Wednesday, December 28, 2016

क्या यह भेदभाव नहीं?


पीड़ा 
रियो ओलंपिक में देश को रजत व कांस्य पदक दिलाने वाली पीवी सिंधू व साक्षी मलिक के नाम तो सभी को याद ही होंगे। पदक जीतने वाली इन दोनों खिलाडिय़ों के अलावा जिमनास्ट दीपा कर्माकर का नाम भी जेहन में होगा ही। जब इतना याद है तो यह भी स्मरण जरूर होगा कि रियो ओलंपिक गए दल में किसी भी पुरुष खिलाड़ी ने कोई पदक नहीं जीता। था। सभी जिस उत्साह से गए थे, उतने ही निराश मन से मुंह लटकाए वापस आ गए। स्वर्ण पदक की आस तो हर तरफ से अधूरी ही रह गई। खैर, रियो ओलपिंक जुड़ी यह तो मुख्य बातें थी। इसके अलावा भी बहुत कुछ हुआ था। जरा याद कीजिए, सोशल मीडिया से लेकर मीडिया व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में किस तरह का माहौल तैयार किया गया। पदक की आस में खिलाडिय़ों को बांस पर इस कदर चढ़ा दिया गया था कि बेचारे उम्मीदों के बोझ से ही दब गए। कहने का मतलब यह है कि भारतीय खिलाडिय़ों के प्रदर्शन से पहले और प्रदर्शन के बाद जिस तरह चर्चा रही है वह अपने आप में अनूठी थी। पदक विजेताओं का देश में लौटने के बाद जिस गर्मजोशी से स्वागत हुआ वह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है। देश का मान बढ़ाने वाले खिलाडिय़ों का सम्मान इसी अंदाज में होना भी चाहिए। स्वागत के साथ-साथ पदक विजेता बेटियों के लिए इनामों की तो एक तरह से झडी ही लग गई थी। हर तरफ इनाम ही इनाम और कई तरह की घोषणाएं। इतनी घोषणाएं हुई कि सब को याद रखना हर किसी के बस की बात भी नहीं है। फिर भी कुछ मोटी घोषणाओं की बात करें तो रजत पदक जीतने वाली पीवी सिंधू के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने तीन करोड़ रुपए नकद के साथ मकान बनाने के लिए एक हजार स्क्वायर यार्ड जमीन तथा नंबर वन क्लास अफसर की नौकरी की घोषणा की। तेलंगाना सरकार ने भी सिंधू को एक करोड़ रुपए देने की घोषणा की। बैंडमिंटन एसोसिएशन ने पचास लाख रुपए देने की घोषणा की। ऑल इंडिया फुटबाल फैडरेशन ने पांच लाख की देने की बात कही। मध्य प्रदेश सरकार ने भी सिंधू को पचास लाख रुपए देने की घोषणा की। इसके अलावा देश भर की कई कम्पनियों, ज्वैलरी शोरूम व बिजनैस मैन आदि ने भी गिफ्ट व कैश की घोषणा की। क्रिकेट स्टार सचिन तेन्डुलकर ने बीएमडब्ल्यू कार दी। यह फेहरिस्त और भी लंबी है। 
इसी तरह कांस्य पदक जीतने वाली साक्षी मलिक को हरियाणा सरकार ने ढाई करोड़ एवं नौकरी देने का ऐलान किया। रेलवे ने साठ लाख रुपए देने की घोषणा की। इसके अलावा साक्षी को भी सचिन से बीएमडब्ल्यू मिली तथा कई तरह के गिफ्ट भी बतौर उपहार मिले। खैर, विजेता खिलाडिय़ों पर इनामोंं की यह बारिश इसलिए थी कि इन्होंने देश का मान बढ़ाया बल्कि इसलिए भी थी कि देश के बाकी खिलाड़ी भी इनसे प्रेरणा लें और भविष्य में इन जैसा चमकदार प्रदर्शन करें। खिलाडिय़ों का मनोबल बढ़ाने तथा उनमें जोश भरने के लिए इस तरह के इनाम जरूरी भी हैं। हो सकता है खिलाडिय़ों के सम्मान में संबंधित सरकारों के निहितार्थ छिपे हों लेकिन सभी ने मुक्त हस्त से खिलाडियों पर धनवर्षा की। देश के गौरव को चार चांद लगाने वाली इन खिलाडिया़ें पर इस तरह ही धन वर्षा किसी को अखरी भी नहीं। 
रियो ओलंपिक के पीछे-पीछे ही रियो पैरालंपिक आया। मतलब दिव्यांग खिलाडिय़ों का महाकुंभ। विडम्बना देखिए मीडिया में यह यह महाकुंभ उतना हाइलाइट नहीं हो पाया जितना पहले वाला था। अपवाद स्वरूप कुछ मीडिया घराने जरूर रहे जिन्होंने इस महाकुंभ को भी मान-सम्मान दिया बाकी तो यह आयोजन चुपचाप ही चल रहा था। और इस चुपके चुपके में ही देश के हिस्से में दो स्वर्ण सहित कुल पांच पदक आ गए। शुरुआत हाई जंप में मरियप्पन ने की। वो ही मरियप्प्पन जिसकी मां सब्जी बेचती बताई। खैर, मरियप्पन की इस स्वर्णिम खुशी को दोगुना किया शेखावाटी के लाडले देवेन्द्र झाझडिय़ा ने। देवेन्द्र ने न केवल स्वर्ण जीता बल्कि नया विश्व रिकॉर्ड भी बनाया। साथ ही भाला फेंकने में दो बार स्वर्ण जीतने वाले देश के पहले खिलाड़ी होने का गौरव भी हासिल किया। देवेन्द्र की स्वर्णिम खबर के साथ एक छोटी सी खबर यह भी कि राज्य सरकार ने उनकी इस उपलब्धि पर 75 लाख रुपए नकद देने की घोषणा की तथा सरकारी नौकरी देने पर विचार चल रहा है। इसके अलावा 25 बीघा नहरी मुरब्बा तथा जयपुर में भूखंड देने की खबरें भी सोशल मीडिया में वायरल हुई। इसके अलावा किसी तरह की कोई घोषणा देखने/सुनने को नहीं मिली। यह बेहद चौंकाने वाली बात थी। जिस देश में कुछ दिनों पूर्व इनामों की बारिश हो रही थी, वहां अब सूखा था। एकमात्र घोषणा 75 लाख एवं नौकरी के विचार पर आकर सिमट गई। 
अक्सर कहा जाता है कि इनाम का तो धन्यवाद ही बड़ा होता है लेकिन देवेन्द्र के मामले में इस बात के मायने बदल जाते हैं। देश-प्रदेश में देवेन्द्र के स्वर्णिम पदक की चमक को रजत एवं कांस्य से भी कमतर आंका गया। अफसोसजनक यह भी है कि यहां न तो कोई कंपनी आगे आई और न ही कोई बिजनैसमैन। ज्वेलरी शॉरूम वाले भी पता नहीं कहां दुबक गए। एक दिव्यांग खिलाड़ी, जिसने अपनी शारीरिक कमजोरी पर पार पाते हुए देश का नाम रोशन किया, उसके प्रति ऐसा करना भेदभाव नहीं तो क्या है? इस देश में दो हाथों वाले जिस काम करने को तरसते हैं उसे एक हाथ के देवेन्द्र ने बखूबी कर दिखाया। उसके हौसले, जज्बे व मेहनत को सलाम। बस जिम्मेदारों, जनप्रतिनिधियों से यही शिकायत व पीड़ा है कि वे इस तरह से पेश ना आए, वरना कल कौन देवेन्द्र आगे आएगा। निसंदेह इस तरह की घोषणाएं मनोबल बढ़ाने की नहीं वरन तोडऩे वाली होती है। फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि देवेन्द्र जैसे जीवट, जुझारू खिलाड़ी के लिए सरकार का इस तरह का रूखा रवैया कोई बाधा नहीं बनेगा। देवेन्द्र ने अपनी शारीरिक कमजोरी पर विजय पाई है तो जरूर उसमें वह जज्बा भी है जो उसे विजेताओं की श्रेणी में खड़ा करता है। एक खिलाड़ी की पहचान भी तो यही होती है। सलाम देवेन्द्र को। लख-लख बधाई भी ।

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