Wednesday, December 28, 2016

दोहरा चरित्र!

टिप्पणी

राज्य में शिक्षण संस्थानों से सौ मीटर की दूरी पर शराब बेचने पर पूर्णतया रोक के दावे के बाद भी शिक्षा के मंदिर में शराब ठेकेदारों की किस्मत तय करने में गुरेज नहीं करना विडम्बना है। इससे यह तो साफ जाहिर हो ही जाता है कि प्रतिबंध कैसा है। उसकी पालना करवाने में कितनी गंभीरता बरती जाती है। शुक्रवार को बीकानेर के डूंगर कॉलेज में शराब ठेकों की लाटरी निकाली गई। इस दौरान कॉलेज में नियमित कक्षाएं भी लगी। दलील है कि ठेकों की लॉटरी के लिए दिए भवन से अध्ययन-अध्यापन पर असर नहीं पड़ा। और फिर लॉटरी तो शराब की दुकानों की थी, शराब की नहीं। खैर, दलील देने की कोई बड़ी वजह या मजबूरी हो सकती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसे कामों के लिए शिक्षा के मंदिरों का चयन ही क्यों किया जाता है? जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को इससे मुफीद और कोई जगह क्यों नहीं मिलती? क्या ऐसा करना उचित है?
यह सही है कि शराब से मोटा राजस्व मिलता है, लेकिन विद्यार्थियों को नशे से दूर रहने की नसीहत दिए जाने वाले शिक्षण संस्थानों में शराब ठेकों का निर्धारण करना कितना न्यायसंगत है। नशे के दुष्परिणाम बताए जाते हैं। नशा उन्मूलन के लिए जागरुकता विषयक रैलियां निकाली जाती हैं। जहां नशा न करने के संकल्प किए जाते हैं। शपथ ली जाती है। ऐसा विरोधाभास क्या विद्यार्थियों को खटकेगा नहीं? उनको कचोटेगा नहीं? कहने को कुछ विद्यार्थियों ने कॉलेज परिसर में लॉटरी प्रक्रिया का विरोध जरूर जताया है लेकिन यह महज कागजी है। औपचारिक भर है। वह इसलिए है क्योंकि लॉटरी के स्थान की घोषणा दो रोज पहले ही हो चुकी है। वाकई उनको कॉलेज की या उसके माहौल की चिंता होती तो उनका विरोध तो स्थान घोषणा वाले दिन ही हो जाना चाहिए था।
वैसे, यह न केवल जिम्मेदारों बल्कि सरकार की कथनी एवं करनी में भेद उजागर करता है। यह दोहरा चरित्र नहीं है तो और क्या है। लॉटरी का स्थान तय करते समय जिम्मेदारों के जेहन में एक पल के लिए भी यह विचार क्यों नहीं आया कि इससे विद्यार्थियों पर क्या असर पड़ेगा? खैर, इस पहलू को सिरे से नजरअंदाज किया गया तभी तो यह सब हुआ।
बहरहाल, जो होना था वो हो चुका लेकिन भविष्य में ऐसा न हो इस पर सोचने की जरूरत है। कम से कम शिक्षा के मंदिरों को ऐसी लॉटरी से अलग रखना चाहिए। इससे पहले वेटरनरी में यह लॉटरी निकाली जाती रही है लेकिन वहां भी तो शैक्षणिक माहौल ही है। सब चलता रहा। सरकार का काम है तो सरकारी मुलाजिम कैसे विरोध करेंगे, यह बात तो जिम्मेदारों को सोचनी चाहिए। उम्मीद है जिम्मेदार अधिकारियों को इस बात की गंभीरता को समझते हुए भविष्य में लॉटरी के लिए ऐसा स्थान तय करना चाहिए, जिस पर कोई किन्तु-परन्तु ना हो।


राजस्थान पत्रिका बीकानेर के 12 मार्च 16 के अंक में प्रकाशित..

No comments:

Post a Comment