें तथा बुजुर्ग जी भर के बतियाएं आदि-आदि।
बदकिस्मती देखिए श्रीगंगानगर में कुछेक पार्क को छोड़कर कोई भी एेसा नहीं है जिसका नाम गर्व के साथ लिया जा सके या जिसका नाम लेते ही जेहन में सुखद एहसास हो। अधिकतर पार्क बदहाली के भंवर में फंसे हैं। प्रशासनिक उदासीनता के शिकार हैं। इन पार्कों की दशा देखकर मन में कोफ्त होती है। दुख होता है। व्यवस्था को कोसने को मन करता है। इन सब के बीच एक बात जो बेहद शर्मनाक होने के साथ-साथ अखरने वाली भी है, वह है बरसाती पानी को पार्कों में छोडऩे का फैसला। यह बरसाती पानी अगर सामान्य पानी हो तो कोई बात नहीं है लेकिन यह वह पानी है जो निकासी के अभाव में रास्तों में जमा होता है और प्रशासनिक अमला राहत के नाम पर मोटर लगाकर यह पानी पार्कों में खाली करवाता है। इन सब बातों को नजरअंदाज करके कि इस बरसाती पानी में नालियों का रोजमर्रा का मल-मूत्र व दूषित पानी भी मिला हुआ है। इस तरह का दूषित पानी पार्कों में छोडऩा कोढ में खाज के समान ही है। फौरी राहत के चक्कर में इस तरह करना उचित नहीं है। कल्पना कीजिए बदहाल पार्कों मंे इस तरह का दूषित पानी वहां के वातावरण को कितना प्रदूषित करेगा। शुद्ध ताजा हवा तथा सुकून की उम्मीद में पार्क में आने वालों को यह सब कितना अखरेगा। प्रशासनिक अमला इन सब से अनचान और अपनी खाल बचाने के लिए यह रास्ता लंबे समय से अपनाता आया है लेकिन यह सिलसिला कभी तो रुके। कभी तो ठोस समाधान हो।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 21 जून 17 के अंक में प्रकाशित 

खेल को खेल ही रहने दो कोई नाम न दो


बस यूं ही
सोशल मीडिया पर कल हॉकी का जोरदार जलवा दिखाई दिया। वह हॉकी जो राष्ट्रीय खेल होने के बावजूद हमेशा नेपथ्य में रहती आई है। वह हॉकी जो ग्लेमर की चकाचौंध से दूर रही है। वह हॉकी जो विज्ञापन की चमक से अछूती है। और तो और जिसके सभी खिलाडि़यों के नाम भी शायद ही किसी को याद हों। अधिकतर तो यह बताने की स्थिति में भी नहीं होंगे कि जिस प्रतियोगिता में भारत कल जीता, उससे पहले उसका मुकाबला किन-किन देशों से हुआ तथा उनको कितने अंतर से पराजित किया। यह तो संयोग रहा कि कल क्रिकेट में भारत की पाकिस्तान के हाथों करारी हार हो गई और हॉकी यकायक लोकप्रिय हो गई। हॉकी की जीत ने भारत-पाक क्रिकेट मैच की शुरू से आलोचना करने वालों को बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया। खुश होने की वजह दे दी। हार को भुलाने का बहाना दे दिया। बस फिर क्या था, पिल पड़े क्रिकेट पर। विशेषज्ञों की तरह तर्क व दलीलें दी जाने लगी। हॉकी की शान में पता नहीं क्या-क्या कहा जाने लगा। क्रिकेट को गुलामी का प्रतीक, अंग्रेजों का खेल, समय बर्बाद करने वाला और न जाने क्या-क्या कह दिया गया। फिर भी सवाल उठता है कहीं यह हार की खीझ तो नहीं?
खैर, गरमागरम बहस व चर्चा के बीच मेरा दावा है अगर यही परिदृश्य उलटा होता मतलब हॉकी या क्रिकेट दोनों में ही जीत मिलती, या केवल क्रिकेट में जीतते तो इस तरह विशेषज्ञों की या हॉकी प्रेमियों की फौज खड़ी नहीं होती। दरअसल, खेल पसंद से जुड़ा विषय है। किसी को क्रिकेट से प्रेम है तो किसी को हॉकी से हो सकता है। प्रेम कैसा व कितना है इसका कोई पैमाना नहीं लेकिन मैदानों पर दर्शकों की भीड़ यह तय जरूर कर देती है कि लोकप्रियता किस खेल की है। वैसे खेल हमेशा भावना से जुड़ा होता है। अब जिसकी भावना जिस खेल से जुड़ी है लाजिमी है,वह उसमें जीत ही चाहेगा। भारत-पाक के बीच किसी भी तरह का मैच हो वह रोमांच व धड़कनें बढ़ाने वाला इसीलिए भी होता है क्योंकि खेल प्रेमी इसे एक मैच न मानकर युद्ध की तरह मानते हैं। निष्कर्ष के रूप में मेरा तो यही कहना है कि खेल को खेल ही रहने दो कोई नाम न दो। और हां सियासत या किसी वाद का मुलम्मा तो बिलकुल भी मत चढाओ।

अंधेर नगरी!

 टिप्पणी 
श्री गंगानगर में शनिवार को केवल 34.6 एमएम बरसात ने शहर को बदहाल कर दिया। अधिकतर छोटे-बड़े रास्ते नालों व नहरों में तब्दील हो गए। कई जगह तो आवागमन तक बाधित हो गया। शहर भर इस तरह की तस्वीर को किसी फिल्म का एक छोटे से ट्रेलर की तरह माना जा सकता है, क्योंकि अभी मानसून की बारिश बाकी है। तब तस्वीर और भी भयावह और डरावनी होगी। दरअसल, शहर के लोग तो इस तरह के संकट को सहने को मजबूर हैं। लेकिन जो इस संकट को जान कर भी अनजान बने हैं या हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, वे शहर के जिम्मेदार हैं।
मतलब जनप्रतिनिधि और अधिकारी। क्योंकि एेसा हर साल होता है। बरसात भी हर साल होती है और शहर थम सा जाता है। रास्तों में पानी इतना भर जाता है कि दुपहिया तो क्या चौपहिया वाहन तक नहीं निकल सकता है। हताश, उदास लोग मदद के लिए चिल्लाते हैं तो फिर जिम्मेदार हरकत में आते हैं। राहत के नाम पर हाथ-पैर मारते हैं। वैकल्पिक जुगाड़ करते हैं। कहीं मोटर से पानी निकासी करवाते हैं तो कहीं किसी नाले में कट लगाते हैं। हर साल इसी तरह के फौरी उपाय किए जाते हैं। शनिवार की बरसात के बाद भी इसी तरह के उपाय किए गए। खैर, इन सब के बीच सवाल यह उठता है कि यह वैकल्पिक उपाय कारगर कितने हैं। सवाल यह भी है कि वातानूकुलित कक्षों में बैठकर शहर के विकास का खाका खींचने वाले, विकास की गंगा बहाने के नारे देने वाले तथा सब्जबाग व सुनहरे सपने दिखाने वाले जिम्मेदारों के पास इस समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं हैं? पानी निकासी की दूरगामी योजना क्यों नहीं है? और फिर समाधान या दूरगामी योजना ही नहीं है तो कैसे मिलेगी इस संकट मुक्ति? वक्त बहुत गुजर चुका है, लेकिन शहर अब इस समस्या का समाधान चाहता है। स्थायी व ठोस समाधान। वैकल्पिक उपायों के सहारे आखिर कब तक श्रीगंगानगर के लोग काम चलाते रहेंगे। कब तक शहर बरसात के मौसम में अग्नि परीक्षा देता रहेगा। बहरहाल इस 'अंधेरी नगरी' को कुशल प्रशासक व दूरदर्शी सोच वाले जनप्रतिनिधियों की दरकार है। और हां संभव भी तभी होगा जब जनता जागे। भेड़चाल को छोड़े। मजबूरी व लाचारी का लबादा उतारे तथा सहने की प्रवृत्ति से उबरे व जिम्मेदारों से सवाल-जवाब करे।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 18 जून 17 के अंक में प्रकाशित

सोच

लघुकथा
वह शाम को आफिस से थोड़ा जल्दी ही निकली थी। शाम को दोस्तों के साथ फिल्म देखने का प्लान जो था। फिल्म का समय होने को था। इसी जल्दबाजी में उसने पर्स से डियो निकाला कर फटाफट कपड़ों पर स्प्रे किया। इसके बाद क्रीम निकालकर चेहरे पर पोती। फिर उसने लिपिस्टिक निकालकर बड़े ही बेफिक्री वाले अंदाज में होठों पर फेरी। उसको यह सब करते देख गेट पर बैठे सुरक्षाकर्मी से रहा नहीं गया। उसके मुंह से न चाहते हुए भी निकल ही गया 'मैडम, घर जा रही हो या डांस में.' सुरक्षाकर्मी के मुंह से यह सुनकर युवती ने आंखें तरेरी और 'बकवास मत कर' कह कर फट से निकल गई। सुरक्षाकर्मी उसको देखकर अवाक सा रह गया। दरअसल, सुरक्षाकर्मी को युवती के प्लान की जानकारी नहीं थी। दोनों का वार्तालाप सुन रहा तीसरा शख्स जो अब तक खामोश था, वह भी सुरक्षाकर्मी की सोच पर मंद-मंद मुस्कुराने लगा था।

यह औपचारिकता छोडि़ए...

टिप्पणी
नगर विकास न्यास की आेर से इन दिनों रिक्शों पर लाउड स्पीकर के माध्यम से मुनादी करवाई जा रही है। इसमें कहा जा रहा है कि सूरतगढ़ मार्ग पर शिव चौक से लेकर बाइपास तक सड़क पर रेता-बजरी बेचने वालों सहित जिस जिस ने भी अतिक्रमण कर रखा है, वह उसको हटा लें नहीं तो न्यास की ओर से कार्रवाई की जाएगी। खास बात यह है कि यह मुनादी अतिक्रमण वाले क्षेत्र के साथ-साथ शहर के अंदरुनी हिस्सों में भी की जा ही है। शायद न्यास के नुमाइंदों का एेसा मानना रहा होगा मुनादी शहर भर में होनी चाहिए ताकि लोगों को पता चले कि वाकई न्यास अतिक्रमण हटाने को लेकर गंभीर है। खैर, यह मुनादी औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं है। बरसात के मौसम को देखते हुए न्यास को अपने क्षेत्राधिकार वाले हिस्सों के नालों की सफाई करवानी है।
फिलहाल नालों की सफाई में अतिक्रमण बाधक बन रहा है और इसीलिए न्यास को इस अतिक्रमण की याद आई है। देखा जाए तो यह अतिक्रमण कोई नया-नया नहीं हुआ है। एेसा भी नहीं है कि न्यास के नुमांइदों की नजर में पहली बार आया है। दरअसल, इस मार्ग पर अतिक्रमण लंबे समय से है। इस मार्ग पर कहीं ट्रैक्टर ट्रालियां खड़ी रहती हैं तो कहीं ट्रक पार्क किए जा रहे हैं। रेता-बजरी का कारोबार बीच सड़क पर बेखौफ हो रहा है। इस वजह से दिन में न जाने कितनी ही बार यातायात बाधित या प्रभावित होता है। राजस्थान पत्रिका में इस अतिक्रमण को लेकर लगातार सिलेसिलेवार खबरें भी प्रकाशित की जाती रही हैं। लेकिन न्यास के नुमाइंदों के कानों पर किसी तरह की जूं नहीं रेंगी। अब मानसून की आहट से इनके हाथ पांव फूले हैं। अगर यह नुमाइंदे अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई समय-समय पर करते तो आज यह हालात ही नहीं होते। सड़क पर अतिक्रमण न्यास की उदासीनता या शह के बिना संभव ही नहीं है।
बहरहाल, अब इस मुनादी से भी न्यास के नुमाइंदों की मंशा पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। इससे तो यही जाहिर होता है कि किसी न किसी तरह से इस गीदड़ भभकी से एक बार अतिक्रमण हट जाएं/ हटा लें ताकि नाले की सफाई हो जाए। यह एक तरह की लाचारी ही तो है। यह लाचारी भी बहुत कुछ कहती है। तभी तो मुनादी में गंभीरता कम औपचारिकता ज्यादा नजर आती है। और जब तक यह औपचारिकता निभाई जाती रहेगी समस्या के स्थायी समाधान की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती। न्यास के नुमाइंदे वाकई शहर हित चाहते हैं तो उनको यह रस्मी और औपचारिकता वाली कार्रवाई छोडऩी होंगी। क्योंकि इनसे जनता का भले नहीं होना वाला।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 13 जून 17 के अंक में प्रकाशित

आज बैठे-बैठे यूं ही


तकलीफ, ईष्र्या, पीड़ा, दुख, दर्द, जलन, कोफ्त, पूर्वाग्रह आदि एेसे शब्द हैं जिनके पीछे इमोशंस जुड़े हैं। और यह भी सच है कि यह सभी शब्द नकारात्मक हैं। यह बात दीगर है कि इमोशंस के साथ पॉजिटिव शब्द भी जुड़े हैं। खुशीं, सुख, आदि भी तो भाव ही हैं। तो क्या यह समझ लेना चाहिए जो भावुक नहीं है वह इन सब चीजों से परे है। वैसे मेरा मानना है कि मनुष्य जीवन भाव शून्य हो नहीं सकता। भाव शून्य जीवन तो पत्थर के जैसा ही है। हां यह जरूर है कि जीवन में सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही तरह के भाव समानांतर चलते हैं। इसलिए जहां भाव है, वहीं भावनाएं हैं। यह शोध का विषय जरूर हो सकता है कि भावना की कद्र करने वाला ही तकलीफ क्यों पाता है तथा कद्र न करने वाला क्या सच में ही पत्थर है या भावनाओं को नजरअंदाज करता है। दरअसल, वह सावर्जनिक मंच पर भले ही भावनाओं पर काबू कर ले लेकिन एकांत में यही भावनाएं उसे कचोटती हैं। यकीनन रह-रह कर। भावनाओं के इस आवेग को प्रदर्शित करने व न करने को आप कथनी और करनी में भेद के मुहावरे से अच्छी तरह समझ सकते हैं।

जियोनी तो जान की आफत


बस यूं ही
चाइनीज सामान को लेकर अपने देश में अक्सर एक जुमला चलता है, 'चले तो चांद तक ना चले तो शाम तक।' यह बात अगर मोबाइल के संदर्भ में करें तो सटीक बैठती है। हो सकता है किसी का अनुभव चांद वाला रहा हो लेकिन मेरा अनुभव शाम वाले से भी बदत्तर रहा है। करीब सात साल बाद मैंने मोबाइल खरीदने का मानस बनाया तो जेहन में यही ख्याल था कि इस बार ठीक कीमत व अच्छी गुणवत्ता वाला मोबाइल ही लेते हैं। आखिरकार मोबाइल शोरूम पर गया तो वहां जियोनी एम फाइव प्लस वाला मॉडल पसंद आया। इसका बैटरी बेकअप, मैमोरी, कैमरा आदि अच्छे बताए गए और कीमत बीस हजार रुपए। दो हजार रुपए का बीमा भी करवा लिया। इस तरह यह मोबाइल करीब 22 हजार में पड़ा। यह बात 15 दिसम्बर 16 की है। एक दो माह तक तो मोबाइल जोरदार चला। बिना रुके बिना अटके। मार्च में चार्जिंग को लेकर दिक्कत जरूर आई। सर्विस सेंटर पर चैक करवाया तो पता चला कि चार्जर की लीड खराब हो गई। खैर, लीड बदल दी गई और मोबाइल ठीक से चलने लगा। आधा अप्रेल गुजरने के बाद मोबाइल में कुछ एप में अटकने लगे। विशेषकर टेलीग्राम में चलाते चलाते यह हैंग होने लगा। इससे बचाव के लिए मैं स्क्रॉल धीरे-धीरे करता ताकि हैंग न हो। चूंकि मोबाइल गारंटी पीरियड में था लिहाजा सोचता रहा है कि दिखा लेंगे दिखा लेंगे। यही विचार करते करते आधा मई भी गुजार दिया। मोबाइल में हैंग होने की समस्या अब गहरा चुकी थी। इसके बाद यह अपने आप ही रिस्टार्ट होने लगा था। एक और समस्या यह होने लगी कि फोन बुक के नंबर एक दूसरे पर रिप्लेस होने लगे विशेषकर टेलीग्राम एप में। आखिरकार 27 मई को मैं जियोनी के सर्विस सेंटर पर गया और वहां बैठे प्रतिनिधि को उक्त सारी बातों से अवगत कराया तो उसका कहना था कि मोबाइल का सॉफ्टवेयर पुराना हो चुका है अपडेट करना होगा। चूंकि मुझे यह पता था कि अपडेट करवाने पर सारा डाटा उड़ जाता है लिहाजा बुझे मन से तमाम फोटो पहले ही डिलीट कर चुका था। कुछ विशेष लगाव वाली फोटो श्रीमती को व्हाट्सएप पर भेज दी ताकि सेव रहे। सर्विस सेंटर पर डेढ़ घंटे के इंतजार के बाद मोबाइल दे दिया गया। मोबाइल लेकर घर ही नहीं पहुंचा था कि रास्ते में दो बार उसी तर्ज पर रिस्टार्ट हो गया। स्टार्ट होने पर उसी तरह का मैसेज। चूंकि रात को जोधपुर निकलना था, लिहाजा समस्या को नजरअंदाज करना मजबूरी भी था। खैर, मोबाइल अपडेट हो गया। व्हाट्सएप, जीमेल, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम, आदि सब की सेटिंग दुबारा से करनी पड़ी। अपडेट के बाद टेलीग्राम एप में तो फोटो, वीडियो, पीडीएफ जेपीजी आदि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। बस गोल घेरा लगातार चलता ही रहता लेकिन डाउनलोड का काम बिलकुल बंद। नया सॉफटवेयर करवाने के बाद यह समस्या और खड़ी हो गई थी।

मजबूरी जरूरी है...

बस यूं ही
मजबूरी। यह शब्द पता नहीं आज क्यों सुबह से ही कानों में गूंज रहा है। बार-बार रह रहकर। इस शब्द की उत्पति व प्रयोग के बारे में सोचने लगा तो फिर सोचता ही चला गया। फिर यकायक ख्याल आया क्यों न आज मजबूरी पर ही लिखा जाए। वाकई मजबूरी का प्रयोग कहां नहीं होता। कौन है जो मजबूरी का मारा नहीं है। वैसे एक बात तो है यह मजबूरी शब्द जितना हकीकत के नजदीक है उतना ही बनावटी भी होता है। किसी का कोई काम नहीं होता है तो अक्सर यही जुमला सुनाई देता है, ' अरे यार मजबूरी थी, वरना मैं यह कर देता। क्यां करूं भाई मजबूरी थी, नहीं तो मैं पक्का पहुंचता आदि आदि।' वाकई मजबूरी शब्द बचाव का कारगर हथियार है। मजबूरी सच में किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। इसका निशाना शायद ही कभी चूकता है। इस मजबूरी की घुसपैठ सब जगह है। घर के चूल्हे से लेकर आसमान तक। रिश्तों से लेकर संबंधों तक। खून के रिश्तें हो चाहे धर्म के। मजबूरी हर जगह काम भी आती है और आड़े भी। गांव में कोई घूमता हुआ दिखाई देता है और उससे हाल चाल पूछ लिए तो उसका जवाब होता हैं, 'क्या करें बेरोजगारी है। मजबूरी में गांव में बैठे हैं, कहां जाए।' वैसे, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है वाला जुमला भी अक्सर कहा सुना जाता रहा है। यहां तात्पर्य पैसे की कड़की से है। खैर, शुरुआत में मजबूरी शब्द पर कुछ काव्य शैली में लिखने को मन किया लेकिन फिर सोचने की मजबूरी के कारण गद्य पर ही आ गया।
मजबूर से हीे मजबूरी बना है। मजबूर का मतलब नि: सहाय, विवश, लाचार होता है। लेकिन यह प्रयोग अलग-अलग अर्थों में किया जाता है। मजबूरी अपनों से दूर करती है। मजबूरी समझौते को मजबूर करती है। मजबूरी झूठ बुलवाती है। मजबूरी रिश्तों में दरार डालती है। मजबूरी बहाने बनवाती है। मजबूरी हकीकत पर पर्दा डालती है। नौकरी करना मजबूरी है। खेती करना मजबूरी है। घर छोडऩा मजबूरी है। भूख भी मजबूरी है। पेट भी मजबूरी है। बीमारी भी मजबूरी है। दूरी भी मजबूरी है। औलाद भी मजबूरी है। मां-बाप भी मजबूरी है। भाई-बहिन भी मजबूरी है। सारे सगे संबंधी भी मजबूरी है। फोन रखना मजबूरी है। गाड़ी चलाना मजबूरी है। पैदल चलना भी मजबूरी है। दौडऩा मजबूरी है। हांफना मजबूरी है। आराम करना मजबूरी है। बीड़ी पीना मजबूरी है। सिगरेट पीना मजबूरी है। मांसाहारी होना भी मजबूरी है और शाकाहारी भी मजबूरी है। शराब पीना मजबूरी है। शराब पिलाना भी मजबूरी है। अकेले रहना मजबूरी है। सपरिवार रहना भी मजबूरी है। विवाह समारोह में शिरकत करना मजबूरी है। किसी गमी में जाना भी मजबूरी है। रोना भी मजबूरी है तो हंसना भी मजबूरी है। तनाव में रहना मजबूरी है तो तनावमुक्त रहना भी मजबूरी है। खामोश रहना मजबूरी है तो चिल्लाना भी मजबूरी है। भूखे पेट सो जाना मजबूरी है तो रात भर जागना भी मजबूरी है।
सच में यह मजबूरी शब्द हर जगह है। जीवन में गहरे तक रचा-बसा। इसके बिना जीवन अधूरा है। यह मजबूरी न हो तो दुनिया में बहुत सारे काम या तो अटक जाए या हकीकत से पर्दा उठ जाए। लोक लाज बनी रही इसीलिए मजबूरी जरूरी है। भले ही यह किसी को राहत दे या किसी को पीड़ा पर मजबूरी जरूरी है।

मन की बात.....8


यह तो बात थी जीवन दर्शन से ओत प्रोत गीत की, जिसमें मन की खूबसूरती से व्याख्या की गई। खैर, गानों में मन की बात चल रही थी। वैसे गीतों में मन का जिक्र बहुत बार आया है। इसकी सूची छोटी नहीं है। नागिन फिल्म का यह गीत तो आज भी जहां कहीं बजता है तो सचमुच अच्छे-अच्छों का तन-मन डोलने लगता है। 'मेरा मन डोले, मेरा तन डोले, मेरे दिल का गया करार रे, अब कौन बजाए बांसुरिया...।' सचमुच में इस गीत को कितनी बार ही सुनो मन प्रफुल्लित हो उठता है। मन टाइटल वाले कुछ गीतों पर नजरें डाली जाए तो यह एेसे गीत हैं जो मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालते हैं। बात चाहे 'मन रे तू काहे न धीर धरे.. ' की हो या फिर 'मीत न मिला रे मन का ..' की हो। इस तरह आमिर की तो एक फिल्म का नाम ही मन था। इसी फिल्म का टाइटल गीत 'मेरा मन क्यों तुझे चाहे.. ' भी खूब सुना गया था। बहरहाल, गीतों में मन का जिक्र आता ही रहा है कभी मुखड़े में तो कभी अंतरे में। यह गीत देखिए, कितना सुकून सा मिलता है इसको सुनकर। 'ओ रे मांझी, ओ रे मांझी, ओ ओ ओ ओ मेरे मांझी मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूँ इस पार, ओ मेरे मांझी अबकी बार, ले चल पार, ले चल पार..'

मन की बात....7


सिर्फ साहित्य में ही मन पर नहीं लिखा गया बल्कि भारतीय संगीत में भी मन पर कई कालजयी गीत लिखे गए हैं लेकिन यहां भी मन जरूरत के हिसाब से बदलता रहा है। किसी गीत में मन मंदिर बन जाता है तो किसी में मायावी। यह सब कल्पना का खेल है। जिस तरह मन स्थिर नहीं है तो कल्पना भला कैसे स्थिर होगी। यह तो मनोस्थिति पर निर्भर है। अक्सर जैसी मनोस्थिति होती है वैसा ही व्यवहार होता है। फिल्मों में भी गीत कथानक या सिचुएशन के हिसाब से ही लिखे जाते हैं। तभी तो मन पापी भी हो जाता है। गंगा-जमुना फिल्म के इस गीत में नायिका गाती है 'तोरा मन बड़ा पापी सांवरिया रे..' लेकिन यही पापी मन दर्पण भी बन जाता है। फिल्म काजल का यह गीत ' तोरा मन दर्पण कहलाए.. देखिए । इस गीत का एक-एक अंतरा भी मन को समर्पित है और मन को जिस तरह परिभाषित किया गया है, उससे मन को समझने में आसानी भी होती है। गौर फरमाइए, इसमें मन से बड़ा किसी को नहीं बताया गया है। 'मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय, मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय, इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाए, तोरा मन दर्पण कहलाए.' अगले अंतरे में मन के नैन ही हजार बता दिए गए हैं। 'सुख की कलियां, दुख के कांटे, मन सबका आधार, मन से कोई बात छुपे ना, मन के नैन हज़ार, जग से चाहे भाग लो कोई, मन से भाग न पाए, तोरा मन दर्पण कहलाए.. ' और इस अंतिम अंतरे में मन के धन को अनमोल बताया गया है। 'तन की दौलत ढलती छाया मन का धन अनमोल, तन के कारण मन के धन को मत माटी में रौंद, मन की क़दर भुलाने वाला वीराँ जनम गवाए, तोरा मन दर्पण कहलाए..'

साथ, समझ, स्नेह व सहयोग के तेरह साल...


पति-पत्नी का रिश्ता परस्पर साथ, सहयोग, समझ, स्नेह व विश्वास की बुनियाद पर टिका होता है। इन पायों में अगर प्रगाढ़ता है तो तय है कि आपके जीवन की गाड़ी सरपट दौड़ रही है लेकिन इनमें से एक भी पाया कमजोर है तो यकीनन गाड़ी चल तो रही है लेकिन हिचकोले खाते हुए। मैं इस मामले में बेहद खुशकिस्मत हूं और परवरदिगार का शुक्रगुजार भी। 4 नवंबर 2003 को मेरी सगाई हुई थी। सगाई के करीब पन्द्रह दिन बाद किसी एसटीडी बूथ से कॉल आई। सामने किसी महिला की आवाज सुनकर मैं एकदम से सकपका गया। श्रीगंगानगर की ही बात है। डेस्क के बाकी साथियों के बीच बैठा था, लिहाजा हां-हूं के अलावा कुछ नहीं कह पाया। दरअसल, यह फोन मंगेतर निर्मल का था। कुल मिलाकर यह समझ लीजिए कि फोन पर पहली बार बातचीत का अनुभव ज्यादा अच्छा नहीं रहा। धड़कन तेज हो गई थी और मुंह सूख चुका था। यह हालात कमोबेश दोनों तरफ थीं। खैर, इसके बाद नए साल 2004 के उपलक्ष्य में करीब दस पेज का पत्र लिखा था। (जो आज भी सहेज कर रखा है।) यह पत्र लिखने में मेरे को चार-पांच दिन इसलिए लगे थे क्योंकि निर्मल के स्वभाव, पसंद आदि के बारे में मेरे को जानकारी नहीं थी। बस खुद पर यकीन था कि पत्र रूपी यह तोहफा पसंद आ जाएगा और हुआ भी एेसा ही। इसके बाद बातों का सिलसिला चल पड़ा। इस बीच मेरा स्थानांतरण श्रीगंगानगर से अलवर हो गया था। बातचीत की झिझक अब खत्म हो चुकी थी। इस काम में प्रोत्साहित करने में तत्कालीन संपादक आशीष जी व्यास का बहुत योगदान रहा। फिर तो खूब बातें होती। चोरी-चोरी, चुपके-चुपके वाले अंदाज में। आखिरकार 22 जून 2004 को हम दोनों परिणय सूत्र में बंध गए।
हां यह सही है कि फोन के माध्यम से हमने एक दूसरे को काफी समझा लेकिन स्नेह और समझ साथ-साथ रहने से बढ़ते गए। हमने एक दूसरे को बखूबी जाना व पहचाना। समय बीतता गया और आज तेरह साल हो गए। हर मोड़ पर निर्मल ने मेरा साथ दिया। विपरीत व तनाव की परिस्थितियों में भी उसने मुझे मोटीवेट किया। मुझे संबल दिया। मेरी थोड़ी बहुत जो भी सफलता है उसमें अकेली मेरी योग्यता व मेहनत ही नहीं बल्कि निर्मल का समर्पण भी है। आज मां और पापा हमारे साथ हैं तो इसके पीछे भी बड़ा योगदान निर्मल का ही है। मेरा फैसला तो केवल उनको साथ रखने का ही था। बाकी उनकी सेवा सुश्रुषा व देखभाल का जिम्मा निर्मल के हाथ ही है। मां के बीमार होने के बाद निर्मल की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। वह मां को नहलाने, खाना खिलाने से लेकर तमाम काम करती है। यह निर्मल के संस्कार ही हैं कि वह यह सब कर पा रही है। उसकी दिनचर्या तो अब दिनचर्या ही नहीं रह गई है। न सोने का वक्त है न खाने का। देर रात मेरे के लिए उठाना, अलसुबह बच्चों के लिए जागना व दिनभर घर के काम और मां-पापा सेवा। सही में खुद के लिए उसके पास समय ही कहां है? सच कहता हूं कई बार वह थकान व दर्द से कराहती रहती है, लेकिन मुंह से कभी उफ तक नहीं करती। सचमुच मैं खुशनसीब हूं। बेहद खुशनसीब। हमारा यह साथ, स्नेह व विश्वास की डोर में इसी तरह बंधा रहे।

मन की बात.... 6


भागदौड़ व खुद में खोए रहने की संस्कृति के दौर में मन की भले ही न सुनी जाए लेकिन मन की बात तो देश सुन ही रहा है। गौर से सुने या न सुने यह अलग विषय है लेकिन मन की बात सबसे हो रही है। यह मन की बात कितनी प्रासंगिक है और कितनी नहीं यह तो दो साल बाद ही पता चलेगा। फिलहाल मन की बात का जोर है और प्रचार उससे भी कहीं ज्यादा। वैसे मन पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी ने भी लिखा है। विडम्बना यह है कि उनके मन की बात ज्यादा गहरी एवं मार्मिक होने की बावजूद वर्तमान मन की बात के आगे उन्नीस ही साबित हो रही है। हो रही है या कर दी गई है यह बहस का मुद्दा हो सकता है। खैर, आज इसी बहाने अटल जी की मन पर लिखी बातों का जिक्र कर लिया जाए। अटलजी ने लिखा है ' आदमी की पहचान, उसके धन या आसन से नहीं होती, उसके मन से होती है। मन की फकीरी पर कुबेर की संपदा भी रोती है।' पर आजकल मन से पहचान करने वाले हैं ही कितने? यह दो लाइनें तो और गहरी है व सोचने पर मजबूर करती है। 'मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते, न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।' वैसे मन की पहचान करते-करते अटल जी खुद भी भ्रमित हो ही गए। मन की फकीरी पर कुबेर की संपदा के रोने की बात कहने के बावजूद वो यह भी कह गए कि बड़ा बनने के लिए मन भी बड़ा होना चाहिए। ' छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।'

बच्चे तो बच्चे हैं

बच्चे तो बच्चे हैं, जिद कर उठते हैं। उनकी जिद माननी भी पड़ती है। भले अपने खुशियां में कटौती ही क्यों न हो। कुछ ऐसा ही धर्मपत्नी निर्मल के साथ हो रहा है। वह इस बार मायके नहीं जा पाई, क्योंकि माताजी-पिताजी हमारे पास ही हैं। उनकी सेवा में कोई कमी नहीं रहे, बस यही सोचकर वह बच्चों के साथ नहीं गई। पिछले साल भी नहीं जा पाई थी। मैं दोनों बच्चों को लेकर शनिवार रात को जोधपुर रवाना हुआ और सोमवार सुबह श्रीगंगानगर पहुंच गया। घर पहुंचा तो श्रीमती उदास थी। उसने कहा कि आपकी संगत का असर हो गया है। मैं चौंका तो कहने लगी अपनी भावनाओं को शब्द दिए हैं, तकिये के नीचे जो कागज है वह निकाल कर पढ़ लो। पढऩे लगा तो आंखों से आंसू टप-टप कर गिरने लगे। वो कहने लगी यह फेसबुक पर लगाने के लिए लिखा है। लेकिन इतना बड़ा लिख दिया है कि मोबाइल पर कंपोज कैसे करूं। मैंने कहा ठीक हैं मैं इसे कम्पोज कर देता हूं। आपकी मूल भावनाएं जस की तस। आप भी पढि़ए धर्मपत्नी का भावनाओं से भरे यह शब्द......
दिनांक 28 मई
समय रात : नौ बजे
श्रीगंगानगर।
'आज मन बहुत व्यथित है और उदास भी है। उसने ही मुझे मजबूर किया कि मैं अपनी उदासी कुछ लिखकर दूर कर लूं। यह मन यूं ही उदास नहीं है। इस उदासी में बच्चों की खुशी छिपी है। बात यूं है कि बच्चे कई दिनों से जोधपुर अपने ननिहाल जाने की जिद कर रहे थे लेकिन मैं किसी कारणवश या यूं कह सकते हैं कि अपने कर्तव्य मतलब कि कुछ घर के प्रति जो कर्तव्य जरूरी हैं, उनके चलते नहीं जा पा रही थी। इसी वजह से पिछली गर्मियों में भी बच्चों के साथ नहीं जा पाई। खैर मैं, विषयांतर हो रही हूं। हां तो मैं कह रही थी मेरा मन व्यथित है। उदास है। और ये और भी उदास हुए जा रहा है, लगातार डूबता सा प्रतीत हो रहा है। पता नहीं क्यों पर मन तो मन है। इसकी जैसी मर्जी होगी वैसा ही रहेगा। अरे मैं कहां मन को ले बैठी। यह तो फिलहाल मेरे मिस्टर एमएस का काम है। उन्होंने मन की जिम्मेदारी जो ले रखी है इन दिनों। दरअसल, मेरा मन मन ना हुआ गोया बिलासपुर-भिलाई की बारिश हो गया है। जब मर्जी तब मर्जी आ रहा है मेरे लेखन के आगे बार-बार।
आज बच्चे नहीं हैं। घर सूना सूना। मेरा तो जग सूना सूना हो रहा है। देखो सामने बेजान कुत्ता भी मुंह बाए पड़ा है जो कि रोज बच्चों की लातों का शिकार होता था। मुझे वो फ्रिज पर पड़े चंद सिक्के चिढ़ा रहे हैं कि माना कह रहे हों कि पड़े हैं हम यहां अब संभाल लो। जब चीकू फ्रिज से उन सिक्कों को तकरीबन रोज ही उठाकर बड़े प्यार से पूछता, मम्मा ले लूं एक रुपया। और मेरा चिल्लाना कि रोज तुम्हारा ये ही नाटक है। ले लूं ले लूं आज याद आ रही है बेटे तेरी। दरअसल वह सिक्के मैं चीकू के लिए रखती थी। और तो और वह कम्प्यूटर भी वीरान बेजान पड़ा है बच्चों के बिना। जिसके कान छुट्टियों में बच्चे छोड़ते ही नहीं है। आज मेरा वाई फाई का नेट जोकि आधे दिन में दो जीबी भी कम पड़ता था वो वैसा ही पड़ा है पूरा फुल, खचाखच। और वो मक्खियों की ढेरी भी आज गुम है। या यूं कहें कि छुट्टी पर चली गई जो कि बच्चों की मौजूदगी में घर में भरी पड़ी रहती थी। मानो वो उनसे ही मिलने आती थी।
सच में बच्चों के बिना 10-15 दिन निकालना कठिन लग रहा है इस बार। पहले मैं सोचती थी कि मैं मेरी मम्मी की तरह स्ट्रोंग हूं मैनेज कर लूंगी। दरअसल मम्मी स्ट्रोंग तो है पर अब परिवार के मोह को बहुत पीछे छोड़ चुकी है। इसलिए उन्हें कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। उन्हें तो अपने राम से मतलब है। खैर, जो भी हो धन्य है वो मां बाप जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए छोटी सी उम्र में होस्टल में भेज देते हैं। मेरी प्रिय सहेली बसंत ने अपनी बेटी को होस्टल भेजा तो मुझे हमेशा फोन करके कहती यार मेरा मन आजकल कहीं लगता ही नहंी। उसकी बात आज याद आ रही है कि वाकई बच्चों के बिन घर, घर नहीं होता। आज मुझे महसूस हो रहा है। मेरे राम लखन चाहे कितनी भी लड़ाई करें पर घर की रौनक उन्हीं से है। सच बच्चों अब तो यही लग रहा है कि 10-15 दिन जल्दी से बीत जाए और मेरे कृष्ण बलराम घर आ जाएं।
मम्मा मिसिंग यू ए लोट
निर्मल

मन की बात.... 5

कबीर जी के मुझ से बुरा न कोय वाले दोहे के बिना तो चर्चा ही अधूरी है। संभवत: इस दोहे से सभी का वास्ता पड़ा है। 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय।' हालांकि इस दोहे को मजाक के रूप में उल्टा भी कहा जाता है। 'भला जो देखने मैं चला, भला न मिलिया न कोय, जो मन देखा आपना मुझ से भला न कोय।' खैर, मन के साथ इतने दोहों की चर्चा इसलिए भी क्योंकि इनमें अधिकतर दोहे आज भी कंठस्थ हैं। हो भी क्यों नहीं? विद्यालय में आठवीं तक निर्विवाद रूप से अंत्याक्षरी के मामले में सारी स्कूल एक तरफ और अपुन एक तरफ रहे हैं। उस दौर के मेरे सहपाठियों को यह बात भली भांति याद होगी। गुरुजी मेरे को प्रत्येक कक्षा में बारी-बारी से भेजते थे और विद्यार्थियों को चुनौती देते थे इसको कोई हरा कर दिखाए। यही हाल अंग्रेजी में था। कई बार दूसरे स्कूलों से टीम आती थी। अंत्याक्षरी मुकाबले में मैं अक्सर खड़ा ही रहता था। बैठता ही नहीं था। क्योंकि मैं दूसरों को बोलने का मौका कम ही देता था। खैर मन की चर्चा में मन दूसरे विषय की ओर चला गया। कबीर जी के यह दोहे भी कम चर्चित नहीं है मसलन 'ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।' 'फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम। कहे कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुना दाम।' 'मन दिना कछु और ही, तन साधुन के संग। कहे कबीर कारी दरी, कैसे लागे रंग।' 'सुमिरन मन में लाइए, जैसे नाद कुरंग। कहे कबीरा बिसर नहीं, प्राण तजे ते ही संग।' दोहों के बाद अब आगे छोटी सी चर्चा मन आधारित कुछ चुनिंदा कविताओं की होगी।

मन की बात....4

बात कबीर जी के दोहों की चल रही थी। उन्होंने मन पर जितना लिखा है, अगर उसको पढ़कर आत्मसात कर लिया जाए तो न केवल मन की थाह लेने में मदद मिलेगी बल्कि मन को नियंत्रण में रखने में भी आसानी होगी। मन पर कबीर जी के दोहे इतने कालजयी हैं कि आज भी प्रासंगिक लगते हैं। इन दोहों की बानगी देखिए, फिर आगे जारी रहेगी बात। 'नहाये धोए क्या हुआ, जो मन का मैल न जाए। मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जाए।' अर्थात सिर्फ नहाने धोने से (शरीर को सिर्फ बाहर से साफ़ करने से) क्या होगा? यदि मन मैला ही रह गया (मन के विकार नहीं निकाल सके) मछली हमेशा जल में रहती है लेकिन इतना धुलकर भी उसकी दुर्गन्ध (बास) नहीं जाती। इसी तरह एक अन्य दोहा, 'जग में बैरी कोय नहीं, जो मन शीतल होय। या आपा को डारि दे, दया करे सब कोय।' अर्थात संसार में हमारा कोई शत्रु (बैरी) नहीं हो सकता यदि हमारा मन शांत हो तो। यदि हम मन से मान-अभिमान और अहंकार को छोड़ दे तो हम सब पर दया करेंगे और सभी हमसे प्रेम करने लगेंगे। खैर, मन पर दोहों की फेहरिस्त लंबी है। मन के बारे मंे जितना लिखा जाए जैसा लिखा जाए और जब-जब भी लिखा जाए वह कम है। क्योंकि मन तो अनंत है। असीम है। अपरिमित है।

मन की बात....3


विडम्बना देखिए मन को जीतने से जीत हो जाती है और मन के हारने से हार। गोया सारा खेल ही मन पर टिका है। कहावत भी है ना कि मन चंगा तो कठौती में गंगा अर्थात मन की शुद्धता ही वास्तविक शुद्धता है। मन के साथ लड्डुओं को भी जोड़ा जाता है। एक तरफ कहा जाता है कि मन के लड्डुओं से भूख नहीं मिटती लेकिन साथ ही यह भी कहा जाता है कि मन के लड्डू फीके क्योंï। दरअसल, मन के साथ विरोधाभास शुरू से ही जुड़ा है। वैसे मन के बारे में कबीर जी ने बहुत अच्छा लिखा है। मन पर उनके दोहे यथार्थ से रुबरू करवाते हैं। गौर फरमाएं, 'मन दाता मन लालची मन राजा मन रंक, जो यह मन गुरु सो मिले तो गुरु मिले निसंक।' अर्थात यह मन ही शुद्धि-अशुद्धि भेद से दाता-लालची कंजूस-उदार बनाता है। यदि मन निकष्पट होकर गुरु से मिले तो निसंदेह उसे गुरु पद प्राप्त हो जाए। कबीर जी का एक और दोहा है 'मन के मारे बन गए, बन तजि बस्ती माहिं, कहे कबीर क्या कीजिए, यह मन ठहरे नाहिं।' अर्थात मन की चंचलता को रोकने के लिए वन में गए, वहां जब मन शांत नहीं हुआ तो फिर से बस्ती में आ गए। कबीर जी कहते हैं कि जब तक मन शांत नहीं होएगा, तब तक तुम क्या आत्म-कल्याण करोगे।

दाग धोने का मौका

टिप्पणी
श्रीगंगानगर शहर के लोग उस कार्रवाई को अभी भूले नहीं होंगे जब पुलिस ने सप्ताह भर सिलसिलेवार अभियान चलाया और निर्धारित समय के बाद खुलने वाले शराब ठेकों के खिलाफ कार्रवाई की थी। शराब कारोबार से ही जुड़ी एक और घटना तो ज्यादा पुरानी भी नहीं हुई है जब शराब ठेकेदारों से बंधी लेकर उनको मनमर्जी से शराब बेचने की इजाजत देने के आरोप में पुलिस थानेदार व आबकारी विभाग के दो नुमाइंदे रिश्वत लेने के आरोप में धरे गए थे। इन दोनों घटनाओं को हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है। दोनों मामलों का जिक्र इसीलिए क्योंकि शहर व जिले में हालात इन दिनों कमोबेश वैसे ही हो गए हैं। सोमवार रात के दो घटनाक्रमों से इस बात को समझा जा सकता है। पहला मामला मीरा चौक का है, जहां शराब ठेके देर रात तक खुलने से परेशान लोगों ने पुलिस चौकी के सामने धरना दिया जबकि दूसरा मामला चहल चौक क्षेत्र का बताया जा रहा है, जहां निर्धारित समय के बाद भी शराब बेची जा रही थी। दरअसल, यह दो घटनाक्रम तो बानगी भर हैं, क्योंकि इस तरह की तस्वीर न केवल श्रीगंगानगर शहर बल्कि समूचे जिले की है। किसी भी मार्ग से गुजर जाओ। ठेके देर रात तक गुलजार ही मिलेंगे।
कानून विरुद्ध काम और निर्धारित से ज्यादा कीमत वसूलना यह दोनों ही काम एक साथ क्या बिना सरकारी संरक्षण या शह के संभव हैं? नियमों व कानून की पालना करवाने वाले क्या वाकई इतने लाचार मजबूर हो गए कि कोई उनको गांठता हीं नहीं है? या फिर जिम्मेदारों ने जुगलबंदी कर आंखों पर पट्टी बांध ली है? व्यवस्था में चूक के कारण इन दो तीन बातों के इर्द-गिर्द ही घूमते दिखाई देते हैं। हो सकता है कि शिकायत करने वालों को 'एेसा कोई मामला अभी तक तो जानकारी में नहीं आया है।' 'शिकायत मिली तो कार्रवाई करेंगे।' 'एक दो जगह शिकायत आई है, फिलहाल जांच करवा रहे हैं।' जैसे जुमले भी सुनने को मिले। क्योंकि यह जुमले उन सरकारी अधिकारियों के होते हैं, जो हकीकत से आंखें चुराते हैं। सच बताने से डरते हैं, इसलिए इस तरह के तकिया कलामों का सहारा लेते हैं। फिर भी सवाल जरूर कौंध रहे हैं कि आखिर कौन है जो निर्धारित मूल्य से ज्यादा कीमत वसूलने का भरोसा दे रहा है? कौन है जो निर्धारित समय के बाद भी ठेके खोलने की इजाजत दे रहा है? कौन है जो ठेकेदारों को एकजुट करके मनमर्जी की कीमत निर्धारित करने की छूट दे रहा है? कानून को ठेंगा दिखाकर इस तरह का दुस्साहस किया जा रहा है तो इस बात को बल जरूर मिलता है कि पर्दे के पीछे जरूर कोई सूत्रधार है।
बहरहाल, इस तरह के मामलों में पुलिस और आबकारी की भूमिका संदेह के घेरे में रहती आई है। आरोप भी खूब लगते हैं। फिलहाल इन दोनों ही विभागों के पास इस संदेह को साफ करने का मौका है। अब यह इन पर निर्भर करता है कि कौनसा रास्ता चुनते हैं। बंधी जैसे मामलों में बैकफुट पर आए दोनों विभाग अगर पर्दे के पीछे के सूत्रधार को सामने लाते हैं तो निसंदेह दागदार हुई छवि को सुधारने इससे बड़ा मौका और होगा भी क्या।

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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगगर के 24 मई 17 के अंक में प्रकाशित 

मन की बात....2

हां तो कल मन की बात हो रही थी। यही कि मन बहुत तेज दौड़ता है। यह तो आजाद पंछी के जैसा है। इसको कौन बांध पाया है आदि आदि। यह सब जानने के बावजूद मन कहां मानता है। मन किसी पर आ भी जाता है तो यह अचानक उचट भी जाता है। मन कभी खट्टा होता है। कभी खट्टा मीठा तो कभी यह किसी फूल की मानिंद खिल उठता है। हैरत की बात तो यह है कि मन बंटता है बढता है और बदलता भी है। कभी कभी मन बहलता भी है। चौंकिए मत इतना कुछ करने के बावजूद मन मर जाता है तो मन को बांध भी लिया जाता है। मन खानाबदोश होकर दर-दर भटकता है तो कभी यह भारी व हल्का भी हो जाता है। वाकई इस मन का संसार बड़ा ही रोचक है। कभी किसी बहाने से मन को टटोला जाता है तो कई बार मन जीत भी लिया जाता है। आश्चर्य की बात है कि मन डूबता भी है। अब देखिए मन को तौला भी जाता है तो कई बार इसे ठिकाने भी लगा दिया जाता है। कई बार मन नाच भी उठता है। बिलकुल मयूर की तरह। मन नाचता ही नहीं लहराता भी है। यह मन इतना नाजुक है कि यह मोम बन जाता है और मोम की तरह पिघल भी जाता है।

मन की बात....

यह मन भी बड़ा विचित्र है साहब। बिलकुल किसी अबूझ पहेली की तरह। यह कभी चंचल बन जाता है तो कभी चितचोर। कभी लालची बन जाता है तो कभी कुछ ओर। यह पल-पल में रंग बदलता है। मन ही है जो सपने दिखाता है। बड़े बड़े सपने। न पूरे होने वाले सपने। हकीकत से कोसों दूर सुनहरी सपने। तभी तो आदमी मन के अनुसार न चलने की सीख को दरकिनार करता है। लोभ संवरण नहीं कर पाता। मनमाफिक काम करता है तो कभी अपनी मनमर्जी चलाता है। 'सुनो सबकी करो मन की', की तर्ज पर। बार-बार यह विरोधाभास ही मन को मथ रहा है कि क्या किया जाए। मन की सुनी जाए या फिर मन के मते न चलने की सीख को आत्मसात किया जाए। बड़ा कन्फ्यूजन है यह। यह मन रूपी संसार बड़ा अनूठा है। यह इतना गहरा सागर है कि गोते लगाते रहो। इसकी कोई थाह नहीं है। समझने वाला उल्टे उलझता ही चला जाता है। इस मन की कहानी बड़ी लंबी है। बिलकुल द्रोपदी के चीर की तरह। यह मन आजकल सियासी भी हो चला है।

सोशल मीडिया का रोचक संसार

सोशल मीडिया के प्लेटफार्म व्हाट्सएप, टेलीग्राम, फेसबुक, टिवटर व इंस्टाग्राम आदि का संसार न केवल काफी बड़ा है बल्कि विचित्र, अनूठा व रोचक भी है। मैं समझता हूं सोशल मीडिया पर सर्वाधिक आदान-प्रदान चुटकलों का होता है। आज व्हाट्स एप पर दो चुटकले मिले। इन दो चुटकलों का उल्लेख इसलिए कि यह दोनों मारवाड़ी (राजस्थानी) में थे। एक सुबह मिला तो दूसरा शाम को। दोनों को पढ़ता हूं तो हंसी बरबस छूट ही जाती है, लिहाजा दोनों चुटकले फेसबुक पर साझा कर रहा हूं। आप भी लीजिए आनंद...
1.
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एडमिन की सासू जी सुबह एडमिन की आँख सूजेड़ी देख'र ऊंकी घरआळी स्यूं पूछ्यो
" के बात है, जंवाई-राजा री आँख कियां सूजेड़ी है
,तू ठोकी के ?
लुगाई एकदम तारामती ( हरीश्चंद्र की लुगाई) बोली " हाँ, ठोकी !"
सासू = क्यूं ?
घरआळी = सुबह उठतांई आधी नींद म बोल्या " म्हारो चस्मो कठै है, सुमन ?
सासू = तो इमै ठोकण री कांई बात ही ?
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म्हारो नांव कांई है ?
सासू :- रजनी ....
ओरे !!!
मरज्याणे के दो और चेपणी ही ....
2.
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कालिया की सगाई करण नैं घरां दो आदमी आया
एक तो कालिये को सुसरो अर एक बिन्दणी को बडलियो भाई।
नेगचार करके सुसरो कालिये ने एक खोपरो दियो
और खोपरे ने बो कालियो कंजर बीके सामैं ही 2 बटका भर के खाग्यो।
सुसरो कई देर तक तो कालिये कानी देख्यो,
अरै बाद मे थुथकारो घालके बोल्यो
क- " थू थू
जँवाई की जाङ तो गण्डक की सी है "

मैं कैसा लगता हूं...

बस यूं ही
देखने में आया है कि अधिकतर भारतीय दो ही विधाओं से जुड़े लोगों को हीरो मतलब नायक मानते हैं। एक तो सिनेमा और दूसरा क्रिकेट। सिनेमा में तो जरूर हीरो के साथ हीरोइन का विकल्प है लेकिन महिला क्रिकेट में कोई ख्यात नाम नहीं होने के कारण पुरुषों का ही बोलबाला है। वैसे हर इंसान की फितरत है और उसके मन के किसी कोने में यह बात जरूर दबी होती है कि वह कैसा लगता है। कुछ आत्मविश्वास से लबरेज व्यक्ति तो जरूर अपने बारे में खुल कर बता देते हैं लेकिन बहुत से एेसे भी हैं जो स्वभाव से शर्मीले होने के कारण कुछ बता नहीं पाते।
खैर, क्रिकेट व सिनेमा से जुड़े लोगों को आदर्श या हीरो मानने की बात अब तो फेसबुक भी मानने और जानने लगा है। तभी तो दो तीन दिन से एक एप चल रहा है जिसमें किसी सिने कलाकार या क्रिकेटर के साथ शक्ल मिलाई जाती है। शक्ल मिलाने के इस खेल में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। आपको एक लिंक क्लिक करना होता है उसके बाद आपकी एक सामने के फेस के फोटो का चयन करना होता है, बाकी काम फेसबुक पलक झपकते ही कर देता है।
वैसे फेसबुक पर फेक आईडी बनाकर किसी आकर्षक नयन नक्श वाली युवती की फोटो लगाकर ' मैं कैसी लग रही हूं.. ।' का काम भी बदस्तूर चल रहा है लेकिन एप से किसी क्रिकेटर या अभिनेता की शक्ल मिलाने का शगल दो तीन दिन से परवान पर है। फेसबुक से जुड़ा हर दूसरा या तीसरा शख्स यह जानने को बेताब है कि वह कैसा लगता है। कल रात को एक साथी की शक्ल अमिताभ बच्चन से मिली देखी तो अपने भी जिज्ञासा पैदा हो गई। करना क्या था एक क्लिक किया फोटो सलेक्ट की और अपनी भी फोटो अमिताभ से मिला दी गई। आज सुबह से देख रहा हूं। फेसबुक किसी को सचिन तेंदुलकर बना रहा है तो किसी को महेन्द्रसिंह धोनी। किसी को सलमान खान बना रहा है तो किसी को शाहरूख खान। किसी को नवजोतसिंह सिद्ध बना दिया तो किसी को आमिर खान। कोई अक्षय कुमार बना तो कोई कुछ। श्रीमती भी कल से यह सब देख कर रही थी। आखिर उसका भी मन ललचा ही गया। उसने भी वो ही तरीका अपनाया तो परिणाम दीपिका पादुकोण के रूप में सामने आया। खैर, इस तरह की परिणाम जानने की फेहरिस्त बेहद लंबी है। वैसे फेसबुक पर इस तरह के कई एप व लिंक हैं जिनको क्लिक करने से कई तरह के परिणाम सामने आते हैं। हालांकि यह सब एक तरह का मनोरंजन ही है। हकीकत से कोसो दूर फकत मनोरंजन।

बस यादें बाकी-4


स्मृति शेष- विनोद खन्ना
'कभी कभी एेसे इंसान भी जन्म लेते हैं, जो अपना नाम, अपनी याद तारीख में नहीं बल्कि लोगों के दिलों में महफूज कर जाते हैं।' संयोग देखिए दयावान फिल्म में बोला गया यह डायलॉग विनोद खन्ना पर मौजूं हो गया। विनोद खन्ना चले गए लेकिन उनका नाम उनकी याद तथा उनका काम दिलों में महफूज रहेगा। हमेशा हमेशा के लिए। विनोद खन्ना के डायलॉग इतने सहज व सीधे होते थे कि यह जल्द ही जुबान पर चढ़ जाते थे। साथ ही हर आदमी डायलॉग को अपनी बात समझने लगता है। 'मजदूर को मजदूरी पसीना सूखने से पहले और मजलूम को इंसाफ दर्द मिटने से पहले।' वाकई इस डायलॉग में आज की कड़वी हकीकत छिपी हुई है। काश उनका यह डायलॉग हकीकत के धरातल पर उतरता। विनोद यह डायलॉग तो कमोबेश सभी पर लागू होता है 'इज्जत वो दौलत है जो एक बार चली गई तो फिर कभी हासिल नहीं की जा सकती।' उनकी डायलॉग में गरीब का दर्द उजागर होता है। फिल्मों में गरीबों का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं। यह दो डायलॉग देखिए.. ' गरीब की जान की कीमत भी उतनी ही है जितनी पैसे वाले की जान की कीमत..' तथा 'गरीब का दिल अगर सोने का होता है तो हाथ फैलाद के होते हैं..। ' विनोद खन्ना का यह डायलॉग तो कई साथी आम बोलचाल में भी कह देते हैं कि ' मैंने जब से होश संभाला है खिलौनों से जगह मौत से खेलता आया हूं।' चांदनी फिल्म के डायलॉग 'दर्द की दवा न हो तो दर्द को ही दवा समझ लेना चाहिए ।' ने कई युगलों का संबल प्रदान किया। खैर, मौजूदा हालात में उनका यह डायलॉग तो आज भी प्रासंगिक है लगता है ' तलवार की लड़ाई तलवार से, प्यार की लड़ाई प्यार से और बेकार की लड़ाई सरकार से। ' इस तरह के विनोद खन्ना के डायलॉग कई हैं। सिनेमा, संन्यास और सियासत तीनों के समान रंग देख चुका रुपहले पर्दे का यह हीरों आज हमारे बीच नहीं है लेकिन इसकी यादें जेहन में जिंदा रहेंगी। जन्म जन्मांतर तक। इस कलाकार को मेरी श्रद्धांजलि।
इति।

बस यादें बाकी-3

स्मृति शेष- विनोद खन्ना
बीच में व्यस्तता इतनी बढ़ी कि विनोद खन्ना की सीरिज ही गौण हो गई। चूंकि दो नंबर पोस्ट के नीेचे क्रमश: चस्पा कर रखा था, लिहाजा लिखना तो बनता ही है। फिल्मों के नामों के बाद अब बात विनोद खन्ना के कुछ चुनिंदा गीतों की। विनोद खन्ना के कई गीत तो इतने कालजयी और अमर हैं वो कभी भी सुनो दिलो-दिमाग को सुकून प्रदान करते हैं। एक गीत में वो गुनगुनाते हैं और चलते रहने की सीख देते हैं 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के...' लेकिन एक दूसरे गीत में वो जिंदगी से अंसतुष्ट दिखाई देते हैं गोया वो जिंदगी के फलसफे को जान चुके हैं। तभी तो गाते हैं' जिंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा संग लेकर जाएगी....।' वैसे विनोद खन्ना के गीतों में प्रेम व निराशा का दोनों ही दिखाई देेते हैं। एक तरफ वो 'हम तुम्हे चाहते हैं एेसे, मरने वाला कोई जिंदगी चाहता हो जैसे... ' गीत गाकर प्रेम को बुलंदी प्रदान करते हैं लेकिन दूसरे ही पल कोई साथी न मिलने का मलाल वो इस तरह जाहिर करते हैं 'कोई होता जिसको अपना हम कह लेते यारो...। ' इस गीत में देखिए, प्यार होने पर वो महबूबा से इजाजत मांगते हैं 'हमको तुमसे हो गया है प्यार बोलो तो जीएं बोलो तो मर जाएं.. ' और इधर तो एक सलाम से ही खुद को तसल्ली देते नजर आते हैं 'जाते हो जाने जाना, आखिर सलाम लेते जाना..। ' फिर अचानक वो कह उठते हैं ' आज फिर तुम पे प्यार आया है..। ' विनोद प्रेम के साथ-साथ अपने साथी से मदद के लिए भी कहते हैं, 'छेड़ मेरे हमराही गीत कोई एेसा..' तो ' जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए, तुम देना साथ मेरा..।' इतना ही नहीं एक दूसरे के बिना जीने व रहने की कल्पना भी नहीं करते तभी तो गाते हैं ' वादा करले साजना तेरे बिना मैं रहूं मेरे बिना तू ना रहे ..। ' वो टूटे दिल के साथ सावन को दोष देते नजर आते हैं ,जब गाते हैं 'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है..।' खैर इस तरह के सदाबहार गानों की फेहरिस्त बेहद लंबी है। बहुत लंबी। कल बात विनोद के कुछ खास डॉयलाग की।
क्रमश:......

अंकित सोनी की फिरकी में उलझ रहे धुरंधर

श्रीगंगानगर. सप्ताहभर पहले क्रिकेट की दुनिया में अंकित सोनी अजनबी चेहरा था। क्रिकेट जानकारों के पास न तो अंकित का कोई डाटा उपलब्ध था और न ही किसी तरह का आंकड़ा। पिछले गुरुवार को जब अंकित गुजरात लॉयंस की टीम से जुड़े तब भी उनको अनजान चेहरा करार दिया गया। और, इसके बाद केवल तीन मैचों में अपने चमकदार प्रदर्शन से अंकित ने सभी का ध्यान खींच लिया है। हरफनमौला खिलाड़ी के रूप में टीम में शामिल किए गए अंकित ने बल्ले से जरूर कोई खास कमाल नहीं दिखाया लेकिन अपनी फिरकी के फेर में धुरंधर बल्लेबाज को एेसा बांधा कि वो रनों को तरस गए। विदित रहे कि अंकित सोनी राजस्थान का इकलौता खिलाड़ी है जिसने बगैर कोई रणजी या राष्ट्रीय मैच खेले सीधे आईपीएल में जगह बनाई है।
इस तरह मिली इंट्री
अंकित सोनी श्रीगंगानगर का रहने वाला है। उसने 2014 व 2015 में श्रीगंगानगर की तरफ से अंडर 16 व अंडर 19 प्रतियोगिताओं में भाग लिया। 2015 में अंकित को राजस्थान रॉयल्स टीम के बल्लेबाजों के समक्ष नेट में गेंदबाजी का मौका मिला। वर्ष 2015 व 2017 में अंकित ने आईपीएल ट्रायल दिए लेकिन किसी ने नहीं खरीदा। बाद में गुजरात लॉयंस के ड्वेन ब्रावो व शिविल कौशिक के चोटिल होने पर अंकित को टीम में शामिल किया गया।
सिक्सर किंग भी 'मजबूर'
लंबी कद काठी के अंकित के प्रदर्शन में मैच दर मैच निखार आ रहा है। पहले मैच में तीन ओवर में 28 रन लुटाने वाले अंकित ने दूसरे मैच में मुंबई इंडियंस के आक्रामक सलामी बल्लेबाज पार्थिव पटेल व जोस बटलर को बांधे रखा। इसी तरह तीसरे मैच में उन्होंने पुणे के शतकवीर बेन स्टोक्स व महेन्द्रसिंह धोनी को खुलकर शॉट नहीं लगाने दिए। मुंबई व पुणे के मैच में हालांकि अंकित की टीम जीत नहीं पाई लेकिन मैच रोमांचक बनाने में अंकित की किफायती गेंदबाजी महत्वपूर्ण रही।
अंकित सोनी का अब तक का प्रदर्शन
पहला मैच : रॉयल चैलेंजर बेंगलूरु - 3-0-28-1
दूसरा मैच : मुंबई इंडियंस - 4-0-16-1
राइजिंग पुणे सुपरजाएंट्स - 4-0-16-0
आईपीएल में अब तक के पांच सबसे महंगे गेंदबाज
इशांत शर्मा ने 2013 में चार ओवर में 66 रन दिए
उमेश यादव ने 2013 में चार ओवर में 65 रन दिए
संदीप शर्मा ने 2014 में चार ओवर में 65 रन दिए
वरुण एरॉन ने 2012 में चार ओवर में 63 रन दिए
अशोक डिंडा ने 2013 में चार ओवर 63 रन दिए
आईपीएल में अब तक के पांच सबसे किफायती गेंदबाज
नाम इकोनॉमी रेट
सुनील नरेन 6.17
रविचंद्रन अश्विन 6.55
अनिल कुंबले 6.57
लसिथ मलिंगा 6.67
मुथैया मुरलीधन 6.67
नोट - अंकित ने तीन मैचों में कुल 11 ओवर की गेंदबाजी में 60 रन खर्च कर 2 विकेट हासिल किए है। पहले मैच में अंकित जरूर महंगे साबित हुए लेकिन आखिरी दो मैचों में उनका इकोनॉमी 4 का रहा है। तीनों मैचों का औसत देखें तो अंकित की इकोनॉमी रेट 5.45 रहा है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगगर व हनुमानगढ संस्करण के 3 मई 17 के अंक में प्रकाशित 

बयानों के भरोसे कब तक

पहला बयान :-
'मैं देश को आश्वासन देना चाहता हूं कि हमले के पीछे दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. हमले में शहीद हुए जवानों को हम सैल्यूट करते हैं. राष्ट्र के लिए की गई उनकी सेवा हमेशा याद की जाएगी।'
-पिछले साल सितम्बर में कश्मीर में आतंकी हमले में 17 जवानों के शहीद होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बयान।
दूसरा बयान :-
'जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी. हम स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। हमें अपने जवानों पर गर्व है. उनकी शहादत को व्यर्थ नहीं जाने देंगे। इस हमले में घायल जवानों के जल्द से जल्द स्वस्थ होने की कामना करता हूं।'
- पिछले माह अप्रेल में छत्तीसगढ़ नक्सली हमले में 26 जवानों के शहीद होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बयान।
तीसरा बयान :-
'पाकिस्तान की यह हरकत अमानवीय है। ऐसी हरकत युद्ध के दौरान भी नहीं की जाती हैं। पूरे देश को सेना पर भरोसा है। सेना को जो प्रतिक्रिया करनी है, वह करेगी। जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।
-एक मई को कश्मीर में आतंकी हमले में दो जवानों के शव क्षत-विक्षत करने पर रक्षा मंत्री अरुण जेटली का बयान।
यह तीन बयान है। दो हमारे प्रधानमंत्री के हैं जबकि एक रक्षा मंत्री का। यह तीनों बयान पिछले नौ महीनों के दौरान आए हैं। इन तीनों बयानों में कई तरह की समानताएं हैं। मसलन, यह जवानों के शहीद होने के बाद आए हैं। इसमें जवानों की शहादत को याद किया गया तथा इन बयानों से देशवासियों को भरोसा भी दिलाया गया। आदि आदि। इसके बावजूद एक और खास बात है और वह कि जवानों की शहादत को व्यर्थ न जाने देने की। अमूमन इस तरह के बयान हर हमले के बाद आते हैं लेकिन देश को कभी शहादत को व्यर्थ न जाने देने वाले बयान का कारगर जवाब नहीं मिला। यह बात दीगर है कि कश्मीर हमले के बाद सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक तथा जवानों के शव क्षत-विक्षत करने के बाद जवाबी कार्रवाई करने की बात कही जा रही है। फिर भी बड़ा सवाल यह है कि जवानों के इस तरह शहीद होने का सिलसिला कब तक और क्यों?
दरअसल देशवासी अब नासूर हो चुकी इन समस्याओं का कारगर व स्थायी हल चाहता है। भले ही वह नक्सली हो या कश्मीर में आतंकी। दोनों समस्याओं के लिए बातचीत अब घिसा पिटा आजमाया हुआ तरीका हो चुका है। इस तरीके की भाषा न तो आतंकी समझते हैं और न ही नक्सली। ठीक वैसे ही जैसे लातों के भूत बातों से नहीं मानते। अतीत गवाह है 'कुत्ते की दुम' को सीधा करने के लिए कितने प्रयास किए जा चुके हैं लेकिन वह दुम कभी सीधी नहीं होती है। इस टेढ़ी दुम को सीधी करने के चक्कर में देश कई जवानों का बलिदान देख चुका है। इतने बलिदानों के बाद भी यह दुम सीधी नहीं हुई तो अब इसको काट देने में ही भलाई है। फैसला सरकार को लेना है। सेना को तो बस एक आदेश का इंतजार है।

बस यादें बाकी-2

स्मृति शेष- विनोद खन्ना
इस 'हिमालय पुत्र' को खून शब्द से इतना लगाव था कि कभी इसका 'गरम खून' 'वक्त का बादशाह' बना तो कभी 'मुकदर का बादशाह' कहलाया। कभी इस 'उस्ताद' ने 'खून का बदला खून' से लिया तो कभी इसने 'खून का कर्ज' उतारने का ' निश्चिय' भी किया। 'खून की पुकार' पर इस 'सेवक' ने 'इंसानियत के देवता' के रूप में भी 'पहचान' बनाई। इस 'फरेबी' 'चौकीदार' ने 'प्यार का रोग' भी पाला तो 'प्यार का रिश्ता' भी 'परम्परा' की तरह शिद्दत के साथ से निभाया। इस 'युवराज' की 'ताकत' की 'हलचल' इस कदर थी कि 'जाने-अनजाने' में भी लोग इसे 'सबका साथी' मानते रहे। 'मेरा गांव मेरा देश' के फलसफे में विश्वास करने वाले इस 'राजपूत' की 'प्रेम कहानी' का 'दीवानापन' कभी किसी 'परिचय' का मोहताज नहीं रहा। एक वक्त एेसा भी आया भी आया जब इस 'आखिरी डाकू' की 'परछाइयां' लोगों को डराने लगी लेकिन 'खुदा की कसम' इस 'जालिम' की 'अनोखी अदा' हमेशा 'नहले पर दहला' ही साबित हुई। ' मैमसाहब' का यह 'मस्ताना', ' गुड्डी' का यह 'प्रीतम' वैसे तो 'कच्चे धागे' की डोर में बंध जाता था लेकिन वक्त के हाथों मजबूर हो यह ' हत्यारा' बना तो कभी 'कुंवारा बाप' बनकर ' गद्दार' भी कहलाया। 'चोर-सिपाही' खेलने वाला यह 'एक बेचारा' ' द बर्निंग ट्रेन' में सवार हुआ तो 'हंगामा' हो गया। ' नतीजा' यह निकला कि इसने 'मुकदमा' भी झेला। 'सरकारी मेहमान' बन इसने ' दो यार' तो 'पांच दुश्मन; भी पैदा कर लिए। फिर भी ' दौलत के दुश्मन' ने कभी 'जमीर' का 'बंटवारा' नहीं किया। संभवत: यह सब इसकी 'परवरिश' का नतीजा था।
क्रमश:

बस यादें बाकी-1

स्मृति शेष : विनोद खन्ना
ठीक से तो याद नहीं लेकिन संभवत: नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर विनोद खन्ना की फिल्म 'हाथ की सफाई' आई थी। पूरी कहानी भी याद नहीं है लेकिन फिल्म का वह डायलॉग आज भी जेहन में गूंजता है। फिल्म एक जेबकतरे की कहानी पर आधारित थी। इसमें विनोद खन्ना की जेब जब कोई दूसरा काटता है तो वह उसका हाथ पकड़कर कहते हैं.. 'बच्चे जिस स्कूल में तुम पढ़ते हो हम उसमें हैडमास्टर रह चुके हैं।' यह डायलॉग बचपन में इतनी बार बोला कि यह जेहन में स्थायी रूप से चस्पा हो गया। इसी फिल्म के साथ दूसरा संयोग यह जुड़ा कि इसका गीत इतनी बार सुना और गुनगुनाया कि बरबस इसके बोल होठों पर आ ही जाते हैं। 'वादा करले साजना तेरे बिना मैं ना रहूं मेरे बिना तू ना रहे होके जुदा यह वादा रहा' खैर, खबर यह है कि प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना गुरुवार को हमारे से रुखसत हो गए। थोड़े दिन पहले ही उनकी एक फोटो वायरल हुई थी, जिसमें वे बेहद कमजोर और बीमार नजर आए। विनोद खन्ना की पहली फिल्मी पारी तो जन्म से पहले ही खेली जा चुकी थी लेकिन जब उन्होंने दूसरी पारी संभाली तब तक फिल्मों की चस्का लग चुका था। हालांकि साथ-साथ उनकी पहली पारी की फिल्में भी देखी। 'मुकदर का सिकंदर' तो इतनी पसंद है कि बार-बार देखने को जी करता है। खैर नब्बे के दशक में जब भी कोई फिल्म रिलीज होती तो बड़े ही ठसके से कहते यह विनोद खन्ना की फिल्म है।
आज इस कालजयी कलाकार के निधन पर उन्हीं की फिल्मों के नाम से लिखने तथा उनको श्रद्धांजलि देने की ठानी। हालांकि विचार आते-आते रात के साढ़े दस बज चुके थे। खैर, 'मन का मीत' यह ' महाबदमाश' 'दयावान' ' इंसान' जिंदगी के 'इम्तिहान' में इस कदर 'हेराफेरी' कर चला जाएगा किसने सोचा था। कभी 'शंकर शंभू' कभी ' महादेव' कभी ' मुकदर का सिकंदर' बना यह ' दबंग' जिंदगी की 'आखिरी अदालत' में इस तरह ' अचानक' हारेगा यकीन नहीं हो रहा है। इस 'फरिश्ते' की 'जन्मकुंडली' में इतना 'महासंग्राम' लिखा था कि 'खून-पसीने' से तैयार किए गए 'राजमहल' को छोड़कर चला गया। यह 'रखवाला' दिलों में आज इस कदर 'कैद' है कि जिंदगी भर कभी इसकी ' रिहाई' नहीं होगी। 'कुदरत' के आगे आज यह 'क्षत्रिय' हार गया। 'इंसाफ' और 'जुर्म' की दुनिया में इस 'दिलवाले' ने शोहरत और ' दौलत' भी खूब कमाई। ' अमर अकबर एंथोनी' के इस अमर पर 'आरोप' भी लगे 'लेकिन' 'सत्यमेव जयते; का यह पक्षधर अपने फैसलों पर अडिग रहा। यह कभी 'सूर्या' बनकर चमका तो कभी इसकी शीतल 'चांदनी ने आंखों को सुकून प्रदान किया।
क्रमश: .....

और 'टाइगर' चला गया

बस यूं ही
रात सवा बारह बजे घर पहुंचा तो श्रीमती को मुख्य दरवाजे पर खड़े देखकर चौंक गया। अक्सर रात को उसको फोन करके जगाना पड़ता है तब दरवाजा खुलता है। खैर, उससे मुखातिब होते ही मेरा पहला सवाल यही था कि इतनी रात गए यहां कैसे? मेरा सवाल सुनकर वह जोर से हंसने लगी। कहने लगी बच्चे आज टाइगर लेकर आए हैं। नाम सुनकर मैं फिर चौंका। मेरा हाथ पकड़कर वह चौक के कोने में बनाए अस्थायी एक छोटे से घर की तरफ ले गई। मैंने देखा उसके अंदर एक पिल्ला सोया हुआ है।
चारों तरफ ईंटें लगाकर एक तरह से बाड़ा बनाया गया था। मैंने पूछा तो कहने लगी कि बच्चे शाम को पार्क से लौट रहे थे तो यह पिल्ला रास्ते में मिल गया। किसी गाड़ी की नीचे आ ही जाता पर बच्चों ने बचा लिया। मकान मालिक का पोता भुवन्यू व अपने दोनों बच्चे इस पिल्ले को पाकर बड़ा खुश हैं। भुवन्यू ने तो अपनी मम्मी से लड़ाई भी कर ली चाहे कुछ भी हो जाए वह पिल्ला घर में ही रहेगा। घर लाकर पिल्ले को बच्चों ने बाकायदा नहलाया। उसके लिए बाहर से ईंट लेकर आए और उसके लिए घर बनाया। अंदर पायदान बिछा दिया गया। प्लास्टिक के एक पात्र पर स्कैच से टाइगर फूड लिखकर रख दिया। मैं बच्चों की मेहनत देख मुस्कुराए बिना नहीं रह सका। सोचते-सोचते अतीत में चला गया। मैंने भी कितने पिल्ले पाले। एक- दो नहीं पूरे आठ पर जिंदा एक भी नहीं बचा। मैं बहुत रोता था। जब नया लेकर आता तब मां डांटती थी। फिर भी यह शौक कम नहीं हुआ। खैर, रात को खाना खाकर उठा तो देखा पिल्ले की आवाज आ रही है। गेट खोल कर बाहर गया तो देखा वह अस्थायी घर की दीवारें लांघ कर चौक में घूम रहा था। मैंने श्रीमती को उसी वक्त कह दिया था कि यह पिल्ला इस तरह नहीं रुकेगा। हुआ भी वही सुबह टाइगर जा चुका था। बच्चों के लटके हुए चेहरे देखकर मैं भी दुखी था। बच्चों को दिलासा देते हुए मुंह से बस यही निकला बच्चों टाइगर चला गया। बच्चों ने इधर-उधर काफी जगह देखा पर टाइगर वास्तव में चला गया था।

कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं...

छत्तीसगढ़ में जवान गोली खा रहे हैं
और कश्मीर में पत्थर झेल रहे हैं,
अमन चैन और सदभाव के दावे
बस आगे से आगे टल रहे हैं।
फिर हम किस मुंह से कह रहे हैं
कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं।
दिल्ली में किसान मूत्र पी रहे हैं
लोग घुटन व तनाव में जी रहे हैं,
वादों और घोषणाओं के सब्जबाग
आम जन को यहां छल रहे हैं।
फिर हम किस मुंह से कह रहे हैं
कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं।
कांग्रेस मुक्त भारत की कहानी,
नई बोतल में है शराब पुरानी,
फकत सत्ता सुंदरी के खातिर,
भेष बहुरूपिए बदल रहे हैं।
फिर हम किस मुंह से कह रहे हैं
कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं।
नोटबंदी व लालबत्ती की बातें,
बिन मौसम की जैसी बरसातें,
करूं पड़ोसी से शिकवा क्या 'माही'
अपने ही अपनों को छल रहे हैं।
फिर हम किस मुंह से कह रहे हैं
कि देश में अच्छे दिन चल रहे हैं।

'शहरहित या स्वहित' ?

टिप्पणी
वाकई श्रीगंगानगर के जनप्रतिनिधि बड़े 'जागरूक' हैं। विशेषकर पार्षदों का तो कहना ही क्या। बात 'शहर-हित' की आती है तो यह लोग दलगत राजनीति छोड़कर एक हो जाते हैं। एेसे अवसर कई बार सामने आए हैं जब पार्र्टी गौण हो गई और सबने 'एकजुटता' का परिचय दिया। सभापति का चुनाव ही ले लीजिए। सभापति फिलहाल किसी दल से नहीं हैं लेकिन वो बाकायदा सभी दलों के पार्षदों के समर्थन के सहारे टिके हुए हैं। भले ही सभापति को लेकर कई तरह की शिकायतें हों, सार्वजनिक मंचों पर उनकी मुखालफत की जाती हो, परिषद की बैठकों में भी खूब नोकझोंक होती हो। वहां पार्षद एक दूसरे के खिलाफ बांहें चढ़ाते हों। कुर्सियां उछलती हों। जूतम पैजार या सिर फुटोव्वल जैसे हालात बनते हों लेकिन क्या मजाल कि कोई सभापति के खिलाफ पाला बदले। कांग्रेस और भाजपा के पार्षद यहां एक रंग में रंगे हुए नजर आते हैं। सभापति को समर्थन देने वालों की 'एकता' की यह जीती जागती नजीर है। संभवत: यह भी एक तरह का 'शहरहित' ही है जो सभी को 'एकजुटता' में बांधे हुए है।
अब देखिए ना पार्षदों का 'शहरहित'। भाजपा के कई पार्षद तो अपनी ही पार्टी और नेताओं से परेशान हैं। धरना दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी अपनी पीड़ा जाहिर कर रहे हैं। उनका एकसूत्री कार्यक्रम है कि भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो। रसद विभाग वाला मामला पार्षदों की नजर में इतना बड़ा है कि वो पार्टी व अपने नेताओं के खिलाफ भी बगावती सुर अलापने से बाज नहीं आ रहे हैं। वाकई भ्रष्टाचार ज्वलंत मुद्दा है और इसका विरोध होना लाजिमी है और पार्षद भी तो वही कर रहे हैं। बानगी देखिए, एक दल के पार्षद आंदोलन कर रहे हैं जबकि दूसरे दल के चुपचाप हाथ पर हाथ धरकर इस तरह बैठे हैं मानों उनकी इस मसले में मौन स्वीकृति हो। यही तो 'एकजुटता' है। इसे पार्षदों की दरियादिली कहिए या 'शहरहित' कि वो अपने वार्डों की छोटी-मोटी समस्याओं को नजरअंदाज कर केवल रसद विभाग के भ्रष्टाचार को बेनकाब करने के लिए प्रयासरत हैं। पार्षदों की नजर में शायद वार्डों की छोटी-मोटी समस्याएं रसद विभाग के भ्रष्टाचार के आगे बेहद छोटी हैं। पटरी से उतरी सफाई व्यवस्था, आवारा पशु, बंद पड़ी रोडलाइट, बदहाल पार्क, अतिक्रमण, नशाखोरी, पेयजल संकट आदि शहर की एेसी ज्वलंत समस्याएं हैं, जो पार्षदों की नजर में या तो समस्या ही नहीं हैं और अगर है तो रसद विभाग के भ्रष्टाचार से बेहद छोटी है। लगता है यह समस्याएं आम आदमी से संबंधित नहीं हैं। सिर्फ राशन प्रकरण ही जनता के सबसे नजदीक है। जनता उसी से ज्यादा प्रभावित और पीडि़त है। दरअसल, बाकी सब को गौण कर एक ही मसले में दिलचस्पी दिखाना या आंखें मूंद लेना यह भी तो एक तरह की 'एकजुटता' ही है। अपने प्रतिनिधियों के इस 'शहरहित' को देख कर आम लोग यकीनन मतदान के दिन को याद कर बार-बार अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे। खैर, इस 'शहरहित' के पीछे कहीं न कहीं 'स्व हित' भी जुड़ा है और इन दोनों हितों में इतना घालमेल हो चला है कि कई बार दोनों में अंतर तक करना मुश्किल हो जाता है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण में 21 अप्रेल 17 के अंक में प्रकाशित

कुछ तो तरस खाओ...

टिप्पणी 
सुबह सुहानी है ना यहां की शाम सिंदूरी है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त के मनोरम एवं आकर्षक प्राकृतिक नजारे को देखे हुए तो मुद्दत हो गई है। आसमान का रंग तक बदल गया है। पेड़ों से हरितिमा गायब हो चली है। सब जगह कालिमा का ही साम्राज्य दिखाई देता है। न शुद्ध हवा बची है ना शुद्ध पानी। जमीन अंदर से खोखली हो गई है। जल, जंगल एवं जमीन लगातार कम हो रहे हैं। हर तरफ राखड़ के ढेर लगे हैं। प्रदूषण की मार से तो शहर कोई कोना अछूता नहीं बचा है। जी हां, ऊर्जानगरी के नाम से विख्यात कोरबा जिले के साथ यह दर्दनाक सच जुड़ा हुआ है। वैसे भी कोरबा का नाम देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में पांचवें स्थान पर है। प्रतिदिन 55 हजार टन कोयले की राख अकेले कोरबा से निकल रही है। यही रफ्तार रही तो आने वाले समय में प्रदूषण के मामले में कोरबा पहले पायदान पर आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रदूषण से त्रस्त कोरबा के लोगों की चिंता न राज्य को है ना केन्द्र को। यहां की औद्योगिक इकाइयों को भी इससे कोई सरोकार नहीं है। सब यहीं से कमा रहे हैं लेकिन देने के नाम पर सभी के माथे पर बल पड़ते हैं। प्रदूषण को कम करने के लिए बने एक्शन प्लान का उदाहरण सबके सामने है। एक्शन प्लान को लागू करने के लिए जो राशि चाहिए, उसके लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। गेंद एक दूसरे के पाले में डालकर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा जा रहा है।
कोयला निकालने तथा बिजली पैदा करने की इस अंधी दौड़ में विकास के मुद्दे तो सिरे से ही गौण हो गए हैं। विडम्बना देखिए छत्तीसगढ़ के अलावा देश के सात राज्यों में बिजली निर्यात करने वाले कोरबा जिले के ही चालीस गांवों के लोग आज भी चिमनी एवं लालटेन के भरोसे हैं। पावर हब के नाम से विख्यात छत्तीसगढ़ एवं कोरबा जिले के लिए इससे शर्मनाक बात भला और क्या होगी। कोरबा में सरकारी दफ्तरों के लिए जमीन भले ही ना मिले लेकिन पावर प्लांट स्थापित करने में कोई दिक्कत नहीं है। आलम देखिए कि जिले का किसान पानी के लिए तरस रहा है जबकि पड़ोसी जिले रायगढ़ एवं जांजगीर चाम्पा में कोरबा के पानी से खेती लहलहा रही है। सरकार चाहे तो क्या नहीं हो सकता लेकिन यहां की खेती को भी सुनियोजित तरीके से उजाड़ा जा रहा है, ताकि औद्योगिक इकाई स्थापित करने के लिए जमीन आसानी से सुलभ हो जाए।
कोरबा में स्थापित सरकारी एवं निजी उपक्रमों पर नजर डालें तो उनकी नियत में खोट साफ नजर आता है। यह एक तरह से यहां के लोगों के साथ सरासर नाइंसाफी ही तो है। एसईसीएल यहां से खूब कमा रहा है लेकिन बदले में क्या दिया? अपोलो अस्पताल बिलासपुर में तो मेडिकल कॉलेज मनेन्द्रगढ़ चला गया। यहां के लोग बस सपने ही देखते रह गए। यही हाल बालको के हैं। यहां के लोगों के स्वास्थ्य को दरकिनार एवं नजरदअंदाज करते हुए बालको की ओर से रायपुर में तीन सौ करोड़ रुपए का केन्सर अस्पताल खोला जा रहा है। एनटीपीसी की हालत भी कुछ ऐसी ही है। भले ही उसने आईटीआई एवं इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना में सहयोग किया हो लेकिन एनटीपीसी के सहयोग से ही ट्रिपल आईटी की स्थापना राजनांदगांव में की जा रही है। कोरबा की बहुत सी प्रतिभाएं उच्च अध्ययन के लिए पलायन करने का मजबूर है लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया गया। छत्तीसगढ़ पावर जनरेशन कंपनी के अकेले कोरबा में चार प्लांट हैं लेकिन कंपनी अपना मुख्यालय तक यहां नहीं खोल पाई। कंपनी का मुख्यालय कोरबा में ही प्रस्तावित था, इसके लिए आंदोलन भी हुए लेकिन वह चुपचाप रायपुर में स्थापित कर दिया गया। कमोबेश यही हाल रेलवे का है। कोयले के लदान के लिए कोरबा से प्रतिदिन 34 से 38 के बीच मालगाडिय़ों का संचालन होता है लेकिन सवारी गाडिय़ों की संख्या इनके मुकाबले बेहद कम है। रेलवे स्टेशन को आदर्श स्टेशन बनाने का काम भी बेहद धीमा है। शहर को दो भागों में बांटने वाली लाइन पर बने फाटकों पर वाहन चालक घंटों परेशान होते हैं लेकिन रेलवे उनके लिए ओवरब्रिज तक नहीं बना पाया है। किसी प्लांट में कोयले के लदान का मामला होता तो रेलवे लाइन बिछाने में एक पल की भी देरी नहीं करता।
शहर के वर्तमान हालात के लिए औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ नगर निगम भी कम जिम्मेदार नहीं है। वह औद्योगिक इकाइयों से टैक्स तो वसूल रहा है लेकिन शहरवासियों के हित पर खर्च करने का अनुपात बेहद कम है। शहर की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यह करीब 30 किलोमीटर में फैला है लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर कोई सुविधा नहीं है। ऑटोचालक मनमर्जी का किराया वसूलते हैं। पेयजल समस्या का कोई स्थायी हल नहीं है। डे्रनेज एवं सीवरेज सिस्टम की तो कल्पना ही नहीं की गई है। आधुनिक सब्जी मंडी का मामला अधरझूल में है। एल्यूमिनियम पार्क, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी व सरकारी दफ्तरों के लिए जमीन उपलब्ध कराने तक के मामले लम्बित चल रहे हैं। इतना ही नहीं प्रदूषण की मार से बीमार हो रहे कोरबा के लोगों के लिए सभी सुविधाओं से परिपूर्ण अस्पताल तक भी नहीं है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी भी लगातार बनी हुई है। जरूरतों को देखते हुए मेडिकल एवं माइनिंग कॉलेज की मांग यहां से लगातार उठती रही है। इतना ही नहीं बेरोजगारों की लम्बी चौड़ी फौज के लिए रोजगार के साधन खोजने के कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं।
बहरहाल, उत्पादन के नाम पर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कतई उचित नहीं है। राज्य, केन्द्र एवं औद्योगिक इकाइयों के लिए स्वास्थ्य का मामला पहली प्राथमिकता शामिल होना चाहिए। यहां के जनप्रतिनिधियों को भी इस मामले में पहल करनी चाहिए। वैसे देखा गया है कि जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान ही जनता के साथ होते हैं। वादे करते हैं आश्वासनों की रेवडिय़ां बांटते हैं लेकिन बाद में वे भी औद्योगिक इकाइयों के सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं। लम्बे समय तक कोरबा की यह उपेक्षा उचित नहीं है। ऐसा न हो कि लोगों की शराफत की इंतहा हो जाए, उससे पहले सभी को कोरबा की हालात पर तरस खाना चाहिए। देरी किसी भी कीमत पर उचित नहीं है।

धोखे की बुनियाद पर धंधा

टिप्पणी 
यह विशुद्ध रूप से धंधा है, जो केवल और केवल धोखे की बुनियाद पर टिका है। यह धंधानिहायत ही दोयम दर्जे का है, जो विश्वास व रिश्तों का कत्ल भी करता है। यह धंधा बेहद घृणित व निम्नस्तर का है, जो झूठ व फरेब के सहारे चलता है। यह धंधा एक तरह का व्यापार है, जो मानवीय मूल्यों व रिश्तों की भाषा नहीं समझता। यह धंधा कुत्सित सोच का परिणाम है, जो केवल पैसों की भाषा ही जानता है। यह धंधा लालच की नींव पर बने गठजोड़ से चलता है। इस धंध में पैसे की भूख वाले दलाल तथा'धरती का भगवान कहे जाने वाले कुछ कुछ लालची किस्म के चिकित्सक शामिल हैं जो इस कुकृत्य को अंजाम दे रहे हैं। सभ्य समाज को शर्मसार करने वाले इस धंधे में वो माता-पिता भी शामिल हैं, जो बेटे-बेटियों में भेद करते हैं और कोख में कत्ल के पाप के भागीदार बनते हैं। दरअसल, यह धंधा कोख में कत्ल करने का है। यह धंधा पैसों के बदले अजन्मे बच्चों की हत्या का है। चिंताजनक व हैरत वाली बात यह है इस धंधे में कत्ल बेटियों के साथ-बेटों का भी हो रहा है। यह बात एक बार नहीं कई बार सामने आ चुकी है। फिर भी पाप का यह खेल बदस्तूर जारी है। विशेषकर हनुमानगढ़-श्रीगंगानगर जिलों में हाल में हुए डिकॉय आपरेशन में यह बात विशेष तौर पर सामने आई कि गर्भ में बेटी बताकर भी गर्भपात करवाया जा रहा है। महज इसीलिए कि कोख में बेटा बता दिया तो फिर गर्भपात कौन करवाएगा?
बड़ा सवाल यह भी है कि कानूनी धरपकड़, तमाम सरकारी अभियानों तथा जागरुकता विषयक कार्यक्रमों के बावजूद इस धंधे पर रोक क्यों नहीं लग रही? बेटी बचाओ व समानता के नारों के बीच मानसिकता में बदलाव आ क्यों नहीं रहा है? इन सवालों से जाहिर होता है कि कहीं न कहीं कमी जरूर है। भले ही वह सरकारी स्तर पर हो या सामाजिक रूप से स्वीकार्यता की। इस कमी को चिन्हित कर उसको दूर करने की सबसे पहले जरूरत है। समाज व सरकारी प्रयासों में बिना तालमेल के समानता की बात करना बेमानी है। एकसूत्री मंथन इस बात पर हो आखिर मानसिकता में बदलाव कैसे व किस तरह आ सकता है। बदलाव के प्रयासों पर सर्वाधिक जोर दिया जाना चाहिए। समानता में बाधक सामाजिक वर्जनाओं पर चोट हो। समानता के समर्थकों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जिलों में जरूरतमंद कन्याओं को शिक्षित करने तथा उनके हाथ पीले करवाने वाली सेवाभावी संस्थाओं की कमी नहीं है। सरकार के साथ-साथ इन संस्थाओं को भी इस दिशा में सोचना चाहिए। वैसे बेटा-बेटी में समानता में सबसे बड़ी बाधा दहेज भी है। दहेज के कारण समाज में लड़कियों को बोझ माना जाता है। दहेज का लेन-देन किस तरह से बंद हो, समाज की इसमें क्या भूमिका हो सकती है तथा सरकारी स्तर पर इसकी रोकथाम के लिए कानून में क्या संशोधन हो सकते हैं, इन सब बातों पर बड़े स्तर पर मंथन व चिंतन की जरूरत है।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 8 अप्रेल 17 के अंक में प्रकाशित 

हे मां! एेसा रोज क्यों नहीं होता

टिप्पणी 
हे मां दुर्गा! यह मान मनुहार का दिन साल में एक-दो बार ही क्यों आता है? हे आदिशक्ति! यह खुले हाथ से उपहारों की बारिश एक दो दिन होकर थम क्यों जाती है? हे महाकाली! यह पूछ परख का सिलसिला अवसर विशेष का मोहताज क्यों बना हुआ है? हे शैलपुत्री! यह स्वागत सत्कार का दौर एक दो दिन तक ही सीमित क्यों है? हे ब्रह्मचारिणी! यह आदर व मान-सम्मान देने का मौका रोज क्यों नहीं आता है? हे चंद्रघटा! मां व बहन का स्वरूप आप में सिर्फ आज की क्यों दिखाई देता है? हे कुष्माण्डा! यह मेहमानों जैसी आवभगत साल भर में कभी-कभार ही क्यों होती है? हे कालरात्रि ! यह अपने-पराये का भेद सिर्फ दो दिन के लिए ही क्यों भुलाया जाता है? हे महागौरी! साल भर दूरी रखने वाले के दिलों में प्रेम व स्नेह की धारा अचानक ही कैसे बहने लगती है? हे सिद्धिदात्री! महज दो दिन के लिए धर्म-सम्प्रदाय की बातें गौण कैसे हो जाती हैं? हे स्कंदमाता! पुरुष प्रधान समाज की सोच चमत्कारिक रूप से यकायक कैसे बदल जाती है? हे कात्यायनी! यह कथनी एवं करनी में भेद क्यों है? हे महिषासुर मर्दिनी! एक साथ इतने सवाल पूछने की गुस्ताखी माफ करना। सवाल पूछने का इससे मुफीद मौका और हो भी नहीं सकता। नवरात्र पर आज दिन भर बेटियों की खूब आवभगत हुई। शक्ति स्वरूपा मानकर बेटियों की पूजा की गई। घोर आश्चर्य एवं खुशी तो उन बहनों को देखकर हुई जो समाज की मुख्य धारा से कटी हुई है और खेलने खाने की उम्र में सुबह से शाम तक दर-दर भटक कर भरपेट भोजन जुटाती है। हिकारत से देखी जाती हैं। याचक की भूमिका में दुत्कार एवं फटकार पाती हैं। आज इन बहनों की दीवाली और होली सब एक साथ थी। साफ-सुथरे कपड़ों में सजी-धजी बहनों को कभी मोटरसाइकिल पर ले जाया जा रहा था तो कभी किसी लग्जरी गाड़ी में। इतना ही नहीं आज इन बहनों के प्रति इतना प्रेम उमड़ रहा था कि जैसे वो ही सब कुछ हैं।
हे मां! छोटा मुंह बड़ी बात का आरोप भले ही लगे लेकिन मेरे को यह सब दिखावा लगता है। महज दिखावा। बेटियों के प्रति इतना ही स्नेह एवं प्रेम है तो वह रोज दिखाई क्यों नहीं देता? बेटियां शक्ति स्वरूपा है तो क्यों उनका कोख में ही कत्ल किया जा रहा है? आज पूजन के लिए बेटियों की तलाश करनी पड़ी इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है। वाकई बेटियों के प्रति इतनी हमदर्दी व श्रद्धा भाव है तो फिर लिंगानुपात में इतना अंतर क्यों व किसलिए है? देश में प्रति हजार पुरुषों के पीछे 943 महिलाएं हैं। यही आंकड़ा राजस्थान में आकर और भी कम हो जाता है। श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ में प्रति हजार पुरुषों के पीछे भी महिलाओं का अनुपात कम है। सोचिए, यह मान-सम्मान, यह आवभगत, यह पूछ परख अगर वाकई दिल से होती तो क्या यह आंकड़ा बराबरी पर नहीं होता?
हे मां! आपके नाम से बेटियों की पूजा करना मेरे को तो औपचारिक हीं नजर आता है। एक तरह का दस्तूर, जिसको निभाने की सब में होड़ लगी है। एक रस्म जिसको पूरी करने में सब लगे हैं। यह देखादेखी व एक दूसरे का अनुसरण करने से ज्यादा कुछ नहीं। बराबरी का दर्जा देने की बात तथा सशक्तिकरण के दावे इस औपचारिकता के आगे बेहद बौने नजर आते हैं। हे मां! सबको सदबुद्धि दो और उनकी सोच को बदलो ताकि बेटियांे के प्रति ऐसा समभाव हमेशा दिखाई दे।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ संस्करण के 5 अप्रेल 17 के अंक में प्रकाशित 

पुलिस कार्रवाई पर सवाल

टिप्पणी 
हनुमानगढ़ में एक बालिका से जबरन जिस्मफरोशी कराने का मामला सामने आने के तीन दिन बाद सक्रिय हुई पुलिस ने नौ जगह दबिश देकर देह व्यापार में संलिप्त 27 आरोपितों को पकड़कर अपनी साख बचाने की भरपूर कोशिश की है। पकड़े गए आरोपितों में सात दलाल/ ग्राहक एवं 20 महिलाएं शामिल हैं। इस कार्रवाई से यह तो साबित हुआ है कि पुलिस चाहे तो कुछ भी संभव है, लेकिन साथ में बड़ा सवाल यह भी है कि हालात यहां तक पहुंचे ही क्यों? आखिर एेसी कौनसी चूक या शह रही, जिससे देह व्यापार करने वालों के हौसले इतने बढ़ते गए कि वह पुलिस के ठीक नाक के नीचे यह धंधा बेखौफ संचालित करने लगे। कहीं न कहीं इन सवालों के जवाब तलाशेंगे तो कठघरे में पुलिस ही होगी। एक साथ कार्रवाई करने और उसमें सफलता हासिल करने से भी यही साबित होता है कि पुलिस को देह व्यापार के इन ठिकानों की जानकारी पहले से थी। और अगर जानकारी थी तो जिम्मेदार क्यों आंखें मंूदे रहे? पुलिस पर सवाल दोनों तरफ से हैं। कार्रवाई न करने पर भी और कार्रवाई करने के बाद भी। एेसा इसलिए क्योंकि जिस सुरेशिया चौकी से कुछ ही दूरी पर मासूम बालिका के सपनों व अरमानों को जबरन रौंदा जाता रहा है वह पुलिस को दिखाई नहीं दिया। लेकिन आनन-फानन में नौ ठिकाने खोज निकाले गए। अपनी खाल बचाने को पुलिस यह दलील जरूर दे सकती है कि देह व्यापार के अड्डों पर कार्रवाई से पहले ही आरोपित भूमिगत हो जाते हैं, इसलिए सफलता नहीं मिलती। खैर, किसी कार्रवाई को कितनी गोपनीयता से अंजाम दिया जाता है यह भी पुलिस से बेहतर कोई नहीं जान सकता।
हनुमागढ़ के नौरंगदेसर के पास ओवरलोड जीप का हादसा शेरगढ़ चौकी के पास हुआ। देह व्यापार का मामला भी पुलिस चौकी के पास ही हुआ। सुरेशिया में शांतिप्रिय एवं इज्जतदार लोग भी रहते हैं। लेकिन आज उस बस्ती की पहचान देह व्यापार के लिए कुख्यात बस्ती के रूप में है। जो इज्जतदार हैं वह इसलिए नहीं बोलते कि देह व्यापार का धंधा पुलिस चौकी की नाक के नीचे चल रहा है। पुलिस अधीक्षक अगर चाहें तो सुरेशिया के दस इज्जतदार लोगों को अपने दफ्तर में बुलाकर पुष्टि कर सकते हैं। खोजने पर इस तरह के उदाहरण और भी मिल जाएंगे। खास बात यह है कि इन हादसों/प्रकरणों से कोई सबक नहीं लिया जाता है। यह बात दीगर है कि तात्कालिक आक्रोश को शांत करने के उपाय जरूर खोज लिए जाते हैं। इसके बाद व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। 
बहरहाल, हनुमानगढ़ में देह व्यापार की शिकायतों को देखते हुए अभी और कार्रवाई की दरकार है। विशेष रूप से उन होटलों की गहनता से पड़ताल होनी चाहिए जिनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं। जंक्शन में बस अड्डे के आसपास ही एेसे कई होटल हैं जहां दिनदहाड़े जिस्मफरोशी की गतिविधियां संचालित होती है। आसपास के दुकानदार इन होटलों में चल रही गतिविधियों से परेशान हैं। शिकायत इसलिए नहीं करते कि पुलिस के साथ सांठगांठ का दावा होटल वाले करते रहते हैं। फिलहाल तो पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती मासूम से देह व्यापार करवाने की आरोपित महिला को पकडऩा है। संभव है उसके पकड़े जाने के बाद और कई चौंकाने वाले खुलासे हों। जरूरत ईमानदार व कारगर तथा लगातार कार्रवाई की है। सवालों से घिरी पुलिस के पास इससे बेहतर मौका और होगा भी क्या? आखिर जिस जनता की नजरों में आज वह खटक रही है, वही जनता उसको आंखों पर बैठाती है। यह पुलिस पर निर्भर करता है वह कौनसी राह चुनती है।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ संस्करण में 2 अप्रेल 17 को प्रकाशित

ईमानदार तहकीकत की दरकार

टिप्पणी
श्रीगंगानगर में राशन फर्जीवाड़े का मामला भले ही जयपुर पहुंच गया हो। विधानसभा में भी उठ गया हो। और तो और मंत्री ने कार्रवाई का भरोसा भी दे दिया हो लेकिन इस प्रकरण की पड़ताल ईमानदारी से होगी, इसमें संशय नजर आता है। प्रशासनिक एवं सरकार के स्तर पर अब तक हुई कार्रवाई तो कुछ इसी तरह के संकेत दे रही है। प्रकरण के खुलासे के तीन-चार दिन बाद महज दस राशन डीलरों के लाइसेंस निलंबित करने की कार्रवाई से समझा जा सकता है कि हुक्मरान इस गंभीर मसले को कितने हल्के में ले रहे हैं। सरकार की देर से की गई तथा औपचारिक व मजबूरी से भरी इस कार्रवाई से यह प्रकरण और भी संदिग्ध हो जाता है। संभव नहीं कि फर्जीवाड़े के खेल में अकेले राशन डीलर ही यह सब कर रहे थे, वह भी इतने बड़े पैमाने पर। वैसे इसकी टोपी उसके सिर रखने की होड़ ने इस फर्जीवाडे़ के सूत्रधारों, जिम्मेदारों और भागीदारों की भूमिका को भी संदेह के दायरे में ला दिया है। इसकी बानगी देखिए। राशन डीलर कहते हैं गड़बड़ी उन्होंने नहीं की, पोस मशीन खराब है या फिर ई मित्र वालों ने गड़बड़ की है। जबकि विभाग कह रहा है कि राशन उठाना आसान काम है। जिनके नाम से राशन उठाया गया है, उन्होंने राशनकार्ड आधार, भामाशाह व गैस कनेक्शन नंबर लिंक नहीं करवाए हैं। उन उपभोक्ताओं के साथ एेसा हो सकता है। विभाग की इसमें कोई गलती नहीं है। 
विभाग की दलील तो यह भी है कि ऑनलाइन काम में कंट्रोल नहीं रहता। मतलब जो कुछ हुआ उसके लिए केवल उपभोक्ता ही जिम्मेदार है। इधर, इस मामले में फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ करने वाले पार्षद तो डिपो धारक व अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं। आरोप सच्चाई के नजदीक नजर इसलिए भी आते हैं कि इस तरह का घपला जब बड़े स्तर पर होता है और कार्रवाई ऊंट के मुंह में जीरे के समान होती है। अक्सर देखा भी गया है कि फर्जीवाड़े के खेल में तालमेल से ही घालमेल होता है।
खैर, रसद विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल तो उस वक्त भी उठते रहे हैं जब राशन वितरण का काम ऑफलाइन होता रहा है। अब केवल निलंबन की कार्रवाई से भी सवाल उठते हैं। भले ही विभाग ने तात्कालिक कार्रवाई कर अपनी खाल बचाने का भरपूर प्रयास किया हो लेकिन निलंबन करना यह तो दर्शाता ही है कि गड़बड़ी हुई है। और गड़बड़ी हुई है तो फिर इसकी पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं? महज निलंबन करके रसद विभाग क्या किसी जांच से बचना चाहता है? क्या विभाग के अधिकारियों को डर है कि जांच हुई तो कहीं उसकी जद में वो न आ जाए? कहीं विभाग की भूमिका से पर्दा न उठ जाए?
बहरहाल, इस मसले में कुछ तो एेसा है ही जो अधिकारियों को इस प्रकरण को पुलिस तक ले जाने से रोक रहा है। वैसे इस प्रकरण का पर्दाफाश करने वालों को अब चुपचाप नहीं बैठना चाहिए। भ्रष्टाचार और घपले के इस खेल में शामिल सभी सूत्रधारों व भागीदारों के नाम सार्वजनिक तभी हो पाएंगे जब इसकी जांच ईमानदारी से होगी। क्योंकि सरकारी संरक्षण व शह पाकर मजबूत होने वाले गठजोड़ों की गांठ तोडऩा आसान काम नहीं होता। जांच भी स्वतंत्र एजेंसी से हो तभी दूध का दूध व पानी का पानी होने की उम्मीद है, वरना यह खेल जैसे चलता आया है वैसे ही चलता रहेगा। अनवरत... बदस्तूर...।
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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 30 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

...तो क्या हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं?

टिप्पणी,
श्री गंगानगर शहर के अंदर से गुजरने वाले नेशनल/स्टेट हाइवे पर अब शराब की दुकानें खुलेंगी। यह इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि राज्य सरकार ने नियमों की आड़ में पतली गली ढूंढ ली है। नए नियमों के बहाने दलील दी जा रही है कि नगर पालिका या परिषद क्षेत्र से गुजरने वाले नेशनल/स्टेट हाइवे जिनके बाइपास हैं, उन पर शराब की दुकानें खुल सकेंगी। आदेशों के तहत श्रीगंगानगर के लक्कड़ मंडी टी पाइंट से लेकर सूरतगढ़ बाइपास तक, शिव चौक से नाथांवाला बाइपास तक तथा कोडा चौक से पदमपुर बाइपास तक शराब की दुकानें खोली जा सकेंगी। नए आदेश एक अप्रेल से लागू हो जाएंगे। इन आदेशों से यह तो साफ जाहिर होता है कि कमाई के लिए राज्य सरकार कुछ भी कर सकती है और किसी भी हद तक जा सकती है। एेसा इसलिए है क्योंकि नियमों को ठेंगा दिखाने, उनमें संशोधन करने या उनको घुमा फिराकर नए सिरे से परिभाषित करने की कलाकारी सरकार व उसके हुक्मरानों को बखूबी आती है। खैर, शराब दुकानों के मामले में राज्य सरकार द्वारा इस तरह और इतने समय बाद नियमों का तोड़ निकालने से एक नई बहस जरूर खड़ी हो गई है। साथ ही कई तरह के सवाल भी हैं, जो सरकार व हुक्मरानों को कठघरे में खड़ा करते हैं। नियम बनाने वाले यह क्यों समझते हैं कि शराब का सेवन करने से हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं। शराब पीकर शहरी क्षेत्र में गाड़ी चलाने वालों से तो हादसे होते ही नहीं या फिर नगरपालिका या नगर परिषद क्षेत्र से गुजरने वाले एेसे नेशनल और स्टेट हाइवे जिनके बाइपास बने हुए हैं उन पर ही वाहन चलते हैं, वो शहर के अंदर आते ही नहीं। नियमों की आड़ में निकाले गए इस तरह के आदेशों से तो यही जाहिर होता है कि हादसे केवल हाइवे पर ही होते हैं और जान का खतरा भी केवल और केवल हाइवे पर ही होता है। बाकी जगह शराब पीकर किसी भी तरह गाड़ी चलाओ, जानमाल का कोई खतरा नहीं है।
राजस्व के लिए सरकार किस हद पर तक जा सकती है। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि जिस बाइपास का हवाला दिया जा रहा है वह अभी तक पूर्ण ही नहीं है। मुख्यमंत्री के उद्घाटन के बावजूद हाइवे का काम अभी तक अधूरा पड़ा है। अधिग्रहित की गई जमीन के बदले किसानों को मुआवजा वितरण अभी तक नहीं किया जा सका है। मुआवजा हुक्मरानों के बीच लंबे समय तक फुटबाल बना हुआ है। इस काम को पूर्ण करने के लिए शराब की दुकानों जैसी तत्परता दिखाई नहीं देती। हाइवे का अधूरा काम अगर तत्काल प्रभाव से भी शुरू होता है तो कम से कम छह माह पहले वह पूर्ण नहीं हो पाएगा।
बहरहाल, समूचे प्रदेश में शराब बंदी के लिए अनशन करने तथा जान की बाजी लगाने वाले शख्स के जिले में इस तरह नियमों की आड़ में दुकानें खोलना दिखाता है कि सरकार शराब के माध्यम से राजस्व प्राप्ति के लिए किस हद तक जा सकती है। यह फैसला शराबबंदी की मांग को मुखर करने वालों को ठेंगा भी दिखाता है और चिढ़ाता भी है। खैर, प्रतिबंध के बावजूद रात आठ बजे बाद शराब बेचने की अघोषित छूट की बात से इसको समझा जा सकता है कि सरकार को सिर्फ और राजस्व पसंद है, भले ही वह कैसे भी आए। जान जाती है तो चली जाए, अमन-चैन भंग होता है तो हो। सरकार को इससे सरोकार नहीं।

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राजस्थान पत्रिका के श्रीगंगानगर संस्करण के 25 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित

धैर्य की परीक्षा कब तक?

टिप्पणी
यह सवाल है न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद का। केन्द्र की ओर से समर्थन मूल्य का निर्धारण होने तथा मंडी में सरसों की आवक शुरू होने के बावजूद अभी तक इसकी सरकारी खरीद शुरू नहीं हो पाई है। यह सवाल बहुत बड़ा है और लंबे समय से अनुतरित है। तभी तो यह कमोबेश हर साल उठता है और हर बार इसी तरह का विरोध होता है। व्यवस्थाओं में दोष के खिलाफ आक्रोश भड़कना लाजिमी है। इस कड़ी में आंदोलन होते हैं। वार्ताओं के दौर चलते है। ज्ञापन लेने की औपचारिकताएं निभाई जाती हैं तो आश्वासन की रेवडि़यां भी खूब बंटती हैं। अंततोगत्वा सियासी लाभ-हानि का गणित देखने तथा तात्कालिक परिस्थितियों के आधार पर विरोध को शांत करने के वैकल्पिक उपाय तलाशे जाते हैं। 
विडम्बना यह है कि इस तरह की प्रक्रिया हर साल दोहराई जाती है। इससे भी अफसोसजनक बात तो यह है कि हक हकूक से जुड़े मसले का कभी स्थायी समाधान नहीं खोजा जाता। जिम्मेदारों और हुक्मरानों ने रोजी-रोटी से जुड़े इस अहम सवाल को कभी गंभीरता से नहीं लिया। यह सवाल धरतीपुत्रों के हक से जुड़ा है। यह सवाल उनके कठोर परिश्रम के प्रतिफल से वाबस्ता है। यह सवाल उनके जीवन से इतना घुला-मिला और रचा बसा है कि इसके समाधान होने से ही उनके घर में खुशी आती है। 
यह सवाल है न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद का। केन्द्र की ओर से समर्थन मूल्य का निर्धारण होने तथा मंडी में सरसों की आवक शुरू होने के बावजूद अभी तक इसकी सरकारी खरीद शुरू नहीं हो पाई है। इसी मांग को लेकर श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले के धरतीपुत्र आंदोलन की राह पर हैं। उनमें आक्रोश उबल रहा है लेकिन जिम्मेदारों व हुक्मरानों के पास अभी कोई ठोस समाधान या आश्वासन नहीं है। सरकारी प्रयासों की बानगी देखिए कि श्रीगंगानगर जिले में अभी तक चने की सरकारी खरीद के लिए केवल एक केन्द्र बनाया गया है तथा गेहूं के लिए 34 केन्द्रों की स्थापना की गई है, लेकिन सरसों के लिए खरीद केन्द्र तक बनाने की जरूरत नहीं समझी गई। इससे समझा जा सकता है कि सरकार खरीद मामले में कितनी गंभीर है और किसानों की कितनी हमदर्द है। 
प्रदेश को धन-धान्य से परिपूर्ण करने वाले जिलों में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ का योगदान किसी से छिपा हुआ नहीं है, लेकिन यह सब करने के लिए किसान को पग-पग पर परीक्षा देनी पड़ती है। सड़कों पर आना पड़ता है। कभी पानी के लिए, कभी बारी के लिए। वह जैसे-तैसे इन समस्याओं से निबटता है तो फिर खरीद के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। दिन-रात एक कर कठोर परिश्रम दम पर रिकॉर्डतोड़ पैदावार लेने वाले धरतीपुत्र को उसकी मेहनत का वाजिब हक आखिरकार क्यों नहीं मिलता? 
बहरहाल, यह तो जगजाहिर है कि श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिले के किसानों ने अपनी मेहनत व लगन के दम पर दोनों ही जिलों को कृषि के मामले में अव्वल बनाया है। सरकारी स्तर पर पानी से लेकर जिंसों की खरीद तक उन्हें सहुलियत मिले तो नि:संदेह दोनों जिलों के खाते में उपलब्धियों के और भी रिकॉर्ड होंगे। पर यह सब सरकार व उनके हुक्मरानों की इच्छाशक्ति एवं संवदेनशीलता पर निर्भर करता है। धरतीपुत्रों की धैर्य की परीक्षा अब खत्म होनी चाहिए। उनके साथ सरकारी स्तर की यह संवेदनहीनता व नाइंसाफी किसी भी कीमत पर उचित नहीं है।
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राजस्थान पत्रिका श्रीगंगानगर संस्करण के 22 मार्च 17 के अंक में प्रकाशित